Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S31: Difference between revisions
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| title = एकत्रिंशोऽध्यायः | | title = एकत्रिंशोऽध्यायः | ||
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आग्नेय्या धारणया स्वतनुमदग्ध्वा स्वकं धामाविशत् ।'आग्नेय्याऽन्ये धारणया दग्ध्वा देहं परं पदम् | आग्नेय्या धारणया स्वतनुमदग्ध्वा स्वकं धामाविशत् । | ||
'आग्नेय्याऽन्ये धारणया दग्ध्वा देहं परं पदम् । | |||
यान्ति देवाः समस्ताश्च तेषामन्यां तनुं हरिः ॥ | |||
नृसिंहरूपी सर्वेषां भित्त्वा ताभिरलङ्कृतः । | |||
नृत्यते प्रलये देवः स्वयं कृष्णादिरूपवान् ॥ | |||
अदग्ध्वैव तनुं याति नित्यानन्दस्वरूपतः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥६॥ | |||
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तनुभृद्वज्जननवदप्ययवच्च ईहा तनुभृज्जननाप्ययेहा ।'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः,"'अजायमानो बहुधा विजायते''।इति च ।'अजातो जातवद्विष्णुरमृतो मृतवत् तथा | तनुभृद्वज्जननवदप्ययवच्च ईहा तनुभृज्जननाप्ययेहा । | ||
'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः," | |||
'अजायमानो बहुधा विजायते''।इति च । | |||
'अजातो जातवद्विष्णुरमृतो मृतवत् तथा । | |||
मायया दर्शयेन्नित्यमज्ञानां मोहनाय च''॥ इति ब्राह्मे ॥ ११ ॥ | |||
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शेषितं वपुर्बलभद्रादीनाम् ।'जगतो मोहनार्थाय भगवान् पुरुषोत्तमः | शेषितं वपुर्बलभद्रादीनाम् । | ||
'जगतो मोहनार्थाय भगवान् पुरुषोत्तमः । | |||
दर्शयेन्मानुषीं चेष्टां तथा मृतकवद्विभुः ॥ | |||
प्रकाशयेददेहोऽपि मोहाय च दुरात्मनाम् । | |||
मायया मृतकं देहं तदा सृष्ट्वा प्रदर्शयेत् ॥ | |||
कुतो हि मृतकं तस्य मृत्यभावात्परात्मनः''॥ इति च । | |||
'जीवविष्ण्वोरभेदश्च देहयोगवियोजने । | |||
विष्णोर्दुःखं वृणित्वादि पराभावस्तथैव च ॥ | |||
अस्वातन्त्र्यं च वेदादावुक्तवद् भासते विभोः । | |||
क्वचित्क्वचिद् विमोहाय दैत्यादीनां दुरात्मनाम् ॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ १३ ॥ | |||
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'अग्नावन्तर्दधे भैष्मी सत्यभामा वने तथा | 'अग्नावन्तर्दधे भैष्मी सत्यभामा वने तथा । | ||
न तु देहवियोगोऽस्ति तयोः शुद्धचिदात्मनोः''॥ इति च ॥ २० ॥ | |||
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