Aitareya/C2/S1: Difference between revisions
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॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम् | ॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम् | ||
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नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् । | नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् । | ||
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प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः । | प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः । | ||
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एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | ||
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विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । | विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । | ||
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उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः । | उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः । | ||
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स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः । | स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः । | ||
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तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् । | तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् । | ||
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-वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥ | -वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥ | ||
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पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः । | पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः । | ||
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तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् । | तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् । | ||
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अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥ | अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥ | ||
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-... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥ | -... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥ | ||
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स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते । | स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते । | ||
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तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् । | तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् । | ||
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विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाश्रितानि च । | विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाश्रितानि च । | ||
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मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह । | मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह । | ||
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हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥ | हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥ | ||
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... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् । | ... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् । | ||
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प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥ | प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥ | ||
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आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् । | आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् । | ||
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. ... स एष भगवान् गिरिः । | . ... स एष भगवान् गिरिः । | ||
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असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः । | असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः । | ||
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स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥ | स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥ | ||
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ब्रह्मपन्थाः सत्यं कर्मेति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत्सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् । तथेति निर्णयः । इरामया इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् । | ब्रह्मपन्थाः सत्यं कर्मेति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत्सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् । तथेति निर्णयः । इरामया इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् । | ||
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दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे इति शब्दनिर्णये । | दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे इति शब्दनिर्णये । | ||
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ब्रह्मा हैवं ता३ ईते । | ब्रह्मा हैवं ता३ ईते । | ||
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देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा । | देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा । | ||
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संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते । | संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते । | ||
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अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतं अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामप्यधिदैवत्वकथनम् । कर्मजदेवाद्यपेक्षया । मुख्याधिदैवतं नारायण एव । तस्योष्णिग्लोमानीत्यादि लोमसूष्णिगित्याद्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिवच्च । | अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतं अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामप्यधिदैवत्वकथनम् । कर्मजदेवाद्यपेक्षया । मुख्याधिदैवतं नारायण एव । तस्योष्णिग्लोमानीत्यादि लोमसूष्णिगित्याद्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिवच्च । | ||
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अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि ।तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति स्कान्दे । | अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि ।तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति स्कान्दे । | ||
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अस्मै पुण्याय कर्मण इत्येतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते ।न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदादन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोधे औपचारिकं कारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् । अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं वाचं पितरमित्यादिना । | अस्मै पुण्याय कर्मण इत्येतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते ।न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदादन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोधे औपचारिकं कारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् । अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं वाचं पितरमित्यादिना । | ||
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मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् । | मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् । | ||
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आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वज्ञापनार्थं न तु सन्निहितस्यैव । यथेन्द्रं कुत्स इत्यादि । यथा च पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् इति ॥ ८ ॥ | आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वज्ञापनार्थं न तु सन्निहितस्यैव । यथेन्द्रं कुत्स इत्यादि । यथा च पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् इति ॥ ८ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||