Brahmasutra/C2/S1: Difference between revisions
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| title = प्रथमः पादः | | title = प्रथमः पादः | ||
}} | }}=== स्मृत्यधिकरणम् === | ||
=== स्मृत्यधिकरणम् === | |||
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सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यादिति चेन्न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वाच्छृतेराधिक्यं सिद्ध्यति॥ 01 ॥ | सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यादिति चेन्न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वाच्छृतेराधिक्यं सिद्ध्यति॥ 01 ॥ | ||
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इतरेषां तासु स्मृतिषूक्तानां फलादीनां प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेरप्रमाण्यं तासां युक्तम् । चशब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥ | इतरेषां तासु स्मृतिषूक्तानां फलादीनां प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेरप्रमाण्यं तासां युक्तम् । चशब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥ | ||
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योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यमिति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥ | योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यमिति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥ | ||
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नैवं श्रुतेस्तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्देरप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात् नित्यत्वात् तदनुसारित्वाच्च । न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः । स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः । | नैवं श्रुतेस्तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्देरप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात् नित्यत्वात् तदनुसारित्वाच्च । न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः । स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः । | ||
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‘न चक्क्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेधा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च । | ‘न चक्क्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेधा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च । | ||
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नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’ इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥ | नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’ इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥ | ||
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अधिकारिणां फलम् । भविष्यत्पुराणे च | अधिकारिणां फलम् । भविष्यत्पुराणे च | ||
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‘ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या मूलरामायणं तथा। | ‘ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या मूलरामायणं तथा। | ||
भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः ॥ | |||
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पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः । | पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः । | ||
स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद्विचार्यते ॥ | |||
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यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् । | यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् । | ||
नाप्रामाण्यं भवेत् तेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥ | |||
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इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन । | इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन । | ||
अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥ | |||
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मृदाद्यभिमानिदेवता तत्र व्यपदिश्यते । तासां चेतरेभ्यो विशिष्टं सामर्थ्यमनुगतिश्च सर्वत्र । अतस्तासां सर्वमुक्तं युज्यते ॥ 06 ॥ | मृदाद्यभिमानिदेवता तत्र व्यपदिश्यते । तासां चेतरेभ्यो विशिष्टं सामर्थ्यमनुगतिश्च सर्वत्र । अतस्तासां सर्वमुक्तं युज्यते ॥ 06 ॥ | ||
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तासां सामर्थ्यं महद्भिः । भविष्यत्पुराणे च – | तासां सामर्थ्यं महद्भिः । भविष्यत्पुराणे च – | ||
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‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः। | ‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः। | ||
अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः । | |||
ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥ | |||
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प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते । सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि’तदधीनत्वादर्थवत्’ इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेनाङ्गिकारादसतः प्राप्तिः।तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते ।समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद्युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥ | प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते । सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि’तदधीनत्वादर्थवत्’ इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेनाङ्गिकारादसतः प्राप्तिः।तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते ।समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद्युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥ | ||
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असत उत्पत्तौ प्रलयेऽपि सर्वासत्त्वमेव स्यात् ॥ 09 ॥ | असत उत्पत्तौ प्रलयेऽपि सर्वासत्त्वमेव स्यात् ॥ 09 ॥ | ||
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प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते। सत उत्पत्तिः, सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥ | प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते। सत उत्पत्तिः, सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥ | ||
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दृष्टान्ताभावादेव ॥ 11 ॥ | दृष्टान्ताभावादेव ॥ 11 ॥ | ||
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एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावादुक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेन्न, एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्ष प्रसङ्गः । अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् । | एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावादुक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेन्न, एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्ष प्रसङ्गः । अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् । | ||
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‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥ | ‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥ | ||
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एतेन दृष्टान्तभावेनाभावेन चावशिष्टा अप्यपरिग्रहा विरुद्धसिद्धान्ता अकर्तृकत्वाचेतनकर्तृकत्वजीवकर्तृकत्वादयोऽपि । | एतेन दृष्टान्तभावेनाभावेन चावशिष्टा अप्यपरिग्रहा विरुद्धसिद्धान्ता अकर्तृकत्वाचेतनकर्तृकत्वजीवकर्तृकत्वादयोऽपि । | ||
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‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’ | ‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’ | ||
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‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति । | ‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति । | ||
