Bruhadaranyaka/C3/S7: Difference between revisions
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| verse_line1 = अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥ | | verse_line1 = यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥ | ||
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| verse_line1 = यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥ | ||
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