Krishnamrutamaharnava/Data: Difference between revisions
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| verse_text = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः | | verse_text = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।¦यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥ | ||
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| verse_text = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् | | verse_text = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।¦वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | ||
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| verse_text = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् | | verse_text = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।¦यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | ||
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| verse_text = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले | | verse_text = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।¦अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | ||
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| verse_text = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् | | verse_text = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।¦सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् | | verse_text = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।¦ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | ||
| verse_lines = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।¦ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | | verse_lines = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।¦ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः | | verse_text = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।¦वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | ||
| verse_lines = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।¦वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | | verse_lines = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।¦वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = आत्रेयः¦यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।¦तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥ | ||
| verse_lines = आत्रेयः¦यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।¦तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥ | | verse_lines = आत्रेयः¦यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।¦तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = ब्रह्मा¦बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।¦वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्मा¦बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।¦वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥ | | verse_lines = ब्रह्मा¦बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।¦वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = कौशिकः¦अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥ | ||
| verse_lines = कौशिकः¦अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥ | | verse_lines = कौशिकः¦अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = शङ्करः¦कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।¦प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥ | ||
| verse_lines = शङ्करः¦कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।¦प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥ | | verse_lines = शङ्करः¦कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।¦प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः | | verse_text = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।¦तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | ||
| verse_lines = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।¦तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | | verse_lines = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।¦तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = ब्रह्मा¦न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।¦भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्मा¦न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।¦भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥ | | verse_lines = ब्रह्मा¦न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।¦भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः | | verse_text = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।¦जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | ||
| verse_lines = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।¦जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | | verse_lines = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।¦जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते | | verse_text = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।¦न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | ||
| verse_lines = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।¦न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | | verse_lines = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।¦न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः | | verse_text = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।¦करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | ||
| verse_lines = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।¦करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | | verse_lines = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।¦करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना | | verse_text = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।¦ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | ||
| verse_lines = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।¦ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | | verse_lines = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।¦ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः | | verse_text = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः ।¦न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा | | verse_text = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।¦स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः | | verse_text = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।¦पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | ||
| verse_lines = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।¦पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | | verse_lines = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।¦पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् | | verse_text = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् ।¦असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = अगस्त्यः¦स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः ।¦शतधा भेदमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च | | verse_text = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।¦भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता | | verse_text = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।¦यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | ||
| verse_lines = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।¦यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | | verse_lines = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।¦यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् | | verse_text = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् ।¦अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥ | ||
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| verse_lines = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।¦ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥ | | verse_lines = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।¦ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् | | verse_text = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।¦मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | ||
| verse_lines = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।¦मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | | verse_lines = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।¦मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् | | verse_text = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।¦प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | ||
| verse_lines = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।¦प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | | verse_lines = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।¦प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः | | verse_text = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।¦तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | ||
| verse_lines = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।¦तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | | verse_lines = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।¦तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् | | verse_text = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।¦न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | ||
| verse_lines = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।¦न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | | verse_lines = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।¦न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् | | verse_text = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।¦फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | ||
| verse_lines = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।¦फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | | verse_lines = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।¦फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे | | verse_text = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।¦तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | ||
| verse_lines = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।¦तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | | verse_lines = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।¦तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः | | verse_text = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।¦पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | ||
| verse_lines = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।¦पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | | verse_lines = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।¦पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी | | verse_text = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।¦तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | ||
| verse_lines = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।¦तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | | verse_lines = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।¦तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः | | verse_text = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।¦सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | ||
| verse_lines = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।¦सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | | verse_lines = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।¦सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = कौशिकः¦अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥ | ||
| verse_lines = कौशिकः¦अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥ | | verse_lines = कौशिकः¦अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।¦आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते | | verse_text = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।¦गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | ||
| verse_lines = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।¦गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | | verse_lines = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।¦गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् | | verse_text = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।¦क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | ||
| verse_lines = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।¦क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | | verse_lines = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।¦क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् | | verse_text = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।¦स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | ||
| verse_lines = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।¦स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | | verse_lines = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।¦स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे | | verse_text = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।¦हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | ||
| verse_lines = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।¦हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | | verse_lines = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।¦हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः | | verse_text = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।¦पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | ||
| verse_lines = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।¦पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | | verse_lines = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।¦पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् | | verse_text = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।¦जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | ||
| verse_lines = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।¦जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | | verse_lines = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।¦जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = ब्रह्मा¦असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।¦समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्मा¦असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।¦समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥ | | verse_lines = ब्रह्मा¦असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।¦समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् | | verse_text = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।¦तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | ||
| verse_lines = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।¦तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | | verse_lines = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।¦तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः | | verse_text = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।¦स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | ||
| verse_lines = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।¦स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | | verse_lines = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।¦स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।¦नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥ | | verse_lines = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।¦नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।¦मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | | verse_lines = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।¦मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।¦गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥ | | verse_lines = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।¦गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥ | ||
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| verse_text = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् | | verse_text = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।¦नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | ||
| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।¦नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | | verse_lines = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।¦नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् | | verse_text = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।¦क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | ||
| verse_lines = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।¦क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | | verse_lines = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।¦क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् | | verse_text = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।¦अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | ||
| verse_lines = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।¦अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | | verse_lines = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।¦अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः | | verse_text = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।¦हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च | | verse_text = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।¦नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | ||
| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।¦नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | | verse_lines = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।¦नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा | | verse_text = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।¦पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | ||
| verse_lines = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।¦पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | | verse_lines = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।¦पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये | | verse_text = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।¦शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | ||
| verse_lines = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।¦शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | | verse_lines = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।¦शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् | | verse_text = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।¦नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | ||
| verse_lines = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।¦नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | | verse_lines = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।¦नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत | | verse_text = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।¦तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् | | verse_text = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।¦अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | ||
| verse_lines = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।¦अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | | verse_lines = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।¦अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः | | verse_text = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।¦तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | ||
| verse_lines = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।¦तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | | verse_lines = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।¦तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः | | verse_text = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।¦समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी | | verse_text = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।¦विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | ||
| verse_lines = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।¦विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | | verse_lines = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।¦विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | ||
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| verse_text = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि | | verse_text = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।¦कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | ||
| verse_lines = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।¦कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | | verse_lines = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।¦कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।¦विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥ | | verse_lines = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।¦विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् | | verse_text = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् ।¦सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।¦नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥ | | verse_lines = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।¦नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् | | verse_text = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।¦निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।¦योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥ | | verse_lines = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।¦योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।¦यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥ | | verse_lines = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।¦यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा | | verse_text = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।¦तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | ||
| verse_lines = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।¦तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | | verse_lines = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।¦तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते | | verse_text = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।¦तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | ||
| verse_lines = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।¦तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | | verse_lines = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।¦तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः | | verse_text = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।¦तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | ||
| verse_lines = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।¦तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | | verse_lines = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।¦तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा | | verse_text = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।¦तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् | | verse_text = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।¦तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् | | verse_text = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।¦तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | ||
| verse_lines = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।¦तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | | verse_lines = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।¦तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् | | verse_text = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् ।¦तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा | | verse_text = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा ।¦तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये | | verse_text = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | ||
| verse_lines = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | | verse_lines = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति | | verse_text = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।¦सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।¦विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥ | | verse_lines = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।¦विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।¦तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥ | | verse_lines = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।¦तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।¦सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | | verse_lines = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।¦सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।¦सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥ | | verse_lines = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।¦सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा | | verse_text = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | ||
| verse_lines = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | | verse_lines = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।¦उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च | | verse_text = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।¦अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | ||
| verse_lines = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।¦अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | | verse_lines = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।¦अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | ||
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| verse_text = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि | | verse_text = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।¦विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।¦विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥ | ||
| verse_lines = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।¦विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।¦विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥ | | verse_lines = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।¦विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।¦विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥ | ||
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| verse_text = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् | | verse_text = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।¦यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | ||
| verse_lines = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।¦यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | | verse_lines = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।¦यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | ||
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| verse_text = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च | | verse_text = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।¦धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | ||
| verse_lines = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।¦धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | | verse_lines = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।¦धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः | | verse_text = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।¦अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥ | ||
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| verse_text = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च | | verse_text = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।¦असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।¦आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥ | ||
| verse_lines = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।¦असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।¦आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥ | | verse_lines = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।¦असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।¦आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥ | ||
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| verse_text = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् | | verse_text = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।¦कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥ | ||
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| verse_text = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः | | verse_text = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः ।¦यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥ | ||
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| verse_text = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् | | verse_text = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।¦न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | ||
| verse_lines = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।¦न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | | verse_lines = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।¦न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥ | ||
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| verse_text = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् | | verse_text = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् ।¦पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा | | verse_text = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।¦ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥ | ||
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| verse_text = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः | | verse_text = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।¦एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।¦शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥ | | verse_lines = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।¦शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।¦एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥ | | verse_lines = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।¦एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥ | ||
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| verse_text = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः | | verse_text = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।¦अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | ||
| verse_lines = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।¦अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | | verse_lines = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।¦अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् | | verse_text = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।¦न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | ||
| verse_lines = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।¦न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | | verse_lines = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।¦न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च | | verse_text = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।¦एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | ||
| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।¦एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | | verse_lines = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।¦एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् | | verse_text = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।¦भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | ||
| verse_lines = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।¦भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | | verse_lines = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।¦भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | ||
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| verse_text = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते | | verse_text = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।¦यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | ||
| verse_lines = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।¦यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | | verse_lines = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।¦यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | ||
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| verse_text = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप | | verse_text = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।¦यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | ||
| verse_lines = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।¦यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | | verse_lines = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।¦यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो | | verse_text = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।¦एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | ||
| verse_lines = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।¦एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | | verse_lines = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।¦एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते | | verse_text = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।¦व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | ||
| verse_lines = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।¦व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | | verse_lines = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।¦व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | ||
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| verse_text = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे | | verse_text = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।¦तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥ | ||
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| verse_text = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् | | verse_text = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।¦वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥ | ||
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| verse_text = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः | | verse_text = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।¦अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | ||
| verse_lines = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।¦अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | | verse_lines = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।¦अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥ | ||
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| verse_text = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च | | verse_text = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।¦अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥ | ||
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| verse_text = | | verse_text = रुग्माङ्गदः¦अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।¦यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥ | ||
| verse_lines = रुग्माङ्गदः¦अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।¦यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥ | | verse_lines = रुग्माङ्गदः¦अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।¦यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।¦अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥ | | verse_lines = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।¦अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥ | ||
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| verse_lines = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।¦भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | | verse_lines = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।¦भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | ||
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| verse_lines = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।¦परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥ | | verse_lines = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।¦परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् | | verse_text = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।¦श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | ||
| verse_lines = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।¦श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | | verse_lines = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।¦श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि | | verse_text = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।¦कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | ||
| verse_lines = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।¦कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | | verse_lines = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।¦कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | ||
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| verse_text = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि | | verse_text = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।¦अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | ||
| verse_lines = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।¦अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | | verse_lines = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।¦अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् | | verse_text = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।¦तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | ||
| verse_lines = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।¦तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | | verse_lines = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।¦तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | ||
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| verse_text = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् | | verse_text = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।¦तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | ||
| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।¦तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | | verse_lines = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।¦तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने | | verse_text = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।¦वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥ | ||
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| verse_text = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः | | verse_text = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।¦विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥ | ||
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| verse_text = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् | | verse_text = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।¦स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | ||
| verse_lines = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।¦स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | | verse_lines = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।¦स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | ||
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| verse_text = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् | | verse_text = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।¦नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥ | ||
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| verse_text = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते | | verse_text = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।¦वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः | | verse_text = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।¦कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।¦स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | | verse_lines = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।¦स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | ||
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| verse_text = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः | | verse_text = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।¦अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।¦दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।¦अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥ | | verse_lines = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।¦दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।¦अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥ | ||
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| verse_text = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा | | verse_text = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।¦क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥ | ||
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| verse_text = (इति पाद्मे) | | verse_text = (इति पाद्मे)¦वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।¦एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरोत्तरम्॥ २२१॥ | ||
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| verse_text = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः | | verse_text = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।¦सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥ | ||
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| verse_text = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः | | verse_text = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।¦वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | ||
| verse_lines = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।¦वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | | verse_lines = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।¦वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि | | verse_text = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।¦न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | ||
| verse_lines = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।¦न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | | verse_lines = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।¦न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥ | ||
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| verse_text = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा | | verse_text = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।¦यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | ||
| verse_lines = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।¦यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | | verse_lines = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।¦यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | ||
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| verse_text = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् | | verse_text = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।¦अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | ||
| verse_lines = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।¦अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | | verse_lines = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।¦अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | ||
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| verse_text = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः | | verse_text = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।¦एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | ||
| verse_lines = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।¦एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | | verse_lines = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।¦एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | ||
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| verse_text = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः | | verse_text = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।¦एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥ | ||
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| verse_text = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च | | verse_text = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।¦वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | ||
| verse_lines = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।¦वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | | verse_lines = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।¦वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | ||
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| verse_text = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते | | verse_text = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।¦निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥ | ||
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| verse_text = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता | | verse_text = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।¦गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥ | ||
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| verse_text = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि | | verse_text = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-¦र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥ | ||
| verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-¦र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥ | | verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-¦र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥ | ||
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| verse_text = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः | | verse_text = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।¦प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | ||
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