Yamakabharatam: Difference between revisions

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<div class="gr-doc-title">यमकभारतम्</div>
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| verse_line1 = ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् ।
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| verse_line2 = उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥
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| verse_line1 = यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् ।
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| verse_line2 = यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥
यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥
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| verse_line1 = यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् ।
यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् ।
| verse_line2 = यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥
यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥
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| verse_line1 = परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः ।
परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः ।
| verse_line2 = मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥
मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥
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| verse_line1 = सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते ।
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| verse_line2 = अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥
अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥
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| verse_line1 = नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।
नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।
| verse_line2 = तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥
तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥
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| verse_line1 = ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।
ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।
| verse_line2 = तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥
तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥
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| verse_line1 = अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।
अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।
| verse_line2 = अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥
अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥
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| verse_line1 = मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् ।
मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् ।
| verse_line2 = नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥
नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥
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| verse_line1 = तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् ।
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| verse_line2 = अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥
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| verse_line1 = तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा ।
तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा ।
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यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥
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| verse_line1 = तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः ।
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| verse_line2 = हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥
हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥
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| verse_line1 = सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् ।
सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् ।
| verse_line2 = अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥
अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥
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| verse_line1 = तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) ।
तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) ।
| verse_line2 = जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥
जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥
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| verse_line2 = अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥
अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥
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| verse_line1 = चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् ।
चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् ।
| verse_line2 = तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥
तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥
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| verse_line1 = अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् ।
अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् ।
| verse_line2 = तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥
तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥
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अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) ।
| verse_line2 = सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥
सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥
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| verse_line1 = सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के ।
सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के ।
| verse_line2 = अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥
अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥
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हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् ।
| verse_line2 = व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥
व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥
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गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता ।
| verse_line2 = शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥
शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥
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रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा।
| verse_line2 = पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥
पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥
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अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः ।
| verse_line2 = भङ्‍क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥
भङ्‍क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥
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मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् ।
| verse_line2 = हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥
हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥
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| verse_line1 = प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) ।
प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) ।
| verse_line2 = गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥
गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥
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| verse_line1 = जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् ।
जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् ।
| verse_line2 = अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥
अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥
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प्रसभं सगजबलस्य क्षत्रस्योच्चैः समगधराजबलस्य ।
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मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥
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कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥
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सत्याजाम्बवतीर्या भार्या विन्दाद्या भानुसाम्बवतीर्याः ।
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प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥
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यत्परिवारतयेशा जाता देवा नृपात्मजा रतयेशाः ।
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यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥
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भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥
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अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् ।
| verse_line2 = द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥
द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥
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| verse_line2 = स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
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वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥
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अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥
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नीतो दिवि देववरै रेमे सत्यासमन्वितोऽदेववरैः ।
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सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥
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सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् ।
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शक्रपुरीमभियातः प्रादाद् वह्नेर्वनं सतामभियातः ॥३९॥
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| verse_line1 = शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) ।
शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) ।
| verse_line2 = तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥
तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥
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| verse_line1 = यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः ।
यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः ।
| verse_line2 = जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥
जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥
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अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम् ।
| verse_line2 = पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥
पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥
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| verse_line1 = निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) ।
निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) ।
| verse_line2 = अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥
अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥
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| verse_line1 = असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः ।
असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः ।
| verse_line2 = क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥
क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥
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यस्यावेशोरुबलान्न्यहनत् पार्थोऽसुरान् प्रजेशोरुबलान्(त्) ।
| verse_line2 = वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥
वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥
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यस्यावेशात् स बलः प्रचकर्ष पुरं प्रसह्य वेशात् सबलः ।
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कुरुपतिनाम नु यमुना कृष्टा(कृष्णा) येनाहुरर्ह्यमतनु(येनाहुरर्घ्यमतनु) यमुना ॥४५॥
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यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान् ।
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लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥
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यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्) ।
| verse_line2 = धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥
धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥
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न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् ।
| verse_line2 = नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥
नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥
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क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता ।
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सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥
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यद्भक्तप्रवरेण प्रोतः स्वस्मिन् स कीचकः प्रवरेण ।
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पतितास्तस्य सहायाः कृष्णार्थे मानिनः समस्य सहायाः ॥५०॥
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यद्भक्त्याऽनुगृहीतौ पार्थो भीमश्च गोनृपौ नु गृहीतौ(निगृहीतौ)।
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ऋणमुक्त्यै सुव्यत्यस्त्यै क्रमशो वीरावमुञ्चतां सुव्यत्यस्त्यै ॥५१॥
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यद्भक्त्याऽमितयाऽलं कृष्णा कार्ये विवेश कृष्णाकार्ये ।
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यामीरार्द्धतनुत्वान्नापाद् भीमादृतेऽपि नापाद् भीमात् ॥५२॥
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यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम् ।
| verse_line2 = शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥
शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥
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मनसामनसाऽमनसा मनसा यमनन्तमजस्रमवेदनुया ।
| verse_line2 = विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥
विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥
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सोऽगाद् दूतमुखेन प्रभुणेदं वर्तते यदूतमुखेन ।
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पार्थार्थे बहुतनुतां यत्र प्रकाशयन्(त्) स्वयं सबहुतनुताम् ॥५५॥
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गुरुकर्णनदीजानवधीच्चक्षुर्बलेन जनदीजादी ।
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शक्त्या निजया परवान् स्वजनानुद्रेचयन्ननन्तयाऽपरवान् ॥५६॥
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यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् ।
| verse_line2 = अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥
अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥
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येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः ।
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यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥
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यद्भरितो भरताभः प्रभुरम्भाभावितोऽभिभरताभः ।
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भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥
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यदनुग्रहिपूर्णत्वाद्(यदनुग्रहपूर्णत्वाद्) भीमः सर्वानरीननहिपूर्णत्वात् ।
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अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥
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दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥
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| verse_line2 = पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥
पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥
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पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥
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तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः ।
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अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥
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सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् ।
| verse_line2 = पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥
पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥
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प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥
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एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः ।
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पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥
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तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥
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| verse_line1 = भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ।
भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ।
| verse_line2 = भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥
भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥
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| verse_line1 = नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)।
नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)।
| verse_line2 = सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥
सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥
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| verse_line1 = कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता ।
कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता ।
| verse_line2 = भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥
भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥
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| verse_line1 = इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा ।
इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा ।
| verse_line2 = पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥
पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥
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