Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S96: Difference between revisions

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| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥
| verse_line1  = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥
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| verse_line1  = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि ।
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| verse_line1  = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥
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| verse_line1  = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥
| verse_line1  = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥
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| verse_line1  = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥
| verse_line1  = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥
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| verse_line1  = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥
| verse_line1  = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥
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| verse_line1  = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥
| verse_line1  = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥
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| verse_line1  = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥
| verse_line1  = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥
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| verse_line1  = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥
| verse_line1  = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥
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| verse_line1  = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥
| verse_line1  = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥
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| verse_line1  = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥
| verse_line1  = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥
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| verse_line1  = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे ।
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| verse_line1  = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥
| verse_line1  = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥
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| verse_line1  = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।
| verse_line1  = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।
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| verse_line1  = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥
| verse_line1  = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥
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| verse_line1  = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥
| verse_line1  = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥
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| verse_line1  = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥
| verse_line1  = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥
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| verse_line1  = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥
| verse_line1  = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥
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| verse_line1  = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥
| verse_line1  = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥
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| verse_line1  = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥
| verse_line1  = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥
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| verse_line1  = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥
| verse_line1  = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥
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| verse_line1  = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥
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| verse_line1  = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥
| verse_line1  = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥
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| verse_line1  = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥
| verse_line1  = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥
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| verse_line1  = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥
| verse_line1  = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥
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| verse_line1  = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥
| verse_line1  = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥
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| verse_line1  = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥
| verse_line1  = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥
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| verse_line1  = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥
| verse_line1  = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥
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| verse_line1  = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥
| verse_line1  = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥
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| verse_line1  = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥
| verse_line1  = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥
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| verse_line1  = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥
| verse_line1  = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥
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| verse_line1  = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः ।
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| verse_line1  = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् ।
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| verse_line1  = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥
| verse_line1  = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥
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| verse_line1  = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥
| verse_line1  = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥
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| verse_line1  = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।
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| verse_line1  = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥
| verse_line1  = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥}}
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ दशमः स्कन्धः समाप्तः ॥}}
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