प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥ | |||
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‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः । | ‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः । | ||
जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’ | |||
इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः । यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः । श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥ | |||
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‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव । न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेन्न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः | ‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव । न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेन्न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः | ||
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‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’ इति । | ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’ इति । | ||
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स्कान्दे च – | स्कान्दे च – | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् । | ‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् । | ||
न चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते ॥ | |||
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एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना । | एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना । | ||
प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति । | |||
}} | }} | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते । | ‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते । | ||
तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च । | |||
}} | }} | ||
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| id = BS_C02_S01_V14_B11 | | id = BS_C02_S01_V14_B11 | ||
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‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’’न ते विष्णो जायमानो न जातः’ | ‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’’न ते विष्णो जायमानो न जातः’ | ||
इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स्वतन्त्र बहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः । | स्वतन्त्र बहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः । | ||
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‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथाऽऽसीत्’ इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च । | ‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथाऽऽसीत्’ इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते । | ‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते । | ||
साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’ इत्यादिभिः ॥ 15 ॥ | |||
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स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाण्यैरुपलभ्येत । | स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाण्यैरुपलभ्येत । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्तिकुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥ | ‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्तिकुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥ | ||
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अवरस्य तदधीनस्य साधनस्य सत्त्वात् । | अवरस्य तदधीनस्य साधनस्य सत्त्वात् । | ||
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‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद्यदासीत् तदावृतमासीत् ततधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद्यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’ इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥ | ‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद्यदासीत् तदावृतमासीत् ततधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद्यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’ इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥ | ||
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‘नासदासीन्नो सदासीत्’ इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेन्न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।’तम आसीत्’ इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति । | ‘नासदासीन्नो सदासीत्’ इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेन्न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।’तम आसीत्’ इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति । | ||
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‘अजे ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’। | ‘अजे ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’। | ||
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति । | |||
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न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’॥ | न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’॥ | ||
| Line 632: | Line 590: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’। | ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’। | ||
| Line 641: | Line 598: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’ | ‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’ | ||
| Line 650: | Line 606: | ||
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‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’। | ‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’। | ||
| Line 659: | Line 614: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अथैनमाहुः सत्यकर्मेति, सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’। | ‘अथैनमाहुः सत्यकर्मेति, सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’। | ||
| Line 668: | Line 622: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः । | ‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः । | ||
| Line 677: | Line 630: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B11 | | id = BS_C02_S01_V18_B11 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता। | ‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता। | ||
तथैवार्थ परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’ | |||
इति बृहत्संहितायाम् । | |||
}} | }} | ||
| Line 688: | Line 640: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B13 | | id = BS_C02_S01_V18_B13 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः । | ‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः । | ||
तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ इति च । | |||
}} | }} | ||
| Line 698: | Line 649: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B15 | | id = BS_C02_S01_V18_B15 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि । | ‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि । | ||
इत्यादिवद्विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः । | |||
}} | }} | ||
| Line 708: | Line 658: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B17 | | id = BS_C02_S01_V18_B17 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥ | प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥ | ||
| Line 717: | Line 666: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B18 | | id = BS_C02_S01_V18_B18 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना । | वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना । | ||
अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’ | |||
इति भागवततन्त्रे । | |||
}} | }} | ||
| Line 728: | Line 676: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B20 | | id = BS_C02_S01_V18_B20 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् । | ‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् । | ||
मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 738: | Line 685: | ||
| id = BS_C02_S01_V18_B22 | | id = BS_C02_S01_V18_B22 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥ | प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥ | ||
| Line 756: | Line 702: | ||
| id = BS_C02_S01_V19_B1 | | id = BS_C02_S01_V19_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘साधनानां साधनत्वं यदात्माधीनमिष्यते । | ‘साधनानां साधनत्वं यदात्माधीनमिष्यते । | ||
तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’ | |||
इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता । | |||
}} | }} | ||
| Line 767: | Line 712: | ||
| id = BS_C02_S01_V19_B4 | | id = BS_C02_S01_V19_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’ इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥ | ‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’ इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥ | ||
| Line 785: | Line 729: | ||
| id = BS_C02_S01_V20_B1 | | id = BS_C02_S01_V20_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
साधनान्तरेण हि पटादिसृष्टिर्दृष्टा ॥ 20 ॥ | साधनान्तरेण हि पटादिसृष्टिर्दृष्टा ॥ 20 ॥ | ||
| Line 811: | Line 754: | ||
| id = BS_C02_S01_V21_B1 | | id = BS_C02_S01_V21_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव यथा शरीरेन्द्रियादिः। | तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव यथा शरीरेन्द्रियादिः। | ||
| Line 820: | Line 762: | ||
| id = BS_C02_S01_V21_B2 | | id = BS_C02_S01_V21_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्य पुरुषोत्तमः ।क्षोभयामास भगवान् सृष्ट्यर्थं जगतो विभुः’ इति कौर्मे ॥ 21 ॥ | ‘प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्य पुरुषोत्तमः ।क्षोभयामास भगवान् सृष्ट्यर्थं जगतो विभुः’ इति कौर्मे ॥ 21 ॥ | ||
| Line 848: | Line 789: | ||
| id = BS_C02_S01_V22_B1 | | id = BS_C02_S01_V22_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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जीवकर्तृत्वपक्षे हिताकरणमहितकरणं च न स्यात् ॥ 22 ॥ | जीवकर्तृत्वपक्षे हिताकरणमहितकरणं च न स्यात् ॥ 22 ॥ | ||
| Line 866: | Line 806: | ||
| id = BS_C02_S01_V23_B1 | | id = BS_C02_S01_V23_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिधोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् । | न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिधोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् । | ||
| Line 875: | Line 814: | ||
| id = BS_C02_S01_V23_B2 | | id = BS_C02_S01_V23_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाघोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’ | ‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाघोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’ | ||
‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’ | |||
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ | |||
इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 896: | Line 834: | ||
| id = BS_C02_S01_V24_B1 | | id = BS_C02_S01_V24_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चेतनत्वेऽप्यश्मादिवदस्वतन्त्रत्वात् स्वतः कर्तृत्वानुपपत्तिर्जीवस्य। | चेतनत्वेऽप्यश्मादिवदस्वतन्त्रत्वात् स्वतः कर्तृत्वानुपपत्तिर्जीवस्य। | ||
| Line 905: | Line 842: | ||
| id = BS_C02_S01_V24_B2 | | id = BS_C02_S01_V24_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यथा धारुमयीं योषां नरः स्थिरसमाहितः।इङ्गयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः’ इति भारते ॥ 24 ॥ | ‘यथा धारुमयीं योषां नरः स्थिरसमाहितः।इङ्गयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः’ इति भारते ॥ 24 ॥ | ||
| Line 923: | Line 859: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B1 | | id = BS_C02_S01_V25_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेन्न । यथा गोषु क्षीरं दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते , | जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेन्न । यथा गोषु क्षीरं दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते , | ||
| Line 932: | Line 867: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B2 | | id = BS_C02_S01_V25_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’ इति वचनात् । | ‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’ इति वचनात् । | ||
| Line 941: | Line 875: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B3 | | id = BS_C02_S01_V25_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव । | एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव । | ||
| Line 950: | Line 883: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B4 | | id = BS_C02_S01_V25_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ । ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्तायस्तु सदा प्रभुः’ इत्यादेः ॥ 25 ॥ | ‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ । ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्तायस्तु सदा प्रभुः’ इत्यादेः ॥ 25 ॥ | ||
| Line 968: | Line 900: | ||
| id = BS_C02_S01_V26_B1 | | id = BS_C02_S01_V26_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवददृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य । | न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवददृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य । | ||
| Line 977: | Line 908: | ||
| id = BS_C02_S01_V26_B2 | | id = BS_C02_S01_V26_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘न युक्तियोगाद्वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥ | ‘न युक्तियोगाद्वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥ | ||
| Line 1,003: | Line 933: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B1 | | id = BS_C02_S01_V27_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युच्यते, सामर्थैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन, निरवयवत्वात् । | अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युच्यते, सामर्थैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन, निरवयवत्वात् । | ||
| Line 1,012: | Line 941: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B2 | | id = BS_C02_S01_V27_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
| Line 1,021: | Line 949: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B4 | | id = BS_C02_S01_V27_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न चोपाधिकृतोंऽशः स एवांश उपहित इति, द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुध्येत तदीशकृतमेव हि’ इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥ | न चोपाधिकृतोंऽशः स एवांश उपहित इति, द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुध्येत तदीशकृतमेव हि’ इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥ | ||
| Line 1,041: | Line 968: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B1 | | id = BS_C02_S01_V28_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न चेश्वरपक्षेयं विरोधः । | न चेश्वरपक्षेयं विरोधः । | ||
| Line 1,050: | Line 976: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B2 | | id = BS_C02_S01_V28_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग्वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’ इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव । | ‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग्वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’ इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव । | ||
| Line 1,059: | Line 984: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B4 | | id = BS_C02_S01_V28_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः । | शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः । | ||
| Line 1,068: | Line 992: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B5 | | id = BS_C02_S01_V28_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिर्विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’ | ‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिर्विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’ | ||
इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,087: | Line 1,010: | ||
| id = BS_C02_S01_V29_B1 | | id = BS_C02_S01_V29_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति, नान्येषाम् । | परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति, नान्येषाम् । | ||
| Line 1,096: | Line 1,018: | ||
| id = BS_C02_S01_V29_B2 | | id = BS_C02_S01_V29_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘ शक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥ | ‘ शक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥ | ||
| Line 1,114: | Line 1,035: | ||
| id = BS_C02_S01_V30_B1 | | id = BS_C02_S01_V30_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः । | ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः । | ||
न दोषः परमे कश्चिद्गुणा एव निरन्तराः’ । | |||
इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,125: | Line 1,045: | ||
| id = BS_C02_S01_V30_B4 | | id = BS_C02_S01_V30_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ यः सदोषः साञ्जनः सजनिः स जीवोऽथ यः स निर्दोषो निष्कलः सगुणः परः परमात्मा’इति काषायणश्रुतिः ॥ 30 ॥ | ‘अथ यः सदोषः साञ्जनः सजनिः स जीवोऽथ यः स निर्दोषो निष्कलः सगुणः परः परमात्मा’इति काषायणश्रुतिः ॥ 30 ॥ | ||
| Line 1,143: | Line 1,062: | ||
| id = BS_C02_S01_V31_B1 | | id = BS_C02_S01_V31_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वैर्युक्ताशक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ | ‘सर्वैर्युक्ताशक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ | ||
| Line 1,152: | Line 1,070: | ||
| id = BS_C02_S01_V31_B4 | | id = BS_C02_S01_V31_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अतो न केवलं विचित्रशक्तिः, किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥ | अतो न केवलं विचित्रशक्तिः, किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥ | ||
| Line 1,178: | Line 1,095: | ||
| id = BS_C02_S01_V32_B1 | | id = BS_C02_S01_V32_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न च करणाभावादनुपपत्तिरिति युक्तम् । | न च करणाभावादनुपपत्तिरिति युक्तम् । | ||
| Line 1,187: | Line 1,103: | ||
| id = BS_C02_S01_V32_B2 | | id = BS_C02_S01_V32_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘आपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः। | ‘आपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः। | ||
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्तातमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’। | |||
}} | }} | ||
| Line 1,197: | Line 1,112: | ||
| id = BS_C02_S01_V32_B4 | | id = BS_C02_S01_V32_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । | ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । | ||
पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ | |||
इत्यादि श्रतिभ्यः | |||
}} | }} | ||
| Line 1,208: | Line 1,122: | ||
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‘सर्वोपेता च’ इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥ | ‘सर्वोपेता च’ इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥ | ||
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‘अथैष एव परम आनन्दः’ इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ॥ | ‘अथैष एव परम आनन्दः’ इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ॥ | ||
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यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य । नारायणसंहितायां च- | यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य । नारायणसंहितायां च- | ||
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‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनपेक्ष्य तु । | ‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनपेक्ष्य तु । | ||
कुरुते केवलानन्दाद्यथा मत्तस्य नर्तनम् ॥ | |||
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पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः । | पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः । | ||
मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’ इति ॥ | |||
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‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’ इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥ | ‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’ इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥ | ||
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कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति श्रुतिः ॥ 35 ॥ | कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति श्रुतिः ॥ 35 ॥ | ||
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यदपेक्षयाऽसौ फलं ददाति न तत् कर्म । | यदपेक्षयाऽसौ फलं ददाति न तत् कर्म । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’ इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न । तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः । | ‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’ इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न । तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः । | ||
भविष्यत्पुराणे च – | |||
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‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा । | ‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा । | ||
अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’ इति ॥ 36 ॥ | |||
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न च कर्मापेक्षत्वेनेश्वरस्यास्वातन्त्र्यम् । | न च कर्मापेक्षत्वेनेश्वरस्यास्वातन्त्र्यम् । | ||
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‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । | ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । | ||
यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’ ॥ | |||
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इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याध्यापेते न दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात् । | इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याध्यापेते न दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात् । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि । | ‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि । | ||
ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’ | |||
इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥ | |||
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‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । | ‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । | ||
चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥ | इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥ | ||