Aitareya/C3/S2: Difference between revisions
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गृहस्याच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । | गृहस्याच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । | ||
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अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । | अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । | ||
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तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । | तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । | ||
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एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । | एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । | ||
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तस्यैतस्यात्मनस्तस्य शरीराख्यस्यात्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेस्तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । विष्णुरित्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्णाक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । | तस्यैतस्यात्मनस्तस्य शरीराख्यस्यात्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेस्तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । विष्णुरित्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्णाक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । | ||
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अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । | अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । | ||
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मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थमिदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानामभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । र्ओ निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक्प्रेरकत्वाद् विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येवाहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । | मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थमिदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानामभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । र्ओ निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक्प्रेरकत्वाद् विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येवाहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । | ||
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यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । | यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । | ||
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संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । | संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । | ||
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स एवादित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ॥ | स एवादित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ॥ | ||
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एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ॥ | एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ॥ | ||
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कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । | कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । | ||
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सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । | सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । | ||
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देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ॥ | देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ॥ | ||
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शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात् तदुपास्यत्वात् तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यदीं एव अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत्सर्वमरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावो रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । परस्मै शंसनमात्रादरतिरेवेत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थामिति दोषद्वयमेवेत्यवधारयति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवतीति । अलकं शृणोतीति त्यागद्वयस्य मुख्यतः । तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद्भवति । तौ यदाऽस्माच्छरीराद् विहीयेते तदैवैतानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । | शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात् तदुपास्यत्वात् तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यदीं एव अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत्सर्वमरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावो रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । परस्मै शंसनमात्रादरतिरेवेत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थामिति दोषद्वयमेवेत्यवधारयति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवतीति । अलकं शृणोतीति त्यागद्वयस्य मुख्यतः । तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद्भवति । तौ यदाऽस्माच्छरीराद् विहीयेते तदैवैतानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । | ||
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यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । | यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । | ||
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ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्यानन्दं जनयन् । स्वरानन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आवक्षणाभ्य इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । | ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्यानन्दं जनयन् । स्वरानन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आवक्षणाभ्य इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । | ||
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सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । | सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । | ||
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इन्दुरिष्टप्रदत्वाद्यो वायुरादाय गच्छति । | इन्दुरिष्टप्रदत्वाद्यो वायुरादाय गच्छति । | ||
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अनन्यहेतुकं साक्षाद्भगवद्भक्तिरूपकम् । | अनन्यहेतुकं साक्षाद्भगवद्भक्तिरूपकम् । | ||
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तमसः सकाशात् उद्गता वयमुत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तस्तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवमगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमज्योतिः न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रमिदमिति ज्ञापयितुमगन्म ज्योतिरुत्तममिति पुनर्वचनम् । | तमसः सकाशात् उद्गता वयमुत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तस्तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवमगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमज्योतिः न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रमिदमिति ज्ञापयितुमगन्म ज्योतिरुत्तममिति पुनर्वचनम् । | ||
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अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः इति शब्दनिर्णये । | अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः इति शब्दनिर्णये । | ||
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बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । | बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । | ||
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रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । | रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । | ||
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अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुशब्दार्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववागुपनिषद एव । तथापि मुख्यत एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । | अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुशब्दार्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववागुपनिषद एव । तथापि मुख्यत एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । | ||
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पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । | पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । | ||
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तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । | तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । | ||
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विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्सारामप्यृचं जपेत् । | विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्सारामप्यृचं जपेत् । | ||
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नेत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवदस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वात् वक्ष्यमाणत्वाच्च । | नेत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवदस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वात् वक्ष्यमाणत्वाच्च । | ||
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श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः इति भागवते । | श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः इति भागवते । | ||
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यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद इत्यादिश्रुतिश्च । | यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद इत्यादिश्रुतिश्च । | ||
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स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ | स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ | ||
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संवत्सर इति विशेषणाद्विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । | संवत्सर इति विशेषणाद्विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । | ||
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श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । | श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । | ||
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विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ॥ | विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ॥ | ||
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संहितासहितत्वेन यदृचो धीमहे वयम् ॥ | संहितासहितत्वेन यदृचो धीमहे वयम् ॥ | ||
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.... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । | .... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | ||
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॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥ | ॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥ | ||
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संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । | संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । | ||
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य एतेन ण इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलं षशब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाततत्वं सर्वर्चां सर्वासां संहितामनु तदर्थत्वेन वेद । अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथेत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनामव्याख्यानरूपा एव । यद्द्वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोधीमहे तेनास्माकं णशब्दषशब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । वीत्युपसर्गत्वादुकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वादुक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक्तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ | य एतेन ण इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलं षशब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाततत्वं सर्वर्चां सर्वासां संहितामनु तदर्थत्वेन वेद । अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथेत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनामव्याख्यानरूपा एव । यद्द्वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोधीमहे तेनास्माकं णशब्दषशब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । वीत्युपसर्गत्वादुकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वादुक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक्तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ | ||
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सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैर्मेघाग्निवारिधितलादिरवैश्च सर्वैः । | सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैर्मेघाग्निवारिधितलादिरवैश्च सर्वैः । | ||
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यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
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हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । | हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । | ||
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साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । | साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । | ||
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पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | ||