Brahmasutra/C1/S1: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ शास्त्रयोनित्वात् ॐ ॥ 03-03 ॥ | | verse_line1 = ॐ शास्त्रयोनित्वात् ॐ ॥ 03-03 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V03| text = अनुमानतोऽन्ये न कल्पनीयाः –}} | |||
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| verse_line1 = ॐ तत्तु समन्वयात् ॐ ॥ 04-04 ॥ | | verse_line1 = ॐ तत्तु समन्वयात् ॐ ॥ 04-04 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V04| text = अज्ञानां प्रतीयमानमपि नेतरेषां शास्त्रयोनित्वम् , कुतः ? ।}} | |||
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| Line 885: | Line 889: | ||
| verse_line1 = ॐ ईक्षतेर्नाशब्दम् ॐ ॥ 05-05 ॥ | | verse_line1 = ॐ ईक्षतेर्नाशब्दम् ॐ ॥ 05-05 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V05| text = ननु’यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’, ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्’ ॥ ‘अवचनेनैव प्रोवाच’, ‘यद्वाचाऽनभ्युदितम् । येन वागभ्युद्यते ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्’ इत्यादिभिर्न तच्छब्दगोचरम् । नेत्याह –}} | |||
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| Line 1,161: | Line 1,167: | ||
| verse_line1 = ॐ गतिसामान्यात् ॐ ॥ 10-10 ॥ | | verse_line1 = ॐ गतिसामान्यात् ॐ ॥ 10-10 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V10| text = न च कासुचिच्छाखास्वन्यथोच्यते ।}} | |||
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| Line 1,220: | Line 1,228: | ||
| verse_line1 = ॐ आनन्दमयोऽभ्यासात् ॐ ॥ 12-12 ॥ | | verse_line1 = ॐ आनन्दमयोऽभ्यासात् ॐ ॥ 12-12 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V12| text = ‘तमेव समन्वयं प्रकटयत्यानन्दमयोऽभ्यासादित्यादिना समस्तेनाध्यायेन प्रायेण । | |||
प्रायेणान्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां परमात्मनि समन्वयः प्रदर्श्यतेऽस्मिन् पादे । नान्यथा तददृष्टेः । | |||
ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्येत्युक्तम् । तच्च ब्रह्म ‘ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’ इत्यानन्दमयावयवरूपं प्रतीयते । न ह्यवयविनं विना अवयवमात्रस्य ज्ञेयतेत्यत आह –}} | |||
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| Line 1,554: | Line 1,566: | ||
| verse_line1 = ॐ कामाच्च नानुमानापेक्षा ॐ ॥ 18-18 ॥ | | verse_line1 = ॐ कामाच्च नानुमानापेक्षा ॐ ॥ 18-18 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V18| text = न च तत्तदनुमानविरोधः ।}} | |||
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| Line 1,641: | Line 1,655: | ||
| verse_line1 = ॐ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॐ ॥ 20-20 ॥ | | verse_line1 = ॐ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॐ ॥ 20-20 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V20| text = ‘अदृश्येऽनात्म्ये’ इत्युक्तम् । तच्चादृष्यत्वम्,‘अन्तः प्रविष्टं कर्तारमेतमन्तश्चन्द्रमसि मनसा चरन्ततम् । सहैव सन्तं न विजानन्ति देवाः’ इत्यन्तःस्थस्य कस्यचिदुच्यते । | |||
स च’इन्द्रो राजा’’सप्तयुञ्जन्ति’ इत्यादिभिरन्यः प्रतीयते । तस्मात् स एवानन्दमय इति न मन्तव्यम् ।}} | |||
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| Line 1,766: | Line 1,783: | ||
| verse_line1 = ॐ आकाशस्तल्लिङ्गात् ॐ ॥ 22-22 ॥ | | verse_line1 = ॐ आकाशस्तल्लिङ्गात् ॐ ॥ 22-22 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V22| text = ‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इति’ इत्याकाशस्यानन्दमयत्वे हेतुरुक्तः, न तु विष्णोरिति न मन्तव्यम् । यतः –}} | |||
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| Line 1,866: | Line 1,885: | ||
| verse_line1 = ॐ ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॐ ॥ 24-24 ॥ | | verse_line1 = ॐ ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॐ ॥ 24-24 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V24| text = ‘यो वेद निहितम् गुहायाम्’ इत्युक्तम् । तच्च गुहानिहितम् – | |||
‘वि मे कर्णा पतयतो विचक्षुर्वीदं ज्योतिर्हृदय आहितं यत् । विमे मनश्चरति दूर आधीः किंस्विद्वक्ष्यामि किमु नो मनिष्ये’ इति ज्योतिरुक्तम् । | |||
तच्च ज्योतिरग्निसूक्तत्वात् प्रसिद्धेश्चाग्निरेवेति प्राप्तम् । अत आह –}} | |||
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| Line 2,028: | Line 2,051: | ||
| verse_line1 = ॐ प्राणस्तथाऽनुगमात् ॐ ॥ 28-28 ॥ | | verse_line1 = ॐ प्राणस्तथाऽनुगमात् ॐ ॥ 28-28 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S01_V28| text = ‘प्राणो विष्णुरित्युक्तम् । तत्र ‘ता वा एताः शीर्षन् श्रियः श्रिताश्चक्षुश्र्योत्रं मनो वाक्प्राणः’ इत्यत्र प्राणस्य विष्णुत्वं न विद्यते । इन्द्रियैः सहाभिधानादिति । अत आह-}} | |||
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