Chandogya/C6: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = ॐ श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = न वै नूनं भगवंस्तस्य एतदवेदिषुर्यद्ह्येेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = न वै नूनं भगवंस्तस्य एतदवेदिषुर्यद्ह्येेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति तत् तेजोऽसृजत तत् तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति तत् तेजोऽसृजत तत् तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥ | | verse_line1 = ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुदि्भज्जमिति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुदि्भज्जमिति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = सेयं दैवतैक्षत हन्ताहमिममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = सेयं दैवतैक्षत हन्ताहमिममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदादित्यस्य रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = यदादित्यस्य रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = यच्चन्द्रमसो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगाच्चन्द्रात् चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = यच्चन्द्रमसो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापगाच्चन्द्रात् चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्विद्युतो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद् विद्युतो विद्युत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यद्विद्युतो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद् विद्युतो विद्युत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विद्वाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विद्वाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥ | | verse_line1 = अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥ | ||
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| verse_line1 = दध्नः सोम्यः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = दध्नः सोम्यः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग् भवति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग् भवति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥६॥ | | verse_line1 = अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥६॥ | ||
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| verse_line1 = षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माऽशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माऽशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वं ह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥ | | verse_line1 = स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वं ह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥ | ||
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| verse_line1 = एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत् तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयो वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत् तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयो वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥ | ||
| Line 531: | Line 457: | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥ | ||
| Line 553: | Line 477: | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अशनायापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अशनायापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 563: | Line 485: | ||
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| verse_line1 = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छदि्भः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छदि्भः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ() तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ() तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = ते यथा तत्र न विवेकं लभन्ते अमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मि अमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = ते यथा तत्र न विवेकं लभन्ते अमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मि अमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ() तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ() तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति । स समुद्र एव भवति । ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति । स समुद्र एव भवति । ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति । त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १० ॥ | | verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १० ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेत् स एष जीवेनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेत् स एष जीवेनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीति अण्व्य इव इमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीति अण्व्य इव इमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तं होवाच यं वै सौम्य एतमणिमानं न निभालयसे एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्नः एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धस्व सोम्येति ॥२॥ | | verse_line1 = तं होवाच यं वै सौम्य एतमणिमानं न निभालयसे एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्नः एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धस्व सोम्येति ॥२॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = लवणमेतदुदकेऽवधाय मा प्रातरुपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ | | verse_line1 = लवणमेतदुदकेऽवधाय मा प्रातरुपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ | ||
| Line 843: | Line 729: | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमिति अन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति अभिप्रास्यैतदथ मा उपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत् संवर्तते । तं होवाचात्र वाव किल स सोम्येतमणिमानं न निभालयसे अत्रैव किलेति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमिति अन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति अभिप्रास्यैतदथ मा उपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत् संवर्तते । तं होवाचात्र वाव किल स सोम्येतमणिमानं न निभालयसे अत्रैव किलेति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १३ ॥ | ||
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| chapter_id = CHU_C06 | | chapter_id = CHU_C06 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत् स यथा तत्र प्राङ्ग्वोदङ्ग्वाऽधराङ्ग्वा प्रध्मायीताऽभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत् स यथा तत्र प्राङ्ग्वोदङ्ग्वाऽधराङ्ग्वा प्रध्मायीताऽभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्यत इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्यत इति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पुरुषं सोम्योपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = पुरुषं सोम्योपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यदास्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अथ यदास्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्ति अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ | | verse_line1 = पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्ति अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ | ||
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| chapter_id = CHU_C06 | | chapter_id = CHU_C06 | ||
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| verse_line1 = अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते । स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति ॥ ३ ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥ | | verse_line1 = स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति ॥ ३ ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥ | ||