Anuvyakhyana/Data: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) Tag: Replaced |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 623: | Line 623: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I01 | | verse_id = AV_C01_S01_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः | | verse_text = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।¦अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥ | ||
| verse_lines = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः | | verse_lines = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।¦अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 631: | Line 631: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I02 | | verse_id = AV_C01_S01_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव | | verse_text = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।¦विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥ | ||
| verse_lines = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव | | verse_lines = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।¦विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 639: | Line 639: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I03 | | verse_id = AV_C01_S01_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः | | verse_text = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।¦अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥ | ||
| verse_lines = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः | | verse_lines = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।¦अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 647: | Line 647: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I04 | | verse_id = AV_C01_S01_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः | | verse_text = गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।¦यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥ | ||
| verse_lines = गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः | | verse_lines = गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।¦यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 655: | Line 655: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I05 | | verse_id = AV_C01_S01_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता | | verse_text = वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।¦आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥ | ||
| verse_lines = वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता | | verse_lines = वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।¦आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 663: | Line 663: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I06 | | verse_id = AV_C01_S01_I06 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् | | verse_text = युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।¦दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥ | ||
| verse_lines = युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् | | verse_lines = युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।¦दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 671: | Line 671: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I07 | | verse_id = AV_C01_S01_I07 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते | | verse_text = अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।¦स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥ | ||
| verse_lines = अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते | | verse_lines = अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।¦स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 679: | Line 679: | ||
| verse_id = AV_C01_S01_I08 | | verse_id = AV_C01_S01_I08 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते | | verse_text = तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।¦सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥ | ||
| verse_lines = तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते | | verse_lines = तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।¦सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 687: | Line 687: | ||
| verse_id = AV_C01_S03_I01 | | verse_id = AV_C01_S03_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः | | verse_text = तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः ।¦विशेषान्मुख्यतो वृत्तिं स्वस्मिन्नेवात्र वक्त्यजः ॥1॥ | ||
| verse_lines = तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः | | verse_lines = तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः ।¦विशेषान्मुख्यतो वृत्तिं स्वस्मिन्नेवात्र वक्त्यजः ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 695: | Line 695: | ||
| verse_id = AV_C02_S01_I01 | | verse_id = AV_C02_S01_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते | | verse_text = उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते ।¦चतुर्विधस्य तस्यादौ यौक्तः तत्रापि च स्मृतेः ॥1॥ | ||
| verse_lines = उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते | | verse_lines = उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते ।¦चतुर्विधस्य तस्यादौ यौक्तः तत्रापि च स्मृतेः ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 703: | Line 703: | ||
| verse_id = AV_C02_S01_I02 | | verse_id = AV_C02_S01_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः | | verse_text = तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः ।¦पादाः सर्वे तदंशाश्च मूर्तीनां वर्णमागमात् ॥2॥ | ||
| verse_lines = तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः | | verse_lines = तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः ।¦पादाः सर्वे तदंशाश्च मूर्तीनां वर्णमागमात् ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 711: | Line 711: | ||
| verse_id = AV_C02_S01_I03 | | verse_id = AV_C02_S01_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) | | verse_text = आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) ।¦सर्वानुसारो लघुता विशेषादर्शनाफले ॥3॥ | ||
| verse_lines = आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) | | verse_lines = आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) ।¦सर्वानुसारो लघुता विशेषादर्शनाफले ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 719: | Line 719: | ||
| verse_id = AV_C02_S01_I04 | | verse_id = AV_C02_S01_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः | | verse_text = इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः ।¦एता एव त्वतिबलाः सिद्धान्तस्य नियामकाः ॥4॥ | ||
| verse_lines = इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः | | verse_lines = इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः ।¦एता एव त्वतिबलाः सिद्धान्तस्य नियामकाः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 735: | Line 735: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I02 | | verse_id = AV_C02_S02_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति | | verse_text = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।¦इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥ | ||
| verse_lines = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति | | verse_lines = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।¦इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 743: | Line 743: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I03 | | verse_id = AV_C02_S02_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः | | verse_text = दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः ।¦अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहतः ॥3॥ | ||
| verse_lines = दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः | | verse_lines = दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः ।¦अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहतः ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 751: | Line 751: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I04 | | verse_id = AV_C02_S02_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः | | verse_text = न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः ।¦भ्रान्तिमूलत्वमेतेषां पृथग्दर्शयति स्फुटम् ॥4॥ | ||
| verse_lines = न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः | | verse_lines = न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः ।¦भ्रान्तिमूलत्वमेतेषां पृथग्दर्शयति स्फुटम् ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 759: | Line 759: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I05 | | verse_id = AV_C02_S02_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् | | verse_text = तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् ।¦दौर्लभ्याच्छुद्धबुद्धीनां बाहुल्यादल्पवेदिनाम् ॥5॥ | ||
| verse_lines = तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् | | verse_lines = तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् ।¦दौर्लभ्याच्छुद्धबुद्धीनां बाहुल्यादल्पवेदिनाम् ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 767: | Line 767: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I06 | | verse_id = AV_C02_S02_I06 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः | | verse_text = तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः ।¦विद्वेषात् परमे तत्त्वे तत्त्ववेदिषु चानिशम् ॥6॥ | ||
| verse_lines = तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः | | verse_lines = तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः ।¦विद्वेषात् परमे तत्त्वे तत्त्ववेदिषु चानिशम् ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 775: | Line 775: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I07 | | verse_id = AV_C02_S02_I07 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः | | verse_text = अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः ।¦दुराग्रहगृहीतत्वाद्वर्तन्ते समयाः सदा ॥7॥ | ||
| verse_lines = अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः | | verse_lines = अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः ।¦दुराग्रहगृहीतत्वाद्वर्तन्ते समयाः सदा ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 783: | Line 783: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I08 | | verse_id = AV_C02_S02_I08 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् | | verse_text = तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् ।¦सुयुक्तयस्तमो हन्युरागमानुगताः सदा ॥8॥ | ||
| verse_lines = तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् | | verse_lines = तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् ।¦सुयुक्तयस्तमो हन्युरागमानुगताः सदा ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 791: | Line 791: | ||
| verse_id = AV_C02_S02_I09 | | verse_id = AV_C02_S02_I09 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् | | verse_text = इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् ।¦चकार निजभक्तानां बुद्धिशाणत्वसिद्धये ॥9॥ | ||
| verse_lines = इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् | | verse_lines = इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् ।¦चकार निजभक्तानां बुद्धिशाणत्वसिद्धये ॥9॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 799: | Line 799: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I01 | | verse_id = AV_C02_S03_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः | | verse_text = अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः ।¦करिष्यन् अधिदैवाधिभूतजीवपरात्मनाम् ॥1॥ | ||
| verse_lines = अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः | | verse_lines = अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः ।¦करिष्यन् अधिदैवाधिभूतजीवपरात्मनाम् ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 807: | Line 807: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I02 | | verse_id = AV_C02_S03_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् | | verse_text = स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् ।¦पादेनानेनाविरोधं दर्शयत्यमितद्युतिः ॥2॥ | ||
| verse_lines = स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् | | verse_lines = स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् ।¦पादेनानेनाविरोधं दर्शयत्यमितद्युतिः ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 815: | Line 815: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I03 | | verse_id = AV_C02_S03_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् | | verse_text = अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् ।¦एतत्सर्वं सतः साम्यं द्वारवैयर्थ्यमेव च ॥3॥ | ||
| verse_lines = अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् | | verse_lines = अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् ।¦एतत्सर्वं सतः साम्यं द्वारवैयर्थ्यमेव च ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 823: | Line 823: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I04 | | verse_id = AV_C02_S03_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः | | verse_text = दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः ।¦प्रसिद्धनामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तिता ॥4॥ | ||
| verse_lines = दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः | | verse_lines = दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः ।¦प्रसिद्धनामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तिता ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 831: | Line 831: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I05 | | verse_id = AV_C02_S03_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता | | verse_text = लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता ।¦तत्र तत्र परिज्ञानं गुणसाम्यश्रुती तथा ॥5॥ | ||
| verse_lines = लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता | | verse_lines = लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता ।¦तत्र तत्र परिज्ञानं गुणसाम्यश्रुती तथा ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 839: | Line 839: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I06 | | verse_id = AV_C02_S03_I06 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने | | verse_text = उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने ।¦नानाश्रुतिश्च वैचित्र्यं युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥6॥ | ||
| verse_lines = उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने | | verse_lines = उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने ।¦नानाश्रुतिश्च वैचित्र्यं युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 847: | Line 847: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I07 | | verse_id = AV_C02_S03_I07 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता | | verse_text = व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता ।¦मुख्यता शक्तिमत्त्वं च वैरूप्यं सर्वसङ्ग्रहः ॥7॥ | ||
| verse_lines = व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता | | verse_lines = व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता ।¦मुख्यता शक्तिमत्त्वं च वैरूप्यं सर्वसङ्ग्रहः ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 855: | Line 855: | ||
| verse_id = AV_C02_S03_I08 | | verse_id = AV_C02_S03_I08 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता | | verse_text = गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता ।¦अभीष्टासिद्धिसुव्यक्ती शास्त्रसिद्धिर्विपर्ययः ॥8॥ | ||
| verse_lines = गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता | | verse_lines = गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता ।¦अभीष्टासिद्धिसुव्यक्ती शास्त्रसिद्धिर्विपर्ययः ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 871: | Line 871: | ||
| verse_id = AV_C02_S04_I01 | | verse_id = AV_C02_S04_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते | | verse_text = श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते ।¦यत्र तन्निर्णयं देवः सुविशिष्टोपपत्तिभिः ॥1॥ | ||
| verse_lines = श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते | | verse_lines = श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते ।¦यत्र तन्निर्णयं देवः सुविशिष्टोपपत्तिभिः ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 879: | Line 879: | ||
| verse_id = AV_C02_S04_I02 | | verse_id = AV_C02_S04_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः | | verse_text = करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः ।¦विशेषश्रुतिवैरूप्यं माहात्म्यं व्यक्तसद्गुणाः ॥2॥ | ||
| verse_lines = करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः | | verse_lines = करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः ।¦विशेषश्रुतिवैरूप्यं माहात्म्यं व्यक्तसद्गुणाः ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 887: | Line 887: | ||
| verse_id = AV_C02_S04_I03 | | verse_id = AV_C02_S04_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता | | verse_text = दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता ।¦युक्तयः पूर्वपक्षेषु सुनिर्णीतास्तु तादृशाः ॥¦युक्तयो निर्णयस्यैव स्वयं भगवतोदिताः ॥3॥ | ||
| verse_lines = दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता | | verse_lines = दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता ।¦युक्तयः पूर्वपक्षेषु सुनिर्णीतास्तु तादृशाः ॥¦युक्तयो निर्णयस्यैव स्वयं भगवतोदिताः ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 903: | Line 903: | ||
| verse_id = AV_C03_S01_I02 | | verse_id = AV_C03_S01_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता | | verse_text = अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता ।¦विरुद्धोक्तिः सहस्थानं वैयर्थ्यं चान्यथागतिः ॥ 2 ॥ | ||
| verse_lines = अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता | | verse_lines = अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता ।¦विरुद्धोक्तिः सहस्थानं वैयर्थ्यं चान्यथागतिः ॥ 2 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 911: | Line 911: | ||
| verse_id = AV_C03_S01_I03 | | verse_id = AV_C03_S01_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ | | verse_text = युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ ।¦उपपत्तिद्विरूपत्वमाधिक्यमनुरूपता ॥3॥ | ||
| verse_lines = युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ | | verse_lines = युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ ।¦उपपत्तिद्विरूपत्वमाधिक्यमनुरूपता ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 919: | Line 919: | ||
| verse_id = AV_C03_S01_I04 | | verse_id = AV_C03_S01_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः | | verse_text = योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः ।¦क्लृप्तिरन्या गतिश्चैव सिद्धान्तस्यैव साधकाः ॥4॥ | ||
| verse_lines = योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः | | verse_lines = योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः ।¦क्लृप्तिरन्या गतिश्चैव सिद्धान्तस्यैव साधकाः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 927: | Line 927: | ||
| verse_id = AV_C03_S01_I05 | | verse_id = AV_C03_S01_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् | | verse_text = बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् ।¦अथशब्देन भगवानाह कारणतश्च ताम् ॥4॥ | ||
| verse_lines = बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् | | verse_lines = बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् ।¦अथशब्देन भगवानाह कारणतश्च ताम् ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 935: | Line 935: | ||
| verse_id = AV_C03_S02_I01 | | verse_id = AV_C03_S02_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः | | verse_text = पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः ।¦स्थानभेदो विरुद्धत्वं न्यायसाम्यं स्वतो भवः ॥1॥ | ||
| verse_lines = पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः | | verse_lines = पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः ।¦स्थानभेदो विरुद्धत्वं न्यायसाम्यं स्वतो भवः ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 943: | Line 943: | ||
| verse_id = AV_C03_S02_I02 | | verse_id = AV_C03_S02_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता | | verse_text = गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता ।¦नानाभावः प्रलोभश्च युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥2॥ | ||
| verse_lines = गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता | | verse_lines = गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता ।¦नानाभावः प्रलोभश्च युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 951: | Line 951: | ||
| verse_id = AV_C03_S02_I03 | | verse_id = AV_C03_S02_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च | | verse_text = अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च ।¦अमानक्लृप्तिसन्मानव्यवस्थात्यल्पताभवाः ॥3॥ | ||
| verse_lines = अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च | | verse_lines = अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च ।¦अमानक्लृप्तिसन्मानव्यवस्थात्यल्पताभवाः ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 959: | Line 959: | ||
| verse_id = AV_C03_S02_I04 | | verse_id = AV_C03_S02_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् | | verse_text = विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् ।¦अलौकिकत्वमाधिक्यं स्वातन्त्र्यं निर्णयप्रमाः ॥4॥ | ||
| verse_lines = विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् | | verse_lines = विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् ।¦अलौकिकत्वमाधिक्यं स्वातन्त्र्यं निर्णयप्रमाः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 967: | Line 967: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I1 | | verse_id = AV_C03_S03_I1 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् | | verse_text = वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् ।¦आपरोक्ष्यं भवेत् विष्णोरिति पादक्रमो भवेत् ॥1॥ | ||
| verse_lines = वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् | | verse_lines = वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् ।¦आपरोक्ष्यं भवेत् विष्णोरिति पादक्रमो भवेत् ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 975: | Line 975: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I2 | | verse_id = AV_C03_S03_I2 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् | | verse_text = युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् ।¦परस्परविरोधं(धे) च प्रणुद्याशेषवाक्यगम् ॥2॥ | ||
| verse_lines = युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् | | verse_lines = युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् ।¦परस्परविरोधं(धे) च प्रणुद्याशेषवाक्यगम् ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 983: | Line 983: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I3 | | verse_id = AV_C03_S03_I3 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः | | verse_text = अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः ।¦बहुयुक्तिविरोधानां भानात् तत्सहितश्रुतेः ॥3॥ | ||
| verse_lines = अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः | | verse_lines = अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः ।¦बहुयुक्तिविरोधानां भानात् तत्सहितश्रुतेः ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 991: | Line 991: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I4 | | verse_id = AV_C03_S03_I4 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् | | verse_text = विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् ।¦परिहृत्य विरोधांश्च तत्प्रसादानुरञ्जितः ॥4॥ | ||
| verse_lines = विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् | | verse_lines = विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् ।¦परिहृत्य विरोधांश्च तत्प्रसादानुरञ्जितः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 999: | Line 999: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I5 | | verse_id = AV_C03_S03_I5 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः | | verse_text = देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः ।¦विशेषस्नेहमापाद्य सर्वकर्तृत्वतोऽधिकम् ॥5॥ | ||
| verse_lines = देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः | | verse_lines = देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः ।¦विशेषस्नेहमापाद्य सर्वकर्तृत्वतोऽधिकम् ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,007: | Line 1,007: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I6 | | verse_id = AV_C03_S03_I6 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः | | verse_text = निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः ।¦उत्पाद्याधिकवैराग्यं तद्गुणाधिक्यवेदनात् ॥6॥ | ||
| verse_lines = निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः | | verse_lines = निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः ।¦उत्पाद्याधिकवैराग्यं तद्गुणाधिक्यवेदनात् ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,015: | Line 1,015: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I7 | | verse_id = AV_C03_S03_I7 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च | | verse_text = सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च ।¦यतेतोपासनायैव विशिष्टाचार्यसम्पदा ॥7॥ | ||
| verse_lines = सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च | | verse_lines = सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च ।¦यतेतोपासनायैव विशिष्टाचार्यसम्पदा ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,023: | Line 1,023: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I8 | | verse_id = AV_C03_S03_I8 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये | | verse_text = कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये ।¦अत इत्युदितेऽप्यस्य विशेषानुक्तितः पुनः ॥8॥ | ||
| verse_lines = कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये | | verse_lines = कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये ।¦अत इत्युदितेऽप्यस्य विशेषानुक्तितः पुनः ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,031: | Line 1,031: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I9 | | verse_id = AV_C03_S03_I9 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः | | verse_text = सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः ।¦यतो मोक्षादिदाताऽसावतो जिज्ञास्य एव वः ॥9॥ | ||
| verse_lines = सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः | | verse_lines = सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः ।¦यतो मोक्षादिदाताऽसावतो जिज्ञास्य एव वः ॥9॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,039: | Line 1,039: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I10 | | verse_id = AV_C03_S03_I10 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् | | verse_text = इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् ।¦येनैव बन्धमोक्षः स्यात् स च जिज्ञासया गतः ॥10॥ | ||
| verse_lines = इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् | | verse_lines = इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् ।¦येनैव बन्धमोक्षः स्यात् स च जिज्ञासया गतः ॥10॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,047: | Line 1,047: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I11 | | verse_id = AV_C03_S03_I11 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा | | verse_text = सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा ।¦मोक्षादिदत्वमीशस्य कथमेवावगम्यते ॥11॥ | ||
| verse_lines = सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा | | verse_lines = सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा ।¦मोक्षादिदत्वमीशस्य कथमेवावगम्यते ॥11॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,055: | Line 1,055: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I12 | | verse_id = AV_C03_S03_I12 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः | | verse_text = इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः ।¦प्रत्यक्षावसितेभ्यः स्याद्यदि मोक्षः कथञ्चन ॥12॥ | ||
| verse_lines = इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः | | verse_lines = इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः ।¦प्रत्यक्षावसितेभ्यः स्याद्यदि मोक्षः कथञ्चन ॥12॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,063: | Line 1,063: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I13 | | verse_id = AV_C03_S03_I13 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः | | verse_text = किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः ।¦यस्मान्नियमतो दुःखहानिः प्रत्यक्षतो भवेत् ॥13॥ | ||
| verse_lines = किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः | | verse_lines = किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः ।¦यस्मान्नियमतो दुःखहानिः प्रत्यक्षतो भवेत् ॥13॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,071: | Line 1,071: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I14 | | verse_id = AV_C03_S03_I14 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः | | verse_text = धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः ।¦अनुमागम्यतो मोक्षो यदि स्यादनुमैव हि ॥14॥ | ||
| verse_lines = धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः | | verse_lines = धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः ।¦अनुमागम्यतो मोक्षो यदि स्यादनुमैव हि ॥14॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,079: | Line 1,079: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I15 | | verse_id = AV_C03_S03_I15 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् | | verse_text = दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् ।¦तच्छास्त्रगम्य एवैको मोक्षदो भवति ध्रुवम् ॥15॥ | ||
| verse_lines = दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् | | verse_lines = दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् ।¦तच्छास्त्रगम्य एवैको मोक्षदो भवति ध्रुवम् ॥15॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,087: | Line 1,087: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I16 | | verse_id = AV_C03_S03_I16 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् | | verse_text = शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् ।¦मोक्षदो हि स्वतन्त्रः स्यात् परतन्त्रः स्वयं सृतौ ॥16॥ | ||
| verse_lines = शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् | | verse_lines = शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् ।¦मोक्षदो हि स्वतन्त्रः स्यात् परतन्त्रः स्वयं सृतौ ॥16॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,095: | Line 1,095: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I17 | | verse_id = AV_C03_S03_I17 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् | | verse_text = वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् ।¦अन्याश्रयेण यद्येष दद्यान्मोक्षं स एव हि ॥17॥ | ||
| verse_lines = वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् | | verse_lines = वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् ।¦अन्याश्रयेण यद्येष दद्यान्मोक्षं स एव हि ॥17॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,103: | Line 1,103: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I18 | | verse_id = AV_C03_S03_I18 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः | | verse_text = तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः ।¦अतस्तदर्थमपि स ज्ञेयो विष्णुर्मुमुक्षुभिः ॥18॥ | ||
| verse_lines = तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः | | verse_lines = तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः ।¦अतस्तदर्थमपि स ज्ञेयो विष्णुर्मुमुक्षुभिः ॥18॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,111: | Line 1,111: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I19 | | verse_id = AV_C03_S03_I19 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् | | verse_text = ‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् ।¦शास्त्रयोनित्वमस्यैव ज्ञायते वेदवादिभिः ॥19॥ | ||
| verse_lines = ‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् | | verse_lines = ‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् ।¦शास्त्रयोनित्वमस्यैव ज्ञायते वेदवादिभिः ॥19॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,119: | Line 1,119: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I20 | | verse_id = AV_C03_S03_I20 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः | | verse_text = ‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः ।¦‘तदेव ब्रह्म परममि’ति श्रुत्यावधारितः ॥20॥ | ||
| verse_lines = ‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः | | verse_lines = ‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः ।¦‘तदेव ब्रह्म परममि’ति श्रुत्यावधारितः ॥20॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,127: | Line 1,127: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I21 | | verse_id = AV_C03_S03_I21 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः | | verse_text = ‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः ।¦शास्त्रयोनिर्न चान्योऽस्ति मुख्यतस्त्विति गम्यते ॥21॥ | ||
| verse_lines = ‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः | | verse_lines = ‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः ।¦शास्त्रयोनिर्न चान्योऽस्ति मुख्यतस्त्विति गम्यते ॥21॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,135: | Line 1,135: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I22 | | verse_id = AV_C03_S03_I22 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् | | verse_text = शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् ।¦समिति ह्युपसर्गेन परमुख्यार्थतोच्यते ॥22॥ | ||
| verse_lines = शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् | | verse_lines = शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् ।¦समिति ह्युपसर्गेन परमुख्यार्थतोच्यते ॥22॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,143: | Line 1,143: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I23 | | verse_id = AV_C03_S03_I23 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः | | verse_text = एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः ।¦निर्धारणाय नाशब्दमिति वेदपतिर्जगौ ॥23॥ | ||
