Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S96: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_num = 10 | | chapter_num = 10 | ||
| title = षण्णवतितमोऽध्यायः | | title = षण्णवतितमोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
| Line 14: | Line 10: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥ | ||
| Line 24: | Line 18: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥ | | verse_line1 = श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥ | ||
| Line 34: | Line 26: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि । | | verse_line1 = तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि । | ||
| Line 45: | Line 35: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | ||
| Line 64: | Line 52: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | ||
| Line 74: | Line 60: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | ||
| Line 84: | Line 68: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | ||
| Line 103: | Line 85: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | ||
| Line 122: | Line 102: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | ||
| Line 141: | Line 119: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | ||
| Line 160: | Line 136: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | ||
| Line 179: | Line 153: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | | verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | ||
| Line 198: | Line 170: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | | verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | ||
| Line 218: | Line 188: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | | verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | ||
| Line 237: | Line 205: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | | verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | ||
| Line 257: | Line 223: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | ||
| Line 276: | Line 240: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | ||
| Line 295: | Line 257: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | ||
| Line 314: | Line 274: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | ||
| Line 333: | Line 291: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | ||
| Line 352: | Line 308: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | ||
| Line 371: | Line 325: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | ||
| Line 390: | Line 342: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | ||
| Line 409: | Line 359: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | ||
| Line 428: | Line 376: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | | verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | ||
| Line 447: | Line 393: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | ||
| Line 457: | Line 401: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | ||
| Line 476: | Line 418: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | ||
| Line 495: | Line 435: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | ||
| Line 505: | Line 443: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | ||
| Line 524: | Line 460: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | ||
| Line 543: | Line 477: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | ||
| Line 562: | Line 494: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | ||
| Line 581: | Line 511: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | | verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | ||
| Line 601: | Line 529: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् । | | verse_line1 = एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् । | ||
| Line 612: | Line 538: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥ | | verse_line1 = नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥ | ||
| Line 622: | Line 546: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | ||
| Line 632: | Line 554: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | | verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | ||
| Line 652: | Line 572: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C10 | | chapter_id = BTN_C10 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | | verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BTN_C10_S96_V50 | |||
| id = BTN_C10_S96_V50_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ | |||
}} | |||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BTN_C10_S96_V50 | |||
| id = BTN_C10_S96_V50_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ दशमः स्कन्धः समाप्तः ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||