Bruhadaranyaka/C6/S2: Difference between revisions
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| verse_line1 = श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच | | verse_line1 = वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच | ||
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| verse_line1 = अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास । | | verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास । | ||
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| verse_line1 = असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥ | | verse_line1 = अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति । | | verse_line1 = ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति । | ||
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| verse_line1 = अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति । | | verse_line1 = अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति । | ||
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