Krishnamrutamaharnava: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 8: | Line 8: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः । | | verse_line1 = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः । | ||
| verse_lines = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।;यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥ | |||
| verse_line2 = यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥ | | verse_line2 = यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 17: | Line 18: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् । | | verse_line1 = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् । | ||
| verse_lines = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।;वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | |||
| verse_line2 = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | | verse_line2 = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 26: | Line 28: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । | | verse_line1 = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । | ||
| verse_lines = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।;यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | |||
| verse_line2 = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | | verse_line2 = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 35: | Line 38: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले । | | verse_line1 = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले । | ||
| verse_lines = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।;अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | |||
| verse_line2 = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | | verse_line2 = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 44: | Line 48: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् । | | verse_line1 = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् । | ||
| verse_lines = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् ।;आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | |||
| verse_line2 = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | | verse_line2 = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 53: | Line 58: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् । | | verse_line1 = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् । | ||
| verse_lines = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।;तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | |||
| verse_line2 = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | | verse_line2 = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 62: | Line 68: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् । | | verse_line1 = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् । | ||
| verse_lines = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् ।;येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | |||
| verse_line2 = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | | verse_line2 = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 71: | Line 78: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने । | | verse_line1 = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने । | ||
| verse_lines = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने ।;युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | |||
| verse_line2 = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | | verse_line2 = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 80: | Line 88: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे । | | verse_line1 = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे । | ||
| verse_lines = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे ।;अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | |||
| verse_line2 = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | | verse_line2 = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 89: | Line 98: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते । | | verse_line1 = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते । | ||
| verse_lines = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते ।;केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | |||
| verse_line2 = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | | verse_line2 = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 98: | Line 108: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः । | | verse_line1 = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः । | ||
| verse_lines = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः ।;मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | |||
| verse_line2 = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | | verse_line2 = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 107: | Line 118: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शङ्करः | | verse_line1 = शङ्करः | ||
| verse_lines = शङ्करः;सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ १२॥ | |||
| verse_line2 = सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः । | | verse_line2 = सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 116: | Line 128: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः । | | verse_line1 = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः । | ||
| verse_lines = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः ।;स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | |||
| verse_line2 = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | | verse_line2 = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 125: | Line 138: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः । | | verse_line1 = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः । | ||
| verse_lines = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः ।;साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥ | |||
| verse_line2 = साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥ | | verse_line2 = साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 134: | Line 148: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः । | | verse_line1 = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः । | ||
| verse_lines = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः ।;हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | |||
| verse_line2 = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | | verse_line2 = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 143: | Line 158: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः । | | verse_line1 = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः । | ||
| verse_lines = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः ।;फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥ | |||
| verse_line2 = फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥ | | verse_line2 = फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 152: | Line 168: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः । | | verse_line1 = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः । | ||
| verse_lines = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः ।;किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | |||
| verse_line2 = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | | verse_line2 = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 161: | Line 178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः । | | verse_line1 = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः । | ||
| verse_lines = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः ।;यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥ | |||
| verse_line2 = यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥ | | verse_line2 = यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 170: | Line 188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । | | verse_line1 = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । | ||
| verse_lines = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।;स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | |||
| verse_line2 = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | | verse_line2 = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 179: | Line 198: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः । | | verse_line1 = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः ।;न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | |||
| verse_line2 = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | | verse_line2 = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 188: | Line 208: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः । | | verse_line1 = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः । | ||
| verse_lines = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥ | |||
| verse_line2 = यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥ | | verse_line2 = यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 197: | Line 218: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते । | | verse_line1 = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते । | ||
| verse_lines = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते ।;सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥ | |||
| verse_line2 = सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥ | | verse_line2 = सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 206: | Line 228: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः । | | verse_line1 = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः । | ||
| verse_lines = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः ।;प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥ | |||
| verse_line2 = प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥ | | verse_line2 = प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 215: | Line 238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज । | | verse_line1 = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज । | ||
| verse_lines = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज ।;न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥ | |||
| verse_line2 = न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥ | | verse_line2 = न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 224: | Line 248: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अत्रिः | | verse_line1 = अत्रिः | ||
| verse_lines = अत्रिः;परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः ।;स चाप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ २५॥ | |||
| verse_line2 = परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः । | | verse_line2 = परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 233: | Line 258: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अङ्गिराः | | verse_line1 = अङ्गिराः | ||
| verse_lines = अङ्गिराः;यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः ।;तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्य्रं यदीच्छसि॥ २६॥ | |||
| verse_line2 = यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः । | | verse_line2 = यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 242: | Line 268: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुलस्त्यः | | verse_line1 = पुलस्त्यः | ||
| verse_lines = पुलस्त्यः;परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् ।;तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ २७॥ | |||
| verse_line2 = परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् । | | verse_line2 = परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 251: | Line 278: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् । | | verse_line1 = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् । | ||
| verse_lines = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् ।;प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥ | |||
| verse_line2 = प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥ | | verse_line2 = प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 260: | Line 288: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति । | | verse_line1 = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति । | ||
| verse_lines = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति ।;त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥ | |||
| verse_line2 = त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥ | | verse_line2 = त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 269: | Line 298: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् । | | verse_line1 = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् । | ||
| verse_lines = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।;सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | |||
| verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | | verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 278: | Line 308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् । | | verse_line1 = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् । | ||
| verse_lines = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।;ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | |||
| verse_line2 = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | | verse_line2 = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 287: | Line 318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः । | | verse_line1 = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः । | ||
| verse_lines = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।;वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | | verse_line2 = वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 296: | Line 328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्रेयः | | verse_line1 = आत्रेयः | ||
| verse_lines = आत्रेयः;यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।;तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥ | |||
| verse_line2 = यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी । | | verse_line2 = यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी । | ||
}} | }} | ||
| Line 305: | Line 338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा | | verse_line1 = ब्रह्मा | ||
| verse_lines = ब्रह्मा;बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।;वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥ | |||
| verse_line2 = बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि । | | verse_line2 = बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि । | ||
}} | }} | ||
| Line 314: | Line 348: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कौशिकः | | verse_line1 = कौशिकः | ||
| verse_lines = कौशिकः;अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥ | |||
| verse_line2 = अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः । | | verse_line2 = अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 323: | Line 358: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शङ्करः | | verse_line1 = शङ्करः | ||
| verse_lines = शङ्करः;कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।;प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥ | |||
| verse_line2 = कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते । | | verse_line2 = कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते । | ||
}} | }} | ||
| Line 332: | Line 368: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः । | | verse_line1 = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः । | ||
| verse_lines = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।;तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | |||
| verse_line2 = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | | verse_line2 = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 341: | Line 378: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा | | verse_line1 = ब्रह्मा | ||
| verse_lines = ब्रह्मा;न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।;भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥ | |||
| verse_line2 = न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् । | | verse_line2 = न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 350: | Line 388: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः । | | verse_line1 = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः । | ||
| verse_lines = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।;जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | |||
| verse_line2 = जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | | verse_line2 = जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 359: | Line 398: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते । | | verse_line1 = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते । | ||
| verse_lines = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।;न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | |||
| verse_line2 = न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | | verse_line2 = न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 368: | Line 408: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः । | | verse_line1 = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः । | ||
| verse_lines = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।;करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | |||
| verse_line2 = करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | | verse_line2 = करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 377: | Line 418: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना । | | verse_line1 = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना । | ||
| verse_lines = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।;ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | |||
| verse_line2 = ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | | verse_line2 = ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 386: | Line 428: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः । | | verse_line1 = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः । | ||
| verse_lines = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः ।;न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥ | |||
| verse_line2 = न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥ | | verse_line2 = न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 395: | Line 438: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा । | | verse_line1 = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा । | ||
| verse_lines = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।;स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥ | |||
| verse_line2 = स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥ | | verse_line2 = स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 404: | Line 448: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः । | | verse_line1 = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः । | ||
| verse_lines = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।;पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | |||
| verse_line2 = पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | | verse_line2 = पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 413: | Line 458: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् । | | verse_line1 = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् । | ||
| verse_lines = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् ।;असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥ | |||
| verse_line2 = असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥ | | verse_line2 = असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 422: | Line 468: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अगस्त्यः | | verse_line1 = अगस्त्यः | ||
| verse_lines = अगस्त्यः;स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः ।;शतधा भेदमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ४७॥ | |||
| verse_line2 = स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः । | | verse_line2 = स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः । | ||
}} | }} | ||
| Line 431: | Line 478: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च । | | verse_line1 = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च । | ||
| verse_lines = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।;भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥ | |||
| verse_line2 = भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥ | | verse_line2 = भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 440: | Line 488: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता । | | verse_line1 = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता । | ||
| verse_lines = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।;यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | |||
| verse_line2 = यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | | verse_line2 = यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 449: | Line 498: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् । | | verse_line1 = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् । | ||
| verse_lines = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् ।;अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥ | |||
| verse_line2 = अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥ | | verse_line2 = अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 458: | Line 508: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः । | | verse_line1 = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः । | ||
| verse_lines = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः ।;कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥ | |||
| verse_line2 = कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥ | | verse_line2 = कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 467: | Line 518: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । | | verse_line1 = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । | ||
| verse_lines = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।;यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥ | |||
| verse_line2 = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥ | | verse_line2 = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 476: | Line 528: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति । | | verse_line1 = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति । | ||
| verse_lines = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।;ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥ | |||
| verse_line2 = ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥ | | verse_line2 = ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 485: | Line 538: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् । | | verse_line1 = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् । | ||
| verse_lines = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् ।;नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥ | |||
| verse_line2 = नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥ | | verse_line2 = नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 494: | Line 548: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । | | verse_line1 = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । | ||
| verse_lines = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।;इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥ | |||
| verse_line2 = इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥ | | verse_line2 = इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 503: | Line 558: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । | | verse_line1 = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । | ||
| verse_lines = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।;पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥ | |||
| verse_line2 = पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥ | | verse_line2 = पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 512: | Line 568: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च । | | verse_line1 = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च । | ||
| verse_lines = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च ।;इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥ | |||
| verse_line2 = इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥ | | verse_line2 = इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 521: | Line 578: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति । | | verse_line1 = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति । | ||
| verse_lines = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति ।;फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥ | |||
| verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥ | | verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 530: | Line 588: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् । | | verse_line1 = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् । | ||
| verse_lines = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।;मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | |||
| verse_line2 = मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | | verse_line2 = मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 539: | Line 598: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । | | verse_line1 = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । | ||
| verse_lines = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।;प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | |||
| verse_line2 = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | | verse_line2 = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 548: | Line 608: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः । | | verse_line1 = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः । | ||
| verse_lines = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।;तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | |||
| verse_line2 = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | | verse_line2 = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 557: | Line 618: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् । | | verse_line1 = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् । | ||
| verse_lines = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।;न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | |||
| verse_line2 = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | | verse_line2 = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 566: | Line 628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् । | | verse_line1 = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् । | ||
| verse_lines = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।;फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | |||
| verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | | verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 575: | Line 638: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे । | | verse_line1 = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे । | ||
| verse_lines = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।;तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | |||
| verse_line2 = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | | verse_line2 = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 584: | Line 648: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः । | | verse_line1 = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः । | ||
| verse_lines = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।;पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | |||
| verse_line2 = पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | | verse_line2 = पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 593: | Line 658: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी । | | verse_line1 = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी । | ||
| verse_lines = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।;तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | |||
| verse_line2 = तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | | verse_line2 = तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 602: | Line 668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । | | verse_line1 = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः । | ||
| verse_lines = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।;सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | |||
| verse_line2 = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | | verse_line2 = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 611: | Line 678: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कौशिकः | | verse_line1 = कौशिकः | ||
| verse_lines = कौशिकः;अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥ | |||
| verse_line2 = अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः । | | verse_line2 = अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः । | ||
}} | }} | ||
| Line 620: | Line 688: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते । | | verse_line1 = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते । | ||
| verse_lines = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।;गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | |||
| verse_line2 = गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | | verse_line2 = गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 629: | Line 698: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् । | | verse_line1 = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् । | ||
| verse_lines = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।;क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | |||
| verse_line2 = क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | | verse_line2 = क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 638: | Line 708: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् । | | verse_line1 = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् । | ||
| verse_lines = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | |||
| verse_line2 = स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | | verse_line2 = स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 647: | Line 718: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे । | | verse_line1 = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे । | ||
| verse_lines = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।;हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | |||
| verse_line2 = हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | | verse_line2 = हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 656: | Line 728: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः । | | verse_line1 = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः । | ||
| verse_lines = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।;पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | |||
| verse_line2 = पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | | verse_line2 = पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 665: | Line 738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् । | | verse_line1 = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् । | ||
| verse_lines = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।;जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | |||
| verse_line2 = जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | | verse_line2 = जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 674: | Line 748: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा | | verse_line1 = ब्रह्मा | ||
| verse_lines = ब्रह्मा;असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।;समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥ | |||
| verse_line2 = असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् । | | verse_line2 = असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 683: | Line 758: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् । | | verse_line1 = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् । | ||
| verse_lines = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।;तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | |||
| verse_line2 = तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | | verse_line2 = तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 692: | Line 768: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः । | | verse_line1 = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।;स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | |||
| verse_line2 = स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | | verse_line2 = स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 701: | Line 778: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन । | | verse_line1 = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन । | ||
| verse_lines = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन ।;यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥ | |||
| verse_line2 = यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥ | | verse_line2 = यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 710: | Line 788: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव । | | verse_line1 = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव । | ||
| verse_lines = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।;नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥ | |||
| verse_line2 = नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥ | | verse_line2 = नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 719: | Line 798: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे । | | verse_line1 = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे । | ||
| verse_lines = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।;मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | |||
| verse_line2 = मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | | verse_line2 = मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 728: | Line 808: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः । | | verse_line1 = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः । | ||
| verse_lines = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।;गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥ | |||
| verse_line2 = गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥ | | verse_line2 = गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 737: | Line 818: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका । | | verse_line1 = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका । | ||
| verse_lines = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका ।;रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥ | |||
| verse_line2 = रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥ | | verse_line2 = रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 746: | Line 828: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः । | | verse_line1 = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः । | ||
| verse_lines = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः ।;यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥ | |||
| verse_line2 = यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥ | | verse_line2 = यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 755: | Line 838: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ । | | verse_line1 = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ । | ||
| verse_lines = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ ।;ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥ | |||
| verse_line2 = ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥ | | verse_line2 = ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 764: | Line 848: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः । | | verse_line1 = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः । | ||
| verse_lines = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः ।;यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥ | |||
| verse_line2 = यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥ | | verse_line2 = यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 773: | Line 858: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् । | | verse_line1 = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् । | ||
| verse_lines = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।;ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥ | |||
| verse_line2 = ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥ | | verse_line2 = ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 782: | Line 868: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः । | | verse_line1 = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः । | ||
| verse_lines = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः ।;रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥ | |||
| verse_line2 = रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥ | | verse_line2 = रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 791: | Line 878: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् । | | verse_line1 = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् । | ||
| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।;नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | |||
| verse_line2 = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | | verse_line2 = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 800: | Line 888: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् । | | verse_line1 = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् । | ||
| verse_lines = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।;क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | |||
| verse_line2 = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | | verse_line2 = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 809: | Line 898: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् । | | verse_line1 = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् । | ||
| verse_lines = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।;अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | |||
| verse_line2 = अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | | verse_line2 = अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 818: | Line 908: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः । | | verse_line1 = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः । | ||
| verse_lines = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।;हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥ | |||
| verse_line2 = हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥ | | verse_line2 = हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 827: | Line 918: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च । | | verse_line1 = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च । | ||
| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।;नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | |||
| verse_line2 = नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | | verse_line2 = नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 836: | Line 928: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । | | verse_line1 = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । | ||
| verse_lines = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।;पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | |||
| verse_line2 = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | | verse_line2 = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 845: | Line 938: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये । | | verse_line1 = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये । | ||
| verse_lines = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।;शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | |||
| verse_line2 = शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | | verse_line2 = शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 854: | Line 948: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् । | | verse_line1 = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् । | ||
| verse_lines = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।;नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | |||
| verse_line2 = नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | | verse_line2 = नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 863: | Line 958: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत । | | verse_line1 = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत । | ||
| verse_lines = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।;तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥ | |||
| verse_line2 = तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥ | | verse_line2 = तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 872: | Line 968: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् । | | verse_line1 = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् । | ||
| verse_lines = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।;अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | |||
| verse_line2 = अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | | verse_line2 = अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 881: | Line 978: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः । | | verse_line1 = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः । | ||
| verse_lines = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।;तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | |||
| verse_line2 = तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | | verse_line2 = तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 890: | Line 988: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः । | | verse_line1 = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः । | ||
| verse_lines = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।;समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥ | |||
| verse_line2 = समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥ | | verse_line2 = समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 899: | Line 998: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी । | | verse_line1 = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी । | ||
| verse_lines = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।;विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | |||
| verse_line2 = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | | verse_line2 = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 908: | Line 1,008: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि । | | verse_line1 = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि । | ||
| verse_lines = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।;कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | |||
| verse_line2 = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | | verse_line2 = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 917: | Line 1,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च । | | verse_line1 = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च । | ||
| verse_lines = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।;विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥ | |||
| verse_line2 = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥ | | verse_line2 = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 926: | Line 1,028: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् । | | verse_line1 = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् । | ||
| verse_lines = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् ।;सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥ | |||
| verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥ | | verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 935: | Line 1,038: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् । | | verse_line1 = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् । | ||
| verse_lines = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।;नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥ | |||
| verse_line2 = नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥ | | verse_line2 = नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 944: | Line 1,048: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् । | | verse_line1 = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् । | ||
| verse_lines = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।;निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥ | |||
| verse_line2 = निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥ | | verse_line2 = निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 953: | Line 1,058: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति । | | verse_line1 = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति । | ||
| verse_lines = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति ।;दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥ | |||
| verse_line2 = दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥ | | verse_line2 = दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 962: | Line 1,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः । | | verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः । | ||
| verse_lines = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।;उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥ | |||
| verse_line2 = उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥ | | verse_line2 = उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 971: | Line 1,078: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः । | | verse_line1 = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः । | ||
| verse_lines = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः ।;तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥ | |||
| verse_line2 = तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥ | | verse_line2 = तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 980: | Line 1,088: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति । | | verse_line1 = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति । | ||
| verse_lines = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।;योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥ | |||
| verse_line2 = योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥ | | verse_line2 = योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 989: | Line 1,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् । | | verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् । | ||
| verse_lines = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।;यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥ | |||
| verse_line2 = यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥ | | verse_line2 = यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 998: | Line 1,108: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः । | | verse_line1 = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः । | ||
| verse_lines = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।;उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥ | |||
| verse_line2 = उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥ | | verse_line2 = उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,007: | Line 1,118: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः । | | verse_line1 = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः । | ||
| verse_lines = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः ।;स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥ | |||
| verse_line2 = स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥ | | verse_line2 = स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,016: | Line 1,128: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् । | | verse_line1 = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् । | ||
| verse_lines = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् ।;सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥ | |||
| verse_line2 = सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥ | | verse_line2 = सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,025: | Line 1,138: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते । | | verse_line1 = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते । | ||
| verse_lines = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते ।;त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥ | |||
| verse_line2 = त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥ | | verse_line2 = त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,034: | Line 1,148: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः । | | verse_line1 = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः । | ||
| verse_lines = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥ | |||
| verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥ | | verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,043: | Line 1,158: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा । | | verse_line1 = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा । | ||
| verse_lines = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा ।;तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥ | |||
| verse_line2 = तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥ | | verse_line2 = तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,052: | Line 1,168: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा । | | verse_line1 = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा । | ||
| verse_lines = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | |||
| verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | | verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,061: | Line 1,178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते । | | verse_line1 = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते । | ||
| verse_lines = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।;तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | |||
| verse_line2 = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | | verse_line2 = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,070: | Line 1,188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः । | | verse_line1 = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः । | ||
| verse_lines = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | |||
| verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | | verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,079: | Line 1,198: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा । | | verse_line1 = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा । | ||
| verse_lines = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥ | |||
| verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥ | | verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,088: | Line 1,208: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् । | | verse_line1 = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् । | ||
| verse_lines = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।;तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥ | |||
| verse_line2 = तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥ | | verse_line2 = तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,097: | Line 1,218: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् । | | verse_line1 = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् । | ||
| verse_lines = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।;तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | |||
| verse_line2 = तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | | verse_line2 = तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,106: | Line 1,228: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च । | | verse_line1 = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च । | ||
| verse_lines = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च ।;अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥ | |||
| verse_line2 = अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥ | | verse_line2 = अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,115: | Line 1,238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् । | | verse_line1 = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् । | ||
| verse_lines = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् ।;तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥ | |||
| verse_line2 = तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥ | | verse_line2 = तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,124: | Line 1,248: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा । | | verse_line1 = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा । | ||
| verse_lines = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा ।;तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥ | |||
| verse_line2 = तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥ | | verse_line2 = तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,133: | Line 1,258: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सूतः | | verse_line1 = सूतः | ||
| verse_lines = सूतः;ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् ।;कर्तव्य उपवासस्तु ह्यन्यथा नरकं व्रजेत्॥ १२६॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् । | | verse_line2 = ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,142: | Line 1,268: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये । | | verse_line1 = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये । | ||
| verse_lines = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | |||
| verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | | verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,151: | Line 1,278: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति । | | verse_line1 = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति । | ||
| verse_lines = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।;सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥ | |||
| verse_line2 = सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥ | | verse_line2 = सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,160: | Line 1,288: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् । | | verse_line1 = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् । | ||
| verse_lines = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् ।;सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥ | |||
| verse_line2 = सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥ | | verse_line2 = सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,169: | Line 1,298: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् । | | verse_line1 = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् । | ||
| verse_lines = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् ।;एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥ | |||
| verse_line2 = एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥ | | verse_line2 = एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,178: | Line 1,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् । | | verse_line1 = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् । | ||
| verse_lines = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।;विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥ | |||
| verse_line2 = विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥ | | verse_line2 = विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,187: | Line 1,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः । | | verse_line1 = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः । | ||
| verse_lines = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।;तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥ | |||
| verse_line2 = तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥ | | verse_line2 = तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,196: | Line 1,328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् । | | verse_line1 = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् । | ||
| verse_lines = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् ।;उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥ | |||
| verse_line2 = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥ | | verse_line2 = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,205: | Line 1,338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः । | | verse_line1 = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः । | ||
| verse_lines = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।;सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | |||
| verse_line2 = सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | | verse_line2 = सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,214: | Line 1,348: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते । | | verse_line1 = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते । | ||
| verse_lines = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते ।;न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥ | |||
| verse_line2 = न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥ | | verse_line2 = न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,223: | Line 1,358: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते । | | verse_line1 = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते । | ||
| verse_lines = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते ।;पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥ | |||
| verse_line2 = पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥ | | verse_line2 = पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,232: | Line 1,368: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते । | | verse_line1 = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते । | ||
| verse_lines = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते ।;यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥ | |||
| verse_line2 = यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥ | | verse_line2 = यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,241: | Line 1,378: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता । | | verse_line1 = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता । | ||
| verse_lines = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।;सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥ | |||
| verse_line2 = सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥ | | verse_line2 = सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,250: | Line 1,388: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा । | | verse_line1 = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा । | ||
| verse_lines = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।;सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥ | |||
| verse_line2 = सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥ | | verse_line2 = सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,259: | Line 1,398: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् । | | verse_line1 = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् । | ||
| verse_lines = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् ।;तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥ | |||
| verse_line2 = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥ | | verse_line2 = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,268: | Line 1,408: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा । | | verse_line1 = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा । | ||
| verse_lines = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।;सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥ | |||
| verse_line2 = सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥ | | verse_line2 = सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,277: | Line 1,418: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् । | | verse_line1 = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् । | ||
| verse_lines = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् ।;तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥ | |||
| verse_line2 = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥ | | verse_line2 = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,286: | Line 1,428: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता । | | verse_line1 = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता । | ||
| verse_lines = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता ।;तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥ | |||
| verse_line2 = तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥ | | verse_line2 = तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,295: | Line 1,438: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् । | | verse_line1 = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् । | ||
| verse_lines = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् ।;सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥ | |||
| verse_line2 = सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥ | | verse_line2 = सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,304: | Line 1,448: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु । | | verse_line1 = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु । | ||
| verse_lines = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु ।;उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥ | |||
| verse_line2 = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥ | | verse_line2 = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,313: | Line 1,458: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा । | | verse_line1 = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा । | ||
| verse_lines = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | |||
| verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | | verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,322: | Line 1,468: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च । | | verse_line1 = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च । | ||
| verse_lines = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।;अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | |||
| verse_line2 = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | | verse_line2 = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,331: | Line 1,478: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि । | | verse_line1 = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि । | ||
| verse_lines = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।;विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।;विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥ | |||
| verse_line2 = विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः । | | verse_line2 = विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,340: | Line 1,488: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् । | | verse_line1 = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् । | ||
| verse_lines = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।;यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | |||
| verse_line2 = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | | verse_line2 = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,349: | Line 1,498: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च । | | verse_line1 = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च । | ||
| verse_lines = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।;धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | |||
| verse_line2 = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | | verse_line2 = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,358: | Line 1,508: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः । | | verse_line1 = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः । | ||
| verse_lines = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।;अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥ | |||
| verse_line2 = अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥ | | verse_line2 = अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,367: | Line 1,518: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च । | | verse_line1 = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च । | ||
| verse_lines = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।;असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।;आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥ | |||
| verse_line2 = असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये । | | verse_line2 = असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,376: | Line 1,528: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् । | | verse_line1 = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् । | ||
| verse_lines = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।;कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥ | |||
| verse_line2 = कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥ | | verse_line2 = कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,385: | Line 1,538: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः । | | verse_line1 = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः । | ||
| verse_lines = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः ।;यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥ | |||
| verse_line2 = यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥ | | verse_line2 = यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,394: | Line 1,548: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् । | | verse_line1 = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् । | ||
| verse_lines = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।;न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | |||
| verse_line2 = न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | | verse_line2 = न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,403: | Line 1,558: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् । | | verse_line1 = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् । | ||
| verse_lines = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् ।;पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥ | |||
| verse_line2 = पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥ | | verse_line2 = पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,412: | Line 1,568: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । | | verse_line1 = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । | ||
| verse_lines = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।;ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥ | |||
| verse_line2 = ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥ | | verse_line2 = ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,421: | Line 1,578: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः । | | verse_line1 = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः । | ||
| verse_lines = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥ | | verse_line2 = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,430: | Line 1,588: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा । | | verse_line1 = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा । | ||
| verse_lines = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।;शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥ | |||
| verse_line2 = शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥ | | verse_line2 = शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,439: | Line 1,598: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् । | | verse_line1 = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् । | ||
| verse_lines = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।;एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥ | |||
| verse_line2 = एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥ | | verse_line2 = एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,448: | Line 1,608: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि । | | verse_line1 = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि । | ||
| verse_lines = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥ | | verse_line2 = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,457: | Line 1,618: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने । | | verse_line1 = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने । | ||
| verse_lines = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने ।;भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥ | |||
| verse_line2 = भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥ | | verse_line2 = भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,466: | Line 1,628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् । | | verse_line1 = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् । | ||
| verse_lines = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् ।;प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥ | |||
| verse_line2 = प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥ | | verse_line2 = प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,475: | Line 1,638: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि । | | verse_line1 = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि । | ||
| verse_lines = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि ।;प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः ।;प्रीणनार्थं हरेश्चापि विष्णुलोकस्य चाप्तये॥ १६४॥ | |||
| verse_line2 = प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः । | | verse_line2 = प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,484: | Line 1,648: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि । | | verse_line1 = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि । | ||
| verse_lines = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥ | |||
| verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥ | | verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,493: | Line 1,658: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि । | | verse_line1 = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि । | ||
| verse_lines = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥ | |||
| verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥ | | verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,502: | Line 1,668: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे । | | verse_line1 = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे । | ||
| verse_lines = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥ | |||
| verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥ | | verse_line2 = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,511: | Line 1,678: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः । | | verse_line1 = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः । | ||
| verse_lines = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः ।;पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥ | |||
| verse_line2 = पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥ | | verse_line2 = पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,520: | Line 1,688: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् । | | verse_line1 = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् । | ||
| verse_lines = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् ।;न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥ | |||
| verse_line2 = न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥ | | verse_line2 = न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,529: | Line 1,698: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् । | | verse_line1 = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् । | ||
| verse_lines = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् ।;पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥ | |||
| verse_line2 = पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥ | | verse_line2 = पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,538: | Line 1,708: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु । | | verse_line1 = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु । | ||
| verse_lines = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु ।;आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥ | |||
| verse_line2 = आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥ | | verse_line2 = आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,547: | Line 1,718: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये । | | verse_line1 = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये । | ||
| verse_lines = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये ।;भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥ | |||
| verse_line2 = भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥ | | verse_line2 = भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,556: | Line 1,728: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् । | | verse_line1 = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् । | ||
| verse_lines = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् ।;क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥ | |||
| verse_line2 = क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥ | | verse_line2 = क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,565: | Line 1,738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः । | | verse_line1 = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः । | ||
| verse_lines = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।;अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | |||
| verse_line2 = अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | | verse_line2 = अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,574: | Line 1,748: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् । | | verse_line1 = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् । | ||
| verse_lines = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।;न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | |||
| verse_line2 = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | | verse_line2 = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,583: | Line 1,758: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च । | | verse_line1 = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च । | ||
| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।;एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | | verse_line2 = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,592: | Line 1,768: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् । | | verse_line1 = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् । | ||
| verse_lines = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।;भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | |||
| verse_line2 = भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | | verse_line2 = भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,601: | Line 1,778: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते । | | verse_line1 = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते । | ||
| verse_lines = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।;यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | |||
| verse_line2 = यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | | verse_line2 = यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,610: | Line 1,788: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप । | | verse_line1 = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप । | ||
| verse_lines = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।;यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | |||
| verse_line2 = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | | verse_line2 = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,619: | Line 1,798: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो । | | verse_line1 = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो । | ||
| verse_lines = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।;एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | | verse_line2 = एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,628: | Line 1,808: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते । | | verse_line1 = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते । | ||
| verse_lines = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।;व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | |||
| verse_line2 = व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | | verse_line2 = व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,637: | Line 1,818: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे । | | verse_line1 = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे । | ||
| verse_lines = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।;तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥ | |||
| verse_line2 = तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥ | | verse_line2 = तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,646: | Line 1,828: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः । | | verse_line1 = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः । | ||
| verse_lines = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।;एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥ | | verse_line2 = एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,655: | Line 1,838: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् । | | verse_line1 = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् । | ||
| verse_lines = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।;वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥ | |||
| verse_line2 = वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥ | | verse_line2 = वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,664: | Line 1,848: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः । | | verse_line1 = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः । | ||
| verse_lines = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।;अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | |||
| verse_line2 = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | | verse_line2 = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,673: | Line 1,858: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च । | | verse_line1 = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च । | ||
| verse_lines = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।;अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥ | |||
| verse_line2 = अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥ | | verse_line2 = अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,682: | Line 1,868: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रुग्माङ्गदः | | verse_line1 = रुग्माङ्गदः | ||
| verse_lines = रुग्माङ्गदः;अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।;यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥ | |||
| verse_line2 = अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते । | | verse_line2 = अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,691: | Line 1,878: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः । | | verse_line1 = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः । | ||
| verse_lines = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः ।;पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥ | |||
| verse_line2 = पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥ | | verse_line2 = पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,700: | Line 1,888: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् । | | verse_line1 = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् । | ||
| verse_lines = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् ।;न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥ | |||
| verse_line2 = न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥ | | verse_line2 = न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,709: | Line 1,898: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने । | | verse_line1 = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने । | ||
| verse_lines = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने ।;न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥ | |||
| verse_line2 = न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥ | | verse_line2 = न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,718: | Line 1,908: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते । | | verse_line1 = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते । | ||
| verse_lines = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।;अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥ | |||
| verse_line2 = अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥ | | verse_line2 = अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,727: | Line 1,918: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः । | | verse_line1 = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः । | ||
| verse_lines = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।;भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | |||
| verse_line2 = भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | | verse_line2 = भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,736: | Line 1,928: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः । | | verse_line1 = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः । | ||
| verse_lines = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।;परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥ | |||
| verse_line2 = परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥ | | verse_line2 = परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,745: | Line 1,938: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा । | | verse_line1 = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा । | ||
| verse_lines = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा ।;रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥ | |||
| verse_line2 = रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥ | | verse_line2 = रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,754: | Line 1,948: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत । | | verse_line1 = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत । | ||
| verse_lines = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत ।;रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥ | |||
| verse_line2 = रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥ | | verse_line2 = रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,763: | Line 1,958: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण । | | verse_line1 = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण । | ||
| verse_lines = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण ।;भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥ | |||
| verse_line2 = भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥ | | verse_line2 = भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,772: | Line 1,968: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय । | | verse_line1 = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय । | ||
| verse_lines = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय ।;मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥ | |||
| verse_line2 = मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥ | | verse_line2 = मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,781: | Line 1,978: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् । | | verse_line1 = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् । | ||
| verse_lines = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् ।;आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥ | |||
| verse_line2 = आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥ | | verse_line2 = आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,790: | Line 1,988: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् । | | verse_line1 = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् । | ||
| verse_lines = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् ।;स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥ | |||
| verse_line2 = स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥ | | verse_line2 = स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,799: | Line 1,998: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् । | | verse_line1 = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् । | ||
| verse_lines = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् ।;स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥ | |||
| verse_line2 = स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥ | | verse_line2 = स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,808: | Line 2,008: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया । | | verse_line1 = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया । | ||
| verse_lines = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया ।;भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥ | |||
| verse_line2 = भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥ | | verse_line2 = भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,817: | Line 2,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् । | | verse_line1 = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।;सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥ | |||
| verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥ | | verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,826: | Line 2,028: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् । | | verse_line1 = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।;श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | |||
| verse_line2 = श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | | verse_line2 = श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,835: | Line 2,038: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि । | | verse_line1 = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि । | ||
| verse_lines = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।;कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | |||
| verse_line2 = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | | verse_line2 = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,844: | Line 2,048: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि । | | verse_line1 = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि । | ||
| verse_lines = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।;अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | |||
| verse_line2 = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | | verse_line2 = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,853: | Line 2,058: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् । | | verse_line1 = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् । | ||
| verse_lines = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।;तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | |||
| verse_line2 = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | | verse_line2 = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,862: | Line 2,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् । | | verse_line1 = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् । | ||
| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।;तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | |||
| verse_line2 = तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | | verse_line2 = तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,871: | Line 2,078: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने । | | verse_line1 = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने । | ||
| verse_lines = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।;वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥ | |||
| verse_line2 = वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥ | | verse_line2 = वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,880: | Line 2,088: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः । | | verse_line1 = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः । | ||
| verse_lines = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।;विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥ | |||
| verse_line2 = विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥ | | verse_line2 = विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,889: | Line 2,098: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् । | | verse_line1 = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् । | ||
| verse_lines = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।;स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | |||
| verse_line2 = स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | | verse_line2 = स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,898: | Line 2,108: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् । | | verse_line1 = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् । | ||
| verse_lines = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।;नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥ | |||
| verse_line2 = नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥ | | verse_line2 = नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,907: | Line 2,118: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । | | verse_line1 = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । | ||
| verse_lines = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।;वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥ | |||
| verse_line2 = वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥ | | verse_line2 = वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,916: | Line 2,128: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् । | | verse_line1 = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् । | ||
| verse_lines = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥ | |||
| verse_line2 = बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥ | | verse_line2 = बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,925: | Line 2,138: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । | | verse_line1 = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । | ||
| verse_lines = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।;कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥ | |||
| verse_line2 = कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥ | | verse_line2 = कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,934: | Line 2,148: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । | | verse_line1 = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । | ||
| verse_lines = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।;यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥ | |||
| verse_line2 = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥ | | verse_line2 = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,943: | Line 2,158: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् । | | verse_line1 = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् । | ||
| verse_lines = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।;येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥ | |||
| verse_line2 = येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥ | | verse_line2 = येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,952: | Line 2,168: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु । | | verse_line1 = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु । | ||
| verse_lines = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।;स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | |||
| verse_line2 = स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | | verse_line2 = स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,961: | Line 2,178: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः । | | verse_line1 = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः । | ||
| verse_lines = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।;अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥ | |||
| verse_line2 = अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥ | | verse_line2 = अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,970: | Line 2,188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु । | | verse_line1 = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु । | ||
| verse_lines = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।;दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।;अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥ | |||
| verse_line2 = दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् । | | verse_line2 = दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,979: | Line 2,198: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । | | verse_line1 = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । | ||
| verse_lines = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।;क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥ | |||
| verse_line2 = क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥ | | verse_line2 = क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,988: | Line 2,208: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = (इति पाद्मे) | | verse_line1 = (इति पाद्मे) | ||
| verse_lines = (इति पाद्मे);वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।;एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरोत्तरम्॥ २२१॥ | |||
| verse_line2 = वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी । | | verse_line2 = वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,997: | Line 2,218: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । | | verse_line1 = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । | ||
| verse_lines = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।;सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥ | | verse_line2 = सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,006: | Line 2,228: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च । | | verse_line1 = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च । | ||
| verse_lines = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च ।;तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥ | |||
| verse_line2 = तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥ | | verse_line2 = तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,015: | Line 2,238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा । | | verse_line1 = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा । | ||
| verse_lines = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा ।;न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥ | |||
| verse_line2 = न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥ | | verse_line2 = न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,024: | Line 2,248: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने । | | verse_line1 = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने । | ||
| verse_lines = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने ।;सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥ | |||
| verse_line2 = सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥ | | verse_line2 = सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,033: | Line 2,258: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते । | | verse_line1 = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते ।;स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥ | |||
| verse_line2 = स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥ | | verse_line2 = स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,042: | Line 2,268: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् । | | verse_line1 = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् । | ||
| verse_lines = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् ।;शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥ | |||
| verse_line2 = शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥ | | verse_line2 = शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,051: | Line 2,278: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् । | | verse_line1 = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् ।;अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥ | |||
| verse_line2 = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥ | | verse_line2 = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,060: | Line 2,288: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । | | verse_line1 = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । | ||
| verse_lines = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।;व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥ | |||
| verse_line2 = व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥ | | verse_line2 = व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,069: | Line 2,298: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा । | | verse_line1 = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा । | ||
| verse_lines = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा ।;तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥ | |||
| verse_line2 = तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥ | | verse_line2 = तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,078: | Line 2,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः । | | verse_line1 = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः । | ||
| verse_lines = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।;वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | |||
| verse_line2 = वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | | verse_line2 = वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,087: | Line 2,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि । | | verse_line1 = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि । | ||
| verse_lines = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।;न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | |||
| verse_line2 = न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | | verse_line2 = न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,096: | Line 2,328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा । | | verse_line1 = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा । | ||
| verse_lines = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।;यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | |||
| verse_line2 = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | | verse_line2 = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,105: | Line 2,338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् । | | verse_line1 = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् । | ||
| verse_lines = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।;अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | |||
| verse_line2 = अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | | verse_line2 = अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,114: | Line 2,348: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | | verse_line1 = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | ||
| verse_lines = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 2,122: | Line 2,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः । | | verse_line1 = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः । | ||
| verse_lines = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।;एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | |||
| verse_line2 = एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | | verse_line2 = एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,131: | Line 2,367: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥ | | verse_line1 = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥ | ||
| verse_lines = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 2,139: | Line 2,376: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । | | verse_line1 = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । | ||
| verse_lines = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।;एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥ | |||
| verse_line2 = एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥ | | verse_line2 = एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,148: | Line 2,386: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च । | | verse_line1 = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च । | ||
| verse_lines = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।;वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | |||
| verse_line2 = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | | verse_line2 = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,157: | Line 2,396: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते । | | verse_line1 = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते । | ||
| verse_lines = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।;निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥ | |||
| verse_line2 = निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥ | | verse_line2 = निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,166: | Line 2,406: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता । | | verse_line1 = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता । | ||
| verse_lines = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।;गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥ | |||
| verse_line2 = गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥ | | verse_line2 = गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,175: | Line 2,416: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | | verse_line1 = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
| verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं;ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।;वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-;र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥ | |||
| verse_line2 = ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | | verse_line2 = ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | ||
}} | }} | ||
| Line 2,184: | Line 2,426: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः । | | verse_line1 = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः । | ||
| verse_lines = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।;प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | |||
| verse_line2 = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | | verse_line2 = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | ||
}} | }} | ||