Brahmasutra/C1/S4: Difference between revisions
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| title = चतुर्थः पादः | | title = चतुर्थः पादः | ||
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=== अनुमानिकाधिकरणम् === | |||
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‘तत्तु समन्वयात्’ इति सर्वशब्दानां परमेश्वरे समन्वय उक्तः । तन्न युज्यते । यतो ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति साङ्ख्यानुमानपरिकल्पितं प्रधानमप्येकेषां शाखिनामुच्यत इति चेन्न, तस्यैव पारतन्त्र्याच्छिररीररूपके ऽव्यक्ते विन्यस्तस्य परमात्मन एवाव्यक्तशब्देन गृहीतेः । कप्रत्ययः कुत्सने । परमात्मना एवाव्यक्तॆशब्दः । । तत्तन्त्रत्वेन तच्छरीररूपत्वादितरस्याप्यव्यक्तशब्दः । | ‘तत्तु समन्वयात्’ इति सर्वशब्दानां परमेश्वरे समन्वय उक्तः । तन्न युज्यते । यतो ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति साङ्ख्यानुमानपरिकल्पितं प्रधानमप्येकेषां शाखिनामुच्यत इति चेन्न, तस्यैव पारतन्त्र्याच्छिररीररूपके ऽव्यक्ते विन्यस्तस्य परमात्मन एवाव्यक्तशब्देन गृहीतेः । कप्रत्ययः कुत्सने । परमात्मना एवाव्यक्तॆशब्दः । । तत्तन्त्रत्वेन तच्छरीररूपत्वादितरस्याप्यव्यक्तशब्दः । | ||
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‘तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत्’ इति दर्शयति च । | ‘तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत्’ इति दर्शयति च । | ||
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‘अव्यक्तमचलं शान्तं निष्कलं निष्क्रियं परम् । यो वेद हरिमात्मानं स भयादनुमुच्यते’ ।इति पिप्पलादशाखायाम्। | ‘अव्यक्तमचलं शान्तं निष्कलं निष्क्रियं परम् । यो वेद हरिमात्मानं स भयादनुमुच्यते’ ।इति पिप्पलादशाखायाम्। | ||
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‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ इत्युक्त्वा‘अव्यक्तो ऽक्षर इत्युक्तः’इति वचनाच्च ॥ 01 ॥ | ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ इत्युक्त्वा‘अव्यक्तो ऽक्षर इत्युक्तः’इति वचनाच्च ॥ 01 ॥ | ||
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सूक्ष्ममेवाव्यक्तश्यब्देनोच्यते । तद्द्यव्यक्ततामर्हति । सूक्ष्मत्वं च मुख्यं तस्यैव । | सूक्ष्ममेवाव्यक्तश्यब्देनोच्यते । तद्द्यव्यक्ततामर्हति । सूक्ष्मत्वं च मुख्यं तस्यैव । | ||
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‘यत्तत्सूक्ष्मं परमं वेदितव्यं नित्यं पदं वैष्णवं ह्यामनन्ति ।यत्तल्लोका न विदुर्लोकसारं विन्दन्त्येतत् कवयो योगनिष्ठाः’॥इति च पिप्पलादशाखायाम् । | ‘यत्तत्सूक्ष्मं परमं वेदितव्यं नित्यं पदं वैष्णवं ह्यामनन्ति ।यत्तल्लोका न विदुर्लोकसारं विन्दन्त्येतत् कवयो योगनिष्ठाः’॥इति च पिप्पलादशाखायाम् । | ||
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मुख्ये च विद्यमाने नामुख्यं युक्तम् ॥ 02 ॥ | मुख्ये च विद्यमाने नामुख्यं युक्तम् ॥ 02 ॥ | ||
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तददीनत्वाच्चाव्यक्तादीनां तस्यैवाव्यक्तत्वपरावरत्वादिकमर्थवत् । | तददीनत्वाच्चाव्यक्तादीनां तस्यैवाव्यक्तत्वपरावरत्वादिकमर्थवत् । | ||
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‘यदधीनो गुणो यस्य तद्गुणी सोऽभिधीयते । यथा जीवः परात्मेति यथा राजा जयीत्यपि’ इति च स्कान्दे ॥ 03 ॥ | ‘यदधीनो गुणो यस्य तद्गुणी सोऽभिधीयते । यथा जीवः परात्मेति यथा राजा जयीत्यपि’ इति च स्कान्दे ॥ 03 ॥ | ||
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अन्यस्य न वाच्यत्वं युज्यते ॥ 04 ॥ | अन्यस्य न वाच्यत्वं युज्यते ॥ 04 ॥ | ||
