Bhagavadgitabhashya: Difference between revisions
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| verse_line1 = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । | | verse_line1 = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । | ||
| verse_lines = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।;मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥ | | verse_line2 = मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । | | verse_line1 = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।;आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥ | | verse_line2 = आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥ | ||
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| verse_line1 = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् । | | verse_line1 = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् । | ||
| verse_lines = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।;व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥ | | verse_line2 = व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । | | verse_line1 = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । | ||
| verse_lines = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।;युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥ | | verse_line2 = युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । | | verse_line1 = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । | ||
| verse_lines = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।;पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥ | | verse_line2 = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । | | verse_line1 = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । | ||
| verse_lines = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।;सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥ | | verse_line2 = सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम । | | verse_line1 = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम । | ||
| verse_lines = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।;नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । | | verse_line1 = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । | ||
| verse_lines = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।;अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । | | verse_line1 = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । | ||
| verse_lines = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।;नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । | | verse_line1 = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । | ||
| verse_lines = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।;पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । | | verse_line1 = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । | ||
| verse_lines = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।;भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । | | verse_line1 = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । | ||
| verse_lines = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।;सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥ | | verse_line2 = सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । | | verse_line1 = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । | ||
| verse_lines = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।;सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥ | | verse_line2 = सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । | | verse_line1 = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । | ||
| verse_lines = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।;माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४ ॥ | | verse_line2 = माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४ ॥ | ||
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| verse_line1 = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । | | verse_line1 = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । | ||
| verse_lines = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।;पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥ | | verse_line2 = पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । | | verse_line1 = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । | ||
| verse_lines = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।;नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । | | verse_line1 = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । | ||
| verse_lines = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।;धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥ | | verse_line2 = धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥ | ||
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| verse_lines = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।;सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥ | | verse_line2 = सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । | | verse_line1 = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । | ||
| verse_lines = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।;नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥ | | verse_line2 = नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । | | verse_line1 = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । | ||
| verse_lines = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।;प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥ | |||
| verse_line2 = प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥ | | verse_line2 = प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥ | ||
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| verse_line1 = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते । | | verse_line1 = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते । | ||
| verse_lines = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते । | |||
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| verse_line1 = सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ २१ ॥ | | verse_line1 = सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ २१ ॥ | ||
| verse_lines = सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् । | | verse_line1 = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् । | ||
| verse_lines = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।;कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥ | | verse_line2 = कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥ | ||
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| verse_line1 = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । | | verse_line1 = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । | ||
| verse_lines = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।;धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥ | |||
| verse_line2 = धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥ | | verse_line2 = धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥ | ||
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| verse_line1 = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । | | verse_line1 = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । | ||
| verse_lines = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । | | verse_line1 = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । | ||
| verse_lines = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।;उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥ | | verse_line2 = उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥ | ||
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| verse_line1 = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् । | | verse_line1 = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् । | ||
| verse_lines = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।;आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥ | | verse_line2 = आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥ | ||
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| Line 348: | Line 375: | ||
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| verse_line1 = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । | | verse_line1 = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । | ||
| verse_lines = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।;तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥ | | verse_line2 = तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 357: | Line 385: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्जुन उवाच | | verse_line1 = अर्जुन उवाच | ||
| verse_lines = अर्जुन उवाच;( अर्जुनविषादः );कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।;दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = ( अर्जुनविषादः ) | | verse_line2 = ( अर्जुनविषादः ) | ||
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| Line 366: | Line 395: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । | | verse_line1 = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । | ||
| verse_lines = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।;वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥ | | verse_line2 = वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥ | ||
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| Line 375: | Line 405: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । | | verse_line1 = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । | ||
| verse_lines = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।;न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥ | | verse_line2 = न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 384: | Line 415: | ||
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| verse_line1 = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । | | verse_line1 = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । | ||
| verse_lines = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।;नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । | | verse_line1 = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । | ||
| verse_lines = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।;किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥ | | verse_line2 = किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । | | verse_line1 = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । | ||
| verse_lines = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।;त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥ | | verse_line2 = त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । | | verse_line1 = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । | ||
| verse_lines = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।;मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥ | | verse_line2 = मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥ | ||
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| verse_lines = एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।;अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥ | | verse_line2 = अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥ | ||
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| verse_line1 = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । | | verse_line1 = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । | ||
| verse_lines = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।;पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥ | | verse_line2 = पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 438: | Line 475: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् । | | verse_line1 = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् । | ||
| verse_lines = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।;स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥ | | verse_line2 = स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 447: | Line 485: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । | | verse_line1 = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । | ||
| verse_lines = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।;कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥ | |||
| verse_line2 = कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥ | | verse_line2 = कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 456: | Line 495: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् । | | verse_line1 = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् । | ||
| verse_lines = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।;कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥ | | verse_line2 = कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 465: | Line 505: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । | | verse_line1 = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । | ||
| verse_lines = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।;धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥ | | verse_line2 = धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 474: | Line 515: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । | | verse_line1 = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । | ||
| verse_lines = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।;स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥ | | verse_line2 = स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 483: | Line 525: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । | | verse_line1 = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । | ||
| verse_lines = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।;पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥ | | verse_line2 = पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 492: | Line 535: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । | | verse_line1 = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । | ||
| verse_lines = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।;उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 501: | Line 545: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । | | verse_line1 = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । | ||
| verse_lines = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।;नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 510: | Line 555: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । | | verse_line1 = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । | ||
| verse_lines = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।;यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 519: | Line 565: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः । | | verse_line1 = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः । | ||
| verse_lines = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।;धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥ | |||
| verse_line2 = धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥ | | verse_line2 = धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 530: | Line 577: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । | | verse_line1 = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । | ||
| verse_lines = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।;विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥ | |||
| verse_line2 = विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥ | | verse_line2 = विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 545: | Line 593: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । | | verse_line1 = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । | ||
| verse_lines = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।;विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥ | | verse_line2 = विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 556: | Line 605: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । | | verse_line1 = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । | ||
| verse_lines = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।;अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥ | | verse_line2 = अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 565: | Line 615: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते । | | verse_line1 = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते । | ||
| verse_lines = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।;क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥ | | verse_line2 = क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 576: | Line 627: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । | | verse_line1 = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । | ||
| verse_lines = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।;इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥ | | verse_line2 = इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 585: | Line 637: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । | | verse_line1 = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । | ||
| verse_lines = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।;हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥ | | verse_line2 = हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 594: | Line 647: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । | | verse_line1 = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । | ||
| verse_lines = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।;यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 603: | Line 657: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । | | verse_line1 = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । | ||
| verse_lines = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।;यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥ | | verse_line2 = यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 612: | Line 667: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् । | | verse_line1 = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् । | ||
| verse_lines = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।;अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥ | | verse_line2 = अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 623: | Line 679: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः । | | verse_line1 = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः । | ||
| verse_lines = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।;न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥ | | verse_line2 = न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 632: | Line 689: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । | | verse_line1 = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । | ||
| verse_lines = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥ | | verse_line2 = सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 643: | Line 701: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । | | verse_line1 = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । | ||
| verse_lines = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।;गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | | verse_line2 = गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 661: | Line 720: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । | | verse_line1 = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । | ||
| verse_lines = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।;न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 679: | Line 739: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । | | verse_line1 = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । | ||
| verse_lines = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।;तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥ | | verse_line2 = तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 757: | Line 818: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । | | verse_line1 = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । | ||
| verse_lines = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।;आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 787: | Line 849: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । | | verse_line1 = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । | ||
| verse_lines = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।;समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥ | | verse_line2 = समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 805: | Line 868: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । | | verse_line1 = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । | ||
| verse_lines = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।;उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥ | | verse_line2 = उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 835: | Line 899: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । | | verse_line1 = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । | ||
| verse_lines = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।;विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥ | | verse_line2 = विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥ | ||
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| Line 853: | Line 918: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । | | verse_line1 = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । | ||
| verse_lines = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।;अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | | verse_line2 = अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | ||
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| Line 877: | Line 943: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । | | verse_line1 = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । | ||
| verse_lines = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।;उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | | verse_line2 = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | ||
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| Line 901: | Line 968: | ||
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| verse_line1 = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । | | verse_line1 = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । | ||
| verse_lines = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।;अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | |||
| verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | | verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 925: | Line 993: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । | | verse_line1 = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । | ||
| verse_lines = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।;कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥ | | verse_line2 = कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥ | ||
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| Line 943: | Line 1,012: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । | | verse_line1 = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । | ||
| verse_lines = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।;तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 961: | Line 1,031: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । | | verse_line1 = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । | ||
| verse_lines = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।;नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | | verse_line2 = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 979: | Line 1,050: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । | | verse_line1 = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । | ||
| verse_lines = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।;नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | | verse_line2 = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | ||
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| Line 1,039: | Line 1,111: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते । | | verse_line1 = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते । | ||
| verse_lines = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।;तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥ | | verse_line2 = तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,057: | Line 1,130: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । | | verse_line1 = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । | ||
| verse_lines = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।;तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥ | | verse_line2 = तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥ | ||
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| Line 1,075: | Line 1,149: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । | | verse_line1 = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । | ||
| verse_lines = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।;तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥ | | verse_line2 = तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,093: | Line 1,168: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । | | verse_line1 = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । | ||
| verse_lines = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।;अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥ | | verse_line2 = अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥ | ||
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| Line 1,111: | Line 1,187: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्- | | verse_line1 = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्- | ||
| verse_lines = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-;आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।;आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति;श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः । | | verse_line2 = आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,120: | Line 1,197: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । | | verse_line1 = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । | ||
| verse_lines = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।;तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥ | | verse_line2 = तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,138: | Line 1,216: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि । | | verse_line1 = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि । | ||
| verse_lines = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।;धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥ | | verse_line2 = धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,147: | Line 1,226: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् । | | verse_line1 = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् । | ||
| verse_lines = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।;सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥ | | verse_line2 = सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,156: | Line 1,236: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । | | verse_line1 = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । | ||
| verse_lines = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।;ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥ | | verse_line2 = ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,165: | Line 1,246: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । | | verse_line1 = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । | ||
| verse_lines = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।;सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥ | | verse_line2 = सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,174: | Line 1,256: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । | | verse_line1 = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । | ||
| verse_lines = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।;येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥ | | verse_line2 = येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,183: | Line 1,266: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । | | verse_line1 = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । | ||
| verse_lines = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।;निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ | | verse_line2 = निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,192: | Line 1,276: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । | | verse_line1 = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । | ||
| verse_lines = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।;तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥ | | verse_line2 = तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,201: | Line 1,286: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । | | verse_line1 = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । | ||
| verse_lines = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।;ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥ | |||
| verse_line2 = ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥ | | verse_line2 = ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,210: | Line 1,296: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । | | verse_line1 = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । | ||
| verse_lines = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।;बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥ | | verse_line2 = बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,219: | Line 1,306: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । | | verse_line1 = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । | ||
| verse_lines = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।;स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥ | | verse_line2 = स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥ | ||
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| Line 1,237: | Line 1,325: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । | | verse_line1 = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । | ||
| verse_lines = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।;बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥ | | verse_line2 = बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥ | ||
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| Line 1,255: | Line 1,344: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । | | verse_line1 = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । | ||
| verse_lines = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।;वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥ | | verse_line2 = वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,264: | Line 1,354: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । | | verse_line1 = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । | ||
| verse_lines = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।;क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥ | |||
| verse_line2 = क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥ | | verse_line2 = क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,273: | Line 1,364: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् । | | verse_line1 = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् । | ||
| verse_lines = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।;व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥ | | verse_line2 = व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,291: | Line 1,383: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । | | verse_line1 = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । | ||
| verse_lines = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।;निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥ | | verse_line2 = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,309: | Line 1,402: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । | | verse_line1 = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । | ||
| verse_lines = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।;तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥ | |||
| verse_line2 = तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥ | | verse_line2 = तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 1,327: | Line 1,421: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । | | verse_line1 = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । | ||
| verse_lines = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।;मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥ | |||
| verse_line2 = मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥ | | verse_line2 = मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥ | ||
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| Line 1,351: | Line 1,446: | ||
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| verse_line1 = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । | | verse_line1 = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । | ||
| verse_lines = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।;सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥ | |||
| verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥ | | verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥ | ||
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| Line 1,369: | Line 1,465: | ||
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| verse_line1 = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय । | | verse_line1 = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय । | ||
| verse_lines = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।;बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥ | | verse_line2 = बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥ | ||
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| Line 1,387: | Line 1,484: | ||
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| verse_line1 = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । | | verse_line1 = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । | ||
| verse_lines = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।;तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥ | |||
| verse_line2 = तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥ | | verse_line2 = तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥ | ||
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| Line 1,441: | Line 1,539: | ||
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| verse_line1 = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । | | verse_line1 = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । | ||
| verse_lines = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।;जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥ | |||
| verse_line2 = जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥ | | verse_line2 = जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । | | verse_line1 = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । | ||
| verse_lines = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।;तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥ | |||
| verse_line2 = तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥ | | verse_line2 = तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥ | | verse_line1 = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥ | ||
| verse_lines = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥;समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥ | |||
| verse_line2 = समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥ | | verse_line2 = समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥ | ||
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| Line 1,501: | Line 1,602: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्जुन उवाच | | verse_line1 = अर्जुन उवाच | ||
| verse_lines = अर्जुन उवाच;स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।;स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । | | verse_line2 = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । | ||
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| Line 1,521: | Line 1,623: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । | | verse_line1 = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । | ||
| verse_lines = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।;आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥ | | verse_line2 = आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥ | ||
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| Line 1,545: | Line 1,648: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । | | verse_line1 = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । | ||
| verse_lines = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।;वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥ | |||
| verse_line2 = वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥ | | verse_line2 = वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥ | ||
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| Line 1,563: | Line 1,667: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् । | | verse_line1 = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् । | ||
| verse_lines = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।;नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥ | |||
| verse_line2 = नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥ | | verse_line2 = नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,572: | Line 1,677: | ||
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| verse_line1 = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । | | verse_line1 = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । | ||
| verse_lines = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥ | ||
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| Line 1,590: | Line 1,696: | ||
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| verse_line1 = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । | | verse_line1 = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । | ||
| verse_lines = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।;रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥ | |||
| verse_line2 = रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥ | | verse_line2 = रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥ | ||
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| Line 1,608: | Line 1,715: | ||
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| verse_line1 = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । | | verse_line1 = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । | ||
| verse_lines = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।;इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥ | ||
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| Line 1,626: | Line 1,734: | ||
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| verse_line1 = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । | | verse_line1 = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । | ||
| verse_lines = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।;वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥ | |||
| verse_line2 = वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥ | | verse_line2 = वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥ | ||
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| verse_line1 = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । | | verse_line1 = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । | ||
| verse_lines = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।;सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ | |||
| verse_line2 = सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ | | verse_line2 = सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः । | | verse_line1 = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः । | ||
| verse_lines = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।;स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥ | | verse_line2 = स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥ | ||
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| Line 1,679: | Line 1,790: | ||
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| verse_line1 = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् । | | verse_line1 = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् । | ||
| verse_lines = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।;आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥ | | verse_line2 = आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । | | verse_line1 = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । | ||
| verse_lines = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।;प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥ | | verse_line2 = प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥ | ||
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| verse_line1 = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । | | verse_line1 = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । | ||
| verse_lines = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।;न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥ | |||
| verse_line2 = न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥ | | verse_line2 = न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥ | ||
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| verse_line1 = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । | | verse_line1 = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।;तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥ | |||
| verse_line2 = तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥ | | verse_line2 = तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । | | verse_line1 = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । | ||
| verse_lines = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥ | ||
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| verse_line1 = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । | | verse_line1 = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । | ||
| verse_lines = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।;यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥ | | verse_line2 = यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् । | | verse_line1 = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् । | ||
| verse_lines = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।;तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥ | |||
| verse_line2 = तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥ | | verse_line2 = तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥ | ||
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| verse_line1 = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । | | verse_line1 = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । | ||
| verse_lines = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।;निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥ | | verse_line2 = निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥ | ||
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| verse_line1 = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । | | verse_line1 = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । | ||
| verse_lines = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।;स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥ | | verse_line2 = स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥ | ||
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| verse_line1 = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । | | verse_line1 = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । | ||
| verse_lines = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।;तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ | | verse_line2 = तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । | | verse_line1 = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । | ||
| verse_lines = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।;तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच | ||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ । | | verse_line1 = लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ । | ||
| verse_lines = लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ ।;ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । | | verse_line1 = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । | ||
| verse_lines = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।;न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । | | verse_line1 = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । | ||
| verse_lines = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।;कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । | | verse_line1 = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । | ||
| verse_lines = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।;इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन । | | verse_line1 = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन । | ||
| verse_lines = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।;कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । | | verse_line1 = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । | ||
| verse_lines = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।;शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । | | verse_line1 = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । | ||
| verse_lines = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।;तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । | | verse_line1 = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । | ||
| verse_lines = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।;अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । | | verse_line1 = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । | ||
| verse_lines = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।;परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । | | verse_line1 = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । | ||
| verse_lines = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।;तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥ | | verse_line2 = तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । | | verse_line1 = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । | ||
| verse_lines = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।;भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥ | | verse_line2 = भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः । | | verse_line1 = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः । | ||
| verse_lines = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।;यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । | | verse_line1 = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । | ||
| verse_lines = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।;तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,175: | Line 2,311: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । | | verse_line1 = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । | ||
| verse_lines = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।;अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥ | | verse_line2 = अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥ | ||
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| Line 2,193: | Line 2,330: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः । | | verse_line1 = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः । | ||
| verse_lines = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।;आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 2,229: | Line 2,367: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । | | verse_line1 = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । | ||
| verse_lines = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।;न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 2,259: | Line 2,398: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । | | verse_line1 = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । | ||
| verse_lines = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।;असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 2,277: | Line 2,417: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । | | verse_line1 = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । | ||
| verse_lines = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।;लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥ | | verse_line2 = लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥ | ||
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| Line 2,313: | Line 2,454: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । | | verse_line1 = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । | ||
| verse_lines = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।;स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,331: | Line 2,473: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । | | verse_line1 = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । | ||
| verse_lines = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।;नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥ | | verse_line2 = नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,340: | Line 2,483: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । | | verse_line1 = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । | ||
| verse_lines = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।;मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥ | | verse_line2 = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,349: | Line 2,493: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । | | verse_line1 = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । | ||
| verse_lines = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।;सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ | |||
| verse_line2 = सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ | | verse_line2 = सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,358: | Line 2,503: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । | | verse_line1 = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । | ||
| verse_lines = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।;कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥ | | verse_line2 = कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,367: | Line 2,513: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । | | verse_line1 = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । | ||
| verse_lines = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।;जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥ | | verse_line2 = जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,376: | Line 2,523: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । | | verse_line1 = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । | ||
| verse_lines = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।;अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥ | | verse_line2 = अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥ | ||
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| Line 2,394: | Line 2,542: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । | | verse_line1 = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । | ||
| verse_lines = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।;गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥ | | verse_line2 = गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,412: | Line 2,561: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । | | verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । | ||
| verse_lines = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।;तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥ | | verse_line2 = तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,430: | Line 2,580: | ||
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| verse_line1 = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । | | verse_line1 = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । | ||
| verse_lines = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।;निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥ | | verse_line2 = निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,448: | Line 2,599: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । | | verse_line1 = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । | ||
| verse_lines = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।;श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,457: | Line 2,609: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । | | verse_line1 = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । | ||
| verse_lines = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।;सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥ | | verse_line2 = सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,475: | Line 2,628: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । | | verse_line1 = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । | ||
| verse_lines = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।;प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥ | | verse_line2 = प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,493: | Line 2,647: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । | | verse_line1 = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । | ||
| verse_lines = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।;तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,511: | Line 2,666: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | | verse_line1 = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | ||
| verse_lines = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।;स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥ | | verse_line2 = स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,531: | Line 2,687: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । | | verse_line1 = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । | ||
| verse_lines = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।;अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,551: | Line 2,708: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । | | verse_line1 = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । | ||
| verse_lines = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।;महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥ | | verse_line2 = महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,569: | Line 2,727: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । | | verse_line1 = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । | ||
| verse_lines = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।;यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,587: | Line 2,746: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । | | verse_line1 = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । | ||
| verse_lines = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।;कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥ | | verse_line2 = कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,605: | Line 2,765: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । | | verse_line1 = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।;एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥ | | verse_line2 = एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥ | ||
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| Line 2,623: | Line 2,784: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । | | verse_line1 = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । | ||
| verse_lines = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।;पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥ | | verse_line2 = पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥ | ||
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| Line 2,641: | Line 2,803: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । | | verse_line1 = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।;मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,650: | Line 2,813: | ||
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| verse_line1 = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । | | verse_line1 = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । | ||
| verse_lines = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।;जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥ | |||
| verse_line2 = जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥ | | verse_line2 = जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥ | ||
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| Line 2,678: | Line 2,842: | ||
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| verse_line1 = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । | | verse_line1 = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । | ||
| verse_lines = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।;विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥ | | verse_line2 = विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,687: | Line 2,852: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । | | verse_line1 = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । | ||
| verse_lines = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।;स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥ | | verse_line2 = स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,696: | Line 2,862: | ||
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| verse_line1 = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । | | verse_line1 = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । | ||
| verse_lines = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।;भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥ | | verse_line2 = भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥ | ||
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| Line 2,716: | Line 2,883: | ||
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| verse_line1 = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । | | verse_line1 = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । | ||
| verse_lines = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।;कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥ | | verse_line2 = कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,727: | Line 2,895: | ||
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| verse_line1 = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । | | verse_line1 = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । | ||
| verse_lines = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।;तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,745: | Line 2,914: | ||
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| verse_line1 = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | | verse_line1 = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | ||
| verse_lines = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।;प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥ | | verse_line2 = प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 2,754: | Line 2,924: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । | | verse_line1 = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । | ||
| verse_lines = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।;अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥ | | verse_line2 = अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 2,778: | Line 2,949: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । | | verse_line1 = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । | ||
| verse_lines = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।;धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥ | | verse_line2 = धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥ | ||
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| Line 2,796: | Line 2,968: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । | | verse_line1 = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । | ||
| verse_lines = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।;त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥ | | verse_line2 = त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥ | ||
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| Line 2,814: | Line 2,987: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । | | verse_line1 = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । | ||
| verse_lines = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।;बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥ | | verse_line2 = बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥ | ||
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| Line 2,832: | Line 3,006: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । | | verse_line1 = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । | ||
| verse_lines = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।;मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥ | | verse_line2 = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥ | ||
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| Line 2,856: | Line 3,031: | ||
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| verse_line1 = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । | | verse_line1 = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । | ||
| verse_lines = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।;क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥ | | verse_line2 = क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । | | verse_line1 = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । | ||
| verse_lines = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।;तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । | | verse_line1 = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । | ||
| verse_lines = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।;इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥ | | verse_line2 = इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥ | ||
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| Line 2,910: | Line 3,088: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । | | verse_line1 = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । | ||
| verse_lines = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।;कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥ | | verse_line2 = कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥ | ||
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| Line 2,928: | Line 3,107: | ||
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| verse_line1 = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । | | verse_line1 = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । | ||
| verse_lines = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।;तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥ | | verse_line2 = तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥ | ||
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| verse_line1 = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । | | verse_line1 = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । | ||
| verse_lines = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।;अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥ | | verse_line2 = अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः । | | verse_line1 = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः । | ||
| verse_lines = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।;स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥ | | verse_line2 = स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥ | ||
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| Line 2,982: | Line 3,164: | ||
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| verse_line1 = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । | | verse_line1 = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । | ||
| verse_lines = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।;ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,000: | Line 3,183: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । | | verse_line1 = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । | ||
| verse_lines = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।;कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥ | | verse_line2 = कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,018: | Line 3,202: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । | | verse_line1 = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । | ||
| verse_lines = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।;शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥ | | verse_line2 = शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । | | verse_line1 = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । | ||
| verse_lines = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।;समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥ | | verse_line2 = समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । | | verse_line1 = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । | ||
| verse_lines = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।;यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥ | | verse_line2 = यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । | | verse_line1 = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । | ||
| verse_lines = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।;ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥ | ||
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| verse_line1 = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । | | verse_line1 = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । | ||
| verse_lines = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।;ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,099: | Line 3,288: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । | | verse_line1 = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । | ||
| verse_lines = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।;शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥ | | verse_line2 = शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । | | verse_line1 = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । | ||
| verse_lines = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।;आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥ | | verse_line2 = आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे । | | verse_line1 = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे । | ||
| verse_lines = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।;स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥ | | verse_line2 = स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे । | | verse_line1 = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे । | ||
| verse_lines = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।;प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥ | | verse_line2 = प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । | | verse_line1 = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । | ||
| verse_lines = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।;सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥ | | verse_line2 = सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । | | verse_line1 = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । | ||
| verse_lines = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।;नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥ | | verse_line2 = नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । | | verse_line1 = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । | ||
| verse_lines = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।;कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥ | | verse_line2 = कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप । | | verse_line1 = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप । | ||
| verse_lines = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।;सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥ | | verse_line2 = सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया । | | verse_line1 = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया । | ||
| verse_lines = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।;उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥ | | verse_line2 = उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । | | verse_line1 = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । | ||
| verse_lines = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।;येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥ | | verse_line2 = येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । | | verse_line1 = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । | ||
| verse_lines = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।;सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥ | | verse_line2 = सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । | | verse_line1 = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । | ||
| verse_lines = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।;ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥ | ||
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| verse_line1 = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । | | verse_line1 = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । | ||
| verse_lines = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।;तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽत्मनि विन्दति॥३८ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः । | | verse_line1 = श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः ।;ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥ | ||
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| Line 3,324: | Line 3,527: | ||
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| verse_line1 = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । | | verse_line1 = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । | ||
| verse_lines = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।;नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥ | | verse_line2 = नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥ | ||
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| Line 3,333: | Line 3,537: | ||
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| verse_line1 = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । | | verse_line1 = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । | ||
| verse_lines = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।;आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥ | | verse_line2 = आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,342: | Line 3,547: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । | | verse_line1 = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । | ||
| verse_lines = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।;छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥ | | verse_line2 = छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,363: | Line 3,569: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । | | verse_line1 = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । | ||
| verse_lines = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।;यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥ | | verse_line2 = यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥ | ||
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| Line 3,383: | Line 3,590: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । | | verse_line1 = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । | ||
| verse_lines = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।;तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥ | | verse_line2 = तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥ | ||
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| Line 3,401: | Line 3,609: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । | | verse_line1 = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । | ||
| verse_lines = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।;निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥ | | verse_line2 = निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥ | ||
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| Line 3,419: | Line 3,628: | ||
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| verse_line1 = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । | | verse_line1 = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । | ||
| verse_lines = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।;एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥ | | verse_line2 = एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥ | ||
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| Line 3,437: | Line 3,647: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते । | | verse_line1 = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते । | ||
| verse_lines = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।;एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥ | | verse_line2 = एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥ | ||
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| Line 3,455: | Line 3,666: | ||
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| verse_line1 = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । | | verse_line1 = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । | ||
| verse_lines = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।;योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥ | | verse_line2 = योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥ | ||
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| Line 3,473: | Line 3,685: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । | | verse_line1 = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।;सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 3,499: | Line 3,712: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । | | verse_line1 = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । | ||
| verse_lines = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।;पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥ | | verse_line2 = पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,509: | Line 3,723: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि । | | verse_line1 = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि । | ||
| verse_lines = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,518: | Line 3,733: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । | | verse_line1 = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।;लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥ | | verse_line2 = लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,536: | Line 3,752: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । | | verse_line1 = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । | ||
| verse_lines = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।;योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥ | | verse_line2 = योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,554: | Line 3,771: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । | | verse_line1 = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । | ||
| verse_lines = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।;अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥ | | verse_line2 = अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,572: | Line 3,790: | ||
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| verse_line1 = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । | | verse_line1 = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । | ||
| verse_lines = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।;नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥ | | verse_line2 = नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥ | ||
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| Line 3,590: | Line 3,809: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । | | verse_line1 = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । | ||
| verse_lines = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।;न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥ | | verse_line2 = न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,599: | Line 3,819: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । | | verse_line1 = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । | ||
| verse_lines = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।;अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥ | | verse_line2 = अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,617: | Line 3,838: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । | | verse_line1 = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । | ||
| verse_lines = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।;तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥ | | verse_line2 = तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,635: | Line 3,857: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः । | | verse_line1 = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः । | ||
| verse_lines = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।;गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥ | | verse_line2 = गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,653: | Line 3,876: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । | | verse_line1 = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । | ||
| verse_lines = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।;शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥ | | verse_line2 = शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,671: | Line 3,895: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । | | verse_line1 = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । | ||
| verse_lines = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।;निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥ | | verse_line2 = निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,697: | Line 3,922: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । | | verse_line1 = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । | ||
| verse_lines = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।;स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥ | | verse_line2 = स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,707: | Line 3,933: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । | | verse_line1 = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । | ||
| verse_lines = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।;स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥ | | verse_line2 = स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,725: | Line 3,952: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । | | verse_line1 = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । | ||
| verse_lines = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।;आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥ | | verse_line2 = आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,743: | Line 3,971: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । | | verse_line1 = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । | ||
| verse_lines = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।;कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥ | | verse_line2 = कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥ | ||
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| Line 3,769: | Line 3,998: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । | | verse_line1 = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । | ||
| verse_lines = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।;स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥ | | verse_line2 = स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,787: | Line 4,017: | ||
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| verse_line1 = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः । | | verse_line1 = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः । | ||
| verse_lines = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।;छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥ | | verse_line2 = छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥ | ||
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| Line 3,805: | Line 4,036: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । | | verse_line1 = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । | ||
| verse_lines = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।;अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥ | | verse_line2 = अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥ | ||
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| Line 3,823: | Line 4,055: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । | | verse_line1 = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । | ||
| verse_lines = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।;प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥ | | verse_line2 = प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,832: | Line 4,065: | ||
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| verse_line1 = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः । | | verse_line1 = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः । | ||
| verse_lines = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।;विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥ | | verse_line2 = विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,850: | Line 4,084: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । | | verse_line1 = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । | ||
| verse_lines = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।;सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥ | | verse_line2 = सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,880: | Line 4,115: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । | | verse_line1 = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । | ||
| verse_lines = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।;स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥ | | verse_line2 = स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥ | ||
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| Line 3,898: | Line 4,134: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । | | verse_line1 = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । | ||
| verse_lines = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।;न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥ | | verse_line2 = न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥ | ||
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| Line 3,916: | Line 4,153: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । | | verse_line1 = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । | ||
| verse_lines = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।;योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥ | | verse_line2 = योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,934: | Line 4,172: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । | | verse_line1 = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । | ||
| verse_lines = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।;सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥ | | verse_line2 = सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,952: | Line 4,191: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् । | | verse_line1 = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् । | ||
| verse_lines = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।;आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥ | | verse_line2 = आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥ | ||
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| Line 3,970: | Line 4,210: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः । | | verse_line1 = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः । | ||
| verse_lines = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।;अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥ | | verse_line2 = अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 3,988: | Line 4,229: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । | | verse_line1 = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । | ||
| verse_lines = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।;शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥ | | verse_line2 = शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,997: | Line 4,239: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः । | | verse_line1 = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः । | ||
| verse_lines = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।;युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥ | | verse_line2 = युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,015: | Line 4,258: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । | | verse_line1 = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । | ||
| verse_lines = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।;साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥ | | verse_line2 = साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,045: | Line 4,289: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । | | verse_line1 = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । | ||
| verse_lines = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।;एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥ | | verse_line2 = एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,054: | Line 4,299: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । | | verse_line1 = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । | ||
| verse_lines = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।;नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥ | | verse_line2 = नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥ | ||
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| Line 4,072: | Line 4,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । | | verse_line1 = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । | ||
| verse_lines = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।;उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥ | | verse_line2 = उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,081: | Line 4,328: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । | | verse_line1 = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । | ||
| verse_lines = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।;सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥ | | verse_line2 = सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,090: | Line 4,338: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । | | verse_line1 = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । | ||
| verse_lines = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।;मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥ | | verse_line2 = मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,108: | Line 4,357: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । | | verse_line1 = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । | ||
| verse_lines = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।;शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥ | | verse_line2 = शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,126: | Line 4,376: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । | | verse_line1 = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । | ||
| verse_lines = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।;न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥ | | verse_line2 = न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,144: | Line 4,395: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । | | verse_line1 = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । | ||
| verse_lines = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।;युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥ | | verse_line2 = युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,162: | Line 4,414: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । | | verse_line1 = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । | ||
| verse_lines = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।;निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥ | | verse_line2 = निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,180: | Line 4,433: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । | | verse_line1 = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । | ||
| verse_lines = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।;योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥ | | verse_line2 = योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,198: | Line 4,452: | ||
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| verse_line1 = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । | | verse_line1 = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । | ||
| verse_lines = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।;यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥ | | verse_line2 = यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,216: | Line 4,471: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । | | verse_line1 = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । | ||
| verse_lines = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।;वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥ | | verse_line2 = वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,234: | Line 4,490: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । | | verse_line1 = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । | ||
| verse_lines = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।;यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥ | | verse_line2 = यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,243: | Line 4,500: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । | | verse_line1 = तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । | ||
| verse_lines = तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।;स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥ | | verse_line2 = स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,261: | Line 4,519: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । | | verse_line1 = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । | ||
| verse_lines = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।;मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥ | | verse_line2 = मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,279: | Line 4,538: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । | | verse_line1 = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । | ||
| verse_lines = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।;आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥ | | verse_line2 = आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥ | ||
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| Line 4,297: | Line 4,557: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । | | verse_line1 = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । | ||
| verse_lines = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।;ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥ | | verse_line2 = ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥ | ||
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| Line 4,315: | Line 4,576: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । | | verse_line1 = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।;उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥ | | verse_line2 = उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,324: | Line 4,586: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः । | | verse_line1 = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः । | ||
| verse_lines = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।;सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥ | | verse_line2 = सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥ | ||
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| Line 4,342: | Line 4,605: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि । | | verse_line1 = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि । | ||
| verse_lines = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।;ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥ | | verse_line2 = ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । | | verse_line1 = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । | ||
| verse_lines = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।;तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥ | | verse_line2 = तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । | | verse_line1 = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । | ||
| verse_lines = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।;सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥ | | verse_line2 = सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । | | verse_line1 = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । | ||
| verse_lines = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।;सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥ | | verse_line2 = सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । | | verse_line1 = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । | ||
| verse_lines = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।;एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥ | | verse_line2 = एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,425: | Line 4,693: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । | | verse_line1 = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । | ||
| verse_lines = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।;तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥ | | verse_line2 = तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,436: | Line 4,705: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । | | verse_line1 = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । | ||
| verse_lines = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।;अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥ | | verse_line2 = अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥ | ||
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| Line 4,454: | Line 4,724: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । | | verse_line1 = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । | ||
| verse_lines = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।;वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥ | | verse_line2 = वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥ | ||
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| Line 4,474: | Line 4,745: | ||
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| verse_line1 = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । | | verse_line1 = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । | ||
| verse_lines = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।;अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥ | | verse_line2 = अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥ | ||
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| Line 4,492: | Line 4,764: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति । | | verse_line1 = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति । | ||
| verse_lines = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।;अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥ | | verse_line2 = अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,501: | Line 4,774: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । | | verse_line1 = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । | ||
| verse_lines = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।;त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥ | | verse_line2 = त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,512: | Line 4,786: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । | | verse_line1 = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । | ||
| verse_lines = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।;न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥ | | verse_line2 = न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,521: | Line 4,796: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । | | verse_line1 = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । | ||
| verse_lines = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।;शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥ | | verse_line2 = शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,530: | Line 4,806: | ||
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| verse_line1 = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । | | verse_line1 = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । | ||
| verse_lines = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।;एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥ | | verse_line2 = एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । | | verse_line1 = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । | ||
| verse_lines = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।;यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥ | |||
| verse_line2 = यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥ | | verse_line2 = यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,548: | Line 4,826: | ||
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| verse_line1 = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । | | verse_line1 = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । | ||
| verse_lines = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।;जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥ | |||
| verse_line2 = जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥ | | verse_line2 = जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । | | verse_line1 = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । | ||
| verse_lines = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।;अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥ | |||
| verse_line2 = अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥ | | verse_line2 = अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥ | ||
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| verse_line1 = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । | | verse_line1 = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । | ||
| verse_lines = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।;कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥ | | verse_line2 = कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । | | verse_line1 = योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । | ||
| verse_lines = योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।;श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥ | | verse_line2 = श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_line1 = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः । | | verse_line1 = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः । | ||
| verse_lines = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।;असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥ | | verse_line2 = असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥ | ||
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| Line 4,645: | Line 4,928: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । | | verse_line1 = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । | ||
| verse_lines = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।;यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥ | | verse_line2 = यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,663: | Line 4,947: | ||
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| verse_line1 = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । | | verse_line1 = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । | ||
| verse_lines = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।;यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥ | | verse_line2 = यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥ | ||
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| verse_line1 = भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । | | verse_line1 = भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । | ||
| verse_lines = भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।;अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥ | | verse_line2 = अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । | | verse_line1 = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । | ||
| verse_lines = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥ | | verse_line2 = जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । | | verse_line1 = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । | ||
| verse_lines = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।;अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥ | | verse_line2 = अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥ | ||
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| Line 4,735: | Line 5,023: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । | | verse_line1 = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । | ||
| verse_lines = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।;मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥ | | verse_line2 = मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,753: | Line 5,042: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः । | | verse_line1 = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः । | ||
| verse_lines = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।;प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥ | | verse_line2 = प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । | | verse_line1 = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । | ||
| verse_lines = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।;जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥ | | verse_line2 = जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,771: | Line 5,062: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । | | verse_line1 = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । | ||
| verse_lines = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।;बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥ | | verse_line2 = बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,780: | Line 5,072: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् । | | verse_line1 = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् । | ||
| verse_lines = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।;धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥ | | verse_line2 = धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,804: | Line 5,097: | ||
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| verse_line1 = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । | | verse_line1 = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । | ||
| verse_lines = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।;मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥ | | verse_line2 = मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥ | ||
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| verse_line1 = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । | | verse_line1 = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । | ||
| verse_lines = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।;मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥ | ||
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| verse_line1 = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । | | verse_line1 = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । | ||
| verse_lines = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।;मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥ | | verse_line2 = मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥ | ||
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| verse_line1 = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । | | verse_line1 = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । | ||
| verse_lines = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।;माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥ | | verse_line2 = माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥ | ||
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| verse_line1 = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । | | verse_line1 = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । | ||
| verse_lines = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।;आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥ | | verse_line2 = आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । | | verse_line1 = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । | ||
| verse_lines = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।;प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥ | | verse_line2 = प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,894: | Line 5,193: | ||
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| verse_line1 = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । | | verse_line1 = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । | ||
| verse_lines = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।;आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥ | | verse_line2 = आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥ | ||
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| verse_line1 = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते । | | verse_line1 = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते । | ||
| verse_lines = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।;वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥ | | verse_line2 = वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥ | ||
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| Line 4,930: | Line 5,231: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । | | verse_line1 = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । | ||
| verse_lines = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।;तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥ | | verse_line2 = तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,948: | Line 5,250: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति । | | verse_line1 = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति । | ||
| verse_lines = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।;तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥ | | verse_line2 = तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,957: | Line 5,260: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । | | verse_line1 = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । | ||
| verse_lines = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।;लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥ | | verse_line2 = लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 4,966: | Line 5,270: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । | | verse_line1 = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । | ||
| verse_lines = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।;देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥ | | verse_line2 = देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 4,984: | Line 5,289: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । | | verse_line1 = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । | ||
| verse_lines = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।;परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥ | | verse_line2 = परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,002: | Line 5,308: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । | | verse_line1 = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । | ||
| verse_lines = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।;मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥ | | verse_line2 = मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥ | ||
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| Line 5,020: | Line 5,327: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । | | verse_line1 = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । | ||
| verse_lines = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।;भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥ | | verse_line2 = भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥ | ||
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| Line 5,038: | Line 5,346: | ||
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| verse_line1 = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । | | verse_line1 = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । | ||
| verse_lines = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।;सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥ | | verse_line2 = सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥ | ||
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| Line 5,056: | Line 5,365: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । | | verse_line1 = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । | ||
| verse_lines = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।;ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥ | | verse_line2 = ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥ | ||
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| Line 5,074: | Line 5,384: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । | | verse_line1 = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । | ||
| verse_lines = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।;ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥ | | verse_line2 = ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,083: | Line 5,394: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । | | verse_line1 = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । | ||
| verse_lines = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।;प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥ | | verse_line2 = प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥ | ||
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| Line 5,117: | Line 5,429: | ||
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| verse_line1 = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । | | verse_line1 = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । | ||
| verse_lines = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।;अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥ | | verse_line2 = अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,126: | Line 5,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन । | | verse_line1 = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन । | ||
| verse_lines = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।;प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥ | | verse_line2 = प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,137: | Line 5,451: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । | | verse_line1 = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । | ||
| verse_lines = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।;भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥ | | verse_line2 = भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,155: | Line 5,470: | ||
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| verse_line1 = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥ | | verse_line1 = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥ | ||
| verse_lines = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥;अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥ | | verse_line2 = अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,185: | Line 5,501: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । | | verse_line1 = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । | ||
| verse_lines = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।;यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥ | | verse_line2 = यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,203: | Line 5,520: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । | | verse_line1 = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । | ||
| verse_lines = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।;तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥ | | verse_line2 = तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,212: | Line 5,530: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । | | verse_line1 = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । | ||
| verse_lines = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।;मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥ | | verse_line2 = मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,230: | Line 5,549: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । | | verse_line1 = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । | ||
| verse_lines = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।;परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥ | | verse_line2 = परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,248: | Line 5,568: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः। | | verse_line1 = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः। | ||
| verse_lines = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।;सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥ | | verse_line2 = सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,266: | Line 5,587: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । | | verse_line1 = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । | ||
| verse_lines = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।;भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,284: | Line 5,606: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । | | verse_line1 = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । | ||
| verse_lines = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।;यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,302: | Line 5,625: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । | | verse_line1 = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । | ||
| verse_lines = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।;मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,311: | Line 5,635: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । | | verse_line1 = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । | ||
| verse_lines = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।;यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,329: | Line 5,654: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । | | verse_line1 = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । | ||
| verse_lines = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।;तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥ | | verse_line2 = तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥ | ||
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| Line 5,347: | Line 5,673: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । | | verse_line1 = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । | ||
| verse_lines = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।;नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥ | | verse_line2 = नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥ | ||
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| Line 5,365: | Line 5,692: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । | | verse_line1 = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । | ||
| verse_lines = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।;मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥ | | verse_line2 = मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,383: | Line 5,711: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । | | verse_line1 = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । | ||
| verse_lines = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।;रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥ | | verse_line2 = रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,392: | Line 5,721: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । | | verse_line1 = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । | ||
| verse_lines = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।;रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥ | | verse_line2 = रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,401: | Line 5,731: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । | | verse_line1 = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । | ||
| verse_lines = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।;रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥ | | verse_line2 = रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,410: | Line 5,741: | ||
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| verse_line1 = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः । | | verse_line1 = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः । | ||
| verse_lines = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।;यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।;यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥ | |||
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| verse_line1 = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । | | verse_line1 = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । | ||
| verse_lines = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।;प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥ | | verse_line2 = प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥ | ||
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| Line 5,482: | Line 5,817: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । | | verse_line1 = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । | ||
| verse_lines = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।;तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥ | | verse_line2 = तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,491: | Line 5,827: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । | | verse_line1 = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । | ||
| verse_lines = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।;तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥ | | verse_line2 = तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,500: | Line 5,837: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । | | verse_line1 = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । | ||
| verse_lines = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।;एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥ | | verse_line2 = एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥ | ||
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| Line 5,518: | Line 5,856: | ||
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| verse_line1 = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । | | verse_line1 = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । | ||
| verse_lines = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।;तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥ | | verse_line2 = तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,527: | Line 5,866: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । | | verse_line1 = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । | ||
| verse_lines = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।;अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।;॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् । | | verse_line2 = अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् । | ||
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| Line 5,561: | Line 5,901: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । | | verse_line1 = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । | ||
| verse_lines = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।;ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । | | verse_line1 = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।;प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥ | | verse_line2 = प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,579: | Line 5,921: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । | | verse_line1 = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । | ||
| verse_lines = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।;अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥ | | verse_line2 = अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥ | ||
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| verse_line1 = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । | | verse_line1 = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । | ||
| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।;मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥ | | verse_line2 = मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । | | verse_line1 = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । | ||
| verse_lines = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।;भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥ | | verse_line2 = भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । | | verse_line1 = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । | ||
| verse_lines = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।;तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥ | | verse_line2 = तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । | | verse_line1 = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । | ||
| verse_lines = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।;कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥ | | verse_line2 = कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥ | ||
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| Line 5,669: | Line 6,016: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । | | verse_line1 = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । | ||
| verse_lines = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।;भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥ | | verse_line2 = भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥ | ||
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| Line 5,687: | Line 6,035: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । | | verse_line1 = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । | ||
| verse_lines = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।;उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥ | | verse_line2 = उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,705: | Line 6,054: | ||
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| verse_line1 = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । | | verse_line1 = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । | ||
| verse_lines = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।;हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥ | | verse_line2 = हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥ | ||
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| verse_line1 = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | | verse_line1 = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | ||
| verse_lines = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।;परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥ | | verse_line2 = परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥ | ||
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| Line 5,741: | Line 6,092: | ||
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| verse_line1 = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । | | verse_line1 = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । | ||
| verse_lines = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।;राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥ | | verse_line2 = राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । | | verse_line1 = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । | ||
| verse_lines = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।;भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,780: | Line 6,133: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । | | verse_line1 = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । | ||
| verse_lines = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।;नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥ | | verse_line2 = नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥ | ||
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| Line 5,798: | Line 6,152: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । | | verse_line1 = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । | ||
| verse_lines = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।;एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥ | | verse_line2 = एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् । | | verse_line1 = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् । | ||
| verse_lines = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।;मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥ | | verse_line2 = मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥ | ||
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| verse_line1 = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । | | verse_line1 = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । | ||
| verse_lines = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।;वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥ | | verse_line2 = वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 5,843: | Line 6,200: | ||
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| verse_line1 = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । | | verse_line1 = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । | ||
| verse_lines = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।;प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥ | | verse_line2 = प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । | | verse_line1 = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । | ||
| verse_lines = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।;अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥ | | verse_line2 = अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥ | ||
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| Line 5,879: | Line 6,238: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः | | verse_line1 = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः | ||
| verse_lines = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः;यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।;ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं;अश्नन्तिदिव्यान् दिवि देवभोगान् ॥२०॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । | | verse_line2 = यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । | ||
}} | }} | ||
| Line 5,888: | Line 6,248: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं | | verse_line1 = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं | ||
| verse_lines = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं;क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।;एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना;गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । | | verse_line2 = क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 5,906: | Line 6,267: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । | | verse_line1 = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । | ||
| verse_lines = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।;तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥ | | verse_line2 = तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥ | ||
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| Line 5,924: | Line 6,286: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । | | verse_line1 = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । | ||
| verse_lines = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।;तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥ | | verse_line2 = तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥ | ||
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| Line 5,942: | Line 6,305: | ||
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| verse_line1 = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । | | verse_line1 = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । | ||
| verse_lines = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।;न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥ | | verse_line2 = न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥ | ||
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| Line 5,960: | Line 6,324: | ||
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| verse_line1 = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः । | | verse_line1 = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः । | ||
| verse_lines = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।;भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥ | | verse_line2 = भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । | | verse_line1 = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । | ||
| verse_lines = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।;तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥ | | verse_line2 = तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥ | ||
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| verse_lines = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।;यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥ | |||
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| Line 6,005: | Line 6,372: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | | verse_line1 = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | ||
| verse_lines = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।;संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥ | | verse_line2 = संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,023: | Line 6,391: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । | | verse_line1 = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । | ||
| verse_lines = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।;ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥ | | verse_line2 = ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥ | ||
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| Line 6,041: | Line 6,410: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । | | verse_line1 = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । | ||
| verse_lines = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।;साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥ | | verse_line2 = साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,059: | Line 6,429: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । | | verse_line1 = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । | ||
| verse_lines = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।;कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥ | | verse_line2 = कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,068: | Line 6,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । | | verse_line1 = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । | ||
| verse_lines = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।;स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥ | | verse_line2 = स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,077: | Line 6,449: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । | | verse_line1 = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । | ||
| verse_lines = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।;अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥ | | verse_line2 = अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,086: | Line 6,459: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | | verse_line1 = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | ||
| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥ | | verse_line2 = मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,116: | Line 6,490: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः । | | verse_line1 = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः । | ||
| verse_lines = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।;यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥ | | verse_line2 = यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥ | ||
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| Line 6,134: | Line 6,509: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । | | verse_line1 = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । | ||
| verse_lines = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।;अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥ | | verse_line2 = अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥ | ||
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| Line 6,152: | Line 6,528: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । | | verse_line1 = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । | ||
| verse_lines = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।;असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥ | | verse_line2 = असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥ | ||
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| Line 6,170: | Line 6,547: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । | | verse_line1 = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । | ||
| verse_lines = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।;सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥ | | verse_line2 = सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,179: | Line 6,557: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । | | verse_line1 = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । | ||
| verse_lines = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।;भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥ | | verse_line2 = भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥ | ||
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| Line 6,197: | Line 6,576: | ||
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| verse_line1 = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । | | verse_line1 = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । | ||
| verse_lines = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।;मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥ | | verse_line2 = मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,221: | Line 6,601: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । | | verse_line1 = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । | ||
| verse_lines = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।;सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥ | | verse_line2 = सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,230: | Line 6,611: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । | | verse_line1 = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । | ||
| verse_lines = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।;इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥ | | verse_line2 = इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,239: | Line 6,621: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । | | verse_line1 = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । | ||
| verse_lines = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।;कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥ | | verse_line2 = कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,248: | Line 6,631: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । | | verse_line1 = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । | ||
| verse_lines = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।;ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥ | | verse_line2 = ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,257: | Line 6,641: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । | | verse_line1 = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । | ||
| verse_lines = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।;नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥ | | verse_line2 = नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥ | ||
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| Line 6,277: | Line 6,662: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । | | verse_line1 = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । | ||
| verse_lines = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।;पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,286: | Line 6,672: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । | | verse_line1 = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । | ||
| verse_lines = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।;असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥ | | verse_line2 = असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,295: | Line 6,682: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । | | verse_line1 = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । | ||
| verse_lines = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।;न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥ | | verse_line2 = न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,304: | Line 6,692: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । | | verse_line1 = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । | ||
| verse_lines = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।;भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥ | | verse_line2 = भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥ | ||
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| Line 6,322: | Line 6,711: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | | verse_line1 = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | ||
| verse_lines = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।;याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥ | | verse_line2 = याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,340: | Line 6,730: | ||
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| verse_line1 = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् । | | verse_line1 = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् । | ||
| verse_lines = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।;केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥ | | verse_line2 = केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,349: | Line 6,740: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । | | verse_line1 = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । | ||
| verse_lines = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।;भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥ | | verse_line2 = भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥ | ||
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| Line 6,369: | Line 6,761: | ||
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| verse_line1 = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | | verse_line1 = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | ||
| verse_lines = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।;प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥ | | verse_line2 = प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥ | ||
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| Line 6,378: | Line 6,771: | ||
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| verse_line1 = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । | | verse_line1 = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । | ||
| verse_lines = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।;अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥ | | verse_line2 = अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥ | ||
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| Line 6,387: | Line 6,781: | ||
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| verse_line1 = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । | | verse_line1 = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । | ||
| verse_lines = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।;मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥ | | verse_line2 = मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥ | ||
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| Line 6,405: | Line 6,800: | ||
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| verse_line1 = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । | | verse_line1 = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । | ||
| verse_lines = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।;इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥ | |||
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| verse_line1 = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । | | verse_line1 = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । | ||
| verse_lines = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।;वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥ | |||
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| verse_line1 = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । | | verse_line1 = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । | ||
| verse_lines = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।;सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥ | | verse_line2 = सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥ | ||
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| verse_lines = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।;यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥ | |||
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| Line 6,441: | Line 6,840: | ||
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| verse_line1 = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । | | verse_line1 = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । | ||
| verse_lines = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।;गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।;ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥ | |||
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| verse_line1 = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । | | verse_line1 = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । | ||
| verse_lines = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।;प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥ | | verse_line2 = प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,477: | Line 6,879: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । | | verse_line1 = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । | ||
| verse_lines = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।;पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥ | | verse_line2 = पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । | | verse_line1 = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । | ||
| verse_lines = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।;मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥ | | verse_line2 = मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,495: | Line 6,899: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । | | verse_line1 = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । | ||
| verse_lines = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।;झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥ | | verse_line2 = झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥ | ||
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| Line 6,513: | Line 6,918: | ||
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| verse_line1 = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । | | verse_line1 = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । | ||
| verse_lines = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।;अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥ | | verse_line2 = अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । | | verse_line1 = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । | ||
| verse_lines = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।;अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥ | | verse_line2 = अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् । | | verse_line1 = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् । | ||
| verse_lines = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।;कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥ | | verse_line2 = कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,540: | Line 6,948: | ||
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| verse_line1 = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । | | verse_line1 = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । | ||
| verse_lines = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।;मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥ | | verse_line2 = मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥ | ||
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| verse_line1 = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । | | verse_line1 = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । | ||
| verse_lines = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।;जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥ | | verse_line2 = जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥ | ||
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| verse_line1 = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । | | verse_line1 = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । | ||
| verse_lines = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।;मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥ | | verse_line2 = मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥ | ||
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| verse_line1 = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । | | verse_line1 = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । | ||
| verse_lines = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।;मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥ | |||
| verse_line2 = मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥ | | verse_line2 = मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । | | verse_line1 = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । | ||
| verse_lines = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।;न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥ | | verse_line2 = न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,594: | Line 7,007: | ||
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| verse_line1 = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । | | verse_line1 = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । | ||
| verse_lines = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।;एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥ | | verse_line2 = एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । | | verse_line1 = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । | ||
| verse_lines = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।;तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥ | | verse_line2 = तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥ | ||
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| Line 6,630: | Line 7,045: | ||
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| verse_line1 = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । | | verse_line1 = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । | ||
| verse_lines = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।;विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥ | | verse_line2 = विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥ | ||
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| verse_line1 = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । | | verse_line1 = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । | ||
| verse_lines = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।;यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥ | | verse_line2 = यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । | | verse_line1 = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । | ||
| verse_lines = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।;त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥ | | verse_line2 = त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । | | verse_line1 = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । | ||
| verse_lines = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।;द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥ | | verse_line2 = द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो । | | verse_line1 = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो । | ||
| verse_lines = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।;योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥ | | verse_line2 = योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः । | | verse_line1 = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः । | ||
| verse_lines = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।;नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥ | | verse_line2 = नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । | | verse_line1 = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । | ||
| verse_lines = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।;बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥ | | verse_line2 = बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । | | verse_line1 = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । | ||
| verse_lines = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।;मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥ | | verse_line2 = मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,734: | Line 7,157: | ||
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| verse_line1 = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । | | verse_line1 = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । | ||
| verse_lines = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।;दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥ | | verse_line2 = दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,745: | Line 7,169: | ||
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| verse_line1 = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । | | verse_line1 = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । | ||
| verse_lines = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।;दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥ | | verse_line2 = दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥ | ||
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| verse_line1 = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् । | | verse_line1 = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् । | ||
| verse_lines = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।;अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥ | |||
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}} | }} | ||
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| verse_line1 = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । | | verse_line1 = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । | ||
| verse_lines = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।;सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥ | | verse_line2 = सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥ | ||
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| verse_line1 = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । | | verse_line1 = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । | ||
| verse_lines = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।;यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥ | | verse_line2 = यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । | | verse_line1 = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । | ||
| verse_lines = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।;अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥ | | verse_line2 = अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । | | verse_line1 = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । | ||
| verse_lines = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।;प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥ | | verse_line2 = प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् । | | verse_line1 = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् । | ||
| verse_lines = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।;ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,837: | Line 7,268: | ||
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| verse_line1 = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । | | verse_line1 = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । | ||
| verse_lines = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।;नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥ | | verse_line2 = नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,867: | Line 7,299: | ||
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| verse_line1 = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । | | verse_line1 = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । | ||
| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।;पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥ | | verse_line2 = पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,885: | Line 7,318: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | | verse_line1 = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | ||
| verse_lines = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।;त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥ | | verse_line2 = त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥ | ||
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| Line 6,894: | Line 7,328: | ||
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| verse_line1 = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । | | verse_line1 = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । | ||
| verse_lines = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।;पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥ | | verse_line2 = पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,912: | Line 7,347: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । | | verse_line1 = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । | ||
| verse_lines = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।;दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥ | | verse_line2 = दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 6,930: | Line 7,366: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । | | verse_line1 = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । | ||
| verse_lines = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।;स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ | | verse_line2 = स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,939: | Line 7,376: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । | | verse_line1 = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । | ||
| verse_lines = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।;गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥ | | verse_line2 = गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,948: | Line 7,386: | ||
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| verse_line1 = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । | | verse_line1 = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । | ||
| verse_lines = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।;बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥ | | verse_line2 = बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,957: | Line 7,396: | ||
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| verse_line1 = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । | | verse_line1 = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । | ||
| verse_lines = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।;दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥ | | verse_line2 = दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,966: | Line 7,406: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । | | verse_line1 = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । | ||
| verse_lines = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।;दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥ | | verse_line2 = दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,975: | Line 7,416: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः । | | verse_line1 = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः । | ||
| verse_lines = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।;भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥ | | verse_line2 = भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,984: | Line 7,426: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । | | verse_line1 = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । | ||
| verse_lines = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।;केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥ | | verse_line2 = केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,993: | Line 7,436: | ||
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| verse_line1 = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । | | verse_line1 = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । | ||
| verse_lines = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।;तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥ | | verse_line2 = तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,002: | Line 7,446: | ||
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| verse_line1 = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । | | verse_line1 = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । | ||
| verse_lines = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।;तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ | |||
| verse_line2 = तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ | | verse_line2 = तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,011: | Line 7,456: | ||
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| verse_line1 = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः । | | verse_line1 = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः । | ||
| verse_lines = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।;तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥ | |||
| verse_line2 = तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥ | | verse_line2 = तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,020: | Line 7,466: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । | | verse_line1 = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । | ||
| verse_lines = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।;विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥ | |||
| verse_line2 = विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥ | | verse_line2 = विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥ | ||
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| Line 7,040: | Line 7,487: | ||
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| verse_line1 = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । | | verse_line1 = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । | ||
| verse_lines = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।;ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥ | |||
| verse_line2 = ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥ | | verse_line2 = ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,064: | Line 7,512: | ||
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| verse_line1 = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । | | verse_line1 = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । | ||
| verse_lines = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।;मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥ | |||
| verse_line2 = मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,073: | Line 7,522: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् । | | verse_line1 = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् । | ||
| verse_lines = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।;मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥ | |||
| verse_line2 = मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥ | | verse_line2 = मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,084: | Line 7,534: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । | | verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । | ||
| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।;नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥ | |||
| verse_line2 = नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥ | | verse_line2 = नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,104: | Line 7,555: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । | | verse_line1 = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । | ||
| verse_lines = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।;रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥ | |||
| verse_line2 = रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥ | | verse_line2 = रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥ | ||
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| Line 7,122: | Line 7,574: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । | | verse_line1 = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । | ||
| verse_lines = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।;अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | | verse_line2 = अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | ||
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| Line 7,140: | Line 7,593: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | | verse_line1 = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | ||
| verse_lines = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।;वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥ | |||
| verse_line2 = वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,149: | Line 7,603: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । | | verse_line1 = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । | ||
| verse_lines = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।;नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥ | |||
| verse_line2 = नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥ | | verse_line2 = नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,158: | Line 7,613: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । | | verse_line1 = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । | ||
| verse_lines = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।;अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥ | | verse_line2 = अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,167: | Line 7,623: | ||
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| verse_line1 = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । | | verse_line1 = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । | ||
| verse_lines = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।;अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥ | |||
| verse_line2 = अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,176: | Line 7,633: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । | | verse_line1 = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । | ||
| verse_lines = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।;एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥ | |||
| verse_line2 = एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥ | | verse_line2 = एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,194: | Line 7,652: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । | | verse_line1 = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । | ||
| verse_lines = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।;न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,203: | Line 7,662: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । | | verse_line1 = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । | ||
| verse_lines = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।;पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥ | |||
| verse_line2 = पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,212: | Line 7,672: | ||
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| verse_line1 = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । | | verse_line1 = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । | ||
| verse_lines = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।;तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥ | |||
| verse_line2 = तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,221: | Line 7,682: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । | | verse_line1 = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । | ||
| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।;तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥ | |||
| verse_line2 = तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥ | | verse_line2 = तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,232: | Line 7,694: | ||
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| verse_line1 = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । | | verse_line1 = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । | ||
| verse_lines = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।;तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥ | |||
| verse_line2 = तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥ | | verse_line2 = तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,241: | Line 7,704: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । | | verse_line1 = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । | ||
| verse_lines = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।;एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥ | |||
| verse_line2 = एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,250: | Line 7,714: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् । | | verse_line1 = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् । | ||
| verse_lines = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।;व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥ | |||
| verse_line2 = व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,261: | Line 7,726: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । | | verse_line1 = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । | ||
| verse_lines = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।;आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥ | |||
| verse_line2 = आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥ | | verse_line2 = आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,272: | Line 7,738: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । | | verse_line1 = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।;इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥ | |||
| verse_line2 = इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥ | | verse_line2 = इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,283: | Line 7,750: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । | | verse_line1 = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । | ||
| verse_lines = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।;देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥ | |||
| verse_line2 = देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥ | | verse_line2 = देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,292: | Line 7,760: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । | | verse_line1 = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । | ||
| verse_lines = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।;शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥ | |||
| verse_line2 = शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥ | | verse_line2 = शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,301: | Line 7,770: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । | | verse_line1 = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । | ||
| verse_lines = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।;ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥ | | verse_line2 = ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,310: | Line 7,780: | ||
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| verse_line1 = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । | | verse_line1 = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । | ||
| verse_lines = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।;निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥ | | verse_line2 = निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,340: | Line 7,811: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । | | verse_line1 = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । | ||
| verse_lines = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।;ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥ | | verse_line2 = ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,351: | Line 7,823: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । | | verse_line1 = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । | ||
| verse_lines = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।;श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥ | | verse_line2 = श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,387: | Line 7,860: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते । | | verse_line1 = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते । | ||
| verse_lines = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।;सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥ | | verse_line2 = सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,396: | Line 7,870: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । | | verse_line1 = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । | ||
| verse_lines = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।;ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥ | | verse_line2 = ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,414: | Line 7,889: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् । | | verse_line1 = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् । | ||
| verse_lines = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।;अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥ | | verse_line2 = अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,444: | Line 7,920: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । | | verse_line1 = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । | ||
| verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।;अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥ | | verse_line2 = अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,453: | Line 7,930: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । | | verse_line1 = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । | ||
| verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।;भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥ | | verse_line2 = भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,462: | Line 7,940: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । | | verse_line1 = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । | ||
| verse_lines = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।;निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥ | | verse_line2 = निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,471: | Line 7,950: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । | | verse_line1 = अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । | ||
| verse_lines = अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।;अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥ | | verse_line2 = अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,480: | Line 7,960: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । | | verse_line1 = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । | ||
| verse_lines = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।;मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥ | | verse_line2 = मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,489: | Line 7,970: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । | | verse_line1 = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । | ||
| verse_lines = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।;सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥ | | verse_line2 = सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,507: | Line 7,989: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते । | | verse_line1 = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते । | ||
| verse_lines = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।;ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,525: | Line 8,008: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । | | verse_line1 = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । | ||
| verse_lines = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।;निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥ | | verse_line2 = निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,534: | Line 8,018: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । | | verse_line1 = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । | ||
| verse_lines = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।;मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥ | | verse_line2 = मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,543: | Line 8,028: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । | | verse_line1 = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । | ||
| verse_lines = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।;हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥ | | verse_line2 = हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,552: | Line 8,038: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । | | verse_line1 = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । | ||
| verse_lines = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।;सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥ | | verse_line2 = सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,561: | Line 8,048: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । | | verse_line1 = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । | ||
| verse_lines = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।;शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥ | | verse_line2 = शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,570: | Line 8,058: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । | | verse_line1 = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । | ||
| verse_lines = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।;शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥ | | verse_line2 = शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,579: | Line 8,068: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । | | verse_line1 = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । | ||
| verse_lines = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।;अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥ | | verse_line2 = अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,597: | Line 8,087: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । | | verse_line1 = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । | ||
| verse_lines = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।;श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥ | | verse_line2 = श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,627: | Line 8,118: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । | | verse_line1 = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । | ||
| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।;एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥ | | verse_line2 = एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥ | ||
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| Line 7,638: | Line 8,130: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । | | verse_line1 = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । | ||
| verse_lines = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।;एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥ | | verse_line2 = एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,647: | Line 8,140: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । | | verse_line1 = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । | ||
| verse_lines = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।;क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥ | | verse_line2 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,656: | Line 8,150: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । | | verse_line1 = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । | ||
| verse_lines = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।;स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥ | | verse_line2 = स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,674: | Line 8,169: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । | | verse_line1 = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । | ||
| verse_lines = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।;ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,692: | Line 8,188: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । | | verse_line1 = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । | ||
| verse_lines = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।;इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥ | | verse_line2 = इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,701: | Line 8,198: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । | | verse_line1 = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । | ||
| verse_lines = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।;एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥ | | verse_line2 = एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,719: | Line 8,217: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । | | verse_line1 = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । | ||
| verse_lines = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।;आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥ | | verse_line2 = आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,737: | Line 8,236: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च । | | verse_line1 = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च । | ||
| verse_lines = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।;जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥ | | verse_line2 = जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,746: | Line 8,246: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । | | verse_line1 = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । | ||
| verse_lines = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।;नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥ | | verse_line2 = नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,764: | Line 8,265: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । | | verse_line1 = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । | ||
| verse_lines = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।;विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥ | | verse_line2 = विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,773: | Line 8,275: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । | | verse_line1 = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । | ||
| verse_lines = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।;एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥ | | verse_line2 = एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,791: | Line 8,294: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । | | verse_line1 = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । | ||
| verse_lines = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।;अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥ | | verse_line2 = अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,809: | Line 8,313: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । | | verse_line1 = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । | ||
| verse_lines = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।;सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥ | | verse_line2 = सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,818: | Line 8,323: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं । | | verse_line1 = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं । | ||
| verse_lines = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।;असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥ | | verse_line2 = असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,836: | Line 8,342: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च । | | verse_line1 = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च । | ||
| verse_lines = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।;सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥ | | verse_line2 = सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,845: | Line 8,352: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । | | verse_line1 = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । | ||
| verse_lines = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।;भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥ | | verse_line2 = भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,854: | Line 8,362: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । | | verse_line1 = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । | ||
| verse_lines = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।;ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,863: | Line 8,372: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । | | verse_line1 = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । | ||
| verse_lines = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।;मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥ | | verse_line2 = मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,881: | Line 8,391: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । | | verse_line1 = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । | ||
| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।;विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥ | | verse_line2 = विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,899: | Line 8,410: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । | | verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । | ||
| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।;पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥ | | verse_line2 = पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,917: | Line 8,429: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् । | | verse_line1 = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् । | ||
| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।;कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥ | | verse_line2 = कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,926: | Line 8,439: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । | | verse_line1 = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । | ||
| verse_lines = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।;परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥ | | verse_line2 = परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,944: | Line 8,458: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । | | verse_line1 = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । | ||
| verse_lines = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।;सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥ | | verse_line2 = सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 7,980: | Line 8,495: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । | | verse_line1 = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । | ||
| verse_lines = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।;अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥ | | verse_line2 = अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 7,989: | Line 8,505: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते । | | verse_line1 = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते । | ||
| verse_lines = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।;तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥ | | verse_line2 = तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,007: | Line 8,524: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । | | verse_line1 = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । | ||
| verse_lines = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।;क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥ | | verse_line2 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,016: | Line 8,534: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । | | verse_line1 = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । | ||
| verse_lines = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।;विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥ | | verse_line2 = विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,025: | Line 8,544: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । | | verse_line1 = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । | ||
| verse_lines = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।;न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥ | | verse_line2 = न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,043: | Line 8,563: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । | | verse_line1 = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । | ||
| verse_lines = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।;यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥ | | verse_line2 = यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,061: | Line 8,582: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति । | | verse_line1 = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति । | ||
| verse_lines = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।;तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥ | | verse_line2 = तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,079: | Line 8,601: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः । | | verse_line1 = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः । | ||
| verse_lines = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।;शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥ | | verse_line2 = शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,097: | Line 8,620: | ||
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| verse_line1 = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते । | | verse_line1 = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते । | ||
| verse_lines = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।;सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥ | | verse_line2 = सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,106: | Line 8,630: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । | | verse_line1 = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । | ||
| verse_lines = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।;क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥ | | verse_line2 = क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,115: | Line 8,640: | ||
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| verse_line1 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा । | | verse_line1 = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा । | ||
| verse_lines = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।;भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥ | | verse_line2 = भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥ | ||
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| verse_line1 = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | | verse_line1 = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।;यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥ | | verse_line2 = यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,154: | Line 8,681: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | | verse_line1 = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | ||
| verse_lines = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।;सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥ | | verse_line2 = सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । | | verse_line1 = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । | ||
| verse_lines = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।;सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥ | | verse_line2 = सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । | | verse_line1 = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । | ||
| verse_lines = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।;तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥ | | verse_line2 = तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । | | verse_line1 = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । | ||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।;निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥ | | verse_line2 = निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,205: | Line 8,736: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् । | | verse_line1 = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् । | ||
| verse_lines = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।;सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥ | | verse_line2 = सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,223: | Line 8,755: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । | | verse_line1 = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । | ||
| verse_lines = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।;तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥ | | verse_line2 = तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,241: | Line 8,774: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । | | verse_line1 = तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । | ||
| verse_lines = तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।;प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥ | | verse_line2 = प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,259: | Line 8,793: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । | | verse_line1 = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । | ||
| verse_lines = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।;ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,268: | Line 8,803: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । | | verse_line1 = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । | ||
| verse_lines = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।;रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥ | | verse_line2 = रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,277: | Line 8,813: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते । | | verse_line1 = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते । | ||
| verse_lines = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।;ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,286: | Line 8,823: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । | | verse_line1 = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । | ||
| verse_lines = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।;रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥ | | verse_line2 = रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,295: | Line 8,833: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । | | verse_line1 = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । | ||
| verse_lines = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।;तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥ | | verse_line2 = तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,304: | Line 8,843: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । | | verse_line1 = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । | ||
| verse_lines = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।;तदोत्तमविदां लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = तदोत्तमविदां लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥ | | verse_line2 = तदोत्तमविदां लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,313: | Line 8,853: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । | | verse_line1 = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । | ||
| verse_lines = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।;तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥ | | verse_line2 = तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,322: | Line 8,863: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । | | verse_line1 = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । | ||
| verse_lines = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।;रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥ | | verse_line2 = रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,340: | Line 8,882: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । | | verse_line1 = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । | ||
| verse_lines = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।;प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥ | | verse_line2 = प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,349: | Line 8,892: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । | | verse_line1 = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।;जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥ | | verse_line2 = जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,358: | Line 8,902: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । | | verse_line1 = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । | ||
| verse_lines = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।;गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥ | | verse_line2 = गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥ | ||
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| Line 8,376: | Line 8,921: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् । | | verse_line1 = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् । | ||
| verse_lines = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।;जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥ | | verse_line2 = जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,387: | Line 8,933: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो । | | verse_line1 = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो । | ||
| verse_lines = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।;किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥ | | verse_line2 = किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,398: | Line 8,945: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । | | verse_line1 = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । | ||
| verse_lines = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।;न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥ | | verse_line2 = न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,416: | Line 8,964: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । | | verse_line1 = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । | ||
| verse_lines = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।;गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥ | | verse_line2 = गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,425: | Line 8,974: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । | | verse_line1 = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । | ||
| verse_lines = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।;तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥ | | verse_line2 = तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,434: | Line 8,984: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । | | verse_line1 = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । | ||
| verse_lines = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।;सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥ | | verse_line2 = सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,452: | Line 9,003: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । | | verse_line1 = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । | ||
| verse_lines = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।;स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥ | | verse_line2 = स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,470: | Line 9,022: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च । | | verse_line1 = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च । | ||
| verse_lines = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।;शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥ | | verse_line2 = शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,504: | Line 9,057: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । | | verse_line1 = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।;छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥ | | verse_line2 = छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,522: | Line 9,076: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । | | verse_line1 = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । | ||
| verse_lines = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।;अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,540: | Line 9,095: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । | | verse_line1 = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । | ||
| verse_lines = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।;अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥ | | verse_line2 = अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,558: | Line 9,114: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः । | | verse_line1 = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः । | ||
| verse_lines = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।;तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥ | | verse_line2 = तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥ | ||
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| Line 8,576: | Line 9,133: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । | | verse_line1 = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । | ||
| verse_lines = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।;द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ | | verse_line2 = द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,594: | Line 9,152: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । | | verse_line1 = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । | ||
| verse_lines = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।;यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥ | | verse_line2 = यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥ | ||
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| Line 8,612: | Line 9,171: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । | | verse_line1 = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । | ||
| verse_lines = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।;मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥ | | verse_line2 = मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,621: | Line 9,181: | ||
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| verse_line1 = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । | | verse_line1 = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । | ||
| verse_lines = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।;गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥ | | verse_line2 = गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥ | ||
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| Line 8,639: | Line 9,200: | ||
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| verse_line1 = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । | | verse_line1 = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । | ||
| verse_lines = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।;अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥ | | verse_line2 = अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥ | ||
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| Line 8,657: | Line 9,219: | ||
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| verse_line1 = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । | | verse_line1 = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । | ||
| verse_lines = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।;विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥ | | verse_line2 = विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥ | ||
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| Line 8,675: | Line 9,238: | ||
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| verse_line1 = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । | | verse_line1 = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । | ||
| verse_lines = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।;यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥ | | verse_line2 = यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥ | ||
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| Line 8,693: | Line 9,257: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् । | | verse_line1 = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् । | ||
| verse_lines = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।;यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,711: | Line 9,276: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । | | verse_line1 = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । | ||
| verse_lines = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।;पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥ | | verse_line2 = पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,729: | Line 9,295: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । | | verse_line1 = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । | ||
| verse_lines = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।;प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥ | | verse_line2 = प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,738: | Line 9,305: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । | | verse_line1 = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । | ||
| verse_lines = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।;वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥ | | verse_line2 = वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥ | ||
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| Line 8,756: | Line 9,324: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | | verse_line1 = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | ||
| verse_lines = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।;क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥ | | verse_line2 = क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥ | ||
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| Line 8,765: | Line 9,334: | ||
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| verse_line1 = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । | | verse_line1 = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । | ||
| verse_lines = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।;यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥ | | verse_line2 = यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । | | verse_line1 = यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । | ||
| verse_lines = यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।;अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥ | | verse_line2 = अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥ | ||
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| Line 8,783: | Line 9,354: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । | | verse_line1 = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । | ||
| verse_lines = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।;स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥ | | verse_line2 = स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,792: | Line 9,364: | ||
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| verse_line1 = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । | | verse_line1 = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । | ||
| verse_lines = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।;एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥ | | verse_line2 = एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥ | ||
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| Line 8,822: | Line 9,395: | ||
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| verse_line1 = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। | | verse_line1 = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। | ||
| verse_lines = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।;दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥ | | verse_line2 = दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 8,840: | Line 9,414: | ||
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| verse_line1 = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । | | verse_line1 = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । | ||
| verse_lines = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।;दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥ | | verse_line2 = दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥ | ||
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| verse_line1 = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता । | | verse_line1 = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता । | ||
| verse_lines = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।;भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥ | | verse_line2 = भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥ | ||
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| Line 8,867: | Line 9,443: | ||
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| verse_line1 = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । | | verse_line1 = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । | ||
| verse_lines = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।;अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥ | | verse_line2 = अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥ | ||
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| Line 8,876: | Line 9,453: | ||
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| verse_line1 = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । | | verse_line1 = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । | ||
| verse_lines = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।;मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥ | | verse_line2 = मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥ | ||
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| verse_line1 = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । | | verse_line1 = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । | ||
| verse_lines = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।;दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥ | | verse_line2 = दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,894: | Line 9,473: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । | | verse_line1 = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । | ||
| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।;न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥ | | verse_line2 = न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_line1 = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | | verse_line1 = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | ||
| verse_lines = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।;अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥ | | verse_line2 = अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 8,921: | Line 9,502: | ||
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| verse_line1 = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः । | | verse_line1 = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः । | ||
| verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।;प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥ | | verse_line2 = प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । | | verse_line1 = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । | ||
| verse_lines = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।;मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥ | | verse_line2 = मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_line1 = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । | | verse_line1 = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । | ||
| verse_lines = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।;कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥ | | verse_line2 = कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । | | verse_line1 = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । | ||
| verse_lines = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।;ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥ | | verse_line2 = ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् । | | verse_line1 = इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् । | ||
| verse_lines = इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।;इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥ | ||
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| verse_line1 = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । | | verse_line1 = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । | ||
| verse_lines = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।;ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥ | | verse_line2 = ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । | | verse_line1 = आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । | ||
| verse_lines = आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।;यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥ | |||
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| verse_line1 = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । | | verse_line1 = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । | ||
| verse_lines = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।;प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६ ॥ | |||
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| verse_line1 = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । | | verse_line1 = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । | ||
| verse_lines = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।;यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥ | |||
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| verse_line1 = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । | | verse_line1 = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । | ||
| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।;मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।;क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।;मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥ | |||
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| verse_line1 = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । | | verse_line1 = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । | ||
| verse_lines = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।;कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । | | verse_line1 = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । | ||
| verse_lines = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।;आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥ | | verse_line2 = आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥ | ||
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| verse_line1 = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । | | verse_line1 = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । | ||
| verse_lines = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।;न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥ | | verse_line2 = न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥ | ||
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| verse_lines = तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।;ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।;तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥ | |||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । | | verse_line1 = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । | ||
| verse_lines = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।;सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥ | | verse_line2 = सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,142: | Line 9,741: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । | | verse_line1 = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । | ||
| verse_lines = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।;श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥ | | verse_line2 = श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,160: | Line 9,760: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः । | | verse_line1 = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः । | ||
| verse_lines = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।;प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥ | | verse_line2 = प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,178: | Line 9,779: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । | | verse_line1 = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । | ||
| verse_lines = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।;दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥ | | verse_line2 = दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,187: | Line 9,789: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । | | verse_line1 = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । | ||
| verse_lines = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।;मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥ | | verse_line2 = मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,205: | Line 9,808: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । | | verse_line1 = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । | ||
| verse_lines = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।;यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥ | | verse_line2 = यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,214: | Line 9,818: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । | | verse_line1 = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । | ||
| verse_lines = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।;रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥ | | verse_line2 = रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,232: | Line 9,837: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । | | verse_line1 = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । | ||
| verse_lines = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।;आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥ | | verse_line2 = आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,241: | Line 9,847: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । | | verse_line1 = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । | ||
| verse_lines = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।;उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥ | | verse_line2 = उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,250: | Line 9,857: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । | | verse_line1 = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । | ||
| verse_lines = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।;यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥ | | verse_line2 = यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,259: | Line 9,867: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । | | verse_line1 = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । | ||
| verse_lines = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।;इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥ | | verse_line2 = इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,268: | Line 9,877: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । | | verse_line1 = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । | ||
| verse_lines = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।;श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥ | | verse_line2 = श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,277: | Line 9,887: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । | | verse_line1 = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । | ||
| verse_lines = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।;ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,286: | Line 9,897: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । | | verse_line1 = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । | ||
| verse_lines = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।;स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥ | | verse_line2 = स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,295: | Line 9,907: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । | | verse_line1 = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । | ||
| verse_lines = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।;भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥ | | verse_line2 = भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,313: | Line 9,926: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः । | | verse_line1 = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः । | ||
| verse_lines = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।;अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥ | | verse_line2 = अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,322: | Line 9,936: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । | | verse_line1 = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । | ||
| verse_lines = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।;क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥ | | verse_line2 = क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,331: | Line 9,946: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । | | verse_line1 = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । | ||
| verse_lines = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।;परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥ | | verse_line2 = परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,340: | Line 9,956: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । | | verse_line1 = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । | ||
| verse_lines = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।;देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥ | | verse_line2 = देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । | | verse_line1 = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । | ||
| verse_lines = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।;दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥ | | verse_line2 = दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥ | ||
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| Line 9,358: | Line 9,976: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते । | | verse_line1 = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते । | ||
| verse_lines = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।;असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | | verse_line2 = असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,367: | Line 9,986: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः । | | verse_line1 = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः । | ||
| verse_lines = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।;ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥ | | verse_line2 = ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,376: | Line 9,996: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । | | verse_line1 = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । | ||
| verse_lines = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।;प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥ | | verse_line2 = प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,400: | Line 10,021: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । | | verse_line1 = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । | ||
| verse_lines = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।;दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥ | | verse_line2 = दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,418: | Line 10,040: | ||
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| verse_line1 = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते । | | verse_line1 = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते । | ||
| verse_lines = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।;प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥ | | verse_line2 = प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,427: | Line 10,050: | ||
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| verse_line1 = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । | | verse_line1 = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । | ||
| verse_lines = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।;कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥ | | verse_line2 = कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,436: | Line 10,060: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । | | verse_line1 = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । | ||
| verse_lines = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।;असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥ | | verse_line2 = असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,466: | Line 10,091: | ||
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| verse_line1 = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । | | verse_line1 = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । | ||
| verse_lines = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।;त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥ | |||
| verse_line2 = त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥ | | verse_line2 = त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,477: | Line 10,103: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः । | | verse_line1 = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः । | ||
| verse_lines = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।;सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥ | | verse_line2 = सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,495: | Line 10,122: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । | | verse_line1 = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । | ||
| verse_lines = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।;यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥ | | verse_line2 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,513: | Line 10,141: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । | | verse_line1 = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । | ||
| verse_lines = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।;त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥ | |||
| verse_line2 = त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥ | | verse_line2 = त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । | | verse_line1 = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । | ||
| verse_lines = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।;यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥ | | verse_line2 = यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । | | verse_line1 = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । | ||
| verse_lines = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।;कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥ | | verse_line2 = कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । | | verse_line1 = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । | ||
| verse_lines = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।;मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥ | |||
| verse_line2 = मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥ | | verse_line2 = मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । | | verse_line1 = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । | ||
| verse_lines = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।;स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥ | |||
| verse_line2 = स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥ | | verse_line2 = स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,567: | Line 10,200: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । | | verse_line1 = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । | ||
| verse_lines = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।;सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥ | |||
| verse_line2 = सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥ | | verse_line2 = सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,576: | Line 10,210: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते । | | verse_line1 = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते । | ||
| verse_lines = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।;त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥ | |||
| verse_line2 = त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥ | | verse_line2 = त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,594: | Line 10,229: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । | | verse_line1 = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । | ||
| verse_lines = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।;यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥ | |||
| verse_line2 = यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥ | | verse_line2 = यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,612: | Line 10,248: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । | | verse_line1 = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । | ||
| verse_lines = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।;भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥ | |||
| verse_line2 = भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥ | | verse_line2 = भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,630: | Line 10,267: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । | | verse_line1 = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । | ||
| verse_lines = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।;साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥ | |||
| verse_line2 = साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥ | | verse_line2 = साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,648: | Line 10,286: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । | | verse_line1 = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । | ||
| verse_lines = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।;विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥ | |||
| verse_line2 = विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥ | | verse_line2 = विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,657: | Line 10,296: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । | | verse_line1 = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । | ||
| verse_lines = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।;न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥ | |||
| verse_line2 = न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥ | | verse_line2 = न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,675: | Line 10,315: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः । | | verse_line1 = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः । | ||
| verse_lines = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।;पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥ | |||
| verse_line2 = पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥ | | verse_line2 = पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,693: | Line 10,334: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । | | verse_line1 = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । | ||
| verse_lines = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।;हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥ | |||
| verse_line2 = हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥ | | verse_line2 = हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,711: | Line 10,353: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । | | verse_line1 = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । | ||
| verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।;करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥ | |||
| verse_line2 = करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥ | | verse_line2 = करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,741: | Line 10,384: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । | | verse_line1 = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । | ||
| verse_lines = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।;प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥ | | verse_line2 = प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,759: | Line 10,403: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । | | verse_line1 = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । | ||
| verse_lines = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।;अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥ | |||
| verse_line2 = अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥ | | verse_line2 = अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,777: | Line 10,422: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् । | | verse_line1 = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् । | ||
| verse_lines = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।;वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥ | |||
| verse_line2 = वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥ | | verse_line2 = वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,786: | Line 10,432: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । | | verse_line1 = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । | ||
| verse_lines = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।;अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | |||
| verse_line2 = अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | | verse_line2 = अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,795: | Line 10,442: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् । | | verse_line1 = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् । | ||
| verse_lines = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।;अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥ | |||
| verse_line2 = अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥ | | verse_line2 = अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,804: | Line 10,452: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । | | verse_line1 = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । | ||
| verse_lines = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।;क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥ | |||
| verse_line2 = क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥ | | verse_line2 = क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,813: | Line 10,462: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् । | | verse_line1 = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् । | ||
| verse_lines = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।;मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥ | |||
| verse_line2 = मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥ | | verse_line2 = मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,822: | Line 10,472: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । | | verse_line1 = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । | ||
| verse_lines = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।;सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥ | |||
| verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥ | | verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,831: | Line 10,482: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । | | verse_line1 = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । | ||
| verse_lines = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।;हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥ | |||
| verse_line2 = हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥ | | verse_line2 = हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,840: | Line 10,492: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । | | verse_line1 = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । | ||
| verse_lines = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।;विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥ | |||
| verse_line2 = विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥ | | verse_line2 = विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 9,858: | Line 10,511: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु । | | verse_line1 = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु । | ||
| verse_lines = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।;प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥ | | verse_line2 = प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,867: | Line 10,521: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । | | verse_line1 = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । | ||
| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।;बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥ | |||
| verse_line2 = बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥ | | verse_line2 = बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,876: | Line 10,531: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । | | verse_line1 = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । | ||
| verse_lines = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।;अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥ | |||
| verse_line2 = अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥ | | verse_line2 = अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता । | | verse_line1 = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता । | ||
| verse_lines = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।;सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥ | | verse_line2 = सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,903: | Line 10,560: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । | | verse_line1 = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । | ||
| verse_lines = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।;योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥ | |||
| verse_line2 = योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥ | | verse_line2 = योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,912: | Line 10,570: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन । | | verse_line1 = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन । | ||
| verse_lines = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।;प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥ | | verse_line2 = प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,921: | Line 10,580: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । | | verse_line1 = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । | ||
| verse_lines = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।;न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥ | |||
| verse_line2 = न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥ | | verse_line2 = न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥ | ||
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| Line 9,930: | Line 10,590: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ । | | verse_line1 = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ । | ||
| verse_lines = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।;अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥ | |||
| verse_line2 = अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥ | | verse_line2 = अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । | | verse_line1 = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । | ||
| verse_lines = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।;तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७ ॥ | | verse_line2 = तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् । | | verse_line1 = विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् । | ||
| verse_lines = विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् ।;परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८ ॥ | |||
| verse_line2 = परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८ ॥ | | verse_line2 = परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । | | verse_line1 = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । | ||
| verse_lines = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।;निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥ | |||
| verse_line2 = निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥ | | verse_line2 = निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । | | verse_line1 = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । | ||
| verse_lines = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।;सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥ | |||
| verse_line2 = सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥ | | verse_line2 = सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । | | verse_line1 = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । | ||
| verse_lines = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।;कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥ | |||
| verse_line2 = कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥ | | verse_line2 = कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥ | ||
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| Line 9,984: | Line 10,650: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । | | verse_line1 = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । | ||
| verse_lines = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।;ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (ब्रह्मकर्म)ब्राह्मं कर्म स्वभावजम्॥४२ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (ब्रह्मकर्म)ब्राह्मं कर्म स्वभावजम्॥४२ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (ब्रह्मकर्म)ब्राह्मं कर्म स्वभावजम्॥४२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 9,993: | Line 10,660: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । | | verse_line1 = शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । | ||
| verse_lines = शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।;दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥ | |||
| verse_line2 = दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,002: | Line 10,670: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । | | verse_line1 = कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । | ||
| verse_lines = कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।;परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥ | |||
| verse_line2 = परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥ | | verse_line2 = परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,011: | Line 10,680: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । | | verse_line1 = स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । | ||
| verse_lines = स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।;स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥ | | verse_line2 = स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,020: | Line 10,690: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । | | verse_line1 = यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । | ||
| verse_lines = यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।;स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥ | | verse_line2 = स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,029: | Line 10,700: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | | verse_line1 = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | ||
| verse_lines = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।;स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥ | | verse_line2 = स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,038: | Line 10,710: | ||
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| verse_line1 = सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । | | verse_line1 = सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । | ||
| verse_lines = सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।;सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवाऽवृताः॥४८ ॥ | |||
| verse_line2 = सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवाऽवृताः॥४८ ॥ | | verse_line2 = सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवाऽवृताः॥४८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,047: | Line 10,720: | ||
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| verse_line1 = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । | | verse_line1 = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । | ||
| verse_lines = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।;नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥ | |||
| verse_line2 = नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥ | | verse_line2 = नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,065: | Line 10,739: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे । | | verse_line1 = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे । | ||
| verse_lines = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।;समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥ | |||
| verse_line2 = समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥ | | verse_line2 = समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,083: | Line 10,758: | ||
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| verse_line1 = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च । | | verse_line1 = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च । | ||
| verse_lines = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।;शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥ | |||
| verse_line2 = शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥ | | verse_line2 = शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,092: | Line 10,768: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । | | verse_line1 = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । | ||
| verse_lines = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।;ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ | |||
| verse_line2 = ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ | | verse_line2 = ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,101: | Line 10,778: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । | | verse_line1 = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । | ||
| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।;विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥ | |||
| verse_line2 = विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥ | | verse_line2 = विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,119: | Line 10,797: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । | | verse_line1 = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । | ||
| verse_lines = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।;समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥ | |||
| verse_line2 = समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥ | | verse_line2 = समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,128: | Line 10,807: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । | | verse_line1 = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । | ||
| verse_lines = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।;ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥ | |||
| verse_line2 = ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥ | | verse_line2 = ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,137: | Line 10,817: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । | | verse_line1 = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । | ||
| verse_lines = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।;मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥ | |||
| verse_line2 = मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥ | | verse_line2 = मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,155: | Line 10,836: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । | | verse_line1 = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । | ||
| verse_lines = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।;बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥ | | verse_line2 = बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,164: | Line 10,846: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । | | verse_line1 = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । | ||
| verse_lines = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।;अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥ | | verse_line2 = अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,173: | Line 10,856: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । | | verse_line1 = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । | ||
| verse_lines = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।;मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥ | |||
| verse_line2 = मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥ | | verse_line2 = मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,182: | Line 10,866: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । | | verse_line1 = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । | ||
| verse_lines = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।;कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥ | |||
| verse_line2 = कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥ | | verse_line2 = कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,191: | Line 10,876: | ||
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| verse_line1 = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । | | verse_line1 = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । | ||
| verse_lines = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।;भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥ | |||
| verse_line2 = भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥ | | verse_line2 = भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,200: | Line 10,886: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । | | verse_line1 = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । | ||
| verse_lines = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।;तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥ | | verse_line2 = तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,218: | Line 10,905: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया । | | verse_line1 = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया । | ||
| verse_lines = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।;विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥ | |||
| verse_line2 = विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥ | | verse_line2 = विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,227: | Line 10,915: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः । | | verse_line1 = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः । | ||
| verse_lines = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।;इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥ | |||
| verse_line2 = इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥ | | verse_line2 = इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,236: | Line 10,925: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | | verse_line1 = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | ||
| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥ | |||
| verse_line2 = मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥ | | verse_line2 = मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 10,245: | Line 10,935: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । | | verse_line1 = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । | ||
| verse_lines = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।;अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥ | |||
| verse_line2 = अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥ | | verse_line2 = अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavadgitabhashya | | commentary1 = bhagavadgitabhashya | ||
| Line 10,263: | Line 10,954: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । | | verse_line1 = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । | ||
| verse_lines = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।;न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥ | |||
| verse_line2 = न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥ | | verse_line2 = न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥ | ||
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| Line 10,272: | Line 10,964: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । | | verse_line1 = य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । | ||
| verse_lines = य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।;भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥ | |||
| verse_line2 = भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥ | | verse_line2 = भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥ | ||
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| Line 10,281: | Line 10,974: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । | | verse_line1 = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । | ||
| verse_lines = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।;भविता न च मे तस्माद् अन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । | | verse_line1 = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । | ||
| verse_lines = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।;ज्ञानयज्ञेन तेनाहम् इष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥ | |||
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| Line 10,299: | Line 10,994: | ||
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| verse_line1 = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः । | | verse_line1 = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः । | ||
| verse_lines = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।;सोऽपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥७१ ॥ | |||
| verse_line2 = सोऽपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥७१ ॥ | | verse_line2 = सोऽपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥७१ ॥ | ||
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| Line 10,308: | Line 11,004: | ||
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| verse_line1 = कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । | | verse_line1 = कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । | ||
| verse_lines = कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।;कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥ | |||
| verse_line2 = कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥ | | verse_line2 = कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥ | ||
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| verse_line1 = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत । | | verse_line1 = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत । | ||
| verse_lines = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।;स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥ | | verse_line2 = स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥ | ||
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| Line 10,330: | Line 11,028: | ||
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| verse_line1 = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । | | verse_line1 = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । | ||
| verse_lines = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।;संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥ | |||
| verse_line2 = संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥ | | verse_line2 = संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥ | ||
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| Line 10,339: | Line 11,038: | ||
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| verse_line1 = व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् । | | verse_line1 = व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् । | ||
| verse_lines = व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।;योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥ | |||
| verse_line2 = योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥ | | verse_line2 = योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥ | ||
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| verse_line1 = राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । | | verse_line1 = राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । | ||
| verse_lines = राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।;केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥ | |||
| verse_line2 = केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥ | | verse_line2 = केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । | | verse_line1 = तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । | ||
| verse_lines = तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।;विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥ | |||
| verse_line2 = विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥ | | verse_line2 = विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥ | ||
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| verse_line1 = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । | | verse_line1 = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । | ||
| verse_lines = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।;तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥ | |||
| verse_line2 = तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥ | | verse_line2 = तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥ | ||
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Revision as of 07:45, 5 June 2026
प्रथमोऽध्यायः
अवेक्ष्य प्रार्थयामासुर्देवेशं पुरुषोत्तमम् ।
ततः प्रसन्नो भगवान् व्यासो भूत्वा च तेन च ॥
अन्यावताररूपैश्च वेदानुक्तार्थभूषितम् ।
केवलेनात्मबोधेन दृष्टं वेदार्थसंयुतम् ॥
वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।
भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥
पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।
बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये।
यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’ इति नारदीये ।
दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥
न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’
‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३)
तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६)
देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः ।
व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे)
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००)
विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’ इति महाकौर्मे ।
धृतराष्ट्र उवाच
सञ्जय उवाच
अर्जुन उवाच
सञ्जय उवाच
सञ्जय उवाच
द्वितीयोऽध्यायः
सञ्जय उवाच
श्री भगवानुवाच
अजुर्न उवाच
सञ्जय उवाच
श्रीभगवानुवाच
श्रीभगवानुवाच
तृतीयोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
चतुर्थोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
पञ्चमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्री भगवानुवाच
षष्ठोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
सप्तमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अष्टमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
नवमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
दशमोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
सञ्जय उवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
सञ्जय उवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
सञ्जय उवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
पञ्चदशोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
षोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन उवाच
सञ्जय उवाच