Bruhadaranyaka/C3/S2: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_num = 3 | | chapter_num = 3 | ||
| title = आर्तभागब्राह्मणम् | | title = आर्तभागब्राह्मणम् | ||
}} | }} | ||
| Line 14: | Line 10: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥ | ||
| Line 24: | Line 18: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥ | ||
| Line 34: | Line 26: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥ | | verse_line1 = वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥ | ||
| Line 44: | Line 34: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥ | ||
| Line 54: | Line 42: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥ | ||
| Line 64: | Line 50: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 74: | Line 58: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥ | ||
| Line 84: | Line 66: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥ | ||
| Line 94: | Line 74: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥ | ||
| Line 104: | Line 82: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥ | ||
| Line 114: | Line 90: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥ | ||
| Line 124: | Line 98: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥ | ||
| Line 134: | Line 106: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BR_C03_S02_V13 | |||
| id = BR_C03_S02_V13_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इत्यार्तभागब्राह्मणम् ॥ | |||
}} | |||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BR_C03_S02_V13 | |||
| id = BR_C03_S02_V13_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति आर्तभागब्राह्मणम् ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||