Bhagavatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | ||
== प्रथमः स्कन्धः == | == प्रथमः स्कन्धः == | ||
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| verse_lines = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्¦तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः ।¦तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा¦धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां¦वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।¦श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः¦सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं¦शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।¦पिबत भागवतं रसमालयं¦मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः¦सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।¦अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥¦वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।¦ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।¦ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।¦लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच–¦यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं¦द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।¦पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽपि नेदु-¦स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-¦मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् ।¦संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं¦तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।¦ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।¦उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।¦पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।¦क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-¦र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते ।¦स्थित्यादये हरिविरिञ्चहरेति सञ्ज्ञाः¦श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनौ नृणां स्युः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।¦तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।¦सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।¦पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।¦सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।¦अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।¦स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच–¦जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः ।¦सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।¦तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।¦यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।¦चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।¦तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।¦भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।¦प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।¦आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।¦दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।¦चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।¦रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।¦बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।¦यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।¦इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।¦मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।¦एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।¦अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।¦सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।¦मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।¦असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।¦प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।¦कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच—¦पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना ।¦परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।¦तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यास उवाच—¦अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे ।¦तत्मूलमव्यक्तमगाधबोधं, पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।¦न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो¦जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् ।¦तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा¦न यत्र हंसा न्यपतन् मिमङ्क्षया ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं¦न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।¦कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे¦न चार्षितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अतो महाभाग भवानमोघदृक्¦शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।¦उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये¦समाधिनाऽनुस्मर यद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं¦स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।¦यद्वाक्यतो धर्म इतीतरस्थितो¦न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-¦रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।¦प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-¦स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो¦यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः ।¦तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि¦प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते¦प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।¦ययाऽहमेतत् सदसत् स्वमायया¦पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः¦समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।¦प्रख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां¦सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।¦खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।¦आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे ।¦शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।¦अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्¦कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।¦अपाहरद्विप्रियमेतदस्य¦जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ती ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = माता शिशूनां निधनं सुतानां¦निशम्य घोरं परितप्यमाना ।¦तदाऽरुदद् बाष्पकलाकुलाक्षी¦तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।¦भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते ।¦भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् ।¦समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।¦भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।¦इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।¦प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं¦प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः।¦शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः¦प्रणिध्युपात्तामनुजानुवर्तितः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।¦नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रिय ऊचुः—¦स वै किलायं पुरुषः पुरातनो¦य एक आसीदविशेष आत्मनि ।¦अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे¦निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां¦स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।¦अनामरूपात्मनि रूपनामनी¦विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः¦जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल ।¦धर्मं भगं सत्यमृतं दयां यशो¦भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं¦निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते ।¦यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिः¦न जात्वपैत्याकृतिभिः हृदि स्पृशन् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।¦परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।¦सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्¦कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया ।¦तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद्¦रविं विनाऽक्ष्णामिव नस्तवाच्युत ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।¦न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | |||
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| verse_lines = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।¦अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मणा ऊचुः—¦पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः ।¦ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च रामो दाशरर्थियथा ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः ।¦आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।¦यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।¦यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।¦स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।¦गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | |||
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| verse_lines = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।¦गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ।¦अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।¦अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जय उवाच—¦अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन ।¦न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिर उवाच—¦नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः ।¦अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी ।¦कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शनः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।¦सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।¦दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।¦अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।¦ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।¦निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।¦कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।¦हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।¦ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।¦यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।¦प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।¦कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।¦अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-¦श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् ।¦स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्यो¦यैस्तत्स्त्रियो न्यकृत तत् सविमुक्तकेश्यः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते¦सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति ।¦सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं¦भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूषे ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा ।¦भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि ।¦कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः ।¦लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः ।¦तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् ।¦धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।¦सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः ।¦हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।¦मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = शौनक उवाच—¦कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः ।¦नृदेवचिह्नधृक् शूद्रः कोऽसौ गां यः पदाऽहनत् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।¦अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।¦क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।¦अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-¦वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः ।¦स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतस्य विष्णोः¦भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = धरोवाच—¦सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् ।¦शमो दमः तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।¦स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।¦गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।¦प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | |||
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| verse_lines = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।¦वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।¦यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।¦चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।¦ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति ।¦कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् ।¦विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः ।¦वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।¦भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।¦योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् ।¦व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।¦स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं¦यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः ।¦परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते¦पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।¦न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः¦प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः ।¦उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते¦समुद्रपत्न््नयाः स्वसुते न्यस्तभारः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या¦स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन ।¦प्रत्युत्थिता मुनयश्चाऽसनेभ्यः¦तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥ ४ ॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | ||
== द्वितीयस्कन्धः == | == द्वितीयस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।¦आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।¦अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।¦दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।¦तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।¦नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।¦गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।¦मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।¦मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् ।¦पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।¦आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच—¦यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।¦यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।¦स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।¦यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।¦वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।¦महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | |||
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| verse_lines = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।¦हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | |||
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| verse_lines = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।¦परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | |||
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| verse_lines = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।¦सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।¦तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।¦तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।¦ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।¦तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः¦यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् ।¦काले च देशे च मनो न सज्जेत्¦प्राणान्नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य¦क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि ।¦आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो¦लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः¦कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे ।¦न यत्र सत्वं न रजस्तमश्च¦न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद्¦उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः ।¦ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी¦स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत¦निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः ।¦स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि-¦र्निर्भिद्य मूर्धन्विसृजेत्परं गतः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् ।¦अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा ।¦न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = वैश्वानरं याति विहायसा गतः¦सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा ।¦विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात्¦प्रयाति चक्रं नृप शैंशुमारम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः ।¦सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा ।¦रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् ।¦नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् ।¦यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-¦स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् ।¦ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले¦वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं¦रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव ।¦श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणं तत्¦प्रायेण नावृत्तिमुपैति योगी ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात्¦सनातनोऽसौ भगवाननादिः ।¦मनोमयं देवमयं विकार्यं¦संसाद्य मत्या सह तेन याति ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् ।¦आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ।¦एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च ।¦ये द्वे पुरा ब्रह्मण आह पृष्टः आराधितो भगवान् वासुदेवः ॥३५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा ।¦श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।¦तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।¦तस्यर्ते यः क्षणो नीतः उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।¦राज्ये चाविकले नित्यनिरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् ।¦वासुदेवे भगवति स्वात्मभावं दृढं गतः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे¦सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया ।¦गृहीतशक्तित्रितयाय देहिनाम्¦अन्तर्ध्रुवायाऽनुपलभ्यवर्त्मने ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां¦असम्भवायाऽखिलसत्वमूर्तये ।¦पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमे¦व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर-¦स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः ।¦गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि-¦र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान्प्रसीदताम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच—¦देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज ।¦तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्वनिदर्शनम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो ।¦यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।¦एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो ।¦नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।¦अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि ।¦यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।¦विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।¦वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।¦नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।¦स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।¦बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः ।¦स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया ।¦आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः ।¦कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् ।¦तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा ।¦वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा ।¦द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभोः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।¦तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः ।¦परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।¦दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।¦सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।¦कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।¦सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।¦ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।¦ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।¦विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च¦सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।¦तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।¦अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।¦यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।¦यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य¦कालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।¦द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि¦विराड् स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः¦दक्षादयो ये भवदादयश्च ।¦स्वर्लोकपालाः खगलोकपालाः¦नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः¦ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः ।¦ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां¦दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः ।¦यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् ।¦ह्रीश्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्तत्परं रूपवदस्वरूपम् ॥४४॥ | |||
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| verse_lines = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति¦लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः ।¦आपीयतां कर्मकषायशोषान-¦नुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशलान् ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः¦आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।¦लोकत्रयस्य महतीमहरद्य आर्तिं¦स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्तः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो¦दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः ।¦यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा¦योगर्धिमापुरमयीं यदुहैहयाद्याः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे¦आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् ।¦प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्वं¦सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या¦नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः ।¦दृष्टात्मनो भगवतो नियमावलोपं¦देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो¦बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय ।¦तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो¦दिव्याः स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-¦निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।¦ज्ञात्वार्थितो जगति पुत्रपदञ्च लेभे¦दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः¦यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् ।¦यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति¦स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः¦साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः ।¦छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा¦वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः¦क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।¦विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे¦आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः¦चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।¦चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मात्¦हस्ते प्रगृह्य भगवान्कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्¦अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।¦यो वै प्रतिश्रुतमृतेऽपि च शीर्षमाणं¦आत्मन्यमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-¦वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।¦ज्ञानञ्च भागवतमात्मसुतत्वदीपं¦यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो¦मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।¦दुष्टेषु राजसु दमं विदधत्स्वकीर्तिं¦सत्ये निविष्ट उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः¦इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।¦तिष्ठन्वनं सदयितानुज आविवेश¦यस्मिन्विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो¦मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः ।¦दूरेसुहृन्मथितरोषसुशोषदृष्ट्या¦तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-¦दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः ।¦सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः¦विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरितैः ससैन्यः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः¦क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।¦जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः¦कर्माणि चात्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः¦त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।¦यद्रिङ्गताऽन्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा¦उन्मूलनन्त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं¦दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने ।¦उन्नेष्यति व्रजमितोऽवसितान्तकालं¦नेत्रे पिधाय्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्¦गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।¦जल्प्यावृतं निशि शयानमतिश्रमेण¦लोके विकुण्ठ उपधास्यति गोकुलं सः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां¦रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।¦उद्दीपितस्मररुजां व्रजसद्वधूनां¦हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-¦मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः ।¦अन्येऽपि शाल्वकपिबल्वलदन्तवक्र-¦सप्तोक्षशंबरविडूरथरुग्मिमुख्याः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः¦काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः ।¦यास्यन्त्यदर्शनमिता बलपार्थभीम-¦व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां¦स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।¦आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां¦वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः¦स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।¦अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्याः¦मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः¦मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये ।¦गायन् गुणान्दशशतानन आदिदेवः¦शेषोऽधुनाऽपि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः¦सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।¦ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां¦नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां¦स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।¦यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षाः¦तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं¦शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् ।¦शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो¦माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य¦भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः ।¦देहे स्वधातुविगमे तु विशीर्यमाणे¦व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।¦समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।¦कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।¦सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।¦विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।¦अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः ।¦ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः ।¦न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्ने द्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया ।¦रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः ।¦रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।¦ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो¦जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः ।¦अतप्यत स्माखिललोकतापनं¦तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः¦सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् ।¦व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं¦सन्दृष्टवद्भिर्विबुधैरभिष्टुतम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः¦सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।¦न यत्र माया किमुतापरे हरे-¦रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः¦करोति मानं बहुधा विभूतिभिः ।¦प््रोङ्खश्रिता याः कुसुमाकरानुगै-¦र्विगीयमाना प््रिायकर्म गायती ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं¦श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ।¦सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः¦स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं¦वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः ।¦युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः¦स्व एव धामन्रममाणमीश्वरम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।¦यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।¦तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।¦बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानुवाच–¦ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।¦सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् ।¦पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।¦तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च ।¦प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।¦अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः ।¦सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः ।¦महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।¦ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् ।¦यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।¦ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।¦मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते ।¦स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।¦यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे ।¦त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः ।¦आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।¦तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः ।¦वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।¦ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।¦मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।¦अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।¦उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ।¦तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।¦पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः ।¦विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥ | |||
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== तृतीयः स्कन्धः == | == तृतीयः स्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः¦केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् ।¦न वारयामास नृपः स्नुषाया¦और्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं¦कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् ।¦तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा-¦मेकातपत्रामजितेन पार्थः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं¦वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् ।¦संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्¦सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः¦कृतानि नानायतनानि विष्णोः ।¦प्रत्यङ्कमुख्याङ्कितमन्दिराणि¦यद्दर्शनात् कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-¦पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ ।¦आसात उर्व्याः कुशलं विधाय¦कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो¦भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः ।¦यो वै स्वसॄणां पितृवद् ददाति¦वरान् वदान्यो वरतर्पणेन ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-¦दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते ।¦यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो¦नृपासनाधिं परिहृत्य दूरात् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी¦भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।¦यस्याङ्घ्रिपातं रणभूर्न सेहे¦मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय¦कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।¦न त्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं¦परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये¦निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।¦कार्त्स्न्येन चात्रोपगतं विधातु-¦रर्वाक् सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे¦संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।¦ये संयुगेऽचक्षत तार्क्षपुत्र-¦स्यांसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = समाहुता भीष्मककन्यया ये¦श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् ।¦गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं¦जह्रे पदं मूधर्ि्न दधत् सुपर्णः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।¦एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।¦कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।¦गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।¦को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।¦ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा ।¦तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् ।¦हयान् रथानिभान् कन्यां धरां वृत्तिकरीमपि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् ।¦गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = उद्धव उवाच–¦भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।¦सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।¦बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।¦पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच–¦निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-¦ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्यः ।¦स तु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्¦हरिरपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीशः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = शुक उवाच–¦ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः ।¦संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।¦अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = परावरेषां भगवन् कृतानि¦श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।¦न तृप्नुमः कर्णसुखावहानां¦तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां¦सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः ।¦यस्मिन् नृणां ग्राम्यसुखानुवादै¦र्मतिर्गृहीता न हरेः कथायाम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना¦विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः ।¦हरेः सदाऽनुस्मृतिनिर्वृतस्य¦समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय उवाच–¦भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।¦आत्मेच्छानुगतो ह्यात्मा नानाशक्त्युपलक्षितः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।¦मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।¦आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।¦तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।¦ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।¦आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।¦नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-¦स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।¦आत्मल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-¦च्छायांशविद्यामत आश्रयेम ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-¦श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते ।¦यच्चाघमर्षो द्युसरिद्धरायाः¦परं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तथापरे त्वात्मसमाधियोग-¦बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।¦त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति¦तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य¦त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये ।¦सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं¦न शक्नुमस्तत् प्रतिकर्तवे ते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे¦बभूविमात्मन् करवाम किं ते ।¦त्वं नः स चक्षुः परिदेहि शक्ता¦देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
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== चतुर्थस्कन्धः == | == चतुर्थस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = मैत्रेय उवाच–¦मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे ।¦आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।¦प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।¦निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।¦वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।¦तत्संकल्पस्य ते ब्रह्मन् यद् वै ध्यायसि ते वयम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।¦दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।¦मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।¦देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं¦खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।¦एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाऽद्य¦प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।¦भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | |||
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| verse_lines = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।¦अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | |||
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| verse_lines = नन्दिरुवाच–¦य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।¦द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।¦कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।¦स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।¦संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।¦मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं¦यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।¦सत्त्वं च यस्मिन् भगवान् वासुदेवो¦ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-¦र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।¦लोकस्य यद् वर्षति चाशिषोऽर्थिनः¦तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये¦ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।¦तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-¦र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत¦वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् ।¦विरोधि तद् यौगपदेककर्तरि¦द्वयं यथाऽऽब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं¦जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् ।¦ददर्श देहे हतकल्मषा सती¦सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।¦छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः ।¦विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे ।¦यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः ।¦तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।¦नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये¦ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।¦विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा¦तस्यात्मतन्त्रस्य क उद्विधित्सेत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।¦ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं¦सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि ।¦उत्थाय चक्रे शिरसाऽभिवन्दनं¦महत्तमोऽर्कस्य यथैव विष्णोः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोवाच–¦जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः ।¦शक्तेः शिवस्य च परं यत् तद् ब्रह्म निरन्तरम् ॥ ४२ ॥ | |||
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== पञ्चमस्कन्धः == | == पञ्चमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-¦दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः ।¦भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिसृष्टान्¦विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन्¦यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले¦मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः ।¦विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे¦किं वा मृगान् मृगयसे विपिने प्रमत्तान् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि¦भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः¦प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।¦तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | |||
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| verse_lines = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।¦प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।¦यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।¦सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन¦ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।¦योगेन धृत्युद्भवसत्वयुक्तो¦लिङ्गं व्यपोहेत्कुशलोऽहमाख्यम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।¦अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | |||
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| verse_lines = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।¦योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।¦कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां¦साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं¦जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या¦द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।¦गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः¦कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-¦न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी ।¦यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां¦महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां¦देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः ।¦अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो¦मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = परो रजाः सवितर्जातवेदो¦वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान ।¦स्वरेतसाऽदः पुनराविश्य चष्टे¦हंसं गृध्राणामृषभं सङ्गृणीमः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–¦त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं¦भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः ।¦गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा¦पीवेति चासौ न विदां प्रवादः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च¦क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।¦निद्राऽरतिर्मन्युरहंमदश्च¦देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-¦न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।¦स्वस्वामिभावो ध्रुव एष यत्र¦तर्ह्यच्युतेऽसाविति कृत्ययोगः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च¦पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।¦क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्य-¦मथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य¦साम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।¦महद्विमानात्स्वकृताद्धिमादृग्¦धक्षत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-¦वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।¦न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः¦प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स वासनात्मा विषयोपरक्तो¦गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा ।¦चित्रं पृथङ्नामभी रूपभेद-¦मन्तर्बहिष्ठः स्वपुरैस्तनोति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं¦कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति ।¦आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा¦स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तावानयं व्यवहारः सदा वै¦क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः ।¦तस्मान्मनोलिङ्गमदो वदन्ति¦गुणागुणस्यास्य परावरस्य ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः¦क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।¦यथा प्रदीपो घृतवर्तिमास्थितो¦स्थितिं स धूमां भजति ह्यन्यदा स्वम् ।¦पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं¦बहिर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्वम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = पदं विषयम् ।¦एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती-¦राकूतयः पञ्च धियोऽभिमानाः ।¦मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां¦वदन्ति हैकादश वीर भूमिम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि¦विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः ।¦एकादशं स्वीकरणं ममेति¦मायामहं द्वादशमेकमाहुः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-¦रेकादशामी मनसो विकाराः ।¦सहस्रशः शतशः कोटिशश्च¦क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः¦साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः ।¦नारायणो भगवान्वासुदेवः¦स्वमाययाऽऽत्मन्व्यवधीयमानः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य-¦मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः ।¦गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो¦जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोहम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–¦अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां¦यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः ।¦तस्यापि चाङ्घ्र्योरधि गुल्फजङ्घा-¦जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां¦सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।¦यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो¦राजाऽस्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-¦र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।¦जनस्य गोप्तेति विकत्थमानो¦न शोभसे वृद्धसभासु दुष्टः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि क्षितावेव चराचरस्य¦विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् ।¦तन्नामतोऽन्यद्व्यवहारमात्रं¦निरूप्यतां तत्क्रिययानुतिष्ठन् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-¦मसन्निधानं परमाणवो ये ।¦अविद्यया मनसा कल्पितास्ते¦येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-¦दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।¦द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म-¦नाम््नयाऽजयाऽवैहि कृतं द्वितीयम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-¦मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् ।¦प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दवाच्यं¦यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति ।¦आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः ।¦नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो¦वामपादाङ्गुष्ठ-नखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा¦तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला¦साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोभिरभिधीय-मानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो¦मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = भव उवाच–¦ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते¦ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् ।¦युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे¦सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुनि ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा¦हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च ।¦पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः¦सरीसृपस्थास्नु यदत्र दृश्यते ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं¦अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।¦सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भना-¦त्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं¦चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् ।¦द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-¦द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-¦रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।¦सङ्ख्या यया तत्त्वदृशा विनीयते¦तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय हि ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो¦गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् ।¦मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो¦गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-¦र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।¦तथैव तत्रातिशयात्मबुद्धिभि-¦र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः¦सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।¦शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्यया-¦द्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां¦त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज ।¦भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां¦विधेहि योगं त्वयि नः सुभावितम् ॥ इति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं | |||
| verse_lines = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं¦स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् ।¦तेनाब्जनाभस्मृतिजन्मनः स्या-¦द्वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_text = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं¦रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् ।¦नमस्यतः स्तुवतो नश्यते वै¦स्वयं त्रिकालं कृतमाशु पापम् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_text = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
| verse_lines = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | ||
== षष्ठस्कन्धः == | == षष्ठस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यमदूता ऊचुः–¦वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।¦वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_text = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।¦अजामिलोऽप्यगान्मुक्तिं किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = यम उवाच–¦परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च¦ओतं प्रोतं पटवद् यत्र विश्वम् ।¦यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा¦नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः¦सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।¦गुणो यथा गुणिनोऽव्यक्तदृष्टि-¦स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा¦नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् ।¦सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो¦न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदोपरामो मनसो नामरूप-¦रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् ।¦य ईयते केवलया स्वसंस्थया¦हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं¦स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः ।¦वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं¦मनीषया निष्कृषन्तीह गूढम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = स वै ममाशेषविशेषमाया-¦निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।¦स सर्वनामा स च विश्वरूपः¦प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं¦धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य ।¦मा भूत् स्वरूपं गुणरूपबृंहितं¦स वै गुणापायनिसर्गलक्षणः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै¦यं यो यथा कुरुते कार्यते वा ।¦परावरेषां परमं प्राक् स्वसिद्धं¦तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-¦रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः ।¦अपेक्षितं किञ्चन सांख्ययोगयोः¦समं परं ह्यनुकूलं बृहत् तत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-¦मनामरूपो भगवाननन्तः ।¦नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-¦र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदताम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां¦यथाशयं देहगतो विभाति ।¦यथाऽनिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं¦स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।¦विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।¦अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।¦यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-¦द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् ।¦देवर्षिवर्यः पुरुषान्तरार्चनात्¦कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका¦ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।¦हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ¦बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-¦स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।¦एकोऽरविन्दात् पतितस्ततार¦तस्माद् भयाद् येन स नोऽस्तु पारः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = य एक ईशो निजमायया नः¦ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।¦वयं च यस्यापि पुरः समेताः¦पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।¦पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।¦नमस्ते अस्तु चक्राय नमोऽस्तु पुरुहूतये ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।¦नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण¦स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह¦वाव न विदामः ।न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगण ईश्वर अनवगाह्य-माहात्म्ये¦अर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्तःकरणदुरवग्रहवादिनां च¦विवादानवसरे उपरतसमस्तमाया-मये केवलस्वात्ममायामन्तर्धाय को नु दुर्घट इव भवति ।¦स्वरूपद्वयाभावात् समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम् । स एव हि पुनः सर्ववस्तुषु वस्तुस्वरूपः सर्वेश्वरः सकलजगत्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात्¦सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः ।अथ ह वाव तव¦महिमामहामृतरससमुद्रविप्लुषाऽसकृल्लीढया स्व-मनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेन¦विस्मारितदृष्टश्रुतविषयसुखलेशाभासाः परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूतप्रियसुहृदि¦सर्वात्मनि निरन्तरनिर्वृतमनसः कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्यात्मप्रियसुहृदः¦साधवस्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपरिवर्तः ।¦त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तवैव विभूतयोऽभूवन्¦दितिजदनुजादयश्चापि तेषामनुपक्रमसमयोऽयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रितजलचराकृतिभिः¦यथाऽ-पराधं दण्डं दधर्थावतीर्य ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय¦कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।¦सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रयाय¦शश्वद् वरिष्ठगतये हरये नमस्ते ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।¦तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।¦न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।¦विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् ।¦यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः ।¦शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् ।¦अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः¦कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः ।¦न्यपातयत् तावदहर्गणेन¦यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् ।¦ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।¦ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं¦सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।¦सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो¦यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे ।¦परे तु जीवत्यपरस्य या मृतिः¦विपर्ययश्चेत् त्वमसि ध्रुवं परः ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः¦शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः ।¦यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये¦स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां¦त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।¦अञ्जस्तरेम भवताऽप्रजदुस्तरं यद्¦ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-¦स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् ।¦सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो¦भुंक्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते¦मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् ।¦किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं¦नीतोऽघृणेन न शृृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।¦मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।¦अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।¦दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।¦पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः ।¦ऋषिर्वेदशिरा बोध्यो मुनिः पञ्चशिखस्तथा ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।¦एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।¦एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।¦गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः¦कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।¦देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।¦द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे¦शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।¦सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं¦प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।¦आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।¦उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।¦अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।¦मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।¦जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।¦प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः¦प्रहृष्टरोमा तमनादिपूरुषम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।¦शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।¦उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।¦मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो¦न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः ।¦समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य¦कुतोऽनुरागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।¦सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।¦गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।¦मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः ।¦त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् ।¦त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ।¦यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।¦तथेमा उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १३ ॥ | |||
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<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | ||
== सप्तमस्कन्धः == | == सप्तमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।¦स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।¦विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।¦श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।¦तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।¦स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।¦न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।¦संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।¦वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।¦आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।¦सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।¦तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।¦पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।¦दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | |||
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| verse_lines = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।¦भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।¦रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।¦अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।¦सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः ।¦धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।¦चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।¦याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_text = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते¦यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः ।¦यथा नभः सर्वगतं न सज्जते¦तथा गुणैः सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।¦यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।¦यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।¦तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–¦कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् ।¦अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।¦रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।¦चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा¦त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च ।¦त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि-¦रनन्तपारः कविरव्ययात्मा ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-¦मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।¦कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महान्¦त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-¦देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति ।¦विद्याकलास्ते तनवश्च सर्वा¦हिरण्यगर्भोऽसि बृहत् त्रिपृष्ठः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।¦न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।¦भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो¦महाबलो निर्जितलोक एकराट् ।¦रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः¦प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना¦विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।¦उपासतोपायनपाणिभिर्विना¦त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।¦धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।¦प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः ।¦न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–¦परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः ।¦विमोहितधियां दृष्टः तस्मै भगवते नमः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।¦अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–¦श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।¦अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = गुरुपुत्र उवाच–¦न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं¦सुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो ।¦नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्¦नियच्छ मन्युं क्व तदाऽऽत्ममानः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् ।¦व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।¦माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।¦भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये¦किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः ।¦धर्मादिभिः किमगुणेन च कांक्षितेन¦सारं जुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।¦फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।¦विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।¦ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।¦सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।¦अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।¦बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।¦यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-¦त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् ।¦मुहुः श्वसन् वक्ति हरे जगत्पते¦नारायणेत्यात्मगतिर्गतत्रपः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-¦स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।¦निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा¦भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः¦शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।¦तद् ब्रह्मनिर्वाणसुखं विदुर्बुधा-¦स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-¦रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।¦अस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां¦सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।¦भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।¦भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।¦खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वा ऊचुः–¦वयं विभो ते नटनाट्यगायका¦येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः ।¦स एष नीतो भवता दशामिमां¦किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।¦अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-¦पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।¦मन्ये तदर्पितमनोवचनात्मगेह-¦प्राणः पुनाति सकलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य¦यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा ।¦भावं करोति विकरोति पृथक् स्वभावः¦सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः¦कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।¦छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं¦संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्¦जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।¦न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया¦यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरप्रसादः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या¦सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् ।¦अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेः¦नाभेरभूत् स्वकणिकाद्वटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-¦स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् ।¦नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो¦जातेऽङ्कुरे कथमिहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं¦कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः ।¦त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं¦भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-¦नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् ।¦मायामयं सदुपलक्षणसन्निवेशं¦दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा¦मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः ।¦नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको¦नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे¦बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य ।¦युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां¦योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।¦भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।¦मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।¦जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।¦अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।¦भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।¦परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।¦आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं¦कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।¦प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय¦आत्माऽर्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।¦प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।¦आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।¦सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।¦हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।¦गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।¦भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।¦कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।¦सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।¦ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।¦आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।¦अतिवादान् त्यजेत् तर्कान् पक्षं कञ्चिन्न संश्रयेत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।¦न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।¦मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।¦व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।¦क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते ।¦तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः ।¦तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः ।¦पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः ।¦तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः ।¦देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।¦न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | |||
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| verse_lines = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः ।¦जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | |||
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| verse_text = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः । | |||
| verse_lines = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।¦नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | ||
== अष्टमस्कन्धः == | == अष्टमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।¦योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो¦नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।¦अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं¦धत्ते रजःसत्वतमांसि काले ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-¦मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।¦छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ¦तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु ।¦त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां¦यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् ।¦तं निर्जितात्मात्मगुणं परेशं¦नमामि भूतेषु समं चरन्तम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं¦सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः ।¦लोकास्त्रयोऽथाखिललोकपालाः¦प्रसीदतां ब्रह्म माविभूतिः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = सोमं मनो यस्य समामनन्ति¦दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः ।¦ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा¦जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा ।¦अन्तः समुद्रे पचतः स्वधातून्¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं¦त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् ।¦द्वारं च मुक्तेरमृतस्य मृत्योः¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः ।¦ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो¦विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् ।¦भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा¦अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या¦भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् ।¦आसीनमद्रावपवर्गहेतो-¦स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_text = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_lines = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः ।¦तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं¦त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् ।¦वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं¦न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जितः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं¦क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः ।¦यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गलः¦सुमङ्गलः कश्चन काङ्क्षते हि माम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।¦स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।¦तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह¦आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः ।¦तल्लीलया गरुडमूधर्ि्न पतद् गृहीत्वा¦तेनाहनन्नृप सवाहमरिं त्र्यधीशः ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-¦च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् ।¦आहत्य तिग्मगदयाऽहनदण्डजेन्द्रं¦तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।¦तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।¦हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | |||
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| verse_text = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
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<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | ||
== नवमस्कन्धः == | == नवमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = एवंविधानेकगुणः स राजा¦परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।¦क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं¦यया विरिञ्चादिमधश्चकार ॥ ८४ ॥ | |||
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| verse_lines = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-¦स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।¦जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीय-¦कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९० ॥ | |||
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| verse_lines = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं¦वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् ।¦भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः¦स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार ॥ ९२ ॥ | |||
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| verse_lines = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।¦ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।¦स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।¦अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।¦त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः ।¦स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।¦आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।¦वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः ।¦त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् ।¦व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | ||
== दशमस्कन्धः == | == दशमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं¦मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।¦दृष्टश्रुताभ्यां मनसाऽनुचिन्तयन्¦प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = यतो यतो धावति दैवचोदितं¦मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु ।¦गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ¦प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।¦आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं¦समाहितं शूरसुतेन देवी ।¦दधार सर्वात्मकमात्मभूतं¦काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं नभस्तः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_text = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-¦श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा ।¦सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो¦दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः¦स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च ।¦त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां¦पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_text = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_lines = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न¦समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये ।¦त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन¦कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्¦भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।¦भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते¦निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ¦शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।¦वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-¦स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्¦विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।¦गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्¦प्रकाशते यस्य च येन वाऽगुणः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः¦निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।¦मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो¦देवक्रियायाः प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्¦नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।¦क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-¦राविष्टचित्तो न भवाय कल्प्यते ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो¦भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।¦दिष्ट्याऽङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-¦र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं¦विना विनोदं बत तर्कयामहे ।¦भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्ययाऽऽ-¦कृता यतस्त्वय्यभवाश्रयात्मनि ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् ।¦तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह ।¦नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो¦ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः ।¦अनावृतत्वाद् बहिरन्तरं न ते¦सर्वस्य सर्वात्मन आत्मवस्तुनः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे-¦र्व्यवस्यसेऽस्वव्यतिरेकतोऽबुधैः ।¦विनाऽनुवादं न च तन्मनीषितं¦सम्यग् वचो व्यक्तमुपाददत्पुमान् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो¦वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् ।¦त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते¦तदाश्रयत्वादुपचर्यसे गुणैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया¦बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः ।¦सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं¦कृष्णं च वर्णं तमसा जनात्यये ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु-¦र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर ।¦राजन्यसंज्ञासुरकोटियूथपै-¦र्निर्व्यूह्यमानां निहनिष्यसे चमूम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_lines = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने¦महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु ।¦व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते¦भवानेकः शिष्यतेऽशेषसंज्ञः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो¦चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् ।¦निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां-¦स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः ।¦जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च ।¦नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् ।¦अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः ।¦को न्विहार्हति विज्ञातुं प्राक् सिद्धं गुणसंस्थितेः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।¦आत्मद्योतैर्गुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्मणे नमः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः । तैस्तैरतुल्यातिशयैस्तिर्यग्योनिष्वसङ्गतैः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो¦दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ।¦यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः¦क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं¦न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।¦न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा¦वाञ्छन्ति त्वत्पादरजःप्रपन्नाः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।¦अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् ।¦नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।¦सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा ।¦अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः ।¦वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।¦श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेमिरे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः ।¦कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।¦अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।¦शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।¦अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।¦रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।¦प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।¦य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् ।¦कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।¦अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो¦दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः ।¦हिताय चेच्छातनुभिः समीहसे¦मानं विधुन्वन् जगदीशमानिनाम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।¦सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।¦ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः ।¦जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।¦अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।¦अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके ।¦ये बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥(भा.मू | |||
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| verse_lines = सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।¦न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च ।¦वृत्तिं न दद्यात् तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् ।¦गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः ।¦मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः ।¦अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदोर्भृशम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः ।¦बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् ।¦दृष्ट्वा परमसन्तुष्टौ रामकृष्णौ जगत्पती ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन ।¦रामकृष्णौ स्मृतावावां क्वचित् ते श्रवणं गतौ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे ।¦निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः ।¦जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् ।¦पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् ।¦हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।¦ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | |||
| verse_lines = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः ।¦यत्रोपलब्धं सुव्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_lines = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् ।¦लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | |||
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| verse_lines = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | |||
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| verse_text = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | |||
| verse_lines = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे ।¦तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।¦त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_text = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | |||
| verse_lines = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_text = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_lines = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_text = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_lines = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_text = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_lines = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_text = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_lines = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_text = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | |||
| verse_lines = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | |||
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| verse_lines = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_text = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | |||
| verse_lines = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।¦तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_text = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_lines = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | |||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | ||
== एकादशस्कन्धः == | == एकादशस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।¦सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_text = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_lines = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_text = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_lines = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।¦विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।¦संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।¦सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।¦एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।¦मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।¦तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।¦आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।¦अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।¦अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।¦सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।¦इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।¦त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_text = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।¦गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।¦अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।¦शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।¦अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।¦दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।¦मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।¦परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_text = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_lines = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_text = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_text = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_lines = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः ।¦महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः ।¦द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः ।¦शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः ।¦यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।¦स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | |||
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| verse_text = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां | |||
<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | ||
== द्वादशस्कन्धः == | == द्वादशस्कन्धः == | ||
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| verse_text = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते ।¦मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह ।¦विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।¦नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।¦बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।¦विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | |||
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