Bruhadaranyaka/C1/S3: Difference between revisions
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| verse_line1 = द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥ | | verse_line1 = अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥ | ||
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| verse_line1 = अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_line1 = मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥ | ||
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