Bhagavatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | ||
== प्रथमः स्कन्धः == | == प्रथमः स्कन्धः == | ||
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| verse_lines = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्¦तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः ।¦तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा¦धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां¦वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।¦श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः¦सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं¦शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।¦पिबत भागवतं रसमालयं¦मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः¦सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।¦अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥¦वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।¦ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।¦ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।¦लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच–¦यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं¦द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।¦पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽपि नेदु-¦स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-¦मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् ।¦संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं¦तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।¦ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।¦उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।¦पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।¦क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-¦र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते ।¦स्थित्यादये हरिविरिञ्चहरेति सञ्ज्ञाः¦श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनौ नृणां स्युः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।¦तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।¦सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।¦पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।¦सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।¦अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।¦स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच–¦जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः ।¦सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।¦तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।¦यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।¦चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।¦तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।¦भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।¦प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।¦आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।¦दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।¦चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।¦रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।¦बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।¦यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।¦इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।¦मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।¦एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।¦अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।¦सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।¦मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।¦असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।¦प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।¦कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच—¦पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना ।¦परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।¦तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यास उवाच—¦अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे ।¦तत्मूलमव्यक्तमगाधबोधं, पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।¦न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो¦जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् ।¦तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा¦न यत्र हंसा न्यपतन् मिमङ्क्षया ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं¦न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।¦कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे¦न चार्षितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अतो महाभाग भवानमोघदृक्¦शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।¦उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये¦समाधिनाऽनुस्मर यद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं¦स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।¦यद्वाक्यतो धर्म इतीतरस्थितो¦न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-¦रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।¦प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-¦स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो¦यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः ।¦तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि¦प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते¦प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।¦ययाऽहमेतत् सदसत् स्वमायया¦पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः¦समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।¦प्रख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां¦सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।¦खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।¦आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे ।¦शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।¦अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्¦कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।¦अपाहरद्विप्रियमेतदस्य¦जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ती ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = माता शिशूनां निधनं सुतानां¦निशम्य घोरं परितप्यमाना ।¦तदाऽरुदद् बाष्पकलाकुलाक्षी¦तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।¦भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते ।¦भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् ।¦समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।¦भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।¦इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।¦प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं¦प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः।¦शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः¦प्रणिध्युपात्तामनुजानुवर्तितः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।¦नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रिय ऊचुः—¦स वै किलायं पुरुषः पुरातनो¦य एक आसीदविशेष आत्मनि ।¦अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे¦निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां¦स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।¦अनामरूपात्मनि रूपनामनी¦विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः¦जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल ।¦धर्मं भगं सत्यमृतं दयां यशो¦भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं¦निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते ।¦यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिः¦न जात्वपैत्याकृतिभिः हृदि स्पृशन् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।¦परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।¦सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्¦कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया ।¦तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद्¦रविं विनाऽक्ष्णामिव नस्तवाच्युत ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।¦न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | |||
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| verse_lines = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।¦अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मणा ऊचुः—¦पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः ।¦ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च रामो दाशरर्थियथा ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः ।¦आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।¦यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।¦यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।¦स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।¦गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | |||
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| verse_lines = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।¦गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ।¦अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।¦अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जय उवाच—¦अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन ।¦न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिर उवाच—¦नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः ।¦अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी ।¦कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शनः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।¦सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।¦दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।¦अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।¦ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।¦निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।¦कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।¦हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।¦ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।¦यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।¦प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।¦कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।¦अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-¦श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् ।¦स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्यो¦यैस्तत्स्त्रियो न्यकृत तत् सविमुक्तकेश्यः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते¦सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति ।¦सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं¦भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूषे ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा ।¦भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि ।¦कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः ।¦लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः ।¦तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् ।¦धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।¦सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः ।¦हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।¦मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = शौनक उवाच—¦कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः ।¦नृदेवचिह्नधृक् शूद्रः कोऽसौ गां यः पदाऽहनत् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।¦अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।¦क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।¦अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-¦वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः ।¦स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतस्य विष्णोः¦भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = धरोवाच—¦सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् ।¦शमो दमः तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।¦स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।¦गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।¦प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | |||
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| verse_lines = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।¦वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।¦यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।¦चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।¦ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति ।¦कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् ।¦विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः ।¦वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।¦भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।¦योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् ।¦व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।¦स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं¦यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः ।¦परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते¦पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।¦न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः¦प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः ।¦उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते¦समुद्रपत्न््नयाः स्वसुते न्यस्तभारः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या¦स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन ।¦प्रत्युत्थिता मुनयश्चाऽसनेभ्यः¦तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥ ४ ॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | ||
== द्वितीयस्कन्धः == | == द्वितीयस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।¦आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।¦अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।¦दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।¦तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।¦नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।¦गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।¦मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।¦मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् ।¦पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।¦आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच—¦यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।¦यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।¦स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।¦यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।¦वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।¦महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | |||
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| verse_lines = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।¦हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | |||
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| verse_lines = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।¦परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | |||
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| verse_lines = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।¦सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।¦तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।¦तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।¦ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।¦तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः¦यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् ।¦काले च देशे च मनो न सज्जेत्¦प्राणान्नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य¦क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि ।¦आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो¦लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः¦कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे ।¦न यत्र सत्वं न रजस्तमश्च¦न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद्¦उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः ।¦ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी¦स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत¦निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः ।¦स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि-¦र्निर्भिद्य मूर्धन्विसृजेत्परं गतः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् ।¦अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा ।¦न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = वैश्वानरं याति विहायसा गतः¦सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा ।¦विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात्¦प्रयाति चक्रं नृप शैंशुमारम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः ।¦सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा ।¦रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् ।¦नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् ।¦यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-¦स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् ।¦ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले¦वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं¦रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव ।¦श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणं तत्¦प्रायेण नावृत्तिमुपैति योगी ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात्¦सनातनोऽसौ भगवाननादिः ।¦मनोमयं देवमयं विकार्यं¦संसाद्य मत्या सह तेन याति ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् ।¦आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ।¦एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च ।¦ये द्वे पुरा ब्रह्मण आह पृष्टः आराधितो भगवान् वासुदेवः ॥३५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा ।¦श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।¦तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।¦तस्यर्ते यः क्षणो नीतः उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।¦राज्ये चाविकले नित्यनिरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् ।¦वासुदेवे भगवति स्वात्मभावं दृढं गतः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे¦सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया ।¦गृहीतशक्तित्रितयाय देहिनाम्¦अन्तर्ध्रुवायाऽनुपलभ्यवर्त्मने ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां¦असम्भवायाऽखिलसत्वमूर्तये ।¦पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमे¦व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर-¦स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः ।¦गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि-¦र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान्प्रसीदताम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच—¦देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज ।¦तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्वनिदर्शनम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो ।¦यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।¦एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो ।¦नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।¦अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि ।¦यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।¦विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।¦वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।¦नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।¦स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।¦बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः ।¦स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया ।¦आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः ।¦कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् ।¦तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा ।¦वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा ।¦द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभोः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।¦तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः ।¦परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।¦दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।¦सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।¦कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।¦सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।¦ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।¦ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।¦विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च¦सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।¦तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।¦अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।¦यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।¦यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य¦कालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।¦द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि¦विराड् स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः¦दक्षादयो ये भवदादयश्च ।¦स्वर्लोकपालाः खगलोकपालाः¦नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः¦ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः ।¦ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां¦दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः ।¦यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् ।¦ह्रीश्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्तत्परं रूपवदस्वरूपम् ॥४४॥ | |||
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| verse_lines = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति¦लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः ।¦आपीयतां कर्मकषायशोषान-¦नुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशलान् ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः¦आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।¦लोकत्रयस्य महतीमहरद्य आर्तिं¦स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्तः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो¦दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः ।¦यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा¦योगर्धिमापुरमयीं यदुहैहयाद्याः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे¦आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् ।¦प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्वं¦सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या¦नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः ।¦दृष्टात्मनो भगवतो नियमावलोपं¦देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो¦बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय ।¦तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो¦दिव्याः स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-¦निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।¦ज्ञात्वार्थितो जगति पुत्रपदञ्च लेभे¦दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः¦यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् ।¦यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति¦स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः¦साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः ।¦छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा¦वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः¦क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।¦विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे¦आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः¦चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।¦चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मात्¦हस्ते प्रगृह्य भगवान्कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्¦अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।¦यो वै प्रतिश्रुतमृतेऽपि च शीर्षमाणं¦आत्मन्यमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-¦वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।¦ज्ञानञ्च भागवतमात्मसुतत्वदीपं¦यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो¦मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।¦दुष्टेषु राजसु दमं विदधत्स्वकीर्तिं¦सत्ये निविष्ट उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः¦इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।¦तिष्ठन्वनं सदयितानुज आविवेश¦यस्मिन्विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो¦मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः ।¦दूरेसुहृन्मथितरोषसुशोषदृष्ट्या¦तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-¦दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः ।¦सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः¦विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरितैः ससैन्यः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः¦क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।¦जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः¦कर्माणि चात्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः¦त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।¦यद्रिङ्गताऽन्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा¦उन्मूलनन्त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं¦दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने ।¦उन्नेष्यति व्रजमितोऽवसितान्तकालं¦नेत्रे पिधाय्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्¦गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।¦जल्प्यावृतं निशि शयानमतिश्रमेण¦लोके विकुण्ठ उपधास्यति गोकुलं सः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां¦रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।¦उद्दीपितस्मररुजां व्रजसद्वधूनां¦हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-¦मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः ।¦अन्येऽपि शाल्वकपिबल्वलदन्तवक्र-¦सप्तोक्षशंबरविडूरथरुग्मिमुख्याः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः¦काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः ।¦यास्यन्त्यदर्शनमिता बलपार्थभीम-¦व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां¦स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।¦आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां¦वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः¦स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।¦अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्याः¦मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः¦मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये ।¦गायन् गुणान्दशशतानन आदिदेवः¦शेषोऽधुनाऽपि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः¦सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।¦ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां¦नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां¦स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।¦यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षाः¦तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं¦शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् ।¦शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो¦माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य¦भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः ।¦देहे स्वधातुविगमे तु विशीर्यमाणे¦व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।¦समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।¦कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।¦सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।¦विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।¦अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = सूत उवाच—¦स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः ।¦ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।¦ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच—¦आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः ।¦न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्ने द्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया ।¦रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः ।¦रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।¦ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो¦जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः ।¦अतप्यत स्माखिललोकतापनं¦तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः¦सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् ।¦व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं¦सन्दृष्टवद्भिर्विबुधैरभिष्टुतम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः¦सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।¦न यत्र माया किमुतापरे हरे-¦रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः¦करोति मानं बहुधा विभूतिभिः ।¦प््रोङ्खश्रिता याः कुसुमाकरानुगै-¦र्विगीयमाना प््रिायकर्म गायती ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं¦श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ।¦सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः¦स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं¦वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः ।¦युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः¦स्व एव धामन्रममाणमीश्वरम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।¦यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।¦तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।¦बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानुवाच–¦ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।¦सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् ।¦पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।¦तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च ।¦प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।¦अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः ।¦सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः ।¦महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।¦ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् ।¦यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।¦ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।¦मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते ।¦स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।¦यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे ।¦त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः ।¦आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।¦तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः ।¦वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।¦ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।¦मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।¦अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।¦उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ।¦तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।¦पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः ।¦विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥ | |||
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== तृतीयः स्कन्धः == | == तृतीयः स्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः¦केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् ।¦न वारयामास नृपः स्नुषाया¦और्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं¦कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् ।¦तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा-¦मेकातपत्रामजितेन पार्थः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं¦वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् ।¦संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्¦सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः¦कृतानि नानायतनानि विष्णोः ।¦प्रत्यङ्कमुख्याङ्कितमन्दिराणि¦यद्दर्शनात् कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-¦पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ ।¦आसात उर्व्याः कुशलं विधाय¦कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो¦भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः ।¦यो वै स्वसॄणां पितृवद् ददाति¦वरान् वदान्यो वरतर्पणेन ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-¦दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते ।¦यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो¦नृपासनाधिं परिहृत्य दूरात् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी¦भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।¦यस्याङ्घ्रिपातं रणभूर्न सेहे¦मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय¦कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।¦न त्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं¦परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये¦निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।¦कार्त्स्न्येन चात्रोपगतं विधातु-¦रर्वाक् सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे¦संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।¦ये संयुगेऽचक्षत तार्क्षपुत्र-¦स्यांसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = समाहुता भीष्मककन्यया ये¦श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् ।¦गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं¦जह्रे पदं मूधर्ि्न दधत् सुपर्णः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।¦एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।¦कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।¦गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।¦को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।¦ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा ।¦तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् ।¦हयान् रथानिभान् कन्यां धरां वृत्तिकरीमपि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् ।¦गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = उद्धव उवाच–¦भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।¦सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।¦बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।¦पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच–¦निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-¦ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्यः ।¦स तु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्¦हरिरपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीशः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = शुक उवाच–¦ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः ।¦संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।¦अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = परावरेषां भगवन् कृतानि¦श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।¦न तृप्नुमः कर्णसुखावहानां¦तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां¦सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः ।¦यस्मिन् नृणां ग्राम्यसुखानुवादै¦र्मतिर्गृहीता न हरेः कथायाम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना¦विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः ।¦हरेः सदाऽनुस्मृतिनिर्वृतस्य¦समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय उवाच–¦भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।¦आत्मेच्छानुगतो ह्यात्मा नानाशक्त्युपलक्षितः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।¦मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।¦आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।¦तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।¦ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।¦आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।¦नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-¦स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।¦आत्मल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-¦च्छायांशविद्यामत आश्रयेम ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-¦श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते ।¦यच्चाघमर्षो द्युसरिद्धरायाः¦परं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तथापरे त्वात्मसमाधियोग-¦बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।¦त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति¦तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य¦त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये ।¦सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं¦न शक्नुमस्तत् प्रतिकर्तवे ते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे¦बभूविमात्मन् करवाम किं ते ।¦त्वं नः स चक्षुः परिदेहि शक्ता¦देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
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== चतुर्थस्कन्धः == | == चतुर्थस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = मैत्रेय उवाच–¦मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे ।¦आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।¦प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।¦निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।¦वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।¦तत्संकल्पस्य ते ब्रह्मन् यद् वै ध्यायसि ते वयम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।¦दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।¦मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।¦देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं¦खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।¦एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाऽद्य¦प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।¦भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | |||
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| verse_lines = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।¦अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | |||
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| verse_lines = नन्दिरुवाच–¦य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।¦द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।¦कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।¦स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।¦संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।¦मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं¦यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।¦सत्त्वं च यस्मिन् भगवान् वासुदेवो¦ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-¦र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।¦लोकस्य यद् वर्षति चाशिषोऽर्थिनः¦तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये¦ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।¦तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-¦र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत¦वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् ।¦विरोधि तद् यौगपदेककर्तरि¦द्वयं यथाऽऽब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं¦जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् ।¦ददर्श देहे हतकल्मषा सती¦सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।¦छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः ।¦विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे ।¦यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः ।¦तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।¦नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये¦ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।¦विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा¦तस्यात्मतन्त्रस्य क उद्विधित्सेत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।¦ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं¦सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि ।¦उत्थाय चक्रे शिरसाऽभिवन्दनं¦महत्तमोऽर्कस्य यथैव विष्णोः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोवाच–¦जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः ।¦शक्तेः शिवस्य च परं यत् तद् ब्रह्म निरन्तरम् ॥ ४२ ॥ | |||
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== पञ्चमस्कन्धः == | == पञ्चमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-¦दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः ।¦भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिसृष्टान्¦विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन्¦यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले¦मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः ।¦विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे¦किं वा मृगान् मृगयसे विपिने प्रमत्तान् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि¦भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः¦प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।¦तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | |||
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| verse_lines = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।¦प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।¦यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।¦सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन¦ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।¦योगेन धृत्युद्भवसत्वयुक्तो¦लिङ्गं व्यपोहेत्कुशलोऽहमाख्यम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।¦अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | |||
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| verse_lines = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।¦योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।¦कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां¦साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं¦जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या¦द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।¦गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः¦कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-¦न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी ।¦यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां¦महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां¦देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः ।¦अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो¦मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = परो रजाः सवितर्जातवेदो¦वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान ।¦स्वरेतसाऽदः पुनराविश्य चष्टे¦हंसं गृध्राणामृषभं सङ्गृणीमः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–¦त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं¦भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः ।¦गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा¦पीवेति चासौ न विदां प्रवादः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च¦क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।¦निद्राऽरतिर्मन्युरहंमदश्च¦देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-¦न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।¦स्वस्वामिभावो ध्रुव एष यत्र¦तर्ह्यच्युतेऽसाविति कृत्ययोगः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च¦पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।¦क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्य-¦मथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य¦साम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।¦महद्विमानात्स्वकृताद्धिमादृग्¦धक्षत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-¦वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।¦न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः¦प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स वासनात्मा विषयोपरक्तो¦गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा ।¦चित्रं पृथङ्नामभी रूपभेद-¦मन्तर्बहिष्ठः स्वपुरैस्तनोति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं¦कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति ।¦आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा¦स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तावानयं व्यवहारः सदा वै¦क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः ।¦तस्मान्मनोलिङ्गमदो वदन्ति¦गुणागुणस्यास्य परावरस्य ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः¦क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।¦यथा प्रदीपो घृतवर्तिमास्थितो¦स्थितिं स धूमां भजति ह्यन्यदा स्वम् ।¦पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं¦बहिर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्वम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = पदं विषयम् ।¦एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती-¦राकूतयः पञ्च धियोऽभिमानाः ।¦मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां¦वदन्ति हैकादश वीर भूमिम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि¦विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः ।¦एकादशं स्वीकरणं ममेति¦मायामहं द्वादशमेकमाहुः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-¦रेकादशामी मनसो विकाराः ।¦सहस्रशः शतशः कोटिशश्च¦क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः¦साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः ।¦नारायणो भगवान्वासुदेवः¦स्वमाययाऽऽत्मन्व्यवधीयमानः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य-¦मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः ।¦गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो¦जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोहम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–¦अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां¦यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः ।¦तस्यापि चाङ्घ्र्योरधि गुल्फजङ्घा-¦जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां¦सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।¦यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो¦राजाऽस्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-¦र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।¦जनस्य गोप्तेति विकत्थमानो¦न शोभसे वृद्धसभासु दुष्टः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि क्षितावेव चराचरस्य¦विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् ।¦तन्नामतोऽन्यद्व्यवहारमात्रं¦निरूप्यतां तत्क्रिययानुतिष्ठन् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-¦मसन्निधानं परमाणवो ये ।¦अविद्यया मनसा कल्पितास्ते¦येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-¦दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।¦द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म-¦नाम््नयाऽजयाऽवैहि कृतं द्वितीयम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-¦मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् ।¦प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दवाच्यं¦यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति ।¦आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः ।¦नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो¦वामपादाङ्गुष्ठ-नखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा¦तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला¦साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोभिरभिधीय-मानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो¦मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = भव उवाच–¦ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते¦ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् ।¦युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे¦सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुनि ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा¦हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च ।¦पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः¦सरीसृपस्थास्नु यदत्र दृश्यते ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं¦अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।¦सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भना-¦त्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं¦चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् ।¦द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-¦द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-¦रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।¦सङ्ख्या यया तत्त्वदृशा विनीयते¦तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय हि ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो¦गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् ।¦मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो¦गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-¦र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।¦तथैव तत्रातिशयात्मबुद्धिभि-¦र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः¦सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।¦शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्यया-¦द्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां¦त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज ।¦भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां¦विधेहि योगं त्वयि नः सुभावितम् ॥ इति ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं | |||
| verse_lines = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं¦स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् ।¦तेनाब्जनाभस्मृतिजन्मनः स्या-¦द्वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_text = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं¦रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् ।¦नमस्यतः स्तुवतो नश्यते वै¦स्वयं त्रिकालं कृतमाशु पापम् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_text = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
| verse_lines = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | ||
