Aitareya/C2/S2: Difference between revisions
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एष नारायणो देवो वायुना सहेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या पुरि शेत इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति स भगवान् नारायणः । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इत्यादिश्रुतिभ्यः । य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्युक्त्वा तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । यमादित्यो न वेदेत्युक्तत्वान्नादित्यः । भेदव्यपदेशाच्चान्यः इति भगवद्वचनम् । | एष नारायणो देवो वायुना सहेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या पुरि शेत इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति स भगवान् नारायणः । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इत्यादिश्रुतिभ्यः । य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्युक्त्वा तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । यमादित्यो न वेदेत्युक्तत्वान्नादित्यः । भेदव्यपदेशाच्चान्यः इति भगवद्वचनम् । | ||
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वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । | वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । | ||
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ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । | ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । | ||
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तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । | तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । | ||
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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | ||
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न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । | न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । | ||
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अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । | अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । | ||
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तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते । तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति मध्यमशब्दोक्तस्य प्राणः स्थूणा इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्यमण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । | तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते । तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति मध्यमशब्दोक्तस्य प्राणः स्थूणा इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्यमण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । | ||
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क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | ||
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स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते । ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । | स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते । ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । | ||
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प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । | प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । | ||
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वसिष्ठो वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् । | वसिष्ठो वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् । | ||
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तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकमभवत् । बतेत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्टूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन्नहमल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपो महाप्राणिषु महारूपश्च भवानीति स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिताः भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । | तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकमभवत् । बतेत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्टूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन्नहमल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपो महाप्राणिषु महारूपश्च भवानीति स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिताः भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । | ||
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एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानिति ऋक् । गच्छति हि मरणकाले । | एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानिति ऋक् । गच्छति हि मरणकाले । | ||
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म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । | म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । | ||
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अर्च गतिपूजनयोः ऋ गतौ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । पद गतौ । तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । क्षर विनाशसन्ततदानयोः इति धातोः ।एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि । | अर्च गतिपूजनयोः ऋ गतौ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । पद गतौ । तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । क्षर विनाशसन्ततदानयोः इति धातोः ।एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि । | ||
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यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या । | यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या । | ||
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उक्तं च बृहत्संहितायाम्– | उक्तं च बृहत्संहितायाम्– | ||
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अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः । तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम् । तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेत इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमित्यादिना ॥ | अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः । तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम् । तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेत इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमित्यादिना ॥ | ||
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वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | ||
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उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वापि त्वामेव जानीयामिति वरस्वीकारादिन्द्रादेव चेन्द्राविष्टो भगवानत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते । एष तपन्नेवास्मीति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । | उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वापि त्वामेव जानीयामिति वरस्वीकारादिन्द्रादेव चेन्द्राविष्टो भगवानत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते । एष तपन्नेवास्मीति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । | ||
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यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ॥ | यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ॥ | ||
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इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । | ||
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सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः । | सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः । | ||
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नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । | नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । | ||
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यो देवानां नामधा एक एवेत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव । | यो देवानां नामधा एक एवेत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव । | ||
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श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः इति श्रुतिः । | श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः इति श्रुतिः । | ||
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परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । | परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । | ||
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नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् इत्यादिप्रश्नस्यापि | नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् इत्यादिप्रश्नस्यापि | ||
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परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । | परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । | ||
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मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्यपर्वणि । | मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्यपर्वणि । | ||
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न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना चेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना चेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | ||
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मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते । | मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते । | ||
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उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | ||
| Line 501: | Line 467: | ||
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विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः इत्युक्त्वा तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । सदिति प्राण इति श्रुतेः । | विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः इत्युक्त्वा तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । सदिति प्राण इति श्रुतेः । | ||
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सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः । | सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः । | ||
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प्रियधाम्न उप समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | प्रियधाम्न उप समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | ||
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बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः । | बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः । | ||
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न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । प्राणस्तथाऽनुगमाद् इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् इति वक्तुः बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्येन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । अध्यात्मसम्बन्धशब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्ह्यध्यात्मभूमेत्येव स्यात् सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः । | न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । प्राणस्तथाऽनुगमाद् इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् इति वक्तुः बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्येन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । अध्यात्मसम्बन्धशब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्ह्यध्यात्मभूमेत्येव स्यात् सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः । | ||
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जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् । | जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् । | ||
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असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। | असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। | ||
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न च प्राणो वा अहमस्मृष इत्यादावहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दाद्यर्थः । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एवेति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा तत्रैव प्रमाणत्वेन – विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्ययिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात् सर्वगुणत्वात् सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | न च प्राणो वा अहमस्मृष इत्यादावहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दाद्यर्थः । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एवेति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा तत्रैव प्रमाणत्वेन – विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्ययिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात् सर्वगुणत्वात् सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | ||
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उक्तं च भारते । | उक्तं च भारते । | ||
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पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । आ तृणादाकरीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा इति च श्रुतिः । | पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । आ तृणादाकरीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा इति च श्रुतिः । | ||
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हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । अमृतो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वा अमृतः समभवत् समभवत् इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । न हि भेदाभावे भूतेभ्यो ददृश इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते । एकत्वे तु ददृश इत्येतावता पूर्यते सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । | हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । अमृतो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वा अमृतः समभवत् समभवत् इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । न हि भेदाभावे भूतेभ्यो ददृश इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते । एकत्वे तु ददृश इत्येतावता पूर्यते सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । | ||
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नच कर्तृकर्मविरोधो नामास्तीत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः । | नच कर्तृकर्मविरोधो नामास्तीत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः । | ||
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न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | ||
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विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् । | विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् । | ||
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न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वाभावः प्रसीदति इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः इत्यादिना कर्माणि च । तस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः । | न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वाभावः प्रसीदति इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः इत्यादिना कर्माणि च । तस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः । | ||
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अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । | अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । | ||
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श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | ||
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यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां ३ वाचं वदन् । | यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां ३ वाचं वदन् । | ||
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यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् । | यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् । | ||
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यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः । | यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः । | ||
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यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः । | यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः । | ||
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यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते । | यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते । | ||
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यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । | यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । | ||
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मुक्तः प्रतिज्ञानात् सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः जगद्व्यापारवर्जम् भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात् इत्यादिसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ग्राव्णा सोमे महीयते इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते । | मुक्तः प्रतिज्ञानात् सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः जगद्व्यापारवर्जम् भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात् इत्यादिसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ग्राव्णा सोमे महीयते इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते । | ||
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बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । | ||
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भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । | भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । | ||
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इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | ||
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तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ | तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ | ||
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यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति यस्मात् कस्मादपि छन्दसस्तावत्यः शंसनीयाः । तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभिमानिदेवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः । | यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति यस्मात् कस्मादपि छन्दसस्तावत्यः शंसनीयाः । तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभिमानिदेवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः । | ||
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व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः । | व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः । | ||
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सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव । न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादिपृथक् पृथङ्मयशब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् । | सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव । न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादिपृथक् पृथङ्मयशब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् । | ||
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अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः । | अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः । | ||
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सम्भूयेत्यत्र समित्युपसर्गात् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि क्रमेण प्राप्नोति । | सम्भूयेत्यत्र समित्युपसर्गात् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि क्रमेण प्राप्नोति । | ||
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द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् । | द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् । | ||
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बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि । पुरुषैरहेयत्वादहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप समीपे ईक्षेत । | बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि । पुरुषैरहेयत्वादहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप समीपे ईक्षेत । | ||
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नानर्थकः स्वरो वापि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् । | नानर्थकः स्वरो वापि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् । | ||
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सुकरं च सर्वपदानामनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद् विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानामानर्थक्यं कल्प्यम् । | सुकरं च सर्वपदानामनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद् विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानामानर्थक्यं कल्प्यम् । | ||
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एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः । | एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः । | ||
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अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति, न वा अहमिमं विजानाति, तस्योपनिषदहम् इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वेऽहमिमं न जानातीति न युज्यते । तस्य भूरिति शिरो भुव इति बाहू इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम् । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । | अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति, न वा अहमिमं विजानाति, तस्योपनिषदहम् इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वेऽहमिमं न जानातीति न युज्यते । तस्य भूरिति शिरो भुव इति बाहू इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम् । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । | ||
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अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि गुणाद्वालोकवत् इति च सूत्रात् । आदित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि तस्यैतस्य तदेव रूपमिति कथनाच्च । स एष एवैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिरित्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वादहं नामा । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः जगतस्तस्थुषश्चात्मा इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च । | अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि गुणाद्वालोकवत् इति च सूत्रात् । आदित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि तस्यैतस्य तदेव रूपमिति कथनाच्च । स एष एवैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिरित्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वादहं नामा । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः जगतस्तस्थुषश्चात्मा इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च । | ||
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यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । | यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । | ||
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देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद्देवतास्वप्येतीति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे सम्भूय देवता अप्येतीति ल्यप् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः । | देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद्देवतास्वप्येतीति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे सम्भूय देवता अप्येतीति ल्यप् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः । | ||
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सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् । | सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् । | ||
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अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् । | अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् । | ||
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सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुमाध्यायमूलतः । | सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुमाध्यायमूलतः । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ||