Aitareya/C2/S3: Difference between revisions
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योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः । | योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः । | ||
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.... तानि रूपाणि वै हरेः ॥ | .... तानि रूपाणि वै हरेः ॥ | ||
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सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ॥ | सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ॥ | ||
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सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ॥ | सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ॥ | ||
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आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्योपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । वपनीरोमकरणावकाशप्रदानबीजवर्धनेषु इति च धातुः । तस्मिन् पञ्चके योऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । तस्मिन् वेद अस्मिन्नाजायत इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणादुपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च स्वजाताविति ज्ञायते । | आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्योपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । वपनीरोमकरणावकाशप्रदानबीजवर्धनेषु इति च धातुः । तस्मिन् पञ्चके योऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । तस्मिन् वेद अस्मिन्नाजायत इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणादुपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च स्वजाताविति ज्ञायते । | ||
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क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् । सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ॥ | क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् । सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ॥ | ||
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गुणवैशेष्याभावेन वाहनादिषु चरणमात्रादधीव चरन्तीत्यादाविवशब्दः ॥ १ ॥ | गुणवैशेष्याभावेन वाहनादिषु चरणमात्रादधीव चरन्तीत्यादाविवशब्दः ॥ १ ॥ | ||
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आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः । | आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः । | ||
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य आत्मानं परमात्मानमाविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । अन चेष्टायामिति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनाम् । ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥ | य आत्मानं परमात्मानमाविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । अन चेष्टायामिति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनाम् । ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥ | ||
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योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति । सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिदलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथापि तमेनमात्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुमत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोपि न तेन साम्यं तद्भावं वा मन्यते । कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः मुक्तानां परमा गतिः अमृतस्यैष सेतुः इत्यादिवाक्याच्च ।। | योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति । सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिदलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथापि तमेनमात्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुमत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोपि न तेन साम्यं तद्भावं वा मन्यते । कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः मुक्तानां परमा गतिः अमृतस्यैष सेतुः इत्यादिवाक्याच्च ।। | ||
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यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । बहुगणिकादिपरिवाररूपमशुचीदं पदमित्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत । | यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । बहुगणिकादिपरिवाररूपमशुचीदं पदमित्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत । | ||
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न च मन्यते इति काममात्रम् । मनु अवबोधन इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि राज्यकाम इति स्यात् । न च मन्यते मन्येतेति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् । | न च मन्यते इति काममात्रम् । मनु अवबोधन इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि राज्यकाम इति स्यात् । न च मन्यते मन्येतेति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् । | ||
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पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः । | पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः । | ||
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तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् । | तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् । | ||
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पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत्पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥ | पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत्पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥ | ||
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यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् । | यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् । | ||
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प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ॥ | प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ॥ | ||
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अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा । | अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा । | ||
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मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः । | मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः । | ||
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दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ॥ | दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ॥ | ||
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.... छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ॥ | .... छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ॥ | ||
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..त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः । | ..त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः । | ||
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..स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वात् छन्दः ॥ ४ ॥ | ..स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वात् छन्दः ॥ ४ ॥ | ||
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तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितमिति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति । | तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितमिति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति । | ||
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अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकामृचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद्भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाहुः विष्णुं हंसस्वरूपिणम् । अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च । | अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकामृचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद्भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाहुः विष्णुं हंसस्वरूपिणम् । अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च । | ||
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मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् । | मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् । | ||
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वागाख्यायामनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सर्वदा शृण्वन्तीति ज्ञायतेऽतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति । | वागाख्यायामनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सर्वदा शृण्वन्तीति ज्ञायतेऽतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति । | ||
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अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु । | अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु । | ||
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महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः । | महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः । | ||
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अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् । | अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् । | ||
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इतोऽन्यत् सत्किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः । | इतोऽन्यत् सत्किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः । | ||
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ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानोऽभ्यस्यमानः । तृतीयोऽतिशये इति सूत्रादकारस्येकारः । मथनात् मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते । हत्वी दस्यून् इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः । | ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानोऽभ्यस्यमानः । तृतीयोऽतिशये इति सूत्रादकारस्येकारः । मथनात् मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते । हत्वी दस्यून् इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः । | ||
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एकापि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा । | एकापि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा । | ||
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एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥ | एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥ | ||
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बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्शंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्यात् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते । | बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्शंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्यात् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते । | ||
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वाचमष्टापदीमहमित्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वागृतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद्यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् । | वाचमष्टापदीमहमित्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वागृतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद्यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् । | ||
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तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग्ध्यायन् । | तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग्ध्यायन् । | ||
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यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेदनुष्टुभाम् । | यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेदनुष्टुभाम् । | ||
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स्रक्तयो विभागाः । | स्रक्तयो विभागाः । | ||
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स वा एष वाचः परमो विकारः अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः । | स वा एष वाचः परमो विकारः अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः । | ||
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अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् । | अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् । | ||
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....तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥ | ....तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥ | ||
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. परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः । | . परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः । | ||
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.स्वराणां नियमो यत्र ह्यृचो नामैव ताः स्मृताः । | .स्वराणां नियमो यत्र ह्यृचो नामैव ताः स्मृताः । | ||
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. अकारार्थत्वान्नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वादकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग्वाच्य इति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तदात्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् । | . अकारार्थत्वान्नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वादकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग्वाच्य इति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तदात्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् । | ||
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.अकारस्योङ्कारता त्वकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्यादौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमोङ्कारः । यमर्थमकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्त्वच्छिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वादयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाप्यकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्मादकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥ | .अकारस्योङ्कारता त्वकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्यादौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमोङ्कारः । यमर्थमकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्त्वच्छिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वादयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाप्यकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्मादकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥ | ||
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विद्यान्तरोपदेशार्थं तद्वा इदं बृहतीसहस्रमिति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशस्तस्य नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद्यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत्प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । इदि परमैश्वर्ये इति धातोश्च । तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वं न तु मुख्यतः । अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः । मत्सि सोमं वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम् इति । | विद्यान्तरोपदेशार्थं तद्वा इदं बृहतीसहस्रमिति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशस्तस्य नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद्यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत्प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । इदि परमैश्वर्ये इति धातोश्च । तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वं न तु मुख्यतः । अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः । मत्सि सोमं वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम् इति । | ||
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न चेन्द्रं विष्णुं चेति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनादत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ्मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमित्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् । | न चेन्द्रं विष्णुं चेति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनादत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ्मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमित्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् । | ||
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यत्र चैवं भूतेष्वेकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति । अन्यथैकत्वमेव । यो देवानां नामधा एक एव इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दा अन्येषामुपचारतः । मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदायेत्यन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च मत्सीन्द्रमिन्दो पवमानेति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् । | यत्र चैवं भूतेष्वेकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति । अन्यथैकत्वमेव । यो देवानां नामधा एक एव इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दा अन्येषामुपचारतः । मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदायेत्यन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च मत्सीन्द्रमिन्दो पवमानेति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् । | ||
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महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् । न तु सामर्थ्यतः । मह पूजायामिति धातोः । पूज्यो ह्यग्रजो भवति । | महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् । न तु सामर्थ्यतः । मह पूजायामिति धातोः । पूज्यो ह्यग्रजो भवति । | ||
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आयो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः । | आयो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः । | ||
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इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादिप्रदाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादादवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् । | इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादिप्रदाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादादवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् । | ||
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अन्येन्द्रो ह्यहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयमिति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप । विष्णुस्तु क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस इति वायोरपि विधाता श्रूयते । डुधाञ् धारणपोषणयोरिति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद्यशो बृहदुक्थादिकम् । | अन्येन्द्रो ह्यहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयमिति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप । विष्णुस्तु क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस इति वायोरपि विधाता श्रूयते । डुधाञ् धारणपोषणयोरिति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद्यशो बृहदुक्थादिकम् । | ||
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ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि । | ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि । | ||
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श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥ | श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥ | ||
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इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः । | इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः । | ||
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यन्नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत्स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यन्नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते । तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति । नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् । किन्त्वेकस्थाने वासोऽत्यनुकूलचित्तता च । एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः । | यन्नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत्स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यन्नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते । तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति । नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् । किन्त्वेकस्थाने वासोऽत्यनुकूलचित्तता च । एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः । | ||
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यस्मादक्षरान्नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः । | यस्मादक्षरान्नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः । | ||
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वियूय विचार्य नामायत्तान्येव नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीन्यन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन् । शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन् तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । | वियूय विचार्य नामायत्तान्येव नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीन्यन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन् । शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन् तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । | ||
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अर्थतः कठिनं क्रूरमुल्बणं श्रवणाप्रियम् इति शब्दनिर्णये । | अर्थतः कठिनं क्रूरमुल्बणं श्रवणाप्रियम् इति शब्दनिर्णये । | ||
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अस्त्री पुमान् ब्रुवन् अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ।सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान् तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च । | अस्त्री पुमान् ब्रुवन् अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ।सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान् तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च । | ||
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अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः । | अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः । | ||
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नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः । | नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः । | ||
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तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् इति च श्रुतिः । | तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् इति च श्रुतिः । | ||
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सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते । | सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते । | ||
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एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अ इति ब्रह्मेति ॥ | एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अ इति ब्रह्मेति ॥ | ||
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इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र वैशेषिकं हि तत् । | इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र वैशेषिकं हि तत् । | ||
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तत्रागतमहमिति यस्माद् अः इत्ययं शब्दः प्रस्तुतस्य भावं विरोधिनमन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यस्तद्विरोधी तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति । मनसि प्रस्तुतत्वादवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाददृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु अव इति पृथग्विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये । | तत्रागतमहमिति यस्माद् अः इत्ययं शब्दः प्रस्तुतस्य भावं विरोधिनमन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यस्तद्विरोधी तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति । मनसि प्रस्तुतत्वादवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाददृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु अव इति पृथग्विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये । | ||
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न च शून्यस्याशब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे ह्यकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावताऽन्यता विरोधितेति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्मादकारस्य भगवानेव मुख्यार्थो न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्मादमुख्यार्थत्वादन्ययुक्तेनैवाकारेणाभाव इति तदुच्यते । न तु अव इत्येव केनचित्क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति । तस्मात् पारतन्त्र्याल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्यो अन्यदज्ञानदुःखाल्पत्वपारतन्त्र्योत्पत्तिनाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैवाशब्दार्थः । पूर्णं हि ब्रह्मशब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्मादकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं अः इति ब्रह्मेति । | न च शून्यस्याशब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे ह्यकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावताऽन्यता विरोधितेति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्मादकारस्य भगवानेव मुख्यार्थो न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्मादमुख्यार्थत्वादन्ययुक्तेनैवाकारेणाभाव इति तदुच्यते । न तु अव इत्येव केनचित्क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति । तस्मात् पारतन्त्र्याल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्यो अन्यदज्ञानदुःखाल्पत्वपारतन्त्र्योत्पत्तिनाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैवाशब्दार्थः । पूर्णं हि ब्रह्मशब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्मादकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं अः इति ब्रह्मेति । | ||
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विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि । | विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि । | ||
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अः इति ब्रह्म पूर्णं वस्तूच्यते । तत्रागतमहमिति तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति । मुक्तेभ्यः प्रलये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यः सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च अः इति पृथग्वचनम् । | अः इति ब्रह्म पूर्णं वस्तूच्यते । तत्रागतमहमिति तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति । मुक्तेभ्यः प्रलये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यः सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च अः इति पृथग्वचनम् । | ||
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तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये– | तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये– | ||
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न च निषेधस्वरूपे विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य वैयर्थ्यात् । | न च निषेधस्वरूपे विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य वैयर्थ्यात् । | ||
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उक्तं हि शब्दनिर्णये । | उक्तं हि शब्दनिर्णये । | ||
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तस्मान्नारायणः एवाकारवाच्य इति सिद्धम् । | तस्मान्नारायणः एवाकारवाच्य इति सिद्धम् । | ||
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षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु । | षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु । | ||
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वायोरुत्पत्तिकामो मायां रमायां रमत इत्यनकाममारः । जीवस्थितेनाक्षरगेनाक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितमहराख्यं स्वरूपमाप्नोति तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तमित्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते । पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदतीत्युक्तत्वादुभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदतीत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः । | वायोरुत्पत्तिकामो मायां रमायां रमत इत्यनकाममारः । जीवस्थितेनाक्षरगेनाक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितमहराख्यं स्वरूपमाप्नोति तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तमित्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते । पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदतीत्युक्तत्वादुभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदतीत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः । | ||
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न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वादस्त्री पुमानित्यपि वदन्निति भवति । | न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वादस्त्री पुमानित्यपि वदन्निति भवति । | ||
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स्त्रीपुंरूपद्वयं विष्णोर्न तृतीयं कथञ्चन । | स्त्रीपुंरूपद्वयं विष्णोर्न तृतीयं कथञ्चन । | ||
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न च रक्ष इति नपुंसकशब्दमात्रेण रावणादयो नपुंसका भवन्ति । भवतीतिपदाभावादनकाममार इति भगवन्नामैवेति ज्ञायते | न च रक्ष इति नपुंसकशब्दमात्रेण रावणादयो नपुंसका भवन्ति । भवतीतिपदाभावादनकाममार इति भगवन्नामैवेति ज्ञायते | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः ॥ | ||
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ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्धातोः सर्वज्ञ एकराट् । | ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्धातोः सर्वज्ञ एकराट् । | ||
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निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह । | निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह । | ||
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सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद्दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोरुभयोरपि वचनार्थम् । | सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद्दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोरुभयोरपि वचनार्थम् । | ||
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न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगादहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । तद्रासभो नासत्या सहस्रम् इति वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । यो देवानां नामधा एक एव इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥ | न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगादहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । तद्रासभो नासत्या सहस्रम् इति वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । यो देवानां नामधा एक एव इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥ | ||