Brahmasutra/C2/S3: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॐ ॥ 07-225 ॥ | | verse_line1 = ॐ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॐ ॥ 07-225 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति वियदधिकरणम् ॥ 01 ॥}} | |||
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| Line 206: | Line 208: | ||
| verse_line1 = ॐ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॐ ॥ 08-226 ॥ | | verse_line1 = ॐ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॐ ॥ 08-226 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V08| text = ‘अथ ह नित्याश्चानित्याश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यनित्यानि वायुर्वाव नित्यो वायुना हि सर्वाणि भूतानि नेनीयन्ते’ | |||
‘अथ ह चेतनाश्चाचेतनाश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यचेतनानि वायुर्वाव चेतनो वायुना हि सर्वाणि भूतानि विज्ञायन्ते’ । | |||
‘कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् ।ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण’। | |||
‘सा वा एषा देवताऽनादिर्योऽयं पवते’ इति । | |||
‘यस्यानादिर्न मध्यं नान्तो नोदयो न निम्लोचः’।इत्यादिश्रुतिभ्यो वायोरनुत्पत्तिरित्यतो ब्रवीति –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति मातरिश्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥}} | |||
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| Line 256: | Line 266: | ||
| verse_line1 = ॐ असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 09-227 ॥ | | verse_line1 = ॐ असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 09-227 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = इति असम्भवाधिकरणम् ॥ 03 ॥}} | |||
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| Line 353: | Line 365: | ||
| verse_line1 = ॐ तेजोऽतस्तथा ह्याह ॐ ॥ 10-228 ॥ | | verse_line1 = ॐ तेजोऽतस्तथा ह्याह ॐ ॥ 10-228 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति तेजोऽधिकरणम् ॥ 04 ॥}} | |||
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| Line 374: | Line 388: | ||
| verse_line1 = ॐ आपः ॐ ॥ 11-229 ॥ | | verse_line1 = ॐ आपः ॐ ॥ 11-229 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति अबधिकरणम् ॥ 05 ॥}} | |||
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| Line 442: | Line 458: | ||
| verse_line1 = ॐ पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ॐ ॥ 12-230 ॥ | | verse_line1 = ॐ पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ॐ ॥ 12-230 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V12| text = ‘ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्यामः प्रजायेमेहीति । ता अन्नमसृजन्त’ इत्यद्ब्द्योऽन्नसृष्टिः श्रूयते ।‘अद्ब्यः पृथिवी’ इति कुत्रचित् पृथिवीसृष्टिः । अतो विरुद्धत्वादप्रामाण्यमित्यतो वक्तिः –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति पृथिव्यधिकरणम् ॥}} | |||
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| Line 503: | Line 523: | ||
| verse_line1 = ॐ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॐ ॥ 13-231 ॥ | | verse_line1 = ॐ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॐ ॥ 13-231 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V13| text = ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा विशान्तकस्तेनान्नेनाप्यायस्व’ इत्यादिनाऽन्यः संहर्ता प्रतीयत इत्यतो ब्रूते –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति तदभिध्यानाधिकरणम् ॥ 07 ॥}} | |||
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| Line 574: | Line 598: | ||
| verse_line1 = ॐ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॐ ॥ 14-232 ॥ | | verse_line1 = ॐ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॐ ॥ 14-232 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V14| text = ‘अत एव हीदं परात् क्रमादुत्पद्यते क्रमाद्विलीयते नासावुदेति नास्तमेति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ क्रमाल्लयः प्रतीयते । | |||
‘अक्षरात् परमादेव सर्वमुत्पद्यते क्रमात् ।व्युत्क्रमाद्विलयश्चैव तस्मिन्नेव परात्मनि’ ॥इति चतुर्वेदशिखायां व्युत्क्रमाल्लयः प्रतीयते । अत आह}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति विपर्ययाधिकरणम् ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॐ ॥ 16-234 ॥ | | verse_line1 = ॐ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॐ ॥ 16-234 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति अन्तराधिकरणम् ॥ 09 ॥}} | |||
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| Line 739: | Line 770: | ||
| verse_line1 = ॐ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॐ ॥ 17-235 ॥ | | verse_line1 = ॐ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॐ ॥ 17-235 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति आत्माधिकरणम् ॥ 10 ॥}} | |||
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| Line 780: | Line 813: | ||
| verse_line1 = ॐ ज्ञोऽत एव ॐ ॥ 18-236 ॥ | | verse_line1 = ॐ ज्ञोऽत एव ॐ ॥ 18-236 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V18| text = ‘नित्यो नित्यानाम्’ इति जीवास्यापि नित्यत्वमुक्तम् ।‘सर्व एते चिदात्मानो व्युच्चरन्ति’इत्युत्पत्तिरुच्यते । अतो विरोध इत्यत आह –}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||
| Line 799: | Line 834: | ||
| verse_line1 = ॐ युक्तेश्च ॐ ॥ 19-237 ॥ | | verse_line1 = ॐ युक्तेश्च ॐ ॥ 19-237 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = इति ज्ञाधिकरणम् ॥ 11 ॥}} | |||
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| Line 847: | Line 884: | ||
| verse_line1 = ॐ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॐ ॥ 20-238 ॥ | | verse_line1 = ॐ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॐ ॥ 20-238 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V20| text = ‘व्याप्ताह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च सर्वात्मानः सर्वरूपा अनन्ताः’ इति काषायणश्रुतौ व्याप्तत्वं प्रतीयते । | |||
‘अणुर्ह्येष आत्मायं वा एते सिनीतः । पुण्यं चापुण्यं च’ इति गौपवनश्रुतावणुत्वमित्यतो विरोध इति । अतो ब्रवीति-}} | |||
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| Line 876: | Line 916: | ||
| verse_line1 = ॐ स्वात्मना चोत्तरयोः ॐ ॥ 21-239 ॥ | | verse_line1 = ॐ स्वात्मना चोत्तरयोः ॐ ॥ 21-239 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V21| text = तत्र स्वातन्त्र्य प्रतीतेः- | |||
एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रमीयते। एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्’ इत्यादेश्च ॥ स्वयमेवेत्यतो वक्ति –}} | |||
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| Line 1,029: | Line 1,072: | ||
| verse_line1 = ॐ गुणाद्वाऽऽलोकवत् ॐ ॥ 26-244 ॥ | | verse_line1 = ॐ गुणाद्वाऽऽलोकवत् ॐ ॥ 26-244 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति उत्क्रान्त्यधिकरणम् ॥ 12 ॥}} | |||
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| Line 1,070: | Line 1,115: | ||
| verse_line1 = ॐ व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ॐ ॥ 27-245 ॥ | | verse_line1 = ॐ व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ॐ ॥ 27-245 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V27| text = ‘स नित्यो निरवयवः पुण्ययुक् पापयुक् च स इमं लोकममुं चावर्तते स विमुच्यते स एकधा न सप्तधा न शतधा’ इति गौपवनश्रुतावेकस्याबहुत्वं प्रतीयते । | |||
‘स पञ्चधा स सप्तधा स दशधा भवति स शतधा च सहस्रधा स गच्छति स मुच्यते’ इति पाराशर्यायणश्रुतौ बहुरूपत्वं प्रतीयते । | |||
अतो विरोधं परिहरति-}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति व्यतिरेकाधिकरणम् ॥ 13 ॥}} | |||
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| Line 1,110: | Line 1,161: | ||
| verse_line1 = ॐ पृथगुपदेशात् ॐ ॥ 28-246 ॥ | | verse_line1 = ॐ पृथगुपदेशात् ॐ ॥ 28-246 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V28| text = ‘तत्वमसि’ ,’अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादिषु जीवस्य परेणाभेदः प्रतीयते ।‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’ ‘द्वा सुपर्णा’ इत्यादिषु भेदः। अत उच्यते-}} | |||
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| Line 1,138: | Line 1,191: | ||
| verse_line1 = ॐ तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॐ ॥ 29-247 ॥ | | verse_line1 = ॐ तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॐ ॥ 29-247 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति पृथगुपदेशाधिकरणम् ॥ 14 ॥}} | |||
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| Line 1,169: | Line 1,224: | ||
| verse_line1 = ॐ यावदात्माभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॐ ॥ 30-248 ॥ | | verse_line1 = ॐ यावदात्माभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॐ ॥ 30-248 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V30| text = जीवास्याप्युत्पत्तिरुक्ता । अतस्तस्य ‘सोऽनादिना पुण्येन पापेन चानुबद्धः। परेण निर्मुक्त आनन्त्याय कल्पते’ । इत्यानादिकर्मसम्बन्ध आनन्त्यावाप्तिश्च न युज्यत इत्यत आह –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति यावदधिकरणम् ॥ 15 ॥}} | |||
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| Line 1,209: | Line 1,268: | ||
| verse_line1 = ॐ पुंस्त्वादिवत्त्वस्यसतोऽभिव्यक्तियोगात् ॐ ॥ 31-249 ॥ | | verse_line1 = ॐ पुंस्त्वादिवत्त्वस्यसतोऽभिव्यक्तियोगात् ॐ ॥ 31-249 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V31| text = ‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः’ । ‘स आनन्दः स बलः स ओजः स परेणामुं लोकं नीयते स विमुच्यत इति जीवस्य ज्ञानानन्दादिरूपत्वमुच्यते । स दुःखाद्विमुक्त आनन्दी भवति । सोऽज्ञानाद्विमुक्तो ज्ञानी भवति ।सोऽबलाद्विमुक्तो बली भवति। स नित्यो निरातङ्कोऽतिष्ठते’ इति पैङ्गीश्रुतावनानन्दादिरूपत्वं प्रतीयते । अत आह –}} | |||
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| Line 1,237: | Line 1,298: | ||
| verse_line1 = ॐ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॐ ॥ 32-250 ॥ | | verse_line1 = ॐ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॐ ॥ 32-250 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति पुंस्त्वाधिकरणम् ॥ 16 ॥}} | |||
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| Line 1,288: | Line 1,351: | ||
| verse_line1 = ॐ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॐ ॥ 33-251 ॥ | | verse_line1 = ॐ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॐ ॥ 33-251 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V33| text = ईश्वरस्यैव कर्तृत्वमुक्तम् । ’यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’ इति जीवस्याप्युपलभ्यते । अत आह-}} | |||
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| Line 1,392: | Line 1,457: | ||
| verse_line1 = ॐ शक्तिविपर्ययात् ॐ ॥ 38-256 ॥ | | verse_line1 = ॐ शक्तिविपर्ययात् ॐ ॥ 38-256 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V38| text = कुतः ? –}} | |||
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| Line 1,477: | Line 1,544: | ||
| verse_line1 = ॐ कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रतिषेधावैयर्थ्यादिभ्यः ॐ ॥ 42-260 ॥ | | verse_line1 = ॐ कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रतिषेधावैयर्थ्यादिभ्यः ॐ ॥ 42-260 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति कर्तृत्वाधिकरणम् ॥ 17 ॥}} | |||
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| Line 1,516: | Line 1,585: | ||
| verse_line1 = ॐ अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ॐ ॥ 43-261 ॥ | | verse_line1 = ॐ अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ॐ ॥ 43-261 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V43| text = ‘अंशा एव हीमे जीवा अंशी हि परमेश्वरः । स्वयमंशैरिदं सर्वं कारयत्यचलो हरिः’ ॥ इति गौपवनश्रुतौ अंशत्वं जीवस्योपलभ्यते । | |||
‘नैवांशो न सम्बन्धो नापेक्ष्यो जीवः परस्य । तथाऽपि तु यथायोगं फलदः प्रभुरेकराट् । न नियम्यः स कस्यापि स सर्वस्य नियामकः’ ॥ इति च भाल्लवेयश्रुतौ ॥ | |||
अतो ब्रवीति-}} | |||
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| Line 1,694: | Line 1,767: | ||
| verse_line1 = ॐ प्रकाशादिवन्नैवं परः ॐ ॥ 46-264 ॥ | | verse_line1 = ॐ प्रकाशादिवन्नैवं परः ॐ ॥ 46-264 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V46| text = अनंशत्वश्रुतेर्गतिं चाह –}} | |||
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| Line 1,903: | Line 1,978: | ||
| verse_line1 = ॐ आभास एव च ॐ ॥ 50-268 ॥ | | verse_line1 = ॐ आभास एव च ॐ ॥ 50-268 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति अंशाधिकरणम् ॥ 18 ॥}} | |||
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| Line 1,971: | Line 2,048: | ||
| verse_line1 = ॐ अदृष्टनियमात् ॐ ॥ 51-269 ॥ | | verse_line1 = ॐ अदृष्टनियमात् ॐ ॥ 51-269 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S03_V51| text = प्रतिबिम्बानां मिथो वैचित्र्ये कारणमाह –}} | |||
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| Line 2,009: | Line 2,088: | ||
| verse_line1 = ॐ प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॐ ॥ 53-271 ॥ | | verse_line1 = ॐ प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॐ ॥ 53-271 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति अदृष्टाधिकरणम् ॥ 19 ॥}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः॥ 02-03 ॥}} | |||
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