| verse_lines = एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः | | verse_lines = एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः ।¦निर्धारणाय नाशब्दमिति वेदपतिर्जगौ ॥23॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,151: | Line 1,151: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I24 | | verse_id = AV_C03_S03_I24 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् | | verse_text = कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् ।¦‘वेदा ह्यनन्ता’ इति हि श्रुतिराहाप्यनन्ताम् ॥24॥ | ||
| verse_lines = कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् | | verse_lines = कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् ।¦‘वेदा ह्यनन्ता’ इति हि श्रुतिराहाप्यनन्ताम् ॥24॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,159: | Line 1,159: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I25 | | verse_id = AV_C03_S03_I25 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः | | verse_text = अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः ।¦उत्तारणोपमेत्यस्मान्न ज्ञेयोऽत्र समन्वयः ॥25॥ | ||
| verse_lines = अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः | | verse_lines = अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः ।¦उत्तारणोपमेत्यस्मान्न ज्ञेयोऽत्र समन्वयः ॥25॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,167: | Line 1,167: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I26 | | verse_id = AV_C03_S03_I26 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः | | verse_text = इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः ।¦अशक्योत्तारणत्वेऽपि(अशक्योत्तरणत्वेऽपि) ह्यागमापारवारिधेः ॥26॥ | ||
| verse_lines = इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः | | verse_lines = इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः ।¦अशक्योत्तारणत्वेऽपि(अशक्योत्तरणत्वेऽपि) ह्यागमापारवारिधेः ॥26॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,175: | Line 1,175: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I27 | | verse_id = AV_C03_S03_I27 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना | | verse_text = निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना ।¦यद्यप्यशेषवेदार्थो दुर्गमोऽखलिमानवैः ॥27॥ | ||
| verse_lines = निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना | | verse_lines = निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना ।¦यद्यप्यशेषवेदार्थो दुर्गमोऽखलिमानवैः ॥27॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,183: | Line 1,183: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I28 | | verse_id = AV_C03_S03_I28 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् | | verse_text = मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् ।¦इति प्रकाशयन् (वेद)विश्वपतिराह प्रमेयताम् ॥28॥ | ||
| verse_lines = मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् | | verse_lines = मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् ।¦इति प्रकाशयन् (वेद)विश्वपतिराह प्रमेयताम् ॥28॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,191: | Line 1,191: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I29 | | verse_id = AV_C03_S03_I29 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा | | verse_text = निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा ।¦को नाम गतिसामान्यमनन्तागमसम्पदः ॥29॥ | ||
| verse_lines = निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा | | verse_lines = निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा ।¦को नाम गतिसामान्यमनन्तागमसम्पदः ॥29॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,199: | Line 1,199: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I30 | | verse_id = AV_C03_S03_I30 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् | | verse_text = ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् ।¦अन्योऽप्यल्पमतिः शाखाचतुष्पञ्चगतं वसु ॥30॥ | ||
| verse_lines = ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् | | verse_lines = ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् ।¦अन्योऽप्यल्पमतिः शाखाचतुष्पञ्चगतं वसु ॥30॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,207: | Line 1,207: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I31 | | verse_id = AV_C03_S03_I31 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः | | verse_text = जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः ।¦इति मुख्यतयाऽशेषगतिसामान्यवित् प्रभुः ॥31॥ | ||
| verse_lines = जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः | | verse_lines = जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः ।¦इति मुख्यतयाऽशेषगतिसामान्यवित् प्रभुः ॥31॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,215: | Line 1,215: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I32 | | verse_id = AV_C03_S03_I32 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते | | verse_text = प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते ।¦अतो निखलिवेदानां सिद्ध एव समन्वयः ॥32॥ | ||
| verse_lines = प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते | | verse_lines = प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते ।¦अतो निखलिवेदानां सिद्ध एव समन्वयः ॥32॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,223: | Line 1,223: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I33 | | verse_id = AV_C03_S03_I33 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् | | verse_text = इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् ।¦तत्र प्रथमतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां समन्वयः ॥33॥ | ||
| verse_lines = इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् | | verse_lines = इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् ।¦तत्र प्रथमतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां समन्वयः ॥33॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,231: | Line 1,231: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I34 | | verse_id = AV_C03_S03_I34 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् | | verse_text = शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् ।¦इतोऽत्यभ्यधिकत्वेऽपि तुर्यपादोदितस्य तु ॥34॥ | ||
| verse_lines = शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् | | verse_lines = शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् ।¦इतोऽत्यभ्यधिकत्वेऽपि तुर्यपादोदितस्य तु ॥34॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,239: | Line 1,239: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I35 | | verse_id = AV_C03_S03_I35 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि | | verse_text = महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि ।¦ब्रह्मैवाधिकृतस्तत्र मुख्यतोऽन्ये यथाक्रमम् ॥35॥ | ||
| verse_lines = महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि | | verse_lines = महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि ।¦ब्रह्मैवाधिकृतस्तत्र मुख्यतोऽन्ये यथाक्रमम् ॥35॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,247: | Line 1,247: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I36 | | verse_id = AV_C03_S03_I36 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा | | verse_text = दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा ।¦अतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां निर्णयाय तु ॥36॥ | ||
| verse_lines = दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा | | verse_lines = दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा ।¦अतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां निर्णयाय तु ॥36॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,255: | Line 1,255: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I37 | | verse_id = AV_C03_S03_I37 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः | | verse_text = प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः ।¦ईशस्यैवेति निर्णीताः श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥37॥ | ||
| verse_lines = प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः | | verse_lines = प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः ।¦ईशस्यैवेति निर्णीताः श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥37॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,263: | Line 1,263: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I38 | | verse_id = AV_C03_S03_I38 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः | | verse_text = देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः ।¦विष्णुमेव वदन्त्यद्धा तत्सङ्गादुपचारतः ॥38॥ | ||
| verse_lines = देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः | | verse_lines = देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः ।¦विष्णुमेव वदन्त्यद्धा तत्सङ्गादुपचारतः ॥38॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,271: | Line 1,271: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I39 | | verse_id = AV_C03_S03_I39 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः | | verse_text = अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः ।¦विष्णुमेव परं ब्रूयुरेवमन्येऽप्यशेषतः ॥39॥ | ||
| verse_lines = अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः | | verse_lines = अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः ।¦विष्णुमेव परं ब्रूयुरेवमन्येऽप्यशेषतः ॥39॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,279: | Line 1,279: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I40 | | verse_id = AV_C03_S03_I40 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः | | verse_text = इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः ।¦ज्ञाते समन्वये विष्णौ लिङ्गैर्ह्येष समन्वयः ॥40॥ | ||
| verse_lines = इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः | | verse_lines = इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः ।¦ज्ञाते समन्वये विष्णौ लिङ्गैर्ह्येष समन्वयः ॥40॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,287: | Line 1,287: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I41 | | verse_id = AV_C03_S03_I41 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः | | verse_text = तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः ।¦इत्येवाशेषलिङ्गानां ब्रह्मण्येव समन्वयम् ॥41॥ | ||
| verse_lines = तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः | | verse_lines = तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः ।¦इत्येवाशेषलिङ्गानां ब्रह्मण्येव समन्वयम् ॥41॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,295: | Line 1,295: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I42 | | verse_id = AV_C03_S03_I42 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः | | verse_text = आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः ।¦इति संशयनुत्त्यर्थमुभयत्र प्रतीतितः ॥42॥ | ||
| verse_lines = आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः | | verse_lines = आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः ।¦इति संशयनुत्त्यर्थमुभयत्र प्रतीतितः ॥42॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,303: | Line 1,303: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I43 | | verse_id = AV_C03_S03_I43 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः | | verse_text = शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः ।¦समन्वयो हरावेव यन्नैवान्यत्र मुख्यतः ॥43॥ | ||
| verse_lines = शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः | | verse_lines = शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः ।¦समन्वयो हरावेव यन्नैवान्यत्र मुख्यतः ॥43॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,311: | Line 1,311: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I44 | | verse_id = AV_C03_S03_I44 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता | | verse_text = शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता ।¦अस्वतन्त्रेषु शब्दस्य वृत्तिहेतुर्न मुख्यतः ॥44॥ | ||
| verse_lines = शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता | | verse_lines = शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता ।¦अस्वतन्त्रेषु शब्दस्य वृत्तिहेतुर्न मुख्यतः ॥44॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,319: | Line 1,319: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I45 | | verse_id = AV_C03_S03_I45 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः | | verse_text = यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः ।¦अत्यल्पेनैव शब्दस्य वृत्तिहेतुगुणेन तु ॥45॥ | ||
| verse_lines = यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः | | verse_lines = यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः ।¦अत्यल्पेनैव शब्दस्य वृत्तिहेतुगुणेन तु ॥45॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,327: | Line 1,327: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I46 | | verse_id = AV_C03_S03_I46 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः | | verse_text = अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः ।¦मुख्यशब्दार्थ इति हि स्वीकर्तव्यो मनीषिभिः ॥46॥ | ||
| verse_lines = अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः | | verse_lines = अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः ।¦मुख्यशब्दार्थ इति हि स्वीकर्तव्यो मनीषिभिः ॥46॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,335: | Line 1,335: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I47 | | verse_id = AV_C03_S03_I47 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये | | verse_text = इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये ।¦सिद्धेऽप्यशेषशब्दानां न कथञ्चन युज्यते ॥47॥ | ||
| verse_lines = इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये | | verse_lines = इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये ।¦सिद्धेऽप्यशेषशब्दानां न कथञ्चन युज्यते ॥47॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,343: | Line 1,343: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I48 | | verse_id = AV_C03_S03_I48 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् | | verse_text = विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् ।¦इति चेदवरत्वादि द्विविधं ह्युपलभ्यते ॥48॥ | ||
| verse_lines = विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् | | verse_lines = विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् ।¦इति चेदवरत्वादि द्विविधं ह्युपलभ्यते ॥48॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,351: | Line 1,351: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I49 | | verse_id = AV_C03_S03_I49 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् | | verse_text = परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् ।¦सोऽपि ह्यवरशब्दार्थो यथा राजा जयी भवेत् ॥49॥ | ||
| verse_lines = परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् | | verse_lines = परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् ।¦सोऽपि ह्यवरशब्दार्थो यथा राजा जयी भवेत् ॥49॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,359: | Line 1,359: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I50 | | verse_id = AV_C03_S03_I50 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे | | verse_text = अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे ।¦द्वितीयो जीव एवास्ति स्वातन्त्र्यान्न तु(च) दूषणम् ॥50॥ | ||
| verse_lines = अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे | | verse_lines = अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे ।¦द्वितीयो जीव एवास्ति स्वातन्त्र्यान्न तु(च) दूषणम् ॥50॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,367: | Line 1,367: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I51 | | verse_id = AV_C03_S03_I51 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये | | verse_text = हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये ।¦उक्ते विरोधहीनस्य स्यात् समन्वयता यतः ॥51॥ | ||
| verse_lines = हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये | | verse_lines = हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये ।¦उक्ते विरोधहीनस्य स्यात् समन्वयता यतः ॥51॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,375: | Line 1,375: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I52 | | verse_id = AV_C03_S03_I52 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः | | verse_text = अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः ।¦समन्वयाविरोधाभ्यां सञ्जाते वस्तुनिर्णये ॥52॥ | ||
| verse_lines = अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः | | verse_lines = अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः ।¦समन्वयाविरोधाभ्यां सञ्जाते वस्तुनिर्णये ॥52॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,383: | Line 1,383: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I53 | | verse_id = AV_C03_S03_I53 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः | | verse_text = किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः ।¦तत्र भक्तिविधानार्थमभक्तानर्थसन्ततौ ॥53॥ | ||
| verse_lines = किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः | | verse_lines = किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः ।¦तत्र भक्तिविधानार्थमभक्तानर्थसन्ततौ ॥53॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,391: | Line 1,391: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I54 | | verse_id = AV_C03_S03_I54 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये | | verse_text = उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये ।¦वक्तव्योपासना नित्यं कर्तव्येत्यादरेण हि ॥54॥ | ||
| verse_lines = उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये | | verse_lines = उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये ।¦वक्तव्योपासना नित्यं कर्तव्येत्यादरेण हि ॥54॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,399: | Line 1,399: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I55 | | verse_id = AV_C03_S03_I55 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी | | verse_text = सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी ।¦ध्यानरूपा परा चैव तदङ्गं धारणादिकम् ॥55॥ | ||
| verse_lines = सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी | | verse_lines = सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी ।¦ध्यानरूपा परा चैव तदङ्गं धारणादिकम् ॥55॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,407: | Line 1,407: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I56 | | verse_id = AV_C03_S03_I56 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः | | verse_text = तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः ।¦आहोपासनमद्धैव विस्तरात् श्रुतिपूर्वकम् ॥56॥ | ||
| verse_lines = तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः | | verse_lines = तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः ।¦आहोपासनमद्धैव विस्तरात् श्रुतिपूर्वकम् ॥56॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,415: | Line 1,415: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I57 | | verse_id = AV_C03_S03_I57 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः | | verse_text = पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः ।¦विशेषदर्शनं कार्यलोपो नानोक्तिराशुता ॥57॥ | ||
| verse_lines = पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः | | verse_lines = पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः ।¦विशेषदर्शनं कार्यलोपो नानोक्तिराशुता ॥57॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,423: | Line 1,423: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I58 | | verse_id = AV_C03_S03_I58 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता | | verse_text = विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता ।¦अप्रयोजनता चातिप्रसङ्गोऽदूरसंश्रयः ॥58॥ | ||
| verse_lines = विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता | | verse_lines = विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता ।¦अप्रयोजनता चातिप्रसङ्गोऽदूरसंश्रयः ॥58॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,431: | Line 1,431: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I59 | | verse_id = AV_C03_S03_I59 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः | | verse_text = विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः ।¦अनुक्तिरप्रयत्नत्वं दृढबन्धपराभवौ ॥59॥ | ||
| verse_lines = विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः | | verse_lines = विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः ।¦अनुक्तिरप्रयत्नत्वं दृढबन्धपराभवौ ॥59॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,439: | Line 1,439: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I60 | | verse_id = AV_C03_S03_I60 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः | | verse_text = पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः ।¦विशेषदर्शितालापो गुणसाम्यं पृथग्दृशिः ॥60॥ | ||
| verse_lines = पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः | | verse_lines = पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः ।¦विशेषदर्शितालापो गुणसाम्यं पृथग्दृशिः ॥60॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,447: | Line 1,447: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I61 | | verse_id = AV_C03_S03_I61 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना | | verse_text = अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना ।¦शुद्धवैरूप्यमङ्गत्वमविशेषदृशिः क्रिया ॥61॥ | ||
| verse_lines = अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना | | verse_lines = अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना ।¦शुद्धवैरूप्यमङ्गत्वमविशेषदृशिः क्रिया ॥61॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,455: | Line 1,455: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I62 | | verse_id = AV_C03_S03_I62 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया | | verse_text = युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया ।¦माहात्म्यमल्पशक्तित्वं यथायोग्यफलं भवः ॥62॥ | ||
| verse_lines = युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया | | verse_lines = युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया ।¦माहात्म्यमल्पशक्तित्वं यथायोग्यफलं भवः ॥62॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,463: | Line 1,463: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I63 | | verse_id = AV_C03_S03_I63 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता | | verse_text = फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता ।¦यथाशक्तिक्रिया सन्धिः प्रमाणबलमानतिः ॥63॥ | ||
| verse_lines = फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता | | verse_lines = फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता ।¦यथाशक्तिक्रिया सन्धिः प्रमाणबलमानतिः ॥63॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,471: | Line 1,471: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I64 | | verse_id = AV_C03_S03_I64 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् | | verse_text = कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् ।¦प्रतिक्रियाविरोधश्च प्रतिसन्धिरनूनता ॥64॥ | ||
| verse_lines = कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् | | verse_lines = कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् ।¦प्रतिक्रियाविरोधश्च प्रतिसन्धिरनूनता ॥64॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,479: | Line 1,479: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I65 | | verse_id = AV_C03_S03_I65 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् | | verse_text = संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् ।¦विशेषोक्तिरमानत्वं प्राधान्यं प्रीतिरागमः ॥65॥ | ||
| verse_lines = संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् | | verse_lines = संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् ।¦विशेषोक्तिरमानत्वं प्राधान्यं प्रीतिरागमः ॥65॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,487: | Line 1,487: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I66 | | verse_id = AV_C03_S03_I66 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः | | verse_text = सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः ।¦साधनोत्तमता नानादृष्टिः शिष्टिरनूनता ॥66॥ | ||
| verse_lines = सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः | | verse_lines = सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः ।¦साधनोत्तमता नानादृष्टिः शिष्टिरनूनता ॥66॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,495: | Line 1,495: | ||
| verse_id = AV_C03_S03_I67 | | verse_id = AV_C03_S03_I67 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः | | verse_text = अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः ।¦सिद्धान्तनिर्णया ह्येता युक्तयो व्याहृताः सदा ॥67॥ | ||
| verse_lines = अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः | | verse_lines = अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः ।¦सिद्धान्तनिर्णया ह्येता युक्तयो व्याहृताः सदा ॥67॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,503: | Line 1,503: | ||
| verse_id = AV_C03_S04_I01 | | verse_id = AV_C03_S04_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा | | verse_text = एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा ।¦अपेक्षितफलप्राप्तिरारब्धस्यानतिक्रमात् ॥1॥ | ||
| verse_lines = एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा | | verse_lines = एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा ।¦अपेक्षितफलप्राप्तिरारब्धस्यानतिक्रमात् ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,511: | Line 1,511: | ||
| verse_id = AV_C03_S04_I02 | | verse_id = AV_C03_S04_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः | | verse_text = देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः ।¦जैमिन्युक्तं मानुषाणां तद्विशेषाश्च केचन ॥2॥ | ||
| verse_lines = देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः | | verse_lines = देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः ।¦जैमिन्युक्तं मानुषाणां तद्विशेषाश्च केचन ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,519: | Line 1,519: | ||
| verse_id = AV_C03_S04_I03 | | verse_id = AV_C03_S04_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः | | verse_text = सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः ।¦बलवद्विरोधिसद्भावे जैमिन्याद्युक्तिरिष्यते ॥3॥ | ||
| verse_lines = सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः | | verse_lines = सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः ।¦बलवद्विरोधिसद्भावे जैमिन्याद्युक्तिरिष्यते ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,527: | Line 1,527: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I01 | | verse_id = AV_C04_S01_I01 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने | | verse_text = समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने ।¦विचारितेष्वशेषेषु साधनेषु विशेषतः ॥1॥ | ||
| verse_lines = समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने | | verse_lines = समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने ।¦विचारितेष्वशेषेषु साधनेषु विशेषतः ॥1॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,535: | Line 1,535: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I02 | | verse_id = AV_C04_S01_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् | | verse_text = नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् ।¦चिन्त्यते प्रथमं तत्र श्रवणादिसकृत्क्रिया ॥2॥ | ||
| verse_lines = नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् | | verse_lines = नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् ।¦चिन्त्यते प्रथमं तत्र श्रवणादिसकृत्क्रिया ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,543: | Line 1,543: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I03 | | verse_id = AV_C04_S01_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि | | verse_text = आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि ।¦उपदेशोऽतत्त्वमसीत्यादि ह्यसकृदेव यत् ॥3॥ | ||
| verse_lines = आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि | | verse_lines = आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि ।¦उपदेशोऽतत्त्वमसीत्यादि ह्यसकृदेव यत् ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,551: | Line 1,551: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I04 | | verse_id = AV_C04_S01_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् | | verse_text = ‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् ।¦शुश्रावोग्रतपा नाम योग्यो रुद्रपदस्य यः ॥4॥ | ||
| verse_lines = ‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् | | verse_lines = ‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् ।¦शुश्रावोग्रतपा नाम योग्यो रुद्रपदस्य यः ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,559: | Line 1,559: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I05 | | verse_id = AV_C04_S01_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः | | verse_text = सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः ।¦तत्त्रिभागमुपासां च चक्रे सम्भृतमानसः ॥5॥ | ||
| verse_lines = सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः | | verse_lines = सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः ।¦तत्त्रिभागमुपासां च चक्रे सम्भृतमानसः ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,567: | Line 1,567: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I06 | | verse_id = AV_C04_S01_I06 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः | | verse_text = दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः ।¦पदयोग्यात्सुमनसः सुनन्दो नाम चाशृणोत् ॥6॥ | ||
| verse_lines = दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः | | verse_lines = दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः ।¦पदयोग्यात्सुमनसः सुनन्दो नाम चाशृणोत् ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,575: | Line 1,575: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I07 | | verse_id = AV_C04_S01_I07 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् | | verse_text = उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् ।¦सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पदयोग्यौ सुतेजसौ ॥7॥ | ||
| verse_lines = उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् | | verse_lines = उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् ।¦सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पदयोग्यौ सुतेजसौ ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,583: | Line 1,583: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I08 | | verse_id = AV_C04_S01_I08 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् | | verse_text = सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् ।¦अशृण्वतां सुमनसो मन्वन्तरमुपासताम् ॥8॥ | ||
| verse_lines = सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् | | verse_lines = सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् ।¦अशृण्वतां सुमनसो मन्वन्तरमुपासताम् ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,591: | Line 1,591: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I09 | | verse_id = AV_C04_S01_I09 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः | | verse_text = ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।¦अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥ | ||
| verse_lines = ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः | | verse_lines = ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।¦अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,599: | Line 1,599: | ||
| verse_id = AV_C04_S01_I10 | | verse_id = AV_C04_S01_I10 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते | | verse_text = इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।¦आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥ | ||
| verse_lines = इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते | | verse_lines = इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।¦आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,615: | Line 1,615: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I02 | | verse_id = AV_C04_S02_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः | | verse_text = उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।¦कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥ | ||
| verse_lines = उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः | | verse_lines = उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।¦कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,623: | Line 1,623: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I03 | | verse_id = AV_C04_S02_I03 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः | | verse_text = फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।¦स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥ | ||
| verse_lines = फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः | | verse_lines = फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।¦स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,631: | Line 1,631: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I04 | | verse_id = AV_C04_S02_I04 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः | | verse_text = देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः ।¦स्रष्टुस्तु ग्रासभूतस्य देहस्तत्र लयं व्रजेत् ॥4॥ | ||
| verse_lines = देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः | | verse_lines = देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः ।¦स्रष्टुस्तु ग्रासभूतस्य देहस्तत्र लयं व्रजेत् ॥4॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,639: | Line 1,639: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I05 | | verse_id = AV_C04_S02_I05 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् | | verse_text = यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् ।¦लयाच्चैवार्चिरादीनां लोकानामपि सर्वशः ॥5॥ | ||
| verse_lines = यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् | | verse_lines = यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् ।¦लयाच्चैवार्चिरादीनां लोकानामपि सर्वशः ॥5॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,647: | Line 1,647: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I06 | | verse_id = AV_C04_S02_I06 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः | | verse_text = कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः ।¦जातानां मानुषे लोके देवानां तु(च) कदाचन ॥6॥ | ||
| verse_lines = कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः | | verse_lines = कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः ।¦जातानां मानुषे लोके देवानां तु(च) कदाचन ॥6॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,655: | Line 1,655: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I07 | | verse_id = AV_C04_S02_I07 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते | | verse_text = उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।¦अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥¦सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥ | ||
| verse_lines = उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते | | verse_lines = उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।¦अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥¦सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,663: | Line 1,663: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I08 | | verse_id = AV_C04_S02_I08 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः | | verse_text = ‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।¦अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः(भाग.३.३२.९) ॥8॥ | ||
| verse_lines = ‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः | | verse_lines = ‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।¦अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः(भाग.३.३२.९) ॥8॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,671: | Line 1,671: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I09 | | verse_id = AV_C04_S02_I09 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः | | verse_text = एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।¦तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥ | ||
| verse_lines = एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः | | verse_lines = एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।¦तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,679: | Line 1,679: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I10 | | verse_id = AV_C04_S02_I10 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह | | verse_text = ‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह ।¦परमं मोक्षमायान्ति लिङ्गभङ्गेन योगिनः’ ॥10॥ | ||
| verse_lines = ‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह | | verse_lines = ‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह ।¦परमं मोक्षमायान्ति लिङ्गभङ्गेन योगिनः’ ॥10॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,687: | Line 1,687: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I11 | | verse_id = AV_C04_S02_I11 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः | | verse_text = ‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः ।¦आनन्दव्यक्तिमायान्ति पूर्णा लिङ्गस्य भङ्गतः’ ॥11 ॥ | ||
| verse_lines = ‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः | | verse_lines = ‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः ।¦आनन्दव्यक्तिमायान्ति पूर्णा लिङ्गस्य भङ्गतः’ ॥11 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,695: | Line 1,695: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I12 | | verse_id = AV_C04_S02_I12 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् | | verse_text = इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् ।¦भोगस्तु सर्वदेवानां नरादीनां च विद्यते ॥12॥ | ||
| verse_lines = इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् | | verse_lines = इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् ।¦भोगस्तु सर्वदेवानां नरादीनां च विद्यते ॥12॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,703: | Line 1,703: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I13 | | verse_id = AV_C04_S02_I13 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् | | verse_text = तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् ।¦उच्यते देहगानां च वृत्तीनामेवमेव तु ॥13॥ | ||
| verse_lines = तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् | | verse_lines = तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् ।¦उच्यते देहगानां च वृत्तीनामेवमेव तु ॥13॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,711: | Line 1,711: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I14 | | verse_id = AV_C04_S02_I14 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् | | verse_text = तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् ।¦नाना वदन्ति पुंसां हि मतयो गुणभेदतः ॥14॥ | ||
| verse_lines = तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् | | verse_lines = तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् ।¦नाना वदन्ति पुंसां हि मतयो गुणभेदतः ॥14॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,719: | Line 1,719: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I15 | | verse_id = AV_C04_S02_I15 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः | | verse_text = पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः ।¦रजसा मिश्रबुद्धित्वं सत्त्वेनैव यथामतिः ॥15॥ | ||
| verse_lines = पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः | | verse_lines = पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः ।¦रजसा मिश्रबुद्धित्वं सत्त्वेनैव यथामतिः ॥15॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,727: | Line 1,727: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I16 | | verse_id = AV_C04_S02_I16 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः | | verse_text = गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः ।¦सम्यगेवाथ नित्या च तत्तन्माहात्म्ययोगतः ॥16॥ | ||
| verse_lines = गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः | | verse_lines = गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः ।¦सम्यगेवाथ नित्या च तत्तन्माहात्म्ययोगतः ॥16॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,735: | Line 1,735: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I17 | | verse_id = AV_C04_S02_I17 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः | | verse_text = बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः ।¦महाशुद्धचितित्वेन ततोऽप्यतिमहाचितिः ॥17॥ | ||
| verse_lines = बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः | | verse_lines = बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः ।¦महाशुद्धचितित्वेन ततोऽप्यतिमहाचितिः ॥17॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,743: | Line 1,743: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I18 | | verse_id = AV_C04_S02_I18 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः | | verse_text = अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः ।¦नित्यमेकप्रकारा च नारायणमतिः परा ॥18॥ | ||
| verse_lines = अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः | | verse_lines = अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः ।¦नित्यमेकप्रकारा च नारायणमतिः परा ॥18॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,751: | Line 1,751: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I19 | | verse_id = AV_C04_S02_I19 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा | | verse_text = सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा ।¦निर्लेपा वीतदोषा च नित्यमेवाविकारिणी ॥19॥ | ||
| verse_lines = सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा | | verse_lines = सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा ।¦निर्लेपा वीतदोषा च नित्यमेवाविकारिणी ॥19॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,759: | Line 1,759: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I20 | | verse_id = AV_C04_S02_I20 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः | | verse_text = विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः ।¦तथैव स्पष्टताभावात् तत्तन्त्रत्वात् तु(च) केवलम् ॥20॥ | ||
| verse_lines = विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः | | verse_lines = विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः ।¦तथैव स्पष्टताभावात् तत्तन्त्रत्वात् तु(च) केवलम् ॥20॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,767: | Line 1,767: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I21 | | verse_id = AV_C04_S02_I21 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा | | verse_text = न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा ।¦मुक्तानां तु तदन्येषां समुद्रतरलोपमा ॥21॥ | ||
| verse_lines = न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा | | verse_lines = न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा ।¦मुक्तानां तु तदन्येषां समुद्रतरलोपमा ॥21॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,775: | Line 1,775: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I22 | | verse_id = AV_C04_S02_I22 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः | | verse_text = अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः ।¦एवंविधेषु ज्ञानेषु तमसा मुष्टदृष्टयः ॥22 ॥ | ||
| verse_lines = अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः | | verse_lines = अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः ।¦एवंविधेषु ज्ञानेषु तमसा मुष्टदृष्टयः ॥22 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,783: | Line 1,783: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I23 | | verse_id = AV_C04_S02_I23 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः | | verse_text = खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः ।¦वदन्ति वादिनो मोक्षं नानामतसमाश्रयात् ॥23॥ | ||
| verse_lines = खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः | | verse_lines = खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः ।¦वदन्ति वादिनो मोक्षं नानामतसमाश्रयात् ॥23॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,791: | Line 1,791: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I24 | | verse_id = AV_C04_S02_I24 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् | | verse_text = आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् ।¦ज्ञानात् कर्मक्षयान्मोक्षो भवेद्देहाख्यपञ्जरात् ॥24॥ | ||
| verse_lines = आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् | | verse_lines = आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् ।¦ज्ञानात् कर्मक्षयान्मोक्षो भवेद्देहाख्यपञ्जरात् ॥24॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,799: | Line 1,799: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I25 | | verse_id = AV_C04_S02_I25 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः | | verse_text = पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः ।¦नित्यमूर्ध्वं व्रजत्येव पुद्गलो हस्तपादवान् ॥25॥ | ||
| verse_lines = पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः | | verse_lines = पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः ।¦नित्यमूर्ध्वं व्रजत्येव पुद्गलो हस्तपादवान् ॥25॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,807: | Line 1,807: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I26 | | verse_id = AV_C04_S02_I26 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) | | verse_text = इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।¦गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥ | ||
| verse_lines = इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) | | verse_lines = इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।¦गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,815: | Line 1,815: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I27 | | verse_id = AV_C04_S02_I27 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् | | verse_text = इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् ।¦अनूर्ध्वगतिता तत्र यद्युपाधिः खगस्य च ॥27॥ | ||
| verse_lines = इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् | | verse_lines = इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् ।¦अनूर्ध्वगतिता तत्र यद्युपाधिः खगस्य च ॥27॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,823: | Line 1,823: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I28 | | verse_id = AV_C04_S02_I28 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः | | verse_text = दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः ।¦प्रतिसाधनरूपस्य नानुमानस्य दूषणम् ॥28॥ | ||
| verse_lines = दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः | | verse_lines = दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः ।¦प्रतिसाधनरूपस्य नानुमानस्य दूषणम् ॥28॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,831: | Line 1,831: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I29 | | verse_id = AV_C04_S02_I29 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् | | verse_text = उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् ।¦अथापि सशरीरत्वं चात्रोपाधिर्न वै भवेत् ॥29॥ | ||
| verse_lines = उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् | | verse_lines = उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् ।¦अथापि सशरीरत्वं चात्रोपाधिर्न वै भवेत् ॥29॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,839: | Line 1,839: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I30 | | verse_id = AV_C04_S02_I30 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् | | verse_text = गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् ।¦आगमाननुसारित्वे प्रसङ्गोऽयं यतस्ततः ॥30॥ | ||
| verse_lines = गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् | | verse_lines = गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् ।¦आगमाननुसारित्वे प्रसङ्गोऽयं यतस्ततः ॥30॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,847: | Line 1,847: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I31 | | verse_id = AV_C04_S02_I31 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् | | verse_text = नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् ।¦तदैवातिप्रसङ्गः स्यान्न प्रसङ्गः क्वचिद्भवेत् ॥31॥ | ||
| verse_lines = नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् | | verse_lines = नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् ।¦तदैवातिप्रसङ्गः स्यान्न प्रसङ्गः क्वचिद्भवेत् ॥31॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,855: | Line 1,855: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I32 | | verse_id = AV_C04_S02_I32 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः | | verse_text = लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।¦सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥ | ||
| verse_lines = लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः | | verse_lines = लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।¦सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,863: | Line 1,863: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I33 | | verse_id = AV_C04_S02_I33 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् | | verse_text = मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।¦चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥ | ||
| verse_lines = मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् | | verse_lines = मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।¦चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,871: | Line 1,871: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I34 | | verse_id = AV_C04_S02_I34 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् | | verse_text = असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।¦अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥ | ||
| verse_lines = असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् | | verse_lines = असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।¦अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,879: | Line 1,879: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I35 | | verse_id = AV_C04_S02_I35 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् | | verse_text = चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।¦अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥ | ||
| verse_lines = चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् | | verse_lines = चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।¦अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,887: | Line 1,887: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I36 | | verse_id = AV_C04_S02_I36 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः | | verse_text = इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।¦ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥ | ||
| verse_lines = इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः | | verse_lines = इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।¦ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,895: | Line 1,895: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I37 | | verse_id = AV_C04_S02_I37 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा | | verse_text = न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा ।¦एकस्मिन् संसृतेर्मुक्ते न किञ्चिदवशिष्यते ॥37॥ | ||
| verse_lines = न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा | | verse_lines = न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा ।¦एकस्मिन् संसृतेर्मुक्ते न किञ्चिदवशिष्यते ॥37॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,903: | Line 1,903: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I38 | | verse_id = AV_C04_S02_I38 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः | | verse_text = तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।¦दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥ | ||
| verse_lines = तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः | | verse_lines = तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।¦दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,911: | Line 1,911: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I39 | | verse_id = AV_C04_S02_I39 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते | | verse_text = न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते ।¦न सुखत्वं न दुःखत्वं न विशेषोऽपि कश्चन ॥39॥ | ||
| verse_lines = न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते | | verse_lines = न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते ।¦न सुखत्वं न दुःखत्वं न विशेषोऽपि कश्चन ॥39॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,919: | Line 1,919: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I40 | | verse_id = AV_C04_S02_I40 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् | | verse_text = निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् ।¦शून्यं तत्त्वमसम्बाधं नानासंवृतिवर्जितम् ॥40॥ | ||
| verse_lines = निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् | | verse_lines = निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् ।¦शून्यं तत्त्वमसम्बाधं नानासंवृतिवर्जितम् ॥40॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,927: | Line 1,927: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I41 | | verse_id = AV_C04_S02_I41 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् | | verse_text = अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् ।¦मोक्ष इत्युच्यतेऽसद्भिर्नानासंवृतिवर्जितम् ॥41॥ | ||
| verse_lines = अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् | | verse_lines = अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् ।¦मोक्ष इत्युच्यतेऽसद्भिर्नानासंवृतिवर्जितम् ॥41॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,935: | Line 1,935: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I42 | | verse_id = AV_C04_S02_I42 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) | | verse_text = संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।¦स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥ | ||
| verse_lines = संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) | | verse_lines = संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।¦स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,943: | Line 1,943: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I43 | | verse_id = AV_C04_S02_I43 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा | | verse_text = केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।¦अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥ | ||
| verse_lines = केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा | | verse_lines = केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।¦अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,951: | Line 1,951: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I44 | | verse_id = AV_C04_S02_I44 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति | | verse_text = यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति ।¦स पुद्गलत्वनिर्मुक्तो महाशून्यत्वमेष्यति ॥44॥ | ||
| verse_lines = यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति | | verse_lines = यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति ।¦स पुद्गलत्वनिर्मुक्तो महाशून्यत्वमेष्यति ॥44॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,959: | Line 1,959: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I45 | | verse_id = AV_C04_S02_I45 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् | | verse_text = संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।¦इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥ | ||
| verse_lines = संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् | | verse_lines = संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।¦इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,967: | Line 1,967: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I46 | | verse_id = AV_C04_S02_I46 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः | | verse_text = बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।¦निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥ | ||
| verse_lines = बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः | | verse_lines = बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।¦निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,975: | Line 1,975: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I47 | | verse_id = AV_C04_S02_I47 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः | | verse_text = सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः ।¦व्यावर्त्यमात्रभेदस्तु विद्यते शून्यवादिनः ॥47॥ | ||
| verse_lines = सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः | | verse_lines = सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः ।¦व्यावर्त्यमात्रभेदस्तु विद्यते शून्यवादिनः ॥47॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,983: | Line 1,983: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I48 | | verse_id = AV_C04_S02_I48 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते | | verse_text = अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते ।¦निर्विशेषत्वतो नैव विशेषो ब्रह्मशून्ययोः ॥48॥ | ||
| verse_lines = अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते | | verse_lines = अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते ।¦निर्विशेषत्वतो नैव विशेषो ब्रह्मशून्ययोः ॥48॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,991: | Line 1,991: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I49 | | verse_id = AV_C04_S02_I49 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि | | verse_text = प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।¦अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥ | ||
| verse_lines = प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि | | verse_lines = प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।¦अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 1,999: | Line 1,999: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I50 | | verse_id = AV_C04_S02_I50 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् | | verse_text = अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् ।¦दीर्घभ्रान्तिकरी चेत् स्यादतत्त्वावेदकप्रमा ॥50॥ | ||
| verse_lines = अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् | | verse_lines = अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् ।¦दीर्घभ्रान्तिकरी चेत् स्यादतत्त्वावेदकप्रमा ॥50॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,007: | Line 2,007: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I51 | | verse_id = AV_C04_S02_I51 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता | | verse_text = रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता ।¦स्यादागमस्यानिवर्त्यमहामोहप्रदत्वतः ॥51॥ | ||
| verse_lines = रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता | | verse_lines = रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता ।¦स्यादागमस्यानिवर्त्यमहामोहप्रदत्वतः ॥51॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,015: | Line 2,015: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I52 | | verse_id = AV_C04_S02_I52 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् | | verse_text = तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् ।¦छत्राकारत्वविज्ञानं चन्द्रप्रादेशतामतिः ॥52॥ | ||
| verse_lines = तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् | | verse_lines = तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् ।¦छत्राकारत्वविज्ञानं चन्द्रप्रादेशतामतिः ॥52॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,023: | Line 2,023: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I53 | | verse_id = AV_C04_S02_I53 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा | | verse_text = निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा ।¦सत्त्वासत्त्वादिधर्माणामभाव उभयोर्मतः ॥53॥ | ||
| verse_lines = निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा | | verse_lines = निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा ।¦सत्त्वासत्त्वादिधर्माणामभाव उभयोर्मतः ॥53॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,031: | Line 2,031: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I54 | | verse_id = AV_C04_S02_I54 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते | | verse_text = न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते ।¦न च दुःखविरोधित्वादन्या ह्यानन्दतेष्यते ॥54॥ | ||
| verse_lines = न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते | | verse_lines = न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते ।¦न च दुःखविरोधित्वादन्या ह्यानन्दतेष्यते ॥54॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,039: | Line 2,039: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I55 | | verse_id = AV_C04_S02_I55 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च | | verse_text = मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च ।¦धर्माः केऽपि(धर्मास्तेऽपि) न सन्त्येव को विशेषस्ततस्तयोः ॥55॥ | ||
| verse_lines = मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च | | verse_lines = मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च ।¦धर्माः केऽपि(धर्मास्तेऽपि) न सन्त्येव को विशेषस्ततस्तयोः ॥55॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,047: | Line 2,047: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I56 | | verse_id = AV_C04_S02_I56 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् | | verse_text = एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् ।¦स्वपक्षसाधनेनैव ‘नाभाव’ इति चोक्तितः ॥56॥ | ||
| verse_lines = एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् | | verse_lines = एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् ।¦स्वपक्षसाधनेनैव ‘नाभाव’ इति चोक्तितः ॥56॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,055: | Line 2,055: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I57 | | verse_id = AV_C04_S02_I57 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः | | verse_text = आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः ।¦यदि नात्मावधिर्मोक्षो मोक्षः स्याद्धटशून्यता ॥57॥ | ||
| verse_lines = आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः | | verse_lines = आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः ।¦यदि नात्मावधिर्मोक्षो मोक्षः स्याद्धटशून्यता ॥57॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,063: | Line 2,063: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I58 | | verse_id = AV_C04_S02_I58 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् | | verse_text = कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् ।¦दृश्यमाने विशेषेऽपि यदि चेदविशेषता ॥58॥ | ||
| verse_lines = कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् | | verse_lines = कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् ।¦दृश्यमाने विशेषेऽपि यदि चेदविशेषता ॥58॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,071: | Line 2,071: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I59 | | verse_id = AV_C04_S02_I59 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः | | verse_text = घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः ।¦न मोक्षो विमतो यस्माददेहो घटशून्यता ॥59॥ | ||
| verse_lines = घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः | | verse_lines = घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः ।¦न मोक्षो विमतो यस्माददेहो घटशून्यता ॥59॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,079: | Line 2,079: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I60 | | verse_id = AV_C04_S02_I60 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः | | verse_text = यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः ।¦न च मायी वदेत् तत्र पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥60॥ | ||
| verse_lines = यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः | | verse_lines = यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः ।¦न च मायी वदेत् तत्र पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥60॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,087: | Line 2,087: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I61 | | verse_id = AV_C04_S02_I61 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी | | verse_text = अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी ।¦श्रुतिः काचिददेहत्वमप्राकृतशरीरताम् ॥61॥ | ||
| verse_lines = अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी | | verse_lines = अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी ।¦श्रुतिः काचिददेहत्वमप्राकृतशरीरताम् ॥61॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,095: | Line 2,095: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I62 | | verse_id = AV_C04_S02_I62 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः | | verse_text = मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः ।¦निर्दुःखत्वान्न तन्मोक्षः प्रतिपन्नं यथेति च ॥62॥ | ||
| verse_lines = मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः | | verse_lines = मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः ।¦निर्दुःखत्वान्न तन्मोक्षः प्रतिपन्नं यथेति च ॥62॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,103: | Line 2,103: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I63 | | verse_id = AV_C04_S02_I63 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः | | verse_text = अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः ।¦दुःखं दुःखादभिन्नत्वान्मोक्षोऽपि स्यादसंशयम् ॥63॥ | ||
| verse_lines = अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः | | verse_lines = अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः ।¦दुःखं दुःखादभिन्नत्वान्मोक्षोऽपि स्यादसंशयम् ॥63॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,111: | Line 2,111: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I64 | | verse_id = AV_C04_S02_I64 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः | | verse_text = भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः ।¦हेयं मायामतेनैव सह शून्यमतं बुधैः ॥64॥ | ||
| verse_lines = भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः | | verse_lines = भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः ।¦हेयं मायामतेनैव सह शून्यमतं बुधैः ॥64॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,119: | Line 2,119: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I65 | | verse_id = AV_C04_S02_I65 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः | | verse_text = एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः ।¦तस्यापि भङ्गुरत्वादिविशेषमपहाय हि ॥65॥ | ||
| verse_lines = एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः | | verse_lines = एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः ।¦तस्यापि भङ्गुरत्वादिविशेषमपहाय हि ॥65॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,127: | Line 2,127: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I66 | | verse_id = AV_C04_S02_I66 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् | | verse_text = अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् ।¦कालो न केवलज्ञानी कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥66॥ | ||
| verse_lines = अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् | | verse_lines = अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् ।¦कालो न केवलज्ञानी कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥66॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,135: | Line 2,135: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I67 | | verse_id = AV_C04_S02_I67 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता | | verse_text = एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता ।¦यदि कालोऽपि नेत्याह कदेति प्रश्न उत्तरम् ॥67॥ | ||
| verse_lines = एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता | | verse_lines = एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता ।¦यदि कालोऽपि नेत्याह कदेति प्रश्न उत्तरम् ॥67॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,143: | Line 2,143: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I68 | | verse_id = AV_C04_S02_I68 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् | | verse_text = किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् ।¦अवस्थात्वादिति ह्येव हेतुः साऽपि कदेति च ॥68॥ | ||
| verse_lines = किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् | | verse_lines = किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् ।¦अवस्थात्वादिति ह्येव हेतुः साऽपि कदेति च ॥68॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,151: | Line 2,151: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I69 | | verse_id = AV_C04_S02_I69 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् | | verse_text = पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् ।¦न काल इति सामान्यनिषेधे कालगप्रमा ॥69॥ | ||
| verse_lines = पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् | | verse_lines = पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् ।¦न काल इति सामान्यनिषेधे कालगप्रमा ॥69॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,159: | Line 2,159: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I70 | | verse_id = AV_C04_S02_I70 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् | | verse_text = निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् ।¦एकजीवत्वपक्षे तु कालाभावादियं प्रमा ॥70॥ | ||
| verse_lines = निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् | | verse_lines = निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् ।¦एकजीवत्वपक्षे तु कालाभावादियं प्रमा ॥70॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,167: | Line 2,167: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I71 | | verse_id = AV_C04_S02_I71 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् | | verse_text = कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् ।¦विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥71॥ | ||
| verse_lines = कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् | | verse_lines = कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् ।¦विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥71॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,175: | Line 2,175: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I72 | | verse_id = AV_C04_S02_I72 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् | | verse_text = इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् ।¦कालशब्देश्वरैकत्वमतान्यप्येवमेव हि ॥72॥ | ||
| verse_lines = इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् | | verse_lines = इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् ।¦कालशब्देश्वरैकत्वमतान्यप्येवमेव हि ॥72॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,183: | Line 2,183: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I73 | | verse_id = AV_C04_S02_I73 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः | | verse_text = निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः ।¦ज्ञानं स्वरसभङ्ग्येव नित्यसन्तानमिष्यते ॥73॥ | ||
| verse_lines = निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः | | verse_lines = निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः ।¦ज्ञानं स्वरसभङ्ग्येव नित्यसन्तानमिष्यते ॥73॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,191: | Line 2,191: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I74 | | verse_id = AV_C04_S02_I74 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः | | verse_text = बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः ।¦मोक्षो न शुद्धविज्ञानसन्तानी कालगत्वतः ॥74॥ | ||
| verse_lines = बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः | | verse_lines = बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः ।¦मोक्षो न शुद्धविज्ञानसन्तानी कालगत्वतः ॥74॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,199: | Line 2,199: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I75 | | verse_id = AV_C04_S02_I75 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् | | verse_text = प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।¦अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥ | ||
| verse_lines = प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् | | verse_lines = प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।¦अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,207: | Line 2,207: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I76 | | verse_id = AV_C04_S02_I76 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः | | verse_text = निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः ।¦साङ्ख्यनैयायिकाद्याश्च प्राहुर्मोक्षं च(तु) निःसुखम् ॥76॥ | ||
| verse_lines = निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः | | verse_lines = निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः ।¦साङ्ख्यनैयायिकाद्याश्च प्राहुर्मोक्षं च(तु) निःसुखम् ॥76॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,215: | Line 2,215: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I77 | | verse_id = AV_C04_S02_I77 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् | | verse_text = इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् ।¦तत्राहुर्नैतदप्यत्र शोभनं श्रुतयो यतः ॥77॥ | ||
| verse_lines = इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् | | verse_lines = इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् ।¦तत्राहुर्नैतदप्यत्र शोभनं श्रुतयो यतः ॥77॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,223: | Line 2,223: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I78 | | verse_id = AV_C04_S02_I78 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि | | verse_text = महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि ।¦प्राकृतप्रियहानिस्तु प्रियास्पृष्टिरितीर्यते ॥78॥ | ||
| verse_lines = महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि | | verse_lines = महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि ।¦प्राकृतप्रियहानिस्तु प्रियास्पृष्टिरितीर्यते ॥78॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,231: | Line 2,231: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I79 | | verse_id = AV_C04_S02_I79 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् | | verse_text = अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् ।¦नास्ति ह्यप्राकृतं दुःखं सतो जीवस्य कुत्रचित् ॥79॥ | ||
| verse_lines = अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् | | verse_lines = अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् ।¦नास्ति ह्यप्राकृतं दुःखं सतो जीवस्य कुत्रचित् ॥79॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,239: | Line 2,239: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I80 | | verse_id = AV_C04_S02_I80 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः | | verse_text = प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः ।¦हेयत्वादप्रियस्यैव प्रियहानेरनिष्टतः ॥80॥ | ||
| verse_lines = प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः | | verse_lines = प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः ।¦हेयत्वादप्रियस्यैव प्रियहानेरनिष्टतः ॥80॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,247: | Line 2,247: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I81 | | verse_id = AV_C04_S02_I81 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते | | verse_text = न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते ।¦अप्रियस्य स्वरूपत्वमसुरेष्वेव हि श्रुतम् ॥81॥ | ||
| verse_lines = न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते | | verse_lines = न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते ।¦अप्रियस्य स्वरूपत्वमसुरेष्वेव हि श्रुतम् ॥81॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,255: | Line 2,255: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I82 | | verse_id = AV_C04_S02_I82 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः | | verse_text = असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः ।¦इत्यात्मप्रियहानाय को यतेत च बुद्धिमान् ॥82॥ | ||
| verse_lines = असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः | | verse_lines = असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः ।¦इत्यात्मप्रियहानाय को यतेत च बुद्धिमान् ॥82॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,263: | Line 2,263: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I83 | | verse_id = AV_C04_S02_I83 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि | | verse_text = सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।¦धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥ | ||
| verse_lines = सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि | | verse_lines = सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।¦धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,271: | Line 2,271: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I84 | | verse_id = AV_C04_S02_I84 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् | | verse_text = आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् ।¦भवानित्युक्तवत्या हि नाहं मोहं वदामि ते ॥84॥ | ||
| verse_lines = आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् | | verse_lines = आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् ।¦भवानित्युक्तवत्या हि नाहं मोहं वदामि ते ॥84॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,279: | Line 2,279: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I85 | | verse_id = AV_C04_S02_I85 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् | | verse_text = इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् ।¦ज्ञानरूपस्य विज्ञाननाशस्तन्नाश एव यत् ॥85॥ | ||
| verse_lines = इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् | | verse_lines = इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् ।¦ज्ञानरूपस्य विज्ञाननाशस्तन्नाश एव यत् ॥85॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,287: | Line 2,287: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I86 | | verse_id = AV_C04_S02_I86 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् | | verse_text = इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् ।¦धर्मानाहाप्यनुच्छिन्नांस्तार्किकैर्विनिवारितान् ॥86॥ | ||
| verse_lines = इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् | | verse_lines = इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् ।¦धर्मानाहाप्यनुच्छिन्नांस्तार्किकैर्विनिवारितान् ॥86॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,295: | Line 2,295: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I87 | | verse_id = AV_C04_S02_I87 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः | | verse_text = मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः ।¦आचिक्षेप मतं तच्च यस्मिन्न विषयादनम् ॥87॥ | ||
| verse_lines = मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः | | verse_lines = मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः ।¦आचिक्षेप मतं तच्च यस्मिन्न विषयादनम् ॥87॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,303: | Line 2,303: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I88 | | verse_id = AV_C04_S02_I88 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः | | verse_text = घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः ।¦येनेदमखिलं वेद विज्ञातारं स्वमेव च ॥88॥ | ||
| verse_lines = घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः | | verse_lines = घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः ।¦येनेदमखिलं वेद विज्ञातारं स्वमेव च ॥88॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,311: | Line 2,311: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I89 | | verse_id = AV_C04_S02_I89 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा | | verse_text = केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा ।¦नाखिलज्ञापको विष्णुरज्ञेयो नियमेन हि ॥89॥ | ||
| verse_lines = केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा | | verse_lines = केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा ।¦नाखिलज्ञापको विष्णुरज्ञेयो नियमेन हि ॥89॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,319: | Line 2,319: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I90 | | verse_id = AV_C04_S02_I90 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् | | verse_text = तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् ।¦प्रत्यक्षमात्मविज्ञानाविरोधानुभवादपि ॥90॥ | ||
| verse_lines = तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् | | verse_lines = तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् ।¦प्रत्यक्षमात्मविज्ञानाविरोधानुभवादपि ॥90॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,327: | Line 2,327: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I91 | | verse_id = AV_C04_S02_I91 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते | | verse_text = न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।¦कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥ | ||
| verse_lines = न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते | | verse_lines = न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।¦कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,335: | Line 2,335: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I92 | | verse_id = AV_C04_S02_I92 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् | | verse_text = कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् ।¦‘सोऽश्नुते सर्वकामांश्च’ ‘कामान्नी कामरूप्यथ’ ॥92॥ | ||
| verse_lines = कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् | | verse_lines = कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् ।¦‘सोऽश्नुते सर्वकामांश्च’ ‘कामान्नी कामरूप्यथ’ ॥92॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,343: | Line 2,343: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I93 | | verse_id = AV_C04_S02_I93 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि | | verse_text = इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि ।¦अस्वातन्त्र्यादिवेत्युक्तं न द्वैताभावतः क्वचित् ॥93॥ | ||
| verse_lines = इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि | | verse_lines = इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि ।¦अस्वातन्त्र्यादिवेत्युक्तं न द्वैताभावतः क्वचित् ॥93॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,351: | Line 2,351: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I94 | | verse_id = AV_C04_S02_I94 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः | | verse_text = आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः ।¦‘अस्वातन्त्र्योपमाभेदभेदेष्विव उदीरितः’ ॥94॥ | ||
| verse_lines = आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः | | verse_lines = आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः ।¦‘अस्वातन्त्र्योपमाभेदभेदेष्विव उदीरितः’ ॥94॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,359: | Line 2,359: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I95 | | verse_id = AV_C04_S02_I95 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् | | verse_text = शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् ।¦सुखादिधर्महानौ तु मुक्तेः किं च प्रयोजनम् ॥95॥ | ||
| verse_lines = शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् | | verse_lines = शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् ।¦सुखादिधर्महानौ तु मुक्तेः किं च प्रयोजनम् ॥95॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,367: | Line 2,367: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I96 | | verse_id = AV_C04_S02_I96 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् | | verse_text = यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् ।¦तयोश्च दुःखहानाद्धि सुखनाशोऽधिको भवेत् ॥96॥ | ||
| verse_lines = यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् | | verse_lines = यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् ।¦तयोश्च दुःखहानाद्धि सुखनाशोऽधिको भवेत् ॥96॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,375: | Line 2,375: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I97 | | verse_id = AV_C04_S02_I97 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः | | verse_text = प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः ।¦यतते सुखहानौ हि को मोक्षाय यतेत् पुमान् ॥97॥ | ||
| verse_lines = प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः | | verse_lines = प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः ।¦यतते सुखहानौ हि को मोक्षाय यतेत् पुमान् ॥97॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,383: | Line 2,383: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I98 | | verse_id = AV_C04_S02_I98 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः | | verse_text = अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः ।¦महच्च दुःखमाप्नोति सुखनाशनिवृत्तये ॥98॥ | ||
| verse_lines = अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः | | verse_lines = अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः ।¦महच्च दुःखमाप्नोति सुखनाशनिवृत्तये ॥98॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,391: | Line 2,391: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I99 | | verse_id = AV_C04_S02_I99 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् | | verse_text = न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् ।¦नारदाद्याः सुखार्थाय सहन्ते दुःखमञ्जसा ॥99॥ | ||
| verse_lines = न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् | | verse_lines = न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् ।¦नारदाद्याः सुखार्थाय सहन्ते दुःखमञ्जसा ॥99॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,399: | Line 2,399: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I100 | | verse_id = AV_C04_S02_I100 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते | | verse_text = युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते ।¦‘यदेन्द्रवैरोचनयोर्ब्रह्मास्त्राभ्यां सुतापिताः ॥100 ॥ | ||
| verse_lines = युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते | | verse_lines = युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते ।¦‘यदेन्द्रवैरोचनयोर्ब्रह्मास्त्राभ्यां सुतापिताः ॥100 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,407: | Line 2,407: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I101 | | verse_id = AV_C04_S02_I101 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ | | verse_text = अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ ।¦इति स्कान्दवचनस्तस्मात् सुखाभावाय को यतेत् ॥101॥ | ||
| verse_lines = अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ | | verse_lines = अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ ।¦इति स्कान्दवचनस्तस्मात् सुखाभावाय को यतेत् ॥101॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,415: | Line 2,415: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I102 | | verse_id = AV_C04_S02_I102 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः | | verse_text = विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः ।¦प्रतिपन्नो यथेत्येव चानुमा केन वार्यते ॥102॥ | ||
| verse_lines = विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः | | verse_lines = विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः ।¦प्रतिपन्नो यथेत्येव चानुमा केन वार्यते ॥102॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,423: | Line 2,423: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I103 | | verse_id = AV_C04_S02_I103 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा | | verse_text = सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा ।¦मुक्तौ न ग्राह्यमेवैतत्सुखाभावमतं बुधैः ॥103॥ | ||
| verse_lines = सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा | | verse_lines = सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा ।¦मुक्तौ न ग्राह्यमेवैतत्सुखाभावमतं बुधैः ॥103॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,431: | Line 2,431: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I104 | | verse_id = AV_C04_S02_I104 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ | | verse_text = ‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ ।¦‘निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः ॥104॥ | ||
| verse_lines = ‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ | | verse_lines = ‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ ।¦‘निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः ॥104॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,439: | Line 2,439: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I105 | | verse_id = AV_C04_S02_I105 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) | | verse_text = परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।¦‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥ | ||
| verse_lines = परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) | | verse_lines = परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।¦‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,447: | Line 2,447: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I106 | | verse_id = AV_C04_S02_I106 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ | | verse_text = न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ ।¦‘यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ॥106॥ | ||
| verse_lines = न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ | | verse_lines = न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ ।¦‘यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ॥106॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,455: | Line 2,455: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I107 | | verse_id = AV_C04_S02_I107 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ | | verse_text = कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ ।¦इति श्रुतिपुराणानि तत्र तत्र वदन्ति हि ॥107॥ | ||
| verse_lines = कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ | | verse_lines = कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ ।¦इति श्रुतिपुराणानि तत्र तत्र वदन्ति हि ॥107॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,463: | Line 2,463: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I108 | | verse_id = AV_C04_S02_I108 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि | | verse_text = अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि ।¦शिरःकराद्यभावश्च न मुक्तस्य भवेत् क्वचित् ॥108॥ | ||
| verse_lines = अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि | | verse_lines = अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि ।¦शिरःकराद्यभावश्च न मुक्तस्य भवेत् क्वचित् ॥108॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,479: | Line 2,479: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I110 | | verse_id = AV_C04_S02_I110 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः | | verse_text = ‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।¦न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥110॥ | ||
| verse_lines = ‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः | | verse_lines = ‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।¦न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥110॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,487: | Line 2,487: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I111 | | verse_id = AV_C04_S02_I111 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः | | verse_text = श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।¦सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणिप्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥111॥ | ||
| verse_lines = श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः | | verse_lines = श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।¦सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणिप्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥111॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,495: | Line 2,495: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I112 | | verse_id = AV_C04_S02_I112 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् | | verse_text = प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।¦भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥112॥ | ||
| verse_lines = प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् | | verse_lines = प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।¦भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥112॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,503: | Line 2,503: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I113 | | verse_id = AV_C04_S02_I113 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः | | verse_text = विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः ।¦श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः’(भाग.२.९.१०-१३) ॥113॥ | ||
| verse_lines = विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः | | verse_lines = विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः ।¦श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः’(भाग.२.९.१०-१३) ॥113॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,511: | Line 2,511: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I114 | | verse_id = AV_C04_S02_I114 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = ‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु | | verse_text = ‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।¦ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः’(ऋ.सं.१०.७१.११) ॥114॥ | ||
| verse_lines = ‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु | | verse_lines = ‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।¦ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः’(ऋ.सं.१०.७१.११) ॥114॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,519: | Line 2,519: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I115 | | verse_id = AV_C04_S02_I115 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः | | verse_text = कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः ।¦देहः स्वरूपात्मक एव तेषां मुक्तिं गतानामपि चेयते हि ॥115॥ | ||
| verse_lines = कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः | | verse_lines = कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः ।¦देहः स्वरूपात्मक एव तेषां मुक्तिं गतानामपि चेयते हि ॥115॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,527: | Line 2,527: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I116 | | verse_id = AV_C04_S02_I116 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् | | verse_text = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।¦यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥ | ||
| verse_lines = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् | | verse_lines = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।¦यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,535: | Line 2,535: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I117 | | verse_id = AV_C04_S02_I117 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् | | verse_text = न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।¦स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥ | ||
| verse_lines = न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् | | verse_lines = न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।¦स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,543: | Line 2,543: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I118 | | verse_id = AV_C04_S02_I118 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् | | verse_text = यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।¦भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥ | ||
| verse_lines = यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् | | verse_lines = यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।¦भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,551: | Line 2,551: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I119 | | verse_id = AV_C04_S02_I119 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् | | verse_text = सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।¦इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥ | ||
| verse_lines = सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् | | verse_lines = सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।¦इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,559: | Line 2,559: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I120 | | verse_id = AV_C04_S02_I120 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् | | verse_text = कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।¦इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥ | ||
| verse_lines = कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् | | verse_lines = कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।¦इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,567: | Line 2,567: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I121 | | verse_id = AV_C04_S02_I121 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति | | verse_text = कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।¦यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥ | ||
| verse_lines = कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति | | verse_lines = कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।¦यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,575: | Line 2,575: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I122 | | verse_id = AV_C04_S02_I122 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति | | verse_text = न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।¦यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥ | ||
| verse_lines = न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति | | verse_lines = न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।¦यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,583: | Line 2,583: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I123 | | verse_id = AV_C04_S02_I123 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण | | verse_text = इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।¦विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥ | ||
| verse_lines = इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण | | verse_lines = इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।¦विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,591: | Line 2,591: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I124 | | verse_id = AV_C04_S02_I124 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः | | verse_text = औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।¦स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥ | ||
| verse_lines = औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः | | verse_lines = औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।¦स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,599: | Line 2,599: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I125 | | verse_id = AV_C04_S02_I125 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् | | verse_text = व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।¦विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥ | ||
| verse_lines = व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् | | verse_lines = व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।¦विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,607: | Line 2,607: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I126 | | verse_id = AV_C04_S02_I126 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः | | verse_text = सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।¦नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥ | ||
| verse_lines = सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः | | verse_lines = सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।¦नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,615: | Line 2,615: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I127 | | verse_id = AV_C04_S02_I127 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् | | verse_text = महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।¦विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥ | ||
| verse_lines = महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् | | verse_lines = महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।¦विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,623: | Line 2,623: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I128 | | verse_id = AV_C04_S02_I128 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च | | verse_text = व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।¦समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥ | ||
| verse_lines = व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च | | verse_lines = व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।¦समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,631: | Line 2,631: | ||
| verse_id = AV_C04_S02_I129 | | verse_id = AV_C04_S02_I129 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः | | verse_text = विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।¦कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥ | ||
| verse_lines = विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः | | verse_lines = विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।¦कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 2,655: | Line 2,655: | ||
| verse_id = AV_C04_S04_I02 | | verse_id = AV_C04_S04_I02 | ||
| verse_type = introduction | | verse_type = introduction | ||
| verse_text = समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके | | verse_text = समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।¦सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥¦विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः । | ||
| verse_lines = समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके | | verse_lines = समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।¦सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥¦विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः । | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||