Aitareya/C2/S6: Difference between revisions
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अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । | अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । | ||
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यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | ||
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ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ॥ | ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ॥ | ||
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सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । | सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । | ||
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जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मेति पृष्टः स भगवानाह । कतरः स आत्मेति । कतरः आनन्दतमः । | जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मेति पृष्टः स भगवानाह । कतरः स आत्मेति । कतरः आनन्दतमः । | ||
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यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्तमौ इति शब्दनिर्णये । | यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्तमौ इति शब्दनिर्णये । | ||
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यत्प्रेरणादयं जीवो दर्शनादीन् करोति च । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् । सर्वेषां दर्शनादिकारणत्वमेकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।प्रजापतिः शिवः लिङ्गाभिमानित्वात् । | यत्प्रेरणादयं जीवो दर्शनादीन् करोति च । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् । सर्वेषां दर्शनादिकारणत्वमेकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।प्रजापतिः शिवः लिङ्गाभिमानित्वात् । | ||
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प्रजापतिः शिवः शेषो लिङ्गमित्यभिधीयते । | प्रजापतिः शिवः शेषो लिङ्गमित्यभिधीयते । | ||
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सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । | सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । | ||
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क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् । भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । | क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् । भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । | ||
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प्रथमेतराणीतिशब्दो मानुषाणाम् । द्वितीयो सुरादीनाम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रमिति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात् पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वादलोकः । | प्रथमेतराणीतिशब्दो मानुषाणाम् । द्वितीयो सुरादीनाम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रमिति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात् पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वादलोकः । | ||
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अण्डजानि चेत्याद्युक्त्वा पुनरश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते इति भारतवचनादश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणीति । गमनपतनस्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गममित्यादिवचनम् । | अण्डजानि चेत्याद्युक्त्वा पुनरश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते इति भारतवचनादश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणीति । गमनपतनस्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गममित्यादिवचनम् । | ||
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स एतेनेत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्ममुक्त्यनन्तरं हि शरीरादुत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः प्रज्ञेनात्मनैवोत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् स भुङ्क्ते इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्त इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनात्मनेत्यादि । अनुक्तविशेषणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रो लोक इति सामान्यवचनम् । | स एतेनेत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्ममुक्त्यनन्तरं हि शरीरादुत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः प्रज्ञेनात्मनैवोत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् स भुङ्क्ते इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्त इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनात्मनेत्यादि । अनुक्तविशेषणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रो लोक इति सामान्यवचनम् । | ||
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अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । | अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । | ||
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ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थमेष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेत्रकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनामत्र विवक्षितम् । नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु इति शब्दतत्त्वे ॥ | ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थमेष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेत्रकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनामत्र विवक्षितम् । नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु इति शब्दतत्त्वे ॥ | ||
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| id = AIT_C02_S06_author-note | | id = AIT_C02_S06_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥ | ||