Bhagavatatatparyanirnaya: Difference between revisions
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| verse_line1 = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् | | verse_line1 = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् | ||
| verse_lines = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्;तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः ।;तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा;धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः । | | verse_line2 = तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः । | ||
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| verse_line1 = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां | | verse_line1 = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां | ||
| verse_lines = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां;वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।;श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः;सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् । | | verse_line2 = वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् । | ||
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| verse_line1 = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं | | verse_line1 = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं | ||
| verse_lines = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं;शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।;पिबत भागवतं रसमालयं;मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । | | verse_line2 = शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । | ||
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| verse_line1 = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः | | verse_line1 = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः | ||
| verse_lines = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः;सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः । | | verse_line1 = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः । | ||
| verse_lines = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।;अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥;वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।;ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् । | | verse_line1 = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् । | ||
| verse_lines = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।;ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः । | | verse_line1 = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः । | ||
| verse_lines = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।;लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = सूत उवाच– | | verse_line1 = सूत उवाच– | ||
| verse_lines = सूत उवाच–;यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं;द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।;पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽपि नेदु-;स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं | | verse_line2 = यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं | ||
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| verse_line1 = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक- | | verse_line1 = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक- | ||
| verse_lines = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-;मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् ।;संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं;तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् । | | verse_line2 = मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् । | ||
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| verse_line1 = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । | | verse_line1 = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । | ||
| verse_lines = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।;ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् । | | verse_line1 = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् । | ||
| verse_lines = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।;उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया । | | verse_line1 = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया । | ||
| verse_lines = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।;पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | | verse_line1 = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | ||
| verse_lines = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।;क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै- | | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै- | ||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-;र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते ।;स्थित्यादये हरिविरिञ्चहरेति सञ्ज्ञाः;श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनौ नृणां स्युः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते । | | verse_line2 = र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते । | ||
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| verse_line1 = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः । | | verse_line1 = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः । | ||
| verse_lines = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।;तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् । | | verse_line1 = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् । | ||
| verse_lines = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।;सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै । | | verse_line1 = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै । | ||
| verse_lines = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।;पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_line1 = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । | | verse_line1 = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । | ||
| verse_lines = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।;सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव । | | verse_line1 = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव । | ||
| verse_lines = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।;अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः । | | verse_line1 = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः । | ||
| verse_lines = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।;स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | ||
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| verse_line1 = सूत उवाच– | | verse_line1 = सूत उवाच– | ||
| verse_lines = सूत उवाच–;जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः ।;सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः । | | verse_line2 = जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः । | ||
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| verse_line1 = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । | | verse_line1 = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । | ||
| verse_lines = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।;तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । | | verse_line1 = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । | ||
| verse_lines = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।;यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः । | | verse_line1 = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः । | ||
| verse_lines = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।;चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः । | | verse_line1 = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः । | ||
| verse_lines = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।;तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी । | | verse_line1 = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी । | ||
| verse_lines = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।;भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । | | verse_line1 = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । | ||
| verse_lines = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।;प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया । | | verse_line1 = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया । | ||
| verse_lines = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।;आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । | | verse_line1 = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । | ||
| verse_lines = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।;दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । | | verse_line1 = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । | ||
| verse_lines = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।;चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | ||
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| verse_line1 = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । | | verse_line1 = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । | ||
| verse_lines = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।;रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । | | verse_line1 = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । | ||
| verse_lines = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।;बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 596: | Line 628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः । | | verse_line1 = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः । | ||
| verse_lines = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।;यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 614: | Line 647: | ||
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| verse_line1 = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । | | verse_line1 = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । | ||
| verse_lines = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।;इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 632: | Line 666: | ||
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| verse_line1 = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । | | verse_line1 = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । | ||
| verse_lines = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।;मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 650: | Line 685: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले । | | verse_line1 = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले । | ||
| verse_lines = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।;एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 668: | Line 704: | ||
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| verse_line1 = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् । | | verse_line1 = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् । | ||
| verse_lines = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।;अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 686: | Line 723: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । | | verse_line1 = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । | ||
| verse_lines = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।;अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 704: | Line 742: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः । | | verse_line1 = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः । | ||
| verse_lines = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।;सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 722: | Line 761: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | | verse_line1 = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | ||
| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।;उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 761: | Line 802: | ||
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| verse_line1 = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः । | | verse_line1 = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः । | ||
| verse_lines = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः ।;एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 779: | Line 821: | ||
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| verse_line1 = सूत उवाच— | | verse_line1 = सूत उवाच— | ||
| verse_lines = सूत उवाच—;द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।;जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये । | | verse_line2 = द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये । | ||
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| Line 797: | Line 840: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा । | | verse_line1 = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा । | ||
| verse_lines = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा ।;सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 815: | Line 859: | ||
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| verse_line1 = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । | | verse_line1 = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । | ||
| verse_lines = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।;कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।;इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । | | verse_line2 = कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । | ||
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| Line 833: | Line 878: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । | | verse_line1 = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । | ||
| verse_lines = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।;सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 842: | Line 888: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । | | verse_line1 = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । | ||
| verse_lines = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।;वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 860: | Line 907: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः । | | verse_line1 = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः । | ||
| verse_lines = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।;मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 878: | Line 926: | ||
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| verse_line1 = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः । | | verse_line1 = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः । | ||
| verse_lines = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।;असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | ||
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| verse_line1 = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । | | verse_line1 = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । | ||
| verse_lines = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।;प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । | | verse_line1 = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । | ||
| verse_lines = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।;कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = नारद उवाच— | | verse_line1 = नारद उवाच— | ||
| verse_lines = नारद उवाच—;पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना ।;परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । | | verse_line2 = पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । | ||
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| Line 954: | Line 1,006: | ||
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| verse_line1 = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् । | | verse_line1 = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् । | ||
| verse_lines = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।;तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 972: | Line 1,025: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यास उवाच— | | verse_line1 = व्यास उवाच— | ||
| verse_lines = व्यास उवाच—;अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे ।;तत्मूलमव्यक्तमगाधबोधं, पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे । | | verse_line2 = अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे । | ||
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| Line 990: | Line 1,044: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः । | | verse_line1 = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः । | ||
| verse_lines = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।;न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 1,008: | Line 1,063: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो | | verse_line1 = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो | ||
| verse_lines = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो;जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् ।;तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा;न यत्र हंसा न्यपतन् मिमङ्क्षया ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् । | | verse_line2 = जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् । | ||
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| Line 1,026: | Line 1,082: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं | | verse_line1 = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं | ||
| verse_lines = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं;न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।;कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे;न चार्षितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । | | verse_line2 = न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । | ||
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| Line 1,044: | Line 1,101: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अतो महाभाग भवानमोघदृक् | | verse_line1 = अतो महाभाग भवानमोघदृक् | ||
| verse_lines = अतो महाभाग भवानमोघदृक्;शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।;उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये;समाधिनाऽनुस्मर यद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः । | | verse_line2 = शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः । | ||
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| Line 1,062: | Line 1,120: | ||
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| verse_line1 = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं | | verse_line1 = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं | ||
| verse_lines = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं;स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।;यद्वाक्यतो धर्म इतीतरस्थितो;न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । | | verse_line2 = स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । | ||
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| Line 1,080: | Line 1,139: | ||
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| verse_line1 = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो- | | verse_line1 = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो- | ||
| verse_lines = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-;रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।;प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-;स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । | | verse_line2 = रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । | ||
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| Line 1,098: | Line 1,158: | ||
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| verse_line1 = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो | | verse_line1 = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो | ||
| verse_lines = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो;यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः ।;तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि;प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः । | | verse_line2 = यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः । | ||
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| Line 1,116: | Line 1,177: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते | | verse_line1 = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते | ||
| verse_lines = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते;प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।;ययाऽहमेतत् सदसत् स्वमायया;पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम । | | verse_line2 = प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम । | ||
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| Line 1,134: | Line 1,196: | ||
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| verse_line1 = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः | | verse_line1 = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः | ||
| verse_lines = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः;समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।;प्रख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां;सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् । | | verse_line2 = समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् । | ||
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| Line 1,156: | Line 1,219: | ||
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| verse_line1 = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् । | | verse_line1 = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् । | ||
| verse_lines = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।;खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 1,174: | Line 1,238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । | | verse_line1 = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । | ||
| verse_lines = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।;आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 1,196: | Line 1,261: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सूत उवाच— | | verse_line1 = सूत उवाच— | ||
| verse_lines = सूत उवाच—;ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे ।;शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे । | | verse_line2 = ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे । | ||
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| Line 1,214: | Line 1,280: | ||
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| verse_line1 = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले । | | verse_line1 = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले । | ||
| verse_lines = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।;अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् | | verse_line1 = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् | ||
| verse_lines = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्;कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।;अपाहरद्विप्रियमेतदस्य;जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ती ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि । | | verse_line2 = कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,241: | Line 1,309: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = माता शिशूनां निधनं सुतानां | | verse_line1 = माता शिशूनां निधनं सुतानां | ||
| verse_lines = माता शिशूनां निधनं सुतानां;निशम्य घोरं परितप्यमाना ।;तदाऽरुदद् बाष्पकलाकुलाक्षी;तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = निशम्य घोरं परितप्यमाना । | | verse_line2 = निशम्य घोरं परितप्यमाना । | ||
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| verse_line1 = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । | | verse_line1 = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । | ||
| verse_lines = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।;भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते । | | verse_line1 = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते । | ||
| verse_lines = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते ।;भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 1,299: | Line 1,370: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् । | | verse_line1 = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् । | ||
| verse_lines = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् ।;समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 1,317: | Line 1,389: | ||
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| verse_line1 = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः । | | verse_line1 = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः । | ||
| verse_lines = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।;भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | ||
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| verse_line1 = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् । | | verse_line1 = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् । | ||
| verse_lines = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।;इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । | | verse_line1 = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । | ||
| verse_lines = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।;प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | ||
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| verse_line1 = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं | | verse_line1 = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं | ||
| verse_lines = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं;प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः।;शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः;प्रणिध्युपात्तामनुजानुवर्तितः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः। | | verse_line2 = प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः। | ||
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| Line 1,397: | Line 1,473: | ||
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| verse_line1 = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः । | | verse_line1 = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः । | ||
| verse_lines = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।;नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = स्त्रिय ऊचुः— | | verse_line1 = स्त्रिय ऊचुः— | ||
| verse_lines = स्त्रिय ऊचुः—;स वै किलायं पुरुषः पुरातनो;य एक आसीदविशेष आत्मनि ।;अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे;निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = स वै किलायं पुरुषः पुरातनो | | verse_line2 = स वै किलायं पुरुषः पुरातनो | ||
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| Line 1,433: | Line 1,511: | ||
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| verse_line1 = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां | | verse_line1 = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां | ||
| verse_lines = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां;स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।;अनामरूपात्मनि रूपनामनी;विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् । | | verse_line2 = स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,451: | Line 1,530: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः | | verse_line1 = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः | ||
| verse_lines = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः;जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल ।;धर्मं भगं सत्यमृतं दयां यशो;भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल । | | verse_line2 = जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,469: | Line 1,549: | ||
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| verse_line1 = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं | | verse_line1 = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं | ||
| verse_lines = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं;निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते ।;यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिः;न जात्वपैत्याकृतिभिः हृदि स्पृशन् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते । | | verse_line2 = निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते । | ||
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| Line 1,487: | Line 1,568: | ||
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| verse_line1 = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः । | | verse_line1 = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः । | ||
| verse_lines = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।;परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 1,505: | Line 1,587: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः । | | verse_line1 = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः । | ||
| verse_lines = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।;सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,523: | Line 1,606: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान् | | verse_line1 = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान् | ||
| verse_lines = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्;कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया ।;तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद्;रविं विनाऽक्ष्णामिव नस्तवाच्युत ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया । | | verse_line2 = कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । | | verse_line1 = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । | ||
| verse_lines = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।;न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | |||
| verse_line2 = न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | | verse_line2 = न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,559: | Line 1,644: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः । | | verse_line1 = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः । | ||
| verse_lines = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।;अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | | verse_line2 = अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,581: | Line 1,667: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्राह्मणा ऊचुः— | | verse_line1 = ब्राह्मणा ऊचुः— | ||
| verse_lines = ब्राह्मणा ऊचुः—;पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः ।;ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च रामो दाशरर्थियथा ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः । | | verse_line2 = पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,599: | Line 1,686: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः । | | verse_line1 = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः । | ||
| verse_lines = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः ।;आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 1,621: | Line 1,709: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् । | | verse_line1 = प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् । | ||
| verse_lines = प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् ।;अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवन्दनैः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवन्दनैः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवन्दनैः ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 1,639: | Line 1,728: | ||
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| verse_line1 = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् । | | verse_line1 = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।;यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु । | | verse_line1 = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु । | ||
| verse_lines = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।;यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 1,675: | Line 1,766: | ||
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| verse_line1 = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो । | | verse_line1 = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो । | ||
| verse_lines = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।;स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् । | | verse_line1 = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् । | ||
| verse_lines = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् ।;इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_line1 = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः । | | verse_line1 = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः । | ||
| verse_lines = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।;गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | |||
| verse_line2 = गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | | verse_line2 = गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | ||
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| verse_line1 = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः । | | verse_line1 = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः । | ||
| verse_lines = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।;गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ।;अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः । | | verse_line2 = गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः । | ||
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| verse_line1 = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् । | | verse_line1 = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् । | ||
| verse_lines = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।;अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,765: | Line 1,861: | ||
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| verse_line1 = सञ्जय उवाच— | | verse_line1 = सञ्जय उवाच— | ||
| verse_lines = सञ्जय उवाच—;अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन ।;न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन । | | verse_line2 = अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,783: | Line 1,880: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = युधिष्ठिर उवाच— | | verse_line1 = युधिष्ठिर उवाच— | ||
| verse_lines = युधिष्ठिर उवाच—;नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः ।;अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी ।;कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शनः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः । | | verse_line2 = नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 1,801: | Line 1,899: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् । | | verse_line1 = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् । | ||
| verse_lines = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।;सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | ||
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| Line 1,819: | Line 1,918: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया । | | verse_line1 = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया । | ||
| verse_lines = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।;दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | ||
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| Line 1,837: | Line 1,937: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि । | | verse_line1 = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि । | ||
| verse_lines = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।;अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | | verse_line2 = अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | ||
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| Line 1,855: | Line 1,956: | ||
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| verse_line1 = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् । | | verse_line1 = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् । | ||
| verse_lines = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।;ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | ||
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| Line 1,873: | Line 1,975: | ||
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| verse_line1 = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः । | | verse_line1 = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः । | ||
| verse_lines = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।;निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | | verse_line2 = निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | ||
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| verse_line1 = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि । | | verse_line1 = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि । | ||
| verse_lines = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।;कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | ||
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| Line 1,909: | Line 2,013: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन । | | verse_line1 = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन । | ||
| verse_lines = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।;हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | |||
| verse_line2 = हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | | verse_line2 = हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | ||
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| Line 1,931: | Line 2,036: | ||
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| verse_line1 = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः । | | verse_line1 = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः । | ||
| verse_lines = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।;ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | | verse_line2 = ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | ||
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| Line 1,949: | Line 2,055: | ||
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| verse_line1 = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः । | | verse_line1 = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः । | ||
| verse_lines = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।;यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः । | | verse_line1 = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः । | ||
| verse_lines = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।;प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 1,985: | Line 2,093: | ||
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| verse_line1 = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः । | | verse_line1 = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः । | ||
| verse_lines = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।;कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 2,003: | Line 2,112: | ||
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| verse_line1 = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे । | | verse_line1 = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे । | ||
| verse_lines = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।;अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 2,025: | Line 2,135: | ||
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| verse_line1 = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक- | | verse_line1 = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक- | ||
| verse_lines = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-;श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् ।;स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्यो;यैस्तत्स्त्रियो न्यकृत तत् सविमुक्तकेश्यः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् । | | verse_line2 = श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् । | ||
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| Line 2,043: | Line 2,154: | ||
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| verse_line1 = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते | | verse_line1 = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते | ||
| verse_lines = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते;सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति ।;सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं;भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूषे ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति । | | verse_line2 = सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,065: | Line 2,177: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सूत उवाच— | | verse_line1 = सूत उवाच— | ||
| verse_lines = सूत उवाच—;वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा ।;भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा । | | verse_line2 = वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा । | ||
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| Line 2,083: | Line 2,196: | ||
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| verse_line1 = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि । | | verse_line1 = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि । | ||
| verse_lines = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि ।;कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | ||
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| Line 2,101: | Line 2,215: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः । | | verse_line1 = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः । | ||
| verse_lines = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः ।;लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 2,119: | Line 2,234: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः । | | verse_line1 = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः । | ||
| verse_lines = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः ।;तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 2,137: | Line 2,253: | ||
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| verse_line1 = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् । | | verse_line1 = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् । | ||
| verse_lines = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् ।;धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,146: | Line 2,263: | ||
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| verse_line1 = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः । | | verse_line1 = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः । | ||
| verse_lines = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।;सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः । | | verse_line1 = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः । | ||
| verse_lines = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः ।;हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः । | | verse_line1 = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः । | ||
| verse_lines = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।;मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = शौनक उवाच— | | verse_line1 = शौनक उवाच— | ||
| verse_lines = शौनक उवाच—;कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः ।;नृदेवचिह्नधृक् शूद्रः कोऽसौ गां यः पदाऽहनत् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः । | | verse_line2 = कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः । | ||
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| verse_line1 = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् । | | verse_line1 = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् । | ||
| verse_lines = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।;अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः । | | verse_line1 = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः । | ||
| verse_lines = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।;क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः । | | verse_line1 = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः । | ||
| verse_lines = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।;अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य- | | verse_line1 = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य- | ||
| verse_lines = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-;वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः ।;स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतस्य विष्णोः;भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः । | | verse_line2 = वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः । | ||
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| verse_line1 = धरोवाच— | | verse_line1 = धरोवाच— | ||
| verse_lines = धरोवाच—;सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् ।;शमो दमः तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् । | | verse_line2 = सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 2,303: | Line 2,429: | ||
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| verse_line1 = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः । | | verse_line1 = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः । | ||
| verse_lines = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।;स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 2,321: | Line 2,448: | ||
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| verse_line1 = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः । | | verse_line1 = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः । | ||
| verse_lines = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।;गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 2,339: | Line 2,467: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः । | | verse_line1 = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः । | ||
| verse_lines = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।;प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | |||
| verse_line2 = प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | | verse_line2 = प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,361: | Line 2,490: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् । | | verse_line1 = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् । | ||
| verse_lines = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।;वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | ||
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| Line 2,379: | Line 2,509: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् । | | verse_line1 = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् । | ||
| verse_lines = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।;यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,388: | Line 2,519: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा । | | verse_line1 = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा । | ||
| verse_lines = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।;चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 2,406: | Line 2,538: | ||
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| verse_line1 = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । | | verse_line1 = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । | ||
| verse_lines = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।;ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | ||
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| Line 2,424: | Line 2,557: | ||
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| verse_line1 = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति । | | verse_line1 = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति । | ||
| verse_lines = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति ।;कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् । | | verse_line1 = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् । | ||
| verse_lines = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् ।;विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 2,464: | Line 2,599: | ||
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| verse_line1 = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः । | | verse_line1 = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः । | ||
| verse_lines = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः ।;वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | | verse_line1 = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | ||
| verse_lines = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।;भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 2,500: | Line 2,637: | ||
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| verse_line1 = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । | | verse_line1 = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । | ||
| verse_lines = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।;योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । | | verse_line1 = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । | ||
| verse_lines = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् ।;व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,536: | Line 2,675: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । | | verse_line1 = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । | ||
| verse_lines = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।;स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 2,554: | Line 2,694: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । | | verse_line1 = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । | ||
| verse_lines = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः ।;ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 2,572: | Line 2,713: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् । | | verse_line1 = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् ।;कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 2,590: | Line 2,732: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न | | verse_line1 = अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न | ||
| verse_lines = अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न;रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः ।;तदा हि चोरप्रचुरो विनङ्क्ष-;त्यरक्ष्यमाणो विवरूथवत् क्षणात् ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः । | | verse_line2 = रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,608: | Line 2,751: | ||
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| verse_line1 = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं | | verse_line1 = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं | ||
| verse_lines = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं;यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः ।;परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते;पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः । | | verse_line2 = यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः । | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । | | verse_line1 = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । | ||
| verse_lines = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।;न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,648: | Line 2,793: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः | | verse_line1 = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः | ||
| verse_lines = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः;प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः ।;उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते;समुद्रपत्न््नयाः स्वसुते न्यस्तभारः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः । | | verse_line2 = प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,670: | Line 2,816: | ||
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| verse_line1 = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या | | verse_line1 = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या | ||
| verse_lines = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या;स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन ।;प्रत्युत्थिता मुनयश्चाऽसनेभ्यः;तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन । | | verse_line2 = स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,696: | Line 2,843: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच—;वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।;आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप । | | verse_line2 = वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,714: | Line 2,862: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः । | | verse_line1 = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः । | ||
| verse_lines = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।;अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | ||
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| Line 2,732: | Line 2,881: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः । | | verse_line1 = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः । | ||
| verse_lines = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।;दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,741: | Line 2,891: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि । | | verse_line1 = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि । | ||
| verse_lines = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।;तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 2,759: | Line 2,910: | ||
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| verse_line1 = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः । | | verse_line1 = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः । | ||
| verse_lines = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।;नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,777: | Line 2,929: | ||
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| verse_line1 = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | | verse_line1 = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | ||
| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।;अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 2,795: | Line 2,948: | ||
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| verse_line1 = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया । | | verse_line1 = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया । | ||
| verse_lines = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।;गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 2,813: | Line 2,967: | ||
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| verse_line1 = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः । | | verse_line1 = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः । | ||
| verse_lines = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।;मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 2,831: | Line 2,986: | ||
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| verse_line1 = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । | | verse_line1 = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । | ||
| verse_lines = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।;मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् ।;पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् । | | verse_line2 = मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् । | ||
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| Line 2,849: | Line 3,005: | ||
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| verse_line1 = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । | | verse_line1 = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । | ||
| verse_lines = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।;आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | ||
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| verse_line1 = राजोवाच— | | verse_line1 = राजोवाच— | ||
| verse_lines = राजोवाच—;यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।;यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता । | | verse_line2 = यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता । | ||
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| Line 2,885: | Line 3,043: | ||
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| verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच—;जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।;स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः । | | verse_line2 = जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः । | ||
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| Line 2,903: | Line 3,062: | ||
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| verse_line1 = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् । | | verse_line1 = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् । | ||
| verse_lines = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।;यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 2,921: | Line 3,081: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते । | | verse_line1 = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते । | ||
| verse_lines = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।;वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 2,939: | Line 3,100: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । | | verse_line1 = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । | ||
| verse_lines = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।;महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | |||
| verse_line2 = महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | | verse_line2 = महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि । | | verse_line1 = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि । | ||
| verse_lines = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।;हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | |||
| verse_line2 = हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | | verse_line2 = हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | ||
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| Line 2,979: | Line 3,142: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । | | verse_line1 = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । | ||
| verse_lines = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।;परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | |||
| verse_line2 = परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | | verse_line2 = परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | ||
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| Line 2,997: | Line 3,161: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । | | verse_line1 = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । | ||
| verse_lines = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।;सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | |||
| verse_line2 = सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | | verse_line2 = सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,015: | Line 3,180: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः । | | verse_line1 = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः । | ||
| verse_lines = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।;तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,033: | Line 3,199: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः । | | verse_line1 = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः । | ||
| verse_lines = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।;तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,051: | Line 3,218: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । | | verse_line1 = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । | ||
| verse_lines = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।;ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । | | verse_line1 = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । | ||
| verse_lines = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।;तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः | | verse_line1 = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः | ||
| verse_lines = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः;यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् ।;काले च देशे च मनो न सज्जेत्;प्राणान्नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् । | | verse_line2 = यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् । | ||
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| Line 3,105: | Line 3,275: | ||
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| verse_line1 = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य | | verse_line1 = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य | ||
| verse_lines = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य;क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि ।;आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो;लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि । | | verse_line2 = क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि । | ||
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| Line 3,123: | Line 3,294: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः | | verse_line1 = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः | ||
| verse_lines = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः;कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे ।;न यत्र सत्वं न रजस्तमश्च;न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे । | | verse_line2 = कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,141: | Line 3,313: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद् | | verse_line1 = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद् | ||
| verse_lines = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद्;उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः ।;ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी;स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः । | | verse_line2 = उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 3,150: | Line 3,323: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत | | verse_line1 = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत | ||
| verse_lines = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत;निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः ।;स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि-;र्निर्भिद्य मूर्धन्विसृजेत्परं गतः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः । | | verse_line2 = निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,168: | Line 3,342: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् । | | verse_line1 = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् । | ||
| verse_lines = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् ।;अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,177: | Line 3,352: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा । | | verse_line1 = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा । | ||
| verse_lines = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा ।;न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,195: | Line 3,371: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैश्वानरं याति विहायसा गतः | | verse_line1 = वैश्वानरं याति विहायसा गतः | ||
| verse_lines = वैश्वानरं याति विहायसा गतः;सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा ।;विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात्;प्रयाति चक्रं नृप शैंशुमारम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा । | | verse_line2 = सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,213: | Line 3,390: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः । | | verse_line1 = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः । | ||
| verse_lines = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः ।;सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा । | | verse_line1 = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा । | ||
| verse_lines = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा ।;रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,249: | Line 3,428: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् । | | verse_line1 = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् । | ||
| verse_lines = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् ।;नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | | verse_line2 = नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,267: | Line 3,447: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् । | | verse_line1 = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् । | ||
| verse_lines = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् ।;यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,285: | Line 3,466: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय- | | verse_line1 = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय- | ||
| verse_lines = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-;स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् ।;ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले;वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् । | | verse_line2 = स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,303: | Line 3,485: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं | | verse_line1 = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं | ||
| verse_lines = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं;रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव ।;श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणं तत्;प्रायेण नावृत्तिमुपैति योगी ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव । | | verse_line2 = रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,321: | Line 3,504: | ||
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| verse_line1 = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात् | | verse_line1 = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात् | ||
| verse_lines = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात्;सनातनोऽसौ भगवाननादिः ।;मनोमयं देवमयं विकार्यं;संसाद्य मत्या सह तेन याति ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सनातनोऽसौ भगवाननादिः । | | verse_line2 = सनातनोऽसौ भगवाननादिः । | ||
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| Line 3,339: | Line 3,523: | ||
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| verse_line1 = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् । | | verse_line1 = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् । | ||
| verse_lines = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् ।;आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग । | | verse_line1 = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग । | ||
| verse_lines = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ।;एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च ।;ये द्वे पुरा ब्रह्मण आह पृष्टः आराधितो भगवान् वासुदेवः ॥३५॥ | |||
| verse_line2 = एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च । | | verse_line2 = एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च । | ||
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| verse_line1 = न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्थाः विश्रुतः संसृताविह । | | verse_line1 = न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्थाः विश्रुतः संसृताविह । | ||
| verse_lines = न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्थाः विश्रुतः संसृताविह ।;वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 3,384: | Line 3,571: | ||
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| verse_line1 = भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया । | | verse_line1 = भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया । | ||
| verse_lines = भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया ।;तद्धि ह्यपश्यत्कूटस्थे रतिरात्मन् यतो भवेत् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्धि ह्यपश्यत्कूटस्थे रतिरात्मन् यतो भवेत् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = तद्धि ह्यपश्यत्कूटस्थे रतिरात्मन् यतो भवेत् ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 3,402: | Line 3,590: | ||
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| verse_line1 = भगवान्सर्वभूतेषु लक्षितश्चात्मना हरिः । | | verse_line1 = भगवान्सर्वभूतेषु लक्षितश्चात्मना हरिः । | ||
| verse_lines = भगवान्सर्वभूतेषु लक्षितश्चात्मना हरिः ।;दृश्यैर्बुध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = दृश्यैर्बुध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = दृश्यैर्बुध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 3,420: | Line 3,609: | ||
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| verse_line1 = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा । | | verse_line1 = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा । | ||
| verse_lines = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा ।;श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 3,442: | Line 3,632: | ||
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| verse_line1 = अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः । | | verse_line1 = अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः । | ||
| verse_lines = अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।;तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,460: | Line 3,651: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ । | | verse_line1 = आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ । | ||
| verse_lines = आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।;तस्यर्ते यः क्षणो नीतः उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्यर्ते यः क्षणो नीतः उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = तस्यर्ते यः क्षणो नीतः उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 3,482: | Line 3,674: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । | | verse_line1 = आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । | ||
| verse_lines = आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।;राज्ये चाविकले नित्यनिरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = राज्ये चाविकले नित्यनिरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥ | | verse_line2 = राज्ये चाविकले नित्यनिरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥ | ||
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| Line 3,500: | Line 3,693: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् । | | verse_line1 = संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् । | ||
| verse_lines = संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् ।;वासुदेवे भगवति स्वात्मभावं दृढं गतः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवे भगवति स्वात्मभावं दृढं गतः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवे भगवति स्वात्मभावं दृढं गतः ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 3,518: | Line 3,712: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे;सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया ।;गृहीतशक्तित्रितयाय देहिनाम्;अन्तर्ध्रुवायाऽनुपलभ्यवर्त्मने ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे | | verse_line2 = नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे | ||
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| Line 3,536: | Line 3,731: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां | | verse_line1 = भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां | ||
| verse_lines = भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां;असम्भवायाऽखिलसत्वमूर्तये ।;पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमे;व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = असम्भवायाऽखिलसत्वमूर्तये । | | verse_line2 = असम्भवायाऽखिलसत्वमूर्तये । | ||
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| Line 3,554: | Line 3,750: | ||
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| verse_line1 = स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर- | | verse_line1 = स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर- | ||
| verse_lines = स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर-;स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः ।;गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि-;र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान्प्रसीदताम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः । | | verse_line2 = स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः । | ||
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| Line 3,576: | Line 3,773: | ||
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| verse_line1 = नारद उवाच— | | verse_line1 = नारद उवाच— | ||
| verse_lines = नारद उवाच—;देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज ।;तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्वनिदर्शनम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज । | | verse_line2 = देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज । | ||
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| Line 3,594: | Line 3,792: | ||
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| verse_line1 = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो । | | verse_line1 = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो । | ||
| verse_lines = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो ।;यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | ||
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| Line 3,612: | Line 3,811: | ||
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| verse_line1 = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः । | | verse_line1 = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः । | ||
| verse_lines = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।;एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 3,630: | Line 3,830: | ||
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| verse_line1 = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो । | | verse_line1 = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो । | ||
| verse_lines = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो ।;नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 3,648: | Line 3,849: | ||
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| verse_line1 = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः । | | verse_line1 = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः । | ||
| verse_lines = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।;अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | | verse_line2 = अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | ||
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| Line 3,666: | Line 3,868: | ||
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| verse_line1 = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि । | | verse_line1 = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि । | ||
| verse_lines = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि ।;यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया । | | verse_line1 = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया । | ||
| verse_lines = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।;विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । | | verse_line1 = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । | ||
| verse_lines = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।;वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 3,711: | Line 3,916: | ||
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| verse_line1 = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः । | | verse_line1 = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः । | ||
| verse_lines = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।;नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 3,729: | Line 3,935: | ||
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| verse_line1 = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः । | | verse_line1 = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः । | ||
| verse_lines = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।;स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः । | | verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः । | ||
| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।;बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 3,765: | Line 3,973: | ||
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| verse_line1 = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः । | | verse_line1 = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः । | ||
| verse_lines = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः ।;स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | ||
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| Line 3,783: | Line 3,992: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया । | | verse_line1 = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया । | ||
| verse_lines = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया ।;आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 3,801: | Line 4,011: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः । | | verse_line1 = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः । | ||
| verse_lines = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः ।;कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,819: | Line 4,030: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् । | | verse_line1 = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् । | ||
| verse_lines = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् ।;तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 3,837: | Line 4,049: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा । | | verse_line1 = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा । | ||
| verse_lines = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा ।;वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा ।;द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभोः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा । | | verse_line2 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 3,855: | Line 4,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः । | | verse_line1 = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः । | ||
| verse_lines = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।;तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 3,873: | Line 4,087: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः । | | verse_line1 = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः । | ||
| verse_lines = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः ।;परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 3,891: | Line 4,106: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश । | | verse_line1 = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश । | ||
| verse_lines = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।;दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 3,909: | Line 4,125: | ||
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| verse_line1 = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः । | | verse_line1 = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः । | ||
| verse_lines = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।;सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 3,927: | Line 4,144: | ||
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| verse_line1 = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् । | | verse_line1 = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् । | ||
| verse_lines = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।;कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 3,945: | Line 4,163: | ||
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| verse_line1 = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः । | | verse_line1 = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः । | ||
| verse_lines = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।;सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥ | ||
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| Line 3,963: | Line 4,182: | ||
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| verse_line1 = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः । | | verse_line1 = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः । | ||
| verse_lines = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।;ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 3,981: | Line 4,201: | ||
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| verse_line1 = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः । | | verse_line1 = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः । | ||
| verse_lines = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।;ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 4,003: | Line 4,224: | ||
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| verse_line1 = रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी । | | verse_line1 = रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी । | ||
| verse_lines = रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी ।;कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 4,021: | Line 4,243: | ||
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| verse_line1 = रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः । | | verse_line1 = रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः । | ||
| verse_lines = रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः ।;केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 4,039: | Line 4,262: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् । | | verse_line1 = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् । | ||
| verse_lines = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।;विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च;सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च | | verse_line2 = विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च | ||
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| Line 4,057: | Line 4,281: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च । | | verse_line1 = धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च । | ||
| verse_lines = धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च ।;विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 4,075: | Line 4,300: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् । | | verse_line1 = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् । | ||
| verse_lines = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।;तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 4,093: | Line 4,319: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ । | | verse_line1 = स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ । | ||
| verse_lines = स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ ।;एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 4,111: | Line 4,338: | ||
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| verse_line1 = सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् । | | verse_line1 = सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् । | ||
| verse_lines = सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् ।;महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 4,129: | Line 4,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः । | | verse_line1 = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः । | ||
| verse_lines = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।;अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 4,147: | Line 4,376: | ||
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| verse_line1 = पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः । | | verse_line1 = पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः । | ||
| verse_lines = पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः ।;अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे । | | verse_line1 = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे । | ||
| verse_lines = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।;यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः । | | verse_line1 = तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः । | ||
| verse_lines = तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः ।;तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,192: | Line 4,424: | ||
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| verse_line1 = यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः । | | verse_line1 = यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः । | ||
| verse_lines = यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः ।;नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च । | | verse_line1 = नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च । | ||
| verse_lines = नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च ।;देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् । | | verse_line1 = नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् । | ||
| verse_lines = नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् ।;गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि । | | verse_line1 = इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि । | ||
| verse_lines = इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि ।;नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 4,264: | Line 4,500: | ||
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| verse_line1 = नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां | | verse_line1 = नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां | ||
| verse_lines = नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां;भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् ।;यः स्वात्ममायाविभवं स्वयं गतो;नाहं नभस्वांस्तमथापरे कुतः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् । | | verse_line2 = भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,282: | Line 4,519: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः । | | verse_line1 = स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः । | ||
| verse_lines = स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः ।;आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् । | | verse_line1 = विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् । | ||
| verse_lines = विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् ।;सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,309: | Line 4,548: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः । | | verse_line1 = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः । | ||
| verse_lines = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।;यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 4,327: | Line 4,567: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य | | verse_line1 = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य | ||
| verse_lines = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य;कालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।;द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि;विराड् स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । | | verse_line2 = कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,336: | Line 4,577: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः | | verse_line1 = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः | ||
| verse_lines = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः;दक्षादयो ये भवदादयश्च ।;स्वर्लोकपालाः खगलोकपालाः;नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = दक्षादयो ये भवदादयश्च । | | verse_line2 = दक्षादयो ये भवदादयश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,345: | Line 4,587: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः | | verse_line1 = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः | ||
| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः;ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः ।;ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां;दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः । | | verse_line2 = ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,354: | Line 4,597: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः । | | verse_line1 = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः । | ||
| verse_lines = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः ।;यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् ।;ह्रीश्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्तत्परं रूपवदस्वरूपम् ॥४४॥ | |||
| verse_line2 = यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् । | | verse_line2 = यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,363: | Line 4,607: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति | | verse_line1 = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति | ||
| verse_lines = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति;लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः ।;आपीयतां कर्मकषायशोषान-;नुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशलान् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः । | | verse_line2 = लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः | | verse_line1 = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः | ||
| verse_lines = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः;आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।;लोकत्रयस्य महतीमहरद्य आर्तिं;स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्तः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् । | | verse_line2 = आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,403: | Line 4,649: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो | | verse_line1 = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो | ||
| verse_lines = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो;दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः ।;यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा;योगर्धिमापुरमयीं यदुहैहयाद्याः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः । | | verse_line2 = दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,421: | Line 4,668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे | | verse_line1 = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे | ||
| verse_lines = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे;आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् ।;प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्वं;सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् । | | verse_line2 = आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,439: | Line 4,687: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या | | verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या | ||
| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या;नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः ।;दृष्टात्मनो भगवतो नियमावलोपं;देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । | | verse_line2 = नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,457: | Line 4,706: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो | | verse_line1 = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो | ||
| verse_lines = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो;बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय ।;तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो;दिव्याः स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय । | | verse_line2 = बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,475: | Line 4,725: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र- | | verse_line1 = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र- | ||
| verse_lines = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-;निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।;ज्ञात्वार्थितो जगति पुत्रपदञ्च लेभे;दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् । | | verse_line2 = निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,493: | Line 4,744: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः | | verse_line1 = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः | ||
| verse_lines = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः;यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् ।;यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति;स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् । | | verse_line2 = यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् । | ||
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| Line 4,511: | Line 4,763: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः | | verse_line1 = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः | ||
| verse_lines = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः;साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः ।;छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा;वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः । | | verse_line2 = साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,529: | Line 4,782: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः | | verse_line1 = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः | ||
| verse_lines = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः;क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।;विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे;आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः । | | verse_line2 = क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,547: | Line 4,801: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः | | verse_line1 = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः | ||
| verse_lines = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः;चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।;चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मात्;हस्ते प्रगृह्य भगवान्कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः । | | verse_line2 = चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,565: | Line 4,820: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम् | | verse_line1 = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम् | ||
| verse_lines = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्;अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।;यो वै प्रतिश्रुतमृतेऽपि च शीर्षमाणं;आत्मन्यमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् । | | verse_line2 = अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 4,583: | Line 4,839: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि- | | verse_line1 = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि- | ||
| verse_lines = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-;वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।;ज्ञानञ्च भागवतमात्मसुतत्वदीपं;यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् । | | verse_line2 = वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् । | ||
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| Line 4,601: | Line 4,858: | ||
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| verse_line1 = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो | | verse_line1 = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो | ||
| verse_lines = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो;मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।;दुष्टेषु राजसु दमं विदधत्स्वकीर्तिं;सत्ये निविष्ट उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति । | | verse_line2 = मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति । | ||
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| Line 4,619: | Line 4,877: | ||
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| verse_line1 = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः | | verse_line1 = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः | ||
| verse_lines = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः;इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।;तिष्ठन्वनं सदयितानुज आविवेश;यस्मिन्विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे । | | verse_line2 = इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,628: | Line 4,887: | ||
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| verse_line1 = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो | | verse_line1 = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो | ||
| verse_lines = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो;मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः ।;दूरेसुहृन्मथितरोषसुशोषदृष्ट्या;तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः । | | verse_line2 = मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः । | ||
}} | }} | ||
| Line 4,637: | Line 4,897: | ||
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| verse_line1 = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह- | | verse_line1 = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह- | ||
| verse_lines = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-;दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः ।;सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः;विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरितैः ससैन्यः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः । | | verse_line2 = दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः । | ||
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| verse_line1 = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः | | verse_line1 = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः | ||
| verse_lines = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः;क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।;जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः;कर्माणि चात्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः । | | verse_line2 = क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः । | ||
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| verse_line1 = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः | | verse_line1 = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः | ||
| verse_lines = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः;त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।;यद्रिङ्गताऽन्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा;उन्मूलनन्त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः । | | verse_line2 = त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः । | ||
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| verse_line1 = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं | | verse_line1 = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं | ||
| verse_lines = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं;दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने ।;उन्नेष्यति व्रजमितोऽवसितान्तकालं;नेत्रे पिधाय्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने । | | verse_line2 = दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने । | ||
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| verse_line1 = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात् | | verse_line1 = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात् | ||
| verse_lines = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्;गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।;जल्प्यावृतं निशि शयानमतिश्रमेण;लोके विकुण्ठ उपधास्यति गोकुलं सः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च । | | verse_line2 = गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च । | ||
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| verse_line1 = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां | | verse_line1 = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां | ||
| verse_lines = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां;रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।;उद्दीपितस्मररुजां व्रजसद्वधूनां;हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन । | | verse_line2 = रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन । | ||
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| verse_line1 = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट- | | verse_line1 = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट- | ||
| verse_lines = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-;मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः ।;अन्येऽपि शाल्वकपिबल्वलदन्तवक्र-;सप्तोक्षशंबरविडूरथरुग्मिमुख्याः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः । | | verse_line2 = मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः । | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः | | verse_line1 = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः | ||
| verse_lines = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः;काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः ।;यास्यन्त्यदर्शनमिता बलपार्थभीम-;व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः । | | verse_line2 = काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः । | ||
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| verse_line1 = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां | | verse_line1 = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां | ||
| verse_lines = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां;स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।;आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां;वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः । | | verse_line2 = स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः । | ||
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| verse_line1 = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः | | verse_line1 = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः | ||
| verse_lines = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः;स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।;अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्याः;मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः । | | verse_line2 = स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः । | ||
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| verse_line1 = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः | | verse_line1 = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः | ||
| verse_lines = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः;मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये ।;गायन् गुणान्दशशतानन आदिदेवः;शेषोऽधुनाऽपि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये । | | verse_line2 = मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये । | ||
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| verse_line1 = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः | | verse_line1 = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः | ||
| verse_lines = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः;सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।;ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां;नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । | | verse_line2 = सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । | ||
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| verse_line1 = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां | | verse_line1 = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां | ||
| verse_lines = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां;स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।;यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षाः;तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः । | | verse_line2 = स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः । | ||
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| verse_line1 = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं | | verse_line1 = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं | ||
| verse_lines = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं;शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् ।;शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो;माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् । | | verse_line2 = शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् । | ||
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| verse_line1 = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य | | verse_line1 = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य | ||
| verse_lines = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य;भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः ।;देहे स्वधातुविगमे तु विशीर्यमाणे;व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः । | | verse_line2 = भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः । | ||
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| verse_line1 = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः । | | verse_line1 = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः । | ||
| verse_lines = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।;समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | ||
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| verse_line1 = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे । | | verse_line1 = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे । | ||
| verse_lines = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।;कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | | verse_line2 = कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | ||
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| verse_line1 = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः । | | verse_line1 = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः । | ||
| verse_lines = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।;सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | ||
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| verse_line1 = पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः । | | verse_line1 = पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः । | ||
| verse_lines = पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः ।;लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुमः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुमः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुमः ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = यस्मिन्कर्मसमावापो यथा येनोपगृह्यते । | | verse_line1 = यस्मिन्कर्मसमावापो यथा येनोपगृह्यते । | ||
| verse_lines = यस्मिन्कर्मसमावापो यथा येनोपगृह्यते ।;गुणानां गुणिनां चैव परिमाणं सुविस्तरम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणानां गुणिनां चैव परिमाणं सुविस्तरम् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = गुणानां गुणिनां चैव परिमाणं सुविस्तरम् ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः । | | verse_line1 = नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः । | ||
| verse_lines = नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः ।;श्रेणीनां राजर्षीणाञ्च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रेणीनां राजर्षीणाञ्च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = श्रेणीनां राजर्षीणाञ्च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तत्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् । | | verse_line1 = तत्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् । | ||
| verse_lines = तत्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् ।;पुरुषाराधनविधिः योगस्याऽध्यात्मिकस्य च ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = योगेश्वरैश्वर्यगतिं लिङ्गभङ्गं च योगिनाम् । | | verse_line1 = योगेश्वरैश्वर्यगतिं लिङ्गभङ्गं च योगिनाम् । | ||
| verse_lines = योगेश्वरैश्वर्यगतिं लिङ्गभङ्गं च योगिनाम् ।;वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया । | | verse_line1 = यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया । | ||
| verse_lines = यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।;विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः । | | verse_line1 = अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः । | ||
| verse_lines = अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।;अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = सूत उवाच— | | verse_line1 = सूत उवाच— | ||
| verse_lines = सूत उवाच—;स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः ।;ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः । | | verse_line2 = स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः । | ||
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| verse_line1 = आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | | verse_line1 = आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | ||
| verse_lines = आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।;ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच—;आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः ।;न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्ने द्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । | | verse_line2 = आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 5,122: | Line 5,410: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया । | | verse_line1 = बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया । | ||
| verse_lines = बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया ।;रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | | verse_line2 = रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,131: | Line 5,420: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः । | | verse_line1 = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः । | ||
| verse_lines = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः ।;रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,149: | Line 5,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् । | | verse_line1 = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् । | ||
| verse_lines = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।;ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,167: | Line 5,458: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो | | verse_line1 = दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो | ||
| verse_lines = दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो;जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः ।;अतप्यत स्माखिललोकतापनं;तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । | | verse_line2 = जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,185: | Line 5,477: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः | | verse_line1 = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः | ||
| verse_lines = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः;सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् ।;व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं;सन्दृष्टवद्भिर्विबुधैरभिष्टुतम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् । | | verse_line2 = सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,203: | Line 5,496: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः | | verse_line1 = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः | ||
| verse_lines = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः;सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।;न यत्र माया किमुतापरे हरे-;रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । | | verse_line2 = सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,221: | Line 5,515: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः | | verse_line1 = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः | ||
| verse_lines = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः;करोति मानं बहुधा विभूतिभिः ।;प््रोङ्खश्रिता याः कुसुमाकरानुगै-;र्विगीयमाना प््रिायकर्म गायती ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = करोति मानं बहुधा विभूतिभिः । | | verse_line2 = करोति मानं बहुधा विभूतिभिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,239: | Line 5,534: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं | | verse_line1 = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं | ||
| verse_lines = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं;श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ।;सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः;स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । | | verse_line2 = श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,257: | Line 5,553: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं | | verse_line1 = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं | ||
| verse_lines = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं;वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः ।;युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः;स्व एव धामन्रममाणमीश्वरम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः । | | verse_line2 = वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,275: | Line 5,572: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् । | | verse_line1 = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् । | ||
| verse_lines = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।;यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 5,293: | Line 5,591: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते । | | verse_line1 = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते । | ||
| verse_lines = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।;तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,302: | Line 5,601: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । | | verse_line1 = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । | ||
| verse_lines = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।;बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।;सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । | | verse_line2 = ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,338: | Line 5,639: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् । | | verse_line1 = अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् । | ||
| verse_lines = अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् ।;पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,356: | Line 5,658: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । | | verse_line1 = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । | ||
| verse_lines = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।;तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,365: | Line 5,668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च । | | verse_line1 = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च । | ||
| verse_lines = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च ।;प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,383: | Line 5,687: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । | | verse_line1 = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । | ||
| verse_lines = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।;अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,401: | Line 5,706: | ||
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| verse_line1 = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः । | | verse_line1 = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः । | ||
| verse_lines = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः ।;सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,419: | Line 5,725: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः । | | verse_line1 = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः । | ||
| verse_lines = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः ।;महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,437: | Line 5,744: | ||
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| verse_line1 = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप । | | verse_line1 = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप । | ||
| verse_lines = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।;ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,455: | Line 5,763: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् । | | verse_line1 = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् । | ||
| verse_lines = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् ।;यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,477: | Line 5,786: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः । | | verse_line1 = भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः । | ||
| verse_lines = भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।;ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 5,495: | Line 5,805: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः । | | verse_line1 = निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः । | ||
| verse_lines = निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।;मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते । | | verse_line1 = आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते । | ||
| verse_lines = आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते ।;स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 5,531: | Line 5,843: | ||
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| verse_line1 = आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । | | verse_line1 = आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । | ||
| verse_lines = आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।;यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे । | | verse_line1 = एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे । | ||
| verse_lines = एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे ।;त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः । | | verse_line1 = पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः । | ||
| verse_lines = पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः ।;आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,576: | Line 5,891: | ||
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| verse_line1 = तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् । | | verse_line1 = तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् । | ||
| verse_lines = तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।;तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः । | | verse_line1 = एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः । | ||
| verse_lines = एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः ।;वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 5,612: | Line 5,929: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । | | verse_line1 = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । | ||
| verse_lines = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।;ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 5,630: | Line 5,948: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया । | | verse_line1 = एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया । | ||
| verse_lines = एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।;मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् । | | verse_line1 = अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् । | ||
| verse_lines = अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।;अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते । | | verse_line1 = अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते । | ||
| verse_lines = अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।;उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,684: | Line 6,005: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् । | | verse_line1 = स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् । | ||
| verse_lines = स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् ।;नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माऽकर्मकः परः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माऽकर्मकः परः ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माऽकर्मकः परः ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,702: | Line 6,024: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रजापतीन् मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् । | | verse_line1 = प्रजापतीन् मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् । | ||
| verse_lines = प्रजापतीन् मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् ।;सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,720: | Line 6,043: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः । | | verse_line1 = सत्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः । | ||
| verse_lines = सत्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः ।;तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,738: | Line 6,062: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते । | | verse_line1 = यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते । | ||
| verse_lines = यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ।;तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।;पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् । | | verse_line2 = तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,756: | Line 6,081: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः । | | verse_line1 = ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः । | ||
| verse_lines = ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः ।;सन्नियच्छति तत्काले घनानीकमिवानिलः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = सन्नियच्छति तत्काले घनानीकमिवानिलः ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = सन्नियच्छति तत्काले घनानीकमिवानिलः ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,774: | Line 6,100: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः । | | verse_line1 = इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः । | ||
| verse_lines = इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः ।;नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,792: | Line 6,119: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न चास्य जन्मकर्माणि परस्य न विधीयते । | | verse_line1 = न चास्य जन्मकर्माणि परस्य न विधीयते । | ||
| verse_lines = न चास्य जन्मकर्माणि परस्य न विधीयते ।;कर्तृत्वं प्रतिषेधार्थं माययाऽऽरोपितं हि तत् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तृत्वं प्रतिषेधार्थं माययाऽऽरोपितं हि तत् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = कर्तृत्वं प्रतिषेधार्थं माययाऽऽरोपितं हि तत् ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,810: | Line 6,138: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः । | | verse_line1 = अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः । | ||
| verse_lines = अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः ।;विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥ | ||
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| Line 5,836: | Line 6,165: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;एवमेतत् पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल ।;क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन त्यक्त्वा स्वगृहमृद्धिमत् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = एवमेतत् पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल । | | verse_line2 = एवमेतत् पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल । | ||
}} | }} | ||
| Line 5,845: | Line 6,175: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 5,862: | Line 6,193: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;यदा तु राजा स्वसुतानसाधून्;पुष्णन्नधर्मेण विनष्टदृष्टिः ।;भ्रातुर्यविष्ठस्य सुतान् विबन्धून्;प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यदा तु राजा स्वसुतानसाधून् | | verse_line2 = यदा तु राजा स्वसुतानसाधून् | ||
}} | }} | ||
| Line 5,871: | Line 6,203: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः | | verse_line1 = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः | ||
| verse_lines = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः;केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् ।;न वारयामास नृपः स्नुषाया;और्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् । | | verse_line2 = केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,889: | Line 6,222: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं | | verse_line1 = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं | ||
| verse_lines = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं;कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् ।;तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा-;मेकातपत्रामजितेन पार्थः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् । | | verse_line2 = कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 5,898: | Line 6,232: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं | | verse_line1 = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं | ||
| verse_lines = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं;वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् ।;संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्;सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् । | | verse_line2 = वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,916: | Line 6,251: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः | | verse_line1 = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः | ||
| verse_lines = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः;कृतानि नानायतनानि विष्णोः ।;प्रत्यङ्कमुख्याङ्कितमन्दिराणि;यद्दर्शनात् कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = कृतानि नानायतनानि विष्णोः । | | verse_line2 = कृतानि नानायतनानि विष्णोः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,934: | Line 6,270: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य- | | verse_line1 = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य- | ||
| verse_lines = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-;पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ ।;आसात उर्व्याः कुशलं विधाय;कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ । | | verse_line2 = पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,952: | Line 6,289: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो | | verse_line1 = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो | ||
| verse_lines = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो;भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः ।;यो वै स्वसॄणां पितृवद् ददाति;वरान् वदान्यो वरतर्पणेन ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः । | | verse_line2 = भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,970: | Line 6,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज- | | verse_line1 = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज- | ||
| verse_lines = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-;दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते ।;यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो;नृपासनाधिं परिहृत्य दूरात् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते । | | verse_line2 = दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 5,988: | Line 6,327: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी | | verse_line1 = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी | ||
| verse_lines = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी;भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।;यस्याङ्घ्रिपातं रणभूर्न सेहे;मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् । | | verse_line2 = भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,006: | Line 6,346: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय | | verse_line1 = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय | ||
| verse_lines = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय;कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।;न त्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं;परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् । | | verse_line2 = कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,028: | Line 6,369: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये | | verse_line1 = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये | ||
| verse_lines = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये;निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।;कार्त्स्न्येन चात्रोपगतं विधातु-;रर्वाक् सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः । | | verse_line2 = निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,046: | Line 6,388: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे | | verse_line1 = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे | ||
| verse_lines = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे;संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।;ये संयुगेऽचक्षत तार्क्षपुत्र-;स्यांसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् । | | verse_line2 = संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,068: | Line 6,411: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समाहुता भीष्मककन्यया ये | | verse_line1 = समाहुता भीष्मककन्यया ये | ||
| verse_lines = समाहुता भीष्मककन्यया ये;श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् ।;गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं;जह्रे पदं मूधर्ि्न दधत् सुपर्णः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् । | | verse_line2 = श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,086: | Line 6,430: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः । | | verse_line1 = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः । | ||
| verse_lines = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।;एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,104: | Line 6,449: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः । | | verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः । | ||
| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।;कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,122: | Line 6,468: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । | | verse_line1 = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । | ||
| verse_lines = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।;गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 6,140: | Line 6,487: | ||
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| verse_line1 = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् । | | verse_line1 = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् । | ||
| verse_lines = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।;को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः । | | verse_line1 = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः । | ||
| verse_lines = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।;ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा । | | verse_line1 = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा । | ||
| verse_lines = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा ।;तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_lines = हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् ।;हयान् रथानिभान् कन्यां धरां वृत्तिकरीमपि ॥ २७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् । | | verse_line1 = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् । | ||
| verse_lines = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् ।;गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_line1 = उद्धव उवाच– | | verse_line1 = उद्धव उवाच– | ||
| verse_lines = उद्धव उवाच–;भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।;सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः । | | verse_line2 = भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः । | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह । | | verse_line1 = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह । | ||
| verse_lines = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।;बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,225: | Line 6,579: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम । | | verse_line1 = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम । | ||
| verse_lines = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।;पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,243: | Line 6,598: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = राजोवाच– | | verse_line1 = राजोवाच– | ||
| verse_lines = राजोवाच–;निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-;ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्यः ।;स तु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्;हरिरपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीशः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे- | | verse_line2 = निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे- | ||
}} | }} | ||
| Line 6,252: | Line 6,608: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुक उवाच– | | verse_line1 = शुक उवाच– | ||
| verse_lines = शुक उवाच–;ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः ।;संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः । | | verse_line2 = ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,270: | Line 6,627: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः । | | verse_line1 = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः । | ||
| verse_lines = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।;अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,292: | Line 6,650: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परावरेषां भगवन् कृतानि | | verse_line1 = परावरेषां भगवन् कृतानि | ||
| verse_lines = परावरेषां भगवन् कृतानि;श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।;न तृप्नुमः कर्णसुखावहानां;तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् । | | verse_line2 = श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,310: | Line 6,669: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां | | verse_line1 = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां | ||
| verse_lines = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां;सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः ।;यस्मिन् नृणां ग्राम्यसुखानुवादै;र्मतिर्गृहीता न हरेः कथायाम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः । | | verse_line2 = सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,328: | Line 6,688: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना | | verse_line1 = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना | ||
| verse_lines = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना;विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः ।;हरेः सदाऽनुस्मृतिनिर्वृतस्य;समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः । | | verse_line2 = विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,350: | Line 6,711: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।;आत्मेच्छानुगतो ह्यात्मा नानाशक्त्युपलक्षितः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः । | | verse_line2 = भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,368: | Line 6,730: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् । | | verse_line1 = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् । | ||
| verse_lines = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।;मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,386: | Line 6,749: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः । | | verse_line1 = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः । | ||
| verse_lines = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।;आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,404: | Line 6,768: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः । | | verse_line1 = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः । | ||
| verse_lines = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।;तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,413: | Line 6,778: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः । | | verse_line1 = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः । | ||
| verse_lines = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।;ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,422: | Line 6,788: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् । | | verse_line1 = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् । | ||
| verse_lines = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।;आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,431: | Line 6,798: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् । | | verse_line1 = ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् । | ||
| verse_lines = ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् ।;महीं गन्धगुणामाधात् कालमायांशयोगतः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = महीं गन्धगुणामाधात् कालमायांशयोगतः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = महीं गन्धगुणामाधात् कालमायांशयोगतः ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,449: | Line 6,817: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः । | | verse_line1 = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः । | ||
| verse_lines = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।;नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,467: | Line 6,836: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा- | | verse_line1 = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा- | ||
| verse_lines = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-;स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।;आत्मल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-;च्छायांशविद्यामत आश्रयेम ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म । | | verse_line2 = स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,485: | Line 6,855: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै- | | verse_line1 = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै- | ||
| verse_lines = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-;श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते ।;यच्चाघमर्षो द्युसरिद्धरायाः;परं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते । | | verse_line2 = श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,503: | Line 6,874: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तथापरे त्वात्मसमाधियोग- | | verse_line1 = तथापरे त्वात्मसमाधियोग- | ||
| verse_lines = तथापरे त्वात्मसमाधियोग-;बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।;त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति;तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । | | verse_line2 = बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,521: | Line 6,893: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य | | verse_line1 = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य | ||
| verse_lines = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य;त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये ।;सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं;न शक्नुमस्तत् प्रतिकर्तवे ते ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये । | | verse_line2 = त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,539: | Line 6,912: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे | | verse_line1 = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे | ||
| verse_lines = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे;बभूविमात्मन् करवाम किं ते ।;त्वं नः स चक्षुः परिदेहि शक्ता;देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = बभूविमात्मन् करवाम किं ते । | | verse_line2 = बभूविमात्मन् करवाम किं ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,561: | Line 6,935: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषिरुवाच– | | verse_line1 = ऋषिरुवाच– | ||
| verse_lines = ऋषिरुवाच–;इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः ।;प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशम्य गिरमीश्वरः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः । | | verse_line2 = इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,579: | Line 6,954: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः । | | verse_line1 = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः । | ||
| verse_lines = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।;त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,597: | Line 6,973: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् । | | verse_line1 = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् । | ||
| verse_lines = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् ।;भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,615: | Line 6,992: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः । | | verse_line1 = प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः । | ||
| verse_lines = प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः ।;प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,633: | Line 7,011: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् । | | verse_line1 = स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् । | ||
| verse_lines = स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् ।;विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,651: | Line 7,030: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः । | | verse_line1 = एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः । | ||
| verse_lines = एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः ।;आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,669: | Line 7,049: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा । | | verse_line1 = साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा । | ||
| verse_lines = साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा ।;विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् । | | verse_line1 = निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् । | ||
| verse_lines = निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।;प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् । | | verse_line1 = आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् । | ||
| verse_lines = आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् ।;बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् । | | verse_line1 = अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् । | ||
| verse_lines = अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् ।;कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् । | | verse_line1 = सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् । | ||
| verse_lines = सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् ।;चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह । | | verse_line1 = मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह । | ||
| verse_lines = मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।;यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः । | | verse_line1 = बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः । | ||
| verse_lines = बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः ।;यो जातस्त्रायते वर्णान् पुरुषान् कण्टकक्षतात् ॥ ३१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 6,759: | Line 7,146: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः । | | verse_line1 = विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः । | ||
| verse_lines = विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः ।;वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,768: | Line 7,156: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये । | | verse_line1 = पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये । | ||
| verse_lines = पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये ।;तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,786: | Line 7,175: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः । | | verse_line1 = एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः । | ||
| verse_lines = एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः ।;कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,804: | Line 7,194: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् । | | verse_line1 = अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् । | ||
| verse_lines = अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् ।;यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,813: | Line 7,204: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह । | | verse_line1 = यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह । | ||
| verse_lines = यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह ।;अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,835: | Line 7,227: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्रीडाया मुद् यतोऽर्हस्य कामं चिक्रीडिषाऽन्यतः । | | verse_line1 = क्रीडाया मुद् यतोऽर्हस्य कामं चिक्रीडिषाऽन्यतः । | ||
| verse_lines = क्रीडाया मुद् यतोऽर्हस्य कामं चिक्रीडिषाऽन्यतः ।;स्वतस्तृप्तस्य तु कथं निर्वृतस्य सदात्मनः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वतस्तृप्तस्य तु कथं निर्वृतस्य सदात्मनः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = स्वतस्तृप्तस्य तु कथं निर्वृतस्य सदात्मनः ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,853: | Line 7,246: | ||
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| verse_line1 = देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । | | verse_line1 = देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । | ||
| verse_lines = देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।;अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,862: | Line 7,256: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानेष एवैकः सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः । | | verse_line1 = भगवानेष एवैकः सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः । | ||
| verse_lines = भगवानेष एवैकः सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः ।;अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,880: | Line 7,275: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;सेयं भगवतो माया न्याय्यं येन विरुध्यते ।;ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = सेयं भगवतो माया न्याय्यं येन विरुध्यते । | | verse_line2 = सेयं भगवतो माया न्याय्यं येन विरुध्यते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,898: | Line 7,294: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथाऽर्थेन विनाऽमुष्य पुंस आत्मविपर्ययः । | | verse_line1 = यथाऽर्थेन विनाऽमुष्य पुंस आत्मविपर्ययः । | ||
| verse_lines = यथाऽर्थेन विनाऽमुष्य पुंस आत्मविपर्ययः ।;प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,907: | Line 7,304: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः । | | verse_line1 = यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः । | ||
| verse_lines = यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः ।;दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनोऽनात्मनो गुणः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनोऽनात्मनो गुणः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनोऽनात्मनो गुणः ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,916: | Line 7,314: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया । | | verse_line1 = स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया । | ||
| verse_lines = स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया ।;भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,934: | Line 7,333: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदेन्द्रियोपरामार्थो दृष्टात्मनि परे हरौ । | | verse_line1 = यदेन्द्रियोपरामार्थो दृष्टात्मनि परे हरौ । | ||
| verse_lines = यदेन्द्रियोपरामार्थो दृष्टात्मनि परे हरौ ।;विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,952: | Line 7,352: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विदुर उवाच– | | verse_line1 = विदुर उवाच– | ||
| verse_lines = विदुर उवाच–;सञ्छिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो ।;उभयत्रापि भगवन् मनो मे सम्प्रधावति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = सञ्छिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो । | | verse_line2 = सञ्छिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो । | ||
}} | }} | ||
| Line 6,961: | Line 7,362: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साधु तद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः । | | verse_line1 = साधु तद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः । | ||
| verse_lines = साधु तद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः ।;आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद् बहिः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद् बहिः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद् बहिः ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,970: | Line 7,372: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः । | | verse_line1 = यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः । | ||
| verse_lines = यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः ।;तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,979: | Line 7,382: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्याप्यनात्मनः । | | verse_line1 = अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्याप्यनात्मनः । | ||
| verse_lines = अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्याप्यनात्मनः ।;तां चापि युष्मच्चरणसेवयाऽहं पराणुदे ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = तां चापि युष्मच्चरणसेवयाऽहं पराणुदे ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = तां चापि युष्मच्चरणसेवयाऽहं पराणुदे ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 6,997: | Line 7,401: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु । | | verse_line1 = दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु । | ||
| verse_lines = दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु ।;यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,015: | Line 7,420: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सृष्ट्वाऽग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् । | | verse_line1 = सृष्ट्वाऽग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् । | ||
| verse_lines = सृष्ट्वाऽग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् ।;तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद् विभुः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद् विभुः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद् विभुः ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 7,024: | Line 7,430: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् । | | verse_line1 = यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् । | ||
| verse_lines = यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् ।;यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाराः समासते ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाराः समासते ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाराः समासते ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,033: | Line 7,440: | ||
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| verse_line1 = यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् । | | verse_line1 = यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् । | ||
| verse_lines = यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् ।;त्वयेरिता यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वयेरिता यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = त्वयेरिता यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,042: | Line 7,450: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः । | | verse_line1 = यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः । | ||
| verse_lines = यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः ।;प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,064: | Line 7,473: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वमेव धिष्ण्यं बहुमानयन्तं | | verse_line1 = स्वमेव धिष्ण्यं बहुमानयन्तं | ||
| verse_lines = स्वमेव धिष्ण्यं बहुमानयन्तं;यं वासुदेवाभिधमामनन्ति ।;प्रत्यक्धृताक्षाम्बुजकोशमीषद्;उन्मीलयन्तं विबुधोदयाय ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = यं वासुदेवाभिधमामनन्ति । | | verse_line2 = यं वासुदेवाभिधमामनन्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,082: | Line 7,492: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत् | | verse_line1 = स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत् | ||
| verse_lines = स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत्;कालेन कर्मप्रतिबोधितेन ।;स्वरोचिषा तत् सलिलं विशालं;विद्योतयन्नर्क इवात्मयोनिः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = कालेन कर्मप्रतिबोधितेन । | | verse_line2 = कालेन कर्मप्रतिबोधितेन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,100: | Line 7,511: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः | | verse_line1 = तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः | ||
| verse_lines = तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः;प्रावीविशत् सर्वगुणावभासम् ।;तस्मिन् स्वयं वेदमयो विधाता;स्वयंभुवं यं स्म वदन्ति सोऽभूत् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रावीविशत् सर्वगुणावभासम् । | | verse_line2 = प्रावीविशत् सर्वगुणावभासम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,118: | Line 7,530: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ | | verse_line1 = क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ | ||
| verse_lines = क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ;एतत् कुतो वाऽब्जमनन्यदप्सु ।;अस्ति ह्यधस्तादिह किञ्चनैतद्;अधिष्ठितं यत्र सताऽनुभाव्यम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = एतत् कुतो वाऽब्जमनन्यदप्सु । | | verse_line2 = एतत् कुतो वाऽब्जमनन्यदप्सु । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,136: | Line 7,549: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै- | | verse_line1 = पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै- | ||
| verse_lines = पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै-;रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् ।;प्रदर्शयन्तं कृपया नखेन्दु-;मयूखभिन्नाङ्गुलिचारुपत्रम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् । | | verse_line2 = रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,154: | Line 7,568: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक- | | verse_line1 = परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक- | ||
| verse_lines = परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक-;पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् ।;अव्यक्तमूलं भुवनाङ्घ्रिपेन्द्रम्;अहीन्द्रभोगैरधिवीतवल्कम् ॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् । | | verse_line2 = पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,172: | Line 7,587: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निवीतमाम्नायमधुव्रताश्रयस्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् । | | verse_line1 = निवीतमाम्नायमधुव्रताश्रयस्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् । | ||
| verse_lines = निवीतमाम्नायमधुव्रताश्रयस्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् ।;सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमत्त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमत्त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमत्त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,194: | Line 7,610: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| verse_lines = ब्रह्मोवाच–;ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां;न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम् ।;नान्यत् त्वदस्ति भगवन्नपि तत्त्वशुद्धं;मायागुणव्यतिकराद् यदुरुर्विभासि ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां | | verse_line2 = ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,212: | Line 7,629: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रूपं यदेतदवबोध रसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = रूपं यदेतदवबोध रसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = रूपं यदेतदवबोध रसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 7,220: | Line 7,638: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नातः परं परम यद् भवतः स्वरूप | | verse_line1 = नातः परं परम यद् भवतः स्वरूप | ||
| verse_lines = नातः परं परम यद् भवतः स्वरूप;मानन्दमात्रमविकारमविद्धवर्चः ।;पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमाद्यं;भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मानन्दमात्रमविकारमविद्धवर्चः । | | verse_line2 = मानन्दमात्रमविकारमविद्धवर्चः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,238: | Line 7,657: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं | | verse_line1 = ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं | ||
| verse_lines = ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं;जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् ।;भक्त्या गृहीतचरणः परया च तेषां;नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात् स्वपुंसाम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् । | | verse_line2 = जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,256: | Line 7,676: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावत् पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थं | | verse_line1 = यावत् पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थं | ||
| verse_lines = यावत् पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थं;मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् ।;तावच्च संसृतिरसौ प्रतिसङ्क्रमेत;व्यर्थापि दुःखनिवहं वहती क्रियार्था ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् । | | verse_line2 = मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,274: | Line 7,695: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अध्याहृतार्थकरणा निशि निःशयाना | | verse_line1 = अध्याहृतार्थकरणा निशि निःशयाना | ||
| verse_lines = अध्याहृतार्थकरणा निशि निःशयाना;नानामनोरथधियः क्षणभङ्गनिद्राः ।;दैवाद्धतार्थरचना ऋषयोऽपि देव;युष्मत्प्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = नानामनोरथधियः क्षणभङ्गनिद्राः । | | verse_line2 = नानामनोरथधियः क्षणभङ्गनिद्राः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,292: | Line 7,714: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वद्भावयोगपरिभावितहृत्सरोजा | | verse_line1 = त्वद्भावयोगपरिभावितहृत्सरोजा | ||
| verse_lines = त्वद्भावयोगपरिभावितहृत्सरोजा;ये सच्छ्रुतेक्षितपथा ननु नाथ पुंसाम् ।;यद् यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति;तत् तद् वपुः प्रणयसे तदनुग्रहाय ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = ये सच्छ्रुतेक्षितपथा ननु नाथ पुंसाम् । | | verse_line2 = ये सच्छ्रुतेक्षितपथा ननु नाथ पुंसाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,310: | Line 7,733: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नातिप्रसीदसि तथोपचितोपचारै | | verse_line1 = नातिप्रसीदसि तथोपचितोपचारै | ||
| verse_lines = नातिप्रसीदसि तथोपचितोपचारै;राराधितः सुरगणैर्हृदि बद्धकामैः ।;यः सर्वभूतदययाऽसदलभ्ययैको;नानाजनेष्ववहितः सुहृदन्तरात्मा ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = राराधितः सुरगणैर्हृदि बद्धकामैः । | | verse_line2 = राराधितः सुरगणैर्हृदि बद्धकामैः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,328: | Line 7,752: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शश्वत् स्वरूपमहसैव निपीतभेद | | verse_line1 = शश्वत् स्वरूपमहसैव निपीतभेद | ||
| verse_lines = शश्वत् स्वरूपमहसैव निपीतभेद;मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै ।;विश्वोदयस्थितिलयेषु निमित्तलीलाऽऽ-;रामाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै । | | verse_line2 = मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,346: | Line 7,771: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि | | verse_line1 = यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि | ||
| verse_lines = यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि;नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।;ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा;संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति । | | verse_line2 = नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,364: | Line 7,790: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च | | verse_line1 = यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च | ||
| verse_lines = यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च;स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलाः ।;भूत्वा त्रिपाद् ववृध एक उरुप्ररोह-;स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलाः । | | verse_line2 = स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,382: | Line 7,809: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः | | verse_line1 = लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः | ||
| verse_lines = लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः;कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे ।;यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां;सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे । | | verse_line2 = कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,400: | Line 7,828: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि- | | verse_line1 = तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि- | ||
| verse_lines = तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि-;ष्वात्मेच्छयाऽऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः ।;रेमेऽनिरस्तरतिरप्युपलब्धकाष्ठ-;स्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = ष्वात्मेच्छयाऽऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः । | | verse_line2 = ष्वात्मेच्छयाऽऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,418: | Line 7,847: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या | | verse_line1 = एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या | ||
| verse_lines = एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या;यद् यत् करिष्यति गृहीतगुणावतारः ।;तस्मिन् स्वविक्रम इदं सृजतोऽपि चेतो;युञ्जीत कर्मशमलं च यथा विजह्याम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = यद् यत् करिष्यति गृहीतगुणावतारः । | | verse_line2 = यद् यत् करिष्यति गृहीतगुणावतारः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,436: | Line 7,866: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः । | | verse_line1 = लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः । | ||
| verse_lines = लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः ।;तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,454: | Line 7,885: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्री भगवानुवाच– | | verse_line1 = श्री भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = श्री भगवानुवाच–;मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह ।;तन्मया चोदितं ह्यग्रे यन्मां प्रार्थयते भवान् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह । | | verse_line2 = मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,472: | Line 7,904: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूयश्च तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । | | verse_line1 = भूयश्च तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । | ||
| verse_lines = भूयश्च तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् ।;ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,490: | Line 7,923: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत आत्मनि योगेन भक्तियुक्तः समाहितः । | | verse_line1 = तत आत्मनि योगेन भक्तियुक्तः समाहितः । | ||
| verse_lines = तत आत्मनि योगेन भक्तियुक्तः समाहितः ।;द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन् मयि लोकांस्त्वमात्मनि ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन् मयि लोकांस्त्वमात्मनि ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन् मयि लोकांस्त्वमात्मनि ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,508: | Line 7,942: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः । | | verse_line1 = यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः । | ||
| verse_lines = यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः ।;स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,526: | Line 7,961: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् । | | verse_line1 = ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् । | ||
| verse_lines = ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् ।;यन्मां त्वं मन्यसे युक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = यन्मां त्वं मन्यसे युक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = यन्मां त्वं मन्यसे युक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,544: | Line 7,980: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया । | | verse_line1 = प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया । | ||
| verse_lines = प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया ।;यदस्तौषीद् गुणमयं निर्गुणं माऽनुवर्णयन् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = यदस्तौषीद् गुणमयं निर्गुणं माऽनुवर्णयन् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = यदस्तौषीद् गुणमयं निर्गुणं माऽनुवर्णयन् ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,562: | Line 7,999: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगैः समाधिना । | | verse_line1 = पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगैः समाधिना । | ||
| verse_lines = पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगैः समाधिना ।;राज्यं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = राज्यं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = राज्यं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,580: | Line 8,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहमात्मात्मनां धातः प््रोष्ठः सन् प््रोयसामपि । | | verse_line1 = अहमात्मात्मनां धातः प््रोष्ठः सन् प््रोयसामपि । | ||
| verse_lines = अहमात्मात्मनां धातः प््रोष्ठः सन् प््रोयसामपि ।;अतो मयि रतिं कुर्याद् देहादिर्यत्कृते प््रिायः ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = अतो मयि रतिं कुर्याद् देहादिर्यत्कृते प््रिायः ॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = अतो मयि रतिं कुर्याद् देहादिर्यत्कृते प््रिायः ॥ ४२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,602: | Line 8,041: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;विरिञ्चोऽपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः ।;आत्मन्यात्मानमावेश्य यथाऽऽह भगवानजः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = विरिञ्चोऽपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः । | | verse_line2 = विरिञ्चोऽपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,620: | Line 8,060: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतावान् जीवलोकस्य संस्थाभेदः समासतः । | | verse_line1 = एतावान् जीवलोकस्य संस्थाभेदः समासतः । | ||
| verse_lines = एतावान् जीवलोकस्य संस्थाभेदः समासतः ।;धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठिनः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठिनः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठिनः ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,638: | Line 8,079: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विदुर उवाच– | | verse_line1 = विदुर उवाच– | ||
| verse_lines = विदुर उवाच–;यदात्थ बहुरूपस्य हरेरद्भुतकर्मणः ।;कालाख्यं लक्षणं ब्रह्मन् यथा वर्णय नः प्रभो ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = यदात्थ बहुरूपस्य हरेरद्भुतकर्मणः । | | verse_line2 = यदात्थ बहुरूपस्य हरेरद्भुतकर्मणः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,656: | Line 8,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः ।;पुरुषस्तदुपादानमात्मानं लीलयाऽसृजत् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः । | | verse_line2 = गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,674: | Line 8,117: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया । | | verse_line1 = विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया । | ||
| verse_lines = विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया ।;ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,692: | Line 8,136: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथेदानीं तथा चाऽग्रे पश्चादप्येतदीदृशम् । | | verse_line1 = यथेदानीं तथा चाऽग्रे पश्चादप्येतदीदृशम् । | ||
| verse_lines = यथेदानीं तथा चाऽग्रे पश्चादप्येतदीदृशम् ।;सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतश्च यः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतश्च यः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतश्च यः ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,710: | Line 8,155: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसङ्क्रमः । | | verse_line1 = कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसङ्क्रमः । | ||
| verse_lines = कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसङ्क्रमः ।;आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः ।;द्वितीयस्त्वहमस्तत्र द्रव्यज्ञानक्रियादयः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः । | | verse_line2 = आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,728: | Line 8,174: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रद्रव्यशक्तिमान् । | | verse_line1 = भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रद्रव्यशक्तिमान् । | ||
| verse_lines = भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रद्रव्यशक्तिमान् ।;चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः ।;वैकारिको देवसर्गः पञ्चमो यन्मयं मनः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः । | | verse_line2 = चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,746: | Line 8,193: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः । | | verse_line1 = षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः । | ||
| verse_lines = षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः ।;षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे शृृणु ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे शृृणु ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे शृृणु ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,764: | Line 8,212: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः । | | verse_line1 = रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः । | ||
| verse_lines = रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः ।;सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्विधस्तस्थुषां च यः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्विधस्तस्थुषां च यः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्विधस्तस्थुषां च यः ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,782: | Line 8,231: | ||
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| verse_line1 = वनस्पत्योषधिलता त्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः । | | verse_line1 = वनस्पत्योषधिलता त्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः । | ||
| verse_lines = वनस्पत्योषधिलता त्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः ।;उत्स्रोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशोषिणः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = उत्स्रोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशोषिणः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = उत्स्रोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशोषिणः ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_lines = तिरश्चामष्टमः सर्गः सोऽष्टाविंशद्विधो मतः ।;अविदो भूरितमसो घ्राणज्ञा हृद्यवेदिनः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = गौरजो महिषः कृष्णः सूकरो गवयो रुरुः ।;द्विशफाः पशवश्चेमे अविरुष्ट्रश्च सत्तम ॥ २१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा । | | verse_line1 = खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा । | ||
| verse_lines = खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा ।;एते चैकशफाः क्षत्तः शृृणु पञ्चनखान् पशून् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = एते चैकशफाः क्षत्तः शृृणु पञ्चनखान् पशून् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = एते चैकशफाः क्षत्तः शृृणु पञ्चनखान् पशून् ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,827: | Line 8,280: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्यकौ । | | verse_line1 = श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्यकौ । | ||
| verse_lines = श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्यकौ ।;सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादयः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादयः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादयः ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,836: | Line 8,290: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कङ्कगृध्रबश्येना भासवल्लूरबर्हिणः । | | verse_line1 = कङ्कगृध्रबश्येना भासवल्लूरबर्हिणः । | ||
| verse_lines = कङ्कगृध्रबश्येना भासवल्लूरबर्हिणः ।;हंससारसचक्राह्वकाकोलूकादयः खगाः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = हंससारसचक्राह्वकाकोलूकादयः खगाः ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = हंससारसचक्राह्वकाकोलूकादयः खगाः ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,854: | Line 8,309: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् । | | verse_line1 = अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् । | ||
| verse_lines = अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् ।;रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,872: | Line 8,328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैकृतास्त्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम । | | verse_line1 = वैकृतास्त्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम । | ||
| verse_lines = वैकृतास्त्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम ।;वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,890: | Line 8,347: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः । | | verse_line1 = देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः । | ||
| verse_lines = देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः ।;गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः ॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,899: | Line 8,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतप््रोतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः । | | verse_line1 = भूतप््रोतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः । | ||
| verse_lines = भूतप््रोतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः ।;दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 7,917: | Line 8,376: | ||
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| verse_line1 = अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान् मन्वतराणि च । | | verse_line1 = अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान् मन्वतराणि च । | ||
| verse_lines = अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान् मन्वतराणि च ।;एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः ।;सृजत्यमोघसङ्कल्प आत्मैवाऽत्मानमात्मना ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः । | | verse_line2 = एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः । | ||
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| Line 7,939: | Line 8,399: | ||
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| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;चरमस्तु विशेषाणामनेकांशायुतः सदा ।;परमाणुः स विज्ञेयो नृणामैक्यभ्रमो यतः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = चरमस्तु विशेषाणामनेकांशायुतः सदा । | | verse_line2 = चरमस्तु विशेषाणामनेकांशायुतः सदा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,957: | Line 8,418: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत् । | | verse_line1 = सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत् । | ||
| verse_lines = सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत् ।;कैवल्यं परममहानविशेषो निरन्तरः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = कैवल्यं परममहानविशेषो निरन्तरः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = कैवल्यं परममहानविशेषो निरन्तरः ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 7,975: | Line 8,437: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम । | | verse_line1 = एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम । | ||
| verse_lines = एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम ।;संस्थानभुक्त्या भगवानव्यक्तोऽव्यक्तभुग् विभुः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = संस्थानभुक्त्या भगवानव्यक्तोऽव्यक्तभुग् विभुः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = संस्थानभुक्त्या भगवानव्यक्तोऽव्यक्तभुग् विभुः ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,984: | Line 8,447: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् । | | verse_line1 = स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् । | ||
| verse_lines = स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् ।;सतोऽविशेषभुग् यस्तु स कालः परमो महान् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = सतोऽविशेषभुग् यस्तु स कालः परमो महान् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = सतोऽविशेषभुग् यस्तु स कालः परमो महान् ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 8,002: | Line 8,466: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अणुर्द्वौ परमाणू स्यात् त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः । | | verse_line1 = अणुर्द्वौ परमाणू स्यात् त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः । | ||
| verse_lines = अणुर्द्वौ परमाणू स्यात् त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः ।;जालार्करश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = जालार्करश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = जालार्करश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात् ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 8,020: | Line 8,485: | ||
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| verse_line1 = लघूनि वै समाम्नाता दश पञ्च च नाडिका । | | verse_line1 = लघूनि वै समाम्नाता दश पञ्च च नाडिका । | ||
| verse_lines = लघूनि वै समाम्नाता दश पञ्च च नाडिका ।;ते द्वे मुहूर्तं प्रहरः षड् यामः सप्त वा नृणाम् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = ते द्वे मुहूर्तं प्रहरः षड् यामः सप्त वा नृणाम् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = ते द्वे मुहूर्तं प्रहरः षड् यामः सप्त वा नृणाम् ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 8,038: | Line 8,504: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः । | | verse_line1 = द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः । | ||
| verse_lines = द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः ।;स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत् प्रस्थजलं पिबेत् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत् प्रस्थजलं पिबेत् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत् प्रस्थजलं पिबेत् ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,056: | Line 8,523: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे । | | verse_line1 = यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे । | ||
| verse_lines = यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे ।;पक्षः पञ्चदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = पक्षः पञ्चदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद ॥ १० ॥ | | verse_line2 = पक्षः पञ्चदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,074: | Line 8,542: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ग्रहर्क्षताराचक्रस्थः परमाण्वादिना जगत् । | | verse_line1 = ग्रहर्क्षताराचक्रस्थः परमाण्वादिना जगत् । | ||
| verse_lines = ग्रहर्क्षताराचक्रस्थः परमाण्वादिना जगत् ।;संवत्सरावसानेन पर्येत्यनिमिषो विभुः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = संवत्सरावसानेन पर्येत्यनिमिषो विभुः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = संवत्सरावसानेन पर्येत्यनिमिषो विभुः ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,083: | Line 8,552: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संवत्सरः परिवत्सर इडावत्सर एव च । | | verse_line1 = संवत्सरः परिवत्सर इडावत्सर एव च । | ||
| verse_lines = संवत्सरः परिवत्सर इडावत्सर एव च ।;अनुवत्सरो वत्सरश्च विदुरेवं प्रभाष्यते ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = अनुवत्सरो वत्सरश्च विदुरेवं प्रभाष्यते ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = अनुवत्सरो वत्सरश्च विदुरेवं प्रभाष्यते ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यः सृज्यशक्तिमुरुधोच्छ्वसयन् स्वशक्त्या | | verse_line1 = यः सृज्यशक्तिमुरुधोच्छ्वसयन् स्वशक्त्या | ||
| verse_lines = यः सृज्यशक्तिमुरुधोच्छ्वसयन् स्वशक्त्या;पुंसोऽभ्रमाय दिवि धावति भूतभेदः ।;कालाख्यया गुणमयीं क्रतुभिर्वितन्वं-;स्तस्मै बलिं हरत वत्सरपञ्चकाय ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = पुंसोऽभ्रमाय दिवि धावति भूतभेदः । | | verse_line2 = पुंसोऽभ्रमाय दिवि धावति भूतभेदः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते । | | verse_line1 = निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते । | ||
| verse_lines = निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते ।;यावद् दिनं भगवतो मनून् भुञ्जंश्चतुर्दश ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = यावद् दिनं भगवतो मनून् भुञ्जंश्चतुर्दश ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = यावद् दिनं भगवतो मनून् भुञ्जंश्चतुर्दश ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,137: | Line 8,609: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिका ह्येकसप्ततिः । | | verse_line1 = स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिका ह्येकसप्ततिः । | ||
| verse_lines = स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिका ह्येकसप्ततिः ।;मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः ।;भवन्ति चैते युगपत् सुरेशाश्चानु ये च तान् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः । | | verse_line2 = मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,155: | Line 8,628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रमः । | | verse_line1 = तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रमः । | ||
| verse_lines = तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रमः ।;कालेनानुगतः शेष आस्ते तूष्णीं दिनात्यये ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = कालेनानुगतः शेष आस्ते तूष्णीं दिनात्यये ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = कालेनानुगतः शेष आस्ते तूष्णीं दिनात्यये ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,173: | Line 8,647: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः । | | verse_line1 = एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः । | ||
| verse_lines = एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः ।;अपेक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = अपेक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = अपेक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम् ॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,191: | Line 8,666: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते । | | verse_line1 = कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते । | ||
| verse_lines = कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते ।;अव्याकृतस्यानन्तस्य ह्यनादेर्जगदात्मनः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = अव्याकृतस्यानन्तस्य ह्यनादेर्जगदात्मनः ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = अव्याकृतस्यानन्तस्य ह्यनादेर्जगदात्मनः ॥ ३७ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईरितः । | | verse_line1 = कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईरितः । | ||
| verse_lines = कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईरितः ।;नैवेष्टे स प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = नैवेष्टे स प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = नैवेष्टे स प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम् ॥ ३८ ॥ | ||
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| verse_line1 = विकारैः षोडशैर्युक्तो विशेषादिभिरावृतः । | | verse_line1 = विकारैः षोडशैर्युक्तो विशेषादिभिरावृतः । | ||
| verse_lines = विकारैः षोडशैर्युक्तो विशेषादिभिरावृतः ।;अण्डकोशो बहिरयं पञ्चाशत्कोटिविस्तृतः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = अण्डकोशो बहिरयं पञ्चाशत्कोटिविस्तृतः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = अण्डकोशो बहिरयं पञ्चाशत्कोटिविस्तृतः ॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,236: | Line 8,714: | ||
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| verse_line1 = दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत् । | | verse_line1 = दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत् । | ||
| verse_lines = दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत् ।;लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशयः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशयः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशयः ॥ ४० ॥ | ||
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| verse_line1 = यमाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् । | | verse_line1 = यमाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् । | ||
| verse_lines = यमाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् ।;विष्णोर्धाम परं साक्षात् पुरुषस्य महात्मनः ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = विष्णोर्धाम परं साक्षात् पुरुषस्य महात्मनः ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = विष्णोर्धाम परं साक्षात् पुरुषस्य महात्मनः ॥ ४१ ॥ | ||
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| verse_line1 = ससर्जाग्रेऽथ तामिस्रमन्धतामिस्रमादिकृत् । | | verse_line1 = ससर्जाग्रेऽथ तामिस्रमन्धतामिस्रमादिकृत् । | ||
| verse_lines = ससर्जाग्रेऽथ तामिस्रमन्धतामिस्रमादिकृत् ।;महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = दृष्ट्वा पापीयसीं सृष्टिं नाऽत्मानं बह्वमन्यत । | | verse_line1 = दृष्ट्वा पापीयसीं सृष्टिं नाऽत्मानं बह्वमन्यत । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा पापीयसीं सृष्टिं नाऽत्मानं बह्वमन्यत ।;भगवद्ध्यानपूतेन मनसाऽन्यांस्ततोऽसृजत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवद्ध्यानपूतेन मनसाऽन्यांस्ततोऽसृजत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = भगवद्ध्यानपूतेन मनसाऽन्यांस्ततोऽसृजत् ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 8,303: | Line 8,785: | ||
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| verse_line1 = सनकं च सनन्दं च सनातनमथाऽत्मभूः । | | verse_line1 = सनकं च सनन्दं च सनातनमथाऽत्मभूः । | ||
| verse_lines = सनकं च सनन्दं च सनातनमथाऽत्मभूः ।;सनत्कुमारं च मुनिं निष्क्रियानूर्ध्वरेतसः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = सनत्कुमारं च मुनिं निष्क्रियानूर्ध्वरेतसः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = सनत्कुमारं च मुनिं निष्क्रियानूर्ध्वरेतसः ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् । | | verse_line1 = स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् । | ||
| verse_lines = स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् ।;प्रजापतिपतिस्तन्वीं तत्याज व्रीडितस्तदा ।;तां दिशो जगृहुर्घोरां नीहारं यद् विदुस्तमः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजापतिपतिस्तन्वीं तत्याज व्रीडितस्तदा । | | verse_line2 = प्रजापतिपतिस्तन्वीं तत्याज व्रीडितस्तदा । | ||
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| verse_line1 = कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात् ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात् ॥ ३४ ॥ | ||
| verse_lines = कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात् ॥ ३४ ॥ | |||
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| Line 8,347: | Line 8,832: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः । शस्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात् क्रमात् ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः । शस्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात् क्रमात् ॥ ३७ ॥ | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच– ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः । शस्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात् क्रमात् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 8,355: | Line 8,841: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इतिहासपुराणं च पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = इतिहासपुराणं च पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९ ॥ | ||
| verse_lines = इतिहासपुराणं च पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 8,363: | Line 8,850: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तपः शौचं दया सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासंख्यमसृजत् सह वृत्तिभिः ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = तपः शौचं दया सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासंख्यमसृजत् सह वृत्तिभिः ॥ ४१ ॥ | ||
| verse_lines = तपः शौचं दया सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासंख्यमसृजत् सह वृत्तिभिः ॥ ४१ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 8,380: | Line 8,868: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत् तथा । | | verse_line1 = सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत् तथा । | ||
| verse_lines = सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत् तथा ।;वार्ताऽसञ्चयशालीनं शिलोंञ्छ इति वै गृहे ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = वार्ताऽसञ्चयशालीनं शिलोंञ्छ इति वै गृहे ॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = वार्ताऽसञ्चयशालीनं शिलोंञ्छ इति वै गृहे ॥ ४२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,398: | Line 8,887: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैखानसा वालखिल्योदुम्बराः फेनपा वने । | | verse_line1 = वैखानसा वालखिल्योदुम्बराः फेनपा वने । | ||
| verse_lines = वैखानसा वालखिल्योदुम्बराः फेनपा वने ।;न्यासे कुटीचकः पूर्वं बहूदो हंसनिष्क्रियौ ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = न्यासे कुटीचकः पूर्वं बहूदो हंसनिष्क्रियौ ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = न्यासे कुटीचकः पूर्वं बहूदो हंसनिष्क्रियौ ॥ ४३ ॥ | ||
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| Line 8,416: | Line 8,906: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च । | | verse_line1 = आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च । | ||
| verse_lines = आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च ।;एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवेनास्पदं गताः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवेनास्पदं गताः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवेनास्पदं गताः ॥ ४४ ॥ | ||
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| Line 8,434: | Line 8,925: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्पर्शास्तस्याभवन् जीवात् स्वरो देह उदाहृतः । | | verse_line1 = स्पर्शास्तस्याभवन् जीवात् स्वरो देह उदाहृतः । | ||
| verse_lines = स्पर्शास्तस्याभवन् जीवात् स्वरो देह उदाहृतः ।;ऊष्माण इन्द्रियाण्याहुरन्तस्था बलमात्मनः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = ऊष्माण इन्द्रियाण्याहुरन्तस्था बलमात्मनः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = ऊष्माण इन्द्रियाण्याहुरन्तस्था बलमात्मनः ॥ ४६ ॥ | ||
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| Line 8,452: | Line 8,944: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः । | | verse_line1 = स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः । | ||
| verse_lines = स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः ।;शब्दब्रह्मात्मनस्तात व्यक्ताव्यक्तात्मनः प्रभोः ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दब्रह्मात्मनस्तात व्यक्ताव्यक्तात्मनः प्रभोः ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = शब्दब्रह्मात्मनस्तात व्यक्ताव्यक्तात्मनः प्रभोः ॥ ४७ ॥ | ||
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| Line 8,470: | Line 8,963: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् । | | verse_line1 = ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् । | ||
| verse_lines = ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् ।;ज्ञात्वा तद् हृदये भूयश्चिन्तयामास कौरव ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञात्वा तद् हृदये भूयश्चिन्तयामास कौरव ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञात्वा तद् हृदये भूयश्चिन्तयामास कौरव ॥ ४९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,479: | Line 8,973: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा । | | verse_line1 = अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा । | ||
| verse_lines = अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा ।;न ह्येधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघातकम् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = न ह्येधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघातकम् ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = न ह्येधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघातकम् ॥ ५० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,488: | Line 8,983: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं युक्तिमतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा । | | verse_line1 = एवं युक्तिमतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा । | ||
| verse_lines = एवं युक्तिमतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा ।;कस्य रूपमभूद् द्वेधा यत् कायमभिचक्षते ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = कस्य रूपमभूद् द्वेधा यत् कायमभिचक्षते ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = कस्य रूपमभूद् द्वेधा यत् कायमभिचक्षते ॥ ५१ ॥ | ||
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| Line 8,510: | Line 9,006: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद् विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्विज्यात्मशक्तिषु । | | verse_line1 = तद् विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्विज्यात्मशक्तिषु । | ||
| verse_lines = तद् विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्विज्यात्मशक्तिषु ।;यत् कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद् गतिः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद् गतिः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = यत् कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद् गतिः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,528: | Line 9,025: | ||
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| verse_line1 = स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं विलग्नां स उत्थितः संरुरुहे रसायाः । | | verse_line1 = स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं विलग्नां स उत्थितः संरुरुहे रसायाः । | ||
| verse_lines = स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं विलग्नां स उत्थितः संरुरुहे रसायाः ।;तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥३३॥ | |||
| verse_line2 = तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥३३॥ | | verse_line2 = तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥३३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,537: | Line 9,035: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जघान रुन्धानमसह्यविक्रमः सलीलयेभं मृगराडिवाम्भसि । | | verse_line1 = जघान रुन्धानमसह्यविक्रमः सलीलयेभं मृगराडिवाम्भसि । | ||
| verse_lines = जघान रुन्धानमसह्यविक्रमः सलीलयेभं मृगराडिवाम्भसि ।;तद्रक्तपङ्काङ्किततुण्डगण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्रक्तपङ्काङ्किततुण्डगण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = तद्रक्तपङ्काङ्किततुण्डगण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,559: | Line 9,058: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला | | verse_line1 = ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला | ||
| verse_lines = ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला;यत्कारणं विश्वमिदं च मायया ।;आज्ञाकरी तस्य पिशाचचर्या;अहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्कारणं विश्वमिदं च मायया । | | verse_line2 = यत्कारणं विश्वमिदं च मायया । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,577: | Line 9,077: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् ।;पुत्रयोश्च वधं कृष्णाद् विदित्वाऽऽसीन्महामनाः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् । | | verse_line2 = श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,599: | Line 9,100: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः । | | verse_line1 = वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः । | ||
| verse_lines = वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः ।;ये नित्यमनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = ये नित्यमनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = ये नित्यमनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,617: | Line 9,119: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्र | | verse_line1 = वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्र | ||
| verse_lines = वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्र;गायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः ।;अन्तर्जले तु विलसन्मधुमाधवीनां;गन्धेन खण्डितधियोऽप्यनिलं क्षिपन्तः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = गायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः । | | verse_line2 = गायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,635: | Line 9,138: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक- | | verse_line1 = पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक- | ||
| verse_lines = पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक-;दात्यूहहंसशुकतित्तिरबर्हिणाद्यैः ।;कोलाहले विरचिते चिरमात्रयोच्चै-;र्भृङ्गाधिपे हरिकथामनुगायमाने ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = दात्यूहहंसशुकतित्तिरबर्हिणाद्यैः । | | verse_line2 = दात्यूहहंसशुकतित्तिरबर्हिणाद्यैः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,653: | Line 9,157: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकोर्ण- | | verse_line1 = मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकोर्ण- | ||
| verse_lines = मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकोर्ण-;पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः ।;गन्धेऽर्चिते तुलसिकाभरणेन तस्या;यस्मिंस्तपः सुमनसो बहु मानयन्ति ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः । | | verse_line2 = पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,671: | Line 9,176: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यन्न व्रजन्त्यघभिदोरचनानुवादाः | | verse_line1 = यन्न व्रजन्त्यघभिदोरचनानुवादाः | ||
| verse_lines = यन्न व्रजन्त्यघभिदोरचनानुवादाः;शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।;यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तवीर्या-;स्तास्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमःसु हन्त ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः । | | verse_line2 = शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,689: | Line 9,195: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्ना | | verse_line1 = येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्ना | ||
| verse_lines = येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्ना;ज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र ।;नाराधनं भगवतो वितरन्त्यमुष्य;संमोहिता विततया ननु मायया ते ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र । | | verse_line2 = ज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,707: | Line 9,214: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौ | | verse_line1 = मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौ | ||
| verse_lines = मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौ;विन्यस्तयाऽसितचतुष्टयबाहुमध्ये ।;वक्त्रभ्रुवा कुटिलया स्फुटनिर्गतेन;रक्तेक्षणेन च मनाग् रभसं दधानौ ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = विन्यस्तयाऽसितचतुष्टयबाहुमध्ये । | | verse_line2 = विन्यस्तयाऽसितचतुष्टयबाहुमध्ये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,725: | Line 9,233: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान् | | verse_line1 = तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान् | ||
| verse_lines = तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्;वृद्धान् दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान् ।;वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ;तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = वृद्धान् दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान् । | | verse_line2 = वृद्धान् दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,743: | Line 9,252: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = को वा इहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै- | | verse_line1 = को वा इहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै- | ||
| verse_lines = को वा इहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-;स्तद्धर्मिणामपि सतां विषमस्वभावः ।;तस्मिन् प्रशान्तपुरुषे गतविग्रहे वां;को वाऽत्मवत् कुहकयोः परिशङ्कनीयः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तद्धर्मिणामपि सतां विषमस्वभावः । | | verse_line2 = स्तद्धर्मिणामपि सतां विषमस्वभावः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,761: | Line 9,271: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा- | | verse_line1 = न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा- | ||
| verse_lines = न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-;वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः ।;पश्यन्ति यत्र युवयोः सुरलिङ्गिनोः किं;व्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोऽस्य ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः । | | verse_line2 = वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,779: | Line 9,290: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद् वा अमुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः | | verse_line1 = तद् वा अमुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः | ||
| verse_lines = तद् वा अमुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः;कर्तुं न युक्तमिति धीमहि मन्दधीभ्याम् ।;लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या;पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तुं न युक्तमिति धीमहि मन्दधीभ्याम् । | | verse_line2 = कर्तुं न युक्तमिति धीमहि मन्दधीभ्याम् । | ||
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| Line 8,797: | Line 9,309: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूयानघाद्धि भगवद्भिरकारि दण्डो | | verse_line1 = भूयानघाद्धि भगवद्भिरकारि दण्डो | ||
| verse_lines = भूयानघाद्धि भगवद्भिरकारि दण्डो;यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् ।;मा वोऽनुतापकलया भगवत्स्मृतिघ्नो;मोहो भवेदिह तु नौ व्रजतोरधोऽधः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् । | | verse_line2 = यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् । | ||
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| Line 8,815: | Line 9,328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुंभि- | | verse_line1 = तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुंभि- | ||
| verse_lines = तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुंभि-;स्तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिगम्यम् ।;हंसश्रियोर्व्यजनयोः शिववायुलोल;शुभ्रातपत्रशशिकेसरशीकराम्बुम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिगम्यम् । | | verse_line2 = स्तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिगम्यम् । | ||
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| Line 8,833: | Line 9,347: | ||
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| verse_line1 = कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम | | verse_line1 = कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम | ||
| verse_lines = कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम;स्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम् ।;श्यामे पृथावुरसि शोभितया श्रिया स्व;ग्रीवामणिं सुभगयन्तमिवात्मधिष्ण्यम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम् । | | verse_line2 = स्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,851: | Line 9,366: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिंदिरायाः | | verse_line1 = अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिंदिरायाः | ||
| verse_lines = अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिंदिरायाः;स्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम् ।;मह्यं भवस्य भवतां भजनीयमङ्गं;नेमुर्निरीक्ष्य नवितृप्तदृशो मुदा कैः ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम् । | | verse_line2 = स्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,869: | Line 9,385: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- | | verse_line1 = तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- | ||
| verse_lines = तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-;किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः ।;अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां;सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । | | verse_line2 = किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,887: | Line 9,404: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं | | verse_line1 = नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं | ||
| verse_lines = नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं;किं चान्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते ।;येऽङ्ग त्वदङ्घ्रिशरणा भवतः कथायाः;कीर्तन्यतीर्थयशसः कुशला रसज्ञाः ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = किं चान्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते । | | verse_line2 = किं चान्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,905: | Line 9,423: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामं व्रजेम वृजिनैर्निरयेषु नष्टा | | verse_line1 = कामं व्रजेम वृजिनैर्निरयेषु नष्टा | ||
| verse_lines = कामं व्रजेम वृजिनैर्निरयेषु नष्टा;श्चेतोऽलिवद् यदि नु ते पदयो रमेत ।;वाचश्च नस्तुलसिवद् यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः;पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = श्चेतोऽलिवद् यदि नु ते पदयो रमेत । | | verse_line2 = श्चेतोऽलिवद् यदि नु ते पदयो रमेत । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,927: | Line 9,446: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । | | verse_line1 = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । | ||
| verse_lines = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे ।;तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,936: | Line 9,456: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः | | verse_line1 = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः | ||
| verse_lines = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः;सद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः ।;सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति-;श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = सद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः । | | verse_line2 = सद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः । | ||
}} | }} | ||
| Line 8,945: | Line 9,466: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः | | verse_line1 = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः | ||
| verse_lines = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः;सद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् ।;न श्रीर्विरक्तमपि मां विजहाति यस्याः;प््रोक्षालवार्थमितरे नियमोऽर्हते मत् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = सद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् । | | verse_line2 = सद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 8,963: | Line 9,485: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| verse_lines = ब्रह्मोवाच–;अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् ।;आस्वाद्य मन्युदष्टानां तेषामात्माऽप्यतृप्यत ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् । | | verse_line2 = अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् । | ||
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| Line 8,981: | Line 9,504: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । | | verse_line1 = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । | ||
| verse_lines = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् ।;प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 8,999: | Line 9,523: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । | | verse_line1 = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । | ||
| verse_lines = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।;धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान् मतः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान् मतः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान् मतः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 9,017: | Line 9,542: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- | | verse_line1 = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- | ||
| verse_lines = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-;रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः ।;धन्यार्पिताङ्घ्रितुलसीनवदामधाम्नो;लोकं मधुव्रतपतेरिव कामयाना ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः । | | verse_line2 = रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,035: | Line 9,561: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां | | verse_line1 = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां | ||
| verse_lines = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां;नात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः ।;स त्वं द्विजानुपथपुण्यरजःपुनीतिः;श्रीवत्सलक्ष्म किमगा भगभाजनत्वम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = नात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः । | | verse_line2 = नात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः । | ||
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| Line 9,053: | Line 9,580: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः | | verse_line1 = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः | ||
| verse_lines = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः;पद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् ।;नूनं भृतं तदभिघातिरजस्तमश्च;सत्त्वेन नो वरदया तनुवा निरस्य ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = पद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् । | | verse_line2 = पद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,071: | Line 9,599: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं | | verse_line1 = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं | ||
| verse_lines = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं;गोप्ता वृष स्वर्हणेन सुसूनृतेन ।;तर्ह्येव नङ्क्षयति शिवस्तव देव पन्थाः;लोकोऽग्रहीष्यदृषभस्य हि यत् प्रमाणम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = गोप्ता वृष स्वर्हणेन सुसूनृतेन । | | verse_line2 = गोप्ता वृष स्वर्हणेन सुसूनृतेन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,089: | Line 9,618: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः | | verse_line1 = तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः | ||
| verse_lines = तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः;क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः ।;नैतावता त्र्यधिपतेर्बत विश्वभर्तु-;स्तेजःक्षतिस्त्ववनतस्य स ते विनोदः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः । | | verse_line2 = क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,107: | Line 9,637: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः;संरम्भसम्भृतसमाध्यनुबद्धयोगौ ।;भूयः सकाशमुपयास्यत आशु यो वः;शापो मयैव विहितस्तदवैत विप्र ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः | | verse_line2 = एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,125: | Line 9,656: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| verse_lines = ब्रह्मोवाच–;भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च ।;प्रतिजग्मुः प्रमुदिताः शंसन्तो वैष्णवीं श्रियम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च । | | verse_line2 = भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च । | ||
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| Line 9,143: | Line 9,675: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । | | verse_line1 = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । | ||
| verse_lines = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् ।;प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 9,165: | Line 9,698: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ववौ वायुः सुदुस्पर्शः फट्काराराववान् मुहुः । | | verse_line1 = ववौ वायुः सुदुस्पर्शः फट्काराराववान् मुहुः । | ||
| verse_lines = ववौ वायुः सुदुस्पर्शः फट्काराराववान् मुहुः ।;उन्मूलयन् नगपतीन् वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = उन्मूलयन् नगपतीन् वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = उन्मूलयन् नगपतीन् वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,183: | Line 9,717: | ||
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| verse_line1 = अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् । | | verse_line1 = अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् । | ||
| verse_lines = अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् ।;सृगाला अपि टङ्कारैः प्रणेदुरशिवाः शिवाः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = सृगाला अपि टङ्कारैः प्रणेदुरशिवाः शिवाः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = सृगाला अपि टङ्कारैः प्रणेदुरशिवाः शिवाः ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,201: | Line 9,736: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = खरोष्ट्राः कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् । | | verse_line1 = खरोष्ट्राः कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् । | ||
| verse_lines = खरोष्ट्राः कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् ।;खात्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = खात्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = खात्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 9,219: | Line 9,755: | ||
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| verse_line1 = तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् । | | verse_line1 = तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् । | ||
| verse_lines = तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् ।;वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमसंन्यस्तमहागदम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमसंन्यस्तमहागदम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमसंन्यस्तमहागदम् ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,228: | Line 9,765: | ||
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| verse_line1 = मनोवीर्यमदोत्सिक्तमधृष्यमकुतोभयम् । | | verse_line1 = मनोवीर्यमदोत्सिक्तमधृष्यमकुतोभयम् । | ||
| verse_lines = मनोवीर्यमदोत्सिक्तमधृष्यमकुतोभयम् ।;भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तयोः स्पृधोः स्निग्धगदाहताङ्गयोः | | verse_line1 = तयोः स्पृधोः स्निग्धगदाहताङ्गयोः | ||
| verse_lines = तयोः स्पृधोः स्निग्धगदाहताङ्गयोः;क्षतस्रवाघ्राणविवृद्धयुद्धयोः ।;विचित्रमार्गांश्चरतोर्जिगीषया;व्यभादिलायामिव शुष्मिणोर्मृधः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षतस्रवाघ्राणविवृद्धयुद्धयोः । | | verse_line2 = क्षतस्रवाघ्राणविवृद्धयुद्धयोः । | ||
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| verse_line1 = दैत्यस्य यज्ञावयवस्य मायया | | verse_line1 = दैत्यस्य यज्ञावयवस्य मायया | ||
| verse_lines = दैत्यस्य यज्ञावयवस्य मायया;गृहीतवाराहतनोर्महात्मनः ।;कौरव्य मह्यां द्विषतोर्विमर्दनं;दिदृक्षुरागाद् ऋषिभिर्वृतः स्वराट् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = गृहीतवाराहतनोर्महात्मनः । | | verse_line2 = गृहीतवाराहतनोर्महात्मनः । | ||
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| verse_line1 = आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसं | | verse_line1 = आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसं | ||
| verse_lines = आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसं;कृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् ।;विलक्ष्य दैत्यं भगवान् सहस्रणी;र्जगाद नारायणमादिसूकरम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = कृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् । | | verse_line2 = कृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् । | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एषा घोरतमा सन्ध्या लोकशम्बट्करी प्रभो । | | verse_line1 = एषा घोरतमा सन्ध्या लोकशम्बट्करी प्रभो । | ||
| verse_lines = एषा घोरतमा सन्ध्या लोकशम्बट्करी प्रभो ।;उपसर्पति सर्वात्मन् सुराणां जयमावह ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = उपसर्पति सर्वात्मन् सुराणां जयमावह ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = उपसर्पति सर्वात्मन् सुराणां जयमावह ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अधुनैवाभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिकोऽभ्यगात् । | | verse_line1 = अधुनैवाभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिकोऽभ्यगात् । | ||
| verse_lines = अधुनैवाभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिकोऽभ्यगात् ।;शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 9,326: | Line 9,869: | ||
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| verse_line1 = गदायामपविद्धायां हाहाकारे च निर्गते । | | verse_line1 = गदायामपविद्धायां हाहाकारे च निर्गते । | ||
| verse_lines = गदायामपविद्धायां हाहाकारे च निर्गते ।;मानयामास तद्धर्मं सुनाभं चास्मरद् विभुः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = मानयामास तद्धर्मं सुनाभं चास्मरद् विभुः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = मानयामास तद्धर्मं सुनाभं चास्मरद् विभुः ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 9,348: | Line 9,892: | ||
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| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च ।;जातक्षोभाद् भगवतो महानासीद् गुणत्रयात् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च । | | verse_line2 = दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च । | ||
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| Line 9,366: | Line 9,911: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजः प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् । | | verse_line1 = रजः प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् । | ||
| verse_lines = रजः प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् ।;जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्च च ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्च च ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्च च ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,375: | Line 9,921: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽशयिष्टाधिसलिल आण्डकोशो निरात्मकः । | | verse_line1 = सोऽशयिष्टाधिसलिल आण्डकोशो निरात्मकः । | ||
| verse_lines = सोऽशयिष्टाधिसलिल आण्डकोशो निरात्मकः ।;साग्रं वै वर्षसाहस्रमन्ववात्सीत् तमीश्वरः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = साग्रं वै वर्षसाहस्रमन्ववात्सीत् तमीश्वरः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = साग्रं वै वर्षसाहस्रमन्ववात्सीत् तमीश्वरः ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,393: | Line 9,940: | ||
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| verse_line1 = सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये । | | verse_line1 = सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये । | ||
| verse_lines = सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।;लोकसंस्थां यथापूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = लोकसंस्थां यथापूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = लोकसंस्थां यथापूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 9,411: | Line 9,959: | ||
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| verse_line1 = देवस्तानाह संविग्नो मा मा जक्षत रक्षत । | | verse_line1 = देवस्तानाह संविग्नो मा मा जक्षत रक्षत । | ||
| verse_lines = देवस्तानाह संविग्नो मा मा जक्षत रक्षत ।;अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं भविष्यथ ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं भविष्यथ ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं भविष्यथ ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,420: | Line 9,969: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवताः प्रभया या या दिव्याः प्रमुखतोऽसृजत् । | | verse_line1 = देवताः प्रभया या या दिव्याः प्रमुखतोऽसृजत् । | ||
| verse_lines = देवताः प्रभया या या दिव्याः प्रमुखतोऽसृजत् ।;तेऽहार्षुर्देवयन्तोऽपि विसृष्टां तां प्रभामहः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तेऽहार्षुर्देवयन्तोऽपि विसृष्टां तां प्रभामहः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तेऽहार्षुर्देवयन्तोऽपि विसृष्टां तां प्रभामहः ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,429: | Line 9,979: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवोऽदेवान् जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् । | | verse_line1 = देवोऽदेवान् जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् । | ||
| verse_lines = देवोऽदेवान् जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् ।;त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,438: | Line 9,989: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः । | | verse_line1 = ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः । | ||
| verse_lines = ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः ।;अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 9,456: | Line 10,008: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः । | | verse_line1 = सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः । | ||
| verse_lines = सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः ।;विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 9,474: | Line 10,027: | ||
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| verse_line1 = ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः । | | verse_line1 = ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः । | ||
| verse_lines = ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः ।;साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत् प्रभुः ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत् प्रभुः ॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत् प्रभुः ॥ ४२ ॥ | ||
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| verse_line1 = स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः । | | verse_line1 = स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः । | ||
| verse_lines = स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः ।;तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,501: | Line 10,056: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेभ्यः स व्यसृजद् देहं परः पुरुष आत्मनः । | | verse_line1 = तेभ्यः स व्यसृजद् देहं परः पुरुष आत्मनः । | ||
| verse_lines = तेभ्यः स व्यसृजद् देहं परः पुरुष आत्मनः ।;तां दृष्ट्वा ये पुरा सृष्टाः प्रशशंसुः प्रजापतिम् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = तां दृष्ट्वा ये पुरा सृष्टाः प्रशशंसुः प्रजापतिम् ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = तां दृष्ट्वा ये पुरा सृष्टाः प्रशशंसुः प्रजापतिम् ॥ ५० ॥ | ||
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| Line 9,519: | Line 10,075: | ||
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| verse_line1 = तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना । | | verse_line1 = तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना । | ||
| verse_lines = तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।;आदावृषीन् हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = आदावृषीन् हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = आदावृषीन् हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ५२ ॥ | ||
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| Line 9,541: | Line 10,098: | ||
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| verse_line1 = तावत् प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे । | | verse_line1 = तावत् प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे । | ||
| verse_lines = तावत् प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे ।;दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद् वपुः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद् वपुः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद् वपुः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,559: | Line 10,117: | ||
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| verse_line1 = न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां | | verse_line1 = न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां | ||
| verse_lines = न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां;त्रयोदशारं त्रिशतं षष्ठिपर्व ।;षण्णेम्यनन्तच्छिदि यत् त्रिनाभि;करालस्रोतो जगदाच्छिद्य धावत् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रयोदशारं त्रिशतं षष्ठिपर्व । | | verse_line2 = त्रयोदशारं त्रिशतं षष्ठिपर्व । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_line1 = नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते । | | verse_line1 = नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते । | ||
| verse_lines = नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते ।;वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालनी ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालनी ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालनी ॥ ५० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,586: | Line 10,146: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् । | | verse_line1 = योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् । | ||
| verse_lines = योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् ।;रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लात्मने नमः ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लात्मने नमः ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लात्मने नमः ॥ ५१ ॥ | ||
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| Line 9,608: | Line 10,169: | ||
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| verse_line1 = कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः | | verse_line1 = कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः | ||
| verse_lines = कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः;पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः ।;क एव ते तनयां नाद्रियेत स्वयैव;कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः । | | verse_line2 = पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,626: | Line 10,188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता । | | verse_line1 = बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता । | ||
| verse_lines = बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता ।;न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,635: | Line 10,198: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कुशकाशास्त एवासंल्लसद्धरितवर्चसः । | | verse_line1 = कुशकाशास्त एवासंल्लसद्धरितवर्चसः । | ||
| verse_lines = कुशकाशास्त एवासंल्लसद्धरितवर्चसः ।;ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,653: | Line 10,217: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः । | | verse_line1 = अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः । | ||
| verse_lines = अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः ।;शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,671: | Line 10,236: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शारीरा मानसा दिव्याः पर्यासे ये च मानुषाः । | | verse_line1 = शारीरा मानसा दिव्याः पर्यासे ये च मानुषाः । | ||
| verse_lines = शारीरा मानसा दिव्याः पर्यासे ये च मानुषाः ।;भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,693: | Line 10,259: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वास्सु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटिमत् । | | verse_line1 = द्वास्सु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटिमत् । | ||
| verse_lines = द्वास्सु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटिमत् ।;शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिष्ठितम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिष्ठितम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिष्ठितम् ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,711: | Line 10,278: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् । | | verse_line1 = हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् । | ||
| verse_lines = हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् ।;कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २० ॥ | | verse_line2 = कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,729: | Line 10,297: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथाऽदर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् । | | verse_line1 = अथाऽदर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् । | ||
| verse_lines = अथाऽदर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् ।;विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,747: | Line 10,316: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिंन्नलुप्तमहिमा प््रिाययाऽनुषक्तो | | verse_line1 = तस्मिंन्नलुप्तमहिमा प््रिाययाऽनुषक्तो | ||
| verse_lines = तस्मिंन्नलुप्तमहिमा प््रिाययाऽनुषक्तो;विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।;बभ्राज उत्कचक उद्गुणपानवीच्य-;स्ताराभिरावृत इवोडुपतिर्नभस्स्थः ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने । | | verse_line2 = विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,765: | Line 10,335: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता । | | verse_line1 = तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता । | ||
| verse_lines = तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता ।;न चाबुद्ध्यत तं कालं पत्याऽऽवीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = न चाबुद्ध्यत तं कालं पत्याऽऽवीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = न चाबुद्ध्यत तं कालं पत्याऽऽवीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,787: | Line 10,358: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः ।;दयालुः शालिनीमाह शुक्लाभिव्याहृतं स्मरन् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः । | | verse_line2 = निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,805: | Line 10,377: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः । | | verse_line1 = तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः । | ||
| verse_lines = तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः ।;कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,823: | Line 10,396: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् । | | verse_line1 = भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् । | ||
| verse_lines = भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् ।;तत्त्वसंख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानजः स्वराट् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = तत्त्वसंख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानजः स्वराट् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = तत्त्वसंख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानजः स्वराट् ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,841: | Line 10,415: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः । | | verse_line1 = अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः । | ||
| verse_lines = अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः ।;लोके कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धनः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = लोके कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धनः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = लोके कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धनः ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,859: | Line 10,434: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् । | | verse_line1 = स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् । | ||
| verse_lines = स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् ।;विविक्त उपसङ्गम्य प्रणम्य समभाषत ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = विविक्त उपसङ्गम्य प्रणम्य समभाषत ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = विविक्त उपसङ्गम्य प्रणम्य समभाषत ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 9,877: | Line 10,453: | ||
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| verse_line1 = तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव । | | verse_line1 = तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव । | ||
| verse_lines = तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव ।;यानि यानीह रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = यानि यानीह रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = यानि यानीह रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 9,895: | Line 10,472: | ||
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| verse_line1 = परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् । | | verse_line1 = परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् । | ||
| verse_lines = परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् ।;आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥३३॥ | |||
| verse_line2 = आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥३३॥ | | verse_line2 = आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥३३॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,913: | Line 10,491: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्री भगवानुवाच– | | verse_line1 = श्री भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = श्री भगवानुवाच–;मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके ।;अथाजनि मया तुभ्यं यदवोचमृतं मुने ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके । | | verse_line2 = मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,931: | Line 10,510: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विश्वमेतद्धि शास्त्रेण विज्ञायात्मानमीश्वरम् । | | verse_line1 = विश्वमेतद्धि शास्त्रेण विज्ञायात्मानमीश्वरम् । | ||
| verse_lines = विश्वमेतद्धि शास्त्रेण विज्ञायात्मानमीश्वरम् ।;मुनिः शान्तमनोवाक्यस्तदा नाऽख्यात्युपप्लवः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = मुनिः शान्तमनोवाक्यस्तदा नाऽख्यात्युपप्लवः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = मुनिः शान्तमनोवाक्यस्तदा नाऽख्यात्युपप्लवः ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,949: | Line 10,529: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् । | | verse_line1 = निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् । | ||
| verse_lines = निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् ।;प्रत्यग्रः शान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रत्यग्रः शान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = प्रत्यग्रः शान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,967: | Line 10,548: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । | | verse_line1 = आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । | ||
| verse_lines = आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।;अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥ ४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,976: | Line 10,558: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि । | | verse_line1 = वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि । | ||
| verse_lines = वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि ।;परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः ॥ ४७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 9,998: | Line 10,581: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं त्वा गताऽहं शरणं शरण्यं | | verse_line1 = तं त्वा गताऽहं शरणं शरण्यं | ||
| verse_lines = तं त्वा गताऽहं शरणं शरण्यं;स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् ।;जिज्ञासया प्रकृतेः पूरुषस्य;नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् । | | verse_line2 = स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,016: | Line 10,600: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;योग आध्यात्मिकः पुंसां मतो निःश्रेयसाय मे ।;अत्यन्तोपरतिर्यत्र दुःखस्य च सुखस्य च ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = योग आध्यात्मिकः पुंसां मतो निःश्रेयसाय मे । | | verse_line2 = योग आध्यात्मिकः पुंसां मतो निःश्रेयसाय मे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,034: | Line 10,619: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहंममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः । | | verse_line1 = अहंममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः । | ||
| verse_lines = अहंममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः ।;वीतं यदाऽऽत्मनः शुद्धमदुःखमसुखं समम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = वीतं यदाऽऽत्मनः शुद्धमदुःखमसुखं समम् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = वीतं यदाऽऽत्मनः शुद्धमदुःखमसुखं समम् ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,043: | Line 10,629: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् । | | verse_line1 = तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् । | ||
| verse_lines = तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् ।;निरन्तरं स्वयञ्ज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = निरन्तरं स्वयञ्ज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = निरन्तरं स्वयञ्ज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,052: | Line 10,639: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन चात्मना । | | verse_line1 = ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन चात्मना । | ||
| verse_lines = ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन चात्मना ।;परिपश्यत्युदासीनां प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = परिपश्यत्युदासीनां प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = परिपश्यत्युदासीनां प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 10,070: | Line 10,658: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् । | | verse_line1 = मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् । | ||
| verse_lines = मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् ।;मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 10,088: | Line 10,677: | ||
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| verse_line1 = मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च । | | verse_line1 = मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च । | ||
| verse_lines = मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च ।;तपन्ति विविधांस्तापानैकात्म्यगतचेतसः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = तपन्ति विविधांस्तापानैकात्म्यगतचेतसः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = तपन्ति विविधांस्तापानैकात्म्यगतचेतसः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 10,106: | Line 10,696: | ||
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| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;विदित्वाऽर्थं कपिलो मातुरित्थं;जातस्नेहो यत्र तन्वाऽभिजातः ।;तत्त्वाऽम्नायं यत् प्रवदन्ति साङ्ख्यं;प्रावोचद् वै भक्तिवितानयोगम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = विदित्वाऽर्थं कपिलो मातुरित्थं | | verse_line2 = विदित्वाऽर्थं कपिलो मातुरित्थं | ||
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| Line 10,124: | Line 10,715: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् ।;सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् । | | verse_line2 = देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,142: | Line 10,734: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । | | verse_line1 = अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । | ||
| verse_lines = अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।;जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 10,160: | Line 10,753: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैकात्म्यतां मे स्पृहयन्ति केचिन्- | | verse_line1 = नैकात्म्यतां मे स्पृहयन्ति केचिन्- | ||
| verse_lines = नैकात्म्यतां मे स्पृहयन्ति केचिन्-;मत्पादसेवाभिरता मदीहाः ।;येऽन्योन्यतो भागवताः प्रसज्य;सम्भाजयन्ते मम पौरुषाणि ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्पादसेवाभिरता मदीहाः । | | verse_line2 = मत्पादसेवाभिरता मदीहाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,178: | Line 10,772: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपा | | verse_line1 = न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपा | ||
| verse_lines = न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपा;नङ्क्षयन्ति मे नोऽनिमिषो लेढि हेतिः ।;येषामहं प््रिाय आत्मा सुतश्च;सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = नङ्क्षयन्ति मे नोऽनिमिषो लेढि हेतिः । | | verse_line2 = नङ्क्षयन्ति मे नोऽनिमिषो लेढि हेतिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,200: | Line 10,795: | ||
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| verse_line1 = न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः । | | verse_line1 = न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः । | ||
| verse_lines = न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः ।;निमित्तैरात्ततद्धर्मा यथा स्वप्ने तदीक्षिता ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = निमित्तैरात्ततद्धर्मा यथा स्वप्ने तदीक्षिता ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = निमित्तैरात्ततद्धर्मा यथा स्वप्ने तदीक्षिता ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,218: | Line 10,814: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः । | | verse_line1 = स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः । | ||
| verse_lines = स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः ।;यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,236: | Line 10,833: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः । | | verse_line1 = गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः । | ||
| verse_lines = गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः ।;विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,254: | Line 10,852: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् । | | verse_line1 = एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् । | ||
| verse_lines = एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् ।;कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,272: | Line 10,871: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् । | | verse_line1 = तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् । | ||
| verse_lines = तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् ।;भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,290: | Line 10,890: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । | | verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । | ||
| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।;भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषः प्रकृतेः परः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषः प्रकृतेः परः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषः प्रकृतेः परः ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,308: | Line 10,909: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।;प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । | | verse_line2 = यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,326: | Line 10,928: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः । | | verse_line1 = मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः । | ||
| verse_lines = मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः ।;चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,344: | Line 10,947: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि । | | verse_line1 = एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि । | ||
| verse_lines = एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि ।;सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,362: | Line 10,966: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् । | | verse_line1 = प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् । | ||
| verse_lines = प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् ।;अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,380: | Line 10,985: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् । | | verse_line1 = दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् । | ||
| verse_lines = दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् ।;आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,398: | Line 11,004: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः । | | verse_line1 = विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः । | ||
| verse_lines = विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः ।;स्वतेजसाऽपिबत् तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वतेजसाऽपिबत् तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = स्वतेजसाऽपिबत् तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 10,416: | Line 11,023: | ||
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| verse_line1 = यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् । | | verse_line1 = यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् । | ||
| verse_lines = यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् ।;यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,434: | Line 11,042: | ||
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| verse_line1 = स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः । | | verse_line1 = स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः । | ||
| verse_lines = स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः ।;वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथाऽपां प्रकृतिः परा ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथाऽपां प्रकृतिः परा ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथाऽपां प्रकृतिः परा ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् । | | verse_line1 = महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् । | ||
| verse_lines = महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् ।;क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः । | | verse_line1 = वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः । | ||
| verse_lines = वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः ।;तामसस्त्वर्थमात्रं च गुणव्यतिकरस्त्रिवृत् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = सहस्रशिरसं साक्षाद् यमनन्तं प्रचक्षते ।;संकर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = संकर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = संकर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_line1 = कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् । | | verse_line1 = कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् । | ||
| verse_lines = कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् ।;शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहंकृतेः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । | | verse_line1 = संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । | ||
| verse_lines = संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च ।;स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,542: | Line 11,157: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः । | | verse_line1 = तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः । | ||
| verse_lines = तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः ।;प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,560: | Line 11,176: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् । | | verse_line1 = तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् । | ||
| verse_lines = तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् ।;शब्दमात्रमभूत् तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दमात्रमभूत् तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = शब्दमात्रमभूत् तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,569: | Line 11,186: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च । | | verse_line1 = अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च । | ||
| verse_lines = अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च ।;तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३५ ॥ | ||
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| Line 10,587: | Line 11,205: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः । | | verse_line1 = नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः । | ||
| verse_lines = नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः ।;स्पर्शोऽभवत् ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्पर्शोऽभवत् ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = स्पर्शोऽभवत् ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 10,605: | Line 11,224: | ||
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| verse_line1 = चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः । | | verse_line1 = चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः । | ||
| verse_lines = चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः ।;सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 10,623: | Line 11,243: | ||
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| verse_line1 = द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च । | | verse_line1 = द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च । | ||
| verse_lines = द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च ।;तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ४१ ॥ | ||
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| Line 10,641: | Line 11,262: | ||
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| verse_line1 = क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् । | | verse_line1 = क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् । | ||
| verse_lines = क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् ।;तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४५ ॥ | ||
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| Line 10,659: | Line 11,281: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् । | | verse_line1 = भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् । | ||
| verse_lines = भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् ।;सर्वसत्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वसत्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = सर्वसत्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४८ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् । | | verse_line1 = ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् । | ||
| verse_lines = ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् ।;उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५४ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् । | | verse_line1 = हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् । | ||
| verse_lines = हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् ।;पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ६१ ॥ | |||
| verse_line2 = पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ६१ ॥ | | verse_line2 = पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ६१ ॥ | ||
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| Line 10,713: | Line 11,338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् । | | verse_line1 = अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् । | ||
| verse_lines = अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ।;मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरांपतिः ।;अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्त्यस्ततोऽभवत् ॥ ६४ ॥ | |||
| verse_line2 = मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरांपतिः । | | verse_line2 = मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरांपतिः । | ||
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| Line 10,731: | Line 11,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | | verse_line1 = विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | ||
| verse_lines = विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।;नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७० ॥ | |||
| verse_line2 = नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७० ॥ | | verse_line2 = नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७० ॥ | ||
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| Line 10,749: | Line 11,376: | ||
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| verse_line1 = बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | | verse_line1 = बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | ||
| verse_lines = बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।;रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७२ ॥ | |||
| verse_line2 = रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७२ ॥ | | verse_line2 = रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७२ ॥ | ||
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| Line 10,767: | Line 11,395: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा । | | verse_line1 = चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा । | ||
| verse_lines = चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा ।;विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७३ ॥ | |||
| verse_line2 = विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७३ ॥ | | verse_line2 = विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७३ ॥ | ||
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| Line 10,789: | Line 11,418: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रबुद्ध्य स्वप्नसुप्तिभ्यां संस्मरन्नात्मवैशसम् । | | verse_line1 = प्रबुद्ध्य स्वप्नसुप्तिभ्यां संस्मरन्नात्मवैशसम् । | ||
| verse_lines = प्रबुद्ध्य स्वप्नसुप्तिभ्यां संस्मरन्नात्मवैशसम् ।;वैतथ्यं व्यभिचारं च नासौ ध्यायेद् यतो भयम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = वैतथ्यं व्यभिचारं च नासौ ध्यायेद् यतो भयम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = वैतथ्यं व्यभिचारं च नासौ ध्यायेद् यतो भयम् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,807: | Line 11,437: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः । | | verse_line1 = निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः । | ||
| verse_lines = निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः ।;उपलभ्यात्मनात्मानं चक्षुषेवार्कमेकदृक् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = उपलभ्यात्मनात्मानं चक्षुषेवार्कमेकदृक् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = उपलभ्यात्मनात्मानं चक्षुषेवार्कमेकदृक् ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 10,825: | Line 11,456: | ||
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| verse_line1 = मुक्तलिङ्गः सदाभासमसति प्रतिपद्यते । | | verse_line1 = मुक्तलिङ्गः सदाभासमसति प्रतिपद्यते । | ||
| verse_lines = मुक्तलिङ्गः सदाभासमसति प्रतिपद्यते ।;सतो बन्धुं समं चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = सतो बन्धुं समं चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = सतो बन्धुं समं चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 10,843: | Line 11,475: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोगुणैः । | | verse_line1 = एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोगुणैः । | ||
| verse_lines = एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोगुणैः ।;स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 10,861: | Line 11,494: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया । | | verse_line1 = भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया । | ||
| verse_lines = भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया ।;लीनेषु सत्सु यस्तत्र विनिद्रो निरहङ्क्रियः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = लीनेषु सत्सु यस्तत्र विनिद्रो निरहङ्क्रियः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = लीनेषु सत्सु यस्तत्र विनिद्रो निरहङ्क्रियः ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,879: | Line 11,513: | ||
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| verse_line1 = मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा । | | verse_line1 = मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा । | ||
| verse_lines = मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा ।;नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,897: | Line 11,532: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते । | | verse_line1 = एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते । | ||
| verse_lines = एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते ।;साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,919: | Line 11,555: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।;मनो येनैव विधिना प्रपन्नं याति सत्पथम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । | | verse_line2 = योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,937: | Line 11,574: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । | | verse_line1 = स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । | ||
| verse_lines = स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।;वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,955: | Line 11,593: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । | | verse_line1 = तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । | ||
| verse_lines = तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।;विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 10,973: | Line 11,612: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत | | verse_line1 = कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत | ||
| verse_lines = कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत;दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।;मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां;चैत्त्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन । | | verse_line2 = दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन । | ||
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| Line 10,991: | Line 11,631: | ||
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| verse_line1 = यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं | | verse_line1 = यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं | ||
| verse_lines = यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं;भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।;मीनद्वयश्रियमधिक्षिपदब्जनेत्रं;ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् । | | verse_line2 = भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् । | ||
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| Line 11,009: | Line 11,650: | ||
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| verse_line1 = ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ- | | verse_line1 = ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ- | ||
| verse_lines = ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ-;भासाऽरुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति ।;ध्यायेत् स्वहृत्कुहरकेऽवसितस्य विष्णो-;र्भक्त्याऽऽर्द्रयाऽर्पितमना न पृथग् दिदृक्षेत् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = भासाऽरुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति । | | verse_line2 = भासाऽरुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति । | ||
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| Line 11,027: | Line 11,669: | ||
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| verse_line1 = एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो | | verse_line1 = एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो | ||
| verse_lines = एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो;भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकप्रमोदः ।;औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान-;स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकप्रमोदः । | | verse_line2 = भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकप्रमोदः । | ||
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| Line 11,045: | Line 11,688: | ||
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| verse_line1 = मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तं | | verse_line1 = मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तं | ||
| verse_lines = मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तं;निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः ।;आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक-;मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः । | | verse_line2 = निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,063: | Line 11,707: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या | | verse_line1 = सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या | ||
| verse_lines = सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या;तस्मिन् महिम््नयवसितः सुखदुःखबाह्ये ।;हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्न;स्वात्मन् विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मिन् महिम््नयवसितः सुखदुःखबाह्ये । | | verse_line2 = तस्मिन् महिम््नयवसितः सुखदुःखबाह्ये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,081: | Line 11,726: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । | | verse_line1 = सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । | ||
| verse_lines = सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।;ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,099: | Line 11,745: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् । | | verse_line1 = तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् । | ||
| verse_lines = तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् ।;दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,121: | Line 11,768: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवहूतिरुवाच– | | verse_line1 = देवहूतिरुवाच– | ||
| verse_lines = देवहूतिरुवाच–;लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च ।;स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत् पारमार्थिकम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च । | | verse_line2 = लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च । | ||
}} | }} | ||
| Line 11,130: | Line 11,778: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत् प्रचक्षते । | | verse_line1 = यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत् प्रचक्षते । | ||
| verse_lines = यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत् प्रचक्षते ।;भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २ ॥ | | verse_line2 = भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २ ॥ | ||
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| Line 11,148: | Line 11,797: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव च । | | verse_line1 = विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव च । | ||
| verse_lines = विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव च ।;अर्चादावर्चयेद् यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अर्चादावर्चयेद् यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अर्चादावर्चयेद् यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,166: | Line 11,816: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् । | | verse_line1 = कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् । | ||
| verse_lines = कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।;यजेद् यष्टव्यमिति वाऽपृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = यजेद् यष्टव्यमिति वाऽपृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = यजेद् यष्टव्यमिति वाऽपृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १० ॥ | ||
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| Line 11,184: | Line 11,835: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्चादावर्चयेत् तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् । | | verse_line1 = अर्चादावर्चयेत् तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् । | ||
| verse_lines = अर्चादावर्चयेत् तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।;यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,202: | Line 11,854: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् । | | verse_line1 = आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् । | ||
| verse_lines = आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।;तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विधत्ते भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विधत्ते भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विधत्ते भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,220: | Line 11,873: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे । | | verse_line1 = जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे । | ||
| verse_lines = जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे ।;ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,229: | Line 11,883: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः । | | verse_line1 = अत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः । | ||
| verse_lines = अत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः ।;तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,238: | Line 11,893: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः । | | verse_line1 = रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः । | ||
| verse_lines = रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः ।;तेषां बहुपदः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = तेषां बहुपदः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = तेषां बहुपदः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,247: | Line 11,903: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः । | | verse_line1 = ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः । | ||
| verse_lines = ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः ।;ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,256: | Line 11,913: | ||
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| verse_line1 = अर्थज्ञात् संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वधर्मकृत् । | | verse_line1 = अर्थज्ञात् संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वधर्मकृत् । | ||
| verse_lines = अर्थज्ञात् संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वधर्मकृत् ।;मुक्तसङ्गस्ततो भूयान् न दोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = मुक्तसङ्गस्ततो भूयान् न दोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = मुक्तसङ्गस्ततो भूयान् न दोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,265: | Line 11,923: | ||
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| verse_line1 = तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मरतिर्नरः । | | verse_line1 = तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मरतिर्नरः । | ||
| verse_lines = तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मरतिर्नरः ।;मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः ।;न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः । | | verse_line2 = मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,283: | Line 11,942: | ||
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| verse_line1 = मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् । | | verse_line1 = मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् । | ||
| verse_lines = मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् ।;ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,301: | Line 11,961: | ||
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| verse_line1 = भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः । | | verse_line1 = भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः । | ||
| verse_lines = भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः ।;ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,319: | Line 11,980: | ||
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| verse_line1 = यत् तद् भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः । | | verse_line1 = यत् तद् भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः । | ||
| verse_lines = यत् तद् भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः ।;परं प्रधानात् पुरुषाद् दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = परं प्रधानात् पुरुषाद् दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = परं प्रधानात् पुरुषाद् दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 11,337: | Line 11,999: | ||
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| verse_line1 = रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते । | | verse_line1 = रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते । | ||
| verse_lines = रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।;भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 11,355: | Line 12,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः । | | verse_line1 = न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः । | ||
| verse_lines = न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः ।;आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,377: | Line 12,041: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तदा । | | verse_line1 = एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तदा । | ||
| verse_lines = एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तदा ।;नाद्रियन्ते यथापूर्वं कीनाश इव गोजरम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = नाद्रियन्ते यथापूर्वं कीनाश इव गोजरम् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = नाद्रियन्ते यथापूर्वं कीनाश इव गोजरम् ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,395: | Line 12,060: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वायुनोत्क्रमतोत्तारकफसंरुद्धनासिकः । | | verse_line1 = वायुनोत्क्रमतोत्तारकफसंरुद्धनासिकः । | ||
| verse_lines = वायुनोत्क्रमतोत्तारकफसंरुद्धनासिकः ।;कासश्वासकृतायासः कण्ठो घुरुघुरायते ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = कासश्वासकृतायासः कण्ठो घुरुघुरायते ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = कासश्वासकृतायासः कण्ठो घुरुघुरायते ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,413: | Line 12,079: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योजनानां सहस्राणि नवतिर्नव चाध्वनः । | | verse_line1 = योजनानां सहस्राणि नवतिर्नव चाध्वनः । | ||
| verse_lines = योजनानां सहस्राणि नवतिर्नव चाध्वनः ।;त्रिभिर्मुहूर्तैर्द्वाभ्यां वा नीतः प्राप्नोति यातनाम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रिभिर्मुहूर्तैर्द्वाभ्यां वा नीतः प्राप्नोति यातनाम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = त्रिभिर्मुहूर्तैर्द्वाभ्यां वा नीतः प्राप्नोति यातनाम् ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,431: | Line 12,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते । | | verse_line1 = अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते । | ||
| verse_lines = अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते ।;या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिताः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिताः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिताः ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,453: | Line 12,121: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| verse_lines = भगवानुवाच–;कलिलं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् ।;दशाहेन तु कर्कन्धुः पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = कलिलं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् । | | verse_line2 = कलिलं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,471: | Line 12,140: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाथमानो ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः । | | verse_line1 = नाथमानो ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः । | ||
| verse_lines = नाथमानो ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः ।;स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,489: | Line 12,159: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं यदेतददधात् कतमः स देव- | | verse_line1 = ज्ञानं यदेतददधात् कतमः स देव- | ||
| verse_lines = ज्ञानं यदेतददधात् कतमः स देव-;स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः ।;तं जीवकर्मपदवीमनुवर्तमाना-;स्तापत्रयोपशमनाय वयं भजेम ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः । | | verse_line2 = स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,507: | Line 12,178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः | | verse_line1 = पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः | ||
| verse_lines = पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः;शारीरभेदमशरीरवदस्य देहे ।;यद्दत्तया स तमहं पुरुषं पुराणं;पश्ये बहिर्हृदि च चैत्त्यमिव प्रतीतम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = शारीरभेदमशरीरवदस्य देहे । | | verse_line2 = शारीरभेदमशरीरवदस्य देहे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,525: | Line 12,197: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मावसायिषु । | | verse_line1 = तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मावसायिषु । | ||
| verse_lines = तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मावसायिषु ।;सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 11,543: | Line 12,216: | ||
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| verse_line1 = तत्सृष्टिसृष्टसृष्टेषु कोन्वखण्डितधीः पुमान् । | | verse_line1 = तत्सृष्टिसृष्टसृष्टेषु कोन्वखण्डितधीः पुमान् । | ||
| verse_lines = तत्सृष्टिसृष्टसृष्टेषु कोन्वखण्डितधीः पुमान् ।;ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३९ ॥ | ||
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| verse_line1 = बलं मे पश्य मायायाः | | verse_line1 = बलं मे पश्य मायायाः | ||
| verse_lines = बलं मे पश्य मायायाः;स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् ।;या करोति निजायत्तान्;भ्रूविजृम्भेण केवलम् ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् । | | verse_line2 = स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 11,570: | Line 12,245: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सङ्गं न कुर्यात् प्रमदासु जातु | | verse_line1 = सङ्गं न कुर्यात् प्रमदासु जातु | ||
| verse_lines = सङ्गं न कुर्यात् प्रमदासु जातु;योगस्य पारं परमारुरुक्षुः ।;मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो;वदन्ति यां निरयद्वारमस्य ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = योगस्य पारं परमारुरुक्षुः । | | verse_line2 = योगस्य पारं परमारुरुक्षुः । | ||
}} | }} | ||
| Line 11,579: | Line 12,255: | ||
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| verse_line1 = योपयाति शनैर्माया योषिद् देवविनिर्मिता । | | verse_line1 = योपयाति शनैर्माया योषिद् देवविनिर्मिता । | ||
| verse_lines = योपयाति शनैर्माया योषिद् देवविनिर्मिता ।;तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ ४२ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् । | | verse_line1 = देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् । | ||
| verse_lines = देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् ।;भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ ४५ ॥ | ||
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| Line 11,615: | Line 12,293: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा । | | verse_line1 = यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा । | ||
| verse_lines = यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा ।;तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वं योग्यताऽनयोः ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वं योग्यताऽनयोः ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वं योग्यताऽनयोः ॥ ४८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,633: | Line 12,312: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मनः केवलं ज्ञानमर्थो देहाद्यसङ्गिनः । | | verse_line1 = आत्मनः केवलं ज्ञानमर्थो देहाद्यसङ्गिनः । | ||
| verse_lines = आत्मनः केवलं ज्ञानमर्थो देहाद्यसङ्गिनः ।;सुखदुःखादयो भावा न देहस्य न चात्मनः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = सुखदुःखादयो भावा न देहस्य न चात्मनः ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = सुखदुःखादयो भावा न देहस्य न चात्मनः ॥ ५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,655: | Line 12,335: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तच्छ्रद्धयाक्राऽऽन्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् । | | verse_line1 = तच्छ्रद्धयाक्राऽऽन्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् । | ||
| verse_lines = तच्छ्रद्धयाक्राऽऽन्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् ।;गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,673: | Line 12,354: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः । | | verse_line1 = आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः । | ||
| verse_lines = आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः ।;योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,682: | Line 12,364: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा । | | verse_line1 = भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा । | ||
| verse_lines = भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा ।;कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,691: | Line 12,374: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना । | | verse_line1 = स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना । | ||
| verse_lines = स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना ।;जातेऽगुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = जातेऽगुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = जातेऽगुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,709: | Line 12,393: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् । | | verse_line1 = ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् । | ||
| verse_lines = ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् ।;निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरेऽसति ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरेऽसति ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरेऽसति ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,727: | Line 12,412: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः । | | verse_line1 = ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः । | ||
| verse_lines = ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः ।;कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,736: | Line 12,422: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः । | | verse_line1 = रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः । | ||
| verse_lines = रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः ।;पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,745: | Line 12,432: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः । | | verse_line1 = त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः । | ||
| verse_lines = त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः ।;कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,754: | Line 12,442: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् । | | verse_line1 = नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् । | ||
| verse_lines = नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् ।;हित्वा शृृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = हित्वा शृृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = हित्वा शृृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,763: | Line 12,452: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते । | | verse_line1 = दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते । | ||
| verse_lines = दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते ।;प्रजायां तु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजायां तु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = प्रजायां तु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,772: | Line 12,462: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति । | | verse_line1 = ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति । | ||
| verse_lines = ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति ।;पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,790: | Line 12,481: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् । | | verse_line1 = ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् । | ||
| verse_lines = ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् ।;अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणाम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणाम् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणाम् ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,808: | Line 12,500: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् । | | verse_line1 = यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् । | ||
| verse_lines = यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् ।;एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद् यतः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद् यतः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद् यतः ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,826: | Line 12,519: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः । | | verse_line1 = ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः । | ||
| verse_lines = ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः ।;द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,848: | Line 12,542: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवहूतिरुवाच– | | verse_line1 = देवहूतिरुवाच– | ||
| verse_lines = देवहूतिरुवाच–;अथाप्ययान्ते सलिले शयानं भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते ।;गुणप्रवाहं सदशेषबीजं दध्यौ स्वयं यज्जठराब्जजातः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अथाप्ययान्ते सलिले शयानं भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते । | | verse_line2 = अथाप्ययान्ते सलिले शयानं भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,866: | Line 12,561: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये । | | verse_line1 = त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये । | ||
| verse_lines = त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये ।;यथावतारास्तव सूकरादयस्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = यथावतारास्तव सूकरादयस्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = यथावतारास्तव सूकरादयस्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,884: | Line 12,580: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये । | | verse_line1 = ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये । | ||
| verse_lines = ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये ।;निवृत्तजीवोपाधित्वात् वीतक्लेशाप्तनिर्वृतिः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = निवृत्तजीवोपाधित्वात् वीतक्लेशाप्तनिर्वृतिः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = निवृत्तजीवोपाधित्वात् वीतक्लेशाप्तनिर्वृतिः ॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,893: | Line 12,590: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नित्यरूढसमाधित्वात् परावृत्तगुणभ्रमा । | | verse_line1 = नित्यरूढसमाधित्वात् परावृत्तगुणभ्रमा । | ||
| verse_lines = नित्यरूढसमाधित्वात् परावृत्तगुणभ्रमा ।;न सस्मार तदात्मानं स्वप्नदृष्टमिवोत्थितः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = न सस्मार तदात्मानं स्वप्नदृष्टमिवोत्थितः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = न सस्मार तदात्मानं स्वप्नदृष्टमिवोत्थितः ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,919: | Line 12,617: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे ।;आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे । | | verse_line2 = मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,937: | Line 12,636: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । | | verse_line1 = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । | ||
| verse_lines = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।;प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,946: | Line 12,646: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना । | | verse_line1 = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना । | ||
| verse_lines = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।;निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 11,955: | Line 12,656: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । | | verse_line1 = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । | ||
| verse_lines = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।;वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,973: | Line 12,675: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवा ऊचुः– | | verse_line1 = देवा ऊचुः– | ||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।;तत्संकल्पस्य ते ब्रह्मन् यद् वै ध्यायसि ते वयम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । | | verse_line2 = यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 11,991: | Line 12,694: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । | | verse_line1 = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । | ||
| verse_lines = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।;दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,009: | Line 12,713: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् । | | verse_line1 = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् । | ||
| verse_lines = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।;मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,018: | Line 12,723: | ||
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| verse_line1 = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् । | | verse_line1 = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् । | ||
| verse_lines = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।;देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = देवा ऊचुः– | | verse_line1 = देवा ऊचुः– | ||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं;खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।;एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाऽद्य;प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं | | verse_line2 = यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं | ||
}} | }} | ||
| Line 12,036: | Line 12,743: | ||
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| verse_line1 = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ । | | verse_line1 = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ । | ||
| verse_lines = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।;भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | |||
| verse_line2 = भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | | verse_line2 = भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,054: | Line 12,762: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । | | verse_line1 = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । | ||
| verse_lines = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।;अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | | verse_line2 = अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,076: | Line 12,785: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नन्दिरुवाच– | | verse_line1 = नन्दिरुवाच– | ||
| verse_lines = नन्दिरुवाच–;य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।;द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि । | | verse_line2 = य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि । | ||
}} | }} | ||
| Line 12,085: | Line 12,795: | ||
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| verse_line1 = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया । | | verse_line1 = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया । | ||
| verse_lines = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।;कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,094: | Line 12,805: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः । | | verse_line1 = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः । | ||
| verse_lines = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।;स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,103: | Line 12,815: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः । | | verse_line1 = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः । | ||
| verse_lines = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।;संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 12,121: | Line 12,834: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा । | | verse_line1 = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा । | ||
| verse_lines = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।;मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 12,143: | Line 12,857: | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं | | verse_line1 = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं | ||
| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं;यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।;सत्त्वं च यस्मिन् भगवान् वासुदेवो;ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = यदीयते तत्र पुमानपावृतः । | | verse_line2 = यदीयते तत्र पुमानपावृतः । | ||
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| Line 12,165: | Line 12,880: | ||
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| verse_line1 = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि- | | verse_line1 = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि- | ||
| verse_lines = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-;र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।;लोकस्य यद् वर्षति चाशिषोऽर्थिनः;तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः । | | verse_line2 = र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,183: | Line 12,899: | ||
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| verse_line1 = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये | | verse_line1 = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये | ||
| verse_lines = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये;ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।;तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-;र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने । | | verse_line2 = ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,201: | Line 12,918: | ||
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| verse_line1 = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत | | verse_line1 = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत | ||
| verse_lines = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत;वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् ।;विरोधि तद् यौगपदेककर्तरि;द्वयं यथाऽऽब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् । | | verse_line2 = वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् । | ||
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| Line 12,223: | Line 12,941: | ||
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| verse_line1 = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं | | verse_line1 = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं | ||
| verse_lines = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं;जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् ।;ददर्श देहे हतकल्मषा सती;सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् । | | verse_line2 = जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् । | ||
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| Line 12,245: | Line 12,964: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना । | | verse_line1 = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना । | ||
| verse_lines = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।;छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,254: | Line 12,974: | ||
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| verse_line1 = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः । | | verse_line1 = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः । | ||
| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः ।;विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,263: | Line 12,984: | ||
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| verse_line1 = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे । | | verse_line1 = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे ।;यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः । | | verse_line1 = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः । | ||
| verse_lines = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः ।;तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 12,294: | Line 13,017: | ||
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| verse_line1 = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः । | | verse_line1 = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः । | ||
| verse_lines = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।;नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 12,312: | Line 13,036: | ||
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| verse_line1 = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये | | verse_line1 = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये | ||
| verse_lines = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये;ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।;विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा;तस्यात्मतन्त्रस्य क उद्विधित्सेत् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् । | | verse_line2 = ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् । | ||
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| Line 12,330: | Line 13,055: | ||
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| verse_line1 = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः । | | verse_line1 = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः । | ||
| verse_lines = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।;ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 12,348: | Line 13,074: | ||
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| verse_line1 = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं | | verse_line1 = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं | ||
| verse_lines = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं;सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि ।;उत्थाय चक्रे शिरसाऽभिवन्दनं;महत्तमोऽर्कस्य यथैव विष्णोः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि । | | verse_line2 = सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,366: | Line 13,093: | ||
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| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| verse_lines = ब्रह्मोवाच–;जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः ।;शक्तेः शिवस्य च परं यत् तद् ब्रह्म निरन्तरम् ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः । | | verse_line2 = जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः । | ||
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| Line 12,384: | Line 13,112: | ||
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| verse_line1 = त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः । | | verse_line1 = त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः । | ||
| verse_lines = त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः ।;विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडयोर्णपदो यथा ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडयोर्णपदो यथा ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडयोर्णपदो यथा ॥ ४३ ॥ | ||
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| Line 12,402: | Line 13,131: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमेव धर्मार्थदुघाऽभिपत्तये | | verse_line1 = त्वमेव धर्मार्थदुघाऽभिपत्तये | ||
| verse_lines = त्वमेव धर्मार्थदुघाऽभिपत्तये;दक्षेण सूत्रेण विसर्जिताध्वरः ।;त्वयैव लोकेऽवसिताश्च सेतवो;यान् ब्राह्मणाः श्रद्धधते धृतव्रताः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = दक्षेण सूत्रेण विसर्जिताध्वरः । | | verse_line2 = दक्षेण सूत्रेण विसर्जिताध्वरः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,420: | Line 13,150: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनां | | verse_line1 = न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनां | ||
| verse_lines = न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनां;भूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव ।;भूतानि चात्मन्यपृथग् दिदृक्षतां;प्रायेण रोषोऽभिभवेद् यथा पशोः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव । | | verse_line2 = भूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,438: | Line 13,169: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया | | verse_line1 = येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया | ||
| verse_lines = येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया;दुर्लङ्ध्यया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः ।;कुर्वन्ति तत्र ह्यनुकम्पया कृपां;न साधवो दैवबलात्कृताः कथम् ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = दुर्लङ्ध्यया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः । | | verse_line2 = दुर्लङ्ध्यया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,456: | Line 13,188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भवान् हि पुंसः परमस्य मायया | | verse_line1 = भवान् हि पुंसः परमस्य मायया | ||
| verse_lines = भवान् हि पुंसः परमस्य मायया;दुरन्तयाऽस्पृष्टमतिः समस्तदृक् ।;तया हतात्मस्वनुकर्मचेत-;स्स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हति प्रभो ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = दुरन्तयाऽस्पृष्टमतिः समस्तदृक् । | | verse_line2 = दुरन्तयाऽस्पृष्टमतिः समस्तदृक् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,478: | Line 13,211: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः । | | verse_line1 = अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः । | ||
| verse_lines = अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः ।;यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,496: | Line 13,230: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दक्ष उवाच– | | verse_line1 = दक्ष उवाच– | ||
| verse_lines = दक्ष उवाच–;शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं;चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् ।;तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्या-;मास्ते भवानपरिशुद्धमिवामनन्ति ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं | | verse_line2 = शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,514: | Line 13,249: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋत्विज ऊचुः– | | verse_line1 = ऋत्विज ऊचुः– | ||
| verse_lines = ऋत्विज ऊचुः–;तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात्;कर्मण्यवग्रहधियो भगवन् विदामः ।;धर्मोपलक्षणमिदं त्रिवृदध्वराख्यं;ज्ञातं यदर्थमधिदैवमदस्त्वमास्थाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात् | | verse_line2 = तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात् | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,532: | Line 13,268: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रुद्र उवाच– | | verse_line1 = रुद्र उवाच– | ||
| verse_lines = रुद्र उवाच–;तव वरद वराड्घ्रावाशिषा चानभिध्ये;ह्यपि मुनिभिरसक्तैरादरेणार्हणीये ।;यदि रचितधियं मां विद्धि लोकापविद्धं;जगति न गणयेयं त्वत्परानुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = तव वरद वराड्घ्रावाशिषा चानभिध्ये | | verse_line2 = तव वरद वराड्घ्रावाशिषा चानभिध्ये | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,550: | Line 13,287: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ- | | verse_line1 = नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ- | ||
| verse_lines = नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ-;भेदग्रहः पुरुषो यावदीक्षेत् ।;ज्ञानस्य चार्थस्य गुणस्य चाश्रया-;न्मायामयाद् व्यतिरिक्तो यतस्त्वम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = भेदग्रहः पुरुषो यावदीक्षेत् । | | verse_line2 = भेदग्रहः पुरुषो यावदीक्षेत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,568: | Line 13,306: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषय ऊचुः – | | verse_line1 = ऋषय ऊचुः – | ||
| verse_lines = ऋषय ऊचुः –;अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं;यदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे ।;विभूतयो यत उपसेदुरीश्वरा-;न्न मन्यते स्वयमनुवर्तिनीं भवान् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं | | verse_line2 = अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,586: | Line 13,325: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = लोकपाला ऊचुः– | | verse_line1 = लोकपाला ऊचुः– | ||
| verse_lines = लोकपाला ऊचुः–;दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं;प्रत्यग्दृष्ट्या दृश्यते येन विश्वम् ।;माया ह्येषा भवदीया हि भूमन्;यस्त्वं षष्ठः पञ्चभिर्भासि भूतैः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं | | verse_line2 = दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,604: | Line 13,344: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योगेश्वरा ऊचुः– | | verse_line1 = योगेश्वरा ऊचुः– | ||
| verse_lines = योगेश्वरा ऊचुः–;प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमृतप्रिय प्रभो;विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग् य आत्मनः ।;अथापि भृत्येश तयोपधावता-;मनन्यवृत्त्याऽनुगृहाण वत्सल ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमृतप्रिय प्रभो | | verse_line2 = प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमृतप्रिय प्रभो | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,622: | Line 13,363: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलया | | verse_line1 = जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलया | ||
| verse_lines = जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलया;प्रविभज्यमानगुणयाऽऽत्ममायया ।;रचितात्मभेदमतये स्वसंस्थया;ह्यतिवर्तितभ्रमगुणात्मने नमः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रविभज्यमानगुणयाऽऽत्ममायया । | | verse_line2 = प्रविभज्यमानगुणयाऽऽत्ममायया । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,640: | Line 13,382: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्निरुवाच– | | verse_line1 = अग्निरुवाच– | ||
| verse_lines = अग्निरुवाच–;यत्तेजसाऽहं सुसमिद्धतेजा;हव्यं वहाम्यध्वर आज्यसिक्तम् ।;तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभिः;स्विष्टं यजुर्भिः प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्तेजसाऽहं सुसमिद्धतेजा | | verse_line2 = यत्तेजसाऽहं सुसमिद्धतेजा | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,658: | Line 13,401: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्राह्मणा ऊचुः– | | verse_line1 = ब्राह्मणा ऊचुः– | ||
| verse_lines = ब्राह्मणा ऊचुः–;त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं;त्वं हि मन्त्राः समिद् दर्भपात्राणि च ।;त्वं सदस्यर्त्विजो दम्पती देवता;अग्निहोत्रं स्वधा सोम आज्यं पशुः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं | | verse_line2 = त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,676: | Line 13,420: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच–;अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् ।;आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयंदृगविशेषणः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् । | | verse_line2 = अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,694: | Line 13,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि । | | verse_line1 = तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि । | ||
| verse_lines = तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि ।;देहात्मबुद्धिर्भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = देहात्मबुद्धिर्भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = देहात्मबुद्धिर्भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,712: | Line 13,458: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् । | | verse_line1 = त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् । | ||
| verse_lines = त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् ।;सर्वभूतात्मना ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभूतात्मना ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = सर्वभूतात्मना ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,730: | Line 13,477: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् ।;अर्चित्वा क्रतुना स्वेन देवानुभयतोऽयजत् ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् । | | verse_line2 = एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,748: | Line 13,496: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम् | | verse_line1 = अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम् | ||
| verse_lines = अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम्;एतद् भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः ।;श्रुतं भागवताच्छिष्यादुद्धवान्मे बृहस्पतेः ॥ ५९ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद् भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः । | | verse_line2 = एतद् भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः । | ||
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| Line 12,766: | Line 13,515: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने । | | verse_line1 = पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने । | ||
| verse_lines = पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने ।;कुमारोऽभूत् ततस्तस्मै स्तनं षट् कृत्तिका ददुः ॥ ६३ ॥ | |||
| verse_line2 = कुमारोऽभूत् ततस्तस्मै स्तनं षट् कृत्तिका ददुः ॥ ६३ ॥ | | verse_line2 = कुमारोऽभूत् ततस्तस्मै स्तनं षट् कृत्तिका ददुः ॥ ६३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 12,775: | Line 13,525: | ||
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| verse_line1 = षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् । | | verse_line1 = षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् । | ||
| verse_lines = षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् ।;ततश्चक्रुः सैन्यपालं सर्वासुरभयंकरम् ॥ ६४ ॥ | |||
| verse_line2 = ततश्चक्रुः सैन्यपालं सर्वासुरभयंकरम् ॥ ६४ ॥ | | verse_line2 = ततश्चक्रुः सैन्यपालं सर्वासुरभयंकरम् ॥ ६४ ॥ | ||
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| Line 12,797: | Line 13,548: | ||
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| verse_line1 = अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह । | | verse_line1 = अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह । | ||
| verse_lines = अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह ।;स्वायंभुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मनः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वायंभुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मनः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = स्वायंभुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मनः ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 12,815: | Line 13,567: | ||
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| verse_line1 = प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ । | | verse_line1 = प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ । | ||
| verse_lines = प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ ।;वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगतः स्थितौ ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगतः स्थितौ ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगतः स्थितौ ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 12,833: | Line 13,586: | ||
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| verse_line1 = विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः । | | verse_line1 = विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः । | ||
| verse_lines = विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः ।;पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोका निजकर्मभिः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोका निजकर्मभिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोका निजकर्मभिः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 12,851: | Line 13,605: | ||
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| verse_line1 = स्मयमानमभिध्यायेत् सानुरागावलोकनम् । | | verse_line1 = स्मयमानमभिध्यायेत् सानुरागावलोकनम् । | ||
| verse_lines = स्मयमानमभिध्यायेत् सानुरागावलोकनम् ।;नियमेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = नियमेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = नियमेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५४ ॥ | ||
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| Line 12,869: | Line 13,624: | ||
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| verse_line1 = परिचर्या भगवतो यावतीः पूर्वसेविताः । | | verse_line1 = परिचर्या भगवतो यावतीः पूर्वसेविताः । | ||
| verse_lines = परिचर्या भगवतो यावतीः पूर्वसेविताः ।;ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ६१ ॥ | |||
| verse_line2 = ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ६१ ॥ | | verse_line2 = ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ६१ ॥ | ||
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| Line 12,887: | Line 13,643: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः । | | verse_line1 = सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः । | ||
| verse_lines = सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः ।;एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ७२ ॥ | |||
| verse_line2 = एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ७२ ॥ | | verse_line2 = एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ७२ ॥ | ||
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| Line 12,905: | Line 13,662: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् । | | verse_line1 = तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् । | ||
| verse_lines = तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।;समाहितः पर्यचरद् दृष्ट्याऽऽदेशेन पूरुषम् ॥ ७४ ॥ | |||
| verse_line2 = समाहितः पर्यचरद् दृष्ट्याऽऽदेशेन पूरुषम् ॥ ७४ ॥ | | verse_line2 = समाहितः पर्यचरद् दृष्ट्याऽऽदेशेन पूरुषम् ॥ ७४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,923: | Line 13,681: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया । | | verse_line1 = देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया । | ||
| verse_lines = देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया ।;सर्पेभसिंहकूष्माण्डैस्तान् नापश्यत् परं गतः ॥ ८० ॥ | |||
| verse_line2 = सर्पेभसिंहकूष्माण्डैस्तान् नापश्यत् परं गतः ॥ ८० ॥ | | verse_line2 = सर्पेभसिंहकूष्माण्डैस्तान् नापश्यत् परं गतः ॥ ८० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,941: | Line 13,700: | ||
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| verse_line1 = सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाश्रयम् । | | verse_line1 = सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाश्रयम् । | ||
| verse_lines = सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाश्रयम् ।;ध्यायन् भगवतो रूपं नाद्राक्षीत् किञ्चनापरम् ॥ ८१ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यायन् भगवतो रूपं नाद्राक्षीत् किञ्चनापरम् ॥ ८१ ॥ | | verse_line2 = ध्यायन् भगवतो रूपं नाद्राक्षीत् किञ्चनापरम् ॥ ८१ ॥ | ||
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| Line 12,959: | Line 13,719: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो | | verse_line1 = तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो | ||
| verse_lines = तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो;द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया ।;लोका निरुच्छ्वासनिपीडिता भृशं;सलोकपालाः शरणं ययुर्हरिम् ॥ ८४ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया । | | verse_line2 = द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,977: | Line 13,738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवा ऊचुः– | | verse_line1 = देवा ऊचुः– | ||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं;चराचरस्याखिलसत्वधाम्नः ।;विधेहि तन्नो वृजिनाद् विमोक्षं;प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥ ८५ ॥ | |||
| verse_line2 = नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं | | verse_line2 = नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 12,999: | Line 13,761: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- | | verse_line1 = या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- | ||
| verse_lines = या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-;ध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।;सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्;किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । | | verse_line2 = ध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,017: | Line 13,780: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीशमाद्यं | | verse_line1 = ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीशमाद्यं | ||
| verse_lines = ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीशमाद्यं;स्वान् संपदः सुतसुहृद्गृहवित्तदारान् ।;ये त्वब्जनाभभवदीयपदारविन्द-;सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गाः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वान् संपदः सुतसुहृद्गृहवित्तदारान् । | | verse_line2 = स्वान् संपदः सुतसुहृद्गृहवित्तदारान् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,035: | Line 13,799: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- | | verse_line1 = तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- | ||
| verse_lines = तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-;मर्त्यादिभिर्विरचितं सदसद्विशेषम् ।;रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यशेषं;नातः परं परम वेद्मि न यत्र वाचः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = मर्त्यादिभिर्विरचितं सदसद्विशेषम् । | | verse_line2 = मर्त्यादिभिर्विरचितं सदसद्विशेषम् । | ||
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| Line 13,053: | Line 13,818: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्ध आत्मा | | verse_line1 = त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्ध आत्मा | ||
| verse_lines = त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्ध आत्मा;कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः ।;यद्बुध्द्यवस्थितमखण्डितया स्वबुद्ध्या;दृष्ट्वाऽऽस्थिता वधिमतो व्यतिरिक्त आस्से ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः । | | verse_line2 = कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः । | ||
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| Line 13,071: | Line 13,837: | ||
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| verse_line1 = यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं पतन्ति | | verse_line1 = यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं पतन्ति | ||
| verse_lines = यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं पतन्ति;विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्या ।;तद् ब्रह्म विश्वभवमेकमविश्वमाद्य-;मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्या । | | verse_line2 = विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्या । | ||
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| verse_line1 = सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादमूल- | | verse_line1 = सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादमूल- | ||
| verse_lines = सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादमूल-;माशिष्टयोऽनुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः ।;अप्येवमार्य भगवान् परिपाति दीनान्;वास्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = माशिष्टयोऽनुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । | | verse_line2 = माशिष्टयोऽनुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 13,098: | Line 13,866: | ||
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| verse_line1 = तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥ | ||
| verse_lines = तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 13,115: | Line 13,884: | ||
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| verse_line1 = दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् । | | verse_line1 = दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् । | ||
| verse_lines = दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।;तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_line1 = भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः । | | verse_line1 = भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः । | ||
| verse_lines = भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ।;तादात्म्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितं बत;ईश्वरात् क्षीणपुण्येन पुलकानिव चाधनः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = तादात्म्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितं बत | | verse_line2 = तादात्म्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितं बत | ||
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| Line 13,151: | Line 13,922: | ||
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| verse_line1 = लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः । | | verse_line1 = लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः । | ||
| verse_lines = लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः ।;आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत् पुरम् ॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत् पुरम् ॥ ५३ ॥ | | verse_line2 = आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत् पुरम् ॥ ५३ ॥ | ||
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| verse_line1 = निमित्तमात्रं तत्रात्मा निर्गुणः पुरुषर्षभः । | | verse_line1 = निमित्तमात्रं तत्रात्मा निर्गुणः पुरुषर्षभः । | ||
| verse_lines = निमित्तमात्रं तत्रात्मा निर्गुणः पुरुषर्षभः ।;व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ ४७ ॥ | ||
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| verse_line1 = केचित् कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप । एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ ५२ ॥ | | verse_line1 = केचित् कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप । एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ ५२ ॥ | ||
| verse_lines = केचित् कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप । एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ ५२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 13,200: | Line 13,974: | ||
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| verse_line1 = अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात् पुरुषस्य हि । | | verse_line1 = अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात् पुरुषस्य हि । | ||
| verse_lines = अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात् पुरुषस्य हि ।;स्वाप्नीव भात्यनुध्यानाद् यया बन्धविपर्ययः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाप्नीव भात्यनुध्यानाद् यया बन्धविपर्ययः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = स्वाप्नीव भात्यनुध्यानाद् यया बन्धविपर्ययः ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,218: | Line 13,993: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भजस्व भजनीयाङ्घ्रिमभवाय भवच्छिदम् । | | verse_line1 = भजस्व भजनीयाङ्घ्रिमभवाय भवच्छिदम् । | ||
| verse_lines = भजस्व भजनीयाङ्घ्रिमभवाय भवच्छिदम् ।;युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,236: | Line 14,012: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं | | verse_line1 = वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं | ||
| verse_lines = वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं;मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः ।;वरार्हणोऽस्यम्बुजनाभपादयो-;र्निरन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः । | | verse_line2 = मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,254: | Line 14,031: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । | | verse_line1 = अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । | ||
| verse_lines = अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।;द्रव्यक्रियादेवतानां कर्माकर्मफलप्रदम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = द्रव्यक्रियादेवतानां कर्माकर्मफलप्रदम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = द्रव्यक्रियादेवतानां कर्माकर्मफलप्रदम् ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,272: | Line 14,050: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वात्मन्यच्युते सर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् । | | verse_line1 = सर्वात्मन्यच्युते सर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् । | ||
| verse_lines = सर्वात्मन्यच्युते सर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् ।;ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,290: | Line 14,069: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि । | | verse_line1 = मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि । | ||
| verse_lines = मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।;अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,308: | Line 14,088: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्या विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य | | verse_line1 = तस्या विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य | ||
| verse_lines = तस्या विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य;बद्धासनो जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः ।;स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्;ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजन् समाधौ ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = बद्धासनो जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः । | | verse_line2 = बद्धासनो जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,326: | Line 14,107: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया | | verse_line1 = सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया | ||
| verse_lines = सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया;यत् सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् ।;आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो;ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् । | | verse_line2 = यत् सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 13,335: | Line 14,117: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् । | | verse_line1 = अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् । | ||
| verse_lines = अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् ।;आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,353: | Line 14,136: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः । | | verse_line1 = श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः । | ||
| verse_lines = श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः ।;नेच्छंस्तत्राऽत्मनाऽऽत्मानं संतुष्ट इति सिध्यति ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = नेच्छंस्तत्राऽत्मनाऽऽत्मानं संतुष्ट इति सिध्यति ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = नेच्छंस्तत्राऽत्मनाऽऽत्मानं संतुष्ट इति सिध्यति ॥ ४९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,375: | Line 14,159: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः । | | verse_line1 = अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः । | ||
| verse_lines = अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः ।;स्वरूपमवरुन्धानो नान्यदस्मात् तदैक्षत ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वरूपमवरुन्धानो नान्यदस्मात् तदैक्षत ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = स्वरूपमवरुन्धानो नान्यदस्मात् तदैक्षत ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,393: | Line 14,178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः । | | verse_line1 = मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः । | ||
| verse_lines = मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः ।;वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,411: | Line 14,197: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सदस्या ऊचुः– | | verse_line1 = सदस्या ऊचुः– | ||
| verse_lines = सदस्या ऊचुः–;नरदेवेह भवतो नावद्यं हि मनाक् स्थितम् ।;अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदि हेदृक् त्वमप्रजः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = नरदेवेह भवतो नावद्यं हि मनाक् स्थितम् । | | verse_line2 = नरदेवेह भवतो नावद्यं हि मनाक् स्थितम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 13,420: | Line 14,207: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप । | | verse_line1 = तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप । | ||
| verse_lines = तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप ।;इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,429: | Line 14,217: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः । | | verse_line1 = यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः । | ||
| verse_lines = यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।;यद् यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = यद् यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = यद् यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,447: | Line 14,236: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः । | | verse_line1 = स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः । | ||
| verse_lines = स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।;अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,456: | Line 14,246: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः । | | verse_line1 = स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः । | ||
| verse_lines = स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।;हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,478: | Line 14,269: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं | | verse_line1 = तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं | ||
| verse_lines = तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं;त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् ।;यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते;राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि ॥ | |||
| verse_line2 = त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । | | verse_line2 = त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,496: | Line 14,288: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि- | | verse_line1 = यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि- | ||
| verse_lines = यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-;र्वितायमानेन सुराः कला हरेः ।;स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं;तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = र्वितायमानेन सुराः कला हरेः । | | verse_line2 = र्वितायमानेन सुराः कला हरेः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,514: | Line 14,307: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेन उवाच– | | verse_line1 = वेन उवाच– | ||
| verse_lines = वेन उवाच–;अवजानन्ति ये मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् ।;नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = अवजानन्ति ये मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् । | | verse_line2 = अवजानन्ति ये मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 13,523: | Line 14,317: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः । | | verse_line1 = तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः । | ||
| verse_lines = तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः ।;बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,541: | Line 14,336: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः । | | verse_line1 = विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः । | ||
| verse_lines = विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः ।;ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद् बाहुको नरः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद् बाहुको नरः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद् बाहुको नरः ॥ ४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,550: | Line 14,346: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं तु तेऽवनतं दृष्ट्वा किं करोमीति वादिनम् । | | verse_line1 = तं तु तेऽवनतं दृष्ट्वा किं करोमीति वादिनम् । | ||
| verse_lines = तं तु तेऽवनतं दृष्ट्वा किं करोमीति वादिनम् ।;निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,559: | Line 14,356: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः । | | verse_line1 = तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः । | ||
| verse_lines = तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः ।;योऽपाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = योऽपाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = योऽपाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,577: | Line 14,375: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषय ऊचुः – | | verse_line1 = ऋषय ऊचुः – | ||
| verse_lines = ऋषय ऊचुः –;एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपावनी ।;इयं च लक्ष्मीः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपावनी । | | verse_line2 = एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपावनी । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,599: | Line 14,398: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया । | | verse_line1 = एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया । | ||
| verse_lines = एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया ।;इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,621: | Line 14,421: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः | | verse_line1 = अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः | ||
| verse_lines = अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः;कूटस्थ आत्मा कलयाऽवतीर्णः ।;यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थकं;पश्यन्ति नानात्वमिव प्रतीतम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = कूटस्थ आत्मा कलयाऽवतीर्णः । | | verse_line2 = कूटस्थ आत्मा कलयाऽवतीर्णः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,643: | Line 14,444: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः । | | verse_line1 = ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः । | ||
| verse_lines = ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः ।;पौरान् जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = पौरान् जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = पौरान् जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,661: | Line 14,463: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यच्चान्यदपि कृष्णस्य ब्रह्मन् भगवतः प्रभोः । | | verse_line1 = यच्चान्यदपि कृष्णस्य ब्रह्मन् भगवतः प्रभोः । | ||
| verse_lines = यच्चान्यदपि कृष्णस्य ब्रह्मन् भगवतः प्रभोः ।;श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,679: | Line 14,482: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धरण्युवाच – | | verse_line1 = धरण्युवाच – | ||
| verse_lines = धरण्युवाच –;नमः परस्मै पुरुषाय मायया;विन्यस्तनानातनवे गुणात्मने ।;नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत-;द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = नमः परस्मै पुरुषाय मायया | | verse_line2 = नमः परस्मै पुरुषाय मायया | ||
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| Line 13,697: | Line 14,501: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नूनं तवेशस्य समीहितं जनैः | | verse_line1 = नूनं तवेशस्य समीहितं जनैः | ||
| verse_lines = नूनं तवेशस्य समीहितं जनैः;स्वमायया दुर्जययाऽकृतात्मभिः ।;न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयद्;योऽनेक एकः परतः स ईश्वरः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वमायया दुर्जययाऽकृतात्मभिः । | | verse_line2 = स्वमायया दुर्जययाऽकृतात्मभिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,715: | Line 14,520: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि- | | verse_line1 = सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि- | ||
| verse_lines = सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि-;र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः ।;तस्मै समुन्नद्धविरुद्धशक्तये;नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । | | verse_line2 = र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,737: | Line 14,543: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् । | | verse_line1 = कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् । | ||
| verse_lines = कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् ।;हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,755: | Line 14,562: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् । | | verse_line1 = दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् । | ||
| verse_lines = दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् ।;विधाय दुदुहुः क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = विधाय दुदुहुः क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = विधाय दुदुहुः क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,773: | Line 14,581: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च । | | verse_line1 = ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च । | ||
| verse_lines = ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च ।;घोषान् व्रजांश्च शिबिरान् नगरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = घोषान् व्रजांश्च शिबिरान् नगरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = घोषान् व्रजांश्च शिबिरान् नगरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 13,795: | Line 14,604: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा । | | verse_line1 = एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा । | ||
| verse_lines = एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा ।;अन्वधावदतिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्वधावदतिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = अन्वधावदतिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,804: | Line 14,614: | ||
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| verse_line1 = सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् । | | verse_line1 = सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् । | ||
| verse_lines = सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ।;धीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = धीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = धीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 13,822: | Line 14,633: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु । | | verse_line1 = धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु । | ||
| verse_lines = धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।;प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 13,844: | Line 14,656: | ||
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| verse_line1 = एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः । | | verse_line1 = एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः । | ||
| verse_lines = एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः ।;सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्माऽनात्मनः परः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्माऽनात्मनः परः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्माऽनात्मनः परः ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 13,853: | Line 14,666: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहाद्यपार्थास्तद्धर्मा न स्युस्तद्द्रष्टुरात्मनः । | | verse_line1 = देहाद्यपार्थास्तद्धर्मा न स्युस्तद्द्रष्टुरात्मनः । | ||
| verse_lines = देहाद्यपार्थास्तद्धर्मा न स्युस्तद्द्रष्टुरात्मनः ।;कैवल्यं तस्य वै धर्मः सुषुप्तं तन्निदर्शनम् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = कैवल्यं तस्य वै धर्मः सुषुप्तं तन्निदर्शनम् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = कैवल्यं तस्य वै धर्मः सुषुप्तं तन्निदर्शनम् ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 13,871: | Line 14,685: | ||
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| verse_line1 = उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् । | | verse_line1 = उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् । | ||
| verse_lines = उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् ।;कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 13,889: | Line 14,704: | ||
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| verse_line1 = भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहं | | verse_line1 = भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहं | ||
| verse_lines = भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहं;द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः ।;दृष्ट्वा सुसंपत्सु विपत्सु सूरयो;न विक्रियन्ते मयि बद्धसौहृदाः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः । | | verse_line2 = द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः । | ||
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| Line 13,907: | Line 14,723: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्पृशन्तं पादयोः शीर्ष्णा व्रीडन्तं स्वेन कर्मणा । | | verse_line1 = स्पृशन्तं पादयोः शीर्ष्णा व्रीडन्तं स्वेन कर्मणा । | ||
| verse_lines = स्पृशन्तं पादयोः शीर्ष्णा व्रीडन्तं स्वेन कर्मणा ।;शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 13,925: | Line 14,742: | ||
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| verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः । | | verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः । | ||
| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः ।;समुज्जिहानया भक्तया गृहीतचरणाम्बुजः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = समुज्जिहानया भक्तया गृहीतचरणाम्बुजः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = समुज्जिहानया भक्तया गृहीतचरणाम्बुजः ॥ २० ॥ | ||
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| Line 13,943: | Line 14,761: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जन्तोर्जगत्यां जगदीश वैशसं | | verse_line1 = जन्तोर्जगत्यां जगदीश वैशसं | ||
| verse_lines = जन्तोर्जगत्यां जगदीश वैशसं;स्यादेव यत् कर्मणि नः समीहितम् ।;करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सल;स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्यादेव यत् कर्मणि नः समीहितम् । | | verse_line2 = स्यादेव यत् कर्मणि नः समीहितम् । | ||
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| Line 13,961: | Line 14,780: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो | | verse_line1 = भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो | ||
| verse_lines = भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो;व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् ।;भवत्पदानुस्मरणादृते सतां;निमित्तमन्यद् भगवन् न विद्महे ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । | | verse_line2 = व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । | ||
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| Line 13,979: | Line 14,799: | ||
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| verse_line1 = यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । | | verse_line1 = यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । | ||
| verse_lines = यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः ।;सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,001: | Line 14,822: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = को न्वस्य कीर्तिं नशृृणोत्यभिज्ञो | | verse_line1 = को न्वस्य कीर्तिं नशृृणोत्यभिज्ञो | ||
| verse_lines = को न्वस्य कीर्तिं नशृृणोत्यभिज्ञो;यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।;लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम-;मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः । | | verse_line2 = यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,019: | Line 14,841: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषांचिदिह सत्तमाः । | | verse_line1 = अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषांचिदिह सत्तमाः । | ||
| verse_lines = अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषांचिदिह सत्तमाः ।;इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद् भुवः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद् भुवः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद् भुवः ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 14,037: | Line 14,860: | ||
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| verse_line1 = राज्यस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्महेतुता । | | verse_line1 = राज्यस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्महेतुता । | ||
| verse_lines = राज्यस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्महेतुता ।;दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 14,055: | Line 14,879: | ||
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| verse_line1 = असाविहानेकगुणाध्वरैः सता पृथग्विधैर्द्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । | | verse_line1 = असाविहानेकगुणाध्वरैः सता पृथग्विधैर्द्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । | ||
| verse_lines = असाविहानेकगुणाध्वरैः सता पृथग्विधैर्द्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।;सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभिर्विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपतः ॥३३॥ | |||
| verse_line2 = सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभिर्विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपतः ॥३३॥ | | verse_line2 = सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभिर्विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपतः ॥३३॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,073: | Line 14,898: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रधानकालाशयकर्मसङ्ग्रहः | | verse_line1 = प्रधानकालाशयकर्मसङ्ग्रहः | ||
| verse_lines = प्रधानकालाशयकर्मसङ्ग्रहः;शरीरशेषं प्रतिपद्य चेतनः ।;क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते;यथाऽनलो दारुषु तद्गुणात्मकः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरशेषं प्रतिपद्य चेतनः । | | verse_line2 = शरीरशेषं प्रतिपद्य चेतनः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,091: | Line 14,917: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो | | verse_line1 = ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो | ||
| verse_lines = ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो;नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् ।;अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो;जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् । | | verse_line2 = नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,109: | Line 14,936: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुमाल्लभेताप्यतिवेलमात्मनः | | verse_line1 = पुमाल्लभेताप्यतिवेलमात्मनः | ||
| verse_lines = पुमाल्लभेताप्यतिवेलमात्मनः;प्रसादतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।;यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः;परं किमत्रास्ति सुखं हविर्भुजाम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रसादतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । | | verse_line2 = प्रसादतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,127: | Line 14,955: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः | | verse_line1 = अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः | ||
| verse_lines = अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः;श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः ।;न वै तथा चेतनया बहिष्कृते;हुताशने पारमहंस्यवर्यगुः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । | | verse_line2 = श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । | ||
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| verse_line1 = पुत्रेण जयते लोक इति सत्यवती श्रुतिः । | | verse_line1 = पुत्रेण जयते लोक इति सत्यवती श्रुतिः । | ||
| verse_lines = पुत्रेण जयते लोक इति सत्यवती श्रुतिः ।;ब्रह्मदण्डहतः पापो यद् वेनोऽत्यतरत् तमः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मदण्डहतः पापो यद् वेनोऽत्यतरत् तमः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मदण्डहतः पापो यद् वेनोऽत्यतरत् तमः ॥ ४५ ॥ | ||
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| Line 14,163: | Line 14,993: | ||
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| verse_line1 = अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः । | | verse_line1 = अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः । | ||
| verse_lines = अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।;यदुत्तमश्लोकतमस्य विष्णोर्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्षि ॥४८॥ | |||
| verse_line2 = यदुत्तमश्लोकतमस्य विष्णोर्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्षि ॥४८॥ | | verse_line2 = यदुत्तमश्लोकतमस्य विष्णोर्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्षि ॥४८॥ | ||
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| verse_line1 = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । | | verse_line1 = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । | ||
| verse_lines = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् ।;यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । | | verse_line1 = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । | ||
| verse_lines = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः ।;स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः | | verse_line1 = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः | ||
| verse_lines = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः;पादारविन्देऽस्य गुणानुवादिनि ।;रतिः सदा या विधुनोति नैष्ठिकी;कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = पादारविन्देऽस्य गुणानुवादिनि । | | verse_line2 = पादारविन्देऽस्य गुणानुवादिनि । | ||
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| Line 14,239: | Line 15,073: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां | | verse_line1 = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां | ||
| verse_lines = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां;क्षेमस्य सम्यग्विमृशेषु हेतुः ।;असङ्ग आत्मव्यतिरिक्तवस्तुनि;दृढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेमस्य सम्यग्विमृशेषु हेतुः । | | verse_line2 = क्षेमस्य सम्यग्विमृशेषु हेतुः । | ||
}} | }} | ||
| Line 14,248: | Line 15,083: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया | | verse_line1 = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया | ||
| verse_lines = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया;गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।;भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्परात्मनि;स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया । | | verse_line2 = गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया । | ||
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| Line 14,266: | Line 15,102: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा- | | verse_line1 = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा- | ||
| verse_lines = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-;नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।;दहत्यबीजं हृदयं जीवकोशं;पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्निः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा । | | verse_line2 = नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा । | ||
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| Line 14,284: | Line 15,121: | ||
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| verse_line1 = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो | | verse_line1 = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो | ||
| verse_lines = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो;नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे ।;परात्मनोर्यद् व्यवधानं पुरस्तात्;स्वप्ने यथाऽपुरुषस्तद्विनाशे ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे । | | verse_line2 = नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे । | ||
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| Line 14,302: | Line 15,140: | ||
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| verse_line1 = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः । | | verse_line1 = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः । | ||
| verse_lines = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः ।;चेतनां हरते बुद्धेः स्तुम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = चेतनां हरते बुद्धेः स्तुम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = चेतनां हरते बुद्धेः स्तुम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,320: | Line 15,159: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये । | | verse_line1 = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये । | ||
| verse_lines = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।;तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,329: | Line 15,169: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः । | | verse_line1 = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः । | ||
| verse_lines = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।;यद्यस्त्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = यद्यस्त्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = यद्यस्त्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,338: | Line 15,179: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । | | verse_line1 = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । | ||
| verse_lines = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।;स्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुग्धताम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुग्धताम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = स्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुग्धताम् ॥ ३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,347: | Line 15,189: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा । | | verse_line1 = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा । | ||
| verse_lines = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा ।;धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 14,365: | Line 15,208: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया । | | verse_line1 = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया । | ||
| verse_lines = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया ।;क्रिया च वासनामात्रं साऽनीहायां प्रलीयते ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = क्रिया च वासनामात्रं साऽनीहायां प्रलीयते ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = क्रिया च वासनामात्रं साऽनीहायां प्रलीयते ॥ ३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,374: | Line 15,218: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति । | | verse_line1 = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति । | ||
| verse_lines = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति ।;एवं व्युदस्यात्ममायां भिदामुपरमेन्मुनिः ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं व्युदस्यात्ममायां भिदामुपरमेन्मुनिः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = एवं व्युदस्यात्ममायां भिदामुपरमेन्मुनिः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 14,392: | Line 15,237: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः । | | verse_line1 = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः । | ||
| verse_lines = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः ।;नानुवृत्तिर्न प्रलयस्तद् ब्रह्म विजितात्मनः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = नानुवृत्तिर्न प्रलयस्तद् ब्रह्म विजितात्मनः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = नानुवृत्तिर्न प्रलयस्तद् ब्रह्म विजितात्मनः ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 14,410: | Line 15,256: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । | | verse_line1 = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । | ||
| verse_lines = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।;यः क्षेत्रवित् त्वमनयोर्हृदि विष्वगाधिः;प्रत्यक् चकास्ति भगवांस्तमवैहि सोऽस्ति ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = यः क्षेत्रवित् त्वमनयोर्हृदि विष्वगाधिः | | verse_line2 = यः क्षेत्रवित् त्वमनयोर्हृदि विष्वगाधिः | ||
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| verse_line1 = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति | | verse_line1 = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति | ||
| verse_lines = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति;मायाविवेकविधुतिः स्रजिवाहिबुद्धिः ।;तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्धतत्त्वं;प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = मायाविवेकविधुतिः स्रजिवाहिबुद्धिः । | | verse_line2 = मायाविवेकविधुतिः स्रजिवाहिबुद्धिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,446: | Line 15,294: | ||
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| verse_line1 = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या | | verse_line1 = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या | ||
| verse_lines = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या;कर्माशयग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः ।;तत्त्वं न तद् द्विमतयोऽपि विरुद्धमार्ग-;स्रोतोगुणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्माशयग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः । | | verse_line2 = कर्माशयग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,464: | Line 15,313: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया । | | verse_line1 = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया । | ||
| verse_lines = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया ।;आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ५२ ॥ | ||
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| Line 14,482: | Line 15,332: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । | | verse_line1 = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । | ||
| verse_lines = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव ।;वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ।;बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मतत्त्वे स्वयं हरिः ॥ ६४ ॥ | |||
| verse_line2 = वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः । | | verse_line2 = वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,500: | Line 15,351: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । | | verse_line1 = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । | ||
| verse_lines = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।;ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यपरोद्यमे ॥ ६५ ॥ | |||
| verse_line2 = ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यपरोद्यमे ॥ ६५ ॥ | | verse_line2 = ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यपरोद्यमे ॥ ६५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,509: | Line 15,361: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । | | verse_line1 = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । | ||
| verse_lines = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।;प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६६ ॥ | | verse_line2 = प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,531: | Line 15,384: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म- | | verse_line1 = तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म- | ||
| verse_lines = तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म-;सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या ।;ज्ञानं विरक्तिमदभून्निशितेन येन;चिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या । | | verse_line2 = सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,549: | Line 15,403: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह- | | verse_line1 = छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह- | ||
| verse_lines = छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-;स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन ।;तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रयत्नो;यावद् गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन । | | verse_line2 = स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,567: | Line 15,422: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि । | | verse_line1 = एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि । | ||
| verse_lines = एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि ।;ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,585: | Line 15,441: | ||
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| verse_line1 = उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः । | | verse_line1 = उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः । | ||
| verse_lines = उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः ।;वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,594: | Line 15,451: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः । | | verse_line1 = खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः । | ||
| verse_lines = खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः ।;क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् । | | verse_line1 = इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् ।;भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,612: | Line 15,471: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् । | | verse_line1 = तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् । | ||
| verse_lines = तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।;तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् ।;ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थो व्यधात् प्रभुः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् । | | verse_line2 = तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,630: | Line 15,490: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देव्य ऊचुः – | | verse_line1 = देव्य ऊचुः – | ||
| verse_lines = देव्य ऊचुः –;अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् ।;सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीवधूरिव ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् । | | verse_line2 = अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,652: | Line 15,513: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् । | | verse_line1 = सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् । | ||
| verse_lines = सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् ।;यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ट्वलंकृताम् ।;परिक्रमन्तीमुद्वाहे चकमेऽग्निः शुकीमिव ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ट्वलंकृताम् । | | verse_line2 = यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ट्वलंकृताम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 14,661: | Line 15,523: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धमहोरगाः । | | verse_line1 = विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धमहोरगाः । | ||
| verse_lines = विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धमहोरगाः ।;विजिताः स्युर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरैः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = विजिताः स्युर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरैः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = विजिताः स्युर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरैः ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,679: | Line 15,542: | ||
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| verse_line1 = स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् | | verse_line1 = स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् | ||
| verse_lines = स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान्;विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम् ।;अव्याकृतं भागवतोऽथ वैष्णवं;पदं यथाऽर्हं विविधैः कलात्यये ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम् । | | verse_line2 = विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,697: | Line 15,561: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा । | | verse_line1 = अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा । | ||
| verse_lines = अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा ।;न मे भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = न मे भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = न मे भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 14,715: | Line 15,580: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रुद्र उवाच – | | verse_line1 = रुद्र उवाच – | ||
| verse_lines = रुद्र उवाच –;जितं व आत्मविद्धुर्याः स्वस्तये स्वस्तिरस्तु वः ।;भवतां राधसे राध्यं सर्वस्मा आत्मने नमः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = जितं व आत्मविद्धुर्याः स्वस्तये स्वस्तिरस्तु वः । | | verse_line2 = जितं व आत्मविद्धुर्याः स्वस्तये स्वस्तिरस्तु वः । | ||
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| Line 14,733: | Line 15,599: | ||
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| verse_line1 = भवान् भक्तिमतां लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् । | | verse_line1 = भवान् भक्तिमतां लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् । | ||
| verse_lines = भवान् भक्तिमतां लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् ।;स्वाराज्यस्याप्यभिमता एकान्तेनात्मविद्गतिः ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाराज्यस्याप्यभिमता एकान्तेनात्मविद्गतिः ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = स्वाराज्यस्याप्यभिमता एकान्तेनात्मविद्गतिः ॥ ५४ ॥ | ||
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| Line 14,751: | Line 15,618: | ||
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| verse_line1 = क्षणार्धेनाऽपि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | | verse_line1 = क्षणार्धेनाऽपि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | ||
| verse_lines = क्षणार्धेनाऽपि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।;भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ५७ ॥ | ||
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| Line 14,769: | Line 15,637: | ||
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| verse_line1 = अथानघाङ्घ्र्योस्तव कीर्तितीर्थयो- | | verse_line1 = अथानघाङ्घ्र्योस्तव कीर्तितीर्थयो- | ||
| verse_lines = अथानघाङ्घ्र्योस्तव कीर्तितीर्थयो-;रन्तर्बहिः स्नानविधूतपाप्मनाम् ।;भूतेष्वनुक्रोशसुसत्त्वशीलिनां;स्यात् सङ्गमोऽनुग्रह एष नस्तव ॥ ५८ ॥ | |||
| verse_line2 = रन्तर्बहिः स्नानविधूतपाप्मनाम् । | | verse_line2 = रन्तर्बहिः स्नानविधूतपाप्मनाम् । | ||
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| Line 14,787: | Line 15,656: | ||
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| verse_line1 = यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् । | | verse_line1 = यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् । | ||
| verse_lines = यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् ।;न त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६० ॥ | |||
| verse_line2 = न त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६० ॥ | | verse_line2 = न त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६० ॥ | ||
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| Line 14,805: | Line 15,675: | ||
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| verse_line1 = यो माययेदं पुरुरूपयाऽसृजद् | | verse_line1 = यो माययेदं पुरुरूपयाऽसृजद् | ||
| verse_lines = यो माययेदं पुरुरूपयाऽसृजद्;बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः ।;यद्भेदबुद्धिः सदिवाऽऽत्मसंस्थया;तमात्मतन्त्रं भगवन् प्रतीमहि ॥ ६१ ॥ | |||
| verse_line2 = बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः । | | verse_line2 = बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,823: | Line 15,694: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः | | verse_line1 = क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः | ||
| verse_lines = क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः;श्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये ।;भूतेन्द्रियान्तःकरणोपलक्षणं;वेदे च तन्त्रे च त एव कोविदाः ॥ ६२ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये । | | verse_line2 = श्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,841: | Line 15,713: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति- | | verse_line1 = त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति- | ||
| verse_lines = त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति-;स्तया रजः सत्त्वतमो विभिद्यते ।;महानहं खं मरुदग्निवार्धराः;सुरर्षयो भूतगणा इदं यतः ॥ ६३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तया रजः सत्त्वतमो विभिद्यते । | | verse_line2 = स्तया रजः सत्त्वतमो विभिद्यते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,859: | Line 15,732: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविश्य | | verse_line1 = सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविश्य | ||
| verse_lines = सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविश्य;चतुर्विधं पुरमात्मांशकेन ।;अथो विदुस्त्वां पुरुषं सन्तमत्र;भुङ्क्ते हृषीकैर्मधु सारघं यतः ॥ ६४ ॥ | |||
| verse_line2 = चतुर्विधं पुरमात्मांशकेन । | | verse_line2 = चतुर्विधं पुरमात्मांशकेन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,877: | Line 15,751: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो | | verse_line1 = कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो | ||
| verse_lines = कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो;यत् ते पुमानप्ययमब्जकेतनः ।;विशङ्कयाऽस्मद्गुरुरर्चति स्म यद्;विनोपपत्तिं मनवश्चतुर्दश ॥ ६७ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् ते पुमानप्ययमब्जकेतनः । | | verse_line2 = यत् ते पुमानप्ययमब्जकेतनः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,895: | Line 15,770: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्स्पृष्टोऽहरहर्मुक्तक्लेशः शेतेऽमृताम्बुधौ । | | verse_line1 = यत्स्पृष्टोऽहरहर्मुक्तक्लेशः शेतेऽमृताम्बुधौ । | ||
| verse_lines = यत्स्पृष्टोऽहरहर्मुक्तक्लेशः शेतेऽमृताम्बुधौ ।;तावद् वेदाथ तत् तेऽङ्घ्रिं जनो नु स्मरते च तत् ॥ ६८ ॥ | |||
| verse_line2 = तावद् वेदाथ तत् तेऽङ्घ्रिं जनो नु स्मरते च तत् ॥ ६८ ॥ | | verse_line2 = तावद् वेदाथ तत् तेऽङ्घ्रिं जनो नु स्मरते च तत् ॥ ६८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,917: | Line 15,793: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् । | | verse_line1 = प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् । | ||
| verse_lines = प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् ।;नारदोऽध्यात्मतत्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = नारदोऽध्यात्मतत्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = नारदोऽध्यात्मतत्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत् ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,926: | Line 15,803: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारद उवाच– | | verse_line1 = नारद उवाच– | ||
| verse_lines = नारद उवाच–;श्रेयस्त्वं कतमद् राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे ।;दुःखहानिः सुखावाप्तिः श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रेयस्त्वं कतमद् राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे । | | verse_line2 = श्रेयस्त्वं कतमद् राजन् कर्मणाऽऽत्मन ईहसे । | ||
}} | }} | ||
| Line 14,935: | Line 15,813: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राचीनबर्हिरुवाच– | | verse_line1 = प्राचीनबर्हिरुवाच– | ||
| verse_lines = प्राचीनबर्हिरुवाच–;न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः ।;ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः । | | verse_line2 = न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः । | ||
}} | }} | ||
| Line 14,944: | Line 15,823: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भो भो प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाऽध्वरे । | | verse_line1 = भो भो प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाऽध्वरे । | ||
| verse_lines = भो भो प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाऽध्वरे ।;संज्ञापितान् जीवसङ्घान् निर्घृणेन सहस्रशः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = संज्ञापितान् जीवसङ्घान् निर्घृणेन सहस्रशः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = संज्ञापितान् जीवसङ्घान् निर्घृणेन सहस्रशः ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,953: | Line 15,833: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव । | | verse_line1 = एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव । | ||
| verse_lines = एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव ।;सम्परेतमयः कूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्परेतमयः कूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = सम्परेतमयः कूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 14,971: | Line 15,852: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आसीत् पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः । | | verse_line1 = आसीत् पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः । | ||
| verse_lines = आसीत् पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः ।;तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत् सखाऽविज्ञातचेष्टितः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत् सखाऽविज्ञातचेष्टितः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत् सखाऽविज्ञातचेष्टितः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 14,980: | Line 15,862: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु । | | verse_line1 = स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु । | ||
| verse_lines = स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु ।;ददर्श नवभिर्द्वारैः पुरीं लक्षितलक्षणाम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ददर्श नवभिर्द्वारैः पुरीं लक्षितलक्षणाम् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ददर्श नवभिर्द्वारैः पुरीं लक्षितलक्षणाम् ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_line1 = यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् । | | verse_line1 = यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् । | ||
| verse_lines = यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ।;भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः ॥ २० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 15,007: | Line 15,891: | ||
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| verse_line1 = तेषां परिवृढो राजन् सर्वेषां बलिमुद्वहन् । | | verse_line1 = तेषां परिवृढो राजन् सर्वेषां बलिमुद्वहन् । | ||
| verse_lines = तेषां परिवृढो राजन् सर्वेषां बलिमुद्वहन् ।;सस्त्रीकाणां सखा तस्या बहुरूपोऽग्रणीः स्त्रियः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = सस्त्रीकाणां सखा तस्या बहुरूपोऽग्रणीः स्त्रियः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = सस्त्रीकाणां सखा तस्या बहुरूपोऽग्रणीः स्त्रियः ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 15,025: | Line 15,910: | ||
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| verse_line1 = पितृभूर्नृप पुर्या द्वा दक्षिणेन पुरञ्जनः । | | verse_line1 = पितृभूर्नृप पुर्या द्वा दक्षिणेन पुरञ्जनः । | ||
| verse_lines = पितृभूर्नृप पुर्या द्वा दक्षिणेन पुरञ्जनः ।;राष्ट्रं दक्षिणपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = राष्ट्रं दक्षिणपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = राष्ट्रं दक्षिणपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 15,034: | Line 15,920: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवभूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः । | | verse_line1 = देवभूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः । | ||
| verse_lines = देवभूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः ।;राष्ट्रमुत्तरपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = राष्ट्रमुत्तरपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = राष्ट्रमुत्तरपाञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः ॥ ५२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,056: | Line 15,943: | ||
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| verse_line1 = तीर्थेषु श्रुतिदृष्टेषु राजा मेध्यपशून्वने । | | verse_line1 = तीर्थेषु श्रुतिदृष्टेषु राजा मेध्यपशून्वने । | ||
| verse_lines = तीर्थेषु श्रुतिदृष्टेषु राजा मेध्यपशून्वने ।;यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 15,065: | Line 15,953: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत वा न वा । | | verse_line1 = य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत वा न वा । | ||
| verse_lines = य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत वा न वा ।;कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन स न लिप्यते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन स न लिप्यते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन स न लिप्यते ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,087: | Line 15,976: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ । | | verse_line1 = द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ । | ||
| verse_lines = द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।;यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,109: | Line 15,999: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि । | | verse_line1 = स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि । | ||
| verse_lines = स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि ।;विद्वान् स्वप्न इवामृश्य साक्षिणं विरराम ह ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = विद्वान् स्वप्न इवामृश्य साक्षिणं विरराम ह ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = विद्वान् स्वप्न इवामृश्य साक्षिणं विरराम ह ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,127: | Line 16,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारो घ्राणादयः प्रभो । | | verse_line1 = पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारो घ्राणादयः प्रभो । | ||
| verse_lines = पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारो घ्राणादयः प्रभो ।;तेजोबन्नानि कोष्ठानि गोलकेन्द्रियसंग्रहः ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = तेजोबन्नानि कोष्ठानि गोलकेन्द्रियसंग्रहः ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = तेजोबन्नानि कोष्ठानि गोलकेन्द्रियसंग्रहः ॥ ५७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,145: | Line 16,037: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो । | | verse_line1 = अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो । | ||
| verse_lines = अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो ।;न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२ ॥ | |||
| verse_line2 = न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२ ॥ | | verse_line2 = न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥ ६२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,167: | Line 16,060: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः । | | verse_line1 = पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः । | ||
| verse_lines = पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ।;आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ॥ २० ॥ | | verse_line2 = आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,185: | Line 16,079: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । | | verse_line1 = दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । | ||
| verse_lines = दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।;जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत् तत् तत्प्रतिक्रिया ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत् तत् तत्प्रतिक्रिया ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत् तत् तत्प्रतिक्रिया ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,203: | Line 16,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । | | verse_line1 = अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । | ||
| verse_lines = अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।;मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,221: | Line 16,117: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः । | | verse_line1 = प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः । | ||
| verse_lines = प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः ।;दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,239: | Line 16,136: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे । | | verse_line1 = शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे । | ||
| verse_lines = शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।;मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,257: | Line 16,155: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः । | | verse_line1 = यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः । | ||
| verse_lines = यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः ।;स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,275: | Line 16,174: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स त्वं विचक्ष्व मृगचेष्ठितमात्मनोऽन्त- | | verse_line1 = स त्वं विचक्ष्व मृगचेष्ठितमात्मनोऽन्त- | ||
| verse_lines = स त्वं विचक्ष्व मृगचेष्ठितमात्मनोऽन्त-;श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्तिम् ।;जह्यङ्गनाभ्रममसत्तमयूथगाथं;प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्तिम् । | | verse_line2 = श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्तिम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,293: | Line 16,193: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडशविस्तरम् । | | verse_line1 = एकं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडशविस्तरम् । | ||
| verse_lines = एकं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडशविस्तरम् ।;एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७६ ॥ | |||
| verse_line2 = एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७६ ॥ | | verse_line2 = एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,311: | Line 16,212: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्तिः कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि । | | verse_line1 = भक्तिः कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि । | ||
| verse_lines = भक्तिः कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि ।;यदि स्यादात्मनो भूयादपवर्गस्तु संसृतेः ॥ ८२ ॥ | |||
| verse_line2 = यदि स्यादात्मनो भूयादपवर्गस्तु संसृतेः ॥ ८२ ॥ | | verse_line2 = यदि स्यादात्मनो भूयादपवर्गस्तु संसृतेः ॥ ८२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,329: | Line 16,231: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्ष्येद्भूतं स्वप्नवदन्यथा । | | verse_line1 = अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्ष्येद्भूतं स्वप्नवदन्यथा । | ||
| verse_lines = अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्ष्येद्भूतं स्वप्नवदन्यथा ।;भूतं भवद् भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहो रहः ॥ ८३ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतं भवद् भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहो रहः ॥ ८३ ॥ | | verse_line2 = भूतं भवद् भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहो रहः ॥ ८३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,351: | Line 16,254: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | | verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | ||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः ।;जपयज्ञेन तपसा पुरञ्जनमतोषयन् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः । | | verse_line2 = प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,369: | Line 16,273: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः । | | verse_line1 = दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः । | ||
| verse_lines = दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः ।;भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,387: | Line 16,292: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न व्यवह्रियते यज्ञो ब्रह्मैतद् ब्रह्मवादिभिः । | | verse_line1 = न व्यवह्रियते यज्ञो ब्रह्मैतद् ब्रह्मवादिभिः । | ||
| verse_lines = न व्यवह्रियते यज्ञो ब्रह्मैतद् ब्रह्मवादिभिः ।;न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,405: | Line 16,311: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठमनस्यपार्थे विलसद्द्वयाय । | | verse_line1 = शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठमनस्यपार्थे विलसद्द्वयाय । | ||
| verse_lines = शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठमनस्यपार्थे विलसद्द्वयाय ।;नमो जगत्स्थानलयोदयेषु गृहीतमायागुणविग्रहाय ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = नमो जगत्स्थानलयोदयेषु गृहीतमायागुणविग्रहाय ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = नमो जगत्स्थानलयोदयेषु गृहीतमायागुणविग्रहाय ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,423: | Line 16,330: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे । | | verse_line1 = नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे । | ||
| verse_lines = नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे ।;वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,445: | Line 16,353: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा । | | verse_line1 = दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा । | ||
| verse_lines = दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा ।;प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद् यत्र जाजलिः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद् यत्र जाजलिः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद् यत्र जाजलिः ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,463: | Line 16,372: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थितः । | | verse_line1 = श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थितः । | ||
| verse_lines = श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थितः ।;सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,481: | Line 16,391: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतत् परं तज्जगदात्मनः पदं | | verse_line1 = एतत् परं तज्जगदात्मनः पदं | ||
| verse_lines = एतत् परं तज्जगदात्मनः पदं;सकृद् विभातं सवितुर्यथा प्रभा ।;यदाऽसवो जाग्रति सुप्तवृत्तयो;द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमात्ययः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = सकृद् विभातं सवितुर्यथा प्रभा । | | verse_line2 = सकृद् विभातं सवितुर्यथा प्रभा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,499: | Line 16,410: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् । | | verse_line1 = तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् । | ||
| verse_lines = तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् ।;स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहमात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहमात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहमात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,517: | Line 16,429: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निरस्तसङ्कल्पविकल्पमद्वयं | | verse_line1 = निरस्तसङ्कल्पविकल्पमद्वयं | ||
| verse_lines = निरस्तसङ्कल्पविकल्पमद्वयं;द्वयापवादोपरमोपलम्भनम् ।;अनादिमध्यान्तमजस्रनिर्वृतिं;संज्ञप्तिमात्रं भजतामुया दृशा ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वयापवादोपरमोपलम्भनम् । | | verse_line2 = द्वयापवादोपरमोपलम्भनम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,535: | Line 16,448: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न भजति कुमनीषिणां स इज्यां | | verse_line1 = न भजति कुमनीषिणां स इज्यां | ||
| verse_lines = न भजति कुमनीषिणां स इज्यां;हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः ।;श्रुतधनकुलकर्मणां मदैर्ये;विदधति पापमकिञ्चनेषु सत्सु ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः । | | verse_line2 = हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,553: | Line 16,467: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्च | | verse_line1 = श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्च | ||
| verse_lines = श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्च;द्विपदपतीन् विबुधांश्च यः स्वपूर्णः ।;न भजति निजभृत्यवर्गतन्त्रः;कथममुमुद्विसृजेत् पुमान् कृतज्ञः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = द्विपदपतीन् विबुधांश्च यः स्वपूर्णः । | | verse_line2 = द्विपदपतीन् विबुधांश्च यः स्वपूर्णः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,571: | Line 16,486: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत् परं सर्वधिष्ण्येभ्यो मायाधिष्ठितमारुहत् । | | verse_line1 = तत् परं सर्वधिष्ण्येभ्यो मायाधिष्ठितमारुहत् । | ||
| verse_lines = तत् परं सर्वधिष्ण्येभ्यो मायाधिष्ठितमारुहत् ।;मुनयोऽद्याप्युदीक्षन्ते परं नापुरवाङ् नृपाः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = मुनयोऽद्याप्युदीक्षन्ते परं नापुरवाङ् नृपाः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = मुनयोऽद्याप्युदीक्षन्ते परं नापुरवाङ् नृपाः ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,597: | Line 16,513: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश- | | verse_line1 = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश- | ||
| verse_lines = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-;दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः ।;भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिसृष्टान्;विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः । | | verse_line2 = दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,615: | Line 16,532: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन् | | verse_line1 = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन् | ||
| verse_lines = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन्;यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,637: | Line 16,555: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले | | verse_line1 = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले | ||
| verse_lines = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले;मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः ।;विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे;किं वा मृगान् मृगयसे विपिने प्रमत्तान् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः । | | verse_line2 = मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,659: | Line 16,578: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि | | verse_line1 = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि | ||
| verse_lines = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि;भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,681: | Line 16,601: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः | | verse_line1 = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः | ||
| verse_lines = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः;प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,703: | Line 16,624: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् । | | verse_line1 = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् । | ||
| verse_lines = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।;तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | |||
| verse_line2 = तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | | verse_line2 = तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,721: | Line 16,643: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने । | | verse_line1 = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने । | ||
| verse_lines = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।;प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,739: | Line 16,662: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः । | | verse_line1 = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः । | ||
| verse_lines = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।;यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,757: | Line 16,681: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च । | | verse_line1 = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च । | ||
| verse_lines = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।;सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | |||
| verse_line2 = सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | | verse_line2 = सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,775: | Line 16,700: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन | | verse_line1 = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन | ||
| verse_lines = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन;ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।;योगेन धृत्युद्भवसत्वयुक्तो;लिङ्गं व्यपोहेत्कुशलोऽहमाख्यम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन । | | verse_line2 = ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,793: | Line 16,719: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् । | | verse_line1 = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् । | ||
| verse_lines = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।;अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | |||
| verse_line2 = अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | | verse_line2 = अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,811: | Line 16,738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो | | verse_line1 = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो | ||
| verse_lines = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो;दक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् ।;भवः परः सोथ विरिञ्चिवीर्यः;स मत्परोहं द्विजदेवदेवः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = दक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् । | | verse_line2 = दक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,829: | Line 16,757: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि- | | verse_line1 = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि- | ||
| verse_lines = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-;श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।;सम्भावितव्यानि पदेपदे वो;विविक्तदृष्टिस्तदुतार्हणं मे ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि । | | verse_line2 = श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,851: | Line 16,780: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = राजोवाच– | | verse_line1 = राजोवाच– | ||
| verse_lines = राजोवाच–;न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि;भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि | | verse_line2 = न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,869: | Line 16,799: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तथा चोक्तम्– | | verse_line1 = तथा चोक्तम्– | ||
| verse_lines = तथा चोक्तम्–;न कुर्यात्कस्यचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते ।;यद्विस्रम्भाच्चिराच्चीर्णं चस्कन्द तप ऐश्वरम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = न कुर्यात्कस्यचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते । | | verse_line2 = न कुर्यात्कस्यचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते । | ||
}} | }} | ||
| Line 15,878: | Line 16,809: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः । | | verse_line1 = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः । | ||
| verse_lines = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।;योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 15,887: | Line 16,819: | ||
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| verse_line1 = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः । | | verse_line1 = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः । | ||
| verse_lines = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।;कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,905: | Line 16,838: | ||
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| verse_line1 = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां | | verse_line1 = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां | ||
| verse_lines = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां;साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं;जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं | | verse_line2 = साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 15,923: | Line 16,857: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 15,940: | Line 16,875: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 15,948: | Line 16,884: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 15,956: | Line 16,893: | ||
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| verse_line1 = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | | verse_line1 = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 15,964: | Line 16,902: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 15,972: | Line 16,911: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 15,989: | Line 16,929: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या | | verse_line1 = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या | ||
| verse_lines = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या;द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।;गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः;कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् । | | verse_line2 = द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,007: | Line 16,948: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे- | | verse_line1 = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे- | ||
| verse_lines = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-;न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी ।;यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां;महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी । | | verse_line2 = न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,025: | Line 16,967: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 16,042: | Line 16,985: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां | | verse_line1 = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां | ||
| verse_lines = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां;देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः ।;अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो;मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः । | | verse_line2 = देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,064: | Line 17,008: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परो रजाः सवितर्जातवेदो | | verse_line1 = परो रजाः सवितर्जातवेदो | ||
| verse_lines = परो रजाः सवितर्जातवेदो;वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान ।;स्वरेतसाऽदः पुनराविश्य चष्टे;हंसं गृध्राणामृषभं सङ्गृणीमः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान । | | verse_line2 = वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,086: | Line 17,031: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 16,103: | Line 17,049: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्राह्मण उवाच– | | verse_line1 = ब्राह्मण उवाच– | ||
| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–;त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं;भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः ।;गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा;पीवेति चासौ न विदां प्रवादः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं | | verse_line2 = त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,121: | Line 17,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च | | verse_line1 = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च | ||
| verse_lines = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च;क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।;निद्राऽरतिर्मन्युरहंमदश्च;देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । | | verse_line2 = क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,139: | Line 17,087: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज- | | verse_line1 = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज- | ||
| verse_lines = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-;न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।;स्वस्वामिभावो ध्रुव एष यत्र;तर्ह्यच्युतेऽसाविति कृत्ययोगः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् । | | verse_line2 = न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,148: | Line 17,097: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च | | verse_line1 = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च | ||
| verse_lines = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च;पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।;क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्य-;मथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् । | | verse_line2 = पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,166: | Line 17,116: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य | | verse_line1 = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य | ||
| verse_lines = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य;साम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।;महद्विमानात्स्वकृताद्धिमादृग्;धक्षत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = साम्येन वीताभिमतेस्तवापि । | | verse_line2 = साम्येन वीताभिमतेस्तवापि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,188: | Line 17,139: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध- | | verse_line1 = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध- | ||
| verse_lines = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-;वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।;न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः;प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = वितानविद्योरुविजृम्भितेषु । | | verse_line2 = वितानविद्योरुविजृम्भितेषु । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,206: | Line 17,158: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वासनात्मा विषयोपरक्तो | | verse_line1 = स वासनात्मा विषयोपरक्तो | ||
| verse_lines = स वासनात्मा विषयोपरक्तो;गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा ।;चित्रं पृथङ्नामभी रूपभेद-;मन्तर्बहिष्ठः स्वपुरैस्तनोति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । | | verse_line2 = गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,215: | Line 17,168: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं | | verse_line1 = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं | ||
| verse_lines = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं;कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति ।;आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा;स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति । | | verse_line2 = कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,233: | Line 17,187: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तावानयं व्यवहारः सदा वै | | verse_line1 = तावानयं व्यवहारः सदा वै | ||
| verse_lines = तावानयं व्यवहारः सदा वै;क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः ।;तस्मान्मनोलिङ्गमदो वदन्ति;गुणागुणस्यास्य परावरस्य ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः । | | verse_line2 = क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,251: | Line 17,206: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः | | verse_line1 = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः | ||
| verse_lines = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः;क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।;यथा प्रदीपो घृतवर्तिमास्थितो;स्थितिं स धूमां भजति ह्यन्यदा स्वम् ।;पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं;बहिर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्वम् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । | | verse_line2 = क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,260: | Line 17,216: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पदं विषयम् । | | verse_line1 = पदं विषयम् । | ||
| verse_lines = पदं विषयम् ।;एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती-;राकूतयः पञ्च धियोऽभिमानाः ।;मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां;वदन्ति हैकादश वीर भूमिम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती- | | verse_line2 = एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती- | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,278: | Line 17,235: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि | | verse_line1 = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि | ||
| verse_lines = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि;विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः ।;एकादशं स्वीकरणं ममेति;मायामहं द्वादशमेकमाहुः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः । | | verse_line2 = विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,296: | Line 17,254: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- | | verse_line1 = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- | ||
| verse_lines = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-;रेकादशामी मनसो विकाराः ।;सहस्रशः शतशः कोटिशश्च;क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = रेकादशामी मनसो विकाराः । | | verse_line2 = रेकादशामी मनसो विकाराः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,314: | Line 17,273: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः | | verse_line1 = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः | ||
| verse_lines = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः;साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः ।;नारायणो भगवान्वासुदेवः;स्वमाययाऽऽत्मन्व्यवधीयमानः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः । | | verse_line2 = साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,332: | Line 17,292: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य- | | verse_line1 = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य- | ||
| verse_lines = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य-;मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः ।;गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो;जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोहम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः । | | verse_line2 = मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,354: | Line 17,315: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्राह्मण उवाच– | | verse_line1 = ब्राह्मण उवाच– | ||
| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–;अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां;यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः ।;तस्यापि चाङ्घ्र्योरधि गुल्फजङ्घा-;जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां | | verse_line2 = अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां | ||
}} | }} | ||
| Line 16,363: | Line 17,325: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां | | verse_line1 = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां | ||
| verse_lines = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां;सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।;यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो;राजाऽस्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । | | verse_line2 = सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,381: | Line 17,344: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि- | | verse_line1 = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि- | ||
| verse_lines = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-;र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।;जनस्य गोप्तेति विकत्थमानो;न शोभसे वृद्धसभासु दुष्टः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि । | | verse_line2 = र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,399: | Line 17,363: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि क्षितावेव चराचरस्य | | verse_line1 = यदि क्षितावेव चराचरस्य | ||
| verse_lines = यदि क्षितावेव चराचरस्य;विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् ।;तन्नामतोऽन्यद्व्यवहारमात्रं;निरूप्यतां तत्क्रिययानुतिष्ठन् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । | | verse_line2 = विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,408: | Line 17,373: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- | | verse_line1 = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- | ||
| verse_lines = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-;मसन्निधानं परमाणवो ये ।;अविद्यया मनसा कल्पितास्ते;येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = मसन्निधानं परमाणवो ये । | | verse_line2 = मसन्निधानं परमाणवो ये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,426: | Line 17,392: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य- | | verse_line1 = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य- | ||
| verse_lines = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-;दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।;द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म-;नाम््नयाऽजयाऽवैहि कृतं द्वितीयम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । | | verse_line2 = दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,435: | Line 17,402: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक- | | verse_line1 = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक- | ||
| verse_lines = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-;मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् ।;प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दवाच्यं;यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् । | | verse_line2 = मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,457: | Line 17,425: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति । | | verse_line1 = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति । | ||
| verse_lines = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति ।;आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः ।;नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥ २६॥ | |||
| verse_line2 = आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः । | | verse_line2 = आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,475: | Line 17,444: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय | | verse_line1 = यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय | ||
| verse_lines = यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय;योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय ।;नारायणाय हरये नम इत्युदारं;गायन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय । | | verse_line2 = योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,497: | Line 17,467: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति । | | verse_line1 = तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति । | ||
| verse_lines = तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति ।;गयं नृपं कः प्रतियाति कर्मभि-;र्यज्वाभिमानी बहुविद्धर्मगोप्ता ।;सदागतश्रीः सदसस्पतिः सतां;सत्सेवकोऽन्यो भगवत्कलामृते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = गयं नृपं कः प्रतियाति कर्मभि- | | verse_line2 = गयं नृपं कः प्रतियाति कर्मभि- | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,519: | Line 17,490: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥ | ||
| verse_lines = तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 16,540: | Line 17,512: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो;वामपादाङ्गुष्ठ-नखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा;तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला;साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोभिरभिधीय-मानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो;मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो | | verse_line2 = तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,558: | Line 17,531: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 16,566: | Line 17,540: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भव उवाच– | | verse_line1 = भव उवाच– | ||
| verse_lines = भव उवाच–;ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,588: | Line 17,563: | ||
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| verse_line1 = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते | | verse_line1 = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते | ||
| verse_lines = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते;ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् ।;युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे;सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुनि ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् । | | verse_line2 = ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,606: | Line 17,582: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 16,614: | Line 17,591: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 16,631: | Line 17,609: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा | | verse_line1 = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा | ||
| verse_lines = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा;हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च ।;पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः;सरीसृपस्थास्नु यदत्र दृश्यते ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च । | | verse_line2 = हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,649: | Line 17,628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं | | verse_line1 = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं | ||
| verse_lines = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं;अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।;सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भना-;त्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् । | | verse_line2 = अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,667: | Line 17,647: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं | | verse_line1 = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं | ||
| verse_lines = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं;चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् ।;द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-;द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् । | | verse_line2 = चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,685: | Line 17,666: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम- | | verse_line1 = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम- | ||
| verse_lines = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-;रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।;सङ्ख्या यया तत्त्वदृशा विनीयते;तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय हि ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । | | verse_line2 = रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,703: | Line 17,685: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो | | verse_line1 = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो | ||
| verse_lines = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो;गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् ।;मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो;गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् । | | verse_line2 = गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,721: | Line 17,704: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि- | | verse_line1 = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि- | ||
| verse_lines = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-;र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।;तथैव तत्रातिशयात्मबुद्धिभि-;र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने । | | verse_line2 = र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,743: | Line 17,727: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः | | verse_line1 = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः | ||
| verse_lines = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः;सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।;शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्यया-;द्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् । | | verse_line2 = सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् । | ||
}} | }} | ||
| Line 16,752: | Line 17,737: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां | | verse_line1 = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां | ||
| verse_lines = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां;त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज ।;भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां;विधेहि योगं त्वयि नः सुभावितम् ॥ इति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज । | | verse_line2 = त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,770: | Line 17,756: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं | | verse_line1 = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं | ||
| verse_lines = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं;स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् ।;तेनाब्जनाभस्मृतिजन्मनः स्या-;द्वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् । | | verse_line2 = स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् । | ||
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| Line 16,792: | Line 17,779: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 16,809: | Line 17,797: | ||
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| verse_line1 = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 16,830: | Line 17,819: | ||
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| verse_line1 = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं | | verse_line1 = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं | ||
| verse_lines = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं;रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् ।;नमस्यतः स्तुवतो नश्यते वै;स्वयं त्रिकालं कृतमाशु पापम् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् । | | verse_line2 = रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् । | ||
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| Line 16,852: | Line 17,842: | ||
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| verse_line1 = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | ||
| verse_lines = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 16,877: | Line 17,868: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यमदूता ऊचुः– | | verse_line1 = यमदूता ऊचुः– | ||
| verse_lines = यमदूता ऊचुः–;वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।;वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । | | verse_line2 = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,899: | Line 17,891: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 16,907: | Line 17,900: | ||
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| verse_line1 = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् । | | verse_line1 = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् । | ||
| verse_lines = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।;अजामिलोऽप्यगान्मुक्तिं किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ५२ ॥ | |||
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| Line 16,929: | Line 17,923: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यम उवाच– | | verse_line1 = यम उवाच– | ||
| verse_lines = यम उवाच–;परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च;ओतं प्रोतं पटवद् यत्र विश्वम् ।;यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा;नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च | | verse_line2 = परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,951: | Line 17,946: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः | | verse_line1 = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः | ||
| verse_lines = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः;सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।;गुणो यथा गुणिनोऽव्यक्तदृष्टि-;स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् । | | verse_line2 = सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,969: | Line 17,965: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा | | verse_line1 = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा | ||
| verse_lines = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा;नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् ।;सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो;न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् । | | verse_line2 = नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 16,987: | Line 17,984: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदोपरामो मनसो नामरूप- | | verse_line1 = यदोपरामो मनसो नामरूप- | ||
| verse_lines = यदोपरामो मनसो नामरूप-;रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् ।;य ईयते केवलया स्वसंस्थया;हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् । | | verse_line2 = रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,005: | Line 18,003: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं | | verse_line1 = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं | ||
| verse_lines = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं;स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः ।;वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं;मनीषया निष्कृषन्तीह गूढम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः । | | verse_line2 = स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,023: | Line 18,022: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वै ममाशेषविशेषमाया- | | verse_line1 = स वै ममाशेषविशेषमाया- | ||
| verse_lines = स वै ममाशेषविशेषमाया-;निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।;स सर्वनामा स च विश्वरूपः;प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः । | | verse_line2 = निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,041: | Line 18,041: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं | | verse_line1 = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं | ||
| verse_lines = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं;धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य ।;मा भूत् स्वरूपं गुणरूपबृंहितं;स वै गुणापायनिसर्गलक्षणः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य । | | verse_line2 = धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,059: | Line 18,060: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै | | verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै | ||
| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै;यं यो यथा कुरुते कार्यते वा ।;परावरेषां परमं प्राक् स्वसिद्धं;तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यं यो यथा कुरुते कार्यते वा । | | verse_line2 = यं यो यथा कुरुते कार्यते वा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,077: | Line 18,079: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो- | | verse_line1 = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो- | ||
| verse_lines = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-;रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः ।;अपेक्षितं किञ्चन सांख्ययोगयोः;समं परं ह्यनुकूलं बृहत् तत् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः । | | verse_line2 = रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,095: | Line 18,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल- | | verse_line1 = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल- | ||
| verse_lines = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-;मनामरूपो भगवाननन्तः ।;नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-;र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदताम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = मनामरूपो भगवाननन्तः । | | verse_line2 = मनामरूपो भगवाननन्तः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,113: | Line 18,117: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां | | verse_line1 = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां | ||
| verse_lines = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां;यथाशयं देहगतो विभाति ।;यथाऽनिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं;स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = यथाशयं देहगतो विभाति । | | verse_line2 = यथाशयं देहगतो विभाति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,131: | Line 18,136: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः । | | verse_line1 = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।;विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,149: | Line 18,155: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः । | | verse_line1 = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः । | ||
| verse_lines = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।;अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,167: | Line 18,174: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः । | | verse_line1 = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः । | ||
| verse_lines = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः ।;संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,185: | Line 18,193: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे । | | verse_line1 = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे । | ||
| verse_lines = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।;यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | ||
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| Line 17,207: | Line 18,216: | ||
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| verse_line1 = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा- | | verse_line1 = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा- | ||
| verse_lines = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-;द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् ।;देवर्षिवर्यः पुरुषान्तरार्चनात्;कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् । | | verse_line2 = द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् । | ||
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| Line 17,225: | Line 18,235: | ||
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| verse_line1 = यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् । | | verse_line1 = यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् । | ||
| verse_lines = यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।;सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,234: | Line 18,245: | ||
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| verse_line1 = तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् । | | verse_line1 = तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् । | ||
| verse_lines = तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् ।;भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,243: | Line 18,255: | ||
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| verse_line1 = तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः । | | verse_line1 = तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः । | ||
| verse_lines = तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।;पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा । | | verse_line1 = एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा । | ||
| verse_lines = एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।;पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,270: | Line 18,284: | ||
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| verse_line1 = न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् । | | verse_line1 = न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् । | ||
| verse_lines = न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।;राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 17,292: | Line 18,307: | ||
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| verse_line1 = देवा ऊचुः– | | verse_line1 = देवा ऊचुः– | ||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका;ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।;हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ;बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका | | verse_line2 = वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका | ||
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| Line 17,310: | Line 18,326: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ- | | verse_line1 = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ- | ||
| verse_lines = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-;स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।;एकोऽरविन्दात् पतितस्ततार;तस्माद् भयाद् येन स नोऽस्तु पारः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले । | | verse_line2 = स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,328: | Line 18,345: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य एक ईशो निजमायया नः | | verse_line1 = य एक ईशो निजमायया नः | ||
| verse_lines = य एक ईशो निजमायया नः;ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।;वयं च यस्यापि पुरः समेताः;पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् । | | verse_line2 = ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,346: | Line 18,364: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ । | | verse_line1 = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ । | ||
| verse_lines = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।;पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,364: | Line 18,383: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवा ऊचुः– | | verse_line1 = देवा ऊचुः– | ||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।;नमस्ते अस्तु चक्राय नमोऽस्तु पुरुहूतये ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः । | | verse_line2 = नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः । | ||
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| Line 17,382: | Line 18,402: | ||
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| verse_line1 = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् । | | verse_line1 = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् । | ||
| verse_lines = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।;नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,400: | Line 18,421: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण | | verse_line1 = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण | ||
| verse_lines = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण;स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह;वाव न विदामः ।न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगण ईश्वर अनवगाह्य-माहात्म्ये;अर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्तःकरणदुरवग्रहवादिनां च;विवादानवसरे उपरतसमस्तमाया-मये केवलस्वात्ममायामन्तर्धाय को नु दुर्घट इव भवति ।;स्वरूपद्वयाभावात् समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम् । स एव हि पुनः सर्ववस्तुषु वस्तुस्वरूपः सर्वेश्वरः सकलजगत्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात्;सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः ।अथ ह वाव तव;महिमामहामृतरससमुद्रविप्लुषाऽसकृल्लीढया स्व-मनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेन;विस्मारितदृष्टश्रुतविषयसुखलेशाभासाः परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूतप्रियसुहृदि;सर्वात्मनि निरन्तरनिर्वृतमनसः कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्यात्मप्रियसुहृदः;साधवस्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपरिवर्तः ।;त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तवैव विभूतयोऽभूवन्;दितिजदनुजादयश्चापि तेषामनुपक्रमसमयोऽयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रितजलचराकृतिभिः;यथाऽ-पराधं दण्डं दधर्थावतीर्य ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह | | verse_line2 = स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,418: | Line 18,440: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय | | verse_line1 = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय | ||
| verse_lines = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय;कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।;सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रयाय;शश्वद् वरिष्ठगतये हरये नमस्ते ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय । | | verse_line2 = कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय । | ||
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| Line 17,436: | Line 18,459: | ||
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| verse_line1 = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् । | | verse_line1 = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् । | ||
| verse_lines = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।;तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः । | | verse_line1 = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः । | ||
| verse_lines = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।;न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | |||
| verse_line2 = न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | | verse_line2 = न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | ||
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| Line 17,463: | Line 18,488: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् । | | verse_line1 = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् । | ||
| verse_lines = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।;विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,485: | Line 18,511: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् । | | verse_line1 = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् । | ||
| verse_lines = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् ।;यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,507: | Line 18,534: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः । | | verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः । | ||
| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः ।;शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् ।;अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् । | | verse_line2 = शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,525: | Line 18,553: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः | | verse_line1 = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः | ||
| verse_lines = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः;कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः ।;न्यपातयत् तावदहर्गणेन;यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः । | | verse_line2 = कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,547: | Line 18,576: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् ।;ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् । | | verse_line2 = एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,556: | Line 18,586: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । | | verse_line1 = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । | ||
| verse_lines = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।;ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं;सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं | | verse_line2 = ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,578: | Line 18,609: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । | | verse_line1 = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । | ||
| verse_lines = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।;सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,596: | Line 18,628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो | | verse_line1 = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो | ||
| verse_lines = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो;यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे ।;परे तु जीवत्यपरस्य या मृतिः;विपर्ययश्चेत् त्वमसि ध्रुवं परः ॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे । | | verse_line2 = यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,605: | Line 18,638: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः | | verse_line1 = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः | ||
| verse_lines = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः;शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः ।;यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये;स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः । | | verse_line2 = शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,614: | Line 18,648: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां | | verse_line1 = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां | ||
| verse_lines = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां;त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।;अञ्जस्तरेम भवताऽप्रजदुस्तरं यद्;ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् । | | verse_line2 = त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,623: | Line 18,658: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या- | | verse_line1 = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या- | ||
| verse_lines = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-;स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् ।;सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो;भुंक्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् । | | verse_line2 = स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,632: | Line 18,668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते | | verse_line1 = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते | ||
| verse_lines = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते;मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् ।;किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं;नीतोऽघृणेन न शृृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् । | | verse_line2 = मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,654: | Line 18,691: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः । | | verse_line1 = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः । | ||
| verse_lines = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।;मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,663: | Line 18,701: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः । | | verse_line1 = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः । | ||
| verse_lines = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।;अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,672: | Line 18,711: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः । | | verse_line1 = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः । | ||
| verse_lines = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।;दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,681: | Line 18,721: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः । | | verse_line1 = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः । | ||
| verse_lines = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।;पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः ।;ऋषिर्वेदशिरा बोध्यो मुनिः पञ्चशिखस्तथा ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः । | | verse_line2 = पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः । | ||
}} | }} | ||
| Line 17,690: | Line 18,731: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः । | | verse_line1 = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः । | ||
| verse_lines = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।;एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,708: | Line 18,750: | ||
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| verse_line1 = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । | | verse_line1 = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । | ||
| verse_lines = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।;एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 17,717: | Line 18,760: | ||
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| verse_line1 = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः । | | verse_line1 = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः । | ||
| verse_lines = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।;गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17,726: | Line 18,770: | ||
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| verse_line1 = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः | | verse_line1 = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः | ||
| verse_lines = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः;कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,744: | Line 18,789: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः । | | verse_line1 = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः । | ||
| verse_lines = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।;देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,762: | Line 18,808: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः । | | verse_line1 = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः । | ||
| verse_lines = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।;द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,780: | Line 18,827: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे | | verse_line1 = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे | ||
| verse_lines = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे;शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।;सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं;प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य । | | verse_line2 = शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य । | ||
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| Line 17,802: | Line 18,850: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् । | | verse_line1 = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् । | ||
| verse_lines = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।;आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,820: | Line 18,869: | ||
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| verse_line1 = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् । | | verse_line1 = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् । | ||
| verse_lines = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।;उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,838: | Line 18,888: | ||
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| verse_line1 = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह । | | verse_line1 = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह । | ||
| verse_lines = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।;अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | |||
| verse_line2 = अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | | verse_line2 = अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | ||
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| Line 17,856: | Line 18,907: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । | | verse_line1 = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । | ||
| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।;मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 17,874: | Line 18,926: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः । | | verse_line1 = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः । | ||
| verse_lines = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।;जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः । | | verse_line1 = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः । | ||
| verse_lines = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।;प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः;प्रहृष्टरोमा तमनादिपूरुषम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः | | verse_line2 = प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः | ||
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| Line 17,910: | Line 18,964: | ||
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| verse_line1 = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । | | verse_line1 = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । | ||
| verse_lines = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।;शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | ||
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| Line 17,928: | Line 18,983: | ||
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| verse_line1 = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । | | verse_line1 = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । | ||
| verse_lines = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।;उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | ||
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| Line 17,946: | Line 19,002: | ||
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| verse_line1 = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । | | verse_line1 = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । | ||
| verse_lines = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।;मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_line1 = उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । | | verse_line1 = उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । | ||
| verse_lines = उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।;अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥ ५६ ॥ | | verse_line2 = अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥ ५६ ॥ | ||
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| Line 17,982: | Line 19,040: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः । | | verse_line1 = यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः । | ||
| verse_lines = यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः ।;ततः संसार एतस्य देहाद् देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः संसार एतस्य देहाद् देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = ततः संसार एतस्य देहाद् देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,004: | Line 19,063: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं | | verse_line1 = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं | ||
| verse_lines = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं;जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् ।;यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन्;प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड््यः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् । | | verse_line2 = जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,022: | Line 19,082: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो | | verse_line1 = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो | ||
| verse_lines = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो;न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः ।;समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य;कुतोऽनुरागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । | | verse_line2 = न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । | ||
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| Line 18,040: | Line 19,101: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया । | | verse_line1 = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया । | ||
| verse_lines = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।;सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,049: | Line 19,111: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि । | | verse_line1 = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि । | ||
| verse_lines = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।;गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,067: | Line 19,130: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । | | verse_line1 = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । | ||
| verse_lines = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।;मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 18,089: | Line 19,153: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः । | | verse_line1 = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः । | ||
| verse_lines = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः ।;त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,098: | Line 19,163: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् । | | verse_line1 = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् । | ||
| verse_lines = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् ।;त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,107: | Line 19,173: | ||
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| verse_line1 = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः । | | verse_line1 = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः । | ||
| verse_lines = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ।;यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।;तथेमा उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । | | verse_line2 = यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । | ||
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| Line 18,133: | Line 19,200: | ||
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| verse_line1 = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः । | | verse_line1 = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः । | ||
| verse_lines = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।;स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 18,151: | Line 19,219: | ||
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| verse_line1 = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते । | | verse_line1 = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते । | ||
| verse_lines = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।;विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 18,169: | Line 19,238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 18,186: | Line 19,256: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 18,203: | Line 19,274: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् । | | verse_line1 = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् । | ||
| verse_lines = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।;श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | ||
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| Line 18,221: | Line 19,293: | ||
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| verse_line1 = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः । | | verse_line1 = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः । | ||
| verse_lines = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।;तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 18,239: | Line 19,312: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा । | | verse_line1 = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा । | ||
| verse_lines = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।;स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,257: | Line 19,331: | ||
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| verse_line1 = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् । | | verse_line1 = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् । | ||
| verse_lines = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।;न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,266: | Line 19,341: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् । | | verse_line1 = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् । | ||
| verse_lines = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।;संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,275: | Line 19,351: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे । | | verse_line1 = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे । | ||
| verse_lines = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।;वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,293: | Line 19,370: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः । | | verse_line1 = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः । | ||
| verse_lines = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।;आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 18,311: | Line 19,389: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः । | | verse_line1 = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः । | ||
| verse_lines = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।;सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 18,329: | Line 19,408: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति । | | verse_line1 = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति । | ||
| verse_lines = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।;तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 18,347: | Line 19,427: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव । | | verse_line1 = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव । | ||
| verse_lines = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।;पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 18,365: | Line 19,446: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः । | | verse_line1 = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः । | ||
| verse_lines = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।;दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | |||
| verse_line2 = दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | | verse_line2 = दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | ||
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| Line 18,383: | Line 19,465: | ||
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| verse_line1 = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् । | | verse_line1 = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् । | ||
| verse_lines = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।;भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,401: | Line 19,484: | ||
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| verse_line1 = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ । | | verse_line1 = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ । | ||
| verse_lines = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।;रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | ||
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| Line 18,410: | Line 19,494: | ||
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| verse_line1 = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव । | | verse_line1 = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव । | ||
| verse_lines = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।;अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | ||
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| verse_line1 = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् । | | verse_line1 = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् । | ||
| verse_lines = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् ।;नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् । | | verse_line1 = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् । | ||
| verse_lines = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।;सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।;चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 18,503: | Line 19,593: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् । | | verse_line1 = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् । | ||
| verse_lines = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।;याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,521: | Line 19,612: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः । | | verse_line1 = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः । | ||
| verse_lines = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।;अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 18,539: | Line 19,631: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | ||
| verse_lines = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 18,556: | Line 19,649: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि- | | verse_line1 = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि- | ||
| verse_lines = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-;र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।;न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-;स्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः । | | verse_line2 = र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः । | ||
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| Line 18,574: | Line 19,668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते | | verse_line1 = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते | ||
| verse_lines = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते;यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः ।;यथा नभः सर्वगतं न सज्जते;तथा गुणैः सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः । | | verse_line2 = यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,592: | Line 19,687: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ । | | verse_line1 = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ । | ||
| verse_lines = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।;यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,601: | Line 19,697: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः । | | verse_line1 = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः । | ||
| verse_lines = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।;यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,610: | Line 19,707: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः । | | verse_line1 = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः । | ||
| verse_lines = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।;भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,619: | Line 19,717: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः । | | verse_line1 = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः । | ||
| verse_lines = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः ।;ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,628: | Line 19,727: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः । | | verse_line1 = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः । | ||
| verse_lines = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।;यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,646: | Line 19,746: | ||
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| verse_line1 = हिरण्यकशिपुरुवाच– | | verse_line1 = हिरण्यकशिपुरुवाच– | ||
| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–;बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।;ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥ ५८ ॥ | |||
| verse_line2 = बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः । | | verse_line2 = बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,664: | Line 19,765: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च । | | verse_line1 = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च । | ||
| verse_lines = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च ।;स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥ | |||
| verse_line2 = स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥ | | verse_line2 = स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,686: | Line 19,788: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना । | | verse_line1 = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना । | ||
| verse_lines = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना ।;अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,695: | Line 19,798: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना । | | verse_line1 = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना । | ||
| verse_lines = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना ।;कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,713: | Line 19,817: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । | | verse_line1 = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । | ||
| verse_lines = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।;किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,731: | Line 19,836: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । | | verse_line1 = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । | ||
| verse_lines = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते ।;भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,749: | Line 19,855: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् । | | verse_line1 = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् । | ||
| verse_lines = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् ।;विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,767: | Line 19,874: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः । | | verse_line1 = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः । | ||
| verse_lines = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।;तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | | verse_line2 = तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,785: | Line 19,893: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हिरण्यकशिपुरुवाच– | | verse_line1 = हिरण्यकशिपुरुवाच– | ||
| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–;कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् ।;अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् । | | verse_line2 = कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 18,794: | Line 19,903: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । | | verse_line1 = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । | ||
| verse_lines = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।;रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,812: | Line 19,922: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् । | | verse_line1 = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् । | ||
| verse_lines = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।;चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,830: | Line 19,941: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा | | verse_line1 = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा | ||
| verse_lines = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा;त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च ।;त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि-;रनन्तपारः कविरव्ययात्मा ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च । | | verse_line2 = त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,848: | Line 19,960: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना- | | verse_line1 = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना- | ||
| verse_lines = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-;मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।;कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महान्;त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि । | | verse_line2 = मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,866: | Line 19,979: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- | | verse_line1 = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- | ||
| verse_lines = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-;देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति ।;विद्याकलास्ते तनवश्च सर्वा;हिरण्यगर्भोऽसि बृहत् त्रिपृष्ठः ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति । | | verse_line2 = देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,884: | Line 19,998: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । | | verse_line1 = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । | ||
| verse_lines = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।;न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,906: | Line 20,021: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः । | | verse_line1 = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः । | ||
| verse_lines = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।;भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,924: | Line 20,040: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो | | verse_line1 = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो | ||
| verse_lines = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो;महाबलो निर्जितलोक एकराट् ।;रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः;प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = महाबलो निर्जितलोक एकराट् । | | verse_line2 = महाबलो निर्जितलोक एकराट् । | ||
}} | }} | ||
| Line 18,933: | Line 20,050: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना | | verse_line1 = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना | ||
| verse_lines = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना;विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।;उपासतोपायनपाणिभिर्विना;त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । | | verse_line2 = विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 18,951: | Line 20,069: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । | | verse_line1 = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । | ||
| verse_lines = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।;धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 18,960: | Line 20,079: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । | | verse_line1 = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । | ||
| verse_lines = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।;प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 18,978: | Line 20,098: | ||
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| verse_line1 = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । | | verse_line1 = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । | ||
| verse_lines = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः ।;न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,000: | Line 20,121: | ||
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| verse_line1 = प्रह्लाद उवाच– | | verse_line1 = प्रह्लाद उवाच– | ||
| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–;परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः ।;विमोहितधियां दृष्टः तस्मै भगवते नमः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः । | | verse_line2 = परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः । | ||
}} | }} | ||
| Line 19,009: | Line 20,131: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते । | | verse_line1 = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते । | ||
| verse_lines = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।;अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,027: | Line 20,150: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रह्लाद उवाच– | | verse_line1 = प्रह्लाद उवाच– | ||
| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–;श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।;अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । | | verse_line2 = श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,045: | Line 20,169: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुरुपुत्र उवाच– | | verse_line1 = गुरुपुत्र उवाच– | ||
| verse_lines = गुरुपुत्र उवाच–;न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं;सुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो ।;नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्;नियच्छ मन्युं क्व तदाऽऽत्ममानः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं | | verse_line2 = न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,067: | Line 20,192: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् । | | verse_line1 = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् । | ||
| verse_lines = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् ।;व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,085: | Line 20,211: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः । | | verse_line1 = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः । | ||
| verse_lines = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।;माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,103: | Line 20,230: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् । | | verse_line1 = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् । | ||
| verse_lines = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।;भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,121: | Line 20,249: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये | | verse_line1 = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये | ||
| verse_lines = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये;किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः ।;धर्मादिभिः किमगुणेन च कांक्षितेन;सारं जुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः । | | verse_line2 = किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,143: | Line 20,272: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः । | | verse_line1 = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः । | ||
| verse_lines = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।;फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,161: | Line 20,291: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः । | | verse_line1 = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः । | ||
| verse_lines = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।;विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,179: | Line 20,310: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । | | verse_line1 = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । | ||
| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।;ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,197: | Line 20,329: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः । | | verse_line1 = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः । | ||
| verse_lines = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।;सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 19,215: | Line 20,348: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः । | | verse_line1 = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः । | ||
| verse_lines = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।;अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 19,233: | Line 20,367: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् । | | verse_line1 = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् । | ||
| verse_lines = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।;बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,251: | Line 20,386: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि । | | verse_line1 = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि । | ||
| verse_lines = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।;यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 19,260: | Line 20,396: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस- | | verse_line1 = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस- | ||
| verse_lines = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-;त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् ।;मुहुः श्वसन् वक्ति हरे जगत्पते;नारायणेत्यात्मगतिर्गतत्रपः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् । | | verse_line2 = त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 19,269: | Line 20,406: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन- | | verse_line1 = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन- | ||
| verse_lines = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-;स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।;निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा;भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः । | | verse_line2 = स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,287: | Line 20,425: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः | | verse_line1 = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः | ||
| verse_lines = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः;शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।;तद् ब्रह्मनिर्वाणसुखं विदुर्बुधा-;स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् । | | verse_line2 = शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,305: | Line 20,444: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- | | verse_line1 = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- | ||
| verse_lines = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-;रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।;अस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां;सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः । | | verse_line2 = रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,323: | Line 20,463: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः । | | verse_line1 = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः । | ||
| verse_lines = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।;भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | ||
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| Line 19,341: | Line 20,482: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः । | | verse_line1 = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः । | ||
| verse_lines = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।;भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,359: | Line 20,501: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः । | | verse_line1 = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः । | ||
| verse_lines = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।;खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,381: | Line 20,524: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषय ऊचुः– | | verse_line1 = ऋषय ऊचुः– | ||
| verse_lines = ऋषय ऊचुः–;त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो;येनेदमादिपुरुषात्मगतं समस्तम् ।;तद् विप्रलुप्तममुनाद्य शरण्यपाल;रक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्थाः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो | | verse_line2 = त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,399: | Line 20,543: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गन्धर्वा ऊचुः– | | verse_line1 = गन्धर्वा ऊचुः– | ||
| verse_lines = गन्धर्वा ऊचुः–;वयं विभो ते नटनाट्यगायका;येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः ।;स एष नीतो भवता दशामिमां;किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = वयं विभो ते नटनाट्यगायका | | verse_line2 = वयं विभो ते नटनाट्यगायका | ||
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| Line 19,421: | Line 20,566: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् । | | verse_line1 = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् । | ||
| verse_lines = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।;अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 19,430: | Line 20,576: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके । | | verse_line1 = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके । | ||
| verse_lines = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके ।;तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 19,448: | Line 20,595: | ||
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| verse_line1 = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- | | verse_line1 = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- | ||
| verse_lines = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-;पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।;मन्ये तदर्पितमनोवचनात्मगेह-;प्राणः पुनाति सकलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । | | verse_line2 = पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । | ||
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| Line 19,466: | Line 20,614: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य | | verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य | ||
| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य;यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा ।;भावं करोति विकरोति पृथक् स्वभावः;सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा । | | verse_line2 = यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,484: | Line 20,633: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः | | verse_line1 = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः | ||
| verse_lines = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः;कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।;छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं;संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । | | verse_line2 = कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । | ||
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| Line 19,502: | Line 20,652: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् | | verse_line1 = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् | ||
| verse_lines = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्;जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।;न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया;यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरप्रसादः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । | | verse_line2 = जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । | ||
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| Line 19,520: | Line 20,671: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात् | | verse_line1 = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात् | ||
| verse_lines = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात्;जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि ।;संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः;सेवानुरूप उदयो न परावरत्वम् ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि । | | verse_line2 = जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,538: | Line 20,690: | ||
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| verse_line1 = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो | | verse_line1 = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो | ||
| verse_lines = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो;माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था ।;यद् यस्य जन्मनिधनं स्थितिरीक्षणं च;तद् वै तदेव खलु कालवदुष्टितर्वोः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था । | | verse_line2 = माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,556: | Line 20,709: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये | | verse_line1 = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये | ||
| verse_lines = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये;शेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः ।;योगेन मीलितदृगात्मनि वीतनिद्र-;स्तुर्यस्थितो ननु तमोऽनुगुणांश्च युंक्षे ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = शेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः । | | verse_line2 = शेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,574: | Line 20,728: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या | | verse_line1 = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या | ||
| verse_lines = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या;सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् ।;अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेः;नाभेरभूत् स्वकणिकाद्वटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् । | | verse_line2 = सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 19,583: | Line 20,738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- | | verse_line1 = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- | ||
| verse_lines = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-;स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् ।;नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो;जातेऽङ्कुरे कथमिहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् । | | verse_line2 = स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,601: | Line 20,757: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं | | verse_line1 = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं | ||
| verse_lines = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं;कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः ।;त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं;भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । | | verse_line2 = कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । | ||
}} | }} | ||
| Line 19,610: | Line 20,767: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु- | | verse_line1 = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु- | ||
| verse_lines = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-;नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् ।;मायामयं सदुपलक्षणसन्निवेशं;दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् । | | verse_line2 = नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,628: | Line 20,786: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा | | verse_line1 = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा | ||
| verse_lines = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा;मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः ।;नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको;नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । | | verse_line2 = मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 19,646: | Line 20,805: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे | | verse_line1 = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे | ||
| verse_lines = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे;बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य ।;युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां;योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य । | | verse_line2 = बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य । | ||
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| Line 19,668: | Line 20,828: | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 19,685: | Line 20,846: | ||
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| verse_line1 = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः । | | verse_line1 = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः । | ||
| verse_lines = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।;भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 19,703: | Line 20,865: | ||
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| verse_line1 = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः । | | verse_line1 = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः । | ||
| verse_lines = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।;मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 19,721: | Line 20,884: | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 19,738: | Line 20,902: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः । | | verse_line1 = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः । | ||
| verse_lines = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।;जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 19,756: | Line 20,921: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः । | | verse_line1 = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः । | ||
| verse_lines = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।;अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च । | | verse_line1 = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च । | ||
| verse_lines = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।;भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् । | | verse_line1 = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् । | ||
| verse_lines = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।;परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 19,783: | Line 20,951: | ||
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| verse_line1 = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते । | | verse_line1 = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते । | ||
| verse_lines = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।;आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | ||
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| Line 19,801: | Line 20,970: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं | | verse_line1 = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं | ||
| verse_lines = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं;कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।;प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय;आत्माऽर्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः । | | verse_line2 = कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः । | ||
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| Line 19,823: | Line 20,993: | ||
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| verse_line1 = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | | verse_line1 = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 19,857: | Line 21,029: | ||
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| verse_line1 = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः । | | verse_line1 = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः । | ||
| verse_lines = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।;प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन । | | verse_line1 = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन । | ||
| verse_lines = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।;आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः । | | verse_line1 = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः । | ||
| verse_lines = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।;सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा । | | verse_line1 = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा । | ||
| verse_lines = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।;हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ | | verse_line1 = द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ | |||
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| Line 19,954: | Line 21,131: | ||
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| verse_line1 = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः । | | verse_line1 = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः । | ||
| verse_lines = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।;गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् । | | verse_line1 = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् । | ||
| verse_lines = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।;भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् । | | verse_line1 = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् । | ||
| verse_lines = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।;कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः । | | verse_line1 = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः । | ||
| verse_lines = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।;सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् । | | verse_line1 = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् । | ||
| verse_lines = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।;ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये । | | verse_line1 = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये । | ||
| verse_lines = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।;आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् । | | verse_line1 = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् । | ||
| verse_lines = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।;अतिवादान् त्यजेत् तर्कान् पक्षं कञ्चिन्न संश्रयेत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् । | | verse_line1 = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् । | ||
| verse_lines = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।;न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 20,110: | Line 21,296: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे । | | verse_line1 = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे । | ||
| verse_lines = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।;मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,128: | Line 21,315: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् । | | verse_line1 = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् । | ||
| verse_lines = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।;व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,150: | Line 21,338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् । | | verse_line1 = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् । | ||
| verse_lines = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।;क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,168: | Line 21,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । | | verse_line1 = तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । | ||
| verse_lines = तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।;चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,186: | Line 21,376: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः । | | verse_line1 = पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः । | ||
| verse_lines = पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः ।;शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो ह्यसौ ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो ह्यसौ ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो ह्यसौ ॥ ३८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,204: | Line 21,395: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते । | | verse_line1 = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते । | ||
| verse_lines = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते ।;तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,222: | Line 21,414: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः । | | verse_line1 = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः । | ||
| verse_lines = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः ।;तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,231: | Line 21,424: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः । | | verse_line1 = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः । | ||
| verse_lines = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः ।;पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,253: | Line 21,447: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः । | | verse_line1 = निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः । | ||
| verse_lines = निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः ।;इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥ ५२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,262: | Line 21,457: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः । | | verse_line1 = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः ।;तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | | verse_line2 = तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,280: | Line 21,476: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥ | | verse_line1 = अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥ | ||
| verse_lines = अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 20,297: | Line 21,494: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः । | | verse_line1 = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः । | ||
| verse_lines = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः ।;देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,315: | Line 21,513: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते । | | verse_line1 = य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते । | ||
| verse_lines = य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते ।;शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति ॥ ५६ ॥ | | verse_line2 = शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति ॥ ५६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,333: | Line 21,532: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् । | | verse_line1 = आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् । | ||
| verse_lines = आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् ।;ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिश्च यत् स्वयम् ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिश्च यत् स्वयम् ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिश्च यत् स्वयम् ॥ ५७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,351: | Line 21,551: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः । | | verse_line1 = अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः । | ||
| verse_lines = अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः ।;दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ॥ ५८ ॥ | |||
| verse_line2 = दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ॥ ५८ ॥ | | verse_line2 = दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ॥ ५८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,369: | Line 21,570: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि । | | verse_line1 = क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि । | ||
| verse_lines = क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि ।;न संघातो विकारोऽपि न पृथङ् नान्वितोऽपि वा ॥ ५९ ॥ | |||
| verse_line2 = न संघातो विकारोऽपि न पृथङ् नान्वितोऽपि वा ॥ ५९ ॥ | | verse_line2 = न संघातो विकारोऽपि न पृथङ् नान्वितोऽपि वा ॥ ५९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,387: | Line 21,589: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना । | | verse_line1 = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना । | ||
| verse_lines = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।;न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | |||
| verse_line2 = न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | | verse_line2 = न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,405: | Line 21,608: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः । | | verse_line1 = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः । | ||
| verse_lines = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः ।;जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | |||
| verse_line2 = जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | | verse_line2 = जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,423: | Line 21,627: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः । | | verse_line1 = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः । | ||
| verse_lines = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।;नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | |||
| verse_line2 = नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | | verse_line2 = नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,449: | Line 21,654: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । | | verse_line1 = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । | ||
| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।;योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,471: | Line 21,677: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो | | verse_line1 = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो | ||
| verse_lines = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो;नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।;अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं;धत्ते रजःसत्वतमांसि काले ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः । | | verse_line2 = नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,489: | Line 21,696: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना- | | verse_line1 = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना- | ||
| verse_lines = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-;मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।;छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ;तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् । | | verse_line2 = मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,507: | Line 21,715: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु । | | verse_line1 = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु । | ||
| verse_lines = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु ।;त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,525: | Line 21,734: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां | | verse_line1 = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां | ||
| verse_lines = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां;यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् ।;तं निर्जितात्मात्मगुणं परेशं;नमामि भूतेषु समं चरन्तम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् । | | verse_line2 = यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,543: | Line 21,753: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं | | verse_line1 = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं | ||
| verse_lines = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं;सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः ।;लोकास्त्रयोऽथाखिललोकपालाः;प्रसीदतां ब्रह्म माविभूतिः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः । | | verse_line2 = सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,552: | Line 21,763: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोमं मनो यस्य समामनन्ति | | verse_line1 = सोमं मनो यस्य समामनन्ति | ||
| verse_lines = सोमं मनो यस्य समामनन्ति;दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः ।;ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः । | | verse_line2 = दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,570: | Line 21,782: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा | | verse_line1 = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा | ||
| verse_lines = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा;जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा ।;अन्तः समुद्रे पचतः स्वधातून्;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा । | | verse_line2 = जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,588: | Line 21,801: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं | | verse_line1 = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं | ||
| verse_lines = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं;त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् ।;द्वारं च मुक्तेरमृतस्य मृत्योः;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् । | | verse_line2 = त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,610: | Line 21,824: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः । | | verse_line1 = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः । | ||
| verse_lines = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः ।;ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,632: | Line 21,847: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो | | verse_line1 = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो | ||
| verse_lines = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो;विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् ।;भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा;अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् । | | verse_line2 = विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,641: | Line 21,857: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या | | verse_line1 = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या | ||
| verse_lines = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या;भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् ।;आसीनमद्रावपवर्गहेतो-;स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् । | | verse_line2 = भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,650: | Line 21,867: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | ||
| verse_lines = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 20,658: | Line 21,876: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः । | | verse_line1 = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः । | ||
| verse_lines = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः ।;तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,680: | Line 21,899: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 20,688: | Line 21,908: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं | | verse_line1 = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं | ||
| verse_lines = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं;त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् ।;वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं;न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जितः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् । | | verse_line2 = त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,697: | Line 21,918: | ||
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| verse_line1 = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं | | verse_line1 = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं | ||
| verse_lines = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं;क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः ।;यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गलः;सुमङ्गलः कश्चन काङ्क्षते हि माम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः । | | verse_line2 = क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः । | ||
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| Line 20,715: | Line 21,937: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः । | | verse_line1 = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः । | ||
| verse_lines = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।;स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,724: | Line 21,947: | ||
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| verse_line1 = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् । | | verse_line1 = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् । | ||
| verse_lines = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।;तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 20,742: | Line 21,966: | ||
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| verse_line1 = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 20,763: | Line 21,988: | ||
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| verse_line1 = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह | | verse_line1 = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह;आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः ।;तल्लीलया गरुडमूधर्ि्न पतद् गृहीत्वा;तेनाहनन्नृप सवाहमरिं त्र्यधीशः ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः । | | verse_line2 = आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,772: | Line 21,998: | ||
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| verse_line1 = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य- | | verse_line1 = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य- | ||
| verse_lines = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-;च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् ।;आहत्य तिग्मगदयाऽहनदण्डजेन्द्रं;तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः ॥ ५७॥ | |||
| verse_line2 = च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् । | | verse_line2 = च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,794: | Line 22,021: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् । | | verse_line1 = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् । | ||
| verse_lines = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।;तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,803: | Line 22,031: | ||
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| verse_line1 = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः । | | verse_line1 = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः । | ||
| verse_lines = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।;हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | |||
| verse_line2 = हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | | verse_line2 = हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | ||
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| Line 20,825: | Line 22,054: | ||
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| verse_line1 = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | | verse_line1 = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 20,850: | Line 22,080: | ||
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| verse_line1 = एवंविधानेकगुणः स राजा | | verse_line1 = एवंविधानेकगुणः स राजा | ||
| verse_lines = एवंविधानेकगुणः स राजा;परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।;क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं;यया विरिञ्चादिमधश्चकार ॥ ८४ ॥ | |||
| verse_line2 = परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे । | | verse_line2 = परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे- | | verse_line1 = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे- | ||
| verse_lines = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-;स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।;जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीय-;कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९० ॥ | |||
| verse_line2 = स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् । | | verse_line2 = स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् । | ||
}} | }} | ||
| Line 20,881: | Line 22,113: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं | | verse_line1 = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं | ||
| verse_lines = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं;वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् ।;भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः;स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार ॥ ९२ ॥ | |||
| verse_line2 = वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् । | | verse_line2 = वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,903: | Line 22,136: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता । | | verse_line1 = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता । | ||
| verse_lines = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।;ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,912: | Line 22,146: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः । | | verse_line1 = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः । | ||
| verse_lines = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।;स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,921: | Line 22,156: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः । | | verse_line1 = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः । | ||
| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।;अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,930: | Line 22,166: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः । | | verse_line1 = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः । | ||
| verse_lines = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।;त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः । | | verse_line1 = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः । | ||
| verse_lines = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः ।;स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 20,948: | Line 22,186: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् । | | verse_line1 = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् । | ||
| verse_lines = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।;आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,970: | Line 22,209: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः । | | verse_line1 = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः । | ||
| verse_lines = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।;वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 20,992: | Line 22,232: | ||
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| verse_line1 = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः । | | verse_line1 = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः । | ||
| verse_lines = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः ।;त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 21,001: | Line 22,242: | ||
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| verse_line1 = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् । | | verse_line1 = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् । | ||
| verse_lines = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् ।;व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 21,027: | Line 22,269: | ||
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| verse_line1 = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं | | verse_line1 = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं | ||
| verse_lines = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं;मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।;दृष्टश्रुताभ्यां मनसाऽनुचिन्तयन्;प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः । | | verse_line2 = मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः । | ||
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| Line 21,045: | Line 22,288: | ||
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| verse_line1 = यतो यतो धावति दैवचोदितं | | verse_line1 = यतो यतो धावति दैवचोदितं | ||
| verse_lines = यतो यतो धावति दैवचोदितं;मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु ।;गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ;प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु । | | verse_line2 = मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,063: | Line 22,307: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः | | verse_line1 = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः | ||
| verse_lines = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः;समीरवेगानुगतं विभाव्यते ।;एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्;गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = समीरवेगानुगतं विभाव्यते । | | verse_line2 = समीरवेगानुगतं विभाव्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 21,072: | Line 22,317: | ||
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| verse_line1 = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः । | | verse_line1 = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः । | ||
| verse_lines = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः ।;आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥ | ||
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| Line 21,090: | Line 22,336: | ||
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| verse_line1 = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो- | | verse_line1 = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो- | ||
| verse_lines = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-;रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति ।;एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः;शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति । | | verse_line2 = रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,112: | Line 22,359: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः । | | verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः । | ||
| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।;आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 21,121: | Line 22,369: | ||
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| verse_line1 = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं | | verse_line1 = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं | ||
| verse_lines = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं;समाहितं शूरसुतेन देवी ।;दधार सर्वात्मकमात्मभूतं;काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं नभस्तः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = समाहितं शूरसुतेन देवी । | | verse_line2 = समाहितं शूरसुतेन देवी । | ||
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| Line 21,139: | Line 22,388: | ||
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| verse_line1 = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 21,156: | Line 22,406: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल- | | verse_line1 = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल- | ||
| verse_lines = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-;श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा ।;सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो;दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा । | | verse_line2 = श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा । | ||
}} | }} | ||
| Line 21,165: | Line 22,416: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः | | verse_line1 = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः | ||
| verse_lines = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः;स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च ।;त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां;पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च । | | verse_line2 = स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,183: | Line 22,435: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | ||
| verse_lines = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 21,191: | Line 22,444: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न | | verse_line1 = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न | ||
| verse_lines = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न;समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये ।;त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन;कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये । | | verse_line2 = समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,209: | Line 22,463: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन् | | verse_line1 = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन् | ||
| verse_lines = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्;भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।;भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते;निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः । | | verse_line2 = भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,227: | Line 22,482: | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ | | verse_line1 = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ | ||
| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ;शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।;वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-;स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः । | | verse_line2 = शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,245: | Line 22,501: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद् | | verse_line1 = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद् | ||
| verse_lines = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्;विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।;गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्;प्रकाशते यस्य च येन वाऽगुणः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । | | verse_line2 = विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,263: | Line 22,520: | ||
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| verse_line1 = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः | | verse_line1 = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः | ||
| verse_lines = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः;निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।;मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो;देवक्रियायाः प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः । | | verse_line2 = निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,281: | Line 22,539: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् | | verse_line1 = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् | ||
| verse_lines = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्;नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।;क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-;राविष्टचित्तो न भवाय कल्प्यते ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते । | | verse_line2 = नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,299: | Line 22,558: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो | | verse_line1 = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो | ||
| verse_lines = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो;भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।;दिष्ट्याऽङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-;र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः । | | verse_line2 = भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः । | ||
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| Line 21,317: | Line 22,577: | ||
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| verse_line1 = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं | | verse_line1 = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं | ||
| verse_lines = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं;विना विनोदं बत तर्कयामहे ।;भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्ययाऽऽ-;कृता यतस्त्वय्यभवाश्रयात्मनि ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = विना विनोदं बत तर्कयामहे । | | verse_line2 = विना विनोदं बत तर्कयामहे । | ||
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| Line 21,339: | Line 22,600: | ||
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| verse_line1 = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् । | | verse_line1 = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् । | ||
| verse_lines = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् ।;तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 21,357: | Line 22,619: | ||
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| verse_line1 = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह । | | verse_line1 = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह । | ||
| verse_lines = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह ।;नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 21,383: | Line 22,647: | ||
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| verse_line1 = एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो | | verse_line1 = एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो | ||
| verse_lines = एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो;ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः ।;अनावृतत्वाद् बहिरन्तरं न ते;सर्वस्य सर्वात्मन आत्मवस्तुनः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः । | | verse_line2 = ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः । | ||
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| Line 21,401: | Line 22,666: | ||
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| verse_line1 = यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे- | | verse_line1 = यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे- | ||
| verse_lines = यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे-;र्व्यवस्यसेऽस्वव्यतिरेकतोऽबुधैः ।;विनाऽनुवादं न च तन्मनीषितं;सम्यग् वचो व्यक्तमुपाददत्पुमान् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = र्व्यवस्यसेऽस्वव्यतिरेकतोऽबुधैः । | | verse_line2 = र्व्यवस्यसेऽस्वव्यतिरेकतोऽबुधैः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,419: | Line 22,685: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो | | verse_line1 = त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो | ||
| verse_lines = त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो;वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् ।;त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते;तदाश्रयत्वादुपचर्यसे गुणैः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् । | | verse_line2 = वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,437: | Line 22,704: | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया | | verse_line1 = सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया | ||
| verse_lines = सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया;बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः ।;सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं;कृष्णं च वर्णं तमसा जनात्यये ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः । | | verse_line2 = बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,455: | Line 22,723: | ||
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| verse_line1 = त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु- | | verse_line1 = त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु- | ||
| verse_lines = त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु-;र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर ।;राजन्यसंज्ञासुरकोटियूथपै-;र्निर्व्यूह्यमानां निहनिष्यसे चमूम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर । | | verse_line2 = र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,473: | Line 22,742: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | ||
| verse_lines = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 21,490: | Line 22,760: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने | | verse_line1 = नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने | ||
| verse_lines = नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने;महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु ।;व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते;भवानेकः शिष्यतेऽशेषसंज्ञः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । | | verse_line2 = महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,508: | Line 22,779: | ||
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| verse_line1 = योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो | | verse_line1 = योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो | ||
| verse_lines = योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो;चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् ।;निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां-;स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । | | verse_line2 = चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,530: | Line 22,802: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः । | | verse_line1 = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः । | ||
| verse_lines = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः ।;जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 21,548: | Line 22,821: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च । | | verse_line1 = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च । | ||
| verse_lines = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च ।;नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यतोऽनेकविधोऽभेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगश्च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥ | | verse_line1 = यतोऽनेकविधोऽभेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगश्च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = यतोऽनेकविधोऽभेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगश्च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥ | ||
| verse_lines = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् । | | verse_line1 = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् । | ||
| verse_lines = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् ।;अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः । | | verse_line1 = शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः । | ||
| verse_lines = शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।;मिथो घ्नन्तो न पश्यन्ति भावैर्भावान् पृथग्दृशः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = मिथो घ्नन्तो न पश्यन्ति भावैर्भावान् पृथग्दृशः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = मिथो घ्नन्तो न पश्यन्ति भावैर्भावान् पृथग्दृशः ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_line1 = यक्षावूचतुः - कृष्ण कृष्ण महायोगिन् त्वमाद्यः पुरुषः परः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = यक्षावूचतुः - कृष्ण कृष्ण महायोगिन् त्वमाद्यः पुरुषः परः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥ ३० ॥ | ||
| verse_lines = यक्षावूचतुः - कृष्ण कृष्ण महायोगिन् त्वमाद्यः पुरुषः परः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वमेकः सर्वभूतानां देह आत्मेन्द्रियेश्वरः । | | verse_line1 = त्वमेकः सर्वभूतानां देह आत्मेन्द्रियेश्वरः । | ||
| verse_lines = त्वमेकः सर्वभूतानां देह आत्मेन्द्रियेश्वरः ।;त्वमेव कालो भगवान् विष्णुरव्यय ईश्वरः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी । | | verse_line1 = त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी । | ||
| verse_lines = त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी ।;त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित् ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित् ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित् ॥ ३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः । | | verse_line1 = गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः । | ||
| verse_lines = गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः ।;को न्विहार्हति विज्ञातुं प्राक् सिद्धं गुणसंस्थितेः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे । | | verse_line1 = तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे । | ||
| verse_lines = तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।;आत्मद्योतैर्गुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्मणे नमः ॥ ३४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 21,723: | Line 23,007: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो | | verse_line1 = अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो | ||
| verse_lines = अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो;दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ।;यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः;क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः । | | verse_line2 = दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,741: | Line 23,026: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं | | verse_line1 = न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं | ||
| verse_lines = न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं;न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।;न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा;वाञ्छन्ति त्वत्पादरजःप्रपन्नाः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । | | verse_line2 = न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,759: | Line 23,045: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने । | | verse_line1 = नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने । | ||
| verse_lines = नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।;भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,777: | Line 23,064: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । | | verse_line1 = ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । | ||
| verse_lines = ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।;अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,795: | Line 23,083: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे । | | verse_line1 = कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे । | ||
| verse_lines = कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे ।;विश्वाय तदुपद्रष्टे्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = विश्वाय तदुपद्रष्टे्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = विश्वाय तदुपद्रष्टे्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,813: | Line 23,102: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मस्थोदयाय च । | | verse_line1 = नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मस्थोदयाय च । | ||
| verse_lines = नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मस्थोदयाय च ।;गुणप्रत्युपलक्ष्याय गुणद्रष्टे्र स्वसंविदे ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणप्रत्युपलक्ष्याय गुणद्रष्टे्र स्वसंविदे ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = गुणप्रत्युपलक्ष्याय गुणद्रष्टे्र स्वसंविदे ॥ ४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,831: | Line 23,121: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः । | | verse_line1 = परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः । | ||
| verse_lines = परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः ।;अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्ट्रे विश्वहेतवे ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्ट्रे विश्वहेतवे ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्ट्रे विश्वहेतवे ॥ ४८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,849: | Line 23,140: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो | | verse_line1 = त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो | ||
| verse_lines = त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो;गुणैरनीहोऽकृतकालशक्तिधृक् ।;तस्मात् स्वभावात् प्रतिबोधयस्व नः;समीक्षयाऽमोघविहार ईहसे ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणैरनीहोऽकृतकालशक्तिधृक् । | | verse_line2 = गुणैरनीहोऽकृतकालशक्तिधृक् । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,867: | Line 23,159: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां | | verse_line1 = तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां | ||
| verse_lines = तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां;शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः ।;शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनाऽवितुः सतां;स्थातुश्च ते कर्मपरीप्सयेहतः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः । | | verse_line2 = शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः । | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,885: | Line 23,178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् । | | verse_line1 = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् । | ||
| verse_lines = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् ।;नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | |||
| verse_line2 = नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | | verse_line2 = नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,907: | Line 23,201: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति । | | verse_line1 = अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति । | ||
| verse_lines = अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।;सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 21,916: | Line 23,211: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा । | | verse_line1 = तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा । | ||
| verse_lines = तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा ।;अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,938: | Line 23,234: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः । | | verse_line1 = उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः । | ||
| verse_lines = उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः ।;वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 21,960: | Line 23,257: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् । | | verse_line1 = इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् । | ||
| verse_lines = इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।;श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेमिरे ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेमिरे ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेमिरे ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 21,969: | Line 23,267: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | | verse_line1 = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 21,990: | Line 23,289: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः । | | verse_line1 = अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः । | ||
| verse_lines = अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः ।;कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 22,008: | Line 23,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् । | | verse_line1 = किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् । | ||
| verse_lines = किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।;अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,017: | Line 23,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 22,025: | Line 23,327: | ||
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| verse_line1 = देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा । | | verse_line1 = देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा । | ||
| verse_lines = देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।;शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,034: | Line 23,337: | ||
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| verse_line1 = तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् । | | verse_line1 = तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् । | ||
| verse_lines = तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।;अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । | | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । | ||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।;रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः । | | verse_line1 = रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः । | ||
| verse_lines = रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।;प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,061: | Line 23,367: | ||
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| verse_line1 = तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः । | | verse_line1 = तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः । | ||
| verse_lines = तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।;य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 22,083: | Line 23,390: | ||
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| verse_line1 = वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् । | | verse_line1 = वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् । | ||
| verse_lines = वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् ।;कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 22,105: | Line 23,413: | ||
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| verse_line1 = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,122: | Line 23,431: | ||
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| verse_line1 = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः । | | verse_line1 = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः । | ||
| verse_lines = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।;अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 22,140: | Line 23,450: | ||
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| verse_line1 = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो | | verse_line1 = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो | ||
| verse_lines = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो;दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः ।;हिताय चेच्छातनुभिः समीहसे;मानं विधुन्वन् जगदीशमानिनाम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः । | | verse_line2 = दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः । | ||
}} | }} | ||
| Line 22,149: | Line 23,460: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 22,166: | Line 23,478: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये । | | verse_line1 = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये । | ||
| verse_lines = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।;सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः । | | verse_line1 = दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः । | ||
| verse_lines = दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।;ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,197: | Line 23,511: | ||
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| verse_line1 = तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः । | | verse_line1 = तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः । | ||
| verse_lines = तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः ।;जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,206: | Line 23,521: | ||
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| verse_line1 = राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 22,214: | Line 23,530: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 22,222: | Line 23,539: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप । | | verse_line1 = नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप । | ||
| verse_lines = नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।;अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 22,231: | Line 23,549: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामं क्रोधं भयं स्नेहं मैत्रीं सौहृदमेव च । | | verse_line1 = कामं क्रोधं भयं स्नेहं मैत्रीं सौहृदमेव च । | ||
| verse_lines = कामं क्रोधं भयं स्नेहं मैत्रीं सौहृदमेव च ।;नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 22,253: | Line 23,572: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,274: | Line 23,594: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥ | |||
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| Line 22,295: | Line 23,616: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,312: | Line 23,634: | ||
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| verse_line1 = यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥ | |||
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| Line 22,329: | Line 23,652: | ||
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| verse_line1 = प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती । | | verse_line1 = प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती । | ||
| verse_lines = प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।;अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 22,351: | Line 23,675: | ||
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| verse_line1 = भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,368: | Line 23,693: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,385: | Line 23,711: | ||
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| verse_line1 = त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम् । | | verse_line1 = त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम् । | ||
| verse_lines = त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम् ।;साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदैवं च साधवः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदैवं च साधवः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = साध्यात्मं साधिभूतं च साधिदैवं च साधवः ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 22,403: | Line 23,730: | ||
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| verse_line1 = त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः । | | verse_line1 = त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः । | ||
| verse_lines = त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः ।;यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 22,421: | Line 23,749: | ||
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| verse_line1 = तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥ | |||
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| Line 22,446: | Line 23,776: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 22,454: | Line 23,785: | ||
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| verse_line1 = त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,471: | Line 23,803: | ||
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| verse_line1 = यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थं विभर्षि हि । | | verse_line1 = यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थं विभर्षि हि । | ||
| verse_lines = यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थं विभर्षि हि ।;तैरामृष्टशुचो लोका मुदा गायन्ति ते यशः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = तैरामृष्टशुचो लोका मुदा गायन्ति ते यशः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = तैरामृष्टशुचो लोका मुदा गायन्ति ते यशः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 22,489: | Line 23,822: | ||
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| verse_line1 = नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च । | | verse_line1 = नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च । | ||
| verse_lines = नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च ।;प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः । मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः । मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः । मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः । प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥ २ ॥॥ | | verse_line1 = उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः । प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥ २ ॥॥ | ||
| verse_lines = उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः । प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥ २ ॥॥ | |||
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| Line 22,527: | Line 23,863: | ||
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| verse_line1 = नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि । | | verse_line1 = नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि । | ||
| verse_lines = नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि ।;बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामगमन् क्वचित् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामगमन् क्वचित् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामगमन् क्वचित् ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 22,536: | Line 23,873: | ||
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| verse_line1 = न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके । | | verse_line1 = न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके । | ||
| verse_lines = न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके ।;ये बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥(भा.मू | |||
| verse_line2 = ये बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥(भा.मू | | verse_line2 = ये बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥(भा.मू | ||
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| verse_line1 = सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः । | | verse_line1 = सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः । | ||
| verse_lines = सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।;न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च । | | verse_line1 = यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च । | ||
| verse_lines = यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च ।;वृत्तिं न दद्यात् तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = वृत्तिं न दद्यात् तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = वृत्तिं न दद्यात् तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 22,563: | Line 23,903: | ||
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| verse_line1 = मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् । | | verse_line1 = मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् । | ||
| verse_lines = मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् ।;गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः । | | verse_line1 = तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः । | ||
| verse_lines = तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः ।;मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः । | | verse_line1 = तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः । | ||
| verse_lines = तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः ।;अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदोर्भृशम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदोर्भृशम् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदोर्भृशम् ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः । | | verse_line1 = मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः । | ||
| verse_lines = मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः ।;बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् । | | verse_line1 = फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् । | ||
| verse_lines = फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् ।;दृष्ट्वा परमसन्तुष्टौ रामकृष्णौ जगत्पती ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन । | | verse_line1 = नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन । | ||
| verse_lines = नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन ।;रामकृष्णौ स्मृतावावां क्वचित् ते श्रवणं गतौ ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = रामकृष्णौ स्मृतावावां क्वचित् ते श्रवणं गतौ ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = रामकृष्णौ स्मृतावावां क्वचित् ते श्रवणं गतौ ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे । | | verse_line1 = एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे । | ||
| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे ।;निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः । | | verse_line1 = उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः । | ||
| verse_lines = उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः ।;जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 22,670: | Line 24,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् । | | verse_line1 = इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् । | ||
| verse_lines = इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् ।;पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् । | | verse_line1 = पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् । | ||
| verse_lines = पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् ।;हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥ | ||
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| Line 22,697: | Line 24,047: | ||
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| verse_line1 = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,739: | Line 24,091: | ||
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| verse_line1 = न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । | | verse_line1 = न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । | ||
| verse_lines = न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।;ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 22,757: | Line 24,110: | ||
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| verse_line1 = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | | verse_line1 = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | ||
| verse_lines = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 22,782: | Line 24,137: | ||
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| verse_line1 = ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः । | | verse_line1 = ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः । | ||
| verse_lines = ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः ।;यत्रोपलब्धं सुव्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्रोपलब्धं सुव्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = यत्रोपलब्धं सुव्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 22,804: | Line 24,160: | ||
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| verse_line1 = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | ||
| verse_lines = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | ||
| verse_lines = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | ||
| verse_lines = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | | verse_line1 = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | ||
| verse_lines = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | | verse_line1 = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | ||
| verse_lines = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_line1 = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । | | verse_line1 = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । | ||
| verse_lines = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् ।;लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | |||
| verse_line2 = लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | | verse_line2 = लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | ||
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| verse_line1 = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | ||
| verse_lines = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_line1 = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | | verse_line1 = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | ||
| verse_lines = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | | verse_line1 = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | ||
| verse_lines = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | | verse_line1 = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | ||
| verse_lines = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_line1 = नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन । | | verse_line1 = नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन । | ||
| verse_lines = नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन ।;अम्बाया इव हि प्रायः कन्यावादरतिः क्वचित् ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = अम्बाया इव हि प्रायः कन्यावादरतिः क्वचित् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = अम्बाया इव हि प्रायः कन्यावादरतिः क्वचित् ॥ ५१ ॥ | ||
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| verse_line1 = मुग्धायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् । | | verse_line1 = मुग्धायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् । | ||
| verse_lines = मुग्धायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् ।;बुधोऽसतीं न बिभृयात् तां बिभ्रदुभयच्युतः ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = बुधोऽसतीं न बिभृयात् तां बिभ्रदुभयच्युतः ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = बुधोऽसतीं न बिभृयात् तां बिभ्रदुभयच्युतः ॥ ५२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | |||
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| Line 23,040: | Line 24,410: | ||
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| verse_line1 = रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = निहते रुग्मिणि श्याले नाब्रवीत् साध्वसाधु वा । | | verse_line1 = निहते रुग्मिणि श्याले नाब्रवीत् साध्वसाधु वा । | ||
| verse_lines = निहते रुग्मिणि श्याले नाब्रवीत् साध्वसाधु वा ।;रुग्मिणीबलयो राजन् स्नेहभङ्गभयाद् हरिः ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = रुग्मिणीबलयो राजन् स्नेहभङ्गभयाद् हरिः ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = रुग्मिणीबलयो राजन् स्नेहभङ्गभयाद् हरिः ॥ ५० ॥ | ||
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| Line 23,079: | Line 24,451: | ||
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| verse_line1 = श्रुत्वाऽजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः । | | verse_line1 = श्रुत्वाऽजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वाऽजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः ।;आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,122: | Line 24,496: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 23,130: | Line 24,505: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥ | | verse_line1 = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥ | |||
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| Line 23,138: | Line 24,514: | ||
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| verse_line1 = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि । | | verse_line1 = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि । | ||
| verse_lines = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि ।;तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 23,147: | Line 24,524: | ||
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| verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | |||
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| Line 23,164: | Line 24,542: | ||
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| verse_line1 = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,197: | Line 24,578: | ||
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| verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,214: | Line 24,596: | ||
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| verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,231: | Line 24,614: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,248: | Line 24,632: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | | verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | | verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | ||
| verse_lines = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे ।;तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | ||
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| verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | | verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | ||
| verse_lines = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,317: | Line 24,705: | ||
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| verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | | verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | ||
| verse_lines = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।;त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | ||
| verse_lines = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | ||
| verse_lines = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | ||
| verse_lines = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | ||
| verse_lines = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | ||
| verse_lines = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | ||
| verse_lines = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | ||
| verse_lines = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | | verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | ||
| verse_lines = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,505: | Line 24,904: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | ||
| verse_lines = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 23,513: | Line 24,913: | ||
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| verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,530: | Line 24,931: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | ||
| verse_lines = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | |||
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| Line 23,547: | Line 24,949: | ||
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| verse_line1 = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | ||
| verse_lines = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | |||
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| Line 23,555: | Line 24,958: | ||
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| verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,572: | Line 24,976: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | ||
| verse_lines = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,589: | Line 24,994: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | ||
| verse_lines = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,606: | Line 25,012: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | ||
| verse_lines = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,623: | Line 25,030: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | | verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | ||
| verse_lines = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः ।;समुद्धृतः पूर्वजैस्तैर्व्योमायनमहात्मभिः ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = समुद्धृतः पूर्वजैस्तैर्व्योमायनमहात्मभिः ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = समुद्धृतः पूर्वजैस्तैर्व्योमायनमहात्मभिः ॥ ४३ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् । | | verse_line1 = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् । | ||
| verse_lines = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् ।;पूूर्णः सद्यस्ततो राजन् प्राह वीरव्रतो गुरुम् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = पूूर्णः सद्यस्ततो राजन् प्राह वीरव्रतो गुरुम् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = पूूर्णः सद्यस्ततो राजन् प्राह वीरव्रतो गुरुम् ॥ ४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,650: | Line 25,059: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥ | | verse_line1 = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥ | ||
| verse_lines = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 23,658: | Line 25,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | | verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | ||
| verse_lines = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।;तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | | verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | ||
| verse_lines = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,709: | Line 25,122: | ||
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| verse_line1 = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च । | | verse_line1 = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च । | ||
| verse_lines = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।;सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,718: | Line 25,132: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,735: | Line 25,150: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 23,752: | Line 25,168: | ||
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| verse_line1 = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | ||
| verse_lines = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 23,760: | Line 25,177: | ||
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| verse_line1 = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | ||
| verse_lines = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| Line 23,777: | Line 25,195: | ||
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| verse_line1 = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | | verse_line1 = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | ||
| verse_lines = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_line1 = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | | verse_line1 = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | ||
| verse_lines = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
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| Line 23,793: | Line 25,213: | ||
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| verse_line1 = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | ||
| verse_lines = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_line1 = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति । | | verse_line1 = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति । | ||
| verse_lines = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।;विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः । | | verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः । | ||
| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।;संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | ||
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| verse_line1 = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा । | | verse_line1 = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा । | ||
| verse_lines = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।;सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | |||
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| Line 23,885: | Line 25,310: | ||
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| verse_line1 = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः । | | verse_line1 = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः । | ||
| verse_lines = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।;एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,894: | Line 25,320: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः । | | verse_line1 = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः । | ||
| verse_lines = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।;मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,903: | Line 25,330: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् । | | verse_line1 = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् । | ||
| verse_lines = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।;तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 23,921: | Line 25,349: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् । | | verse_line1 = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् । | ||
| verse_lines = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।;आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | |||
| verse_line2 = आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | | verse_line2 = आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | ||
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| Line 23,930: | Line 25,359: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । | | verse_line1 = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । | ||
| verse_lines = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।;अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 23,948: | Line 25,378: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप । | | verse_line1 = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप । | ||
| verse_lines = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।;अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,957: | Line 25,388: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते । | | verse_line1 = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते । | ||
| verse_lines = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।;सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 23,966: | Line 25,398: | ||
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| verse_line1 = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते । | | verse_line1 = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते । | ||
| verse_lines = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।;इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 23,992: | Line 25,426: | ||
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| verse_line1 = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | |||
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| Line 24,009: | Line 25,444: | ||
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| verse_line1 = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी । | | verse_line1 = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी । | ||
| verse_lines = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।;त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 24,018: | Line 25,454: | ||
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| verse_line1 = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | | verse_line1 = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | ||
| verse_lines = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | |||
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| Line 24,035: | Line 25,472: | ||
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| verse_line1 = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
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| Line 24,043: | Line 25,481: | ||
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| verse_line1 = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना । | | verse_line1 = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना । | ||
| verse_lines = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।;गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | ||
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| Line 24,052: | Line 25,491: | ||
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| verse_line1 = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् । | | verse_line1 = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् । | ||
| verse_lines = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।;अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 24,061: | Line 25,501: | ||
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| verse_line1 = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । | | verse_line1 = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । | ||
| verse_lines = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।;शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । | | verse_line1 = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । | ||
| verse_lines = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।;अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । | | verse_line1 = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । | ||
| verse_lines = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।;दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । | | verse_line1 = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । | ||
| verse_lines = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।;मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । | | verse_line1 = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । | ||
| verse_lines = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।;परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | ||
| verse_lines = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,159: | Line 25,605: | ||
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| verse_line1 = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | ||
| verse_lines = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,176: | Line 25,623: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,193: | Line 25,641: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | ||
| verse_lines = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,210: | Line 25,659: | ||
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| verse_line1 = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | ||
| verse_lines = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_line1 = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥ | | verse_line1 = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥ | ||
| verse_lines = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥ | |||
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| verse_line1 = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | | verse_line1 = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | ||
| verse_lines = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । | | verse_line1 = नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।;विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ ४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | ||
| verse_lines = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_line1 = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः । | | verse_line1 = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः । | ||
| verse_lines = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः ।;महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | ||
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| Line 24,296: | Line 25,751: | ||
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| verse_line1 = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः । | | verse_line1 = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः । | ||
| verse_lines = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः ।;द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः । | | verse_line1 = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः । | ||
| verse_lines = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः ।;शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | |||
| verse_line2 = शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | ||
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| Line 24,332: | Line 25,789: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः । | | verse_line1 = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः । | ||
| verse_lines = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः ।;यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | | verse_line2 = यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | ||
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| Line 24,354: | Line 25,812: | ||
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| verse_line1 = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् । | | verse_line1 = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् । | ||
| verse_lines = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।;स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | |||
| verse_line2 = स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | | verse_line2 = स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | ||
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| Line 24,372: | Line 25,831: | ||
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| verse_line1 = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,389: | Line 25,849: | ||
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| verse_line1 = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,406: | Line 25,867: | ||
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| verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,423: | Line 25,885: | ||
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| verse_line1 = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,440: | Line 25,903: | ||
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| verse_line1 = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | | verse_line1 = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,474: | Line 25,939: | ||
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| verse_line1 = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,491: | Line 25,957: | ||
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| verse_line1 = देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,512: | Line 25,979: | ||
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| verse_line1 = वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितश्रियो गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिषः । यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणा वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितश्रियो गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिषः । यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणा वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितश्रियो गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिषः । यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणा वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,529: | Line 25,997: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विहाय यज्ञान् सुराग््राहैरासुरवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विहाय यज्ञान् सुराग््राहैरासुरवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विहाय यज्ञान् सुराग््राहैरासुरवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 24,537: | Line 26,006: | ||
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| verse_line1 = धनं हि धर्मैकफलं यतोऽस्य ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्तिः । गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = धनं हि धर्मैकफलं यतोऽस्य ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्तिः । गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = धनं हि धर्मैकफलं यतोऽस्य ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्तिः । गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 24,545: | Line 26,015: | ||
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| verse_line1 = यद् घ््र•णभक्षो विहितः सुराया- स्तथा पशोरालभनं न हिंसा । एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = यद् घ््र•णभक्षो विहितः सुराया- स्तथा पशोरालभनं न हिंसा । एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = यद् घ््र•णभक्षो विहितः सुराया- स्तथा पशोरालभनं न हिंसा । एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥ १३ ॥ | |||
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| Line 24,562: | Line 26,033: | ||
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| verse_line1 = द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् । | | verse_line1 = द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् । | ||
| verse_lines = द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् ।;मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 24,580: | Line 26,052: | ||
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| verse_line1 = एवं युगानुरूपोऽसौ भगवान् युगवर्तिभिः । | | verse_line1 = एवं युगानुरूपोऽसौ भगवान् युगवर्तिभिः । | ||
| verse_lines = एवं युगानुरूपोऽसौ भगवान् युगवर्तिभिः ।;मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥ | ||
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| Line 24,598: | Line 26,071: | ||
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| verse_line1 = देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् । सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिचर्यया च ॥ ४२ ॥ | | verse_line1 = देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् । सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिचर्यया च ॥ ४२ ॥ | ||
| verse_lines = देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् । सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिचर्यया च ॥ ४२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 24,606: | Line 26,080: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वपादमूलं भजतः प््रिायस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ ४३ ॥ | | verse_line1 = स्वपादमूलं भजतः प््रिायस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ ४३ ॥ | ||
| verse_lines = स्वपादमूलं भजतः प््रिायस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ ४३ ॥ | |||
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| Line 24,623: | Line 26,098: | ||
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| verse_line1 = वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र- साल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियः पुनः किम् ॥ ४९ ॥ | | verse_line1 = वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र- साल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियः पुनः किम् ॥ ४९ ॥ | ||
| verse_lines = वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र- साल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियः पुनः किम् ॥ ४९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,644: | Line 26,120: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः । नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यः स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥ | | verse_line1 = त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः । नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यः स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥ | ||
| verse_lines = त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः । नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यः स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 24,652: | Line 26,129: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥ | | verse_line1 = स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥ | ||
| verse_lines = स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥ | |||
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| Line 24,669: | Line 26,147: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥ | |||
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| Line 24,686: | Line 26,165: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥ | |||
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| Line 24,720: | Line 26,201: | ||
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| verse_line1 = त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥ | |||
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| Line 24,737: | Line 26,219: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 24,754: | Line 26,237: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 24,771: | Line 26,255: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम । | | verse_line1 = यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम । | ||
| verse_lines = यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम ।;शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 24,789: | Line 26,274: | ||
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| verse_line1 = तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् । | | verse_line1 = तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् । | ||
| verse_lines = तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् ।;लोकं जिघृक्षत्यूर्ध्वं मे वेलामिव महार्णवः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = लोकं जिघृक्षत्यूर्ध्वं मे वेलामिव महार्णवः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = लोकं जिघृक्षत्यूर्ध्वं मे वेलामिव महार्णवः ॥ ३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 24,798: | Line 26,284: | ||
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| verse_line1 = यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् । | | verse_line1 = यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् । | ||
| verse_lines = यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् ।;गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुल्बणेन विनंक्ष्यति ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुल्बणेन विनंक्ष्यति ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुल्बणेन विनंक्ष्यति ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 24,816: | Line 26,303: | ||
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| verse_line1 = वाताशना महर्षयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः । | | verse_line1 = वाताशना महर्षयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः । | ||
| verse_lines = वाताशना महर्षयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः ।;ब््राह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥४८॥ | |||
| verse_line2 = ब््राह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥४८॥ | | verse_line2 = ब््राह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥४८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 24,825: | Line 26,313: | ||
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| verse_line1 = वयं त्विह महायोगिन् भ््रामन्तः कर्मवर्त्मसु । त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४९ ॥ | | verse_line1 = वयं त्विह महायोगिन् भ््रामन्तः कर्मवर्त्मसु । त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४९ ॥ | ||
| verse_lines = वयं त्विह महायोगिन् भ््रामन्तः कर्मवर्त्मसु । त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 24,833: | Line 26,322: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च । | | verse_line1 = स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च । | ||
| verse_lines = स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च ।;गत्युत्स्मितेक्षणोत्केलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = गत्युत्स्मितेक्षणोत्केलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = गत्युत्स्मितेक्षणोत्केलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ५० ॥ | ||
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| Line 24,855: | Line 26,345: | ||
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| verse_line1 = यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः । | | verse_line1 = यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः । | ||
| verse_lines = यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।;नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायां मनोमयीम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायां मनोमयीम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायां मनोमयीम् ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थे भ््रामः स गुणदोषकृत् । | | verse_line1 = पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थे भ््रामः स गुणदोषकृत् । | ||
| verse_lines = पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थे भ््रामः स गुणदोषकृत् ।;कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्माद् युक्तेन्द्रियग््र•मो युक्तचित्त इदं जगत् । | | verse_line1 = तस्माद् युक्तेन्द्रियग््र•मो युक्तचित्त इदं जगत् । | ||
| verse_lines = तस्माद् युक्तेन्द्रियग््र•मो युक्तचित्त इदं जगत् ।;आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् । | | verse_line1 = ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् । | ||
| verse_lines = ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् ।;आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यते ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यते ॥ १० ॥ | | verse_line2 = आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यते ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते । | | verse_line1 = दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते । | ||
| verse_lines = दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते ।;गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाऽर्भकः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाऽर्भकः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाऽर्भकः ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चलः । | | verse_line1 = सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चलः । | ||
| verse_lines = सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चलः ।;पश्यन् मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यन् मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = पश्यन् मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = उद्धव उवाच– योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव । निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = उद्धव उवाच– योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव । निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = उद्धव उवाच– योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव । निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब््राह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब््राह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब््राह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमखण्डविकुण्ठधिष्ण्यम् । निर्वेदधीरहरहर्वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमखण्डविकुण्ठधिष्ण्यम् । निर्वेदधीरहरहर्वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमखण्डविकुण्ठधिष्ण्यम् । निर्वेदधीरहरहर्वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्री भगवानुवाच– प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्वविचक्षणाः । समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = श्री भगवानुवाच– प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्वविचक्षणाः । समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = श्री भगवानुवाच– प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्वविचक्षणाः । समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वं हि नः पृच्छतां ब््राह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् । | | verse_line1 = त्वं हि नः पृच्छतां ब््राह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् । | ||
| verse_lines = त्वं हि नः पृच्छतां ब््राह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् ।;ब््राूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = ब््राूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = ब््राूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = शश्वत् परार्थसर्वेहां परार्थैकान्तसम्भवम् । | | verse_line1 = शश्वत् परार्थसर्वेहां परार्थैकान्तसम्भवम् । | ||
| verse_lines = शश्वत् परार्थसर्वेहां परार्थैकान्तसम्भवम् ।;साधुः शिक्षेत भूमेश्च अनुशिक्षं व््रातान्तरम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = साधुः शिक्षेत भूमेश्च अनुशिक्षं व््रातान्तरम् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = साधुः शिक्षेत भूमेश्च अनुशिक्षं व््रातान्तरम् ॥ ३८ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्तर्बहिश्च स्थिरजङ्गमेषु ब््राह्मात्मभावेन समन्वयेन । व्याप्त्याऽव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभोवद् विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥ | | verse_line1 = अन्तर्बहिश्च स्थिरजङ्गमेषु ब््राह्मात्मभावेन समन्वयेन । व्याप्त्याऽव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभोवद् विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥ | ||
| verse_lines = अन्तर्बहिश्च स्थिरजङ्गमेषु ब््राह्मात्मभावेन समन्वयेन । व्याप्त्याऽव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभोवद् विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_line1 = तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः । | | verse_line1 = तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः । | ||
| verse_lines = तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः ।;न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थवन्नृणाम् । | | verse_line1 = स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थवन्नृणाम् । | ||
| verse_lines = स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थवन्नृणाम् ।;मुनिः पुनात्यघान्मित्रमीक्षणस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = मुनिः पुनात्यघान्मित्रमीक्षणस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = मुनिः पुनात्यघान्मित्रमीक्षणस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षो दूरभाजनः । | | verse_line1 = तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षो दूरभाजनः । | ||
| verse_lines = तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षो दूरभाजनः ।;सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते पापमग्निवत् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते पापमग्निवत् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते पापमग्निवत् ॥ ४५ ॥ | ||
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| verse_line1 = क्वचिच्छन्नः क्वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम् । | | verse_line1 = क्वचिच्छन्नः क्वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम् । | ||
| verse_lines = क्वचिच्छन्नः क्वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम् ।;भुङ्क्त्े सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = भुङ्क्त्े सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = भुङ्क्त्े सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥ | ||
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| Line 25,138: | Line 26,645: | ||
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| verse_line1 = स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः । | | verse_line1 = स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः । | ||
| verse_lines = स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः ।;प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७ ॥ | ||
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| verse_line1 = कालनद्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ । | | verse_line1 = कालनद्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ । | ||
| verse_lines = कालनद्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ ।;नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथाऽर्चिषाम् ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथाऽर्चिषाम् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथाऽर्चिषाम् ॥ ४९ ॥ | ||
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| verse_line1 = बुद्धिसंस्थेन भेदेन व्यक्तस्थ इव तद्गतः । | | verse_line1 = बुद्धिसंस्थेन भेदेन व्यक्तस्थ इव तद्गतः । | ||
| verse_lines = बुद्धिसंस्थेन भेदेन व्यक्तस्थ इव तद्गतः ।;लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चाम्बुस्थितार्कवत् ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चाम्बुस्थितार्कवत् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चाम्बुस्थितार्कवत् ॥ ५१ ॥ | ||
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| verse_line1 = दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः । | | verse_line1 = दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः ।;प्रलोभितः पतन्त्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रलोभितः पतन्त्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = प्रलोभितः पतन्त्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः । | | verse_line1 = योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः । | ||
| verse_lines = योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः ।;प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_line1 = सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् । | | verse_line1 = सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् । | ||
| verse_lines = सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।;तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 25,245: | Line 26,758: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । | | verse_line1 = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । | ||
| verse_lines = वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।;एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 25,263: | Line 26,777: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 25,271: | Line 26,786: | ||
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| verse_line1 = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,288: | Line 26,804: | ||
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| verse_line1 = एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया । | | verse_line1 = एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया । | ||
| verse_lines = एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया ।;संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 25,297: | Line 26,814: | ||
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| verse_line1 = एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः । | | verse_line1 = एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः । | ||
| verse_lines = एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ।;कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,306: | Line 26,824: | ||
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| verse_line1 = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः । | | verse_line1 = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः । | ||
| verse_lines = सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ।;परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 25,324: | Line 26,843: | ||
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| verse_line1 = यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया । | | verse_line1 = यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया । | ||
| verse_lines = यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।;स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्सरूपताम् ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,333: | Line 26,853: | ||
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| verse_line1 = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः । | | verse_line1 = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः । | ||
| verse_lines = कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः ।;याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = याति तत्साम्यतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन् ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 25,351: | Line 26,872: | ||
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| verse_line1 = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥ | ||
| verse_lines = देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,368: | Line 26,890: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥ | ||
| verse_lines = जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,385: | Line 26,908: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् । | | verse_line1 = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् । | ||
| verse_lines = न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् ।;ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = ब््राह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 25,407: | Line 26,931: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः । | | verse_line1 = सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः । | ||
| verse_lines = सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः ।;नानात्मकत्वाद् विफलस्तथाऽभेदोऽन्यधीगुणैः॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = नानात्मकत्वाद् विफलस्तथाऽभेदोऽन्यधीगुणैः॥ ३ ॥ | | verse_line2 = नानात्मकत्वाद् विफलस्तथाऽभेदोऽन्यधीगुणैः॥ ३ ॥ | ||
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| Line 25,425: | Line 26,950: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् । | | verse_line1 = निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् । | ||
| verse_lines = निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् ।;जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनाम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनाम् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनाम् ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 25,443: | Line 26,969: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित् । | | verse_line1 = यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित् । | ||
| verse_lines = यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित् ।;मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 25,461: | Line 26,988: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान् । | | verse_line1 = निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान् । | ||
| verse_lines = निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान् ।;अनुप्रविष्ट आधत्ते एवं देहगुणान् परः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अनुप्रविष्ट आधत्ते एवं देहगुणान् परः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अनुप्रविष्ट आधत्ते एवं देहगुणान् परः ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,470: | Line 26,998: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि । | | verse_line1 = योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि । | ||
| verse_lines = योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि ।;संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसोऽविद्यास्थितात्मनः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसोऽविद्यास्थितात्मनः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसोऽविद्यास्थितात्मनः ॥ १० ॥ | ||
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| Line 25,488: | Line 27,017: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम् । | | verse_line1 = तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम् । | ||
| verse_lines = तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम् ।;सङ्गम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = सङ्गम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = सङ्गम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 25,506: | Line 27,036: | ||
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| verse_line1 = वैशारदी साऽतिविशुद्धबुद्धि- र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूतिम् । गुणांश्च संदह्य यदात्म्यमेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाऽग्निः ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = वैशारदी साऽतिविशुद्धबुद्धि- र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूतिम् । गुणांश्च संदह्य यदात्म्यमेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाऽग्निः ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = वैशारदी साऽतिविशुद्धबुद्धि- र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूतिम् । गुणांश्च संदह्य यदात्म्यमेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाऽग्निः ॥ १३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः । | | verse_line1 = अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः । | ||
| verse_lines = अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः ।;नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम् ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,532: | Line 27,064: | ||
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| verse_line1 = मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी तथा । | | verse_line1 = मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी तथा । | ||
| verse_lines = मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी तथा ।;तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,541: | Line 27,074: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवमप्यत्र सर्वेषां देहिनां देहयोगतः । | | verse_line1 = एवमप्यत्र सर्वेषां देहिनां देहयोगतः । | ||
| verse_lines = एवमप्यत्र सर्वेषां देहिनां देहयोगतः ।;कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 25,559: | Line 27,093: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते । | | verse_line1 = तत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते । | ||
| verse_lines = तत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते ।;भोक्तुश्च सुखदुःखानां कोन्वर्थो विवशं भजेत् ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = भोक्तुश्च सुखदुःखानां कोन्वर्थो विवशं भजेत् ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = भोक्तुश्च सुखदुःखानां कोन्वर्थो विवशं भजेत् ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 25,577: | Line 27,112: | ||
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| verse_line1 = न देहिनां सुखं किञ्चिद् विद्यते विदुषामपि । | | verse_line1 = न देहिनां सुखं किञ्चिद् विद्यते विदुषामपि । | ||
| verse_lines = न देहिनां सुखं किञ्चिद् विद्यते विदुषामपि ।;तथा च दुःखमूढानां वृथाऽहङ्कारिणां परम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा च दुःखमूढानां वृथाऽहङ्कारिणां परम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = तथा च दुःखमूढानां वृथाऽहङ्कारिणां परम् ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः । | | verse_line1 = यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः । | ||
| verse_lines = यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः ।;तेऽप्यद्धा न विदुर्योगं मृत्युर्न प्रभवेद् यथा ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = तेऽप्यद्धा न विदुर्योगं मृत्युर्न प्रभवेद् यथा ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = तेऽप्यद्धा न विदुर्योगं मृत्युर्न प्रभवेद् यथा ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 25,613: | Line 27,150: | ||
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| verse_line1 = गुणाः सृजन्ति कर्माणि कालो नु सृजते गुणान् । | | verse_line1 = गुणाः सृजन्ति कर्माणि कालो नु सृजते गुणान् । | ||
| verse_lines = गुणाः सृजन्ति कर्माणि कालो नु सृजते गुणान् ।;जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 25,622: | Line 27,160: | ||
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| verse_line1 = यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः । | | verse_line1 = यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः । | ||
| verse_lines = यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः ।;नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्त्र्यं तदैव हि ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्त्र्यं तदैव हि ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्त्र्यं तदैव हि ॥ ३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम् । य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचाऽर्पिताः ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम् । य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचाऽर्पिताः ॥ ३३ ॥ | ||
| verse_lines = यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम् । य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचाऽर्पिताः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = काल आत्माऽऽगमो लोकः स्वभावो धर्म एव च ।;इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरेऽसति ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = उद्धव उवाच– गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः । गुणैर्न बध्यतेऽदेही बध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = उद्धव उवाच– गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः । गुणैर्न बध्यतेऽदेही बध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = उद्धव उवाच– गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः । गुणैर्न बध्यतेऽदेही बध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतदच्युत मे ब््राूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर । | | verse_line1 = एतदच्युत मे ब््राूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर । | ||
| verse_lines = एतदच्युत मे ब््राूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।;नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे मतिः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,713: | Line 27,257: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया । | | verse_line1 = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया । | ||
| verse_lines = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया ।;स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥ | | verse_line2 = स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥ | ||
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| Line 25,731: | Line 27,276: | ||
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| verse_line1 = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् । | | verse_line1 = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् । | ||
| verse_lines = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् ।;मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 25,749: | Line 27,295: | ||
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| verse_line1 = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते । | | verse_line1 = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते । | ||
| verse_lines = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते ।;बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 25,767: | Line 27,314: | ||
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| verse_line1 = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते । | | verse_line1 = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते । | ||
| verse_lines = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते ।;विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 25,785: | Line 27,333: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,802: | Line 27,351: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 25,819: | Line 27,369: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः । | | verse_line1 = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः । | ||
| verse_lines = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः ।;ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 25,837: | Line 27,388: | ||
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| verse_line1 = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च । | | verse_line1 = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च । | ||
| verse_lines = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च ।;गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 25,855: | Line 27,407: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा । | | verse_line1 = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा । | ||
| verse_lines = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा ।;वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥ | | verse_line2 = वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥ | ||
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| Line 25,873: | Line 27,426: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने । | | verse_line1 = एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने । | ||
| verse_lines = एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने ।;दर्शनस्पर्शनघ््र•णभोजनश्रवणादिषु ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = दर्शनस्पर्शनघ््र•णभोजनश्रवणादिषु ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = दर्शनस्पर्शनघ््र•णभोजनश्रवणादिषु ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 25,882: | Line 27,436: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् । | | verse_line1 = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् । | ||
| verse_lines = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् ।;प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सविताऽनिलः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सविताऽनिलः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सविताऽनिलः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 25,900: | Line 27,455: | ||
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| verse_line1 = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः । | | verse_line1 = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः । | ||
| verse_lines = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः ।;प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 25,918: | Line 27,474: | ||
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| verse_line1 = न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा । | | verse_line1 = न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा । | ||
| verse_lines = न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा ।;वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 25,927: | Line 27,484: | ||
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| verse_line1 = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । | | verse_line1 = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । | ||
| verse_lines = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि ।;श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 25,962: | Line 27,521: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९ ॥ | |||
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| Line 25,970: | Line 27,530: | ||
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| verse_line1 = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि । | | verse_line1 = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि । | ||
| verse_lines = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि ।;उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 26,005: | Line 27,567: | ||
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| verse_line1 = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः । | | verse_line1 = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः । | ||
| verse_lines = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः ।;अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः । | | verse_line1 = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः । | ||
| verse_lines = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।;भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 26,041: | Line 27,605: | ||
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| verse_line1 = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया । | | verse_line1 = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया । | ||
| verse_lines = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया ।;वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि । | | verse_line1 = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि । | ||
| verse_lines = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि ।;क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्ते न दक्षिणाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्ते न दक्षिणाः ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्ते न दक्षिणाः ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 26,089: | Line 27,656: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व््रातानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः । | | verse_line1 = व््रातानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः । | ||
| verse_lines = व््रातानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः ।;यथाऽवरुन्धेन्मत्सङ्गः सर्वदुःखापहो हि माम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = यथाऽवरुन्धेन्मत्सङ्गः सर्वदुःखापहो हि माम् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = यथाऽवरुन्धेन्मत्सङ्गः सर्वदुःखापहो हि माम् ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,107: | Line 27,675: | ||
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| verse_line1 = मत्सङ्गेन तु दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः । | | verse_line1 = मत्सङ्गेन तु दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः । | ||
| verse_lines = मत्सङ्गेन तु दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः ।;गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 26,116: | Line 27,685: | ||
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| verse_line1 = विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः । | | verse_line1 = विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः । | ||
| verse_lines = विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः ।;रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,134: | Line 27,704: | ||
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| verse_line1 = ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः । | | verse_line1 = ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः । | ||
| verse_lines = ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः ।;अव्रतातप्ततपसो मत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥ | |||
| verse_line2 = अव्रतातप्ततपसो मत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥ | | verse_line2 = अव्रतातप्ततपसो मत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः । | | verse_line1 = केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः । | ||
| verse_lines = केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः ।;येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः । | | verse_line1 = यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः । | ||
| verse_lines = यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः ।;व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,161: | Line 27,734: | ||
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| verse_line1 = मत्कामा रमणं जारं मत्स्वरूपाविदोऽबलाः । | | verse_line1 = मत्कामा रमणं जारं मत्स्वरूपाविदोऽबलाः । | ||
| verse_lines = मत्कामा रमणं जारं मत्स्वरूपाविदोऽबलाः ।;ब््राह्म मां परमं प्रापुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ब््राह्म मां परमं प्रापुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ब््राह्म मां परमं प्रापुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदितां प्रतिचोदनाम् । | | verse_line1 = तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदितां प्रतिचोदनाम् । | ||
| verse_lines = तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदितां प्रतिचोदनाम् ।;प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् । | | verse_line1 = मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् । | ||
| verse_lines = मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।;याहि सर्वात्मभावेन यस्मिन्नस्त्यकुतोभयम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = याहि सर्वात्मभावेन यस्मिन्नस्त्यकुतोभयम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = याहि सर्वात्मभावेन यस्मिन्नस्त्यकुतोभयम् ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 26,206: | Line 27,782: | ||
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| verse_line1 = उद्धव उवाच– संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ््र•म्यति मे मनः ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = उद्धव उवाच– संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ््र•म्यति मे मनः ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = उद्धव उवाच– संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ््र•म्यति मे मनः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– य एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपैति रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठम् ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– य एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपैति रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठम् ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– य एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपैति रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठम् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथाऽनलः स्वेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिद्ध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = यथाऽनलः स्वेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिद्ध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = यथाऽनलः स्वेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिद्ध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं गतिः कर्म रतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजः सत्वतमोविकारः ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = एवं गतिः कर्म रतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजः सत्वतमोविकारः ॥ १९ ॥ | ||
| verse_lines = एवं गतिः कर्म रतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजः सत्वतमोविकारः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको जगतां यथाऽऽद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥ | | verse_line1 = अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको जगतां यथाऽऽद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको जगतां यथाऽऽद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥ | |||
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| Line 26,273: | Line 27,854: | ||
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| verse_line1 = यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटे यथा तन्तुवितानसंस्था । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटे यथा तन्तुवितानसंस्था । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥ | ||
| verse_lines = यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटे यथा तन्तुवितानसंस्था । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलः खं प्रविष्टः ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलः खं प्रविष्टः ॥ २२ ॥ | ||
| verse_lines = द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलः खं प्रविष्टः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अदन्ति चैकं फलमस्य गृध््र• ग््र•मेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एवं बहुरूपमिष्टं मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = अदन्ति चैकं फलमस्य गृध््र• ग््र•मेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एवं बहुरूपमिष्टं मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥ | ||
| verse_lines = अदन्ति चैकं फलमस्य गृध््र• ग््र•मेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एवं बहुरूपमिष्टं मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः । | | verse_line1 = सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः । | ||
| verse_lines = सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।;सात्विकोपात्तया ज्ञानं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = सात्विकोपात्तया ज्ञानं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥ | | verse_line2 = सात्विकोपात्तया ज्ञानं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । | | verse_line1 = वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । | ||
| verse_lines = वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् ।;एवं गुणव्यत्ययजो वेदः शाम्यति तद् यथा ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं गुणव्यत्ययजो वेदः शाम्यति तद् यथा ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = एवं गुणव्यत्ययजो वेदः शाम्यति तद् यथा ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूर्भूतभावनः । ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूर्भूतभावनः । ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूर्भूतभावनः । ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् । | | verse_line1 = स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् । | ||
| verse_lines = स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् ।;तस्याहं हंसरूपेण समीपमगमं तदा ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्याहं हंसरूपेण समीपमगमं तदा ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = तस्याहं हंसरूपेण समीपमगमं तदा ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः । | | verse_line1 = वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः । | ||
| verse_lines = वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः ।;कथं घटेत वो विप्रा वक्तुं वाऽनेक आश्रयः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = कथं घटेत वो विप्रा वक्तुं वाऽनेक आश्रयः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = कथं घटेत वो विप्रा वक्तुं वाऽनेक आश्रयः ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । | | verse_line1 = पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । | ||
| verse_lines = पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः ।;को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो निरर्थकः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो निरर्थकः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो निरर्थकः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । | | verse_line1 = मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । | ||
| verse_lines = मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।;अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । | | verse_line1 = गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । | ||
| verse_lines = गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः ।;जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । | | verse_line1 = गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । | ||
| verse_lines = गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया ।;गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः । | | verse_line1 = यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः । | ||
| verse_lines = यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः ।;मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तु गुणचेतसाम् ॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तु गुणचेतसाम् ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तु गुणचेतसाम् ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 26,497: | Line 28,092: | ||
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| verse_line1 = यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । | | verse_line1 = यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । | ||
| verse_lines = यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।;जाग््रात्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = जाग््रात्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = जाग््रात्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा । | | verse_line1 = असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा । | ||
| verse_lines = असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा ।;गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥ | ||
| verse_lines = यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥ | |||
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| Line 26,550: | Line 28,148: | ||
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| verse_line1 = वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥ | ||
| verse_lines = वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥ | ||
| verse_lines = देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_line1 = देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥ | ||
| verse_lines = देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_line1 = मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । | | verse_line1 = मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । | ||
| verse_lines = मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् ।;सुहृदं परमात्मानं साम्यासङ्गादयो गुणाः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_line1 = तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा । | | verse_line1 = तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा । | ||
| verse_lines = तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा ।;ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब््राह्म महर्षयः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब््राह्म महर्षयः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब््राह्म महर्षयः ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयो नृणाम् । | | verse_line1 = एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयो नृणाम् । | ||
| verse_lines = एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयो नृणाम् ।;पारम्पर्येण केषाञ्चित् पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = पारम्पर्येण केषाञ्चित् पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = पारम्पर्येण केषाञ्चित् पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,676: | Line 28,281: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ । | | verse_line1 = मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ । | ||
| verse_lines = मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ ।;श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,685: | Line 28,291: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम् । | | verse_line1 = धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम् । | ||
| verse_lines = धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम् ।;अन्ये वदन्ति चार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजने । केचिद् यज्ञं तपो दानं व्रतानि नियमान् यमान् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = अन्ये वदन्ति चार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजने । केचिद् यज्ञं तपो दानं व्रतानि नियमान् यमान् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = अन्ये वदन्ति चार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजने । केचिद् यज्ञं तपो दानं व्रतानि नियमान् यमान् ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,694: | Line 28,301: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः । | | verse_line1 = आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः । | ||
| verse_lines = आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः ।;दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 26,712: | Line 28,320: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न तथा मे प््रिायतम आत्मयोनिर्न शङ्करः । | | verse_line1 = न तथा मे प््रिायतम आत्मयोनिर्न शङ्करः । | ||
| verse_lines = न तथा मे प््रिायतम आत्मयोनिर्न शङ्करः ।;न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवाऽत्मा च यथा भवान् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवाऽत्मा च यथा भवान् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवाऽत्मा च यथा भवान् ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 26,730: | Line 28,339: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् । | | verse_line1 = निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् । | ||
| verse_lines = निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् ।;अनुव््राजाम्यहं नित्यं पूयेय स्वाङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = अनुव््राजाम्यहं नित्यं पूयेय स्वाङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = अनुव््राजाम्यहं नित्यं पूयेय स्वाङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 26,748: | Line 28,358: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना । | | verse_line1 = कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना । | ||
| verse_lines = कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना ।;विनाऽऽनन्दाश्रुकलया तुष्येत् भक्त्या विनेश्वरः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = विनाऽऽनन्दाश्रुकलया तुष्येत् भक्त्या विनेश्वरः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = विनाऽऽनन्दाश्रुकलया तुष्येत् भक्त्या विनेश्वरः ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,757: | Line 28,368: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च । विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च । विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४ ॥ | ||
| verse_lines = वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च । विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 26,774: | Line 28,386: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्त्रीसङ्गसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् । | | verse_line1 = स्त्रीसङ्गसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् । | ||
| verse_lines = स्त्रीसङ्गसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् ।;क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,783: | Line 28,396: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न तथाऽस्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः । | | verse_line1 = न तथाऽस्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः । | ||
| verse_lines = न तथाऽस्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः ।;योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,801: | Line 28,415: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणसंयममभ्यसेत् । | | verse_line1 = एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणसंयममभ्यसेत् । | ||
| verse_lines = एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणसंयममभ्यसेत् ।;दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,819: | Line 28,434: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योमि्न धारयेत् । | | verse_line1 = तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योमि्न धारयेत् । | ||
| verse_lines = तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योमि्न धारयेत् ।;तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,837: | Line 28,453: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि । | | verse_line1 = एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि । | ||
| verse_lines = एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि ।;विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम् ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम् ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,855: | Line 28,472: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ध्यानेनेत्थं सुतीव््रोण युञ्जतो योगिनो मनः । | | verse_line1 = ध्यानेनेत्थं सुतीव््रोण युञ्जतो योगिनो मनः । | ||
| verse_lines = ध्यानेनेत्थं सुतीव््रोण युञ्जतो योगिनो मनः ।;संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ््रामः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ््रामः ॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ््रामः ॥ ४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,877: | Line 28,495: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगैः । तासामष्टौ मत्प्रधाना ता एव गुणहेतवः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगैः । तासामष्टौ मत्प्रधाना ता एव गुणहेतवः ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगैः । तासामष्टौ मत्प्रधाना ता एव गुणहेतवः ॥ ३ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 26,894: | Line 28,513: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः । | | verse_line1 = अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः । | ||
| verse_lines = अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः ।;प्राकाश्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप््रोरणमीशिता ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राकाश्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप््रोरणमीशिता ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = प्राकाश्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप््रोरणमीशिता ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,903: | Line 28,523: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवाप्स्यति । | | verse_line1 = गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवाप्स्यति । | ||
| verse_lines = गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवाप्स्यति ।;एता मे सिद्धयः सौम्याष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = एता मे सिद्धयः सौम्याष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = एता मे सिद्धयः सौम्याष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 26,921: | Line 28,542: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम् । | | verse_line1 = अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम् । | ||
| verse_lines = अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम् ।;मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,930: | Line 28,552: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम् । | | verse_line1 = स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम् । | ||
| verse_lines = स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम् ।;यथासङ्कल्पसंसिद्धिराज्ञाऽप्रतिहतागतिः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = यथासङ्कल्पसंसिद्धिराज्ञाऽप्रतिहतागतिः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = यथासङ्कल्पसंसिद्धिराज्ञाऽप्रतिहतागतिः ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26,939: | Line 28,562: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता । | | verse_line1 = त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता । | ||
| verse_lines = त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता ।;अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिस्तम्भोऽपराजयः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिस्तम्भोऽपराजयः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिस्तम्भोऽपराजयः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,957: | Line 28,581: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयन् मनः । | | verse_line1 = भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयन् मनः । | ||
| verse_lines = भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयन् मनः ।;अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥ १० ॥ | | verse_line2 = अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,975: | Line 28,600: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = महत्यात्मन् मयि परे यथासंस्थं मनो दधत् । | | verse_line1 = महत्यात्मन् मयि परे यथासंस्थं मनो दधत् । | ||
| verse_lines = महत्यात्मन् मयि परे यथासंस्थं मनो दधत् ।;महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक्पृथक् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक्पृथक् ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक्पृथक् ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 26,993: | Line 28,619: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन् । | | verse_line1 = परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन् । | ||
| verse_lines = परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन् ।;कालसूक्ष्मात्मके योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = कालसूक्ष्मात्मके योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = कालसूक्ष्मात्मके योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,011: | Line 28,638: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धारयन् मय्यहन्तत्वे मनो वैकारिकेऽखिलम् । | | verse_line1 = धारयन् मय्यहन्तत्वे मनो वैकारिकेऽखिलम् । | ||
| verse_lines = धारयन् मय्यहन्तत्वे मनो वैकारिकेऽखिलम् ।;सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,029: | Line 28,657: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयन् मयि मानसम् । | | verse_line1 = महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयन् मयि मानसम् । | ||
| verse_lines = महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयन् मयि मानसम् ।;प्राकाश्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राकाश्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = प्राकाश्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 27,047: | Line 28,676: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग््राहे । | | verse_line1 = विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग््राहे । | ||
| verse_lines = विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग््राहे ।;स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनम् ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 27,065: | Line 28,695: | ||
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| verse_line1 = श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि । | | verse_line1 = श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि । | ||
| verse_lines = श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि ।;धारयन् श्वेततां याति षडूर्मिरहितोऽमरः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = धारयन् श्वेततां याति षडूर्मिरहितोऽमरः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = धारयन् श्वेततां याति षडूर्मिरहितोऽमरः ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,083: | Line 28,714: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन् । | | verse_line1 = मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन् । | ||
| verse_lines = मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन् ।;तत्रोपलब्धाभूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्रोपलब्धाभूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = तत्रोपलब्धाभूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,101: | Line 28,733: | ||
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| verse_line1 = मनो मनसि संयोज्य देहं तदनु वायुना । | | verse_line1 = मनो मनसि संयोज्य देहं तदनु वायुना । | ||
| verse_lines = मनो मनसि संयोज्य देहं तदनु वायुना ।;मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 27,119: | Line 28,752: | ||
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| verse_line1 = यदा मन उपादाय यद्यद् रूपं बुभूषति । | | verse_line1 = यदा मन उपादाय यद्यद् रूपं बुभूषति । | ||
| verse_lines = यदा मन उपादाय यद्यद् रूपं बुभूषति ।;तत्तद् भजेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रितः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्तद् भजेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रितः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तत्तद् भजेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रितः ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,128: | Line 28,762: | ||
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| verse_line1 = परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् । | | verse_line1 = परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् । | ||
| verse_lines = परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् ।;पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्घ्रिवत् ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,137: | Line 28,772: | ||
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| verse_line1 = पार्ष्ण्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु । | | verse_line1 = पार्ष्ण्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु । | ||
| verse_lines = पार्ष्ण्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु ।;आरोप्य ब््राह्मरन्ध््रोण ब््राह्म नीत्वोत्सृजेत् तनुम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = आरोप्य ब््राह्मरन्ध््रोण ब््राह्म नीत्वोत्सृजेत् तनुम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = आरोप्य ब््राह्मरन्ध््रोण ब््राह्म नीत्वोत्सृजेत् तनुम् ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,146: | Line 28,782: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् । | | verse_line1 = यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् । | ||
| verse_lines = यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् ।;न कुतश्चन हन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = न कुतश्चन हन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = न कुतश्चन हन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,155: | Line 28,792: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मद्भक्त्या शुद्धसत्वस्य योगिनो धारणाविदः । | | verse_line1 = मद्भक्त्या शुद्धसत्वस्य योगिनो धारणाविदः । | ||
| verse_lines = मद्भक्त्या शुद्धसत्वस्य योगिनो धारणाविदः ।;तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता ॥ २८॥ | |||
| verse_line2 = तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता ॥ २८॥ | | verse_line2 = तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता ॥ २८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,164: | Line 28,802: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः । | | verse_line1 = अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः । | ||
| verse_lines = अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः ।;मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकैर्यथा ॥ २९॥ | |||
| verse_line2 = मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकैर्यथा ॥ २९॥ | | verse_line2 = मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकैर्यथा ॥ २९॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,182: | Line 28,821: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उपासकस्य मामेवं योगधारणया पुनः । | | verse_line1 = उपासकस्य मामेवं योगधारणया पुनः । | ||
| verse_lines = उपासकस्य मामेवं योगधारणया पुनः ।;सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥ ३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,191: | Line 28,831: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः । | | verse_line1 = जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः । | ||
| verse_lines = जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः ।;मद्धारणां धारयतः का नु सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = मद्धारणां धारयतः का नु सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = मद्धारणां धारयतः का नु सिद्धिः सुदुर्लभा ॥ ३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,200: | Line 28,841: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्तरायान् वदन्त्येतान् युञ्जतो योगमुत्तमम् । | | verse_line1 = अन्तरायान् वदन्त्येतान् युञ्जतो योगमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = अन्तरायान् वदन्त्येतान् युञ्जतो योगमुत्तमम् ।;मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 27,218: | Line 28,860: | ||
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| verse_line1 = जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः । | | verse_line1 = जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः । | ||
| verse_lines = जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः ।;योगेनाप्नोति ताः सर्वा यैर्यैर्योगगतिं व््राजेत् ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = योगेनाप्नोति ताः सर्वा यैर्यैर्योगगतिं व््राजेत् ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = योगेनाप्नोति ताः सर्वा यैर्यैर्योगगतिं व््राजेत् ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,240: | Line 28,883: | ||
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| verse_line1 = अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः । | | verse_line1 = अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः । | ||
| verse_lines = अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः ।;अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 27,258: | Line 28,902: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम् । | | verse_line1 = अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम् । | ||
| verse_lines = अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम् ।;गुणानामप्यहं सौम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = गुणानामप्यहं सौम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = गुणानामप्यहं सौम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,267: | Line 28,912: | ||
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| verse_line1 = गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् । सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् । सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् । सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः ॥ ११ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 27,284: | Line 28,930: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हिरण्यगर्भो देवानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् । | | verse_line1 = हिरण्यगर्भो देवानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् । | ||
| verse_lines = हिरण्यगर्भो देवानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् ।;अक्षराणामकारोऽस्मि पदानि च्छन्दसामहम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अक्षराणामकारोऽस्मि पदानि च्छन्दसामहम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अक्षराणामकारोऽस्मि पदानि च्छन्दसामहम् ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 27,302: | Line 28,949: | ||
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| verse_line1 = इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् । | | verse_line1 = इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् । | ||
| verse_lines = इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् ।;आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् । | | verse_line1 = उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् । | ||
| verse_lines = उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् ।;यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 27,329: | Line 28,978: | ||
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| verse_line1 = नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम् । | | verse_line1 = नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम् । | ||
| verse_lines = नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम् ।;आश्रमाणां तुरीयोऽहं वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥१९॥ | |||
| verse_line2 = आश्रमाणां तुरीयोऽहं वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥१९॥ | | verse_line2 = आश्रमाणां तुरीयोऽहं वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥१९॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब््राह्मिष्ठानां बृहस्पतिः । | | verse_line1 = पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब््राह्मिष्ठानां बृहस्पतिः । | ||
| verse_lines = पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब््राह्मिष्ठानां बृहस्पतिः ।;स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग््राण्यां भगवानजः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग््राण्यां भगवानजः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग््राण्यां भगवानजः ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् । | | verse_line1 = योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् । | ||
| verse_lines = योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् ।;आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 27,383: | Line 29,035: | ||
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| verse_line1 = स्त्रीणां तु शतरूपाऽहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः । | | verse_line1 = स्त्रीणां तु शतरूपाऽहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः । | ||
| verse_lines = स्त्रीणां तु शतरूपाऽहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः ।;नारायणो मुनीनां च कुमारो ब््राह्मचारिणाम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = नारायणो मुनीनां च कुमारो ब््राह्मचारिणाम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = नारायणो मुनीनां च कुमारो ब््राह्मचारिणाम् ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् । | | verse_line1 = वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् । | ||
| verse_lines = वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् ।;किम्पुरुषाणां च हनुमान् विद्याध््र•णां सुदर्शनः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = किम्पुरुषाणां च हनुमान् विद्याध््र•णां सुदर्शनः ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = किम्पुरुषाणां च हनुमान् विद्याध््र•णां सुदर्शनः ॥ २९ ॥ | ||
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| verse_line1 = ओजः सहोबलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम् । | | verse_line1 = ओजः सहोबलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम् । | ||
| verse_lines = ओजः सहोबलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम् ।;सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं पुरा ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं पुरा ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं पुरा ॥ ३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = विश्वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् । | | verse_line1 = विश्वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् । | ||
| verse_lines = विश्वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् ।;भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुवः ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुवः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुवः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 27,446: | Line 29,102: | ||
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| verse_line1 = अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः । | | verse_line1 = अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः । | ||
| verse_lines = अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः ।;प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः ॥ ३४ ॥ | ||
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| verse_line1 = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् । | | verse_line1 = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् । | ||
| verse_lines = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् ।;विकारः पुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्वं तमः परः । अहमेतत्प्रसङ्ख्यानं ज्ञानं तत्वविनिश्चयः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = विकारः पुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्वं तमः परः । अहमेतत्प्रसङ्ख्यानं ज्ञानं तत्वविनिश्चयः ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = विकारः पुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्वं तमः परः । अहमेतत्प्रसङ्ख्यानं ज्ञानं तत्वविनिश्चयः ॥ ३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,473: | Line 29,131: | ||
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| verse_line1 = मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना । | | verse_line1 = मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना । | ||
| verse_lines = मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना ।;सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सङ्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया । | | verse_line1 = सङ्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया । | ||
| verse_lines = सङ्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया ।;न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 27,509: | Line 29,169: | ||
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| verse_line1 = एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः । | | verse_line1 = एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः । | ||
| verse_lines = एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः ।;मनोविकारा एवैते तथा वाचाऽभिधीयते ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोविकारा एवैते तथा वाचाऽभिधीयते ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = मनोविकारा एवैते तथा वाचाऽभिधीयते ॥ ४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणं यच्छेन्द्रियाणि च । आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्प्यसेऽध्वने ॥ ४२ ॥ | | verse_line1 = वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणं यच्छेन्द्रियाणि च । आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्प्यसेऽध्वने ॥ ४२ ॥ | ||
| verse_lines = वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणं यच्छेन्द्रियाणि च । आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्प्यसेऽध्वने ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_line1 = यो वै वाङ्मनसी सम्यङ् न संयच्छेद् धिया यतिः । | | verse_line1 = यो वै वाङ्मनसी सम्यङ् न संयच्छेद् धिया यतिः । | ||
| verse_lines = यो वै वाङ्मनसी सम्यङ् न संयच्छेद् धिया यतिः ।;तस्य व््रातं तपो ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत् ॥ ४३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = तस्माद् वचोमनःप्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः । | | verse_line1 = तस्माद् वचोमनःप्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः । | ||
| verse_lines = तस्माद् वचोमनःप्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः ।;मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते ॥ ४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = वक्ता कर्ताऽविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि । | | verse_line1 = वक्ता कर्ताऽविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि । | ||
| verse_lines = वक्ता कर्ताऽविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि ।;सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = वेदाध्यायी स्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् । | | verse_line1 = वेदाध्यायी स्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् । | ||
| verse_lines = वेदाध्यायी स्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् ।;देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥५०॥ | |||
| verse_line2 = देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥५०॥ | | verse_line2 = देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥५०॥ | ||
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| verse_line1 = विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः । | | verse_line1 = विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः । | ||
| verse_lines = विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः ।;विघ्नं कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = विघ्नं कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = विघ्नं कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसम्भृतम् । | | verse_line1 = यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसम्भृतम् । | ||
| verse_lines = यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसम्भृतम् ।;सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ २७ ॥ | |||
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| Line 27,642: | Line 29,310: | ||
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| verse_line1 = वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी । | | verse_line1 = वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी । | ||
| verse_lines = वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।;शुष्कवादविवादेन कञ्चित्पक्षं न संश्रयेत् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = शुष्कवादविवादेन कञ्चित्पक्षं न संश्रयेत् ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = शुष्कवादविवादेन कञ्चित्पक्षं न संश्रयेत् ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,660: | Line 29,329: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः । | | verse_line1 = एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः । | ||
| verse_lines = एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः ।;खं यद्वदुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = खं यद्वदुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = खं यद्वदुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,678: | Line 29,348: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् । | | verse_line1 = शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् । | ||
| verse_lines = शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् ।;अन्यांश्च नियमान् ज्ञानी यथाऽहं लीलयेश्वरः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्यांश्च नियमान् ज्ञानी यथाऽहं लीलयेश्वरः ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = अन्यांश्च नियमान् ज्ञानी यथाऽहं लीलयेश्वरः ॥ ३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,687: | Line 29,358: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नहि तस्य विकल्पाख्या क्रिया मद्वीक्षया हता । | | verse_line1 = नहि तस्य विकल्पाख्या क्रिया मद्वीक्षया हता । | ||
| verse_lines = नहि तस्य विकल्पाख्या क्रिया मद्वीक्षया हता ।;आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥३८॥ | |||
| verse_line2 = आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥३८॥ | | verse_line2 = आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥३८॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,705: | Line 29,377: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः । | | verse_line1 = तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः । | ||
| verse_lines = तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः ।;यावद् ब््राह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = यावद् ब््राह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = यावद् ब््राह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 27,727: | Line 29,400: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 27,744: | Line 29,418: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 27,761: | Line 29,436: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै । | | verse_line1 = नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै । | ||
| verse_lines = नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै ।;ईक्षेतान्वेकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = ईक्षेतान्वेकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = ईक्षेतान्वेकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,770: | Line 29,446: | ||
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| verse_line1 = एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् । | | verse_line1 = एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् । | ||
| verse_lines = एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् ।;स्थित्युत्पत्त्यप्यया नः स्युर्भावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थित्युत्पत्त्यप्यया नः स्युर्भावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = स्थित्युत्पत्त्यप्यया नः स्युर्भावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,779: | Line 29,456: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् । | | verse_line1 = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् । | ||
| verse_lines = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् ।;पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,797: | Line 29,475: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् । | | verse_line1 = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् । | ||
| verse_lines = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् ।;प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 27,815: | Line 29,494: | ||
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| verse_line1 = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् । | | verse_line1 = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् । | ||
| verse_lines = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् ।;गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 27,833: | Line 29,513: | ||
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| verse_line1 = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः । | | verse_line1 = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः ।;गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥ | ||
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| Line 27,855: | Line 29,536: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणदोषभिदादृष्टिर्नियमात् तेन हि स्वतः । | | verse_line1 = गुणदोषभिदादृष्टिर्नियमात् तेन हि स्वतः । | ||
| verse_lines = गुणदोषभिदादृष्टिर्नियमात् तेन हि स्वतः ।;नियमेनापवादश्च भिदाया इति हि भ्रमः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = नियमेनापवादश्च भिदाया इति हि भ्रमः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = नियमेनापवादश्च भिदाया इति हि भ्रमः ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,864: | Line 29,546: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 27,872: | Line 29,555: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु । | | verse_line1 = निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु । | ||
| verse_lines = निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु ।;तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कर्मिणाम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कर्मिणाम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कर्मिणाम् ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 27,881: | Line 29,565: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् । | | verse_line1 = यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् । | ||
| verse_lines = यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् ।;न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,899: | Line 29,584: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नृदेहमासाद्य सुदुर्लभं यः प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स मार्गणः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = नृदेहमासाद्य सुदुर्लभं यः प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स मार्गणः ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = नृदेहमासाद्य सुदुर्लभं यः प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स मार्गणः ॥ १७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 27,916: | Line 29,602: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः । | | verse_line1 = कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः । | ||
| verse_lines = कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।;गुणदोषविधानेन त्वंहसां त्याजनेच्छया ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणदोषविधानेन त्वंहसां त्याजनेच्छया ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = गुणदोषविधानेन त्वंहसां त्याजनेच्छया ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,934: | Line 29,621: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भिद्यते हृदयग््रान्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | | verse_line1 = भिद्यते हृदयग््रान्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | ||
| verse_lines = भिद्यते हृदयग््रान्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।;क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥ ३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 27,952: | Line 29,640: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः । | | verse_line1 = तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः । | ||
| verse_lines = तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः ।;न ज्ञानान्न च वैराग्यात् प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = न ज्ञानान्न च वैराग्यात् प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = न ज्ञानान्न च वैराग्यात् प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 27,970: | Line 29,659: | ||
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| verse_line1 = यत् कर्मभिर्यत् तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । | | verse_line1 = यत् कर्मभिर्यत् तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । | ||
| verse_lines = यत् कर्मभिर्यत् तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् ।;योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥ ३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा । | | verse_line1 = सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा । | ||
| verse_lines = सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा ।;स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथञ्चिद् यदि वाञ्छति ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथञ्चिद् यदि वाञ्छति ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथञ्चिद् यदि वाञ्छति ॥ ३४ ॥ | ||
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| verse_line1 = न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम । वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम । वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३५ ॥ | ||
| verse_lines = न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम । वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमकल्मषम् । तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमकल्मषम् । तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३६ ॥ | ||
| verse_lines = नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमकल्मषम् । तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_line1 = न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः । | | verse_line1 = न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः । | ||
| verse_lines = न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः ।;साधूनां समचित्तानां बुद्धेः पारमुपेयुषाम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = साधूनां समचित्तानां बुद्धेः पारमुपेयुषाम् ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = साधूनां समचित्तानां बुद्धेः पारमुपेयुषाम् ॥ ३७ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः । क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः । क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३८ ॥ | ||
| verse_lines = एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः । क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु ।;द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः । | | verse_line1 = भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः । | ||
| verse_lines = भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः ।;आब्रह्मस्थावरादीनां शरीरा आत्मसंयुताः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = भेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि । | | verse_line1 = भेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि । | ||
| verse_lines = भेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि ।;धातुशुद्ध्यै विकल्प्यन्त एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = कृष्णसारोऽथ देशानां ब्राह्मणानां शुचिर्भवेत् । | | verse_line1 = कृष्णसारोऽथ देशानां ब्राह्मणानां शुचिर्भवेत् । | ||
| verse_lines = कृष्णसारोऽथ देशानां ब्राह्मणानां शुचिर्भवेत् ।;कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा । | | verse_line1 = कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा । | ||
| verse_lines = कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा ।;यतो निवर्तते कर्म सदोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = यतो निवर्तते कर्म सदोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = यतो निवर्तते कर्म सदोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः । | | verse_line1 = क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः । | ||
| verse_lines = क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः ।;गुणदोषार्थनियमस्तद्विदामेव बाधते ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणदोषार्थनियमस्तद्विदामेव बाधते ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = गुणदोषार्थनियमस्तद्विदामेव बाधते ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,115: | Line 29,816: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समानकर्माचरणेऽपतितानां न पातकम् । | | verse_line1 = समानकर्माचरणेऽपतितानां न पातकम् । | ||
| verse_lines = समानकर्माचरणेऽपतितानां न पातकम् ।;औत्पत्तिको गुणैः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = औत्पत्तिको गुणैः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = औत्पत्तिको गुणैः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,124: | Line 29,826: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः । एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः । एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः । एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः ॥ १८ ॥ | |||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
}} | }} | ||
| Line 28,141: | Line 29,844: | ||
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| verse_line1 = विषयेषु गुणध्यानात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत् । | | verse_line1 = विषयेषु गुणध्यानात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत् । | ||
| verse_lines = विषयेषु गुणध्यानात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत् ।;सङ्गादेव भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = सङ्गादेव भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = सङ्गादेव भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,150: | Line 29,854: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तदनुवर्तते । | | verse_line1 = कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तदनुवर्तते । | ||
| verse_lines = कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तदनुवर्तते ।;तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी ततः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी ततः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी ततः ॥ २० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,159: | Line 29,864: | ||
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| verse_line1 = तया च रहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते । | | verse_line1 = तया च रहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते । | ||
| verse_lines = तया च रहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते ।;ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशोऽ)मूर्च्छितस्य मृतस्य च ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशोऽ)मूर्च्छितस्य मृतस्य च ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशोऽ)मूर्च्छितस्य मृतस्य च ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,168: | Line 29,874: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं वेद नापरम् । | | verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं वेद नापरम् । | ||
| verse_lines = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं वेद नापरम् ।;वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं ग्रस्तवयाः श्वसन् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं ग्रस्तवयाः श्वसन् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं ग्रस्तवयाः श्वसन् ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 28,186: | Line 29,893: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = फलश्रुतिरियं नॄणां नः श्रेयोरोचनं परम् । | | verse_line1 = फलश्रुतिरियं नॄणां नः श्रेयोरोचनं परम् । | ||
| verse_lines = फलश्रुतिरियं नॄणां नः श्रेयोरोचनं परम् ।;श्रोतुर्विवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रोतुर्विवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = श्रोतुर्विवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम् ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,195: | Line 29,903: | ||
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| verse_line1 = उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च । | | verse_line1 = उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च । | ||
| verse_lines = उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च ।;आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,204: | Line 29,913: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि । | | verse_line1 = न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि । | ||
| verse_lines = न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि ।;कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 28,222: | Line 29,932: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः । | | verse_line1 = एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः । | ||
| verse_lines = एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः ।;फलश्रुतिं कुसुमितामवेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = फलश्रुतिं कुसुमितामवेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = फलश्रुतिं कुसुमितामवेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 28,240: | Line 29,951: | ||
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| verse_line1 = कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु पलबुद्धयः । | | verse_line1 = कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु पलबुद्धयः । | ||
| verse_lines = कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु पलबुद्धयः ।;अग्निमुग्धा धूमतान्ताः स्वलोकं न विदन्ति ते ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = अग्निमुग्धा धूमतान्ताः स्वलोकं न विदन्ति ते ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = अग्निमुग्धा धूमतान्ताः स्वलोकं न विदन्ति ते ॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,249: | Line 29,961: | ||
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| verse_line1 = न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः । उक्थशासो ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः । उक्थशासो ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः । उक्थशासो ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः ॥ २८ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 28,257: | Line 29,970: | ||
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| verse_line1 = ते मे मतमविज्ञाय परोक्षविषयात्मकाः । हिंसायां यदि कामः स्याद् यज्ञ एव न चोदना ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = ते मे मतमविज्ञाय परोक्षविषयात्मकाः । हिंसायां यदि कामः स्याद् यज्ञ एव न चोदना ॥ २९ ॥ | ||
| verse_lines = ते मे मतमविज्ञाय परोक्षविषयात्मकाः । हिंसायां यदि कामः स्याद् यज्ञ एव न चोदना ॥ २९ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 28,274: | Line 29,988: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया । | | verse_line1 = हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया । | ||
| verse_lines = हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया ।;यजन्ते देवता यज्ञैः पितॄन् भूतपतीन् खलाः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = यजन्ते देवता यज्ञैः पितॄन् भूतपतीन् खलाः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = यजन्ते देवता यज्ञैः पितॄन् भूतपतीन् खलाः ॥ ३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,292: | Line 30,007: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः । | | verse_line1 = रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः । | ||
| verse_lines = रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः ।;उपासते इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न यथैव माम् ॥३२॥ | |||
| verse_line2 = उपासते इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न यथैव माम् ॥३२॥ | | verse_line2 = उपासते इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न यथैव माम् ॥३२॥ | ||
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| Line 28,310: | Line 30,026: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया अपि । | | verse_line1 = वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया अपि । | ||
| verse_lines = वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया अपि ।;परोक्षवादो वेदोऽयं परोक्षं मम च प्रियम् ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = परोक्षवादो वेदोऽयं परोक्षं मम च प्रियम् ॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = परोक्षवादो वेदोऽयं परोक्षं मम च प्रियम् ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,328: | Line 30,045: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम् । | | verse_line1 = शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम् । | ||
| verse_lines = शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम् ।;अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ ३६ ॥ | ||
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| verse_line1 = मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणाऽनन्तशक्तिना । | | verse_line1 = मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणाऽनन्तशक्तिना । | ||
| verse_lines = मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणाऽनन्तशक्तिना ।;भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते ॥ ३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,364: | Line 30,083: | ||
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| verse_line1 = यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वहते मुखात् । | | verse_line1 = यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वहते मुखात् । | ||
| verse_lines = यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वहते मुखात् ।;आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसाऽऽस्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसाऽऽस्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसाऽऽस्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,373: | Line 30,093: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः । | | verse_line1 = छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः । | ||
| verse_lines = छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः ।;ओङ्कारेष्वञ्जितां स्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = ओङ्कारेष्वञ्जितां स्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = ओङ्कारेष्वञ्जितां स्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम् ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 28,382: | Line 30,103: | ||
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| verse_line1 = विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः । | | verse_line1 = विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः । | ||
| verse_lines = विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः ।;अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम् ॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम् ॥ ४० ॥ | | verse_line2 = अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम् ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 28,391: | Line 30,113: | ||
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| verse_line1 = गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च । | | verse_line1 = गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च । | ||
| verse_lines = गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ।;त्रिष्टुप् जगत्यतिच्छन्दो ह्यष्ट्यत्यष्टी जगद् विराट् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रिष्टुप् जगत्यतिच्छन्दो ह्यष्ट्यत्यष्टी जगद् विराट् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = त्रिष्टुप् जगत्यतिच्छन्दो ह्यष्ट्यत्यष्टी जगद् विराट् ॥ ४१ ॥ | ||
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| verse_line1 = किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत् । | | verse_line1 = किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत् । | ||
| verse_lines = किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत् ।;इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद् वेद कश्चन ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_line1 = मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्पापोह्य इत्यहम् ॥ ४३ ॥ | | verse_line1 = मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्पापोह्य इत्यहम् ॥ ४३ ॥ | ||
| verse_lines = मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्पापोह्य इत्यहम् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय माऽभिदाम् । | | verse_line1 = एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय माऽभिदाम् । | ||
| verse_lines = एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय माऽभिदाम् ।;मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रशाम्यति ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रशाम्यति ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रशाम्यति ॥ ४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 28,465: | Line 30,192: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा । | | verse_line1 = नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा । | ||
| verse_lines = नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा ।;एवं विवदतां हेतुः शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं विवदतां हेतुः शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = एवं विवदतां हेतुः शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,474: | Line 30,202: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् । | | verse_line1 = यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् । | ||
| verse_lines = यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् ।;प्राप्ते शमदमे व्येति वादस्तमनु शाम्यति॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राप्ते शमदमे व्येति वादस्तमनु शाम्यति॥ ६ ॥ | | verse_line2 = प्राप्ते शमदमे व्येति वादस्तमनु शाम्यति॥ ६ ॥ | ||
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| Line 28,483: | Line 30,212: | ||
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| verse_line1 = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ । | | verse_line1 = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ । | ||
| verse_lines = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।;पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,501: | Line 30,231: | ||
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| verse_line1 = एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च । | | verse_line1 = एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च । | ||
| verse_lines = एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।;पूर्वस्मिन् वाऽपरस्मिन् वा तत्वे तत्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = पूर्वस्मिन् वाऽपरस्मिन् वा तत्वे तत्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = पूर्वस्मिन् वाऽपरस्मिन् वा तत्वे तत्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,510: | Line 30,241: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् । | | verse_line1 = पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् । | ||
| verse_lines = पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् ।;यथा विविक्तं यद्युक्तं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा विविक्तं यद्युक्तं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = यथा विविक्तं यद्युक्तं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात् ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,519: | Line 30,251: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् । | | verse_line1 = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् । | ||
| verse_lines = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।;स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥ | ||
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| Line 28,537: | Line 30,270: | ||
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| verse_line1 = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि । | | verse_line1 = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि । | ||
| verse_lines = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।;तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 28,555: | Line 30,289: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः । | | verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः । | ||
| verse_lines = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः ।;सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 28,573: | Line 30,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते । | | verse_line1 = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते । | ||
| verse_lines = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।;गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 28,591: | Line 30,327: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः । | | verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः । | ||
| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः ।;ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 28,600: | Line 30,337: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥ | |||
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| Line 28,608: | Line 30,346: | ||
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| verse_line1 = शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥ | |||
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| Line 28,624: | Line 30,364: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 28,641: | Line 30,382: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः । | | verse_line1 = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः । | ||
| verse_lines = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः ।;ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 28,659: | Line 30,401: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः । | | verse_line1 = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः । | ||
| verse_lines = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः ।;जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 28,677: | Line 30,420: | ||
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| verse_line1 = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च । | | verse_line1 = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च । | ||
| verse_lines = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।;पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 28,695: | Line 30,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते । | | verse_line1 = तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते । | ||
| verse_lines = तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते ।;भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,704: | Line 30,449: | ||
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| verse_line1 = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् । | | verse_line1 = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् । | ||
| verse_lines = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् ।;सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 28,722: | Line 30,468: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥ | ||
| verse_lines = उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 28,730: | Line 30,477: | ||
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| verse_line1 = एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि । | | verse_line1 = एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि । | ||
| verse_lines = एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।;छेत्तुमर्हसि पद्मेश वचोभिस्तत्वनैपुणैः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = छेत्तुमर्हसि पद्मेश वचोभिस्तत्वनैपुणैः ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = छेत्तुमर्हसि पद्मेश वचोभिस्तत्वनैपुणैः ॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 28,739: | Line 30,487: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः । | | verse_line1 = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः । | ||
| verse_lines = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः ।;त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 28,757: | Line 30,506: | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते । | | verse_line1 = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते । | ||
| verse_lines = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते ।;वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥ | |||
| verse_line2 = वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥ | | verse_line2 = वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥ | ||
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| verse_line1 = दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥ | ||
| verse_lines = दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥ | ||
| verse_lines = एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| Line 28,808: | Line 30,561: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥ | ||
| verse_lines = योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥ | |||
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| Line 28,816: | Line 30,570: | ||
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| verse_line1 = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥ | ||
| verse_lines = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 28,833: | Line 30,588: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः । | | verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः । | ||
| verse_lines = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः ।;जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 28,851: | Line 30,607: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि । | | verse_line1 = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि । | ||
| verse_lines = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।;बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥ | ||
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| Line 28,869: | Line 30,626: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । | | verse_line1 = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । | ||
| verse_lines = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् ।;सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ । | | verse_line1 = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ । | ||
| verse_lines = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।;भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥ | ||
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| Line 28,905: | Line 30,664: | ||
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| verse_line1 = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ । | | verse_line1 = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ । | ||
| verse_lines = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ ।;तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥ | ||
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| Line 28,923: | Line 30,683: | ||
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| verse_line1 = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् । | | verse_line1 = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् । | ||
| verse_lines = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।;एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥ | ||
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| Line 28,941: | Line 30,702: | ||
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| verse_line1 = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा । | | verse_line1 = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा । | ||
| verse_lines = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।;स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥ | ||
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| verse_line1 = मनोवशेऽन्ये हि भवन्ति देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीमो हि देवः सहसः सहीया- न्नात्याविशत् तत् स हि देवदेवः ॥ ४८ ॥ | | verse_line1 = मनोवशेऽन्ये हि भवन्ति देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीमो हि देवः सहसः सहीया- न्नात्याविशत् तत् स हि देवदेवः ॥ ४८ ॥ | ||
| verse_lines = मनोवशेऽन्ये हि भवन्ति देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीमो हि देवः सहसः सहीया- न्नात्याविशत् तत् स हि देवदेवः ॥ ४८ ॥ | |||
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| Line 28,971: | Line 30,734: | ||
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| verse_line1 = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् । | | verse_line1 = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् । | ||
| verse_lines = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।;कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । | | verse_line1 = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । | ||
| verse_lines = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः ।;एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥५०॥ | |||
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| Line 29,007: | Line 30,772: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥ | | verse_line1 = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥ | ||
| verse_lines = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,024: | Line 30,790: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥ | | verse_line1 = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥ | ||
| verse_lines = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,041: | Line 30,808: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥ | | verse_line1 = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥ | ||
| verse_lines = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,058: | Line 30,826: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥ | | verse_line1 = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥ | ||
| verse_lines = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,075: | Line 30,844: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥ | | verse_line1 = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥ | ||
| verse_lines = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,092: | Line 30,862: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥ | | verse_line1 = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥ | ||
| verse_lines = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,109: | Line 30,880: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥ | | verse_line1 = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥ | ||
| verse_lines = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,130: | Line 30,902: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् । | | verse_line1 = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् । | ||
| verse_lines = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् ।;यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | ||
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| Line 29,148: | Line 30,921: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् । | | verse_line1 = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् । | ||
| verse_lines = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् ।;वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 29,166: | Line 30,940: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका । | | verse_line1 = तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका । | ||
| verse_lines = तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका ।;ज्ञानं त्वन्यतमो भागः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं त्वन्यतमो भागः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं त्वन्यतमो भागः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,175: | Line 30,950: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 29,183: | Line 30,959: | ||
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| verse_line1 = तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् । | | verse_line1 = तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् । | ||
| verse_lines = तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् ।;ततो विकुर्वतो जातो योऽहङ्कारो विमोहकः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = ततो विकुर्वतो जातो योऽहङ्कारो विमोहकः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = ततो विकुर्वतो जातो योऽहङ्कारो विमोहकः ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,192: | Line 30,969: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् । | | verse_line1 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् । | ||
| verse_lines = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् ।;तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 29,210: | Line 30,988: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते । | | verse_line1 = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते । | ||
| verse_lines = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते ।;मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | ||
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| Line 29,228: | Line 31,007: | ||
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| verse_line1 = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः । | | verse_line1 = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः । | ||
| verse_lines = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः ।;महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 29,246: | Line 31,026: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । | | verse_line1 = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । | ||
| verse_lines = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् ।;गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 29,264: | Line 31,045: | ||
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| verse_line1 = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् । | | verse_line1 = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् । | ||
| verse_lines = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् ।;विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 29,282: | Line 31,064: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् । | | verse_line1 = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् । | ||
| verse_lines = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् ।;आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 29,300: | Line 31,083: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः । | | verse_line1 = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः । | ||
| verse_lines = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः ।;सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 29,318: | Line 31,102: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः । | | verse_line1 = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः । | ||
| verse_lines = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः ।;महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | ||
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| Line 29,336: | Line 31,121: | ||
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| verse_line1 = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः । | | verse_line1 = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः । | ||
| verse_lines = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः ।;पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 29,354: | Line 31,140: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते । | | verse_line1 = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते । | ||
| verse_lines = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते ।;धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 29,372: | Line 31,159: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे । | | verse_line1 = योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे । | ||
| verse_lines = योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे ।;शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,381: | Line 31,169: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥ | ||
| verse_lines = स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥ | |||
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| Line 29,389: | Line 31,178: | ||
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| verse_line1 = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | ||
| verse_lines = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,410: | Line 31,200: | ||
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| verse_line1 = काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदाऽसुखम् । | | verse_line1 = काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदाऽसुखम् । | ||
| verse_lines = काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदाऽसुखम् ।;मनोत्साहो यशःप्रीतिर्धार्ष्ट्यवीर्यबलोद्यमाः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मनोत्साहो यशःप्रीतिर्धार्ष्ट्यवीर्यबलोद्यमाः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मनोत्साहो यशःप्रीतिर्धार्ष्ट्यवीर्यबलोद्यमाः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = सत्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः । | | verse_line1 = सत्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः । | ||
| verse_lines = सत्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः ।;तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 29,446: | Line 31,238: | ||
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| verse_line1 = कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं कर्मनिष्ठं तु राजसम् । | | verse_line1 = कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं कर्मनिष्ठं तु राजसम् । | ||
| verse_lines = कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं कर्मनिष्ठं तु राजसम् ।;प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 29,464: | Line 31,257: | ||
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| verse_line1 = सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी । | | verse_line1 = सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी । | ||
| verse_lines = सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी ।;तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 29,482: | Line 31,276: | ||
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| verse_line1 = सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् । | | verse_line1 = सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् । | ||
| verse_lines = सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् ।;तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 29,500: | Line 31,295: | ||
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| verse_line1 = सर्वे गुणमया भावा पुरुषाव्यक्तनिष्ठिताः । | | verse_line1 = सर्वे गुणमया भावा पुरुषाव्यक्तनिष्ठिताः । | ||
| verse_lines = सर्वे गुणमया भावा पुरुषाव्यक्तनिष्ठिताः ।;दृष्टं श्रुतमनुध्यायेद् बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = दृष्टं श्रुतमनुध्यायेद् बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = दृष्टं श्रुतमनुध्यायेद् बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 29,522: | Line 31,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया । | | verse_line1 = गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया । | ||
| verse_lines = गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।;गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः । वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः । वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः । वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | ||
| Line 29,540: | Line 31,337: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः । | | verse_line1 = सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः । | ||
| verse_lines = सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः ।;देवता बान्धवाः सन्तः पिता माताऽहमेव च ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = देवता बान्धवाः सन्तः पिता माताऽहमेव च ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = देवता बान्धवाः सन्तः पिता माताऽहमेव च ॥ ३४ ॥ | ||
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| Line 29,562: | Line 31,360: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम । | | verse_line1 = पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम । | ||
| verse_lines = पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम ।;अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,571: | Line 31,370: | ||
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| verse_line1 = तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पद्य तन्मयः । आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पद्य तन्मयः । आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २३ ॥ | ||
| verse_lines = तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पद्य तन्मयः । आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,588: | Line 31,388: | ||
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| verse_line1 = स्वस्य घर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया । | | verse_line1 = स्वस्य घर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया । | ||
| verse_lines = स्वस्य घर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।;पौरुषेणापि सूक्तेन धामनीराजनादिभिः ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = पौरुषेणापि सूक्तेन धामनीराजनादिभिः ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = पौरुषेणापि सूक्तेन धामनीराजनादिभिः ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 29,606: | Line 31,407: | ||
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| verse_line1 = उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम । | | verse_line1 = उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम । | ||
| verse_lines = उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम ।;मत्कथाः श्रावयन् शृण्वन् मुहूर्तक्षणिको भवेत् ॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्कथाः श्रावयन् शृण्वन् मुहूर्तक्षणिको भवेत् ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = मत्कथाः श्रावयन् शृण्वन् मुहूर्तक्षणिको भवेत् ॥ ४३ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् । | | verse_line1 = प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् । | ||
| verse_lines = प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् ।;पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५१ ॥ | |||
| verse_line2 = पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,633: | Line 31,436: | ||
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| verse_line1 = मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति । | | verse_line1 = मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति । | ||
| verse_lines = मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति ।;स भक्तियोगं लभते एवं यः पूजयेत माम् ॥ ५२ ॥ | |||
| verse_line2 = स भक्तियोगं लभते एवं यः पूजयेत माम् ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = स भक्तियोगं लभते एवं यः पूजयेत माम् ॥ ५२ ॥ | ||
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| Line 29,655: | Line 31,459: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 29,663: | Line 31,468: | ||
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| verse_line1 = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 29,680: | Line 31,486: | ||
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| verse_line1 = तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः । | | verse_line1 = तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः । | ||
| verse_lines = तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।;मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 29,698: | Line 31,505: | ||
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| verse_line1 = कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् । | | verse_line1 = कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् । | ||
| verse_lines = कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् ।;वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः । | | verse_line1 = छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः । | ||
| verse_lines = छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।;एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥ | ||
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| Line 29,734: | Line 31,543: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः । | | verse_line1 = आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः । | ||
| verse_lines = आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।;त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 29,743: | Line 31,553: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 29,751: | Line 31,562: | ||
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| verse_line1 = इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥ | |||
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| Line 29,759: | Line 31,571: | ||
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| verse_line1 = एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 29,767: | Line 31,580: | ||
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| verse_line1 = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥ | | verse_line1 = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = अर्थेऽप्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । | | verse_line1 = अर्थेऽप्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । | ||
| verse_lines = अर्थेऽप्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।;ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् । | | verse_line1 = यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् । | ||
| verse_lines = यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् ।;स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः । | | verse_line1 = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः । | ||
| verse_lines = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।;अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥ | ||
| verse_lines = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् । | | verse_line1 = ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् । | ||
| verse_lines = ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् ।;आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥ | |||
| verse_line2 = आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥ | | verse_line2 = आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥ | ||
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| verse_line1 = यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । | | verse_line1 = यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य । | ||
| verse_lines = यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।;तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ । | | verse_line1 = विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ । | ||
| verse_lines = विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।;समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥ | ||
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| verse_line1 = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥ | ||
| verse_lines = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥ | ||
| verse_lines = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥ | ||
| verse_lines = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥ | ||
| verse_lines = समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥ | |||
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| Line 29,993: | Line 31,820: | ||
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| verse_line1 = यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥ | ||
| verse_lines = यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥ | ||
| verse_lines = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥ | |||
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| Line 30,018: | Line 31,847: | ||
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| verse_line1 = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥ | ||
| verse_lines = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥ | |||
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| Line 30,035: | Line 31,865: | ||
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| verse_line1 = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥ | ||
| verse_lines = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| Line 30,052: | Line 31,883: | ||
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| verse_line1 = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥ | ||
| verse_lines = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥ | |||
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| Line 30,069: | Line 31,901: | ||
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| verse_line1 = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥ | ||
| verse_lines = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥ | |||
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| Line 30,086: | Line 31,919: | ||
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| verse_line1 = एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले । | | verse_line1 = एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले । | ||
| verse_lines = एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले ।;आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 30,104: | Line 31,938: | ||
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| verse_line1 = यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् । | | verse_line1 = यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् । | ||
| verse_lines = यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् ।;व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 30,126: | Line 31,961: | ||
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| verse_line1 = श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥ | |||
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}} | }} | ||
| Line 30,143: | Line 31,979: | ||
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| verse_line1 = पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् । | | verse_line1 = पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् । | ||
| verse_lines = पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् ।;कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् । | | verse_line1 = मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् । | ||
| verse_lines = मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् ।;ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 30,170: | Line 32,008: | ||
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| verse_line1 = इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥ | |||
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| Line 30,178: | Line 32,017: | ||
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| verse_line1 = ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥ | ||
| verse_lines = ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया । | | verse_line1 = सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया । | ||
| verse_lines = सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया ।;परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते । | | verse_line1 = यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते । | ||
| verse_lines = यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते ।;तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 30,231: | Line 32,073: | ||
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| verse_line1 = एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् । | | verse_line1 = एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् । | ||
| verse_lines = एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।;यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = राजोवाच– ततो महाभागवत उद्धवे बदरीं गते । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = राजोवाच– ततो महाभागवत उद्धवे बदरीं गते । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = राजोवाच– ततो महाभागवत उद्धवे बदरीं गते । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः । | | verse_line1 = ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः ।;प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति यशो यत् सतामात्मलग्नम् । यच्छ्रीवाचं जनयति रतिं कोऽनुमानः कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति यशो यत् सतामात्मलग्नम् । यच्छ्रीवाचं जनयति रतिं कोऽनुमानः कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति यशो यत् सतामात्मलग्नम् । यच्छ्रीवाचं जनयति रतिं कोऽनुमानः कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = लोकाभिरामां स्वतनुं धरणाध्यानमङ्गलाम् । | | verse_line1 = लोकाभिरामां स्वतनुं धरणाध्यानमङ्गलाम् । | ||
| verse_lines = लोकाभिरामां स्वतनुं धरणाध्यानमङ्गलाम् ।;योगधारणयाऽऽग्नेय्याऽदग्ध्वा धामाविशत् स्वकम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = योगधारणयाऽऽग्नेय्याऽदग्ध्वा धामाविशत् स्वकम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = योगधारणयाऽऽग्नेय्याऽदग्ध्वा धामाविशत् स्वकम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहां मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चाऽत्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहां मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चाऽत्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहां मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चाऽत्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = तथाऽप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थ गतिं प्रदर्शयन् ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = तथाऽप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थ गतिं प्रदर्शयन् ॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = तथाऽप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थ गतिं प्रदर्शयन् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = रामपत्न्यश्च तं देहमुपगुह्याग्निमाविशन् । | | verse_line1 = रामपत्न्यश्च तं देहमुपगुह्याग्निमाविशन् । | ||
| verse_lines = रामपत्न्यश्च तं देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।;वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेः स्नुषाः । कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुग्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेः स्नुषाः । कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुग्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेः स्नुषाः । कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुग्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | ||
| verse_lines = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते । | | verse_line1 = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते । | ||
| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते ।;मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह । | | verse_line1 = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह । | ||
| verse_lines = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह ।;विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 30,431: | Line 32,284: | ||
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| verse_line1 = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते । | | verse_line1 = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते । | ||
| verse_lines = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।;नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 30,453: | Line 32,307: | ||
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| verse_line1 = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः । | | verse_line1 = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः । | ||
| verse_lines = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।;बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 30,462: | Line 32,317: | ||
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| verse_line1 = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् । | | verse_line1 = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् । | ||
| verse_lines = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।;विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 30,480: | Line 32,336: | ||
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| verse_line1 = नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा । | | verse_line1 = नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा । | ||
| verse_lines = नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा ।;नारायणाय हरये नमः प्रेष्ठतमाय मे ॥ | |||
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