== षष्ठस्कन्धः == | == षष्ठस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यमदूता ऊचुः–¦वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।¦वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_text = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।¦अजामिलोऽप्यगान्मुक्तिं किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = यम उवाच–¦परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च¦ओतं प्रोतं पटवद् यत्र विश्वम् ।¦यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा¦नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः¦सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।¦गुणो यथा गुणिनोऽव्यक्तदृष्टि-¦स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा¦नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् ।¦सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो¦न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदोपरामो मनसो नामरूप-¦रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् ।¦य ईयते केवलया स्वसंस्थया¦हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं¦स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः ।¦वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं¦मनीषया निष्कृषन्तीह गूढम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = स वै ममाशेषविशेषमाया-¦निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।¦स सर्वनामा स च विश्वरूपः¦प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं¦धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य ।¦मा भूत् स्वरूपं गुणरूपबृंहितं¦स वै गुणापायनिसर्गलक्षणः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै¦यं यो यथा कुरुते कार्यते वा ।¦परावरेषां परमं प्राक् स्वसिद्धं¦तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-¦रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः ।¦अपेक्षितं किञ्चन सांख्ययोगयोः¦समं परं ह्यनुकूलं बृहत् तत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-¦मनामरूपो भगवाननन्तः ।¦नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-¦र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदताम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां¦यथाशयं देहगतो विभाति ।¦यथाऽनिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं¦स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।¦विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।¦अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।¦यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-¦द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् ।¦देवर्षिवर्यः पुरुषान्तरार्चनात्¦कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका¦ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।¦हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ¦बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-¦स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।¦एकोऽरविन्दात् पतितस्ततार¦तस्माद् भयाद् येन स नोऽस्तु पारः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = य एक ईशो निजमायया नः¦ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।¦वयं च यस्यापि पुरः समेताः¦पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।¦पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = देवा ऊचुः–¦नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।¦नमस्ते अस्तु चक्राय नमोऽस्तु पुरुहूतये ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।¦नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण¦स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह¦वाव न विदामः ।न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगण ईश्वर अनवगाह्य-माहात्म्ये¦अर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्तःकरणदुरवग्रहवादिनां च¦विवादानवसरे उपरतसमस्तमाया-मये केवलस्वात्ममायामन्तर्धाय को नु दुर्घट इव भवति ।¦स्वरूपद्वयाभावात् समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम् । स एव हि पुनः सर्ववस्तुषु वस्तुस्वरूपः सर्वेश्वरः सकलजगत्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात्¦सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः ।अथ ह वाव तव¦महिमामहामृतरससमुद्रविप्लुषाऽसकृल्लीढया स्व-मनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेन¦विस्मारितदृष्टश्रुतविषयसुखलेशाभासाः परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूतप्रियसुहृदि¦सर्वात्मनि निरन्तरनिर्वृतमनसः कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्यात्मप्रियसुहृदः¦साधवस्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपरिवर्तः ।¦त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तवैव विभूतयोऽभूवन्¦दितिजदनुजादयश्चापि तेषामनुपक्रमसमयोऽयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रितजलचराकृतिभिः¦यथाऽ-पराधं दण्डं दधर्थावतीर्य ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय¦कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।¦सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रयाय¦शश्वद् वरिष्ठगतये हरये नमस्ते ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।¦तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।¦न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।¦विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् ।¦यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः ।¦शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् ।¦अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः¦कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः ।¦न्यपातयत् तावदहर्गणेन¦यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच–¦एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् ।¦ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।¦ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं¦सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।¦सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो¦यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे ।¦परे तु जीवत्यपरस्य या मृतिः¦विपर्ययश्चेत् त्वमसि ध्रुवं परः ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः¦शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः ।¦यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये¦स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां¦त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।¦अञ्जस्तरेम भवताऽप्रजदुस्तरं यद्¦ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-¦स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् ।¦सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो¦भुंक्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते¦मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् ।¦किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं¦नीतोऽघृणेन न शृृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।¦मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।¦अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।¦दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।¦पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः ।¦ऋषिर्वेदशिरा बोध्यो मुनिः पञ्चशिखस्तथा ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।¦एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।¦एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।¦गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः¦कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।¦देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।¦द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे¦शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।¦सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं¦प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।¦आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।¦उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।¦अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।¦मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।¦जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।¦प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः¦प्रहृष्टरोमा तमनादिपूरुषम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।¦शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।¦उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।¦मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥ | |||
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| verse_lines = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो¦न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः ।¦समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य¦कुतोऽनुरागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।¦सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।¦गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।¦मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः ।¦त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् ।¦त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ।¦यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।¦तथेमा उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १३ ॥ | |||
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<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | ||
== सप्तमस्कन्धः == | == सप्तमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।¦स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।¦विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।¦श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।¦तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।¦स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।¦न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।¦संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।¦वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।¦आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।¦सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।¦तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।¦पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।¦दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | |||
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| verse_lines = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।¦भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।¦रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।¦अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।¦सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः ।¦धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।¦चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।¦याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_text = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते¦यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः ।¦यथा नभः सर्वगतं न सज्जते¦तथा गुणैः सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।¦यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।¦यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।¦तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–¦कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् ।¦अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।¦रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।¦चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा¦त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च ।¦त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि-¦रनन्तपारः कविरव्ययात्मा ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-¦मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।¦कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महान्¦त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-¦देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति ।¦विद्याकलास्ते तनवश्च सर्वा¦हिरण्यगर्भोऽसि बृहत् त्रिपृष्ठः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।¦न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।¦भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो¦महाबलो निर्जितलोक एकराट् ।¦रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः¦प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना¦विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।¦उपासतोपायनपाणिभिर्विना¦त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।¦धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।¦प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः ।¦न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–¦परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः ।¦विमोहितधियां दृष्टः तस्मै भगवते नमः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।¦अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–¦श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।¦अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = गुरुपुत्र उवाच–¦न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं¦सुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो ।¦नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्¦नियच्छ मन्युं क्व तदाऽऽत्ममानः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् ।¦व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।¦माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।¦भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये¦किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः ।¦धर्मादिभिः किमगुणेन च कांक्षितेन¦सारं जुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।¦फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।¦विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।¦ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।¦सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।¦अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।¦बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।¦यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-¦त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् ।¦मुहुः श्वसन् वक्ति हरे जगत्पते¦नारायणेत्यात्मगतिर्गतत्रपः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-¦स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।¦निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा¦भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः¦शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।¦तद् ब्रह्मनिर्वाणसुखं विदुर्बुधा-¦स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-¦रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।¦अस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां¦सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।¦भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।¦भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।¦खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वा ऊचुः–¦वयं विभो ते नटनाट्यगायका¦येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः ।¦स एष नीतो भवता दशामिमां¦किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।¦अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-¦पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।¦मन्ये तदर्पितमनोवचनात्मगेह-¦प्राणः पुनाति सकलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य¦यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा ।¦भावं करोति विकरोति पृथक् स्वभावः¦सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः¦कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।¦छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं¦संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्¦जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।¦न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया¦यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरप्रसादः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या¦सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् ।¦अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेः¦नाभेरभूत् स्वकणिकाद्वटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-¦स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् ।¦नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो¦जातेऽङ्कुरे कथमिहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं¦कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः ।¦त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं¦भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-¦नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् ।¦मायामयं सदुपलक्षणसन्निवेशं¦दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा¦मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः ।¦नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको¦नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे¦बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य ।¦युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां¦योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।¦भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।¦मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।¦जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।¦अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।¦भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।¦परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।¦आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं¦कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।¦प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय¦आत्माऽर्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।¦प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।¦आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।¦सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।¦हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।¦गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।¦भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।¦कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।¦सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।¦ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।¦आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।¦अतिवादान् त्यजेत् तर्कान् पक्षं कञ्चिन्न संश्रयेत् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।¦न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।¦मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।¦व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।¦क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते ।¦तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः ।¦तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः ।¦पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः ।¦तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः ।¦देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।¦न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | |||
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| verse_lines = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः ।¦जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | |||
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| verse_text = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः । | |||
| verse_lines = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।¦नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | ||
== अष्टमस्कन्धः == | == अष्टमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।¦योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो¦नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।¦अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं¦धत्ते रजःसत्वतमांसि काले ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-¦मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।¦छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ¦तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु ।¦त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां¦यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् ।¦तं निर्जितात्मात्मगुणं परेशं¦नमामि भूतेषु समं चरन्तम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं¦सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः ।¦लोकास्त्रयोऽथाखिललोकपालाः¦प्रसीदतां ब्रह्म माविभूतिः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = सोमं मनो यस्य समामनन्ति¦दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः ।¦ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा¦जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा ।¦अन्तः समुद्रे पचतः स्वधातून्¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं¦त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् ।¦द्वारं च मुक्तेरमृतस्य मृत्योः¦प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः ।¦ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो¦विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् ।¦भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा¦अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या¦भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् ।¦आसीनमद्रावपवर्गहेतो-¦स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_text = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_lines = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः ।¦तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं¦त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् ।¦वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं¦न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जितः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं¦क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः ।¦यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गलः¦सुमङ्गलः कश्चन काङ्क्षते हि माम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।¦स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।¦तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह¦आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः ।¦तल्लीलया गरुडमूधर्ि्न पतद् गृहीत्वा¦तेनाहनन्नृप सवाहमरिं त्र्यधीशः ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-¦च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् ।¦आहत्य तिग्मगदयाऽहनदण्डजेन्द्रं¦तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।¦तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।¦हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | |||
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| verse_text = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
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<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | ||
== नवमस्कन्धः == | == नवमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = एवंविधानेकगुणः स राजा¦परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।¦क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं¦यया विरिञ्चादिमधश्चकार ॥ ८४ ॥ | |||
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| verse_lines = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-¦स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।¦जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीय-¦कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९० ॥ | |||
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| verse_lines = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं¦वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् ।¦भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः¦स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार ॥ ९२ ॥ | |||
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| verse_lines = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।¦ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।¦स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।¦अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।¦त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः ।¦स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।¦आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।¦वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः ।¦त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् ।¦व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | ||
