Brahmasutra/C1/S3: Difference between revisions
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| title = तृतीयः पादः | | title = तृतीयः पादः | ||
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‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्याश्रयो विष्णुरेव । | ‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्याश्रयो विष्णुरेव । | ||
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‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ||
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न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥ | न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥ | ||
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‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् । | ‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् । | ||
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‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | ||
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योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः’॥ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥ | योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः’॥ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥ | ||
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नानुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् । | नानुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् । | ||
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‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।ब्रह्माण्डे च | ‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।ब्रह्माण्डे च | ||
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‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः । | ‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः । | ||
ईशानादेव चेशानो महैदेवो महत्त्वतः ॥ | |||
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पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् । | पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् । | ||
तदाधारो यतो विष्णुः पिनाकीति ततः स्मृतः॥ | |||
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शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः । | शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः । | ||
कृत्यात्मकमिदं देहं यतो वस्ते प्रवर्तयन् ॥ | |||
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कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् । | कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् । | ||
बृंहणाद्ब्रह्मनामाऽसावैश्वर्यादिन्द्र उच्यते ॥ | |||
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एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः । | एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः । | ||
वेदेषु सपुराणेषु गीयते पुरुषोत्तमः’ इति । | |||
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वामने च – | वामने च – | ||
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‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः । अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुरेक एव प्रकीर्तितः’ इति ॥ | ‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः । अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुरेक एव प्रकीर्तितः’ इति ॥ | ||
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स्कान्दे च – | स्कान्दे च – | ||
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‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः । | ‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः । | ||
प्रादादन्यत्र भगवान् राजेवर्ते स्वकं पुरम्’इति | |||
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‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति । | ‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति । | ||
उग्रो भस्मधरो नग्नः कपालीति शिवस्य च । | |||
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विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः’इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥ | विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः’इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥ | ||
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एतैरेव हेतुभिर्न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥ | एतैरेव हेतुभिर्न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥ | ||
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न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम्’ इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥ | न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम्’ इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥ | ||
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‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ||
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‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । | ‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । | ||
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्ननन्यो अभिचाकशीति’ | |||
इति ईशजीवयोः स्धित्यदनोक्तेः ॥ 07 ॥ | |||
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‘सम्प्रसादात्’ पूर्णसुखरूपत्वात् ‘अध्युपदेशात्’ सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा । | ‘सम्प्रसादात्’ पूर्णसुखरूपत्वात् ‘अध्युपदेशात्’ सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा । | ||
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‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः | ‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः | ||
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‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना नोत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥ | ‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना नोत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥ | ||
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सर्वगतत्वादिधर्मोपपतेश्च ॥09॥ | सर्वगतत्वादिधर्मोपपतेश्च ॥09॥ | ||
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‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेर्ब्रह्मैवाक्षरम् । | ‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेर्ब्रह्मैवाक्षरम् । | ||
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‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’ | ‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’ | ||
‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति । एको देवो बहुधा निविष्टः । यदा भारं तन्द्रयते स भर्तुम् । पराऽस्य भारं पुनरस्तमेति’ । ‘यस्मिन्निदं सञ्च वि चैदि सर्वं यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः’ इत्यादि श्रुतेः । | |||
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‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥ | ‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥ | ||
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सा च धृतिः प्रशासादुच्यते ।’ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव । | सा च धृतिः प्रशासादुच्यते ।’ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव । | ||
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‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ । | ‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ । | ||
चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत्’ इत्यादिश्रुतेः । | |||
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‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’। | ‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’। | ||
यो हृच्छयस्तमहमिह ब्रवीमि’ | |||
‘न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलीनां चापरेषाम्’इत्यादेश्च ॥ 11 ॥ | |||
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‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना स्थूलाण्वादीनामन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च। | ‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना स्थूलाण्वादीनामन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च। | ||
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‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः । | ‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः । | ||
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‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’ । इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥ | ‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’ । इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥ | ||
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‘तदैक्षत’ इतीक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते । | ‘तदैक्षत’ इतीक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते । | ||
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‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’,’नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’ इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् । | ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’,’नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’ इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् । | ||
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बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तं’अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥13॥ | बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तं’अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥13॥ | ||
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‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव । | ‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव । | ||
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‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ | ‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ | ||
‘स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः’ | |||
इत्यादिना विष्णोरेव हि ते गुणाः । | |||
}} | }} | ||
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‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि’ इति पाद्मे । | ‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि’ इति पाद्मे । | ||
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सापेक्षनिरपेक्षयोश्च निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥ | सापेक्षनिरपेक्षयोश्च निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥ | ||
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‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥ | ‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥ | ||
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अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’ इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते । | अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’ इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते । | ||
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‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेस्तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’ इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् । | ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेस्तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’ इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् । | ||
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‘अरश्च वै ण्यश्च सासमुद्रौ तत्रैव सर्वाभिमतप्रदौ द्वौ’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लक्षणत्वेनोच्यते ॥ 15 ॥ | ‘अरश्च वै ण्यश्च सासमुद्रौ तत्रैव सर्वाभिमतप्रदौ द्वौ’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लक्षणत्वेनोच्यते ॥ 15 ॥ | ||
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‘एष सेतुर्विधृतिः’ इति धृतेः’एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः । | ‘एष सेतुर्विधृतिः’ इति धृतेः’एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः । | ||
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‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ | ‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ | ||
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’ | |||
‘स हि सर्वाधिपतिः स हि सर्वकालः स ईशः स विष्णुः’ | |||
‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तस्य ह्येष महिमा । | |||
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‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति स्कान्दे ॥16॥ | ‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति स्कान्दे ॥16॥ | ||
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‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥ | ‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥ | ||
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‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्टद्यते’ ‘एष आत्मेति होवाच’ इति जीवपरामर्शात् स इति चेन्न । | ‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्टद्यते’ ‘एष आत्मेति होवाच’ इति जीवपरामर्शात् स इति चेन्न । | ||
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तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥ | तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥ | ||
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‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेन्न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादादाविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥ | ‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेन्न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादादाविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥ | ||
| Line 779: | Line 724: | ||
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‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽभिनिष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥ | ‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽभिनिष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘दहर’ इत्यल्पश्रुतेर्नेति चेन्न ।’निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’ इत्युक्व्तात् ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’ इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥ | ‘दहर’ इत्यल्पश्रुतेर्नेति चेन्न ।’निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’ इत्युक्व्तात् ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’ इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥ | ||
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‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः, | ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः, | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः । | ‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः । | ||
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न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत्तेजो रश्मीन्’ इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥ | न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत्तेजो रश्मीन्’ इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | ‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | ||
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्’ इति | |||
}} | }} | ||
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| id = BS_C01_S03_V23_B3 | | id = BS_C01_S03_V23_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। | ‘न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। | ||
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’ इति च ॥ 23 ॥ | |||
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| id = BS_C01_S03_V24_B1 | | id = BS_C01_S03_V24_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् । | वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णय’ इति स्कान्दे ॥ | ‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णय’ इति स्कान्दे ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः’तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’ इति ॥ 24 ॥ | तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः’तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’ इति ॥ 24 ॥ | ||
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सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥ | सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥ | ||
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तदुपरि मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्युपरि । सम्भवति हि तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । तिर्यगादीनां तदभावादभावः । तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥ | तदुपरि मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्युपरि । सम्भवति हि तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । तिर्यगादीनां तदभावादभावः । तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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मानुषा एव देवादयो भवन्तीति तदुपरीत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावाद्देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेन्न । अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् । | मानुषा एव देवादयो भवन्तीति तदुपरीत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावाद्देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेन्न । अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् । | ||
‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः’ इति ॥27॥ | |||
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| id = BS_C01_S03_V28_B1 | | id = BS_C01_S03_V28_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयान्नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य, स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद्वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोध इति चेन्न । | ‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयान्नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य, स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद्वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोध इति चेन्न । | ||
| Line 1,036: | Line 967: | ||
| id = BS_C01_S03_V28_B2 | | id = BS_C01_S03_V28_B2 | ||
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‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’ | ‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’ | ||
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‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा । | ‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा । | ||
तस्मान्नानीदृशं क्वापि विश्वमेतद्भविष्यति’ ॥ | |||
इत्यादेरत एव शब्दात् तेषां प्रभवनियमात्,महतां प्रत्यक्षात् । यथेदानीं तथोपर्यपि देवा भविष्यन्तीतीतरेषामनुमानाच्च ॥ 28 ॥ | |||
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अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥ | अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥ | ||
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अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् । | अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा । | ‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा । | ||
ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । | |||
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वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’ इति स्मृतेश्च ॥30॥ | वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’ इति स्मृतेश्च ॥30॥ | ||
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‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥ | ‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥ | ||
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ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विध्यानाम् ॥ 32 ॥ | ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विध्यानाम् ॥ 32 ॥ | ||
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फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः । | फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः । | ||
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‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता । सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्। सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥ | ‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता । सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्। सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥ | ||
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उक्तफलानधिकारमात्रं जैमिनिमतम् । अतो न मतविरोधः । | उक्तफलानधिकारमात्रं जैमिनिमतम् । अतो न मतविरोधः । | ||
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‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥ | ‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥ | ||
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नासौ पौत्रायणः शूद्रः, शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् । | नासौ पौत्रायणः शूद्रः, शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् । | ||
‘कम्वर एनमेतत्सन्तम्’ इत्यनादरश्रवणात् । | |||
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| id = BS_C01_S03_V34_B3 | | id = BS_C01_S03_V34_B3 | ||
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‘स ह सञ्ञिहान एव क्षत्तारमुवाच’ इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥ | ‘स ह सञ्ञिहान एव क्षत्तारमुवाच’ इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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अयमश्वतरीरथ इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च । | अयमश्वतरीरथ इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च । | ||
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| id = BS_C01_S03_V35_B2 | | id = BS_C01_S03_V35_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे । | ‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे । | ||
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‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥ | ‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥ | ||
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‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’ इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’ इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च । | ‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’ इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’ इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च । | ||
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उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् । | उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् । | ||
‘सपत्नीं मे पराधम’ इत्यादिष्वधिकारदर्शनात् । | |||
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संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’इति स्मृतेः ॥ 36 ॥ | संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’इति स्मृतेः ॥ 36 ॥ | ||
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‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’ इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य’नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’ इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥ | ‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’ इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य’नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’ इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥ | ||
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‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् । अध्ययने जिह्वाच्छेदः अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’ इति प्रतिषेधात् । | ‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् । अध्ययने जिह्वाच्छेदः अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’ इति प्रतिषेधात् । | ||
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‘नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाद्ययनं कुतः ।केवलैव तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते’ इति स्मृतेश्च । | ‘नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाद्ययनं कुतः ।केवलैव तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते’ इति स्मृतेश्च । | ||
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विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥ | विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥ | ||
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एजतीति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव । | एजतीति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव । | ||
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‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’तथा चेतोऽर्पणार्थं हि निगत्यते इति हि श्रुतिः । | ‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’तथा चेतोऽर्पणार्थं हि निगत्यते इति हि श्रुतिः । | ||
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‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’ इति च | ‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’ इति च | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति स्कान्दे ॥ | ‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति स्कान्दे ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्रमुच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्म वैवर्ते ॥ 39 ॥ | ‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्रमुच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्म वैवर्ते ॥ 39 ॥ | ||
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| id = BS_C01_S03_V40_B1 | | id = BS_C01_S03_V40_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘विष्णुरेव ज्योतिर्विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’ इति दर्शनाच्चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् सस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥ | ‘विष्णुरेव ज्योतिर्विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’ इति दर्शनाच्चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् सस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥ | ||
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‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाकाशो हरिरेव। ‘अवर्णं यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तलक्षणम्। | ‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाकाशो हरिरेव। ‘अवर्णं यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तलक्षणम्। | ||
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| id = BS_C01_S03_V41_B3 | | id = BS_C01_S03_V41_B3 | ||
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‘अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात्’ इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥ | ‘अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात्’ इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’ ‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ | ‘प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’ ‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ | ||
इति भेदव्यपदेशान्न जीवः, पर एवासङ्गः । स्वप्नादिद्रष्ट्रुत्वं च सर्वज्ञत्वात् तस्यैव युज्यते ॥ 42 ॥ | |||
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‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः …. स वा एष नेति नेति’ इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव । | ‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः …. स वा एष नेति नेति’ इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव । | ||
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‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’ | ‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’ | ||
‘सप्तार्धगर्भाभुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ | |||
‘स योऽतोऽश्रुतः’ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥ | इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥ | ||