Aitareya/C3/S1: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 12: | Line 12: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V01 | | verse_id = AIT_C03_S01_V01 | ||
| id = AIT_C03_S01_V01_B01 | | id = AIT_C03_S01_V01_B01 | ||
| text = | | text = | ||
विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | ||
| Line 35: | Line 34: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V02 | | verse_id = AIT_C03_S01_V02 | ||
| id = AIT_C03_S01_V02_B01 | | id = AIT_C03_S01_V02_B01 | ||
| text = | | text = | ||
पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥ | पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥ | ||
| Line 66: | Line 64: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V03 | | verse_id = AIT_C03_S01_V03 | ||
| id = AIT_C03_S01_V03_B01 | | id = AIT_C03_S01_V03_B01 | ||
| text = | | text = | ||
आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | ||
| Line 83: | Line 80: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V04 | | verse_id = AIT_C03_S01_V04 | ||
| id = AIT_C03_S01_V04_B01 | | id = AIT_C03_S01_V04_B01 | ||
| text = | | text = | ||
भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥ | भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥ | ||
| Line 100: | Line 96: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V05 | | verse_id = AIT_C03_S01_V05 | ||
| id = AIT_C03_S01_V05_B01 | | id = AIT_C03_S01_V05_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् । | अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् । | ||
| Line 117: | Line 112: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | ||
| Line 127: | Line 121: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | ||
| Line 137: | Line 130: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । | प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । | ||
| Line 146: | Line 138: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् । | मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । | मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । | ||
| Line 163: | Line 153: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V06 | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 | ||
| id = AIT_C03_S01_V06_B01 | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | ||
| Line 180: | Line 169: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V07 | | verse_id = AIT_C03_S01_V07 | ||
| id = AIT_C03_S01_V07_B01 | | id = AIT_C03_S01_V07_B01 | ||
| text = | | text = | ||
वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | ||
| Line 204: | Line 192: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V08 | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 | ||
| id = AIT_C03_S01_V08_B01 | | id = AIT_C03_S01_V08_B01 | ||
| text = | | text = | ||
उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | ||
| Line 220: | Line 207: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V08 | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 | ||
| id = AIT_C03_S01_V08_B02 | | id = AIT_C03_S01_V08_B02 | ||
| text = | | text = | ||
वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | ||
| Line 237: | Line 223: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V09 | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 | ||
| id = AIT_C03_S01_V09_B01 | | id = AIT_C03_S01_V09_B01 | ||
| text = | | text = | ||
पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | ||
| Line 253: | Line 238: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V09 | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 | ||
| id = AIT_C03_S01_V09_B01 | | id = AIT_C03_S01_V09_B01 | ||
| text = | | text = | ||
भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् । | भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V09 | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 | ||
| id = AIT_C03_S01_V09_B01 | | id = AIT_C03_S01_V09_B01 | ||
| text = | | text = | ||
क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | ||
| Line 280: | Line 263: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V10 | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
| id = AIT_C03_S01_V10_B01 | | id = AIT_C03_S01_V10_B01 | ||
| text = | | text = | ||
उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V10 | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
| id = AIT_C03_S01_V10_B01 | | id = AIT_C03_S01_V10_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | ||
| Line 299: | Line 280: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V10 | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
| id = AIT_C03_S01_V10_B01 | | id = AIT_C03_S01_V10_B01 | ||
| text = | | text = | ||
षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | ||
| Line 318: | Line 298: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V10 | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
| id = AIT_C03_S01_V10_B01 | | id = AIT_C03_S01_V10_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण । | अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण । | ||
| Line 335: | Line 314: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V11 | | verse_id = AIT_C03_S01_V11 | ||
| id = AIT_C03_S01_V11_B01 | | id = AIT_C03_S01_V11_B01 | ||
| text = | | text = | ||
द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | ||
| Line 358: | Line 336: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V12 | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| id = AIT_C03_S01_V12_B01 | | id = AIT_C03_S01_V12_B01 | ||
| text = | | text = | ||
भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V12 | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| id = AIT_C03_S01_V12_B01 | | id = AIT_C03_S01_V12_B01 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | ||
| Line 382: | Line 358: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V12 | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| id = AIT_C03_S01_V12_B01 | | id = AIT_C03_S01_V12_B01 | ||
| text = | | text = | ||
स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V12 | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| id = AIT_C03_S01_V12_B01 | | id = AIT_C03_S01_V12_B01 | ||
| text = | | text = | ||
तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | ||
| Line 409: | Line 383: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V13 | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 | ||
| id = AIT_C03_S01_V13_B01 | | id = AIT_C03_S01_V13_B01 | ||
| text = | | text = | ||
पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | ||
| Line 426: | Line 399: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V13 | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 | ||
| id = AIT_C03_S01_V13_B01 | | id = AIT_C03_S01_V13_B01 | ||
| text = | | text = | ||
मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | ||
| Line 443: | Line 415: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । | मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । | ||
| Line 452: | Line 423: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः । | अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः । | ||
| Line 462: | Line 432: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | ||
| Line 477: | Line 446: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | ||
| Line 489: | Line 457: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | ||
| Line 510: | Line 476: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | ||
| Line 528: | Line 492: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V14 | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = AIT_C03_S01_V14_B01 | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = | ||
सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् । | सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् । | ||
| Line 548: | Line 511: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V15 | | verse_id = AIT_C03_S01_V15 | ||
| id = AIT_C03_S01_V15_B01 | | id = AIT_C03_S01_V15_B01 | ||
| text = | | text = | ||
देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | ||
| Line 577: | Line 539: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V16 | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 | ||
| id = AIT_C03_S01_V16_B01 | | id = AIT_C03_S01_V16_B01 | ||
| text = | | text = | ||
संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥ | संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥ | ||
| Line 614: | Line 575: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V17 | | verse_id = AIT_C03_S01_V17 | ||
| id = AIT_C03_S01_V17_B01 | | id = AIT_C03_S01_V17_B01 | ||
| text = | | text = | ||
.... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥ | .... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥ | ||
| Line 639: | Line 599: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V18 | | verse_id = AIT_C03_S01_V18 | ||
| id = AIT_C03_S01_V18_B01 | | id = AIT_C03_S01_V18_B01 | ||
| text = | | text = | ||
पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥ | पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥ | ||
| Line 663: | Line 622: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = AIT_C03_S01_V19_author-note | | id = AIT_C03_S01_V19_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = AIT_C03_S01_V19_B01 | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 | ||
| text = | | text = | ||
प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि । | प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि । | ||
| Line 705: | Line 662: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = AIT_C03_S01_V19_B02 | | id = AIT_C03_S01_V19_B02 | ||
| text = | | text = | ||
प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | ||
| Line 747: | Line 703: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = AIT_C03_S01_V19_B03 | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 | ||
| text = | | text = | ||
यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् । | यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = AIT_C03_S01_V19_B01 | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 | ||
| text = | | text = | ||
चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | ||