Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S6: Difference between revisions
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| title = षष्ठोऽध्यायः | | title = षष्ठोऽध्यायः | ||
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| verse_line1 = स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥ | | verse_line1 = स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥ | ||
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| verse_line1 = पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_line1 = बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम । | | verse_line1 = यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम । | ||
| verse_line2 = शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ॥ २५ ॥ | ||
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| Line 167: | Line 173: | ||
| verse_line1 = यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् । | | verse_line1 = यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् । | ||
| verse_line2 = गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुल्बणेन विनंक्ष्यति ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुल्बणेन विनंक्ष्यति ॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 202: | Line 209: | ||
| verse_line1 = स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च । | | verse_line1 = स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च । | ||
| verse_line2 = गत्युत्स्मितेक्षणोत्केलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ५० ॥ | | verse_line2 = गत्युत्स्मितेक्षणोत्केलि यन्नृलोकविडम्बनम् ॥ ५० ॥ | ||
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