Bruhadaranyaka/C2/S3: Difference between revisions

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| verse_line1  = द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे । मूर्तं चैवामूर्तं च, मर्त्यं चामृतं, स्थितं च यच्च, सच्च त्यञ्च ॥ १ ॥
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| verse_line1  = तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत् स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥
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| verse_line1  = अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद् यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥
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| verse_line1  = अथाध्यात्मम् इदमेव मूर्तं यदन्यत् प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = एतस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तं सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत् परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥
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{{AuthorNote| text = ॥  इति मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥ ४३ ॥}}
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