== दशमस्कन्धः == | == दशमस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं¦मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।¦दृष्टश्रुताभ्यां मनसाऽनुचिन्तयन्¦प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = यतो यतो धावति दैवचोदितं¦मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु ।¦गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ¦प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।¦आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं¦समाहितं शूरसुतेन देवी ।¦दधार सर्वात्मकमात्मभूतं¦काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं नभस्तः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_text = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-¦श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा ।¦सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो¦दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः¦स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च ।¦त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां¦पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_text = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_lines = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न¦समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये ।¦त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन¦कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्¦भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।¦भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते¦निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ¦शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।¦वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-¦स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्¦विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।¦गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्¦प्रकाशते यस्य च येन वाऽगुणः ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः¦निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।¦मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो¦देवक्रियायाः प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्¦नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।¦क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-¦राविष्टचित्तो न भवाय कल्प्यते ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो¦भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।¦दिष्ट्याऽङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-¦र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं¦विना विनोदं बत तर्कयामहे ।¦भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्ययाऽऽ-¦कृता यतस्त्वय्यभवाश्रयात्मनि ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् ।¦तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह ।¦नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो¦ग्राह्यैर्गुणैः सन्नपि तद्गुणाग्रहः ।¦अनावृतत्वाद् बहिरन्तरं न ते¦सर्वस्य सर्वात्मन आत्मवस्तुनः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे-¦र्व्यवस्यसेऽस्वव्यतिरेकतोऽबुधैः ।¦विनाऽनुवादं न च तन्मनीषितं¦सम्यग् वचो व्यक्तमुपाददत्पुमान् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो¦वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् ।¦त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते¦तदाश्रयत्वादुपचर्यसे गुणैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया¦बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः ।¦सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं¦कृष्णं च वर्णं तमसा जनात्यये ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु-¦र्गृहेऽवतीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर ।¦राजन्यसंज्ञासुरकोटियूथपै-¦र्निर्व्यूह्यमानां निहनिष्यसे चमूम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_lines = देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने¦महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु ।¦व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते¦भवानेकः शिष्यतेऽशेषसंज्ञः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो¦चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् ।¦निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां-¦स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः ।¦जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनाः सहासते ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च ।¦नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् ।¦अज्ञानप्रभवा हन्ति स्वपरेति भिदा यतः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः ।¦को न्विहार्हति विज्ञातुं प्राक् सिद्धं गुणसंस्थितेः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।¦आत्मद्योतैर्गुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्मणे नमः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः । तैस्तैरतुल्यातिशयैस्तिर्यग्योनिष्वसङ्गतैः ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो¦दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ।¦यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः¦क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं¦न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।¦न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा¦वाञ्छन्ति त्वत्पादरजःप्रपन्नाः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।¦अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् ।¦नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।¦सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा ।¦अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः ।¦वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।¦श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेमिरे ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः ।¦कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।¦अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।¦शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।¦अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।¦रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।¦प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।¦य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् ।¦कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।¦अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो¦दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः ।¦हिताय चेच्छातनुभिः समीहसे¦मानं विधुन्वन् जगदीशमानिनाम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।¦सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।¦ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः ।¦जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।¦अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।¦अवतीर्णौ जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके ।¦ये बालाः पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम् ॥ ४ ॥(भा.मू | |||
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| verse_lines = सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।¦न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्यः शतायुषा ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च ।¦वृत्तिं न दद्यात् तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् ।¦गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः ।¦मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः ।¦अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदोर्भृशम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः ।¦बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् ।¦दृष्ट्वा परमसन्तुष्टौ रामकृष्णौ जगत्पती ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन ।¦रामकृष्णौ स्मृतावावां क्वचित् ते श्रवणं गतौ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे ।¦निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः ।¦जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् ।¦पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् ।¦हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।¦ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | |||
| verse_lines = यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः ।¦यत्रोपलब्धं सुव्यक्तमव्यक्तं च ततः परम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_lines = सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् ।¦लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयाढ्यं मर्त्याशिषोरुभयमर्थविविक्तदृष्टिः ॥४६॥ | |||
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| verse_lines = तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥ | |||
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| verse_text = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे । | |||
| verse_lines = प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे ।¦तव पुरुष वदन्त्यखिलशक्तिधृतः स्वकृतम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।¦त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत् प्रियवच्चरन्ति तथोन्मुखास्त्वयि हि ते प्रिय आत्मनि च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_text = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | |||
| verse_lines = स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_text = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | |||
| verse_lines = तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_text = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_lines = त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_text = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | |||
| verse_lines = न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_text = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_lines = न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_text = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | |||
| verse_lines = त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥ | |||
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| verse_lines = इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_text = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः । | |||
| verse_lines = सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।¦तस्मै तद् वर्णयामास नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_text = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | |||
| verse_lines = यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥ | |||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | ||
== एकादशस्कन्धः == | == एकादशस्कन्धः == | ||
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| verse_lines = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।¦सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_text = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_lines = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_text = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_lines = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।¦विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।¦संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।¦सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।¦एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।¦मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।¦तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।¦आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।¦अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।¦अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।¦सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।¦इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।¦त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_text = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_lines = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।¦गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।¦अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।¦शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।¦अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।¦दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।¦मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।¦परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_text = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_lines = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_text = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_text = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_text = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_lines = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः ।¦महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः ।¦द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः ।¦शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः ।¦यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | |||
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| verse_lines = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।¦स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | |||
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| verse_lines = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां | |||
<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | ||
== द्वादशस्कन्धः == | == द्वादशस्कन्धः == | ||
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| verse_text = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह ।¦विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।¦नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।¦बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।¦विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | |||
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Revision as of 16:47, 16 June 2026
श्रीमद्भागवततात्पर्यनिर्णयः — मूलम्
प्रथमः स्कन्धः
जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं
नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः
यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।
आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।
अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।
सूत उवाच–
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-
वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।
तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-
पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।
भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।
रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।
स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।
तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।
असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।
सूत उवाच–
यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।
स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।
तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।
तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।
पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।
षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।
ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।
ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।
एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।
एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।
यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।
अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।
यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।
यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।
एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः ।
सूत उवाच—
दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा ।
स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।
नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।
धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।
अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।
किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।
तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।
नारद उवाच—
जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।
व्यास उवाच—
यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं
अतो महाभाग भवानमोघदृक्
जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं
विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-
इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो
तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते
त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः
स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।
प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।
सूत उवाच—
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।
भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्
माता शिशूनां निधनं सुतानां
तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।
विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते ।
मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् ।
ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।
नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।
शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।
निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं
अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।
स्त्रिय ऊचुः—
स एव भूयो निजवीर्यचोदितां
यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः
एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं
अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।
तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।
यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्
यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।
तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।
ब्राह्मणा ऊचुः—
स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः ।
प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् ।
इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।
अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।
प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।
अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् ।
अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।
तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।
पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।
सञ्जय उवाच—
युधिष्ठिर उवाच—
यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।
धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।
स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।
विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।
ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।
स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।
विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।
व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।
अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।
मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।
भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।
कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।
पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-
तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते
सूत उवाच—
गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि ।
विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः ।
स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः ।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् ।
त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।
उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः ।
ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।
शौनक उवाच—
तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।
एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।
सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-
धरोवाच—
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।
प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।
इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।
वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।
धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।
अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।
न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।
यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति ।
अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् ।
उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः ।
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् ।
प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।
अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः ।
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् ।
अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न
तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं
साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।
इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः
श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या
द्वितीयस्कन्धः
श्रीशुक उवाच—
श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।
देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।
प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।
नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।
यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।
राजोवाच—
श्रीशुक उवाच—
विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।
आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।
पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।
छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।
शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।
अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।
एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।
स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।
अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।
यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।
स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः
मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य
न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः
नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद्
तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत
यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् ।
योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा ।
वैश्वानरं याति विहायसा गतः
योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः ।
देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा ।
तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् ।
न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् ।
ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-
घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं
स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात्
विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् ।
एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ।
न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्थाः विश्रुतः संसृताविह ।
भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया ।
भगवान्सर्वभूतेषु लक्षितश्चात्मना हरिः ।
तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा ।
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।
आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।
आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।
संस्थां विज्ञाय सन्यस्य कर्म त्रैवर्गिकञ्च यत् ।
श्रीशुक उवाच–
भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसतां
स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर-
नारद उवाच—
यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो ।
यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।
नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो ।
नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।
नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि ।
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।
द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।
नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।
सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।
कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।
स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः ।
कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया ।
कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः ।
महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् ।
सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा ।
तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।
नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः ।
वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।
तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।
वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।
स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।
यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।
पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।
रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी ।
रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः ।
बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।
धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च ।
सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।
स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ ।
सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् ।
पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।
पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः ।
सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।
तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः ।
यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः ।
नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च ।
नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् ।
इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि ।
नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां
स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः ।
विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् ।
ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।
आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य
अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः
गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः
अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः ।
प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति
जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः
अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो
तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या
विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो
यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-
नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः
सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः
मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः
स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्
तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-
चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो
कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः
यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो
वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-
भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः
तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः
तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्
क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-
ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः
कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां
सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः
नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः
येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां
शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं
स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य
सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।
नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।
किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।
पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः ।
यस्मिन्कर्मसमावापो यथा येनोपगृह्यते ।
नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः ।
तत्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् ।
योगेश्वरैश्वर्यगतिं लिङ्गभङ्गं च योगिनाम् ।
यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।
अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।
सूत उवाच—
आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
श्रीशुक उवाच—
बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया ।
यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः ।
आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।
दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो
तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः
न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः
श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः
ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं
अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं
मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।
प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।
सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।
भगवानुवाच–
अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् ।
ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च ।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः ।
मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः ।
नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।
यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् ।
भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।
आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते ।
आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।
एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे ।
पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः ।
तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।
एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः ।
उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।
एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।
अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।
अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।
स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् ।
प्रजापतीन् मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् ।
सत्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः ।
यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ।
ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः ।
इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः ।
न चास्य जन्मकर्माणि परस्य न विधीयते ।
अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः ।
तृतीयः स्कन्धः
श्रीशुक उवाच–
यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥
श्रीशुक उवाच–
यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः
इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं
तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं
अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः
कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-
कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो
कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-
किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी
अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय
यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये
मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे
समाहुता भीष्मककन्यया ये
तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।
भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।
तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।
दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।
ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।
तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा ।
हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् ।
अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् ।
उद्धव उवाच–
अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।
अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।
राजोवाच–
शुक उवाच–
नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।
परावरेषां भगवन् कृतानि
मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां
सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना
मैत्रेय उवाच–
स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।
सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।
कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।
अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।
अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।
ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् ।
एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।
ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-
मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-
तथापरे त्वात्मसमाधियोग-
तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य
ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे
ऋषिरुवाच–
कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।
सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् ।
प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः ।
स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् ।
एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः ।
साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा ।
निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।
आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् ।
अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् ।
सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् ।
मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।
बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः ।
विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः ।
पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये ।
एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः ।
अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् ।
यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह ।
क्रीडाया मुद् यतोऽर्हस्य कामं चिक्रीडिषाऽन्यतः ।
देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।
भगवानेष एवैकः सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः ।
मैत्रेय उवाच–
यथाऽर्थेन विनाऽमुष्य पुंस आत्मविपर्ययः ।
यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः ।
स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया ।
यदेन्द्रियोपरामार्थो दृष्टात्मनि परे हरौ ।
विदुर उवाच–
साधु तद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः ।
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः ।
अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्याप्यनात्मनः ।
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु ।
सृष्ट्वाऽग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् ।
यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् ।
यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् ।
यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः ।
स्वमेव धिष्ण्यं बहुमानयन्तं
स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत्
तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः
क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ
पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै-
परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक-
निवीतमाम्नायमधुव्रताश्रयस्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् ।
ब्रह्मोवाच–
रूपं यदेतदवबोध रसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥
नातः परं परम यद् भवतः स्वरूप
ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं
यावत् पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थं
अध्याहृतार्थकरणा निशि निःशयाना
त्वद्भावयोगपरिभावितहृत्सरोजा
नातिप्रसीदसि तथोपचितोपचारै
शश्वत् स्वरूपमहसैव निपीतभेद
यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि
यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च
लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः
तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि-
एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या
लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः ।
श्री भगवानुवाच–
भूयश्च तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् ।
तत आत्मनि योगेन भक्तियुक्तः समाहितः ।
यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः ।
ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् ।
प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया ।
पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगैः समाधिना ।
अहमात्मात्मनां धातः प््रोष्ठः सन् प््रोयसामपि ।
मैत्रेय उवाच–
एतावान् जीवलोकस्य संस्थाभेदः समासतः ।
विदुर उवाच–
मैत्रेय उवाच–
विश्वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया ।
यथेदानीं तथा चाऽग्रे पश्चादप्येतदीदृशम् ।
कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसङ्क्रमः ।
भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रद्रव्यशक्तिमान् ।
षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः ।
रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः ।
वनस्पत्योषधिलता त्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः ।
तिरश्चामष्टमः सर्गः सोऽष्टाविंशद्विधो मतः ।
गौरजो महिषः कृष्णः सूकरो गवयो रुरुः ।
खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा ।
श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्यकौ ।
कङ्कगृध्रबश्येना भासवल्लूरबर्हिणः ।
अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् ।
वैकृतास्त्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम ।
देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः ।
भूतप््रोतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान् मन्वतराणि च ।
मैत्रेय उवाच–
सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत् ।
एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम ।
स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् ।
अणुर्द्वौ परमाणू स्यात् त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः ।
लघूनि वै समाम्नाता दश पञ्च च नाडिका ।
द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः ।
यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे ।
ग्रहर्क्षताराचक्रस्थः परमाण्वादिना जगत् ।
संवत्सरः परिवत्सर इडावत्सर एव च ।
यः सृज्यशक्तिमुरुधोच्छ्वसयन् स्वशक्त्या
निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते ।
स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिका ह्येकसप्ततिः ।
तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रमः ।
एवंविधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः ।
कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते ।
कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईरितः ।
विकारैः षोडशैर्युक्तो विशेषादिभिरावृतः ।
दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत् ।
यमाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् ।
ससर्जाग्रेऽथ तामिस्रमन्धतामिस्रमादिकृत् ।
दृष्ट्वा पापीयसीं सृष्टिं नाऽत्मानं बह्वमन्यत ।
सनकं च सनन्दं च सनातनमथाऽत्मभूः ।
स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् ।
कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात् ॥ ३४ ॥
मैत्रेय उवाच– ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः । शस्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात् क्रमात् ॥ ३७ ॥
इतिहासपुराणं च पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९ ॥
तपः शौचं दया सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासंख्यमसृजत् सह वृत्तिभिः ॥ ४१ ॥
सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत् तथा ।
वैखानसा वालखिल्योदुम्बराः फेनपा वने ।
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च ।
स्पर्शास्तस्याभवन् जीवात् स्वरो देह उदाहृतः ।
स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः ।
ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् ।
अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा ।
एवं युक्तिमतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा ।
तद् विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्विज्यात्मशक्तिषु ।
स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं विलग्नां स उत्थितः संरुरुहे रसायाः ।
जघान रुन्धानमसह्यविक्रमः सलीलयेभं मृगराडिवाम्भसि ।
ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला
मैत्रेय उवाच–
वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः ।
वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्र
पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक-
मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकोर्ण-
यन्न व्रजन्त्यघभिदोरचनानुवादाः
येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्ना
मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौ
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
को वा इहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-
न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-
तद् वा अमुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः
भूयानघाद्धि भगवद्भिरकारि दण्डो
तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुंभि-
कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम
अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिंदिरायाः
तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-
नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं
कामं व्रजेम वृजिनैर्निरयेषु नष्टा
तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे ।
यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः
यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः
ब्रह्मोवाच–
ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् ।
त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।
यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-
यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां
धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः
न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं
तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः
भगवानुवाच–
ब्रह्मोवाच–
मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् ।
ववौ वायुः सुदुस्पर्शः फट्काराराववान् मुहुः ।
अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् ।
खरोष्ट्राः कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् ।
तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् ।
मनोवीर्यमदोत्सिक्तमधृष्यमकुतोभयम् ।
तयोः स्पृधोः स्निग्धगदाहताङ्गयोः
दैत्यस्य यज्ञावयवस्य मायया
आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसं
एषा घोरतमा सन्ध्या लोकशम्बट्करी प्रभो ।
अधुनैवाभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिकोऽभ्यगात् ।
गदायामपविद्धायां हाहाकारे च निर्गते ।
मैत्रेय उवाच–
रजः प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् ।
सोऽशयिष्टाधिसलिल आण्डकोशो निरात्मकः ।
सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।
देवस्तानाह संविग्नो मा मा जक्षत रक्षत ।
देवताः प्रभया या या दिव्याः प्रमुखतोऽसृजत् ।
देवोऽदेवान् जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् ।
ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः ।
सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः ।
ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः ।
स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः ।
तेभ्यः स व्यसृजद् देहं परः पुरुष आत्मनः ।
तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।
तावत् प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे ।
न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां
नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते ।
योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् ।
कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः
बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता ।
कुशकाशास्त एवासंल्लसद्धरितवर्चसः ।
अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः ।
शारीरा मानसा दिव्याः पर्यासे ये च मानुषाः ।
द्वास्सु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटिमत् ।
हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् ।
अथाऽदर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् ।
तस्मिंन्नलुप्तमहिमा प््रिाययाऽनुषक्तो
तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता ।
मैत्रेय उवाच–
तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः ।
भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् ।
अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः ।
स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् ।
तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव ।
परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् ।
श्री भगवानुवाच–
विश्वमेतद्धि शास्त्रेण विज्ञायात्मानमीश्वरम् ।
निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् ।
आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।
वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि ।
तं त्वा गताऽहं शरणं शरण्यं
भगवानुवाच–
अहंममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः ।
तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् ।
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन चात्मना ।
मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् ।
मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च ।
मैत्रेय उवाच–
भगवानुवाच–
अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।
नैकात्म्यतां मे स्पृहयन्ति केचिन्-
न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपा
न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः ।
स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः ।
गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः ।
एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् ।
तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् ।
कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।
भगवानुवाच–
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः ।
एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि ।
प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् ।
दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् ।
विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः ।
यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् ।
स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः ।
महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् ।
वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः ।
सहस्रशिरसं साक्षाद् यमनन्तं प्रचक्षते ।
कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् ।
तैजसात् तु विकुर्वाणाद् बुद्धितत्त्वमभूत् सति ।
संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च ।
तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः ।
तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् ।
अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च ।
नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः ।
चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः ।
द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च ।
क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् ।
भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् ।
ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् ।
हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् ।
अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ।
विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।
बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।
चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा ।
प्रबुद्ध्य स्वप्नसुप्तिभ्यां संस्मरन्नात्मवैशसम् ।
निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः ।
मुक्तलिङ्गः सदाभासमसति प्रतिपद्यते ।
एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोगुणैः ।
भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया ।
मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा ।
एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते ।
भगवानुवाच–
स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।
तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत
यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं
ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ-
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तं
सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् ।
देवहूतिरुवाच–
यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत् प्रचक्षते ।
विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव च ।
कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।
अर्चादावर्चयेत् तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।
आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।
जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे ।
अत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः ।
रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः ।
ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः ।
अर्थज्ञात् संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वधर्मकृत् ।
तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मरतिर्नरः ।
मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् ।
भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः ।
यत् तद् भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः ।
रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।
न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः ।
एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तदा ।
वायुनोत्क्रमतोत्तारकफसंरुद्धनासिकः ।
योजनानां सहस्राणि नवतिर्नव चाध्वनः ।
अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते ।
भगवानुवाच–
नाथमानो ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः ।
ज्ञानं यदेतददधात् कतमः स देव-
पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मावसायिषु ।
तत्सृष्टिसृष्टसृष्टेषु कोन्वखण्डितधीः पुमान् ।
बलं मे पश्य मायायाः
सङ्गं न कुर्यात् प्रमदासु जातु
योपयाति शनैर्माया योषिद् देवविनिर्मिता ।
देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् ।
यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा ।
आत्मनः केवलं ज्ञानमर्थो देहाद्यसङ्गिनः ।
तच्छ्रद्धयाक्राऽऽन्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् ।
आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः ।
भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा ।
स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना ।
ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् ।
ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः ।
रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः ।
त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः ।
नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् ।
दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते ।
ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति ।
ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् ।
यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् ।
ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः ।
देवहूतिरुवाच–
त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये ।
ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये ।
नित्यरूढसमाधित्वात् परावृत्तगुणभ्रमा ।
चतुर्थस्कन्धः
मैत्रेय उवाच–
शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।
तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।
अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।
देवा ऊचुः–
सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।
मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।
नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।
देवा ऊचुः–
ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।
पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।
नन्दिरुवाच–
गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।
बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।
विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।
गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं
यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-
किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये
कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत
ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं
आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।
शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः ।
दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे ।
जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः ।
उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।
नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये
तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।
स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं
ब्रह्मोवाच–
त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः ।
त्वमेव धर्मार्थदुघाऽभिपत्तये
न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनां
येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया
भवान् हि पुंसः परमस्य मायया
अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः ।
दक्ष उवाच–
ऋत्विज ऊचुः–
रुद्र उवाच–
नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ-
ऋषय ऊचुः –
लोकपाला ऊचुः–
योगेश्वरा ऊचुः–
जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलया
अग्निरुवाच–
ब्राह्मणा ऊचुः–
श्रीभगवानुवाच–
तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि ।
त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् ।
मैत्रेय उवाच–
अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम्
पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने ।
षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् ।
अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ ।
विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः ।
स्मयमानमभिध्यायेत् सानुरागावलोकनम् ।
परिचर्या भगवतो यावतीः पूर्वसेविताः ।
सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः ।
तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।
देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया ।
सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाश्रयम् ।
तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो
देवा ऊचुः–
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीशमाद्यं
तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-
त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्ध आत्मा
यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं पतन्ति
सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादमूल-
तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥
दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।
भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ।
लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः ।
निमित्तमात्रं तत्रात्मा निर्गुणः पुरुषर्षभः ।
केचित् कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप । एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ ५२ ॥
अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात् पुरुषस्य हि ।
भजस्व भजनीयाङ्घ्रिमभवाय भवच्छिदम् ।
वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं
अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
सर्वात्मन्यच्युते सर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् ।
मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।
तस्या विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य
सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया
अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् ।
श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः ।
अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः ।
मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः ।
सदस्या ऊचुः–
तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप ।
यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।
स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।
तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं
यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-
वेन उवाच–
तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः ।
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः ।
तं तु तेऽवनतं दृष्ट्वा किं करोमीति वादिनम् ।
तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः ।
ऋषय ऊचुः –
एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया ।
अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः
ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः ।
यच्चान्यदपि कृष्णस्य ब्रह्मन् भगवतः प्रभोः ।
धरण्युवाच –
नूनं तवेशस्य समीहितं जनैः
सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि-
कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् ।
दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् ।
ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च ।
एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा ।
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ।
धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।
एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः ।
देहाद्यपार्थास्तद्धर्मा न स्युस्तद्द्रष्टुरात्मनः ।
उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् ।
भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहं
स्पृशन्तं पादयोः शीर्ष्णा व्रीडन्तं स्वेन कर्मणा ।
भगवानपि विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः ।
जन्तोर्जगत्यां जगदीश वैशसं
भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो
यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः ।
को न्वस्य कीर्तिं नशृृणोत्यभिज्ञो
अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषांचिदिह सत्तमाः ।
राज्यस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्महेतुता ।
असाविहानेकगुणाध्वरैः सता पृथग्विधैर्द्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।
प्रधानकालाशयकर्मसङ्ग्रहः
ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो
पुमाल्लभेताप्यतिवेलमात्मनः
अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः
पुत्रेण जयते लोक इति सत्यवती श्रुतिः ।
अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।
नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् ।
व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः ।
अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः
शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां
हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया
यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-
दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो
इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः ।
भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।
नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।
न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा ।
मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया ।
आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति ।
न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः ।
तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।
यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति
यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया ।
कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव ।
भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।
कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म-
छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-
एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि ।
उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः ।
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः ।
इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् ।
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।
देव्य ऊचुः –
सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् ।
विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धमहोरगाः ।
स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान्
अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा ।
रुद्र उवाच –
भवान् भक्तिमतां लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् ।
क्षणार्धेनाऽपि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
अथानघाङ्घ्र्योस्तव कीर्तितीर्थयो-
यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् ।
यो माययेदं पुरुरूपयाऽसृजद्
क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः
त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति-
सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविश्य
कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितो
यत्स्पृष्टोऽहरहर्मुक्तक्लेशः शेतेऽमृताम्बुधौ ।
प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् ।
नारद उवाच–
प्राचीनबर्हिरुवाच–
भो भो प्रजापते राजन् पशून् पश्य त्वयाऽध्वरे ।
एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव ।
आसीत् पुरञ्जनो नाम राजा राजन् बृहच्छ्रवाः ।
स एकदा हिमवतो दक्षिणेष्वथ सानुषु ।
यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ।
तेषां परिवृढो राजन् सर्वेषां बलिमुद्वहन् ।
पितृभूर्नृप पुर्या द्वा दक्षिणेन पुरञ्जनः ।
देवभूर्नाम पुर्या द्वा उत्तरेण पुरञ्जनः ।
तीर्थेषु श्रुतिदृष्टेषु राजा मेध्यपशून्वने ।
य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत वा न वा ।
द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।
स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि ।
पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारो घ्राणादयः प्रभो ।
अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो ।
पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ।
दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः ।
शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।
यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः ।
स त्वं विचक्ष्व मृगचेष्ठितमात्मनोऽन्त-
एकं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडशविस्तरम् ।
भक्तिः कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि ।
अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्ष्येद्भूतं स्वप्नवदन्यथा ।
मैत्रेय उवाच–
दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः ।
न व्यवह्रियते यज्ञो ब्रह्मैतद् ब्रह्मवादिभिः ।
शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठमनस्यपार्थे विलसद्द्वयाय ।
नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे ।
दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा ।
श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थितः ।
एतत् परं तज्जगदात्मनः पदं
तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् ।
निरस्तसङ्कल्पविकल्पमद्वयं
न भजति कुमनीषिणां स इज्यां
श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्च
तत् परं सर्वधिष्ण्येभ्यो मायाधिष्ठितमारुहत् ।
पञ्चमस्कन्धः
त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-
या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन्
का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले
किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि
यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः
पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।
एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।
पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।
हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।
सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन
तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।
देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो
सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-
राजोवाच–
तथा चोक्तम्–
नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।
कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।
अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां
तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥
एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥
अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥
यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥
येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥
तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥
अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या
को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-
यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥
राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां
परो रजाः सवितर्जातवेदो
एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥
ब्राह्मण उवाच–
स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च
जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-
विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च
न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य
तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-
स वासनात्मा विषयोपरक्तो
दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं
तावानयं व्यवहारः सदा वै
गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः
पदं विषयम् ।
गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि
द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः
भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य-
ब्राह्मण उवाच–
अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां
शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-
यदि क्षितावेव चराचरस्य
एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-
एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-
ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-
तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति ।
यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय
तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति ।
तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥
श्रीशुक उवाच–
भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥
भव उवाच–
विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते
केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥
तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥
यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा
यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं
जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं
यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-
यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः
तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां
यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं
प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥
एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥
ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं
तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥
षष्ठस्कन्धः
यमदूता ऊचुः–
साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।
यम उवाच–
न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः
देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा
यदोपरामो मनसो नामरूप-
मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं
स वै ममाशेषविशेषमाया-
यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं
यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै
अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-
योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-
यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।
तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।
अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः ।
मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।
तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् ।
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
देवा ऊचुः–
पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-
य एक ईशो निजमायया नः
आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
देवा ऊचुः–
यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।
अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण
हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय
न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।
स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।
मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।
नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् ।
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः ।
वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः
श्रीशुक उवाच–
तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।
अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो
न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः
त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां
उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-
नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते
चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।
कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।
वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।
रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।
हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।
अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।
दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।
तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।
यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।
वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।
यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।
ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।
तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।
लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।
यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः ।
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं
न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो
देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।
इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।
तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः ।
गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् ।
नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ।
सप्तमस्कन्धः
निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।
कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥
य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥
शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।
यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।
तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।
कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।
गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।
कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।
मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।
पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।
तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।
ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।
तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।
वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् ।
तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।
विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥
नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः ।
यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।
सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।
यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-
यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।
न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।
यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः ।
वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।
हिरण्यकशिपुरुवाच–
क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च ।
सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना ।
तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना ।
अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।
तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते ।
तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् ।
व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।
हिरण्यकशिपुरुवाच–
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।
त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा
त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-
त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-
नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।
तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो
तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।
यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः ।
प्रह्लाद उवाच–
स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।
प्रह्लाद उवाच–
गुरुपुत्र उवाच–
प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् ।
केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।
तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये
जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।
अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।
बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।
एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।
एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।
तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।
निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।
यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-
तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-
अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः
कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-
तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।
सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।
ऋषय ऊचुः–
गन्धर्वा ऊचुः–
साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।
प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके ।
विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-
यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य
माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः
क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्
नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात्
त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो
न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये
तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या
तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-
स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं
एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-
प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा
रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे
श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥
भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।
कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।
श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥
एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।
एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।
प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।
धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।
स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं
नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥
राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥
वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।
देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।
या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।
द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥
दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।
मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥
कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।
इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।
पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।
नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।
विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।
स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।
कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।
तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।
पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः ।
तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते ।
पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः ।
तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः ।
निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः ।
इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः ।
अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥
विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः ।
य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते ।
आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् ।
अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः ।
क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि ।
धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।
स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः ।
अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।
अष्टमस्कन्धः
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो
विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-
अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु ।
