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Bhagavadgitabhashya: Difference between revisions

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<span class="shloka-line">धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।</span>
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<span class="shloka-line">मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥</span>
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<blockquote class="uvaaca">धृतराष्ट्र उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">धृतराष्ट्र उवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।</span>
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<span class="shloka-line">आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥</span>
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।</span>
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<span class="shloka-line">व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्
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| verse_line2  = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५
</div>
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| verse_line1  = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
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| verse_line2  = सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६
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| verse_line1  = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम
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| verse_line2  = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७
</div>
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| verse_line1  = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः
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<span class="shloka-line">भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः </span>
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<span class="shloka-line">अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च </span>
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| verse_line1  = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः
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| verse_line1  = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः
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<span class="shloka-line">तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः </span>
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| verse_line1  = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः
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| verse_line1  = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ
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| verse_line1  = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः
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| verse_line1  = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः
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| verse_line2  = नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६
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<span class="shloka-line">अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।</span>
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<span class="shloka-line">नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥</span>
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| verse_line1  = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
</div>
| verse_line2  = धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥
</div>
}}
 
<div class="verse" id="BGB_C01_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="shloka">
<span class="shloka-line">काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।</span>
<span class="shloka-line">धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥</span>
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</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C01_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।</span>
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<span class="shloka-line">सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥</span>
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| verse_line1  = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
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<span class="shloka-line">स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।</span>
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<span class="shloka-line">नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
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<span class="shloka-line">अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥</span>
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| verse_line1  = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
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<span class="shloka-line">हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते ।</span>
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C01_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C01_V22
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<span class="shloka-line">यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।</span>
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<span class="shloka-line">कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥</span>
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| verse_line1  = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।
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<div class="verse" id="BGB_C01_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C01_V23
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<span class="shloka-line">योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।</span>
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<span class="shloka-line">धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥</span>
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| verse_line1  = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C01_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥</span>
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| verse_line1  = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
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<div class="verse" id="BGB_C01_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C01_V25
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<span class="shloka-line">भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।</span>
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<span class="shloka-line">उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥</span>
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| verse_line1  = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C01_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C01_V26
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।</span>
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<span class="shloka-line">आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥</span>
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| verse_line1  = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।
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<div class="verse" id="BGB_C01_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C01_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C01
<span class="shloka-line">तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥</span>
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| verse_line1  = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
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| verse_line2  = तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C01_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C01_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अर्जुन उवाच</span>
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<span class="shloka-line">( अर्जुनविषादः )</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।</span>
| verse_line1  = अर्जुन उवाच
<span class="shloka-line">दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ २८ ॥</span>
| verse_line2  = ( अर्जुनविषादः )
</div>
}}
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C01_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C01_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
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| verse_line2  = वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C01_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C01_V30
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<span class="shloka-line">गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
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<div class="verse" id="BGB_C01_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।</span>
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<span class="shloka-line">नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥</span>
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| verse_line1  = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
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<span class="shloka-line">न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।</span>
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<span class="shloka-line">किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥</span>
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<span class="shloka-line">येषामर्थे काङ्‍‍क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।</span>
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<span class="shloka-line">त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥</span>
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<span class="shloka-line">आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।</span>
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<span class="shloka-line">एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।</span>
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<span class="shloka-line">अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥</span>
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<span class="shloka-line">निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।</span>
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<span class="shloka-line">पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥</span>
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<span class="shloka-line">तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥</span>
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<span class="shloka-line">यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।</span>
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<span class="shloka-line">कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।</span>
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| verse_line1  = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।
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<span class="shloka-line">धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥</span>
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<span class="shloka-line">अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।</span>
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<span class="shloka-line">स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥</span>
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<span class="shloka-line">संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।</span>
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<span class="shloka-line">पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥</span>
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<span class="shloka-line">दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।</span>
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<span class="shloka-line">अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥</span>
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<span class="shloka-line">एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।</span>
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<span class="shloka-line">विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥</span>
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
Line 531: Line 529:
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span>
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span>
== द्वितीयोऽध्यायः ==
== द्वितीयोऽध्यायः ==
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<span class="shloka-line">तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।</span>
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| verse_line1  = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।</span>
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<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।</span>
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| verse_line1  = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।
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<span class="shloka-line">कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।</span>
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| verse_line1  = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
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<blockquote class="uvaaca">अजुर्न उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अजुर्न उवाच</blockquote>


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| verse_id    = BGB_C02_V05
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<span class="shloka-line">गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।</span>
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<span class="shloka-line">हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥</span>
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<span class="shloka-line">न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।</span>
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<span class="shloka-line">यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥</span>
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<span class="shloka-line">कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।</span>
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<span class="shloka-line">यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥</span>
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<span class="shloka-line">न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥</span>
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<span class="shloka-line">एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।</span>
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C02_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C02_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।</span>
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<span class="shloka-line">गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V11_B01" data-verse="BGB_C02_V11">
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<span class="gr-moola">प्रज्ञावादान्</span> स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? <span class="gr-moola">गतासून्</span>॥११ ॥
| verse_id = BGB_C02_V11
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| id       = BGB_C02_V11_B01
| text    = प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? गतासून् ॥११ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
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| verse_line2  = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>किमिति? <span class="gr-moola">न त्वेवाहम्</span> ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह –<span class="gr-prateeka">न त्वेति ॥</span> यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥</p>
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| id       = BGB_C02_V12_B01
| text    = किमिति? न त्वेवाहम् ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह – न त्वेति ॥ यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
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| verse_line2  = तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- <span class="gr-prateeka">देहिनोऽस्मिन् ॥</span> यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
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| id       = BGB_C02_V13_B01
| text    = देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- देहिनोऽस्मिन् ॥ यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B02" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
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| id       = BGB_C02_V13_B02
| text    = न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B03" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B03
| text    = समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B04" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B04
| text    = श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B05" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B05
| text    = माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B06" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‍‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B06
| text    = अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‍‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B07" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B07
| text    = सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् ।
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B08" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B08
| text    = रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति ।
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B09" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः <span class="gr-moola">धीरस्तत्र न मुह्यति</span> </p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B09
| text    = न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B10" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह –<span class="gr-prateeka">न त्वेवेति ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B10
| text    = अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह – न त्वेवेति ॥
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V13_B11" data-verse="BGB_C02_V13">
{{Bhashyam
<p>नापि देहनाशमित्याह – <span class="gr-prateeka">देहिन इति ॥</span> यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V13
</div>
| id       = BGB_C02_V13_B11
| text    = नापि देहनाशमित्याह – देहिन इति ॥ यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
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| verse_line2  = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V14_B01" data-verse="BGB_C02_V14">
{{Bhashyam
<p>तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – <span class="gr-prateeka">मात्रास्पर्शा इति ॥</span> मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव <span class="gr-moola">शीतोष्णसुखदुःखदाः</span> देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V14
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| id       = BGB_C02_V14_B01
| text    = तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – मात्रास्पर्शा इति ॥ मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव शीतोष्णसुखदुःखदाः । देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V14_B02" data-verse="BGB_C02_V14">
{{Bhashyam
<p>आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – <span class="gr-prateeka">अनित्या इति ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V14
</div>
| id       = BGB_C02_V14_B02
| text    = आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – अनित्या इति ॥
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V14_B03" data-verse="BGB_C02_V14">
{{Bhashyam
<p>अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य <span class="gr-moola">तान्</span> शीतोष्णादीन् <span class="gr-moola">तितिक्षस्व</span> ॥ १४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V14
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| id       = BGB_C02_V14_B03
| text    = अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व ॥ १४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
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| verse_line2  = समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V15">
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{{Bhashyam
<p>अतः प्रयोजनमाह – <span class="gr-prateeka">यं हीति ॥</span>  <span class="gr-moola">यम् एते</span> मात्रास्पर्शा <span class="gr-moola">न व्यथयन्ति</span>। पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V15
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| id       = BGB_C02_V15_B01
| text    = अतः प्रयोजनमाह – यं हीति ॥ यम् एते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति । पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
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| verse_line2  = उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V16_B01" data-verse="BGB_C02_V16">
{{Bhashyam
<p>‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते ।</p>
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| id       = BGB_C02_V16_B01
| text    = ‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते ।
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V16_B02" data-verse="BGB_C02_V16">
{{Bhashyam
<p>‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् <span class="gr-moola">‘विद्यते’</span> इत्यादरार्थः ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V16
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| id       = BGB_C02_V16_B02
| text    = ‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् ‘विद्यते’ इत्यादरार्थः ॥
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V16_B03" data-verse="BGB_C02_V16">
{{Bhashyam
<p>असतः कारणत्वं च – <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१)</span></span> इति भागवते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२)</span></span> इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – <span class="gr-prateeka">उभयोरपीति ॥</span> <span class="gr-moola">अन्तो</span>  निर्णयः॥१६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V16
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| id       = BGB_C02_V16_B03
| text    = असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – उभयोरपीति ॥ अन्तो निर्णयः॥१६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V17
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
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| verse_line2  = विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V17_B01" data-verse="BGB_C02_V17">
{{Bhashyam
<p>किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – <span class="gr-prateeka">अविनाशीति ॥</span> नापि शापादिना विनाश इत्याह – <span class="gr-prateeka">विनाशमिति ॥</span> अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V17
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| id       = BGB_C02_V17_B01
| text    = किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – अविनाशीति ॥ नापि शापादिना विनाश इत्याह – विनाशमिति ॥ अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C02_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V18_B01" data-verse="BGB_C02_V18">
{{Bhashyam
<p>भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – <span class="gr-prateeka">अन्तवन्त इति ॥</span>अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">नित्यस्येति ॥</span>  <span class="gr-moola">‘शरीरिणः’</span> इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – <span class="gr-prateeka">अनाशिन इति ॥</span> कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V18
</div>
| id       = BGB_C02_V18_B01
| text    = भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – अन्तवन्त इति ॥ अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – नित्यस्येति ॥ ‘शरीरिणः’ इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – अनाशिन इति ॥ कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V18_B02" data-verse="BGB_C02_V18">
{{Bhashyam
<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavad-id">‘प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया । <br/>चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः ॥’</span></span> इति भगवद्वचनात् ॥१८ ॥
| verse_id = BGB_C02_V18
</div>
| id       = BGB_C02_V18_B02
| text    = ‘प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया । चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः ॥’ इति भगवद्वचनात् ॥१८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति  न हन्यते॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
</div>
| verse_line2  = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति  न हन्यते॥१९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V19_B01" data-verse="BGB_C02_V19">
{{Bhashyam
<p>व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – <span class="gr-prateeka">य एनमिति ॥</span> कुतः? उक्तहेतुभ्यो <span class="gr-prateeka">नायं हन्ति, न हन्यते ।</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V19
</div>
| id       = BGB_C02_V19_B01
| text    = व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – य एनमिति ॥ कुतः? उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति, न हन्यते ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V19_B02" data-verse="BGB_C02_V19">
{{Bhashyam
<p>न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया । स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘ध्यायतीव’ (बृ.उ.६.३.७)</span></span> इति श्रुतेश्च ॥ १९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V19
</div>
| id       = BGB_C02_V19_B02
| text    = न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया । स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान् । ‘ध्यायतीव’ (बृ.उ.६.३.७) इति श्रुतेश्च ॥ १९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
</div>
| verse_line2  = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V20_B01" data-verse="BGB_C02_V20">
{{Bhashyam
<p>अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – <span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३)</span> </p>
| verse_id = BGB_C02_V20
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।<br/>अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् ।
| id       = BGB_C02_V20_B01
</div>
| text    = अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V20_B02" data-verse="BGB_C02_V20">
{{Bhashyam
<p>कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । <span class="gr-moola">शाश्वतः</span> सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति <span class="gr-moola">पुराणः</span>। तथाऽपि <span class="gr-moola">न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे</span> ॥२० ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V20
</div>
| id       = BGB_C02_V20_B02
| text    = कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । शाश्वतः सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति पुराणः । तथाऽपि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥२० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
</div>
| verse_line2  = कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V21_B01" data-verse="BGB_C02_V21">
{{Bhashyam
<p>अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? <span class="gr-moola">अविनाशिनं</span>  नैमित्तिकनाशरहितम् । <span class="gr-moola">नित्यं</span> स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- <span class="gr-moola">अविनाशिनं</span> दोषयोगरहितम्, <span class="gr-moola">नित्यं</span> सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V21
</div>
| id       = BGB_C02_V21_B01
| text    = अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? अविनाशिनं नैमित्तिकनाशरहितम् । नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- अविनाशिनं दोषयोगरहितम्, नित्यं सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
</div>
| verse_line2  = तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V22">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V22">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V22_B01" data-verse="BGB_C02_V22">
{{Bhashyam
<p>देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – <span class="gr-prateeka">वासांसीति ॥ २२ ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V22
</div>
| id       = BGB_C02_V22_B01
| text    = देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – वासांसीति ॥ २२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
</div>
| verse_line2  = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V23_B01" data-verse="BGB_C02_V23">
{{Bhashyam
<p>स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – <span class="gr-prateeka">नैनमिति ॥२३ ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V23
</div>
| id       = BGB_C02_V23_B01
| text    = स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – नैनमिति ॥२३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
</div>
| verse_line2  = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B01" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B01
| text    = वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B02" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>तत्ता च - <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
<p>स्थाणुत्वेऽपि <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३)</span> इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् )</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.)</span> इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः ।</p>
| id       = BGB_C02_V24_B02
</div>
| text    = तत्ता च - ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८) , ‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः । स्थाणुत्वेऽपि ‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३) इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । ‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९) , ‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् ) , ‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.) इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B03" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>महातात्पर्याच्च । मोक्षो हि महापुरुषार्थः। ‘तत्रापि मोक्ष एवार्थः’ । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे ।<br/>अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥’(म.भा.१२.३१७.३४)</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanioshat-id">‘पुण्यचितो लोकः क्षीयते’"(छा.उ. ८.१.६)</span></span>  इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स च विष्णुप्रसादादेव सिध्यति ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishnupurana-id">‘वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।’(विष्णु.१.४.१८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे’ (भाग.७.६.२५)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तत्प्रसादाद् अवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।’</span></span>, <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः सर्वात्मना श्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।<br/>ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥’ (भाग.२. ७ .४२)</span></span>,<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते’<br/>‘ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवाः तापत्रयेणोपहता न शर्म ।<br/>आत्मन् लभन्ते भगवन् तवाङ्घ्रिच्छायांशविद्यामत आश्रयेम॥’ (भाग.३.६.१८)</span></span>, <br/>‘ऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह ।’<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तमेवं विद्वान्.....’</span></span> इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः ।<br/> स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति । लोकप्रसिद्धेः । लोकसिद्धमविरुद्धम् अत्राप्यङ्गीकार्यम् ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B03
| text    = महातात्पर्याच्च । मोक्षो हि महापुरुषार्थः। ‘तत्रापि मोक्ष एवार्थः’ । ‘अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥’(म.भा.१२.३१७.३४) ‘पुण्यचितो लोकः क्षीयते’"(छा.उ. ८.१.६) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स च विष्णुप्रसादादेव सिध्यति । ‘वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।’(विष्णु.१.४.१८) , ‘तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे’ (भाग.७.६.२५) , ‘तत्प्रसादाद् अवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।’ , ‘येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः सर्वात्मना श्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥’ (भाग.२. ७ .४२) , ‘तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते’ ‘ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवाः तापत्रयेणोपहता न शर्म । आत्मन् लभन्ते भगवन् तवाङ्घ्रिच्छायांशविद्यामत आश्रयेम॥’ (भाग.३.६.१८) , ‘ऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह ।’ ‘तमेवं विद्वान्.....’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति । लोकप्रसिद्धेः । लोकसिद्धमविरुद्धम् अत्राप्यङ्गीकार्यम् ॥
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B04" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>‘अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते बहुतरो लेपो नासीद्’ इत्युत्कर्षमेव वक्ति । बहुनरकफलो ह्यसौ । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तस्य न लोम च न क्षीयते(मीयते)’(कौ.उ.३.२)</span></span> इति श्रुत्यन्तराच्च । ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्’ (१५.१९) इति तदुक्तेश्च ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B04
| text    = ‘अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते बहुतरो लेपो नासीद्’ इत्युत्कर्षमेव वक्ति । बहुनरकफलो ह्यसौ । ‘तस्य न लोम च न क्षीयते(मीयते)’(कौ.उ.३.२) इति श्रुत्यन्तराच्च । ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्’ (१५.१९) इति तदुक्तेश्च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B05" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः । <br/> विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा ॥</span></span> <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा ।<br/>नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः ॥’</span></span> इति नारदीये । <br/> अन्योत्कर्ष ऐक्यं च -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishnupurana-id">‘तथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम् ।<br/> को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥’(वि.पु.३.४.५)</span></span> इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम् ।<br/> तत्र हि -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।<br/> एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥’(म.भा.१.१.१८)</span></span>,<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ।’ (म.भा.१२.३४१.१२)</span></span>,<br/>‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः’ (११.४३) इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तम् उत्कर्षं विष्णोर्वक्ति । अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे । तद्धि अग्न्यादेरपि वेदादावस्ति- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः’ (ऋ.२.१.३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः’(ऋ.१०.८६.१)</span></span> इत्यादिषु ।
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B05
| text    = ‘सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः । विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा ॥ पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा । नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः ॥’ इति नारदीये । अन्योत्कर्ष ऐक्यं च - ‘तथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥’(वि.पु.३.४.५) इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम् । तत्र हि - ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥’(म.भा.१.१.१८) , ‘यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ।’ (म.भा.१२.३४१.१२) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः’ (११.४३) इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तम् उत्कर्षं विष्णोर्वक्ति । अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे । तद्धि अग्न्यादेरपि वेदादावस्ति- ‘त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः’ (ऋ.२.१.३) , ‘विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः’(ऋ.१०.८६.१) इत्यादिषु ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B06" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>तद्ग्रन्थविरोधाच्च । तथा हि स्कान्दे शैवे -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः ।<br/>यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि ॥<br/>यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि ।<br/>यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोः तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि ॥<br/>यदन्तरं प्रलयजवारिविप्लुषोः यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः ।<br/>स्फुलिङ्गसंवर्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः ॥<br/>अनन्तत्वान्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम् ।<br/>माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदारणमीरितम् ॥<br/>तत्समो ह्यधिको वाऽपि नास्ति कश्चित् कदाचन ।<br/>एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् ॥’</span></span> इत्याद्याह । <br/> तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् - <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि।’</span></span> इत्यादि ।<br/>पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padmapurana-id">‘अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः’</span></span> इत्यादि । समब्राह्मविरोधाच्च ।<br/>वेदश्च इतिहासाद्यविरोधेन योज्यः । ‘यदि विद्याद्’ इति वचनात् । अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा । तत्रापीष्टसिद्धिः । नामवैशेष्यात् । अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B06
| text    = तद्ग्रन्थविरोधाच्च । तथा हि स्कान्दे शैवे - ‘यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः । यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि ॥ यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि । यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोः तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि ॥ यदन्तरं प्रलयजवारिविप्लुषोः यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः । स्फुलिङ्गसंवर्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः ॥ अनन्तत्वान्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम् । माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदारणमीरितम् ॥ तत्समो ह्यधिको वाऽपि नास्ति कश्चित् कदाचन । एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् ॥’ इत्याद्याह । तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् - ‘संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि।’ इत्यादि । पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह - ‘अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः’ इत्यादि । समब्राह्मविरोधाच्च । वेदश्च इतिहासाद्यविरोधेन योज्यः । ‘यदि विद्याद्’ इति वचनात् । अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा । तत्रापीष्टसिद्धिः । नामवैशेष्यात् । अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B07" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>तथाऽपि स्वतः प्रामाण्यात् सन्नेवोच्यते । अविरोधात् । न च प्रमाणसिद्ध(दृष्ट)स्यान्यत्रादृष्ट्याऽपह्नवो युक्तः । धर्मवैचित्र्याद् अर्थानाम् । स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तावप्यदोषत्वं च साधयेद् इत्यतिप्रसङ्गः ।<br/>अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नारायणपरा वेदाः’ (भाग.२.५.१५)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठ.२.१५)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वासुदेवपरा वेदाः’ (भाग.१.२.२९)</span></span>इति । न चैतद् विरुद्धम् । ईश्वरनियमात् । अनादौ च तत् सिद्धं <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’ ( भाग.२.१०.१२)</span></span>इत्यादौ । प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन । अतः सिद्धमेतत् ।<br/>तच्चानन्यापेक्षा अचिन्त्यशक्तित्व एव युक्तम् । अतो न मायामयमेकम् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B07
| text    = तथाऽपि स्वतः प्रामाण्यात् सन्नेवोच्यते । अविरोधात् । न च प्रमाणसिद्ध(दृष्ट)स्यान्यत्रादृष्ट्याऽपह्नवो युक्तः । धर्मवैचित्र्याद् अर्थानाम् । स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तावप्यदोषत्वं च साधयेद् इत्यतिप्रसङ्गः । अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम् । ‘नारायणपरा वेदाः’ (भाग.२.५.१५) , ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठ.२.१५) , ‘वासुदेवपरा वेदाः’ (भाग.१.२.२९) इति । न चैतद् विरुद्धम् । ईश्वरनियमात् । अनादौ च तत् सिद्धं ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’ ( भाग.२.१०.१२) इत्यादौ । प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन । अतः सिद्धमेतत् । तच्चानन्यापेक्षा अचिन्त्यशक्तित्व एव युक्तम् । अतो न मायामयमेकम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V24_B08" data-verse="BGB_C02_V24">
{{Bhashyam
<p>अचलत्वं तु <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘अप्रहर्षमनानन्दम्’(म.भा.१२.१९१.८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘अदुःखमसुखम्’(म.भा.१२.२५६.२१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘(न)अप्रज्ञम्’ (माण्डूक-२.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-taitiriyopanishat-id">‘असद्वा’ (तै.उ.२.७)</span></span> इत्यादिवत् । क्रियादृष्टेः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः’ (भाग.६.४.४६)</span></span> इत्याद्युक्तेः । अतश्च न मायामयं सर्वम् । ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-taitiriyopanishat-id">‘तं त्वा भग’( तै. उ.१.४)</span></span>  इत्यादौ । स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’ ( भाग.३.१०.२४)</span></span>,   <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’ (भाग.६.४.४८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwataropanishat-id">‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ ( श्वे.उ.६.८)</span></span> इत्यादिवचनात् ॥२४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V24
</div>
| id       = BGB_C02_V24_B08
| text    = अचलत्वं तु ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’(म.भा.१२.१९१.८) , ‘अदुःखमसुखम्’(म.भा.१२.२५६.२१) , ‘(न)अप्रज्ञम्’ (माण्डूक-२.१) , ‘असद्वा’ (तै.उ.२.७) इत्यादिवत् । क्रियादृष्टेः । ‘तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः’ (भाग.६.४.४६) इत्याद्युक्तेः । अतश्च न मायामयं सर्वम् । ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च ‘तं त्वा भग’( तै. उ.१.४) इत्यादौ । स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम् । ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’ ( भाग.३.१०.२४) , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’ (भाग.६.४.४८) , ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ ( श्वे.उ.६.८) इत्यादिवचनात् ॥२४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।
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| verse_line2  = तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V25">
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V25_B01" data-verse="BGB_C02_V25">
{{Bhashyam
<p>अत एवाव्यक्तादिरूपः ॥ २५ ॥</p>
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| text    = अत एवाव्यक्तादिरूपः ॥ २५ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V26
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।</span>
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<span class="shloka-line">तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
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| verse_line2  = तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">अथ चेति ॥</span>२६ ॥</p>
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| id       = BGB_C02_V26_B01
| text    = अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – अथ चेति ॥ २६ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥</span>
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| verse_line1  = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
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| verse_line2  = तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V27_B01" data-verse="BGB_C02_V27">
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<p>कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – <span class="gr-prateeka">जातस्येति ॥</span>२७ ॥</p>
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| text    = कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – जातस्येति ॥ २७ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥</span>
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| verse_line1  = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
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| verse_line2  = अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>तदेव स्पष्टयति – <span class="gr-prateeka">अव्यक्तादीनीति ॥</span> २८ ॥</p>
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| text    = तदेव स्पष्टयति – अव्यक्तादीनीति ॥ २८ ॥
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<span class="shloka-line">आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति</span>
| verse_line1  = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-
<span class="shloka-line">श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ २९ ॥</span>
| verse_line2  = आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।
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<div class="verse" id="BGB_C02_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V30
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<span class="shloka-line">देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
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| verse_line2  = तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V29_B01" data-verse="BGB_C02_V30">
{{Bhashyam
<p>‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – <span class="gr-prateeka">आश्चर्यवदिति ॥</span> दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V30
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| id       = BGB_C02_V29_B01
| text    = ‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – आश्चर्यवदिति ॥ दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥
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<span class="shloka-line">स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।</span>
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<span class="shloka-line">धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥</span>
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| verse_line1  = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।
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<div class="verse" id="BGB_C02_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।</span>
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<span class="shloka-line">सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥</span>
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| verse_line1  = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।
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| verse_line2  = सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V33
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
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| verse_line2  = ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C02_V34" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V34
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
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| verse_line2  = सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V35
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
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| verse_line2  = येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V36
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥</span>
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| verse_line1  = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
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| verse_line2  = निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V37
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<span class="shloka-line">हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥</span>
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| verse_line1  = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C02_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V38
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।</span>
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<span class="shloka-line">ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥</span>
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| verse_line1  = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
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| verse_line2  = ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V39
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।</span>
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<span class="shloka-line">बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥</span>
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| verse_line1  = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
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| verse_line2  = बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V40
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
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| verse_line2  = स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V39">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V39">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V39_B01" data-verse="BGB_C02_V40">
{{Bhashyam
<p>साङ्ख्यम् ज्ञानम् । <span class="gr-reference gr-ref-vyasasmruti-id">‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’</span> इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V40
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३)</span> इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥
| id       = BGB_C02_V39_B01
</div>
| text    = साङ्ख्यम् ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३) इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V41
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
</div>
| verse_line2  = बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V41">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V41">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V41_B01" data-verse="BGB_C02_V41">
{{Bhashyam
<p>‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">व्यवसायात्मिकेति ॥</span> सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V41
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| id       = BGB_C02_V41_B01
| text    = ‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – व्यवसायात्मिकेति ॥ सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V42
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
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| verse_line2  = वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V43" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C02_V43
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥</span>
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| verse_line1  = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C02_V44" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V44
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।
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| verse_line2  = व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V44">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V44">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V44_B01" data-verse="BGB_C02_V44">
{{Bhashyam
<p>स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति । वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >, <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परोक्षविषया वेदाः’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Aitreyopanishat-id">‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३)</span> इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र–</p>
| verse_id = BGB_C02_V44
<p>>, <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । <br/> स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३)</span> इति ॥ ४२-४४ ॥</p>
| id       = BGB_C02_V44_B01
</div>
| text    = स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति । वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >, ‘परोक्षविषया वेदाः’ , ‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४) , ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३) इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– >, ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) इति ॥ ४२-४४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V45" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V45
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
</div>
| verse_line2  = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V45">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V45">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V45_B01" data-verse="BGB_C02_V45">
{{Bhashyam
<p>तां योगबुद्धिमाह - <span class="gr-prateeka">त्रैगुण्यविषया इत्यादिना</span> इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’</span></span> इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’</span></span> इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-kalkipurana-id">‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।<br/> आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२),</span></span> <br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५),</span></span> <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmruti-id">‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । <br/> आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६)</span></span>,<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०)</span></span>’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V45
</div>
| id       = BGB_C02_V45_B01
| text    = तां योगबुद्धिमाह - त्रैगुण्यविषया इत्यादिना इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६) , ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०) ’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V46" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V46
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
</div>
| verse_line2  = तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V46">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V46">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V46_B01" data-verse="BGB_C02_V46">
{{Bhashyam
<p>तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">यावानर्थ इति ॥</span> यथा <span class="gr-moola">यावान् अर्थः</span> प्रयोजनम् <span class="gr-moola">उदपाने</span>  कूपे भवति, <span class="gr-moola">तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके</span> अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् <span class="gr-moola">विजानतो</span>ऽपि ज्ञानिनो <span class="gr-moola">ब्राह्मणस्य</span> फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V46
</div>
| id       = BGB_C02_V46_B01
| text    = तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – यावानर्थ इति ॥ यथा यावान् अर्थः प्रयोजनम् उदपाने कूपे भवति, तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् विजानतो ऽपि ज्ञानिनो ब्राह्मणस्य फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V47" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V47
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
</div>
| verse_line2  = मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V47">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V47">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V47_B01" data-verse="BGB_C02_V47">
{{Bhashyam
<p>कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स्वर्गकामो यजेत’</span></span>इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">कर्मण्येवेति ॥</span>  <span class="gr-moola">‘ते’</span> इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५)</span></span>इत्यादिज्ञानिगणनाच्च ।<br/> कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V47
</div>
| id       = BGB_C02_V47_B01
| text    = कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - कर्मण्येवेति ॥ ‘ते’ इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५) इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V47_B02" data-verse="BGB_C02_V47">
{{Bhashyam
<p>अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३)</span></span> इत्यादौ भागवते ।<br/> अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmruti-id">‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९)</span></span> इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’</span></span> इत्यादिभ्यश्च । अतो <span class="gr-moola">मा कर्मफलहेतुर्भूः</span> । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– <span class="gr-prateeka">मा त इति ॥</span> कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०)</span></span> इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘भक्तिमन्विच्छन्तः’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Sutra-id">‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१)</span></span>, <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्रष्टव्यः.....’</span></span> इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V47
</div>
| id       = BGB_C02_V47_B02
| text    = अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७) , ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– मा त इति ॥ कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४) , ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’ , ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१) , ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१) , ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V48" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V48
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।</span>
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<span class="shloka-line">सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥</span>
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| verse_line1  = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
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| verse_line2  = सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V48_B01" data-verse="BGB_C02_V48">
{{Bhashyam
<p>पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – <span class="gr-prateeka">योगस्थ इति ॥</span> <span class="gr-moola">योगस्थः</span> उपायस्थः । <span class="gr-moola">सङ्गं</span> फलस्नेहं <span class="gr-moola">त्यक्त्वा</span> । तत एव <span class="gr-moola">सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा</span> । स एव च मयोक्तो <span class="gr-moola">योगः</span> ॥ ४८ ॥</p>
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| id       = BGB_C02_V48_B01
| text    = पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – योगस्थ इति ॥ योगस्थः उपायस्थः । सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा । तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । स एव च मयोक्तो योगः ॥ ४८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V49" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V49
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।</span>
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<span class="shloka-line">बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥</span>
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| verse_line1  = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।
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| verse_line2  = बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C02_V49_B01" data-verse="BGB_C02_V49">
{{Bhashyam
<p>इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – <span class="gr-prateeka">दूरेणेति ॥</span> <span class="gr-moola">बुद्धियोगाद्</span> ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । <span class="gr-moola">दूरेण</span> अतीव । अतो <span class="gr-moola">बुद्धौ शरणं</span> ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते <span class="gr-moola">फलहेतवः</span> ॥ ४९ ॥</p>
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| id       = BGB_C02_V49_B01
| text    = इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – दूरेणेति ॥ बुद्धियोगाद् ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । दूरेण अतीव । अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः ॥ ४९ ॥
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥</span>
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| verse_line1  = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
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| verse_line2  = तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V50">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B01" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>ज्ञानफलमाह – <span class="gr-prateeka">बुद्धियुक्त इति ॥</span> सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५)</span></span> , <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०)</span></span>इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२)</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५)</span></span> इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् ।</p>
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</div>
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| text    = ज्ञानफलमाह – बुद्धियुक्त इति ॥ सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१) , ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१) , ‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३) , ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५) , ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५) , ‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३) , ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B02" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने (परे ज्ञाने) किं नु दुःखतरं भवेत्’(म.भा.१२.२९०.७९)</span></span> इत्यादिनिन्दनाद् मोक्षधर्मे । परिहारे पृथग् भोगाभिधानाच्च । शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७)</span></span>इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्च । ‘इदं ज्ञानमु(म)पाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः’(१४.२) इति च । उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य । न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः । ‘आसं दुःखी, नाऽसम्’ इति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य । अनेन रूपेणेति च । भेदाभावात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B02
| text    = न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने (परे ज्ञाने) किं नु दुःखतरं भवेत्’(म.भा.१२.२९०.७९) इत्यादिनिन्दनाद् मोक्षधर्मे । परिहारे पृथग् भोगाभिधानाच्च । शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्च । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्च । ‘इदं ज्ञानमु(म)पाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः’(१४.२) इति च । उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य । न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः । ‘आसं दुःखी, नाऽसम्’ इति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य । अनेन रूपेणेति च । भेदाभावात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B03" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः । उपाधिनाशे मानं वा । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने’ इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च । ‘यावदात्मभावित्वाद्’ इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B03
| text    = न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः । उपाधिनाशे मानं वा । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने’ इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च । ‘यावदात्मभावित्वाद्’ इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B04" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन । प्रतिशाखं च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स एकधा’(छा.उ.७.२६.८)</span></span> इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते । विरोधे तु युक्तिमतामेव बलवत्त्वम् । युक्तयश्चात्रोक्ताः - ‘मग्नस्य हि’ इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववत् एकीभावः । उक्तं च - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यथोदकं शुद्धे शुद्धम्’(कठ.उ.२.१.१५)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘यथा नद्यः’(आथ.उ.३.२.८)</span></span> इत्यादौ । तत्राऽप्यन्योन्यात्मकत्वे वृद्ध्यसम्भवः । अस्ति चेषत् समुद्रेऽपि द्वारि । महत्त्वाद् अन्यत्रादृष्टिः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahakourma-id">‘ता एवापो ददौ तस्य स ऋषिः शंसितव्रतः’</span></span> इति महाकौर्मे समर्थानां भेदज्ञानाच्च ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘नैव तत् प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः ।<br/> यत् ते पदं हि कैवल्यम्’</span></span> इति निषेधाच्च, नारदीये ।<br/> सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षधर्मेषु । बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात् । अतो <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यत्र नान्यत् पश्यति’(छां.७.२४.१)</span></span> इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि । अन्यथा कथम् ऐश्वर्यादि स्यात्? न च तन्मायामयम् इत्युक्तम् । अन्यथा कथं तत्रैव<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘स एकधा’(छां.७.२६.२)</span></span>इत्यादि ब्रूयात् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B04
| text    = दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन । प्रतिशाखं च ‘स एकधा’(छा.उ.७.२६.८) इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते । विरोधे तु युक्तिमतामेव बलवत्त्वम् । युक्तयश्चात्रोक्ताः - ‘मग्नस्य हि’ इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववत् एकीभावः । उक्तं च - ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धम्’(कठ.उ.२.१.१५) , ‘यथा नद्यः’(आथ.उ.३.२.८) इत्यादौ । तत्राऽप्यन्योन्यात्मकत्वे वृद्ध्यसम्भवः । अस्ति चेषत् समुद्रेऽपि द्वारि । महत्त्वाद् अन्यत्रादृष्टिः । ‘ता एवापो ददौ तस्य स ऋषिः शंसितव्रतः’ इति महाकौर्मे समर्थानां भेदज्ञानाच्च । ‘नैव तत् प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः । यत् ते पदं हि कैवल्यम्’ इति निषेधाच्च, नारदीये । सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षधर्मेषु । बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात् । अतो ‘यत्र नान्यत् पश्यति’(छां.७.२४.१) इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि । अन्यथा कथम् ऐश्वर्यादि स्यात्? न च तन्मायामयम् इत्युक्तम् । अन्यथा कथं तत्रैव ‘स एकधा’(छां.७.२६.२) इत्यादि ब्रूयात् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B05" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>न च –<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘न वै सशरीरस्य....’(छां.८.१२.१)</span></span>इत्यादिविरोधः । वैलक्षण्यात् तच्छरीराणाम् । अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानीश्वरशक्त्या । तथाचोक्तम्– <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव तु’</span></span>  इत्यादि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । <br/> वदन्ति च लौकिकवैलक्षण्येऽभावशब्दम्- ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’, ‘सुखदुःखबाह्यः’ इत्यादिषु । निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि । तथा हि श्रुतिः - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अशारीतीँ.... तच्छरीरमभवद्’</span></span>इति । न हि तानि शीर्णानि भवन्ति । ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते’(१४.२) इत्यादिवचनात् । साम्यात् प्रयोगः । प्रयोगाच्च - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः’(कुम्भ-म.भा.१२.३३६.२९)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्’(भाग.७.१.३४)</span></span> इत्यादि दृष्टदेहेष्वेव ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B05
| text    = न च – ‘न वै सशरीरस्य....’(छां.८.१२.१) इत्यादिविरोधः । वैलक्षण्यात् तच्छरीराणाम् । अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानीश्वरशक्त्या । तथाचोक्तम्– ‘शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव तु’ इत्यादि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । वदन्ति च लौकिकवैलक्षण्येऽभावशब्दम्- ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’, ‘सुखदुःखबाह्यः’ इत्यादिषु । निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि । तथा हि श्रुतिः - ‘अशारीतीँ.... तच्छरीरमभवद्’ इति । न हि तानि शीर्णानि भवन्ति । ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते’(१४.२) इत्यादिवचनात् । साम्यात् प्रयोगः । प्रयोगाच्च - ‘अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः’(कुम्भ-म.भा.१२.३३६.२९) , ‘देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्’(भाग.७.१.३४) इत्यादि दृष्टदेहेष्वेव ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B06" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Adityapurana-id">‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्याद् एष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’</span></span> इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात् ।<br/>ये त्वत्रैव भगवन्तं प्रविशन्ति तेऽपि पश्चात् तत्रैव यान्ति । योग्यत्वं चात्र विवक्षितम् । युधिष्ठिरप्रश्न इतरनिन्दनाच्च । सायुज्यं च ग्रहवत् । तदुक्तेश्च - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः ।<br/> तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान् भोगांस्तु भुञ्जते ॥’</span></span> इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।<br/> अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B06
| text    = न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिः । ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । योगी तावन्न मुक्तः स्याद् एष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात् । ये त्वत्रैव भगवन्तं प्रविशन्ति तेऽपि पश्चात् तत्रैव यान्ति । योग्यत्वं चात्र विवक्षितम् । युधिष्ठिरप्रश्न इतरनिन्दनाच्च । सायुज्यं च ग्रहवत् । तदुक्तेश्च - ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान् भोगांस्तु भुञ्जते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V50_B07" data-verse="BGB_C02_V50">
{{Bhashyam
<p>सोऽस्त्येव सर्वात्मना– <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अदुःखम्’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सर्वदुःखविवर्जिताः’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अशोकमहिमम्’</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११)</span></span> इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् ।<br/>प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’</span></span> इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’</span></span>। इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् ।<br/> ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’</span></span> <br/>इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । <span class="gr-moola">अतो योगाय युज्यस्व</span> । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V50
</div>
| id       = BGB_C02_V50_B07
| text    = सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’ , ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’ , ‘अशोकमहिमम्’ , ‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् । प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’ । इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । अतो योगाय युज्यस्व । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V51" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V51
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
</div>
| verse_line2  = जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V51">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V51">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V51_B01" data-verse="BGB_C02_V51">
{{Bhashyam
<p>तदुपायमाह -<span class="gr-prateeka">कर्मजमिति ॥</span> <span class="gr-moola">कर्मजं फलं त्यक्त्वा</span>, अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा <span class="gr-moola">पदं गच्छन्ति</span> । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V51
</div>
| id       = BGB_C02_V51_B01
| text    = तदुपायमाह - कर्मजमिति ॥ कर्मजं फलं त्यक्त्वा , अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V52" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V52
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
</div>
| verse_line2  = तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V52">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V52">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V52_B01" data-verse="BGB_C02_V52">
{{Bhashyam
<p>कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१)</span> इत्यादि ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V52
<p>न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति ।</p>
| id       = BGB_C02_V52_B01
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे ।<br/>कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’</span> इति वचनात् ।
| text    = कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि । न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति । ‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् । अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्- ‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् । तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् ।
<p>अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्-</p>
}}
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।<br/>सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०)</span> इत्यादिवचनात् ।
<p>तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् ।</p>
</div>


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V52_B02" data-verse="BGB_C02_V52">
{{Bhashyam
<p>तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३)</span> इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च</p>
| verse_id = BGB_C02_V52
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे ।<br/>तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥<br/>योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् ।<br/>प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’</span> इति (इत्याद्युक्तेः )।
| id       = BGB_C02_V52_B02
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन ।<br/>मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’</span> इति च ।
| text    = तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, ‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८) , ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४) , ‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३) इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च ‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे । तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥ योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् । प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’ इति (इत्याद्युक्तेः )। ‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन । मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’ इति च । साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- ‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) । तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥
<p>साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) ।<br/>तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’</span> इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।</p>
}}
<p>अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥</p>
</div>


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V53" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V53
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥
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| verse_line2  = समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V53">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V53">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V53_B01" data-verse="BGB_C02_V53">
{{Bhashyam
<p>तदेव स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥</span> पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि <span class="gr-moola">निश्चला</span> भवति; ततश्च <span class="gr-moola">समाधावचला</span>, ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; <span class="gr-moola">तदा योगमवाप्स्यसि</span> उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V53
</div>
| id       = BGB_C02_V53_B01
| text    = तदेव स्पष्टयति - श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥ पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति; ततश्च समाधावचला , ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V54" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V54
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अर्जुन उवाच</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥</span>
| verse_line1  = अर्जुन उवाच
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| verse_line2  = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
</div>
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V54">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V54">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V54_B01" data-verse="BGB_C02_V54">
{{Bhashyam
<p>स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा , लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V54
<span class="gr-reference gr-ref-Harivamsha-id">‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च ।<br/>सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’</span> इति वचनान्तराच्च ।
| id       = BGB_C02_V54_B01
<p>किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् -</p>
| text    = स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा , लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च । सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च । किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् - ‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि । तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये । न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’ इति वचनात् ॥५४ ॥
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि ।<br/>तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये ।<br/>न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’</span> इति वचनात् ॥५४ ॥
}}
</div>


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V55" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V55
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
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| verse_line2  = आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V55">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V55">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V55_B01" data-verse="BGB_C02_V55">
{{Bhashyam
<p>गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’</span> इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्-</p>
| verse_id = BGB_C02_V55
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । <br/>उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’</span> इति ।
| id       = BGB_C02_V55_B01
<p>अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् ।</p>
| text    = गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् ।
</div>
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V55_B02" data-verse="BGB_C02_V55">
{{Bhashyam
<p>न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V55
<span class="gr-reference gr-ref-Smruthi-id">‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् ।<br/>  ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’</span> इति स्मृतेः ।
| id       = BGB_C02_V55_B02
<p>मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति ।</p>
| text    = न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति । ‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥
<span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः ।<br/> देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’</span> इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥
}}
</div>


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V56" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V56
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
</div>
| verse_line2  = वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V56">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V56">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V56_B01" data-verse="BGB_C02_V56">
{{Bhashyam
<p>तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’</span> इति । शोभनाध्यासो रागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’</span> इत्यभिधानम् ॥५६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V56
</div>
| id       = BGB_C02_V56_B01
| text    = तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - ‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’ इति । शोभनाध्यासो रागः । ‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’ इत्यभिधानम् ॥५६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V57" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V57
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
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| verse_line2  = नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V58" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V58
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
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| verse_line2  = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V58">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V58">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V58_B01" data-verse="BGB_C02_V58">
{{Bhashyam
<p>सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य <span class="gr-moola">नाभिनन्दति न द्वेष्टि</span> ॥५७, ५८॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V58
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| id       = BGB_C02_V58_B01
| text    = सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि ॥५७, ५८॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V59" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V59
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
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| verse_line2  = रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V59">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V59">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V59_B01" data-verse="BGB_C02_V59">
{{Bhashyam
<p>न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - <span class="gr-prateeka">विषया इति ॥</span> <br/></p>
| verse_id = BGB_C02_V59
  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः ।<br/>वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९)</span></span> इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥
| id       = BGB_C02_V59_B01
</div>
| text    = न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - विषया इति ॥ ‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः । वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V60" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V60
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
</div>
| verse_line2  = इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V60">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V60">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V60_B01" data-verse="BGB_C02_V60">
{{Bhashyam
<p>अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । <span class="gr-moola">पुरुषस्य</span> शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? <span class="gr-moola">प्रमाथीनि</span> प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V60
</div>
| id       = BGB_C02_V60_B01
| text    = अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । पुरुषस्य शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V61" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V61
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
</div>
| verse_line2  = वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V61">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V61">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V61_B01" data-verse="BGB_C02_V61">
{{Bhashyam
<p>तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - <span class="gr-prateeka">तानीति ॥</span> बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । <span class="gr-moola">युक्तो</span> मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स <span class="gr-moola">मत्परः</span> । फलमाह - <span class="gr-prateeka">वशे हीति ॥६१॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V61
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| id       = BGB_C02_V61_B01
| text    = तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - तानीति ॥ बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । युक्तो मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स मत्परः । फलमाह - वशे हीति ॥६१॥
}}


</div>
</div>
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</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C02_V62" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V62
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
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| verse_line2  = सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C02_V63" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V63
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
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| verse_line2  = स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V63">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V63">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V63_B01" data-verse="BGB_C02_V63">
{{Bhashyam
<p>सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’</span> इति । तथा चान्यत्र - <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’</span> इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् -</p>
| verse_id = BGB_C02_V63
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा ।<br/>दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’</span> इति ॥ ६२, ६३ ॥
| id       = BGB_C02_V63_B01
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| text    = सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् - ‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा । दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥
}}


</div>
</div>
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</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C02_V64" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V64
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।
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| verse_line2  = आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V64">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V64">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V64_B02" data-verse="BGB_C02_V64">
{{Bhashyam
<p>विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । <span class="gr-moola">प्रसादं</span> मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V64
</div>
| id       = BGB_C02_V64_B02
| text    = विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । प्रसादं मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V65" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V65
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
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| verse_line2  = प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V65">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V65">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V65_B01" data-verse="BGB_C02_V65">
{{Bhashyam
<p>कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V65
</div>
| id       = BGB_C02_V65_B01
| text    = कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V66" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V66
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
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| verse_line2  = न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="introduction" id="BGB_C02_V66_I01" data-verse="BGB_C02_V66">
<div class="introduction" id="BGB_C02_V66_I01" data-verse="BGB_C02_V66">
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{{Bhashyam
<p>न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । <span class="gr-moola">अयुक्तस्य च बुद्धिः</span> सम्यग्ज्ञानं <span class="gr-moola">नास्ति</span> । तदेवोपपादयति - <span class="gr-prateeka">न चायुक्तस्येति ॥</span> <span class="gr-moola">शान्तिः</span> मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V66
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| id       = BGB_C02_V66_B01
| text    = न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं नास्ति । तदेवोपपादयति - न चायुक्तस्येति ॥ शान्तिः मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V67" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V67
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
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| verse_line2  = तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - <span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणामिति ॥</span> <span class="gr-moola">अनुविधीयते</span> क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । <span class="gr-moola">प्रज्ञां</span> प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V67
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| id       = BGB_C02_V67_B01
| text    = कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - इन्द्रियाणामिति ॥ अनुविधीयते क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । प्रज्ञां प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V68" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V68
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥</span>
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| verse_line1  = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
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| verse_line2  = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - <span class="gr-prateeka">तस्मादिति ॥ ६८ ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C02_V68
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| id       = BGB_C02_V68_B01
| text    = तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - तस्मादिति ॥ ६८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C02_V69" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V69
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
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| verse_line2  = यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V69">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V69">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V69_B01" data-verse="BGB_C02_V69">
{{Bhashyam
<p>उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - <span class="gr-prateeka">या निशेति ॥</span> <span class="gr-moola">या सर्वभूतानां निशा</span> परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, <span class="gr-moola">तस्याम्</span> इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी <span class="gr-moola">जागर्ति</span> । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । <span class="gr-moola">यस्यां</span> विषयलक्षणायां <span class="gr-moola">भूतानि जाग्रति</span> तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘देहं तु तं न चरमम्’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७)</span></span> इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V69
</div>
| id       = BGB_C02_V69_B01
| text    = उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - या निशेति ॥ या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, तस्याम् इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी जागर्ति । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’ , ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V70" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V70
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।
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| verse_line2  = तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V70">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V70">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V70_B01" data-verse="BGB_C02_V70">
{{Bhashyam
<p>तेन विषयानुभवप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">आपूर्यमाणमिति ॥</span> यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् <span class="gr-moola">आप्नोति</span> इत्यर्थः ॥ ७० ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V70
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| id       = BGB_C02_V70_B01
| text    = तेन विषयानुभवप्रकारमाह - आपूर्यमाणमिति ॥ यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् आप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V71" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V71
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
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| verse_line2  = निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V71">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V71">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V71_B01" data-verse="BGB_C02_V71">
{{Bhashyam
<p>एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">विहायेति ॥</span> <span class="gr-moola">कामान्</span> विषयान् निःस्पृहतया <span class="gr-moola">विहाय</span> <span class="gr-moola">यश्चरति</span> भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् <span class="gr-moola">अधिगच्छति</span> इत्यर्थः ॥ ७१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V71
</div>
| id       = BGB_C02_V71_B01
| text    = एतदेव प्रपञ्चयति - विहायेति ॥ कामान् विषयान् निःस्पृहतया विहाय यश्चरति भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् अधिगच्छति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C02_V72" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C02_V72
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C02
<span class="shloka-line">स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
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| verse_line2  = स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V72">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C02_V72">
<div class="bhashya" id="BGB_C02_V72_B01" data-verse="BGB_C02_V72">
{{Bhashyam
<p>उपसंहरति - <span class="gr-prateeka">एषेति ॥</span> <span class="gr-moola">ब्राह्मी स्थितिः</span> ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । <span class="gr-moola">अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा</span> एव <span class="gr-moola">ब्रह्म</span> गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९)</span></span> इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’</span></span> इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः ।<br/>साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः‍॥’</span></span> इति गारुडे । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’।</span></span> इति नारदीये ।<br/>निश्चितफलं च ज्ञानम् - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५)</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V72
</div>
| id       = BGB_C02_V72_B01
| text    = उपसंहरति - एषेति ॥ ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा एव ब्रह्म गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः । साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः‍॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये । निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२) , ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V72_B02" data-verse="BGB_C02_V72">
{{Bhashyam
<p>न च कायव्यूहापेक्षा । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तद्यथैषीकातूलम्’(छां.उ.५.२४.३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘तद्यथा(तद्वक्ष्यामि यथा) पुष्करपलाशे’(छां.उ.४.१४.३)</span></span>, ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’(४.३७) इत्यादिवचनेभ्यः । प्रारब्धे त्वविरोधः । प्रमाणाभावाच्च । न च तत् शास्त्रं प्रमाणम्-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम् । <br/>मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः ॥’</span></span> इति निन्दनात् । <br/>यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव ; न सत्यत्वम् । न हि तेषामपि इतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम् । तथा ह्युक्तम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Varaha-id">‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति ।<br/>  त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ।<br/> अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । <br/> प्रकाशं कुरु चात्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु ॥’</span></span> इति वाराहे ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः ।<br/> चकार शास्त्राणि विभुर्ऋषयस्तत्प्रचोदिताः । <br/>  दधीच्याद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु ।<br/> चक्रुर्वेदैस्तु ब्राह्माणि वैष्णवान् विष्णुवेदतः ।<br/> पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा ।<br/> तथा पुराणं भागवतं विष्णुवेद इतीरितः ।<br/> अतः शैवपुराणानि योग्यान्यन्याविरोधतः॥‌’</span></span> इति च नारदीये ।<br/>अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः । भीष्मादीनां तु तस्मिन् क्षणे मुक्त्यभावः । ‘स्मरंस्त्यजति’ इति वर्तमानापदेशो हि कृतः ।तच्चोक्तम्-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘ज्ञानिनां कर्मयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा ।<br/>विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि ॥’</span></span>इति गारुडे ।<br/>नचान्येषां तदा स्मृतिर्भवति -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">‘बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम् ।<br/>भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा ॥’</span></span>इत्युक्तेर्ब्रह्मवैवर्ते ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V72
</div>
| id       = BGB_C02_V72_B02
| text    = न च कायव्यूहापेक्षा । ‘तद्यथैषीकातूलम्’(छां.उ.५.२४.३) , ‘तद्यथा(तद्वक्ष्यामि यथा) पुष्करपलाशे’(छां.उ.४.१४.३) , ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’(४.३७) इत्यादिवचनेभ्यः । प्रारब्धे त्वविरोधः । प्रमाणाभावाच्च । न च तत् शास्त्रं प्रमाणम्- ‘अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम् । मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः ॥’ इति निन्दनात् । यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव ; न सत्यत्वम् । न हि तेषामपि इतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम् । तथा ह्युक्तम्- ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु ॥’ इति वाराहे । ‘कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः । चकार शास्त्राणि विभुर्ऋषयस्तत्प्रचोदिताः । दधीच्याद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु । चक्रुर्वेदैस्तु ब्राह्माणि वैष्णवान् विष्णुवेदतः । पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा । तथा पुराणं भागवतं विष्णुवेद इतीरितः । अतः शैवपुराणानि योग्यान्यन्याविरोधतः॥‌’ इति च नारदीये । अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः । भीष्मादीनां तु तस्मिन् क्षणे मुक्त्यभावः । ‘स्मरंस्त्यजति’ इति वर्तमानापदेशो हि कृतः ।तच्चोक्तम्- ‘ज्ञानिनां कर्मयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा । विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि ॥’ इति गारुडे । नचान्येषां तदा स्मृतिर्भवति - ‘बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम् । भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा ॥’ इत्युक्तेर्ब्रह्मवैवर्ते ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V72_B03" data-verse="BGB_C02_V72">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">निर्बाणम्</span> अशरीरम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘कायो बाणं शरीरं च’</span></span> इत्यभिधानात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘एतद्बाणमवष्टभ्य’</span></span>इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११)</span></span> इति भागवते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परं ब्रह्म जनार्दनः’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९)</span></span>, ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmruti-id">‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८)</span></span>, ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२)</span></span> इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘केचित् स्वदेहे’</span></span> इत्यादौ रूपवान् उच्यते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwatropanishat-id">‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwatropanishat-id">‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwatropanishat-id">‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३)</span></span>इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते।
| verse_id = BGB_C02_V72
</div>
| id       = BGB_C02_V72_B03
| text    = निर्बाणम् अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’ इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०) , ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’ , ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९) , ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१) , ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८) , ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६) , ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१) , ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३) , ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८) , ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६) , ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३) इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V72_B04" data-verse="BGB_C02_V72">
{{Bhashyam
<p>अतिपरिपूर्णतम-ज्ञान-ऐश्वर्य-वीर्य-आनन्द-श्री-शक्त्यादिमांश्च भगवान् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shwetashwatropanishat-id">‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।’(श्वे.उ.६.८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.९,मु.उ.१.१.९)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘आनन्दं ब्रह्मणः’(तै.उ.ब्रह्मवल्लि.९)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadarnyakopanishat-id">‘एतस्यैवाऽनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उपजीवन्ति’ (बृह. ४,३.३२)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम्’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्’</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’(भाग.६.५,४८)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’(भाग.०३.१०.२४)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘तुर्यं (तु) तत् सर्वदृक् सदा’(माण्डूक्य.उ.२.४)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘आत्मानम् अन्यं च स वेद विद्वान्’(भाग.११.११.७)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘अन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः’(भाग.१.१८.२१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhannaradiya-id">‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य’(बृहन्नारदीय.१,४६.१७)</span></span><br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम् ।<br/>यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः ॥’</span></span>इत्यादिभ्यः ।</p>
| verse_id = BGB_C02_V72
</div>
| id       = BGB_C02_V72_B04
| text    = अतिपरिपूर्णतम-ज्ञान-ऐश्वर्य-वीर्य-आनन्द-श्री-शक्त्यादिमांश्च भगवान् । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।’(श्वे.उ.६.८) , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.९,मु.उ.१.१.९) , ‘आनन्दं ब्रह्मणः’(तै.उ.ब्रह्मवल्लि.९) , ‘एतस्यैवाऽनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उपजीवन्ति’ (बृह. ४,३.३२) , ‘अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम्’ , ‘सहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्’ , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’(भाग.६.५,४८) , ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’(भाग.०३.१०.२४) , ‘तुर्यं (तु) तत् सर्वदृक् सदा’(माण्डूक्य.उ.२.४) , ‘आत्मानम् अन्यं च स वेद विद्वान्’(भाग.११.११.७) , ‘अन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः’(भाग.१.१८.२१) , ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य’(बृहन्नारदीय.१,४६.१७) । ‘अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम् । यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः ॥’ इत्यादिभ्यः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C02_V72_B05" data-verse="BGB_C02_V72">
{{Bhashyam
<p>तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५)</span></span>,<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११)</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Sruti-id">‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।<br/>न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’,<br/> ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।<br/>ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’</span></span>इति पैङ्गिखिलेषु ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarta-id">‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः ।<br/>परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’</span></span>  इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते ।<br/>तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः ।<br/>न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः ।<br/>नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’</span></span> इति पाद्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ ।<br/>‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् ।<br/> लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् ।<br/>रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥<br/>योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह ।<br/>न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’</span></span> इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे ।<br/>न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः ।<br/>यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र ।<br/>तच्चोक्तम् - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः ।<br/>तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि ।<br/>परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’</span></span> इति गारुडे ।<br/>न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा ।<br/>न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’</span></span> इत्यादेश्च नारदीये ।<br/>तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी <span class="gr-moola">ऋच्छति</span> इति सिद्धम् ॥७२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C02_V72
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| id       = BGB_C02_V72_B05
| text    = तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि - ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५) , ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२) , ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२) , ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९) , ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) । ‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा । न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः । ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’ इति पैङ्गिखिलेषु । ‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः । परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः । न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः । नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे । ‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ । ‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् । रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥ योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह । न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे । न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः । यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र । तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः । तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि । परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे । न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् । ‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा । न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये । तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी ऋच्छति इति सिद्धम् ॥७२ ॥
}}


<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥</div>
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<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span>
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span>
== तृतीयोऽध्यायः ==
== तृतीयोऽध्यायः ==
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।</span>
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<span class="shloka-line">तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥</span>
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| verse_line1  = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।</span>
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<span class="shloka-line">तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥</span>
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<p>कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह- ज्यायसीति ॥ कर्मणः सकाशाद् बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते तव मता तत् तर्हि ॥ १-२ ॥</p>
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| text    = कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह- ज्यायसीति ॥ कर्मणः सकाशाद् बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते तव मता तत् तर्हि ॥ १-२ ॥
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<span class="shloka-line">श्रीभगवानुवाच</span>
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<p>‍‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- लोक इति ॥</p>
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| text    = ‍‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- लोक इति ॥
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<div class="bhashya" id="BGB_C03_V03_B02" data-verse="BGB_C03_V03">
{{Bhashyam
<p>द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । सांख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम् । योगिनाम् उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः । निष्ठा स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥</p>
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| id       = BGB_C03_V03_B02
| text    = द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । सांख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम् । योगिनाम् उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः । निष्ठा स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V04
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
</div>
| verse_line2  = न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V04_B01" data-verse="BGB_C03_V04">
{{Bhashyam
<p>इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह-<span class="gr-prateeka">न कर्मणामिति ॥ कर्मणां</span> युद्धादीनाम् अनारम्भेण<span class="gr-prateeka">नैष्कर्म्यं</span> निष्कर्मतया काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं, <span class="gr-prateeka">नाश्नुते</span> । ज्ञानमेव तत्साधनं, न तु कर्माकरणमित्यर्थः । कुतः ? पुरुषत्वात् । सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः ! यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणां च ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V04
</div>
| id       = BGB_C03_V04_B01
| text    = इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह- न कर्मणामिति ॥ कर्मणां युद्धादीनाम् अनारम्भेण नैष्कर्म्यं निष्कर्मतया काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं, नाश्नुते । ज्ञानमेव तत्साधनं, न तु कर्माकरणमित्यर्थः । कुतः ? पुरुषत्वात् । सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः ! यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणां च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V04_B02" data-verse="BGB_C03_V04">
{{Bhashyam
<p>न चाकरणे कर्माभावान्मुक्तिर्भवति । प्रतिजन्म कृतानाम् अनन्तानां कर्मणां भावात् । न च सर्वाणि कर्माणि भुक्तानि । एकस्मिन् शरीरे बहूनि हि कर्माणि करोति । तानि चैकैकानि बहुजन्मफलानि कानिचित् । तत्र चैकैकानि कर्माणि भुञ्जन् प्राप्नोत्येव शेषेण मानुष्यम् । ततश्च बहुशरीरफलानि कर्माणी-त्यसमाप्तिः । तच्चोक्तम्-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।<br/>स्त्री वाऽप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जते ॥<br/>चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः।<br/>अतोऽवित्त्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने ॥’</span></span>  इति ब्राह्मे ।<br/>यदि सादिः स्यात् संसारः पूर्वकर्माभावाद् अतत्प्राप्तिः। अबन्धकत्वं त्वकामेनैव भवति । तच्च वक्ष्यते ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V04
</div>
| id       = BGB_C03_V04_B02
| text    = न चाकरणे कर्माभावान्मुक्तिर्भवति । प्रतिजन्म कृतानाम् अनन्तानां कर्मणां भावात् । न च सर्वाणि कर्माणि भुक्तानि । एकस्मिन् शरीरे बहूनि हि कर्माणि करोति । तानि चैकैकानि बहुजन्मफलानि कानिचित् । तत्र चैकैकानि कर्माणि भुञ्जन् प्राप्नोत्येव शेषेण मानुष्यम् । ततश्च बहुशरीरफलानि कर्माणी-त्यसमाप्तिः । तच्चोक्तम्- ‘जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु । स्त्री वाऽप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जते ॥ चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः। अतोऽवित्त्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने ॥’ इति ब्राह्मे । यदि सादिः स्यात् संसारः पूर्वकर्माभावाद् अतत्प्राप्तिः। अबन्धकत्वं त्वकामेनैव भवति । तच्च वक्ष्यते ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V04_B03" data-verse="BGB_C03_V04">
{{Bhashyam
<p>ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manave-id">‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते ।<br/>निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे ।</span></span><br/>अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह-<span class="gr-prateeka">न चेति ॥</span><span class="gr-prateeka">सन्न्यासः</span> काम्यकर्मपरित्यागः । ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ (१८.२) इति वक्ष्यमाणत्वात् । अकामकर्मणाम् अन्तःकरणशुध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति । तच्चोक्तम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘कर्मभिश्शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि ।’</span></span> इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमित्युक्तम् । -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न तस्य तत्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचस्समासन् ।<br/>स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेध(धि)सौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’ (भाग. ५-११-३)</span></span> इति ।<br/> न तु फलाभावात् । कर्माभावात् । अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम् ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V04
</div>
| id       = BGB_C03_V04_B03
| text    = ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः - ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते । निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे । अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह- न चेति ॥ सन्न्यासः काम्यकर्मपरित्यागः । ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ (१८.२) इति वक्ष्यमाणत्वात् । अकामकर्मणाम् अन्तःकरणशुध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति । तच्चोक्तम्- ‘कर्मभिश्शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि ।’ इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमित्युक्तम् । - ‘न तस्य तत्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचस्समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेध(धि)सौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’ (भाग. ५-११-३) इति । न तु फलाभावात् । कर्माभावात् । अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V04_B04" data-verse="BGB_C03_V04">
{{Bhashyam
<p>यत्याश्रमस्तु प्रायत्यार्थो भगवत्तोषार्थश्च । अप्रयतत्वमेव हि प्रायो गृहस्थादीनाम् , इतरकर्मोद्योगात् । अप्रयतानां च न ज्ञानम् । तथाहि श्रुतिः -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘नाशान्तो नासमाहितः’(कठ.1.3.10)</span></span>इति । महांश्च यत्याश्रमे तोषो भगवतः । तथा ह्याह - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘यत्याश्रमं तुरीयं तु दीक्षां मम सुतोषणीम्’</span></span> इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । आधिकारिकास्तु तत्स्था एव प्रायत्ये समर्थाः । स एव च महान् भगवत्तोषः । तच्चोक्तम् -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘देवादीनामादिराज्ञां महोद्योगेऽपि नो मनः ।<br/>विष्णोश्चलति तद्भोगोऽप्यतीव हरितोष(णम्)णः॥’</span></span> इति पाद्मे ॥४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V04
</div>
| id       = BGB_C03_V04_B04
| text    = यत्याश्रमस्तु प्रायत्यार्थो भगवत्तोषार्थश्च । अप्रयतत्वमेव हि प्रायो गृहस्थादीनाम् , इतरकर्मोद्योगात् । अप्रयतानां च न ज्ञानम् । तथाहि श्रुतिः - ‘नाशान्तो नासमाहितः’(कठ.1.3.10) इति । महांश्च यत्याश्रमे तोषो भगवतः । तथा ह्याह - ‘यत्याश्रमं तुरीयं तु दीक्षां मम सुतोषणीम्’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । आधिकारिकास्तु तत्स्था एव प्रायत्ये समर्थाः । स एव च महान् भगवत्तोषः । तच्चोक्तम् - ‘देवादीनामादिराज्ञां महोद्योगेऽपि नो मनः । विष्णोश्चलति तद्भोगोऽप्यतीव हरितोष(णम्)णः॥’ इति पाद्मे ॥४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
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| verse_line2  = कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V05_B01" data-verse="BGB_C03_V05">
{{Bhashyam
<p>न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- न हीति ॥५॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V05
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| id       = BGB_C03_V05_B01
| text    = न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- न हीति ॥५॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।</span>
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<span class="shloka-line">इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
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| verse_line2  = इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C03_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।
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| verse_line2  = कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V07">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V07_B01" data-verse="BGB_C03_V07">
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<p>तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- कर्मेन्द्रियाणीति ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V07
<p>मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥</p>
| id       = BGB_C03_V07_B01
</div>
| text    = तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- कर्मेन्द्रियाणीति ॥ मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।</span>
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<span class="shloka-line">शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥</span>
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| verse_line1  = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
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| verse_line2  = शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>अतो नियतं स्ववर्णाश्रमोचितं कर्म कुरु ॥ ८ ॥</p>
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| id       = BGB_C03_V08_B01
| text    = अतो नियतं स्ववर्णाश्रमोचितं कर्म कुरु ॥ ८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥</span>
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| verse_line1  = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
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| verse_line2  = तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V09_B01" data-verse="BGB_C03_V09">
{{Bhashyam
<p>‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः । यज्ञो विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः । ‘मुक्तसङ्गः’ इति विशेषणात् । <span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२)</span> इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२)</span> इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V09
</div>
| id       = BGB_C03_V09_B01
| text    = ‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः । यज्ञो विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः । ‘मुक्तसङ्गः’ इति विशेषणात् । ‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२) इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । ‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२) इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V10
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
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| verse_line2  = अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
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| verse_line2  = परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
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| verse_line2  = तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
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| verse_line2  = भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V13">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V13">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V13_B01" data-verse="BGB_C03_V13">
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<p>अत्रार्थवादमाह- सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V13
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| id       = BGB_C03_V13_B01
| text    = अत्रार्थवादमाह- सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C03_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।</span>
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<span class="shloka-line">यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥</span>
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| verse_line1  = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।
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| verse_line2  = यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V14_B01" data-verse="BGB_C03_V14">
{{Bhashyam
<p>हेत्वन्तरमाह- अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् ।</p>
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</div>
| id       = BGB_C03_V14_B01
| text    = हेत्वन्तरमाह- अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V14_B02" data-verse="BGB_C03_V14">
{{Bhashyam
<p>मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च यज्ञाद् भवति ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V14
<span class="gr-reference gr-ref-Manusmriti-id">‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । <br/> आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) ।</span>
| id       = BGB_C03_V14_B02
<p>उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः, कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥</p>
| text    = मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च यज्ञाद् भवति । ‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः, कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V15
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
</div>
| verse_line2  = तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B01" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>कर्म ब्रह्मणो जायते । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौ.3.9), ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’(गी.10.4) इत्यादिभ्यः । न च मुख्ये सम्भाव्यमाने पारम्पर्येणौपचारिकं कल्प्यम् । न च जडानां स्वतः प्रवृत्तिः सम्भवति । ‘एतस्य वा अक्षरस्य’ इत्यादिसर्वनियमनश्रुतेश्च । ‘द्रव्यं कर्म च’ इत्यादेश्च अचिन्त्यशक्तिश्चोक्ता । जीवस्य च प्रतिबिम्बस्य बिम्बपूर्वैव चेष्टा । ‘न कर्तृत्वम्’ इत्यादिनिषेधाच्च ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
</div>
| id       = BGB_C03_V15_B01
| text    = कर्म ब्रह्मणो जायते । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौ.3.9), ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’(गी.10.4) इत्यादिभ्यः । न च मुख्ये सम्भाव्यमाने पारम्पर्येणौपचारिकं कल्प्यम् । न च जडानां स्वतः प्रवृत्तिः सम्भवति । ‘एतस्य वा अक्षरस्य’ इत्यादिसर्वनियमनश्रुतेश्च । ‘द्रव्यं कर्म च’ इत्यादेश्च अचिन्त्यशक्तिश्चोक्ता । जीवस्य च प्रतिबिम्बस्य बिम्बपूर्वैव चेष्टा । ‘न कर्तृत्वम्’ इत्यादिनिषेधाच्च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B02" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>अक्षराणि प्रसिद्धानि । तेभ्यो ह्यभिव्यज्यते परं ब्रह्म । अन्यथानादिनिधनमचिन्त्यं परिपूर्णमपि ब्रह्म को जानाति? न च रूढिं विना योगाङ्गीकारो युक्तः ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
</div>
| id       = BGB_C03_V15_B02
| text    = अक्षराणि प्रसिद्धानि । तेभ्यो ह्यभिव्यज्यते परं ब्रह्म । अन्यथानादिनिधनमचिन्त्यं परिपूर्णमपि ब्रह्म को जानाति? न च रूढिं विना योगाङ्गीकारो युक्तः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B03" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>परामर्शाच्च ‘तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म’ (३.१५) इति । न ह्येकशब्देन द्विरुक्तेन भेदश्रुतिं विना वस्तुद्वयं कुत्रचिदुच्यते ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
</div>
| id       = BGB_C03_V15_B03
| text    = परामर्शाच्च ‘तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म’ (३.१५) इति । न ह्येकशब्देन द्विरुक्तेन भेदश्रुतिं विना वस्तुद्वयं कुत्रचिदुच्यते ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B04" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>तानि चाक्षराणि नित्यानि । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ. ८.६४.६)</span> , ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutrani-id">‘अत एव च नित्यत्वम्’ (ब्र.सू. १-३-२९)</span> इत्यादिश्रुतिस्मृति-भगवद्वचनेभ्यः । दोषाश्चोक्ताः सकर्तृकत्वे ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
</div>
| id       = BGB_C03_V15_B04
| text    = तानि चाक्षराणि नित्यानि । ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ. ८.६४.६) , ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, ‘अत एव च नित्यत्वम्’ (ब्र.सू. १-३-२९) इत्यादिश्रुतिस्मृति-भगवद्वचनेभ्यः । दोषाश्चोक्ताः सकर्तृकत्वे ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B05" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । <span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘सोऽकामयत’ (तै. २.११)</span> इत्यादेश्च । <span class="gr-reference gr-ref-Brihdaranyakopanishat-id">‘इष्टं हुतम्’ (बृ. ६.१.२)</span> इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च । महातात्पर्यविरोधाच्च । तच्चोक्तं पुरस्तात् (गी.भा. २.२४)। न ह्यस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम् । अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति । यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि , अभिमानिदेवताविषयाणि च । ‘नित्या’ इत्युक्त्वा ‘उत्सृष्टा’ इति वचनात् । अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्ति । ‘कृत्स्नं शतपथं चक्रे’ (मोक्षधर्मे) इति । कथमादित्यस्था वेदाः तेनैव क्रियन्ते ? वचनमात्राच्च निर्णयात्मक-शारीरकोक्तं बलवत् ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
</div>
| id       = BGB_C03_V15_B05
| text    = न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । ‘सोऽकामयत’ (तै. २.११) इत्यादेश्च । ‘इष्टं हुतम्’ (बृ. ६.१.२) इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च । महातात्पर्यविरोधाच्च । तच्चोक्तं पुरस्तात् (गी.भा. २.२४)। न ह्यस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम् । अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति । यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि , अभिमानिदेवताविषयाणि च । ‘नित्या’ इत्युक्त्वा ‘उत्सृष्टा’ इति वचनात् । अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्ति । ‘कृत्स्नं शतपथं चक्रे’ (मोक्षधर्मे) इति । कथमादित्यस्था वेदाः तेनैव क्रियन्ते ? वचनमात्राच्च निर्णयात्मक-शारीरकोक्तं बलवत् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V15_B06" data-verse="BGB_C03_V15">
{{Bhashyam
<p>शास्त्रं योनिः प्रमाणमस्येति तु शास्त्रयोनित्वम् । ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्ते प्रमाणं हि तत्रापेक्षितं, न तु तस्य जातत्वं वेदकारणत्वं वा । न हि वेदकारणत्वं जगत्कारणत्वे हेतुः । न हि विचित्रजगत्सृष्टेर्वेदसृष्टिरशक्या सृज्यत्वे । न च सर्वज्ञत्वे । यदि वेदस्रष्टा सर्वज्ञः किमिति न जगत्स्रष्टा ? तस्माद् वेदप्रमाणकत्वमेवात्र विवक्षितम् । अतो नित्यान्यक्षराणि ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V15
<p>यत एवं परम्परया यज्ञाभिव्यङ्ग्यं ब्रह्म तस्मात् तद् नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥</p>
| id       = BGB_C03_V15_B06
</div>
| text    = शास्त्रं योनिः प्रमाणमस्येति तु शास्त्रयोनित्वम् । ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्ते प्रमाणं हि तत्रापेक्षितं, न तु तस्य जातत्वं वेदकारणत्वं वा । न हि वेदकारणत्वं जगत्कारणत्वे हेतुः । न हि विचित्रजगत्सृष्टेर्वेदसृष्टिरशक्या सृज्यत्वे । न च सर्वज्ञत्वे । यदि वेदस्रष्टा सर्वज्ञः किमिति न जगत्स्रष्टा ? तस्माद् वेदप्रमाणकत्वमेवात्र विवक्षितम् । अतो नित्यान्यक्षराणि । यत एवं परम्परया यज्ञाभिव्यङ्ग्यं ब्रह्म तस्मात् तद् नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
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| verse_line2  = अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_16_B01" data-verse="BGB_C03_V16">
{{Bhashyam
<p>तानि चाक्षराणि भूताभिव्यङ्ग्यानीति चक्रम् । तदेतत् जगच्चक्रं यो नानुवर्तयति, स तद्विनाशकत्वाद् अघायुः । पापनिमित्तमेव यस्याऽयुः सोऽघायुः ॥ १६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V16
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| id       = BGB_C03_16_B01
| text    = तानि चाक्षराणि भूताभिव्यङ्ग्यानीति चक्रम् । तदेतत् जगच्चक्रं यो नानुवर्तयति, स तद्विनाशकत्वाद् अघायुः । पापनिमित्तमेव यस्याऽयुः सोऽघायुः ॥ १६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।
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| verse_line2  = आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V17_B01" data-verse="BGB_C03_V17">
{{Bhashyam
<p>तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V17
</div>
| id       = BGB_C03_V17_B01
| text    = तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V17_B02" data-verse="BGB_C03_V17">
{{Bhashyam
<p>महच्च तत् सुखम् । तेनैवान्यत्रालम्बुद्धिरिति दर्शयति । आत्मन्येव च सन्तुष्टः, इति तत्स्थ एव सन् सन्तुष्ट इत्यर्थः । नान्यत् किमपि सन्तोषकारणम् इत्यवधारणम् । आत्मना तृप्तः । न ह्यात्मन्यलम्बुद्धिर्युक्ता । तद्वाचित्वं च ‘वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमैः’ (भाग. १.१.१९) इति प्रयोगात् सिद्धम् । अध्याहारस्त्वगतिका गतिः ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V17
</div>
| id       = BGB_C03_V17_B02
| text    = महच्च तत् सुखम् । तेनैवान्यत्रालम्बुद्धिरिति दर्शयति । आत्मन्येव च सन्तुष्टः, इति तत्स्थ एव सन् सन्तुष्ट इत्यर्थः । नान्यत् किमपि सन्तोषकारणम् इत्यवधारणम् । आत्मना तृप्तः । न ह्यात्मन्यलम्बुद्धिर्युक्ता । तद्वाचित्वं च ‘वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमैः’ (भाग. १.१.१९) इति प्रयोगात् सिद्धम् । अध्याहारस्त्वगतिका गतिः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB C03 V17 B03" data-verse="BGB_C03_V17">
{{Bhashyam
<p>‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V17
<span class="gr-reference gr-ref-Pancharatra-id">‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’</span> इति वचनाच्च पञ्चरात्रे ।
| id       = BGB C03 V17 B03
<p>अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ ।</p>
| text    = ‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते । ‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’ इति वचनाच्च पञ्चरात्रे । अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ ।
</div>
}}


<div class="bhashya" id="BGB C03 V17 B04" data-verse="BGB_C03_V17">
{{Bhashyam
<p>अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधावेवैतत् । ‘मानवः’ इति ज्ञानिन एवासम्प्रज्ञातसमाधिर्भवतीति दर्शयति ‘मनु अवबोधने’ इति धातोः ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V17
<p>परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता ।</p>
| id       = BGB C03 V17 B04
<p>‘विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि ।’इति वचनात् ॥ १७ ॥</p>
| text    = अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधावेवैतत् । ‘मानवः’ इति ज्ञानिन एवासम्प्रज्ञातसमाधिर्भवतीति दर्शयति ‘मनु अवबोधने’ इति धातोः । परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता । ‘विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि ।’इति वचनात् ॥ १७ ॥
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}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V18
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
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| verse_line2  = न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V18_B01" data-verse="BGB_C03_V18">
{{Bhashyam
<p>तस्य ‘कर्मकाले वक्तव्योऽहम्’ इति कञ्चित् प्रत्युक्त्वा तत्कृतावात्मरत्यधिकः समो वाऽर्थो नास्ति । न च सन्ध्याद्यकृतौ कश्चिद्दोषोऽस्ति ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V18
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| id       = BGB_C03_V18_B01
| text    = तस्य ‘कर्मकाले वक्तव्योऽहम्’ इति कञ्चित् प्रत्युक्त्वा तत्कृतावात्मरत्यधिकः समो वाऽर्थो नास्ति । न च सन्ध्याद्यकृतौ कश्चिद्दोषोऽस्ति ।
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<div class="bhashya" id="BGB C03 V18 B02" data-verse="BGB_C03_V18">
{{Bhashyam
<p>न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ व्यपाश्रयः ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V18
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| id       = BGB C03 V18 B02
| text    = न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ व्यपाश्रयः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB C033 V18 B03" data-verse="BGB_C03_V18">
{{Bhashyam
<p>ज्ञानमात्रेण प्रत्यवायो यद्यपि न भवति । तद् अर्जुनस्यापि समम् इति न तस्य कर्मोपदेशोपयोग्येतद् भवति । ईषत् प्रारब्धानर्थसूचकं च तद् भवति महच्चेद् वृत्रहत्यादिवत् ॥ १८ ॥</p>
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</div>
| id       = BGB C033 V18 B03
| text    = ज्ञानमात्रेण प्रत्यवायो यद्यपि न भवति । तद् अर्जुनस्यापि समम् इति न तस्य कर्मोपदेशोपयोग्येतद् भवति । ईषत् प्रारब्धानर्थसूचकं च तद् भवति महच्चेद् वृत्रहत्यादिवत् ॥ १८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।</span>
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<span class="shloka-line">असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥</span>
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| verse_line1  = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
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| verse_line2  = असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V19_B01" data-verse="BGB_C03_V19">
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<p>यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः, तस्मात् कर्म समाचर ॥१९॥</p>
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| id       = BGB_C03_V19_B01
| text    = यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः, तस्मात् कर्म समाचर ॥१९॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
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| verse_line2  = लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V20">
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<div class="bhashya" id="BGB_C03_V20_B01" data-verse="BGB_C03_V20">
{{Bhashyam
<p>आचारोऽप्यस्तीत्याह-<span class="gr-prateeka">कर्मणैवेति ॥</span><span class="gr-prateeka">कर्मणा</span> सह कर्म कुवन्त एवेत्यर्थः । कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V20
</div>
| id       = BGB_C03_V20_B01
| text    = आचारोऽप्यस्तीत्याह- कर्मणैवेति ॥ कर्मणा सह कर्म कुवन्त एवेत्यर्थः । कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V20_B02" data-verse="BGB_C03_V20">
{{Bhashyam
<p>न तु ज्ञानं विना । प्रसिद्धं हि तेषां ज्ञानित्वं भारतादिषु । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittariya-Aranyaka-id">‘तमेवं विद्वान्’ (तै.आ. ३.१२)</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । अत्रापि कर्मणां ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च ‘बुद्धियुक्ताः’ (२.५१) इति ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V20
</div>
| id       = BGB_C03_V20_B02
| text    = न तु ज्ञानं विना । प्रसिद्धं हि तेषां ज्ञानित्वं भारतादिषु । ‘तमेवं विद्वान्’ (तै.आ. ३.१२) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । अत्रापि कर्मणां ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च ‘बुद्धियुक्ताः’ (२.५१) इति ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V20_B03" data-verse="BGB_C03_V20">
{{Bhashyam
<p>गत्यन्तरं च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittariya-Aranyaka-id">‘नान्यः पन्थाः’ (तै.आ.३.१२)</span></span> इत्यस्य नास्ति । इतरेषां ज्ञानद्वाराऽप्यविरोधः । यत्र च तीर्थाद्येव मुक्तिसाधनमुच्यते-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘ब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा ।<br/> अथवा स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ ॥’</span></span><br/> इत्यादौ, तत्र पापादिमुक्तिः, स्तुतिपरता च ।</p>
| verse_id = BGB_C03_V20
</div>
| id       = BGB_C03_V20_B03
| text    = गत्यन्तरं च ‘नान्यः पन्थाः’ (तै.आ.३.१२) इत्यस्य नास्ति । इतरेषां ज्ञानद्वाराऽप्यविरोधः । यत्र च तीर्थाद्येव मुक्तिसाधनमुच्यते- ‘ब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा । अथवा स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ ॥’ इत्यादौ, तत्र पापादिमुक्तिः, स्तुतिपरता च ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C03_V20_B04" data-verse="BGB_C03_V20">
{{Bhashyam
<p>तत्रापि हि कुत्रचिद् ब्रह्मज्ञानसाधनत्वमेवोच्यतेऽन्यथा मुक्तिं निषिध्य<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">- ‘ब्रह्मज्ञानं विना मुक्तिर्न कथञ्चिदपीष्यते ।<br/> प्रयागादेस्तु या मुक्तिर्ज्ञानोपायत्वमेव हि ॥’</span></span> इत्यादौ ।<br/> न च तीर्थस्तुतिवाक्यानि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तं ज्ञाननियमं घ्नन्ति । यथा कञ्चिद् दक्षं भृत्यं प्रति उक्तानि ‘अयमेव हि राजा किं राज्ञा’ इत्यादीनि । यथाऽऽह भगवान् -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘यानि तीर्थादिवाक्यानि कर्मादिविषयाणि च ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C03_V20
<p>स्तावकान्येव तानि स्युरज्ञानां मोहकानि वा ।<br/>भवेन्मोक्षस्तु मद्दृष्टेर्नान्यतस्तु कथञ्चन ॥’</span></span> इति नारदीये ।<br/>अतोऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्षः । कर्म तु तत्साधनमेव ॥ २० ॥</p>
| id       = BGB_C03_V20_B04
</div>
| text    = तत्रापि हि कुत्रचिद् ब्रह्मज्ञानसाधनत्वमेवोच्यतेऽन्यथा मुक्तिं निषिध्य - ‘ब्रह्मज्ञानं विना मुक्तिर्न कथञ्चिदपीष्यते । प्रयागादेस्तु या मुक्तिर्ज्ञानोपायत्वमेव हि ॥’ इत्यादौ । न च तीर्थस्तुतिवाक्यानि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तं ज्ञाननियमं घ्नन्ति । यथा कञ्चिद् दक्षं भृत्यं प्रति उक्तानि ‘अयमेव हि राजा किं राज्ञा’ इत्यादीनि । यथाऽऽह भगवान् - ‘यानि तीर्थादिवाक्यानि कर्मादिविषयाणि च । स्तावकान्येव तानि स्युरज्ञानां मोहकानि वा । भवेन्मोक्षस्तु मद्दृष्टेर्नान्यतस्तु कथञ्चन ॥’ इति नारदीये । अतोऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्षः । कर्म तु तत्साधनमेव ॥ २० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
</div>
| verse_line2  = स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V21_B01" data-verse="BGB_C03_V21">
{{Bhashyam
<p>स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते , यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V21
</div>
| id       = BGB_C03_V21_B01
| text    = स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते , यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥</span>
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</div>
| verse_line1  = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
</div>
| verse_line2  = नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C03_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V23
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।</span>
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<span class="shloka-line">मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥</span>
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| verse_line1  = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
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| verse_line2  = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V24
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥</span>
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| verse_line1  = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
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| verse_line2  = सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V25
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥</span>
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| verse_line1  = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
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<div class="verse" id="BGB_C03_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C03_V26
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<span class="shloka-line">न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥</span>
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| verse_line1  = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C03_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V27
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<span class="shloka-line">प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।</span>
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<span class="shloka-line">अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
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| verse_line2  = अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V27">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V27">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V27_B01" data-verse="BGB_C03_V27">
{{Bhashyam
<p>विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V27
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| id       = BGB_C03_V27_B01
| text    = विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V28
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
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| verse_line2  = गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V28_B01" data-verse="BGB_C03_V28">
{{Bhashyam
<p>कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित् । गुणा इन्द्रियादीनि । गुणेषु विषयेषु ॥ २८ ॥</p>
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</div>
| id       = BGB_C03_V28_B01
| text    = कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित् । गुणा इन्द्रियादीनि । गुणेषु विषयेषु ॥ २८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V29
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
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| verse_line2  = तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V29">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V29_B01" data-verse="BGB_C03_V29">
{{Bhashyam
<p>प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘शब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च । अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः ॥’</span></p>
| verse_id = BGB_C03_V29
<p>इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥</p>
| id       = BGB_C03_V29_B01
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| text    = प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । ‘शब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च । अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः ॥’ इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V30
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
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| verse_line2  = निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V30">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V30">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V30_B01" data-verse="BGB_C03_V30">
{{Bhashyam
<p>अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V30
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| id       = BGB_C03_V30_B01
| text    = अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V31
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
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| verse_line2  = श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V32
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
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| verse_line2  = सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V32">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V32">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V32_B01" data-verse="BGB_C03_V32">
{{Bhashyam
<p>फलमाह- ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते । <span class="gr-reference gr-ref-Narayanashtaksharakalpa-id">‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’</span></p>
| verse_id = BGB_C03_V32
<p>इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।</p>
| id       = BGB_C03_V32_B01
<p>अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥</p>
| text    = फलमाह- ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते । ‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V33
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
</div>
| verse_line2  = प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V33">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V33">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V33_B01" data-verse="BGB_C03_V33">
{{Bhashyam
<p>एवं चेत् किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह - सदृशमिति । प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः ॥ ३३ ॥</p>
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| id       = BGB_C03_V33_B01
| text    = एवं चेत् किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह - सदृशमिति । प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः ॥ ३३ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V34" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V34
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
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| verse_line2  = तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V34">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V34">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V34_B01" data-verse="BGB_C03_V34">
{{Bhashyam
<p>तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- इन्द्रियस्येति ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V34
<p>तथा ह्युक्तम् - <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥</span></p>
| id       = BGB_C03_V34_B01
</div>
| text    = तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- इन्द्रियस्येति ॥ तथा ह्युक्तम् - ‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V35
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
</div>
| verse_line2  = स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V35">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V35">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V35_B01" data-verse="BGB_C03_V35">
{{Bhashyam
<p>तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- श्रेयानिति ॥ ३५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V35
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| id       = BGB_C03_V35_B01
| text    = तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- श्रेयानिति ॥ ३५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V36
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
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| verse_line2  = अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V36">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V36">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V36_B01" data-verse="BGB_C03_V36">
{{Bhashyam
<p>बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति-<span class="gr-prateeka">अथेति ॥</span> अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V36
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| id       = BGB_C03_V36_B01
| text    = बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति- अथेति ॥ अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V37
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
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| verse_line2  = महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V37">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V37">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V37_B01" data-verse="BGB_C03_V37">
{{Bhashyam
<p>यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः । क्रोधो ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति । महाशनः । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् महापाप्मा । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V37
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| id       = BGB_C03_V37_B01
| text    = यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः । क्रोधो ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति । महाशनः । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् महापाप्मा । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V38
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
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| verse_line2  = यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V38">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V38">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V38_B01" data-verse="BGB_C03_V38">
{{Bhashyam
<p>कथं विरोधी सः ? इदमनेनावृतम् । यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाश-रूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा । यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति, तथाऽन्तःकरणं परमात्मा-देर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम् । यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भस्तथा कामेन जीवः ॥ ३८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V38
</div>
| id       = BGB_C03_V38_B01
| text    = कथं विरोधी सः ? इदमनेनावृतम् । यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाश-रूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा । यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति, तथाऽन्तःकरणं परमात्मा-देर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम् । यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भस्तथा कामेन जीवः ॥ ३८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V39
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
</div>
| verse_line2  = कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V39">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V39">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V39_B01" data-verse="BGB_C03_V39">
{{Bhashyam
<p>शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा । दुष्पूरेण दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती अनलः । उक्तं च- <span class="gr-reference gr-ref-Pramanashloka-id">‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C03_V39
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| id       = BGB_C03_V39_B01
| text    = शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा । दुष्पूरेण दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती अनलः । उक्तं च- ‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V40
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
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| verse_line2  = एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V40">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V40">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V40_B01" data-verse="BGB_C03_V40">
{{Bhashyam
<p>वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V40
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| id       = BGB_C03_V40_B01
| text    = वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V41
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
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| verse_line2  = पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V41">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V41">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V41_B01" data-verse="BGB_C03_V41">
{{Bhashyam
<p>हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति ॥ ४१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V41
</div>
| id       = BGB_C03_V41_B01
| text    = हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति ॥ ४१ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C03_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V42
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C03
<span class="shloka-line">मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥</span>
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| verse_line1  = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
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| verse_line2  = मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C03_V43" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C03_V43
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।</span>
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<span class="shloka-line">जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥</span>
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| verse_line1  = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
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| verse_line2  = जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V43">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C03_V43">
<div class="bhashya" id="BGB_C03_V43_B01" data-verse="BGB_C03_V43">
{{Bhashyam
<p>शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह-<span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणीति ॥</span> ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । शरीराद्<span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणि पराणि</span> उत्कृष्टानि । न केवलं बुद्धेः परः । श्रुत्युक्त-प्रकारेणाव्यक्तादपि । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’</span></span> इति हि श्रुतिः । न च तत्रतत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः । सार्वत्रिक-गुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutrani-id">‘आनन्दादयः प्रधानस्य’ (ब्र.सू. ३-३-१२)</span></span> इत्यादिना । तथा चान्यत्र- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘अपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि ।<br/>सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये ॥<br/>सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम् ।<br/>तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥’</span></span> इति गारुडे ।<br/>तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः । न चात्र जीव उच्यते । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’(२.५९) इत्युक्तत्वात् । ‘अविहाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः’ इति च । अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम् ।<span class="gr-prateeka">आत्मानं</span> मनः ।<span class="gr-prateeka">आत्मना</span> बुध्या ॥ ४२-४३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C03_V43
</div>
| id       = BGB_C03_V43_B01
| text    = शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह- इन्द्रियाणीति ॥ ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । शरीराद् इन्द्रियाणि पराणि उत्कृष्टानि । न केवलं बुद्धेः परः । श्रुत्युक्त-प्रकारेणाव्यक्तादपि । ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति हि श्रुतिः । न च तत्रतत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः । सार्वत्रिक-गुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितः । ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’ (ब्र.सू. ३-३-१२) इत्यादिना । तथा चान्यत्र- ‘अपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि । सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये ॥ सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम् । तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति गारुडे । तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः । न चात्र जीव उच्यते । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’(२.५९) इत्युक्तत्वात् । ‘अविहाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः’ इति च । अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम् । आत्मानं मनः । आत्मना बुध्या ॥ ४२-४३ ॥
}}


</div>
</div>
Line 2,346: Line 2,652:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C04_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।</span>
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<span class="shloka-line">विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥</span>
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| verse_line1  = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
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| verse_line2  = विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C04_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
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| verse_line2  = स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C04_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।</span>
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<span class="shloka-line">भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V03_B01" data-verse="BGB_C04_V03">
{{Bhashyam
<p>पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - इममिति ॥ १-३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V03
</div>
| id       = BGB_C04_V03_B01
| text    = पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - इममिति ॥ १-३ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C04_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
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| verse_line2  = कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C04_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
</div>
| verse_line2  = तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V05_B01" data-verse="BGB_C04_V05">
{{Bhashyam
<p>‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - अपरमिति ॥ ४-५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V05
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| id       = BGB_C04_V05_B01
| text    = ‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - अपरमिति ॥ ४-५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
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| verse_line2  = प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C04_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
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| verse_line2  = अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V07">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V07_B01" data-verse="BGB_C04_V07">
{{Bhashyam
<p>न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">अजोऽपीति ॥</span> अव्यय आत्मा= देहोऽपीति <span class="gr-moola">अव्ययात्मा</span> । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५)</span></span> इति च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१)</span></span> इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् ।</p>
| verse_id = BGB_C04_V07
</div>
| id       = BGB_C04_V07_B01
| text    = न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह - अजोऽपीति ॥ अव्यय आत्मा= देहोऽपीति अव्ययात्मा । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । ‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५) इति च । ‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१) इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C04_V07_B02" data-verse="BGB_C04_V07">
{{Bhashyam
<p>कथमनादिनित्यस्य जनिः? <span class="gr-moola">प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय</span> । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह -<span class="gr-prateeka">स्वामिति ॥</span>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४)</span></span>  इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । <span class="gr-moola">आत्ममायया</span> आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’</span></span> इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– <br/>‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता ।<br/> विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि ।<br/>जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति ।<br/> <span class="gr-moola">ईश्वरः</span> ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id">‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् ।<br/>वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’</span></span> इति ब्रह्मवैवर्ते ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च</span></span>॥ ६,७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V07
</div>
| id       = BGB_C04_V07_B02
| text    = कथमनादिनित्यस्य जनिः? प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह - स्वामिति ॥ ‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४) इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । आत्ममायया आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । ‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’ इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– ‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता । विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि । जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति । ईश्वरः ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्- ‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् । वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । ‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च ॥ ६,७ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V08
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
</div>
| verse_line2  = धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V08_B01" data-verse="BGB_C04_V08">
{{Bhashyam
<p>न जन्मनैव परित्राणादिकं कार्यमिति नियमः । तथाऽपि लीलया स्वभावेन च यथेष्टचारी । तथाह्युक्तम्– <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------------------id">‘देवस्यैष स्वभावोऽयम्’।</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutrani-id">‘लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्’ ।</span></span> <br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------------id">‘क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय’ ।(विष्णुपुराण.१.२.१८)</span></span> <br/>        <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------id">‘.....अरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद् यदनन्तवीर्यः’ (भाग.३.२.१६)।</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘पूर्णोऽयमस्यात्र न किञ्चिदाप्यं तथाऽपि सर्वाः कुरुते प्रवृत्तीः ।<br/>अतो विरुद्धेषुमिमं वदन्ति परावरज्ञा मुनयः प्रशान्ताः ॥’</span></span>  इत्याद्यृग्वेदखिलेषु॥ ८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V08
</div>
| id       = BGB_C04_V08_B01
| text    = न जन्मनैव परित्राणादिकं कार्यमिति नियमः । तथाऽपि लीलया स्वभावेन च यथेष्टचारी । तथाह्युक्तम्– ‘देवस्यैष स्वभावोऽयम्’। ‘लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्’ । ‘क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय’ ।(विष्णुपुराण.१.२.१८) ‘.....अरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद् यदनन्तवीर्यः’ (भाग.३.२.१६)। ‘पूर्णोऽयमस्यात्र न किञ्चिदाप्यं तथाऽपि सर्वाः कुरुते प्रवृत्तीः । अतो विरुद्धेषुमिमं वदन्ति परावरज्ञा मुनयः प्रशान्ताः ॥’ इत्याद्यृग्वेदखिलेषु॥ ८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
</div>
| verse_line2  = त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V09_B01" data-verse="BGB_C04_V09">
{{Bhashyam
<p>पृथङ् मुक्त्युक्तिः सर्वज्ञाननियमदर्शनार्थम् ; न तु तावन्मात्रेण मुक्तिरित्युक्तम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref----------id">‘वेदाद्युक्तं तु सर्वं यो ज्ञात्वोपास्ते सदा हि माम् ।<br/>तस्यैव दर्शनपथं यामि नान्यस्य कस्यचित् ॥’</span></span> इत्युक्तेश्च महाकौर्मे ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C04_V09
<p>अत्रोक्तस्यैतज्ज्ञात्वैव जन्म नैतीति गतिः । इतरवाक्यानां नान्या गतिः । ‘नान्यस्य कस्यचित्’ इति विशेषणात् । ‘तत्त्वतः’ इति विशेषणाच्च सर्वज्ञानमापतति । यत्रैवं भवति यत्र तत्त्वत इति विशेषणे न विरोधः । उक्तं च–<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘एकं च तत्त्वतो ज्ञातुं विना सर्वज्ञतां नरः ।<br/>न समर्थो महेन्द्रोऽपि तस्मात् सर्वत्र जिज्ञसेत्’</span></span> ॥ इति स्कान्दे ॥९ ॥</p>
| id       = BGB_C04_V09_B01
</div>
| text    = पृथङ् मुक्त्युक्तिः सर्वज्ञाननियमदर्शनार्थम् ; न तु तावन्मात्रेण मुक्तिरित्युक्तम् । ‘वेदाद्युक्तं तु सर्वं यो ज्ञात्वोपास्ते सदा हि माम् । तस्यैव दर्शनपथं यामि नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इत्युक्तेश्च महाकौर्मे । अत्रोक्तस्यैतज्ज्ञात्वैव जन्म नैतीति गतिः । इतरवाक्यानां नान्या गतिः । ‘नान्यस्य कस्यचित्’ इति विशेषणात् । ‘तत्त्वतः’ इति विशेषणाच्च सर्वज्ञानमापतति । यत्रैवं भवति यत्र तत्त्वत इति विशेषणे न विरोधः । उक्तं च– ‘एकं च तत्त्वतो ज्ञातुं विना सर्वज्ञतां नरः । न समर्थो महेन्द्रोऽपि तस्मात् सर्वत्र जिज्ञसेत्’ ॥ इति स्कान्दे ॥९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V10
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
</div>
| verse_line2  = बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V10">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V10_B01" data-verse="BGB_C04_V10">
{{Bhashyam
<p>सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह–<span class="gr-prateeka">वीतरागेति ॥</span> <span class="gr-moola">मन्मयाः</span> मत्प्रचुराः । सर्वत्र मां विना न किञ्चित् पश्यन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V10
</div>
| id       = BGB_C04_V10_B01
| text    = सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह– वीतरागेति ॥ मन्मयाः मत्प्रचुराः । सर्वत्र मां विना न किञ्चित् पश्यन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
</div>
| verse_line2  = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V11_B01" data-verse="BGB_C04_V11">
{{Bhashyam
<p>न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह -<span class="gr-prateeka">ये यथेति ॥</span> <span class="gr-moola">भजामि</span> सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">मम वर्त्मेति ॥</span> अन्यदेवता यजन्तोऽपि <span class="gr-moola">मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते</span> । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम ।</p>
| verse_id = BGB_C04_V11
</div>
| id       = BGB_C04_V11_B01
| text    = न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह - ये यथेति ॥ भजामि सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह - मम वर्त्मेति ॥ अन्यदेवता यजन्तोऽपि मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C04_V11_B02" data-verse="BGB_C04_V11">
{{Bhashyam
<p>‘योऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३) इति हि वक्ष्यति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व,६ अनु)</span></span> इति हि श्रुतिः । स भगवानेव च तत्राभिधीयते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व)</span></span> इत्यादि तल्लिङ्गात् ॥ ११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V11
</div>
| id       = BGB_C04_V11_B02
| text    = ‘योऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३) इति हि वक्ष्यति । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व,६ अनु) इति हि श्रुतिः । स भगवानेव च तत्राभिधीयते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व) इत्यादि तल्लिङ्गात् ॥ ११ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
</div>
| verse_line2  = क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V12_B01" data-verse="BGB_C04_V12">
{{Bhashyam
<p>कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? <span class="gr-moola">क्षिप्रं हि ॥</span> अत एव हि फलप्राप्तिः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-----------id">‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९)</span></span> इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V12
</div>
| id       = BGB_C04_V12_B01
| text    = कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? क्षिप्रं हि ॥ अत एव हि फलप्राप्तिः । ‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९) इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
</div>
| verse_line2  = तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V13">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V13">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V13_B01" data-verse="BGB_C04_V13">
{{Bhashyam
<p>अहमेव हि कर्तेत्याह -<span class="gr-prateeka">चातुर्वर्ण्यमिति ॥</span> चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू)</span></span> इत्यादि । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६)</span></span> इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V13
</div>
| id       = BGB_C04_V13_B01
| text    = अहमेव हि कर्तेत्याह - चातुर्वर्ण्यमिति ॥ चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– ‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू) इत्यादि । ‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६) इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
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| verse_line2  = इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V14_B01" data-verse="BGB_C04_V14">
{{Bhashyam
<p>अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - <span class="gr-prateeka">न मे कर्मफले स्पृहा ॥</span>  इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः ।<br/>नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’</span></span> इति ।<br/> न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’</span></span> इति, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’</span></span> इति ॥ १४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V14
</div>
| id       = BGB_C04_V14_B01
| text    = अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - न मे कर्मफले स्पृहा ॥ इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– ‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः । नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’ इति । न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- ‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’ इति, ‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’ इति ॥ १४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V15
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
</div>
| verse_line2  = कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V15_B01" data-verse="BGB_C04_V15">
{{Bhashyam
<p>एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह -<span class="gr-prateeka">एवमिति ॥</span> <span class="gr-moola">पूर्वतरं कर्म</span> पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V15
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| id       = BGB_C04_V15_B01
| text    = एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह - एवमिति ॥ पूर्वतरं कर्म पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।</span>
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<span class="shloka-line">तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
</div>
| verse_line2  = तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V16_B01" data-verse="BGB_C04_V16">
{{Bhashyam
<p>कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - किं कर्मेति ॥ १६ ॥</p>
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| id       = BGB_C04_V16_B01
| text    = कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - किं कर्मेति ॥ १६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
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| verse_line2  = अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V17_B01" data-verse="BGB_C04_V17">
{{Bhashyam
<p>न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह -<span class="gr-prateeka">कर्मण इति ॥</span> तच्चोक्तम्– <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् ।<br/> दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’</span></span> इति ।<br/> <span class="gr-moola">अकर्म</span> कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् <span class="gr-moola">विकर्म</span> निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह -<span class="gr-prateeka">गहनेति ॥</span> १७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V17
</div>
| id       = BGB_C04_V17_B01
| text    = न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह - कर्मण इति ॥ तच्चोक्तम्– ‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् । दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’ इति । अकर्म कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् विकर्म । निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह - गहनेति ॥ १७ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V18
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।
</div>
| verse_line2  = स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V18_B01" data-verse="BGB_C04_V18">
{{Bhashyam
<p>कर्मादिस्वरूपमाह -<span class="gr-prateeka">कर्मणीति ॥</span>  <span class="gr-moola">कर्मणि</span> क्रियमाणे सति <span class="gr-moola">अकर्म यः पश्येत्</span> - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । <span class="gr-moola">अकर्मणि</span> सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । <span class="gr-moola">स बुद्धिमान्</span> ज्ञानी । स एव च <span class="gr-moola">युक्तो</span> योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V18
</div>
| id       = BGB_C04_V18_B01
| text    = कर्मादिस्वरूपमाह - कर्मणीति ॥ कर्मणि क्रियमाणे सति अकर्म यः पश्येत् - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । अकर्मणि सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । स बुद्धिमान् ज्ञानी । स एव च युक्तो योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
</div>
| verse_line2  = ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V19_B01" data-verse="BGB_C04_V19">
{{Bhashyam
<p>एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">यस्य</span> इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण <span class="gr-moola">ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्</span>॥ १९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V19
</div>
| id       = BGB_C04_V19_B01
| text    = एतदेव प्रपञ्चयति - यस्य इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् ॥ १९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
</div>
| verse_line2  = कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V20_B01" data-verse="BGB_C04_V20">
{{Bhashyam
<p>न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । <span class="gr-moola">आसङ्गं</span> स्नेहं च <span class="gr-moola">त्यक्त्वा</span>। ज्ञानस्वरूपमाह पुनः - <span class="gr-prateeka">नित्यतृप्त इति ॥</span> नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः ॥ २० ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V20
</div>
| id       = BGB_C04_V20_B01
| text    = न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । आसङ्गं स्नेहं च त्यक्त्वा । ज्ञानस्वरूपमाह पुनः - नित्यतृप्त इति ॥ नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः ॥ २० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
</div>
| verse_line2  = शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V21_B01" data-verse="BGB_C04_V21">
{{Bhashyam
<p>कामादित्यागोपायमाह -<span class="gr-prateeka">निराशीरिति ॥</span> <span class="gr-moola">यतचित्तात्मा</span> भूत्वा <span class="gr-moola">निराशीः</span> इत्यर्थः । <span class="gr-moola">आत्मा</span> मनः । <span class="gr-moola">परिग्रहत्यागः</span> अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - <span class="gr-prateeka">नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥</span> २१॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V21
</div>
| id       = BGB_C04_V21_B01
| text    = कामादित्यागोपायमाह - निराशीरिति ॥ यतचित्तात्मा भूत्वा निराशीः इत्यर्थः । आत्मा मनः । परिग्रहत्यागः अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥ २१॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
</div>
| verse_line2  = समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V22">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V22">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V22_B01" data-verse="BGB_C04_V22">
{{Bhashyam
<p>यतचित्तात्मनो लक्षणमाह -<span class="gr-prateeka">यदृच्छालाभेति ॥</span> कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह -<span class="gr-prateeka">समः सिद्धाविति ॥</span> २२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V22
</div>
| id       = BGB_C04_V22_B01
| text    = यतचित्तात्मनो लक्षणमाह - यदृच्छालाभेति ॥ कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह - समः सिद्धाविति ॥ २२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
</div>
| verse_line2  = यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V23_B01" data-verse="BGB_C04_V23">
{{Bhashyam
<p>उपसंहरति- <span class="gr-prateeka">गतसङ्गस्येति ॥</span> <span class="gr-moola">गतसङ्गस्य</span> फलस्नेहरहितस्य । <span class="gr-moola">मुक्तस्य</span> शरीराद्यनभिमानिनः । <span class="gr-moola">ज्ञानावस्थितचेतसः</span> परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V23
</div>
| id       = BGB_C04_V23_B01
| text    = उपसंहरति- गतसङ्गस्येति ॥ गतसङ्गस्य फलस्नेहरहितस्य । मुक्तस्य शरीराद्यनभिमानिनः । ज्ञानावस्थितचेतसः परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
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| verse_line2  = ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V24_B01" data-verse="BGB_C04_V24">
{{Bhashyam
<p>ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति -<span class="gr-prateeka">ब्रह्मार्पणमिति ॥</span>  सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति ।<br/>वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’</span></span> इति पाद्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------id">‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३)</span></span> इति च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------id">‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७)</span></span> इत्यादि च । <span class="gr-moola">समाधिना</span> सह ब्रह्मैव <span class="gr-moola">कर्म</span> ॥२४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V24
</div>
| id       = BGB_C04_V24_B01
| text    = ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति - ब्रह्मार्पणमिति ॥ सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- ‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति । वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति पाद्मे । ‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३) इति च । ‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७) इत्यादि च । समाधिना सह ब्रह्मैव कर्म ॥२४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
</div>
| verse_line2  = ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C04_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V26
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
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| verse_line2  = शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V26_B01" data-verse="BGB_C04_V26">
{{Bhashyam
<p>यज्ञभेदानाह -<span class="gr-prateeka">दैवमित्यादिना ॥</span>  <span class="gr-moola">दैवं</span> भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । <span class="gr-moola">यज्ञं</span> भगवन्तम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं)</span></span> , <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’</span></span>  इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref--------id">‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.)</span></span> इत्यादौ । उक्तं च- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । <br/> अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’</span></span> इति ॥ २५,२६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V26
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| id       = BGB_C04_V26_B01
| text    = यज्ञभेदानाह - दैवमित्यादिना ॥ दैवं भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । यज्ञं भगवन्तम् । ‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं) , ‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- ‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.) इत्यादौ । उक्तं च- ‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’ इति ॥ २५,२६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V27
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
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| verse_line2  = आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C04_V27_B01" data-verse="BGB_C04_V27">
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<p>आत्मसंयमाख्योपायाग्नौ ॥ २७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V27
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| text    = आत्मसंयमाख्योपायाग्नौ ॥ २७ ॥
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| verse_id    = BGB_C04_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।
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| verse_line2  = स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C04_V28_B01" data-verse="BGB_C04_V28">
{{Bhashyam
<p>द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V28
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| text    = द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥
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</div>
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| verse_id    = BGB_C04_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।</span>
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<span class="shloka-line">प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥</span>
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| verse_line1  = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।
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| verse_line2  = प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C04_V29_B01" data-verse="BGB_C04_V29">
{{Bhashyam
<p>अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥</p>
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| text    = अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
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| verse_line2  = सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C04_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C04_V31
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
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| verse_line2  = नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V31_B01" data-verse="BGB_C04_V31">
{{Bhashyam
<p>नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात् प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-------------id">‘यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञः’(काठ.१.७.१३)</span></span> इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा । अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः’</span></span> इति ॥ ३०, ३१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V31
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| id       = BGB_C04_V31_B01
| text    = नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात् प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । ‘यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञः’(काठ.१.७.१३) इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा । अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्- ‘यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः’ इति ॥ ३०, ३१ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V32
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
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| verse_line2  = कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V32">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V32">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V32_B01" data-verse="BGB_C04_V32">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">ब्रह्मणः</span> परमात्मनो <span class="gr-moola">मुखे</span> । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । <span class="gr-moola">एवं ज्ञात्वा</span> तानि कर्माणि कृत्वा <span class="gr-moola">विमोक्ष्यसे</span> । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥
| verse_id = BGB_C04_V32
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| id       = BGB_C04_V32_B01
| text    = ब्रह्मणः परमात्मनो मुखे । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । एवं ज्ञात्वा तानि कर्माणि कृत्वा विमोक्ष्यसे । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C04_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V33
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
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| verse_line2  = सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V33">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V33">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V33_B01" data-verse="BGB_C04_V33">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">अखिलम्</span> उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥
| verse_id = BGB_C04_V33
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| id       = BGB_C04_V33_B01
| text    = अखिलम् उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V34
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।
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| verse_line2  = उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V34">
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<div class="bhashya" id="BGB_C04_V34_B01" data-verse="BGB_C04_V34">
{{Bhashyam
<p>इदानीमपि ज्ञान्येव । तथाऽप्यभिभवान्मोहः । मा तूक्ता ॥ ३४॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V34
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| id       = BGB_C04_V34_B01
| text    = इदानीमपि ज्ञान्येव । तथाऽप्यभिभवान्मोहः । मा तूक्ता ॥ ३४॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V35
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
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| verse_line2  = येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V35">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V35">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V35_B01" data-verse="BGB_C04_V35">
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<p>येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि <span class="gr-moola">अथो</span> तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥</p>
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| text    = येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि अथो तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C04_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V36
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥</span>
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| verse_line1  = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
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| verse_line2  = सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V36">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V36">
<div class="bhashya" id="BGB_C04_V36_B01" data-verse="BGB_C04_V36">
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<p>करणभूतं ज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण ॥ ३६॥</p>
| verse_id = BGB_C04_V36
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| text    = करणभूतं ज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण ॥ ३६॥
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</div>
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| verse_id    = BGB_C04_V37
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥</span>
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| verse_line1  = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।
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<div class="verse" id="BGB_C04_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C04_V38
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<span class="shloka-line">न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽत्मनि विन्दति॥३८ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C04_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C04_V39
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<span class="shloka-line">श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C04_V39">
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<p>तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति-</p>
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| id       = BGB_C04_V39_B01
| text    = तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति-
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| verse_id    = BGB_C04_V40
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<span class="shloka-line">अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥</span>
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| verse_line1  = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
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<div class="verse" id="BGB_C04_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V41
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
</div>
| verse_line2  = आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C04_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C04_V42
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C04
<span class="shloka-line">छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।
</div>
| verse_line2  = छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥
</div>
}}


<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥</div>
Line 2,935: Line 3,337:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C05_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
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| verse_line2  = यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V01_B01" data-verse="BGB_C05_V01">
{{Bhashyam
<p>नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- <br/></p>
| verse_id = BGB_C05_V01
            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref----------id">‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् ।<br/>अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे ।</span></span> <br/>संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः <span class="gr-moola">श्रेयः</span> अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥
| id       = BGB_C05_V01_B01
</div>
| text    = नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- ‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् । अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः श्रेयः अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
</div>
| verse_line2  = तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V02_B01" data-verse="BGB_C05_V02">
{{Bhashyam
<p>नायं संन्यासो यत्याश्रमः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘द्वन्द्वत्यागात्तु संन्यासान्मत्पूजैव गरीयसी ॥’</span></span> इति वचनात् ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्’(म.ना.उ.१६.१२)</span></span> । इति च ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C05_V02
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradapurana-id">‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः ।<br/>न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥<br/>तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः ।<br/>मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते ।<br/>यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’</span></span> इति नारदीये ।
| id       = BGB_C05_V02_B01
          <br/>‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१)</span></span> इति च ।<br/>
| text    = नायं संन्यासो यत्याश्रमः । ‘द्वन्द्वत्यागात्तु संन्यासान्मत्पूजैव गरीयसी ॥’ इति वचनात् । ‘तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्’(म.ना.उ.१६.१२) । इति च । ‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः । न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥ तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः । मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते । यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’ इति नारदीये । ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । ‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१) इति च । ‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) । येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’ इत्यादेश्च ब्राह्मे । अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahme-id">‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) ।<br/>येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’</span></span>इत्यादेश्च ब्राह्मे ।<br/>अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥
}}
</div>


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।
</div>
| verse_line2  = निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V03_B01" data-verse="BGB_C05_V03">
{{Bhashyam
<p>संन्यासशब्दार्थमाह - <span class="gr-prateeka">ज्ञेय इति ॥</span> संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - <span class="gr-prateeka">ज्ञेय इति ॥</span>  ३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V03
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| id       = BGB_C05_V03_B01
| text    = संन्यासशब्दार्थमाह - ज्ञेय इति ॥ संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - ज्ञेय इति ॥ ३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
</div>
| verse_line2  = एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V04_B01" data-verse="BGB_C05_V04">
{{Bhashyam
<p>संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३)</span></span> इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">साङ्ख्ययोगाविति ॥</span> उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१)</span></span> इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V04
</div>
| id       = BGB_C05_V04_B01
| text    = संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - साङ्ख्ययोगाविति ॥ उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.) , ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।
</div>
| verse_line2  = एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V05_B01" data-verse="BGB_C05_V05">
{{Bhashyam
<p>‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - <span class="gr-prateeka">यत् साङ्ख्यैरिति ॥</span> योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V05
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| id       = BGB_C05_V05_B01
| text    = ‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - यत् साङ्ख्यैरिति ॥ योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥</span>
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| verse_line1  = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
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| verse_line2  = योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V06_B01" data-verse="BGB_C05_V06">
{{Bhashyam
<p>इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ ।</span> इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’</span> इति ॥ ६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V06
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| id       = BGB_C05_V06_B01
| text    = इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
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| verse_line2  = सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V07">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V07_B01" data-verse="BGB_C05_V07">
{{Bhashyam
<p>एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">योगयुक्त इति ॥</span> सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref---------id">‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा)</span></span> इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः <span class="gr-moola">सर्वभूतात्मभूतात्मा</span> ॥ ७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V07
</div>
| id       = BGB_C05_V07_B01
| text    = एतदेव प्रपञ्चयति - योगयुक्त इति ॥ सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा ॥ ७ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
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| verse_line2  = पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V09">
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{{Bhashyam
<p>संन्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन ॥ ८, ९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V08
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| id       = BGB_C05_V09_B01
| text    = संन्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन ॥ ८, ९ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।
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| verse_line2  = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C05_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
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| verse_line2  = लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V10">
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<div class="bhashya" id="BGB_C05_V10_B01" data-verse="BGB_C05_V10">
{{Bhashyam
<p>संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- <span class="gr-prateeka">ब्रह्मणीति ॥</span> साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V10
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| id       = BGB_C05_V10_B01
| text    = संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- ब्रह्मणीति ॥ साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥</span>
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| verse_line1  = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
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| verse_line2  = योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C05_V11_B01" data-verse="BGB_C05_V11">
{{Bhashyam
<p>एवं चाऽचार इत्याह - <span class="gr-prateeka">कायेनेति ॥</span> ११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V11
</div>
| id       = BGB_C05_V11_B01
| text    = एवं चाऽचार इत्याह - कायेनेति ॥ ११ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
</div>
| verse_line2  = अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


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<div class="bhashya" id="BGB_C05_V12_B01" data-verse="BGB_C05_V12">
{{Bhashyam
<p>पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - <span class="gr-prateeka">युक्त इति ॥</span> <span class="gr-moola">युक्तो</span> योगयुक्तः॥ १२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V12
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| text    = पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - युक्त इति ॥ युक्तो योगयुक्तः॥ १२ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।</span>
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<span class="shloka-line">नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।
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| verse_line2  = नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C05_V13_B01" data-verse="BGB_C05_V13">
{{Bhashyam
<p>पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">सर्वकर्माणीति ॥</span> ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥</p>
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| id       = BGB_C05_V13_B01
| text    = पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - सर्वकर्माणीति ॥ ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥
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</div>
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{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
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| verse_line2  = न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C05_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।</span>
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<span class="shloka-line">अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
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| verse_line2  = अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V15_B01" data-verse="BGB_C05_V15">
{{Bhashyam
<p>न च करोति वस्तुत इत्याह - <span class="gr-moola">न कर्तृत्वमिति ॥</span> प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥</p>
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| id       = BGB_C05_V15_B01
| text    = न च करोति वस्तुत इत्याह - न कर्तृत्वमिति ॥ प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
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| verse_line2  = तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V16_B01" data-verse="BGB_C05_V16">
{{Bhashyam
<p>ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - <span class="gr-prateeka">ज्ञानेनेति ॥</span> प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥</p>
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| id       = BGB_C05_V16_B01
| text    = ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - ज्ञानेनेति ॥ प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
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| verse_line2  = गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V17_B01" data-verse="BGB_C05_V17">
{{Bhashyam
<p>अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - <span class="gr-prateeka">तद्बुद्धय इति ॥</span> १७ ॥</p>
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| text    = अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - तद्बुद्धय इति ॥ १७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C05_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।</span>
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<span class="shloka-line">शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥</span>
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| verse_line1  = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
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| verse_line2  = शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V18_B01" data-verse="BGB_C05_V18">
{{Bhashyam
<p>परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - <span class="gr-prateeka">विद्येति ॥</span> १८ ॥</p>
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| text    = परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - विद्येति ॥ १८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V19
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।</span>
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<span class="shloka-line">निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
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| verse_line2  = निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V20_B01" data-verse="BGB_C05_V19">
{{Bhashyam
<p>तदेव स्तौति - <span class="gr-prateeka">इहैवेति ॥</span> १९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V19
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| text    = तदेव स्तौति - इहैवेति ॥ १९ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
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| verse_line2  = स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V20_B01" data-verse="BGB_C05_V20">
{{Bhashyam
<p>संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण- ॥ २० ॥</p>
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| id       = BGB_C05_V20_B01
| text    = संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण- ॥ २० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
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| verse_line2  = स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V21_B01" data-verse="BGB_C05_V21">
{{Bhashyam
<p>पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">बाह्यस्पर्शेष्विति ॥</span> कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव <span class="gr-moola">ब्रह्मयोगयुक्तात्मा</span> चेत् तदेव <span class="gr-moola">अक्षयं सुखं विन्दति</span>। ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V21
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| id       = BGB_C05_V21_B01
| text    = पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - बाह्यस्पर्शेष्विति ॥ कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत् तदेव अक्षयं सुखं विन्दति । ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
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| verse_line2  = आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V22">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V22">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V22_B01" data-verse="BGB_C05_V22">
{{Bhashyam
<p>संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - <span class="gr-prateeka">ये हीति ॥</span> २२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V22
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| id       = BGB_C05_V22_B01
| text    = संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - ये हीति ॥ २२ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
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| verse_line2  = कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V23_B01" data-verse="BGB_C05_V23">
{{Bhashyam
<p>तत्परित्यागं प्रशंसयति - <span class="gr-prateeka">शक्नोतीति</span> <span class="gr-moola">कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्,</span> यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V23
</div>
| id       = BGB_C05_V23_B01
| text    = तत्परित्यागं प्रशंसयति - शक्नोतीति ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्, यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।</span>
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<span class="shloka-line">स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
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| verse_line2  = स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V24_B01" data-verse="BGB_C05_V24">
{{Bhashyam
<p>ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-</p>
| verse_id = BGB_C05_V24
</div>
| id       = BGB_C05_V24_B01
| text    = ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-
}}


</div>
</div>
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V24_B02" data-verse="BGB_C05_V24">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">आरामः</span>  परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् ।<br/>आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’</span></span>इति नारदीये ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’</span></span> । इति च ।<br/>अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - <span class="gr-prateeka">ब्रह्मणि भूत इति ॥</span> २४ ॥
| verse_id = BGB_C05_V24
</div>
| id       = BGB_C05_V24_B02
| text    = आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् । आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’ इति नारदीये । ‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च । अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - ब्रह्मणि भूत इति ॥ २४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।
</div>
| verse_line2  = छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V25">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V25">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V25_B01" data-verse="BGB_C05_V25">
{{Bhashyam
<p>पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - <span class="gr-prateeka">लभन्त इति ॥</span> <span class="gr-moola">क्षीणकल्मषा</span> भूत्वा <span class="gr-moola">छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः</span> । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् ।<br/> ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’</span></span>इति च। <br/>छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ ।</span></span> इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V25
</div>
| id       = BGB_C05_V25_B01
| text    = पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - लभन्त इति ॥ क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’ इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V26
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
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| verse_line2  = अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V26_B01" data-verse="BGB_C05_V26">
{{Bhashyam
<p>सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - <span class="gr-prateeka">कामक्रोधेति ॥</span> <span class="gr-moola">अभितः</span> सर्वतः ॥ २६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V26
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| id       = BGB_C05_V26_B01
| text    = सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - कामक्रोधेति ॥ अभितः सर्वतः ॥ २६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।</span>
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<span class="shloka-line">प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
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| verse_line2  = प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C05_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।
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| verse_line2  = विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V28_B01" data-verse="BGB_C05_V28">
{{Bhashyam
<p>ध्यानप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">स्पर्शानित्यादिना ॥</span> बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’</span></span>। इति । <span class="gr-moola">प्राणापानौ समौ कृत्वा</span> कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V28
</div>
| id       = BGB_C05_V28_B01
| text    = ध्यानप्रकारमाह - स्पर्शानित्यादिना ॥ बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च - ‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’ । इति । प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C05_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C05_V29
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C05
<span class="shloka-line">सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
</div>
| verse_line2  = सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V29">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C05_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C05_V29_B01" data-verse="BGB_C05_V29">
{{Bhashyam
<p>ध्येयमाह - <span class="gr-prateeka">भोक्तारमिति ॥</span> २९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C05_V29
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| id       = BGB_C05_V29_B01
| text    = ध्येयमाह - भोक्तारमिति ॥ २९ ॥
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</div>
</div>
Line 3,376: Line 3,854:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C06_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
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| verse_line2  = स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V01_B01" data-verse="BGB_C06_V01">
{{Bhashyam
<p>विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - <span class="gr-prateeka">अनाश्रित इति ॥</span> चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’</span></span> । इति च । तस्माद् <span class="gr-moola">निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न</span>  भवत्येव ॥१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V01
</div>
| id       = BGB_C06_V01_B01
| text    = विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - अनाश्रित इति ॥ चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न भवत्येव ॥१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
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| verse_line2  = न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V02_B01" data-verse="BGB_C06_V02">
{{Bhashyam
<p>संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - <span class="gr-prateeka">यं संन्यासमिति ॥</span>  कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V02
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| id       = BGB_C06_V02_B01
| text    = संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - यं संन्यासमिति ॥ कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
</div>
| verse_line2  = योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V03_B01" data-verse="BGB_C06_V03">
{{Bhashyam
<p>कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥</span>  <span class="gr-moola">योगमारुरुक्षोः</span>  उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । <span class="gr-moola">योगारूढस्य</span>  सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । <span class="gr-moola">कारणं</span>  परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् ।<br/> तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् ।<br/> भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा ।<br/> वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’</span></span> इति ॥३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V03
</div>
| id       = BGB_C06_V03_B01
| text    = कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥ योगमारुरुक्षोः उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । योगारूढस्य सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । कारणं परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्- ‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V04
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
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| verse_line2  = सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V04_B01" data-verse="BGB_C06_V04">
{{Bhashyam
<p>योगारूढस्य लक्षणमाह - <span class="gr-prateeka">यदेति ॥</span>  सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च -<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’</span></span> । इति ॥ ४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V04
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| id       = BGB_C06_V04_B01
| text    = योगारूढस्य लक्षणमाह - यदेति ॥ सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च - ‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।
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| verse_line2  = आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V05_B01" data-verse="BGB_C06_V05">
{{Bhashyam
<p>स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - <span class="gr-prateeka">उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥</span></p>
| verse_id = BGB_C06_V05
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| id       = BGB_C06_V05_B01
| text    = स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।</span>
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<span class="shloka-line">अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।
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| verse_line2  = अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V06_B01" data-verse="BGB_C06_V06">
{{Bhashyam
<p>कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">बन्धुरात्मेति ॥</span>  <span class="gr-moola">आत्मा</span>  मनः । <span class="gr-moola">आत्मनः</span>  जीवस्य । <span class="gr-moola">आत्मना</span>  मनसा । <span class="gr-moola">आत्मानं</span>  जीवम् । <span class="gr-moola">आत्मैव</span>  मनः । <span class="gr-moola">आत्मना</span>  बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishnupurana-id">‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८)</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् ।<br/>जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarta-id">‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य ।<br/>ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’</span></span>  इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते ।<br/> <span class="gr-moola">अनात्मनः</span>  अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V06
</div>
| id       = BGB_C06_V06_B01
| text    = कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- बन्धुरात्मेति ॥ आत्मा मनः । आत्मनः जीवस्य । आत्मना मनसा । आत्मानं जीवम् । आत्मैव मनः । आत्मना बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३) , ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् । जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य । ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । अनात्मनः अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
</div>
| verse_line2  = शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C06_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V08
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।
</div>
| verse_line2  = युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V08_B01" data-verse="BGB_C06_V08">
{{Bhashyam
<p>जितात्मनः फलमाह - <span class="gr-prateeka">जितात्मन इति ॥</span>  जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि <span class="gr-moola">आहितः</span>  सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">शीतोष्णेत्यादिना ॥</span>  शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । <span class="gr-moola">विज्ञानं</span>  विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः ।<br/>देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । <br/> तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । <br/> विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’</span></span> इत्यादि । <span class="gr-moola">कूटस्थः</span>  निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’</span></span> । इत्यभिधानात् । <br/>  <span class="gr-moola">योगी</span>  योगं कुर्वन् । <span class="gr-moola">युक्तः</span>  योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V08
</div>
| id       = BGB_C06_V08_B01
| text    = जितात्मनः फलमाह - जितात्मन इति ॥ जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि आहितः सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - शीतोष्णेत्यादिना ॥ शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । विज्ञानं विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः । देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । कूटस्थः निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । योगी योगं कुर्वन् । युक्तः योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
</div>
| verse_line2  = साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V09_B01" data-verse="BGB_C06_V09">
{{Bhashyam
<p>स एव च सर्वस्माद् विशिष्यते, साधुपापादिषु समबुद्धिः । जीवचितः परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण । चिद्रूपा एव हि जीवाः । विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः । सर्वेषां च साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव, स्वतो न किञ्चिदपि । उक्तं चैतत् सर्वम्- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः ।<br/>जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः ॥<br/> सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित् स्वत एव तु ।<br/> समा एव ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम् ॥<br/> एवं समा नृजीवास्तु विशेषो देवतादिषु । <br/> स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनः (नियमाद्धरेरेव सदा(ना)तनः) ॥<br/>असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि ।<br/> गुणदोषौ मनुष्याणां (मानुषाणां) नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ । <br/>गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः ॥’</span></span> इति ब्राह्मे ।</p>
| verse_id = BGB_C06_V09
</div>
| id       = BGB_C06_V09_B01
| text    = स एव च सर्वस्माद् विशिष्यते, साधुपापादिषु समबुद्धिः । जीवचितः परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण । चिद्रूपा एव हि जीवाः । विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः । सर्वेषां च साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव, स्वतो न किञ्चिदपि । उक्तं चैतत् सर्वम्- ‘स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः । जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः ॥ सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित् स्वत एव तु । समा एव ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम् ॥ एवं समा नृजीवास्तु विशेषो देवतादिषु । स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनः (नियमाद्धरेरेव सदा(ना)तनः) ॥ असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि । गुणदोषौ मनुष्याणां (मानुषाणां) नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ । गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः ॥’ इति ब्राह्मे ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C06_V09_B02" data-verse="BGB_C06_V09">
{{Bhashyam
<p>न तु साधुपापादीनां पूजासाम्यम् । तत्र दोषस्मृतेः । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।<br/> क्रियते येन देवोऽपि स पदाद् भ्रश्यते पुमान् ॥’ इति ब्राह्मे (पाद्मे) ।</span></span> <br/>‘वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।<br/>एतानि मान्यस्थानानि गरीयो (यद्यदुत्तरम्) ह्युत्तरोत्तरम् ॥(म.स्मृ.२.१३६) इति मानवे(वामने) ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-BrahmaVaivarta-id">‘गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।<br/> सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति ।<br/>वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात् । <br/>पूजा या विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।</span></span> <br/> सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः अन्यूनाधिका या साऽपि समा। तदप्याह-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च ।<br/>तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते ॥’ इति गारुडे</span></span></p>
| verse_id = BGB_C06_V09
</div>
| id       = BGB_C06_V09_B02
| text    = न तु साधुपापादीनां पूजासाम्यम् । तत्र दोषस्मृतेः । ‘समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । क्रियते येन देवोऽपि स पदाद् भ्रश्यते पुमान् ॥’ इति ब्राह्मे (पाद्मे) । ‘वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीयो (यद्यदुत्तरम्) ह्युत्तरोत्तरम् ॥(म.स्मृ.२.१३६) इति मानवे(वामने) । ‘गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति । वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात् । पूजा या विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः अन्यूनाधिका या साऽपि समा। तदप्याह- ‘यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च । तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते ॥’ इति गारुडे ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C06_V09_B03" data-verse="BGB_C06_V09">
{{Bhashyam
<p>प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् <span class="gr-moola">सुहृत्</span>  । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति <span class="gr-moola">मित्रम्</span>  । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स <span class="gr-moola">उदासीनः</span>  । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स <span class="gr-moola">मध्यमः(स्थः)</span>  । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) <span class="gr-moola">द्वेष्यः</span>  । आह चैतत्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः ।<br/>प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति ।<br/>स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् ।<br/>यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’</span></span> इति ॥९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V09
</div>
| id       = BGB_C06_V09_B03
| text    = प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् सुहृत् । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम् । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः(स्थः) । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) द्वेष्यः । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः । प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति । स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् । यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V10
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
</div>
| verse_line2  = एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C06_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
</div>
| verse_line2  = नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V11_B01" data-verse="BGB_C06_V11">
{{Bhashyam
<p>समाधियोगप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥</span>  <span class="gr-moola">युञ्जीत</span>  समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । <span class="gr-moola">आत्मानं</span>  मनः ॥ १०-११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V11
</div>
| id       = BGB_C06_V11_B01
| text    = समाधियोगप्रकारमाह - योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥ युञ्जीत समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । आत्मानं मनः ॥ १०-११ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
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| verse_line2  = उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C06_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
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| verse_line2  = सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C06_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
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| verse_line2  = मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V14_B01" data-verse="BGB_C06_V14">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">योगं</span>  समाधियोगं <span class="gr-moola">युञ्ज्यात् ॥</span>  १२-१४ ॥
| verse_id = BGB_C06_V14
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| id       = BGB_C06_V14_B01
| text    = योगं समाधियोगं युञ्ज्यात् ॥ १२-१४ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V15
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।</span>
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<span class="shloka-line">शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।
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| verse_line2  = शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V15_B01" data-verse="BGB_C06_V15">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">निर्वाणपरमां</span>  शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥
| verse_id = BGB_C06_V15
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| id       = BGB_C06_V15_B01
| text    = निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
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| verse_line2  = न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V16_B01" data-verse="BGB_C06_V16">
{{Bhashyam
<p>अनशनादिनिषेधोऽशक्तस्य । उक्तं हि- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘निद्राशनभयश्वासचेष्टातन्द्रा(न्द्र्या)दिवर्जनम् ।<br/>कृत्वाऽऽनिमीलिताक्षस्तु शक्तो ध्यायन् (प्रसिध्यति) प्रसीदति॥’ इति नारदीये</span></span> ॥ १६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V16
</div>
| id       = BGB_C06_V16_B01
| text    = अनशनादिनिषेधोऽशक्तस्य । उक्तं हि- ‘निद्राशनभयश्वासचेष्टातन्द्रा(न्द्र्या)दिवर्जनम् । कृत्वाऽऽनिमीलिताक्षस्तु शक्तो ध्यायन् (प्रसिध्यति) प्रसीदति॥’ इति नारदीये ॥ १६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V17
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
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| verse_line2  = युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V17_B01" data-verse="BGB_C06_V17">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">युक्ताहारविहारस्य</span>  सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥
| verse_id = BGB_C06_V17
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| id       = BGB_C06_V17_B01
| text    = युक्ताहारविहारस्य सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
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| verse_line2  = निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V18">
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{{Bhashyam
<span class="gr-moola">आत्मनि</span>  भगवति ॥ १८ ॥
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| text    = आत्मनि भगवति ॥ १८ ॥
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<span class="shloka-line">यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।</span>
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<span class="shloka-line">योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
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<span class="gr-moola">आत्मनो योगं</span>  भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥
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<span class="shloka-line">यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।</span>
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<span class="shloka-line">यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
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| verse_line2  = यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥
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{{Bhashyam
<span class="gr-moola">आत्मना</span>  मनसा । <span class="gr-moola">आत्मनि</span>  देहे । <span class="gr-moola">आत्मानं</span>  भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥
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| text    = आत्मना मनसा । आत्मनि देहे । आत्मानं भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥
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<span class="shloka-line">सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।</span>
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<span class="shloka-line">वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥</span>
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| verse_line1  = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
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<span class="gr-moola">तत्त्वतो</span>  भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥
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<span class="shloka-line">यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।</span>
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<span class="shloka-line">यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥</span>
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| verse_id    = BGB_C06_V23
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<span class="shloka-line">तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।</span>
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<span class="shloka-line">स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥</span>
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V23_B01" data-verse="BGB_C06_V23">
{{Bhashyam
<p>दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स <span class="gr-moola">दुःखसंयोगवियोगः</span>  । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । <span class="gr-moola">निश्चयेन योक्तव्यः</span>  योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥</p>
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| text    = दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स दुःखसंयोगवियोगः । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । निश्चयेन योक्तव्यः योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V24
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।</span>
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<span class="shloka-line">मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥</span>
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| verse_line1  = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V24">
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<div class="bhashya" id="BGB_C06_V24_B01" data-verse="BGB_C06_V24">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">सर्वान्</span>  सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥
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| text    = सर्वान् सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥
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</div>
</div>
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।</span>
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<span class="shloka-line">आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥</span>
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| verse_line1  = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
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| verse_line2  = आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V25">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V25">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V25_B01" data-verse="BGB_C06_V25">
{{Bhashyam
<p>बुद्धेः (क)कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च ॥ २५ ॥</p>
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| text    = बुद्धेः (क)कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च ॥ २५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C06_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V26
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V26_B01" data-verse="BGB_C06_V26">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">यतो यतः</span>  यत्र यत्र ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२)</span></span> इत्यादिप्रयोगात् । <span class="gr-moola">आत्मन्येव वशं नयेत्</span>  आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥
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| text    = यतो यतः यत्र यत्र । ‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।</span>
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<span class="shloka-line">उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥</span>
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| verse_line1  = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C06_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।</span>
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<span class="shloka-line">सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥</span>
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| verse_line1  = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।
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| verse_line2  = सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V28_B01" data-verse="BGB_C06_V28">
{{Bhashyam
<p>पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">एवं युञ्जन्निति ॥</span>  २८ ॥</p>
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| text    = पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - एवं युञ्जन्निति ॥ २८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।</span>
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<span class="shloka-line">ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।
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| verse_line2  = ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V29">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V29_B01" data-verse="BGB_C06_V29">
{{Bhashyam
<p>ध्येयमाह - <span class="gr-prateeka">सर्वभूतस्थमिति ॥</span>  <span class="gr-moola">सर्वभूतस्थमात्मानं</span>  परमेश्वरम् । <span class="gr-moola">सर्वभूतानि चाऽत्मनि</span>  परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।<br/>अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७)</span></span> इति ।<br/>‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V29
</div>
| id       = BGB_C06_V29_B01
| text    = ध्येयमाह - सर्वभूतस्थमिति ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं परमेश्वरम् । सर्वभूतानि चाऽत्मनि परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति । ‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V30
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
</div>
| verse_line2  = तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V30">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V30">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V30_B01" data-verse="BGB_C06_V30">
{{Bhashyam
<p>फलमाह - <span class="gr-prateeka">यो मामिति॥</span>  <span class="gr-prateeka">तस्याहं न प्रणश्यामीति॥</span>  सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । <span class="gr-moola">स च मे न प्रणश्यति</span>  सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति ।<br/>अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’</span></span> । इति गारुडे ॥३० ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V30
</div>
| id       = BGB_C06_V30_B01
| text    = फलमाह - यो मामिति॥ तस्याहं न प्रणश्यामीति॥ सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । स च मे न प्रणश्यति सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च- ‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति । अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V31
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
</div>
| verse_line2  = सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V31_B01" data-verse="BGB_C06_V31">
{{Bhashyam
<p>एतदेव स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">सर्वभूतस्थितमिति ॥</span>    <span class="gr-moola">एकत्वमास्थितः</span>  सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् ।<br/>प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति ।<br/>आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् ।<br/>बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’</span></span> इति ॥३१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V31
</div>
| id       = BGB_C06_V31_B01
| text    = एतदेव स्पष्टयति - सर्वभूतस्थितमिति ॥ एकत्वमास्थितः सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् । प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति । आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् । बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V32
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C06
<span class="shloka-line">सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
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| verse_line2  = सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V32">
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<div class="bhashya" id="BGB_C06_V32_B01" data-verse="BGB_C06_V32">
{{Bhashyam
<p>साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - <span class="gr-prateeka">आत्मौपम्येनेति ॥</span>  ३२ ॥</p>
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| text    = साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - आत्मौपम्येनेति ॥ ३२ ॥
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| verse_id    = BGB_C06_V33
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।</span>
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<span class="shloka-line">एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥</span>
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| verse_line1  = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
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| verse_line2  = एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


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| verse_id    = BGB_C06_V34
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥</span>
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| verse_line1  = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C06_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥</span>
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| verse_line1  = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V35">
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{{Bhashyam
<span class="gr-moola">एतस्य</span>  योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा ।<br/> विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’</span></span> इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥
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| id       = BGB_C06_V35_B01
| text    = एतस्य योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च - ‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।</span>
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<span class="shloka-line">वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥</span>
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| verse_line1  = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
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| verse_line2  = वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥
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{{Bhashyam
<p>न च कदाचित् स्वयमेव मनो नियम्यते ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘शुभेच्छारहितानां च द्वेषिणां च रमापतौ ।<br/>नास्तिकानां च वै पुंसां सदा मुक्तिर्न जायते ॥’</span></span> इति निषेधाद् ब्राह्मे॥३६ ॥</p>
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| text    = न च कदाचित् स्वयमेव मनो नियम्यते । ‘शुभेच्छारहितानां च द्वेषिणां च रमापतौ । नास्तिकानां च वै पुंसां सदा मुक्तिर्न जायते ॥’ इति निषेधाद् ब्राह्मे॥३६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C06_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।</span>
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<span class="shloka-line">अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥</span>
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| verse_line1  = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V37">
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<span class="gr-moola">अयतिः</span>  अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥
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| text    = अयतिः अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥</span>
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<span class="shloka-line">एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।</span>
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<span class="shloka-line">त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C06_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥</span>
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| verse_line1  = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C06_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।</span>
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<span class="shloka-line">शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥</span>
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| verse_line1  = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
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| verse_line2  = शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C06_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C06_V43" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C06_V44" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V44
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।</span>
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<span class="shloka-line">जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥</span>
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| verse_line1  = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V44">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V44_B01" data-verse="BGB_C06_V44">
{{Bhashyam
<p>योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । <span class="gr-moola">शब्दब्रह्मातिवर्तते</span>  परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥</p>
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| text    = योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । शब्दब्रह्मातिवर्तते परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥
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</div>
</div>
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।</span>
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<span class="shloka-line">अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥</span>
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V45">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V45_B01" data-verse="BGB_C06_V45">
{{Bhashyam
<p>नैकजन्मनीत्याह - <span class="gr-prateeka">प्रयत्नादिति ॥</span>  जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः ।<br/>ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् ।<br/>विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’</span></span> इति नारदीये ॥४५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C06_V45
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| id       = BGB_C06_V45_B01
| text    = नैकजन्मनीत्याह - प्रयत्नादिति ॥ जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः । ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् । विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C06_V46" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V46
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।</span>
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<span class="shloka-line">कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥</span>
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| verse_line1  = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
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<div class="verse" id="BGB_C06_V47" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C06_V47
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।</span>
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<span class="shloka-line">श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे समाधियोगप्रपञ्चनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे समाधियोगप्रपञ्चनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V47">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C06_V47">
<div class="bhashya" id="BGB_C06_V47_B01" data-verse="BGB_C06_V47">
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<span class="gr-moola">ज्ञानिभ्यः</span>  योगज्ञानिभ्यः । <span class="gr-moola">तपस्विभ्यः</span>  कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id"><br/> ‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते ।<br/>तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः ।<br/>ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’</span></span> इति गारुडे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते ।<br/>ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् ।<br/>दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’</span></span> इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥
| verse_id = BGB_C06_V47
</div>
| id       = BGB_C06_V47_B01
| text    = ज्ञानिभ्यः योगज्ञानिभ्यः । तपस्विभ्यः कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च- ‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते । तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः । ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे । ‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते । ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् । दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥
}}


</div>
</div>
Line 4,023: Line 4,601:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C07_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।
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| verse_line2  = असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V01_B01" data-verse="BGB_C07_V01">
{{Bhashyam
<p>आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V01
</div>
| id       = BGB_C07_V01_B01
| text    = आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
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| verse_line2  = यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V02_B01" data-verse="BGB_C07_V02">
{{Bhashyam
<p>इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V02
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| id       = BGB_C07_V02_B01
| text    = इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥
}}


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<div class="verse" id="BGB_C07_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
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| verse_line2  = यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह - मनुष्याणामिति ॥ ३ ॥</p>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥</span>
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{{Bhashyam
<p>प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ महतो हङ्कार एवान्तर्भावः । ॥४ ॥</p>
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| text    = प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ महतो हङ्कार एवान्तर्भावः । ॥४ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V05
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥</span>
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| verse_line1  = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
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| verse_line2  = जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V05_B01" data-verse="BGB_C07_V05">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">अपरा</span> अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एतन्महद्भूतम्’</span></span> इति श्रुतेः । जगाद च- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा ।<br/> अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः ।<br/>महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि ।<br/>अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया ।<br/>चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा ।<br/>यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः ।<br/>नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि ।<br/>ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इति</span></span>नारदीये ॥५॥
| verse_id = BGB_C07_V05
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| id       = BGB_C07_V05_B01
| text    = अपरा अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । ‘एतन्महद्भूतम्’ इति श्रुतेः । जगाद च- ‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा । अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः । महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि । अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया । चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा । यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः । नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि । ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इति नारदीये ॥५॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
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| verse_line2  = अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V06_B01" data-verse="BGB_C07_V06">
{{Bhashyam
<p>न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह -<span class="gr-prateeka">अहमिति ॥</span> प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogya-id">‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९)</span></span> इति । आह च - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता ।<br/>यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः ।<br/>सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः ।<br/>आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु ।<br/>तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’</span></span> ॥ इति नारदीये ॥६॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V06
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| id       = BGB_C07_V06_B01
| text    = न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह - अहमिति ॥ प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः- ‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९) इति । आह च - ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता । यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः । सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः । आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु । तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’ ॥ इति नारदीये ॥६॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।</span>
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<span class="shloka-line">मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
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| verse_line2  = मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V07">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V07_B01" data-verse="BGB_C07_V07">
{{Bhashyam
<p>अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । ( इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V07
</div>
| id       = BGB_C07_V07_B01
| text    = अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । ( इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।
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| verse_line2  = प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V09
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<span class="shloka-line">पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥</span>
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| verse_line1  = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
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| verse_line2  = जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V10
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<span class="shloka-line">बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
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| verse_line2  = बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।
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| verse_line2  = धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V11_B01" data-verse="BGB_C07_V11">
{{Bhashyam
<p>इदं ज्ञानम्। ‘रसोऽहम्’ इति (इत्यादि)विज्ञानम् । अबादयोऽपि तत एव । तथाऽपि रसादिस्वभावानां साराणां (रसानां) च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियामकः । न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिः तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति ‘अप्सु रसः’ इत्यादिविशेषशब्दैः । भोगश्च विशेषतो रसादेरिति, उपासनार्थं च । उक्तं गीताकल्पे- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Geetakalpa-id">‘रसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च ।<br/>सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम् ।<br/>सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः ।<br/>रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः ।<br/>अबादयः पार्षदा एव ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः ।<br/>रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः ॥’</span></span> इति ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘स्वभावो जीव एव च’(भाग.१.१०.१२),</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्(किमतः परम्)।’</span></span>, ‘न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम्’(१०.३९) । इति च ।<br/>‘धर्माविरुद्धः’, ‘कामरागविवर्जितम्’ इत्याद्युपासनार्थम् । उक्तं च गीताकल्पे- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Geetakalpa-id">‘धर्माविरुद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता ।<br/>विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता ।<br/>ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति सः ॥’</span></span> इत्यादि ।</p>
| verse_id = BGB_C07_V11
</div>
| id       = BGB_C07_V11_B01
| text    = इदं ज्ञानम्। ‘रसोऽहम्’ इति (इत्यादि)विज्ञानम् । अबादयोऽपि तत एव । तथाऽपि रसादिस्वभावानां साराणां (रसानां) च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियामकः । न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिः तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति ‘अप्सु रसः’ इत्यादिविशेषशब्दैः । भोगश्च विशेषतो रसादेरिति, उपासनार्थं च । उक्तं गीताकल्पे- ‘रसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च । सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम् । सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः । रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः । अबादयः पार्षदा एव ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः । रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः ॥’ इति । ‘स्वभावो जीव एव च’(भाग.१.१०.१२), ‘सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्(किमतः परम्)।’ , ‘न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम्’(१०.३९) । इति च । ‘धर्माविरुद्धः’, ‘कामरागविवर्जितम्’ इत्याद्युपासनार्थम् । उक्तं च गीताकल्पे- ‘धर्माविरुद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता । विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता । ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति सः ॥’ इत्यादि ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C07_V11_B02" data-verse="BGB_C07_V11">
{{Bhashyam
<p>‘पुण्यो गन्धः’ इति भोगापेक्षया च । तथाहि श्रुतिः - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyka-id">‘पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Katha-id">‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके’(कठ.१.७.१)</span></span> इत्यादिका । ऋतं च पुण्यम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते’</span></span>इत्यभिधानात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात् सम्प्रयोगगः’</span></span> इति च । न च <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(आथ.३.१.१)</span></span>, <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्’(भाग.११.११.६)</span></span> इत्यादिविरोधः । स्थूलानशनोक्तेः । आह च सूक्ष्माशनम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘प्रविविक्ताऽहारतर इवैष भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः’(बृ.६.२.३)</span></span> इति । न चात्र जीव उच्यते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘शारीरादात्मनः’</span></span>इति भेदाभिधानात् । स्वप्नादिश्च शारीर एव - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘शारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः’</span></span> इति वचनाद् गारुडे । ‘अस्मात्’ इतीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः ।<br/>अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः ॥’</span></span> इति वचनान्नारदीये ।<br/>भेदश्रुतेश्च । सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यः, न त्ववस्थाभेदः । आह च -<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Geetakalpa-id">‘प्रविविक्तभुग् यतो ह्यस्माच्छारीरात् पुरुषोत्तमः ।<br/>अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात् स एव तु ॥’</span></span>इति गीताकल्पे ॥ ८-१० ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V11
</div>
| id       = BGB_C07_V11_B02
| text    = ‘पुण्यो गन्धः’ इति भोगापेक्षया च । तथाहि श्रुतिः - ‘पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) , ‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके’(कठ.१.७.१) इत्यादिका । ऋतं च पुण्यम्- ‘ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते’ इत्यभिधानात् । ‘ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात् सम्प्रयोगगः’ इति च । न च ‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(आथ.३.१.१) , ‘अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्’(भाग.११.११.६) इत्यादिविरोधः । स्थूलानशनोक्तेः । आह च सूक्ष्माशनम्- ‘प्रविविक्ताऽहारतर इवैष भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः’(बृ.६.२.३) इति । न चात्र जीव उच्यते । ‘शारीरादात्मनः’ इति भेदाभिधानात् । स्वप्नादिश्च शारीर एव - ‘शारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः’ इति वचनाद् गारुडे । ‘अस्मात्’ इतीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्- ‘शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः । अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः ॥’ इति वचनान्नारदीये । भेदश्रुतेश्च । सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यः, न त्ववस्थाभेदः । आह च - ‘प्रविविक्तभुग् यतो ह्यस्माच्छारीरात् पुरुषोत्तमः । अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात् स एव तु ॥’ इति गीताकल्पे ॥ ८-१० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
</div>
| verse_line2  = मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V12_B01" data-verse="BGB_C07_V12">
{{Bhashyam
<p>‘न त्वहं तेषु’ इति तदनाधारत्वमुच्यते । उक्तं च-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Geetakalpa-id">‘तदाश्रितं जगत् सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः’ ।</span></span>इति गीताकल्पे ॥ १२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V12
</div>
| id       = BGB_C07_V12_B01
| text    = ‘न त्वहं तेषु’ इति तदनाधारत्वमुच्यते । उक्तं च- ‘तदाश्रितं जगत् सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः’ । इति गीताकल्पे ॥ १२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
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| verse_line2  = मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V13">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V13">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V13_B01" data-verse="BGB_C07_V13">
{{Bhashyam
<p>तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">त्रिभिरिति ॥</span> तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’।</span></span> इति ।<br/> नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ ।</span></span> इति व्यासयोगे ।</p>
| verse_id = BGB_C07_V13
            <span class="gr-moola">भावैः</span> पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- <span class="gr-prateeka">एभिरिति |</span> ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थम् ‘इदम्’ इति । गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वा ईश्वरदेहोऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः । जगाद च व्यासयोगे- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘गौणान् ब्रह्मादिदेहादीन् दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः । <br/>देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् ॥’ इति ।</span></span> <br/><span class="gr-moola">एभ्यः</span> गुणमयेभ्यः । ‘गुणेभ्यः परम्’(१४.१९) इति वक्ष्यमाणत्वात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvataropanishat-id">‘केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.६.११)</span></span> इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘त्रैगुण्यवर्जितम्’(म.भा.म.श्लोक)</span></span> इति चोक्तम् ॥१३ ॥
| id       = BGB_C07_V13_B01
</div>
| text    = तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह - त्रिभिरिति ॥ तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- ‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’। इति । नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- ‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ । इति व्यासयोगे । भावैः पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- एभिरिति | ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थम् ‘इदम्’ इति । गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वा ईश्वरदेहोऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः । जगाद च व्यासयोगे- ‘गौणान् ब्रह्मादिदेहादीन् दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः । देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् ॥’ इति । एभ्यः गुणमयेभ्यः । ‘गुणेभ्यः परम्’(१४.१९) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ‘केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.६.११) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । ‘त्रैगुण्यवर्जितम्’(म.भा.म.श्लोक) इति चोक्तम् ॥१३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
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| verse_line2  = मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V14_B01" data-verse="BGB_C07_V14">
{{Bhashyam
<p>कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">दैवीति ॥</span> अयमाशयः - माया हि <span class="gr-moola">एषा</span> मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी ।<br/> तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः ।<br/>अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि ।<br/>तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’</span></span> इति व्यासयोगे । <br/>तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">मामेवेति ॥</span> अन्यत् सर्वं परित्यज्य <span class="gr-moola">मामेव ये प्रपद्यन्ते</span>, गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः ।<br/> मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’</span></span>इति । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६)</span></span>। इति च ॥१४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V14
</div>
| id       = BGB_C07_V14_B01
| text    = कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- दैवीति ॥ अयमाशयः - माया हि एषा मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- ‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी । तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः । अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि । तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’ इति व्यासयोगे । तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- मामेवेति ॥ अन्यत् सर्वं परित्यज्य मामेव ये प्रपद्यन्ते , गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये- ‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः । मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’ इति । ‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६) । इति च ॥१४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V15
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
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| verse_line2  = माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
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| verse_line2  = आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V16_B01" data-verse="BGB_C07_V16">
{{Bhashyam
<p>तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव नराधमाः । अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः । अत एव आसुरं भावमाश्रिताः । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे-</p>
| verse_id = BGB_C07_V16
<span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’।</span> इति ।
| id       = BGB_C07_V16_B01
<p>असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- <span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ ।</span> । इति ॥ १५, १६ ॥</p>
| text    = तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव नराधमाः । अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः । अत एव आसुरं भावमाश्रिताः । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे- ‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’। इति । असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- ‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ । । इति ॥ १५, १६ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C07_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
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| verse_line2  = प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
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| verse_line2  = आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V18_B01" data-verse="BGB_C07_V18">
{{Bhashyam
<p>एकस्मिन्नेव भक्तिरित्येकभक्तिः । तच्चोक्तं गारुडे- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘मय्येव भक्तिर्नान्यत्र एकभक्तिः स उच्यते।’</span></span> इति ॥ १७, १८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V18
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| id       = BGB_C07_V18_B01
| text    = एकस्मिन्नेव भक्तिरित्येकभक्तिः । तच्चोक्तं गारुडे- ‘मय्येव भक्तिर्नान्यत्र एकभक्तिः स उच्यते।’ इति ॥ १७, १८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।
</div>
| verse_line2  = वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V19_B01" data-verse="BGB_C07_V19">
{{Bhashyam
<p>बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- <span class="gr-reference gr-ref-Brahma-id">‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’।</span> इति ॥ १९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V19
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| id       = BGB_C07_V19_B01
| text    = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- ‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’। इति ॥ १९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
</div>
| verse_line2  = तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V20">
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{{Bhashyam
<span class="gr-moola">प्रकृत्या</span> स्वभावेन,- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’।</span></span> इत्यभिधानात् ॥ २० ॥
| verse_id = BGB_C07_V20
</div>
| id       = BGB_C07_V20_B01
| text    = प्रकृत्या स्वभावेन,- ‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’। इत्यभिधानात् ॥ २० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V21
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥</span>
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| verse_line1  = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।
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<div class="verse" id="BGB_C07_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥</span>
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| verse_line1  = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
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<div class="verse" id="BGB_C07_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V23
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥</span>
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| verse_line1  = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
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| verse_line2  = देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V23_B01" data-verse="BGB_C07_V23">
{{Bhashyam
<p>यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये- <span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’।</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३)</span> इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु । <span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarta-id">‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ ।</span> इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V23
</div>
| id       = BGB_C07_V23_B01
| text    = यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये- ‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’। इति । ‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३) इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु । ‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ । इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
</div>
| verse_line2  = परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V24_B01" data-verse="BGB_C07_V24">
{{Bhashyam
<p>को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह - व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सदसतः परम्’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvatara-id">‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvatara-id">‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’</span> इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’</span> । इति ॥ २४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C07_V24
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| id       = BGB_C07_V24_B01
| text    = को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह - व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- ‘सदसतः परम्’ , ‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’ , ‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९) , ‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’ इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्- ‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’ । इति ॥ २४ ॥
}}


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<div class="verse" id="BGB_C07_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V25
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥</span>
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| verse_line1  = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
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| verse_line2  = मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे-</p>
| verse_id = BGB_C07_V25
<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् ।<br/>स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’</span> इति ॥२५ ॥
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| text    = अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे- ‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् । स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’ इति ॥२५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C07_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V26">
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<p>न च मां माया बध्नातीत्याह - वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥</p>
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| text    = न च मां माया बध्नातीत्याह - वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V27
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<span class="shloka-line">इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥</span>
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<div class="bhashya" id="BGB_C07_V27_B01" data-verse="BGB_C07_V27">
{{Bhashyam
<p>द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥</p>
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| id       = BGB_C07_V27_B01
| text    = द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C07_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥</span>
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| verse_line1  = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
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| verse_line2  = ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V28_B01" data-verse="BGB_C07_V28">
{{Bhashyam
<p>विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥</p>
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| text    = विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।</span>
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<span class="shloka-line">ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥</span>
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| verse_line1  = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
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| verse_line2  = ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C07_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C07_V30
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<span class="shloka-line">साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C07
<span class="shloka-line">प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
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| verse_line2  = प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V30">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C07_V30">
<div class="bhashya" id="BGB_C07_V30_B01" data-verse="BGB_C07_V30">
{{Bhashyam
<p>‘जरामरणमोक्षाय’ इत्यन्यकामनिवृत्त्यर्थम् । मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थं वा । न विधिः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘मुमुक्षोरमुमुक्षुस्तु वरो ह्येकान्तभक्तिभाक्’ ।</span></span> इतीतरस्तुतेः नारदीये ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">‘नात्यन्तिकम्’(भाग.३.१६.४८)</span></span> इति च ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C07_V30
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">‘देवानां गुणलिङ्गानाम् आनुश्राविककर्मणाम् ।<br/> सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ।<br/>अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।<br/> जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥’(भाग.३.२६.३२-३३)</span></span>इति भागवते लक्षणाच्च ।<br/>
| id       = BGB_C07_V30_B01
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Githakalpa-id">आह च- ‘सर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः ।<br/>नारायणस्तु मोक्षार्थे मोक्षो नान्यार्थ इष्यते ।<br/>एवं मध्यमभक्तानाम् एकान्तानां न कस्यचित् ।<br/>अर्थे नारायणो देवस्त्वन्यत् सर्वं तदर्थकम् ॥’</span></span> इति गीताकल्पे ।<br/>
| text    = ‘जरामरणमोक्षाय’ इत्यन्यकामनिवृत्त्यर्थम् । मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थं वा । न विधिः । ‘मुमुक्षोरमुमुक्षुस्तु वरो ह्येकान्तभक्तिभाक्’ । इतीतरस्तुतेः नारदीये । ‘नात्यन्तिकम्’(भाग.३.१६.४८) इति च । ‘देवानां गुणलिङ्गानाम् आनुश्राविककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या । अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥’(भाग.३.२६.३२-३३) इति भागवते लक्षणाच्च । आह च- ‘सर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः । नारायणस्तु मोक्षार्थे मोक्षो नान्यार्थ इष्यते । एवं मध्यमभक्तानाम् एकान्तानां न कस्यचित् । अर्थे नारायणो देवस्त्वन्यत् सर्वं तदर्थकम् ॥’ इति गीताकल्पे । त एव च विदुः । ‘यमेवैष वृणुते’(आथ.४.१.३) इति श्रुतेः ॥ २९, ३० ॥
<p>त एव च विदुः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">‘यमेवैष वृणुते’(आथ.४.१.३)</span></span>इति श्रुतेः ॥ २९, ३० ॥</p>
}}
</div>


</div>
</div>
Line 4,452: Line 5,091:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C08_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V01
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥</span>
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| verse_line1  = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
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| verse_line2  = अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C08_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥</span>
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| verse_line1  = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।
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}}


<div class="verse" id="BGB_C08_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
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| verse_line2  = भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V03_B01" data-verse="BGB_C08_V03">
{{Bhashyam
<p>परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C08_V03
</div>
| id       = BGB_C08_V03_B01
| text    = परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V04
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
</div>
| verse_line2  = अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V04_B01" data-verse="BGB_C08_V04">
{{Bhashyam
<p>भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् <span class="gr-moola">अधिभूतम्</span> <span class="gr-moola">क्षरो भावः</span> विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’</span></span> इति च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’</span></span> इति च स्कान्दे ।<br/>पुरि शयनात् <span class="gr-moola">पुरुषो</span> जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)।</p>
| verse_id = BGB_C08_V04
</div>
| id       = BGB_C08_V04_B01
| text    = भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् अधिभूतम् । क्षरो भावः विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- ‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’ इति । ‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’ इति च । ‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’ इति च स्कान्दे । पुरि शयनात् पुरुषो जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C08_V04_B02" data-verse="BGB_C08_V04">
{{Bhashyam
<p>सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः <span class="gr-moola">अधियज्ञः</span> । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् ।<br/>‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-bruhadaranyaka-id">‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९)</span></span> इत्यादेः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२)</span></span> इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण <span class="gr-moola">अधियज्ञः</span></p>
| verse_id = BGB_C08_V04
</div>
| id       = BGB_C08_V04_B02
| text    = सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः अधियज्ञः । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् । ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९) इत्यादेः । ‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२) इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण अधियज्ञः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C08_V04_B03" data-verse="BGB_C08_V04">
{{Bhashyam
<p>‘अत्र’ इति स्वदेहनिवृत्त्यर्थम् । न हि तत्रेश्वरस्य नियन्तृत्वं पृथगस्ति । नात्रोक्तं ब्रह्म भगवतोऽन्यत् । ‘ते ब्रह्म’(७.२९) इत्युक्त्वा ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः’(७.३०) इति परामर्शात् । तस्यैव च प्रश्नात् । ‘साधियज्ञम्’ इति भेदप्रतीतेः तन्निवृत्त्यर्थम् ‘अधियज्ञोऽहम्’ इत्युक्तम् । ‘माम्’ इत्यभेदप्रतीतेः ‘अक्षरम्’ इत्येवोक्तम् । आह च गीताकल्पे- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Geetakalpa-id">‘देहस्थविष्णुरूपाणि अधियज्ञ इतीरितः ।<br/>कर्मेश्वरस्य सृष्ट्याख्यं तच्चापीच्छाद्यमुच्यते ।<br/>अधिभूतं जडं प्रोक्तमध्यात्मं जीव उच्यते ।<br/>हिरण्यगर्भोऽधिदैवं देवः सङ्कर्षणोऽपि वा ।<br/>ब्रह्म नारायणो देवः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥’ इति ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C08_V04
<p>‘यथाप्रतीतं वा सर्वमत्र वै न विरुध्यते ॥’</span></span>  इति च ।<br/> स्कान्दे च - <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘आत्माभिमानाधिकारस्थितमध्यात्ममुच्यते ।<br/>देहाद् बाह्यं विनाऽतीव बाह्यत्वादधिदैवतम् ।<br/>देवाधिकारगं सर्वं महाभूताधिकारगम् ।<br/>तत्कारणं तथा कार्यमधिभूतं तदन्तिकात्’॥</span></span>  इति । <br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahakoorma-id">महाकौर्मे च - ‘अध्यात्मं देहपर्यन्तं केवलात्मोपकारकम् ।<br/></p>
| id       = BGB_C08_V04_B03
<p>‘सदेहजीवभूतानि यत् तेषामुपकारकृत् ।<br/>अधिभूतं तु मायान्तं देवानामधिदैवतम् ॥’</span></span> इति ॥४ ॥</p>
| text    = ‘अत्र’ इति स्वदेहनिवृत्त्यर्थम् । न हि तत्रेश्वरस्य नियन्तृत्वं पृथगस्ति । नात्रोक्तं ब्रह्म भगवतोऽन्यत् । ‘ते ब्रह्म’(७.२९) इत्युक्त्वा ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः’(७.३०) इति परामर्शात् । तस्यैव च प्रश्नात् । ‘साधियज्ञम्’ इति भेदप्रतीतेः तन्निवृत्त्यर्थम् ‘अधियज्ञोऽहम्’ इत्युक्तम् । ‘माम्’ इत्यभेदप्रतीतेः ‘अक्षरम्’ इत्येवोक्तम् । आह च गीताकल्पे- ‘देहस्थविष्णुरूपाणि अधियज्ञ इतीरितः । कर्मेश्वरस्य सृष्ट्याख्यं तच्चापीच्छाद्यमुच्यते । अधिभूतं जडं प्रोक्तमध्यात्मं जीव उच्यते । हिरण्यगर्भोऽधिदैवं देवः सङ्कर्षणोऽपि वा । ब्रह्म नारायणो देवः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥’ इति । ‘यथाप्रतीतं वा सर्वमत्र वै न विरुध्यते ॥’ इति च । स्कान्दे च - ‘आत्माभिमानाधिकारस्थितमध्यात्ममुच्यते । देहाद् बाह्यं विनाऽतीव बाह्यत्वादधिदैवतम् । देवाधिकारगं सर्वं महाभूताधिकारगम् । तत्कारणं तथा कार्यमधिभूतं तदन्तिकात्’॥ इति । महाकौर्मे च - ‘अध्यात्मं देहपर्यन्तं केवलात्मोपकारकम् । ‘सदेहजीवभूतानि यत् तेषामुपकारकृत् । अधिभूतं तु मायान्तं देवानामधिदैवतम् ॥’ इति ॥४ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।
</div>
| verse_line2  = यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V05">
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<div class="bhashya" id="BGB_C08_V05_B01" data-verse="BGB_C08_V05">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">मद्भावं</span> मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२)</span></span>  इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥
| verse_id = BGB_C08_V05
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| id       = BGB_C08_V05_B01
| text    = मद्भावं मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्- ‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२) इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥
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</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥</span>
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| verse_line1  = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
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| verse_line2  = तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C08_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
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| verse_line2  = मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C08_V07_B01" data-verse="BGB_C08_V07">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">स्मरन्</span> त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ ।</span></span>इति स्कान्दे ।<br/>
| verse_id = BGB_C08_V07
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-bruhadaranyaka-id">‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । <br/>तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२)</span></span> इति हि श्रुतिः ।<br/>
| id       = BGB_C08_V07_B01
          ‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘भावना त्वतिवासना’</span></span> इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥
| text    = स्मरन् त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का । ‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ । इति स्कान्दे । ‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः । ‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥
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</div>
</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V08
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
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| verse_line2  = परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V08_B01" data-verse="BGB_C08_V08">
{{Bhashyam
<p>सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति -<span class="gr-prateeka">अभ्यासेति ॥</span> अभ्यास एव योगो <span class="gr-moola">अभ्यासयोगः</span> <span class="gr-moola">दिव्यं पुरुषं</span> पुरिशयं पूर्णं च ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C08_V08
<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-bruhadaranyaka-id">‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। <br/> नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८)</span></span> इति श्रुतेः ।<br/>दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Dhathu-id">‘दिवु = क्रीडा-.......’</span></span> इति धातोः ॥८ ॥
| id       = BGB_C08_V08_B01
</div>
| text    = सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति - अभ्यासेति ॥ अभ्यास एव योगो अभ्यासयोगः । दिव्यं पुरुषं पुरिशयं पूर्णं च । ‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८) इति श्रुतेः । दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । ‘दिवु = क्रीडा-.......’ इति धातोः ॥८ ॥
}}


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</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।
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| verse_line2  = सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V09_B01" data-verse="BGB_C08_V09">
{{Bhashyam
<p>ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् , <span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०)</span> इति श्रुतिः । <span class="gr-reference gr-ref-brahma-id">‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’</span> इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । <span class="gr-reference gr-ref-Dhathu-id">‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’</span> इति धातोः ।</p>
| verse_id = BGB_C08_V09
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४)</span> इति च श्रुतिः । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ब्रह्मा स्थाणुः’</span> इत्यारभ्य <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९)</span> इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’</span> इति पिप्पलादशाखायाम् ।
| id       = BGB_C08_V09_B01
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘मृत्युर्वा व तमः’</span> , <span class="gr-reference gr-ref-bruhadaranyaka-id">मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९)</span> इति श्रुतेः ॥९ ॥
| text    = ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०) इति श्रुतिः । ‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’ इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोः । ‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४) इति च श्रुतिः । ‘ब्रह्मा स्थाणुः’ इत्यारभ्य ‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९) इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’ इति पिप्पलादशाखायाम् । ‘मृत्युर्वा व तमः’ , मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९) इति श्रुतेः ॥९ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V10
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
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| verse_line2  = भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V10">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V10_B01" data-verse="BGB_C08_V10">
{{Bhashyam
<p>वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - <span class="gr-prateeka">प्रयाणकाल इति ॥</span> वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये ।<br/>वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ <br/>तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।<br/>त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५)</span></span>इति ॥<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।<br/> एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५)</span></span> इति च मोक्षधर्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः ।<br/>नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् ।<br/>वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’</span></span> इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥</p>
| verse_id = BGB_C08_V10
</div>
| id       = BGB_C08_V10_B01
| text    = वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - प्रयाणकाल इति ॥ वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- ‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये । वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५) इति ॥ ‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः । नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् । वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’ इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
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| verse_line2  = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V11_B01" data-verse="BGB_C08_V11">
{{Bhashyam
<p>तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति -<span class="gr-prateeka">यदक्षरमित्यादिना ॥</span>  प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति <span class="gr-moola">पदं</span> स्वरूपम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Dhathu-id">‘पद= गतौ’</span></span> इति धातोः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७)</span></span> इति श्रुतेश्च ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Naradiya-id">‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’</span></span> इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C08_V11
</div>
| id       = BGB_C08_V11_B01
| text    = तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति - यदक्षरमित्यादिना ॥ प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति पदं स्वरूपम् । ‘पद= गतौ’ इति धातोः । ‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७) इति श्रुतेश्च । ‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’ इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
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| verse_line2  = मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C08_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
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| verse_line2  = यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V13">
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<div class="bhashya" id="BGB_C08_V13_B01" data-verse="BGB_C08_V13">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति <span class="gr-moola">सर्वद्वाराणि संयम्य</span><br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘निर्गच्छन् चक्षुषा सूर्यं दिशः श्रोत्रेण चैव हि’ इत्यादिवचनात् व्यासयोगे, मोक्षधर्मे च ।</span></span> <span class="gr-moola">हृदि</span> नारायणे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘ह्रियते त्वया जगद् यस्माद्धृदित्येव प्रभाष्यसे’</span></span>इति हि पाद्मे<br/>। न हि <span class="gr-moola">मूर्ध्नि</span> प्राणे (प्राणस्थितेः) <span class="gr-moola">हृदि</span> मनसः स्थितिः सम्भवति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vyasayoga-id">‘यत्र प्राणो मनस्तत्र तत्र जीवः परस्तथा।’</span></span> इति व्यासयोगे । <span class="gr-moola">योगधारणामास्थितः</span> योगभरण एवाभियुक्त इत्यर्थः ॥ १२, १३ ॥</p>
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| id       = BGB_C08_V13_B01
| text    = ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति सर्वद्वाराणि संयम्य । ‘निर्गच्छन् चक्षुषा सूर्यं दिशः श्रोत्रेण चैव हि’ इत्यादिवचनात् व्यासयोगे, मोक्षधर्मे च । हृदि नारायणे । ‘ह्रियते त्वया जगद् यस्माद्धृदित्येव प्रभाष्यसे’ इति हि पाद्मे । न हि मूर्ध्नि प्राणे (प्राणस्थितेः) हृदि मनसः स्थितिः सम्भवति । ‘यत्र प्राणो मनस्तत्र तत्र जीवः परस्तथा।’ इति व्यासयोगे । योगधारणामास्थितः योगभरण एवाभियुक्त इत्यर्थः ॥ १२, १३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।</span>
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<span class="shloka-line">तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
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| verse_line2  = तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥</p>
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| text    = नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V15
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<span class="shloka-line">मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।</span>
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<span class="shloka-line">नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
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| verse_line2  = नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥</p>
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| text    = तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥
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| verse_id    = BGB_C08_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C08_V16_B01" data-verse="BGB_C08_V16">
{{Bhashyam
<p>महामेरुस्थब्रह्मसदनमारभ्य न पुनरावृत्तिः । तच्चोक्तं नारायणगोपालकल्पे-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narayanagopalakalpa-id">‘आ मेरुब्रह्मसदनाद् आजनान्न जनिर्भुवि ।<br/>तथाऽप्यभावः सर्वत्र प्राप्यैव वसुदेवजम् ॥’</span></span>  इति ॥१६ ॥</p>
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| text    = महामेरुस्थब्रह्मसदनमारभ्य न पुनरावृत्तिः । तच्चोक्तं नारायणगोपालकल्पे- ‘आ मेरुब्रह्मसदनाद् आजनान्न जनिर्भुवि । तथाऽप्यभावः सर्वत्र प्राप्यैव वसुदेवजम् ॥’ इति ॥१६ ॥
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</div>
</div>
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<span class="shloka-line">सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।</span>
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<span class="shloka-line">रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥</span>
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| verse_line1  = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
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| verse_line2  = रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥
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<span class="shloka-line">अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।</span>
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<span class="shloka-line">रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥</span>
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| verse_line1  = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
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<span class="shloka-line">भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।</span>
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<span class="shloka-line">रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
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<div class="verse" id="BGB_C08_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V20
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<span class="shloka-line">परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।</span>
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<span class="shloka-line">यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।
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| verse_line2  = यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V20_B01" data-verse="BGB_C08_V20">
{{Bhashyam
<p>‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - <span class="gr-prateeka">सहस्रयुगेत्यादिना ॥</span> सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘सा विश्वरूपस्य रजनी’</span></span> इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- <br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahakourma-id">‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा ।<br/>रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’</span></span>  इति ।<br/>‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥</p>
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| id       = BGB_C08_V20_B01
| text    = ‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - सहस्रयुगेत्यादिना ॥ सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । ‘सा विश्वरूपस्य रजनी’ इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- ‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा । रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’ इति । ‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥</span>
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| verse_line1  = अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।
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| verse_line2  = यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V21_B01" data-verse="BGB_C08_V21">
{{Bhashyam
<p>अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । <span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’</span> इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् ।</p>
| verse_id = BGB_C08_V21
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’</span> इत्यभिधानात्॥ २१ ॥
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| text    = अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । ‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’ इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् । ‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’ इत्यभिधानात्॥ २१ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।</span>
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<span class="shloka-line">यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥</span>
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| verse_line1  = पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
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| verse_line2  = यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥</p>
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| text    = परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V23
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥</span>
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| verse_line1  = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
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| verse_line2  = प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥
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<p>यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥</p>
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| text    = यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥
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</div>
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<span class="shloka-line">अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।</span>
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<span class="shloka-line">तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥</span>
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| verse_line1  = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
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<span class="shloka-line">धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।</span>
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<span class="shloka-line">तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C08_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।</span>
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<span class="shloka-line">एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C08_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C08_V26_B01" data-verse="BGB_C08_V26">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">ज्योतिः</span> अर्चिः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१)</span></span>इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Narada-id">‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’</span></span> इति ।<br/>अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’</span></span> इति युज्येत ।<br/>
| verse_id = BGB_C08_V26
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahme-id">‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’</span></span> इति च ब्राह्मे ।<br/>मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Garuda-id">‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’</span></span> इति ।<br/>तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmavaivarta-id">‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा ।<br/>सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’</span></span> इति ॥ २४-२६ ॥
| id       = BGB_C08_V26_B01
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| text    = ज्योतिः अर्चिः । ‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१) इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- ‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’ इति । अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा ‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति युज्येत । ‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’ इति च ब्राह्मे । मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- ‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’ इति । तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- ‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा । सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’ इति ॥ २४-२६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C08_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C08_V27
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
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| verse_line2  = तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C08_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C08
<span class="shloka-line">अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">॥२८ ॥</span>
| verse_line1  = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
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| verse_line2  = अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
</div>
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥</div>


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{{Bhashyam
<p>एते सृती सोपाये ज्ञात्वाऽनुष्ठाय न मुह्यति । तच्चाह स्कान्दे- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘सृती ज्ञात्वा तु सोपाये अनुष्ठाय च साधनम् ।<br/>न कश्चित् मोहमाप्नोति न चान्या तत्र वै गतिः ॥’</span></span> इति ॥ २७-२८ ॥</p>
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| text    = एते सृती सोपाये ज्ञात्वाऽनुष्ठाय न मुह्यति । तच्चाह स्कान्दे- ‘सृती ज्ञात्वा तु सोपाये अनुष्ठाय च साधनम् । न कश्चित् मोहमाप्नोति न चान्या तत्र वै गतिः ॥’ इति ॥ २७-२८ ॥
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</div>
</div>
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<div class="verse" id="BGB_C09_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V01
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥</span>
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| verse_line1  = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C09_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C09_V02
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<span class="shloka-line">राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥</span>
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| verse_line1  = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
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| verse_line2  = प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C09_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।</span>
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<span class="shloka-line">अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
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| verse_line2  = अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V03_B01" data-verse="BGB_C09_V03">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">राजविद्या</span> प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् <span class="gr-moola">प्रत्यक्षावगमम्</span> । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadarnyaka-id">‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) ।<br/>‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८)</span></span> इत्यादेः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogya-id">‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१)</span></span>इति च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayana-id">‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५)</span></span> इति च ।<br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabarata-id">‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४)</span></span>इत्यादेश्च मोक्षधर्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’</span></span>इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् ।<br/>धर्मो=भगवान्, तद्विषयं <span class="gr-moola">धर्म्यम्</span>। सर्वं जगद् धत्त इति धर्मः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabarata-id">‘पृथिवी (धरणी) धर्ममूर्धनि’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१२)</span></span> इति प्रयोगान्मोक्षधर्मे । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabarata-id">‘भारभृत् कथितो योगी’ इति च ।</span></span> <br/>            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Taittareeyaranyaka-id">‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति’(तै.आ.३.१४)</span></span>इति च श्रुतिः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘धर्मो वा इदमग्र आसीन्न पृथिवी न वायुर्नाकाशो न ब्रह्मा न रुद्रो (नेन्द्रो) न देवा न ऋषयः सोऽध्यायत्’</span></span> इति च सामवेदे बाभ्रव्यशाखायाम् । ‘प्रत्यक्षावगम’शब्देन अपरोक्षज्ञानसाधनत्वमुक्तम् ॥ १-३ ॥
| verse_id = BGB_C09_V03
</div>
| id       = BGB_C09_V03_B01
| text    = राजविद्या प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् प्रत्यक्षावगमम् । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- ‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) । ‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८) इत्यादेः । ‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१) इति च । ‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५) इति च । ‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४) इत्यादेश्च मोक्षधर्मे । ‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’ इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् । धर्मो=भगवान्, तद्विषयं धर्म्यम् । सर्वं जगद् धत्त इति धर्मः । ‘पृथिवी (धरणी) धर्ममूर्धनि’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१२) इति प्रयोगान्मोक्षधर्मे । ‘भारभृत् कथितो योगी’ इति च । ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति’(तै.आ.३.१४) इति च श्रुतिः । ‘धर्मो वा इदमग्र आसीन्न पृथिवी न वायुर्नाकाशो न ब्रह्मा न रुद्रो (नेन्द्रो) न देवा न ऋषयः सोऽध्यायत्’ इति च सामवेदे बाभ्रव्यशाखायाम् । ‘प्रत्यक्षावगम’शब्देन अपरोक्षज्ञानसाधनत्वमुक्तम् ॥ १-३ ॥
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| verse_id    = BGB_C09_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।</span>
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<span class="shloka-line">मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
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| verse_line2  = मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥</p>
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| id       = BGB_C09_V04_B01
| text    = तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥
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<span class="shloka-line">न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥</span>
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| verse_line1  = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
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| verse_line2  = भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- <span class="gr-prateeka">न चेति ॥</span><br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च।’(कुम्भ-म.भा.१२.३४७.२१)</span></span> इति मोक्षधर्मे ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सञ्ज्ञासञ्ज्ञ’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४)</span></span> इति च । <span class="gr-moola">ममाऽत्मा</span> देह एव <span class="gr-moola">भूतभावनः</span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘महाविभूते माहात्म्यशरीर’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४)</span></span> इति हि मोक्षधर्मे ॥५ ॥</p>
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| id       = BGB_C09_V05_B01
| text    = मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- न चेति ॥ ‘न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च।’(कुम्भ-म.भा.१२.३४७.२१) इति मोक्षधर्मे । ‘सञ्ज्ञासञ्ज्ञ’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति च । ममाऽत्मा देह एव भूतभावनः । ‘महाविभूते माहात्म्यशरीर’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति हि मोक्षधर्मे ॥५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।</span>
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<span class="shloka-line">तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥</span>
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| verse_line1  = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
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| verse_line2  = तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥
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{{Bhashyam
<p>‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥</p>
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| text    = ‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥
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</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
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| verse_line2  = कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- सर्वभूतानीत्यादिना ॥ ७॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V07
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।</span>
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<span class="shloka-line">भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V08_B01" data-verse="BGB_C09_V08">
{{Bhashyam
<p>प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।’(कुम्भ-म.भा.शां.प.३४७.४५)</span> इति च मोक्षधर्मे ।</p>
| verse_id = BGB_C09_V08
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे)</span> इति च ।
| id       = BGB_C09_V08_B01
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) ।<br/>प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११)</span> इति च ।
| text    = प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।’(कुम्भ-म.भा.शां.प.३४७.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे) इति च । ‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) । प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११) इति च । ‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य । तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु । ‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’ इति भागवते । ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’ इति च आथर्वणे । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’ इति च । ‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१) , ‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२) इत्यादेश्च । प्रकृतेर्वशादवशम् । ‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव । मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’ इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य ।<br/>तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’</span> इति ऋग्वेदखिलेषु ।
}}
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’</span> इति भागवते ।
<span class="gr-reference gr-ref-Atharvanaveda-id">‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’</span> इति च आथर्वणे ।
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’</span> इति च ।
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१)</span> , <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२)</span> इत्यादेश्च ।
<p>प्रकृतेर्वशादवशम् ।</p>
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव ।<br/>मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’</span> इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C09_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।</span>
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<span class="shloka-line">उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥</span>
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| verse_line1  = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
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| verse_line2  = उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya" id="BGB_C09_V09_B01" data-verse="BGB_C09_V09">
{{Bhashyam
<p>उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- <span class="gr-prateeka">असक्तमिति ॥</span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogya-id">‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२)</span></span> इति (हि) श्रुतिः ।</p>
| verse_id = BGB_C09_V09
            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।<br/>यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११)</span></span> इति भागवते ।<br/>यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः ।<br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’</span></span>इति श्रुतिः।  
| id       = BGB_C09_V09_B01
<p>यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥</p>
| text    = उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- असक्तमिति ॥ ‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२) इति (हि) श्रुतिः । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते । यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’ इति श्रुतिः। यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
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| verse_line2  = हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V10">
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{{Bhashyam
<p>उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruthi-id">‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४)</span> इति ॥१० ॥</p>
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| text    = उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- ‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४) इति ॥१० ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।</span>
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<span class="shloka-line">परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥</span>
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| verse_line1  = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
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| verse_line2  = परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V11_B01" data-verse="BGB_C09_V11">
{{Bhashyam
<p>तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">अवजानन्तीत्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">मानुषीं तनुं</span>  मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mokshadharma-id">‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।<br/>सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ <br/>ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ।<br/>भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ।<br/>भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३)</span></span> इति ।<br/>अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mokshadharma-id">‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः ।<br/>वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७)</span></span><br/> इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति <span class="gr-moola">भूतमहेश्वरम्</span> । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०)</span></span> इति च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४)</span></span> इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V11
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| id       = BGB_C09_V11_B01
| text    = तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह - अवजानन्तीत्यादिना ॥ मानुषीं तनुं मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- ‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते । सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च । भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३) इति । अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः । ‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः । वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७) इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति भूतमहेश्वरम् । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’ इति । ‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०) इति च । ‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४) इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
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| verse_line2  = राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V12_B01" data-verse="BGB_C09_V12">
{{Bhashyam
<p>तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च -</p>
| verse_id = BGB_C09_V12
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् ।<br/>मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः ।<br/>यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) ।<br/>कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७)</span> इति ।
| id       = BGB_C09_V12_B01
<span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये ।<br/>सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’</span> इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् ।
| text    = तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च - ‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् । मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः । यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) । कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) इति । ‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये । सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् ।
</div>
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C09_V12_B02" data-verse="BGB_C09_V12">
{{Bhashyam
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘द्वेषाच्चेद्यादयो नृपाः’(भाग.७.१.३२)</span> ,
| verse_id = BGB_C09_V12
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वैरेण यन्नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रसाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । <br/> ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९)</span>
| id       = BGB_C09_V12_B02
इत्यादि तु भगवतो भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थम्, (नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च ।) स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलाद् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान् ददातीति ।
| text    = ‘द्वेषाच्चेद्यादयो नृपाः’(भाग.७.१.३२) , ‘वैरेण यन्नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रसाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९) इत्यादि तु भगवतो भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थम्, (नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च ।) स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलाद् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान् ददातीति ।
</div>
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C09_V12_B03" data-verse="BGB_C09_V12">
{{Bhashyam
<p>भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७)</span></span> इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।<br/> विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६)</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६)</span></span> इत्यारभ्य<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८)</span></span> इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४)</span></span>  इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह-<span class="gr-prateeka">राक्षसीमिति ॥</span> १२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V12
</div>
| id       = BGB_C09_V12_B03
| text    = भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च ‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७) इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- ‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६) इति । ‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६) इत्यारभ्य ‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८) इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- ‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४) इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह- राक्षसीमिति ॥ १२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।</span>
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<span class="shloka-line">भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
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| verse_line2  = भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C09_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।</span>
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<span class="shloka-line">नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
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| verse_line2  = नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V14">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V14">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V14_B01" data-verse="BGB_C09_V14">
{{Bhashyam
<p>नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V14
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| id       = BGB_C09_V14_B01
| text    = नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C09_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।</span>
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<span class="shloka-line">एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
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| verse_line2  = एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V15_B01" data-verse="BGB_C09_V15">
{{Bhashyam
<p>सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६)</span> इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V15
</div>
| id       = BGB_C09_V15_B01
| text    = सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् । ‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६) इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।
</div>
| verse_line2  = मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V16_B01" data-verse="BGB_C09_V16">
{{Bhashyam
<p>प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’</span> इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V16
</div>
| id       = BGB_C09_V16_B01
| text    = प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । ‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’ इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V17
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
</div>
| verse_line2  = वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C09_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V18
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
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| verse_line2  = प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V18_B01" data-verse="BGB_C09_V18">
{{Bhashyam
<p>गम्यते मुमुक्षुभिरिति <span class="gr-moola">गतिः</span> । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’</span></span> इति । साक्षादीक्षत इति <span class="gr-moola">साक्षी</span> । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’</span></span> इति ।<br/>शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘परमं यः परायणम्’</span></span> इति ह्युक्तम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’</span></span> इति च ।<br/> संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति <span class="gr-moola">निधानम्</span> <br/>तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’</span></span> इति ॥१८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V18
</div>
| id       = BGB_C09_V18_B01
| text    = गम्यते मुमुक्षुभिरिति गतिः । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- ‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’ इति । साक्षादीक्षत इति साक्षी । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- ‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’ इति । शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । ‘परमं यः परायणम्’ इति ह्युक्तम् । ‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ इति च । संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति निधानम् । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’ इति ॥१८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
</div>
| verse_line2  = अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V19_B01" data-verse="BGB_C09_V19">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">सत्</span> कार्यम् । <span class="gr-moola">असत्</span> कारणम् ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः ।<br/>असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’</span></span> ॥ इति ह्यभिधानम् ।<br/>
| verse_id = BGB_C09_V19
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharatha-id">‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३)</span></span> इति च भारते ॥१९ ॥
| id       = BGB_C09_V19_B01
</div>
| text    = सत् कार्यम् । असत् कारणम् । ‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः । असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’ ॥ इति ह्यभिधानम् । ‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३) इति च भारते ॥१९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं</span>
| verse_line1  = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः
<span class="shloka-line">अश्नन्तिदिव्यान् दिवि देवभोगान् ॥२०॥</span>
| verse_line2  = यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
</div>
}}
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C09_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।</span>
| verse_type  = shloka
<span class="shloka-line">एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना</span>
| verse_line1  = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
<span class="shloka-line">गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥</span>
| verse_line2  = क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
</div>
}}
</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V20_B01" data-verse="BGB_C09_V21">
{{Bhashyam
<p>तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V21
</div>
| id       = BGB_C09_V20_B01
| text    = तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
</div>
| verse_line2  = तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V21_B01" data-verse="BGB_C09_V21">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">अनन्याः</span> अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् ।<br/>ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mokshadharma-id">‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः ।<br/>शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’</span></span> ॥ इति मोक्षधर्मे ।<br/>नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥
| verse_id = BGB_C09_V21
</div>
| id       = BGB_C09_V21_B01
| text    = अनन्याः अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् । ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’ इति । ‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः । शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’ ॥ इति मोक्षधर्मे । नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
</div>
| verse_line2  = तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V22">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V22">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V22_B01" data-verse="BGB_C09_V22">
{{Bhashyam
<p>तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V22
</div>
| id       = BGB_C09_V22_B01
| text    = तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
</div>
| verse_line2  = न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V23_B01" data-verse="BGB_C09_V23">
{{Bhashyam
<p>कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V23
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| id       = BGB_C09_V23_B01
| text    = कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।
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| verse_line2  = भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V24_B01" data-verse="BGB_C09_V24">
{{Bhashyam
<p>फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V24
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| id       = BGB_C09_V24_B01
| text    = फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V25
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
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| verse_line2  = तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V25">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V25">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V25_B01" data-verse="BGB_C09_V25">
{{Bhashyam
<p>दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - <span class="gr-prateeka">पत्रमिति ॥</span> न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C09_V25
            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharatha-id">‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११)</span></span> इति च भारते <br/>
| id       = BGB_C09_V25_B01
            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः ।<br/>एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ )</span></span> (इति भागवते) ॥२६ ॥
| text    = दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - पत्रमिति ॥ न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः । ‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते ‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः । एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V26
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
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| verse_line2  = यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C09_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V27
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
</div>
| verse_line2  = संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V27">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V27">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V27_B01" data-verse="BGB_C09_V27">
{{Bhashyam
<p>अतो यत् करोषि ॥ २७, २८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V27
</div>
| id       = BGB_C09_V27_B01
| text    = अतो यत् करोषि ॥ २७, २८ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V28
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
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| verse_line2  = ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V28_B01" data-verse="BGB_C09_V28">
{{Bhashyam
<p>तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’</span> इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’</span> इति ॥ २९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V28
</div>
| id       = BGB_C09_V28_B01
| text    = तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- ‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’ इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’ इति ॥ २९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V29
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
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| verse_line2  = साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V29">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V29_B01" data-verse="BGB_C09_V29">
{{Bhashyam
<p>न भवत्येव प्रायशस्तद्भक्तो सुदुराचारः । तथाऽपि बहुपुण्येन यदि कथञ्चित् भवति तर्हि साधुरेव स मन्तव्यः ॥ ३० ॥</p>
| verse_id = BGB_C09_V29
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| id       = BGB_C09_V29_B01
| text    = न भवत्येव प्रायशस्तद्भक्तो सुदुराचारः । तथाऽपि बहुपुण्येन यदि कथञ्चित् भवति तर्हि साधुरेव स मन्तव्यः ॥ ३० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C09_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V30
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।</span>
| chapter_id  = BGB_C09
<span class="shloka-line">कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥</span>
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| verse_line1  = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
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<div class="verse" id="BGB_C09_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V31
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।</span>
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<span class="shloka-line">स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥</span>
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| verse_line1  = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
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<div class="verse" id="BGB_C09_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V32
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।</span>
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<span class="shloka-line">अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥</span>
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| verse_line1  = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
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<div class="verse" id="BGB_C09_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C09_V33
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।</span>
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<span class="shloka-line">मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥</span>
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| verse_line1  = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
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| verse_line2  = मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज्यगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज्यगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V33">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C09_V33">
<div class="bhashya" id="BGB_C09_V33_B01" data-verse="BGB_C09_V33">
{{Bhashyam
<p>कुतः ? <span class="gr-moola">क्षिप्रं भवति धर्मात्मा</span> । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः ।<br/>सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः ।<br/>देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’</span></span> इति ।<br/>अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishupurana-id">‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’।</span></span> इति हि श्रीविष्णुपुराणे ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C09_V33
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishupurana-id">‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’</span></span> इति च ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् ।<br/>पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् ।<br/>गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् ।<br/>तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् ।<br/>एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’</span></span> इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२)</span></span> इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥
| id       = BGB_C09_V33_B01
</div>
| text    = कुतः ? क्षिप्रं भवति धर्मात्मा । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्- ‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः । सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः । देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’ इति । अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् । ‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’। इति हि श्रीविष्णुपुराणे । ‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’ इति च । ‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् । पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् । गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् । तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् । एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’ इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’ इति । ‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२) इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥
}}


</div>
</div>
Line 5,349: Line 6,092:
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C10_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V01
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।</span>
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<span class="shloka-line">यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।
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| verse_line2  = यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V01">
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<p>प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥</p>
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| text    = प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।</span>
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<span class="shloka-line">अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥</span>
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<div class="bhashya" id="BGB_C10_V02_B01" data-verse="BGB_C10_V02">
{{Bhashyam
<p>प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि-</p>
| verse_id = BGB_C10_V02
<span class="gr-reference gr-ref-TaittariyaBrahmana-id">‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः ।<br/>अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६)</span> इति ।
| id       = BGB_C10_V02_B01
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’</span> इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥
| text    = प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) इति । ‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’ इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥
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}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
</div>
| verse_line2  = असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V03_B01" data-verse="BGB_C10_V03">
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<p>अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य ।</p>
| verse_id = BGB_C10_V03
<p>॥३ ॥</p>
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| text    = अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । ॥३ ॥
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</div>
</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
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<div class="verse" id="BGB_C10_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V05
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥</span>
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V05_B01" data-verse="BGB_C10_V05">
{{Bhashyam
<p>तत् प्रथयति- <span class="gr-prateeka">बुद्धिरित्यादिना॥</span> कार्याकार्यविनिश्चयो <span class="gr-moola">बुद्धिः</span> <span class="gr-moola">ज्ञानं</span> प्रतीतिः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’</span></span> इत्यभिधानम् ।<br/><span class="gr-moola">दमः</span> इन्द्रियनिग्रहः । <span class="gr-moola">शमः</span> परमात्मनि निष्ठा- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id">‘शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः ।’(भाग.११.१९.३५)</span></span>इति हि भागवते । <span class="gr-moola">तुष्टिः</span> अलम्बुद्धिः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः’</span></span> इत्यभिधानात् ॥ ४-५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V05
</div>
| id       = BGB_C10_V05_B01
| text    = तत् प्रथयति- बुद्धिरित्यादिना॥ कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः । ज्ञानं प्रतीतिः । ‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’ इत्यभिधानम् । दमः इन्द्रियनिग्रहः । शमः परमात्मनि निष्ठा- ‘शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः ।’(भाग.११.१९.३५) इति हि भागवते । तुष्टिः अलम्बुद्धिः- ‘अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः’ इत्यभिधानात् ॥ ४-५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V06_B01" data-verse="BGB_C10_V06">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">पूर्वे सप्तर्षयः</span> -<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।<br/>वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०)</span></span> इति मोक्षधर्मोक्ताः ।<br/>ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । <span class="gr-moola">चत्वारः</span> प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति ।<br/>तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’</span></span> इति ।<br/>पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् ।
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</div>
| id       = BGB_C10_V06_B01
| text    = पूर्वे सप्तर्षयः - ‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०) इति मोक्षधर्मोक्ताः । ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । चत्वारः प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति । तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- ‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’ इति । पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C10_V06_B02" data-verse="BGB_C10_V06">
{{Bhashyam
<p>तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’</span></span> इति ।<br/>अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते <span class="gr-moola">मद्भावाः</span> । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V06
</div>
| id       = BGB_C10_V06_B02
| text    = तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते- ‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’ इति । अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते मद्भावाः । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V07
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
</div>
| verse_line2  = सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V08
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
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| verse_line2  = इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
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| verse_line2  = कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
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| verse_line2  = ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
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| verse_line2  = नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V11_B01" data-verse="BGB_C10_V11">
{{Bhashyam
<p>सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V11
</div>
| id       = BGB_C10_V11_B01
| text    = सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।</span>
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<span class="shloka-line">पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
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| verse_line2  = पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C10_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C10_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।</span>
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<span class="shloka-line">असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
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| verse_line2  = असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।</span>
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<span class="shloka-line">न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
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| verse_line2  = न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।</span>
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<span class="shloka-line">भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
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| verse_line2  = भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V15_B01" data-verse="BGB_C10_V15">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्म परिपूर्णम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’</span> इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९)</span> इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Taittariyopanishat-id">‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.)</span> इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V15
</div>
| id       = BGB_C10_V15_B01
| text    = ब्रह्म परिपूर्णम्- ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’ इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति । ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९) इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- ‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’ इति । ‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.) इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
</div>
| verse_line2  = याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V16_B01" data-verse="BGB_C10_V16">
{{Bhashyam
<p>विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V16
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| id       = BGB_C10_V16_B01
| text    = विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V17
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
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| verse_line2  = केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V18
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
</div>
| verse_line2  = भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V18_B01" data-verse="BGB_C10_V18">
{{Bhashyam
<p>न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’</span> इति ॥१८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V18
</div>
| id       = BGB_C10_V18_B01
| text    = न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’ इति ॥१८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
</div>
| verse_line2  = प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C10_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
</div>
| verse_line2  = अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
</div>
| verse_line2  = मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V21_B01" data-verse="BGB_C10_V21">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">विष्णुः</span> सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः ।<br/>‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत ।<br/>व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ।<br/>अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत ।<br/>क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३)</span></span> इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥
| verse_id = BGB_C10_V21
</div>
| id       = BGB_C10_V21_B01
| text    = विष्णुः सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः । ‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति । ‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत । व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम । अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३) इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
</div>
| verse_line2  = इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
</div>
| verse_line2  = वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
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| verse_line2  = सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V25
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥</span>
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| verse_line1  = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
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| verse_line2  = यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥
</div>
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<div class="verse" id="BGB_C10_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V26
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।</span>
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<span class="shloka-line">गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
</div>
| verse_line2  = गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V26_B01" data-verse="BGB_C10_V26">
{{Bhashyam
<p>सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’</span> इत्याद्यभिधानात् । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५)</span> इति च ।</p>
| verse_id = BGB_C10_V26
<span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ।<br/>सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’</span> इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥
| id       = BGB_C10_V26_B01
</div>
| text    = सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । ‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’ इत्याद्यभिधानात् । ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५) इति च । ‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् । सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
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| verse_line2  = ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
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| verse_line2  = प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
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| verse_line2  = पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V30
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<span class="shloka-line">प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
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| verse_line2  = मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V31
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<span class="shloka-line">पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥</span>
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| verse_line1  = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V31_B01" data-verse="BGB_C10_V31">
{{Bhashyam
<p>आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । <span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’</span> इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V31
</div>
| id       = BGB_C10_V31_B01
| text    = आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । ‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C10_V32
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
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<div class="verse" id="BGB_C10_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V33
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<span class="shloka-line">अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।</span>
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<span class="shloka-line">अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥</span>
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| verse_line1  = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
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<div class="verse" id="BGB_C10_V34" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V34
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।</span>
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<span class="shloka-line">कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥</span>
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| verse_line1  = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।
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| verse_line2  = कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V35
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥</span>
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| verse_line1  = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
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| verse_line2  = मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C10_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V36
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<span class="shloka-line">द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥</span>
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| verse_line1  = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C10_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V37
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
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| verse_line2  = मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V37">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V37">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V37_B01" data-verse="BGB_C10_V37">
{{Bhashyam
<p>आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति <span class="gr-moola">वासुः</span> । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः ।<br/>सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१)</span></span> इति मोक्षधर्मे ।<br/>विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति <span class="gr-moola">व्यासः</span> । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा ।<br/>अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’</span></span> इति च ॥३७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V37
</div>
| id       = BGB_C10_V37_B01
| text    = आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति वासुः । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)। ‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१) इति मोक्षधर्मे । विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति व्यासः । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- ‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’ इति । ‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा । अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’ इति च ॥३७ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V38
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
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| verse_line2  = मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C10_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V39
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
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<div class="verse" id="BGB_C10_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V40
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
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| verse_line2  = एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V40">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V40">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V40_B01" data-verse="BGB_C10_V40">
{{Bhashyam
<p>मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । <span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘विश्वरूपः अनन्तगतेः अनन्तभागः अनन्तगः अनन्तः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४)</span> इत्यादि हि मोक्षधर्मे ॥ ३९,४० ॥</p>
| verse_id = BGB_C10_V40
</div>
| id       = BGB_C10_V40_B01
| text    = मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । ‘विश्वरूपः अनन्तगतेः अनन्तभागः अनन्तगः अनन्तः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इत्यादि हि मोक्षधर्मे ॥ ३९,४० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V41
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥</span>
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| verse_line1  = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V41">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V41">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V41_B01" data-verse="BGB_C10_V41">
{{Bhashyam
<p>‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवराजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः ।<br/>कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’</span> इति । <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्तु अवंशयुता अन्यजीवाः’</span> इति च गौतमखिलेषु ।</p>
| verse_id = BGB_C10_V41
<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः ।<br/>कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः।<br/> एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८)</span> इति च भागवते । ऋष्यादीन् अंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन् स्वरूपत्वेनाह । तु शब्द एवार्थे । अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः । अंशत्वं च तत्राप्यवगतम्- ‘उद्बबर्हात्मनः केशौ’ इति । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘मृडयन्ति’(भाग१.३.२९)</span> इति बहुवचनं चायुक्तम् । न हि अन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वम् अपरामृश्य तत्क्रिया उच्यमाना दृष्टा कुत्रचित् ॥ ४१ ॥
| id       = BGB_C10_V41_B01
</div>
| text    = ‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- ‘विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवराजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः । कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’ इति । ‘स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्तु अवंशयुता अन्यजीवाः’ इति च गौतमखिलेषु । ‘ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८) इति च भागवते । ऋष्यादीन् अंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन् स्वरूपत्वेनाह । तु शब्द एवार्थे । अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः । अंशत्वं च तत्राप्यवगतम्- ‘उद्बबर्हात्मनः केशौ’ इति । ‘मृडयन्ति’(भाग१.३.२९) इति बहुवचनं चायुक्तम् । न हि अन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वम् अपरामृश्य तत्क्रिया उच्यमाना दृष्टा कुत्रचित् ॥ ४१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C10_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C10_V42
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C10
<span class="shloka-line">विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
</div>
| verse_line2  = विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V42">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C10_V42">
<div class="bhashya" id="BGB_C10_V42_B01" data-verse="BGB_C10_V42">
{{Bhashyam
<p>‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । <span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अज्ञात्वैनं सर्वविशेषयुक्तं देवं वरं को हि मुच्येत बन्धात्।’</span> इति च ऋर्ग्वेदखिलेषु । त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति ‘तव’ इति विशेषणम् । अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्च एकत्र किंशब्दः -</p>
| verse_id = BGB_C10_V42
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ।<br/>तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’</span> इत्यादौ । प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात् सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य ‘यो मां पश्यति सर्वत्र’(६.३०) इत्यादौ ॥४२ ॥
| id       = BGB_C10_V42_B01
</div>
| text    = ‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । ‘अज्ञात्वैनं सर्वविशेषयुक्तं देवं वरं को हि मुच्येत बन्धात्।’ इति च ऋर्ग्वेदखिलेषु । त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति ‘तव’ इति विशेषणम् । अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्च एकत्र किंशब्दः - ‘रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् । तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’ इत्यादौ । प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात् सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य ‘यो मां पश्यति सर्वत्र’(६.३०) इत्यादौ ॥४२ ॥
}}


</div>
</div>
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</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C11_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥</span>
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| verse_line1  = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
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| verse_line2  = यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥</span>
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| verse_line1  = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
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| verse_line2  = त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।</span>
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<span class="shloka-line">द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
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| verse_line2  = द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।</span>
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<span class="shloka-line">योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V04_B01" data-verse="BGB_C11_V04">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">प्रभुः</span> समर्थः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१)</span></span> इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥
| verse_id = BGB_C11_V04
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| id       = BGB_C11_V04_B01
| text    = प्रभुः समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।
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| verse_line2  = नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
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| verse_line2  = बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
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| verse_line2  = मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥</span>
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| verse_line1  = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
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| verse_line2  = दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
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| verse_line2  = दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V09_B01" data-verse="BGB_C11_V09">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">हरिः</span> सर्वयज्ञभागहारित्वात्-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् ।<br/>वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥</span></span>इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥
| verse_id = BGB_C11_V09
</div>
| id       = BGB_C11_V09_B01
| text    = हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्- ‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् । वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥ इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V10
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।
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| verse_line2  = अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V11_B01" data-verse="BGB_C11_V11">
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<p>सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C11_V11
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| text    = सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V12
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।</span>
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<span class="shloka-line">यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥</span>
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| verse_line1  = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
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| verse_line2  = यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V12_B01" data-verse="BGB_C11_V12">
{{Bhashyam
<p>सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु-</p>
| verse_id = BGB_C11_V12
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’</span> इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥
| id       = BGB_C11_V12_B01
</div>
| text    = सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’ इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V13
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
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| verse_line2  = अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
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| verse_line2  = प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥</span>
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| verse_line1  = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
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| verse_line2  = ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥</span>
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</div>
| verse_line1  = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
</div>
| verse_line2  = नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V16_B01" data-verse="BGB_C11_V16">
{{Bhashyam
<p>‘अनेक’शब्दोऽनन्तवाची । ‘अनन्तबाहुम्’(११.१९) इति वक्ष्यति । ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(१३.१४) इत्यादि च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।<br/>सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥’</span></span>इति ऋग्वेदे ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C11_V16
  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Yajurveda-id">‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् ।<br/>सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’</span></span> इति यजुर्वेदे च ।<br/>
| id       = BGB_C11_V16_B01
<p>विश्वशब्दश्चानन्तवाची-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’</span></span>  इत्यभिधानात् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’</span></span> इति च बाभ्रव्यशाखायाम् ।<br/></p>
| text    = ‘अनेक’शब्दोऽनन्तवाची । ‘अनन्तबाहुम्’(११.१९) इति वक्ष्यति । ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(१३.१४) इत्यादि च । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥’ इति ऋग्वेदे । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’ इति यजुर्वेदे च । विश्वशब्दश्चानन्तवाची- ‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’ इत्यभिधानात् । ‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’ इति च बाभ्रव्यशाखायाम् । महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् ।
<p>महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् ।</p>
}}
</div>


<div class="bhashya" id="BGB_C11_V16_B02" data-verse="BGB_C11_V16">
{{Bhashyam
<p>एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणि इत्यनन्तरूपः । अन्यत्र त्वपरिमाण इति । उक्तं ह्युभयमपि <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘परात् परं यन्महतो महान्तम्’,</span></span><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Yajurveda-id">‘यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम्’(तै.आ.१०.१.१)</span></span> इति यजुर्वेदे <br/></p>
| verse_id = BGB_C11_V16
<p>अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Aditya-id">‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् ।<br/>अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’</span></span>इत्यादित्यपुराणे ।<br/></p>
| id       = BGB_C11_V16_B02
<p>तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ ।</span></span>इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।<br/></p>
| text    = एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणि इत्यनन्तरूपः । अन्यत्र त्वपरिमाण इति । उक्तं ह्युभयमपि ‘परात् परं यन्महतो महान्तम्’, ‘यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम्’(तै.आ.१०.१.१) इति यजुर्वेदे अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति । ‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् । अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’ इत्यादित्यपुराणे । तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) । ‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ । इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः । उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३) इति च । ‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१) इति च भागवते ।
    <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogya-id">‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ।<br/>उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते ।<br/>उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३)</span></span> इति च ।<br/>
}}
    <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१)</span></span>इति च भागवते ।<br/>
</div>


<div class="bhashya" id="BGB_C11_V16_B02" data-verse="BGB_C11_V16">
{{Bhashyam
<p>न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vishnu-id">‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ ।</span></span>इति श्रीविष्णुपुराणे ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C11_V16
    <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathaka-id">‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९)</span></span>इति च श्रुतिः ।<br/>अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।<br/> चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’</span></span> इति जाबालखिलश्रुतेश्च ।<br/>  उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । <span class="gr-moola">विश्वरूपः</span> पूर्णरूपः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shandilya-id">‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’</span></span> इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥
| id       = BGB_C11_V16_B02
</div>
| text    = न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ । इति श्रीविष्णुपुराणे । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९) इति च श्रुतिः । अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते । ‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । विश्वरूपः पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥
}}


</div>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥</span>
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| verse_line1  = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
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| verse_line2  = पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V17">
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<p>‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥</p>
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| text    = ‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।</span>
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<span class="shloka-line">त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥</span>
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| verse_line1  = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।</span>
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<span class="shloka-line">पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥</span>
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| verse_line1  = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V19">
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<p>‘शशिसूर्यनेत्रम्’ इत्यपि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्यादिवत् ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात् तदङ्गेति ऋषिभिः स्तुतास्ते’ ।</span></span>  इत्यृग्वेदखिलेषु ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rugveda-id">‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्योऽजायत’ ।(ऋ.मं.१०.सू.९०.मं.१६)</span></span> इति च । बहुरूपत्वाद् बह्वङ्गत्वं च तेषां युक्तम् ॥ १८, १९ ॥</p>
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| id       = BGB_C11_V19_B01
| text    = ‘शशिसूर्यनेत्रम्’ इत्यपि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्यादिवत् । ‘तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात् तदङ्गेति ऋषिभिः स्तुतास्ते’ । इत्यृग्वेदखिलेषु । ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्योऽजायत’ ।(ऋ.मं.१०.सू.९०.मं.१६) इति च । बहुरूपत्वाद् बह्वङ्गत्वं च तेषां युक्तम् ॥ १८, १९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V20
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<span class="shloka-line">द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥</span>
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| verse_line1  = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
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| verse_line2  = दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V20">
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<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘मातापित्रोरन्तरगः स एकरूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः’ ।</span></span><br/>इति वारुणश्रुतेरेकेन रूपेण द्यावापृथिव्योरन्तरं (प्राप्तो) व्याप्तो भवति । ‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’(११.५) इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि । मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्’,(ऋ.मं.५.सू.४२.मं.१६)</span></span><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘मधु द्यौरस्तु नः पिता’(ऋ.मं.१.सू.९०.मं.७)</span></span> इत्यादिप्रयोगात् । न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम् । नारदस्य तदभावात् । केषाञ्चित् तथा दर्शयति भगवान् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘प्रीयन्ति केचित् तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः’</span></span> । इति हि वरुणशाखायाम् ।<br/>न तु तं सर्वे पश्यन्ति अदृष्ट्वाऽपि तन्निरूप्य भये द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति । तथा च गौतमखिलेषु- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद् बिभ्यतो दृष्टवत् ते ।<br/>पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात्’॥</span></span> इति ।॥२० ॥
| verse_id = BGB_C11_V20
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| id       = BGB_C11_V20_B01
| text    = ‘मातापित्रोरन्तरगः स एकरूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः’ । इति वारुणश्रुतेरेकेन रूपेण द्यावापृथिव्योरन्तरं (प्राप्तो) व्याप्तो भवति । ‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’(११.५) इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि । मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ- ‘मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्’,(ऋ.मं.५.सू.४२.मं.१६) ‘मधु द्यौरस्तु नः पिता’(ऋ.मं.१.सू.९०.मं.७) इत्यादिप्रयोगात् । न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम् । नारदस्य तदभावात् । केषाञ्चित् तथा दर्शयति भगवान् । ‘प्रीयन्ति केचित् तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः’ । इति हि वरुणशाखायाम् । न तु तं सर्वे पश्यन्ति अदृष्ट्वाऽपि तन्निरूप्य भये द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति । तथा च गौतमखिलेषु- ‘दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद् बिभ्यतो दृष्टवत् ते । पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात्’॥ इति ।॥२० ॥
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<span class="shloka-line">अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥</span>
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| verse_line1  = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
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| verse_line2  = स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥
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<span class="shloka-line">रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।</span>
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<span class="shloka-line">गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥</span>
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| verse_line2  = गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥
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<span class="shloka-line">रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।</span>
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<span class="shloka-line">बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥</span>
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<span class="shloka-line">नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।</span>
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<span class="shloka-line">दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥</span>
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<span class="shloka-line">दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।</span>
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<span class="shloka-line">दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।</span>
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<span class="shloka-line">केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥</span>
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| verse_line1  = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_line1  = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
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| verse_line2  = तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse" id="BGB_C11_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।</span>
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<span class="shloka-line">तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V31" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V31
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<span class="shloka-line">आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।</span>
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<span class="shloka-line">विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥</span>
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| verse_line2  = विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V31_B01" data-verse="BGB_C11_V31">
{{Bhashyam
<p>धर्मान्तरज्ञानार्थमेव ‘को भवान्’ इति पृच्छति । यथा कश्चित् किञ्चित् नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति ‘कस्त्वम्’ इति । यदि तमेव न जानाति तर्हि ‘विष्णो’(११.३०) इत्येव सम्बोधनं न स्यात् । ‘त्वमक्षरम्’(११.१८) इत्यादि च ॥ २१-३१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C11_V31
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| id       = BGB_C11_V31_B01
| text    = धर्मान्तरज्ञानार्थमेव ‘को भवान्’ इति पृच्छति । यथा कश्चित् किञ्चित् नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति ‘कस्त्वम्’ इति । यदि तमेव न जानाति तर्हि ‘विष्णो’(११.३०) इत्येव सम्बोधनं न स्यात् । ‘त्वमक्षरम्’(११.१८) इत्यादि च ॥ २१-३१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V32
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
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| verse_line2  = ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V32">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V32">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V32_B01" data-verse="BGB_C11_V32">
{{Bhashyam
<p>कालशब्दो जगद्बन्धन-च्छेदन-ज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची । ‘कल बन्धने’, ‘कल च्छेदने’, ‘कल ज्ञाने’, ‘कल कामधेनुः’ इति (हि) पठन्ति । प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे ।<br/>अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः ।<br/>बद्‍ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं(पशून्) रशनया यथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८१-८२)</span></span>इति हि मोक्षधर्मे विष्णुना बद्धो बलिर्वक्ति ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C11_V32
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग्रहे’(भाग.११.१५.१५)</span></span> इति हि भागवते ।
| id       = BGB_C11_V32_B01
</div>
| text    = कालशब्दो जगद्बन्धन-च्छेदन-ज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची । ‘कल बन्धने’, ‘कल च्छेदने’, ‘कल ज्ञाने’, ‘कल कामधेनुः’ इति (हि) पठन्ति । प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति । ‘नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे । अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः । बद्‍ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं(पशून्) रशनया यथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८१-८२) इति हि मोक्षधर्मे विष्णुना बद्धो बलिर्वक्ति । ‘विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग्रहे’(भाग.११.१५.१५) इति हि भागवते ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C11_V32_B02" data-verse="BGB_C11_V32">
{{Bhashyam
<p>प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’(ऋ.मं.१०.सू.१९०.मं.१)</span></span> इति हि श्रुतिः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एतन्महद्भूतमनन्तम्’</span></span> इति च । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम’(ऋ.मं.७.सू.१००.मं.३)</span></span> इति च । न तु वर्धनम् ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavatha-id">‘नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ।’(भाग.११.३.३९)</span></span> इति हि भागवते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च’</span></span> इति मोक्षधर्मे । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘न कर्मणा’(बृ.३.४.२३)</span></span> इति तु, कर्मणाऽपि न, किमु स्वयमिति । लोकान् समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः । भ्रात्रादींश्च ऋते इति ‘अपि’शब्दः । प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया । सर्वेऽपि (हि) न भविष्यन्ति । अक्षोहिण्यादिभेदेन बहुवचनं च युक्तम् ॥३२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C11_V32
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| id       = BGB_C11_V32_B02
| text    = प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा । ‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’(ऋ.मं.१०.सू.१९०.मं.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतन्महद्भूतमनन्तम्’ इति च । ‘प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम’(ऋ.मं.७.सू.१००.मं.३) इति च । न तु वर्धनम् । ‘नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ।’(भाग.११.३.३९) इति हि भागवते । ‘यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च’ इति मोक्षधर्मे । ‘न कर्मणा’(बृ.३.४.२३) इति तु, कर्मणाऽपि न, किमु स्वयमिति । लोकान् समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः । भ्रात्रादींश्च ऋते इति ‘अपि’शब्दः । प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया । सर्वेऽपि (हि) न भविष्यन्ति । अक्षोहिण्यादिभेदेन बहुवचनं च युक्तम् ॥३२ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V33
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
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| verse_line2  = मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V34" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥</span>
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| verse_line1  = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V35
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।</span>
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<span class="shloka-line">नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥</span>
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| verse_line1  = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
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| verse_line2  = नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V34">
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<div class="bhashya" id="BGB_C11_V34_B01" data-verse="BGB_C11_V35">
{{Bhashyam
<p>‘योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति, तच्छिरो भेत्स्यति’ तत्पितुर्वरात् जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः । सवरा वासवी शक्तिरिति कर्णः ॥३४-३५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C11_V35
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| id       = BGB_C11_V34_B01
| text    = ‘योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति, तच्छिरो भेत्स्यति’ तत्पितुर्वरात् जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः । सवरा वासवी शक्तिरिति कर्णः ॥३४-३५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V36
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥</span>
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| verse_line1  = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
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| verse_line2  = रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V36">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V36">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V36_B01" data-verse="BGB_C11_V36">
{{Bhashyam
<p>यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६)</span> इत्यादौ सिद्धम् । <span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३)</span> इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः ।</p>
| verse_id = BGB_C11_V36
<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः ।<br/>बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् ।<br/>बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् ।<br/>अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन ।<br/>हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति</span> ॥ ३६ ॥
| id       = BGB_C11_V36_B01
</div>
| text    = यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः । बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् । बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् । अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन । हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V37
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
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| verse_line2  = अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V37">
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{{Bhashyam
<p>कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - <span class="gr-prateeka">कस्मादित्यादिना ॥</span> पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabhata-id">‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।<br/>यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-moola">तत्परं</span> सदसतः परम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabhata-id">‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३)</span></span> इति च भागवते ।॥३७ ॥</p>
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| id       = BGB_C11_V37_B01
| text    = कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - कस्मादित्यादिना ॥ पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते- ‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति । तत्परं सदसतः परम् । ‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३) इति च भागवते ।॥३७ ॥
}}


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</div>
<div class="verse" id="BGB_C11_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V38
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<span class="shloka-line">त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।</span>
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<span class="shloka-line">वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥</span>
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| verse_line1  = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।</span>
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<span class="shloka-line">नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।</span>
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<span class="shloka-line">अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।</span>
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<div class="bhashya" id="BGB_C11_V42_B01" data-verse="BGB_C11_V42">
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<p>एकस्त्वमेव कारयिता नान्योऽस्त्यथापि ॥ ४२ ॥</p>
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<span class="shloka-line">पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।</span>
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<span class="shloka-line">न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥</span>
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| verse_line1  = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V44" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।</span>
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<span class="shloka-line">पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C11_V45" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V45
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥</span>
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| verse_line1  = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
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| verse_line2  = तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C11_V46" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V46
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥</span>
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| verse_line1  = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
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| verse_line2  = तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V47" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V47
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥</span>
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| verse_line1  = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
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| verse_line2  = तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V48" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V48
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।</span>
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<span class="shloka-line">एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥</span>
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| verse_line1  = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
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| verse_line2  = एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V49" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥</span>
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| verse_line1  = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।
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| verse_line2  = व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V50" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V50
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥</span>
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| verse_line1  = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
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| verse_line2  = आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V51" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V51
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥</span>
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| verse_line1  = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
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| verse_line2  = इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥
</div>
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V52" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V52
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥</span>
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| verse_line1  = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C11_V53" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C11_V53
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।</span>
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<span class="shloka-line">शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥</span>
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| verse_line1  = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
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| verse_line2  = शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C11_V54" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V54
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥</span>
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| verse_line1  = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
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<div class="verse" id="BGB_C11_V55" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C11_V55
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C11
<span class="shloka-line">निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
</div>
| verse_line2  = निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V50">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C11_V50">
<div class="bhashya" id="BGB_C11_V50_B01" data-verse="BGB_C11_V55">
{{Bhashyam
<p>स्वकं रूपं तु भ्रान्ति(न्त)प्रतीत्या । अन्यथा तदपि स्वकमेव । प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात् ॥ ५० ॥</p>
| verse_id = BGB_C11_V55
</div>
| id       = BGB_C11_V50_B01
| text    = स्वकं रूपं तु भ्रान्ति(न्त)प्रतीत्या । अन्यथा तदपि स्वकमेव । प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात् ॥ ५० ॥
}}


</div>
</div>
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</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C12_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C12
<span class="shloka-line">ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
</div>
| verse_line2  = ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C12_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C12
<span class="shloka-line">श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
</div>
| verse_line2  = श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V01_B01" data-verse="BGB_C12_V02">
{{Bhashyam
<p>तदुपासनमपि हि मोक्षसाधनं प्रतीयते- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathaka-id">‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’</span></span> इति च ।<br/>अव्यक्तं च महतः परम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathaka-id">‘महतः परमव्यक्तम्’</span></span> इत्युक्तपरामर्शोपपत्तेः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘उपास्य तां श्रियमव्यक्तसञ्ज्ञां भक्त्या मर्त्यो मुच्यते सर्वबन्धैः’ ।</span></span> इति सामवेदे आग्निवेश्यशाखायाम् ।</p>
| verse_id = BGB_C12_V02
</div>
| id       = BGB_C12_V01_B01
| text    = तदुपासनमपि हि मोक्षसाधनं प्रतीयते- ‘श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ’ इति । ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति च । अव्यक्तं च महतः परम्- ‘महतः परमव्यक्तम्’ इत्युक्तपरामर्शोपपत्तेः । ‘उपास्य तां श्रियमव्यक्तसञ्ज्ञां भक्त्या मर्त्यो मुच्यते सर्वबन्धैः’ । इति सामवेदे आग्निवेश्यशाखायाम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C12_V01_B02" data-verse="BGB_C12_V02">
{{Bhashyam
<p>महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।<br/>तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३)</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathakasamhita-id">‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।<br/>(तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७)</span></span> इति च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’</span></span>इत्यारभ्य <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।<br/>तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ।<br/>मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।<br/>अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि।<br/> यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।<br/>अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ।<br/>अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे ।<br/>परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८)</span></span> इत्यादि च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२)</span></span> इति च ।<br/>इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- <span class="gr-prateeka">एवमिति ॥</span> एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते ।</p>
| verse_id = BGB_C12_V02
</div>
| id       = BGB_C12_V01_B02
| text    = महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते । ‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३) इति । ‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । (तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७) इति च । ‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’ इत्यारभ्य ‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् । मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् । अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८) इत्यादि च । ‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२) इति च । इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- एवमिति ॥ एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C12_V01_B03" data-verse="BGB_C12_V02">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">अव्यक्तं</span> प्रकृतिः <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Kathakopanishat-id">‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२)</span></span> इति प्रयोगात् ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।<br/> प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११)</span></span>इति च भागवते ।<br/> अक्षरं च तत् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२)</span></span> इति श्रुतेः ।
| verse_id = BGB_C12_V02
</div>
| id       = BGB_C12_V01_B03
| text    = अव्यक्तं प्रकृतिः ‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२) इति प्रयोगात् । ‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११) इति च भागवते । अक्षरं च तत् । ‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२) इति श्रुतेः ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C12_V01_B04" data-verse="BGB_C12_V02">
{{Bhashyam
<p>परं तु ब्रह्म न हि भगवतोऽन्यत् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे’(भाग.२.२.३४)</span></span> इति भागवते । रूपं चेदृशं साधितं पुरस्तात्(गी.भा.२.७२) । उपासनं च तथैव कार्यम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(तै.आ.३.१२.१,श्वे.उ.३.१४,ऋ.सं.मं.१०.सू.९०.मं.१)</span></span> इत्यारभ्य <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७,चित्त्युपनिषत्)</span></span> इति (हि) साभ्यासा । आदित्यवर्णत्वादिश्च न वृथोपचारत्वेनाङ्गीकार्यः । तथा च सामवेदे सौकरायणश्रुतिः-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘‘स्थाणुर्ह वै प्राजापत्यः स प्रजापतिं पितरमेत्य उवाच- <br/>‘(मुमुक्षुभी राधुभिः) मुमुक्षुभिः साधुभिः पूतपापैः किमु ह वै तारकं तारवाच्यम् ।<br/>ध्यानं च तस्याप्तरुचेः कथं स्याद् ध्येयश्च कः पुरुषोऽलोमपादः॥’ इति ।<br/>तं होवाच-<br/> ‘एष वै विष्णुस्तारकोऽलोमपादो ध्यानं च तस्याप्तरुचेर्वदामि ।<br/>सोऽनन्तशीर्षो बहुवर्णः सुवर्णो ध्येयः स वै लोहितादित्यवर्णः ॥<br/> श्यामोऽथ वा हृदये सोऽष्टबाहुः अनन्तवीर्योऽनन्तबलः पुराणः।’ ’’</span></span>इति (इत्यादि)। अरूपत्वादेस्तु गतिरुक्ता (पुरस्तात्) । पुरुषभेदश्च प्रश्नादौ प्रतीयते ‘त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’ इत्यादौ ॥१-२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C12_V02
</div>
| id       = BGB_C12_V01_B04
| text    = परं तु ब्रह्म न हि भगवतोऽन्यत् । ‘आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे’(भाग.२.२.३४) इति भागवते । रूपं चेदृशं साधितं पुरस्तात्(गी.भा.२.७२) । उपासनं च तथैव कार्यम् । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(तै.आ.३.१२.१,श्वे.उ.३.१४,ऋ.सं.मं.१०.सू.९०.मं.१) इत्यारभ्य ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७,चित्त्युपनिषत्) इति (हि) साभ्यासा । आदित्यवर्णत्वादिश्च न वृथोपचारत्वेनाङ्गीकार्यः । तथा च सामवेदे सौकरायणश्रुतिः- ‘‘स्थाणुर्ह वै प्राजापत्यः स प्रजापतिं पितरमेत्य उवाच- ‘(मुमुक्षुभी राधुभिः) मुमुक्षुभिः साधुभिः पूतपापैः किमु ह वै तारकं तारवाच्यम् । ध्यानं च तस्याप्तरुचेः कथं स्याद् ध्येयश्च कः पुरुषोऽलोमपादः॥’ इति । तं होवाच- ‘एष वै विष्णुस्तारकोऽलोमपादो ध्यानं च तस्याप्तरुचेर्वदामि । सोऽनन्तशीर्षो बहुवर्णः सुवर्णो ध्येयः स वै लोहितादित्यवर्णः ॥ श्यामोऽथ वा हृदये सोऽष्टबाहुः अनन्तवीर्योऽनन्तबलः पुराणः।’ ’’ इति (इत्यादि)। अरूपत्वादेस्तु गतिरुक्ता (पुरस्तात्) । पुरुषभेदश्च प्रश्नादौ प्रतीयते ‘त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’ इत्यादौ ॥१-२ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C12_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।
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| verse_line2  = सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।</span>
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<span class="shloka-line">ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
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| verse_line2  = ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V03_B01" data-verse="BGB_C12_V04">
{{Bhashyam
<p>भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">ये त्वित्यादिना ॥</span> अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९)</span></span> इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८)</span></span> इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३)</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’</span></span> इत्यारभ्य <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’</span></span> इति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’</span></span> इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे-<br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)।<br/> असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् <br/>अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्।<br/> सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् <br/>अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६)</span></span> । इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmriti-id">‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् ।<br/>अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५)</span></span> इति (च) मानवे ।<br/>‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’</span></span> इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।<br/>  <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’</span></span>इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥</p>
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| text    = भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- ये त्वित्यादिना ॥ अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- ‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९) इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः ‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८) इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ ‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३) इति । ‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’ इत्यारभ्य ‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’ इति । ‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’ इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे- ‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)। असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्। सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६) । इति । ‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५) इति (च) मानवे । ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । ‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’ इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C12_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V05
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥</span>
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| verse_line1  = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
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| verse_line2  = अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V05_B01" data-verse="BGB_C12_V05">
{{Bhashyam
<p>कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">क्लेश इति ॥</span> अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । <span class="gr-moola">गतिः</span>  मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः ।<br/> तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते ।</p>
| verse_id = BGB_C12_V05
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| id       = BGB_C12_V05_B01
| text    = कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - क्लेश इति ॥ अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । गतिः मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः । तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते ।
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<div class="bhashya" id="BGB_C12_V05_B02" data-verse="BGB_C12_V05">
{{Bhashyam
<p>सामवेदे माधुच्छन्दसशाखायां चोक्तम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘भक्ताश्च येऽतीव विष्णावतीव जितेन्द्रियाः सम्यगाचारयुक्ताः ।<br/>  उपासते तां समबुद्धयश्च तेषां देवी दृश्यते नेतरेषाम् ।<br/> दृष्टा च सा भक्तिमतीव विष्णौ दत्वोपास्तौ सर्वविघ्नान् छिनत्ति । उपास्य तं वासुदेवं विदित्वा ततस्ततः शान्तिमत्यन्तमेति ॥’</span></span> इति ।<br/>उक्तं च सामवेदे आयास्यशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘प्रसन्नो भविता देवः सोऽव्यक्तेन सहैव तु ।<br/>यावता तत्प्रसादो हि तावतैव न संशयः ।<br/>न तत्प्रसादमात्रेण प्रीयते स महेश्वरः ।<br/>तस्मिन् प्रीते तु सर्वस्य प्रीतिस्तु भवति ध्रुवम् ।<br/>यद्यप्युपासनाधिक्यं तथाऽपि गुणदो हि सः ।<br/>मुक्तिदश्च स एवैको नाव्यक्तादि(दे)स्तु कश्चन ॥’</span></span> इति ।<br/>          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मने(ना) ।’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.२७)</span></span>इति च मोक्षधर्मे श्रीवचनम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।<br/>प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.३३)</span></span> इति च ।<br/>महतः परं तु ब्रह्मैव । तथाहि भगवता सयुक्तिकमभिहितम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि’(ब्र.सू.१.४.५)</span></span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च’(ब्र.सू.१.४.७)</span></span> इत्यादि । ‘तम्’ इति पुल्लिङ्गाच्चैतत्सिद्धिः । महतः(त्) परत्वं त्वव्यक्तपरस्य भवत्येव । तथा चाग्निवेश्यशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम्’(काठकेऽपि.१.३.१५)</span></span> इति । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परो हि देवः पुरुहूतो महत्तः’</span></span> इति ।</p>
| verse_id = BGB_C12_V05
</div>
| id       = BGB_C12_V05_B02
| text    = सामवेदे माधुच्छन्दसशाखायां चोक्तम्- ‘भक्ताश्च येऽतीव विष्णावतीव जितेन्द्रियाः सम्यगाचारयुक्ताः । उपासते तां समबुद्धयश्च तेषां देवी दृश्यते नेतरेषाम् । दृष्टा च सा भक्तिमतीव विष्णौ दत्वोपास्तौ सर्वविघ्नान् छिनत्ति । उपास्य तं वासुदेवं विदित्वा ततस्ततः शान्तिमत्यन्तमेति ॥’ इति । उक्तं च सामवेदे आयास्यशाखायाम्- ‘प्रसन्नो भविता देवः सोऽव्यक्तेन सहैव तु । यावता तत्प्रसादो हि तावतैव न संशयः । न तत्प्रसादमात्रेण प्रीयते स महेश्वरः । तस्मिन् प्रीते तु सर्वस्य प्रीतिस्तु भवति ध्रुवम् । यद्यप्युपासनाधिक्यं तथाऽपि गुणदो हि सः । मुक्तिदश्च स एवैको नाव्यक्तादि(दे)स्तु कश्चन ॥’ इति । ‘ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मने(ना) ।’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.२७) इति च मोक्षधर्मे श्रीवचनम् । ‘धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि । प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.३३) इति च । महतः परं तु ब्रह्मैव । तथाहि भगवता सयुक्तिकमभिहितम् । ‘वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि’(ब्र.सू.१.४.५) ‘त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च’(ब्र.सू.१.४.७) इत्यादि । ‘तम्’ इति पुल्लिङ्गाच्चैतत्सिद्धिः । महतः(त्) परत्वं त्वव्यक्तपरस्य भवत्येव । तथा चाग्निवेश्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम्’(काठकेऽपि.१.३.१५) इति । ‘परो हि देवः पुरुहूतो महत्तः’ इति ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C12_V05_B03" data-verse="BGB_C12_V05">
{{Bhashyam
<p>न चाव्यक्त(स्य)रूपं भगवता निषिद्धम् । भारतादौ साधितत्वात् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः’(ब्र.सू.१.४.१)</span></span> इत्यादौ तु साङ्ख्यप्रसिद्धं प्रधानं निषिध्य, वैदिकमव्यक्तमेवोक्तम् । तथा च सौकरायणश्रुतिः -<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘शरीररूपिका साऽशरीरस्य विष्णोः यतः प्रिया सा जगतः प्रसूतिः’</span></span> इति ।<br/>सुव्रतानां क्षिप्रं महदैश्वर्यं ददाति देवी; न देव इति (च) विशेषः । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘सुवर्णवर्णां पद्मकरां च देवीं सर्वेश्वरीं व्याप्तजडां च बुद्‍ध्वा ।<br/> सैवेति वै सुव्रतानां तु मासान्महाभूतिं श्रीस्तु दद्यान्न देवः॥’</span></span> इति ऋग्वेदखिलेषु ।॥५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C12_V05
</div>
| id       = BGB_C12_V05_B03
| text    = न चाव्यक्त(स्य)रूपं भगवता निषिद्धम् । भारतादौ साधितत्वात् । ‘शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः’(ब्र.सू.१.४.१) इत्यादौ तु साङ्ख्यप्रसिद्धं प्रधानं निषिध्य, वैदिकमव्यक्तमेवोक्तम् । तथा च सौकरायणश्रुतिः - ‘शरीररूपिका साऽशरीरस्य विष्णोः यतः प्रिया सा जगतः प्रसूतिः’ इति । सुव्रतानां क्षिप्रं महदैश्वर्यं ददाति देवी; न देव इति (च) विशेषः । ‘सुवर्णवर्णां पद्मकरां च देवीं सर्वेश्वरीं व्याप्तजडां च बुद्‍ध्वा । सैवेति वै सुव्रतानां तु मासान्महाभूतिं श्रीस्तु दद्यान्न देवः॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु ।॥५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C12_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।</span>
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<span class="shloka-line">अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥</span>
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| verse_line1  = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
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| verse_line2  = अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C12_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C12_V07
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<span class="shloka-line">तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।</span>
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<span class="shloka-line">भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
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<div class="verse" id="BGB_C12_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V08
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<span class="shloka-line">मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।</span>
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<span class="shloka-line">निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥</span>
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| verse_line1  = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
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<div class="verse" id="BGB_C12_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C12_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V10
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<span class="shloka-line">अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।</span>
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<span class="shloka-line">मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
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| verse_line2  = मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥
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<div class="verse" id="BGB_C12_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C12
<span class="shloka-line">सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
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| verse_line2  = सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V11_B01" data-verse="BGB_C12_V11">
{{Bhashyam
<p>मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- <span class="gr-prateeka">ये त्वित्यादिना ॥</span> उक्तं च सौकरायणश्रुतौ-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः ।<br/>अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४)</span></span> इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥</p>
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| id       = BGB_C12_V11_B01
| text    = मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- ये त्वित्यादिना ॥ उक्तं च सौकरायणश्रुतौ- ‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’ इति । ‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः । अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४) इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C12_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥</span>
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| verse_line1  = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।
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| verse_line2  = ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V12_B01" data-verse="BGB_C12_V12">
{{Bhashyam
<p>अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः ।<br/>ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-moola">ध्यानात् कर्मफलत्यागः</span> इति तु स्तुतिः । अन्यथा कथम् ‘असमर्थोऽसि’(१२.१०) इत्युच्यते । ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’(५.२) इति चोक्तम् ।<br/>          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘सर्वाधिकं (ज्ञानं)ध्यानमुदाहरन्ति ध्यानाधिके ज्ञानभक्ती परात्मन् ।<br/> कर्माफलाकाङ्क्षमथो विरागः त्यागश्च न ध्यानकलाफलार्हः ॥’</span></span> इति च काषायणशाखायाम् ।<br/>वाक्यसाम्येऽप्यसमर्थविषयत्वोक्तेः तात्पर्याभाव इतरत्र प्रतीयते । ध्यानादिप्राप्तिकारणत्वाच्च(कारणेन) त्यागस्तुतिर्युक्ता । (केवलाद्) केवलध्यानात् फलत्यागयुक्तं ध्यानमधिकम् । ध्यानयुक्तत्याग एव चात्रोक्तः । अन्यथा कथम्- ‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ इत्युच्येत ? कथं च ध्यानादाधिक्यम् ? तथा च गौपवनशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ध्यानात्तु केवलात् त्यागयुक्तं तदधिकं भवेत्॥’</span></span> इति । न हि त्यागमात्रानन्तरमेव मुक्तिर्भवति । भवति च ध्यानयुक्तात् । केवलत्यागस्तुतिरेवमपि भवति । यथा ‘अनेन युक्तो जेता, नान्यथा’ इत्युक्ते ॥१२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C12_V12
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| id       = BGB_C12_V12_B01
| text    = अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्- ‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः । ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’ इति । ध्यानात् कर्मफलत्यागः इति तु स्तुतिः । अन्यथा कथम् ‘असमर्थोऽसि’(१२.१०) इत्युच्यते । ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’(५.२) इति चोक्तम् । ‘सर्वाधिकं (ज्ञानं)ध्यानमुदाहरन्ति ध्यानाधिके ज्ञानभक्ती परात्मन् । कर्माफलाकाङ्क्षमथो विरागः त्यागश्च न ध्यानकलाफलार्हः ॥’ इति च काषायणशाखायाम् । वाक्यसाम्येऽप्यसमर्थविषयत्वोक्तेः तात्पर्याभाव इतरत्र प्रतीयते । ध्यानादिप्राप्तिकारणत्वाच्च(कारणेन) त्यागस्तुतिर्युक्ता । (केवलाद्) केवलध्यानात् फलत्यागयुक्तं ध्यानमधिकम् । ध्यानयुक्तत्याग एव चात्रोक्तः । अन्यथा कथम्- ‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ इत्युच्येत ? कथं च ध्यानादाधिक्यम् ? तथा च गौपवनशाखायाम्- ‘ध्यानात्तु केवलात् त्यागयुक्तं तदधिकं भवेत्॥’ इति । न हि त्यागमात्रानन्तरमेव मुक्तिर्भवति । भवति च ध्यानयुक्तात् । केवलत्यागस्तुतिरेवमपि भवति । यथा ‘अनेन युक्तो जेता, नान्यथा’ इत्युक्ते ॥१२ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C12_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V13
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<span class="shloka-line">अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।</span>
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<span class="shloka-line">निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
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<span class="shloka-line">सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।</span>
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<span class="shloka-line">मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
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<span class="shloka-line">यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।</span>
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<span class="shloka-line">हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C12_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
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<div class="verse" id="BGB_C12_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।</span>
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<span class="shloka-line">शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥</span>
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| verse_line1  = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
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<div class="verse" id="BGB_C12_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V18
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<span class="shloka-line">समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।</span>
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<span class="shloka-line">शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C12_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V19
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।</span>
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<span class="shloka-line">अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V19_B01" data-verse="BGB_C12_V19">
{{Bhashyam
<p>‘सर्वारम्भपरित्यागी’ (‘शुभाशुभपरित्यागी’) इत्यादेः सामान्यविशेष-व्याख्यानव्याख्येयभावेन अपुनरुक्तिः । ‘हर्षादिभिर्मुक्तः’ इत्युक्ते कादाचित्कमपि भवतीति ‘यो न हृष्यति’इत्युक्तम् (इत्याद्युक्तम्) । उपचारपरिहारार्थं पूर्वम् । आधिक्यज्ञापनाय भक्त्यभ्यासः । ‘ये तु सर्वाणि कर्माणि’(१२.६) इत्यादेः प्रपञ्च एषः ॥ १६-१९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C12_V19
</div>
| id       = BGB_C12_V19_B01
| text    = ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ (‘शुभाशुभपरित्यागी’) इत्यादेः सामान्यविशेष-व्याख्यानव्याख्येयभावेन अपुनरुक्तिः । ‘हर्षादिभिर्मुक्तः’ इत्युक्ते कादाचित्कमपि भवतीति ‘यो न हृष्यति’इत्युक्तम् (इत्याद्युक्तम्) । उपचारपरिहारार्थं पूर्वम् । आधिक्यज्ञापनाय भक्त्यभ्यासः । ‘ये तु सर्वाणि कर्माणि’(१२.६) इत्यादेः प्रपञ्च एषः ॥ १६-१९ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C12_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C12_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।</span>
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<span class="shloka-line">श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
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| verse_line2  = श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नम द्वादशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नम द्वादशोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C12_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C12_V20_B01" data-verse="BGB_C12_V20">
{{Bhashyam
<p>पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’</span> इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥</p>
| verse_id = BGB_C12_V20
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| id       = BGB_C12_V20_B01
| text    = पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । ‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥
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</div>
</div>
Line 6,743: Line 7,601:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C13_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V01
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥</span>
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| verse_line1  = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
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| verse_line2  = एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C13_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।</span>
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<span class="shloka-line">एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
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| verse_line2  = एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥
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<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C13_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V03
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<span class="shloka-line">क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
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<div class="verse" id="BGB_C13_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V04_B01" data-verse="BGB_C13_V04">
{{Bhashyam
<p>‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V04
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| id       = BGB_C13_V04_B01
| text    = ‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
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| verse_line2  = ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V05">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V05">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V05_B01" data-verse="BGB_C13_V05">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्मसूत्राणि =शारीरकम् ॥ ५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V05
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| id       = BGB_C13_V05_B01
| text    = ब्रह्मसूत्राणि =शारीरकम् ॥ ५ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C13_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
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| verse_line2  = इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V07
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
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| verse_line2  = एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V07_B01" data-verse="BGB_C13_V07">
{{Bhashyam
<p>इच्छादयो विकाराः ॥ ६-७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V07
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| id       = BGB_C13_V07_B01
| text    = इच्छादयो विकाराः ॥ ६-७ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
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| verse_line2  = आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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{{Bhashyam
<p>‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् ।</span> आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V08
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| id       = BGB_C13_V08_B01
| text    = ‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः । ‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥
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| verse_id    = BGB_C13_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।</span>
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<span class="shloka-line">जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥</span>
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| verse_line1  = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।
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| verse_line2  = जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।</span>
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<span class="shloka-line">नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
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| verse_line2  = नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V10">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V10_B01" data-verse="BGB_C13_V10">
{{Bhashyam
<p>सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’</span> इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥</p>
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| id       = BGB_C13_V10_B01
| text    = सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । ‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’ इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥
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| verse_id    = BGB_C13_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।</span>
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<span class="shloka-line">विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥</span>
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| verse_line1  = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
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| verse_line2  = विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V12
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<span class="shloka-line">अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।</span>
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<span class="shloka-line">एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥</span>
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| verse_line1  = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V12_B01" data-verse="BGB_C13_V12">
{{Bhashyam
<p>तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥</p>
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| text    = तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।</span>
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<span class="shloka-line">अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।
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| verse_line2  = अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V13">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V13">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V13_B01" data-verse="BGB_C13_V13">
{{Bhashyam
<p>‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् ।</p>
| verse_id = BGB_C13_V13
<p>॥ १३ ॥</p>
| id       = BGB_C13_V13_B01
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| text    = ‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । ॥ १३ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C13_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।</span>
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<span class="shloka-line">असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।
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| verse_line2  = असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V15_B01" data-verse="BGB_C13_V15">
{{Bhashyam
<p>सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् ।</p>
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| id       = BGB_C13_V15_B01
| text    = सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् ।
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</div>
</div>
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<span class="shloka-line">बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।
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<div class="verse" id="BGB_C13_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।</span>
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<span class="shloka-line">भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥</span>
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| verse_line1  = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C13_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥</span>
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| verse_line1  = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
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<div class="verse" id="BGB_C13_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V19
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।</span>
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<span class="shloka-line">मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
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| verse_line2  = मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V19_B01" data-verse="BGB_C13_V19">
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<p>विकारान्तर्भावाज्ज्ञानसाधनं प्रथमत उक्तम् । बहुत्वात् साधनात्युपयोगात् प्रभावः ॥ १९ ॥</p>
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C13_V20
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।</span>
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<span class="shloka-line">विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V20_B01" data-verse="BGB_C13_V20">
{{Bhashyam
<p>‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- <span class="gr-prateeka">प्रकृतिमिति ॥</span> <span class="gr-moola">गुणाः</span> सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ ।</span></span>इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V20
</div>
| id       = BGB_C13_V20_B01
| text    = ‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- प्रकृतिमिति ॥ गुणाः सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः । ‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ । इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V21
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
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| verse_line2  = पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V21">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V21">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V21_B01" data-verse="BGB_C13_V21">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">कार्यं</span> शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । <span class="gr-moola">करणानि</span> इन्द्रियाणि । <span class="gr-moola">भोगः</span> अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।<br/>भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९)</span></span>इति (हि) भागवते ॥२१ ॥
| verse_id = BGB_C13_V21
</div>
| id       = BGB_C13_V21_B01
| text    = कार्यं शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । करणानि इन्द्रियाणि । भोगः अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९) इति (हि) भागवते ॥२१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
</div>
| verse_line2  = कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C13_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
</div>
| verse_line2  = परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V23">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V23">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V23_B01" data-verse="BGB_C13_V23">
{{Bhashyam
<p>‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V23
</div>
| id       = BGB_C13_V23_B01
| text    = ‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
</div>
| verse_line2  = सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V24_B01" data-verse="BGB_C13_V24">
{{Bhashyam
<p>‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । <span class="gr-moola">‘पुरुषं प्रकृतिं च’</span> इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् ।<br/> विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का ।<br/>अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः ।<br/>न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’</span></span> इति ।<br/>अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति ।</p>
| verse_id = BGB_C13_V24
</div>
| id       = BGB_C13_V24_B01
| text    = ‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । ‘पुरुषं प्रकृतिं च’ इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का । अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः । न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति । अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C13_V24_B02" data-verse="BGB_C13_V24">
{{Bhashyam
<p>अवान्तरं च तात्पर्यं तत्रास्ति । उक्तं च तत्रैव- ‘अवान्तरं तत्परत्वं च सत्त्वे, महद्वाऽप्येकत्वात् (तु) तयोरनन्ते’ । इति । श्यामत्वाद्यभिधानाच्च । युक्तं च पुरुषमतिकल्पितयुक्त्यादेराभासत्वम् । अज्ञानसम्भवात् । न तु स्वतः प्रमाणस्य वेदस्याऽभासत्वम् । अदर्शनं च सम्भवत्येव । पुंसां बहूनामप्यज्ञानात् । तर्ह्यस्मदनधीतश्रुत्यादौ विपर्ययोऽपि स्यादिति च न वाच्यम् । यतस्तत्रैवाह-<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नैतद्विरुद्धा वाचो नैतद्विरुद्धा युक्तयः इति ह प्रजापतिरुवाच (प्रजापतिरुवाच)’</span></span> इति ।<br/>तद्विरुद्धं च जीवसाम्यम् ।</p>
| verse_id = BGB_C13_V24
</div>
| id       = BGB_C13_V24_B02
| text    = अवान्तरं च तात्पर्यं तत्रास्ति । उक्तं च तत्रैव- ‘अवान्तरं तत्परत्वं च सत्त्वे, महद्वाऽप्येकत्वात् (तु) तयोरनन्ते’ । इति । श्यामत्वाद्यभिधानाच्च । युक्तं च पुरुषमतिकल्पितयुक्त्यादेराभासत्वम् । अज्ञानसम्भवात् । न तु स्वतः प्रमाणस्य वेदस्याऽभासत्वम् । अदर्शनं च सम्भवत्येव । पुंसां बहूनामप्यज्ञानात् । तर्ह्यस्मदनधीतश्रुत्यादौ विपर्ययोऽपि स्यादिति च न वाच्यम् । यतस्तत्रैवाह- ‘नैतद्विरुद्धा वाचो नैतद्विरुद्धा युक्तयः इति ह प्रजापतिरुवाच (प्रजापतिरुवाच)’ इति । तद्विरुद्धं च जीवसाम्यम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C13_V24_B03" data-verse="BGB_C13_V24">
{{Bhashyam
<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘आभास एव च’(ब्र.सू.२.३.५०)</span></span> इति चोक्तम् । <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु ।<br/>को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ।<br/>श्रीवैशंपायन उवाच-<br/>नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्भव ।<br/>बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥<br/>तथा त्वं पुरुषं विश्वं आख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१-३)</span></span> इति च मोक्षधर्मे ।<br/>न च तत् सर्वं स्वप्नेन्द्रजाल(लादि)वत् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत्’(ब्र.सू.२.२.२९)</span></span> इति हि भगवद्वचनम् । न च स्वप्नवत् एकजीवकल्पितत्वे मानं पश्यामः । विपर्यये माश्चोक्ता द्वितीये । उक्तं चायास्यशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘स्वप्नो ह वा अयं चञ्चलत्वान्न च स्वप्नो न हि विच्छेद एतदिति।’</span></span>इति ।
| verse_id = BGB_C13_V24
</div>
| id       = BGB_C13_V24_B03
| text    = ‘आभास एव च’(ब्र.सू.२.३.५०) इति चोक्तम् । ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु । को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति । श्रीवैशंपायन उवाच- नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्भव । बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥ तथा त्वं पुरुषं विश्वं आख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१-३) इति च मोक्षधर्मे । न च तत् सर्वं स्वप्नेन्द्रजाल(लादि)वत् । ‘वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत्’(ब्र.सू.२.२.२९) इति हि भगवद्वचनम् । न च स्वप्नवत् एकजीवकल्पितत्वे मानं पश्यामः । विपर्यये माश्चोक्ता द्वितीये । उक्तं चायास्यशाखायाम्- ‘स्वप्नो ह वा अयं चञ्चलत्वान्न च स्वप्नो न हि विच्छेद एतदिति।’ इति ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C13_V24_B04" data-verse="BGB_C13_V24">
{{Bhashyam
<p>नायं दोषः । न हीश्वरस्य जीवैक्यमुच्यते । जीवस्य हीश्वरैक्यं ध्येयम् । तदपि न निरुपाधिकम् । अतो न प्रतिबिम्बत्वविरोधि ऐक्यम् । तथा च माधुच्छन्दसश्रुतिः- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ऐक्यं चापि प्रातिबिम्ब्येन विष्णोः जीवस्यैतद्ध्यृषयो वदन्ति’</span></span> इति । अहङ्ग्रहोपासने च फलाधिक्यम् अ(आ)ग्निवेश्यश्रुतिसिद्धम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अहङ्ग्रहोपासकस्तस्य साम्यम् अभ्याशो ह वा अश्नुते नात्र शङ्का ।’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Vamanapurana-id">‘तदीयोऽहमिति ज्ञानम् अहङ्ग्रह इतीरितः ।’</span></span>इति वामने ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तद्वशत्वात्तु सोऽस्मीति भृत्यैरेव न तु स्वतः’</span></span> इति च ।<br/>‘प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मि भृत्यश्च’ इति भावना । तथा हि आयास्यशाखायाम्- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘भृत्यश्चाहं प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मीत्येवं ह्युपास्यः परमः पुमान् सः ।’</span></span> इति । प्रातिबिम्ब्यं च तत्साम्य(सादृश्य)मेव ॥ २४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V24
</div>
| id       = BGB_C13_V24_B04
| text    = नायं दोषः । न हीश्वरस्य जीवैक्यमुच्यते । जीवस्य हीश्वरैक्यं ध्येयम् । तदपि न निरुपाधिकम् । अतो न प्रतिबिम्बत्वविरोधि ऐक्यम् । तथा च माधुच्छन्दसश्रुतिः- ‘ऐक्यं चापि प्रातिबिम्ब्येन विष्णोः जीवस्यैतद्ध्यृषयो वदन्ति’ इति । अहङ्ग्रहोपासने च फलाधिक्यम् अ(आ)ग्निवेश्यश्रुतिसिद्धम्- ‘अहङ्ग्रहोपासकस्तस्य साम्यम् अभ्याशो ह वा अश्नुते नात्र शङ्का ।’ इति । ‘तदीयोऽहमिति ज्ञानम् अहङ्ग्रह इतीरितः ।’ इति वामने । ‘तद्वशत्वात्तु सोऽस्मीति भृत्यैरेव न तु स्वतः’ इति च । ‘प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मि भृत्यश्च’ इति भावना । तथा हि आयास्यशाखायाम्- ‘भृत्यश्चाहं प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मीत्येवं ह्युपास्यः परमः पुमान् सः ।’ इति । प्रातिबिम्ब्यं च तत्साम्य(सादृश्य)मेव ॥ २४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
</div>
| verse_line2  = अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C13_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V26
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।
</div>
| verse_line2  = तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V26_B01" data-verse="BGB_C13_V26">
{{Bhashyam
<p>साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति ।<br/>श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति ।<br/>अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’</span> इति ।</p>
| verse_id = BGB_C13_V26
<p>‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥</p>
| id       = BGB_C13_V26_B01
</div>
| text    = साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति । श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति । अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’ इति । ‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V27
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
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| verse_line2  = क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥
</div>
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<div class="verse" id="BGB_C13_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
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| verse_line2  = विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
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| verse_line2  = न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V29">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V29">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V29_B01" data-verse="BGB_C13_V29">
{{Bhashyam
<p>पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V29
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| id       = BGB_C13_V29_B01
| text    = पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V30
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।</span>
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<span class="shloka-line">यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
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| verse_line2  = यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V30">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V30">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V30_B01" data-verse="BGB_C13_V30">
{{Bhashyam
<p>आत्मानं चाकर्तारं पश्यति स पश्यति ॥ ३० ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V30
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| text    = आत्मानं चाकर्तारं पश्यति स पश्यति ॥ ३० ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V31
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥</span>
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| verse_line1  = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।
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| verse_line2  = तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V31_B01" data-verse="BGB_C13_V31">
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<p>एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V31
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| id       = BGB_C13_V31_B01
| text    = एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V32
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥</span>
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| verse_line1  = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V32">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V32">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V32_B01" data-verse="BGB_C13_V32">
{{Bhashyam
<p>न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो <span class="gr-reference gr-ref-Mandukyopanishat-id">‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१)</span> इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V32
</div>
| id       = BGB_C13_V32_B01
| text    = न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C13_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V33
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।
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| verse_line2  = सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V34" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V34
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
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| verse_line2  = क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C13_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C13_V35
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C13
<span class="shloka-line">भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
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| verse_line2  = भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V35">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C13_V35">
<div class="bhashya" id="BGB_C13_V35_B01" data-verse="BGB_C13_V35">
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<p>भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षसाधनम् अमानित्वादिकम् ॥ ३५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C13_V35
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| id       = BGB_C13_V35_B01
| text    = भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षसाधनम् अमानित्वादिकम् ॥ ३५ ॥
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Line 7,200: Line 8,119:
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<div class="verse" id="BGB_C14_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
</div>
| verse_line2  = यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C14_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
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| verse_line2  = सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C14_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
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| verse_line2  = सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V03_B01" data-verse="BGB_C14_V03">
{{Bhashyam
<p>महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः-</p>
| verse_id = BGB_C14_V03
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च ।<br/>उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’</span> इति ।
| id       = BGB_C14_V03_B01
<p>‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ-</p>
| text    = महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः- ‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च । उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ इति । ‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- ‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना । तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ इति ।
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना ।<br/>तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’</span> इति ।
}}
</div>


<div class="bhashya" id="BGB_C14_V03_B02" data-verse="BGB_C14_V03">
{{Bhashyam
<p>अतः सीतादुःखादिकं (सर्वं) मृषाप्रदर्शनमेव । तथा कूर्मपुराणे । न चेयं भूः । तथा च सौकरायणश्रुतिः-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अन्या भूमिर्भूरियं तस्य छाया भूतावमा सा हि भूतैकयोनिः।’</span></span>इति ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अवाप स्वेच्छया दास्यं जगतां प्रपितामही’</span></span><br/> इत्यनभिम्लात(न)श्रुतिः। मत्स्यपुराणोक्तमपि स्वेच्छयैव । महद्ब्रह्मशब्दवाच्याऽपि प्रकृतिरेव-<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Matsyapurana-id">‘महती ब्रह्मणी द्वे तु प्रकृतिश्च महेश्वरः।’</span></span> इति तत्रैव ॥३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V03
</div>
| id       = BGB_C14_V03_B02
| text    = अतः सीतादुःखादिकं (सर्वं) मृषाप्रदर्शनमेव । तथा कूर्मपुराणे । न चेयं भूः । तथा च सौकरायणश्रुतिः- ‘अन्या भूमिर्भूरियं तस्य छाया भूतावमा सा हि भूतैकयोनिः।’ इति । ‘अवाप स्वेच्छया दास्यं जगतां प्रपितामही’ इत्यनभिम्लात(न)श्रुतिः। मत्स्यपुराणोक्तमपि स्वेच्छयैव । महद्ब्रह्मशब्दवाच्याऽपि प्रकृतिरेव- ‘महती ब्रह्मणी द्वे तु प्रकृतिश्च महेश्वरः।’ इति तत्रैव ॥३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।</span>
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<span class="shloka-line">तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
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| verse_line2  = तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C14_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V05
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
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| verse_line2  = निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C14_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।
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| verse_line2  = सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V06_B01" data-verse="BGB_C14_V06">
{{Bhashyam
<p>बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥</p>
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| id       = BGB_C14_V06_B01
| text    = बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥
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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C14_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V07">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V07">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V07_B01" data-verse="BGB_C14_V07">
{{Bhashyam
<p>(रज इति) तृष्णासङ्गयोः समुद्भवम् = तयोः कारणम् ॥ ७ ॥</p>
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| text    = (रज इति) तृष्णासङ्गयोः समुद्भवम् = तयोः कारणम् ॥ ७ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V08_B01" data-verse="BGB_C14_V08">
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<p>अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥</p>
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| text    = अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥
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</div>
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C14_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C14_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V11
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<span class="shloka-line">सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।
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<div class="verse" id="BGB_C14_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।</span>
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| verse_line1  = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
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<div class="verse" id="BGB_C14_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V13
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<span class="shloka-line">अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।</span>
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| verse_line1  = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
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<div class="verse" id="BGB_C14_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V14
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<div class="verse" id="BGB_C14_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C14_V15
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<span class="shloka-line">रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।</span>
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| verse_line2  = तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C14_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V16
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<span class="shloka-line">कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।</span>
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<span class="shloka-line">रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V16_B01" data-verse="BGB_C14_V16">
{{Bhashyam
<p>रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’</span> इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V16
</div>
| id       = BGB_C14_V16_B01
| text    = रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- ‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’ इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
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<div class="verse" id="BGB_C14_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥</span>
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| verse_line1  = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
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| verse_line2  = जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C14_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V19_B01" data-verse="BGB_C14_V19">
{{Bhashyam
<p>परिणामिकर्तारं <span class="gr-moola">गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति</span> । अन्यथा <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Atharvana-id">‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’</span></span> इति श्रुतिविरोधः ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C14_V19
          <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४)</span></span> इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥
| id       = BGB_C14_V19_B01
</div>
| text    = परिणामिकर्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति । अन्यथा ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’ इति श्रुतिविरोधः । ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४) इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।
</div>
| verse_line2  = जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C14_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।
</div>
| verse_line2  = किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥
</div>
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C14_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V22
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
</div>
| verse_line2  = न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V22">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V22">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V22_B01" data-verse="BGB_C14_V22">
{{Bhashyam
<p>प्रायो<span class="gr-moola">न द्वेष्टि न काङ्क्षति</span> । तथाहि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम्-<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘रजस्तमःसत्त्वगुणान् प्रवृत्तान् प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षते ।<br/>तथाऽपि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद् यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् ॥’</span></span> इति।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ।<br/>हीनास्सत्त्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः ।<br/>कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७८-७९)</span></span> इति हि मोक्षधर्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.६९)</span></span> । इति च ॥ २०-२२ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V22
</div>
| id       = BGB_C14_V22_B01
| text    = प्रायो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । तथाहि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम्- ‘रजस्तमःसत्त्वगुणान् प्रवृत्तान् प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षते । तथाऽपि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद् यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् ॥’ इति। ‘न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम । हीनास्सत्त्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः । कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७८-७९) इति हि मोक्षधर्मे । ‘सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.६९) । इति च ॥ २०-२२ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V23
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
</div>
| verse_line2  = गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C14_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V24
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
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| verse_line2  = तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C14_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
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| verse_line2  = सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V25">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V25">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V25_B01" data-verse="BGB_C14_V25">
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<p>तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात् ॥ २४, २५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V25
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| id       = BGB_C14_V25_B01
| text    = तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात् ॥ २४, २५ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V26
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
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| verse_line2  = स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V26">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V26">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V26_B01" data-verse="BGB_C14_V26">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ ।</span></span>इति पाद्मे ।<br/><span class="gr-moola">भूयाय</span> भावाय ॥२६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V26
</div>
| id       = BGB_C14_V26_B01
| text    = ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् । ‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ । इति पाद्मे । भूयाय भावाय ॥२६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C14_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C14_V27
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C14
<span class="shloka-line">शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।
</div>
| verse_line2  = शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिगुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिगुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V27">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C14_V27">
<div class="bhashya" id="BGB_C14_V27_B01" data-verse="BGB_C14_V27">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥</p>
| verse_id = BGB_C14_V27
</div>
| id       = BGB_C14_V27_B01
| text    = ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥
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</div>
</div>
Line 7,531: Line 8,478:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C15_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
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| verse_line2  = छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्री भगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V01_B01" data-verse="BGB_C15_V01">
{{Bhashyam
<p>ऊर्ध्वो विष्णुः ।</p>
| verse_id = BGB_C15_V01
<p>‘ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि द्रविणसवर्चसम्’ । इति हि श्रुतिः । ऊर्ध्वः उत्तमः सर्वतः । अधो निकृष्टम् । शाखा भूतानि । श्वोप्येकप्रकारेण न तिष्ठतीत्यश्वत्थः । तथाऽपि न प्रवाहव्ययः । पूर्वब्रह्मकाले यथा स्थितिस्तथा सर्वत्रापीत्यव्ययता । फलकारणत्वा- च्छन्दसां पर्णत्वम् । न हि कदाचिदप्यजाते पर्णे फलोत्पत्तिः ॥१ ॥</p>
| id       = BGB_C15_V01_B01
</div>
| text    = ऊर्ध्वो विष्णुः । ‘ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि द्रविणसवर्चसम्’ । इति हि श्रुतिः । ऊर्ध्वः उत्तमः सर्वतः । अधो निकृष्टम् । शाखा भूतानि । श्वोप्येकप्रकारेण न तिष्ठतीत्यश्वत्थः । तथाऽपि न प्रवाहव्ययः । पूर्वब्रह्मकाले यथा स्थितिस्तथा सर्वत्रापीत्यव्ययता । फलकारणत्वा- च्छन्दसां पर्णत्वम् । न हि कदाचिदप्यजाते पर्णे फलोत्पत्तिः ॥१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C15_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
</div>
| verse_line2  = अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V02_B01" data-verse="BGB_C15_V02">
{{Bhashyam
<p>अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्-</p>
| verse_id = BGB_C15_V02
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’</span> इति ॥ २ ॥
| id       = BGB_C15_V02_B01
</div>
| text    = अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्- ‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’ इति ॥ २ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C15_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
</div>
| verse_line2  = अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V03_B01" data-verse="BGB_C15_V03">
{{Bhashyam
<p>यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-bhagavata-id">‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०)</span></span>इति भागवते । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९)</span></span> इति च मोक्षधर्मे । <span class="gr-moola">असङ्गशस्त्रेण</span> सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-bhagavata-id">‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८)</span></span> इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’</span></span> इति ।</p>
| verse_id = BGB_C15_V03
</div>
| id       = BGB_C15_V03_B01
| text    = यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । ‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०) इति भागवते । ‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९) इति च मोक्षधर्मे । असङ्गशस्त्रेण सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । ‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८) इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- ‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’ इति ।
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C15_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V04
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
</div>
| verse_line2  = तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V04_B01" data-verse="BGB_C15_V04">
{{Bhashyam
<p>तदर्थं च <span class="gr-moola">तमेव प्रपद्ये</span> प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’</span></span> इति ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) ।</span></span>इति च मोक्षधर्मे । <br/> छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥</p>
| verse_id = BGB_C15_V04
</div>
| id       = BGB_C15_V04_B01
| text    = तदर्थं च तमेव प्रपद्ये प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’ इति । ‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) । इति च मोक्षधर्मे । छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C15_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V05
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
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| verse_line2  = द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V05">
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<div class="bhashya" id="BGB_C15_V05_B01" data-verse="BGB_C15_V05">
{{Bhashyam
<p>साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥</p>
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| text    = साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥
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<div class="verse-text">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
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| verse_line2  = यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<p>स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥</p>
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| text    = स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।</span>
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<span class="shloka-line">मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V08
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<span class="shloka-line">शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।</span>
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<span class="shloka-line">गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥</span>
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| verse_line1  = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V08_B01" data-verse="BGB_C15_V08">
{{Bhashyam
<p>‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- <span class="gr-prateeka">शरीरमित्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">यद्</span> यदा <span class="gr-moola">शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च</span> जीवः तदा <span class="gr-moola">ईश्वरः</span> एव <span class="gr-moola">एतानि गृहीत्वा संयाति</span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः ।<br/>तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२)</span></span> इति हि मोक्षधर्मे ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि ।<br/>आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च</span></span> <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते ।<br/>अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७)</span></span> इति च ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् ।<br/> एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५)</span></span> इति च श्रुतिः<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६)</span></span> इति च ।<br/> गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C15_V08
</div>
| id       = BGB_C15_V08_B01
| text    = ‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- शरीरमित्यादिना ॥ यद् यदा शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च जीवः तदा ईश्वरः एव एतानि गृहीत्वा संयाति । ‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः । तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२) इति हि मोक्षधर्मे । ‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि । आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च । ‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते । अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७) इति च । ‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् । एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५) इति च श्रुतिः । ‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६) इति च । गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥
}}


</div>
</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
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| verse_line2  = अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V09">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V09">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V09_B01" data-verse="BGB_C15_V09">
{{Bhashyam
<p>भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । <span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘(यद्य) तद्य इमे वीणायां गायन्ति एतं ते गायन्ति’(छां.१.३.९)</span> इति च श्रुतिः । गुणान्वितमेव भुङ्क्ते । <span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७)</span> इति श्रुतेः ॥ ९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C15_V09
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| id       = BGB_C15_V09_B01
| text    = भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । ‘(यद्य) तद्य इमे वीणायां गायन्ति एतं ते गायन्ति’(छां.१.३.९) इति च श्रुतिः । गुणान्वितमेव भुङ्क्ते । ‘न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) इति श्रुतेः ॥ ९ ॥
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</div>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।</span>
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<span class="shloka-line">विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
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| verse_line2  = विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V10">
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{{Bhashyam
<p>तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥</p>
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| text    = तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C15
<span class="shloka-line">यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
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| verse_line2  = यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V11">
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<p>यतन्तः ज्ञानं प्राप्य । अकृतात्मानः अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥</p>
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।</span>
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<span class="shloka-line">यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥</span>
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| verse_line2  = यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V12_B01" data-verse="BGB_C15_V12">
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<p>पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - यदादित्यगतमित्यादिना ॥ १२ ॥</p>
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<div class="verse" id="BGB_C15_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।</span>
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<span class="shloka-line">पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥</span>
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| verse_line1  = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
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| verse_line2  = पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V13">
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<p>गां भूमिम् ॥ १३ ॥</p>
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।</span>
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<span class="shloka-line">प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C15_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C15_V15
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<span class="shloka-line">सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।</span>
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<span class="shloka-line">वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥</span>
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| verse_line1  = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V15_B01" data-verse="BGB_C15_V15">
{{Bhashyam
<p>वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘स वेदान्तकृत् स कालक इति । स ह्येव युक्तिसूत्रकृत् स कालक इति’</span> इति ॥१५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C15_V15
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| id       = BGB_C15_V15_B01
| text    = वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- ‘स वेदान्तकृत् स कालक इति । स ह्येव युक्तिसूत्रकृत् स कालक इति’ इति ॥१५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C15_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।</span>
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<span class="shloka-line">क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
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<div class="verse" id="BGB_C15_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C15_V17
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<span class="shloka-line">उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।</span>
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<span class="shloka-line">यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C15_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C15_V18
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<span class="shloka-line">यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।</span>
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<span class="shloka-line">अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C15_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V19
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।</span>
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<span class="shloka-line">स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C15_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C15_V20
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।</span>
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<span class="shloka-line">एतद् बुद्‍ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
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| verse_line2  = एतद् बुद्‍ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C15_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C15_V20_B01" data-verse="BGB_C15_V20">
{{Bhashyam
<p>क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः-</p>
| verse_id = BGB_C15_V20
<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् ।<br/>तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’</span> इति॥ १६-२० ॥
| id       = BGB_C15_V20_B01
</div>
| text    = क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- ‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् । तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ इति॥ १६-२० ॥
}}


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</div>
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<div class="verse" id="BGB_C16_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
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| verse_line2  = दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V01_B01" data-verse="BGB_C16_V01">
{{Bhashyam
<p>तपः ब्रह्मचर्यादि । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’</span> इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥</p>
| verse_id = BGB_C16_V01
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| id       = BGB_C16_V01_B01
| text    = तपः ब्रह्मचर्यादि । ‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’ इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C16_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C16_V02
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
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| verse_line2  = दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V02_B01" data-verse="BGB_C16_V02">
{{Bhashyam
<p>पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् ।</p>
| verse_id = BGB_C16_V02
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः ।<br/> राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’</span> इति ह्यभिधानम् ।
| id       = BGB_C16_V02_B01
<p>लौल्यं= रागः । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’</span> इत्यभिधानात् ।</p>
| text    = पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् । ‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ इति ह्यभिधानम् । लौल्यं= रागः । ‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’ इत्यभिधानात् । अचापलं स्थैर्यम् । ‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’ इत्यभिधानात् ॥२ ॥
<p>अचापलं स्थैर्यम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’</span> इत्यभिधानात् ॥२ ॥</p>
}}
</div>


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C16_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V03
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।</span>
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<span class="shloka-line">भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥</span>
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| verse_line1  = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।
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| verse_line2  = भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C16_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C16_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
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| verse_line2  = अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C16_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C16_V05
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<span class="shloka-line">दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।</span>
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<span class="shloka-line">मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥</span>
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| verse_line1  = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
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<div class="verse" id="BGB_C16_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V06
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<span class="shloka-line">द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।</span>
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<span class="shloka-line">दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥</span>
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| verse_line1  = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।
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<div class="verse" id="BGB_C16_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V07
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<span class="shloka-line">प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
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| verse_line2  = न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V07_B01" data-verse="BGB_C16_V07">
{{Bhashyam
<p>क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥</p>
| verse_id = BGB_C16_V07
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| id       = BGB_C16_V07_B01
| text    = क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C16_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
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| verse_line2  = अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C16_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V09
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
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| verse_line2  = प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V08_B01" data-verse="BGB_C16_V09">
{{Bhashyam
<p>जगतः सत्यं प्रतिष्ठा ईश्वरश्च विष्णुः । तद्वैपरीत्येनाऽहुः ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakaopanishat-id">‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम्, तेषामेष सत्यम्’(बृ.८.१.२०) ।</span></span> इति हि श्रुतिः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakaopanishat-id">‘द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे चामूर्तं चैवामूर्तं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च’(बृ.२.३.१)</span></span> इति च ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यम् इति, एष ह्येवैतत् सादयति यामयति चेति’</span></span> इति च प्राचीनशालाश्रुतिः । परस्परसम्भवो ह्युक्तः- ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’(३.१४) इत्यादिना ॥९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C16_V09
</div>
| id       = BGB_C16_V08_B01
| text    = जगतः सत्यं प्रतिष्ठा ईश्वरश्च विष्णुः । तद्वैपरीत्येनाऽहुः । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम्, तेषामेष सत्यम्’(बृ.८.१.२०) । इति हि श्रुतिः । ‘द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे चामूर्तं चैवामूर्तं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च’(बृ.२.३.१) इति च । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यम् इति, एष ह्येवैतत् सादयति यामयति चेति’ इति च प्राचीनशालाश्रुतिः । परस्परसम्भवो ह्युक्तः- ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’(३.१४) इत्यादिना ॥९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C16_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
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| verse_line2  = मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V10">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V10_B01" data-verse="BGB_C16_V10">
{{Bhashyam
<p>दुष्पूरो हि कामः ।<span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘पाताल इव दुष्पूरो मां हि क्लेशयते सदा।’(कुम्भ-म.भा.१२.१७६.३९)</span></span>इति हि मोक्षधर्मे ॥१० ॥</p>
| verse_id = BGB_C16_V10
</div>
| id       = BGB_C16_V10_B01
| text    = दुष्पूरो हि कामः । ‘पाताल इव दुष्पूरो मां हि क्लेशयते सदा।’(कुम्भ-म.भा.१२.१७६.३९) इति हि मोक्षधर्मे ॥१० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C16_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V11
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।</span>
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<span class="shloka-line">कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥</span>
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| verse_line1  = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
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<div class="verse" id="BGB_C16_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।</span>
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<span class="shloka-line">ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥</span>
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| verse_line1  = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
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<div class="verse" id="BGB_C16_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।</span>
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<span class="shloka-line">इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C16_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।</span>
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<span class="shloka-line">ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
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<div class="verse" id="BGB_C16_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।</span>
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<span class="shloka-line">यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C16_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C16_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
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<span class="shloka-line">आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।</span>
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<span class="shloka-line">यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C16_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V18
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<span class="shloka-line">अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।</span>
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<span class="shloka-line">मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C16_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C16_V18_B01" data-verse="BGB_C16_V18">
{{Bhashyam
<span class="gr-prateeka">मामात्मपरदेहेष्विति ॥</span> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’</span></span>इत्यादि ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् ।<br/>अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’</span></span> इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥
| verse_id = BGB_C16_V18
</div>
| id       = BGB_C16_V18_B01
| text    = मामात्मपरदेहेष्विति ॥ ‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’ इत्यादि । ‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् । अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’ इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये षोडशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये षोडशोऽध्यायः ॥</div>


<div class="verse" id="BGB_C16_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।
</div>
| verse_line2  = क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C16_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।
</div>
| verse_line2  = मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C16_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
</div>
| verse_line2  = कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C16_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C16
<span class="shloka-line">आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
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| verse_line2  = आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C16_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V23
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।</span>
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<span class="shloka-line">न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
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| verse_line2  = न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C16_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C16_V24
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।</span>
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<span class="shloka-line">ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
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| verse_line2  = ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥
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}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥</div>
Line 8,077: Line 9,078:
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</div>


<div class="verse" id="BGB_C17_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
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| verse_line2  = तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V01">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V01">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V01_B01" data-verse="BGB_C17_V01">
{{Bhashyam
<p>शास्त्रविधिमुत्सृज्य= अज्ञात्वा एव ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmruti-id">‘वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना।’(म.स्मृ.२.२३५)</span></span> इति विधिरुत्सृष्टो हि तैः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmriti-id">‘ये वै वेदं न पठन्ते न चार्थं वेदोज्झितांस्तान् विद्धि सानूनबुद्धीन्’ ।</span></span>इति च माधुच्छन्दसश्रुतिः ।<br/>अन्यथा तु ‘तामसाः’ इत्येवोच्येत, नतु विभज्य । यदि सात्त्विकाः तर्हि नोत्सृष्टशास्त्राः । नहि वेदविरुद्धो धर्मः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Manusmruthi-id">‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्’(म.स्मृ.२.६) ।</span></span>इति हि स्मृतिः ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः’(भाग.६.१.४०)</span></span> इति भागवते ॥१ ॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V01
</div>
| id       = BGB_C17_V01_B01
| text    = शास्त्रविधिमुत्सृज्य= अज्ञात्वा एव । ‘वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना।’(म.स्मृ.२.२३५) इति विधिरुत्सृष्टो हि तैः । ‘ये वै वेदं न पठन्ते न चार्थं वेदोज्झितांस्तान् विद्धि सानूनबुद्धीन्’ । इति च माधुच्छन्दसश्रुतिः । अन्यथा तु ‘तामसाः’ इत्येवोच्येत, नतु विभज्य । यदि सात्त्विकाः तर्हि नोत्सृष्टशास्त्राः । नहि वेदविरुद्धो धर्मः । ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्’(म.स्मृ.२.६) । इति हि स्मृतिः । ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः’(भाग.६.१.४०) इति भागवते ॥१ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
</div>
| verse_line2  = सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V02_B01" data-verse="BGB_C17_V02">
{{Bhashyam
<p>अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V02
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| id       = BGB_C17_V02_B01
| text    = अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
</div>
| verse_line2  = श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V03_B01" data-verse="BGB_C17_V03">
{{Bhashyam
<p>सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V03
</div>
| id       = BGB_C17_V03_B01
| text    = सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V04
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
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| verse_line2  = प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V04_B01" data-verse="BGB_C17_V04">
{{Bhashyam
<p>कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥ ४॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V04
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| id       = BGB_C17_V04_B01
| text    = कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥ ४॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V05
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
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| verse_line2  = दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V06
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।</span>
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<span class="shloka-line">मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V06">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V06">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V06_B01" data-verse="BGB_C17_V06">
{{Bhashyam
<p>भगवत्कर्शनं नाम अल्पत्वदृष्टिरेव ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यो वै महान्तं परमं पुमांसं नैवं द्रष्टा कर्शकः सोऽतिपापी’ ।</span></span>इत्यनभिम्लान(त)श्रुतिः ।<br/></p>
| verse_id = BGB_C17_V06
<p>आसुरो निश्चयो येषां त आसुरनिश्चयाः ।<br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘देवास्तु सात्त्विकाः प्रोक्ताः दैत्या राजसतामसाः।’</span></span>इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ॥ ६॥</p>
| id       = BGB_C17_V06_B01
</div>
| text    = भगवत्कर्शनं नाम अल्पत्वदृष्टिरेव । ‘यो वै महान्तं परमं पुमांसं नैवं द्रष्टा कर्शकः सोऽतिपापी’ । इत्यनभिम्लान(त)श्रुतिः । आसुरो निश्चयो येषां त आसुरनिश्चयाः । ‘देवास्तु सात्त्विकाः प्रोक्ताः दैत्या राजसतामसाः।’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ॥ ६॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥</span>
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| verse_line1  = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
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| verse_line2  = यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C17_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
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| verse_line2  = रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V08">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V08">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V08_B01" data-verse="BGB_C17_V08">
{{Bhashyam
<p>प्रीतिः आनन्तरिका । हृद्यत्वं दर्शने । स्थिराश्च न तदैव पक्वा भवन्ति । तथा ह्याज्यादयः ॥ ८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V08
</div>
| id       = BGB_C17_V08_B01
| text    = प्रीतिः आनन्तरिका । हृद्यत्वं दर्शने । स्थिराश्च न तदैव पक्वा भवन्ति । तथा ह्याज्यादयः ॥ ८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।</span>
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<span class="shloka-line">आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥</span>
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| verse_line1  = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V11
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<span class="shloka-line">अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C17_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C17_V13" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।</span>
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<span class="shloka-line">श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
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| verse_line2  = श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V14
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥</span>
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| verse_line1  = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
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| verse_line2  = स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V16
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।</span>
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<span class="shloka-line">भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥</span>
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| verse_line1  = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V16_B01" data-verse="BGB_C17_V16">
{{Bhashyam
<span class="gr-moola">सौम्यत्वम्</span> अक्रौर्यम् । <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’</span></span>इति ह्यभिधानम् ।<br/> <span class="gr-moola">मौनं</span> मननशीलत्वम् ।<br/> <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyaka-id">‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१)</span></span> इति हि श्रुतिः ।<br/>
| verse_id = BGB_C17_V16
            <span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ ।</span></span>इति हि भाल्लवेयश्रुतिः ।<br/>
| id       = BGB_C17_V16_B01
          कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥
| text    = सौम्यत्वम् अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’ इति ह्यभिधानम् । मौनं मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ । इति हि भाल्लवेयश्रुतिः । कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥
</div>
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।</span>
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<span class="shloka-line">अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
</div>
| verse_line2  = अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C17_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V18
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
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| verse_line2  = क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V19
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।</span>
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<span class="shloka-line">परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥</span>
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| verse_line1  = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
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| verse_line2  = परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V20
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।</span>
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<span class="shloka-line">देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥</span>
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| verse_line1  = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V21
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।</span>
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<span class="shloka-line">दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥</span>
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| verse_line1  = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।</span>
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<span class="shloka-line">असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V23
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।</span>
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<span class="shloka-line">ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥</span>
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| verse_line1  = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V24
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
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| verse_line2  = प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V24">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V24">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V24_B01" data-verse="BGB_C17_V24">
{{Bhashyam
<p>पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि-</p>
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<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च ।<br/>सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’</span> इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।
| id       = BGB_C17_V24_B01
<p>द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः ।</p>
| text    = पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च । सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः ।
</div>
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C17_V24_B02" data-verse="BGB_C17_V24">
{{Bhashyam
<span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१)</span> इति च । <span class="gr-reference gr-ref-Taittareeya-id">‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१)</span> इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥
| verse_id = BGB_C17_V24
</div>
| id       = BGB_C17_V24_B02
| text    = ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C17_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V25
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C17
<span class="shloka-line">दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
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| verse_line2  = दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V25">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V25">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V25_B01" data-verse="BGB_C17_V25">
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<p>‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C17_V25
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| text    = ‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V26
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।
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| verse_line2  = प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C17_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।</span>
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<span class="shloka-line">कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
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<div class="verse" id="BGB_C17_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C17_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।</span>
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<span class="shloka-line">असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥</span>
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| verse_line1  = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
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| verse_line2  = असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥</div>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C17_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C17_V28_B01" data-verse="BGB_C17_V28">
{{Bhashyam
<p>सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु-</p>
| verse_id = BGB_C17_V28
<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’</span> इति ॥ २६-२८ ॥
| id       = BGB_C17_V28_B01
</div>
| text    = सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु- ‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’ इति ॥ २६-२८ ॥
}}


</div>
</div>
Line 8,413: Line 9,440:
</div>
</div>


<div class="verse" id="BGB_C18_V01" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V01
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
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| verse_line2  = त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥
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}}


<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C18_V02" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V02
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
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| verse_line2  = सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">श्रीभगवानुवाच</blockquote>


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V02">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V02">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V02_B01" data-verse="BGB_C18_V02">
{{Bhashyam
<p>फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘अनिच्छयाकर्मणा वापि काम्यकर्मन्यासो न्यासः, फलत्यागस्तु त्यागः।’</span> इति ॥ १, २ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V02
</div>
| id       = BGB_C18_V02_B01
| text    = फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- ‘अनिच्छयाकर्मणा वापि काम्यकर्मन्यासो न्यासः, फलत्यागस्तु त्यागः।’ इति ॥ १, २ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V03" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V03
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
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| verse_line2  = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V03">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V03">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V03_B01" data-verse="BGB_C18_V03">
{{Bhashyam
<p>‘मनीषिणः’ इति (उक्तत्वात्) विशेषणात् पूर्वपक्षोऽपि ग्राह्य एव । फलत्यागेन त्यागो विवक्षितो यज्ञादेस्तत्पक्षे । ‘यस्तु कर्मफलत्यागी’(१८.११) इति च वक्ष्यति । अत एक एवायं पक्षः ॥ ३ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V03
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| id       = BGB_C18_V03_B01
| text    = ‘मनीषिणः’ इति (उक्तत्वात्) विशेषणात् पूर्वपक्षोऽपि ग्राह्य एव । फलत्यागेन त्यागो विवक्षितो यज्ञादेस्तत्पक्षे । ‘यस्तु कर्मफलत्यागी’(१८.११) इति च वक्ष्यति । अत एक एवायं पक्षः ॥ ३ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V04" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V04
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।</span>
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<span class="shloka-line">त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥</span>
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| verse_line1  = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
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| verse_line2  = त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V04">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V04">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V04_B01" data-verse="BGB_C18_V04">
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<p>तत्प्रकारं चाह - निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V04_B01
| text    = तत्प्रकारं चाह - निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V05" type="shloka" data-doc="BGB">
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।</span>
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<span class="shloka-line">यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥</span>
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| verse_line1  = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V06" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V06
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।</span>
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<span class="shloka-line">कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
</div>
| verse_line2  = कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥
</div>
}}


<div class="verse" id="BGB_C18_V07" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V07
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
</div>
| verse_line2  = मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥
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}}


<div class="verse" id="BGB_C18_V08" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V08
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥</span>
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| verse_line1  = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
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| verse_line2  = स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V09" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V09
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥</span>
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| verse_line1  = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
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| verse_line2  = सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V10" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V10
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।</span>
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<span class="shloka-line">त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥</span>
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| verse_line1  = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।
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| verse_line2  = त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V10">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V10">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V10_B01" data-verse="BGB_C18_V10">
{{Bhashyam
<p>यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा <span class="gr-reference gr-ref-Smriti-id">‘ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।<br/>यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’</span> इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः । ज्ञानयज्ञविद्याऽभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते । अतो यद्वचोऽन्यथा प्रतीयते अधिकारभेदेन तद् योज्यम् । अन्यथेतरेषां गत्यभावात् ॥ १० ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V10
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| id       = BGB_C18_V10_B01
| text    = यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा ‘ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’ इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः । ज्ञानयज्ञविद्याऽभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते । अतो यद्वचोऽन्यथा प्रतीयते अधिकारभेदेन तद् योज्यम् । अन्यथेतरेषां गत्यभावात् ॥ १० ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V11" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V11
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
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| verse_line2  = यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V11">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V11">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V11_B01" data-verse="BGB_C18_V11">
{{Bhashyam
<p>अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V11
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| text    = अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V12" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V12
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
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| verse_line2  = भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V12">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V12">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V12_B01" data-verse="BGB_C18_V12">
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<p>त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति ॥ १२ ॥</p>
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| text    = त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति ॥ १२ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V13
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
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| verse_line2  = साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V13">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V13">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V13_B01" data-verse="BGB_C18_V13">
{{Bhashyam
<p>पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V13_B01
| text    = पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V14" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V14
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।</span>
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<span class="shloka-line">विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥</span>
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| verse_line1  = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
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| verse_line2  = विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V15" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V15
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
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| verse_line2  = न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V15">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V15">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V15_B01" data-verse="BGB_C18_V15">
{{Bhashyam
<p>अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’</span> । इति ॥ १४, १५ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V15
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| id       = BGB_C18_V15_B01
| text    = अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- ‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’ । इति ॥ १४, १५ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V16" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V16
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।
</div>
| verse_line2  = पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V16">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V16">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V16_B01" data-verse="BGB_C18_V16">
{{Bhashyam
<p>केवलं निष्क्रियम् । <span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’</span> इति तत्रैव ॥१६ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V16
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| id       = BGB_C18_V16_B01
| text    = केवलं निष्क्रियम् । ‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’ इति तत्रैव ॥१६ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V17" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V17
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
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| verse_line2  = हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V17">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V17">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V17_B01" data-verse="BGB_C18_V17">
{{Bhashyam
<p>तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V17_B01
| text    = तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V18" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V18
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
</div>
| verse_line2  = करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V18">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V18">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V18_B01" data-verse="BGB_C18_V18">
{{Bhashyam
<p>एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् ।</p>
| verse_id = BGB_C18_V18
</div>
| id       = BGB_C18_V18_B01
| text    = एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C18_V18_B02" data-verse="BGB_C18_V18">
{{Bhashyam
<p>तथाह्यृग्वेदखिलेषु- <br/><span class="gr-blockquote"><span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानिनं चाप्यपेक्ष्य विधिरुत्थितः ।<br/>करणं चैव कर्ता च कर्मकारणसङ्ग्रहः ॥’</span></span> इति ।<br/> अकर्तृत्वेऽपि विधिद्वारा इश्वरप्रसादाद् इच्छोत्पत्त्या उक्तकारणैः कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति । ईश्वराधीनत्वेऽपि विधिद्वारा नियत तेनैव । यदि चेच्छादिर्जायते तर्हि कारितमेवेश्वरेण । फलं च नियतम् ।</p>
| verse_id = BGB_C18_V18
</div>
| id       = BGB_C18_V18_B02
| text    = तथाह्यृग्वेदखिलेषु- ‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानिनं चाप्यपेक्ष्य विधिरुत्थितः । करणं चैव कर्ता च कर्मकारणसङ्ग्रहः ॥’ इति । अकर्तृत्वेऽपि विधिद्वारा इश्वरप्रसादाद् इच्छोत्पत्त्या उक्तकारणैः कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति । ईश्वराधीनत्वेऽपि विधिद्वारा नियत तेनैव । यदि चेच्छादिर्जायते तर्हि कारितमेवेश्वरेण । फलं च नियतम् ।
}}


<div class="bhashya" id="BGB_C18_V18_B02" data-verse="BGB_C18_V18">
{{Bhashyam
<p>वस्तुतोऽकर्तृत्वेऽप्याभिमानिकं कर्तृत्वं तस्यैव । स्वातन्त्र्यं च जडम् अपेक्ष्येति न प्रवृत्तिविधिवैयर्थ्यम् । सर्वं चैतद् अनुभवोक्तप्रमाणसिद्धमिति न पृथक् प्रमाणमुच्यते ॥१८ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V18
</div>
| id       = BGB_C18_V18_B02
| text    = वस्तुतोऽकर्तृत्वेऽप्याभिमानिकं कर्तृत्वं तस्यैव । स्वातन्त्र्यं च जडम् अपेक्ष्येति न प्रवृत्तिविधिवैयर्थ्यम् । सर्वं चैतद् अनुभवोक्तप्रमाणसिद्धमिति न पृथक् प्रमाणमुच्यते ॥१८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V19" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V19
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
</div>
| verse_line2  = प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥
</div>
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}


<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V19">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V19">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V19_B01" data-verse="BGB_C18_V19">
{{Bhashyam
<p>पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V19
</div>
| id       = BGB_C18_V19_B01
| text    = पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V20" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V20
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
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| verse_line2  = अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V20">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V20">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V20_B01" data-verse="BGB_C18_V20">
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<p>एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥</p>
| verse_id = BGB_C18_V20
</div>
| id       = BGB_C18_V20_B01
| text    = एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V21" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V21
<div class="shloka">
| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।
</div>
| verse_line2  = वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V22" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V22
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥</span>
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| verse_line1  = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
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| verse_line2  = अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V23" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V23
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<span class="shloka-line">नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।</span>
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<span class="shloka-line">अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥</span>
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| verse_line1  = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V24" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।</span>
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<span class="shloka-line">क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥</span>
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| verse_line1  = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V25" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।</span>
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<span class="shloka-line">मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥</span>
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| verse_line1  = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V26" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।</span>
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<span class="shloka-line">सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥</span>
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| verse_line1  = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
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| verse_line2  = सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V27" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V27
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<span class="shloka-line">रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।</span>
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<span class="shloka-line">हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥</span>
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| verse_line1  = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
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| verse_line2  = हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V28" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V28
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।</span>
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<span class="shloka-line">विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥</span>
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| verse_line1  = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
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| verse_line2  = विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V28">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V28">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V28_B01" data-verse="BGB_C18_V28">
{{Bhashyam
<p>परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री ।</p>
| verse_id = BGB_C18_V28
<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा ।<br/>यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’</span> इत्यभिधानात् ॥२८ ॥
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</div>
| text    = परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री । परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा । यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’ इत्यभिधानात् ॥२८ ॥
}}


</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V29" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V29
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥</span>
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| verse_line1  = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।
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| verse_line2  = प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V30" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V30
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<span class="shloka-line">प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।</span>
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<span class="shloka-line">बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥</span>
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| verse_line1  = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
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| verse_id    = BGB_C18_V31
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<span class="shloka-line">यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥</span>
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| verse_line1  = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
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| verse_line2  = अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V31">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V31">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V31_B01" data-verse="BGB_C18_V31">
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<p>यथार्थत्वनियमाभावे राजस्याः । अन्यथा तामस्याः, भेदाभावात् ॥३१ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V31_B01
| text    = यथार्थत्वनियमाभावे राजस्याः । अन्यथा तामस्याः, भेदाभावात् ॥३१ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V32" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V32
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<span class="shloka-line">अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।</span>
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<span class="shloka-line">सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥</span>
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| verse_line1  = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V33" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।</span>
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<span class="shloka-line">योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥</span>
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| verse_line1  = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
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<span class="shloka-line">यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।</span>
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<span class="shloka-line">प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V35" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।</span>
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<span class="shloka-line">न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V36" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V37" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V38" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V39" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V40" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V40
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<span class="shloka-line">न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।</span>
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<span class="shloka-line">सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V41" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V42" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V43" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V43
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<span class="shloka-line">शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V44" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V44
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V45" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V45
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<span class="shloka-line">स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V46" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V46
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V47" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V47
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<span class="shloka-line">श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।</span>
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<span class="shloka-line">स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥</span>
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| verse_line1  = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V48" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V49" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V49
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।</span>
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<span class="shloka-line">नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥</span>
| verse_type  = shloka
</div>
| verse_line1  = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
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| verse_line2  = नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V49">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V49_B01" data-verse="BGB_C18_V49">
{{Bhashyam
<p>नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥</p>
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| text    = नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V50
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।</span>
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<span class="shloka-line">समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥</span>
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| verse_line1  = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।
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| verse_line2  = समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V50">
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<p>यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा निष्ठा ॥ ५० ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V50_B01
| text    = यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा निष्ठा ॥ ५० ॥
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</div>
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| verse_id    = BGB_C18_V51
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।</span>
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<span class="shloka-line">शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।
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| verse_line2  = शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V52" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V52
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<span class="shloka-line">विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।</span>
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<span class="shloka-line">ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V53" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V53
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।</span>
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<span class="shloka-line">विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
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| verse_line2  = विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V53">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V53">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V53_B01" data-verse="BGB_C18_V53">
{{Bhashyam
<p>ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V53_B01
| text    = ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V54" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V54
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।</span>
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<span class="shloka-line">समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥</span>
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| verse_line1  = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
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| verse_line2  = समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥
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<div class="verse" id="BGB_C18_V55" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V55
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।</span>
| chapter_id  = BGB_C18
<span class="shloka-line">ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
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<div class="verse" id="BGB_C18_V56" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V56
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।</span>
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<span class="shloka-line">मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥</span>
| verse_type  = shloka
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| verse_line1  = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V56">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V56">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V56_B01" data-verse="BGB_C18_V56">
{{Bhashyam
<p>पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥</p>
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| id       = BGB_C18_V56_B01
| text    = पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V57" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V57
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।</span>
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<span class="shloka-line">बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V58" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V58
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।</span>
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<span class="shloka-line">अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्‍क्ष्यसि॥५८ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V59" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।</span>
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<span class="shloka-line">मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V60" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।</span>
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<span class="shloka-line">कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V61" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।</span>
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<span class="shloka-line">भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V62" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।</span>
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<span class="shloka-line">तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥</span>
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| commentary1  = bhagavadgitabhashya
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V62">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V62">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V62_B01" data-verse="BGB_C18_V62">
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<p>परोक्षवचनं तु द्रोणं प्रति भीमवचनवत् ॥ ६२ ॥</p>
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</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V63" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V63
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| document_id  = BGB
<span class="shloka-line">इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।</span>
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<span class="shloka-line">विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V64" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।</span>
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<span class="shloka-line">इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V65" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।</span>
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<span class="shloka-line">मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V66" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।</span>
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<span class="shloka-line">अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥</span>
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V66">
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-BGB_C18_V66">
<div class="bhashya" id="BGB_C18_V66_B01" data-verse="BGB_C18_V66">
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<p>धर्मत्यागः फलत्यागः । कथमन्यथा युद्धविधिः ? ‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’(१८.११) इति चोक्तम् ॥ ६६ ॥</p>
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| text    = धर्मत्यागः फलत्यागः । कथमन्यथा युद्धविधिः ? ‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’(१८.११) इति चोक्तम् ॥ ६६ ॥
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</div>
</div>
<div class="verse" id="BGB_C18_V67" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।</span>
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<span class="shloka-line">न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V68" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।</span>
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<span class="shloka-line">भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V69" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V70" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse" id="BGB_C18_V71" type="shloka" data-doc="BGB">
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| verse_id    = BGB_C18_V71
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<span class="shloka-line">श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V72" type="shloka" data-doc="BGB">
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<span class="shloka-line">कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।</span>
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<div class="verse" id="BGB_C18_V73" type="shloka" data-doc="BGB">
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<div class="verse-text">
| verse_id    = BGB_C18_V73
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<span class="shloka-line">नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।</span>
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<span class="shloka-line">स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥</span>
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| verse_line1  = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।
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<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">अर्जुन उवाच</blockquote>


<div class="verse" id="BGB_C18_V74" type="shloka" data-doc="BGB">
{{VerseBlock
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<span class="shloka-line">इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।</span>
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<span class="shloka-line">संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥</span>
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<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>
<blockquote class="uvaaca">सञ्जय उवाच</blockquote>


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<span class="shloka-line">व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।</span>
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<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥</div>
<div class="gr-author-note">॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥</div>


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<p>पूर्णादोषमहाविष्णोः गीतामाश्रित्य लेशतः ।</p>
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<p>निरूपणं कृतं तेन प्रीयतां मे सदा विभुः ॥</p>
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| text    = पूर्णादोषमहाविष्णोः गीतामाश्रित्य लेशतः । निरूपणं कृतं तेन प्रीयतां मे सदा विभुः ॥
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Revision as of 16:58, 22 May 2026

श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितम्

श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम्

देवं नारायणं नत्वा सर्वदोषविवर्जितम् ।

परिपूर्णं गुरूंश्चाऽन् गीतार्थं वक्ष्यामि लेशतः ॥

नष्टधर्मज्ञानलोककृपालुभिर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो ज्ञानप्रदर्शनाय भगवान् व्यासोऽवततार ।

ततश्चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसाधनादर्शनाद् वेदार्थाज्ञानाच्च संसारे क्लिश्यमानानां वेदानधिकारिणां स्त्रीशूद्रादीनां च धर्मज्ञानद्वारा मोक्षो भवेदिति कृपालुः सर्ववेदार्थोपबृंहितां तदनुक्तकेवलेश्वरज्ञानदृष्टार्थयुक्तां च सर्वप्राणिनाम् अवगाह्यानवगाह्यरूपां केवलभगवत्स्वरूपपरां परोक्षार्थां महाभारतसंहिताम् अचीक्लृपत् ॥

तच्चोक्तम् -

‘लोकेशा ब्रह्मरुद्राद्याः संसारे क्लेशिनं जनम् ।

वेदार्थाज्ञमधीकारवर्जितं च स्त्रियादिकम् ॥
अवेक्ष्य प्रार्थयामासुर्देवेशं पुरुषोत्तमम् ।
ततः प्रसन्नो भगवान् व्यासो भूत्वा च तेन च ॥
अन्यावताररूपैश्च वेदानुक्तार्थभूषितम् ।
केवलेनात्मबोधेन दृष्टं वेदार्थसंयुतम् ॥
वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।
भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥
पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।

‘ब्रह्माऽपि तन्न जानाति ईषत् सर्वोऽपि जानति(ते)।
बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये।
‘ब्रह्माद्यैः प्रार्थितो विष्णुर्भारतं स चकार ह ।
यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’
इति नारदीये । ‘भारतं चापि कृतवान् पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।
दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥

परोक्षार्थं तु सर्वत्र वेदादप्युत्तमं तु यत् ॥’ इति स्कान्दे ।

‘यदि विद्याच्चतुर्वेदान् साङ्गोपनिषदान् द्विजः ।
न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’

‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।
‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३)

मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथाऽपरे ।
तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६)

भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।
देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः ।
व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे)

‘महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००)

‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ’( म.भा.आदि ५.५०) , ‘विराटोद्योगसारवान्’ ( म भा.१.८९) इत्यादितद्वाक्यपर्यालोचनया, ऋषिसम्प्रदायात्, ‘को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ( वायुप्रोक्तवचनम्) इत्यादिपुराणग्रन्थान्तरगतवाक्यान्यथानुपपत्त्या, नारदाध्ययनादिलिङ्गैश्चावसीयते ।

कथमन्यथा भारतनिरुक्तिज्ञानमात्रेण सर्वपापक्षयः ? प्रसिद्धश्च सोऽर्थः ।

कथं चान्यस्य न कर्तुं शक्यते? ग्रन्थान्तरगतत्वाच्च नाविद्यमानस्तुतिः । न च कर्तुरेव । इतरत्रापि साम्यात् ।

तत्र च सर्वभारतार्थसंग्रहां वासुदेवार्जुनसंवादरूपां भारतपारिजातमधुभूतां गीताम् उपनिबबन्ध ।

तच्चोक्तम्–

‘भारतं सर्वशास्त्रेषु भारते गीतिका वरा ।
विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’
इति महाकौर्मे ।

‘स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने।’(म.भा.१३.१६.१२.) इत्यादि च ।

तत्र सेनयोर्मध्ये बान्धवादिमोहजालसंवृतं विषीदन्तम् अर्जुनं भगवानुवाच ।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥


धृतराष्ट्र उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥


सञ्जय उवाच

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥


अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥


धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥


युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥


भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥


अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥


अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥


अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥


तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥


ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥


ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४ ॥


पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥


अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥


काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥


द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥


स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥


अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥


हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते ।


अर्जुन उवाच

यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥


योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥


सञ्जय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥


भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥


तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥


श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥


अर्जुन उवाच( अर्जुनविषादः )


सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥


गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥


निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥


न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥


येषामर्थे काङ्‍‍क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥


आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥


एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥


निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥


तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥


यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥


कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥


कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥


अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥


संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥


दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥


उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४ ॥


अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥


यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥


एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥


सञ्जय उवाच

॥ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥

द्वितीयोऽध्यायः

तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥


सञ्जय उवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥


श्री भगवानुवाच

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥


कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥


अजुर्न उवाच

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥


न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥


कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥


न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥


एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥


सञ्जय उवाच

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥


अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥


श्रीभगवानुवाच

प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? गतासून् ॥११ ॥
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥


किमिति? न त्वेवाहम् ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह – न त्वेति ॥ यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥


देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- देहिनोऽस्मिन् ॥ यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् ।
न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् ।
समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च ।
श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् ।
माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् ।
अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‍‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् ।
सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् ।
रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति ।
न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह – न त्वेवेति ॥
नापि देहनाशमित्याह – देहिन इति ॥ यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥


तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – मात्रास्पर्शा इति ॥ मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव शीतोष्णसुखदुःखदाः । देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः ।
आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – अनित्या इति ॥
अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व ॥ १४ ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥


अतः प्रयोजनमाह – यं हीति ॥ यम् एते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति । पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥


‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते ।
‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् ‘विद्यते’ इत्यादरार्थः ॥
असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – उभयोरपीति ॥ अन्तो निर्णयः॥१६ ॥
अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥


किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – अविनाशीति ॥ नापि शापादिना विनाश इत्याह – विनाशमिति ॥ अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥


भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – अन्तवन्त इति ॥ अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – नित्यस्येति ॥ ‘शरीरिणः’ इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – अनाशिन इति ॥ कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥
‘प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया । चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः ॥’ इति भगवद्वचनात् ॥१८ ॥
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥


व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – य एनमिति ॥ कुतः? उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति, न हन्यते ।
न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया । स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान् । ‘ध्यायतीव’ (बृ.उ.६.३.७) इति श्रुतेश्च ॥ १९ ॥
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥


अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् ।
कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । शाश्वतः सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति पुराणः । तथाऽपि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥२० ॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥


अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? अविनाशिनं नैमित्तिकनाशरहितम् । नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- अविनाशिनं दोषयोगरहितम्, नित्यं सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥


देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – वासांसीति ॥ २२ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥


स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – नैनमिति ॥२३ ॥
अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥


वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे ।
तत्ता च - ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८) , ‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः । स्थाणुत्वेऽपि ‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३) इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । ‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९) , ‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् ) , ‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.) इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः ।
महातात्पर्याच्च । मोक्षो हि महापुरुषार्थः। ‘तत्रापि मोक्ष एवार्थः’ । ‘अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥’(म.भा.१२.३१७.३४) ‘पुण्यचितो लोकः क्षीयते’"(छा.उ. ८.१.६) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स च विष्णुप्रसादादेव सिध्यति । ‘वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।’(विष्णु.१.४.१८) , ‘तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे’ (भाग.७.६.२५) , ‘तत्प्रसादाद् अवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।’ , ‘येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः सर्वात्मना श्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥’ (भाग.२. ७ .४२) , ‘तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते’ ‘ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवाः तापत्रयेणोपहता न शर्म । आत्मन् लभन्ते भगवन् तवाङ्घ्रिच्छायांशविद्यामत आश्रयेम॥’ (भाग.३.६.१८) , ‘ऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह ।’ ‘तमेवं विद्वान्.....’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति । लोकप्रसिद्धेः । लोकसिद्धमविरुद्धम् अत्राप्यङ्गीकार्यम् ॥
‘अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते बहुतरो लेपो नासीद्’ इत्युत्कर्षमेव वक्ति । बहुनरकफलो ह्यसौ । ‘तस्य न लोम च न क्षीयते(मीयते)’(कौ.उ.३.२) इति श्रुत्यन्तराच्च । ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्’ (१५.१९) इति तदुक्तेश्च ।
‘सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः । विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा ॥ पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा । नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः ॥’ इति नारदीये । अन्योत्कर्ष ऐक्यं च - ‘तथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥’(वि.पु.३.४.५) इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम् । तत्र हि - ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥’(म.भा.१.१.१८) , ‘यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ।’ (म.भा.१२.३४१.१२) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः’ (११.४३) इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तम् उत्कर्षं विष्णोर्वक्ति । अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे । तद्धि अग्न्यादेरपि वेदादावस्ति- ‘त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः’ (ऋ.२.१.३) , ‘विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः’(ऋ.१०.८६.१) इत्यादिषु ।
तद्ग्रन्थविरोधाच्च । तथा हि स्कान्दे शैवे - ‘यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः । यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि ॥ यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि । यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोः तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि ॥ यदन्तरं प्रलयजवारिविप्लुषोः यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः । स्फुलिङ्गसंवर्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः ॥ अनन्तत्वान्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम् । माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदारणमीरितम् ॥ तत्समो ह्यधिको वाऽपि नास्ति कश्चित् कदाचन । एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् ॥’ इत्याद्याह । तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् - ‘संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि।’ इत्यादि । पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह - ‘अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः’ इत्यादि । समब्राह्मविरोधाच्च । वेदश्च इतिहासाद्यविरोधेन योज्यः । ‘यदि विद्याद्’ इति वचनात् । अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा । तत्रापीष्टसिद्धिः । नामवैशेष्यात् । अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम् ।
तथाऽपि स्वतः प्रामाण्यात् सन्नेवोच्यते । अविरोधात् । न च प्रमाणसिद्ध(दृष्ट)स्यान्यत्रादृष्ट्याऽपह्नवो युक्तः । धर्मवैचित्र्याद् अर्थानाम् । स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तावप्यदोषत्वं च साधयेद् इत्यतिप्रसङ्गः । अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम् । ‘नारायणपरा वेदाः’ (भाग.२.५.१५) , ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठ.२.१५) , ‘वासुदेवपरा वेदाः’ (भाग.१.२.२९) इति । न चैतद् विरुद्धम् । ईश्वरनियमात् । अनादौ च तत् सिद्धं ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’ ( भाग.२.१०.१२) इत्यादौ । प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन । अतः सिद्धमेतत् । तच्चानन्यापेक्षा अचिन्त्यशक्तित्व एव युक्तम् । अतो न मायामयमेकम् ।
अचलत्वं तु ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’(म.भा.१२.१९१.८) , ‘अदुःखमसुखम्’(म.भा.१२.२५६.२१) , ‘(न)अप्रज्ञम्’ (माण्डूक-२.१) , ‘असद्वा’ (तै.उ.२.७) इत्यादिवत् । क्रियादृष्टेः । ‘तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः’ (भाग.६.४.४६) इत्याद्युक्तेः । अतश्च न मायामयं सर्वम् । ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च ‘तं त्वा भग’( तै. उ.१.४) इत्यादौ । स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम् । ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’ ( भाग.३.१०.२४) , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’ (भाग.६.४.४८) , ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ ( श्वे.उ.६.८) इत्यादिवचनात् ॥२४ ॥
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥


अत एवाव्यक्तादिरूपः ॥ २५ ॥
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥


अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – अथ चेति ॥ २६ ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥


कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – जातस्येति ॥ २७ ॥
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥


तदेव स्पष्टयति – अव्यक्तादीनीति ॥ २८ ॥
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।


देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥


‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – आश्चर्यवदिति ॥ दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥
स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥


यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥


अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥


अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥


भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥


अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥


हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥


सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥


एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥


नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥


साङ्ख्यम् ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३) इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥


‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – व्यवसायात्मिकेति ॥ सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥


कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥


भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥


स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति । वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >, ‘परोक्षविषया वेदाः’ , ‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४) , ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३) इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– >, ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) इति ॥ ४२-४४ ॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥


तां योगबुद्धिमाह - त्रैगुण्यविषया इत्यादिना इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६) , ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०) ’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥


तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – यावानर्थ इति ॥ यथा यावान् अर्थः प्रयोजनम् उदपाने कूपे भवति, तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् विजानतो ऽपि ज्ञानिनो ब्राह्मणस्य फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥


कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - कर्मण्येवेति ॥ ‘ते’ इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५) इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे ।
अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७) , ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– मा त इति ॥ कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४) , ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’ , ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१) , ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१) , ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥


पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – योगस्थ इति ॥ योगस्थः उपायस्थः । सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा । तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । स एव च मयोक्तो योगः ॥ ४८ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥


इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – दूरेणेति ॥ बुद्धियोगाद् ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । दूरेण अतीव । अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः ॥ ४९ ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥


ज्ञानफलमाह – बुद्धियुक्त इति ॥ सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१) , ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१) , ‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३) , ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५) , ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५) , ‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३) , ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् ।
न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने (परे ज्ञाने) किं नु दुःखतरं भवेत्’(म.भा.१२.२९०.७९) इत्यादिनिन्दनाद् मोक्षधर्मे । परिहारे पृथग् भोगाभिधानाच्च । शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्च । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्च । ‘इदं ज्ञानमु(म)पाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः’(१४.२) इति च । उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य । न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः । ‘आसं दुःखी, नाऽसम्’ इति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य । अनेन रूपेणेति च । भेदाभावात् ।
न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः । उपाधिनाशे मानं वा । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने’ इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च । ‘यावदात्मभावित्वाद्’ इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम् ।
दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन । प्रतिशाखं च ‘स एकधा’(छा.उ.७.२६.८) इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते । विरोधे तु युक्तिमतामेव बलवत्त्वम् । युक्तयश्चात्रोक्ताः - ‘मग्नस्य हि’ इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववत् एकीभावः । उक्तं च - ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धम्’(कठ.उ.२.१.१५) , ‘यथा नद्यः’(आथ.उ.३.२.८) इत्यादौ । तत्राऽप्यन्योन्यात्मकत्वे वृद्ध्यसम्भवः । अस्ति चेषत् समुद्रेऽपि द्वारि । महत्त्वाद् अन्यत्रादृष्टिः । ‘ता एवापो ददौ तस्य स ऋषिः शंसितव्रतः’ इति महाकौर्मे समर्थानां भेदज्ञानाच्च । ‘नैव तत् प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः । यत् ते पदं हि कैवल्यम्’ इति निषेधाच्च, नारदीये । सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षधर्मेषु । बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात् । अतो ‘यत्र नान्यत् पश्यति’(छां.७.२४.१) इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि । अन्यथा कथम् ऐश्वर्यादि स्यात्? न च तन्मायामयम् इत्युक्तम् । अन्यथा कथं तत्रैव ‘स एकधा’(छां.७.२६.२) इत्यादि ब्रूयात् ।
न च – ‘न वै सशरीरस्य....’(छां.८.१२.१) इत्यादिविरोधः । वैलक्षण्यात् तच्छरीराणाम् । अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानीश्वरशक्त्या । तथाचोक्तम्– ‘शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव तु’ इत्यादि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । वदन्ति च लौकिकवैलक्षण्येऽभावशब्दम्- ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’, ‘सुखदुःखबाह्यः’ इत्यादिषु । निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि । तथा हि श्रुतिः - ‘अशारीतीँ.... तच्छरीरमभवद्’ इति । न हि तानि शीर्णानि भवन्ति । ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते’(१४.२) इत्यादिवचनात् । साम्यात् प्रयोगः । प्रयोगाच्च - ‘अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः’(कुम्भ-म.भा.१२.३३६.२९) , ‘देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्’(भाग.७.१.३४) इत्यादि दृष्टदेहेष्वेव ।
न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिः । ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । योगी तावन्न मुक्तः स्याद् एष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात् । ये त्वत्रैव भगवन्तं प्रविशन्ति तेऽपि पश्चात् तत्रैव यान्ति । योग्यत्वं चात्र विवक्षितम् । युधिष्ठिरप्रश्न इतरनिन्दनाच्च । सायुज्यं च ग्रहवत् । तदुक्तेश्च - ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान् भोगांस्तु भुञ्जते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः ।
सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’ , ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’ , ‘अशोकमहिमम्’ , ‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् । प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’ । इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । अतो योगाय युज्यस्व । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥


तदुपायमाह - कर्मजमिति ॥ कर्मजं फलं त्यक्त्वा , अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥


कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि । न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति । ‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् । अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्- ‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् । तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् ।
तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, ‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८) , ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४) , ‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३) इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च ‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे । तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥ योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् । प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’ इति (इत्याद्युक्तेः )। ‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन । मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’ इति च । साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- ‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) । तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥


तदेव स्पष्टयति - श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥ पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति; ततश्च समाधावचला , ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥
अर्जुन उवाचस्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।


स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा , लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च । सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च । किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् - ‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि । तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये । न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’ इति वचनात् ॥५४ ॥
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥


श्रीभगवानुवाच

गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् ।
न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति । ‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥


तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - ‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’ इति । शोभनाध्यासो रागः । ‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’ इत्यभिधानम् ॥५६ ॥
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥


यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥


सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि ॥५७, ५८॥
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥


न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - विषया इति ॥ ‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः । वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥


अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । पुरुषस्य शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥


तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - तानीति ॥ बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । युक्तो मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स मत्परः । फलमाह - वशे हीति ॥६१॥

रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन

ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥


क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥


सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् - ‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा । दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥

इन्द्रियजयफलमाहोत्तराभ्यां श्लोकाभ्याम् ।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥


विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । प्रसादं मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥


कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥


प्रसादाभावे दोषमाहोत्तरश्लोकाभ्याम् ।

न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं नास्ति । तदेवोपपादयति - न चायुक्तस्येति ॥ शान्तिः मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥


कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - इन्द्रियाणामिति ॥ अनुविधीयते क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । प्रज्ञां प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥
तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥


तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - तस्मादिति ॥ ६८ ॥
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥


उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - या निशेति ॥ या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, तस्याम् इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी जागर्ति । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’ , ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥
आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥


तेन विषयानुभवप्रकारमाह - आपूर्यमाणमिति ॥ यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् आप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥


एतदेव प्रपञ्चयति - विहायेति ॥ कामान् विषयान् निःस्पृहतया विहाय यश्चरति भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् अधिगच्छति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥
उपसंहरति - एषेति ॥ ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा एव ब्रह्म गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः । साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः‍॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये । निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२) , ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
न च कायव्यूहापेक्षा । ‘तद्यथैषीकातूलम्’(छां.उ.५.२४.३) , ‘तद्यथा(तद्वक्ष्यामि यथा) पुष्करपलाशे’(छां.उ.४.१४.३) , ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’(४.३७) इत्यादिवचनेभ्यः । प्रारब्धे त्वविरोधः । प्रमाणाभावाच्च । न च तत् शास्त्रं प्रमाणम्- ‘अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम् । मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः ॥’ इति निन्दनात् । यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव ; न सत्यत्वम् । न हि तेषामपि इतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम् । तथा ह्युक्तम्- ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु ॥’ इति वाराहे । ‘कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः । चकार शास्त्राणि विभुर्ऋषयस्तत्प्रचोदिताः । दधीच्याद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु । चक्रुर्वेदैस्तु ब्राह्माणि वैष्णवान् विष्णुवेदतः । पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा । तथा पुराणं भागवतं विष्णुवेद इतीरितः । अतः शैवपुराणानि योग्यान्यन्याविरोधतः॥‌’ इति च नारदीये । अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः । भीष्मादीनां तु तस्मिन् क्षणे मुक्त्यभावः । ‘स्मरंस्त्यजति’ इति वर्तमानापदेशो हि कृतः ।तच्चोक्तम्- ‘ज्ञानिनां कर्मयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा । विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि ॥’ इति गारुडे । नचान्येषां तदा स्मृतिर्भवति - ‘बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम् । भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा ॥’ इत्युक्तेर्ब्रह्मवैवर्ते ।
निर्बाणम् अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’ इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०) , ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’ , ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९) , ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१) , ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८) , ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६) , ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१) , ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३) , ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८) , ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६) , ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३) इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते।
अतिपरिपूर्णतम-ज्ञान-ऐश्वर्य-वीर्य-आनन्द-श्री-शक्त्यादिमांश्च भगवान् । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।’(श्वे.उ.६.८) , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.९,मु.उ.१.१.९) , ‘आनन्दं ब्रह्मणः’(तै.उ.ब्रह्मवल्लि.९) , ‘एतस्यैवाऽनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उपजीवन्ति’ (बृह. ४,३.३२) , ‘अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम्’ , ‘सहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्’ , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’(भाग.६.५,४८) , ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’(भाग.०३.१०.२४) , ‘तुर्यं (तु) तत् सर्वदृक् सदा’(माण्डूक्य.उ.२.४) , ‘आत्मानम् अन्यं च स वेद विद्वान्’(भाग.११.११.७) , ‘अन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः’(भाग.१.१८.२१) , ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य’(बृहन्नारदीय.१,४६.१७) । ‘अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम् । यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः ॥’ इत्यादिभ्यः ।
तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि - ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५) , ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२) , ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२) , ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९) , ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) । ‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा । न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः । ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’ इति पैङ्गिखिलेषु । ‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः । परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः । न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः । नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे । ‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ । ‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् । रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥ योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह । न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे । न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः । यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र । तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः । तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि । परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे । न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् । ‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा । न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये । तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी ऋच्छति इति सिद्धम् ॥७२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥

तृतीयोऽध्यायः

ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥


आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र । ज्ञानसाधनत्वेन अकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये ।

अर्जुन उवाच

व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥


कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह- ज्यायसीति ॥ कर्मणः सकाशाद् बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते तव मता तत् तर्हि ॥ १-२ ॥
श्रीभगवानुवाच


‍‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- लोक इति ॥
द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । सांख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम् । योगिनाम् उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः । निष्ठा स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥


इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह- न कर्मणामिति ॥ कर्मणां युद्धादीनाम् अनारम्भेण नैष्कर्म्यं निष्कर्मतया काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं, नाश्नुते । ज्ञानमेव तत्साधनं, न तु कर्माकरणमित्यर्थः । कुतः ? पुरुषत्वात् । सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः ! यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणां च ।
न चाकरणे कर्माभावान्मुक्तिर्भवति । प्रतिजन्म कृतानाम् अनन्तानां कर्मणां भावात् । न च सर्वाणि कर्माणि भुक्तानि । एकस्मिन् शरीरे बहूनि हि कर्माणि करोति । तानि चैकैकानि बहुजन्मफलानि कानिचित् । तत्र चैकैकानि कर्माणि भुञ्जन् प्राप्नोत्येव शेषेण मानुष्यम् । ततश्च बहुशरीरफलानि कर्माणी-त्यसमाप्तिः । तच्चोक्तम्- ‘जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु । स्त्री वाऽप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जते ॥ चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः। अतोऽवित्त्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने ॥’ इति ब्राह्मे । यदि सादिः स्यात् संसारः पूर्वकर्माभावाद् अतत्प्राप्तिः। अबन्धकत्वं त्वकामेनैव भवति । तच्च वक्ष्यते ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति ।
ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः - ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते । निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे । अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह- न चेति ॥ सन्न्यासः काम्यकर्मपरित्यागः । ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ (१८.२) इति वक्ष्यमाणत्वात् । अकामकर्मणाम् अन्तःकरणशुध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति । तच्चोक्तम्- ‘कर्मभिश्शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि ।’ इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमित्युक्तम् । - ‘न तस्य तत्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचस्समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेध(धि)सौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’ (भाग. ५-११-३) इति । न तु फलाभावात् । कर्माभावात् । अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम् ।
यत्याश्रमस्तु प्रायत्यार्थो भगवत्तोषार्थश्च । अप्रयतत्वमेव हि प्रायो गृहस्थादीनाम् , इतरकर्मोद्योगात् । अप्रयतानां च न ज्ञानम् । तथाहि श्रुतिः - ‘नाशान्तो नासमाहितः’(कठ.1.3.10) इति । महांश्च यत्याश्रमे तोषो भगवतः । तथा ह्याह - ‘यत्याश्रमं तुरीयं तु दीक्षां मम सुतोषणीम्’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । आधिकारिकास्तु तत्स्था एव प्रायत्ये समर्थाः । स एव च महान् भगवत्तोषः । तच्चोक्तम् - ‘देवादीनामादिराज्ञां महोद्योगेऽपि नो मनः । विष्णोश्चलति तद्भोगोऽप्यतीव हरितोष(णम्)णः॥’ इति पाद्मे ॥४ ॥
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥


न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- न हीति ॥५॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥


यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥


तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- कर्मेन्द्रियाणीति ॥ मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥


अतो नियतं स्ववर्णाश्रमोचितं कर्म कुरु ॥ ८ ॥
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥


‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः । यज्ञो विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः । ‘मुक्तसङ्गः’ इति विशेषणात् । ‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२) इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । ‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२) इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥


देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥


इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥


यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥


अत्रार्थवादमाह- सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥


हेत्वन्तरमाह- अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् ।
मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च यज्ञाद् भवति । ‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः, कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥


कर्म ब्रह्मणो जायते । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौ.3.9), ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’(गी.10.4) इत्यादिभ्यः । न च मुख्ये सम्भाव्यमाने पारम्पर्येणौपचारिकं कल्प्यम् । न च जडानां स्वतः प्रवृत्तिः सम्भवति । ‘एतस्य वा अक्षरस्य’ इत्यादिसर्वनियमनश्रुतेश्च । ‘द्रव्यं कर्म च’ इत्यादेश्च अचिन्त्यशक्तिश्चोक्ता । जीवस्य च प्रतिबिम्बस्य बिम्बपूर्वैव चेष्टा । ‘न कर्तृत्वम्’ इत्यादिनिषेधाच्च ।
अक्षराणि प्रसिद्धानि । तेभ्यो ह्यभिव्यज्यते परं ब्रह्म । अन्यथानादिनिधनमचिन्त्यं परिपूर्णमपि ब्रह्म को जानाति? न च रूढिं विना योगाङ्गीकारो युक्तः ।
परामर्शाच्च ‘तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म’ (३.१५) इति । न ह्येकशब्देन द्विरुक्तेन भेदश्रुतिं विना वस्तुद्वयं कुत्रचिदुच्यते ।
तानि चाक्षराणि नित्यानि । ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ. ८.६४.६) , ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, ‘अत एव च नित्यत्वम्’ (ब्र.सू. १-३-२९) इत्यादिश्रुतिस्मृति-भगवद्वचनेभ्यः । दोषाश्चोक्ताः सकर्तृकत्वे ।
न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । ‘सोऽकामयत’ (तै. २.११) इत्यादेश्च । ‘इष्टं हुतम्’ (बृ. ६.१.२) इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च । महातात्पर्यविरोधाच्च । तच्चोक्तं पुरस्तात् (गी.भा. २.२४)। न ह्यस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम् । अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति । यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि , अभिमानिदेवताविषयाणि च । ‘नित्या’ इत्युक्त्वा ‘उत्सृष्टा’ इति वचनात् । अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्ति । ‘कृत्स्नं शतपथं चक्रे’ (मोक्षधर्मे) इति । कथमादित्यस्था वेदाः तेनैव क्रियन्ते ? वचनमात्राच्च निर्णयात्मक-शारीरकोक्तं बलवत् ।
शास्त्रं योनिः प्रमाणमस्येति तु शास्त्रयोनित्वम् । ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्ते प्रमाणं हि तत्रापेक्षितं, न तु तस्य जातत्वं वेदकारणत्वं वा । न हि वेदकारणत्वं जगत्कारणत्वे हेतुः । न हि विचित्रजगत्सृष्टेर्वेदसृष्टिरशक्या सृज्यत्वे । न च सर्वज्ञत्वे । यदि वेदस्रष्टा सर्वज्ञः किमिति न जगत्स्रष्टा ? तस्माद् वेदप्रमाणकत्वमेवात्र विवक्षितम् । अतो नित्यान्यक्षराणि । यत एवं परम्परया यज्ञाभिव्यङ्ग्यं ब्रह्म तस्मात् तद् नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥


तानि चाक्षराणि भूताभिव्यङ्ग्यानीति चक्रम् । तदेतत् जगच्चक्रं यो नानुवर्तयति, स तद्विनाशकत्वाद् अघायुः । पापनिमित्तमेव यस्याऽयुः सोऽघायुः ॥ १६ ॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥


तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च ।
महच्च तत् सुखम् । तेनैवान्यत्रालम्बुद्धिरिति दर्शयति । आत्मन्येव च सन्तुष्टः, इति तत्स्थ एव सन् सन्तुष्ट इत्यर्थः । नान्यत् किमपि सन्तोषकारणम् इत्यवधारणम् । आत्मना तृप्तः । न ह्यात्मन्यलम्बुद्धिर्युक्ता । तद्वाचित्वं च ‘वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमैः’ (भाग. १.१.१९) इति प्रयोगात् सिद्धम् । अध्याहारस्त्वगतिका गतिः ।
‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते । ‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’ इति वचनाच्च पञ्चरात्रे । अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ ।
अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधावेवैतत् । ‘मानवः’ इति ज्ञानिन एवासम्प्रज्ञातसमाधिर्भवतीति दर्शयति ‘मनु अवबोधने’ इति धातोः । परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता । ‘विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि ।’इति वचनात् ॥ १७ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥


तस्य ‘कर्मकाले वक्तव्योऽहम्’ इति कञ्चित् प्रत्युक्त्वा तत्कृतावात्मरत्यधिकः समो वाऽर्थो नास्ति । न च सन्ध्याद्यकृतौ कश्चिद्दोषोऽस्ति ।
न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ व्यपाश्रयः ।
ज्ञानमात्रेण प्रत्यवायो यद्यपि न भवति । तद् अर्जुनस्यापि समम् इति न तस्य कर्मोपदेशोपयोग्येतद् भवति । ईषत् प्रारब्धानर्थसूचकं च तद् भवति महच्चेद् वृत्रहत्यादिवत् ॥ १८ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥


यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः, तस्मात् कर्म समाचर ॥१९॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥


आचारोऽप्यस्तीत्याह- कर्मणैवेति ॥ कर्मणा सह कर्म कुवन्त एवेत्यर्थः । कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा ।
न तु ज्ञानं विना । प्रसिद्धं हि तेषां ज्ञानित्वं भारतादिषु । ‘तमेवं विद्वान्’ (तै.आ. ३.१२) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । अत्रापि कर्मणां ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च ‘बुद्धियुक्ताः’ (२.५१) इति ।
गत्यन्तरं च ‘नान्यः पन्थाः’ (तै.आ.३.१२) इत्यस्य नास्ति । इतरेषां ज्ञानद्वाराऽप्यविरोधः । यत्र च तीर्थाद्येव मुक्तिसाधनमुच्यते- ‘ब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा । अथवा स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ ॥’ इत्यादौ, तत्र पापादिमुक्तिः, स्तुतिपरता च ।
तत्रापि हि कुत्रचिद् ब्रह्मज्ञानसाधनत्वमेवोच्यतेऽन्यथा मुक्तिं निषिध्य - ‘ब्रह्मज्ञानं विना मुक्तिर्न कथञ्चिदपीष्यते । प्रयागादेस्तु या मुक्तिर्ज्ञानोपायत्वमेव हि ॥’ इत्यादौ । न च तीर्थस्तुतिवाक्यानि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तं ज्ञाननियमं घ्नन्ति । यथा कञ्चिद् दक्षं भृत्यं प्रति उक्तानि ‘अयमेव हि राजा किं राज्ञा’ इत्यादीनि । यथाऽऽह भगवान् - ‘यानि तीर्थादिवाक्यानि कर्मादिविषयाणि च । स्तावकान्येव तानि स्युरज्ञानां मोहकानि वा । भवेन्मोक्षस्तु मद्दृष्टेर्नान्यतस्तु कथञ्चन ॥’ इति नारदीये । अतोऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्षः । कर्म तु तत्साधनमेव ॥ २० ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥


स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते , यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥


यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥


उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥


सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥


न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥


प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥


विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥


कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित् । गुणा इन्द्रियादीनि । गुणेषु विषयेषु ॥ २८ ॥
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥


प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । ‘शब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च । अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः ॥’ इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥


अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥


ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥


फलमाह- ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते । ‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥


एवं चेत् किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह - सदृशमिति । प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः ॥ ३३ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥


तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- इन्द्रियस्येति ॥ तथा ह्युक्तम् - ‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥


तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- श्रेयानिति ॥ ३५ ॥
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥


अर्जुन उवाच

बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति- अथेति ॥ अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥


श्रीभगवानुवाच

यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः । क्रोधो ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति । महाशनः । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् महापाप्मा । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥


कथं विरोधी सः ? इदमनेनावृतम् । यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाश-रूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा । यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति, तथाऽन्तःकरणं परमात्मा-देर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम् । यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भस्तथा कामेन जीवः ॥ ३८ ॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥


शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा । दुष्पूरेण दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती अनलः । उक्तं च- ‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥


वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥


हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति ॥ ४१ ॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥


एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोध्यायः ॥
शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह- इन्द्रियाणीति ॥ ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । शरीराद् इन्द्रियाणि पराणि उत्कृष्टानि । न केवलं बुद्धेः परः । श्रुत्युक्त-प्रकारेणाव्यक्तादपि । ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति हि श्रुतिः । न च तत्रतत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः । सार्वत्रिक-गुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितः । ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’ (ब्र.सू. ३-३-१२) इत्यादिना । तथा चान्यत्र- ‘अपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि । सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये ॥ सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम् । तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति गारुडे । तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः । न चात्र जीव उच्यते । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’(२.५९) इत्युक्तत्वात् । ‘अविहाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः’ इति च । अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम् । आत्मानं मनः । आत्मना बुध्या ॥ ४२-४३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः

बुद्धेः परस्य माहात्म्यम्, कर्मभेदः, ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन् अध्याये ।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥


श्रीभगवानुवाच

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥


स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥


पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - इममिति ॥ १-३ ॥
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥


अर्जुन उवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥


श्रीभगवानुवाच

‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - अपरमिति ॥ ४-५ ॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥


न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह - अजोऽपीति ॥ अव्यय आत्मा= देहोऽपीति अव्ययात्मा । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । ‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५) इति च । ‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१) इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् ।
कथमनादिनित्यस्य जनिः? प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह - स्वामिति ॥ ‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४) इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । आत्ममायया आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । ‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’ इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– ‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता । विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि । जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति । ईश्वरः ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्- ‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् । वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । ‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च ॥ ६,७ ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥


न जन्मनैव परित्राणादिकं कार्यमिति नियमः । तथाऽपि लीलया स्वभावेन च यथेष्टचारी । तथाह्युक्तम्– ‘देवस्यैष स्वभावोऽयम्’। ‘लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्’ । ‘क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय’ ।(विष्णुपुराण.१.२.१८) ‘.....अरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद् यदनन्तवीर्यः’ (भाग.३.२.१६)। ‘पूर्णोऽयमस्यात्र न किञ्चिदाप्यं तथाऽपि सर्वाः कुरुते प्रवृत्तीः । अतो विरुद्धेषुमिमं वदन्ति परावरज्ञा मुनयः प्रशान्ताः ॥’ इत्याद्यृग्वेदखिलेषु॥ ८ ॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥


पृथङ् मुक्त्युक्तिः सर्वज्ञाननियमदर्शनार्थम् ; न तु तावन्मात्रेण मुक्तिरित्युक्तम् । ‘वेदाद्युक्तं तु सर्वं यो ज्ञात्वोपास्ते सदा हि माम् । तस्यैव दर्शनपथं यामि नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इत्युक्तेश्च महाकौर्मे । अत्रोक्तस्यैतज्ज्ञात्वैव जन्म नैतीति गतिः । इतरवाक्यानां नान्या गतिः । ‘नान्यस्य कस्यचित्’ इति विशेषणात् । ‘तत्त्वतः’ इति विशेषणाच्च सर्वज्ञानमापतति । यत्रैवं भवति यत्र तत्त्वत इति विशेषणे न विरोधः । उक्तं च– ‘एकं च तत्त्वतो ज्ञातुं विना सर्वज्ञतां नरः । न समर्थो महेन्द्रोऽपि तस्मात् सर्वत्र जिज्ञसेत्’ ॥ इति स्कान्दे ॥९ ॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥


सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह– वीतरागेति ॥ मन्मयाः मत्प्रचुराः । सर्वत्र मां विना न किञ्चित् पश्यन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥


न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह - ये यथेति ॥ भजामि सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह - मम वर्त्मेति ॥ अन्यदेवता यजन्तोऽपि मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम ।
‘योऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३) इति हि वक्ष्यति । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व,६ अनु) इति हि श्रुतिः । स भगवानेव च तत्राभिधीयते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व) इत्यादि तल्लिङ्गात् ॥ ११ ॥
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥


कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? क्षिप्रं हि ॥ अत एव हि फलप्राप्तिः । ‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९) इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥


अहमेव हि कर्तेत्याह - चातुर्वर्ण्यमिति ॥ चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– ‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू) इत्यादि । ‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६) इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥


अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - न मे कर्मफले स्पृहा ॥ इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– ‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः । नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’ इति । न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- ‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’ इति, ‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’ इति ॥ १४ ॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥


एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह - एवमिति ॥ पूर्वतरं कर्म पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥


कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - किं कर्मेति ॥ १६ ॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥


न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह - कर्मण इति ॥ तच्चोक्तम्– ‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् । दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’ इति । अकर्म कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् विकर्म । निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह - गहनेति ॥ १७ ॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥


कर्मादिस्वरूपमाह - कर्मणीति ॥ कर्मणि क्रियमाणे सति अकर्म यः पश्येत् - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । अकर्मणि सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । स बुद्धिमान् ज्ञानी । स एव च युक्तो योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥


एतदेव प्रपञ्चयति - यस्य इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् ॥ १९ ॥
त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥


न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । आसङ्गं स्नेहं च त्यक्त्वा । ज्ञानस्वरूपमाह पुनः - नित्यतृप्त इति ॥ नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः ॥ २० ॥
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥


कामादित्यागोपायमाह - निराशीरिति ॥ यतचित्तात्मा भूत्वा निराशीः इत्यर्थः । आत्मा मनः । परिग्रहत्यागः अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥ २१॥
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥


यतचित्तात्मनो लक्षणमाह - यदृच्छालाभेति ॥ कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह - समः सिद्धाविति ॥ २२ ॥
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥


उपसंहरति- गतसङ्गस्येति ॥ गतसङ्गस्य फलस्नेहरहितस्य । मुक्तस्य शरीराद्यनभिमानिनः । ज्ञानावस्थितचेतसः परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥


ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति - ब्रह्मार्पणमिति ॥ सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- ‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति । वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति पाद्मे । ‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३) इति च । ‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७) इत्यादि च । समाधिना सह ब्रह्मैव कर्म ॥२४ ॥
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥


श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥


यज्ञभेदानाह - दैवमित्यादिना ॥ दैवं भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । यज्ञं भगवन्तम् । ‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं) , ‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- ‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.) इत्यादौ । उक्तं च- ‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’ इति ॥ २५,२६ ॥
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥


आत्मसंयमाख्योपायाग्नौ ॥ २७ ॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥


द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥
अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥


अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥
अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥


यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥


नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात् प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । ‘यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञः’(काठ.१.७.१३) इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा । अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्- ‘यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः’ इति ॥ ३०, ३१ ॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥


ब्रह्मणः परमात्मनो मुखे । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । एवं ज्ञात्वा तानि कर्माणि कृत्वा विमोक्ष्यसे । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥
श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥


अखिलम् उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥


इदानीमपि ज्ञान्येव । तथाऽप्यभिभवान्मोहः । मा तूक्ता ॥ ३४॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥


येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि अथो तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥


करणभूतं ज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण ॥ ३६॥
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥


न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽत्मनि विन्दति॥३८ ॥


श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः ।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥


तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति-
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥


योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥


तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥


॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥

पञ्चमोऽध्यायः

तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’(४.२२) इत्यादि संन्यासम् , ‘कुरु कर्मैव’(४.१५) इत्यादि कर्मयोगं च।

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥


अर्जुन उवाच

नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- ‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् । अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः श्रेयः अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥


श्री भगवानुवाच

नायं संन्यासो यत्याश्रमः । ‘द्वन्द्वत्यागात्तु संन्यासान्मत्पूजैव गरीयसी ॥’ इति वचनात् । ‘तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्’(म.ना.उ.१६.१२) । इति च । ‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः । न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥ तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः । मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते । यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’ इति नारदीये । ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । ‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१) इति च । ‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) । येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’ इत्यादेश्च ब्राह्मे । अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥


संन्यासशब्दार्थमाह - ज्ञेय इति ॥ संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - ज्ञेय इति ॥ ३ ॥
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥


संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - साङ्ख्ययोगाविति ॥ उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.) , ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥
यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥


‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - यत् साङ्ख्यैरिति ॥ योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥


इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥


एतदेव प्रपञ्चयति - योगयुक्त इति ॥ सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा ॥ ७ ॥
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥


संन्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन ॥ ८, ९ ॥
प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥


ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥


संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- ब्रह्मणीति ॥ साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥


एवं चाऽचार इत्याह - कायेनेति ॥ ११ ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥


पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - युक्त इति ॥ युक्तो योगयुक्तः॥ १२ ॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥


पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - सर्वकर्माणीति ॥ ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥


नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥


न च करोति वस्तुत इत्याह - न कर्तृत्वमिति ॥ प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥


ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - ज्ञानेनेति ॥ प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥
तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥


अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - तद्बुद्धय इति ॥ १७ ॥
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥


परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - विद्येति ॥ १८ ॥
इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥


तदेव स्तौति - इहैवेति ॥ १९ ॥
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥


संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण- ॥ २० ॥
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥


पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - बाह्यस्पर्शेष्विति ॥ कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत् तदेव अक्षयं सुखं विन्दति । ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥


संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - ये हीति ॥ २२ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥


तत्परित्यागं प्रशंसयति - शक्नोतीति ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्, यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥


ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-
आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् । आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’ इति नारदीये । ‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च । अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - ब्रह्मणि भूत इति ॥ २४ ॥
लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥


पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - लभन्त इति ॥ क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’ इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥


सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - कामक्रोधेति ॥ अभितः सर्वतः ॥ २६ ॥
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥


यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥


ध्यानप्रकारमाह - स्पर्शानित्यादिना ॥ बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च - ‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’ । इति । प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
ध्येयमाह - भोक्तारमिति ॥ २९ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥

षष्ठोऽध्यायः

ज्ञानान्तरङ्गं समाधियोगमाहानेनाऽध्यायेन ।

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥


श्री भगवानुवाच

विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - अनाश्रित इति ॥ चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न भवत्येव ॥१ ॥
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥


संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - यं संन्यासमिति ॥ कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥


कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥ योगमारुरुक्षोः उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । योगारूढस्य सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । कारणं परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्- ‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥


योगारूढस्य लक्षणमाह - यदेति ॥ सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च - ‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥


स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥


कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- बन्धुरात्मेति ॥ आत्मा मनः । आत्मनः जीवस्य । आत्मना मनसा । आत्मानं जीवम् । आत्मैव मनः । आत्मना बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३) , ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् । जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य । ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । अनात्मनः अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥


ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥


जितात्मनः फलमाह - जितात्मन इति ॥ जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि आहितः सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - शीतोष्णेत्यादिना ॥ शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । विज्ञानं विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः । देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । कूटस्थः निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । योगी योगं कुर्वन् । युक्तः योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥


स एव च सर्वस्माद् विशिष्यते, साधुपापादिषु समबुद्धिः । जीवचितः परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण । चिद्रूपा एव हि जीवाः । विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः । सर्वेषां च साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव, स्वतो न किञ्चिदपि । उक्तं चैतत् सर्वम्- ‘स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः । जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः ॥ सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित् स्वत एव तु । समा एव ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम् ॥ एवं समा नृजीवास्तु विशेषो देवतादिषु । स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनः (नियमाद्धरेरेव सदा(ना)तनः) ॥ असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि । गुणदोषौ मनुष्याणां (मानुषाणां) नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ । गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः ॥’ इति ब्राह्मे ।
न तु साधुपापादीनां पूजासाम्यम् । तत्र दोषस्मृतेः । ‘समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । क्रियते येन देवोऽपि स पदाद् भ्रश्यते पुमान् ॥’ इति ब्राह्मे (पाद्मे) । ‘वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीयो (यद्यदुत्तरम्) ह्युत्तरोत्तरम् ॥(म.स्मृ.२.१३६) इति मानवे(वामने) । ‘गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति । वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात् । पूजा या विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः अन्यूनाधिका या साऽपि समा। तदप्याह- ‘यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च । तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते ॥’ इति गारुडे ।
प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् सुहृत् । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम् । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः(स्थः) । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) द्वेष्यः । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः । प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति । स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् । यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥


शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥


समाधियोगप्रकारमाह - योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥ युञ्जीत समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । आत्मानं मनः ॥ १०-११ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥


समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥


प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥


योगं समाधियोगं युञ्ज्यात् ॥ १२-१४ ॥
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥


निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥


अनशनादिनिषेधोऽशक्तस्य । उक्तं हि- ‘निद्राशनभयश्वासचेष्टातन्द्रा(न्द्र्या)दिवर्जनम् । कृत्वाऽऽनिमीलिताक्षस्तु शक्तो ध्यायन् (प्रसिध्यति) प्रसीदति॥’ इति नारदीये ॥ १६ ॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥


युक्ताहारविहारस्य सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥


आत्मनि भगवति ॥ १८ ॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥


आत्मनो योगं भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥


आत्मना मनसा । आत्मनि देहे । आत्मानं भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥


तत्त्वतो भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥


तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥


दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स दुःखसंयोगवियोगः । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । निश्चयेन योक्तव्यः योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥
संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥


सर्वान् सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥


बुद्धेः (क)कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च ॥ २५ ॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥


यतो यतः यत्र यत्र । ‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥


एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥


पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - एवं युञ्जन्निति ॥ २८ ॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥


ध्येयमाह - सर्वभूतस्थमिति ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं परमेश्वरम् । सर्वभूतानि चाऽत्मनि परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति । ‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥


फलमाह - यो मामिति॥ तस्याहं न प्रणश्यामीति॥ सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । स च मे न प्रणश्यति सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च- ‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति । अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥


एतदेव स्पष्टयति - सर्वभूतस्थितमिति ॥ एकत्वमास्थितः सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् । प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति । आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् । बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥


साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - आत्मौपम्येनेति ॥ ३२ ॥
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥


अर्जुन उवाच

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥


असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥


श्रीभगवानुवाच

एतस्य योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च - ‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥
असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥


न च कदाचित् स्वयमेव मनो नियम्यते । ‘शुभेच्छारहितानां च द्वेषिणां च रमापतौ । नास्तिकानां च वै पुंसां सदा मुक्तिर्न जायते ॥’ इति निषेधाद् ब्राह्मे॥३६ ॥
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥


अर्जुन उवाच

अयतिः अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥


एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥


पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥


श्रीभगवानुवाच

प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥


अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥


तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥


पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥


योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । शब्दब्रह्मातिवर्तते परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥


नैकजन्मनीत्याह - प्रयत्नादिति ॥ जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः । ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् । विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥
तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥


योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे समाधियोगप्रपञ्चनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
ज्ञानिभ्यः योगज्ञानिभ्यः । तपस्विभ्यः कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च- ‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते । तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः । ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे । ‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते । ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् । दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये षष्ठोऽध्यायः ॥

सप्तमोऽध्यायः

साधनं प्राधान्येनोक्तम् अतीतैरध्यायैः । उत्तरैस्तु षड्भिः भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह-

भगवन्महिमा विशेषत उच्यते ।

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥


श्रीभगवानुवाच

आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥


इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥


दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह - मनुष्याणामिति ॥ ३ ॥
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥


प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ महतो हङ्कार एवान्तर्भावः । ॥४ ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥


अपरा अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । ‘एतन्महद्भूतम्’ इति श्रुतेः । जगाद च- ‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा । अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः । महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि । अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया । चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा । यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः । नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि । ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इति नारदीये ॥५॥
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥


न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह - अहमिति ॥ प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः- ‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९) इति । आह च - ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता । यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः । सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः । आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु । तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’ ॥ इति नारदीये ॥६॥
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥


अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । ( इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥


पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥


बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥


बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥


इदं ज्ञानम्। ‘रसोऽहम्’ इति (इत्यादि)विज्ञानम् । अबादयोऽपि तत एव । तथाऽपि रसादिस्वभावानां साराणां (रसानां) च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियामकः । न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिः तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति ‘अप्सु रसः’ इत्यादिविशेषशब्दैः । भोगश्च विशेषतो रसादेरिति, उपासनार्थं च । उक्तं गीताकल्पे- ‘रसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च । सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम् । सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः । रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः । अबादयः पार्षदा एव ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः । रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः ॥’ इति । ‘स्वभावो जीव एव च’(भाग.१.१०.१२), ‘सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्(किमतः परम्)।’ , ‘न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम्’(१०.३९) । इति च । ‘धर्माविरुद्धः’, ‘कामरागविवर्जितम्’ इत्याद्युपासनार्थम् । उक्तं च गीताकल्पे- ‘धर्माविरुद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता । विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता । ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति सः ॥’ इत्यादि ।
‘पुण्यो गन्धः’ इति भोगापेक्षया च । तथाहि श्रुतिः - ‘पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) , ‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके’(कठ.१.७.१) इत्यादिका । ऋतं च पुण्यम्- ‘ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते’ इत्यभिधानात् । ‘ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात् सम्प्रयोगगः’ इति च । न च ‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(आथ.३.१.१) , ‘अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्’(भाग.११.११.६) इत्यादिविरोधः । स्थूलानशनोक्तेः । आह च सूक्ष्माशनम्- ‘प्रविविक्ताऽहारतर इवैष भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः’(बृ.६.२.३) इति । न चात्र जीव उच्यते । ‘शारीरादात्मनः’ इति भेदाभिधानात् । स्वप्नादिश्च शारीर एव - ‘शारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः’ इति वचनाद् गारुडे । ‘अस्मात्’ इतीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्- ‘शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः । अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः ॥’ इति वचनान्नारदीये । भेदश्रुतेश्च । सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यः, न त्ववस्थाभेदः । आह च - ‘प्रविविक्तभुग् यतो ह्यस्माच्छारीरात् पुरुषोत्तमः । अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात् स एव तु ॥’ इति गीताकल्पे ॥ ८-१० ॥
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥


‘न त्वहं तेषु’ इति तदनाधारत्वमुच्यते । उक्तं च- ‘तदाश्रितं जगत् सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः’ । इति गीताकल्पे ॥ १२ ॥
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥


तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह - त्रिभिरिति ॥ तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- ‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’। इति । नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- ‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ । इति व्यासयोगे । भावैः पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- एभिरिति
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥


कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- दैवीति ॥ अयमाशयः - माया हि एषा मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- ‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी । तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः । अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि । तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’ इति व्यासयोगे । तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- मामेवेति ॥ अन्यत् सर्वं परित्यज्य मामेव ये प्रपद्यन्ते , गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये- ‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः । मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’ इति । ‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६) । इति च ॥१४ ॥
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥


चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥


तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव नराधमाः । अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः । अत एव आसुरं भावमाश्रिताः । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे- ‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’। इति । असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- ‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ । । इति ॥ १५, १६ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥


उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥


एकस्मिन्नेव भक्तिरित्येकभक्तिः । तच्चोक्तं गारुडे- ‘मय्येव भक्तिर्नान्यत्र एकभक्तिः स उच्यते।’ इति ॥ १७, १८ ॥
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥


बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- ‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’। इति ॥ १९ ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥


प्रकृत्या स्वभावेन,- ‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’। इत्यभिधानात् ॥ २० ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥


स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥


अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥


यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये- ‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’। इति । ‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३) इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु । ‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ । इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥


को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह - व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- ‘सदसतः परम्’ , ‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’ , ‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९) , ‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’ इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्- ‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’ । इति ॥ २४ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥


अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे- ‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् । स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’ इति ॥२५ ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥


न च मां माया बध्नातीत्याह - वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥


द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥


विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥


साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥
‘जरामरणमोक्षाय’ इत्यन्यकामनिवृत्त्यर्थम् । मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थं वा । न विधिः । ‘मुमुक्षोरमुमुक्षुस्तु वरो ह्येकान्तभक्तिभाक्’ । इतीतरस्तुतेः नारदीये । ‘नात्यन्तिकम्’(भाग.३.१६.४८) इति च । ‘देवानां गुणलिङ्गानाम् आनुश्राविककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या । अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥’(भाग.३.२६.३२-३३) इति भागवते लक्षणाच्च । आह च- ‘सर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः । नारायणस्तु मोक्षार्थे मोक्षो नान्यार्थ इष्यते । एवं मध्यमभक्तानाम् एकान्तानां न कस्यचित् । अर्थे नारायणो देवस्त्वन्यत् सर्वं तदर्थकम् ॥’ इति गीताकल्पे । त एव च विदुः । ‘यमेवैष वृणुते’(आथ.४.१.३) इति श्रुतेः ॥ २९, ३० ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये सप्तमोध्यायः ॥

अष्टमोऽध्यायः

मरणकालकर्तव्य-गत्याद्यस्मिन्नध्याये उपदिशति-

उक्तव्याख्यानपूर्वकं ब्रह्मप्राप्तिरुच्यते ।

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥


अर्जुन उवाच

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥


अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥


श्रीभगवानुवाच

परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥


भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् अधिभूतम् । क्षरो भावः विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- ‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’ इति । ‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’ इति च । ‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’ इति च स्कान्दे । पुरि शयनात् पुरुषो जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)।
सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः अधियज्ञः । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् । ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९) इत्यादेः । ‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२) इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण अधियज्ञः ।
‘अत्र’ इति स्वदेहनिवृत्त्यर्थम् । न हि तत्रेश्वरस्य नियन्तृत्वं पृथगस्ति । नात्रोक्तं ब्रह्म भगवतोऽन्यत् । ‘ते ब्रह्म’(७.२९) इत्युक्त्वा ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः’(७.३०) इति परामर्शात् । तस्यैव च प्रश्नात् । ‘साधियज्ञम्’ इति भेदप्रतीतेः तन्निवृत्त्यर्थम् ‘अधियज्ञोऽहम्’ इत्युक्तम् । ‘माम्’ इत्यभेदप्रतीतेः ‘अक्षरम्’ इत्येवोक्तम् । आह च गीताकल्पे- ‘देहस्थविष्णुरूपाणि अधियज्ञ इतीरितः । कर्मेश्वरस्य सृष्ट्याख्यं तच्चापीच्छाद्यमुच्यते । अधिभूतं जडं प्रोक्तमध्यात्मं जीव उच्यते । हिरण्यगर्भोऽधिदैवं देवः सङ्कर्षणोऽपि वा । ब्रह्म नारायणो देवः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥’ इति । ‘यथाप्रतीतं वा सर्वमत्र वै न विरुध्यते ॥’ इति च । स्कान्दे च - ‘आत्माभिमानाधिकारस्थितमध्यात्ममुच्यते । देहाद् बाह्यं विनाऽतीव बाह्यत्वादधिदैवतम् । देवाधिकारगं सर्वं महाभूताधिकारगम् । तत्कारणं तथा कार्यमधिभूतं तदन्तिकात्’॥ इति । महाकौर्मे च - ‘अध्यात्मं देहपर्यन्तं केवलात्मोपकारकम् । ‘सदेहजीवभूतानि यत् तेषामुपकारकृत् । अधिभूतं तु मायान्तं देवानामधिदैवतम् ॥’ इति ॥४ ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥


मद्भावं मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्- ‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२) इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥
यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥


तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥


स्मरन् त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का । ‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ । इति स्कान्दे । ‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः । ‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥


सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति - अभ्यासेति ॥ अभ्यास एव योगो अभ्यासयोगः । दिव्यं पुरुषं पुरिशयं पूर्णं च । ‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८) इति श्रुतेः । दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । ‘दिवु = क्रीडा-.......’ इति धातोः ॥८ ॥
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥


ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०) इति श्रुतिः । ‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’ इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोः । ‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४) इति च श्रुतिः । ‘ब्रह्मा स्थाणुः’ इत्यारभ्य ‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९) इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’ इति पिप्पलादशाखायाम् । ‘मृत्युर्वा व तमः’ , मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९) इति श्रुतेः ॥९ ॥
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥


वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - प्रयाणकाल इति ॥ वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- ‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये । वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५) इति ॥ ‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः । नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् । वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’ इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥


तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति - यदक्षरमित्यादिना ॥ प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति पदं स्वरूपम् । ‘पद= गतौ’ इति धातोः । ‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७) इति श्रुतेश्च । ‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’ इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥


ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति सर्वद्वाराणि संयम्य । ‘निर्गच्छन् चक्षुषा सूर्यं दिशः श्रोत्रेण चैव हि’ इत्यादिवचनात् व्यासयोगे, मोक्षधर्मे च । हृदि नारायणे । ‘ह्रियते त्वया जगद् यस्माद्धृदित्येव प्रभाष्यसे’ इति हि पाद्मे । न हि मूर्ध्नि प्राणे (प्राणस्थितेः) हृदि मनसः स्थितिः सम्भवति । ‘यत्र प्राणो मनस्तत्र तत्र जीवः परस्तथा।’ इति व्यासयोगे । योगधारणामास्थितः योगभरण एवाभियुक्त इत्यर्थः ॥ १२, १३ ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥


नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥


तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥
आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥


महामेरुस्थब्रह्मसदनमारभ्य न पुनरावृत्तिः । तच्चोक्तं नारायणगोपालकल्पे- ‘आ मेरुब्रह्मसदनाद् आजनान्न जनिर्भुवि । तथाऽप्यभावः सर्वत्र प्राप्यैव वसुदेवजम् ॥’ इति ॥१६ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥


अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥


भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥


परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥


‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - सहस्रयुगेत्यादिना ॥ सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । ‘सा विश्वरूपस्य रजनी’ इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- ‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा । रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’ इति । ‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥


अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । ‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’ इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् । ‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’ इत्यभिधानात्॥ २१ ॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥


परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥


यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥


धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥


शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥


ज्योतिः अर्चिः । ‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१) इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- ‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’ इति । अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा ‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति युज्येत । ‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’ इति च ब्राह्मे । मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- ‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’ इति । तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- ‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा । सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’ इति ॥ २४-२६ ॥
नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥


वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥
एते सृती सोपाये ज्ञात्वाऽनुष्ठाय न मुह्यति । तच्चाह स्कान्दे- ‘सृती ज्ञात्वा तु सोपाये अनुष्ठाय च साधनम् । न कश्चित् मोहमाप्नोति न चान्या तत्र वै गतिः ॥’ इति ॥ २७-२८ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये अष्टमोऽध्यायः ॥

नवमोऽध्यायः

सप्तमाध्यायोक्तं स्पष्टयत्यस्मिन्नध्याये-

सप्तमोक्तं प्रपञ्चयति ।

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥


श्रीभगवानुवाच

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥


अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥


राजविद्या प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् प्रत्यक्षावगमम् । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- ‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) । ‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८) इत्यादेः । ‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१) इति च । ‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५) इति च । ‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४) इत्यादेश्च मोक्षधर्मे । ‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’ इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् । धर्मो=भगवान्, तद्विषयं धर्म्यम् । सर्वं जगद् धत्त इति धर्मः । ‘पृथिवी (धरणी) धर्ममूर्धनि’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१२) इति प्रयोगान्मोक्षधर्मे । ‘भारभृत् कथितो योगी’ इति च । ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति’(तै.आ.३.१४) इति च श्रुतिः । ‘धर्मो वा इदमग्र आसीन्न पृथिवी न वायुर्नाकाशो न ब्रह्मा न रुद्रो (नेन्द्रो) न देवा न ऋषयः सोऽध्यायत्’ इति च सामवेदे बाभ्रव्यशाखायाम् । ‘प्रत्यक्षावगम’शब्देन अपरोक्षज्ञानसाधनत्वमुक्तम् ॥ १-३ ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥


तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥


मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- न चेति ॥ ‘न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च।’(कुम्भ-म.भा.१२.३४७.२१) इति मोक्षधर्मे । ‘सञ्ज्ञासञ्ज्ञ’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति च । ममाऽत्मा देह एव भूतभावनः । ‘महाविभूते माहात्म्यशरीर’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति हि मोक्षधर्मे ॥५ ॥
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥


‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥


ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- सर्वभूतानीत्यादिना ॥ ७॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥


प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।’(कुम्भ-म.भा.शां.प.३४७.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे) इति च । ‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) । प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११) इति च । ‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य । तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु । ‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’ इति भागवते । ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’ इति च आथर्वणे । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’ इति च । ‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१) , ‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२) इत्यादेश्च । प्रकृतेर्वशादवशम् । ‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव । मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’ इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥
न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥


उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- असक्तमिति ॥ ‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२) इति (हि) श्रुतिः । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते । यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’ इति श्रुतिः। यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥


उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- ‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४) इति ॥१० ॥
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥


तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह - अवजानन्तीत्यादिना ॥ मानुषीं तनुं मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- ‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते । सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च । भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३) इति । अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः । ‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः । वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७) इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति भूतमहेश्वरम् । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’ इति । ‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०) इति च । ‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४) इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥


तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च - ‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् । मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः । यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) । कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) इति । ‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये । सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् ।
‘द्वेषाच्चेद्यादयो नृपाः’(भाग.७.१.३२) , ‘वैरेण यन्नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रसाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९) इत्यादि तु भगवतो भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थम्, (नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च ।) स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलाद् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान् ददातीति ।
भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च ‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७) इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- ‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६) इति । ‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६) इत्यारभ्य ‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८) इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- ‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४) इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह- राक्षसीमिति ॥ १२ ॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥


सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥


नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥


सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् । ‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६) इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥


प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । ‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’ इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥


गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥


गम्यते मुमुक्षुभिरिति गतिः । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- ‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’ इति । साक्षादीक्षत इति साक्षी । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- ‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’ इति । शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । ‘परमं यः परायणम्’ इति ह्युक्तम् । ‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ इति च । संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति निधानम् । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’ इति ॥१८ ॥
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥


सत् कार्यम् । असत् कारणम् । ‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः । असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’ ॥ इति ह्यभिधानम् । ‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३) इति च भारते ॥१९ ॥
त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाःयज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।


ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।


तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥


अनन्याः अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् । ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’ इति । ‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः । शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’ ॥ इति मोक्षधर्मे । नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥


तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥


कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥


फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥


दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - पत्रमिति ॥ न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः । ‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते ‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः । एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥


शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥


अतो यत् करोषि ॥ २७, २८ ॥
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥


तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- ‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’ इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’ इति ॥ २९ ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥


न भवत्येव प्रायशस्तद्भक्तो सुदुराचारः । तथाऽपि बहुपुण्येन यदि कथञ्चित् भवति तर्हि साधुरेव स मन्तव्यः ॥ ३० ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥


मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥


किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥


मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज्यगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥
कुतः ? क्षिप्रं भवति धर्मात्मा । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्- ‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः । सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः । देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’ इति । अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् । ‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’। इति हि श्रीविष्णुपुराणे । ‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’ इति च । ‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् । पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् । गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् । तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् । एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’ इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’ इति । ‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२) इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये नवमोऽध्यायः ॥

दशमोऽध्यायः

उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-

श्री भगवानुवाच

भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥


प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥


प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) इति । ‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’ इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥


अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । ॥३ ॥
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥


अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥


तत् प्रथयति- बुद्धिरित्यादिना॥ कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः । ज्ञानं प्रतीतिः । ‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’ इत्यभिधानम् । दमः इन्द्रियनिग्रहः । शमः परमात्मनि निष्ठा- ‘शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः ।’(भाग.११.१९.३५) इति हि भागवते । तुष्टिः अलम्बुद्धिः- ‘अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः’ इत्यभिधानात् ॥ ४-५ ॥
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥


पूर्वे सप्तर्षयः - ‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०) इति मोक्षधर्मोक्ताः । ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । चत्वारः प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति । तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- ‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’ इति । पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् ।
तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते- ‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’ इति । अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते मद्भावाः । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥


अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥


मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥


तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥


तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥


सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥


अर्जुन उवाच

आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥


सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥


स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥


ब्रह्म परिपूर्णम्- ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’ इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति । ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९) इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- ‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’ इति । ‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.) इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥


विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥
कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥


विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥


न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’ इति ॥१८ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥


श्रीभगवानुवाच

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥


आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥


विष्णुः सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः । ‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति । ‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत । व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम । अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३) इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥


रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥


पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥


महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥


अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥


सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । ‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’ इत्याद्यभिधानात् । ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५) इति च । ‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् । सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥


आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥


अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥


प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥


पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥


आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । ‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥


अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥


मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥


बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥


द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥


वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥


आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति वासुः । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)। ‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१) इति मोक्षधर्मे । विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति व्यासः । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- ‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’ इति । ‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा । अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’ इति च ॥३७ ॥
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥


यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥


नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥


मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । ‘विश्वरूपः अनन्तगतेः अनन्तभागः अनन्तगः अनन्तः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इत्यादि हि मोक्षधर्मे ॥ ३९,४० ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥


‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- ‘विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवराजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः । कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’ इति । ‘स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्तु अवंशयुता अन्यजीवाः’ इति च गौतमखिलेषु । ‘ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८) इति च भागवते । ऋष्यादीन् अंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन् स्वरूपत्वेनाह । तु शब्द एवार्थे । अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः । अंशत्वं च तत्राप्यवगतम्- ‘उद्बबर्हात्मनः केशौ’ इति । ‘मृडयन्ति’(भाग१.३.२९) इति बहुवचनं चायुक्तम् । न हि अन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वम् अपरामृश्य तत्क्रिया उच्यमाना दृष्टा कुत्रचित् ॥ ४१ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । ‘अज्ञात्वैनं सर्वविशेषयुक्तं देवं वरं को हि मुच्येत बन्धात्।’ इति च ऋर्ग्वेदखिलेषु । त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति ‘तव’ इति विशेषणम् । अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्च एकत्र किंशब्दः - ‘रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् । तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’ इत्यादौ । प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात् सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य ‘यो मां पश्यति सर्वत्र’(६.३०) इत्यादौ ॥४२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये दशमोऽध्यायः ॥

एकादशोऽध्यायः

यथा श्रुते ध्यानं (कर्तुं) शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते ।

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥


अर्जुन उवाच

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥


एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥


मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥


प्रभुः समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥


श्रीभगवानुवाच

पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥


इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥


न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥


एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥


सञ्जय उवाच

हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्- ‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् । वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥ इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥
अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥


दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥


सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥


सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’ इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥


ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥


पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥


अर्जुन उवाच

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥


‘अनेक’शब्दोऽनन्तवाची । ‘अनन्तबाहुम्’(११.१९) इति वक्ष्यति । ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(१३.१४) इत्यादि च । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥’ इति ऋग्वेदे । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’ इति यजुर्वेदे च । विश्वशब्दश्चानन्तवाची- ‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’ इत्यभिधानात् । ‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’ इति च बाभ्रव्यशाखायाम् । महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् ।
एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणि इत्यनन्तरूपः । अन्यत्र त्वपरिमाण इति । उक्तं ह्युभयमपि ‘परात् परं यन्महतो महान्तम्’, ‘यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम्’(तै.आ.१०.१.१) इति यजुर्वेदे अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति । ‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् । अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’ इत्यादित्यपुराणे । तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) । ‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ । इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः । उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३) इति च । ‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१) इति च भागवते ।
न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ । इति श्रीविष्णुपुराणे । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९) इति च श्रुतिः । अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते । ‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । विश्वरूपः पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥


‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥


अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥


‘शशिसूर्यनेत्रम्’ इत्यपि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्यादिवत् । ‘तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात् तदङ्गेति ऋषिभिः स्तुतास्ते’ । इत्यृग्वेदखिलेषु । ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्योऽजायत’ ।(ऋ.मं.१०.सू.९०.मं.१६) इति च । बहुरूपत्वाद् बह्वङ्गत्वं च तेषां युक्तम् ॥ १८, १९ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥


‘मातापित्रोरन्तरगः स एकरूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः’ । इति वारुणश्रुतेरेकेन रूपेण द्यावापृथिव्योरन्तरं (प्राप्तो) व्याप्तो भवति । ‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’(११.५) इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि । मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ- ‘मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्’,(ऋ.मं.५.सू.४२.मं.१६) ‘मधु द्यौरस्तु नः पिता’(ऋ.मं.१.सू.९०.मं.७) इत्यादिप्रयोगात् । न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम् । नारदस्य तदभावात् । केषाञ्चित् तथा दर्शयति भगवान् । ‘प्रीयन्ति केचित् तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः’ । इति हि वरुणशाखायाम् । न तु तं सर्वे पश्यन्ति अदृष्ट्वाऽपि तन्निरूप्य भये द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति । तथा च गौतमखिलेषु- ‘दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद् बिभ्यतो दृष्टवत् ते । पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात्’॥ इति ।॥२० ॥
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥


रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥


रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥


नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥


दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥


अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥


वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥


यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥


यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥


लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥


आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥


धर्मान्तरज्ञानार्थमेव ‘को भवान्’ इति पृच्छति । यथा कश्चित् किञ्चित् नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति ‘कस्त्वम्’ इति । यदि तमेव न जानाति तर्हि ‘विष्णो’(११.३०) इत्येव सम्बोधनं न स्यात् । ‘त्वमक्षरम्’(११.१८) इत्यादि च ॥ २१-३१ ॥
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥


श्रीभगवानुवाच

कालशब्दो जगद्बन्धन-च्छेदन-ज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची । ‘कल बन्धने’, ‘कल च्छेदने’, ‘कल ज्ञाने’, ‘कल कामधेनुः’ इति (हि) पठन्ति । प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति । ‘नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे । अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः । बद्‍ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं(पशून्) रशनया यथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८१-८२) इति हि मोक्षधर्मे विष्णुना बद्धो बलिर्वक्ति । ‘विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग्रहे’(भाग.११.१५.१५) इति हि भागवते ।
प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा । ‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’(ऋ.मं.१०.सू.१९०.मं.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतन्महद्भूतमनन्तम्’ इति च । ‘प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम’(ऋ.मं.७.सू.१००.मं.३) इति च । न तु वर्धनम् । ‘नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ।’(भाग.११.३.३९) इति हि भागवते । ‘यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च’ इति मोक्षधर्मे । ‘न कर्मणा’(बृ.३.४.२३) इति तु, कर्मणाऽपि न, किमु स्वयमिति । लोकान् समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः । भ्रात्रादींश्च ऋते इति ‘अपि’शब्दः । प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया । सर्वेऽपि (हि) न भविष्यन्ति । अक्षोहिण्यादिभेदेन बहुवचनं च युक्तम् ॥३२ ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥


द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥


एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥


सञ्जय उवाच

‘योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति, तच्छिरो भेत्स्यति’ तत्पितुर्वरात् जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः । सवरा वासवी शक्तिरिति कर्णः ॥३४-३५ ॥
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥


अर्जुन उवाच

यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः । बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् । बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् । अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन । हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥
कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥


कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - कस्मादित्यादिना ॥ पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते- ‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति । तत्परं सदसतः परम् । ‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३) इति च भागवते ।॥३७ ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥


वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥


नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥


सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥


यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥


एकस्त्वमेव कारयिता नान्योऽस्त्यथापि ॥ ४२ ॥
पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥


तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥


अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥


किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥


मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥


श्रीभगवानुवाच

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥


मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥


इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥


सञ्जय उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥


अर्जुन उवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥


श्रीभगवानुवाच

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥


भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥


मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोध्यायः ॥
स्वकं रूपं तु भ्रान्ति(न्त)प्रतीत्या । अन्यथा तदपि स्वकमेव । प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात् ॥ ५० ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये एकादशोऽध्यायः ॥

द्वादशोऽध्यायः

अव्यक्तोपासनाद् भगवदुपासनस्योत्तमत्वं प्रदर्श्य तदुपायं प्रदर्शयत्यस्मिन्नध्याये-

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥


अर्जुन उवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥


श्रीभगवानुवाच

तदुपासनमपि हि मोक्षसाधनं प्रतीयते- ‘श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ’ इति । ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति च । अव्यक्तं च महतः परम्- ‘महतः परमव्यक्तम्’ इत्युक्तपरामर्शोपपत्तेः । ‘उपास्य तां श्रियमव्यक्तसञ्ज्ञां भक्त्या मर्त्यो मुच्यते सर्वबन्धैः’ । इति सामवेदे आग्निवेश्यशाखायाम् ।
महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते । ‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३) इति । ‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । (तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७) इति च । ‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’ इत्यारभ्य ‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् । मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् । अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८) इत्यादि च । ‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२) इति च । इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- एवमिति ॥ एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते ।
अव्यक्तं प्रकृतिः ‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२) इति प्रयोगात् । ‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११) इति च भागवते । अक्षरं च तत् । ‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२) इति श्रुतेः ।
परं तु ब्रह्म न हि भगवतोऽन्यत् । ‘आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे’(भाग.२.२.३४) इति भागवते । रूपं चेदृशं साधितं पुरस्तात्(गी.भा.२.७२) । उपासनं च तथैव कार्यम् । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(तै.आ.३.१२.१,श्वे.उ.३.१४,ऋ.सं.मं.१०.सू.९०.मं.१) इत्यारभ्य ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७,चित्त्युपनिषत्) इति (हि) साभ्यासा । आदित्यवर्णत्वादिश्च न वृथोपचारत्वेनाङ्गीकार्यः । तथा च सामवेदे सौकरायणश्रुतिः- ‘‘स्थाणुर्ह वै प्राजापत्यः स प्रजापतिं पितरमेत्य उवाच- ‘(मुमुक्षुभी राधुभिः) मुमुक्षुभिः साधुभिः पूतपापैः किमु ह वै तारकं तारवाच्यम् । ध्यानं च तस्याप्तरुचेः कथं स्याद् ध्येयश्च कः पुरुषोऽलोमपादः॥’ इति । तं होवाच- ‘एष वै विष्णुस्तारकोऽलोमपादो ध्यानं च तस्याप्तरुचेर्वदामि । सोऽनन्तशीर्षो बहुवर्णः सुवर्णो ध्येयः स वै लोहितादित्यवर्णः ॥ श्यामोऽथ वा हृदये सोऽष्टबाहुः अनन्तवीर्योऽनन्तबलः पुराणः।’ ’’ इति (इत्यादि)। अरूपत्वादेस्तु गतिरुक्ता (पुरस्तात्) । पुरुषभेदश्च प्रश्नादौ प्रतीयते ‘त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’ इत्यादौ ॥१-२ ॥
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥


सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥


भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- ये त्वित्यादिना ॥ अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- ‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९) इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः ‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८) इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ ‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३) इति । ‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’ इत्यारभ्य ‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’ इति । ‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’ इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे- ‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)। असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्। सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६) । इति । ‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५) इति (च) मानवे । ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । ‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’ इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥


कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - क्लेश इति ॥ अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । गतिः मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः । तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते ।
सामवेदे माधुच्छन्दसशाखायां चोक्तम्- ‘भक्ताश्च येऽतीव विष्णावतीव जितेन्द्रियाः सम्यगाचारयुक्ताः । उपासते तां समबुद्धयश्च तेषां देवी दृश्यते नेतरेषाम् । दृष्टा च सा भक्तिमतीव विष्णौ दत्वोपास्तौ सर्वविघ्नान् छिनत्ति । उपास्य तं वासुदेवं विदित्वा ततस्ततः शान्तिमत्यन्तमेति ॥’ इति । उक्तं च सामवेदे आयास्यशाखायाम्- ‘प्रसन्नो भविता देवः सोऽव्यक्तेन सहैव तु । यावता तत्प्रसादो हि तावतैव न संशयः । न तत्प्रसादमात्रेण प्रीयते स महेश्वरः । तस्मिन् प्रीते तु सर्वस्य प्रीतिस्तु भवति ध्रुवम् । यद्यप्युपासनाधिक्यं तथाऽपि गुणदो हि सः । मुक्तिदश्च स एवैको नाव्यक्तादि(दे)स्तु कश्चन ॥’ इति । ‘ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मने(ना) ।’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.२७) इति च मोक्षधर्मे श्रीवचनम् । ‘धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि । प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.३३) इति च । महतः परं तु ब्रह्मैव । तथाहि भगवता सयुक्तिकमभिहितम् । ‘वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि’(ब्र.सू.१.४.५) ‘त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च’(ब्र.सू.१.४.७) इत्यादि । ‘तम्’ इति पुल्लिङ्गाच्चैतत्सिद्धिः । महतः(त्) परत्वं त्वव्यक्तपरस्य भवत्येव । तथा चाग्निवेश्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम्’(काठकेऽपि.१.३.१५) इति । ‘परो हि देवः पुरुहूतो महत्तः’ इति ।
न चाव्यक्त(स्य)रूपं भगवता निषिद्धम् । भारतादौ साधितत्वात् । ‘शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः’(ब्र.सू.१.४.१) इत्यादौ तु साङ्ख्यप्रसिद्धं प्रधानं निषिध्य, वैदिकमव्यक्तमेवोक्तम् । तथा च सौकरायणश्रुतिः - ‘शरीररूपिका साऽशरीरस्य विष्णोः यतः प्रिया सा जगतः प्रसूतिः’ इति । सुव्रतानां क्षिप्रं महदैश्वर्यं ददाति देवी; न देव इति (च) विशेषः । ‘सुवर्णवर्णां पद्मकरां च देवीं सर्वेश्वरीं व्याप्तजडां च बुद्‍ध्वा । सैवेति वै सुव्रतानां तु मासान्महाभूतिं श्रीस्तु दद्यान्न देवः॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु ।॥५ ॥
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥


तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥


मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥


अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥


अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥


अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥


मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- ये त्वित्यादिना ॥ उक्तं च सौकरायणश्रुतौ- ‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’ इति । ‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः । अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४) इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥


अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्- ‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः । ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’ इति । ध्यानात् कर्मफलत्यागः इति तु स्तुतिः । अन्यथा कथम् ‘असमर्थोऽसि’(१२.१०) इत्युच्यते । ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’(५.२) इति चोक्तम् । ‘सर्वाधिकं (ज्ञानं)ध्यानमुदाहरन्ति ध्यानाधिके ज्ञानभक्ती परात्मन् । कर्माफलाकाङ्क्षमथो विरागः त्यागश्च न ध्यानकलाफलार्हः ॥’ इति च काषायणशाखायाम् । वाक्यसाम्येऽप्यसमर्थविषयत्वोक्तेः तात्पर्याभाव इतरत्र प्रतीयते । ध्यानादिप्राप्तिकारणत्वाच्च(कारणेन) त्यागस्तुतिर्युक्ता । (केवलाद्) केवलध्यानात् फलत्यागयुक्तं ध्यानमधिकम् । ध्यानयुक्तत्याग एव चात्रोक्तः । अन्यथा कथम्- ‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ इत्युच्येत ? कथं च ध्यानादाधिक्यम् ? तथा च गौपवनशाखायाम्- ‘ध्यानात्तु केवलात् त्यागयुक्तं तदधिकं भवेत्॥’ इति । न हि त्यागमात्रानन्तरमेव मुक्तिर्भवति । भवति च ध्यानयुक्तात् । केवलत्यागस्तुतिरेवमपि भवति । यथा ‘अनेन युक्तो जेता, नान्यथा’ इत्युक्ते ॥१२ ॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥


सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥


यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥


अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥


समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥


तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥


‘सर्वारम्भपरित्यागी’ (‘शुभाशुभपरित्यागी’) इत्यादेः सामान्यविशेष-व्याख्यानव्याख्येयभावेन अपुनरुक्तिः । ‘हर्षादिभिर्मुक्तः’ इत्युक्ते कादाचित्कमपि भवतीति ‘यो न हृष्यति’इत्युक्तम् (इत्याद्युक्तम्) । उपचारपरिहारार्थं पूर्वम् । आधिक्यज्ञापनाय भक्त्यभ्यासः । ‘ये तु सर्वाणि कर्माणि’(१२.६) इत्यादेः प्रपञ्च एषः ॥ १६-१९ ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नम द्वादशोऽध्यायः ॥
पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । ‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये द्वादशोऽध्यायः ॥

त्रयोदशोऽध्यायः

पूर्वोक्तज्ञान-ज्ञेय-क्षेत्र-पुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन । (सर्वार्थसङ्क्षेपोऽयम् )॥ १ -३॥

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥


अर्जुन उवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥


श्रीभगवानुवाच

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥


तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥


‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥


ब्रह्मसूत्राणि =शारीरकम् ॥ ५ ॥
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥


इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥


इच्छादयो विकाराः ॥ ६-७ ॥
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥


‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः । ‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥


असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥


सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । ‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’ इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥


अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥


तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥


‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । ॥ १३ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥


सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥


सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् ।
बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥


अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥


ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥


इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥


विकारान्तर्भावाज्ज्ञानसाधनं प्रथमत उक्तम् । बहुत्वात् साधनात्युपयोगात् प्रभावः ॥ १९ ॥
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥


‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- प्रकृतिमिति ॥ गुणाः सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः । ‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ । इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥


कार्यं शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । करणानि इन्द्रियाणि । भोगः अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९) इति (हि) भागवते ॥२१ ॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥


उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥


‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥
य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥


‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । ‘पुरुषं प्रकृतिं च’ इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का । अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः । न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति । अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति ।
अवान्तरं च तात्पर्यं तत्रास्ति । उक्तं च तत्रैव- ‘अवान्तरं तत्परत्वं च सत्त्वे, महद्वाऽप्येकत्वात् (तु) तयोरनन्ते’ । इति । श्यामत्वाद्यभिधानाच्च । युक्तं च पुरुषमतिकल्पितयुक्त्यादेराभासत्वम् । अज्ञानसम्भवात् । न तु स्वतः प्रमाणस्य वेदस्याऽभासत्वम् । अदर्शनं च सम्भवत्येव । पुंसां बहूनामप्यज्ञानात् । तर्ह्यस्मदनधीतश्रुत्यादौ विपर्ययोऽपि स्यादिति च न वाच्यम् । यतस्तत्रैवाह- ‘नैतद्विरुद्धा वाचो नैतद्विरुद्धा युक्तयः इति ह प्रजापतिरुवाच (प्रजापतिरुवाच)’ इति । तद्विरुद्धं च जीवसाम्यम् ।
‘आभास एव च’(ब्र.सू.२.३.५०) इति चोक्तम् । ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु । को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति । श्रीवैशंपायन उवाच- नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्भव । बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥ तथा त्वं पुरुषं विश्वं आख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१-३) इति च मोक्षधर्मे । न च तत् सर्वं स्वप्नेन्द्रजाल(लादि)वत् । ‘वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत्’(ब्र.सू.२.२.२९) इति हि भगवद्वचनम् । न च स्वप्नवत् एकजीवकल्पितत्वे मानं पश्यामः । विपर्यये माश्चोक्ता द्वितीये । उक्तं चायास्यशाखायाम्- ‘स्वप्नो ह वा अयं चञ्चलत्वान्न च स्वप्नो न हि विच्छेद एतदिति।’ इति ।
नायं दोषः । न हीश्वरस्य जीवैक्यमुच्यते । जीवस्य हीश्वरैक्यं ध्येयम् । तदपि न निरुपाधिकम् । अतो न प्रतिबिम्बत्वविरोधि ऐक्यम् । तथा च माधुच्छन्दसश्रुतिः- ‘ऐक्यं चापि प्रातिबिम्ब्येन विष्णोः जीवस्यैतद्ध्यृषयो वदन्ति’ इति । अहङ्ग्रहोपासने च फलाधिक्यम् अ(आ)ग्निवेश्यश्रुतिसिद्धम्- ‘अहङ्ग्रहोपासकस्तस्य साम्यम् अभ्याशो ह वा अश्नुते नात्र शङ्का ।’ इति । ‘तदीयोऽहमिति ज्ञानम् अहङ्ग्रह इतीरितः ।’ इति वामने । ‘तद्वशत्वात्तु सोऽस्मीति भृत्यैरेव न तु स्वतः’ इति च । ‘प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मि भृत्यश्च’ इति भावना । तथा हि आयास्यशाखायाम्- ‘भृत्यश्चाहं प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मीत्येवं ह्युपास्यः परमः पुमान् सः ।’ इति । प्रातिबिम्ब्यं च तत्साम्य(सादृश्य)मेव ॥ २४ ॥
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥


अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥


साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति । श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति । अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’ इति । ‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥
यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥


समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥


समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥


पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥


आत्मानं चाकर्तारं पश्यति स पश्यति ॥ ३० ॥
यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥


एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥
अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥


न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥


यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥


क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥
भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षसाधनम् अमानित्वादिकम् ॥ ३५ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥

चतुर्दशोऽध्यायः

साधनं प्राधान्येनोत्तरैरध्यायैर्वक्ति-

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥


श्रीभगवानुवाच

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥


मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥


महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः- ‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च । उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ इति । ‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- ‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना । तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ इति ।
अतः सीतादुःखादिकं (सर्वं) मृषाप्रदर्शनमेव । तथा कूर्मपुराणे । न चेयं भूः । तथा च सौकरायणश्रुतिः- ‘अन्या भूमिर्भूरियं तस्य छाया भूतावमा सा हि भूतैकयोनिः।’ इति । ‘अवाप स्वेच्छया दास्यं जगतां प्रपितामही’ इत्यनभिम्लात(न)श्रुतिः। मत्स्यपुराणोक्तमपि स्वेच्छयैव । महद्ब्रह्मशब्दवाच्याऽपि प्रकृतिरेव- ‘महती ब्रह्मणी द्वे तु प्रकृतिश्च महेश्वरः।’ इति तत्रैव ॥३ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥


सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥


तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥


बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥


(रज इति) तृष्णासङ्गयोः समुद्भवम् = तयोः कारणम् ॥ ७ ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥


अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥


रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥


सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥


लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥


अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥


यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।तदोत्तमविदां लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥


रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥


कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥


रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- ‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’ इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥
सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥


ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥


नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥


परिणामिकर्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति । अन्यथा ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’ इति श्रुतिविरोधः । ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४) इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥


कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥


अर्जुन उवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥


श्रीभगवानुवाच

प्रायो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । तथाहि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम्- ‘रजस्तमःसत्त्वगुणान् प्रवृत्तान् प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षते । तथाऽपि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद् यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् ॥’ इति। ‘न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम । हीनास्सत्त्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः । कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७८-७९) इति हि मोक्षधर्मे । ‘सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.६९) । इति च ॥ २०-२२ ॥
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥


समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥


मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥


तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात् ॥ २४, २५ ॥
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥


ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् । ‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ । इति पाद्मे । भूयाय भावाय ॥२६ ॥
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिगुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥
ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥

पञ्चदशोऽध्यायः

संसारस्वरूपतदत्ययोपायविज्ञानान्यस्मिन्नध्याये दर्शयति-

त्रयोदशोक्तं विविच्य दर्शयति-

ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥


श्री भगवानुवाच

ऊर्ध्वो विष्णुः । ‘ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि द्रविणसवर्चसम्’ । इति हि श्रुतिः । ऊर्ध्वः उत्तमः सर्वतः । अधो निकृष्टम् । शाखा भूतानि । श्वोप्येकप्रकारेण न तिष्ठतीत्यश्वत्थः । तथाऽपि न प्रवाहव्ययः । पूर्वब्रह्मकाले यथा स्थितिस्तथा सर्वत्रापीत्यव्ययता । फलकारणत्वा- च्छन्दसां पर्णत्वम् । न हि कदाचिदप्यजाते पर्णे फलोत्पत्तिः ॥१ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥


अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्- ‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’ इति ॥ २ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥


यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । ‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०) इति भागवते । ‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९) इति च मोक्षधर्मे । असङ्गशस्त्रेण सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । ‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८) इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- ‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’ इति ।
ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥


तदर्थं च तमेव प्रपद्ये प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’ इति । ‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) । इति च मोक्षधर्मे । छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥


साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥


स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥


शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥


‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- शरीरमित्यादिना ॥ यद् यदा शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च जीवः तदा ईश्वरः एव एतानि गृहीत्वा संयाति । ‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः । तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२) इति हि मोक्षधर्मे । ‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि । आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च । ‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते । अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७) इति च । ‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् । एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५) इति च श्रुतिः । ‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६) इति च । गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥


भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । ‘(यद्य) तद्य इमे वीणायां गायन्ति एतं ते गायन्ति’(छां.१.३.९) इति च श्रुतिः । गुणान्वितमेव भुङ्क्ते । ‘न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) इति श्रुतेः ॥ ९ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥


तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥


यतन्तः ज्ञानं प्राप्य । अकृतात्मानः अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥
यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥


पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - यदादित्यगतमित्यादिना ॥ १२ ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥


गां भूमिम् ॥ १३ ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥


सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥


वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- ‘स वेदान्तकृत् स कालक इति । स ह्येव युक्तिसूत्रकृत् स कालक इति’ इति ॥१५ ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥


उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥


यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥


यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥


इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।एतद् बुद्‍ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- ‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् । तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ इति॥ १६-२० ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥

षोडशोऽध्यायः

पुमर्थसाधनविरोधीनि अनेनाध्यायेन दर्शयति-

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥


श्रीभगवानुवाच

तपः ब्रह्मचर्यादि । ‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’ इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥


पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् । ‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ इति ह्यभिधानम् । लौल्यं= रागः । ‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’ इत्यभिधानात् । अचापलं स्थैर्यम् । ‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’ इत्यभिधानात् ॥२ ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥


दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥


दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥


द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥


प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥


क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥


एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥


जगतः सत्यं प्रतिष्ठा ईश्वरश्च विष्णुः । तद्वैपरीत्येनाऽहुः । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम्, तेषामेष सत्यम्’(बृ.८.१.२०) । इति हि श्रुतिः । ‘द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे चामूर्तं चैवामूर्तं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च’(बृ.२.३.१) इति च । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यम् इति, एष ह्येवैतत् सादयति यामयति चेति’ इति च प्राचीनशालाश्रुतिः । परस्परसम्भवो ह्युक्तः- ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’(३.१४) इत्यादिना ॥९ ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥


दुष्पूरो हि कामः । ‘पाताल इव दुष्पूरो मां हि क्लेशयते सदा।’(कुम्भ-म.भा.१२.१७६.३९) इति हि मोक्षधर्मे ॥१० ॥
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥


आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥


इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥


असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥


आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥


अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६ ॥


आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥


अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८ ॥


मामात्मपरदेहेष्विति ॥ ‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’ इत्यादि । ‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् । अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’ इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये षोडशोऽध्यायः ॥
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥


आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥


त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥


एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥


यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥


तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥

सप्तदशोऽध्यायः

गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥


अर्जुन उवाच

शास्त्रविधिमुत्सृज्य= अज्ञात्वा एव । ‘वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना।’(म.स्मृ.२.२३५) इति विधिरुत्सृष्टो हि तैः । ‘ये वै वेदं न पठन्ते न चार्थं वेदोज्झितांस्तान् विद्धि सानूनबुद्धीन्’ । इति च माधुच्छन्दसश्रुतिः । अन्यथा तु ‘तामसाः’ इत्येवोच्येत, नतु विभज्य । यदि सात्त्विकाः तर्हि नोत्सृष्टशास्त्राः । नहि वेदविरुद्धो धर्मः । ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्’(म.स्मृ.२.६) । इति हि स्मृतिः । ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः’(भाग.६.१.४०) इति भागवते ॥१ ॥
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥


श्रीभगवानुवाच

अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥


सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥


कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥ ४॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥


कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥


भगवत्कर्शनं नाम अल्पत्वदृष्टिरेव । ‘यो वै महान्तं परमं पुमांसं नैवं द्रष्टा कर्शकः सोऽतिपापी’ । इत्यनभिम्लान(त)श्रुतिः । आसुरो निश्चयो येषां त आसुरनिश्चयाः । ‘देवास्तु सात्त्विकाः प्रोक्ताः दैत्या राजसतामसाः।’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ॥ ६॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥


आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥


प्रीतिः आनन्तरिका । हृद्यत्वं दर्शने । स्थिराश्च न तदैव पक्वा भवन्ति । तथा ह्याज्यादयः ॥ ८ ॥
कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥


यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥


अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥


अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥


विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥


देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥


अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥


मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥


सौम्यत्वम् अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’ इति ह्यभिधानम् । मौनं मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ । इति हि भाल्लवेयश्रुतिः । कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥


सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥


मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥


दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥


यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥


अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥


ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥


तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥


पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च । सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः ।
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥


‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥


यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥


अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥
सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु- ‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’ इति ॥ २६-२८ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये सप्तदशोऽध्यायः ॥

अष्टादशोऽध्यायः

पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरति अनेनाध्यायेन ।

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥


अर्जुन उवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥


श्रीभगवानुवाच

फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- ‘अनिच्छयाकर्मणा वापि काम्यकर्मन्यासो न्यासः, फलत्यागस्तु त्यागः।’ इति ॥ १, २ ॥
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥


‘मनीषिणः’ इति (उक्तत्वात्) विशेषणात् पूर्वपक्षोऽपि ग्राह्य एव । फलत्यागेन त्यागो विवक्षितो यज्ञादेस्तत्पक्षे । ‘यस्तु कर्मफलत्यागी’(१८.११) इति च वक्ष्यति । अत एक एवायं पक्षः ॥ ३ ॥
निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥


तत्प्रकारं चाह - निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥


एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥


नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥


दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥


कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥


न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥


यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा ‘ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’ इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः । ज्ञानयज्ञविद्याऽभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते । अतो यद्वचोऽन्यथा प्रतीयते अधिकारभेदेन तद् योज्यम् । अन्यथेतरेषां गत्यभावात् ॥ १० ॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥


अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥


त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति ॥ १२ ॥
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥


पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥


शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥


अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- ‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’ । इति ॥ १४, १५ ॥
तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥


केवलं निष्क्रियम् । ‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’ इति तत्रैव ॥१६ ॥
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥


तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥


एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् ।
तथाह्यृग्वेदखिलेषु- ‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानिनं चाप्यपेक्ष्य विधिरुत्थितः । करणं चैव कर्ता च कर्मकारणसङ्ग्रहः ॥’ इति । अकर्तृत्वेऽपि विधिद्वारा इश्वरप्रसादाद् इच्छोत्पत्त्या उक्तकारणैः कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति । ईश्वराधीनत्वेऽपि विधिद्वारा नियत तेनैव । यदि चेच्छादिर्जायते तर्हि कारितमेवेश्वरेण । फलं च नियतम् ।
वस्तुतोऽकर्तृत्वेऽप्याभिमानिकं कर्तृत्वं तस्यैव । स्वातन्त्र्यं च जडम् अपेक्ष्येति न प्रवृत्तिविधिवैयर्थ्यम् । सर्वं चैतद् अनुभवोक्तप्रमाणसिद्धमिति न पृथक् प्रमाणमुच्यते ॥१८ ॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥


पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥


एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥


यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥


नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥


यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥


अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥


मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥


रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥


अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥


परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री । परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा । यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’ इत्यभिधानात् ॥२८ ॥
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥


प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥


यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥


यथार्थत्वनियमाभावे राजस्याः । अन्यथा तामस्याः, भेदाभावात् ॥३१ ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥


धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥


यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥


यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥


सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥


यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७ ॥


विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् ।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८ ॥


यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥


न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥


ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥


शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (ब्रह्मकर्म)ब्राह्मं कर्म स्वभावजम्॥४२ ॥


शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥


कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥


स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥


यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥


श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवाऽवृताः॥४८ ॥


असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥


नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥


यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा निष्ठा ॥ ५० ॥
बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥


विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥


अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥


ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥


भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥


सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥


पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥


मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्‍क्ष्यसि॥५८ ॥


यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥


स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥


ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥


तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥


परोक्षवचनं तु द्रोणं प्रति भीमवचनवत् ॥ ६२ ॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥


सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥


मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥


सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥


धर्मत्यागः फलत्यागः । कथमन्यथा युद्धविधिः ? ‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’(१८.११) इति चोक्तम् ॥ ६६ ॥
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥


य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥


न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।भविता न च मे तस्माद् अन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥


अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।ज्ञानयज्ञेन तेनाहम् इष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥


श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।सोऽपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥७१ ॥


कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥


नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥


अर्जुन उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥


सञ्जय उवाच

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥


राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥


तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥


यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥


॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥
पूर्णादोषमहाविष्णोः गीतामाश्रित्य लेशतः । निरूपणं कृतं तेन प्रीयतां मे सदा विभुः ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये अष्टादशोऽध्यायः ॥