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‘महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति ज्ञेयत्वं वदतीती चेन्न । प्राज्ञः परमात्मा हि तत्रोच्यते । | ‘महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति ज्ञेयत्वं वदतीती चेन्न । प्राज्ञः परमात्मा हि तत्रोच्यते । | ||
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‘अणोरणीयान्महतो महीयान्’ इति तस्यैव हि महतो महत्वम् । सर्वस्मात् परस्य महतोऽपि परत्वं युज्यते ॥ 05 ॥ | ‘अणोरणीयान्महतो महीयान्’ इति तस्यैव हि महतो महत्वम् । सर्वस्मात् परस्य महतोऽपि परत्वं युज्यते ॥ 05 ॥ | ||
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‘सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमम् पदम्’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ‘सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमम् पदम्’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ||
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त्रयाणामेव पितृसौमनस्यस्वर्ग्याग्निपरमात्मनां प्रश्न उपन्यासश्च । | त्रयाणामेव पितृसौमनस्यस्वर्ग्याग्निपरमात्मनां प्रश्न उपन्यासश्च । | ||
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‘अविज्ञातप्रार्थनं च प्रश्न इत्यभिधीयते’ ॥ इति वचनान्न विरोधः ॥ 07 ॥ | ‘अविज्ञातप्रार्थनं च प्रश्न इत्यभिधीयते’ ॥ इति वचनान्न विरोधः ॥ 07 ॥ | ||
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यथा महच्छब्दो महत्तत्वे प्रसिद्धोऽपि परममहत्त्वात् परमात्मन एव मुख्यः एवमितरेऽपि ॥ 08 ॥ | यथा महच्छब्दो महत्तत्वे प्रसिद्धोऽपि परममहत्त्वात् परमात्मन एव मुख्यः एवमितरेऽपि ॥ 08 ॥ | ||
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यथा चमसशब्दोऽन्यत्र प्रसिद्धोऽपि ‘इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुद्नः’ इति श्रुतेः शिरोवाचकः एवमव्यक्तादिशब्दाः सर्वेऽन्यत्र प्रसिद्धा अपि, | यथा चमसशब्दोऽन्यत्र प्रसिद्धोऽपि ‘इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुद्नः’ इति श्रुतेः शिरोवाचकः एवमव्यक्तादिशब्दाः सर्वेऽन्यत्र प्रसिद्धा अपि, | ||
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‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ | ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ | ||
इत्यादि श्रुतेः परमात्माभिधायका एव । अविशेषाच्छ्चुतेः ॥ 09 ॥ | |||
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ज्योतिरादिकर्मवाचकत्वेन प्रसिद्धाभिधेयोऽपि स एव । ‘एष इमं लोकमभ्यार्चत्’ इत्युपक्रम्य ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषाः एकैव व्याहृतिः प्राण एव प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’ | ज्योतिरादिकर्मवाचकत्वेन प्रसिद्धाभिधेयोऽपि स एव । ‘एष इमं लोकमभ्यार्चत्’ इत्युपक्रम्य ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषाः एकैव व्याहृतिः प्राण एव प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’ | ||
इति ह्यधीयते एके ॥ 10 ॥ | |||
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मधुविद्यादिवत् सर्वशब्दार्थत्वेन परस्य कल्पनोपदेशाच्च न कर्मक्रमादिविरोधः ॥ 11 ॥ | मधुविद्यादिवत् सर्वशब्दार्थत्वेन परस्य कल्पनोपदेशाच्च न कर्मक्रमादिविरोधः ॥ 11 ॥ | ||
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‘यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः’ इत्यादिषु बहुसङ्ख्योपसङ्ग्रहेऽपि न विरोधः । तस्यैवाकाशादिषु नानाभावात् तदतिरिक्तस्वरूपत्वाच्च ॥12॥ | ‘यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः’ इत्यादिषु बहुसङ्ख्योपसङ्ग्रहेऽपि न विरोधः । तस्यैवाकाशादिषु नानाभावात् तदतिरिक्तस्वरूपत्वाच्च ॥12॥ | ||
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‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो मनः’ इति वाक्यशेषात् ॥ 13 ॥ | ‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो मनः’ इति वाक्यशेषात् ॥ 13 ॥ | ||
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‘तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः’ इत्यनेन काण्वानां पञ्चकम् । । 14 ॥ | ‘तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः’ इत्यनेन काण्वानां पञ्चकम् । । 14 ॥ | ||
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आकाशादिष्ववान्तरकारणत्वेन स एव स्थितः । यथाव्यपदिष्टस्यैव परस्य ‘य आकाशे तिष्ठन्’ इत्यादिना आकाशादिषूक्तेः ॥ 15 ॥ | आकाशादिष्ववान्तरकारणत्वेन स एव स्थितः । यथाव्यपदिष्टस्यैव परस्य ‘य आकाशे तिष्ठन्’ इत्यादिना आकाशादिषूक्तेः ॥ 15 ॥ | ||
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परमात्मवाचिनः शब्दा अन्यत्र समाकृष्य व्यवह्रियन्ते । | परमात्मवाचिनः शब्दा अन्यत्र समाकृष्य व्यवह्रियन्ते । | ||
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‘परस्य वाचकाः शब्दा समाकृष्येतरेष्वपि ।व्यवह्रियन्ते सततं लोकवेदानुसारतः’ इति पाद्मे ॥ 16 ॥ | ‘परस्य वाचकाः शब्दा समाकृष्येतरेष्वपि ।व्यवह्रियन्ते सततं लोकवेदानुसारतः’ इति पाद्मे ॥ 16 ॥ | ||
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जगति व्यवहारो लोकस्य । न तु परमात्मनि तथा । अतो जगति प्रसिद्धिः शब्दानाम् ॥ 17 ॥ | जगति व्यवहारो लोकस्य । न तु परमात्मनि तथा । अतो जगति प्रसिद्धिः शब्दानाम् ॥ 17 ॥ | ||
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तदधीनत्वात् तच्छब्दवाच्यत्वमित्युक्तम् । तज्जीवमुख्यप्राणयोर्लिङ्गम् । | तदधीनत्वात् तच्छब्दवाच्यत्वमित्युक्तम् । तज्जीवमुख्यप्राणयोर्लिङ्गम् । | ||
‘अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति’ ‘वायुना हि लोका नेनीयन्ते’ | |||
इत्यादि श्रुतिभ्य इति चेन्न । उपासात्रैविध्यादिति व्याख्यातत्वात् ॥ 18 ॥ | |||
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परमात्मज्ञानार्थं कर्मादिकमपि वदतीति जैमिनिः । | परमात्मज्ञानार्थं कर्मादिकमपि वदतीति जैमिनिः । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति । तस्म्यै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये’ | ‘कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति । तस्म्यै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये’ | ||
‘कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति । यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन’ | |||
इत्यादिप्रश्नव्याख्यानाभ्याम् । | |||
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एवमपि चैके पठन्ति’यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति’ इति ॥ 19 ॥ | एवमपि चैके पठन्ति’यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति’ इति ॥ 19 ॥ | ||
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वाक्यस्याप्येवमन्वयो युज्यते पृथक्पृथक् स्थितस्यापि परमात्मना ॥ 20 ॥ | वाक्यस्याप्येवमन्वयो युज्यते पृथक्पृथक् स्थितस्यापि परमात्मना ॥ 20 ॥ | ||
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‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गत्वेन कर्मादिकमुच्यत इत्याश्मरथ्यः । यस्मादेवमनित्यफलमन्यत् तस्मान्नान्यः पन्था इति ॥ 21 ॥ | ‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गत्वेन कर्मादिकमुच्यत इत्याश्मरथ्यः । यस्मादेवमनित्यफलमन्यत् तस्मान्नान्यः पन्था इति ॥ 21 ॥ | ||
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उत्क्रमिष्यतो मुमुक्षोः कर्मादिना भाव्यं साधनसाधनत्वेन । अतस्तद्व्यक्तीत्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 22 ॥ | उत्क्रमिष्यतो मुमुक्षोः कर्मादिना भाव्यं साधनसाधनत्वेन । अतस्तद्व्यक्तीत्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 22 ॥ | ||
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सर्वं परमात्मन्यवस्थितमिति वक्तुं तद्वचनमिति काशकृत्स्नः । | सर्वं परमात्मन्यवस्थितमिति वक्तुं तद्वचनमिति काशकृत्स्नः । | ||
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‘कृष्णद्द्वैपायनमतादेकदेशविदः परे ।वदन्ति ते यथाप्रज्ञं न विरोधः कथञ्चन’ इति पाद्मे ॥ 23 ॥ | ‘कृष्णद्द्वैपायनमतादेकदेशविदः परे ।वदन्ति ते यथाप्रज्ञं न विरोधः कथञ्चन’ इति पाद्मे ॥ 23 ॥ | ||
| Line 662: | Line 625: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘हन्तैतमेव पुरुषं सर्वाणि नामान्यभिवदन्ति यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रमभिविशन्त्येवमेवैतानि नामानि सर्वाणि पुरुषमभिविशन्ति’ | ‘हन्तैतमेव पुरुषं सर्वाणि नामान्यभिवदन्ति यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रमभिविशन्त्येवमेवैतानि नामानि सर्वाणि पुरुषमभिविशन्ति’ | ||
इति प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् प्रकृतिशब्दवाच्योऽपि स एव ॥ 24 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 681: | Line 643: | ||
| id = BS_C01_S04_V25_B1 | | id = BS_C01_S04_V25_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’। | ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’। | ||
‘महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । | |||
प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छाऽनन्त कथ्यते’ ॥ | |||
}} | }} | ||
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इति वचनात् तदभिध्यैव प्रकृतिशब्देनोच्यते । | इति वचनात् तदभिध्यैव प्रकृतिशब्देनोच्यते । | ||
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| text = | | text = | ||
‘सोऽभिध्या स जूतिः स प्रज्ञा स आनन्दः’ इति श्रुतेरभिध्या च स्वरूपमेव । | ‘सोऽभिध्या स जूतिः स प्रज्ञा स आनन्दः’ इति श्रुतेरभिध्या च स्वरूपमेव । | ||
| Line 710: | Line 669: | ||
| id = BS_C01_S04_V25_B7 | | id = BS_C01_S04_V25_B7 | ||
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‘ध्यायति ध्यानरूपोऽसौ सुखी सुखमतीव च ।परमैश्वर्ययोगेन विरुद्धार्थतयेष्यते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 25 ॥ | ‘ध्यायति ध्यानरूपोऽसौ सुखी सुखमतीव च ।परमैश्वर्ययोगेन विरुद्धार्थतयेष्यते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 25 ॥ | ||
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‘एष स्त्र्येष पुरुष एष प्रकृतिरेष आत्मैष ब्रह्मैष लोक एष अलोको योऽसौ हरिरादिरनादिरनन्तोऽन्तः परमः पराद्विश्वरूपः’ | ‘एष स्त्र्येष पुरुष एष प्रकृतिरेष आत्मैष ब्रह्मैष लोक एष अलोको योऽसौ हरिरादिरनादिरनन्तोऽन्तः परमः पराद्विश्वरूपः’ | ||
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इति पैङ्गिश्रुतौ साक्षादेव प्रकृतिपुरुषत्वाम्नानात् ॥ 26 ॥ | इति पैङ्गिश्रुतौ साक्षादेव प्रकृतिपुरुषत्वाम्नानात् ॥ 26 ॥ | ||
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प्रकर्षेण करोतीति प्रकृतिरिति योगाच्च । प्रकृतावनुप्रविश्य तां परिणाम्य तत्परिणामकत्वेन तत्र स्थित्वाऽऽत्मनो बहुधाकरणात् । | प्रकर्षेण करोतीति प्रकृतिरिति योगाच्च । प्रकृतावनुप्रविश्य तां परिणाम्य तत्परिणामकत्वेन तत्र स्थित्वाऽऽत्मनो बहुधाकरणात् । | ||
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‘अथ हैष आत्मा प्रकृतिमनुप्रविश्यात्मानं बहुधा चकार । तस्मात् प्रकृतिस्तस्मात् प्रकृतिरित्याचक्षते’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ‘अथ हैष आत्मा प्रकृतिमनुप्रविश्यात्मानं बहुधा चकार । तस्मात् प्रकृतिस्तस्मात् प्रकृतिरित्याचक्षते’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
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‘अविकारोऽपि परमः प्रकृतिं तु विकारिणीम् । अनुप्रविश्य गोविन्दः प्रकृतिश्चाभिधीयते’ इति नारदीये । | ‘अविकारोऽपि परमः प्रकृतिं तु विकारिणीम् । अनुप्रविश्य गोविन्दः प्रकृतिश्चाभिधीयते’ इति नारदीये । | ||
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नचान्यत् कल्प्यम्, अप्रमाणिकत्वात् ॥ 27 ॥ | नचान्यत् कल्प्यम्, अप्रमाणिकत्वात् ॥ 27 ॥ | ||
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अव्यवधानेनोत्पत्तिद्वारत्वं प्रकृतित्वम् । तच्चास्यैव गीयते | अव्यवधानेनोत्पत्तिद्वारत्वं प्रकृतित्वम् । तच्चास्यैव गीयते | ||
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‘यद्बूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’ इति । | ‘यद्बूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’ इति । | ||
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‘व्यवधानेन सूतिस्तु पुंस्त्वम् विद्वद्भिरुच्यते । | ‘व्यवधानेन सूतिस्तु पुंस्त्वम् विद्वद्भिरुच्यते । | ||
सूतिरव्यवधानेन प्रकृतित्वमिति स्थितिः ॥ | |||
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उभयात्मकसूतित्वाद्वासुदेवः परः पुमान् ।प्रकृतिः पुरुषश्चेति शब्दैरेकोऽभिधीयते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 28 ॥ | उभयात्मकसूतित्वाद्वासुदेवः परः पुमान् ।प्रकृतिः पुरुषश्चेति शब्दैरेकोऽभिधीयते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 28 ॥ | ||
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एतेन सर्वे शून्यादिशब्दा अपि व्याख्याताः । | एतेन सर्वे शून्यादिशब्दा अपि व्याख्याताः । | ||
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‘एष ह्येव शून्य एष ह्येव तुच्छ एष ह्येवाभाव एष ह्येवाव्यक्तोऽदृश्योऽचिन्त्यो निर्गुणश्च’इति महोपनिषदि। | ‘एष ह्येव शून्य एष ह्येव तुच्छ एष ह्येवाभाव एष ह्येवाव्यक्तोऽदृश्योऽचिन्त्यो निर्गुणश्च’इति महोपनिषदि। | ||
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‘शमूनं कुरुते विष्णुरदृश्यः सन् परः स्वयम् । | ‘शमूनं कुरुते विष्णुरदृश्यः सन् परः स्वयम् । | ||
तस्माच्छून्यमिति प्रोक्तस्तोदनात्तुच्छ उच्यते ॥ | |||
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नैष भावयितं योग्यः केनचित् पुरुषोत्तमः । | नैष भावयितं योग्यः केनचित् पुरुषोत्तमः । | ||
अतोऽभावं वदन्त्येनं नाश्यत्वान्नाश इत्यपि ॥ | |||
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सर्वस्य तदधीनत्वात् तत्तच्छब्दाभिधेयता ।अन्येषां व्यवहारार्थ मिष्यते व्यवहर्तृभिः’इति महाकौर्मे। | सर्वस्य तदधीनत्वात् तत्तच्छब्दाभिधेयता ।अन्येषां व्यवहारार्थ मिष्यते व्यवहर्तृभिः’इति महाकौर्मे। | ||
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एतेन तदधीनत्वाद्युक्तयुक्तिसमुदायेन । | एतेन तदधीनत्वाद्युक्तयुक्तिसमुदायेन । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अवधारणार्थं सर्वस्याप्युक्तस्याध्यायमूलतः ।द्विरुक्तिं कुर्वते प्राज्ञा अध्यायान्ते विनिर्णये’इति वराहसंहितायाम् ॥ 29 ॥ | ‘अवधारणार्थं सर्वस्याप्युक्तस्याध्यायमूलतः ।द्विरुक्तिं कुर्वते प्राज्ञा अध्यायान्ते विनिर्णये’इति वराहसंहितायाम् ॥ 29 ॥ | ||