Aitareya/C2/S6: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति । येन वा शृणोति । येन वा गन्धानाजिघ्रति । येन वा वाचं व्याकरोति । येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । | | verse_line1 = ॐ कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति । येन वा शृणोति । येन वा गन्धानाजिघ्रति । येन वा वाचं व्याकरोति । येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । | ||
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| verse_line1 = यदेतद्धृदयं मनश्चैतत्सञ्ज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामोऽवश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । | | verse_line1 = यदेतद्धृदयं मनश्चैतत्सञ्ज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामोऽवश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । | ||
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| verse_line1 = ऐष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिजानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्त्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । | | verse_line1 = ऐष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिजानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्त्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । | ||
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| verse_line1 = स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्य अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ | | verse_line1 = स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्य अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥ | |||
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