Yamakabharatam: Difference between revisions
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ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् । | | verse_line2 = उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥ | ||
उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥ | |||
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यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् । | | verse_line2 = यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥ | ||
यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥ | |||
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यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् । | | verse_line2 = यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥ | ||
यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥ | |||
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परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः । | | verse_line2 = मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥ | ||
मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥ | |||
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सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते । | | verse_line2 = अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥ | ||
अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥ | |||
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नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) । | | verse_line2 = तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥ | ||
तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥ | |||
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ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् । | | verse_line2 = तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥ | ||
तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥ | |||
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अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली । | | verse_line2 = अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥ | ||
अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥ | |||
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मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् । | | verse_line2 = नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥ | ||
नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥ | |||
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तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् । | | verse_line2 = अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥ | ||
अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥ | |||
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तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा । | | verse_line2 = यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥ | ||
यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥ | |||
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तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः । | | verse_line2 = हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥ | ||
हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥ | |||
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सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् । | | verse_line2 = अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥ | ||
अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥ | |||
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तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) । | | verse_line2 = जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥ | ||
जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥ | |||
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अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम् । | | verse_line2 = अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥ | ||
अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥ | |||
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चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् । | | verse_line2 = तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥ | ||
तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥ | |||
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अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् । | | verse_line2 = तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥ | ||
तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥ | |||
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अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) । | | verse_line2 = सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥ | ||
सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥ | |||
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सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के । | | verse_line2 = अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥ | ||
अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥ | |||
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हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् । | | verse_line2 = व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥ | ||
व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥ | |||
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गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता । | | verse_line2 = शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥ | ||
शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥ | |||
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रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा। | | verse_line2 = पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥ | ||
पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥ | |||
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अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः । | | verse_line2 = भङ्क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥ | ||
भङ्क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥ | |||
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मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् । | | verse_line2 = हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥ | ||
हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥ | |||
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प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) । | | verse_line2 = गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥ | ||
गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥ | |||
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जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् । | | verse_line2 = अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥ | ||
अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥ | |||
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प्रसभं सगजबलस्य क्षत्रस्योच्चैः समगधराजबलस्य । | | verse_line2 = मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥ | ||
मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥ | |||
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हंसो (डिभि)डिभकश्चपलावमुना संसूदितौ यवनकश्च पला । | | verse_line2 = कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥ | ||
कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥ | |||
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सत्याजाम्बवतीर्या भार्या विन्दाद्या भानुसाम्बवतीर्याः । | | verse_line2 = प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥ | ||
प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥ | |||
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यत्परिवारतयेशा जाता देवा नृपात्मजा रतयेशाः । | | verse_line2 = यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥ | ||
यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥ | |||
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येन हिडिम्बबकाद्या रक्षोधीशा निपातिता बबकाद्याः । | | verse_line2 = भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥ | ||
भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥ | |||
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अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् । | | verse_line2 = द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥ | ||
द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥ | |||
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तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् । | | verse_line2 = स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥ | ||
स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥ | |||
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वालिवधानुनयाय प्रणयी सख्यं सुसन्दधे नु नयाय । | | verse_line2 = वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥ | ||
वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥ | |||
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मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै) । | | verse_line2 = अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥ | ||
अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥ | |||
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नीतो दिवि देववरै रेमे सत्यासमन्वितोऽदेववरैः । | | verse_line2 = सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥ | ||
सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् । | ||
सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् । | | verse_line2 = सुरवरवीरेषु दरी प्रधानजीवेश्वरः परेषुदरी ॥३७॥ | ||
सुरवरवीरेषु दरी प्रधानजीवेश्वरः परेषुदरी ॥३७॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = पुरमभियायारिदरी दत्वा भद्रां पृथासुतायारिदरी । | ||
पुरमभियायारिदरी दत्वा भद्रां पृथासुतायारिदरी । | | verse_line2 = शक्रपुरीमभियातः प्रादाद् वह्नेर्वनं सतामभियातः ॥३९॥ | ||
शक्रपुरीमभियातः प्रादाद् वह्नेर्वनं सतामभियातः ॥३९॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) । | ||
शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) । | | verse_line2 = तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥ | ||
तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥ | |||
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यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः । | | verse_line2 = जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥ | ||
जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम् । | ||
अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम् । | | verse_line2 = पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥ | ||
पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) । | ||
निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) । | | verse_line2 = अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥ | ||
अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः । | ||
असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः । | | verse_line2 = क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥ | ||
क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥ | |||
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यस्यावेशोरुबलान्न्यहनत् पार्थोऽसुरान् प्रजेशोरुबलान्(त्) । | | verse_line2 = वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥ | ||
वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥ | |||
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यस्यावेशात् स बलः प्रचकर्ष पुरं प्रसह्य वेशात् सबलः । | | verse_line2 = कुरुपतिनाम नु यमुना कृष्टा(कृष्णा) येनाहुरर्ह्यमतनु(येनाहुरर्घ्यमतनु) यमुना ॥४५॥ | ||
कुरुपतिनाम नु यमुना कृष्टा(कृष्णा) येनाहुरर्ह्यमतनु(येनाहुरर्घ्यमतनु) यमुना ॥४५॥ | |||
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यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान् । | | verse_line2 = लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥ | ||
लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥ | |||
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यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्) । | | verse_line2 = धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥ | ||
धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् । | ||
न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् । | | verse_line2 = नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥ | ||
नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥ | |||
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क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता । | | verse_line2 = सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥ | ||
सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥ | |||
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यद्भक्तप्रवरेण प्रोतः स्वस्मिन् स कीचकः प्रवरेण । | | verse_line2 = पतितास्तस्य सहायाः कृष्णार्थे मानिनः समस्य सहायाः ॥५०॥ | ||
पतितास्तस्य सहायाः कृष्णार्थे मानिनः समस्य सहायाः ॥५०॥ | |||
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यद्भक्त्याऽनुगृहीतौ पार्थो भीमश्च गोनृपौ नु गृहीतौ(निगृहीतौ)। | | verse_line2 = ऋणमुक्त्यै सुव्यत्यस्त्यै क्रमशो वीरावमुञ्चतां सुव्यत्यस्त्यै ॥५१॥ | ||
ऋणमुक्त्यै सुव्यत्यस्त्यै क्रमशो वीरावमुञ्चतां सुव्यत्यस्त्यै ॥५१॥ | |||
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यद्भक्त्याऽमितयाऽलं कृष्णा कार्ये विवेश कृष्णाकार्ये । | | verse_line2 = यामीरार्द्धतनुत्वान्नापाद् भीमादृतेऽपि नापाद् भीमात् ॥५२॥ | ||
यामीरार्द्धतनुत्वान्नापाद् भीमादृतेऽपि नापाद् भीमात् ॥५२॥ | |||
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यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम् । | | verse_line2 = शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥ | ||
शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥ | |||
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मनसामनसाऽमनसा मनसा यमनन्तमजस्रमवेदनुया । | | verse_line2 = विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥ | ||
विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥ | |||
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सोऽगाद् दूतमुखेन प्रभुणेदं वर्तते यदूतमुखेन । | | verse_line2 = पार्थार्थे बहुतनुतां यत्र प्रकाशयन्(त्) स्वयं सबहुतनुताम् ॥५५॥ | ||
पार्थार्थे बहुतनुतां यत्र प्रकाशयन्(त्) स्वयं सबहुतनुताम् ॥५५॥ | |||
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गुरुकर्णनदीजानवधीच्चक्षुर्बलेन जनदीजादी । | | verse_line2 = शक्त्या निजया परवान् स्वजनानुद्रेचयन्ननन्तयाऽपरवान् ॥५६॥ | ||
शक्त्या निजया परवान् स्वजनानुद्रेचयन्ननन्तयाऽपरवान् ॥५६॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् । | ||
यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् । | | verse_line2 = अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥ | ||
अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः । | ||
येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः । | | verse_line2 = यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥ | ||
यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥ | |||
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यद्भरितो भरताभः प्रभुरम्भाभावितोऽभिभरताभः । | | verse_line2 = भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥ | ||
भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥ | |||
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यदनुग्रहिपूर्णत्वाद्(यदनुग्रहपूर्णत्वाद्) भीमः सर्वानरीननहिपूर्णत्वात् । | | verse_line2 = अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥ | ||
अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥ | |||
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कृष्णाभीमाप्ततमः शीर्णं येन स्वकीयहृदयमाप्ततमः । | | verse_line2 = धृतराष्ट्रसुतानवधीत् भीमेन स्थापितो मनसि सुसुतानवधीत् ॥६१॥ | ||
धृतराष्ट्रसुतानवधीत् भीमेन स्थापितो मनसि सुसुतानवधीत् ॥६१॥ | |||
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भीमविपाटितदेहानदर्शयत्(विपातित/निपातित) स्वानरीन् विपाटितदेहान् । | | verse_line2 = कृष्णाया हितकारी सम्यगीरप्रियः सदाऽहितकारी ॥६२॥ | ||
कृष्णाया हितकारी सम्यगीरप्रियः सदाऽहितकारी ॥६२॥ | |||
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अथ हरिणा पीतबलं द्रौणेरस्त्रं महारिणाऽपीतबलम् । | | verse_line2 = दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥ | ||
दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥ | |||
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तस्य च रक्षा सुकृता जनार्दनेनेशशेषकेक्षासुकृता । | | verse_line2 = पार्थेषु प्रेमवता नित्यं भर्त्रासुतासुविप्रेमवता ॥६४॥ | ||
पार्थेषु प्रेमवता नित्यं भर्त्रासुतासुविप्रेमवता ॥६४॥ | |||
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ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात् । | | verse_line2 = पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥ | ||
पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥ | |||
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पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥ | |||
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तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः । | | verse_line2 = अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥ | ||
अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥ | |||
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सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् । | | verse_line2 = पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥ | ||
पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥ | |||
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रेमे तत्रापिसुखी परमोऽनन्तो ननन्द तत्रापि सुखी । | | verse_line2 = प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥ | ||
प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥ | |||
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एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः । | | verse_line2 = पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥ | ||
पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥ | |||
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राम राम महाबाहो माया ते सुदुरासदा । | | verse_line2 = वाद सादद को लोके पादावेव तवासजेत् ॥७१॥ | ||
वाद सादद को लोके पादावेव तवासजेत् ॥७१॥ | |||
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जेत् सवातव वेदापाऽके लोकोदद सादवा । | | verse_line2 = दासरादुसुतेयामाहोवाहा मम राम रा(राः) ॥७२॥ | ||
दासरादुसुतेयामाहोवाहा मम राम रा(राः) ॥७२॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) । | ||
देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) । | | verse_line2 = तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥ | ||
तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = समस्तदेवजनकवासुदेवपरामृत । | ||
समस्तदेवजनकवासुदेवपरामृत । | | verse_line2 = वासुदेव परामृत ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥७४॥ | ||
वासुदेव परामृत ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥७४॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = देवादे देवऽलोकप पूर्णानन्दमहोदधे । | ||
देवादे देवऽलोकप पूर्णानन्दमहोदधे । | | verse_line2 = सर्वज्ञेश रमानाथ देवाऽदेऽदेऽव लोकप ॥७५॥ | ||
सर्वज्ञेश रमानाथ देवाऽदेऽदेऽव लोकप ॥७५॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = यो निर्ममेऽशेषपुराणविद्यां यो निर्ममेशे षपुराणविद्याम् । | ||
यो निर्ममेऽशेषपुराणविद्यां यो निर्ममेशे षपुराणविद्याम् । | | verse_line2 = योनिर्ममेशेषपुराणविद्यां योऽनिर्ममेशेषपुराणविद्याम् ॥७६॥ | ||
योनिर्ममेशेषपुराणविद्यां योऽनिर्ममेशेषपुराणविद्याम् ॥७६॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अनन्तपारामितविक्रमेश प्रभो रमापारमनन्तपार । | ||
अनन्तपारामितविक्रमेश प्रभो रमापारमनन्तपार । | | verse_line2 = महागुणाढ्यापरिमेयसत्त्व रमालयाशेषमहागुणाढ्य ॥७७॥ | ||
महागुणाढ्यापरिमेयसत्त्व रमालयाशेषमहागुणाढ्य ॥७७॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा । | ||
भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा । | | verse_line2 = भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥ | ||
भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)। | ||
नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)। | | verse_line2 = सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥ | ||
सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता । | ||
कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता । | | verse_line2 = भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥ | ||
भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा । | ||
इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा । | | verse_line2 = पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥ | ||
पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥ | |||
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