Aitareya: Difference between revisions
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| verse_line1 | | verse_line1 = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत्तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे येऽत्यायंस्ते परा बभूवुः । | ||
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॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम् | ॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम् | ||
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नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् । | नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् । | ||
प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥ | प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥ | ||
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प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः । | प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः । | ||
तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥ | तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥ | ||
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एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | ||
नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात् कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ | नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात् कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्य१न्या अर्कमभितो विविश्रे । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरन्ति आ विवेशेति । प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुरन्ति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः । न्य १ न्या अर्कमभितो विविश्र इति । ता इमाः प्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवाग्निम् । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तरित्यद उ एव बृहद्भुवनेष्वन्तरसावादित्यः पवमानो हरन्ति आ विविशेति । वायुरेव पवमानो दिशो हरन्ति आविष्टः ॥ | ||
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विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । | विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । | ||
वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा ॥ | वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवी तो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्याग्निरर्कोन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । अन्तरिक्षमेवोक्थमन्तरिक्षं वा अनु पतन्त्यन्तरिक्षमनु धावयन्ति । तस्य वायुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = असावेव द्यौरुक्थममुतःप्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्यासावादित्योऽर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । इत्यधिदैवतम् । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = अथाध्यात्मम् । पुरुष एवोक्थमयमेव महान् प्रजापतिरहमुक्थमस्मीति विद्यात् । तस्य मुखमेवोक्थं यथा पृथिवी तथा । तस्य वागर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । नासिके एवोक्थं यथाऽन्तरिक्षं तथा । तस्य प्राणोऽर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । तदेतद् ब्रध्नस्य विष्टपं यदेतन्नासिकायै विनतमिव । ललाटमेवोक्थं यथा द्यौस्तथा । तस्य चक्षुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । समानमशीतयोऽध्यात्मं चैवाधिदैवतं चान्नमेव । अन्नेन हीमानि सर्वाणि भूतानि समनन्तीग्ं ३ । अन्नेनेमं लोकं जयत्यन्नेनामुम् । तस्मात् समानमशीतयोऽध्यात्मं चाधिदैवतं चान्नमेव । तदिदमन्नमन्नादमियमेव पृथिवीतो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । यद्ध किञ्चेदं प्रेता३ इ तदसौ सर्वमत्ति । यदु किञ्चातः प्रैती३ तदियं सर्वमत्ति । सेयमन्नमत्ति याद्याऽत्री । अत्ता ह वा आद्यो भवति । न तस्येशे यं नाद्याद्यद्वैनं नाद्युः ॥२ ॥ | ||
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उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः । | उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः । | ||
प्रथितः पृथिवीनामा सोऽन्तरिक्षाभिधोऽत्रगः ॥ | प्रथितः पृथिवीनामा सोऽन्तरिक्षाभिधोऽत्रगः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो देवाः । देवानां रेतो वर्षम् । वर्षस्य रेत ओषधयः । ओषधीनां रेतोऽन्नं अन्नस्य रेतो रेतो रेतसो रेतः प्रजाः प्रजानां रेतो हृदयं हृदयस्य रेतो मनो मनसो रेतो वाक् वाचो रेतः कर्म । तदिदं कर्म कृतम् । अयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः । स इरामयो यद्धीरामयस्तस्मात् हिरण्मयः । हिरण्मयो ह वा अमुष्मिं ल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद ॥ | ||
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स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः । | स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः । | ||
तस्माज्जाताः सर्वदेवा ब्रह्माद्यास्तेभ्य एव च ॥ | तस्माज्जाताः सर्वदेवा ब्रह्माद्यास्तेभ्य एव च ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम् । यत्प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषं तस्मात् प्रपदे तस्मात् प्रपदे इत्याचक्षते । शफाः खुरा इत्यन्येषां पशूनाम् । तदूर्ध्वमुदसर्पत् । ता ऊरू अभवताम् । उरु गृणीहीत्यब्रवीत् । तदुदरमभवत् । उर्वेव मे कुर्वित्यब्रवीत् । तदुरोऽभवत् । उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयो ब्रह्मा हैव ता ३ ई । ऊर्ध्वं त्वेवोदसर्पत् । तच्छिरोऽश्रयत यच्छिरोऽश्रयत तच्छिरोऽभवत् । तच्छिरसः शिरस्त्वम् । ता एताः शीर्षच्छ्रियः श्रिता श्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्प्राणः । श्रयन्तेऽस्मिञ्च्छ्रियो य एवमेतच्छिरसः शिरस्त्वं वेद । | ||
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तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् । | तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् । | ||
वासुदेवाभिधं ब्रह्म प्राप प्रपदयोः पुरा ॥ | वासुदेवाभिधं ब्रह्म प्राप प्रपदयोः पुरा ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ता अहिंसन्ताहमुक्थमस्म्यहमुक्थमस्मीति । ता अब्रुवन् । हन्तास्माच्छरीरादुत्क्रामाम तद्यस्मिन् न उत्क्रान्त इदं शरीरं पत्स्यति तदुक्थं भविष्यतीति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = वागुदक्रामदवदन्नन् अश्नन् पिबन्नास्तैव । चक्षुरुदक्रामदपश्यन्नश्नन् पिबन्नास्तैव । श्रोत्रमुदक्रामत् अशृण्वन् अश्नन् पिबन्नास्तैव । मन उदक्रामन्मीलित इवाश्नन् पिबन्नास्तैव । प्राण उदक्रामत् प्राण उत्क्रान्तेऽपद्यत तदशीर्यताशारीतीं३ । तच्छरीरमभवत् । तच्छरीरस्य शरीरत्वम् । शीर्यते ह वा अस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यः पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद । | ||
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-वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥ | -वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥ | ||
ते विष्णोराज्ञयाऽवोचन्नुत्क्रमाम पृथक् पृथक् । | ते विष्णोराज्ञयाऽवोचन्नुत्क्रमाम पृथक् पृथक् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ता अहिंसन्तैवाहमुक्थमस्महमुक्थमस्मीति । ता अब्रुवन् हन्तेदं पुनः शरीरं प्रविशाम तद्यस्मिन्नः प्रपन्न इदं शरीरमुत्थास्यति तदुक्थं भविष्यतीति । वाक्प्राविशदशयदेव । चक्षुः प्राविशदशयदेव । श्रोत्रं प्राविशदशयदेव । मनः प्राविशदशयदेव ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = प्राणः प्राविशत् । तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत् । तदुक्थमभवत् । तदेतदुक्थं प्राण एव । प्राण उक्थमित्येव विद्यात् । तं देवा अब्रुवन् त्वमुक्थमसि त्वमिदं सर्वमसि तव वयं स्मस्त्वमस्माकमसीति । तदप्येतदृषिणोक्तं त्वमस्माकं तव स्मसीति ॥ | ||
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पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः । | पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः । | ||
नोत्थानमभवत् तेषु प्रविष्टेष्वपि सर्वशः ॥ | नोत्थानमभवत् तेषु प्रविष्टेष्वपि सर्वशः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तं देवाः प्राणयन्त । स प्रणीतः प्रातायत । प्रातायीती३ तत्प्रातरभवत् । समागादिती३ तत्सायमभवत् । अहरेव प्राणो रात्रिरपानः । | ||
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तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् । | तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् । | ||
शिष्यप्रशिष्यादिषु च तेऽनयन् वायुनोदितम् ॥ | शिष्यप्रशिष्यादिषु च तेऽनयन् वायुनोदितम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = वागग्निश्चक्षुरसावादित्यश्चन्द्रमा मनो दिशः श्रोत्रं स एष प्रहितं संयोगोऽध्यात्ममिमा देवता अद उ आविरधिदैवतमित्येतत् तदुक्तं भवति । | ||
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अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥ | अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥ | ||
यज्ञादिसाधने यत्तु मनश्चन्द्रः प्रकीर्तितः । | यज्ञादिसाधने यत्तु मनश्चन्द्रः प्रकीर्तितः । | ||
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-... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥ | -... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥ | ||
हिरण्यदन्नाम वैदो भूतेषु हि सुरानृते । | हिरण्यदन्नाम वैदो भूतेषु हि सुरानृते । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तत्सत्यं सदिति प्राणस्तीत्यन्नं यमित्यसावादित्यस्तदेतत् त्रिवृत् । त्रिवृदिव वै चक्षुः शुक्लं कृष्णं कनीनिकेति । स यदि ह वा अपि मृषा वदति सत्यं हैवास्योदितं भवति य एवमेतत् सत्यस्य सत्यत्वं वेद ॥ | ||
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स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते । | स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते । | ||
सर्वोत्तमत्वात् पूर्णत्वात् सर्वज्ञत्वात् तथैव च ॥ | सर्वोत्तमत्वात् पूर्णत्वात् सर्वज्ञत्वात् तथैव च ॥ | ||
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तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् । | तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् । | ||
तन्तिरूपा जगद्बन्धे नाम ब्रह्मादिकं च यत् ॥ | तन्तिरूपा जगद्बन्धे नाम ब्रह्मादिकं च यत् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तस्योष्णिग्लोमानि त्वग्गायत्री त्रिष्टुप् मांसमनुष्टुप् स्नावान्यस्थि जगती पङ्क्तिर्मज्जा प्राणो बृहती । स च्छन्दोभिश्छन्नो यच्छन्दोभिश्छन्नस्तस्माच्छन्दांसीत्याचक्षते । छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात् कर्मणो यस्यां कस्याञ्चिद्दिशि कामयते य एवमेतच्छन्दसां छन्दस्त्वं वेद । | ||
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विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाश्रितानि च । | विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाश्रितानि च । | ||
विष्णोर्विमुक्तवायोश्च लोमाद्यं तु चिदात्मकम् ॥ | विष्णोर्विमुक्तवायोश्च लोमाद्यं तु चिदात्मकम् ॥ | ||
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मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह । | मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह । | ||
एष गोप्ता हि सर्वस्य वायुस्थः पुरुषोत्तमः ॥ | एष गोप्ता हि सर्वस्य वायुस्थः पुरुषोत्तमः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथो आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिरिति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = सर्वं हीदं प्राणेनाऽऽवृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = ६ ॥ | ||
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हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥ | हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥ | ||
तद्ध्यसह्यं बलं वायोरनन्तं किमु तद्धरेः । | तद्ध्यसह्यं बलं वायोरनन्तं किमु तद्धरेः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथाऽतो विभूतयोऽस्य पुरुषस्य । तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च । अस्यामोषधयो जायन्ते । अग्निरेनाः स्वदयतीदमाहरतेदमाहरतेति । एवमेतौ वाचं पितरं परिचरतः पृथिवी चाग्निश्च । यावदनु पृथिवी यावदन्वग्निस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यते पृथिव्याश्चाग्नेश्च य एवमेतां वाचो विभूतिं वेद । | ||
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... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् । | ... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् । | ||
उच्यते तस्य वाचा हि सृष्टावग्निः क्षितिस्तथा ॥ | उच्यते तस्य वाचा हि सृष्टावग्निः क्षितिस्तथा ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्चान्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति । वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहत्येवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च । यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यतेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = चक्षुषा सृष्टौ द्यौश्चादित्यश्च । द्यौर्हास्मै वृष्टिमन्नाद्यं सम्प्रयच्छत्यादित्योऽस्य ज्योतिः प्रकाशं करोत्येवमेतौ चक्षुः पितरं परिचरतो द्यौश्चादित्यश्च । यावदनु द्यौः यावदन्वादित्यस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = यावदेतयोर्न जीर्यते दिवश्चादित्यस्य च य एवमेतां चक्षुषो विभूतिं वेद । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च । दिग्भ्यो हैनमायान्तीं ३ । दिग्भ्यो विशृणोति ॥ | ||
| verse_line5 | | verse_line5 = चन्द्रमा अस्मै पूर्वपक्षापरपक्षान् विचिनोति पुण्याय कर्मणे । एवमेते श्रोत्रं पितरं परिचरन्ति दिशश्च चन्द्रमाश्च । यावदनु दिशो यावदनु चन्द्रमास्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यते दिशां च चन्द्रमसश्च य एवमेतां श्रोत्रस्य विभूतिं वेद । | ||
| verse_line6 | | verse_line6 = मनसा सृष्टा आपश्च च वरुणश्च । आऽऽपो हास्मै श्रद्धां सन्नमन्ते पुण्याय कर्मणे । वरुणोऽस्य प्रजां धर्मेण दाधारैवमेते मनः पितरं परिचरन्त्यापश्च वरुणश्च । यावदन्वापो यावदनु वरुणस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यतेऽपां च वरुणस्य च य एवमेतां मनसो विभूतिं वेद ॥ | ||
| verse_line7 | | verse_line7 = ७ ॥ | ||
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प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥ | प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥ | ||
ब्रह्मशेषसुपर्णेन्द्रशिवाद्या आप ईरिताः । | ब्रह्मशेषसुपर्णेन्द्रशिवाद्या आप ईरिताः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = आपाः ३ इत्यापः इति । तदिदमाप एवेदं वै मूलमदस्तूलमयं पितैते पुत्रा यत्र ह क्वच पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतत् तदुक्तं भवति तद्धस्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेय आहं मां देवेभ्यो वेदा ओमद्देवान् वेदेतः प्रदाना ह्येत इतः सम्भृता इति । | ||
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आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् । | आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् । | ||
नामेत्यपृच्छल्लक्ष्मीस्तं महिदासं जनार्दनम् ॥ | नामेत्यपृच्छल्लक्ष्मीस्तं महिदासं जनार्दनम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एष गिरिश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्प्राणस्तं ब्रह्मगिरिरित्याचक्षते । गिरति ह वै द्विषन्तं पाप्मानं भ्रातृव्यं पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ | ||
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. ... स एष भगवान् गिरिः । | . ... स एष भगवान् गिरिः । | ||
गिरणात् सर्वभूतानां चक्षुर्नामास्य दर्शनात् ॥ | गिरणात् सर्वभूतानां चक्षुर्नामास्य दर्शनात् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एषोऽसुः । स एष प्राणः । स एष भूतिश्चाभूतिश्च तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे । ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूररित्येव प्रश्वसिति । अभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुर्भवत्यात्मना पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ | ||
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असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः । | असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः । | ||
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥ | प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एष मृत्युश्चैवामृतं च । तदुक्तमृषिणा– अपाङ्प्राङेति स्वधया गृभीत इति । अपानेन ह्ययं यतः प्राणो न पराङ्भवति । अमर्त्यो मर्त्येना सयोनिरित्येतेन हीदं सर्वं सयोनि मर्त्यानि हीमानि शरीराणी३ । अमृतैषा देवता । ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१ न्यं चिक्युर्न निचिक्युरन्यमिति निचिन्वन्ति हैवेमानि शरीराणी३ । अमृतैवैषा देवता । अमृतो ह वा अमुष्मिं ल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ | ||
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स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥ | स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥ | ||
स एव जीवनकरो यदाऽपानेन संयुतम् । | स एव जीवनकरो यदाऽपानेन संयुतम् । | ||
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ब्रह्मपन्थाः सत्यं कर्मेति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत्सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् । तथेति निर्णयः । इरामया इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् । | ब्रह्मपन्थाः सत्यं कर्मेति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत्सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् । तथेति निर्णयः । इरामया इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् । | ||
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दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे इति शब्दनिर्णये । | दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे इति शब्दनिर्णये । | ||
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ब्रह्मा हैवं ता३ ईते । | ब्रह्मा हैवं ता३ ईते । | ||
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देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा । | देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा । | ||
स्वरूपतोऽपि नैव स्याद् भेदोऽत्यल्पोपि यत्र हि ॥ | स्वरूपतोऽपि नैव स्याद् भेदोऽत्यल्पोपि यत्र हि ॥ | ||
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संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते । | संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते । | ||
उक्तार्थस्य महाधिक्यं श्रुतेस्तत्र विवक्षितम् ॥ | उक्तार्थस्य महाधिक्यं श्रुतेस्तत्र विवक्षितम् ॥ | ||
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अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतं अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामप्यधिदैवत्वकथनम् । कर्मजदेवाद्यपेक्षया । मुख्याधिदैवतं नारायण एव । तस्योष्णिग्लोमानीत्यादि लोमसूष्णिगित्याद्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिवच्च । | अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतं अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामप्यधिदैवत्वकथनम् । कर्मजदेवाद्यपेक्षया । मुख्याधिदैवतं नारायण एव । तस्योष्णिग्लोमानीत्यादि लोमसूष्णिगित्याद्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिवच्च । | ||
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अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि | |||
<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि । | |||
तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥</span> इति स्कान्दे । | |||
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अस्मै पुण्याय कर्मण इत्येतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते ।न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदादन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोधे औपचारिकं कारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् । अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं वाचं पितरमित्यादिना । | अस्मै पुण्याय कर्मण इत्येतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते ।न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदादन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोधे औपचारिकं कारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् । अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं वाचं पितरमित्यादिना । | ||
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मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् । | मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् । | ||
दैवतैरुपकारस्तु क्रियते नरकर्मणाम् ॥ | दैवतैरुपकारस्तु क्रियते नरकर्मणाम् ॥ | ||
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आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वज्ञापनार्थं न तु सन्निहितस्यैव । यथेन्द्रं कुत्स इत्यादि । यथा च पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् इति ॥ ८ ॥ | आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वज्ञापनार्थं न तु सन्निहितस्यैव । यथेन्द्रं कुत्स इत्यादि । यथा च पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् इति ॥ ८ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||
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एष नारायणो देवो वायुना सहेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या पुरि शेत इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति स भगवान् नारायणः । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इत्यादिश्रुतिभ्यः । य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्युक्त्वा तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । यमादित्यो न वेदेत्युक्तत्वान्नादित्यः । भेदव्यपदेशाच्चान्यः इति भगवद्वचनम् । | एष नारायणो देवो वायुना सहेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या पुरि शेत इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति स भगवान् नारायणः । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इत्यादिश्रुतिभ्यः । य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्युक्त्वा तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । यमादित्यो न वेदेत्युक्तत्वान्नादित्यः । भेदव्यपदेशाच्चान्यः इति भगवद्वचनम् । | ||
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वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । | वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । | ||
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥ | यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥ | ||
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ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । | ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । | ||
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशङ्खचक्रः ॥ | केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशङ्खचक्रः ॥ | ||
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तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । | तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । | ||
नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे । | नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे । | ||
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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | ||
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ | यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ | ||
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न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । | न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । | ||
एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । | एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । | ||
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अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । | अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । | ||
विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥ | विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥ | ||
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तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते । तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति मध्यमशब्दोक्तस्य प्राणः स्थूणा इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्यमण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । | तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते । तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति मध्यमशब्दोक्तस्य प्राणः स्थूणा इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्यमण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । | ||
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क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | ||
आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥ | आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् । तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत् तस्मात् शतर्चिनस्तस्मात् शतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
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स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते । ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । | स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते । ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदस्तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् यदिदं किञ्च । तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद्यदिदं किञ्च । तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्मादत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥ | ||
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प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । | प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । | ||
नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च । | नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति । यद्बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तं देवा अब्रुवन् अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठस्तस्मात् वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = स इदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद् यदिदं किञ्च तस्मात् प्रगाथास्तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च तस्मात् पावमान्यस्तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
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वसिष्ठो वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् । | वसिष्ठो वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = सोऽब्रवीत् अहमिदं सर्वमसानि यच्च क्षुद्रं यच्च महदिति ॥ ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्तास्तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । सूक्तं बतावोचतेति तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तं तस्मात् सूक्तमित्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
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तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकमभवत् । बतेत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्टूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन्नहमल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपो महाप्राणिषु महारूपश्च भवानीति स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिताः भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । | तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकमभवत् । बतेत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्टूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन्नहमल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपो महाप्राणिषु महारूपश्च भवानीति स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिताः भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = एव वा ऋगेष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यदेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत तस्मात् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यदेभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत । तस्मात् अर्धर्चस्तस्मादर्धर्च इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वै पदमेष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि स यदिमानि सर्वाणि भूतानि पादि । तस्मात् पदं तस्मात् पदमित्यचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वा अक्षरमेष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यदेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति न चैनमतिक्षरति तस्मात् अक्षरं तस्मादक्षरमित्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥ | ||
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एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानिति ऋक् । गच्छति हि मरणकाले । | एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानिति ऋक् । गच्छति हि मरणकाले । | ||
ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः इति हि भारते । | ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः इति हि भारते । | ||
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म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । | म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । | ||
त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥ | त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥ | ||
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अर्च गतिपूजनयोः ऋ गतौ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । पद गतौ । तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । क्षर विनाशसन्ततदानयोः इति धातोः ।एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि । | अर्च गतिपूजनयोः ऋ गतौ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । पद गतौ । तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । क्षर विनाशसन्ततदानयोः इति धातोः ।एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि । | ||
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यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या । | यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या । | ||
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | ||
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उक्तं च बृहत्संहितायाम्– | उक्तं च बृहत्संहितायाम्– | ||
हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् । विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ॥ | हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् । विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः । स वा ऋषे द्वितीयं शंसेति स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः । स वा ऋषे तृतीयं शंसेति । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः वरं ते ददामीति । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = स होवाच त्वामेव जानीयामिति तमिन्द्र उवाच प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद्वैश्वामित्रमेष तपन्नेवास्मीति होवाच ॥ ३ ॥ | ||
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अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः । तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम् । तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेत इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमित्यादिना ॥ | अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः । तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम् । तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेत इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमित्यादिना ॥ | ||
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| Line 1,124: | Line 1,181: | ||
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वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | ||
महाव्रतं कर्म चक्रे हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ॥ | महाव्रतं कर्म चक्रे हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ॥ | ||
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| text | | text = | ||
उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वापि त्वामेव जानीयामिति वरस्वीकारादिन्द्रादेव चेन्द्राविष्टो भगवानत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते । एष तपन्नेवास्मीति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । | उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वापि त्वामेव जानीयामिति वरस्वीकारादिन्द्रादेव चेन्द्राविष्टो भगवानत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते । एष तपन्नेवास्मीति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । | ||
स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मीत्यादिनाप्याविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाप्येतेनेति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य म इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वाऽहं विष्णुरित्येव तपन्नेवास्मीत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । अजस्य नाभावध्येकमर्पितम् इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि यो देवानां नामधा एक एव इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते । परमैश्वर्याभावात् । इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः । | स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मीत्यादिनाप्याविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाप्येतेनेति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य म इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वाऽहं विष्णुरित्येव तपन्नेवास्मीत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । अजस्य नाभावध्येकमर्पितम् इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि यो देवानां नामधा एक एव इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते । परमैश्वर्याभावात् । इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः । | ||
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यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ॥ | यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ॥ | ||
इति श्रुतेश्च । | इति श्रुतेश्च । | ||
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इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | ||
इत्यादिश्रुतेश्च । | इत्यादिश्रुतेश्च । | ||
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सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः । | सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः । | ||
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नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । | नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । | ||
नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ॥ | नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ॥ | ||
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यो देवानां नामधा एक एवेत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव । | यो देवानां नामधा एक एवेत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव । | ||
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श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः इति श्रुतिः । | श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः इति श्रुतिः । | ||
एको नारायणस्तत्समो वाऽधिको वा नास्ति इति च । | एको नारायणस्तत्समो वाऽधिको वा नास्ति इति च । | ||
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परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । | परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । | ||
न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ॥ | न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ॥ | ||
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नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् इत्यादिप्रश्नस्यापि | नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् इत्यादिप्रश्नस्यापि | ||
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परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । | परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । | ||
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ | परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ | ||
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मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्यपर्वणि । | मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्यपर्वणि । | ||
दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा । | दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा । | ||
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न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना चेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना चेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | ||
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मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते । | मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते । | ||
तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥ | तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥ | ||
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उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | ||
महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् । | महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् । | ||
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विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः इत्युक्त्वा तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । सदिति प्राण इति श्रुतेः । | विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः इत्युक्त्वा तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । सदिति प्राण इति श्रुतेः । | ||
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सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः । | सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः । | ||
साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥ | साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥ | ||
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प्रियधाम्न उप समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | प्रियधाम्न उप समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | ||
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बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः । | बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः । | ||
द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ॥ | द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ॥ | ||
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न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । प्राणस्तथाऽनुगमाद् इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् इति वक्तुः बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्येन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । अध्यात्मसम्बन्धशब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्ह्यध्यात्मभूमेत्येव स्यात् सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः । | न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । प्राणस्तथाऽनुगमाद् इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् इति वक्तुः बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्येन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । अध्यात्मसम्बन्धशब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्ह्यध्यात्मभूमेत्येव स्यात् सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः । | ||
शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । अहं मनुरभवं सूर्यश्चेत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र चाहं भूमिमददामार्याय इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते । नच वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदापि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते भूमिमददामित्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात् । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोधसूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वादहं मनुरभवमित्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति । | शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । अहं मनुरभवं सूर्यश्चेत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र चाहं भूमिमददामार्याय इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते । नच वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदापि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते भूमिमददामित्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात् । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोधसूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वादहं मनुरभवमित्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति । | ||
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जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् । | जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् । | ||
जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ | जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ | ||
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असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। | असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। | ||
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ | ||
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न च प्राणो वा अहमस्मृष इत्यादावहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दाद्यर्थः । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एवेति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा तत्रैव प्रमाणत्वेन – विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्ययिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात् सर्वगुणत्वात् सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | न च प्राणो वा अहमस्मृष इत्यादावहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दाद्यर्थः । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एवेति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा तत्रैव प्रमाणत्वेन – विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्ययिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात् सर्वगुणत्वात् सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | ||
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उक्तं च भारते । | उक्तं च भारते । | ||
स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् । | स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् । | ||
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पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । आ तृणादाकरीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा इति च श्रुतिः । | पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । आ तृणादाकरीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा इति च श्रुतिः । | ||
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हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । अमृतो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वा अमृतः समभवत् समभवत् इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । न हि भेदाभावे भूतेभ्यो ददृश इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते । एकत्वे तु ददृश इत्येतावता पूर्यते सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । | हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । अमृतो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वा अमृतः समभवत् समभवत् इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । न हि भेदाभावे भूतेभ्यो ददृश इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते । एकत्वे तु ददृश इत्येतावता पूर्यते सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । | ||
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नच कर्तृकर्मविरोधो नामास्तीत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः । | नच कर्तृकर्मविरोधो नामास्तीत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः । | ||
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न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | ||
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विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् । | विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् । | ||
गुडस्य पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥ | गुडस्य पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥ | ||
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न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वाभावः प्रसीदति इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः इत्यादिना कर्माणि च । तस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः । | न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वाभावः प्रसीदति इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः इत्यादिना कर्माणि च । तस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः । | ||
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अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । | अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । | ||
आदध्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥ | आदध्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥ | ||
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श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | ||
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥ | अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥ | ||
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यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां ३ वाचं वदन् । | यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां ३ वाचं वदन् । | ||
ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् । | यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् । | ||
तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः । | यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः । | ||
यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः । | यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः । | ||
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते । | यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते । | ||
देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । | यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । | ||
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥ | ||
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मुक्तः प्रतिज्ञानात् सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः जगद्व्यापारवर्जम् भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात् इत्यादिसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ग्राव्णा सोमे महीयते इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते । | मुक्तः प्रतिज्ञानात् सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः जगद्व्यापारवर्जम् भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात् इत्यादिसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ग्राव्णा सोमे महीयते इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते । | ||
नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः इति हि विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । | नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः इति हि विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । | ||
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बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | ||
योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥ | योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥ | ||
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भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । | भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । | ||
तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ | तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ | ||
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इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | ||
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ | सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ | ||
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तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ | तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् तस्य यानि व्यञ्जनानि तच्छरीरम् । यो घोषः स आत्मा । य ऊष्माणः स प्राणः । एतद्धस्य वै तद्विद्वान् वसिष्ठो वसिष्ठो बभूव । तत एतन्नामधेयं लेभे । एतदु हैवेन्द्रो विश्वामित्राय प्रोवाच। एतदु हैवेन्द्रो भरद्वाजाय प्रोवाच । तस्मात् स तेन बन्धुना यज्ञेषु हूयते । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नुवन्ति । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति । य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ, योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा 'जगतस्थस्थुषश्च' इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥ | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = इति श्रीमन्महैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ||
| commentary1 | | commentary1 = aitareya | ||
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| text | | text = | ||
यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति यस्मात् कस्मादपि छन्दसस्तावत्यः शंसनीयाः । तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभिमानिदेवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः । | यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति यस्मात् कस्मादपि छन्दसस्तावत्यः शंसनीयाः । तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभिमानिदेवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः । | ||
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व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः । | व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः । | ||
घोषाणां सर्वजीवानामभिमानी चतुर्मुखः ॥ | घोषाणां सर्वजीवानामभिमानी चतुर्मुखः ॥ | ||
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सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव । न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादिपृथक् पृथङ्मयशब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् । | सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव । न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादिपृथक् पृथङ्मयशब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् । | ||
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अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः । | अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः । | ||
प्रज्ञेत्युक्तो द्योतनाच्च प्रद्युम्नो देवतोदितः ॥ | प्रज्ञेत्युक्तो द्योतनाच्च प्रद्युम्नो देवतोदितः ॥ | ||
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सम्भूयेत्यत्र समित्युपसर्गात् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि क्रमेण प्राप्नोति । | सम्भूयेत्यत्र समित्युपसर्गात् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि क्रमेण प्राप्नोति । | ||
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द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् । | द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् । | ||
आधिक्यं ज्ञायते विष्णोर्नितरां हि पुनः पुनः ॥ | आधिक्यं ज्ञायते विष्णोर्नितरां हि पुनः पुनः ॥ | ||
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बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि । पुरुषैरहेयत्वादहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप समीपे ईक्षेत । | बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि । पुरुषैरहेयत्वादहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप समीपे ईक्षेत । | ||
नात्र जीवेश्वराभेदो विवक्षितः । उप समीपे ईक्षेतेति समीपे दर्शनवचनात् । न च निरर्थकत्वमुपसर्गस्याङ्गीकर्तुं युक्तम् । न ह्यार्षेषु वेदादिषु व्याकरणनिरुक्तादिषु चोपसर्गाणां वैयर्थ्यमङ्गीकृतं कुत्रचित् । उक्तं च भगवता व्यासेन– | नात्र जीवेश्वराभेदो विवक्षितः । उप समीपे ईक्षेतेति समीपे दर्शनवचनात् । न च निरर्थकत्वमुपसर्गस्याङ्गीकर्तुं युक्तम् । न ह्यार्षेषु वेदादिषु व्याकरणनिरुक्तादिषु चोपसर्गाणां वैयर्थ्यमङ्गीकृतं कुत्रचित् । उक्तं च भगवता व्यासेन– | ||
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नानर्थकः स्वरो वापि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् । | नानर्थकः स्वरो वापि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् । | ||
पदं वाक्यं कुतश्च स्यान्नाल्पार्थमपि कुत्रचित् ॥ | पदं वाक्यं कुतश्च स्यान्नाल्पार्थमपि कुत्रचित् ॥ | ||
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सुकरं च सर्वपदानामनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद् विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानामानर्थक्यं कल्प्यम् । | सुकरं च सर्वपदानामनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद् विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानामानर्थक्यं कल्प्यम् । | ||
जीवेश्वरैक्यङ्गीकारे योऽहं सोऽसावित्येव पूर्यते पुनर्योऽसौ सोऽहमिति व्यर्थम् । न ह्यस्य तेनैक्ये तस्यानेन भेदशङ्का भवति । अस्य तस्येति भेदाङ्गीकारे नाभेदो मुख्यः । किन्तु तदधीनत्वमेवान्यस्य भवति स्नेहविशेषो वा । चैत्रो मैत्रो मैत्रश्चैत्र इतिवत् । तत्र ह्युभयस्नेहापेक्षया पुनर्वचनं युज्यते । अभ्यासत्वे ह्येकप्रकारेण प्रयोगो दृष्टः । अत्र हि प्रयोगद्वैविध्यं दृश्यते । | जीवेश्वरैक्यङ्गीकारे योऽहं सोऽसावित्येव पूर्यते पुनर्योऽसौ सोऽहमिति व्यर्थम् । न ह्यस्य तेनैक्ये तस्यानेन भेदशङ्का भवति । अस्य तस्येति भेदाङ्गीकारे नाभेदो मुख्यः । किन्तु तदधीनत्वमेवान्यस्य भवति स्नेहविशेषो वा । चैत्रो मैत्रो मैत्रश्चैत्र इतिवत् । तत्र ह्युभयस्नेहापेक्षया पुनर्वचनं युज्यते । अभ्यासत्वे ह्येकप्रकारेण प्रयोगो दृष्टः । अत्र हि प्रयोगद्वैविध्यं दृश्यते । | ||
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एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः । | एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः । | ||
अर्थान्तरार्था द्विविधा प्रयुक्तेति हि निर्णयः ॥ | अर्थान्तरार्था द्विविधा प्रयुक्तेति हि निर्णयः ॥ | ||
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अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति, न वा अहमिमं विजानाति, तस्योपनिषदहम् इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वेऽहमिमं न जानातीति न युज्यते । तस्य भूरिति शिरो भुव इति बाहू इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम् । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । | अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति, न वा अहमिमं विजानाति, तस्योपनिषदहम् इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वेऽहमिमं न जानातीति न युज्यते । तस्य भूरिति शिरो भुव इति बाहू इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम् । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । | ||
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अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि गुणाद्वालोकवत् इति च सूत्रात् । आदित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि तस्यैतस्य तदेव रूपमिति कथनाच्च । स एष एवैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिरित्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वादहं नामा । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः जगतस्तस्थुषश्चात्मा इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च । | अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि गुणाद्वालोकवत् इति च सूत्रात् । आदित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि तस्यैतस्य तदेव रूपमिति कथनाच्च । स एष एवैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिरित्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वादहं नामा । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः जगतस्तस्थुषश्चात्मा इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च । | ||
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यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । | यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । | ||
यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति कथ्यते ॥ | यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति कथ्यते ॥ | ||
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देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद्देवतास्वप्येतीति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे सम्भूय देवता अप्येतीति ल्यप् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः । | देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद्देवतास्वप्येतीति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे सम्भूय देवता अप्येतीति ल्यप् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः । | ||
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सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् । | सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् । | ||
स यात्यन्धतमो घोरं नित्यातिशयदुःखदम् ॥ | स यात्यन्धतमो घोरं नित्यातिशयदुःखदम् ॥ | ||
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अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् । | अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् । | ||
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सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुमाध्यायमूलतः । | सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुमाध्यायमूलतः । | ||
अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्यात् पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥ | अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्यात् पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ||
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योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः । | योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः । | ||
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेत्युक्तः सदा श्रुतौ ॥ | नित्याततगुणत्वात् स आत्मेत्युक्तः सदा श्रुतौ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येव वा आत्मोक्थं पञ्चविधमेतस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठत्येतमेवाप्येत्ययनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद । | ||
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.... तानि रूपाणि वै हरेः ॥ | .... तानि रूपाणि वै हरेः ॥ | ||
स्थितानि पञ्चभूतेषु पृथिव्याद्यभिधानि च । | स्थितानि पञ्चभूतेषु पृथिव्याद्यभिधानि च । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्ननादो जायते । भवत्यस्यान्नमापश्च पृथिवी चान्नमेतन्मयानि ह्यन्नानि भवन्ति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = ज्योतिश्च वायुश्चान्नादमेताभ्यां हीदं सर्वमन्नमत्त्यावपनमाकाश आकाशे हीदं सर्वं समोप्यत आवपनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद । | ||
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सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ॥ | सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ॥ | ||
भोक्तृशक्तिप्रदौ नित्यं भोक्तारौ च विशेषतः । | भोक्तृशक्तिप्रदौ नित्यं भोक्तारौ च विशेषतः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्नन्नादो जायते भवत्यस्यान्नमोषधिवनस्पतयोऽन्नं प्राणभृतोऽन्नादमोषधिवनस्पतीन् हि प्राणभृतोऽदन्ति । तेषां य उभयतोऽदन्ताः पुरुषस्यानुविधां विहितास्तेऽन्नादाः अन्नमितरे पशवस्तस्मात् त इतरान् पशूनधीव चरन्त्यधीव ह्यन्नेऽन्नादो भवत्यधीव ह समानानां जायते य एवं वेद ॥ | ||
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सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ॥ | सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ॥ | ||
नारायणानिरुद्धौ तु स्थावरान्तर्गतौ प्रभू । | नारायणानिरुद्धौ तु स्थावरान्तर्गतौ प्रभू । | ||
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आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्योपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । वपनीरोमकरणावकाशप्रदानबीजवर्धनेषु इति च धातुः । तस्मिन् पञ्चके योऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । तस्मिन् वेद अस्मिन्नाजायत इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणादुपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च स्वजाताविति ज्ञायते । | आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्योपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । वपनीरोमकरणावकाशप्रदानबीजवर्धनेषु इति च धातुः । तस्मिन् पञ्चके योऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । तस्मिन् वेद अस्मिन्नाजायत इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणादुपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च स्वजाताविति ज्ञायते । | ||
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क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् । सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ॥ | क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् । सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ॥ | ||
नारायणानिरुद्धौ तु पश्वाकारौ पशुस्थितौ ॥ | नारायणानिरुद्धौ तु पश्वाकारौ पशुस्थितौ ॥ | ||
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गुणवैशेष्याभावेन वाहनादिषु चरणमात्रादधीव चरन्तीत्यादाविवशब्दः ॥ १ ॥ | गुणवैशेष्याभावेन वाहनादिषु चरणमात्रादधीव चरन्तीत्यादाविवशब्दः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेदा । अश्नुते हाऽऽविर्भूय ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् । स आत्मानमाविस्तरां वेद । ओषधिवनस्पतिषु हि रसो दृश्यते । चित्तं प्राणभृत्सु । प्राणभृत्सु त्वेवाविस्तरामात्मा । तेषु हि रसोऽपि दृश्यते । न चित्तमितरेषु । पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा । स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमः । विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वस्तनम् । वेद लोकालोकौ । मर्त्येनामृतमीप्सत्येवं सम्पन्नः । अथेतरेषां पशूनामशनापिपासे एवाभिविज्ञानम् । न विज्ञातं वदन्ति न विज्ञातं पश्यन्ति न विदुः श्वस्तनं न लोकालोकौ । त एतावन्तो भवन्ति । यथाप्रज्ञं हि सम्भवाः ॥ | ||
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आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः । | आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः । | ||
स तस्यैव विशेषेण प्रीतियोगाद् भविष्यति ॥ | स तस्यैव विशेषेण प्रीतियोगाद् भविष्यति ॥ | ||
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य आत्मानं परमात्मानमाविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । अन चेष्टायामिति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनाम् । ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥ | य आत्मानं परमात्मानमाविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । अन चेष्टायामिति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनाम् । ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एष पुरुषः समुद्रः सर्वं लोकमति यद्ध किञ्चाश्नुतेत्येनं मन्यते । यद्यन्तरिक्षलोकमश्नुतेऽत्येनं मन्यते यद्यमुं लोकमश्नुवीतात्येवैनं मन्येत । | ||
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योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति । सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिदलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथापि तमेनमात्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुमत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोपि न तेन साम्यं तद्भावं वा मन्यते । कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः मुक्तानां परमा गतिः अमृतस्यैष सेतुः इत्यादिवाक्याच्च ।। | योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति । सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिदलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथापि तमेनमात्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुमत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोपि न तेन साम्यं तद्भावं वा मन्यते । कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः मुक्तानां परमा गतिः अमृतस्यैष सेतुः इत्यादिवाक्याच्च ।। | ||
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यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । बहुगणिकादिपरिवाररूपमशुचीदं पदमित्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत । | यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । बहुगणिकादिपरिवाररूपमशुचीदं पदमित्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत । | ||
पृथिवीलोकाधिपत्येऽपि विष्णोराधिक्यं सत्पुरुषो मन्यत इति प्रत्यक्षसिद्धत्वान्न पृथगुक्तम् । अतिशब्दाद्यद्ध किञ्चेति प्रथमोक्तो मोक्ष इति सिद्धम् । अन्तरिक्षप्राप्तेरल्पत्वान्मोक्षे स्वतः सिद्धत्वाच्चातिमन्यते इति सिद्धवचनमेव कृतम् । स्वर्गादिप्राप्तेरधिकैश्वर्याद् भगवत्समोऽहं भगवत्स्वरूप इति वा मन्तुं प्राप्तिरस्तीत्येवैनं मन्येतेति सावधारणा विधिः ।। | पृथिवीलोकाधिपत्येऽपि विष्णोराधिक्यं सत्पुरुषो मन्यत इति प्रत्यक्षसिद्धत्वान्न पृथगुक्तम् । अतिशब्दाद्यद्ध किञ्चेति प्रथमोक्तो मोक्ष इति सिद्धम् । अन्तरिक्षप्राप्तेरल्पत्वान्मोक्षे स्वतः सिद्धत्वाच्चातिमन्यते इति सिद्धवचनमेव कृतम् । स्वर्गादिप्राप्तेरधिकैश्वर्याद् भगवत्समोऽहं भगवत्स्वरूप इति वा मन्तुं प्राप्तिरस्तीत्येवैनं मन्येतेति सावधारणा विधिः ।। | ||
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न च मन्यते इति काममात्रम् । मनु अवबोधन इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि राज्यकाम इति स्यात् । न च मन्यते मन्येतेति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् । | न च मन्यते इति काममात्रम् । मनु अवबोधन इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि राज्यकाम इति स्यात् । न च मन्यते मन्येतेति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एष पुरुषः पञ्चविधस्तस्य यदुष्णं तज्ज्योतिर्यानि खानि स आकाशोऽथ यल्लोहितं श्लेष्मा रेतस्ता आपः । यच्छरीरं सा पृथिवी । यः प्राणः स वायुः । स एष वायुः पञ्चविधः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः । ता एता देवताः प्राणापानयोरेव निविष्टाश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति । प्राणस्य ह्यन्वपायमेता अपि यन्ति । | ||
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पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः । | पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः । | ||
प्रद्युम्नादिस्वरूपेण ज्योतिरादौ पृथक् पृथक् ॥ | प्रद्युम्नादिस्वरूपेण ज्योतिरादौ पृथक् पृथक् ॥ | ||
| Line 2,025: | Line 2,157: | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स एष वाचश्चित्तस्योत्तरत्तरिक्रमो यद्यज्ञः । स एष यज्ञः पञ्चविधोऽग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यानि पशुः सोमः । स एव यज्ञानां सम्पन्नतमो यत्सोमः एतस्मिन् ह्येताः पञ्चविधाः अधिगम्यन्ते यत् प्राक्सवनेभ्यः सैका विधा त्रीणि सवनानि, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = ३ ॥ | ||
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तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् । | तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् । | ||
देवानां क्रमवृत्तिभ्यो जाते यज्ञेऽपि केशवः ॥ | देवानां क्रमवृत्तिभ्यो जाते यज्ञेऽपि केशवः ॥ | ||
| Line 2,051: | Line 2,184: | ||
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पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत्पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥ | पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत्पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = यो ह वै यज्ञे यज्ञं वेदाहन्यहर्देवेषु देवमध्यूळ्हं स सम्प्रतिवित् । एष वै यज्ञे यज्ञोऽहन्यहर्देवेषु देवोऽध्यूळ्हो यदेतन्महदुक्थम् । तदेतत्पञ्चविधम् । त्रिवृत्पञ्चदशं सप्तदशमेकविंशं पञ्चविंशमिति स्तोमतः । गायत्रं रथन्तरं बृहद्भद्रं राजनमिति सामतः । गायत्र्युष्णिग्बृहतीत्रिष्टुब् द्विपदेति छन्दस्तः । शिरो दक्षिणः पक्ष उत्तरः पक्षः पुच्छमात्मेत्याख्यानम् । | ||
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यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् । | यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् । | ||
अधिरूढं तथाऽहस्सु चाहर्नामानमेव तु ॥ | अधिरूढं तथाऽहस्सु चाहर्नामानमेव तु ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = पञ्चकृत्वः प्रस्तौति पञ्चकृत्व उद्गायति पञ्चकृत्वः प्रतिहरति पञ्चकृत्व उपद्रवति पञ्चकृत्वो निधनमुपयन्ति । तत्स्तोभसहस्रं भवति । एवं ह्येताः पञ्चविधाः अनुशस्यन्ते यत्प्राक्तृचाशीतिभ्यः सैका विधा तिस्रस्तृचाशीतयो यदूर्ध्वं सा पञ्चमी । | ||
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प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ॥ | प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ॥ | ||
प्रस्तावादीन् पञ्चकृत्वस्तस्मादेव प्रकुर्वते । | प्रस्तावादीन् पञ्चकृत्वस्तस्मादेव प्रकुर्वते । | ||
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अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा । | अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा । | ||
विष्णोः सहस्रनामस्तु यत्तद्रूपसहस्रकम् ॥ | विष्णोः सहस्रनामस्तु यत्तद्रूपसहस्रकम् ॥ | ||
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मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः । | मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः । | ||
कृष्णबुद्धौ च कल्कीति रूपाणां दशकं हरेः ॥ | कृष्णबुद्धौ च कल्कीति रूपाणां दशकं हरेः ॥ | ||
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दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ॥ | दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ॥ | ||
शं रूपं भगवन्तं यद्दद्याद् व्यक्त्या समस्तशः । | शं रूपं भगवन्तं यद्दद्याद् व्यक्त्या समस्तशः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तानि त्रीणि च्छन्दांसि भवन्ति । त्रेधा विहितं वा इदमन्नमशनं पानं खादस्तदेतैराप्नोति ॥ | ||
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.... छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ॥ | .... छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ॥ | ||
अशनादित्रिकं तच्च भूत्वा विष्णुमुपैति च । | अशनादित्रिकं तच्च भूत्वा विष्णुमुपैति च । | ||
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..त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः । | ..त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः । | ||
अतस्त्रिवृदिति प्रोक्तस्तथा पञ्चदशात्मकः ॥ | अतस्त्रिवृदिति प्रोक्तस्तथा पञ्चदशात्मकः ॥ | ||
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..स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वात् छन्दः ॥ ४ ॥ | ..स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वात् छन्दः ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तद्धैतदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं प्रतिजानते किमन्यत्सत् । अन्यद् ब्रूयामेति त्रिष्टुप्सहस्रमेके जगतीसहस्रमेकेऽनुष्टुप्सहस्रमेके । | ||
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तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितमिति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति । | तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितमिति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदुक्तमृषिणाऽनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं निचिक्युः कवयो मनीषेति । वाचि वै तदैन्द्रं प्राणं न्यचायन्नित्येतत् तदुक्तं भवति । | ||
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अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकामृचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद्भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाहुः विष्णुं हंसस्वरूपिणम् । अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च । | अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकामृचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद्भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाहुः विष्णुं हंसस्वरूपिणम् । अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च । | ||
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| Line 2,285: | Line 2,429: | ||
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मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् । | मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् । | ||
विरिञ्चशिवपूर्वेभ्यो नृसिंहानुष्टुभं पराम् ॥ | विरिञ्चशिवपूर्वेभ्यो नृसिंहानुष्टुभं पराम् ॥ | ||
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वागाख्यायामनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सर्वदा शृण्वन्तीति ज्ञायतेऽतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति । | वागाख्यायामनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सर्वदा शृण्वन्तीति ज्ञायतेऽतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति । | ||
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अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु । | अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु । | ||
भवितुं चेश्वरः स स्याद् भावो मुक्तिर्न चान्यथा ॥ | भवितुं चेश्वरः स स्याद् भावो मुक्तिर्न चान्यथा ॥ | ||
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महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः । | महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः । | ||
नानाच्छन्दःप्रशंसादिप्रमाणरहितत्वतः ॥ | नानाच्छन्दःप्रशंसादिप्रमाणरहितत्वतः ॥ | ||
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अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् । | अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् । | ||
मध्यात् तु बृहती जाता तस्मात् सा मध्यमुच्यते ॥ | मध्यात् तु बृहती जाता तस्मात् सा मध्यमुच्यते ॥ | ||
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इतोऽन्यत् सत्किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः । | इतोऽन्यत् सत्किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः । | ||
अन्यत् सद्रूपमित्याहुस्त्रिष्टुब्वादिन एव ते ॥ | अन्यत् सद्रूपमित्याहुस्त्रिष्टुब्वादिन एव ते ॥ | ||
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ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानोऽभ्यस्यमानः । तृतीयोऽतिशये इति सूत्रादकारस्येकारः । मथनात् मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते । हत्वी दस्यून् इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः । | ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानोऽभ्यस्यमानः । तृतीयोऽतिशये इति सूत्रादकारस्येकारः । मथनात् मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते । हत्वी दस्यून् इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः । | ||
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एकापि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा । | एकापि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा । | ||
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एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥ | एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥ | ||
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बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्शंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्यात् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते । | बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्शंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्यात् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = वाचमष्टापदीमहमित्यष्टौ हि चतुरक्षराणि भवित । नवस्रक्तिमिति बृहती सम्पद्यमाना नवस्रक्ति । ऋतस्पृशमिति सत्यं वै वागृचा स्पृष्टा । एन्द्रात् परि तन्वं मम इति । तद्यदेवैतद्बृहतीसहस्रमनुष्टुप्सम्पन्नं भवति । तस्मात् तदैन्द्रात् प्राणाद् बृहत्यै वाचमनुष्टुभं तन्वं संनिर्मिमीते । | ||
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वाचमष्टापदीमहमित्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वागृतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद्यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् । | वाचमष्टापदीमहमित्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वागृतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद्यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् । | ||
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तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग्ध्यायन् । | तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग्ध्यायन् । | ||
विष्णुरेव बृहत्याः प्राणस्याधिष्ठातृदेवता । प्रतिमाधिष्ठितदेवतावत् । तस्माद् बृहत्याः सकाशादनुष्टुप्सम्पादने तस्यैव विष्णोः प्रतिमान्तरं तस्मादेव निर्मितं भवति । अत एवेन्द्रात् परितन्वं मम इत्युक्तम् । बृहतीस्थविष्णोर्बलादेव तत्सम्पद्यते । स हि तस्याः षट् त्रिंशदक्षरादित्वमपि नियमयति तत्प्रसादाद् वायुश्च । वायुरेव यद्भगवन्नियतो नियमयति तस्मादिन्द्रात् परीत्यस्यैन्द्रात् प्राणादिति व्याख्या कृता । | विष्णुरेव बृहत्याः प्राणस्याधिष्ठातृदेवता । प्रतिमाधिष्ठितदेवतावत् । तस्माद् बृहत्याः सकाशादनुष्टुप्सम्पादने तस्यैव विष्णोः प्रतिमान्तरं तस्मादेव निर्मितं भवति । अत एवेन्द्रात् परितन्वं मम इत्युक्तम् । बृहतीस्थविष्णोर्बलादेव तत्सम्पद्यते । स हि तस्याः षट् त्रिंशदक्षरादित्वमपि नियमयति तत्प्रसादाद् वायुश्च । वायुरेव यद्भगवन्नियतो नियमयति तस्मादिन्द्रात् परीत्यस्यैन्द्रात् प्राणादिति व्याख्या कृता । | ||
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यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेदनुष्टुभाम् । | यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेदनुष्टुभाम् । | ||
छन्दसां वा तदन्येषां बृहतीत्वं स्मरेत् ततः ॥ | छन्दसां वा तदन्येषां बृहतीत्वं स्मरेत् ततः ॥ | ||
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स्रक्तयो विभागाः । | स्रक्तयो विभागाः । | ||
स्रक्तिरंशो विभागश्च विदलं चेति कथ्यते । इति शब्दनिर्णये । | स्रक्तिरंशो विभागश्च विदलं चेति कथ्यते । इति शब्दनिर्णये । | ||
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स वा एष वाचः परमो विकारः अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः । | स वा एष वाचः परमो विकारः अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः । | ||
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अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् । | अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् । | ||
सर्वदोषविरुद्धत्वाद् गुणनामन्यतामपि ॥ | सर्वदोषविरुद्धत्वाद् गुणनामन्यतामपि ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदेतत्पञ्चविधम् । मितममितं स्वरः सत्यानृते इति । ऋग्गाथा कुम्ब्या तन्मितम् । यजुर्निगदो वृथावाक्तदमितम् । सामाथो यः कश्च गेष्णः स स्वरः । ओमिति सत्यम् । नेत्यनृतम् । तदेतत्पुष्पं फलं वाचो यत्सत्यम् । सहेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = अथैतन्मूलं वाचो यदनृतम् । तद्यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति स उद्वर्तत एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति स शुष्यति स उद्वर्तते । तस्मादनृतं न वदेद् । दयेत त्वेनेन ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = पराग्वा एतद्रिक्तमक्षरं यदेतदोमिति । तद्यत्किञ्चोमित्याहात्रैवास्मै तद्रिच्यते । स यत्सर्वमोङ्कुर्याद्रिच्यादात्मानम् । स कामेभ्यो नालं स्यात् ॥ | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = अथैतत्पूर्णमभ्यात्मं यन्नेति । स यत्सर्वं नेति ब्रूयात् पापिकास्य कीर्तिर्जायेत । सैनं तत्रैव हन्यात् । तस्मात् काल एव दद्यात् । काले न दद्यात् । तत्सत्यानृते मिथुनीकरोति । तयोर्मिथुनात् प्रजायते ।भूयान् भवति । यो वै तां वाचं वेद यस्या एषः विकारः स सम्प्रतिवित् । अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति । तस्यै यदुपांशु स प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरम् । तस्मात् तत्तिर इव । तिर इव ह्यशरीरम् । अशरीरो हि प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरं तस्मात् तदाविराविर्हि शरीरम् ॥ ६ ॥ | ||
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....तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥ | ....तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥ | ||
व्याख्यानमेवाकारस्य सहैवोक्थेन सर्वशः । | व्याख्यानमेवाकारस्य सहैवोक्थेन सर्वशः । | ||
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. परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः । | . परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः । | ||
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.स्वराणां नियमो यत्र ह्यृचो नामैव ताः स्मृताः । | .स्वराणां नियमो यत्र ह्यृचो नामैव ताः स्मृताः । | ||
अन्या मिताक्षरा यास्तु ता गाथाः परिकीर्तिताः ॥ | अन्या मिताक्षरा यास्तु ता गाथाः परिकीर्तिताः ॥ | ||
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. अकारार्थत्वान्नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वादकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग्वाच्य इति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तदात्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् । | . अकारार्थत्वान्नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वादकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग्वाच्य इति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तदात्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् । | ||
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.अकारस्योङ्कारता त्वकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्यादौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमोङ्कारः । यमर्थमकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्त्वच्छिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वादयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाप्यकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्मादकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥ | .अकारस्योङ्कारता त्वकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्यादौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमोङ्कारः । यमर्थमकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्त्वच्छिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वादयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाप्यकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्मादकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नं तद्यशः । स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः । स य एवमेतमिन्द्रं भूतानामधिपतिं वेद विस्रसा हैवास्माल्लोकात् प्रैतीति ह स्माऽऽह महिदास ऐतरेयः । | ||
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विद्यान्तरोपदेशार्थं तद्वा इदं बृहतीसहस्रमिति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशस्तस्य नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद्यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत्प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । इदि परमैश्वर्ये इति धातोश्च । तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वं न तु मुख्यतः । अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः । मत्सि सोमं वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम् इति । | विद्यान्तरोपदेशार्थं तद्वा इदं बृहतीसहस्रमिति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशस्तस्य नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद्यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत्प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । इदि परमैश्वर्ये इति धातोश्च । तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वं न तु मुख्यतः । अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः । मत्सि सोमं वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम् इति । | ||
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न चेन्द्रं विष्णुं चेति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनादत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ्मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमित्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् । | न चेन्द्रं विष्णुं चेति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनादत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ्मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमित्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् । | ||
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यत्र चैवं भूतेष्वेकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति । अन्यथैकत्वमेव । यो देवानां नामधा एक एव इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दा अन्येषामुपचारतः । मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदायेत्यन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च मत्सीन्द्रमिन्दो पवमानेति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् । | यत्र चैवं भूतेष्वेकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति । अन्यथैकत्वमेव । यो देवानां नामधा एक एव इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दा अन्येषामुपचारतः । मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदायेत्यन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च मत्सीन्द्रमिन्दो पवमानेति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् । | ||
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महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् । न तु सामर्थ्यतः । मह पूजायामिति धातोः । पूज्यो ह्यग्रजो भवति । | महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् । न तु सामर्थ्यतः । मह पूजायामिति धातोः । पूज्यो ह्यग्रजो भवति । | ||
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आयो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः । | आयो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः । | ||
वेधा अजिन्वत् त्रिषधस्थ आर्यमृतस्य भागे यजमानमभजत् ॥ | वेधा अजिन्वत् त्रिषधस्थ आर्यमृतस्य भागे यजमानमभजत् ॥ | ||
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इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादिप्रदाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादादवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् । | इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादिप्रदाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादादवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् । | ||
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अन्येन्द्रो ह्यहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयमिति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप । विष्णुस्तु क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस इति वायोरपि विधाता श्रूयते । डुधाञ् धारणपोषणयोरिति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद्यशो बृहदुक्थादिकम् । | अन्येन्द्रो ह्यहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयमिति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप । विष्णुस्तु क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस इति वायोरपि विधाता श्रूयते । डुधाञ् धारणपोषणयोरिति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद्यशो बृहदुक्थादिकम् । | ||
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ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि । | ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि । | ||
इन्द्रो हि प्रथमो विष्णुर्यज्ञनामा जगत्पतिः ॥ | इन्द्रो हि प्रथमो विष्णुर्यज्ञनामा जगत्पतिः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = प्रेत्येन्द्रो भूत्वैषु लोकेषु राजति । तदाहुर्यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवती३ । अथ केन रूपेणेमं लोकमाभवती३ । | ||
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श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥ | श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥ | ||
महिदासाभिधो भूत्वा लोकेष्वेषु विराजति । | महिदासाभिधो भूत्वा लोकेष्वेषु विराजति । | ||
| Line 2,711: | Line 2,885: | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तद्यदेतत् स्त्रियां लोहितं भवत्यग्नेस्तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । अथ यदेतत्पुरुषे रेतो भवत्यादित्यस्य तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । सोऽयमात्मेममात्मानममुष्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । सावात्माऽमुमात्मानमिममस्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । तावन्योन्यमभिसम्भवतः । अनेन अह रूपेणामुं लोकमभिसम्भवत्यमुनो रूपेणेमं लोकमाभवति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = ७ ॥ | ||
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इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः । | इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः । | ||
स्त्रीषु यल्लोहितं लोके तत्राग्निस्थो जनार्दनः ॥ | स्त्रीषु यल्लोहितं लोके तत्राग्निस्थो जनार्दनः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तत्रैते श्लोकाः– | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥ | ||
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यन्नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत्स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यन्नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते । तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति । नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् । किन्त्वेकस्थाने वासोऽत्यनुकूलचित्तता च । एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः । | यन्नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत्स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यन्नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते । तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति । नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् । किन्त्वेकस्थाने वासोऽत्यनुकूलचित्तता च । एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः । | ||
एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ | एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ | ||
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यस्मादक्षरान्नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः । | यस्मादक्षरान्नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = यद्वाचा ओमिति यच्च नेति यच्चास्याः क्रूरं यदु चोल्बणिष्णु । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तद्वियूया कवयोऽन्वविन्दन् आत्मायत्ता समतृप्यञ्च्छृतेऽधि ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = यस्मिन् नामा समतृप्यञ्च्छृतेऽधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = तेन पाप्मानमपहत्य ब्रह्मणा स्वर्गं लोकमप्येति विद्वान् ॥ | ||
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वियूय विचार्य नामायत्तान्येव नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीन्यन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन् । शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन् तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । | वियूय विचार्य नामायत्तान्येव नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीन्यन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन् । शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन् तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । | ||
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अर्थतः कठिनं क्रूरमुल्बणं श्रवणाप्रियम् इति शब्दनिर्णये । | अर्थतः कठिनं क्रूरमुल्बणं श्रवणाप्रियम् इति शब्दनिर्णये । | ||
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अस्त्री पुमान् ब्रुवन् अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ।सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान् तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च । | अस्त्री पुमान् ब्रुवन् अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ।सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान् तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च । | ||
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अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः । | अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः । | ||
पुमांस्त्री चेति वाच्योऽतो वैलक्ष्ण्यान्न चोच्यते ॥ | पुमांस्त्री चेति वाच्योऽतो वैलक्ष्ण्यान्न चोच्यते ॥ | ||
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नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः । | नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः । | ||
तन्नामभिश्च स्त्रीरूपैः समेति स्वैः स केशवः ॥ | तन्नामभिश्च स्त्रीरूपैः समेति स्वैः स केशवः ॥ | ||
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तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् इति च श्रुतिः । | तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् इति च श्रुतिः । | ||
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सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते । | सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते । | ||
तस्यापि सत्यतादाता साधुपूर्णगुणो हरिः ॥ | तस्यापि सत्यतादाता साधुपूर्णगुणो हरिः ॥ | ||
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एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अ इति ब्रह्मेति ॥ | एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अ इति ब्रह्मेति ॥ | ||
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इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र वैशेषिकं हि तत् । | इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र वैशेषिकं हि तत् । | ||
नाम स्यादिति मे साक्षान्निर्णयः समुदाहृतः ॥ | नाम स्यादिति मे साक्षान्निर्णयः समुदाहृतः ॥ | ||
| Line 2,947: | Line 3,133: | ||
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| text | | text = | ||
तत्रागतमहमिति यस्माद् अः इत्ययं शब्दः प्रस्तुतस्य भावं विरोधिनमन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यस्तद्विरोधी तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति । मनसि प्रस्तुतत्वादवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाददृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु अव इति पृथग्विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये । | तत्रागतमहमिति यस्माद् अः इत्ययं शब्दः प्रस्तुतस्य भावं विरोधिनमन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यस्तद्विरोधी तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति । मनसि प्रस्तुतत्वादवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाददृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु अव इति पृथग्विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये । | ||
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| text | | text = | ||
न च शून्यस्याशब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे ह्यकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावताऽन्यता विरोधितेति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्मादकारस्य भगवानेव मुख्यार्थो न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्मादमुख्यार्थत्वादन्ययुक्तेनैवाकारेणाभाव इति तदुच्यते । न तु अव इत्येव केनचित्क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति । तस्मात् पारतन्त्र्याल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्यो अन्यदज्ञानदुःखाल्पत्वपारतन्त्र्योत्पत्तिनाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैवाशब्दार्थः । पूर्णं हि ब्रह्मशब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्मादकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं अः इति ब्रह्मेति । | न च शून्यस्याशब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे ह्यकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावताऽन्यता विरोधितेति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्मादकारस्य भगवानेव मुख्यार्थो न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्मादमुख्यार्थत्वादन्ययुक्तेनैवाकारेणाभाव इति तदुच्यते । न तु अव इत्येव केनचित्क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति । तस्मात् पारतन्त्र्याल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्यो अन्यदज्ञानदुःखाल्पत्वपारतन्त्र्योत्पत्तिनाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैवाशब्दार्थः । पूर्णं हि ब्रह्मशब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्मादकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं अः इति ब्रह्मेति । | ||
अः इति पृथक्त्वेन वचनं तत्सममधिकं वा किमपि नास्तीति दर्शयितुम् । | अः इति पृथक्त्वेन वचनं तत्सममधिकं वा किमपि नास्तीति दर्शयितुम् । | ||
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विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि । | विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि । | ||
समानोत्तमहीनत्वमुच्यते वस्तुनोऽञ्जसा ॥ | समानोत्तमहीनत्वमुच्यते वस्तुनोऽञ्जसा ॥ | ||
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अः इति ब्रह्म पूर्णं वस्तूच्यते । तत्रागतमहमिति तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति । मुक्तेभ्यः प्रलये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यः सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च अः इति पृथग्वचनम् । | अः इति ब्रह्म पूर्णं वस्तूच्यते । तत्रागतमहमिति तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति । मुक्तेभ्यः प्रलये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यः सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च अः इति पृथग्वचनम् । | ||
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तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये– | तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये– | ||
मुक्ता अपि न विष्णुत्वं यान्ति तत्समतामपि । | मुक्ता अपि न विष्णुत्वं यान्ति तत्समतामपि । | ||
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न च निषेधस्वरूपे विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य वैयर्थ्यात् । | न च निषेधस्वरूपे विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य वैयर्थ्यात् । | ||
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उक्तं हि शब्दनिर्णये । | उक्तं हि शब्दनिर्णये । | ||
विरुद्धता निषेधान्यभावयुक्ते हि केवलः । | विरुद्धता निषेधान्यभावयुक्ते हि केवलः । | ||
| Line 3,023: | Line 3,216: | ||
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तस्मान्नारायणः एवाकारवाच्य इति सिद्धम् । | तस्मान्नारायणः एवाकारवाच्य इति सिद्धम् । | ||
यतोऽकारः सदा विष्णोर्वाचकत्वेन संस्थितः । | यतोऽकारः सदा विष्णोर्वाचकत्वेन संस्थितः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवाहराप्नोति, जीवाह्ना जीवाक्षरमित्यनकाममारः । | ||
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| verse_id = AIT_C02_S03_V33 | | verse_id = AIT_C02_S03_V33 | ||
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षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु । | षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु । | ||
स्त्रीरूपाणि हरेस्तावदह्नामप्यभिमानिषु ॥ | स्त्रीरूपाणि हरेस्तावदह्नामप्यभिमानिषु ॥ | ||
| Line 3,073: | Line 3,268: | ||
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वायोरुत्पत्तिकामो मायां रमायां रमत इत्यनकाममारः । जीवस्थितेनाक्षरगेनाक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितमहराख्यं स्वरूपमाप्नोति तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तमित्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते । पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदतीत्युक्तत्वादुभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदतीत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः । | वायोरुत्पत्तिकामो मायां रमायां रमत इत्यनकाममारः । जीवस्थितेनाक्षरगेनाक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितमहराख्यं स्वरूपमाप्नोति तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तमित्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते । पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदतीत्युक्तत्वादुभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदतीत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः । | ||
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न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वादस्त्री पुमानित्यपि वदन्निति भवति । | न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वादस्त्री पुमानित्यपि वदन्निति भवति । | ||
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स्त्रीपुंरूपद्वयं विष्णोर्न तृतीयं कथञ्चन । | स्त्रीपुंरूपद्वयं विष्णोर्न तृतीयं कथञ्चन । | ||
साक्षान्नपुंसकस्तस्मान्मुक्तिभागी न तु क्वचित्॥ | साक्षान्नपुंसकस्तस्मान्मुक्तिभागी न तु क्वचित्॥ | ||
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न च रक्ष इति नपुंसकशब्दमात्रेण रावणादयो नपुंसका भवन्ति । भवतीतिपदाभावादनकाममार इति भगवन्नामैवेति ज्ञायते | न च रक्ष इति नपुंसकशब्दमात्रेण रावणादयो नपुंसका भवन्ति । भवतीतिपदाभावादनकाममार इति भगवन्नामैवेति ज्ञायते | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ देवरथः । तस्य वागुद्धिः, श्रोत्रे पक्षसी, चक्षुषी युक्ते, मनः सङ्ग्रहीता । तदयं प्राणोऽधितिष्ठति । तदुक्तमृषिणा । आतेन यातं मनसो जवीयसा । निमिषश्चिज्जवीयसेति जवीयसेति ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः ॥ | ||
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ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्धातोः सर्वज्ञ एकराट् । | ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्धातोः सर्वज्ञ एकराट् । | ||
वेदद्रष्टा परमऋषिर्हयास्यः पुरुषोत्तमः ॥ | वेदद्रष्टा परमऋषिर्हयास्यः पुरुषोत्तमः ॥ | ||
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निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह । | निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह । | ||
अधिष्ठितो रथो दिव्यः सोऽध्यात्मं देहनामकः ॥ | अधिष्ठितो रथो दिव्यः सोऽध्यात्मं देहनामकः ॥ | ||
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सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद्दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोरुभयोरपि वचनार्थम् । | सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद्दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोरुभयोरपि वचनार्थम् । | ||
न च सूर्यरथोऽत्र वर्ण्यते । न चाहोरात्रे अहनी इत्युच्येते । सूर्यस्याश्विनामाभावात् सप्ताश्वत्वाच्च तद्रथस्य । चतुरश्वत्वं चात्रोच्यते । श्रोत्रे पक्षसी चक्षुषीयुक्ते इत्यध्यात्मसम्बन्धाच्च । न च रात्रौ सुदिनमिति प्रयोगो दृष्टः । असुदिनस्यापि तत एव जातत्वाद् व्यर्थविशेषणता च । | न च सूर्यरथोऽत्र वर्ण्यते । न चाहोरात्रे अहनी इत्युच्येते । सूर्यस्याश्विनामाभावात् सप्ताश्वत्वाच्च तद्रथस्य । चतुरश्वत्वं चात्रोच्यते । श्रोत्रे पक्षसी चक्षुषीयुक्ते इत्यध्यात्मसम्बन्धाच्च । न च रात्रौ सुदिनमिति प्रयोगो दृष्टः । असुदिनस्यापि तत एव जातत्वाद् व्यर्थविशेषणता च । | ||
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न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगादहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । तद्रासभो नासत्या सहस्रम् इति वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । यो देवानां नामधा एक एव इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥ | न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगादहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । तद्रासभो नासत्या सहस्रम् इति वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । यो देवानां नामधा एक एव इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥ | ||
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एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | ||
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ॥ | नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स ईक्षतेमान् लोकान्नु सृजा इति । स इमांल्लोकान्सृजताम्भो मरीचीर्मरमापः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । | ||
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स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | ||
लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । | लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद्वाक् वाचोऽग्निः नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः । प्राणाद्वायुः । अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुषः आदित्यः । कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशः त्वङि्नरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा । नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानो अपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद्रेतो रेतसः आपः ॥ | ||
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पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | ||
अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । | अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तमशनापिपासाभ्यामन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि । यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति । ताभ्यो गामानयत् ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत् ता अब्रुवन् न वै नोऽयमलमिति । ताभ्यः पुरुषमानयत् ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् । | ||
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एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | ||
दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ॥ | दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ता अब्रवीत् यथायतनं प्रविशतेति । अग्निः वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । औषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । | ||
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... विशतेति स चाब्रवीत् । | ... विशतेति स चाब्रवीत् । | ||
विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥ | विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तमशनापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभि प्रजानीहीति । ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥ | ||
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अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | ||
कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ | कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स ईक्षेतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत्सृष्टं पराङ् अत्यजिघांसत् । | ||
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पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | ||
अबाख्याः देवताः पूर्वं सृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ॥ | अबाख्याः देवताः पूर्वं सृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ॥ | ||
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... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ||
अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ॥ | अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ॥ | ||
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देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | ||
इत्थमैक्षत देवेशो ब्रह्माद्या यदि मां विना । | इत्थमैक्षत देवेशो ब्रह्माद्या यदि मां विना । | ||
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इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | ||
मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ॥ | मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ||
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स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | ||
जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाविशत् । | जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाविशत् । | ||
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आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | ||
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मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | ||
अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः ॥ | अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः ॥ | ||
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मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | ||
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विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | ||
पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे । | पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे । | ||
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यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | ||
चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । | चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । | ||
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णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | ||
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आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ||
न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥ | न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥ | ||
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एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | ||
एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः । | एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः । | ||
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अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | ||
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उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | ||
तदेव मिषणं नाम सद्रूपं मिनुते यतः ॥ | तदेव मिषणं नाम सद्रूपं मिनुते यतः ॥ | ||
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नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | ||
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सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | ||
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प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | ||
जानाति नित्यज्ञानेन मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥ | जानाति नित्यज्ञानेन मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥ | ||
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ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ||
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आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | ||
कालज्यैष्ट्यं न यस्मात् तत्सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥ | कालज्यैष्ट्यं न यस्मात् तत्सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥ | ||
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गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | ||
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भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | ||
लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ॥ | लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ॥ | ||
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या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | ||
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ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ||
शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ॥ | शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ॥ | ||
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अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | ||
यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् तस्मात् कोऽहं भवानीत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान् सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते अभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः । | यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् तस्मात् कोऽहं भवानीत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान् सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते अभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः । | ||
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नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | ||
क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ | क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ | ||
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एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | ||
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प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | ||
ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥ | ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥ | ||
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परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) ॐ पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजस्सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तदस्य प्रथमं जन्म । तत्स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येतेषां लोकानां सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकाः । | ||
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अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् । | अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् । | ||
अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते ॥ | अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते । तदस्य तृतीयं जन्म ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = तदुक्तमृषिणा– | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति ॥ | ||
| verse_line5 | | verse_line5 = गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वं उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||
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पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि । | पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि । | ||
एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे ॥ | एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे ॥ | ||
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नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि । गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा इत्युक्तार्थ उदाहृतमन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः । | नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि । गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा इत्युक्तार्थ उदाहृतमन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः । | ||
आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति आत्मानमेव तद्भावयतीत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । एतया द्वारा प्रापद्यतेति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्रगमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति । | आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति आत्मानमेव तद्भावयतीत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । एतया द्वारा प्रापद्यतेति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्रगमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति । | ||
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कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च । | कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च । | ||
लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् ॥ | लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् ॥ | ||
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प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम् । | प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम् । | ||
आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम् ॥ | आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम् ॥ | ||
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प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवेत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते । एषामवेदमहमित्यत्रापि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा मम जनिमानीत्येवोच्येत । व्यर्थता चैषामित्यादिविशेषणानाम् । अवेदमित्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वादहमित्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्मादहं मनुरित्यादावप्यहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेवाभवमित्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते । | प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवेत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते । एषामवेदमहमित्यत्रापि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा मम जनिमानीत्येवोच्येत । व्यर्थता चैषामित्यादिविशेषणानाम् । अवेदमित्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वादहमित्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्मादहं मनुरित्यादावप्यहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेवाभवमित्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते । | ||
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ओयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः । | ओयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः । | ||
अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥ | अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥ | ||
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न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति । किन्तु सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः । | न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति । किन्तु सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः । | ||
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न वेदेषु पदं ककिञ्चिद्वर्णो वा व्यर्थ इष्यते । | न वेदेषु पदं ककिञ्चिद्वर्णो वा व्यर्थ इष्यते । | ||
यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः ॥ | यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः ॥ | ||
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शब्दा रेतोन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् । | शब्दा रेतोन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् । | ||
वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥ | वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥ | ||
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भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव सोऽग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत्तस्यैव भवति । एवं भावयतामेवैष पन्था उरुगाय इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशव इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः । ता एव देवताः शतं पुर आयसीर्ज्ञानिन्यो विशेषतः । अय पय गताविति धातोः । मानुषानपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । शमस्य विद्यते इति शी विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद्यश्चेति श्यः । सोऽस्य जीवस्येन इति श्येनः । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । निरदीयं निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् । | भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव सोऽग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत्तस्यैव भवति । एवं भावयतामेवैष पन्था उरुगाय इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशव इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः । ता एव देवताः शतं पुर आयसीर्ज्ञानिन्यो विशेषतः । अय पय गताविति धातोः । मानुषानपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । शमस्य विद्यते इति शी विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद्यश्चेति श्यः । सोऽस्य जीवस्येन इति श्येनः । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । निरदीयं निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् । | ||
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स्वर् आनन्दो विष्णुः । अत्रग इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवदनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकारः आप्तिः । सम्भवो भोगः । तां समभवत् ततो मनुष्या आजायन्तेत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जयविजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः । | स्वर् आनन्दो विष्णुः । अत्रग इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवदनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकारः आप्तिः । सम्भवो भोगः । तां समभवत् ततो मनुष्या आजायन्तेत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जयविजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः । | ||
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मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः । सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ | मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः । सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ | ||
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अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । | अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । | ||
इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् ॥ | इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् ॥ | ||
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यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | ||
मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञातृस्वरूपतः । | मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञातृस्वरूपतः । | ||
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ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ॥ | ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ॥ | ||
तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः । | तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः । | ||
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सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । | सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । | ||
प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः ॥ | प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः ॥ | ||
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जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मेति पृष्टः स भगवानाह । कतरः स आत्मेति । कतरः आनन्दतमः । | जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मेति पृष्टः स भगवानाह । कतरः स आत्मेति । कतरः आनन्दतमः । | ||
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यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्तमौ इति शब्दनिर्णये । | यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्तमौ इति शब्दनिर्णये । | ||
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यत्प्रेरणादयं जीवो दर्शनादीन् करोति च । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् । सर्वेषां दर्शनादिकारणत्वमेकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।प्रजापतिः शिवः लिङ्गाभिमानित्वात् । | यत्प्रेरणादयं जीवो दर्शनादीन् करोति च । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् । सर्वेषां दर्शनादिकारणत्वमेकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।प्रजापतिः शिवः लिङ्गाभिमानित्वात् । | ||
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प्रजापतिः शिवः शेषो लिङ्गमित्यभिधीयते । | प्रजापतिः शिवः शेषो लिङ्गमित्यभिधीयते । | ||
लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥इति शैवपुराणे । | लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥इति शैवपुराणे । | ||
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सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । | सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । | ||
वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥ इति भारते । | वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥ इति भारते । | ||
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क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् । भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । | क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् । भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । | ||
ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः । | ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः । | ||
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प्रथमेतराणीतिशब्दो मानुषाणाम् । द्वितीयो सुरादीनाम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रमिति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात् पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वादलोकः । | प्रथमेतराणीतिशब्दो मानुषाणाम् । द्वितीयो सुरादीनाम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रमिति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात् पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वादलोकः । | ||
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अण्डजानि चेत्याद्युक्त्वा पुनरश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते इति भारतवचनादश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणीति । गमनपतनस्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गममित्यादिवचनम् । | अण्डजानि चेत्याद्युक्त्वा पुनरश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते इति भारतवचनादश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणीति । गमनपतनस्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गममित्यादिवचनम् । | ||
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स एतेनेत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्ममुक्त्यनन्तरं हि शरीरादुत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः प्रज्ञेनात्मनैवोत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् स भुङ्क्ते इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्त इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनात्मनेत्यादि । अनुक्तविशेषणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रो लोक इति सामान्यवचनम् । | स एतेनेत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्ममुक्त्यनन्तरं हि शरीरादुत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः प्रज्ञेनात्मनैवोत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् स भुङ्क्ते इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्त इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनात्मनेत्यादि । अनुक्तविशेषणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रो लोक इति सामान्यवचनम् । | ||
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अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । | अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । | ||
कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥ | कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥ | ||
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ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थमेष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेत्रकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनामत्र विवक्षितम् । नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु इति शब्दतत्त्वे ॥ | ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थमेष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेत्रकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनामत्र विवक्षितम् । नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु इति शब्दतत्त्वे ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥ | ||
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वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद्धृदयं मनश्चेति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि हे विष्णो ममाविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो इति सम्बोधनम् । | वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद्धृदयं मनश्चेति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि हे विष्णो ममाविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो इति सम्बोधनम् । | ||
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आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते । | आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते । | ||
तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यमाणीस्थ इति गीयते ॥ | तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यमाणीस्थ इति गीयते ॥ | ||
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आविरावीरिति दैर्घ्यमतिशयार्थे । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलमाणमुच्यते । तस्य धारणेन तद्वानाणी । स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव । विस्मृतो मा भव । हे विष्णो अनेन त्वद्विषयेणैवाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावदवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवत्विति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् । | आविरावीरिति दैर्घ्यमतिशयार्थे । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलमाणमुच्यते । तस्य धारणेन तद्वानाणी । स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव । विस्मृतो मा भव । हे विष्णो अनेन त्वद्विषयेणैवाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावदवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवत्विति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् । | ||
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वाङ्म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् । | वाङ्म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् । | ||
अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥ इति च ॥ | अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥ इति च ॥ | ||
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विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | ||
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकामृषयो विदुः ॥ | विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकामृषयो विदुः ॥ | ||
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पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥ | पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥ | ||
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । | देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । | ||
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आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | ||
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भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥ | भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥ | ||
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अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् । | अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् । | ||
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मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | ||
विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥ | विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥ | ||
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प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | ||
वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥ | वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥ | ||
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प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । | प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । | ||
वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैव तानि कर्मनामान्येव इति च श्रुतिः । | वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैव तानि कर्मनामान्येव इति च श्रुतिः । | ||
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मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् । | मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् । | ||
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मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । | मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । | ||
नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥ इति च । | नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥ इति च । | ||
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प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ शाकल्यस्य । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वृष्टिः सन्धिः । पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद्बलवदनूद्गृह्णन् सन्दधदहोरात्रे वर्षति । द्यावापृथिव्यौ समधातामित्युताप्याहुरितीन्वधिदैवतम् । | ||
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| verse_id = AIT_C03_S01_V07 | | verse_id = AIT_C03_S01_V07 | ||
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| text | | text = | ||
वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | ||
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ॥ | पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ॥ | ||
| Line 4,332: | Line 4,624: | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथाध्यात्मम् ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम् । इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाकाशः । तस्मिन्हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तो यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः । यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींष्येवमिमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुर्यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयं यथाऽयमग्निः पृथिव्यामेवमिदमुपस्थे रेतः । एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाहेदमेव पृथिव्या रूपमिदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = २॥ | ||
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उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | ||
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ॥ | अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ॥ | ||
| Line 4,359: | Line 4,652: | ||
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वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनमुभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठाऽवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाह तस्य नास्त्युपवादः । | ||
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पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | ||
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ॥ | दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ॥ | ||
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भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् । | भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् । | ||
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क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | ||
लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥ इति च । | लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥ इति च । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत्प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत् पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्दिवं देवतामारो द्यौस्त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेदन्तरिक्षं देवतामारोऽन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वाब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत्तथा स्यात् । | ||
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उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | ||
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अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | ||
ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ॥ | ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ॥ | ||
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षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | ||
विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ॥ | विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ॥ | ||
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अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण । | अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = न त्वेवान्यत्कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ | ||
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द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | ||
योऽतिक्रमति तस्याज्ञामतिद्युम्नः प्रकीर्तितः ॥ | योऽतिक्रमति तस्याज्ञामतिद्युम्नः प्रकीर्तितः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेच्छक्नुवन्तं चेन्मन्येत प्राणं वंशं समधां३ । प्राणं मा वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ चेदशक्नुवन्तं मन्येत प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = ४ ॥ | ||
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भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | ||
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सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | ||
वायुं च मुक्तिमाप्नोति य एवं तदुपासकम् ॥ | वायुं च मुक्तिमाप्नोति य एवं तदुपासकम् ॥ | ||
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स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | ||
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तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | ||
विष्णुर्जहाति तं पापमिह चामुत्र च प्रभुः ॥ इति च भारते ॥४ ॥ | विष्णुर्जहाति तं पापमिह चामुत्र च प्रभुः ॥ इति च भारते ॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः । पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहितेति ॥ | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्तयति येन स्वरास्वरं विजानाति येन मात्रामात्रां विभजते सा संहितेति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः । अक्षरे खल्विमे अविकर्षन्ननेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद्याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद्भवति । सामैवाहं संहितां मन्य इति । | ||
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पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | ||
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ॥ | वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ॥ | ||
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मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तं– बृहस्पते न परः साम्नो विदुरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
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मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । | मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । | ||
येषां नैतन्नापरं किं च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्॥ | येषां नैतन्नापरं किं च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्॥ | ||
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अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः । | अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः । | ||
आदेवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥ | आदेवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥ | ||
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ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | ||
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥ | शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥ | ||
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अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | ||
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ | ||
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अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | ||
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असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | ||
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ | ||
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ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | ||
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वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | ||
स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥ | स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥ | ||
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सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् । | सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् । | ||
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद्यतः ॥ | तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद्यतः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = बृहद्रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यःवाग्वैरथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः । भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
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देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | ||
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ॥ | नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = वाक्प्राणेन संहितेति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन पवमानो विश्वैर्देवैः स्वर्गेण लोकेन स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । स यो हैतामवरपरां संहितां वेदैवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते यथैषा संहिता । | ||
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संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥ | संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥ | ||
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । | द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेदभिव्याहार्षन्नेव विद्याद्दिवं संहिताऽगमद्विदुषां देवानामेवं भविष्यतीति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
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.... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥ | .... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥ | ||
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । | आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = वाक्संहितेति पञ्चालचण्डः वाचा वै वेदास्सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । तद्यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेह । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति स्वपिति वा प्राणे तदा वाग्भवति । प्राणस्तदा वाचं रेह । तावन्योन्यं रीहः । वाग्वै माता । प्राणः पुत्रः । तदप्येतदृषिणोक्तम्– | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितस्तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥ इति । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
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पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥ | पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥ | ||
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । | मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम् । पतिरुत्तररूपम् । पुत्रः सन्धिः । प्रजननं सन्धानम् । सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च । पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च तदप्येतदृषिणोक्तम्– अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||
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प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि । | प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि । | ||
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ॥ | विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ॥ | ||
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प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | ||
यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ॥ | यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ॥ | ||
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यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् । | यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् । | ||
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चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | ||
परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इति नामकः ॥ | परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इति नामकः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ॐ प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद्यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युरेवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्यात्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपम् । मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तस्थरूपम् । | ||
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गृहस्याच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । | गृहस्याच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । | ||
तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः ॥ | तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । त्रयं त्वेव न एतत्प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति त्रीणीतः षष्टि शतानि त्रीणीतः । तानि सप्तविंशति शतानि भवन्ति । | ||
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अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । | अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । | ||
तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् ॥ | तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः । स एषोऽहःसंमानश्चक्षुर्मयः । श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतमहःसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेदाह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥ | ||
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तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । | तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । | ||
अहर्नामा च भगवानहार्यत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | अहर्नामा च भगवानहार्यत्वात् प्रकीर्तितः ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ कौण्ठरव्यः । त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणां त्रीणि षष्टि शतान्यूष्मणां त्रीणि षष्टि शतानि सन्धीनाम् । यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ता यान् सन्धीनवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = अथाध्यात्मं यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचामस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम मज्जानस्तेध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतो न ह वा ऋते प्राणाद्रेतः सिच्यते । यद्वा ऋते प्राणाद्रेतः सिच्येत । पूयेन्न सम्भवेत् । यान्सन्धीनधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि पञ्चेतः तदशीतिसहस्रं भवति । अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतमक्षरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेदाक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥ | ||
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एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । | एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । | ||
अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् ॥ | अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् ॥ | ||
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तस्यैतस्यात्मनस्तस्य शरीराख्यस्यात्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेस्तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । विष्णुरित्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्णाक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । | तस्यैतस्यात्मनस्तस्य शरीराख्यस्यात्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेस्तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । विष्णुरित्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्णाक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । | ||
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अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । | अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । | ||
सन्धानात् सन्धिनामासौ स्वयं नारायणः प्रभुः ॥ | सन्धानात् सन्धिनामासौ स्वयं नारायणः प्रभुः ॥ | ||
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मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थमिदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानामभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । र्ओ निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक्प्रेरकत्वाद् विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येवाहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । | मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थमिदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानामभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । र्ओ निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक्प्रेरकत्वाद् विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येवाहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । | ||
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यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । | यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । | ||
विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥ | विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = चत्वारः पुरुषाः इति बाध्वः । शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुष इति । शरीरपुरुष इति यमवोचाम स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः । छन्दःपुरुष इति यमवोचामाक्षरसमाम्नाय एव । तस्यैतस्याकारो रसः । वेदपुरुष इति यमवोचाम येन वेदान् वेद । ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदम् । तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः । तस्माद् ब्रह्माणं ब्रह्मिष्ठं कुर्वीत । यो यज्ञस्योल्बणं पश्येत् । महापुरुष इति यमवोचाम संवत्सर एव प्रध्वंसयन् अन्यानि भूतान्यैक्याभावयन्नन्यानि । तस्यैतस्यासावादित्यो रसः । | ||
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संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । | संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । | ||
स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह ॥ | स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एतमेतदिति विद्यात् । तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति । तदप्येतदृषिणोक्तं– | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ इति । | ||
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स एवादित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ॥ | स एवादित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ॥ | ||
स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः । | स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = एतामनुविधां संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्यामेतं दिव्येतं वायावेतमाकाश एतमप्स्वेतमोषधीष्वेतं वनस्पतिष्वेतं चन्द्रमस्येतं नक्षत्रेष्वेतं सर्वेषु भूतेषु । एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं परस्मै शंसति, दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानमिति । | ||
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एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ॥ | एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ॥ | ||
ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् । | ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्– | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम् ॥ इति । | ||
| verse_line4 | | verse_line4 = न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवति । तस्मादेवं विद्वान्न परस्मा अग्निं चिनुयान्न परस्मै महाव्रतेन स्तुवीत । न परस्मा एतदहः शंसेत् । कामं पित्रे वाऽऽचार्याय वा शंसेदात्मन एवास्य तत्कृतं भवति । | ||
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कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । | कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । | ||
प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् ॥ | प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते । न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्यात्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत तत्कुर्वीत । यदन्ति यच्च दूरके इति सप्त जपेत् । आदित्प्रत्नस्य रेतस इत्येका । यत्र ब्रह्मा पवमानेति षट् । उद्वयं तमसस्परीत्येका । | ||
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सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । | सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । | ||
अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्॥ | अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथापि यत्र च्छिद्र इवादित्यो दृश्यते रथनाभिरिवाभिख्यायेत च्छिद्रां वा छायां पश्येत् तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयातां तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत तद्यथा वटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते तानि यदा न पश्येत् तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यपिधाय कर्णा उपशृणुयात् स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात् तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा मेघे वा विद्युतं पश्येन्मेघे वा विद्युतं न पश्येन्महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्यात् । इति प्रत्यक्षदर्शनानि । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = अथ स्वप्नाः । पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति वराह एनं हन्ति मर्कट एनमास्कन्दयत्याशु वायुरेनं प्रवहति सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति मध्वश्नाति बिसानि भक्षयत्येकपुण्डरीकं धारयति खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति कृष्णं धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति । स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येदुपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वाऽन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्राश्नीयात् । | ||
| verse_line3 | | verse_line3 = स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टो ऽविज्ञातोऽनादिष्टः श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् ॥ ४ ॥ | ||
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देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ॥ | देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ॥ | ||
अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते । | अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते । | ||
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शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात् तदुपास्यत्वात् तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यदीं एव अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत्सर्वमरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावो रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । परस्मै शंसनमात्रादरतिरेवेत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थामिति दोषद्वयमेवेत्यवधारयति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवतीति । अलकं शृणोतीति त्यागद्वयस्य मुख्यतः । तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद्भवति । तौ यदाऽस्माच्छरीराद् विहीयेते तदैवैतानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । | शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात् तदुपास्यत्वात् तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यदीं एव अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत्सर्वमरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावो रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । परस्मै शंसनमात्रादरतिरेवेत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थामिति दोषद्वयमेवेत्यवधारयति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवतीति । अलकं शृणोतीति त्यागद्वयस्य मुख्यतः । तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद्भवति । तौ यदाऽस्माच्छरीराद् विहीयेते तदैवैतानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । | ||
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| Line 5,283: | Line 5,625: | ||
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यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । | यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । | ||
सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥ इति स्कान्दे । | सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥ इति स्कान्दे । | ||
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ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्यानन्दं जनयन् । स्वरानन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आवक्षणाभ्य इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । | ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्यानन्दं जनयन् । स्वरानन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आवक्षणाभ्य इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । | ||
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सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । | सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । | ||
यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥ इति च । | यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥ इति च । | ||
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इन्दुरिष्टप्रदत्वाद्यो वायुरादाय गच्छति । | इन्दुरिष्टप्रदत्वाद्यो वायुरादाय गच्छति । | ||
इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥ इति च । | इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥ इति च । | ||
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अनन्यहेतुकं साक्षाद्भगवद्भक्तिरूपकम् । | अनन्यहेतुकं साक्षाद्भगवद्भक्तिरूपकम् । | ||
सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ॥ | सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ॥ | ||
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तमसः सकाशात् उद्गता वयमुत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तस्तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवमगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमज्योतिः न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रमिदमिति ज्ञापयितुमगन्म ज्योतिरुत्तममिति पुनर्वचनम् । | तमसः सकाशात् उद्गता वयमुत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तस्तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवमगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमज्योतिः न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रमिदमिति ज्ञापयितुमगन्म ज्योतिरुत्तममिति पुनर्वचनम् । | ||
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अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः इति शब्दनिर्णये । | अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः इति शब्दनिर्णये । | ||
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बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । | बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । | ||
स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥ इति ब्रह्माण्डे । | स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥ इति ब्रह्माण्डे । | ||
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रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । | रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । | ||
पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् ॥ | पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शा अन्तरिक्षस्योष्माणो दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शा वायोरुष्माण आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शा यजुर्वेदस्योष्माणः सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः श्रोत्रस्योष्माणो मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शा अपानस्योष्माणो व्यानस्य स्वराः । | ||
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अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुशब्दार्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववागुपनिषद एव । तथापि मुख्यत एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । | अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुशब्दार्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववागुपनिषद एव । तथापि मुख्यत एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । | ||
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पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । | पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । | ||
स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥ | स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥ | ||
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तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । | तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । | ||
दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी ॥ | दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् । ओष्ठापिधाना न कुलीदन्तैः परिवृता पविः ।सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत् । | ||
| verse_line2 | | verse_line2 = इति वाग्रसः ॥५ ॥ | ||
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विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्सारामप्यृचं जपेत् । | विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्सारामप्यृचं जपेत् । | ||
ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् ॥ | ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् ॥ | ||
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नेत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवदस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वात् वक्ष्यमाणत्वाच्च । | नेत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवदस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वात् वक्ष्यमाणत्वाच्च । | ||
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श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः इति भागवते । | श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः इति भागवते । | ||
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यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद इत्यादिश्रुतिश्च । | यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद इत्यादिश्रुतिश्च । | ||
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स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ | स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = अथ हास्मा एतत्कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता । | ||
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संवत्सर इति विशेषणाद्विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । | संवत्सर इति विशेषणाद्विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । | ||
ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः इत्यादि श्रुतेः । | ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः इत्यादि श्रुतेः । | ||
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श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । | श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । | ||
तेनैव सम्यक्सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ॥ | तेनैव सम्यक्सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् । षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकारषकारावनुसंहितमृचो वेद । सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् । | ||
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विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ॥ | विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ॥ | ||
ण इत्याक्रियमाणत्वात् णकारोऽस्य बलं मतम् । | ण इत्याक्रियमाणत्वात् णकारोऽस्य बलं मतम् । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = स यदि विचिकित्सेत् सणकारं ब्रवाणीं३ अणकारां ३ इति सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणीं ३ अषकारां इति । सषकारमेव ब्रूयात् । ते यद्वयमनुसंहितमृचोऽधीमहे यच्च माण्डूकेयीयमध्यायं प्रब्रूमस्तेन नो णकारषकारावुपाप्ताविति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । अथ यद्वयमनुसंहितमृचोऽधीमहे यच्च माण्डूकेयीयमध्यायं प्रब्रूमस्तेन नो णकारषकारावुपाप्तावन्ति ह स्माह स्थविरः शाकल्यः । | ||
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संहितासहितत्वेन यदृचो धीमहे वयम् ॥ | संहितासहितत्वेन यदृचो धीमहे वयम् ॥ | ||
वेदानन्यान्पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः । | वेदानन्यान्पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः । | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः । | ||
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.... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । | .... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । | ||
यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि ॥ | यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि ॥ | ||
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| verse_line1 | | verse_line1 = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ||
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॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥ | ॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥ | ||
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संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । | संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । | ||
अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्॥ | अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्॥ | ||
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य एतेन ण इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलं षशब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाततत्वं सर्वर्चां सर्वासां संहितामनु तदर्थत्वेन वेद । अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथेत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनामव्याख्यानरूपा एव । यद्द्वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोधीमहे तेनास्माकं णशब्दषशब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । वीत्युपसर्गत्वादुकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वादुक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक्तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ | य एतेन ण इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलं षशब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाततत्वं सर्वर्चां सर्वासां संहितामनु तदर्थत्वेन वेद । अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथेत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनामव्याख्यानरूपा एव । यद्द्वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोधीमहे तेनास्माकं णशब्दषशब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । वीत्युपसर्गत्वादुकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वादुक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक्तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ | ||
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सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैर्मेघाग्निवारिधितलादिरवैश्च सर्वैः । | सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैर्मेघाग्निवारिधितलादिरवैश्च सर्वैः । | ||
एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥ | एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥ | ||
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यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | ||
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हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । | हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । | ||
रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥ | रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥ | ||
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साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । | साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । | ||
हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥ | हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥ | ||
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पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | ||
अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥ | अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥ | ||