Brahmasutra/C3/S3: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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| Line 5: | Line 7: | ||
}}उपासनाऽस्मिन् पाद उच्यते। सर्वपरिज्ञानं प्रथमत उच्यते- | }}उपासनाऽस्मिन् पाद उच्यते। सर्वपरिज्ञानं प्रथमत उच्यते- | ||
=== | === सर्वेवेदाधिकरणम् === | ||
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| Line 12: | Line 14: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (366)ओं सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ओम् ॥ 03-03-01 ॥ | ||
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| Line 20: | Line 22: | ||
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| text = | | text = | ||
अन्तो निर्णयः । ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तः’ इति वचनात् । सर्ववेद निर्णयोत्पाद्यज्ञानं ब्रह्म | अन्तो निर्णयः । ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तः’(भ.गी.२.१६) इति वचनात् । | ||
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{{Bhashyam | |||
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सर्ववेद निर्णयोत्पाद्यज्ञानं ब्रह्म ।‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इत्यादिविधीनां तदुक्तयुक्तीनां चाविशिष्टत्वात् ॥ 01 ॥ | |||
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| Line 28: | Line 37: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (367)ओं भेदान्नेति चेदेकस्यामपि ओम् ॥ 03-03-02 ॥ | ||
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| Line 36: | Line 45: | ||
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‘विज्ञानमानन्दं | ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृ.उ.५.९.२८)‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१) इत्यादि प्रतिशाखमुक्तिभेदान्नैकाधिकारिविषयाः सर्वशाखा इति चेन्न । | ||
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{{Bhashyam | |||
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एकस्यामपि शाखायां ‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७)‘कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छां.उ.४.१०.५) इत्यादिभेददर्शनात् ॥ 02 ॥ | |||
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| Line 44: | Line 60: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (368)ओं स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च ओम् ॥ 03-03-03 ॥ | ||
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| Line 52: | Line 68: | ||
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‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इति सामान्यविधेः । | ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’(तै.आ.२.१५) इति सामान्यविधेः । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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हिशब्दात् वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना’इति स्मृतेः । | |||
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| Line 59: | Line 82: | ||
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‘सर्ववेदोक्तमार्गेण कर्म कुर्वीत नित्यशः | ‘सर्ववेदोक्तमार्गेण कर्म कुर्वीत नित्यशः ।आनन्दो हि फलं यस्माच्छाखाभेदो ह्यशक्तिजः ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 67: | Line 89: | ||
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‘सर्वकर्मकृतौ यस्मादशक्ताः सर्वजन्तवः ।शाखाभेदं कर्मभेदं व्यासस्तस्मादचीक्लृपत्’() | |||
इति समाचारे सर्वेषामधिकाराच्च ॥ 03 ॥ | इति समाचारे सर्वेषामधिकाराच्च ॥ 03 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 77: | Line 98: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (369)ओं सलिलवच्च तन्नियमः ओम् ॥ 03-03-04 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 85: | Line 106: | ||
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यथा सर्वं सलिलं समुद्रं | यथा सर्वं सलिलं समुद्रं गच्छति एवं सर्वाणि वचनानि ब्रह्मज्ञानार्थानीति नियमः । | ||
}} | }} | ||
| Line 93: | Line 114: | ||
| text = | | text = | ||
आग्नेये च – | आग्नेये च – | ||
‘यथा नदीनां सलिलं शक्ये सागरगं भवेत् | ‘यथा नदीनां सलिलं शक्ये सागरगं भवेत् ।एवं वाक्यानि सर्वाणि पुंशक्त्या ब्रह्मवित्तये’() इति ॥ 04 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 102: | Line 122: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (370)ओं दर्शयति च ओम् ॥ 03-03-05 ॥ | ||
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| Line 117: | Line 130: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सर्वैश्च वेदैः परमो हि देवो जीज्ञास्योऽसौ नाल्पवेदैः प्रसिद्ध्येत् ।तस्मादेनं सर्वेवेदानदीत्य विचार्य च ज्ञातुमिच्छेन्मुमुक्षुः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् | ‘सर्वैश्च वेदैः परमो हि देवो जीज्ञास्योऽसौ नाल्पवेदैः प्रसिद्ध्येत् ।तस्मादेनं सर्वेवेदानदीत्य विचार्य च ज्ञातुमिच्छेन्मुमुक्षुः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।‘सर्वान् वेदान् सेतिहासान् सपुराणान् सयुक्तिकान् ।सपञ्चरात्रान् विज्ञाय विष्णुर्ज्ञेयो न चान्यथा’इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 134: | Line 140: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (371)ओम् उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत् समाने च ओम् ॥ 03-03-06 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 163: | Line 169: | ||
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आग्नेये च- | आग्नेये च-विधिशेषाणि कर्माणि सर्ववेदोदितान्यपि ।यथा कार्याणि सर्वैश्च सर्वाण्येवाविशेषतः ॥एवं सर्वगुणान् सर्वदोषाभावांश्च यत्नतः ।योजयित्वैव भगवानुपास्यो नान्यथा क्वचित्’ ॥ इति ॥ | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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समानविषये चोपसंहारः । न तु ‘सोऽरोदीत्’(तै.सं.१.५.१) इत्यादिनाम् ।गुणैरेव स तूपास्यो नैव दोषैः कथञ्चन।गुणैरपि न तूपास्यो यो पूर्णत्वविरोधिनः’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (372)ओम् अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ओम् ॥ 03-03-07 ॥ | ||
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‘आत्मेत्येवैपासीत’ इतिशब्दादुपसंहारस्यान्यथात्वमिति | ‘आत्मेत्येवैपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इतिशब्दादुपसंहारस्यान्यथात्वमिति चेत्, | ||
}} | }} | ||
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‘सर्वैर्गुणैरेक एवेशिताऽसावुपासितव्यो न तु दोषैः कदाचित्’ इति विशेषवचनाच्च । | न। एते गुणा नोपास्य इति विशेषवचनाभावात् । ‘सर्वैर्गुणैरेक एवेशिताऽसावुपासितव्यो न तु दोषैः कदाचित्’() इति विशेषवचनाच्च । | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (373)ओं न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ओम् ॥ 03-03-08 ॥ | ||
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प्रकरणभेदान्नवोपसंहारः कार्यः । परोवरीयस्त्वादिषु तावदेव ह्युक्तम् ॥ 08 ॥ | प्रकरणभेदान्नवोपसंहारः कार्यः । | ||
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परोवरीयस्त्वादिषु तावदेव ह्युक्तम् ॥ 08 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (374)ओं सङ्ज्ञातश्चेत् तदुक्तमस्ति तु तदपि ओम् ॥ 03-03-09 ॥ | ||
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सर्वविद्या’उक्त्वासोऽहं नामविदेवास्मि | सर्वविद्या’उक्त्वासोऽहं नामविदेवास्मि नाऽत्मवित्’(छां.उ.७.१.३) इति वचनात् सर्वस्य ब्रह्मनामत्वात् तदुपसंहारः कार्यः ।‘नामत्वात् सर्वविद्यानां गुणानामुपसंहृतिः ।कार्यैव ब्रह्मणि परे नात्र कार्या विचारणा’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ | ||
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इति चेत् सत्यम् । उक्तो ह्युपसंहारः । | |||
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तत्प्रमाणमप्यस्त्येव । ‘नाम वा एता ब्रह्मणः सर्वविद्यास्तस्मादेकः सर्वगुणैर्विचिन्त्यः’ इति कौण्डिन्यश्रुतौ ॥ 09 ॥ | |||
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=== प्राप्त्यधिकरणम् === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (375)ओं प्राप्तेश्च समञ्जसम् ओम् ॥ 03-03-10 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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‘गुणैः सर्वैरुपास्योऽसौ ब्रह्मणा परमेश्वरः ।अन्यैर्यथाक्रमं चैव मानुषैः कैश्चिदेव तु’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥ | |||
}} | }} | ||
=== | === सर्वभेदाधिकरणम् === | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (376)ओं सर्वाभेदादन्यत्रेमे ओम् ॥ 03-03-11 ॥ | ||
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‘सम्पूर्णोपासनाद्ब्रह्मा | ‘सम्पूर्णोपासनाद्ब्रह्मा सम्पूर्णानन्दभाग् भवेत् ।इतरे तु यथायोगं सम्यङ् मुक्तौ भवन्ति हि’ इति पाद्मे ॥ 11 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (377)ओम् आनन्दादयः प्रधानस्य ओम् ॥ 03-03-12 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
सर्वेषां मुमुक्षूणां कियन्नियमेनोपास्यमिति आह- | सर्वेषां मुमुक्षूणां कियन्नियमेनोपास्यमिति अत आह- | ||
}} | }} | ||
| Line 396: | Line 351: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (378)ओं प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ओम् ॥ 03-03-13 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 418: | Line 373: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नैव सर्वगुणाः सर्वैरुपास्या मुक्तिभेदतः ।विरिञ्चस्यैव यन्मुक्तावानन्दस्य सुपूर्णता’ इति हि वाराहे ॥ 13 ॥ | ‘नैव सर्वगुणाः सर्वैरुपास्या मुक्तिभेदतः ।विरिञ्चस्यैव यन्मुक्तावानन्दस्य सुपूर्णता’ इति (हि) वाराहे ॥ 13 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 428: | Line 383: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (379)ओम् इतरे त्वर्थसामान्यात् ओम् ॥ 03-03-14 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 446: | Line 394: | ||
}} | }} | ||
=== | === आध्यानाधिकरणम् === | ||
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| Line 453: | Line 401: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (380)ओम् आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ओम् ॥ 03-03-15 ॥ | ||
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| Line 475: | Line 423: | ||
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‘ज्ञानार्थमथ ध्यानार्थं गुणानां | ‘ज्ञानार्थमथ ध्यानार्थं गुणानां समुदीरणा ।ज्ञातव्याश्चैव ध्यातव्या गुणाः सर्वेऽप्यतो हरेः ॥नान्यत् प्रयोजनं ज्ञानात् ध्यानात् कर्मकृतेरपि ।श्रवणाच्चाथ पाठाद्वा विद्याभिः कञ्चिदिष्यते’ इति परमसंहितायाम् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C03_S03_V15 | | verse_id = BS_C03_S03_V15 | ||
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| text = | | text = | ||
‘गुणाः सर्वेऽपि वेत्तव्या ध्यातव्याश्च न संशयः ।नान्यत् प्रयोजनं मुख्यं गुणानां कथने भवेत्’() ॥ | |||
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| id = BS_C03_S03_V15_B8 | |||
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ज्ञानाध्यानसमायोगाद्गुणानां सर्वशः फलम् ।मुख्यं भवेन्न चान्येन फलं मुख्यं क्वचिद्भवेत्’इति | ज्ञानाध्यानसमायोगाद्गुणानां सर्वशः फलम् ।मुख्यं भवेन्न चान्येन फलं मुख्यं क्वचिद्भवेत्’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 15 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 506: | Line 445: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (381)ओम् आत्मशब्दाच्च ओम् ॥ 03-03-16 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 521: | Line 453: | ||
| id = BS_C03_S03_V16_B10 | | id = BS_C03_S03_V16_B10 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यनुपसंहारप्रमाणम् ॥ 16 ॥ | ‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.६.४.७) इत्यनुपसंहारप्रमाणम् ॥ 16 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 531: | Line 463: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (382)ओम् आत्मगृहीतिरितवदुत्तरात् ओम् ॥ 17-382 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 546: | Line 471: | ||
| id = BS_C03_S03_V17_B1 | | id = BS_C03_S03_V17_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न | न च ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’(ब्र.सू.३.३.१२) इत्युक्तिविरोधः । यतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’(तै.उ.२.१)।‘विज्ञानमानन्दम् ब्रह्म’() इतिवदेवात्मशब्दगृहीतिः । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C03_S03_V17 | | verse_id = BS_C03_S03_V17 | ||
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‘अत्र ह्येते सर्व एकीभवन्ति’(बृ.उ.३.४.७) इत्युत्तरात् ।‘आनन्दानुभवत्त्वाच्च निर्दोषत्वाच्च भण्यते ।नित्यत्वाच्च तथाऽऽत्मेति वेदवादिभिरीश्वरः’ इति (हि) बृहत्तन्त्रे ॥ 17 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 563: | Line 488: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (383)ओम् अन्वयादिति चेत् स्यादवधारणात् ओम् ॥ 03-03-18 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 569: | Line 494: | ||
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सर्वगुणानामान्वय आत्म शब्दे भवति । ‘आप्तव्याप्तेरात्मशब्दः परमस्य प्रयुज्यते’() इति वचनादिति चेत्, | |||
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सत्यम् । स्याच्च्यैवम् । ‘आत्मेत्येव’(बृ.उ.३.४.७) इत्यवधारणात् । अन्यथा सर्वोपसंहारवचनविरोधात् ॥ 18 ॥ | |||
}} | }} | ||
=== | === कार्याख्यानाधिकरणम् === | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (384)ओं कार्याख्यानादपूर्वम् ओम् ॥ 03-03-19 ॥ | ||
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| Line 603: | Line 521: | ||
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‘अलौकिकास्तस्य गुणा ह्युपास्य अलौकिकं मुक्तिकार्यं यतोऽस्य’ | ‘अलौकिकास्तस्य गुणा ह्युपास्य अलौकिकं मुक्तिकार्यं यतोऽस्य’()इति कार्याख्यानादन्यत्रादृष्टा एव गुणा उपास्याः ॥ 19 ॥ | ||
इति कार्याख्यानादन्यत्रादृष्टा एव गुणा उपास्याः ॥ 19 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (385)ओं समान एवं चाभेदात् ओम् ॥ 03-03-20 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (386)ओं सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ओम् ॥ 03-03-21 ॥ | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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परमात्मसम्बन्धित्वेन नित्यत्वात् त्रिविक्रमत्वादिष्वप्युपसंहार्यत्वं युज्यते। | |||
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‘गुणास्त्रैविक्रमाद्याश्च संहर्तव्या न संशयः ।विरिञ्चस्यैव नान्येषां स हि सर्वगुणाधिकः’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 21 ॥ | |||
‘गुणास्त्रैविक्रमाद्याश्च संहर्तव्या न संशयः ।विरिञ्चस्यैव नान्येषां स हि सर्वगुणाधिकः’ इति | |||
}} | }} | ||
| Line 662: | Line 572: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (387)ओं न वा विशेषात् ओम् ॥ 03-03-22 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
न | न वाऽऽत्मशब्देन सर्वगुणगृहीतिः । अधिकारिविशेषात् ॥ 22 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 678: | Line 588: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (388)ओं दर्शयति च ओम् ॥ 03-03-23 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 686: | Line 596: | ||
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| text = | | text = | ||
॥ इति विशेषणाधिकरणम् | ॥ इति नवाधिकरणम् (विशेषणाधिकरणम्) ॥ 13 ॥ | ||
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| Line 703: | Line 613: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (389)ओं सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ओम् ॥ 03-03-24 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 725: | Line 628: | ||
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| text = | | text = | ||
‘देवादीनामुपास्यास्तु भृतिव्याप्त्यादयो गुणाः ।आनन्दाद्यास्तु सर्वेषामन्यथाऽनर्थकृद्भवेत्’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 24 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (390)ओं पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ओम् ॥ 03-03-25 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 743: | Line 646: | ||
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| text = | | text = | ||
यस्यां विद्यायां महागुणा उच्यन्ते सोत्तमानामितराऽन्येषामिति | यस्यां विद्यायां महागुणा उच्यन्ते सोत्तमानामितराऽन्येषामिति चेत्, न – | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (391)ओं वेधाद्यर्थभेदात् ओम् ॥ 03-03-26 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘भिन्धि | ‘भिन्धि विद्ध्यश्रुणीहीति फलभेदेन सर्वशः ।यत्यादीनां तेष्वयोगान्नाधिकार्येकता भवेत् ।अयोग्योपासनादीयुरनर्थं चार्थनाशनम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ | ||
}} | }} | ||
=== मुक्तोपासनाधिकरणम् | === (मुक्तोपासनाधिकरणम्) हान्यधिकरणम् === | ||
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| Line 799: | Line 688: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (392)ओं हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-27॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 807: | Line 696: | ||
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| text = | | text = | ||
मुक्तस्योपासना कर्तव्या न | मुक्तस्योपासना कर्तव्या न वा ? इत्यतोऽब्रवीत् – | ||
}} | }} | ||
| Line 814: | Line 703: | ||
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| text = | | text = | ||
नियतस्वाध्यायानन्तरं स्वेच्छया कुशाग्रहणस्तुत्युपगानवदेव मोक्ष उपासनादिः | नियतस्वाध्यायानन्तरं स्वेच्छया कुशाग्रहणस्तुत्युपगानवदेव मोक्ष उपासनादिः ।‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१.१) इति मोक्षवाक्यशेषत्वादितरेषाम् ॥ तच्चोक्तम् ‘एतत् सामगायन्नास्ते’(तै.उ.३.१०) इत्यादि । | ||
}} | }} | ||
| Line 823: | Line 710: | ||
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| text = | | text = | ||
‘मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरेः | ब्रह्मतर्के च- | ||
‘मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरेः ।नियमानन्तरं विप्राः कुशाद्यैरप्यधीयते’ इति ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 831: | Line 718: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कृष्णो | ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’ इति च भारते ॥ 27 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 839: | Line 726: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (393)ओं साम्पराये तर्तव्याभावात् तथा ह्यन्ये ओम् ॥ 03-03-28 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 845: | Line 732: | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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स्वेच्छयैवेत्यङ्गीकर्तव्यम् । मुक्तस्य तीर्णत्वात् ।‘तीर्णो हि तदा सर्वान् शोकान् हृदयस्य भवति’(बृ.उ.३.३.२२) इति ह्यन्ये पठन्ति । | |||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘स्थितप्रज्ञत्वमाप्ता ये ज्ञानेन परमात्मनः ।ब्रह्मलोकं गताः सर्वे ब्रह्मणा च परं गताः ।तीर्णतर्तव्यभागाश्च स्वेच्छयोपासते परम्’() इति ॥ 28 ॥ | |||
}} | }} | ||
=== छन्दाधिकरणम् === | |||
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कर्मापि कुर्वन्ति न | कर्मापि कुर्वन्ति न वा ? इत्यत आह – | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (395)ओं गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ओम् ॥ 03-03-30 ॥ | ||
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‘कदाचित् कर्म कुर्वन्ति कदाचिन्नैव कुर्वते | ‘कदाचित् कर्म कुर्वन्ति कदाचिन्नैव कुर्वते ।नित्यज्ञानस्वरूपत्वान्नित्यं ध्यायन्ति केशवम्’() ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (396)ओम् उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ओम् ॥ 03-03-31 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (397)ओम् अनियमः सर्वेषामविरोधाच्छब्दानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 03-03-32 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
प्राप्तज्ञानानामपि केषाञ्चिन्मुक्तिप्राप्तिः केषाञ्चिन्न, यथोपसंहारनियम इति न मन्तव्यम् | प्राप्तज्ञानानामपि केषाञ्चिन्मुक्तिप्राप्तिः केषाञ्चिन्न, यथोपसंहारनियम इति न मन्तव्यम् ।‘सर्वेगुणा ब्रह्मणैव ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः’() इत्युपसंहारविरोधादन्यत्राविरोधात् । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘न कश्चिद्ब्रह्मवित् | ‘न कश्चिद्ब्रह्मवित् सृतिमनुभवति मुक्तो ह्येव भवति तस्मादाहुः सृतिहेति’() इति कौण्डन्यश्रुतेश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,005: | Line 854: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (398)ओं यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ओम् ॥ 03-03-33 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,020: | Line 869: | ||
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‘ज्ञानं चोपासनं चैव मुक्तावानन्द एव च ।यथाधिकारं देवानां भवन्त्येवोत्तरोत्तरम्’ इति ॥ 33 ॥ | |||
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‘नानाविधा जीवसङ्घा विमुक्तौन चैव तेषां ब्रह्मधियां विरोधः।दोषाभावाद्गुरुशिष्यादिभावाल्लोकेऽपि नासौ किमु तेषां विमुक्तेः’ इति ॥ 34 ॥ | |||
‘नानाविधा जीवसङ्घा विमुक्तौन चैव तेषां ब्रह्मधियां | |||
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नामाध्यारभ्य प्राणान्तमुत्तरोत्तरमुत्तमत्वमुक्तम्। न प्राणात् | नामाध्यारभ्य प्राणान्तमुत्तरोत्तरमुत्तमत्वमुक्तम्। न प्राणात् किञ्चिद् भूय उक्तम् । तथाऽपि पूर्ववत् स्यात् इति(स्यादपीति) न वाच्यम् । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (401)ओम् अन्तरा भूतग्रामवदिति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-36 ॥ | ||
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यथा भूतग्राम एकस्मादेक उत्तमोऽस्त्येव, एवं प्राणादपि परमात्मानमन्तरा विद्यत इति | यथा भूतग्राम एकस्मादेक उत्तमोऽस्त्येव, एवं प्राणादपि परमात्मानमन्तरा विद्यत इति चेत्, | ||
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न। प्राणादुत्तमाभावे प्रमाणमुक्तम् । अन्यत्रोत्तमाभावे न प्रमाणम्। दृष्यते चान्यत्रोत्तमत्वम् ॥ 36 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (402)ओम् अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशवत् ओम् ॥ 03-03-37 ॥ | ||
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प्राणस्य सर्वोत्तमत्वे परमात्मना भेदानुपपत्तिरिति चेत्, | |||
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न। श्रुत्युपदिष्टवदुपपत्तेः । अन्येभ्यः प्राणस्योत्तमत्वं तस्मात् परमात्मनो ह्युपदिष्टम् ॥ 37 ॥ | |||
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नेति | नेति चेत्, न- | ||
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उक्तं प्राणात् परमात्मन उत्तमत्वं पूर्वोक्ताध्याहारेण‘एष तु वा अतिवदति’(छां.उ.७.१६) इति विशिंषन्ति हि । यथेतरेषु विशेषणम् । | |||
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‘उत्तमत्वं हि देवानां मुक्तावपि हि मानवात् ।तेभ्यः प्राणस्य तस्माच्च नित्यमुक्तस्य वै हरेः’ ॥इति च बृहत्तन्त्रे ॥ 38 ॥ | |||
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=== सत्याद्यधिकरणम् === | |||
=== सत्याद्यधिकरणम् === | |||
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कृतिर्निष्ठा ज्ञानमित्यादीनां भेदाद्बहव उत्तमा इति | कृतिर्निष्ठा ज्ञानमित्यादीनां भेदाद्बहव उत्तमा इति चेत्, न – | ||
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‘नामादिप्राणपर्यन्ताद्योहि सत्यादिरूपवान् ।तस्मै नमो भगवते विष्णवे सर्वजिष्णवे’ इति ॥ | |||
‘नामादिप्राणपर्यन्ताद्योहि सत्यादिरूपवान् | |||
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‘सत्याद्या | ‘सत्याद्या अहमात्मान्ताः यद्गुणाः समुदीरिताः ।तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते’इति चाध्यात्मे ॥ 39 ॥ | ||
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प्रकृतेरपि जन्मादेः संसारप्राप्तेः किमिति नामादिष्वपाठ | प्रकृतेरपि जन्मादेः संसारप्राप्तेः किमिति नामादिष्वपाठ इति अत्रोच्यते- | ||
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स्वेच्छयैव मूलस्थाने | स्वेच्छयैव मूलस्थाने स्थिताऽन्यत्र चावतारान् करोतीश्वरेच्छानुसारेण ।‘सर्वायतना सर्वकाला सर्वेच्छा सर्वज्ञा सर्वावस्था न बद्धा बन्धिका सैषा प्रकृतिविकृतिः’ इति वत्सश्रुतेः । | ||
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| Line 1,263: | Line 1,066: | ||
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‘नामादयस्तु बद्धत्वान्मोचकत्वात् परोऽपि च | ‘नामादयस्तु बद्धत्वान्मोचकत्वात् परोऽपि च ।उभयोरप्यभावेन यथाऽव्यक्तं न तूदितम् ॥श्रुतौ तथा जीवपरावुच्येते किञ्चिनेतरत् ।नोच्यते च तदा तत्त्वद्वयं वै समुदाहृतम्’इति ब्रह्मतर्के ॥ 40 ॥ | ||
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| Line 1,279: | Line 1,074: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (406)ओम् आदरादलोपः ओम् ॥ 03-03-41 ॥ | ||
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| Line 1,294: | Line 1,089: | ||
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‘यथा श्रीर्नित्यमुक्ताऽपि | ‘यथा श्रीर्नित्यमुक्ताऽपि प्राप्तकामाऽपि सर्वदा ।उपास्ते नित्यशो विष्णमेवं भक्तो हरेर्भवेत्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 41 ॥ | ||
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| Line 1,302: | Line 1,097: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (407)ओम् उपस्थितेस्तद्वचनात् ओम् ॥ 03-03-42 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,327: | Line 1,115: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (408)ओं तन्निर्धारणार्थनियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः पलम् ओं॥ 03-03-43 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,335: | Line 1,123: | ||
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| text = | | text = | ||
दर्शनार्थं ह्युपासनम् । तच्च श्रवणादेरेव भवति । अतः | दर्शनार्थं ह्युपासनम् । तच्च श्रवणादेरेव भवति । अतः किमर्थमिति अत्रोच्यते– | ||
}} | }} | ||
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तत्त्वनिश्चयो वेदार्थनियमश्च ब्रह्मदृष्टेः पृथगेव । | |||
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हिशब्देन ‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य’(बृ.उ.४.४.५) इति श्रुतिं सूचयति । | |||
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‘श्रुत्वा मत्वा तथा ध्यात्वा तदज्ञानविपर्ययौ | श्रवणादिफलं चाज्ञानविपर्ययादिदर्शनप्रतिबन्धनिवृत्तिः । | ||
ब्रह्मतर्के च – | |||
‘श्रुत्वा मत्वा तथा ध्यात्वा तदज्ञानविपर्ययौ ।संशयं च पराणुद्य लभते ब्रह्मदर्शनम्’() इति ॥ 43 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (409)ओं प्रदानवदेव हि तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-44 ॥ | ||
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न च श्रवणादिमात्रेण ब्रह्मदृष्टिर्भवति, किन्तु सेतिकर्तव्येन । यथा गुरुदत्तं तथैव | न च श्रवणादिमात्रेण ब्रह्मदृष्टिर्भवति, किन्तु सेतिकर्तव्येन । यथा गुरुदत्तं तथैव भवति।‘आचार्यवान् पुरुषो वेद’(छां.उ.६.१४.२) इति ह्युक्तम् ॥ 44 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,393: | Line 1,174: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (410)ओं लिङ्गभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि ओम् ॥ 03-03-45 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,402: | Line 1,183: | ||
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गुरुप्रसादः स्वप्रयत्नो वा बलवानिति निगद्यते- | गुरुप्रसादः स्वप्रयत्नो वा बलवानिति निगद्यते- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,415: | Line 1,189: | ||
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ऋषभादिभ्यो विद्यां ज्ञात्वाऽपि | ऋषभादिभ्यो विद्यां ज्ञात्वाऽपि सत्यकामेन‘भगवांस्त्वेव मे कामं ब्रूयात्’(छां.उ.४.९.२), श्रुतं ह्येव भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्ध्वेव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति’(छां.उ.४.९.३) इति वचनात् ।‘अत्र ह न किञ्चन वीयाय’(छां.उ.४.९.३) इत्यनुज्ञानादुपकोसलवचनाच्च लिङ्गभूयस्त्वाद्गुरुप्रसाद एव बलवान्(गुरुप्रदानमेव बलवत्) । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,423: | Line 1,196: | ||
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‘गुरुप्रसादो बलवान्न तस्माद्बलवत्तरम् | तर्हि तावताऽलमिति न मन्तव्यम् ।‘श्रोतव्यो मन्तव्यः’(बृ.उ.४.४.५) इत्यादेस्तदपि कर्तव्यम् । | ||
वाराहे च – | |||
‘गुरुप्रसादो बलवान्न तस्माद्बलवत्तरम् ।तथाऽपि श्रवणादिश्च कर्तव्यो मोक्षसिद्धये’() इति ॥ 45 ॥ | |||
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| Line 1,434: | Line 1,208: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (411)ओं पूर्वविकल्पः प्रकरणात् स्यात् क्रियामानसवत् ओम् ॥ 03-03-46 ॥ | ||
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| Line 1,442: | Line 1,216: | ||
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न च पूर्वप्राप्त एव गुरुरिति नियमः । समग्रानुग्रहं चेत् पश्चात्तनः करोति स्वयमेव तदा विकल्पः स्यात् | न च पूर्वप्राप्त एव गुरुरिति नियमः । समग्रानुग्रहं चेत् पश्चात्तनः करोति स्वयमेव तदा विकल्पः स्यात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,449: | Line 1,223: | ||
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मानसक्रियावत्, यथोभयोर्ध्यानयोः समयोः ।‘पूर्वस्मादुत्तमो लब्धः स्वयमेव गुरुर्यदि ।गृह्णीयादविचारेण विकल्पः समयोर्भवेत्’ ॥ | |||
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समग्रानुग्रहाभावात् सत्यकामः स्वकं गुरुम् ।ऋषभाद्यनुज्ञया चैष प्राप तस्माद्धि युज्यते’इति बृहत्तन्त्रे ॥ | समग्रानुग्रहाभावात् सत्यकामः स्वकं गुरुम् ।ऋषभाद्यनुज्ञया चैष प्राप तस्माद्धि युज्यते’इति बृहत्तन्त्रे ॥ | ||
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‘समग्रानुग्रहं कश्चित् स्वयमेव समो यदि | ‘समग्रानुग्रहं कश्चित् स्वयमेव समो यदि ।कुर्यात् पुनश्च गृह्णीयादविरोधेन कामतः ॥ध्यानयोः समयोर्यद्वद्विकल्पः कामतो भवेत् ।एवं गुरोर्द्वितीयस्य विकल्पो ग्रहणेऽपि च’इति महासंहितायाम् ॥ 46 ॥ | ||
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‘ब्रह्मोपास्त्व बह्मोपचरस्व तच्छ्रुणु हि तत्त्वामवतु । या ब्रह्मोपचरेर्यथा मामुपचरेर्ये चान्येऽस्मद्विधाः श्रेयसश्च तानुपास्व तानुपचरस्व तेभ्यः शृणु हि ते त्वामवन्तु’ इति | ‘ब्रह्मोपास्त्व बह्मोपचरस्व तच्छ्रुणु हि तत्त्वामवतु । या ब्रह्मोपचरेर्यथा मामुपचरेर्ये चान्येऽस्मद्विधाः श्रेयसश्च तानुपास्व तानुपचरस्व तेभ्यः शृणु हि ते त्वामवन्तु’ इति पौष्यायणश्रुतावतिदेशाच्च॥ 47 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (413)ओं विद्यैव तु निर्धारणात् ओम् ॥ 03-03-48 ॥ | ||
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न | न च‘कर्मण्यैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’(भ.गी.३.२०)इत्यादिनाऽन्यन्मोक्षसाधनम् । | ||
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| text = | | text = | ||
‘तमेवं विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय’ इति | ‘तमेवं विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय’(श्वे.उ.३.८) इति निर्धारणाद् विद्ययैव मोक्षः ॥ 48 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,528: | Line 1,286: | ||
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| Line 1,550: | Line 1,301: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सर्वान् परो माययाऽयं सिनीते दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’ इति कौशिकश्रुतेः ॥ 49 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (415)ओं श्रुत्यादिबलीयास्त्वाच्च न बाधः ओम् ॥ 03-03-50 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
सावधारणा बलवति श्रुतिः । | सावधारणा बलवति श्रुतिः ।‘इन्द्रोऽश्वमेधांश्चतमिष्ट्वाऽपि राजा ब्रह्माणमीढ्यं समुवाचोपसन्नः॥न कर्मभिर्न धनैर्नैव चान्यैः पश्येत् सुखं तेन तत्त्वं ब्रवीहि’इति बलवल्लिङ्गम् ॥‘नास्त्यकृतः कृतेन’(मुं.उ.१.२.१२) इत्युपपत्तिश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,582: | Line 1,326: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः’इति युक्तिमद्बगवद्वचनम् ॥ | |||
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न | अतो न प्रमाणान्तरबाधः ।‘कर्मण्यैव’(भ.गी.३.२०) इत्ययोगव्यवच्छेदः ॥ 50 ॥ | ||
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=== अनुबन्धाद्यधिकरणम् === | |||
=== अनुबन्धाद्यधिकरणम् === | |||
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न केवलं श्रवणादिभिर्गुरुप्रसादेन च ब्रह्मदर्शनम् । | न केवलं श्रवणादिभिर्गुरुप्रसादेन च ब्रह्मदर्शनम् । किन्तु भक्त्यादिभिश्च । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वज्ञो विष्णुतत्परः ।यद्गुरुः सुप्रसन्नः सन् दद्यात् तन्नान्यथा भवेत् ॥तथाऽप्यनादिसंसिद्धो भक्त्यादिगुणपूगतः । | |||
लभेद्गुरुप्रसादं च तस्मादेव च तद्भवेत्’() इति ॥ | |||
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| text = | | text = | ||
‘भक्तिर्विष्णौ गुरौ चैव गुरोर्नित्यप्रसन्नताम् ।दद्याच्छमदमादिं च तेन चैते गुणाः पुनः ॥तैः सर्वैर्दर्शनं विष्णोः श्रवणादिकृतं भवेत्’ ॥इति नारायणतन्त्रे ॥ 51 ॥ | |||
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=== दर्शनभेधादिकरणम् (प्रज्ञान्तराधिकरणम्) === | |||
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}} | }} | ||
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उपासनाभेदवद्दर्शनभेदः । तच्चोक्तं कमठश्रुतौ | उपासनाभेदवद्दर्शनभेदः । तच्चोक्तं कमठश्रुतौ –‘अन्तर्दृष्टयो बहिर्दृष्टयोऽवतारदृष्टयः सर्वदृष्टय इति । देवावाव सर्वदृष्टयस्तेषु चोत्तरोत्तरमाब्रह्मणोऽन्येषु तु यथायोगं यथा ह्याचार्या आचक्षते’ इति । | ||
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| text = | | text = | ||
‘दृष्ट्वैव ह्यवताराणां मुच्यन्ते केचिदञ्जसा | आध्यात्मे च – | ||
‘दृष्ट्वैव ह्यवताराणां मुच्यन्ते केचिदञ्जसा ।दर्शनेनान्तरेणान्ये देवाः सर्वत्र दर्शनात् ॥तेषां विशेषमाचार्यो वेत्ति सर्वज्ञतां गतः’ इति ॥ 52 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (418)ओं न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ओम् ॥ 03-03-53 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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‘सामान्यदर्शनाल्लोका मुक्तिर्योग्यात्मदर्शनात्’इति हि | ‘सामान्यदर्शनाल्लोका मुक्तिर्योग्यात्मदर्शनात्’इति हि नारायणतन्त्रे॥‘मुच्यते नात्र सन्देहो दृष्ट्वा तु स्वात्मयोग्यया’ इति च ॥‘दर्शनेनात्मयोग्येन मुक्तिर्नान्येन केनचित्’ इति चाध्यात्मे ॥ 53 ॥ | ||
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=== ताद्विध्याधिकरणम् (परेणाधिकरणम्) === | |||
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‘भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी’ इति माठरश्रुतेर्न परमात्मना दर्शनमिति | ‘भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी’() इति माठरश्रुतेर्न परमात्मना दर्शनमिति चेत्, न ।‘तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम’(मुं.उ.३.२.४) इति श्रुतेः । | ||
कथं तर्ह्येषा श्रुतिः – | कथं तर्ह्येषा श्रुतिः – | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
परमात्मैवं भक्त्या दर्शनं प्राप्य मुक्तिं | परमात्मैवं भक्त्या दर्शनं प्राप्य मुक्तिं ददाति । प्रधानसाधनत्वाद्भक्तिः करणत्वेनोच्यते। | ||
}} | }} | ||
| Line 1,797: | Line 1,451: | ||
| text = | | text = | ||
मायावैभवे च | मायावैभवे च | ||
‘भक्तिस्थः परमो विष्णुस्तयैवैनं वशं नयेत् ।तयैव दर्शनं यातः प्रदद्यान्मुक्तिमेतया ॥स्नेहानुबन्धो यस्तस्मिन् बहुमानपुरस्सरः ।भक्तिरित्युच्यते सैव करणं परमीशितुः’॥इति सर्वशब्दानां ब्रह्मणि प्रवृत्तेश्च ॥ 54 ॥ | |||
‘भक्तिस्थः परमो विष्णुस्तयैवैनं वशं नयेत् | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (420)ओम् एक आत्मनः शरीरे भावात् ओम् ॥ 03-03-55 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (421)ओं व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ओम् ॥ 03-03-56 ॥ | ||
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परमसंहितायां च – | परमसंहितायां च – | ||
‘अंशिनस्तु पृथग्जाता अंशास्तस्यैव कर्मणा ।पुनरैक्यं प्रपद्यन्ते नात्र कार्य विचारणा’ इति ॥ 56 ॥ | |||
‘अंशिनस्तु पृथग्जाता अंशास्तस्यैव कर्मणा | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (422)ओम् अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ओम् ॥ 03-03-57 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (423)ओं मन्त्रादिवद् वाऽविरोधः ओम् ॥ 03-03-58 ॥ | ||
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सर्वदेवतामन्त्रा | सर्वदेवतामन्त्रा यथाऽधीयन्ते, एवमविरोधो वा । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (424)ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम् ॥ 03-03-59 ॥ | ||
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सर्वगुणेषु भूमगुणस्य ज्यायस्त्वं क्रतुवत् । सर्वत्र सहभावात् | सर्वगुणेषु भूमगुणस्य ज्यायस्त्वं क्रतुवत् । सर्वत्र सहभावात् दीक्षाप्रायणीयोदयनीयसवनत्रयावभृथात्मकः क्रतुः ।‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते । तस्माद्भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टःइति च गौपवनश्रुतिः ॥ 59 ॥ | ||
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=== नानाशब्दाधिकरणम् === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (425)ओं नाना शब्दादिभेदात् ओम् ॥ 03-03-60 ॥ | ||
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‘शब्दोऽनुमा तथैवाक्षो योग्यताभेदतः सदा | ‘शब्दोऽनुमा तथैवाक्षो योग्यताभेदतः सदा ।ब्रह्मादीनामेकमर्थं बहुधा दर्शयन्ति हि ॥अतः पूर्णत्वमीशस्य वानैवैषां प्रदृश्यते ।अतः फलस्य नानात्वं नानैवोपासनं यतः’ इति ब्रह्मतर्के । | ||
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अतो भूमत्वमपि नानैवोपास्यते ॥ 60 ॥ | |||
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=== विकल्पाधिकरणम् === | |||
=== विकल्पाधिकरणम् === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (427)ओं काम्यास्तुयथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ओम् ॥ 03-03-62-427 ॥ | ||
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‘यस्य यस्य हि यः कामस्तस्य तस्य ह्युपासनम् | ‘यस्य यस्य हि यः कामस्तस्य तस्य ह्युपासनम् ।तादृशानां गुणानां च समाहारं प्रकल्पयेत् ॥अकामत्वान्मुमुक्षूणां न वा तेषामुपासनम् ।तुष्ट्यर्थमीश्वरस्यैव न चोपास विदुष्यति’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 62 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (428)ओम् अङ्गेषु यथाऽऽश्रयाभावः ओम् ॥ 03-03-63 ॥ | ||
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अङ्गदेवतानां यथा यथा | अङ्गदेवतानां यथा यथा परमेश्वराङ्गाश्रयत्वं‘चक्षोः सूर्यो अजायत’(ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादि तथा भावना कर्तव्या॥63॥ | ||
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‘अङ्गैः पराद्ये हि देवा विसृष्टास्तत्तद्गुणान् परमे | ‘अङ्गैः पराद्ये हि देवा विसृष्टास्तत्तद्गुणान् परमे संहरेत।तांश्चापि तत्रैव विचिन्त्य देवान् स्थानं मुमुक्षुः परमं व्रजेत’ ॥ | ||
इति काषायणश्रुतौ समाहारवचनाच्च ॥ 65 ॥ | इति काषायणश्रुतौ समाहारवचनाच्च ॥ 65 ॥ | ||
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‘सत्यो ज्ञानः परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते’॥ इति कमठश्रुतौ ॥ 68 ॥ | |||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 03-03 ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 03-03 ॥ | ||
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