Anubhashya: Difference between revisions
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| verse_line1 = विष्णुरेव विजिज्ञास्यः सर्वकर्ताऽगमोदितः। | | verse_line1 = विष्णुरेव विजिज्ञास्यः सर्वकर्ताऽगमोदितः। | ||
| verse_lines = विष्णुरेव विजिज्ञास्यः सर्वकर्ताऽगमोदितः।;समन्वयादीक्षतेश्च पूर्णानन्दोऽन्तरः खवत्॥ १॥ | |||
| verse_line2 = समन्वयादीक्षतेश्च पूर्णानन्दोऽन्तरः खवत्॥ १॥ | | verse_line2 = समन्वयादीक्षतेश्च पूर्णानन्दोऽन्तरः खवत्॥ १॥ | ||
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| verse_line1 = प्रणेता ज्योतिरित्याद्यैः प्रसिद्धैरन्यवस्तुषु। | | verse_line1 = प्रणेता ज्योतिरित्याद्यैः प्रसिद्धैरन्यवस्तुषु। | ||
| verse_lines = प्रणेता ज्योतिरित्याद्यैः प्रसिद्धैरन्यवस्तुषु।;उच्यते विष्णुरेवैकः सर्वैः सर्वगुणत्वतः॥ २॥ | |||
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| verse_line1 = सर्वगोऽत्ता नियन्ता च दृश्यत्वाद्युज्झितः सदा। | | verse_line1 = सर्वगोऽत्ता नियन्ता च दृश्यत्वाद्युज्झितः सदा। | ||
| verse_lines = सर्वगोऽत्ता नियन्ता च दृश्यत्वाद्युज्झितः सदा।;विश्वजीवान्तरत्वाद्यैर्लिङ्गैः सर्वैर्युतः स हि॥ ३॥ | |||
| verse_line2 = विश्वजीवान्तरत्वाद्यैर्लिङ्गैः सर्वैर्युतः स हि॥ ३॥ | | verse_line2 = विश्वजीवान्तरत्वाद्यैर्लिङ्गैः सर्वैर्युतः स हि॥ ३॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वाश्रयः पूर्णगुणः सोऽक्षरः सन् हृदब्जगः। | | verse_line1 = सर्वाश्रयः पूर्णगुणः सोऽक्षरः सन् हृदब्जगः। | ||
| verse_lines = सर्वाश्रयः पूर्णगुणः सोऽक्षरः सन् हृदब्जगः।;सूर्यादिभासकः प्राणप्रेरको दैवतैरपि॥ ४॥ | |||
| verse_line2 = सूर्यादिभासकः प्राणप्रेरको दैवतैरपि॥ ४॥ | | verse_line2 = सूर्यादिभासकः प्राणप्रेरको दैवतैरपि॥ ४॥ | ||
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| verse_line1 = ज्ञेयो न वेदैः शूद्रादैः कम्पकोऽन्यश्च जीवतः। | | verse_line1 = ज्ञेयो न वेदैः शूद्रादैः कम्पकोऽन्यश्च जीवतः। | ||
| verse_lines = ज्ञेयो न वेदैः शूद्रादैः कम्पकोऽन्यश्च जीवतः।;पतित्वादिगुणैर्युक्तः तदन्यत्र च वाचकैः॥ ५॥ | |||
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| verse_line1 = मुख्यतः सर्वशब्दैश्च वाच्य एको जनार्दनः। | | verse_line1 = मुख्यतः सर्वशब्दैश्च वाच्य एको जनार्दनः। | ||
| verse_lines = मुख्यतः सर्वशब्दैश्च वाच्य एको जनार्दनः।;अव्यक्तः कर्मवाच्यैश्च वाच्य एकोऽमितात्मकः॥ ६॥ | |||
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| verse_line1 = अवान्तरं कारणं च प्रकृतिः शून्यमेव च। | | verse_line1 = अवान्तरं कारणं च प्रकृतिः शून्यमेव च। | ||
| verse_lines = अवान्तरं कारणं च प्रकृतिः शून्यमेव च।;इत्याद्यन्यत्र नियतैरपि मुख्यतयोदितः।;शब्दैरतोऽनन्तगुणो यच्छब्दा योगवृत्तयः॥ ७॥ | |||
| verse_line2 = इत्याद्यन्यत्र नियतैरपि मुख्यतयोदितः। | | verse_line2 = इत्याद्यन्यत्र नियतैरपि मुख्यतयोदितः। | ||
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| verse_line1 = श्रौतस्मृतिविरुद्धत्वात् स्मृतयो न गुणान् हरेः। | | verse_line1 = श्रौतस्मृतिविरुद्धत्वात् स्मृतयो न गुणान् हरेः। | ||
| verse_lines = श्रौतस्मृतिविरुद्धत्वात् स्मृतयो न गुणान् हरेः।;निषेद्धुं शक्नुयुर्वेदा नित्यत्वान्मानमुत्तमम्॥ १॥ | |||
| verse_line2 = निषेद्धुं शक्नुयुर्वेदा नित्यत्वान्मानमुत्तमम्॥ १॥ | | verse_line2 = निषेद्धुं शक्नुयुर्वेदा नित्यत्वान्मानमुत्तमम्॥ १॥ | ||
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| verse_line1 = देवतावचनादापो वदन्तीत्यादिकं वचः । | | verse_line1 = देवतावचनादापो वदन्तीत्यादिकं वचः । | ||
| verse_lines = देवतावचनादापो वदन्तीत्यादिकं वचः ।;नायुक्तवाद्यसन्नैव कारणं दृश्यते क्वचित् ॥ २॥ | |||
| verse_line2 = नायुक्तवाद्यसन्नैव कारणं दृश्यते क्वचित् ॥ २॥ | | verse_line2 = नायुक्तवाद्यसन्नैव कारणं दृश्यते क्वचित् ॥ २॥ | ||
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| verse_line1 = असज्जीवप्रधानादिशब्दा ब्रह्मैव नापरम्। | | verse_line1 = असज्जीवप्रधानादिशब्दा ब्रह्मैव नापरम्। | ||
| verse_lines = असज्जीवप्रधानादिशब्दा ब्रह्मैव नापरम्।;वदन्ति कारणत्वेन क्वापि पूर्णगुणो हरिः॥ ३॥ | |||
| verse_line2 = वदन्ति कारणत्वेन क्वापि पूर्णगुणो हरिः॥ ३॥ | | verse_line2 = वदन्ति कारणत्वेन क्वापि पूर्णगुणो हरिः॥ ३॥ | ||
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| verse_line1 = स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वान्नायुक्तं तद्वदेच्छ्रुतिः। | | verse_line1 = स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वान्नायुक्तं तद्वदेच्छ्रुतिः। | ||
| verse_lines = स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वान्नायुक्तं तद्वदेच्छ्रुतिः।;भ्रान्तिमूलतया सर्वसमयानामयुक्तितः॥४॥ | |||
| verse_line2 = भ्रान्तिमूलतया सर्वसमयानामयुक्तितः॥४॥ | | verse_line2 = भ्रान्तिमूलतया सर्वसमयानामयुक्तितः॥४॥ | ||
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| verse_line1 = न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्। | | verse_line1 = न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्। | ||
| verse_lines = न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्।;आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥ | | verse_line2 = आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = सोऽनुत्पत्तिलयः कर्ता जीवः तद्वशगः सदा। | | verse_line1 = सोऽनुत्पत्तिलयः कर्ता जीवः तद्वशगः सदा। | ||
| verse_lines = सोऽनुत्पत्तिलयः कर्ता जीवः तद्वशगः सदा।;तदाभासो हरिः सर्वरूपेष्वपि समः सदा॥ .६॥ | |||
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| verse_line1 = मुख्यप्राणश्चेन्द्रियाणि देहश्चैव तदुद्भवः। | | verse_line1 = मुख्यप्राणश्चेन्द्रियाणि देहश्चैव तदुद्भवः। | ||
| verse_lines = मुख्यप्राणश्चेन्द्रियाणि देहश्चैव तदुद्भवः।;मुख्यप्राणवशे सर्वं स विष्णोर्वशगः सदा॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वदोषोज्झितः तस्माद् भगवान् पुरुषोत्तमः।;उक्ता गुणाश्चाविरुद्धास्तस्य वेदेषु सर्वशः॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = शुभेन कर्मणा स्वर्गं निरयं च विकर्मणा।;मिथ्याज्ञानेन च तमो ज्ञानेनैव परं पदम्॥ १॥ | |||
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| verse_lines = याति तस्माद्विरक्तः सन् ज्ञानमेव समाश्रयेत्।;सर्वावस्थाप्रेरकश्च सर्वरूपेष्वभेदवान्॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सच्चिदानन्द आत्मेति मानुषैस्तु सुरेश्वरैः।;यथाक्रमं बहुगुणैर्ब्रह्मणा त्वखिलैर्गुणैः॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = उपास्यः सर्वदेवैश्च सर्वैरपि यथा बलम्।;ज्ञेयो विष्णुर्विशेषस्तु ज्ञाने स्यादुत्तरोत्तरम्॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि पुरुषार्थास्युः ज्ञानादेव न संशयः।;न लिप्यते ज्ञानावांश्च सर्वदोषैरपि क्वचित्॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = गुणदोषैः सुखस्यापि वृद्धिह्रासौ विमुक्तिगौ।;नृणां सुराणां मुक्तौ तु सुखं क्लृप्तं यथाक्रमम्॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टशक्तिमन्तश्च विना स्वाभाविकोत्तमान्।;अनन्यवशगाश्चैव वृद्धिह्रासविवर्जिताः।;दुःखादिरहितं नित्यं मोदन्तेऽविरतं सुखम्॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णप्रज्ञेन मुनिना सर्वशास्त्रार्थसङ्ग्रहः।;कृतोऽयं प्रीयतां तेन परमात्मा रमापतिः॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = नमो नमोऽशेषदोषदूरपूर्णगुणात्मने।;विरिञ्चिशर्वपूर्वेड्यवन्द्याय श्रीवराय ते॥ ९॥ | |||
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Latest revision as of 10:44, 4 June 2026
ब्रह्मसूत्राणुभाष्यम्
प्रथमोध्यायः
नारायणं गुणैः सर्वैरुदीर्णं दोषवर्जितम्।
ज्ञेयं गम्यं गुरूंश्चापि नत्वा सूत्रार्थ उच्यते ॥1॥
विष्णुरेव विजिज्ञास्यः सर्वकर्ताऽगमोदितः।समन्वयादीक्षतेश्च पूर्णानन्दोऽन्तरः खवत्॥ १॥
प्रणेता ज्योतिरित्याद्यैः प्रसिद्धैरन्यवस्तुषु।उच्यते विष्णुरेवैकः सर्वैः सर्वगुणत्वतः॥ २॥
सर्वगोऽत्ता नियन्ता च दृश्यत्वाद्युज्झितः सदा।विश्वजीवान्तरत्वाद्यैर्लिङ्गैः सर्वैर्युतः स हि॥ ३॥
सर्वाश्रयः पूर्णगुणः सोऽक्षरः सन् हृदब्जगः।सूर्यादिभासकः प्राणप्रेरको दैवतैरपि॥ ४॥
ज्ञेयो न वेदैः शूद्रादैः कम्पकोऽन्यश्च जीवतः।पतित्वादिगुणैर्युक्तः तदन्यत्र च वाचकैः॥ ५॥
मुख्यतः सर्वशब्दैश्च वाच्य एको जनार्दनः।अव्यक्तः कर्मवाच्यैश्च वाच्य एकोऽमितात्मकः॥ ६॥
अवान्तरं कारणं च प्रकृतिः शून्यमेव च।इत्याद्यन्यत्र नियतैरपि मुख्यतयोदितः।
द्वितीयोऽध्यायः॥
श्रौतस्मृतिविरुद्धत्वात् स्मृतयो न गुणान् हरेः।निषेद्धुं शक्नुयुर्वेदा नित्यत्वान्मानमुत्तमम्॥ १॥
देवतावचनादापो वदन्तीत्यादिकं वचः ।नायुक्तवाद्यसन्नैव कारणं दृश्यते क्वचित् ॥ २॥
असज्जीवप्रधानादिशब्दा ब्रह्मैव नापरम्।वदन्ति कारणत्वेन क्वापि पूर्णगुणो हरिः॥ ३॥
स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वान्नायुक्तं तद्वदेच्छ्रुतिः।भ्रान्तिमूलतया सर्वसमयानामयुक्तितः॥४॥
न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्।आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥
सोऽनुत्पत्तिलयः कर्ता जीवः तद्वशगः सदा।तदाभासो हरिः सर्वरूपेष्वपि समः सदा॥ .६॥
मुख्यप्राणश्चेन्द्रियाणि देहश्चैव तदुद्भवः।मुख्यप्राणवशे सर्वं स विष्णोर्वशगः सदा॥ ७॥
सर्वदोषोज्झितः तस्माद् भगवान् पुरुषोत्तमः।उक्ता गुणाश्चाविरुद्धास्तस्य वेदेषु सर्वशः॥ ८॥
तृतीयोऽध्यायः॥
शुभेन कर्मणा स्वर्गं निरयं च विकर्मणा।मिथ्याज्ञानेन च तमो ज्ञानेनैव परं पदम्॥ १॥
याति तस्माद्विरक्तः सन् ज्ञानमेव समाश्रयेत्।सर्वावस्थाप्रेरकश्च सर्वरूपेष्वभेदवान्॥ २॥
सर्वदेशेषु कालेषु स एकः परमेश्वरः।तद्भक्तितारतम्येन तारतम्यं विमुक्तिगम्॥ ३॥
सच्चिदानन्द आत्मेति मानुषैस्तु सुरेश्वरैः।यथाक्रमं बहुगुणैर्ब्रह्मणा त्वखिलैर्गुणैः॥ ४॥
उपास्यः सर्वदेवैश्च सर्वैरपि यथा बलम्।ज्ञेयो विष्णुर्विशेषस्तु ज्ञाने स्यादुत्तरोत्तरम्॥ ५॥
सर्वेऽपि पुरुषार्थास्युः ज्ञानादेव न संशयः।न लिप्यते ज्ञानावांश्च सर्वदोषैरपि क्वचित्॥ ६॥
गुणदोषैः सुखस्यापि वृद्धिह्रासौ विमुक्तिगौ।नृणां सुराणां मुक्तौ तु सुखं क्लृप्तं यथाक्रमम्॥ ७॥
चतुर्थोऽध्यायः॥
विष्णुर्ब्रह्म तथाऽदातेत्येवं नित्यमुपासनम्।कार्यमापद्यपि ब्रह्म तेन यात्यपरोक्षताम्॥ १॥
प्रारब्धकर्मणोऽन्यस्य ज्ञानादेव परिक्षयः।अनिष्टस्योभयस्यापि सर्वस्यान्यस्य भोगतः॥ २॥
उत्तरेषूत्तरेष्वेवं यावद्वायुं विमुक्तिगाः।प्रविश्य भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा॥ ३॥
वायुर्विष्णुं प्रविश्यैव भोगांश्चैवोत्तरोत्तरम्।उत्क्रम्य मानुषा मुक्तिं यान्ति देहक्षयात् सुराः॥४॥
अर्चिरादिपथा वायुं प्राप्य तेन जनार्दनम्।यान्त्युत्तमा नरोच्चाद्या ब्रह्मलोकात् सहाऽमुना॥ ५॥
यथासङ्कल्पभोगाश्च चिदानन्दशरीरिणः।जगत्सृष्ट्यादिविषये महासामर्थ्यमप्यृते॥ ६॥
यथेष्टशक्तिमन्तश्च विना स्वाभाविकोत्तमान्।अनन्यवशगाश्चैव वृद्धिह्रासविवर्जिताः।
पूर्णप्रज्ञेन मुनिना सर्वशास्त्रार्थसङ्ग्रहः।कृतोऽयं प्रीयतां तेन परमात्मा रमापतिः॥ ८॥
नमो नमोऽशेषदोषदूरपूर्णगुणात्मने।विरिञ्चिशर्वपूर्वेड्यवन्द्याय श्रीवराय ते॥ ९॥