Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S96: Difference between revisions
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| title = षण्णवतितमोऽध्यायः | | title = षण्णवतितमोऽध्यायः | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 138: | Line 141: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 155: | Line 159: | ||
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| verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | | verse_line1 = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 173: | Line 178: | ||
| verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | | verse_line1 = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | ||
| verse_line2 = तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 190: | Line 196: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | | verse_line1 = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 208: | Line 215: | ||
| verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | | verse_line1 = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः । | ||
| verse_line2 = त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 225: | Line 233: | ||
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| verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 242: | Line 251: | ||
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| verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 259: | Line 269: | ||
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| verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | ||
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| Line 276: | Line 287: | ||
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| verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 293: | Line 305: | ||
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| verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 310: | Line 323: | ||
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| verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | ||
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| Line 327: | Line 341: | ||
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| verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 344: | Line 359: | ||
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| verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 361: | Line 377: | ||
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| verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 378: | Line 395: | ||
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| verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | | verse_line1 = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | ||
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| Line 403: | Line 421: | ||
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| verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | | verse_line1 = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | ||
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| verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 445: | Line 465: | ||
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| verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 462: | Line 483: | ||
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| verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 479: | Line 501: | ||
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| verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 496: | Line 519: | ||
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| verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | | verse_line1 = तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥ | ||
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| Line 514: | Line 538: | ||
| verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | | verse_line1 = इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः । | ||
| verse_line2 = समुद्धृतः पूर्वजैस्तैर्व्योमायनमहात्मभिः ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = समुद्धृतः पूर्वजैस्तैर्व्योमायनमहात्मभिः ॥ ४३ ॥ | ||
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| Line 557: | Line 582: | ||
| verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | | verse_line1 = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | ||
| verse_line2 = तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 574: | Line 600: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | | verse_line1 = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | ||
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