Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S75: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 4: | Line 4: | ||
| title = पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः | | title = पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = BTN_C10_S75_V38 | | verse_id = BTN_C10_S75_V38 | ||
| Line 12: | Line 10: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 29: | Line 28: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 46: | Line 46: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 63: | Line 64: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 80: | Line 82: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | | verse_line1 = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 97: | Line 100: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | | verse_line1 = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 115: | Line 119: | ||
| verse_line1 = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । | | verse_line1 = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् । | ||
| verse_line2 = लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | | verse_line2 = लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 132: | Line 137: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 149: | Line 155: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | | verse_line1 = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 166: | Line 173: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | | verse_line1 = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 183: | Line 191: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | | verse_line1 = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 201: | Line 210: | ||
| verse_line1 = नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन । | | verse_line1 = नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन । | ||
| verse_line2 = अम्बाया इव हि प्रायः कन्यावादरतिः क्वचित् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = अम्बाया इव हि प्रायः कन्यावादरतिः क्वचित् ॥ ५१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 227: | Line 237: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||