Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S18: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 4: | Line 4: | ||
| title = अष्टादशोऽध्यायः | | title = अष्टादशोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = BTN_C01_S18_V03 | | verse_id = BTN_C01_S18_V03 | ||
| Line 13: | Line 11: | ||
| verse_line1 = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः । | | verse_line1 = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः । | ||
| verse_line2 = वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 31: | Line 30: | ||
| verse_line1 = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | | verse_line1 = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | ||
| verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 49: | Line 49: | ||
| verse_line1 = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । | | verse_line1 = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । | ||
| verse_line2 = योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 67: | Line 68: | ||
| verse_line1 = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । | | verse_line1 = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । | ||
| verse_line2 = व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 85: | Line 87: | ||
| verse_line1 = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । | | verse_line1 = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । | ||
| verse_line2 = स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 103: | Line 106: | ||
| verse_line1 = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । | | verse_line1 = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । | ||
| verse_line2 = ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | | verse_line2 = ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 121: | Line 125: | ||
| verse_line1 = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् । | | verse_line1 = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् । | ||
| verse_line2 = कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 141: | Line 146: | ||
| verse_line3 = तदा हि चोरप्रचुरो विनङ्क्ष- | | verse_line3 = तदा हि चोरप्रचुरो विनङ्क्ष- | ||
| verse_line4 = त्यरक्ष्यमाणो विवरूथवत् क्षणात् ॥ ४३ ॥ | | verse_line4 = त्यरक्ष्यमाणो विवरूथवत् क्षणात् ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 161: | Line 167: | ||
| verse_line3 = परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते | | verse_line3 = परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते | ||
| verse_line4 = पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | | verse_line4 = पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 179: | Line 186: | ||
| verse_line1 = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । | | verse_line1 = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । | ||
| verse_line2 = न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||