Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S3: Difference between revisions
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| title = तृतीयोऽध्यायः | | title = तृतीयोऽध्यायः | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 48: | Line 47: | ||
| verse_line1 = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् । | | verse_line1 = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् । | ||
| verse_line2 = तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 75: | Line 75: | ||
| verse_line1 = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । | | verse_line1 = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । | ||
| verse_line2 = अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | | verse_line1 = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | ||
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| Line 215: | Line 219: | ||
| verse_line1 = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । | | verse_line1 = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । | ||
| verse_line2 = अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 233: | Line 238: | ||
| verse_line1 = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । | | verse_line1 = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । | ||
| verse_line2 = दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 251: | Line 257: | ||
| verse_line1 = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । | | verse_line1 = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । | ||
| verse_line2 = मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 269: | Line 276: | ||
| verse_line1 = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । | | verse_line1 = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । | ||
| verse_line2 = परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | | verse_line2 = परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | ||
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| Line 286: | Line 294: | ||
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| verse_line1 = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | ||
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| verse_line1 = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | | verse_line1 = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 320: | Line 330: | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 337: | Line 348: | ||
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| verse_line1 = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | | verse_line1 = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | ||
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| Line 354: | Line 366: | ||
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| verse_line1 = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | | verse_line1 = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | ||
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| Line 379: | Line 392: | ||
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| verse_line1 = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | | verse_line1 = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | ||
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| Line 405: | Line 419: | ||
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| verse_line1 = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | | verse_line1 = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | ||
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| Line 423: | Line 438: | ||
| verse_line1 = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः । | | verse_line1 = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः । | ||
| verse_line2 = महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | ||
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| Line 441: | Line 457: | ||
| verse_line1 = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः । | | verse_line1 = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः । | ||
| verse_line2 = द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | | verse_line2 = द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | ||
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| Line 459: | Line 476: | ||
| verse_line1 = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः । | | verse_line1 = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः । | ||
| verse_line2 = शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | | verse_line2 = शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | ||
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| Line 477: | Line 495: | ||
| verse_line1 = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः । | | verse_line1 = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः । | ||
| verse_line2 = यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | | verse_line2 = यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | ||
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