Bruhadaranyaka/C3/S9: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_num = 3 | | chapter_num = 3 | ||
| title = शाकल्यब्राह्मणम् | | title = शाकल्यब्राह्मणम् | ||
}} | }} | ||
| Line 14: | Line 10: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ | ||
| Line 24: | Line 18: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥ | ||
| Line 51: | Line 43: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 83: | Line 73: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥ | ||
| Line 103: | Line 91: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥ | ||
| Line 123: | Line 109: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 145: | Line 129: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥ | ||
| Line 155: | Line 137: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥ | ||
| Line 165: | Line 145: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥ | ||
| Line 211: | Line 189: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥ | | verse_line1 = पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥ | ||
| Line 221: | Line 197: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥ | ||
| Line 231: | Line 205: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥ | ||
| Line 241: | Line 213: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥ | ||
| Line 251: | Line 221: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥ | ||
| Line 261: | Line 229: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥ | ||
| Line 271: | Line 237: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥ | ||
| Line 281: | Line 245: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥ | ||
| Line 398: | Line 360: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥ | ||
| Line 408: | Line 368: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥ | ||
| Line 427: | Line 385: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥ | | verse_line1 = किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥ | ||
| Line 457: | Line 413: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥ | ||
| Line 479: | Line 433: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥ | ||
| Line 500: | Line 452: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥ | ||
| Line 522: | Line 472: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥ | ||
| Line 542: | Line 490: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥ | ||
| Line 565: | Line 511: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥ | ||
| Line 708: | Line 652: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥ | ||
| Line 718: | Line 660: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ । | | verse_line1 = तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ । | ||
| Line 730: | Line 670: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः । | | verse_line1 = त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः । | ||
| Line 741: | Line 679: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् । | | verse_line1 = मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् । | ||
| Line 752: | Line 688: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः । | | verse_line1 = यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः । | ||
| Line 763: | Line 697: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते । | | verse_line1 = रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते । | ||
| Line 774: | Line 706: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् । | | verse_line1 = यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् । | ||
| Line 785: | Line 715: | ||
| document_id = BR | | document_id = BR | ||
| chapter_id = BR_C03 | | chapter_id = BR_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः । | | verse_line1 = जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः । | ||
| Line 792: | Line 720: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BR_C03_S09_V34 | |||
| id = BR_C03_S09_V34_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BR_C03_S09_V34 | |||
| id = BR_C03_S09_V34_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||