न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां
अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं
सोमं मनो यस्य समामनन्ति
अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा
यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं
अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः ।
तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो
विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या
प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥
त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः ।
श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥
धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं
क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं
अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।
धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।
विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥
दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह
माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-
यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।
एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।
मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥
नवमस्कन्धः
एवंविधानेकगुणः स राजा
रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-
रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं
मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।
तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।
स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।
तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।
स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः ।
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।
मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः ।
चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् ।
दशमस्कन्धः
स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं
यतो यतो धावति दैवचोदितं
ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः
तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः ।
अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-
भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।
ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं
ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥
एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-
त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः
बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥
त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न
स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्
सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ
सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्
न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः
शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्
दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो
न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं
स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् ।
य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह ।
सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव । प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भवः ॥ १७ ॥
एवं भवान् बुद्ध्यनुमेयलक्षणो
यदात्मनो दृश्यगुणेषु सन्निधे-
त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो
सत्त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया
त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु-
देवक्युवाच– रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपम् ॥ २५ ॥
नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने
योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो
मा शोचेथां महाभागावात्मजान् स्वकृतं भुजः ।
भुवि भौमानि भूतानि यथाऽऽयान्त्यपयान्ति च ।
यतोऽनेकविधोऽभेदो यत आत्मविपर्ययः । देहयोगवियोगश्च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥
तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि । माऽनुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः ॥ २१ ॥
एवमेतन्महाराज यथा वदसि देहिनाम् ।
शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।
यक्षावूचतुः - कृष्ण कृष्ण महायोगिन् त्वमाद्यः पुरुषः परः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥ ३० ॥
त्वमेकः सर्वभूतानां देह आत्मेन्द्रियेश्वरः ।
त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी ।
गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः ।
तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।
यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः । तैस्तैरतुल्यातिशयैस्तिर्यग्योनिष्वसङ्गतैः ॥ ३५ ॥
अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नो
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।
ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे ।
नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मस्थोदयाय च ।
परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः ।
त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो
तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां
त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् ।
अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।
तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा ।
उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः ।
इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।
गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः दामोदराधरसुधासरसाग््य्रगेयम् । भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसौघमार्गे हृष्टत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवः सदर्भाः ॥ १० ॥
अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः ।
किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥
देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।
तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।
सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।
रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।
वाचालं मानिनं मत्तमज्ञं पण्डितमानिनम् ।
इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥
कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।
पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो
येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥
स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।
दुस्सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।
तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्याऽपि सङ्गताः ।
राजोवाच– कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने । गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥ १२ ॥
श्रीशुक उवाच– उक्तं पुरस्तादेेतत्ते चैद्यः सिद्धिं यथा गतः । द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रियाः ॥ १३ ॥
नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।
कामं क्रोधं भयं स्नेहं मैत्रीं सौहृदमेव च ।
मदविघूर्णितलोचन ईषन् मानदः स्वसुहृदां वनमाली । बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डं मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्म्या ॥ २४ ॥
त्वामीश्वरं स्वाश्रयमात्ममायया विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् । क्रीडार्थमाद्यन्तमनुष्यविग्रहं नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्त्वताम् ॥ २४ ॥
य ईक्षिताऽहंरहितोऽप्यसत्सतोः स्वतेजसाऽपास्ततमोभिदाभ्रमः । स्वमाययाऽऽत्मन् रचितेषु तत् सन् प्राणादिभिर्जन्तुषु भाति चित्रधा ॥ ११ ॥
यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै- र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः । प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद् यास्तद्विरक्ताः स्युरशोभना मताः ॥ १२ ॥
प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।
भूस्तोयमग्निः पवनः खमादि- र्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ ३ ॥
नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते अजादयोऽन्यात्मतया गृहीताः । अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ४ ॥
त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमीश्वरम् ।
त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः ।
तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे । गुणप्रवाहोऽयमविद्ययाऽसकृत् प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥ १३ ॥
अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्घ्रिरीक्षणं सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः । द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवः कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १४ ॥
रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः । निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- र्मेढ्रं तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १५ ॥
त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता लोकाः सपाला बहुजीवसङ्कुलाः । यथा जले सञ्जिहते जलौकसोऽ- प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १६ ॥
यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थं विभर्षि हि ।
नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च ।
श्रीशुक उवाच– पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः । मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥
उवाच पितरावेत्य साग्रजः सात्वतर्षभः । प्रश्रयावनतः प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम् ॥ २ ॥॥
नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि ।
न लब्धो दैवहतयोर्वासो नौ भवदन्तिके ।
सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।
यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च ।
मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम् ।
तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः ।
तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः ।
मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः ।
फलमूलकृताहारं वृतं शिष्यशतैर्मुनिम् ।
नमस्ते भार्गव श्रीमन् जामदग्न्य तपोधन ।
एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे ।
उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः ।
इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् ।
पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् ।
हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥
सत्यभामोवाच– यो मे सनाभिवधतप्तहृदा ततेन लिप्ताभिशापमपमार्ष्टुमुपाजहार । जित्वर्क्षराजमथ रत्नमदात् स तेन नीतच्छिदादिशत मां प्रभवेऽपि दत्ताम् ॥ ९ ॥
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।
नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकं न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः । उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥ १२ ॥
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः । यत्तीर्थबुद्धिश्च जले न कर्हिचित् जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥ १३॥
ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपः स्वाध्यायसंयमैः ।
रुग्मिण्युवाच– नन्वेतदेवमरविन्दविलोचनाह यद् वै भवान् न भवतः सदृशो विभूम्नः । क्व स्वे महिम््नयभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः क्वाहं गुणप्रकृतिरन्यगृहीतपादा ॥ ३८ ॥
सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तः शेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा । योऽनित्यकेन्द्रियगणैः कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवया नृपपदं विधुतं तमोऽन्धम् ॥ ३९ ॥
त्वत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्म स्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम् । यस्मादलौकिकमिवेहितमीश्वरस्य भूमंस्तवेहितमथो अनु मे भवन्ति ॥ ४० ॥
निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद् यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः । न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तिकमाढ्यतान्धाः प्रेष्ठः सतां बलिभुजामपि योऽन्तरास्ते ॥ ४१ ॥
त्वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलात्मा यद्वाञ्छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम् । तेषां विभो समुदितो भवतः प्रसाद- स्त्रय्यां च यश्च रतयोः सुखदुःखिनोर्न ॥ ४२ ॥
त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव आत्माऽऽत्मदश्च जगतामिति मे वृतोऽसि । मुक्त्वा भवद्भवदुदीरितकालगन्ध- ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्यान् ॥ ४३ ॥
का स्त्री वृणीत तव पादसरोजगन्धमाघ्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम् ।
तं त्वाऽनुरूपमभजं जगतामधीश- मात्मानमत्र च परत्र च कामरूपम् । स्यान्मे तवाङ्घ्रिशरणं श्रुतिभिर्भ्रमत्या ये वै भजन्ति त उ यान्त्यनृतापवर्गम् ॥ ४७ ॥
कस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः । यत्कर्णमूलमरिकर्शन नोपयायाद् युष्मत्कथा मृडविरिञ्चसभासु गीता ॥ ४८ ॥
त्वक्श्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त- र्मांसास्थिरक्तकृमिविड्भरितान्त्रवीतम् । जीवच्छवं भजति काममतिर्विमूढा या ते पदाब्जमकरन्दमजिघ्रती स्त्री ॥ ४९ ॥
अस्त्यम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः । यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा ॥ ५० ॥
नैवालीकं भवत्येव वचस्ते मधुसूदन ।
मुग्धायाश्चापि पुंश्चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम् ।
तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लवधियः सहसैव बिभ्यद् रम्भेव वातविहता प्रविकीर्य केशान् ॥ २८ ॥
रामा गृहे विहरतः पुरतः कराभ्यां बद्धेक्षणाः स्वदयितस्य मुदा हसन्त्यः । गात्रान्तराण्यपिदधुर्निजपूरुषस्य क्लेशावहान्यपि तदङ्गजभङ्गभीताः ॥ ६ ॥
निहते रुग्मिणि श्याले नाब्रवीत् साध्वसाधु वा ।
श्रुत्वाऽजितं जरासन्धं नृपतेर्ध्यायतो हरिः ।
ततो मुहूर्तात् प्रकृतावुपस्थित- स्तत्रानुतिष्ठत् स्वजनानुसङ्गतः । महानुभावस्तदबुद्ध्यतासुरीं मायां स साल्वप्रकृतां मयोदिताम् ॥ ३८ ॥
श्रीभगवानुवाच– स्वायम्भुवं ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा । तत्रत्यानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥
श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तमीश्वरम् । ब्रह्मवादः सुसंवृत्तः श्रुतयो यत्र शेरते ॥ १० ॥
तत्राप्ययमभूत् प्रश्नस्त्वं मां यदनुपृच्छसि ।
अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ १२ ॥
सनन्दन उवाच— स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभिः । तदन्ते बोधयाञ्चक्रुस्तल्लिङ्गैः श्रुतयः परम् ॥ १३ ॥
यथा शयानं सम्राजं बन्दिनस्तत्पराक्रमैः । प्रत्यूषेऽभ्येत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविनः ॥ १४ ॥
श्रुतय ऊचुः– जय जय जह्यजामजित दोषगृहीतगुणां त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः । अज जगदोकसामखिलशक्त्यबोधक ते क्वचिदजयाऽऽत्मनाऽनुचरतोऽनुचरेन्निगमः ॥ १५ ॥
बृहदुपलब्धमेतदवशेषतया यत उदगास्तमस्यविकृतेऽविकृतः । अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितं कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ॥ १६ ॥
इति सूरयस्त्र्यधिपतेऽखिललोकमल- क्षपणं तव कथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहुः । किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाः परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १७ ॥
दृतय इवोच्छ्वसन्त्यसुहृदो यदि ते महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहतः । पुरुषविधान्वयोऽत्र चरमोत्तममध्यमादिषु यस्तव सदसतः परं प्रथयेदविशेषमृतम् ॥ १८ ॥
उदरमुपासते यर्हि वर्त्मनि सूक्ष्मदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् । तत उदगाच्च नन्दनपथाऽथ शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १९ ॥
स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया भरतमतश्चकास्स्यनलवत् स्वकृतानुकृतिः । अपि वितथास्वमूष्ववितथोरुविधं मनसि निकटधियो नयन्त्यभिविपत्य तव ॥ २० ॥
प्रक्रमवत् स्वसत्कृतं पुरुषेषु धीषु तु बहिरन्तरसच्चरणे ।
इति विमृशन्ति कवयो निगमावपनं यजन्त उपासते भवमध्यविनिश्वसिताः । दुरवगमात्मतत्वनिगमायतवाङ्मनसश्चरित- महामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणाः॥ २२ ॥
न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहाः ।
न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनो यदनुशया भ्रमन्त्यभवाः कुशरीरभृतः । निभृतमोक्षहृदययोगयुजो हृदयं मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः ॥ २४ ॥
स्मरणात् स्वनुराग तद् भवान् उरगेन्द्रभोगदण्डविषक्तधियो वयमपि ते समासमदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाम् । क इह नु वेद वक्तुमपेतजन्मलयो यत उदगाद् ऋषिरनु देवगणा उभये ॥ २५ ॥
तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजवः किमपि न तत्र शास्त्रमपकृष्य शयीत यदा । जनिमसतः सतो मृतिमजात्मनि ये च भिदां विपणमृते स्मरन्त्युपविश ध्वनिमारुवतः ॥ २६ ॥
त्रिगुणमयः पुमानिति यदबोधकृता त्वयि न तु भवेत् तदवबोधरसे । सदिव मनस्त्रिवृत् त्वयि भवत्यसतां मनुजा- दयो विमृशन्त्यशेषमिदमार्ततयाऽऽत्मविदः ॥ २७ ॥
न हि विकृतं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया स्वकृतमनुप्रविष्ट इदमात्मतया रसितम् । तव ये परिचरन्त्यखिलतत्वनिकेततया ननु ते पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ॥ २८ ॥
परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां- स्त्वयि दृढसौहृदा ननु पुनन्ति न ते विमुखाः । त्वमेकः स्वराडखिलकारकशक्तिधर- स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्ति च येऽनिमिषाः ॥ २९ ॥
वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः । स्थिरचरजातयः स्युरज ये त्वनिमित्तयुजो विरह उदीक्षयेत् यदि परस्य विमुक्तसतः ॥ ३० ॥
न हि परमस्य कश्चिदपरोऽनपरस्य भवेत् व्ययत इवात्र यस्य च शून्यतुल सन्दधतः । अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्व ततो न हि न शास्यतेति नियमो ब्रुवते च तथा ॥ ३१ ॥
अजन परिमुच्यतेऽत्र भवात् सततात् सममनुजानता ततमनन्तमदुष्टतया । न घटत उद्भवः प्रकृतिपूरुषयोरजयो- रुभययुजोर्भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् ॥ ३२ ॥
त्वयि त इमे ततो विबुधनामगुणाः परमे अमृत इवार्णवे मधु निलिल्युरशेषरसाः । नृषु तव मायया स्वगतया कुशलं त्वयि सुधियोऽङ्ग भेदमनुविधातुमनु प्रभवः । कथमनुवर्तिनां भवभयं तव भ्रुकुटी सृजति मुहुर्नृणाम् ॥३३॥
इह भवच्चरणेषु सुजातभुवो जितहृषीकवायुभिरुदात्तमहत्तुरगैः । य इह यतन्त्यमतिलोलमुपायविदो व्यसनशताब्धितारमपहाय गुरोश्चरणम् ॥ ३४ ॥
वणिज इवोच्छ्वसन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ स्वजनसुतात्मदारधनधामधराः । सुखशान्तिमति त्वयि हि सन्ति न तानि नृणां विभव उद्यति श्रयत आत्मनि सर्वरसे ॥ ३५ ॥
इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विहाद्य विजने स्वनिरस्तभगे । भुुवि पुण्यतीर्थसदना ह्यृषयो निविशन्त्यतस्तु भवतः पदाम्बुजं हृदाऽघभिदम् । दधति सकृन्मनस्त्वयि चिदात्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसार हरावसथम् ॥ ३६ ॥
इदमप्यथो वदन्ति चे- न्ननु तर्का व्यभिचरन्ति क्वचित् क्वचिन्मृषा च । ततो भयदृग्व्यवहितये विकल्प उषितोऽन्वहमन्धपरम्परया भ्रमति भारती च तवोरुवृत्तिभिरूढजवा ॥ ३७ ॥
न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना- दनिमित्तकमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपगीयते द्रविणजातिविकल्पपथै- र्वितथमनोविलासमिदमित्यवयन्ति बुधाः ॥ ३८ ॥
उदगात् पुमाननुगीतगुणांश्च जुषन् भजति सरूपतां तदनु त्वमुत जहासि जिहासि ताम् । अहिरिव त्वचं त्वमुत परमात्तभगां महसि महीयसेऽष्टगुणोऽपरिमेयभगः ॥ ३९ ॥
यदि न समुच्चरन्ति यतयोऽपि हृदि कामजडाः दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणिः । अनुतृप्तयोगिनामभयो भगवन् अनवगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवतः ॥ ४० ॥
तदवगमार्थसितासितयो- र्गुणविगुणयोर्न हि देहभृतां सगिरः । अनुययुरत्र हंसकुलगीतपरम्परया । न तुषावरणा इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि सफलं पतन्ति न पतन्ति बन्धनाः ॥ ४१ ॥
इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः ।
एवं स गुरुणाऽऽदिष्टो गृहीत्वा श्रद्धयाऽऽत्मवान् ।
नारद उवाच– नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलमूर्तये । यो धाता सर्वभूूतानामभयो यस्य ते कलाः ॥ ४६ ॥
श्रीशुक उवाच– इत्याद्यमृषिमामन्त्र्य तच्छिष्यांश्चामलात्मकान् । ततोऽगादाश्रमं साक्षात् पितुर्द्वैपायनस्य मे ॥ ४७ ॥
सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रहः ।
यो ह्यात्मा जगदादिमध्यनिधनो योऽव्यक्तजीवेश्वरो यः सृष्ट्वेदमनुप्रविष्ट ऋषिणा चक्रे पुनः संहिताम् । यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्तः कुलायं यथा तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥
एकादशस्कन्धः
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।
वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥
एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥
हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥
अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।
देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।
अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥
एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।
गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।
कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।
इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।
धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।
ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।
वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।
हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥
कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।
प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥
एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।
राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥
प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।
एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।
तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।
सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।
पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥
नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥
नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥
अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥
राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥
आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥
नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।
वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥
लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः ।
अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः ।
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः ।
एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः ।
भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।
यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥
आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥
इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥
त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥
हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥
संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥
देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितश्रियो गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिषः । यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणा वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विहाय यज्ञान् सुराग््राहैरासुरवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥
धनं हि धर्मैकफलं यतोऽस्य ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्तिः । गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥
यद् घ््र•णभक्षो विहितः सुराया- स्तथा पशोरालभनं न हिंसा । एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम् ॥ १३ ॥
द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम् ।
एवं युगानुरूपोऽसौ भगवान् युगवर्तिभिः ।
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् । सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिचर्यया च ॥ ४२ ॥
स्वपादमूलं भजतः प््रिायस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ ४३ ॥
वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र- साल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमापुरनुरक्तधियः पुनः किम् ॥ ४९ ॥
त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थः । नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै यः स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्यः ॥ ८॥
स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमानः । यः सात्विकैः समविभूतिभिरात्मविद्भि- र्व्यूह्यार्चितः सवनशः समविक्रमैश्च ॥ ८,१० ॥
पर्युष्टया पतितया वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपक्षवच्छ्रीः । यः सुप्रणीतममुयाऽर्हणमाददानो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः ॥ १२ ॥
नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति देवाश्च यस्तनुभृदायुषि रज्यमानाः । कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयोः परस्य शं नस्तनोतु चरणः पुरुषोत्तमस्य ॥ १४ ॥
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमानां अव्यक्तजीवमहतामपि कालमात्रः । सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥ १५ ॥
त्वत्तः प्रधानमधिकृत्य पुमान् स्ववीर्यं धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः । सोऽयं त्वयाऽनुगत आत्मन आण्डकोशं हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥ १६ ॥
तत् तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् । अर्थान् जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो येऽन्ये स्वतः परिहृतानपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥
बिभ््रात् तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्याः पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् । आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै- स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्तदुपस्पृशन्ति ॥ १९ ॥
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम ।
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् ।
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् ।
वाताशना महर्षयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः ।
वयं त्विह महायोगिन् भ््रामन्तः कर्मवर्त्मसु । त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ॥ ४९ ॥
स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गतितानि च ।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थे भ््रामः स गुणदोषकृत् ।
तस्माद् युक्तेन्द्रियग््र•मो युक्तचित्त इदं जगत् ।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् ।
दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते ।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चलः ।
उद्धव उवाच– योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव । निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः ॥ १४ ॥
सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब््राह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७ ॥
तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमखण्डविकुण्ठधिष्ण्यम् । निर्वेदधीरहरहर्वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
श्री भगवानुवाच– प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्वविचक्षणाः । समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥
त्वं हि नः पृच्छतां ब््राह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् ।
शश्वत् परार्थसर्वेहां परार्थैकान्तसम्भवम् ।
अन्तर्बहिश्च स्थिरजङ्गमेषु ब््राह्मात्मभावेन समन्वयेन । व्याप्त्याऽव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभोवद् विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥
तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः ।
स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थवन्नृणाम् ।
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षो दूरभाजनः ।
क्वचिच्छन्नः क्वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम् ।
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः ।
कालनद्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ ।
बुद्धिसंस्थेन भेदेन व्यक्तस्थ इव तद्गतः ।
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः ।
योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः ।
सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।
वासो बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत- च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून् । सत्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥
तदेवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा । यथेषुकारो नृपतिं व््राजन्त- मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥
एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया ।
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ।
सत्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ।
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।
कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः ।
देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु- र्बिभ््रात् स्म सत्वनिधनं सततात्युदर्कम् । तत्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन् । सोऽन्ते सुकृच्छ्रमवरुद्धमनाः स्वदेहं सृष्ट्वा स्वबीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥
न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् ।
सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः ।
निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् ।
यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित् ।
निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान् ।
योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि ।
तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम् ।
वैशारदी साऽतिविशुद्धबुद्धि- र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूतिम् । गुणांश्च संदह्य यदात्म्यमेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाऽग्निः ॥ १३ ॥
अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः ।
मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी तथा ।
एवमप्यत्र सर्वेषां देहिनां देहयोगतः ।
तत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते ।
न देहिनां सुखं किञ्चिद् विद्यते विदुषामपि ।
यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः ।
गुणाः सृजन्ति कर्माणि कालो नु सृजते गुणान् ।
यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः ।
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम् । य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचाऽर्पिताः ॥ ३३ ॥
काल आत्माऽऽगमो लोकः स्वभावो धर्म एव च ।
उद्धव उवाच– गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः । गुणैर्न बध्यतेऽदेही बध्यते वा कथं विभो ॥ ३५ ॥
एतदच्युत मे ब््राूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।
श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥
शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया ।
विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् ।
एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते ।
अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते ।
सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥
देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः ।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च ।
दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा ।
एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने ।
न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् ।
वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः ।
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा ।
न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥
शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि ।
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च । वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९ ॥
यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥
एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि ।
त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः ।
ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया ।
स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि ।
श्रीभगवानुवाच– न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्ते न दक्षिणाः ॥ १ ॥
व््रातानि यज्ञाश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः ।
मत्सङ्गेन तु दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः ।
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः ।
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः ।
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः ।
यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः ।
मत्कामा रमणं जारं मत्स्वरूपाविदोऽबलाः ।
तस्मात् त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदितां प्रतिचोदनाम् ।
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।
उद्धव उवाच– संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्मस्थो येन भ््र•म्यति मे मनः ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुवाच– य एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूक्ष्ममुपैति रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठम् ॥ १७ ॥
यथाऽनलः स्वेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः । अणुः प्रजातो हविषा समिद्ध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥
एवं गतिः कर्म रतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च । सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजः सत्वतमोविकारः ॥ १९ ॥
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि- रव्यक्त एको जगतां यथाऽऽद्यः । विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटे यथा तन्तुवितानसंस्था । य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड- स्त्रिवल्कलो द्विफलः खं प्रविष्टः ॥ २२ ॥
अदन्ति चैकं फलमस्य गृध््र• ग््र•मेचरा एकमरण्यवासाः । हंसा य एवं बहुरूपमिष्टं मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥
एवं गुरूपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः । विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥
सत्वाद् धर्मो भवेच्छुद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।
वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् ।
श्रीभगवानुवाच– एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूर्भूतभावनः । ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥
स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारविनिश्चयम् ।
वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्नः ईदृशः ।
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः ।
मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः ।
गुणेषु वाऽऽविशेच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया ।
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तितः ।
यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां किंकृताऽभिदा ।
यो जागरे बहुविधान् क्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणो हृदि तत्सदृक्षान् । स्वप्नेऽथ सुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥ ३२ ॥
वीक्षेत विभ््राममिमं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् । विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया स्वप्ने यथा त्रिगुणसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥
दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततर्ष- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्वच यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ््रामाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५ ॥
देहं च नश्वरमवस्थितमुज्झितं च सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिवृतं मदिरामदान्धः ॥ ३६ ॥
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रति समीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवत् सः ॥ ३७ ॥
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् ।
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा ।
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयो नृणाम् ।
मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ ।
धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम् ।
आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः ।
न तथा मे प््रिायतम आत्मयोनिर्न शङ्करः ।
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् ।
कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना ।
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च । विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४ ॥
स्त्रीसङ्गसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् ।
न तथाऽस्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः ।
एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणसंयममभ्यसेत् ।
तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योमि्न धारयेत् ।
एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि ।
ध्यानेनेत्थं सुतीव््रोण युञ्जतो योगिनो मनः ।
श्रीभगवानुवाच– सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगैः । तासामष्टौ मत्प्रधाना ता एव गुणहेतवः ॥ ३ ॥
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः ।
गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवाप्स्यति ।
अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम् ।
स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम् ।
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता ।
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयन् मनः ।
महत्यात्मन् मयि परे यथासंस्थं मनो दधत् ।
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन् ।
धारयन् मय्यहन्तत्वे मनो वैकारिकेऽखिलम् ।
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयन् मयि मानसम् ।
विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग््राहे ।
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि ।
मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन् ।
मनो मनसि संयोज्य देहं तदनु वायुना ।
यदा मन उपादाय यद्यद् रूपं बुभूषति ।
परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् ।
पार्ष्ण्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु ।
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् ।
मद्भक्त्या शुद्धसत्वस्य योगिनो धारणाविदः ।
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः ।
उपासकस्य मामेवं योगधारणया पुनः ।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः ।
अन्तरायान् वदन्त्येतान् युञ्जतो योगमुत्तमम् ।
जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः ।
अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः ।
अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम् ।
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् । सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः ॥ ११ ॥
हिरण्यगर्भो देवानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् ।
इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् ।
उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् ।
नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम् ।
पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब््राह्मिष्ठानां बृहस्पतिः ।
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् ।
स्त्रीणां तु शतरूपाऽहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः ।
वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् ।
ओजः सहोबलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम् ।
विश्वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् ।
अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः ।
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् ।
मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना ।
सङ्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया ।
एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः ।
वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणं यच्छेन्द्रियाणि च । आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्प्यसेऽध्वने ॥ ४२ ॥
यो वै वाङ्मनसी सम्यङ् न संयच्छेद् धिया यतिः ।
तस्माद् वचोमनःप्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः ।
वक्ता कर्ताऽविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि ।
वेदाध्यायी स्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम् ।
विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः ।
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसम्भृतम् ।
वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।
एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः ।
शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत् ।
नहि तस्य विकल्पाख्या क्रिया मद्वीक्षया हता ।
तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः ।
श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥
त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥
नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै ।
एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् ।
आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् ।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् ।
धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् ।
दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः ।
गुणदोषभिदादृष्टिर्नियमात् तेन हि स्वतः ।
श्रीभगवानुवाच– योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६ ॥
निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु ।
यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान् ।
नृदेहमासाद्य सुदुर्लभं यः प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स मार्गणः ॥ १७ ॥
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।
भिद्यते हृदयग््रान्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः ।
यत् कर्मभिर्यत् तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् ।
सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा ।
न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम । वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३५ ॥
नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमकल्मषम् । तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३६ ॥
न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः ।
एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः । क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३८ ॥
शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु ।
भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः ।
भेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि ।
कृष्णसारोऽथ देशानां ब्राह्मणानां शुचिर्भवेत् ।
कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा ।
क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः ।
समानकर्माचरणेऽपतितानां न पातकम् ।
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः । एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः ॥ १८ ॥
विषयेषु गुणध्यानात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत् ।
कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तदनुवर्तते ।
तया च रहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते ।
विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं वेद नापरम् ।
फलश्रुतिरियं नॄणां नः श्रेयोरोचनं परम् ।
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च ।
न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि ।
एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः ।
कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु पलबुद्धयः ।
न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः । उक्थशासो ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः ॥ २८ ॥
ते मे मतमविज्ञाय परोक्षविषयात्मकाः । हिंसायां यदि कामः स्याद् यज्ञ एव न चोदना ॥ २९ ॥
हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया ।
रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः ।
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया अपि ।
शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम् ।
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणाऽनन्तशक्तिना ।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वहते मुखात् ।
छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः ।
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः ।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ।
किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत् ।
मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्पापोह्य इत्यहम् ॥ ४३ ॥
एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय माऽभिदाम् ।
श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥
नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा ।
यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् ।
परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।
पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् ।
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।
प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः ।
सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः ।
श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥
शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥
सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥
व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥
सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः ।
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः ।
सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।
तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते ।
इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् ।
उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥
एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः ।
श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥
ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते ।
दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥
एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥
योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥
विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः ।
ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् ।
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।
तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ ।
नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।
मनोवशेऽन्ये हि भवन्ति देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति । भीमो हि देवः सहसः सहीया- न्नात्याविशत् तत् स हि देवदेवः ॥ ४८ ॥
तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।
देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः ।
जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥
दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥
आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥
कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥
न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् ।
तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् ।
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका ।
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥
तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् ।
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् ।
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते ।
योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः ।
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् ।
यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् ।
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् ।
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः ।
सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः ।
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः ।
अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते ।
योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे ।
स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदाऽसुखम् ।
सत्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः ।
कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं कर्मनिष्ठं तु राजसम् ।
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी ।
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् ।
सर्वे गुणमया भावा पुरुषाव्यक्तनिष्ठिताः ।
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः ।
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम ।
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पद्य तन्मयः । आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २३ ॥
स्वस्य घर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम ।
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् ।
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति ।
श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥
परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।
कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् ।
छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।
तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥
एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥
श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥
अर्थेऽप्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् ।
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥
अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥
ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् ।
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।
विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।
न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥
अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥
नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥
समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥
तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥
एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले ।
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् ।
श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥
पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् ।
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् ।
इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया ।
यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते ।
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।
राजोवाच– ततो महाभागवत उद्धवे बदरीं गते । द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः ।
प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति यशो यत् सतामात्मलग्नम् । यच्छ्रीवाचं जनयति रतिं कोऽनुमानः कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥
लोकाभिरामां स्वतनुं धरणाध्यानमङ्गलाम् ।
राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहां मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य । सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चाऽत्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥
तथाऽप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये- ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् । नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थ गतिं प्रदर्शयन् ॥ १३ ॥
रामपत्न्यश्च तं देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
द्वादशस्कन्धः
न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥
बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते ।
एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह ।
न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।
इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।
तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।
नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा ।