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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S01_V02_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पतन्ति नियतं हन्तुं देवाश्वाः शत्रुमूर्धसु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेगाधिका आसुराश्वा वेगमात्रं नृवाहनः ॥ इति स्कान्दे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S01_V02_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "गन्धर्वास्तु सदा युद्धरता देवानुगा यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदशक्तौ तु देवानां युध्यन्ते स्वामिनो यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केचिद् गानरता नित्यं गन्धर्वा नर्तकाः परे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केचिद् वाद्यरता नित्यं चारणा देवचारकाः ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02",
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| "type": "brahmanam",
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| "text": "\n \n ",
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| "text": "अश्वमेधब्राह्मणम्",
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| "text": "नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् मृत्युनैवेदमावृतमासीद् अशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चतो ह वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कंह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सर्वसंहारकं विष्णुं देवीं जीवांस्तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कालं त्रिगुणसाम्यं च कर्माणि प्राणमिन्द्रियम् ॥ संस्कारं चैव वेदांश्च नर्ते किञ्चिल्लये त्वभूत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "लयकाले परमात्मनैवावृतमासीत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "अशनं जगदेतद्यन्नयत्यात्मेच्छया हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अशनाया ततः प्रोक्त उदन्या कर्मनामकः ॥ इति ब्राह्मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "अन्यत्र नेतृत्वप्रतीतावपि श्रुतिप्रसिद्धेः स एव नेतेत्याह अशनाया हि मृत्युरिति ॥ तत्तत एव मनोऽकुरुत यतः स्वयमेवासीन्नान्यत् । आत्मवान् स्यामित्यैच्छत् । शरीरवान् त्स्यामिति । अप्सृष्ट्यर्थं मनोऽकुरुत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ऐच्छद्विष्णुरदेहः सन् देहवान्त्स्यामिति प्रभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतो देह इदं सर्वं तस्य विष्णोरदेहिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वशत्वात् स्वयं देवश्चिदानन्दशरीरकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽत्मानमर्चन्नचरदप्सृष्ट्यर्थं जनार्दनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्कुर्वन् यत्सृजेदीशस्तद्भवेद्धि तदात्मकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽर्चतो यतो जाता आपोऽतोऽर्चनसाधनाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यथा कर्तुमीशोऽपि क्रीडया तत्तदात्मकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्तुं तत्तत्प्रवृत्तिः संस्तत्करोति स्वयं प्रभुः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
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| "text": " मे सर्वाहेयस्य विष्णोः ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अस्मच्छब्दगतैर्विष्णुर्वाच्यः सप्तविभक्तिभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाहेयत्वतस्त्वेकः सर्वस्य प्रतियोगितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युष्मच्छब्दाभिधेयश्च तच्छब्दैश्च परोक्षतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव बहुरूपत्वाद् बहुशब्दाभिधानवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवेस्थितेन रूपेण हृद्गतेन द्विधोच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नोऽपि सर्वजीवेभ्यः सर्ववस्तुभ्य एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णानन्दादिरूपस्य कुतोऽल्पसुखिनैकता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदकं सुखहेतुत्वात् कमित्येवाभिधीयते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेव ह्यर्चतो जातमतोऽर्क इति कीर्त्यते ॥ इति व्यासनिरुक्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": " अर्चतो जातं सुखसाधनं चेत्यर्क इत्यर्थः । कं सुखमस्मै भवति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपां हि सुखहेतूनां वेद विष्णोर्जनिं हि सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स मुक्तः सुखभागेव स्याद्विष्णोस्तु प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ॥ १",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S02_V02",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आपो वा अर्कस्तद्यदपांशर आसीत् तत्समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S02_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": " अर्कशब्दस्यादित्ये प्रसिद्धत्वादप्शब्दोऽपि तत्रेत्याशङ्कां निवर्तयितुमापो वा अर्क इति पुनर्वचनम् । नादित्येऽर्कशब्दः किन्त्वप्स्वेवार्कशब्द इत्यर्थः । शरो मण्डः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "फेनरूपस्तु यो मण्डो जलस्यासौ सुसंहतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पृथिवीत्वं समापन्नस्तस्यां शिश्ये जनार्दनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततः स चिन्तयामास स्यादग्निरिति देवराट् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तच्चिन्तनात् समुत्पन्नो वायुरग्न्यभिधानवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्रजत्वादग्रणीत्वाद्वायोरग्नित्वमिष्यते ॥ इति प्रवृत्ते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्तिविस्रंसने चापि शयने चापि कीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रमशब्दो हरेर्नैव शक्तिविस्रंसनं क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो हरेः श्रमो नाम शयनं सम्प्रकीर्तितम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": " तस्यामश्राम्यदिति साधिकरणत्वाच्च शयनं युक्तम् । न हि पृथिव्यां श्रमो नामान्तःकरणधर्मो युज्यते । अधिकरणपरम्पराकल्पनं च क्लिष्टकल्पनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सृष्ट्वा स पृथिवीं विष्णुः शेतेऽनन्तेऽब्धिमध्यगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्यां पृथिव्यां श्वेताख्ये द्वीपे मुक्तैरुपासिते ॥ इति मुक्तिसंहितायाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तप्त आलोचनायुक्तस्तस्मात् कार्र्यार्थकामना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तप्तता तु हरेरुक्ता कुतो दुःखं हरेः प्रभोः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": " तेजोरसः जगतः सामर्थ्यसारभूतः ॥ २ ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V03",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं अग्निं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मावथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे, द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरस्स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S02_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V03_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वायुरग्निरिति प्रोक्तो ह्यग्रणीत्वादथाङ्गिनाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नेतृत्वाददनाच्चापि तस्य स्रष्टा जनार्दनः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स वायुर्वायुरूपेण जगत्पाति शरीरगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आदित्यस्थेन रूपेण जगद्याति प्रकाशयन् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अग्निस्थेन तु रूपेण हूयते सर्वयष्टृभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आदाय यात्यायुरिति स एवादित्य उच्यते ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तत्सम्बन्धात्तु तन्नाम सूर्यस्याग्नेस्तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एष कूर्मरूपेण वायुरण्डोदके स्थितः ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुना कूर्मरूपेण धारितोऽनन्तधारकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य पादा हि चत्वारो ह्यण्डोदे कोणसंस्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उरस्तु भूमिसंश्लिष्टमतिरिच्य भुवं पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव शिरश्चोदकसंस्थितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "आकाशमुदरे तस्य द्यौः पृष्ठे संस्थिता विभोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवंविद्वांस्तु यत्रैति तत्रैव प्रतितिष्ठति ॥ इति प्रभञ्जने ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "स्थानेच्छा चेत् तत्रैव प्रतितिष्ठति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उपास्ते कूर्मरूपं यो वायुं संस्थितिमाप्नुयात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इच्छया विनिवृत्तिं वा लोकं चावृत्तिवर्जितम् ॥ इत्यध्यात्मे ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "स एष प्राणस्त्रेधा विहित इति वचनाच्च वायुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बिभर्त्यण्डं हरिः कूर्मस्त्वण्डे चाप्युदकं महत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदके कूर्मरूपस्य वायुः पुच्छं समाश्रितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वायोः पुच्छं समाश्रित्य शेषस्तु पृथिवीमिमाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बिभर्ति तस्यां च जगदिदं सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ इति वैभवे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "वायोस्तु कूर्मरूपस्य पूर्वतश्चोदके मुखम् ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "आग्नेयेशानगौ बाहू पादौ निर्ऋतिवायुगौ ॥ इति प्रकृष्टे ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनायां मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवन्न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान् संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात् स भाणमकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "text": " आत्मा, ब्रह्मा मे द्वितीयो जायेतेत्यकामयत । वायुरेव ब्रह्मा भवतीति दर्शयितुं वायोः सृष्टिः प्रथममुक्ता ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "वायुरेव यतो ब्रह्मपदं नियमतो व्रजेत् ।",
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| "text": "सहैव जननेऽप्यस्मात्पूर्वं वायोर्जनिं वदेत् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्वचित्तु ब्रह्मणः पूर्वं प्राधान्यात् तत्पदस्य च ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "आत्मा विरिञ्चः सुमनाः सुधौतश्चेति कथ्यते ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मा चतुर्मुखश्चेति पूर्वजो यः प्रजापतिः ॥ इति शब्दनिर्णये ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "स मनसा स्वेच्छया वाचं श्रियं देवीं मिथुनं समभवत् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मम द्वितीयो जायेत ब्रह्मेति भगवान् परः ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदाभिमानिनीं देवीं श्रियं समभवत् प्रभुः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वेच्छयैव यतः शक्तिस्तां विनाऽपि हरेः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततः संवत्सरो नाम ब्रह्मा समभवत् प्रभोः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तं गर्भमुदरे बिभ्रद्यावत्संवत्सरं रमा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तं जातमत्तुं स्वमुखं विदार्य पुरुषोत्तमः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रुत्वा रावं पुनस्तस्य व्यदधात् सृष्टये प्रभुः ॥ इति कारणविवेके ।",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BR_C01_S02_V04_B01"
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| |
| "text": " बिन्दुलोपेनाशनाया मृत्युरित्यर्थः । अशनाया हि मृत्युः इत्युक्तम् । सर्वाशननेतेत्यर्थे बिन्दुः । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । सम्यगात्मनो वत्सभूतान् देवादीन् रमयतीति संवत्सरः ।",
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मणो भाणिति वचो निःसृतं भयतो मुखात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याभिमानिनी देवी तदैवोत्था चतुर्मुखात् ॥",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वागीश्वरीति तामाहुर्वाचं चापि सरस्वतीम् ॥ इति भावतत्त्वे ।",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S02_V04_B01"
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| |
| "text": " तदभिमानित्वात् सैव वागित्युच्यते । भारूपो णरूपश्चेति भगवान् भाण् । तद्व्यञ्चकत्वाद् भणनं वाक् ॥ ४ ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "स ऐक्षत यदि ह वा इमभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तथा वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्चर्चो यजूंषि सामानि च्छन्दां सि यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वं सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "मानं ज्ञानं लयश्चैव मर्यादा चैव कथ्यते ।",
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| "text": "उत्पादनं च सङ्ख्यानं बलं च क्वचिदुच्यते ॥ इति शब्दनिर्णये ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "वेदाभिमानिनः सर्वास्तथा यज्ञाभिमानिनः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "गायत्र्यामसृजद् ब्रह्मा स्वभार्यायां प्रजास्तथा ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V05_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यद्यद्ब्रह्माऽसृजत् पूर्वं तत्तदत्ति जनार्दनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अदितिर्नाम तेनासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "उपास्ते यः परं देवमेवमत्तीति सर्वदा ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "स्वयोग्यतानुसारेण सर्वात्ताऽसौ भवत्युत ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "ब्रह्मरुद्रसुपर्णानां सर्वात्तृत्वं विशेषतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "प्रायेणात्तृत्वमिन्द्रादेरन्येषां दर्शनादिकम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "बहुलस्येति योग्यत्वभेदादत्तृत्वमिष्यते ॥ इति मान्यसंहितायाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "आत्मनो यादृशा भोगा भोक्तुं योग्या हि तादृशान् ।",
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| "text": "भोक्ता विष्णुरिति ध्यायेत् सर्वात्तृत्वं हरेः स्मरेत् ॥",
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| "text": "देवतानां च सर्वेषां सर्वात्तिध्यानमिष्यते ॥ इति प्रवृत्ते ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूमो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥",
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| "text": "इच्छतो विष्णुयजनं ब्रह्मणः साधनास्मृतेः ।",
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| |
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| "text": "प्रवेष्टुं तच्छरीरं च कामयामास स प्रभुः ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S02_V07",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मान्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ॥ ७ ॥",
| |
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| "text": "ऐच्छत् तेनैव देही स्यामिति तस्मिन् विवेश च ॥",
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| "text": "तस्मिन् प्रविश्य स ब्रह्मा द्वितीयं वपुरग्रहीत् ।",
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| "text": "दृष्ट्वोपायं महायज्ञेऽथाश्वाकारं पितामहः ॥",
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| "text": "श्वैतीभावात् परं यस्मात् तज्जज्ञेऽतोऽश्वनामकम् ।",
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| "text": "यदर्थं श्वेततामाप तद्देहो मेध्यतामपि ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "अश्वमेधः स यज्ञोऽभून्नाम्ना तेन तदा कृतः ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "श्वैतीभावं गते देहे पुनर्मेध्ये यतः स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "अतोऽश्वमेधनामाऽसौ ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "अश्वो भूत्वा यतो मेध्यः सोऽभवत् तेन वा स्मृतः ॥",
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| {
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| "text": "मेधो यज्ञः समुद्दिष्टो याज्ञीयं मेध्यमुच्यते ।",
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| "text": "शुद्धं मेध्यमथापि स्यादेवंविद्योऽश्वमेधवित् ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "text": "तमनवरुध्यैवामन्यत । तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदैवत्यं प्रोक्षितं प्राजात्पत्यमालभन्त । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव अप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ८ ॥",
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| "text": "॥ इति अश्वमेधब्राह्मणम् ॥ २ ॥",
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| "text": "सर्वस्मिन् भुवने चाब्दं तदन्ते परमात्मने ।",
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| "text": "स्वस्मिन् स्थिताय सङ्कल्प्य यज्ञ आलभतात्मवान् ॥",
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| "text": "अजादिकान् पशूनन्यदेवस्थपरमात्मने ।",
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| "text": "कर्तृत्वेन पशुत्वेन यत्फलं तदशेषतः ॥",
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| "text": "मम स्यादिति मन्वानः सोऽश्वरूपमधारयत् ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अबुद्धिपूर्वमरणात् स्वर्गश्चापि पशोर्भवेत् ॥",
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| |
| },
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| {
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| "text": "ज्ञानपूर्वमृतेः पुंसः किमु वक्तव्यमित्यजः ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं सूर्योऽप्यश्वमेधनामा संवत्सराभिधः ॥",
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| |
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| "text": "सूर्ये स्थितो यतो ब्रह्मा ह्यश्वमेधाभिधः स्वयम् ।",
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| "text": "सूर्ये ततत्वात् सूर्यात्मा ब्रह्मासौ परिकीर्तितः ॥",
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| {
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| "text": "अग्नौ स्थितो यतः सोऽर्कस्तस्मादग्निरितीर्यते ।",
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| "text": "ब्रह्मातता यतो लोकास्तदात्मानस्ततो मताः ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मसूर्याग्निलोकेषु व्याप्तैका देवता हरिः ।",
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| |
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| {
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| "text": "तादृशं नृहरिं ज्ञात्वा पुनर्मृत्युं जयन्नसौ ॥",
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| {
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| "text": "सदैव वर्तते ब्रह्मा पुनर्मृत्युर्मृतिः स्मृता ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नैनं मृत्व्यात्मको मृत्युः प्राप्नोति हरिसेवनात् ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यस्मान्नृसिंहो मृत्योश्च मृत्युरात्माऽस्य वै भवेत् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आततत्वात् तथात्तृत्वादात्मासौ ब्रह्मणः स्मृतः ॥",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आदानादात्तनिर्माणादात्तज्ञानात् तथैव च ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतासां देवतानां च ब्रह्मेशत्वेन वर्तते ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नृसिंहस्य सदा ज्ञानाद्ध्यानाच्च तदनुग्रहात् ॥ इति महासंहितायाम् ।",
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| "text": "भूयःशब्दः पूर्णत्ववाची । परमेश्वरं परिपूर्णं यजेयेति । अश्वदित्यश्वोऽभवत् तदेव रूपं मेध्यं यज्ञ आलभनीयं चाभवदित्यश्वमेधः । तमनवरुध्येवामन्यतेत्यादिवाक्यशेषादश्वभावः प्रतीयते । अश्वद् बृंहितं पश्चान्मेध्यं चाभूद्यस्य शरीरं सोऽश्वमेध इति च । निरोधमकृत्वा चारयिष्यामीत्यमन्यत । स्वेच्छयैव स्वरूपान्तरत्वादश्वरूपस्य ॥ ",
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| "text": "द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥",
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| "text": "द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।",
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| "text": "बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।",
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| "text": "जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् ।",
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| "text": "ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥",
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| }
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| "text": "अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥",
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| "text": "अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥",
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| "attrs": {
| |
| "id": "R_C03_S03_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S03_V08",
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| "type": "mantra",
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| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S03_V09",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V10",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "id": "BR_C01_S03_V11",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S03_V12",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V14",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V17",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V18",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V19",
| |
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V20",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S03_V20"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V20_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V21",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V22",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V23",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S03_V23"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V23_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V24",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S03_V24"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V24_B01"
| |
| },
| |
| "text": "अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V25",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S03_V26",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V26_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| "text": "गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C01_S03_V27",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C01_S03_V27"
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V27_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V28",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V29",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S03_V29"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V29_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V29_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आस्यादयत इत्ययास्यः । प्रसिद्धमृत्व्यमृतत्वान्नात्र तिरोहितमिवास्ति । एष उद्गातेति वायुत्वयोग्यः । तद्धैतल्लोकजिदेवेति तस्माद्वराभियाचनम् ॥",
| |
| "tail": "\t\t\t\t\t\t\t॥ इति उद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S04",
| |
| "type": "brahmanam",
| |
| "name": "प्रजापतिब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "प्रजापतिब्राह्मणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ततोऽहं नामाऽभवत् तस्मादप्येतर्ह्यामंत्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात् पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C01_S04_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S04_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": " इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवासीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S04_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतस्य जगतो ह्यग्र आसीन्नारायणः परः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक एव श्रिया सार्धं तमात्मा पुरुषेत्यपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आहुस्तस्मात् पुरुषविधो ब्रह्मा समभवद्विभोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मादेश्च श्रियश्चैव नित्यं विष्णुर्गुणाधिकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा तथैव रुद्रादेर्ब्रह्मा यस्माद् गुणाधिकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतस्मात् पुरुषविधता ब्रह्मणः सम्प्रकीर्तिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स तु सर्वा दिशो दृष्ट्वा नान्यद् दृष्ट्वा पितामहः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अब्रवीदहमस्मीति स्वाहेयत्वमनुस्मरन् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हातुं शक्यमिदं सर्वमासीदेकोऽभवं यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओयत्वं स्वरूपस्य स एवं समचिन्तयत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततोऽभवदहंनामा स चाभूत् पुरुषाभिधः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओषणात् सर्वपापानां पूर्वं पुरुष उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणप्रसादेन य एवं पुरुषाभिधम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेद स्वाभिमतं यस्तु पूर्वं प्राप्तुमभीप्सति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओषेत् स्वयमनुष्टः सन् ब्रह्मविष्णुप्रसादतः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S04_V02",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| |
| "text": "सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी बिभेति सहायमीक्षाञ्चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभैष्यत् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "text": "तस्मादद्यापि चैकस्य निर्विवेकं भयं भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विममर्श ततो ब्रह्मा यस्मान्मद्बाधको न हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मया सृज्या यतः सर्वे इतः पश्चात्तनो हरः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः कस्माद्बिभेमीति तस्य भीतिरपोहिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरतिप्रियत्वात्तु तदन्येषां पितृत्वतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कस्माद्भयं भवेत् तस्य समानाद्धि भयं भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विरोधिनोऽधिकाद्वापि हीनाद्वा पारवश्यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हीनमेव यतस्तस्य सर्वमेव जगद्वशे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च जातं तदा सर्वं हरिरेव यतः परः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S04_V03",
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| "children": [
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| "text": "स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयत् ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत् ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| {
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| "children": [
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| "text": "न रेमे स ततो ब्रह्मा तस्मादेकस्य नो रतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अथापि पत्नीमैच्छच्च स स्थूलत्वमुपागतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "दम्पती सहितौ यावद्ब्रह्मा चैव सरस्वती ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तावद्देहोऽभवद्ब्रह्मा तदा देहं द्विधाऽकरोत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पातनात् पतिपत्नीत्वशब्द एनोरजायत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् तयोरेकसुखं भवत्येवार्धपात्रवत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततस्तस्यामुमेशादीन् देवान् सर्वान् मनूनपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जनयामास बोधस्य प्राधान्यं हि मनुष्यता ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S04_V04",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "सोहेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्तां समेवाभवत् । ततो गावो अजायन्त बडवेतराऽभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्तां समेवाभवत् तत एकशफमजायताऽजेतराभवद् वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्तां समेवाभवत् ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S04_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "सोऽवेदहं वाच सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "id": "bhashya-BR_C01_S04_V05"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "id": "BR_C01_S03_V05_B01"
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वज्ञाऽपि तु सा देवी विरिञ्चे भक्तिमत्यपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्भार्यतामात्मनश्च नितरां धर्ममीक्षती ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनाद्यनन्तसम्बन्धमुभयोरपि जानती ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्त्रीस्वभावं दर्शयन्ती साऽधर्ममिव चैक्षत ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानासृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं सा गोत्वादिकमाव्रजत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वृषादिरूपतां सोऽपि प्राप्य सृष्ट्वेदमञ्जसा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्जनात् सृष्टिनामाऽभूत् तद्वित्तत्पुत्रतां व्रजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पिपीलिकान्तरुद्रादौ यथायोग्यत्वमात्मनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S04_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथेत्यभ्यमन्थत् स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत । तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C01_S04_V06"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S03_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अथान्नादमथाप्यन्नं स्रक्ष्यामीति विचिन्तयन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओष्ठद्वयं ममन्थान्तर्हस्तौ चैव परस्परम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तन्मुखाच्चैव हस्ताभ्यामन्तरग्निरजायत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सर्वस्य हेतुत्वात् सर्वस्यापि पतित्वतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे देवा एष एवेत्याहुर्वेदविदो जनाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वतन्त्रेषु यतः शब्दा वर्तेयुः सर्व एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स रेतसः पुनः सोममसृजद्ब्रह्मविद्धरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधिकोऽपि योग्यत्वान्मर्त्यधर्मतया पुरा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवमो योग्यताहीनानप्यायुर्मात्रतोऽधिकान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतोऽस्रागतिसृष्टिस्तं देवं यो वेद पूरुषः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः प्रसादतः सृष्टिं देवलोके स जायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मयोग्यानुसारेण सुखज्ञानादियुक्तता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05",
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| "type": "brahmanam",
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| "name": "अव्याकृतब्राह्मणम्",
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| "title": ""
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अव्याकृतब्राह्मणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामाऽयमिदं रूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामायमिदं रूप इति स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात् विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये तं न पश्यन्त्यकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणनामा भवति वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्माऽनेन ह्येतत्सर्वं वेद यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C01_S05_V01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": " विश्वम्भरो वायुः । अकृत्स्नो हि स इत्यस्याभिप्रायः स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदेत्यादि । प्राण इत्यादिनामानि परमेश्वरस्य न सर्वगुणसम्पूर्णतां वदन्ति । किन्तु प्राणनादिकर्मकर्तृत्वमेव वदन्ति । आत्मशब्द एव सर्वगुणपरिपूर्णत्वं वदति । अस्य सर्वस्य गुणजातस्यायमात्मैव पदनीय आश्रयो यस्मादतस्तं सर्वगुणवाचकेनात्मशब्देनैवोपासीत । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद यस्मात् सर्वज्ञानप्रदस्तस्मात् सर्वगुणसम्पूर्णः इत्येवोपासनं तस्य युक्तम् । तदुपासनादेव सर्वज्ञत्वादयो भवन्ति किमु तस्येति । पद्यते अनेनेति पदं साधनम् । यथा तत्तत्साधनेन तत्तत्फलं प्राप्नुयादेवं सर्वगुणयुक्तत्वेन भगवदुपासनात् कीर्तिं श्लोकं च विन्दते । शं लोकः श्लोकः परमानन्दं परमं ज्ञानं चेत्यर्थः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "लुक् प्रकाश इति धातोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V01_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आसीदेको हरिः पूर्वं देवी नारायणी तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अन्यदव्यक्ततां यातं तद्व्यक्तमकरोद्धरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सृष्ट्वा जगदिदं सर्वं सृष्ट्वा देहांश्च सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आकेशादानखाग्रेभ्यः प्रविष्टः पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा प्राणः शरीरेषु क्षुरो यद्वत् क्षुरस्तुके ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रविष्टमपि तं विष्णुं न पश्यन्ति पृथग्जनाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्रविष्ट इति जानंश्च नैनं जानाति सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यस्मात् तद्गुणभागोऽयं प्रवेशः प्राणनादि च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् प्राणादिनामानि कर्मनामानि तस्य तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् प्राणादिनाम्ना य उपास्ते हरिमव्ययम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अकृत्स्नोपासकः स स्याद्यस्मात् तद्गुणभागवित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णत्वेऽपि परेशस्य यस्तु तद्गुणभागवित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अकृत्स्नवित् स्यात् कृत्स्नस्य वेत्ताऽऽत्मेतिविदेव यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिदानन्दादयो यस्य गुणा आप्ताः सदैव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स आत्मेति प्रविज्ञेयो गुणानामाप्तितो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणनादीनि कर्माणि चात्मशब्दोदितानि तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतदात्मरूपं हि गुणानामश्रयत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पदनीयमिति प्रोक्तं यतस्तज्ज्ञोऽपि सर्ववित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सार्वज्ञ्यादिगुणास्तस्य किमुतात्मेश्वरस्य तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सर्वगुणैर्युक्तं सर्वजीवेश्वरं हरिम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो वेद तत्तत्साध्यं तु यथा तैस्तैस्तु साधनैः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्नुयादेवमेवासौ कीर्तिं च परमं सुखम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानं च परमं विन्देन्मुक्तः सन्नात्र संशयः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V02",
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| "type": "mantra",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तदेतत् प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुतं भवति ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V02_B01"
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| "children": [
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| "text": "स एष विष्णुर्भगवान् पुत्राद्वित्तात् तथाऽऽत्मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "अन्यस्मादपि सर्वस्मात् प्रेष्ठ एव स्वभावतः ॥",
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| |
| },
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| "text": "आत्मनोऽपि प्रियत्वं तु तेनैव कृतमञ्जसा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "text": "आत्मनो निरयायैव कुर्यात् कर्माणि नित्यशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यतोऽतः स्वात्मनश्चापि स्वाप्रियत्वमुदाहृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स चेदप्रियकृद्विष्णुर्नात्माऽपि प्रियतां व्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्मिन् प्रिये प्रियं सर्वं तस्मादेकः प्रियो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स चात्मशब्देनोद्दिष्टो यस्मादाप्तगुणः प्रभुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो विष्णोः प्रियं ब्रूयाद्यः स्वात्माद्यं दुरात्मवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रियरोधं करोषीति तं ब्रूयाद्वैष्णवो महान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं वदन् वैष्णवस्तु समर्थः प्रियरोधने ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य स्याच्च विशेषेण तदुक्त्यैवापि दुःखिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् सर्वप्रियो विष्णुरित्युपास्ते सदा प्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नास्य प्रियमनित्यं स्यादस्य प्रीतिः सदा भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् सर्वप्रियं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नित्यप्रियकरो विष्णुर्भवेत् तस्याप्यजः स्वयम् ॥इत्यध्यात्मे ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V03",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तदाहुर्- यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद् यस्मात् तत्सर्वमभवदिति ॥ ३ ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "\n ",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V03_B01"
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| "text": " ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्त आत्मयोग्यतापूर्तिमाप्नुवन्तो महान्तो यदाहुः ब्रह्मविद्यया स्वयोग्यं सर्वं प्राप्यत इति । नित्यनिर्दुःखानन्दानुभवरूपो हि स्वत उत्तमो जीवः । तादृशं रूपमज्ञानात् तिरोहितं ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते एव । न चान्यथाऽभिव्यज्यत इति सन्तो यदाहुः । तत्तत्र केचिन्मनुष्या इति मन्यन्ते । स्वरूपमपि ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते चेत् तद् ब्रह्मापि यस्मात् सर्वमभवत् परिपूर्णमभवत् तस्मात् स्वरूपं ज्ञात्वैवाभवत् किमिति ॥ ३ ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04",
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| "adhikarana": ""
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात् तत्सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत् पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषं समभवत्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C01_S05_V04"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " सत्यम् । तदपि स्वरूपं नित्यापरोक्षज्ञानेन सर्वदा जानात्येव । अत एव सर्वदा परिपूर्णमिति तेषां परिहारः । तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत्सर्वमभवदिति । आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यादिवत् सदातनज्ञानं पूर्णभावं चाह । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " इदमग्रे अस्याग्र इति षष्ठ्यर्थे द्वितीया । अहं अहेयं, ब्रह्म परिपूर्णम् । अस्मि सर्वदाऽस्तीति मेयमित्येतैर्विशेषणैरात्मानं स्वरूपमेवावेत् । यद्यहंशब्दोऽस्मच्छब्दार्थवाची अस्मिशब्दश्चोत्तमपुरुषे तदाऽऽत्मानमिति व्यर्थं स्यात् । अतोऽहमस्मिशब्दावुक्तार्थावेव । अग्रे अनादिकालत एव विद्यमानमात्मानं जानाति च तद्ब्रह्मेत्यर्थः । सर्वनियन्तृत्वेन सर्वगतत्वादहेयम् । तद्योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहं योऽसावसौ पुरुषः सोहमस्मि इत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽन्तर्यामित्वेनाहेयत्ववाची । तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसीति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " तद्योऽहं सोऽसौ अहं ब्रह्मास्मि इत्यादिवाक्यानां सम्यगर्थापरिज्ञानात् भ्रान्तिप्राप्तोऽभेदोऽतत्त्वमसीति नवकृत्वो निराक्रियते । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यात् कथमसतः सज्जायेत इत्यादिना असद्वा इदमग्र आसीदसतः सदजायत इत्यादिश्रुत्यर्थापरिज्ञानोत्थभ्रमो यथा निवार्यते । एवमतत्त्वमसीतिवाक्येनापि । स आत्मेतिशब्दाच्च । आत्मशब्दस्य परमात्मनि मुख्यत्वेऽपि जीवे भ्रान्तिरुपपद्यते । तन्निवृत्यर्थं चातत्त्वमसीत्याह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यादिना आप्त्यादिकमैतदात्म्यमिदं सर्वमित्यनेनोच्यते । पूर्णत्ववाच्यात्मशब्द आत्मा पूर्णत्वतो हरिः इत्यादिना स आत्मेति पूर्णत्वमभिधीयते । यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन इति सदृशविज्ञानेन सदृशान्तरं विज्ञातं भवतीत्युक्तम् । लोहमणिनेति मणिशब्दात् प्रधानविज्ञानेनाप्रधानं सर्वं विज्ञातं भवतीति । मणिर्मुखं प्रधानञ्चेत्युत्तमस्य वचो भवेत् इति वचनात् । यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात् इति पुनरपि सदृशेन विज्ञातेन सदृशान्तरं विज्ञातं भवतीत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपादानविवक्षायामेकत्वविवक्षायां चैकेनेति विशेषणं, पिण्डेनेति एकेन मणिनेति पुनरेकेनेति च विशेषणानि व्यर्थानि भवेयुः । तस्मिन् पक्षे मृदा विज्ञातया लोहेन विज्ञातेन कार्ष्णायसेन च विज्ञातेन सर्वं विज्ञातं भवतीति वक्तव्यम् । न ह्येकमृत्पिण्डविकारभूतं सर्वं मृण्मयम् । न च तेनैक्यं सर्वस्य विद्यते । न चैकलोहमणिकार्यं सर्वलोहमयम् । न च तेनैकीभूतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चैकनखनिकृन्तनकार्यं सर्वं कार्ष्णायसम् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्यादि प्रधानपरिज्ञाने गुणभूतं परिज्ञातमिव भवतीत्यत्र दृष्टान्तान्तरम् । वाचा नाम्ना आरम्भणं विकारः विविधत्वेन कर्तुं योग्यमिति विकारः । सत्यं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्येव । सङ्केतरूपेण नानाविधानि नामानि कर्तुं शक्यते । तथापि शास्त्रप्रयोगसिद्धमृत्तिकादिनामपरिज्ञानात् तत्तन्नामविद् भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं नित्यासाम्यातिशयसर्वगुणपरिपूर्णपरमेश्वरपरिज्ञानात् सर्वविद्भवतीति । यथैकस्मिन् जनपदे प्रधानपुरुषेषु परिज्ञातेष्वाहूतेष्वागतेषु विनाशितेषु रक्षितेषु वा सर्वो जनपदः परिज्ञात आहूत आगतो विनाशितो रक्षित इत्युच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "यथा वा राजसु नाशितेषु ।\t नाशिता पृथिवी सर्वा धार्तराष्ट्रेण दुर्नयैः इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " यथा च केषाञ्चित् पुरुषाणां रक्षणेन । शशास पृथिवीं सर्वां सशैलवनकाननाम् इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " एवं सर्वोत्तमस्य परमेश्वरस्य विज्ञानात् सर्वं विज्ञातमिव भवति । न च मृन्मात्रविज्ञानाद् घटशरावादिसंस्था विज्ञाता भवन्ति मुख्यतः । तथा सति दृष्टमृदः पुरुषस्य घटशरावादिजिज्ञासा न स्यात् ।सृष्टिकथनं च प्राधान्यार्थम् । त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यमित्यपि प्राधान्यार्थमेवाभिमानिदेवतापेक्षया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजोऽभिमानवान् ब्रह्मा वायुश्चाबभिमानवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रः क्षित्यभिमानी चाप्येतन्मयमिदं जगत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिमन्यमानसहितास्त्रय एतेऽभिमानिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्जाताः क्रमेणैव पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजोऽबन्नाभिधा तस्मादेषामेव प्रकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एते च त्रीणि रूपाणीत्यभिधागोचराः सुराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मवायुगिरीशेभ्यस्तेभ्यो जातमिदं जगत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽग्निसूर्यसोमानामपि रूपं तदुद्भवम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽग्निसूर्यसोमानां नामाप्येषां प्रकीर्तितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सादनाद्यमनाच्चैव सत्यमेषां त्रयः सुराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां सत्यं हरिः साक्षाद्यतस्तेषां नियामकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रधाने सत्यशब्दोऽयं श्रुतिभिः समुदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथैव सर्वलोहानां प्रधानं काञ्चनं स्मृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा मृत्पिण्डसदृशा मृण्मयाः सर्व एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा कार्ष्णायसं सर्वं समं कार्ष्णायसान्तरे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सर्वस्य जगतः सदृशः श्रेष्ठ एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हरिस्तेन तु तज्ज्ञानाज्जगज्ज्ञातमिवाखिलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स स्रष्टा चैव संहर्ता नियन्ता रक्षिता हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेन व्याप्तमिदं सर्वमैतदात्म्यमतो विदुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स आत्मा पूर्णगुणतः स सूक्ष्मः सर्वगः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वोत्तमत्वात् सत्यं तज्जीवाभिन्नं तदासुराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विदुर्न त्वं तथा विद्धि श्वेतकेतो कदाचन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किन्तु विष्णुः पृथक् सर्वदेवदेवेश्वरः प्रभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथगेवाहमत्यल्पशक्तिज्ञानसुखादिकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्येव विद्धि सततमतो मोक्षमवाप्स्यसि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सवोत्तम इति ज्ञातो विष्णुर्मोक्षमिमं नयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवरूपतया ज्ञातस्तमोऽन्धं प्रापयेत् प्रभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्दासतया विष्णोः सामीप्यं मोक्ष उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न विष्णुत्वं तु मोक्षः स्यादेषोऽहमिति वा स्मृतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संसारसागरात् तीर्णो मुक्तोऽहमिति वा स्मृतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा तदा विमोक्षेण किं फलं ज्ञानिनो भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा मधुकरैर्नानाविधपुष्परसैः सह ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मधुत्वं प्रापितः संविदभावान्न सुखी भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा नद्यो न मुक्ता हि समुद्रं प्रापिता अपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इयमस्मीति चाज्ञानाद्यथा सुप्तो न मुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रलयेऽपि हरिं प्राप्तः पृथक्त्वज्ञानवर्जनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं जीवोशयोर्भेदज्ञानाद् विष्णोः सदोच्चताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञात्वैव मुच्यते तस्मादेवं जानीहि पुत्रक ॥ इति ब्रह्माण्डे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् इति च मोक्षधर्मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तस्मै स्वलोकं भगवान् सभाजितः सन्दर्शयामास इत्युक्त्वा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ इति च भागवते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
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| "text": "अदर्शयत् स्वकं लोकं ब्रह्मणे विष्णुरव्ययः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मात् पदात् परं नास्ति यत्र मुक्ता उपासते ॥ इति हरिवंशेषु ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "text": " अतः परं न यत्पदमित्यत्रापि यच्छब्दस्य यस्मादित्यर्थः । यत्तदित्यादयः शब्दाः पञ्चम्यर्थाश्च कीर्तिताः इति च । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " विद्यात्मनि भिदाबोधः",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्ष्माम्भोनलानिलवियन्मन इन्द्रियार्थं भूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टा ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः ॥",
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": " भेददृष्ट्याभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा इत्यादि च । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| |
| "text": "आधिपत्यमृते चैव आनन्देनापि कर्मणा ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या भोगेन विषयेण च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानात्वेनापि सम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतौ कारणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रदर्शयित्वा ह्यात्मानं प्रकृतिस्तेषु सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संयोगः प्रकृतेर्नैव मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समा दुःखनिवृत्तिस्तु मुक्तानामपि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मानुषादिविरिञ्चान्तं सुखं मुक्तौ शतोत्तरम् ॥ इत्यादि वायुप्रोक्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मस्तेना निरानन्दाः अपक्वमनसोऽशिवाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्य ईशस्तथाऽन्योऽहमिति ज्ञानं विपश्चिताम् ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आधिक्यज्ञानमीशस्य यतोऽन्यत्वेन युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतः स्वरूपश्चान्यो जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः स्यादसंहितः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| {
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| "text": "बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैशम्पायन उवाच–॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ इति च मोक्षधर्मे ।",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
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| "text": "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥",
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| |
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| "text": "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।",
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| |
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| "text": "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥",
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| "text": "यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।",
| |
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| |
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| {
| |
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| "text": "अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥ इति च ॥",
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| |
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| {
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| "text": "ईषद्भेदप्रदर्शी च तम एवोत्तरं व्रजे ।",
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| |
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| "text": "गुणानां च विशेषोऽस्ति न विभेदः कथञ्चन ।",
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| |
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| "text": "ते च सर्वे गुणाः पूर्णास्तच्छरीरः परः स्मृतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "आनन्दज्ञानशक्त्यादिदेहं विष्णुं तु ये जनाः ।",
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| |
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| "text": "ओहं भूतदेहं वा विदुस्ते चाधरं तमः ॥",
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| |
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| "text": "तथा प्रकृतिदेहज्ञाः कर्मदेहविदोऽपि वा ।",
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| |
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| |
| {
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| "text": "तस्मादानन्दचिद्देहं चिदानन्दशिरोमुखम् ॥",
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| |
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| "text": "प्रत्येकं तु गुणांस्तांस्तु सदा सर्वगुणात्मकम् ।",
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| "text": "ज्ञात्वा विमुच्यते विष्णोः प्रसादान्मानुषोऽपि सन् ॥",
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| "text": "जीवाभेदं तथाऽभेदं जगता ये विदुः प्रभोः ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेऽपि यान्ति तमो घोरमधरं ब्रह्मतस्कराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदं विदुर्ये च जीवैस्तु जगताऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परस्य ब्रह्मणो यान्ति तमस्तेऽप्युत्तरं सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभेदज्ञाः प्रकृत्याऽपि भेदाभेदविदस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेऽपि यान्ति तमो घोरमधरं चोत्तरं क्रमात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सर्वोत्तमं विष्णुं पूर्णसर्वगुणोच्छ्रितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विजानीयाद्विमुक्त्यर्थं सर्वतश्च विलक्षणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये देहं परमात्मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नं विजानते विष्णोर्भिन्नाभिन्नविदोऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्धन्तमः प्रविशन्ति प्रादुर्भावांस्तु येऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वभूतस्थितान् वाऽपि भिन्नान् जानन्ति येऽखिलान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नाभिन्नविदो वापि शिरःपाण्यादिकं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नं मिथो विजानीयुर्भिन्नाभिन्नविदोऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेऽपि यान्ति तमो घोरं यतो नैवोत्थितिः क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रादुर्भावतया ये च तदन्यान् जानते विभोः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेऽपि यान्ति तमो घोरं तस्मान्नैवंविदो विदुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कृष्णबुद्धौ कल्किदत्तहयशीर्षैतरेयकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पाराशर्यश्च कपिलो वैकुण्ठो वृषभस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञो धन्वन्तरिश्चैव स्त्रीरूपस्तापसो मनुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणो हरिः कृष्णः उपेन्द्रः सर्व एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमाद्याः हरेः साक्षात्प्रादुर्भावाः प्रकीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीर्भूर्दुर्गाऽम्भृणी ह्रीश्च महालक्ष्मीश्च दक्षिणा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सीता जयन्ती सत्या च रुक्मिणीत्यादिभेदिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतिस्तेन चाविष्टा तद्वशा न हरिः स्वयम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततोऽनन्तांशहीना च बलज्ञप्तिसुखादिभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणैः सर्वैस्तथाऽप्यस्य प्रसादाद् दोषवर्जिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदा सुखरूपा च सर्वदा ज्ञानरूपिणी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणः सूत्रं महान् ब्रह्मा चित्तं वायुर्बलं धृतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थितिर्योगश्च वैराग्यं ज्ञानं प्रज्ञा स्मृतिः सुखम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मेधा मुक्तिर्विष्णुभक्तिरादिगोपो महाप्रभुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋजुः समानो विज्ञाता महाध्याता महागुरुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हनूमान् भीम आनन्द इत्यादिबहुरूपिणः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हिरण्यगर्भा येऽतीताः ये भाव्या यश्च वर्तते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे विष्णुवशा नित्यं विमुक्तेरप्यनन्तरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एभ्यः श्रीस्तु विमुक्तेभ्यो गुणैः कोटिगुणोत्तरा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानानन्दबलादिभ्यः सर्वेभ्यः सर्वदैव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नाभिन्नाश्च ते सर्वे ब्रह्माणस्तु परस्परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिमानः पृथक्तेषामानन्दः सह भुज्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते तु भिन्ना हरेर्नित्यं श्रियोऽन्येभ्यस्तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आविष्टो विष्णुरेतेषु न विष्णुस्तत्स्वरूपकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरतिप्रियत्वात् ते ह्यध्यर्धा इति चोदिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः केवलभेदेऽपि शेषादिभ्यः प्रिया यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः प्रियत्वे तद्भक्तौ तज्ज्ञाने च श्रियस्तु ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्ता अप्यवरा नित्यं सर्वे कोटिगुणेन च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सरस्वती च गायत्री श्रद्धाऽऽद्या प्रीतिरेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्ववेदात्मिका बुद्धिरनुभूतिः सुखात्मिका ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुरुभक्तिर्हरौ प्रीतिः सर्वमन्त्रात्मिका भुजिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवकन्येन्द्रसेना च द्रौपदी काशिजा तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चन्द्रेत्यादिस्वरूपा यास्तेभ्यः शतगुणावराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुभक्तौ च तत्प्रीतौ ज्ञानानन्दादिकेष्वपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तेः पश्चादपि गुणैः सर्वैर्ब्रह्मभ्य ईरिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शेषः सदाशिवश्चोर्ध्वस्तपोऽहङ्कार एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नरोऽपटो लक्ष्मणश्च रौहिणेयः शुकस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सद्योजातो वामदेवश्चाघोरस्तत्पुमानपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दुर्वासा द्रौणिरौर्वश्च जैगीषव्यादिरूपकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वोक्तैश्च गुणैः सर्वैस्ताभ्यः शतगुणावराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तेः पश्चादपि सदा अतीतानागताश्च याः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतीतानागता ये च सर्वशोऽप्यवराः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सुपर्णाः सर्वेऽपि समाः शेषैः सदैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वैर्गुणैस्तथा मुक्तौ तद्भार्यास्तच्छतावराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ताभ्यः शतावरास्त्विन्द्राः पुरन्दर इतीरिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेभ्यः शतावरास्त्वन्ये इन्द्राश्चान्याश्च देवताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वित्रिपञ्चादिगुणतः परस्परविशेषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सनत्कुमारास्तु सदा पुरन्दरसमा मताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सनकाद्या नारदश्च दक्षभृग्वादयोऽपि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवावरा यथा तद्वन्मनवोऽपि प्रकीर्तिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रिचतुर्भागभेदेन तेऽप्यन्योन्यविशेषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वाली गाधिर्विकुक्षिश्च पार्थ इन्द्रः पुरन्दरः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुदर्शनश्च भरतः प्रद्युम्नः स्कन्द एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सनत्कुमारः कामश्चेत्येक एव व्यवस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वायम्भुवो मनुर्दक्षो वायुः स्पर्शाधिपस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहस्पतिश्चानिरुद्ध एते सूर्यादितोऽधिकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव यमश्चैते त्रयः सुराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रोक्तेभ्यस्त्ववराश्चान्यदेवेभ्योऽपि सदाऽधिकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्तवीर्यः पृथुश्चैव दौष्यन्तिर्भरतस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शशबिन्दुश्च मान्धाता ककुत्स्थाद्यास्तथाऽपरे ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे ते विष्णुनाऽऽविष्टाः विष्णोर्भिन्नाः सदैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शतावराश्च देवेभ्यः कर्मदेवा इति स्मृताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तुम्बुरुप्रमुखा ये च तथोर्वश्यादिका अपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यादिभ्योऽधमाश्चैव मन्वादिभ्यस्तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैवस्वतो मनुर्नित्यं विष्ण्वावेशी ततोऽधिकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्तवीर्यादिराजभ्यो देवभृत्याः शतावराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आजानदेवास्ते प्रोक्तास्तेभ्यश्च पितरश्चिराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितॄणां सप्तकं यत्तत्कर्मदेवसमं मतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विश्वामित्रो ब्रह्मपुत्रैः समो मुनिरुदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आचार्यः पितृणां चासौ पितृभिः सह पठ्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आजानेभ्यस्तु पितरो ह्यष्टभ्योऽन्ये शतावराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मदेवगणा अष्टगन्धर्वास्तत्परे शतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आजानदेवास्तेभ्योऽन्ये पितृभ्यश्च शतावराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वमुखेनैव देवैर्ये आज्ञाप्याः सर्वदा गणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आख्याता देवगन्धर्वा ये त्वन्यमुखगोचराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मानुषास्ते तु गन्धर्वास्तेभ्यस्ते च शतावराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेभ्यः शतावराश्चैव मनुष्येषूत्तमा गणाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवादिष्वेषु सर्वेषु प्रोक्ता अपि विशेषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चांशतो दशांशाद्वा स्वस्वजात्यां परस्परम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवस्त्रियो दशांशोनाः स्वपतिभ्यस्तथाऽपराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अष्टांशोनाः प्रविज्ञेया यासां मुक्तौ सह स्थितिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिश्च विशेषोऽयं सर्वेषां मानुषादिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इयं नीचोच्चता क्वापि न केनापि ह्यपोदितुम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्यते योऽन्यथाकर्तुमिच्छेत् सोऽपि तमो व्रजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽपि वेद समत्वेन सर्वान्नीचोच्चतः स्थितान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽपि याति तमो घोरं यश्च साम्यमुदीरयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मानुषोत्तममारभ्य ब्रह्मान्तानां प्रयत्नतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्भक्तिज्ञानपूर्वं भवेन्मुक्तिः प्रसादतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तिज्ञानादयः सर्वे सर्वेषामप्यनादयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिकालादारभ्य वृद्धानामुत्तरोत्तरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तद्योग्यतया पूर्तौ विष्णोर्दृष्टिः प्रजायते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथोदञ्चनकुम्भादेः सरित्सागरयोरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अल्पेन महता वाऽपि पूर्तिर्योग्यतया भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं नरादिब्रह्मान्तजीवानां साधनैरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिसिद्धैर्भक्त्याद्यैः पूर्तिर्योग्यतया भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अल्पैः पूर्तिस्तथाल्पानां महद्भिर्महतामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्त्याद्यैर्जायते तेषां साधनैर्नान्यथा क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रवणं मननं चैव ध्यानं भक्तिस्तथा दृशिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानञ्चोक्तविशेषाणां सर्वेषां साधनं भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यक्त्वैतानि न कस्यापि भवेन्मोक्षः कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वोत्तमतया ज्ञानपूर्वकः स्नेह एव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तिर्विष्णौ समुद्दिष्टा तदन्येषां च योग्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुभक्तिर्देवभक्तिर्गुरौ भक्तिस्तथैव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तच्छ्रैष्ठ्यानुसारेण मुक्तौ नियतसाधनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तिपूर्तौ भवेन्मुक्तिस्तदभावे च नो भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तिर्ज्ञानं तथा ध्यानं मुक्तानामपि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियमेन न हीयन्ते मुक्तानां ते स्वरूपकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "साधनानि तु सर्वाणि भक्तिज्ञानप्रवृद्धये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैवान्यसाधनं भक्तिः फलरूपा हि सा यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वात्मोत्तमेषु विद्वेषात् तमो नियमतो व्रजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणानामल्पताज्ञानं तत्स्त्रीरागस्तथैव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रतीपे च या बुद्धिस्त्रिविधो द्वेष उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वेषोज्झिता च या भक्तिः सा मोक्षं नियमान्नयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निर्दुःखं तु सुखं नित्यं मोक्ष इत्यभिधीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिदानन्दशिरोदेहपाणिपादात्मकाः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदोषविनिर्मुक्ता मुक्ताः क्रीडन्ति नित्यशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिकालादारभ्य या भार्यास्ताः सदैव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मादीनां विमुक्तौ च भार्याः स्युर्नियमात् सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कदाचिद्विमुक्तानां भार्याः काश्चित् स्युरन्यगाः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न कदाचिद्वियोगश्च न विद्वेषो न वाऽरतिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "मोदन्ते सहिताः सर्वे सदा विष्णुपरायणाः ॥ इत्यादि पैङ्गिश्रुतिः ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "text": "एकमेवाद्वितीयम्",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नेह नानास्ति किञ्चन",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "attrs": {
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "एकधैवानुदृष्टव्यं नेहनानाऽस्ति किञ्चन ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मृत्योः समृत्युं गच्छति य इह नानेवपश्यति ॥",
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानु विधावति ॥ इत्यादि च ।",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
| |
| "text": " इहेति परमेश्वररूपेषु अवयवेषु धर्मेषु च किञ्चन नाना नास्तीत्यर्थः । एकमेवाद्वितीयमिति तत्समोऽधिको वा तदनधीनो वा नास्तीति सतात्पर्यं निषिध्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एक एवाद्वितीयोऽसौ हरिर्वेदेषु सर्वदा ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एक एवाद्वितीयोऽसावश्वमेधः क्रतुष्वपि ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "एकैव वाऽद्वितीया सा विष्णुभक्तिर्हि साधने ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एक एवाद्वितीयोऽसौ प्रणवो मन्त्र उच्यते ॥ इत्यादिवचनात् ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " यथैकमुत्तमं पुरुषमपेक्ष्य, तस्मिन् पुरे एक एव नान्योऽस्तीत्युक्तेऽपि तत्सदृशस्तदधिको वाऽन्यो नास्तीत्युक्तं भवति ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एक एवाद्वितीयोऽसौ तदतन्त्रस्य वर्जनात् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्समस्याधिकस्यापि ह्यभावात् पुरुषोत्तमः ॥ इति च ब्राह्मे ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
| |
| "text": " स्वगतभेदाविवक्षायामिहेति विशेषणं व्यर्थं स्यात् । नानेवेति भेदाभेदनिराकरणार्थम् । विरुद्धोभयसंयोग इव शब्दः प्रदृश्यते इति शब्दतत्त्वे । पर्वतेषु दुर्गे पर्वताग्रे वृष्टं यथाऽधो विधावति एवं पृथक् दृष्टान् धर्मानन्वेव तदनन्तरमेवाधोऽन्धे तमसि विधावति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "text": "भेदेन दर्शनाद्वाऽपि भेदाभेदेन दर्शनात् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोर्गुणानां रूपाणां तदङ्गानां मुखादिनाम् ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तथा दर्शनकालात्तु क्षिप्रमेव तमो व्रजेत् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।",
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| }
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| "tail": "\n "
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| "text": "जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः,",
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| "text": "द्वा सुपर्णा सयुजा साखाया,",
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| {
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| "text": "यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्",
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| "text": "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य, इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यारभ्य मानुषादिब्रह्मान्तानां मुक्तानामानन्दे शतगुणविशेषश्चोच्यते । मुक्तानां चायं विशेषः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य इति विशेषणात् । न हि ब्रह्मादीनामनधिगतः श्रुत्यर्थः केषाञ्चिदस्ति । न च ब्रह्माण एव केचन कामहताः केचनाकामहताः इत्यत्र प्रमाणमस्ति । तस्माच्छ्रोत्रिय इति प्राप्तश्रुतिफलत्वान्मुक्त उच्यते । अकामहतत्वं च मुख्यं मुक्तस्यैव ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "प्राप्तश्रुतिफलत्वात्तु श्रोत्रियाः प्राप्तमोक्षिणः ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "त एव चाप्तकामत्वात् तथाऽकामहताः श्रुताः ॥ इति च भारते ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "ब्रह्मणोऽपि ह्यमुक्तस्य नाकामहतता परा ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यतस्तस्यापि कामस्य क्षणव्यवहितिर्भवेत् ॥ इति च ।",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": " कामहतता कामेनोपद्रवः ।",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| {
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| "text": "ब्रह्मणोऽप्यल्पदुःखं स्यात् तदप्यनभिमानतः ।",
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| {
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| "text": "नास्त्यात्मसम्बद्धतया भोगाभावात् कथञ्चन ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": " न चान्यस्य कस्यचिच्छ्रोत्रियस्याकामहतस्य च ब्रह्मणा समं सुखं युज्यते ।",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "children": [
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| "text": "ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगत्पतेः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सहसिद्धं चतुष्टयम् ॥ इत्यादिना श्रोत्रियत्वादिगुणैस्तस्यैवान्येभ्य आधिक्यात् । न चेन्द्रपदाद्विरक्तस्येन्द्रसमं सुखं ब्रह्मपदाद्विरक्तस्य तत्सममित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । दृष्टवस्तुनि विरागे आयासाभावात् कश्चित् सुखविशेषो दृश्यते । अन्यत्र ब्रह्मपदाद्विरक्तस्य न कश्चिद्विशेषो दृश्यते । अतोऽनुभवविरुद्धत्वाद्यत्किञ्चिदेतत् ।",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "नरादिब्रह्मपर्यन्तं विमुक्तानां शतोच्छ्रयः ।",
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| "text": "निःशेषदुःखहीनानां नित्यानन्दैकभोगिनाम् ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अप्यानन्दो मिथोऽप्युक्तस्त्वध्वर्यूणां श्रुतौ पृथक् ॥इति हरिवंशेषु ।",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते इत्यत्राप्येतस्मिन्निति विशेषणात् स्वगतभेदनिषेध एव ।",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| {
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| "text": "अभेदमीशरूपाणां भेदं जीवेशयोरपि ।",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यः पश्येत् स्थिरया बुद्ध्या भक्तिमान् स विमुच्यते ॥इति भविष्यत्पुराणे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । स उत्तमः पुरुषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| },
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| "text": "यस्य लोकं समासाद्य स्वरूपमभिपद्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "जीवः पर्येति विष्णोश्च समीपे तत्प्रसादतः ॥ यत्प्रसादात् स पर्येति स विष्णुः पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदध्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "दुग्धसागरगाः केचित् केचिदश्वत्थकक्षगाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अमृतह्रदेषु केचिच्च पिबन्ति स्नातवत् सदा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केचित् पश्यन्ति तं देवं सदा केचित् समीपगाः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आणिं न रथ्यममृताधितस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत् रथ्यमाणिमिवाश्रित्य मुक्ताः सर्वे व्यवस्थिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं विष्णुं देवदेवेशं नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥ इत्यादि ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " तौ यत्र विहीयेते इत्यत्रापि परमात्मैव ।",
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| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| },
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| {
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| "text": "शरीरानभिमानी यो हृदि संस्थो जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिमानवतो देहे जीवस्य स नियामकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव सूर्यसंस्थश्च हंसः सोऽहमिति श्रुतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हन्तृत्वाद्धंसनामासौ सोऽहं चासावहेयतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव सूर्यसंस्थेन रूपेणैवाक्षिणि स्थितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यसंस्थाद्धि रूपात् स विभक्तोऽक्षिणि संस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "गच्छतो म्रियमाणस्य तावुभावपि देहतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तयोर्देहविहाने तु भवेतारिष्टदर्शनम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा सञ्चिन्तयेद्देवं तमेव पुरुषोत्तमम् ॥ इत्यादि हरिवंशेषु ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।",
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥ क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात् स्वयञ्ज्योतिरजः परेशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नारायणो भगवान् वासुदेवः स्वमाययाऽत्मन् व्यवधीयमानः ॥ इति भागवते ।",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वेच्छयैवावृतो विष्णुर्जीवे तिष्ठति सर्वदा ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "योऽसौ नियमयन् जीवं क्षेत्रज्ञ इति शब्दितः ॥ इति हरिवंशेषु ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
| |
| "text": " अशरीरः प्रज्ञात्मेति विशेषणाच्च परमात्मा । न हि जीवस्याशरीरत्वममुक्तस्य । एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः अतोऽन्यदार्तम् इति च । न हि जीवादन्यस्यार्तिरुपपद्यते । सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मादयो हि भूतानि तेषामन्तर्गतो हरिः ।",
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "समः स सर्वभूतेषु य एवं वेद तत्त्ववित् ॥ इति भारते ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " न च मुख्ये सति लक्षणा नाम युज्यते । न च मुख्यत एव जीवेशयोरैक्यं युक्तम् । प्रत्यक्षविरोधादेव । तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते इत्यादेः । सहस्रशीर्षत्वादिसर्वेशत्वसर्वज्यायस्त्वादिज्ञानादेव मोक्षः प्रतीयतेऽनन्ययोगेन । न चात्रैक्यज्ञानमुक्तम् । पुरुष एवेदं सर्वम् इत्यत्रापि सर्वेशितृत्वमेवोक्तम् । उतामृतत्वस्येशानः इति वाक्यशेषात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "पुरुष एवेदं सर्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।",
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| |
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| {
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| "text": "इत्युच्यते तदीयत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "भूतभव्यादिजातस्य मुक्तानामपि चेश्वरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इत्युच्यते श्रुतौ विष्णुः सर्वदा पुरुषोत्तमः ॥ इति भारते ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वस्मादुत्तम इति सम्यक् स्नेहयुता मतिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुस्थिरा भक्तिरुद्दिष्टा तया मोक्षो न चान्यतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तया मोक्षो भवत्येव सा चेत् पूर्णा स्वयोग्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरोक्षदृशा युक्ता सा पूर्णेत्यभिधीयते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरोक्षदृशिश्चापि महाचार्योक्तदर्शनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽपि यन्मोक्षनियतं मनसा समुदीरयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य दर्शनतो याति मुक्तिं नास्त्यत्र संशयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ध्यानं च गुरुशुश्रूषा नित्यनैमित्तिकाः क्रियाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तीर्थदानजपाद्याश्च स्वाध्यायो हरिकीर्तनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वादश्यादिव्रतं चैव तुलस्याद्यैरथार्चनम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वं भक्त्यर्थमुद्दिष्टं निष्फलन्तु तया विना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुभक्तियुतो मुक्तिं याति नान्यः कथञ्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतदन्यत्तु यच्छास्त्रं न तच्छास्त्रं कुवर्त्म तत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्भक्तिमृते मुक्तिर्जीवाभेदो हरेरपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवब्रह्मादिसाम्यं च हरेर्मोहार्थमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैत्यानां मोहनार्थाय विष्णोरन्यसमानता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हीनता चोच्यते शास्त्रैर्न तद्ग्राह्यं मनीषिभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुवायुगिरीशेन्द्रदेवविप्राः क्रमात् सदा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सामर्थ्यतो विहीनास्तु गुणैः सर्वैस्तथैव च ।",
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "हीनो विष्णुर्न कस्यापि सर्वतश्चोत्तमो मतः ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतदन्यत्तु यच्छास्त्रं तदासुरविमोहनम् ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् सर्वोत्तमं विष्णुं निश्चित्य परमं व्रजेत् ॥ इति हरिवंशेषु ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "text": "तुलापुरुषदानाद्यैरश्वमेधादिभिर्मखैः ।",
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| "text": "वाराणसीप्रयागादितीर्थस्नानादिभिः प्रिये ॥",
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| |
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| {
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| "text": "गयाश्राद्धादिभिः पित्र्यैर्वेदपाठादिभिर्जपैः ।",
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| "text": "तपोभिरुग्रैर्नियमैर्यमैर्भूतदयादिभिः ॥",
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| "text": "गुरुशुश्रूषणैः सत्यैः धर्मैर्वर्णाश्रमोचितैः ।",
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| "text": "ज्ञानध्यानादिभिः सम्यक् चरितैर्जन्मजन्मभिः ॥",
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| "text": "न यान्ति तत्परं श्रेयो विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम् ।",
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| "text": "सर्वभावैरनाश्रित्य पुराणपुरुषोत्तमम् ॥ इति पाद्मे ।",
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| "tail": "\n "
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": " भावो भक्तिः समुद्दिष्टस्तद्वान् भावुक उच्यते इति नारसिंहे ।",
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| "text": "मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": " परायण इति विशेषणान्न नारायणायनत्वं विना मुक्तिद्योतकम् ॥",
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| |
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| "text": " न च सिद्धेऽर्थे तात्पर्याभावो वक्तुं युक्तः । अस्त्यत्र तव पिता राजेत्यादिषु सिद्ध एव तात्पर्यदर्शनात् । न च तत्र कार्ये तात्पर्यं कल्पयितुं युक्तम् । सुखसाधनत्वविज्ञानेनैव प्रवृत्त्युपपत्तेः । वाक्यस्य स्वार्थमात्रे तात्पर्यपर्यवसानात् । अधिककल्पनायामश्रुतकल्पनाप्रसक्तिः । यजेतेत्यादिष्वपि यजनादेः सुखसाधनतामात्रं प्रतीयते । न शब्दस्य प्रेरकता । वाक्यमात्रस्य प्रेरकत्वे सर्वैर्विहितमनिष्टसाधनमपि क्रियेत । व्युत्पत्तिरपि सिद्धे साङ्गुलिनिर्देशादिना युज्यते । न च कुत्रचित् सुखसाधनं विना कार्यान्वितं विद्यते । लिङ्गाद्यर्थोऽपि सुखसाधनत्वमेव । न च कार्यान्वित एव तात्पर्यमित्यत्र किञ्चिन्मानम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "सुखसाधनमेवैकं नृणां वेदः प्रदर्शयेत् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "न कुर्विति नरं क्वापि प्रेरयत्यत्र कञ्चन ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सुखसाधनताज्ञानात् सुखप्राप्त्यर्थमिच्छया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रवर्तते ततो वेदः सिद्धस्यैव प्रदर्शकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न तु कारकतां क्वापि वेदः प्राप्नोति कस्यचित् ॥ इति ब्राह्मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " अतस्तद्विरोधिकथनं मोहत एव । कार्यान्विते शक्तिरिति वदता सिद्धवाक्यानां प्रामाण्यमङ्गीकृतं च । अन्यथा वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेतेत्यादौ वसन्तादिलक्षणवाक्यानां स्थानान्तरस्थानां स्वार्थे प्रामाण्याभावाद् वसन्ताद्यसिद्धेर्यागाद्यसिद्धिः । कार्यान्विते शक्तिरित्युक्ते कार्यपदस्य कार्यान्वयाभावादशक्या विध्यादेरसिद्धिश्च । कार्यपदस्य स्वत एव शक्तिरन्येषां कार्यान्वितत्वेनेत्यङ्गीकारे कल्पनागौरवम् । स्वार्थे शक्तिरित्यङ्गीकारे न कश्चिद्विरोधः । कर्तव्यतामात्रे वाक्यप्रामाण्याङ्गीकारे कर्मप्रयोजने प्रमाणाभावात् तत्रापि तात्पर्यमङ्गीकर्तव्यमेवेति सिद्धमेव सिद्धे तात्पर्यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "चित्रादितारकाद्वन्द्वं यदा पूर्णेन्दुसंयुतम् । चैत्रादिमासा विज्ञेयाः ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
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| "text": "इत्यादौ वस्तुयाथार्थ्ये तज्ज्ञाने चोभयत्र तात्पर्यदर्शनात् । उपासनावाक्येष्वप्युपासनायां वस्तुयाथार्थ्ये चोभयत्र तात्पर्यं युक्तम् । ",
| |
| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उभयत्रापि तात्पर्यमात्मोपासादिके विधौ ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्मादसत्यं न ध्यायेद्ध्यायेत् तत्सत्यता तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "विचार्य मतिमान् वाक्यैर्बहुभिः स्वार्थवाचकैः ॥इति हरिवंशेषु ।",
| |
| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " तस्मादिष्टसाधनमेव सर्ववाक्यार्थः । तार्किकाणां तूक्तवचनानां प्रामाण्यं सिद्धमेव । अतस्तद्विरोधिकथनं मोहत एव ।\t",
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अनुमाया विरोधश्चेत् प्रत्यक्षेणागमेन वा ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सैवाप्रमाणतां गच्छेदागमद्विट् तथाऽक्षजम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादागम एवैको मानानामुत्तमोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्मार्थकाममोक्षाणां साक्षादेव प्रदायकः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": " इति वायुप्रोक्तवचनान्नानुमानविरोधो वक्तुं युज्यते । सर्वत्रानिवार्यत्वाच्च प्रत्यनुमानस्य ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "निर्णयस्त्वागमेनैव नानुमाऽऽगमवर्जिता ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्वचिन्निर्णीतिहेतुः स्यादतः शास्त्राद्विनिर्णयः ॥ इति भारते ।",
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
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| "text": " न च वेदात्मकेतिहासपुराणोक्तन्यायं परित्यज्य येन केनचित् क्ऌप्तन्यायो युज्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अक्षपादकणादौ च साङ्ख्ययोगार्हतास्तथा ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "शिवशक्तिमहायानलोकायतपुरःसराः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गाणपत्याश्च सौराश्च सर्वे प्रोक्ता दुरागमाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ऋग्यजुःसामथर्वाश्चेतिहासपुराणकौ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वागमा इति सम्प्रोक्ता मीमांसा धर्म एव च ॥ इति पाद्मे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "इतिहास इति प्रोक्तो ब्राह्माद्यं च पुराणकम् ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वेदाश्चैवेतिहासाश्च पुराणं भागवतं तथा ।",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूलप्रमाणमुद्दिष्टं मीमांसा च तथोत्तरा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतेषामविरोधे तु मानमन्यदुदीरितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतेषां तु विरुद्धं यदप्रमाणं विदो विदुः ॥ इति व्यासस्मृतौ ।",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोः सर्वोत्तमत्वस्य ज्ञानार्थं शास्त्रमिष्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतस्तत्साधकं शास्त्रं दुःशास्त्रं तद्विरोधि यत् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोः सर्वोत्तमत्वं च तद्भक्त्या मोक्ष एव च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शास्त्रार्थ इति निर्दिष्टः सर्वशास्त्रार्थनिर्णयात् ॥ इति पाद्मे ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
| |
| "text": " न चागमस्याप्रामाण्यं वक्तुं युक्तं तत्प्रमाणाभावात् । स्वतः प्रामाण्याच्च । तदनङ्गीकारे चानवस्थानात् । आगमप्रामाण्यसाधकानुमानादेरप्यागमवदप्रामाण्यप्राप्तेश्च । विशेषप्रमाणाभावात् । स्वीकृतत्वाच्च तैरपि स्वागमप्रामाण्यस्य । न ह्यनुमानादिना सप्तमलधारणचैत्यवन्दनादेः स्वर्गसाधनत्वं ज्ञातुं शक्यम् । न च प्रत्यक्षमात्रप्रामाण्यवादिनस्तत्सिद्धमागमाप्रामाण्यम् । अतस्तेषां प्रत्यक्षवदनुमानवच्चाङ्गीकर्तव्यमागमप्रामाण्यम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उक्तं च भविष्यत्पर्वणि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येनोक्तमागमामात्वं कुतस्तदिति तं वदेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षादेर्यदि ब्रूयात् तन्मात्वं क्वेति तं वदेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्स्वतश्चेदागमस्य प्रामाण्यं न स्वतः कुतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परतश्चेत् प्रमाणस्य न कस्यापि स्थितिर्भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अङ्गीकृतं च प्रामाण्यं सर्वैरप्यागमस्य तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतः स्वपक्षप्रामाण्यं विरोधेऽप्यक्षजादिना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अङ्गीकुर्वन्ति तत्पक्षः प्रत्यक्षादिविरोधकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शून्यता क्षणिकत्वं च ज्ञानमात्रत्वमेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भावाभावात्मता साकं शरीरात्मत्वमेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षेण विरुध्यन्ते मद्देह इति दर्शनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भावरूपस्थिरत्वादेर्ज्ञानाद्भेदस्य दर्शनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहभेदो यद्यमुख्यो देहैक्ये मुख्यता कुतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जातिस्मृतिप्रमाणाच्च न युक्ता देहरूपता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुष्ठाय च शास्त्रार्थं फलभोगस्य दर्शनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षादेर्विरुद्धत्वात् सौगताद्या दुरागमाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बह्वागमविरोधाच्च दुष्टत्वं तेषु संस्थितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रामाण्यं स्वीकृतं यैस्तु वेदानामागमा हि ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शतकोट्यः पञ्चरात्रं पुराणं तावदेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रामस्य चरितं तावत् तावदन्यच्च सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्ताश्च तथा वेदाः साङ्गोपाङ्गाश्च सर्वशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधिक्यं यत्र विष्णोस्तात्पर्यात् समुदीर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विंशदेव सहस्राणि श्लोकानां समुदीरितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बार्हस्पत्यं तथा बौद्धं भावाभावमतं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवशक्त्यादिकं यच्च किञ्चित् प्रामाण्यसंयुतम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रिंशत्कोट्येव तत्सर्वमतो मानं न तत्स्मृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहुमानविरुद्धं यन्न तन्मानं विदो विदुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणसाम्येऽपि किमुत गुणाधिकविरोधि यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा बहूनां ज्ञानानां समानां गुणतोऽपि च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विरोध्येकं तु यज्ज्ञानं न मानत्वं गमिष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षादौ हि बहुभिः समैरेकमपोद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्वेदाः प्रमाणं स्युर्बाहुल्यादेव किं पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदोषत्वाद्गुणाच्चैव बलवत्कार्यसाधनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदोक्तकर्मयुक्तानां तथा सिद्धिमतामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वेदबाह्यक्रियायोगान्न बाधः क्वापि दृश्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदोक्तकर्मसिद्धानां न बाध्यं दृश्यते क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असाध्यं वा ततो वेदाः प्रामाण्यं निश्चयाद्गताः ॥ इति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "प्रत्यक्षमनुमानं च वाक्यं चेति त्रिधा प्रमा ।",
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| |
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| |
| {
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| "text": "उपमाद्यं प्रमाणं यदेतेष्वन्तर्गतं हि तत् ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "निर्दोषेन्द्रियसंयोगः प्रत्यक्षमिति गीयते ।",
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| |
| },
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| {
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| "text": "निर्दोषयुक्तिरनुमा तादृशोक्तिस्तथाऽऽगमः ॥",
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| |
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| "text": "मानं चैव विशेषेण निर्दोषज्ञानसाधनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "अर्थापत्तिश्चोपमा च सम्भवाद्यनुमैव तु ॥",
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| |
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| "text": "दुःखाद्यभावः प्रत्यक्षं बाह्यगश्चानुमा स्मृता ।",
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| |
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| {
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| "text": "योग्यस्यानुपलब्ध्याख्या युक्तिरेव हि बाह्यगा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अभावरूपं प्रत्यक्षं मनश्च द्विविधं मतम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चेतनं च जडं चेति चक्षुराद्यं तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चेतनं त्विन्द्रियं ह्यात्मस्वरूपान्नापरं स्मृतम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तानां चेतनं त्वेव बद्धानामुभयं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वरूपेणापि संयोगः स्वरूपस्यैव युज्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा रत्नस्य संयोगस्तत्प्रकाशेन नित्यदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रत्नस्य च प्रकाशस्य न भेदः कश्चिदिष्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषो नाम विज्ञेयो विशेषाद् दृष्टिगोचरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरेव स्वरूपाणां तद्गुणानां तथैव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्यैव शिरआदीनां नैव भेदोऽस्ति कश्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभेदेऽपि विशेषेण व्यवहारः पृथग्भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्जडेन जीवैश्च भेद एव श्रिया तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः क्रियाश्च याः कश्चिदभेदस्तैरपि ध्रुवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कादाचित्कत्वमप्यासां विशेषेणैव युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं विमुक्तजीवानां स्वरूपैः स्वगुणैरपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वक्रियाभिस्तथैवैक्यं नित्यं स्वावयवैरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदस्तु बद्धानां गुणैः स्वैः कर्मभिस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंशांशिनोर्गुणस्यापि गुणिनः कर्म तद्वतोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्योपादानयोश्चैव व्यक्तिसामान्ययोरपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदः समुद्दिष्टो विनाशो यत्र दृश्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकस्मिन् विद्यमानेऽपि तयोरेकस्य कस्यचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविनाभावनियमो यत्राभेदस्तु तत्र हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभेदश्च स्वभिन्नेन भेदाभेदस्तु तत्र च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदो न तु क्वापि विष्णोरस्ति कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेद एव तु जीवाद्यैः केवलाभेद आत्मनि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वरूपेषु विशेषो यः स्वरूपं तस्य सोऽपि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्रियाणां च न नाशोऽस्ति तच्छक्तेः पूर्वकालतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेष एवोपरतिः क्रियायाः समुदीरिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषस्य विशेषोऽन्यो न चैवास्ति कथञ्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वस्यापि तु विशेषश्च स्वयमेव भविष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा जनेर्जनिर्नान्या तस्या वस्तुजनिर्जनिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथाऽपि तु जनित्वात् सा सत्वं वस्तुन आनयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेव विशेषोऽसौ विशेषान्तरवर्जितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "करोति न करोतीति विशेषव्यवहारकृत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यक्तिभावं गता या तु करोतीति स्वरूपिणी ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्तिरूपस्थिता सैव क्रिया शक्तिरितीर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा च व्यक्तिस्तु जनिवत् क्रियाया रूपमेव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथापि तु विशेषेण स्वरूपेण विशेषिणी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जनेर्जनिवदेवासौ ज्ञातव्या व्यतिरेकतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं मुक्तक्रिया नित्या नान्येषां भ्रान्तिसम्भवात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तावुच्छेदतश्चैव निःशेषेणाखिलस्य च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैवं मुक्तक्रियायास्तु तस्याश्च पुनरुद्भवात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अमुक्तानां क्रिया याश्च मुक्तावपि समास्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिन्ना इति ता ज्ञेया अभिव्यक्तेः पुनः पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिन्तनादिक्रियाणां तु मुक्तावुच्छेदतः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किं मया कार्यमादीनां भेदाभेद उदीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अचेतनेष्वस्वतन्त्राः क्रिया यस्मात् सदैव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदस्ततो ज्ञेयः सर्वत्र नियमेन तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ईश्वरः प्रकृतिर्जीवो जडं चेति चतुष्टयम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पदार्थानां समुद्दिष्टं तत्रेशो विष्णुरुच्यते ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| |
| "text": " पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च इत्यादिश्रुतयश्च । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "शक्तिशक्तिमतोश्चैव विशेषस्य विशेषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविनाभाविता यत्र न भेदस्तत्र विद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधिकसुखत्वं च ज्ञानं सर्वाधिकं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधिका सर्वशक्तिस्तेजः सर्वाधिकं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यादयो गुणाः सर्वे स्वरूपं वैष्णवं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदान्यत्वादयः शब्दाः अतद्रूपत्ववाचकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्वचिदन्तरशब्दश्च विशेषस्यैव वाचकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकस्मिन्नेव शब्दानां यस्तु नानास्वरूपिणाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रयोजकत्वहेतुः स्यात् स विशेषः प्रकीर्तितः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
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| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यदाहुर्ब्रह्मविज्ञानात् समग्रत्वं यियासवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मज्ञानात् समग्रत्वं नान्यतश्चेति निश्चयात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र केचिन्मनुष्यास्तु मन्यन्ते ब्रह्म किं मतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समग्रभावमगमदिति ब्रूयाच्च तानिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्माऽपि सर्वदाऽत्मानमहेयं गुणबृंहितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदाऽस्तीति मेयं च विजानाति तथैव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत एव समग्रत्वं स्वत एवास्य सर्वदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदहेयं परं ब्रह्म यो योऽवेद्गुणबृंहितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदाऽस्तीति मेयं च स स याति समग्रताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यं समग्रं तद्ब्रह्म ज्ञानस्यापि समग्रतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किञ्चित्समग्रतां देवास्तेषां ज्ञानं हि तादृशम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आपुस्ततोऽधमां ज्ञानतादृक्त्वादृषयोऽपि तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषिभ्योऽप्यधमां प्रापुर्मानुषाश्च समग्रताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओयं च गुणैः पूर्णं नित्यास्तिज्ञानगोचरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्म पश्यन्वामदेवः सूक्तमेतद्ददर्श ह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं मनुः सूर्य इति स्वान्तर्यामिव्यपेक्षया ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहंशब्दो यतो विष्णौ ततश्चोत्तमपूरुषाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वर्तन्तेऽभवमित्याद्याः सर्वान्तस्थे जनार्दने ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनुरेषोऽवबोधत्वान्मन्वन्तस्थो जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह्याचारानुवाचेशः प्रेरयन्मनुमानसम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव सूरिभिः प्राप्यः सूर्यान्तस्थो मुमुक्षुभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव कक्षगैः सेव्यः कक्षीवति समास्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव शुक्रसंस्थस्तु नीतीः कवयति स्वयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतः कविः स कामस्य प्रेरणादुशनाः स्मृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव शम्बरपुरो बिभेदेन्द्रे व्यवस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वान्तर्यामकत्वात् तु सर्वकर्मा स एव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततः सूक्ते तथोवाच वामदेवः श्रियः पतिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो योऽहेयं परं ब्रह्म सदैवास्तीति मानगम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदानीमपि जानाति स्वयोग्यां स समग्रताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्नोति तस्य देवाश्च नाभूतिं कर्तुमीशते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मा हि विष्णुर्देवानां तेषु व्याप्तो यतः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियोक्तृत्वेन कार्येषु तज्ज्ञो यस्माच्च साधकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्य प्रीतो हरिर्नित्यं तस्य प्रीताश्च देवताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रीतियोगान्नैव तस्य विरुद्धं कर्तुमीशते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं विलक्षणं देवमुपास्ते जीवरूपिणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओयोऽस्तीति मेयोऽन्योऽथान्योऽसौ हरिरित्यपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न स वेद परं विष्णुं जीवरूपेण वेत्ति यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाहेयत्वं च वेदास्य तस्मात् पशुवदीरितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पशवो बहवो यद्वत् पुरुषं भोजयन्त्युत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्वज्ञः पुरुषस्तद्वदेकोऽपि बहुगा यथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानां पशुवच्चासौ यो वेदाहेयरूपिणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवान् भोजयति ज्ञानसम्पत्त्या विष्णुसंश्रयात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वीकारे तु पशोः प्रीतिरेकस्यापि भविष्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहूनां हि गवां लाभे परा प्रीतिश्च किं पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सुबहुगोरूपे देवानां तत्त्ववेदिनि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भवेदभ्यधिका प्रीतिर्विष्ण्वहेयत्ववेदनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्याहेयस्तथैवान्यस्तदन्यो विष्णुरित्यपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानामप्रियं ज्ञानं नैवं विद्यादतः पुमान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरहेयतां चैव नित्यत्वं पूर्णतामपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो न वेद, तथा यश्च जीवैरैक्यं हरेर्वदेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यश्चासत्यं जगद्ब्रूयात् सर्वे ते तमसि स्फुटम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मज्जन्ति सर्ववेदैर्हि गुणैः सर्वैहरिर्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णो नित्यमपूर्णाश्च जीवा मुक्ता अपि स्फुटम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निःशेषदुःखमोकेन सुखैकानुभवस्तु यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोक्ष इत्युच्यते वेदैस्तेऽपि मुक्ता हरिं सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपासते जगच्चैतत्सर्वदाऽऽद्यन्तवर्जितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कदाचिज्जगन्नाशो न कदाचित् तदन्यथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जगत् प्रवाहरूपेण सर्वदैवं व्यवस्थितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानतः कर्मतो वाऽपि तपसा शक्तितोऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कस्याप्यन्यथा भाव्यं जगदेतत् कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यो विष्णुः श्रीश्च सत्या जीवाः सत्या जडं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असत्यं नास्ति किञ्चिच्च सर्वेषां ज्ञानगोचरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञात्वा विष्णुमतो मुक्तिं प्राप्नुयात् पुरुषोत्तमम् ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " इदमित्यात्मनो योग्यं सर्वं समग्रं भवति । निर्दुःखानन्दस्यापेक्षितत्वान्मनसि स्थितत्वेनेदमिति युज्यते । तत्सर्वमभवत् सर्वं भविष्यन्त इत्यादिना समग्रभावस्य प्रस्तुतत्वात् । ब्रह्म पश्यन्वामदेवो ब्रह्मणो मन्वादिजीवैरहेयत्वं प्रतिपेदे ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्म पश्यन्वामदेवो ब्रह्मणोऽहेयतां सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मन्वादिभिः सर्वजीवैः प्रतिपेदे हि मन्त्रदृक् ॥ इति ब्राह्मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " तदिदं ब्रह्म योऽहेयत्वादिगुणमेतर्ह्यपि वेद । अहंशब्दस्याहेयत्वानङ्गीकारे इदंशब्दोऽपि व्यर्थः । सर्वस्वरूपत्वं हि दुर्विद्वद्भिरङ्गीक्रियते । इदंशब्देन परब्रह्मविवक्षायां ब्रह्मशब्दो व्यर्थः स्यात् । इदं योऽहमिति वेदेत्येव स्यात् । एवंशब्दश्च व्यर्थः । अस्मत्पक्षे तु तदात्मानमेवावेदित्यपि ज्ञातव्यमित्येवंशब्दार्थः । तत्पक्षे तदपि व्यर्थमेव । न हि तत्पक्षे तत्स्वात्मानं वेत्ति । व्याख्यानव्याख्येयभावश्चागतिका गतिः ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभावे पृथगर्थानां व्याख्यामभ्यासमेव वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कल्पयेन्नैव तद्भावे व्याख्याऽभ्यासश्च युज्यते ॥ इति भारते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वरूपज्ञं तथाऽहेयं नित्यं च ब्रह्म वेत्ति यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समग्रभावं गच्छेत् स तत्प्रसादान्न संशयः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " स ईश्वरः एषां देवानामात्मा भवति । पुल्लिङ्गं च तत्सत्यं स आत्मा इत्यादिवद् भवति ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानां व्यापकत्वात्तु तेषामात्मा हरिः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तज्ज्ञः प्रियस्ततस्तेषां तस्य नाभूतिदास्ततः ॥ इति वामने ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "सर्वेभ्योऽन्यां विलक्षणां देवतां स्वगुणेभ्योऽहेयत्वादिभ्यश्चान्यां य उपास्ते ओयोऽस्मीति मेयश्चान्योऽन्यश्चासौ विष्णुरिति मत्वा यो विष्णोरन्यां देवतामुपास्ते अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेदेति वा ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवादिभ्यो हरिर्भिन्नस्तं यः स्वगुणभेदतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओयोऽन्यो हरिश्चान्य इति मत्वाऽन्यमेव वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "य उपास्ते न स ज्ञानी मनुष्याणां पशुर्हि सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्यग्ज्ञानी तु देवानां पशुरित्यभिधीयते ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "एवं स देवानामित्यत्र पूर्वः सम्यग्ज्ञानी परामृश्यते । एतन्मनुष्या विद्युरित्यत्रैतच्छब्देन विष्णोरन्यदेवतोपासनमुच्यते । न ह्यज्ञान्येव देवानां भोजकः । ज्ञानी हि विशेषेण भोजकः । अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः इति वचनात् । स य एवंवित् सर्वेषां भूतानां ब्रह्मविच्च तत्रोच्यते । प्रस्तुतत्वात् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्त्वविद् देवगौः प्रोक्तो नरगौश्चाप्यतत्त्ववित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्देवास्तत्त्वविदे प्रियं कुवर्न्त्यतन्द्रिताः ॥ इत्याग्नेये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": " तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत इति देवानां तत्त्वज्ञानं प्रियमित्युक्तं च ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यो जीवेशयोर्भेदः सत्या विष्णोर्गुणा अपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यं जगदिदं सर्वं सत्येशजगतोर्भिदिः ॥ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदेनैव जगत्सर्वं भेदेनेशं गुणैः सह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदेन जीवानन्योन्यं मुक्ताः पश्यन्ति सर्वशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निःशेषदुःखहीनाश्च केवलं सुखभोगिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्ममृत्युविहीनाश्च कालसम्बन्धवर्जिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजस्तमःसत्वहीनाः प्रकृत्यादिविवर्जिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "इत्यादि गारुडवचनान्न ज्ञाननिवर्त्यता वक्तुं युक्ता । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तिर्यङ्मानुषदेवादिविष्णुरूपेष्वशक्तता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मिन् कस्मिंश्च विषये दुःखित्वं भिन्नताऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतेर्विकारिता वाऽपि च्छेदभेदव्रणादि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञानं नाशिता वाऽपि जन्म जीवैरभिन्नता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृत्यभिन्नता वाऽपि जीवाभेदः परस्परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जडाभेदोऽथ वा विष्णोर्मिथ्यात्वं जगतोऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अगुणत्वमदेहत्वमकर्तृत्वं तथा हरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्यग्भक्तिमृते मुक्तिर्विष्णौ तद्द्वेषतस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तावभोगो जीवानां मुक्तौ साम्यं तथैव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरूपत्वं च जीवानां मुक्तानां बन्धिनामपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नामतीर्थादिभिर्मुक्तिस्तत्त्वज्ञानं विनाऽपि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः सकाशात् प्रकृतेर्ब्रह्मणोऽनन्तरुद्रयोः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गरुडेन्द्रसूर्यविघ्नादेरग्निसोमगुहादिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नस्यानिरुद्धस्य देवविप्रादिनामपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यैः कैश्चापि गुणैर्विष्णोः सकाशाद्वरता तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा कदापि यत्नैर्वा वरशापादिनाऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तपसा वाऽप्युपायैर्वा योगज्ञानादिनाऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "साम्यं वा विष्ण्वधीनत्वादन्यथैषां स्थितिः कृतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असंसारित्वमेषां वाऽप्येषामीश्वरताऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विना विष्णुप्रसादेन मुक्तिरेषां सकाशतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः प्रयोजनावाप्तिर्विष्णोर्दोषश्च कश्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोः सर्वेषु रूपेषु सम्पूर्णगुणहीनता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदो वा विष्णुरूपेषु विशेषो वा गुणेषु च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रियः सकाशादाधिक्यं ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "ब्रह्मवाय्वोरनन्तस्य रुद्रस्य गरुडस्य च ॥",
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "तेभ्यश्चैवेन्द्रसूर्यादेर्विप्रभूपादिनां ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "बद्धानां मुक्तिगानां वा दैत्यानां मोक्ष एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वं मोहार्थमुद्दिष्टं वेदेषु हरिणाऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणा वाऽथ रुद्रेण देवैश्च मुनिभिस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यथा सुराणां सज्ज्ञाने तात्पर्यं सर्वदा श्रुतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तथा दुर्ज्ञानजनने तात्पर्यमसुरेषु च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवमेव च देवानां विष्णुब्रह्मादिनामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोः सर्वगुणैः पूर्तिरपि मत्स्यादिरूपिणः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अजेयत्वमभेद्यत्वमच्छेद्यत्वं च सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वावताररूपाणामपि चित्सुखरूपता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीब्रह्मरुद्राद्याधिक्यं सर्वेशत्वं स्वतन्त्रता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वशक्तिस्तत्प्रसादान्मोक्षो ब्रह्मादिनामपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्भक्त्यैव विमोक्षश्च भेदो जीवेशयोरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीब्रह्मरुद्रशक्रादेः क्रमेणैव निजा गुणाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदोषव्यपेतत्वं विष्णोः सर्वत्र सर्वदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतत्सर्वं सर्ववेदैर्विष्ण्वाद्यैर्देवतागणैः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषिभिः क्षत्रियाद्यैश्च सम्यक्तात्पर्यतः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उक्तं सर्वेषु शास्त्रेषु तस्माद् ग्राह्यं बुभूषुभिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं सत्यमिदं सत्यमिदं सत्यं न संशयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कोटिभिः शपथैश्चापि निर्णीतं देवतागणैः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिकालतश्चायं शास्त्रार्थो नान्यथा क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनश्चानन्तकालीन एष एव न संशयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञातव्यश्चैष एवार्थः सर्वदैव बुभूषुभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं तु स्थिरया बुद्ध्या ज्ञात्वा यास्यथ तत्परम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं ते हंसरूपेण विष्णुना देवतागणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्माद्या बोधिताः सर्वे तथा ज्ञात्वा परं गताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "साक्षाद्विष्णुर्हंसरूप उक्त्वैवं तु दिवौकसाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वासुदेवाख्यरूपेण तेन सर्वहृदि स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कर्षणाख्यरूपेण विवेशानन्तमेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं ध्यायति सदाऽनन्तस्तस्मान्मुक्तिपदेच्छया ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नाख्येन रूपेण काममेव विवेश सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हंसस्तद्ध्यानतो मुक्तिं काम इच्छति सर्वदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिरुद्धाख्यरूपेण सोऽनिरुद्धं विवेश ह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हंसस्तद्ध्यानतो मुक्तिमनिरुद्धस्तथेच्छति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यादि ब्रह्माण्डपुराणे तत्त्वनिर्णयगीतायाम् ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सन्न व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत । क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात् क्षत्रात् परं नास्ति । तस्मात् ब्रह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मेवान्तत उप निःश्रयति स्वां योनिं य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयां सं हिंसित्वा ॥ ५ ॥",
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| "text": "विष्णोर्ब्राह्मणजातिः सन् ब्रह्मा जज्ञे चतुर्मुखः ।",
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| "text": "वायुः सदाशिवोऽनन्तो गरुडः शक्र एव च ।",
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| "text": "कामश्च वरुणश्चैव सोमसूर्यौ यमस्तथा ॥",
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| "text": "एवमाद्याः क्षत्रियास्तु देवानां ब्रह्मनिर्मिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "श्रेयसी सर्वजातिभ्यः क्षत्रजातिरिति श्रुतिः ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नैव क्षत्रात् परा जातिर्ब्रह्मजातिं विना क्वचित् ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्राह्मणाच्च परो राजा राजसूयाश्वमेधयोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उपास्ते राजसूयेऽतो ब्राह्मणो राजसूयिनम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आसीन आसनाधस्तात् तथाऽपि ब्राह्मणो गुरुः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् स राजसूयान्ते ब्राह्मणान् वन्दयीत च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यः क्षत्रियो ब्राह्मणहा पितृहा स प्रकीर्तितः ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पापीयानेव भवति हत्वा स्वपितरं यथा ॥ इति वामने ।",
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| "text": "स्वतोऽधिकगुणं हत्वा साक्षाच्च पितरं पुनः ।",
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| "text": "क्षत्रस्य ब्राह्मणं हत्वा तावान् दोषो भवेद् ध्रुवम् ॥ इत्याग्नेये ।",
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| "text": "ईशानो मारुतः प्राणो वायुर्जिष्णुस्तथैव च ।",
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| {
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| "text": "धृष्णुश्च पवमानश्च पवनश्चेति कथ्यते ॥ इति शब्दतत्त्वे ।",
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| |
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| {
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| "text": "बलिर्महाविषश्चेति भूधरश्चेति कथ्यते ॥ इति च ।",
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| "text": "विश्वजिच्चाप्यवध्यश्च वैनतेयश्च कथ्यते ॥ इति च ।",
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| "text": "प्राचीनबर्हिर्हर्यश्वः सोमपो मेषभुक्तथा ॥ इति च ।",
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| "text": "अधो ब्राह्मण आसीनो राजसूये हि सेवते ॥ इति प्रत्यये ।",
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| "text": "ऋच्छति विनाशयति । रीङ्ग् क्षये इति धातोः ॥ ५ ॥",
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| "text": "ततो बहुतरानिच्छन् शूद्रान् देवान् ससर्ज ह ।",
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| "text": "शूद्रदेवाः समुद्दिष्टा देववर्णा इति स्मृताः ।",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणिनां धैर्यरूपं च वायो रूपान्तरं पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ससर्ज मतिमान् ब्रह्मा विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् वायोः परो नास्ति ऋते विष्णुं सनातनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शेषादीनां क्षत्रियाणां वायुरेवाधिपः स्मृतः ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धारणाद्धर्म इत्याहुर्वायुर्धारयति प्रजाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अबलोऽपि ततो वायोर्विष्णुभक्त्यादिरूपिणः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "प्राप्तुमिच्छति युक्तः सन् विष्णुं सुबलवत्तरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "यथैव युवराजेन महाराजमभीप्सति ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्तुं धर्माभिमानी स वायुः सत्याभिमानवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मादाहुर्धर्मविदं सत्यं वेत्तेति वेदिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यज्ञमथ धर्मज्ञं वायुर्देवो यतस्तयोः ॥ इति नारदीये ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवत् ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यश्शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्यां रूपाभ्यां ब्रह्माभवदथ यो ह वा अस्माल्लोकात् स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽनूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवं विन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते ॥ ९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": " नैव व्यभवदिति परिवारबहुत्वेन यद्विशिष्टत्वं तन्नाभवदित्यर्थः ।",
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| "text": "क्षतत्राणात् क्षत्रियश्च त्रिषूनत्वाद् विशः स्मृताः ॥",
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| "text": "ऊनवाची हि विट्शब्दः शुभे दत्ते त्रिभिर्यतः ।",
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| |
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| {
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| "text": "रमते स ततः शूद्रः स ब्राह्मण्याभिमानवान् ॥",
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| |
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| {
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| "text": "ब्रह्माऽग्निना सहैवास्ते देवेष्वथ नरेषु च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्राह्मणेन सहैवास्ते ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "क्षत्रजात्यभिमानी तु पवनो देवराजभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सुपर्णशेषरुद्राद्यैर्मानुषेषु च राजभिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "वैश्यजात्यभिमानी च नासिक्यो वायुरूर्जितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वस्वादिभिः सहैवास्ते देवेष्वथ नरेषु च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विड्भिः शूद्राभिमानी च निर्ऋतिर्देवतासु च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "text": "नासत्ययोः पृथिव्यां च शूद्रेष्वेव तु मानुषे ॥",
| |
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मादग्नौ विशेषेण ब्रह्मणः सन्निधिर्भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽग्नावेव देवानां सर्वेषां नियमाद्धविः ॥",
| |
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "हुत्वा लोकान् प्रार्थयन्ति तथा विप्रेषु मानुषे ।",
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| |
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| {
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| "text": "सर्वजात्युत्तमो ब्रह्मा यतो विप्राग्निसंस्थितः ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्माद्विप्रांस्तथैवाग्निं तर्पयेद्ब्रह्मतुष्टिकृत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तुष्टे ब्रह्मणि विष्णुश्च तुष्टो लोकान् प्रदास्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "अग्निविप्रार्चकोऽप्येवं यो न वेद, हरिं परम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "आश्रयं सर्वजीवानां हरिस्तं नैव भोजयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथाऽनधीतो वेदस्तु यथा कर्माकृतं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "न सम्यक् फलदो विष्णुरज्ञातो जगदीश्वरः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्यवेत्ता महदपि हयमेधादिकं हरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुर्यात् क्षयिष्णुफलवान् स भवेन्नात्र संशयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आप्तकामतयाऽत्मेति यो विष्णुः समुदीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाश्रयमुपासीत तमेव पुरुषं सुधीः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुं सर्वाश्रय इति सदोपास्ते य आत्मवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षीयन्ते नास्य कर्माणि शुभान्येव कदाचन ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपासनाबलान्मुक्तो भोगान् कर्मफलान् सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भुङ्क्ते विष्णोः समीपस्थः सर्वदोषविवर्जितः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C01_S05_V09_B01"
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| "text": " एताभ्यां रूपाभ्यां सहितं हि ब्रह्माऽभवत् । स्वं लोकं स्वाश्रयम् ॥ \t\t\t\t\t\t",
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेनर्षिणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवं हैवं विदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमांसितम् ॥ १० ॥",
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| {
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| |
| "children": [
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| "text": "योऽयं सर्वेषु जीवेषु नियामकतया स्थितः ।",
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| |
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| {
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| "text": "स विष्णुराप्तकामत्वादात्मेत्येवोच्यते बुधैः ॥",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स लोकः सर्वभूतानां सर्वजीवेषु संस्थितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैश्वदेवादिकान् होमान् यज्ञांश्च कुरुते विभुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कारुण्यात् सर्वदेवेषु तेन देवाश्रयो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषीणामाश्रयश्चापि स्वाध्यायेष्वषिसंस्मृतेः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स हि जीवेषु सन्दिष्टः पिण्डं पुत्रजनिं तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्करोति पितॄणां च संश्रयस्तत एव सः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तृणोदकादिदानेन पशूनामन्नतो नृणाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपकाराच्च सर्वेषां प्राणिनामाश्रयो हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञादीन् देवतादीनामन्नत्वेन पुरैव यत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्माद्यैरर्थितः प्रादात् क्षीराब्धेस्तट उत्तरे ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतश्च सर्वलोकानामाश्रयो विष्णुरेव सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं यो वेत्ति विष्णोस्तु सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाण्यपि हि भूतानि तस्येच्छन्त्यविनाशिताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वाश्रयस्य यथा नित्यमनाशं प्रार्थयन्ति हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राजादेरपि तान्येवमुत्तमाश्रयवेदिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतद्वासुदेवस्य सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विदितं सर्ववेदैश्च मीमांसाभिश्च निश्चितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इति भविष्यत्पर्वणि ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| |
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| "text": "निर्भयान् विष्णुनाम्नैव यथेष्टं पदमागतान् ॥",
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| |
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| {
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| "text": "अलब्ध्वा चात्मनः पूजां सम्यगाराधितो हरिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "मया चास्मादपि श्रैष्ठ्यं वाञ्छताऽहङ्कृतात्मना ॥",
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| |
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| "text": "ततः साक्षाज्जगन्नाथः प्रसन्नो भक्तवत्सलः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "अंशाशेनात्मनैवैतान् पूजयामास केशवः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "देवान् पितॄन् द्विजान् हव्यकव्याद्यैः करुणामयः ।",
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| |
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| {
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| "text": "ततः प्रभृति पूज्यन्ते त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ इति च पाद्मे ।",
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| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छंश्च नातो भूयो विन्देत् तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्योकृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवं श्रोत्रेण हि तच्छ्रुणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥११॥ ॥ इति अव्याकृतब्राह्मणम् ॥",
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| |
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| |
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| "text": "॥ इति अव्याकृतब्राह्मणम् ॥ ३५ ॥ \t",
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| "text": "एको नारायणः पूर्वमासीज्जायां स ऐच्छत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्यमानामपि सदा भोगार्थं पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यत्वेऽप्युभयोर्देवोऽवियुक्तस्तु तया यदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक इत्युच्यते देव्या रममाणः सुतं विभुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐच्छद्ब्रह्मा ततो जज्ञे ततो देवांश्च सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जाते पुत्रे वित्तमैच्छद्भूतान्यण्डं ततोऽभवत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः कुर्यां कर्मेति चैच्छत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "ततस्तु कृतवान् यज्ञं स्वस्मै स पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "आहुरात्मेति तं देवं पूर्णत्वाद्विष्णुमव्ययम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादद्यापि यः कामी स ह्येतावन्तमिच्छति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैवं वित्तं सुखाद्यं हि मित्राद्यं मानुषं तु यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदानीमपि तस्माद्धि कामयेदेवमेव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः कश्चित् पुरुषो वाऽपि तद्वैकल्यादकृत्स्नवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकाकिनोऽप्यवैकल्यं यथैव स्यात् तथा शृणु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वात्मनस्त्वपृथग्यत्तज्ज्ञानरूपं मनः परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तावपि न हेयं यत्तत्स्वात्मेत्येव चिन्तयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जायां तु तादृशीं वाचं बलं तादृक्स्वमात्मजम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं चक्षुश्च तादृग्यद्वित्तं दैवं च मानुषम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवम्भूतं चिन्तनं यत्तत्कर्मेत्येव चिन्तयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतत्षट्कं च हरये सर्वेशाय समर्पयेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवमात्मा प्रिया पुत्रो वित्तं द्विविधमित्यपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| "text": "पञ्चभिः क्रियते यज्ञः पुरुषः पशुरेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "मातापितृभ्यामन्नेन तयोः पूर्वेण कर्मणा ।",
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| |
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| {
| |
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| "text": "जन्यस्य कर्मणा चैव साध्यः पञ्चभिरेव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं हि प्राणिनोऽन्येऽपि जायन्ते नात्र संशयः ।",
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| |
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| "text": "एतामुपासनां कुर्याद्यो ब्राह्मं पदमाप्य च ॥",
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| |
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| "text": "सर्वस्यास्य पतिर्भूयाद्विष्णोरेव प्रसादतः ।",
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| |
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| "text": "ब्राह्मे पदे त्वयोग्या ये ते देवपदमाप्नुयुः ॥",
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| |
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| "text": "तस्याप्ययोग्या लोकस्य भवेयुरधिकं प्रियाः ।",
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| "text": "क्रमान्मुक्तिं व्रजेयुश्च केशवस्य प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ।",
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| "text": "अविदित्वा महत्पुण्यं कृत्वा न फलभाग् भवेत् ॥",
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| "text": "तथा ज्ञात्वा हरिं यस्तु कुर्यात् कर्म सदोदितम् ।",
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| "text": "अनन्तफलवान् स स्यात् प्राप्नोति च मनोगतम् ॥ इति बृहच्छ्रुतौ ।",
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| "text": "गृहस्थान्तर्गतो विष्णुर्यज्ञैर्देवाश्रयो भवेत् ।",
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| "text": "स्वाध्याये ऋषिसंस्मृत्या ऋषीणां च सदाश्रयः ॥",
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| "text": "स्वाध्यायाच्छ्राद्धतश्चैव पितॄणामन्नदानतः ।",
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| "text": "मनुष्यादेरतो वेत्ति य एवं सततं गृही ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वस्यान्तर्यामिणं विष्णुं सुरादीन् पूजयेत् तथा ।",
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| "text": "तस्याविनाशमिच्छन्ति स्वाश्रयस्य यथा सुराः ॥",
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| "text": "तदेतत् सर्वशास्त्रेषु ऋषिसङ्घैर्विचारितम् ॥ इति नारायणश्रुतौ ।",
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| "text": "नराणां च सुराणां च गतिरेको जनार्दनः ॥ इति च ।",
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| "text": "इति सोऽपि न तान् प्राप ततोऽपूर्णत्वमात्मनः ।",
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| "text": "मत्वा पूर्णत्वसिद्ध्यर्थं भार्यां वाचमकल्पयत् ॥",
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| "text": "प्राणं पुत्रं तथा वित्तं चक्षुर्बाह्यमथान्तरम् ।",
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| "text": "ज्ञानाख्यं श्रोत्रमेवासौ कर्म स्वात्मानमेव तु ॥",
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| "text": "एवं स मानसे यज्ञे त्वयजत् केशवं विभुम् ।",
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| {
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| "text": "ततोऽस्य वाचः सम्भूता भार्या तस्य सरस्वती ॥",
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| "text": "पुत्रः प्राणादभूर्द्वायुर्दिशो लोका हिरण्मयाः ।",
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| "text": "तस्यापरोक्षतां यातो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥",
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| "text": "सर्वविद्या ददौ ताश्च श्रोत्रेण जगृहे विभुः ।",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति । तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाऽग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वाऽनुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "text": "तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदपपुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "text": "कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति । पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यो वैतामक्षितिं वेदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात् क्षीयेत ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "mantra",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनात्त्येतत् स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S06_V09",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "text": "त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीभीरित्येतत् सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि नः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वाऽयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C01_S06_V_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "सप्तान्नानि यदा विष्णुः परमः पुरुषो विभुः ।",
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| |
| },
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| {
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| "text": "ससर्ज तेषां स्वार्थानि चकार त्रीणि केशवः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मनो वाचं तथा प्राणं तस्मात् तैस्तुष्टिमेति सः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "तस्मात् तद्भक्तिकामः स्यात् सङ्कल्पं तत्कृतिं प्रति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कुर्यात् तद्वेदनेच्छां च श्रद्धां तस्य गुणोन्नतौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्रद्धामन्यसाम्ये वाऽप्यन्येषामुन्नतौ ततः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषां तत्स्वरूपत्वे प्राकृतत्वादिकेऽस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "धृतिं तन्निन्दिवागादौ प्राप्ते तत्रैव चाधृतिम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तन्मतस्य विसर्गार्थे ह्रियं तद्भक्तिवर्जने ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्विवेके धियं चैव तदज्ञाने भियं तथा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वाचं नित्यं तद्गुणोक्तौ प्राणं तत्कर्मणि स्फुटम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तदन्यकर्मसन्त्यागे चापानं व्यानमस्य च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विरोधिनां निरासित्वेऽथोदानं योगधारणे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोवागादीन्द्रियाणां समानं नियमेऽत्र तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नमुक्तेषु सुस्थैर्ये नरः कुर्यात् सदैव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनेकगोचरेच्छा स्यात् काम एकाश्रये स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणः प्रवृत्तिहेतुः स्यादपानस्तु निवर्तने ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बलकर्मा तथा व्यान उदानो योगकर्मकृत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहेन्द्रियमनोनेता समानो नः स्थितिप्रदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोवाक्प्राणसान्निध्यप्राधान्याज्जीव उन्नतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोवाक्प्राणरूपोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोवाक्प्राणतस्तस्य जाता अन्येऽभिमानिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा सरस्वती वायुर्मनआद्यभिमानिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वस्यान्तः स्थितं विष्णुमायत्ता वाग्घि नः सदा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्ववाचश्च घोषाश्च विष्णोर्नामेति कीर्तिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तज्ज्ञानां तत्फलं च स्यादज्ञानां तत्फलं न तु ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वेन्द्रियगतं ज्ञानं मनआयत्तमीरितम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पृष्टे स्पृष्टोऽप्यनेनाहं स्पृष्ट इत्येव वेत्त्यतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मनस्यव्याकुलेऽन्यत्र नैव वेत्ति कथञ्चन ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| "text": "त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ १० ॥",
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| "text": "त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥११॥",
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| "text": "देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवाः मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ १२ ॥",
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| "text": "विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्धि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १४ ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| "text": "यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १६ ॥",
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| "text": "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ १७ ॥",
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| "text": "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १८ ॥",
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| "id": "BR_C01_S06_V19",
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| "text": "अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समास्सर्वेऽनन्तास्स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्ते अनन्तं स लोकं जयति ॥ १९ ॥",
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| "text": "सोऽमावास्यां यतो रात्रौ प्राणभृत्सु व्यवस्थितः ॥",
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| "text": "तदेवमन्त्रयुक्तत्वाद् बलिहोमात्मना द्वयम् ॥",
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| "text": "देवानां प्रददौ विष्णुस्तस्मान्नैवेच्छया यजेत् ।",
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| "text": "यदीच्छया यजेत् तेषामपहर्ता भविष्यति ॥",
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| "text": "देवस्वं तेन येनैव काम्यार्थं विनियोजितम् ।",
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| "text": "चतुष्पाद्भ्यो द्विपद्भ्यश्च पशुभ्यः पयआत्मकम् ।",
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| "text": "संवत्सरं गोपयसा येन होमो हरेः कृतः ॥",
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| "text": "भगवद्दृष्टिपूतस्तु विना होमेन मुच्यते ।",
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| "text": "सप्तान्नसृष्टितत्त्वज्ञस्त्वेकहोमेन मुच्यते ॥",
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| "text": "विशेषज्ञो यतः सोऽयं भगवत्तत्त्ववेदने ।",
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| "text": "को नाम भगवान् विष्णुः परमानन्दरूपतः ॥",
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| "text": "प्राणिनां कर्मभिश्चैव स्वेच्छया च पुनः पुनः ।",
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| "text": "सप्तान्नं सृजते यस्मादन्नानामक्षयस्ततः ॥",
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| "text": "तस्मादक्षितिनामासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
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| "id": "BR_C01_S06_V26",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| |
| "text": "दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ २६ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| {
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| "text": "अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स य एवंवित् सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "पृथिव्यादिस्थिता देवाः सरस्वत्यादिकास्त्रयः ॥",
| |
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| |
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| {
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| |
| "text": "अधिकावेशतो देवेष्वतो देवा इति स्मृताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदावेशात् सर्वमुक्तं सत्यं देवी तु वाघ्धि सा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदावेशान्न दुःखी स्यादानन्दी दैवतं मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "यदावेशात् सर्वकार्येष्वम्लानः प्राण एव सः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वसामर्थ्ययुक्तः स्यान्न म्रियेत कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सप्तान्नविन्मुक्तस्त्रिभिराविष्ट एव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेषु व्याप्तिमन्वेति न दुःखी प्राणिषु स्थितेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सप्तान्नोपासनायोग्या देवा एकान्ततो हि यत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवांश्च पापं नाप्नोति तस्मात् पापं न तस्य तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवा मनुष्यतामंशैराप्ता ये पुत्रतः फलम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्यात् तेषामेव चामुक्तेर्मुक्तानां न तु किञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तानां देववागादेरावेशः सम्प्रकीर्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणज्ञानं यथाऽवन्ति रहस्यमिति सर्वदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं मुक्तस्वरूपं चाप्यवन्त्येव रहस्यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C01_S06_V28",
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| "type": "mantra",
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| {
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| "text": "अथातो व्रतमीमांसा । प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे । तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वदिष्याम्येवाहमिति वाग् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "दध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत् तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्धत्तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिरेऽयं वै नः श्रेष्ठो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवं स्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद । य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C01_S06_V29",
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| "children": [
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| "text": "अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतं स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुर्म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुस्सैषा नास्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथैष श्लोको भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति । प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति । यद्वा एतेऽमुं ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादेकमेव व्रतं चरेत् प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्युच्चरेत् समापिपयिषेत् तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ॥ ३० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C01_S06_V30"
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C01_S06_V30_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "उत्तमः सर्वदेवेषु प्राण एव हरेरनु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चतुर्मुखस्य प्राणस्य न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् विष्णोर्व्रतस्यानु नित्यं प्राणव्रतं चरेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हंसोपास्तिः श्वासरूपे तयोर्व्रतमुदीरितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हंसरूपी हि तौ देवौ श्वसोच्छ्वासप्रवर्तकौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् प्राण्यादपान्याच्च सद्रूपं संस्मरन् सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्यस्योपासनं कुर्यात् तद्भृत्यत्वं विना क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रियाणि ससर्जादौ वासुदेवः प्रजापतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अध्यात्ममिन्द्रियाण्याहुरधिदैवं तु देवताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अध्यात्ममग्निर्वाङ्ग्नामा चक्षुरादित्य उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं तु चन्द्रमा नाम मनः स्थूलं तु वासवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येन यज्ञादिकं कुर्याच्छेषरुद्रविपास्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनः सूक्ष्मं ज्ञानयोग्यं शेषो व्याख्यानगोचरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रस्तु मननाख्यं च गरुडो ध्यानगोचरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुः प्राण इति प्रोक्तो येन सर्वं नियम्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एते भगवत्सृष्टा व्यूदिरेऽध्यात्मसंस्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिदैवे ज्वलत्कर्मा वह्निः सूर्यस्तु तापकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोमः कान्तौ वृष्टिकर्मा वासवः शेष एव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चरात्रप्रवृत्तीशो रुद्रस्तत्स्थक्रियापरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वप्रवर्तको वायुर्ज्ञानमोक्षप्रदस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदप्रवृत्तिकृद्धीन्द्रस्तेऽधिदैवे च पस्पृधुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं श्रेयानहं श्रेयानिति तानब्रवीद्धरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वकर्म यस्त्वविश्रान्तं कुर्याच्छ्रेयान् स वः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति श्रुत्वा ततश्चक्रुः कर्म स्वं स्वमनारतम् ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानेताञ्छ्रमरूपेण प्राप ब्रह्मा प्रजापतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रान्ताः स्वं भगवत्कर्म न शेकुः सर्वदेवताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुं तु समशक्तित्वान्नाप ब्रह्मा प्रजापतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनासौ भगवत्कर्म सर्वं च कृतवान् सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रमात् पापात्मको मृत्युर्भगवत्कर्मवर्जनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यान् देवानवापाशु नैव वायुं कदाचन ॥॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते वायुं ज्ञानमैच्छन्त श्रेष्ठोऽयमिति निश्चिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं ज्ञात्वा तेन चाविष्टास्तद्भृत्यत्वमुपागताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् प्राणाश्च मरुत इत्येषां नाम संस्थितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायोर्देवा हि जायन्ते लयमेष्यन्ति तत्र च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मान्नित्यं तद्व्रताश्च तद्व्रतोऽतो भवेत् सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यदेवव्रतारम्भं यदि कुर्यात् समापयेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| |
| "text": "तेनासौ वायुना साकं भगवन्तमुपेष्यति ॥ इति नारायणश्रुतौ ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| |
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| "text": "आनन्द्येव भवति । न शोचतीत्यतो मुक्त इत्यवगम्यते ॥",
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| "tail": "\t\t\t\t\t\t\t॥ इति सप्तान्नब्राह्मणम् ॥ ३६ ॥"
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| }
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| |
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| |
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामेतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥",
| |
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| {
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| "text": "अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्माऽऽत्मैकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥",
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| "text": "॥ इति त्रयब्राह्मणम् ॥",
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि तृतीयोऽध्यायः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥",
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| "text": "रूपं तु तत्सुतो रुद्रो वशे प्राणस्य तद्द्वयम् ॥",
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| "text": "सत्य इत्युच्यते नित्यं स्वरूपेणामृतः स्मृतः ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाच । अजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा बृहत्पाण्डुरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्तेऽहरहः सुतः प्रसूतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| {
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ आकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात् प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥",
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| }
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥",
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| "text": " स्वयमेवापराजितबहुरूपत्वादपराजिता सेना भगवान् । जिष्णुरुत्तमः । अन्येषां जेता अन्यतस्त्यजायी ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ अग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S01_V09",
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वांस्तानतिरोचते ॥९॥",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा असुरीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात् प्राणो जहाति ॥ १० ॥",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BR_C02_S01_V12",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥",
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| {
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| |
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| "children": [
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| "id": "BR_C02_S01_V13_B01"
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| |
| "text": " आत्मनि हिरण्यगर्भे । आत्मन्वी चित्तवान् । चित्ताभिमानित्वात् तस्य ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| |
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| "attrs": {
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| |
| },
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति, नैतावता विदितं भवतीति । स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "id": "BR_C02_S01_V14_B01"
| |
| },
| |
| "text": " स्वहृदि स्थितं स्वनियामकं भगद्रूपमुपास्यैव मोक्षो भवति । देवतासु भगवन्तमुपास्य तत्तद्देवतासमीपं प्राप्य पुनः स्वहृदिस्थमुपास्यैव मोक्षो भवतीत्यतो नैतावता विदितं भवतीत्युक्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| |
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| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं वै तद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद् ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञापयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन्पाण्डुरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V15_B01"
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| |
| "text": " स्वहृदिस्थभगवद्रूपस्य स्वस्मिन् विशेषसम्बन्धज्ञापनार्थं बृहत्पाण्डुरवास इत्याद्यामन्त्रणम् । तेभ्यो नामभ्योऽप्यस्य शरीरे विशेषसम्बन्ध इत्यतः पाणिपेषणेन जीवमुत्थापयामास भगवान् । येषां बहिरुपासनेन मोक्षस्तेषामपि ह्रद्युपासनं किञ्चित् कर्तव्यमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "text": "स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाऽभूत्स, कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S01_V17",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| "text": "स होवाच । अजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् , य एष विज्ञानमयः पुरुषस् तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते तानि यदा गृह्णाति अथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C02_S01_V17_B01"
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| },
| |
| "text": " स्वहृदिस्थेन भगवद्रूपेण विशेषसम्बन्धदर्शनार्थमेव यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदित्यादि प्रश्नप्रतिवचनं समस्तम् । यत्र यस्मिन् परमेश्वरे विज्ञानमये एष जीवः सुप्तोऽभूत् । यत्रेत्यधिकरणभूत एव य एष विज्ञानमय इति परामृश्यते । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद इत्यादिश्रुतेः । तानि यदा परमात्मा गृह्णाति तदैतत्पुरुषो जीवः स्वपिति नाम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स यत्रैत् स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जनपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V18_B01"
| |
| },
| |
| "text": " स यत्र परमात्मा स्वप्नया नाड्या चरति तदा जीवः उच्चावचं निर्गच्छतीव । सर्वदा महाराजवत् प्राणान् गृहीत्वा परमात्मा परिवर्तते । जीवस्तु कदाचिदेव स्वप्ने राजवदात्मानं पश्यति कदाचिद्ब्राह्मणवच्छ्वमार्जरादिवद् वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V19",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदा सुषुप्तो भवति तदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥१९॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C02_S01_V19"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V19_B01"
| |
| },
| |
| "text": " आनन्दस्य परमात्मनोऽतिघ्नीं समीपम् । कुमारो रुद्रः । महाराजो वायुः । महाब्राह्मणो ब्रह्मा । न हि जीवो विज्ञानपूर्वकं प्राणानां विज्ञानमादत्ते । न च सर्वप्राणलोकदेवभूतानां स्रष्टा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V20",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाऽग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "॥ इति अजातशत्रुब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति अजातशत्रुब्राह्मणम् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C02_S01_V20"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S01_V20_B01"
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "आदित्यचन्द्रविद्युत्सु भूतेष्वादर्श एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गच्छत्पाश्चात्यशब्देन चक्षुश्छायागतं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हिरण्यगर्भसंस्थं च सदोपास्य हरिं परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्देवसार्ष्णितामेत्य हृद्युपास्य हरिं पुनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तिमेत्यथ यो बाह्यान् मुक्तिमेष्यति सोऽपि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदि किञ्चिदुपास्यैव विष्णुं मुक्तिमनुव्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यानि सूर्यादिनामानि विष्णोस्तानि न संशयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदुक्तान्येव सूर्यादिराकृष्यैवोपचारतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषेण तु सम्बन्धो यतः स्वहृदि संस्थिते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवस्यातो न सोमादिनाम्नाऽऽहूतो हरिः परः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवं च वारयेत् तत्र यदा विष्णुः सनातनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नं पश्यति जीवोऽयं यदा विज्ञानरूपिणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुषुम्नासंस्थितं विष्णुमेति तत्सुप्तिमेष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्यग्ज्ञानमयाद्विष्णोरुत्थानं चाप्ययं व्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणानां चैव लोकानां देवानां प्राणिनामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यसत्यो हरिः स्रष्टा पाता विलयकृत् तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियन्ता मोक्षदश्चैव विष्णुरेव सनातनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति नारायणश्रुतौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S02",
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| "type": "brahmanam",
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| "name": "शिशुब्राह्मणम्",
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| "title": ""
| |
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "शिशुब्राह्मणम्",
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| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "text": "यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमे वाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणा अन्नं दाम ॥१॥",
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| }
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| |
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| "id": "BR_C02_S02_V01_B01"
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| "text": " आधानमवस्थानं सूक्ष्मशरीरम् । प्रत्याधानं विधानं स्थूलशरीरम् । प्राणो नारायणः स्थूणा ।",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C02_S02_V01_B01"
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| "children": [
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| "text": "अन्नं दामात्मकं तस्य स्थूणा तु भगवान् हरिः ।",
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| "text": "ध्यायत्येवं हि यो वायुं श्रोत्रादीन् मनसा सह ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "बुद्धिं च सप्तशत्रून् स विषयेष्वभिधावतः ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
| |
| "text": "असुरान् सन्निरुध्यैव वेत्ति नारायणं परम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| |
| },
| |
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| "text": "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनिका तयाऽदित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "दक्षिणाक्षिस्थितं वायुं सप्तदेवा उपासते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "अक्षीणज्ञानमनसः सदाशिवापुरःसराः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उपास्यमानं तैर्देवैर्मोक्षार्थे वायुमीश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्थूणया विष्णुना सार्धं यो विद्यात् सोऽन्नमश्नुते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अक्षीणमेव मुक्तः सन् सर्वदुःखविवर्जितः ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C02_S02_V03",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "तदेष श्लोको भवति अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहतं विश्वरूपं तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपमिति । प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेव तदाह तस्याऽऽसत ऋषयः सप्त तीरे इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी संवित्ता ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वायुश्च संस्थिता नित्यं सर्वेषां दक्षिणाक्षिगाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "पूर्णत्वाद्विश्वतो विष्णो रमायाः स्त्रीषु पूर्णतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वायोर्जीवेषु पूर्णत्वाद्यशोज्ञानसुखात्मकाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्राणाश्चैते प्रणेतृत्वात् ऋषयो रुद्रपूर्वकाः ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C02_S02_V04",
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| "text": "इमावेव गौतमभरद्वाजावयमेव गौतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठ कश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचो ह्यन्नमद्यतेऽत्रिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥",
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| "text": "॥ इति शिशुब्राह्मणम् ॥",
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| "children": [
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| {
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| {
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| "text": "भरद्वाजस्तु पर्जन्यो वाजमन्नं भरेद्यतः ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "text": "वृष्ट्यैव विश्वामित्रख्य आदित्यो यत्प्रकाशनात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विश्वं विज्ञापयन्नित्यमग्निस्तु जमदग्निकः ॥",
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| |
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| {
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| "text": "जातं मितं चात्ति यस्माद्वसिष्ठाख्यस्तु वासवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वसतामुत्तमो यस्मात् पृथ्वी कश्यपनामिका ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मेघवृष्टं पिबेद्यत्कं शयानैव हि सा सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यौरत्रिरिति सम्प्रोक्ता तत्स्थैर्हि हुतमद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रदिङ्ग्नासिकाबाहुदक्षिणाक्षिषु संस्थिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वितीयेन तु रूपेण देवा एते शिवादयः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेषां तु नामानि वेत्ति यः सर्वभुग्भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उपास्ते वायुमेवैकं सस्थूणं ब्रह्मवेदिना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मनामा सदा वायुरेनां वेत्ति विशेषतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति तां वेद यो विद्वान् सर्वात्ता स भविष्यति ॥ इति नारायणीये ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति शिशुब्राह्मणम् ॥ ४२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S03",
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| "text": "मूर्तामूर्तब्राह्मणम्",
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| |
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| "children": [
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| "text": "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे । मूर्तं चैवामूर्तं च, मर्त्यं चामृतं, स्थितं च यच्च, सच्च त्यञ्च ॥ १ ॥",
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| "id": "BR_C02_S03_V01_B01"
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| "text": " विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत् स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥",
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| |
| "id": "BR_C02_S03_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": " प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते ।",
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| }
| |
| ],
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद् यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
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| "id": "bhashya-BR_C02_S03_V03"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| |
| "id": "BR_C02_S03_V03_B01"
| |
| },
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| "text": " मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S03_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "अथाध्यात्मम् इदमेव मूर्तं यदन्यत् प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C02_S03_V05",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "tag": "line",
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| "text": "अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥",
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| "text": " एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च ।",
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "एतस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तं सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत् परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥ ४३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C02_S03_V06"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S03_V06_B01"
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| },
| |
| "text": " तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S03_V06_B01"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूर्तामूर्तमिदं रूपं ब्रह्मणः प्रतिमात्मकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैतत्स्वरूपमेतत् स्यात् तद्धि सर्वपरं सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रियो वायोर्विरिञ्चाच्च येऽन्ये मूर्ता हि ते स्मृताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूरं पापं हि तेनाप्तं मूर्तमित्यभिधीयते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशीर्णं चावसन्नं च तदेवातः सदुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पराधीनगतित्वाच्च स्थितमित्यभिधीयते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य सारो विरिञ्चस्तु तद्विरुद्धस्वभावकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूर्ताद्विरुद्धरूपत्वाच्छ्रीर्वायुश्चाप्यमूर्तकौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वज्ञौ च ततौ चैव नियतो हरिणैव तौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तयोः सारस्तु भगवान् हरिर्नारायणः परः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यमण्डले चैव चक्षुष्वपि च सुस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्रैव संस्थितो ब्रह्मा मूर्तसारोऽपि तस्य च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुरेव परः सारस्तस्य रूपाण्यनेकधा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महारजनवासोवत् पाण्ड्वाविकवदेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्युत्पद्मेन्द्रगोपादिवह्निवत् सुखभास्वरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैवासौ मूर्तवद्विष्णुर्न च मूर्तरसोपमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चामूर्तोपमो देवः स एव परमः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्यान्यदपरं सर्वं सत्यसत्यः स एकराट् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूर्तामूर्तात्मकाः प्राणास्तेषां सत्यः स एव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति नारायणश्रुतौ ।",
| |
| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S03_V06_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रथमनिषेधेनैव मूर्तरससादृश्यमपि निषिद्धम् ॥",
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| "tail": "\t\t\t\t\t\t"
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04",
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| "type": "brahmanam",
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| "name": "मैत्रेयीब्राह्मणम्",
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "मैत्रेयीब्राह्मणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| "tag": "line",
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| "text": "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V02",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V03",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V04",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा ओ अरेक्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C02_S04_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": " आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C02_S04_V06"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": " अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C02_S04_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V09_B01"
| |
| },
| |
| "text": " दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S04_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "id": "BR_C02_S04_V11",
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| {
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| "text": "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥",
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| |
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| "text": " तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| |
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| {
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| "text": "स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": " एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| |
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| "text": "स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S04_V14",
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| "type": "mantra",
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| "text": "यत्र हि द्वैतमिव भवति ।",
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| "text": "तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तदितर इतरं शृणोति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तदितर इतरमभिवदति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "तदितर इतरं मनुते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदितर इतरं विजानाति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केन कं पश्येत् केन कं शृणुयात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं मन्वीत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं केन विजानीयाद् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "॥ इति मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ",
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| "text": " मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः ।",
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| |
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| {
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| "text": " मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ॥ इति च ।\t",
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| {
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| "text": "नानात्वेनाभिसम्बन्धास्तदा तत्कालभाविना ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आनन्देन विना चैव भोगेन विषयेण च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या आधिपत्येन चैव हि ॥ इति वायुप्रोक्ते ।",
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| "tail": "\n "
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| |
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| {
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| "text": "इवशब्दस्त्वस्वातन्त्र्यार्थे । न हि तदधीनं पृथगित्येवोच्यते । तस्मादमुक्तैर्न ज्ञायते इति सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पतिर्जाया प्रिया नैव स्वेच्छया तु भविष्यति ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विष्णोरिच्छाबलेनैव स्वयं च स्वप्रियो भवेत् ॥",
| |
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| |
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| {
| |
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| |
| "text": "विष्णोरिच्छावशेनैव हन्ति ह्यात्मानमात्मना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वात्मानमप्रियं कृत्वा निरये पातयत्यपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राधान्येन हरेर्ज्ञानात् सर्वं विदितवद्भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मजात्यात्मकं वेत्ति नैव विष्णुवशं हि यः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्माणं तं ततो ब्रह्मा पातयेत् तमसि ध्रुवम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं क्षत्रात्मको वायुर्वित्तरूपश्च वित्तपः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चभूतानि विश्वे च देवा लोकाभिमानिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाभिमानिनो देवी मूलप्रकृतिरेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वं विष्णौ स्थितं विष्णोर्जातं विष्णोर्वशे सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शङ्खशब्दो यथा शङ्खदेवतावशगः स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्वेदाः समुत्पन्ना विद्याख्या मूलिका श्रुतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वोपनिषदश्चैव पञ्चरात्राख्यसंहिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मसूत्राणि वेदानां व्याख्यास्तासां च विस्तरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वमेतज्जगच्चैव निःसृतं तुरगाननात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वरुणस्य वशे यद्वदाप एवं वशे हरेः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे बद्धाश्च मुक्ताश्च तारतम्यात्मना स्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि मुक्तस्य विज्ञानं गन्धादिविषये न चेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तथैव भगवद्रूपे स्वरूपे च परस्परम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवमज्ञानरूपां तां मुक्तिं को नाम वाञ्छति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्माद्विष्णोर्वशे सर्वे यथेष्टमुपभोगिनः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मुक्ताः सदा तारतम्यात् तिष्ठन्त्याब्रह्मणोऽखिलाः ॥ इति हयग्रीवसंहितायाम् ।",
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| |
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| {
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| "children": [
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| "text": "सर्गे सर्गे तु यो नैव शब्दतोऽप्यन्यथा भवेत् ।",
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| |
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| |
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| "text": "श्रुत्याख्यः स तु विज्ञेय इतिहासादिरर्थतः ॥",
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| |
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| "text": "भगवद्दृष्टमेवान्यैर्ब्रह्माद्यैर्दृश्यते यदि ।",
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| "text": "ऋषिभेदस्तु तत्र स्याद्वेदो नाविष्णुनिर्गतः ॥",
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| "text": "वेद इत्येव विष्णूक्तस्तपसा दृश्यते परैः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥",
| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ६ ॥",
| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "text": "अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S05_V09",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
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| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C02_S05_V10",
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| "text": "अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥",
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| |
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| "id": "BR_C02_S05_V11",
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| "tag": "line",
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| "text": "अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ११ ॥",
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| |
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| "id": "BR_C02_S05_V12",
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| "text": "इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "tag": "line",
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| "text": "इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| |
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| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "अयं आत्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं आत्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S05_V15",
| |
| "type": "mantra",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S05_V16",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S05_V17",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "children": [
| |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दध्यङ् ह वा मधु प्रवोचदृतायं त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| |
| "type": "mantra",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "दपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरि शयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
| "id": "BR_C02_S05_V19",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति मधुब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C02_S05_V19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S05_V19_B01"
| |
| },
| |
| "text": " भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे । ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C02_S05_V19_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सुखदा सर्वभूतानां पृथ्वी मधुवदुच्यते ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिव्याश्चैव भूतानि तथा सर्वाश्च देवताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिव्यादिषु देवेषु शरीरादिषु च स्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक एव परो विष्णुर्हयशीर्षस्वरूपधृक् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्ततेजा नित्यश्च स एव ब्रह्म सर्वगम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेव गुणपूर्णत्वाद् ब्रह्म सर्वमनूनतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मनामा परो विष्णुः सर्वगो यः प्रकीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव हयशीर्षाख्यस्त्वधिदैवादिषु स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अराणामाश्रयो यद्वद् बहिरन्तः प्रतिष्ठितौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाभिनेमी तथा विष्णुर्जीवानामाश्रयः स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव दशधा प्रोक्तो विष्णुर्मत्स्यादिरूपकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शतं नारायणाद्यात्मा विश्वाद्यात्मा सहस्रकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "परादिरूपो बहुधा सोऽनन्तात्माऽजितादिकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "भूताख्यः सर्वजीवानां विरिञ्चानां च सर्वशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मनाम्नां स एवैको राजाधिपतिरेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वामित्वाद्राजशब्दोऽयमाधिक्यात् पालनात् तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिपश्चेति सम्प्रोक्तः पुरुषः पुरुषस्थितेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुराख्येष्वेव देहेषु हृत्पुर्यपि वसत्यसौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानेन किञ्चिदव्याप्तं नानेनाच्छादितं न च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "नैवास्मात् पूर्वकं किञ्चिन्नैवास्मादपरं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वस्माद् बाह्यतश्चासौ सर्वस्मादन्तरस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्याप्तेरात्मेति सप्रोक्तो ब्रह्मेति गुणपूर्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स सर्वस्यापरोक्षज्ञ इति वेदानुशासनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विरिञ्चस्त्वात्मशब्दोक्तो मानुषं मनुरुच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यं च स्तनयित्नुश्च वायो रूपान्तरे स्मृते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एत एव स्वरे सत्ये जीवे चाध्यात्मसंस्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां नियामको विष्णुस्तत्र तत्रैव संस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "जीवे स्थितस्त्वात्मनामा सौवरः स्वरगः स्मृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सत्यगः सात्यनामासौ धर्मगो धार्म एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोः स्वायम्भुवस्याख्या मानुषेत्येव देहिषु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहिश्च तद्गतो विष्णुर्मानुषेत्येव कीर्त्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रातिश्रुत्क इति श्रोत्रे तैजसो विद्युति स्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इति नानाविधैर्नामसमूहैर्विष्णुरिज्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामेतां विद्यामदात् पुरा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "हयग्रीवब्रह्मविद्येत्येषा ब्रह्मादिभिर्धृता ॥ इति ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": " प्रत्यैरयतं प्रतिसमधत्तम् । ऋतायन् सत्यं कुर्वन् । कक्ष्यं नारायणकवचम् । त्वाष्ट्रं त्वष्टुः पुत्रेण विश्वरूपेणेन्द्रायोक्तम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति मधुब्राह्मणम् ॥ ",
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| "text": "पौतिमाष्यो गौपवनात्।",
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| "text": "गौपवनः कौशिकात् ।",
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| "text": "अनभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमात् ।",
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| "text": "सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् ।",
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| "text": "पाराशर्यो भारद्वाजात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च ।",
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| |
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| {
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| "text": "गौतमो भारद्वाजात्।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "भारद्वाजः पाराशर्यात्, ।",
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| |
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| {
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| "text": "पाराशर्यो बैजवापायनाद् बैजवापायनः ।",
| |
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| |
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| "text": "कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २ ॥",
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| "text": "पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणः ।",
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| "text": "पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् जातूकर्ण्यः ।",
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| |
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| "text": "आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "औपबन्धनेरौपबन्धनिः ।",
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| "text": "आसुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाज",
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| "text": "आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः।",
| |
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| |
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| "text": "माण्टिर्गौतमात् ।",
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| },
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| {
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| "text": "गौतमो वात्स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "वात्स्यः शाण्डिल्यात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "शाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कुमारहारितो गालवात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गालवो विदर्भीकौण्डिन्यात् ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात्, ।",
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| |
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| {
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| "text": "वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः ।",
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| "text": "सौभरो अयास्यात् आङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् ।",
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| "text": "आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् ।",
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| "text": "विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्याम् ।",
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| "text": "दध्यङ् आथर्वणोथर्वणो दैवाद्।",
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| "text": "अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् ।",
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| "text": "मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्।",
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| |
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| "text": "प्रध्वंसन एकऋषेः ।",
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| "text": "एकऋषिर्विप्रचित्तेः ।",
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| "text": "सनातनः सनकात् ।",
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| "text": "सनकः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो।",
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| "text": "ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥",
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| "text": "॥ इति वंशब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥",
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| "text": "जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानां अनूचानतमः इति स ह गवां सहस्रमवरुरोध दश दश पादाः एकैकस्याः शृंगयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥",
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| "text": "तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सौम्योदज सामश्रवा३ इति ता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होता आश्वलो बभूव । सहैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्युनाऽऽप्तं सर्वं मृत्युनाऽभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाऽग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ३ ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तं सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणार्त्विजा चक्षुषाऽऽदित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ४ ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं पूर्वपक्षमपरपक्षाभ्यामाप्तं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षायोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ५ ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥",
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| "text": "होतर्यग्नौ वाचि चैव यो विष्णुं मुक्तिदं स्मरेत् ।",
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| "text": "नित्यं स मुच्यतेऽध्वर्युसूर्यचक्षुष्षु यः स्मरेत् ॥",
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| "text": "अधिकः प्रकाश एवास्य मुक्तावन्येभ्यः इष्यते ।",
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| "text": "मुक्तेभ्योऽपि तथोद्गातृवायुप्राणेषु यः स्मरेत् ॥",
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| "text": "अप्रयत्नेन लोकं स विष्णोर्याति न संशयः ।",
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| "text": "होत्रग्न्यादीनि नामानि विष्णोः सर्वाणि मुख्यतः ॥",
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| "text": "तत्सम्बन्धात् तदन्येषां स वै होत्रादिकर्मकृत् ।",
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| "text": "तस्माद्धोत्राग्निवागादेरैक्यं श्रुतिषु चोच्यते ॥",
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| "text": "होत्रादिषु चतुर्ष्वेष वासुदेवादिरूपधृक् ।",
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| "text": "व्यवस्थितो हि तज्ज्ञानादचिरान्मुक्तिमेष्यति ॥",
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| "text": "मुक्तिनामा स भगवान् मोक्षदत्वात् प्रकीर्तितः ।",
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| "text": "मनुष्येभ्योऽधिकसुखं देवेभ्यो यत्प्रयच्छति ॥",
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| "text": "अतिमुक्तिप्रदा यस्माद्देवाद्यास्तासु योगिनः ॥",
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| "text": "सर्वप्राणभृतामीशः स भवेन्नात्र संशयः ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥",
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| "text": "अनन्तनामकं विष्णुमुपास्यापि ह्यनन्तकाः ॥",
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| "text": "मनुष्याणां ज्ञानमात्राद् गुणाधिक्यं भविष्यति ॥इति परमश्रुतौ ॥",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
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| |
| },
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V04",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V05",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V06",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V07",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V08",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V10",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V11",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S02_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इत्यार्तभागब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति आर्तभागब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S02_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": " आकाशं परमात्मानमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केचित्तु मानुषा मुक्तिमनुक्रम्यैव देहतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहपाते तु देहस्य दोषान् भुक्त्वैव सर्वशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मरणोच्छूनतादींस्तु स्वकीयारब्धकर्मजान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहे क्षीणे तु गच्छन्ति दृष्ट्वा विष्णुमनुज्ञया ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनरत्रैव तिष्ठन्ति नित्यानन्दैकभोगिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहादुत्क्रम्य देवास्तु यान्ति विष्णुं सनातनम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहादुत्क्रम्य यातानां देवा भागत एव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वाधिदैवं व्रजन्त्यद्धा भागतोऽनुव्रजन्ति तान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आकाशाख्यं स्वरूपं तु विष्णुस्तद्धृदि संस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भागतो भागतश्चैनाननुयाति जनार्दनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानस्थितेन रूपेण देवानां मुक्तिदो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुण्यस्थितेन रूपेण स्वर्गं निरयमन्यगः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रहस्यमेतद्देवानां विदुः कर्मेति मानुषाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मान्नैव जनेष्वेतद्विष्णोः कर्म प्रकाशयेत् ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": " अत एव याज्ञवल्क्यो न जनेषूवाच ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S02_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मनामा तु भगवान् फलकर्तृत्वतो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पातनात् पापनामासौ पुनातेः पुण्यनामवान् ॥ इति भारते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03",
| |
| "type": "brahmanam",
| |
| "name": "भुज्युब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "भुज्युब्राह्मणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्यक्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतंजलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति । तं यदा लोकानामन्तान् अपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S03_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": " पारीक्षिताः प्रद्युम्नाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिंद्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत् तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद् यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्मात् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति भुज्युब्राह्मणम् ॥ ५३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S03_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": " अश्वमेधयाजिन इंद्राः ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S03_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नः कामनामासौ पारीक्षित इतीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेक्षणात् परो विष्णुः परीक्षिदिति कीर्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्पुत्रत्वात् कामदेवः पारीक्षित इति स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शताश्वमेधयाजित्वादिंद्रा एवाश्वमेधिनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतीतानागतानां च कामानां वज्रिणामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकमेव हि मुक्तानां स्थानं वेदोदितं सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रनामा तु गरुडः सामर्थ्यादेव कथ्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "तस्य रूपद्वयं नित्यं सौपर्णं पौरुषं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "तत्र पौरुषरूपी सन् भूत्वा सौपर्णरूपवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "कामदेवानुपादाय मुक्तौ वायोः प्रयच्छति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "वायुस्तान् स्वशरीरस्थान् कृत्वेंद्रा यत्र मुक्तिगाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रद्युम्ननामके विष्णावेवं वायुर्हि मोक्षदः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सर्वोत्तमो वायुर्विविधं तु यदष्टकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानृषीन् पितॄन् यक्षान् गन्धर्वान् मानुषोरगान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "असुरांश्च वशे नित्यं नयत्यमितपौरुषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्पूर्णाश्च सुपर्णेशशेषेंद्रांस्तत्स्त्रियोऽपि च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अष्टौ नयत्युन्नयति वशीकृत्य स्वयं प्रभुः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अतो व्यष्टिः समष्टिश्च वायुरेवाभिधीयते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं व्यष्टिं समष्टिं च यो वायुं वेद तत्त्वतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्परं च हरिं नित्यं मुच्यते संसृतेः पुमान् ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इति परमसंहितायाम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": " चरकस्तीर्थसञ्चारी वित्तार्थी करकः स्मृतः इत्यभिधानम् ।\t",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "अहर्मुहूर्तं विज्ञेयमहर्मासोऽपि भण्यते ।",
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| {
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| "text": "अहर्दिनं प्रकाशश्च क्वचिज्ज्ञानं बलं तथा ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मुहूर्तमष्टभागोनघटिकाद्वयमिष्यते ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्वचिद्विघटिकापि स्यात् क्वचित् स्यात्तावदुत्तरः ॥ इति कालनिर्णये ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "द्वात्रिंशत्तु मुहूर्तानां दिनमेकं विदुर्बुधाः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "त्रिंशन्मुहूर्तमथवा मुहूर्तोन्मानभेदतः ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S03_V02_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सप्तकोटिं च लक्षाणां चतुर्दश च नित्यशः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अष्टाविंशत्सहस्रं च सप्तांशशतपञ्चकम् ॥ सौरो रथस्त्वहोरात्रात् परियाति दिवि स्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्त्रिभागाधिकं चक्रं मानसोत्तरगं चरेत् ॥",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नृणां कार्तयुगानां तु योजना मानतो भवेत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यावत्सूर्यरथो याति दिवारात्रेण पार्श्वयोः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सूर्यस्य तावदेव स्यात् प्रकाशः सर्वतस्तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तमोऽन्धं द्विगुणं तस्माद् काठिन्यात् पृथ्विनामकम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ततो मंडोदकं चापि द्विगुणं परिकीर्तितम् ।॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पञ्चाशत्कोटिविस्तारमेवमंडान्तमुच्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ततस्त्वंडं च सौवर्णं तद्भिन्नं हरिणा पुरा ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सुषिरं सर्वतो दिक्षु क्षुरधारासमं ततः ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सुपर्णो वायवे तेन मुक्तान् कामान् प्रयच्छति ॥ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "उषस्तब्राह्मणम्",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तर य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यः समानेन समानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥",
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| "text": " यत्साक्षादपरोक्षात् । साक्षादेवापरोक्षमत्ति अनुभवति स्वरूपमन्यच्च सर्वं पश्यतीति साक्षादपरोक्षात् । आपरोक्ष्येण पश्यतामप्यन्येषां भगवत्प्रसादादेव दर्शनं भवति । न भगवतोऽन्यापेक्षयेति साक्षादिति विशेषणम् । अनन्यापेक्षस्याप्यपूर्णत्वं भवतीत्यतो ब्रह्मेति । अन्येषां नियन्तृत्वं चास्तीत्यत आत्मा । अन्यनियन्तृत्वेप्यन्यापेक्षा नास्तीत्यतः सर्वान्तरः । सर्वं सामार्थ्यं स्वान्तरेवास्तीति । जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मेति । साक्षादपरोक्षत्वादिगुणैरेव भेदे सिद्धेऽपि परमार्थतोऽपि जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मा इति । तत्र प्रधानतात्पर्यज्ञापनार्थं पुनः पुनरभ्यासः ।\t\t\t\t\t\t",
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| "tail": "\n "
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| "id": "BR_C03_S04_V02",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीया न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति उषस्तब्राह्मणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति उषस्तब्राह्मणम् ॥ ५४ ॥",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S04_V02_B1"
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| "text": " देवतान्तरस्यापीदं लक्षणं समानमिति पृच्छति यथा विब्रूयादित्यादिना । चतुष्पात्वादिलक्षणं गोरश्वस्यापि यथा सममेवमेव साक्षादपरोक्षत्वादिलक्षणं तत्तद्देवतावादिभिस्तस्यास्तस्या अंगीक्रियत एव । अतो विशेषनाम वक्ति । अ इति । अतोऽन्यद्विष्णोरन्यदार्तम् । अ इति विष्णोर्हि नाम । न ते विष्णो परो मात्रया इत्यादि श्रुतिप्रसिद्धं विष्णोर्लक्षणम् न दृष्टेर्द्रष्टारमित्यादिना वक्ति ।",
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| "children": [
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| "text": "विनैवान्यप्रसादेन पूर्णसर्वगुणात्मकम् ।",
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| {
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| "text": "पश्यन्ननुभवत्येव स्वरूपं केशवः प्रभुः ॥",
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| {
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| "text": "पश्यत्यव्यवधानेन सर्वं चान्यज्जडाजडम् ।",
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| {
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| "text": "साक्षादेवापरोक्षात् स विष्णुरेव ततः स्मृतः ॥",
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| {
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| "text": "साक्षाच्छब्दः स्वतंत्रत्वमपरोक्षस्त्वनावृतिम् ।",
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| |
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| {
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| "text": "अदनं भोग उद्दिष्टस्तस्माद्विष्णुस्तथा स्मृतः ॥",
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| |
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| |
| {
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| "text": "ब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादात्मा सर्वनियन्तृतः ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "अनियम्यत्वतो नित्यं सर्वैः सर्वान्तरः स्मृतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणादिपञ्चरूपो यो वायुः सर्वनियामकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियन्ता परमो विष्णुर्वायोस्तस्यापि सर्वदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न मनोबुद्धिगोचरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अनन्तत्वान्महाविष्णुरवाच्योऽश्राव्य एव च ॥",
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| |
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| {
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| "text": "यद्यप्येते गुणाः सर्वे विष्णोरेव न चान्यगाः ।",
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| |
| },
| |
| {
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| "text": "तथाऽप्येतैर्गुणैर्युक्तानज्ञाः प्राहुः शिवादिकान् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अनाम्नैव ततो विष्णुमाहुर्वेदा अदोषतः ।",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "अदोषत्वाद्गुणोद्रेकाद इत्युक्तो हरिः स्वयम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अगम्यत्वाच्च बुध्यादेरतोऽन्ये सर्व एव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मरुद्रादयो जीवा दुःखिनस्तत्प्रसादतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "दुःखमुक्ता निजानन्दं प्राप्नुयुर्नित्यमंजसा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तानामपि सर्वेषां विष्णुरेव नियामकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पूर्णानन्दस्य तस्यैव मुक्ता विप्लुट्सुखात्मकाः ।",
| |
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| |
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| |
| {
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| "text": "तारतम्येन तिष्ठन्ति ब्रह्मा तेष्वधिकः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा चंद्रात् सदा भिन्नाः सर्वे तुहिनबिन्दवः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
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| "text": "एवं विष्णोः सदा भिन्ना मुक्ता ब्रह्मादिका गणाः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "एवं नियन्ता भगवान् पूर्णसर्वगुणार्णवः ।",
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| |
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| "text": "एक एव परो विष्णुरनियम्यः सदोदितः ॥ इत्यादि बृहच्छ्रुतिः ॥",
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BR_C03_S04_V02_B1"
| |
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| "text": "आर्तिर्दुःखं समुद्दिष्टमनार्तो विष्णुरव्ययः इति च ।",
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| |
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S04_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": "अतोऽन्यदार्तमित्येतस्माच्च जीवानां भेदः प्रसिद्धः । न हि जीवादन्यस्यार्तिर्युज्यते । अतो जीवेभ्योऽन्यश्च विष्णुरेव । तदन्ये ब्रह्मरुद्रादयः सर्वे जीवा एवेति सिद्धम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S04_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रकृतिस्त्वतिसामीप्यादनार्ताऽपि पृथंग् न तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उच्यते न स्त्रियो यद्वत् त्रयस्त्रिंशत्सु भेदिताः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाच । । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तमेव मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा । या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्मात् ब्राह्मणः पांडित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद् । बाल्यं च पांडित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तम् । ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति कहोलब्राह्मणम् ॥ ५५ ॥",
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| "text": " ये दव साक्षादिति पुनः प्रश्नो मुक्तानामपि भगवतो भेदोऽस्तीति ज्ञापयितुम् । यदेव ब्रह्म तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि यन्नैव भवन्ति कदाचन । तमेव मे व्याचक्ष्व मुक्तजीववैलक्षण्येन सहेति द्वितीय एव शब्दार्थः । स तु भगवान् स्वत एवातीताशनायादिरतीतानागतवर्तमानकालेषु ब्रह्मादयस्तु तं विदित्वा तत्प्रसादादेव पश्चादत्येष्यन्ति एतं वै तमित्येतादृशैर्गुणैः साक्षादपरोक्षत्वजीवभेदादिभिर्युक्तमित्यर्थः ",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "भिक्षाचर्यं चरन्ति मुक्ता अपि ब्रह्मादयस्तस्मादेव परमेश्वराद्विप्लुडानन्दमेव भिक्षन्तो वर्तन्ते । ब्रह्माणनान्मुक्ता एव ब्राह्मणशब्देनोच्यन्ते । न हि ज्ञानादनन्तरं सन्यासस्य कर्तव्यता । येषां तद्योग्यता तेषामपि ज्ञानार्थत्वेनैव सन्यासः । मुक्ता अपि यं भिक्षन्ते सोऽतिपरिपूर्णमहानन्दो भगवान् स्वत एव । तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि तत एव विप्लुडानन्दभिक्षुका इति विशेषः । तथापि तेषामेषणातीतत्वान्न दुःखम् । पुत्रस्य वित्तस्य च लोकार्थत्वात् लोकैषणायामन्तर्भावः । वित्तस्यापि प्रायः पुत्रार्थत्वात् पुत्रैषणायाम् । लोकैषणाया अपि दुःखरूपत्वात् सापि तेषां नास्त्येवेति दर्शयितुमुभे ह्येते एषणे एव भवत इत्याह । उभे अपि दृष्टादृष्टविषये एषणात्वाद् दुःखरूपे एवेत्यर्थः । पुत्रवित्तैषणे उभे अपि दृष्टविषयत्वादेकैवेत्युभे एवेत्युक्तम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "द्वितीयो ब्राह्मणो ब्रह्माणितुं योग्यः । पांडित्यमागमजज्ञानम् । बाल्यं युक्तिसहितम् । बलयुक्तत्वात् । मौनमुपासनाजम् । अमौनमपरोक्षजज्ञानम् । निर्विद्य नितरां प्राप्य लब्ध्वा । विदलृ लाभ इति धातोः । अथ ब्राह्मणो मुक्तो भवतीत्यर्थः । स मुक्तो येन केनापि वर्तयन्नीदृश एव भिक्षुक एव । न कदाचित् स्वतंत्रो भवति । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति च वक्ष्यति । मुक्तविषयं चैतत् । अत्र पिताऽपिता भवतीत्यादि तत्प्रस्तावे ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ओम् इति भगवद्वचनम् । तत्रैव मुक्तानामानन्दतारतम्यं चोक्तम् । स यो मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवति इत्यादिना । श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानां मुक्तेष्वेव मुख्यत्वात् । यश्च श्रोत्रिय इति ह्यभ्यासः । न ह्यमुक्ता अवृजिना अकामहता वा । न च श्रुतिफलं सम्यक्प्राप्ताः । श्रुतिफलप्राप्तिर्हि श्रोत्रियत्वम् । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः इति भागवते शरीरसम्बंधिनां मोहादियुतत्वम् । मोहदियुतानां न श्रोत्रियत्वमदुःखत्वमकामहतत्वं वा । वृजिनं व्रजनं दुःखं क्लेशो बाधेति चोच्यते इत्यभिधानम् । न च देवादिपदाकामानामिंद्रादिपदाकामानां कश्चिद्विशेषो दृश्यते । अतो मुक्तविषयमेवैतत् । ",
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| {
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| "text": "परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति",
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| "text": "ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।",
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| "text": "तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मुक्तानां परमागतिः कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादिवचनैश्च भगवदनुग्राह्यत्वं तदानन्दानवाप्तिश्च मुक्तानां दृश्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "children": [
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| "text": "बह्वभ्यासात् त आत्मेति मुक्तौ जीवेशयोर्भिदा ।",
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| {
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| "text": "प्रधानतत्परत्वेन दृश्यतेऽत्यादरात् सदा ॥",
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "महातात्पर्ययोगाच्च स एवार्थोऽवगम्यते ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तात्पर्यं परमं विष्णोरत्युद्रेके विशेषतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वश्रुतिस्मृतीनां च दृश्यतेऽन्यत् तदर्थतः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "स च जीवेशयोर्भेदे सर्वोद्रेको हि युज्यते ॥",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बह्वभ्यासस्त आत्मेति श्रुतावादरतस्ततः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ममात्मेति वचो यत्र विष्णोऽरपि च दृश्यते ॥",
| |
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "देहस्यापि स्वरूपत्वज्ञापनं तत्प्रयोजनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "न ह्यप्रयोजकं वेदपदं वर्णोऽथवा स्वरः ॥",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहस्वरूपता विष्णोर्न ममेति पदं विना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्यक् ज्ञापयितुं शक्या ततस्तत्पदमिष्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततस्त आत्मेति वचो भेदाभावे न युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "भिक्षया भक्षणं तस्मादानन्दस्य ततोऽवदत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मुक्तानामेकदेशत्वं ब्रह्मानन्दव्यपेक्षया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विप्लुट्त्वं प्रतिबिम्बत्वं श्रुतिषूक्तं हि सर्वशः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथापि पूर्णानन्दत्वममुक्तानां व्यपेक्षया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मादेस्तारतम्यं च मुक्तावेव सदातनम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दृष्टादृष्टेषणानाशान्निर्दुःखत्वं च सर्वदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परब्रह्मत्ववचनं मुक्तानां यत्र दृश्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवेषु ब्रह्मशब्दोक्तैः परत्वं तु विमुक्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्परब्रह्मता तेषां बद्धजीवोच्चता मता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततो ब्रह्माणने योग्यः पांडित्यं प्राप्नुयात् परम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पांडित्यमागमज्ञत्वं बाल्यं युक्तिसहायता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मौनं तूपासनासिद्धिरमौनं भगवद्दृशिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतान्याप्य भवेन्मुक्तिर्मुक्तो वै भिक्षुको भवेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न ह्यन्यभिक्षितं विष्णुर्दद्यान्नियमतः क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मुक्तस्य भिक्षितं सर्वं दद्यान्नियमतो हरिः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयोग्यभिक्षणं तेषां न कदाचित्तु युज्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येन केनापि नैतेषां भिक्षावृत्तिर्विनश्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्रथमो ब्राह्मणो मुक्तो द्वितीयो योग्य उच्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अपरोक्षविन्मुक्तयोस्तु तार्तीयेनोभयोर्ग्रहः ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अतो मुक्ता अमुक्ताश्च न स्वतंत्राः कदाचन ।",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्वतंत्रस्तु स एवैको भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "children": [
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| "text": "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ इत्यादिना च भेदेन महोत्कर्षे परमतात्पर्यं सर्वशाखाणामाह ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "brahmanam",
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| |
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| "text": "अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी प्रपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति, कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नुखलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु चंद्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति इंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु इंद्रलोकाः ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि माऽतिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "॥ इति गार्गिब्राह्मणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति गार्गिब्राह्मणम् ॥",
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| "id": "BR_C03_S06_V01_B1"
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| "text": "मुक्तानां तारतम्यं हि गार्गिब्राह्मणेनोच्यते । लोका इति मुक्तानामानन्दानुभवाः स्वरूपभूताः । अप्सु वायाविति स्वरूपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । अनतिप्रश्नां वै देवतामतिपृच्छसीति देवतास्वरूपप्रश्नस्यैवावगम्यमानत्वाच्च । न चोपरितनलोकेषु अधस्तनलोकाः आश्रिताः । न च वायुर्गन्धर्वलोकाश्रितः । वाय्वाश्रयत्वश्रुतेः सर्वलोकानाम् । वायुना हि सर्वे लोका नेनीयन्ते इत्यादिना । सप्तस्कन्धगतो लोकान् यो बिभर्ति महाबलः इति हरिवंशेषु । न चानतिप्रश्नत्वं लोकमात्रस्यास्ति । अधस्तनेषु चोपरितना लोकास्तिष्ठन्ति । न च मरुतामेकोऽपि गन्धर्वलोकादवरो विद्यते ।",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S06_V01_B1"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आ पिबन्त्यखिलान् भोगानित्यापश्चक्रवर्तिनः ।",
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| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तास्तेषां वायुसुतश्चक्रो नाम व्यपाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तस्तस्य च मुक्तस्तु मरुद्गन्धर्वनामवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुतो वायोस्तत्सुखानां मौक्तानामन्तरिक्षगः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मरुतामेक एवासावन्तरिक्षस्तु वायुजः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्सुखानां च मौक्तानामानन्दाः सूर्यरूपकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सौराणां चापि मौक्तानामानन्दाश्चंद्ररूपकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आह्लादनाच्चन्द्रनामा देवोऽसावनिरुद्धकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव चन्द्रमाविश्य स्थितश्तन्नामकोऽपि सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिरुद्धसुखानां च मौक्तानामिन्द्र आश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नक्षत्रनामवानिन्द्रो नैवान्यः क्षत्रियोऽस्य हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्यते त्रिषु लोकेषु ब्रह्माद्यास्तूर्ध्वलोकगाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आनन्दानां तथेंद्राणां मौक्तानां देव आश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवेति लिङ्गगनाम स्याल्लिङ्गात्मा रुद्र उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्राश्रयः शिवस्यापि सुखानां मुक्तिगामिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवो हीश्वरनामा स्यात् तत्पारम्यात् सरस्वती ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रेत्युक्ता तत्सुखानां ब्रह्माधिर्मुक्तिगामिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्सुखानां परं ब्रह्म मुक्तिगानां पराश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेव च संसारे बिम्बत्वादुत्तरोत्तरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न परब्रह्मणः कश्चिदाश्रयः स्वाश्रयं यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याश्रयोऽस्ति चेत्येवं पृच्छतोऽपि शिरः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिद्यते पर्वतैरन्धे तमसिस्थस्य दैवतैः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्ब्रह्म परं नित्यं ज्ञेयं पूर्णमनाश्रयम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S06_V01_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः ॥ इति भारते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S06_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": "अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च । संसाराल्लुप्तानां मुक्तानां कानि सुखानि लोकाः रोचमानानि कानि लोकाः । लीनं सुखं क इत्युक्तं कं नाम क्षीयतेऽत्र यत् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07",
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| "type": "brahmanam",
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| "name": "अन्तर्यामिब्राह्मणम्",
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| "title": ""
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "अन्तर्यामिब्राह्मणम्",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S07_V01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C03_S07_V01_B1"
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "पुनस्तस्यैव सर्वनियन्तृत्वमुच्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "योऽन्तरो यमयतीति द्वितीययशब्दो विष्णुशब्दपर्यायः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अकयप्रविसम्भूमसखहा विष्णुवाचकाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एकाक्षरा अ इत्येष निर्दोषत्वाज्जनार्दनः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आनन्दत्वात् क इत्युक्तः पूर्णत्वाद्य इतीर्यते । इत्यादि शब्दनिर्णये इति स्वप्रतिज्ञातप्रकारेण ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V01_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मवित्पूर्णविज्ञानाल्लोकानां कर्तृवेदनात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकविद्देवविच्चासौ देवानां देववेदनात् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदार्थवेदनाच्चैव वेदविद्भूतवित् तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तन्नियन्तृपरिज्ञानादात्मविच्चाप्तवेदनात् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्ववित् सर्वसारज्ञो यो वेद पुरुषोत्तमम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देशाधिष्ठातृविज्ञानाद् देशज्ञ इति चोच्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा तद्वद्धरेर्ज्ञानात् सर्वज्ञ इति वैदिकम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V02",
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| "type": "mantra",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥",
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| }
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्यूतं जगदिदं यस्मिन् सूत्रं वायुरसौ स्मृतः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तं चापि यमयेद्यस्मादन्तर्यामी हरिः स्मृतः ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥",
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| }
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| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| {
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| "text": "यः अन्तरिक्षे तिष्ठन्, अन्तरिक्षात् अन्तरो यं अन्तरिक्षं न वेद, यस्य अन्तरिक्षं शरीरं यः अन्तरिक्षमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "text": "यः वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुः न वेद, यस्य वायुः शरीरं यः वायुमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V08",
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| "text": "यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V09",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V10",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यः दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्यो अन्तरो यं दिशो न विदुः, यस्य दिशः शरीरं यः दिशोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "यः तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद, यस्य तमः शरीरं यः तमसोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यः प्राणे तिष्ठन् प्राणाद् अन्तरो यं प्राणो न वेद, यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V18",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यश्चक्षुषि तिष्ठंश्चक्षुषो अन्तरो यं चक्षुः न वेद, यस्य चक्षुः शरीरं यः चक्षुरन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V19",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यः श्रोत्रे तिष्ठन् श्रोत्रादन्तरो यं श्रोत्रं न वेद, यस्य श्रोत्रं शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S07_V20",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "यः मनसि तिष्ठन् मनसो अन्तरो यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीरं यः मनोऽन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V21",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्त्वचि तिष्ठंस्त्वचो अन्तरो यं त्वंग् न वेद, यस्य त्वक् शरीरं यः त्वचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V22",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद, यस्य विज्ञानं शरीरं यः विज्ञानमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः॥२२॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V23",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यं रेतो न वेद, यस्य रेतः शरीरं यः रेतोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता अमतो मन्ता अविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इत्यन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति अन्तर्यामिब्राह्मणम् ॥ ५७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S07_V23"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिव्याद्या देवतास्तु देहवद्यद्वशत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शरीरमिति चोच्यन्ते यस्य विष्णोर्महात्मनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तस्थो देवतानां च न विदुर्यं च देवताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रविष्टत्वाद्देवतास्थः सोऽन्तरः स्ववशत्वतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बाह्यापेक्षां विना यस्तु रमते सोऽन्तरः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतिप्रियत्वाच्च हरेरन्तरत्वमुदाहृतम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवानां स्वप्रियत्वं च विष्णुना नियतं यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य प्रियत्वं नान्येन देवस्य नियतं क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वतंत्रः सन्नियन्ताऽसावन्तर्यामी ततः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवतानां स्वभावोऽपि स्वरूपमपि सर्वदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदधीनं ततो यामी वासुदेवः प्रकीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वभावसत्तादातृत्वं यन्तृत्वमिति कथ्यते ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिभूतं सर्वजीवा अध्यात्मं तच्छरीरगाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवतास्ताः स्वलोकस्था अधिदैवाभिधा मताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकाभिमानिन्यस्ता एवाधिलोका इतीरिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञाभिमानिनो देवा अधियज्ञा इति स्मृताः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "भवनाधिकारे स्थितत्वादधिभूतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S07_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथुं नारायणं वाति समादायैव पक्षिराट् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः स पृथिवीत्युक्तस्त्वन्तरिक्षं हरः स्मृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वान्तर्गतं यतः सर्वमिच्छया क्षपयेदसौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यौर्नाम देवी विद्युत्स्यात् साक्षादेव सरस्वती ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्योतनात् सर्ववस्तूनां तमो दुर्गा प्रकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतः संग्ग्लपयेत् सर्वांस्तेजः श्रीः परिकीर्तिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आकाशो विघ्न उद्दिष्टः काशते हि पृथूदरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आपो वरुण उद्दिष्टो तदेतत् पालयत्यसौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मा विज्ञानमिति तु सर्वजीवाभिमानवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मैवोक्तस्त्विमे सर्वेऽप्यनुक्ता याश्च देवताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये च जीवाः परे सर्वे नियता विष्णुनैव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवानां नियमेऽजीवं किमु वाच्यमिति श्रुतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथक्तन्नियमं नैषा वक्ति सिद्धत्वतः स्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एष सर्ववेत्ता हि परमात्परमो हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्यो वेत्ता स्वतंत्रोऽस्ति जीवाः सर्वे हि दुःखिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि स्वतंत्रा नैवैते दुःखिनः स्युः कदाचन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत आर्तिमतामार्तिदाता मुक्तिप्रदश्च सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भगवान् परमो विष्णुः स्वतंत्रः सर्वदैकराट् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08",
| |
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| "text": "अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥",
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| "text": "पूर्वं गार्ग्या जीवानामुत्तरोत्तराश्रयत्वं सर्वेषां भगवदाश्रयत्वं च श्रुतम् । न तु मूलप्रकृतेराधारत्वमाधेयत्वं वा । अतः पुनः पृच्छति । विजिगीषुकथात्वाद् ब्राह्मणानुज्ञया । स्वभर्तुर्विद्याबलं जानन्त्यपि युष्माकमयं जेतुं न शक्य इति ज्ञापयित्वा तेषामुपकारार्थं च पप्रच्छ । न च युक्त्या पूर्वमुपरता । भार्यात्वाद् भगवतोऽन्याधारत्वं नाशंक्यमित्युक्ते भीत्यैवोपरता । भगवतोऽन्याधारत्वं च सर्वाधारमूलप्रकृतेरपि भगवानेवाधार इत्युक्ते युक्तित एव निवारितं भवति । नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रित्यादियुक्तिभिश्च । अस्थूलत्वादियुक्तिभिश्च ॥ ",
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| "text": "केवलं तत्त्वविज्ञानमुद्दिश्य गुरुशिष्ययोः ॥",
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| "text": "वाद इत्युच्यते सद्भिर्जयस्तत्रार्थिको भवेत् ॥",
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| "text": "विजये शिष्यताऽन्येषां पूजा च जयिनः सदा ।",
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| "text": "पुनश्च संशयो यत् स्यात् तेषां तस्यापि वारणम् ॥",
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| "text": "कर्तव्यं जयिना नित्यमशक्तस्य स्वतोऽधिकात् ।",
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| |
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| "text": "अन्योन्यनिर्णयश्चेत् स्यात् तदा सब्रह्मचारिणः ॥",
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| |
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| "text": "पृष्टेन प्रथमं मानं वक्तव्यं वादिना शुभम् ।",
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| |
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| "text": "वेदाः सर्वे शुभं मानं सेतिहासपुराणकाः ॥",
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| |
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| "text": "सपञ्चरात्रमीमांसाः स्मृतयश्चाप्यनन्तरम् ।",
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| "text": "तदन्यदशुभं प्रोक्तं न प्रयोज्यं कथासु च ॥",
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| "text": "मिश्रमक्षानुमाने तु ग्राह्ये शब्दार्थनिर्णये ।",
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| "text": "अदुष्टमिंद्रियं त्वक्षमुपपत्तिस्तथाऽनुमा ॥",
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| "text": "अनुमैव त्वभावाख्यो ह्यर्थापत्त्युपमे तथा ।",
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| |
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| "text": "तत्त्वनिर्णयवैलोम्यं संवादो वा विरोधिते ।",
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| |
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| "text": "पराजय इति प्रोक्तः समः सर्वकथासु च ॥",
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| |
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| "text": "तत्त्वनिर्णयवैलोम्ये दण्ड्या वादकथास्वपि ।",
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| |
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| "text": "गुरुणैव त्ववश्यानां राजा दंडं प्रयोजयेत् ॥",
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| |
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| "text": "गुरुदंडस्तु वाचा स्याद् राजदंडोऽर्थदेहतः ।",
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| |
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| "text": "गुरुदंडोऽप्यर्थतः स्यात् संवादे व्रततोऽपि वा ॥",
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| {
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| "text": "राजदंडो बलाच्च स्याद्दोषस्य गुरुलाघवात् ।",
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| |
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| "text": "संवादे दण्ड्यता नास्ति जल्पादौ च कथञ्चन ॥",
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| "text": "तत्त्वविप्लवकर्तारं संसत्सु च पराजितम् ।",
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| "text": "छित्वा जिह्वां च काकांकं राजा राज्याद्विवासयेत् ॥",
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| "text": "अन्यसाम्यमभेदो वा नीचता वा कुतश्चन ।",
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| |
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| "text": "विष्णोः श्रीपूर्वकाणां च व्यत्यासो गुणदोषतः ॥",
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| "text": "तद्भक्तेरन्यधर्मत्वं पञ्चैते तत्त्वविप्लवाः ।",
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| "text": "तत्त्वविप्लावकं शूद्रं वैश्यं क्षत्रियमेव वा ॥",
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| "text": "हन्यादेवाविचारेण विप्रजिह्वां तथोद्धरेत् ।",
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| "text": "स्वसिद्धान्ते प्रमाणं च परसिद्धान्तदूषणम् ॥",
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| |
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| "text": "वक्तव्यमुभयं वादे जल्पे चेति सतां मतम् ।",
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| "text": "अवाक्यदूषणं तर्कादागमादेव साधनम् ॥",
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| |
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| "text": "वाक्यतात्पर्यविज्ञप्त्यै मानमन्यन्न चान्यथा ।",
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| |
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| "text": "सतोरेव यदा स्पर्धा गुणतोऽर्थार्थमेव वा ॥",
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| |
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| |
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| |
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| "text": "तदा जल्पः समुद्दिष्टस्तत्र विद्यां परीक्षयेत् ।",
| |
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| |
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| {
| |
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| |
| "text": "विद्यापरीक्षापूर्वा हि सत्कथा जल्प उच्यते ॥",
| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "सर्वज्ञा वैष्णवाः पञ्च सप्त वोभयसंमताः ।",
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| |
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| "text": "अधिका वा यथालब्धाः प्राश्निकास्तु परीक्षकाः ॥",
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| |
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| |
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| |
| "text": "उभयोः प्रश्नकर्तृत्वात् प्राश्निका इति कीर्तिताः ।",
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| |
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| |
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| "text": "तदभावे गुणोद्रेकं दर्शयेतां पृथग्जने ॥",
| |
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| |
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| |
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| "text": "विद्यासाम्ये कथा कार्या ह्यन्यथैकपराजयः ।",
| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "विद्योनो दण्ड्य एव स्याद्यदि नोच्चस्य शिष्यताम् ॥",
| |
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| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "व्रजेत् पश्चाद्यथा वाद एवं जल्पः प्रकीर्तितः ।",
| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "अर्थनिर्णयहेतुत्वाद्वादे प्रश्नो जयेऽपि तु ॥",
| |
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| |
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| |
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| |
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| "text": "न जल्पे तु पुनः प्रश्नः सभ्यानुज्ञां विना भवेत् ।",
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| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "स्पर्धा सतां वितंडा स्यात् तत्त्वविप्लावकैर्यदा ॥",
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| |
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| "text": "मूलपक्षग्रहापेता वितंडा कविभिर्मता ।",
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| |
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| |
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| |
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| "text": "सतामेव वितंडा स्यादसतां जल्प एव तु ॥",
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| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "एवं जल्पो वितंडेति ह्युभयोः सहिता कथा ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "अप्रकाश्यः स्वपक्षो हि पाषंडानां यतस्ततः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "अग्रहेणैव पक्षस्य तर्कागमबलेन तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "दूषयेदेव पाषंडास्तत्त्वविप्लावकान् सदा ॥",
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "तत्पक्षाणां निषेध्यत्वात् तेषां पक्षग्रहो भवेत् ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "विष्णुभक्त्यन्यधर्माख्यस्तत्त्वविप्लव एव तु ॥",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "बौद्धादीनां यतः सर्वे तत्त्वविप्लावकास्ततः ।",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "सर्वनास्तिकवादी वा स्वमनीषामतोऽपि वा ॥",
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| |
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| "text": "तस्यापि पक्षं संश्रित्य दूषयेद्वाक्ययुक्तितः ।",
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| |
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| |
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| "text": "यस्य नैवागमो मानं तं ब्रूयादागमाश्रयः ॥",
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| |
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| |
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| "text": "धर्मार्थोऽथ वृथैवायं तव पक्षस्य सङ्ग्रहः ।",
| |
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| |
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| |
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| "text": "धर्मार्थश्चेन्न धर्मो हि शक्यो द्रष्टुं विनाऽगमात् ॥",
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| |
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| "text": "यथाऽनुमीयते हिंसा पापहेतुस्तथैव हि ।",
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| |
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| "text": "धर्महेतुत्वमप्यस्या अनुमातुं सुशक्यते ॥",
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| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "वृथा पक्षं वृथा हन्याद्यदि कश्चित् किमुत्तरम् ।",
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| |
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| "text": "इत्यशक्तौ सतां सर्वे सम्भूयापि निवारणम् ॥",
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| |
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| "text": "कुर्युरेवासतां सन्तस्तत्त्वविप्लाविनां जये ।",
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| |
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| "text": "येषां विष्णोः समं किञ्चिदधिकं वा न तु क्वचित् ॥",
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| |
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| |
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| "text": "क्षराक्षराभ्यां भिन्नं च विष्णुं पश्यन्ति ये सदा ।",
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| |
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| "text": "तारतम्यविदः सर्वजीवानां प्रकृतेरपि ॥",
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| |
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| "text": "भगवद्धर्मिणो नित्यं ते सन्तः परिकीर्तिताः ।",
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| "text": "पराजितेष्वसत्सूक्तं राजा दंडं प्रपातयेत् ॥",
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| "text": "जितेषु सत्स्वसद्भिस्तु राजोदासीनतां व्रजेत् ।",
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| "text": "यावदेषां विजेता स्यादथ दंडं निपातयेत् ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ॥",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S08_V04"
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| |
| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| },
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "दीप्तेराकाशशब्दोक्ता श्रीर्हि सर्वाश्रया मता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदाश्रयः परो विष्णुः सोऽस्थूलादिगुणो मतः ॥ इति स्कान्दे ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽथापरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "पुनः प्रश्नः सर्वाधारा प्रकृतिरित्यनुपचरितत्वेनावधारणार्थम् । आकाश एवेत्यवधारणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनरुक्तिःशब्ददोषो न्यूनाधिक्यादिकं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न जिगीषुकथायां च कारणं स्यात् पराजये ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्वचिद्विद्याधिकस्यापि स्खलनं सम्भवेद्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्त्वनिर्णयवैलोम्यं विलम्बो वा मुहूर्ततः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्यादौर्बल्यहेतुः स्यादतस्तस्मिन् पराजयः ॥ इति ब्रह्मांडे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S08_V04_B1"
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| },
| |
| "text": " अतस्तत्त्वनिर्णयविरोधिपुनरुक्त्यादीनि निग्रहः ।\t ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S08_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
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| "id": "bhashya-BR_C03_S08_V08"
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रसिद्धस्थूलसूक्ष्मादिवैलक्षण्याज्जनार्दनः ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्थूलादिरिति प्रोक्तो नैव स्थौल्याद्यभावतः ॥ अनावृत्तेस्तमो नास्य स्वातंत्र्यान्नाद्यते क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C03_S08_V09",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासाः मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृताः तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यो पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V11",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मंत्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इत्यक्षरब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति अक्षरब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S08_V12"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V12_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यावापृथिव्यौ श्रीभूमी केशौ सूर्यविधू मतौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दीप्तेः पृथुत्वाज्ज्ञानाच्च तथाऽऽह्लादविधेरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदाधारो हरिर्नित्यं स्वातंत्र्येण प्रशासकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आधारत्वं श्रियो यच्च तच्च विष्णोः प्रशासनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वशान्न स्वतंत्रत्वं स स्वतंत्रो हरिः सदा ॥ इति महामीमांसायाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V12_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥ इति वाराहे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S08_V12_B1"
| |
| },
| |
| "text": "आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे इत्यादेश्च । न सत्तन्नासदुच्यते अदुःखमसुखं समम् न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् इत्यादि च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09",
| |
| "type": "brahmanam",
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| "name": "शाकल्यब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "शाकल्यब्राह्मणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V02_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महीत्युक्तं हि माहात्म्यं महिमानो हि तन्मिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं हि महिमाशब्दस्तद्वशत्वं वदत्ययम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्र माहात्म्यवाची स्यान्महत्वं महिमा तथा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "त्रयस्त्रिंशत्सुराणां हि परिवारास्ततः परे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "षण्णामेते त्रयाणां ते ते द्वयोः साधिकस्य तौ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एकस्य सोऽपि क्रमतः पराधीनस्वरूपिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पराधीनबलाश्चैव पराधीनप्रवृत्तयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक एव स्वतंत्रोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V03_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रथितं हरिमादाय वातीति प्रथिवः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्भार्या पृथिवी नाम यत्तदिच्छानुसारिणी ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वज्ञानात् तथायुष्ट्वात् सूत्रात्मा वायुरुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धानामैव तत्पत्नी सर्वस्यान्तर्निरीक्षणात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तरिक्षमिति प्रोक्ता देवेभ्योऽधिकवीक्षणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदिकालस्थितो यस्मादादित्यस्तु सदाशिवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यौरुमा च समुद्दिष्टा वाग्रूपा द्योतिका यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एते सर्वदेवेभ्यो विशिष्टास्तद्वशाः परे ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नक्षत्रमिंद्र उद्दिष्टश्चंद्रः काम उदाहृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्राणात् सूर्यचंद्राद्यैराह्लादाच्चैव हेतुतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वासयन्ति जगद्यस्मादेतेऽष्टौ वसवः स्मृताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानादिषड्गुणाः षट्सु तदन्येभ्योऽधिका यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वसुष्वपि त एवोच्चा वींद्राद्याः पूर्वकीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V04"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V04_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहस्पतिरिति ह्येते रुद्रा इत्येव कीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V05",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V05"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V05_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धात्रर्यमाद्या आदित्या इंद्राविष्णू विनैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V06",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V06"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V06_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव वज्र इंद्रस्य सोऽशनिश्चाशनादरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञो नामेंद्रपुत्रो यो जयन्त इति चोच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव पशुमानित्वात् पशवश्चेति कथ्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V09"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V09_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षाग्निप्रमुखाः सर्वे प्राणा एव हि वायुजाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रा अपि तदावेशात् पृथंग्नोदीरिता इह ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "काम एवानुविष्टत्वादनिरुद्धश्च नोदितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मन्वावेशादिंद्रजस्तु संख्यायामनुवेशितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्विनौ निर्ऋतिश्चैव कुबेरश्च विनायकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्यम्ण्यंशादिचतुर्षु विशेषावेशसंयुताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्रोक्ता अपि पृथिव्याद्या अन्तर्यामिब्राह्मणे भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "षट्सु प्रधानास्तिस्रो हि वायुवींद्रमहेश्वराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वभार्याणां स्वाश्रयत्वात् ते लोका ज्ञानरूपतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पदैक्याद्ब्रह्मवाय्वोस्तु पदसाम्याच्छिवस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शेषस्यापि तु नैवोक्तिः पृथक् श्रद्धा च मारुतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वौ देवाविति सम्प्रोक्तावन्नं श्रद्धा प्रकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतीतत्वाद्देवताभ्यो नेतृत्वाच्चान्नमुच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धेति वायोः पत्नी सा प्राणो वै विष्णुरुत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "णेत्येवानन्द उद्दिष्ट आसमन्तात् प्रकृष्टतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणो हि भगवान् विष्णुरध्यर्धो वायुरुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अध्यर्धा हि गुणा नित्यं वायोरध्यर्ध एव तत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चैकत्वं भवेद्वायोस्तद्विशिष्टो यतो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च द्वितीयता तस्मिन् प्रीतिरत्यधिका हरेः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनाध्यर्द्धगुणो यस्मात् सर्वस्माद् देवतागणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चाशक्यं न चाप्राप्यमतोऽध्यर्ध इतीरितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्यन्तरंगं यत्तस्मान्न हरेः पृथगीरिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीः स्वरूपविभेदेऽपि सर्वोत्कृष्टाऽपि नित्यशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्या अपि परो विष्णुर्गुणैः सर्वैरदोषवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक इत्युच्यते नित्यं यस्मान्नान्यस्तथाविधः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्परो वा गुणोद्रेके ब्रह्माऽसौ गुणपूर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथात्वेन यतो नित्यमविकारेण याति हि ॥ त्यदित्युक्तास्ततो विष्णुः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥ इति महामीमांसायाम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
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| "text": "काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥",
| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| |
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| |
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| |
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| "type": "mantra",
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| "text": "आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V16",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V17",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥",
| |
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V17"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "आदित्यस्थस्तथा रुद्रः श्रोत्रश्चंद्र उदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "छायामयस्तु निर्ऋतिरादर्शे सूर्य एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पर्जन्यस्त्वप्सु पुरुषः शक्रः पुत्राभिमानवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अमृतं वायुरुद्दिष्टं स्त्रियः श्रीर्गीरुमा तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्यं ब्रह्मा समुद्दिष्टो गरुत्मच्छेषका दिशः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदेशनाद्दिशः प्रोक्ताः मृत्युर्यम उदाहृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तर्गतेन रूपेण वायुरेव त्वसुः स्मृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पालकेन स्वरूपेण ब्रह्मैवात्र प्रजापतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकाशस्त्वान्तरो ज्योतिर्लोको बाह्य इतीर्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनःस्थिता मनोनाम्नी बोधरूपत्वतो रमा ।।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैवाग्निस्थाऽदनान्नित्यमग्निरित्येव गीयते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदयं बुद्धिसंस्था सा त्वयनं हृदि यत्ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुः सा दृष्टिहेतुत्वाद्दृष्टानां लोक एव सा ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": " बुद्धिवृत्त्यपेक्षया बहिः प्रकाशहेतुत्वमपि देव्या न विरुध्यते । इम एव त्रयो लोका इति पूर्वोक्तानां देवानामनुक्तौ कथं लोकमात्रे सर्वदेवानामन्तर्भावः । उक्ताङ्गीकारेऽनन्तर्भावः कथम् । कथं चाग्न्यादिषु । न चावासमात्रमत्र विवक्षितम् । प्रतिशरीरमपि सर्वदेवानामावासान्न लोकादीनां विशेषः । सामर्थ्याधिक्यं चात्र विवक्षितम् । एतेषु हीदं सर्वं षडिति । यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते महिमान एवैषाम् इत्यादिषु षड्गुणोद्रेकादीनामुक्तेः । अन्तर्भावस्य च महिमकारणकत्वोक्तेः । इदं सर्वं गुणषट्कं पूर्णं गुणषट्कमित्यर्थः । इदंशब्दोविवक्षितत्वादयं भगवानितिवत् । एवमेवेदं सर्वमध्यार्ध्नोदिति च । गुणाधिक्येन तदधीनत्वे विवक्षिते निवासत्वादिकमन्तर्भवति । उत्तमानामधिकव्याप्त्यादेः । न तु निवासत्वादौ गुणाधिक्यादिकम् । कथं च तन्महिमत्वेनान्तर्भावमुक्त्वा निवासत्वमात्रेणान्तर्भाव उच्यते । कथं चान्यथा कामादीनां प्रसिद्धमहिमानां स्त्रीमात्रादिकं देवतोच्यते । प्रसिद्धं चैतत् । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भः आत्मा वै वातः इंद्रो वै देवानामोजिष्ठःब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव अयं वाव शिशुर्योयं मध्यमः प्राणः तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तो यच्छुक्लं तेनेन्द्रः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठस्तु मारुतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुर्भीमो भीमनादो महौजास्सर्वेषाञ्च प्राणिनां प्राणभूतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते तस्माद्वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": " क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मत एष प्राणो जायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो वायौ तिष्ठन्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": " देवानां देवता वायुर्वायोर्देवो जनार्दनः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": " स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धाम् एतस्माज्जायते प्राणः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रं समाश्रिता देवाः रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः ॥ इत्यादिषु सर्वत्र ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V17_B1"
| |
| },
| |
| "text": " श्रियः प्रसादं स कुशेशयेशयः श्रितः स चिन्त्यः प्रशशंस शौरिम् इत्यादि च ।\t\t\t\t\t\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V18",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V19",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V19_B1"
| |
| },
| |
| "text": "दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् ।\t\t\t\t\t\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V20",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
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| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V20"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V20_B1"
| |
| },
| |
| "text": "यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V20_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यस्याश्रयश्चक्षुर्नामा स्वायम्भुवो मनुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुस्थो दृष्टिशक्तीशो रूपात्मेंद्रस्तदाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुद्धितत्त्वात्मिकोमा च शक्रस्यापि समाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V21",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V21"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणामानिनी देवी रतिरेव तदाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धारूपः सदा कामस्तस्या अपि समाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदयात्मिक्युमा तस्य कामस्यापि समाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V22",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BR_C03_S09_V22_B1"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "रेत आत्मा सुरगुरुः सोमस्यापि समाश्रयः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याप्युमैवाश्रयः स्यात् ..",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V23",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V23"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V23_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सोमस्य दीक्षारूपा तु शतरूपा समाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्याः सत्यात्मको देवो मनुरेव समाश्रयः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याप्युमैवाश्रया सा स्रष्टृरूपस्य नित्यदा ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V24",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C03_S09_V24"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V24_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याप्युमैव हृदयरूपा नित्यं समाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C03_S09_V25",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहंकारात्मको नित्यमात्मोमा परिकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुद्ध्यात्मनैवाततत्वाद्यद्यस्यानाश्रयो हरः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा बोधात्मिका शक्तिर्नास्या देहाभिरक्षणे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरक्षितान्मानुषादीन् श्वानो वाऽद्युर्वयांसि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शेषस्यापानरूपा सा भारत्येव व्यपाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्या व्यानाभिधो वायुर्विशिष्टानो यतो हि सः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उन्नेतृत्वादुदानाख्या तस्या श्रीराश्रयः सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समानाख्यो हरिस्तस्याः सहैव ह्यनयत्यसौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वावरस्यानकास्त्वन्ये सर्वेषां चेष्टको हि सः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एष भगवान्नैवं श्रीवदन्याश्रयो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च ब्रह्मादिवद्विष्णुर्नैवासौ बद्धवत् क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च मुक्तवदीशेशः कुत एव जडोपमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्राह्योऽशीर्यसंगोऽसावसितश्च न रिष्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि सर्वात्मना क्वापि केनचिज्ज्ञायते क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वल्पोऽपि शीर्यते नैव कारणात् कालतोऽपि वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न लिप्यते जगन्नाथः क्वचिद्दोषेण केनचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतपूर्वो भविष्यो वा बन्धो नास्य कुतश्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च नाशो भवेत् क्वापि न नशिष्यति च क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यत् सर्वं गृहीतं हि तेन ज्ञानादिना सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अशीर्यत्वादयोऽन्येषां सर्वेषां तत्प्रसादतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अतस्तस्यापि वैषम्यान्नेति नेत्याह तं श्रुतिः ॥ इत्यादि च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्गुणानां सुपूर्णानां विप्लुट्कं प्रतिबिम्बितम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीर्भुंक्ते तद्गुणान् ब्रह्मा तस्य रुद्रादयोऽपि च ॥ इत्यादि च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26_B1"
| |
| },
| |
| "text": "अहर्ज्ञानमस्य लीनमित्यहर्लीक एवाहल्लिकः । अज्ञेत्याक्षिपति । न हि गृह्यते इत्यादिना ग्रहणशीरणादिषु सर्वप्रमाणाभावं दर्शयति ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26_B1"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नेति नेत्यादिरूपेण विज्ञापितगुणोऽपि तु ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विशेषापेक्षया पृष्टो न शाकल्यो विवेद तम् ॥ इति ब्रह्मांडे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C03_S09_V26_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तदपेक्षां विनैवासौ निर्गत्य पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वहत्येवानिशं सर्वं निरूढं तेन तज्जगत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रति प्रतिस्थितो रूपैर्यस्माद्धत्ते हरिः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः प्रत्यूह्यते तेन व्यक्ताव्यक्तमिदं जगत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥",
| |
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| |
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| |
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| "text": "न विनोपनिषद्भिः स ज्ञेयः केनापि कस्यचित् ।",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "अत औपनिषत्कं तं प्राहुर्विष्णुं सनातनम् ॥ इति च ॥",
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| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "प्रश्नो वादे च जल्पादौ कर्तव्यः प्रतिवादिना ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "तदुक्तिमात्रे प्रामाण्ये यदि नास्यागमान्तरम् ॥",
| |
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| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "अपेक्षितं यदा शंका दर्शनीयस्तदाऽऽगमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "निःशंकत्वेन यो वक्ता प्रश्नानामुत्तरं सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "आनुकूल्येनागमानां नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "दशतालो दशमुखो ललाटत्रिंशकस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सार्धोन्नतश्चैव पुनः पर्यग्दशशिरास्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चोराः सप्तपादो यो नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नवांगुलमुखो यस्तु गले च चतुरंगुलः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चतुर्विशांगुलतनुस्तद्वाक्यं देवपूजितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राधान्यल्लक्षणोपेतो दुर्लक्षणयुतोऽपि सन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "तस्यापि वाक्यं मानं स्यात् किमु सर्वयुतस्य तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रायो देवाश्च ऋषयो न सर्वशुभलक्षणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋते विष्णुं सुरश्रेष्ठं ब्रह्माणं वाऽप्यनन्तरम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मान्न विदुषां वाक्यमाशंक्यं केनचित् क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्माद्वेदेषु सर्वेषु कथाः प्रश्नोत्तरात्मिकाः ॥",
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| |
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| {
| |
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| "text": "न प्रमाणान्तरं तत्र पृच्छन्ति घटनां विना ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "एतस्मादाश्वलाद्याश्च पप्रच्छुर्नैव कुत्रचित् ॥",
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| |
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| "text": "आगमं याज्ञवल्क्योक्तेरन्यं तं मिथिलोऽपि च ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥",
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| "text": "तस्य पर्येषणं कुर्यात् प्रतीच्छन्नोत दक्षिणाम् ॥ इति च भारते ॥",
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| "text": "षण्णवत्यंगुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमंडलः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "दशतालश्चतुर्हस्तः स देवैरपि पूज्यते ॥ इति वायुप्रोक्ते ॥",
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| |
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| {
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| "text": "अत एव च सर्वागमेषु प्रतिसंहितमाचार्यलक्षणमुच्यते ।",
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| "text": "अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥",
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| "text": "यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।",
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| "text": "तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ २८ ॥",
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| "text": "त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः ।",
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| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मात् तदा तृणात् प्रैति रसो वृक्षादिवाऽहतात् ॥ २९ ॥",
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| }
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| |
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| "children": [
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| "text": "मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३० ॥",
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| "text": "यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।",
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| "text": "मर्त्यः स्विन् मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३१ ॥",
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| |
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| "children": [
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| "text": "धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥ ३२ ॥",
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| "text": "जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।",
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| "text": "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् ॥ तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥ ७ ॥ ३४ ॥",
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| "text": "॥ इति शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ५९ ॥ ",
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| "text": "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥",
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| |
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| "text": "निर्मूलस्य च वृक्षस्य प्रलये पुरुषस्य च ।",
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| |
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| "text": "पुनरुत्पादको यस्तं वदन्तु मम कृत्स्नशः ॥",
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| |
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| "text": "धानाजात इवायं हि दृश्यते विदुषां तरुः ।",
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| |
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| "text": "अस्वातंत्र्यात् तु विदुषां नैव तत्कारणं भवेत् ॥",
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| |
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| |
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| "text": "इति पृष्टास्तु मुनयो न वक्तुं शेकुरंजसा ।",
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| "text": "तद्वेत्तारोऽपि तत्प्रश्ननिर्मूलनबलोज्झिताः ॥",
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| |
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| {
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| |
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| "text": "पूर्णानन्दो हरिर्नान्यः कारणं सृज्यसर्जने ।",
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| "text": "नैवास्य जनकः कश्चिन्नित्यजातो ह्यसौ हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स प्रियः सर्वदातॄणां ज्ञानिनां परमप्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ये तु तद्भाविता नित्यं तेषामेष परायणम् ॥ इति नारदीये ।",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n \n "
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| "text": "जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे । अथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तं होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उयुभयमेव सम्राड् इति होवाच ॥ १ ॥",
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| |
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| "text": "यत्ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणवामेत्यब्रवीत् । मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छैलिनोऽब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य वागेव सम्राति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥२॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| },
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| "text": "प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "दीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "प्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "प्रतिमानमवस्थानं रहस्यं नाम सार्थकम् ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "चतुष्टयं यदा ज्ञानं सम्यग्विद्याफलं तदा ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
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| "children": [
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| "text": "का प्रज्ञता वागेवेत्यादेर्धर्मधर्म्यभेदः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अमिताक्षरं पञ्चरात्रं विद्येत्याहुर्मनीषिणः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मिताक्षरं श्लोकवाच्यमुभयं वेद ईर्यते ॥ इति ब्रह्मांडे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| {
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| "text": "सूत्रं तु ब्रह्मसूत्राख्यं महामीमांसिका तथा ।",
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तथा सांकर्षणं सूत्रं ब्रह्मतर्कादयस्तथा ॥",
| |
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकाशिका निर्णयश्च तत्त्वनिर्णय एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्याख्येति कथिताः सर्वाः स्वयं भगवता कृताः ॥",
| |
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहत्तर्कादयः सर्वा अनुव्याख्याः प्रकीर्तिताः ॥।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति प्रतिसंख्याने ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "वाग्विष्णुर्वाचकत्वेन प्राणः प्रणयनात् स्वयम् ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो मन्तृत्वतो नित्यं स चक्षुः सर्वदर्शनात् ॥",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं श्रवणशक्तित्वाद्धृदयं हृद्गतो यतः ॥ इति प्रत्याहारे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
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| "text": "अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचम् इत्यादि च ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वागादिषु स्थितं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वागादिनाम्ना नैनं स प्रजहाति कदाचन ॥ इति सत्तत्त्वे ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
| |
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| |
| "text": "अत आयतनमेव वागिंद्रियादि । परमं ब्रह्मेतिवचनान्न वागिंद्रियादिमात्रमुपास्यम् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "प्रतिमाद्यं हरित्वेन पृथिव्याद्यमथापि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियप्राणजीवाद्यमथवा य उपासते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मिथ्योपास्तिमतां तेषां निष्कृतिर्न कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतिदुःखे पतन्त्यद्धा तमस्यन्धे पतंगवत् ॥ इत्युपासानिर्णये ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वेंद्रियेषु या विष्णोरुपासा युगपत् सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानामेव योग्या सा तया देवत्वमाप्नुयुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे देवपदे योग्याः सायुज्यं स्वोत्तमेष्वथ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्प्राप्य ब्रह्मणा सार्धं प्राप्नुयुः पुरुषोत्तमम् ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "दुहन्ति सर्वभोगांश्च तेभ्योऽन्ये मुक्तिगा नराः ।",
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| "tail": "\n "
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्वोत्तमेभ्यश्च देवेभ्यस्ते मुक्ता हरये सदा ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रविश्य देहं यो भोगः स्वरूपव्यतिरेकतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सायुज्यमिति तं प्राहुः संयुक्तत्वाद्विशेषतः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "इंद्रियेषु स्थितं विष्णुमुपासीत क्रमेण तु ।",
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| |
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| {
| |
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| "text": "सदा देवपदायोग्यः स मानुषसुरो भवेत् ॥",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मानुषा देवलोकस्थास्ते प्रोक्ताः मानुषाः सुराः ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मानुषा देवसायुज्यं यान्त्युपासनयाऽनया ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C04_S01_V02_B1"
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| "children": [
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| {
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| "text": "ऋषभान् गजमिश्रांस्तु क्षत्रियो गुरुदक्षिणाम् ।",
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| "text": "विप्रो दद्याद् वृषानेव वैश्यो गाः प्रतिविद्यकम् ॥ इति मानसंहितायाम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "children": [
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| |
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| {
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| "text": "तत्रापि योग्यताभेदात् प्रतिभेदा अवान्तराः ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यया यस्य विमुक्तिः स्यात् तद्दाता मुख्यतो गुरुः ।",
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| "text": "एकदेशगुरुत्वं स्यादन्यविद्याप्रदस्य तु ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| }
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| {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S01_V03"
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S01_V03_B1"
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| {
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| "text": "प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् ।",
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| "text": "तदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "तथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥",
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे बर्कुः वार्ष्णः चक्षुः वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S01_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V04_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीत् श्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदुपासीत का अनन्ता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशः दिशो वै सम्राट् श्रोत्रं श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S01_V05"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S01_V05_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिङ्नामा स तु विज्ञेयो दिक्षुस्थो नित्यदेशनात् ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालः मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तज्जाबालोऽब्रवीत् मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनोजहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥६॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S01_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S01_V06_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जातः सुतः सुखे हेतुः परानन्दो हरिः किमु ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S01_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यः हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छाकल्योऽब्रवीत् हृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनं हृदयं वै सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥७॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति षडाचार्यब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति षडाचार्यब्राह्मणम् ॥ ६१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S01_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V07_B1"
| |
| },
| |
| "text": "सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V07_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदये सर्वशो व्यापी प्रादेशः पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवानां स्थानमुद्दिष्टः सर्वदैव सनातनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृत्कर्णिकामूलगतः सोऽङ्गुष्ठाग्रप्रमाणकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूलेश इति नामास्मिन् सर्वे जीवाः प्रतिष्ठिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंगुष्ठमात्रे पुरुषे कर्णिकाग्रस्थिते हरौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रविशन्ति सुषुप्तौ तु प्रबुध्यन्ते ततस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽयं त्रिरूपो भगवान् हृदयाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S01_V07_B1"
| |
| },
| |
| "text": "स्थानमायतनं प्रोक्तं प्रतिष्ठा धारकः पुमान् इति च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02",
| |
| "type": "brahmanam",
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| "name": "कूर्चब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "कूर्चब्राह्मणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जनको वै वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्माऽस्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तद्भगवान् वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति स होवाच ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S02_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": " स्वयोग्यं ज्ञानं श्रोतुं सिंहासनादवरुह्योपसदनं कृत्वोवाच । यत्स्वात्मना प्राप्यं मुक्तौ तदुपास्यैव मुक्तिर्भवतीत्यतः प्राप्यं पृच्छति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": " वृन्दैः प्राप्यतमत्वात् तु वृन्दारक इति स्मृतः इति च पाद्मे ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिंद्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथैतद्वामेऽक्षिणि पुरुषरूपमेषाऽस्य पत्नी विराट् तयोरेष संस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिंडोऽथैनयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणीयैषा हृदयदूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतददास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S02_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V03_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राज्ञां हृदयसंस्थो य इंद्रो नाम जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स इंद्रे च यमे चैव स प्राप्यो मुक्तराजभिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् तेषामुपास्यः स विराण् नाम तदाश्रया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रीस्तयोः स्तुतिरेषा हि प्राणेन क्रियते सदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्णौ पिधाय या ज्ञेया सर्ववेदात्मिका हि सा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "काशनात् सर्वजीवानामाकाश इति सा स्तुतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जाग्रतां सर्वजीवानां स विष्णुर्दक्षिणाक्षिगः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणाः दक्षिणा दिक् दक्षिणाः प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अर्वाची दिगर्वाञ्चः प्राणाः सर्वाः दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्यते असितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स होवाच जनको ह वैदेहोऽभयं त्वागच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "॥ इति कूर्चब्राह्मणम् ॥ ६२ ॥",
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| "text": "यमराक्षसौ दक्षिणस्यां वरुणो वायुरेव च ।",
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| {
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| "text": "पश्चिमस्यामुत्तरस्यां सोमेशानौ प्रतिष्ठितौ ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मा प्रधानवायुश्च तथोर्ध्वायां दिशि स्थितौ ।",
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| "text": "अधरायां शेषकामौ सभार्याः सर्व एव च ॥",
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| "text": "एकैकस्यां हि चत्वारो नेतृत्वात् प्राणनामकाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इंद्रियाभिमतेश्चैव प्राणा इत्येव शब्दिताः ॥",
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| "text": "त्वत्प्रसादाद्यदभयमस्माकं प्राप्तं तदेव तव तृप्तयेऽस्तु नान्यद्वयं प्रत्युपकर्तुं शक्नुम इत्यर्थः । स भगवान् स्वकृतेन तुष्येत् इतिवत् । इन्धो दीप्तः ।",
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| |
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| {
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| "children": [
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| "text": "जीवभोगस्य भोक्तेशो जीवस्तद्भोगभुंग् न तु ।",
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| "text": "विविक्तभुगिवातोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ इति पाद्मे ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥",
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| |
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| {
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| "text": "वैदेहनगरं प्रायात् सन्तो यच्छास्त्रलोलुपाः ॥ इति स्कान्दे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| {
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| "text": "याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥",
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| }
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| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| |
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| "id": "BR_C04_S03_V06",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥",
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| "children": [
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| "text": "भावेऽभावेऽपि सूर्यादेर्जीवानां विष्णुरेव हि ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥",
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| "text": "गृह्णातीव ग्राहयन् स जीवं सर्वेश्वरेश्वरः ॥",
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| |
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| "text": "सदा विज्ञानपूर्णोऽसौ समानोऽसौ सदा समः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अविकारात् समानः सन् जीवमादाय सञ्चरेत् ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "उभौ लौकौ स्वापकत्वाद्भूत्वाऽसौ स्वप्ननामकः ।",
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| "text": "इमं लोकं जाग्रदाख्यं मृत्युरूपात्मकं सदा ॥",
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| "text": "बहुपापैकहेतुत्वात् तारयेत् स्वप्नमानयन् ।",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इमं लोकं च भूराख्यं तारयित्वाऽन्तरिक्षगम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवं कुर्यान्मृतौ विष्णुर्भूलोकः क्षिप्रमृत्युमान् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "बहवो मृत्यवश्चात्र मृत्यो रूपाण्यतस्त्वयम् ॥",
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| |
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| {
| |
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| "text": "पापहेतुत्वतश्चायं भूर्लोको मृत्युरूपकः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "जाग्रच्च पृथिवी चैव द्यौः सुषुप्तिस्तथैव च ॥",
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| |
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| "text": "स्वप्नश्चैवान्तरिक्षं च ज्ञेया अन्योन्यनामकाः ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्द्ययभिप्रायिका तस्मादुभौ लोकाविति श्रुतिः ॥",
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| {
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| "text": "यस्य ज्योतिरयं विष्णुः स परामृश्यते तथा ॥",
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| "text": "यदा तु भगवानुक्तस्तदा स्वातंत्र्यतो विभुः ।",
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| "text": "म्रियमाणो जायमान इत्युक्तस्तन्नियामकः ॥",
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| "text": "फलदानाय पापानां ग्रहस्संसर्ग उच्यते ।",
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| "text": "मोक्षदाने फलादानाद्विजहातीति चोच्यते ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "जीवोऽपि मुक्तिकाले तु हाता पापस्य कथ्यते ।",
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| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V09",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V10"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वर्गः सुषुप्तिरित्याख्या मुक्तेरपि यतः समा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परलोको यतो मुख्यो मुक्तिरेव न चापरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो द्युसुप्तिमोक्षाणामभिप्रायमिदं वचः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुप्तिरित्यादिकं स्वेति विष्णोराख्या सुखत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनरागमनं नाम मुक्तानामपि विद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रलये तु प्रविश्यैनं भगवन्तं जनार्दनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थित्वा ज्ञानाविलोपेन निर्गच्छन्ति पुनस्ततः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च ज्ञानसुखादीनां तेषां सृष्टौ लयेऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषः कश्चिदन्तश्च बहिश्चैव रमन्ति ते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वापयत्येनमिति स स्वपितीत्युच्यते हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आनन्दपापलोकादेर्दर्शनं स्वप्नसुप्तयोः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपि विष्णोः सदैवास्ति न जीवस्य कथञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्रायं भगवान् विष्णुर्जीवस्य स्वयमेव तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्योतिर्विशेषतो भूयान्नैवान्यज्ज्योतिरत्र यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि जीवः स्वयं द्रष्टुं सुप्तः शक्नोति हि ध्रुवम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः स नैव जीवोऽयं सर्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नेऽन्तरिक्षे स्वर्गे वा न रथाद्याः पुरा स्थिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदैव तत्कर्मयोग्यान्निर्मिमीते हरिः स्वयम् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": "जीवपक्षे प्रसिद्धत्वात् कतम आत्मेति प्रश्नो न युक्तः । न च जीवः समानः सन्नुभौ लोकौ सञ्चरति । सुखदुःखविशेषवत्वात् । न च सुखदुःखादेर्मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः । असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् इत्यादि वचनविरुद्धत्वाच्च । न चैतन्नासीदस्ति भविष्यतीत्यनुभवः कदाचिद्भविष्यतीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । किञ्चित्कालस्थिरत्वमात्रस्य शून्यवादिनामपि सिद्धत्वाद् वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवदित्यादिवचनं व्यर्थं स्यात् । अतो न कदाचिदस्य नासीदस्ति भविष्यतीत्यनुभवो भविष्यतीत्यभिप्रायेणैव तद्वचनम् । न च तथानुभवे शून्यस्यानिर्वचनीयस्य च कश्चिद्विशेषः । न च शून्यवादिनां तद्वादिनां च कश्चिद्विशेषो मोक्षे । न च नित्यज्ञानस्वरूपमस्तीति वचनेन कश्चिद्विशेषः ज्ञेयाभावे ज्ञानस्याप्यभावात् । न हि ज्ञेयरहितं ज्ञानं नामास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च स्वविषयं तदिति तेषां पक्षः । तदा कर्तृकर्मविरोध इति हि तेषां वचनम् । न च जानातीत्यादिकर्तृत्वं ज्ञानस्य तैरंगीक्रियते । निर्विशेषत्वांगीकारात् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । स्वप्नो भूत्वा स्वापको भूत्वा । न हि जीवोऽपि स्वप्न एव भवति । स्वापं नयतीति स्वप्न इति च व्युत्पत्तिः । जायमानो म्रियमाणो प्रस्वपितीत्यादि । \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कृत्वा विवाहं तु कुरुप्रवीराः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं येषां भवदनुग्रहात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जज्ञे बहुज्ञं परमाभ्युदारम् द्रष्टुश्चक्षुषो नास्ति जिह्वा इत्यादिवदन्तर्णितणिच्त्वेन भवति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": " स्वातंत्र्यस्नेहयोरन्तर्णीतणिच् इति हि सूत्रम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": "कथमन्यथा स्वयं निहत्य स्वयं निर्माय स्रवन्त्यः सृजते । स हि कर्ता स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति इत्यादि युज्यते । उक्तार्थे च स्वप्नेन शारीरमित्यादि जीवेश्वरभेदमंत्रा उक्ताः प्रमाणत्वेन । ईश्वरो जीवस्य भयानि पश्यन् जक्षदिव अहसदिव । प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इत्यादिषु चाभ्यासेन सर्वत्र भेद एव निर्दिश्यते सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् । न चावस्थाभेदेन जीवभेदो व्यावहारिकोऽप्यस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न हि जाग्रत्स्वप्नस्थश्च द्वावित्यज्ञप्रयोगोऽपि कश्चिदस्ति लौकिकः । न च भ्रमस्तादृशः । तस्माद् भगवानेवात्रोच्यते सर्वकर्तृत्वेन । वेशान्ता वेश्यागृहाः । सुषुप्तिमोक्षोभयविवक्षयैव तद्वचनमिति भगवताऽप्युक्तं स्वाप्ययसम्पत्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति । उभयापेक्षमित्युक्ते मोक्षस्थसुप्तिरिति मन्दस्याशंका स्यादतो मोक्षे सुप्तिरेव नास्तीति ज्ञापयितुमन्यतरापेक्षमित्युक्तं न त्वन्यतर एवार्थ इति । ज्ञाने विकल्पायोगात् । अतोऽवस्थाश्च लोकाश्च सर्वेऽपि विवक्षिताः । सर्वावतः आसमन्तात् सर्ववतः सर्वज्ञानान्युपादाय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V10_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बाह्यप्रकाशो भेत्युक्तो ज्योतिरान्तर उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखं स्वरूपभूतं यदानन्द इति कथ्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुन्नामविषयोत्थं यत्प्रकृष्टविषयात् प्रमुत् ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V11",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेते श्लोका भवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V11"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V11_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुक्रं जीवमादाय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शोकेन रत्या युक्तत्वाच्छुक्रो जीव उदाहृतः ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V11_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रत्यानन्दौ पूर्णनित्यौ हितौ तेन हिरण्मयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वर्णवर्णतया वापि वासुदेवो हिरण्मयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रधानहंसरूपत्वादेकहंस इतीरितः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V12"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V12_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंशेन जीवमादाय क्वचिदीशो बहिर्नयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नेषु फल्गुनं यद्वत् कृष्णः कैलासमानयत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वासनारूपकान् प्रायस्त्वन्तरेव प्रदर्शयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो बहिः कुलायादित्यपि वाङ्ग् न विरुद्ध्यते ॥ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उतेव स्त्रीभिस्सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उच्चावचेषु रूपेषु प्रविशन् पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहुरूपत्वमायाति स्वप्ने स जगतः प्रभुः ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": "मोदरूपत्वतो विष्णोः स्त्रीभिर्मोदो विडम्बनम् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तं नायतं बोधयेदित्याहुर्दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V14"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| |
| "text": "जीवस्य मृतिकाले च स्वप्नकाले च केशवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवंविधानि कर्माणि कुर्वाणोऽपि न दृश्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा जागरिते सुप्तौ मुक्तैरेव तु दृश्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथाऽपि नायतेऽभ्यस्तं ज्ञानी ब्रूयाज्जनार्दनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्य गोचरतां विष्णुः कदाचिन्न प्रपद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्यायतस्य पापस्य भेषजं न हि विद्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुप्तिकालोऽप्ययं विष्णोः सदा जागरितात्मकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यानि जागरिते पश्येत् तानि सुप्तेऽपि पश्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यज्ञानस्वरूपत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यानन्यप्रकाशत्वेऽप्यन्यज्योतिर्यदा भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा स्यात् संशयोऽज्ञानामित्यत्रेति विशेषणम् ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V14_B1"
| |
| },
| |
| "text": "जीवस्यापि स्वप्नावस्थायां जागरितत्वेऽस्येति विशेषणं व्यर्थम् । पूवोक्तमपि मोक्षायैव भवति । अत ऊर्ध्वं विशिष्टमोक्षाय ब्रूहि ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वयोग्यभगवद्दृष्टेः सर्वैर्मुक्तिरवाप्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनर्ज्ञानान्तराधिक्यात् सुखाधिक्यं विमोक्षगम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V14_B1"
| |
| },
| |
| "text": "स्वप्नसुषुप्त्युभयाभिप्रायेण तानि सुप्त इत्युक्तम् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V15",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V15"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V15_B1"
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| },
| |
| "text": "तत्र सुषुप्तिमात्राभिप्रायेण स वा एष एतस्मिन् प्रसाद इत्याह ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V15_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यत्रोभयविवक्षा स्यात् परामर्शस्तदोभयोः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एकस्यापि भवेन्नैकविवक्षायां क्वचिद् द्वयोः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V16",
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| "type": "mantra",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V16"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V16_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नाख्योऽन्तः स्थानं स्वप्नान्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तः स्थानं स्थलं वासः प्रदेश इति चोच्यते । इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V16_B1"
| |
| },
| |
| "text": "स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं चेत्यत्रापि स्वप्नान्तशब्दः स्वप्नसुषुप्त्युभयाभिप्रायेण ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V17",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V18",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V18"
| |
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V18_B1"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुभाशुभं तु दृष्ट्वैव स्वप्ने जागरितेऽपि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असंस्पृष्टः सदा दुःखैश्चरतीशः पुनः पुनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नसुप्त्यात्मकं कूलमेकं बुद्धात्मकं परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महामत्स्य इवासंगी चरत्येको जनार्दनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V19",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V19_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं विष्णुं श्येनवच्छ्रान्तो जीवो जागरिते भ्रमन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्ने च सुप्तावभ्येति संश्रान्तः सद्गृहं यथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वित्यानन्दः परो विष्णुस्तमाप्तः सुप्तः उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्प्राप्य तमयं जीवः कामयेन्नैव किञ्चन ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च स्वप्नसमभ्रान्तिज्ञानं याति कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुषुप्तौ च किमु ज्ञानान्मुक्तौ प्राप्तो जनार्दनम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V20",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V20"
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C04_S03_V20_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "निहितो भगवान्यत्र हिता नाड्यः प्रकीर्तिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "नानावर्णो हरिस्तासु नानारूपी व्यवस्थितः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "तासां मध्ये सुषुम्ना च तत्र सुप्तिं व्रजत्ययम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
| |
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| "text": "ता एव कण्ठदेशस्था जीवस्तत्र व्यवस्थितः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वप्नान् पश्यति जाग्रद्वद्भयं च प्रतिपद्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "अ इत्यादिश्यते विष्णुरविद्या तन्निरीक्षणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तेन स्वप्नानयं पश्येज्जीवो जागरितं तथा ॥ इति महामीमांसायाम् ॥",
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| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V20_B1"
| |
| },
| |
| "text": "जिनन्तीव ताडयन्तीव । विच्छाययति भयेन विच्छायं करोति । ओमेवेदं सर्वोऽस्मि स्वयोग्यतापेक्षया पूर्णोऽस्मि । विषयभोगानन्वितस्वरूपानन्देनेत्येवशब्दः ।\tइदमिति पूर्णत्वविशेषणम् । अजानता महिमानं तवेदम् इतिवत् स्वपूर्णतामापरोक्ष्येणानुभूयेदं पूर्णोऽस्मीति मन्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V20_B1"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्वचित्तद्भावशेषः स्यात् क्रियाशेषः क्वचिद्भवेत् ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "क्वचिद् पदार्थशेषः स्यादिदमादिस्त्रिधा स्मृतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इति शब्दनिर्णये ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V20_B1"
| |
| },
| |
| "text": "न हि राजा देवो वा सर्वजगद्भवति । राज्ञो भोगापेक्षया पूर्तिर्भवतीति देवदृष्टान्तः । प्रत्यक्षदर्शनार्थं राजदृष्टान्तः ॥",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V20_B1"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वयोग्यपूर्तेः स्वातंत्र्याद्राज्ञो देवगणस्य च ।",
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वभावस्तथा मोक्षे न तु सर्वस्वरूपतः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V21",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V21"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V21_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "छन्दसामप्यवाच्यत्वादतिच्छन्दा हरिः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनाश्लिष्टो ह्ययं जीवः सुप्तो मुक्तोऽथवा भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरूपं हि यन्नित्यमभयं पापवर्जितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आप्तकामं च पूर्णत्वादात्मकामं सुखत्वतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शोकं विना सुरमणाच्छोकान्तरमितीरितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V22",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V22"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनाश्लिष्टः स्वपुत्राणां दायादानां न वै पिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां दुःखाददुःखित्वान्न माता लोकमान्यपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अलोकमानान्नो लोको देवोऽपि स्वाधिकारतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वर्षणादेर्व्युत्थितत्वान्न देवो वेदमान्यपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवेदमानान्नो वेदः पापी पापफलाप्ययात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपापः श्रमणश्चापि यतिधर्मात् समुत्थितेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयतिस्तापसश्चैवमनिष्टं पुण्यमप्यमुम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्वेत्येवंविधो मुक्तो विष्णोः सम्प्राप्तिमात्रतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V23",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V23"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V23_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यत्तन्न विष्णुः पश्येत पश्यन् वै तन्न पश्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यज्ञानस्वरूपत्वात् तत्समं नान्यदिष्यते ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "यत्किञ्चिद्वस्तु भगवता न दृष्टं तन्नास्त्येव । विद्यमानं सर्वं पश्यत्येव । न हि द्वितीयो द्रष्टा यो विभक्तत्वेन जगत्पश्यति । तद्विरोधेन पश्यत्यभ्रान्तः । तद्दृष्टादन्यद्वा । नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्यादि श्रुतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्तद्दृष्टं भगवता तदेवास्ति न चापरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न ह्यन्यो विद्यते द्रष्टा यः पश्येत् तददर्शितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मादिरपि यो द्रष्टा पश्येत् तस्य प्रसादतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तददृष्टं कुतः पश्येदतः को वा विरोधतः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V23_B1"
| |
| },
| |
| "text": " यदवतारादिकं द्वैतत्वेन न पश्यति न तु तत्ततो द्वितीयम् । नित्यज्ञानत्वाद् भ्रमाभावात् । यद्विभक्तत्वेन विष्णुः पश्यति तत्ततोऽन्यदस्ति च इति च । यस्माद्विष्णुर्विश्वं विभक्तत्वेनैव पश्यति तस्मात् तदन्यदस्त्येव । न च जगदभावोऽत्रोच्यते । अन्यद्विभक्तमिति विशेषणवैयर्थ्यात् । न च भ्रान्तिकल्पितं जगदित्यत्र किञ्चिन्मानम् । असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् इत्यादि निन्दनाच्च । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V24",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V25",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V26",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V27",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V28",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V29",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V30"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
| },
| |
| "text": " द्रष्ट्रन्तरनिषेधेन तस्यैव सर्वद्रष्टृत्वमेव च यत्र वा अन्यदिव स्यादित्यादिनोपसंह्रीयते । अन्यथाऽन्योऽन्यत् पश्येदित्यादिकमनर्थकम् । न ह्येकस्यान्यत्वेऽन्यस्यानन्यत्वं भवति । अतो द्वितीयोऽन्यशब्दः व्यर्थ एव स्यात् । न च तत्पक्षे दृश्यत्वादिकमात्मनो विद्यते । तस्माद् यत्र किञ्चिदपि स्वातंत्र्यमन्यस्य भवति तत्रैव भगवतोऽन्यः पुरुषो भगवद्दृष्टादन्यत् पश्यतीत्यादि युज्यते तदेव नास्ति स्वतः । अतो नान्योऽन्यत्पश्येदित्यर्थः । अन्यदिवेतीवशब्दोऽल्पस्वातंत्र्याद्यर्थे । राज्ञः पृथगिव भृत्य इतिवत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
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| |
| "text": "उपमार्थे तथाऽल्पत्वेऽपीवशब्दः प्रयुज्यते ॥ इति शब्दनिर्णये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वरूपभेदे स्वातंत्र्ये विरोधे च विलक्षणे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यशब्दश्चतुर्ष्वेषु प्रयोक्तव्यो मनीषिभिः ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
| },
| |
| "text": " अनन्याः सर्व एवैते योधाः कुन्तीसुतादपि । इति प्रयोगाच्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
| },
| |
| "text": " दशरात्रैर्भुक्तमिव न सम्यक् स्वल्पभोजनात् । इति च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतेः पुरुषाणां च नाणुमात्रमपि क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वातंत्र्यं विष्णुना सर्वे नियताः सर्वदैव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तददृष्टं ततः को हि पश्येत् किं वाऽपि तद्भवेत् ॥ इति महामीमांसायाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "text": "अभेदेन स्वावतारांजीवाजीवं तु भेदतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यदभ्रमो हरिर्वेत्ति स तदन्यच्च तद्द्वयम् ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BR_C04_S03_V30_B1"
| |
| },
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| "text": "अन्यदप्यस्वातंत्र्येणान्यवदवस्थितं यस्मिन् पक्षेऽस्ति तत्रैवान्यदर्शनादिव्यवहारो युज्यते । सप्तमरसादिदर्शनाभावादिति च । सर्वेंद्रियोपभोगोऽपि विष्णोः स्वात्मनि विद्यते । ",
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| "tail": "\n "
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| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "text": "यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "यदि जगदेव न स्यात् तदा कथं मोक्षेऽप्यन्यानि भूतानि मात्रां उपजीवन्तीति युज्यते । मोक्षप्रकरणं चैतत् । स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति भगवद्वचनम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "तदा तस्यां परो विष्णुरेको द्रष्टा व्यवस्थितः ॥",
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| "text": "अविरोधादद्वितीय एकोऽसौ समवर्जनात् ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "बृहज्ज्ञानाद् ब्रह्मलोकः सदैव पुरुषोत्तमः ॥",
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| {
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| "text": "सार्वगत्वादस्य गतिः परा विष्णोः सदैव हि ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "पूर्णैश्वर्यादस्य सम्पत् परमा सम्प्रकीर्तिता ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "सार्वज्ञ्यात् परमो लोको विष्णोरानन्द एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वातंत्र्यात् परमो ज्ञेयः स हि पूर्णः सदोदितः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रतिबिम्बरूपविप्लुट्कांस्तदानन्दस्य चाखिलाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मुक्ता ब्रह्मादयोऽश्नन्ति तारतम्येन नित्यदा ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सलीलः सलिल इति वा ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| "text": "स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अन्येभ्यस्तु विमुक्तेभ्य आनन्दश्चक्रवर्तिनाम् ।",
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मुक्तानां हि शतोद्रिक्तः पितॄणां तेभ्य एव च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेभ्योऽप्यृषीणां मुक्तानां कर्मदेवाभिधायिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेभ्यश्च मुक्तदेवानां तेभ्यश्चोमापतेस्तथा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माच्च ब्रह्मणस्त्वेवं मुक्तस्य गरुडादपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष एव ततो विष्णुः पूर्णानन्दः प्रकीर्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्य ब्रह्माऽपि मुक्तः सन् विप्लुण्मात्रं समश्नुते ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": "राद्धो मुक्तः । मनुष्याणां योग्यतया स्वसमेभ्यः प्रयत्नाधिक्यादाधिक्यं मुक्तौ प्राप्तुं शक्यत इत्यतः समृद्ध इत्युक्तम् । यावत्साधयितुं शक्यते तावत् साधनैः सम्पूर्णत्वेन मुक्त इत्यर्थः । स्वराष्ट्रे ज्ञानोपदेष्टृत्वात् मुक्तावपि तेषामधिपतिः । ज्ञानपूर्वकत्वेन मनुष्यत्वे दानादिकं कृत्वा तत्फलैरपि भोगैर्मुक्तौ सम्पन्नतमः । न हास्य कर्म क्षीयते इति श्रुतेः । अन्यथा राद्ध इति विशेषणं व्यर्थं भवति । स मनुष्याणां परम आनन्द इति स्वरूपानन्दश्चात्रोच्यते । न ह्यमुक्तानां स्वरूपानन्दानुभवोऽस्ति ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " भुज्यते स्वसुखं मुक्तैराभासोऽन्यैस्ततोऽपरः इति च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " जितलोका इत्यपि मुक्ता एवोच्यन्ते । गन्धर्वलोके गन्धर्वाणां ब्रह्मज्ञाने मुक्तावित्यर्थः । तदा हि ब्रह्मज्ञानं सदोदितमवतिष्ठते । एष ब्रह्मलोकः सम्रात्यिदिषु ज्ञानस्यैव लोकशब्दोदितत्वात् । यश्च श्रोत्रिय इति वचनं तेषामाजानादीनामपि मुक्तानामेवायं नियमेनानन्दशतगुणोद्रेकः । अन्यदा तु कदाचिद्भवति । कदाचिद्व्याकुलतया न भवतीति दर्शयितुम् । चशब्दस्तु श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानां गुणानां मुक्तौ समुच्चयार्थः । मुक्तस्यैवैते गुणा भवन्तीति मुक्तस्वीकारार्थं य इति विशेषणम् ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वं श्रुतिफलं मुक्तैः प्राप्यं नान्येन केनचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतस्तु श्रोत्रियो मुक्तो ह्यन्यः श्रोत्रियको भवेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदुःखत्वं च तस्यैव कामैरहतता तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः कामितं न प्राप्नोति स कामहत उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "काम्याप्राप्तेश्च पापाच्च कामात् कामहतः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उभयस्याप्यभावेन मुक्तोऽकामहतो मतः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " आजानदेवा इंद्राद्या जातेभ्यस्ते वरा यतः इति च । \t",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": "प्रजापतिलोक इत्युक्तेनैव मुक्तप्रजापतिसिद्धावपि मुक्तस्यैव प्रजापतेर्ब्रह्मणश्चायं विशेष इति स्वरूपकथनार्थं यश्च श्रोत्रिय इत्यादि । अनुपचरितश्रोत्रियादित्वमिति ज्ञापयितुमभ्यासः । सर्वेषामपि मुक्तानां नियमेन तदस्तीति ज्ञापयितुं च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " प्रजास्तु पशुशब्दोक्ताः पशुपस्तु प्रजापतिः इति च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " अथशब्दादेष ब्रह्मलोक इति विशेषणाच्च द्वितीयब्रह्मलोकशब्देन परब्रह्मैवोच्यते । अन्यथैष एव परम आनन्द इत्युक्त्वा पुनरेष इतिशब्दोऽनर्थकः स्यात् । तस्यैव ब्रह्मलोकशब्देन पूर्वमभ्यासाच्च । न च तैत्तिरीयादिश्रुतिविरोधः । शतशब्दस्यायुते दशलक्षादावपि समत्वात् । अतश्चक्रवर्तिभ्यो मनुष्यगन्धर्वाः शताधिकाः । देवगन्धर्वा अयुताधिकाः । पितरो दशलक्षाधिका इत्यविरोधः । उत्तमगन्धर्वापेक्षया पितृभ्यो गन्धर्वाणामाधिक्यं च युज्यते । आजानदेवेभ्यो जाता आजानजा इत्यतस्तत्राप्यविरोधः । यत्राजानजा इत्येवोपरिपाठस्तत्राजानेभ्यो ब्रह्मादिभ्यो जाता इति भवति । इंद्रबृहस्पत्यादीनां विशेषस्तु विशेषवचनत्वादत्राप्यंगीकर्तव्य एव ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "सामान्यधर्मो बलवान् धर्माद्वैशेषिकाद्यथा ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बलवद्विशेषवचनं सामान्यवचनात् तथा ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नृपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरस्तथा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "देवैः सहितगन्धर्वा ऋषयो देवतास्तथा ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इंद्रो बृहस्पतिश्चैवं प्रधानेंद्रः पुरन्दरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशो मुक्ताः शतगुणोत्तराः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "अतिप्रयत्नतो यावत्प्राप्तुं शक्यं विमुक्तिगम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सुखाद्यं तस्य सम्प्राप्त्यै ज्ञानश्रेण्यः क्रमात् स्मृताः ॥",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एकां श्रेणीं प्रविज्ञाय तदुत्कृष्टां च तद्वराम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "क्रमेणैव विजिज्ञासुर्जनकः पृच्छति स्म ह ॥",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पुनः पुनर्विमोक्षाय ब्रूहीत्यद्धा वरात् पुरा ॥ इति च ॥",
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| |
| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रहस्यमस्यायोग्यं च यदि मामेष पृच्छति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "दत्तो मया वरोऽस्येति वक्तव्यं मे भविष्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इति भीतोऽभवद्राज्ञो याज्ञवल्क्यः सुमेधया ॥ इति ब्रह्मांडे ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V33_B1"
| |
| },
| |
| "text": " तेभ्योऽश्वलादिभ्यः ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V34",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V34"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "सर्वदा जीवमादाय नियमाद् विष्णुरेव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जाग्रदादिषु संयाति नान्यथा तु कथञ्चन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "एवं नियमविज्ञप्त्यै जीवास्वातंत्र्यवित्तये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परिवृत्तिमवस्थासु साभ्यासा वक्ति हि श्रुतिः ॥ इति निर्णये ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V34_B1"
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| "text": "अतस्तात्पर्यार्थं पुनर्वचनम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "यथा ग्रामं परित्यज्य यात्यनः पुमधिष्ठितम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं देहं परित्यज्य विष्णुनाऽधिष्ठितः पुमान् ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BR_C04_S03_V36",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S03_V36"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अणिमानं भगवन्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स य एषोऽणिमा तेजः परस्यां देवतायाम् इति हि श्रुतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V36_B1"
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| "text": "उपतपता रोगादिना ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V36_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आम्रं बाल्येऽपि पतति परिणामे ह्युदम्बरम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्यक् पाके यथाऽश्वत्थफलं जीवमृतिस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कलावाम्रोपमा जीवास्त्रेतास्वौदुम्बरोपमाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कृतेऽश्वत्थसमाश्चैव यान्ति ब्रह्मवशाः सदा ॥ इति पाद्मे ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V36_B1"
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V36_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वायुमेवाद्रवत्येष जीवो मोक्षाय तत्त्ववित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदनुज्ञयैव ज्ञानित्वमतस्तं पुनराव्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेऽपि वायुमासाद्य जायस्व ज्ञानमाप्नुहि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति तस्य वरादेव जायन्ते ज्ञानिनोऽखिलाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनस्तं प्राप्य मुक्तिञ्च प्राप्नुयुस्तदनुज्ञया ॥ इति प्रवृत्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V37",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| |
| "id": "BR_C04_S03_V37_B1"
| |
| },
| |
| "text": " इदं मुक्तजीवस्वरूपमायाति । अतोऽनेन सहेदं परं ब्रह्मायातीति परब्रह्मणः पूजार्थं प्रतिकल्पन्ते । यथा राज्ञो ध्वजादिकं दृष्ट्वाऽयं ध्वज आगच्छति तस्माद् राजाऽऽयातीति पूजां प्रतिकल्पन्ते तद्वत् । अन्यथेदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति द्विरुक्तिर्व्यर्था स्यात् । वीप्सात्वे त्वयमायातीत्येकप्रकारेण शब्दाभ्यासः स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एकप्रकारशब्दानामभ्यासस्त्वादरार्थकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वरवर्णादिमात्रं वाऽप्यन्यथा चेत् तदा परः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्थः स्यादेष नियमो वाक्ये वीप्सापदे तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रातिस्विकार्थेऽपि भवेदभ्यासे वा तथा स्थिते ॥इति शब्दनिर्णये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V37_B1"
| |
| },
| |
| "text": "न च कुत्रचिदादरार्थे द्विरूपप्रयोगो दृष्टोऽनन्तरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V37_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा मुक्तो व्रजत्यूर्ध्वं तदा तत्सहितो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियमाद् दृश्यते देवैरमुक्ते नियमो न तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा ध्वजादिकं दृष्ट्वा पूजां राज्ञः प्रकुर्वते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं विमुक्तिगं दृष्ट्वा विष्णोः पूजां प्रकुर्वते ॥इति तत्त्वनिर्णये ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V37_B1"
| |
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| |
| "text": "तस्मादणिमानं न्येतीत्यादिना जीवगतं ब्रह्मैवोच्यते । जीवोपतापादि तु नैव ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S03_V38",
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| "adhikarana-id": "",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "text": "॥ इति ज्योतिर्ब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति ज्योतिर्ब्राह्मणम् ॥ ६३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
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| {
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| "text": "जीवमादाय गच्छन्तमनुयान्ति दिवौकसः ।",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "प्राणाभिमानिनो विष्णुं नृपं परिजना यथा ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "ग्रामण्यस्तु चमूपालास्ते सर्वे द्विविधा मताः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "राज्ञा सह स्थिताश्चैव तथा जनपदे स्थिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "ते सर्वेऽपि नियन्तव्या श्रेणिभिर्द्विविधैः सदा ॥ इति राजनीतौ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S03_V38_B1"
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| "children": [
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| {
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| "text": "अनुयान्ति शरीरस्था अभियान्ति स्वलोकगाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मुक्तमादाय गच्छन्तं विष्णुं सर्वे दिवौकसः ॥ इत्यध्यात्मे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04",
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| "text": "शारीरब्राह्मणम्",
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| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तं यदा प्राप्य जीवात्मा मृतेः पूर्वं विमुग्धताम् ॥",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "याति विष्णुं तदा देवा यान्ति तेजःस्वरूपिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानादाय हरिश्चक्षुःस्थानाद्धृदयमाव्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा न किञ्चिज्जानाति जीवो ब्रह्मसमाश्रितः ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "एनं बल्यमभिसमायान्ति । पराक् स्थितश्चाक्षुषो भगवान् प्रत्यक्परावर्तते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः इत्यादिश्रुतेः ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति स विज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "चक्षुरादिषु रूपाणि जाग्रत्काले तयोः सदा ॥",
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| |
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| {
| |
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| "text": "बहूनि सन्ति तान्येव यदैकीभावमाप्नुयुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "हृदयस्थेन रूपेण तदा जीवो न किञ्चन ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "जानातीति विदुः प्राज्ञास्तदा विष्णोः स्वतेजसा ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "द्योतते हृदयाग्रं च तेन द्वारेण केशवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निष्क्रामेज्जीवमादाय प्राण एनमनुव्रजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणमन्ये तथा देवा विद्या कर्म च योग्यता ॥ इति महामीमांसायाम् ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कर्माभिमानी गरुडो ब्रह्मा ज्ञानाभिमानवान् ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पूर्वप्रज्ञा योग्यता स्याद्रमा तदभिमानिनी ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एतेऽपि विष्णुं गच्छन्तमनुयान्ति सदैव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वायुर्ज्ञानात्मकश्चैव प्राणात्मक इति द्विधा ॥अनुयाति हृषीकेशं सर्वैर्देवैः समन्वितः ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C04_S04_V02_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "देवलोके चिरं रत्वा यस्तु मुक्तिं व्रजिष्यति ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स तु तद्देवताद्वारेणोत्क्रामति न संशयः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्लोकं परं गच्छन्नुत्क्रामेन्मूर्ध्न एव तु ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तथैव ब्रह्मणो लोकं सुषुम्नाया विभेदतः ॥ इत्यध्यात्मे ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "id": "BR_C04_S04_V02_B1"
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| |
| "text": "सविज्ञानो भवति । जीवेन सहितो भवति । सविज्ञानं जीवमेवान्ववक्रामति । जीवमारुह्य गच्छति भगवान् प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इति ह्युक्तम् । यो विज्ञाने तिष्ठन् य आत्मनि तिष्ठन् इत्युभयोर्जीवाभिप्रायेण हि पाठः । शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इति भगवद्वचनम् । विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र इति च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "एष आत्मा निष्क्रामतीति जीवांगीकारे शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते इत्यादिकमयुक्तं स्यात् । न हि जीवः शरीरं निहत्याविद्यां गमयति रूपान्तरं वा करोति । न च सर्वमयत्वं जीवस्य । ब्रह्मेति विशेषणाच्च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C04_S04_V03",
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| "text": "तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वा अन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "id": "bhashya-BR_C04_S04_V03"
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| "id": "BR_C04_S04_V03_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवस्य सूक्ष्मरूपं तु प्राप्य स्थूलं परित्यजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं शरीरं भूतेषु विलापयति केशवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविद्यां चैव जीवस्य गमयेज्ज्ञानसर्जनात् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C04_S04_V04",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद्यथा पेशस्करी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वा अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "शुद्धेन तेन चात्मेष्टं कुरुते रूपमंजसा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं स भगवान् विष्णुर्जीवस्वर्णस्य यन्मलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविद्याकामकर्माद्यमात्माग्नौ नाश्य सर्वकृत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वेच्छया कुरुते रूपं यद्योग्यं तस्य मुक्तिगम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितृजीवस्य पित्र्यं स गान्धर्वं तस्य चैव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैवं तु देवजीवस्य प्राजापत्यं प्रजापतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणो ब्राह्ममेवेति नित्यानन्दस्वरूपकम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न योग्यतां विना क्वापि पूर्वप्रज्ञाश्रुतेः क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा मुक्तो भवेद् ब्रह्मा तदा ब्रह्मा स मुख्यतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं प्रजापतिश्चैव तथैवान्येऽपि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यथा हि स्वर्णरूप्याद्यं मलहानौ हि तद्भवेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वं तु योग्यतामात्रं द्विजत्वं बालके यथा ॥ इत्यादि च ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| },
| |
| "text": "न ह्यमुक्तानां कल्याणतरत्वम् । न च मृगादीनां कल्याणत्वमपि । मरणमात्रं चेदत्रोच्यते तदा कल्याणतरमिति विशेषणं व्यर्थमेव स्यात् । पूर्वोक्तश्रोत्रियावृजिनाकामहतदेवादीनां चात्रोक्तिः । पूर्वाननुभूतत्वान्नवतरं च भवति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अल्पतेजस्तथैवाल्पं जीवरूपं हि संसृतौ ।",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तथैव सुमहत्तेजः करोति भगवान् महत् ॥",
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो नवतरं चैतद्ब्रह्मादीनां करोत्यजः ॥ अन्येषां वा भूतानां मनुष्यादीनाम् । नासुरादीनां भविष्यतीति च ।",
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "मयं तु मानुषं स्वर्णं पीतं गान्धर्वमेव च ।",
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| |
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| {
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| "text": "इंद्रगोपनिभं नाम्ना जाम्बूनदमिति स्मृतम् ॥",
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| {
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| "text": "दैवं चामीकरं नाम प्रोद्यदादित्यसन्निभम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "नैजो विशेषः स्वर्णानामेतेषां सर्वदैव च ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नाग्न्यादिनापि समतां यान्ति तानि कथञ्चन ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "एवं मानुषगन्धर्वपितृदेवाः प्रजापतिः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "ब्रह्मेति क्रमशो जीवा विशिष्टा उत्तरोत्तरम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्वभावेनैव मुक्तानां स्वभावो व्यक्तिमाव्रजेत् ॥ इत्यादि च ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
| |
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| |
| "text": "स यत्राणिमानं न्येति तस्य ह वै तस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वा विमुक्ताः तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च इत्येवमादेश्च मुक्तविषयमेवैतत् । मुक्तविषयत्वेन चैतत्प्रकरणं सूत्रयामास भगवान् । तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् इत्यादिना ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
| |
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| |
| "text": "न चान्या मुक्तिरस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् ब्रह्मणा विपश्चिता । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स य एवंविदेवं पश्यन्नेवं मन्वानस्तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति स एकधा भवति त्रिधा भवति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| "text": "पञ्चधा सप्तधा पुनश्चैकादश स्मृतः ",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| "text": "न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।",
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| "text": "एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| },
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| "text": "तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "परं भूयःप्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
| |
| },
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| "text": " श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशंगवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
| |
| },
| |
| "text": " इत्यादिश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तेषां निर्गुणमुक्तिविषयत्वेन प्रसिद्धेष्वेव स्थलेषु मुक्त्यनन्तरं भोगोक्तेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V04_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "अशरीरक्रिया गौणदेहादेस्ते ह्यभावतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिदानन्दशरीरादेः सदेहाद्या विमोक्षिणः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दा सुगंधिनः ॥ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "tag": "line",
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| "text": "स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयोः वायुमयः आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयस्सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनाथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C04_S04_V05"
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V05_B1"
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| },
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| "text": " मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V05_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "आत्माऽयमाततत्वाद्धि ब्रह्म पूर्णगुणत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "दूरस्थत्वात् स इत्युक्तः समीपस्थो ह्ययं स्मृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
| "text": "पूर्णज्ञानस्वरूपत्वाद् विज्ञानमय ईर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वमन्तृस्वरूपत्वात् स एवोक्तो मनोमयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बलपूर्णस्वरूपत्वात् स प्राणमय ईरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वद्रष्टृस्वरूपत्वाच्चक्षुर्मय इतीर्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वश्रोतृस्वरूपत्वात् स श्रोत्रमय ईरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधारात् सुगन्धत्वात् पृथिवीमय उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वतृप्तिकरत्वाच्च विष्णुरापोमयः स्मृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वकर्तृस्वरूपत्वाच्छ्रुतो वायुमयो हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवकाशप्रदातृत्वादाकाशमय ईर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णतेजःस्वरूपत्वात् तेजोमय उदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सृष्ट्यादीच्छास्वरूपत्वात् स्मृतः काममयो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदुष्टप्रतीपत्वात् स हि क्रोधमयो मतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखादिधर्मरूपत्वाज्ज्ञेयो धर्ममयः प्रभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्राकृतस्वरूपत्वादनेतन्मय एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपार्थिवो हरेर्गन्धो न तृप्तिश्चाप्यबात्मिका ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाग्नेयं तस्य तेजोऽपि न च वायुर्बलं हरेः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्राद्या नास्य चाकाशो मनस्तत्त्वं न तन्मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुद्धितत्त्वं न तद्बुद्धिर्नाहमस्याहमुच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महदात्मकं न तच्चितं प्रकृतिर्नास्य चेतना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृत्यादिगुणा यस्मात् तद्गुणप्रतिबिम्बकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः सर्वमयो विष्णुः सर्वाद्यत्वादतन्मयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिदानन्दात्मकास्तस्य गुणाः सर्वगुणात्मकाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदाऽतः सर्ववैलक्षण्यमेषां प्रकीर्तितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्रोधः क्षमात्मको यस्य चिदानन्दात्मकस्तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यक्रोधसमः क्रोधस्तस्य विष्णोः कथं भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सर्वगुणास्तस्य सर्वेभ्योऽपि विलक्षणाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वप्रज्ञानुसारेण विमुक्तस्तमुपेष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादिकालसम्बद्धा या प्रज्ञा विष्णुसंश्रया ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वप्रज्ञेति सा प्रोक्ता ब्रह्मादेस्तारतम्यतः ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वर्तमानं यतो विष्णोर्वशे तस्मादिदम्मयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतीतानागतं यस्मात् तद्वशेऽतो ह्यदोमयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राधान्ये च मयट् प्रोक्तः स्वरूपे च यतो भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदंरूपोऽप्यदोरूपस्ततो नित्यत्वतो हरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य तस्य प्रधानस्य नित्यपूर्णबलत्वतः ॥ इत्यादि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V05_B1"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यथा पूर्वं तथेदानीमिति विष्णुस्तदुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यथा बाह्ये तथैवान्ते ततो यदिति चोच्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथेदानीं तथा नित्यं यस्मादेष भविष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अत एतदिति प्रोक्तो वासुदेवो जगत्पतिः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स यथा करोति पुरुषं तथैवायं भविष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "साधुर्भवति साधुं चेत् करोति पुरुषोत्तमः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पापो भवति पापं चेत् स करोति जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रेरितेन पुण्येन पुण्यो भवति मानवः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रेरितेन पापेन तथा पापः पुमान् भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आहुश्च तत्कामाधीनं जीवमेनं सदैव हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्कामादस्य कामः स्याद्यथाकामस्तथा भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामानुसारिणी निष्ठा कर्मनिष्ठानुसारतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "फलं कर्मानुसारेण विष्णोः काममयस्ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवोऽयं सर्वदैव स्यान्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ इत्यादि च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "जीवेश्वराभेदांगीकारे सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति सूत्रविरोधः । प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः इत्यादि श्रुतिविरोधश्च । न च व्यावहारिकभेदो नाम कश्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । भ्रान्तिभेदत्वे श्रुतिसिद्धत्वमेव न स्यात् । न हि निर्दोषश्रुतिवाक्यसिद्धं भ्रान्तमिति युक्तम् । उन्मत्तवाक्यवत् सर्ववेदस्याप्रामाण्यप्रसक्तेः । न च स्वविषयस्य भ्रमत्वादन्यदप्रामाण्यं नाम किञ्चित् । तन्मते ह्युन्मत्तवाक्यविषयस्याप्यनिर्वचनीयत्वमेव ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवः । त एते सत्याः कामाः इत्यादिश्रुतिभिर्भगवद्गुणानां सत्यत्वमेव ज्ञायते । सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः इति सर्वजीवानां भगवदनुजीवनं च सत्यमित्येवोच्यते । तदा कथं जीवभेदस्यासत्यता । न च सर्वविध्यर्थक्रियासिद्धस्य कुत्रचिद् बाधो दृष्टः । न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते इति मुक्त्यनन्तरमपि तदधीनत्वप्रतीतेश्च । न भेदस्यासत्यता । न हि संसारावस्थायामक्षीणकर्मता भवति । न च मुख्यार्थं परित्यज्यामुख्यो युक्तः । अतः सत्य एव भेदः । स भगवान् यथाकारी तथा कारयति यथाचारी यथा चारयति तथा भवति । स भगवान् यथा कामो भवति तथा कामो जीवो भवति । इत्थं कामोऽस्य भूयादिति भगवदिच्छावशादस्य कामो भवतीत्यर्थः । क्रतुरितीत्थं करिष्याम्येवेति निश्चयरूपः कामः । स भगवदिच्छया हि भवति । कामेन मे काम आगात् इति च श्रुतिः ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तदेष श्लोको भवति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिंगं मनो यत्र निषिक्तमस्य ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्माल्लोकात् पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकामः आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S04_V06"
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S04_V06_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अ इत्युक्तः परो विष्णुस्तत्कामोऽकाम ईरितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा कामयमानः स योग्यकामस्य चापि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कादाचित्कसमुद्भूतेर्भगवत्कामनां विना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामितस्याखिलस्याप्तेराप्तकामश्च मुक्तिगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चिदानन्दात्मकं रूपं कामत्वेन भविष्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतस्तेनैवाप्तकाम इति मुक्तोऽभिधीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तस्य न पुनः प्राणा उत्क्रामन्ति कदाचन ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवोऽपि ब्रह्मशब्दोक्तो जडाद्गुणबृहत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्नोति परमं ब्रह्म प्रलये प्रलये सदा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मअन्यदा स्वेच्छया विष्णोः स्वरूपाद् बहिरेष्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वेच्छयाऽन्तर्बहिर्वैवं रमते मुक्त आत्मवान् ॥ इत्यादि च ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "text": "न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BR_C04_S04_V07",
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| "children": [
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| "text": "तदेष श्लोको भवति ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तद्यथाऽहिर्निलयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥",
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| {
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| },
| |
| "text": " अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥ ",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "यावद्विमुच्येत् पुरुषस्तावत् कामा हृदि श्रिताः । चित्ताभावाद्विमुक्तस्य स्युः कामास्तद्गताः कुतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "स्वरूपभूतचित्तेन कामाद्याः स्युः सुखात्मकाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "दुःखात्मकाः प्राकृता वा मुक्तानां न कथञ्चन ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अयं जीवोऽथ मुक्त्यनन्तरमेवाशरीरो भवति । अमृतः कदाऽपि न मृतः । प्राणाख्यं परब्रह्मैव । कतम एको देव इति प्राण इति । स ब्रह्मेत्याचक्षते इत्यादिश्रुतेः । तेज एव च । तेज इति श्रीः ॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अन्येषाममृतत्वं तु भवेद् विष्णोः प्रसादतः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नित्यामृतः स भगवान् श्रीश्च नान्यः कथञ्चन ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इति नारदीये ॥",
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| {
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| "text": "प्राणस्तु भगवान् विष्णुः सर्वनेतृत्वतो विभुः ।",
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| {
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| "text": "तेजस्तु सर्वतेजस्त्वाच्छ्रीरेव समुदाहृता ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "text": "तदेते श्लोका भवन्ति ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वो विमुक्ताः ॥ ८ ॥",
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| |
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| "text": "तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अणुश्च विततश्चासौ यतोऽन्तर्बहिरेव च ॥",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "श्रिया स्पृष्टः श्रीपतित्वादनु वित्तस्तथैव च ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्य प्रसादात् संयान्ति तल्लोकं सर्वमोक्षिणः ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "ऊर्ध्वः स भगवान् सर्वविशिष्टो यत्सदैव हि ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| {
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| "text": "तस्मिञ्च्छ्लुक्लमुत नीलमाहुः पिंगलं हरितं लोहितं च ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् तैजसश्च ॥ ९ ॥",
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| "text": "शुक्लं तु वासुदेवाख्यमनिरुद्धं तु नीलकम् ।",
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| "text": "संकर्षणं पिंगलं च प्रद्युम्नं हरितं स्मृतम् ॥",
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| "text": "नारायणं लोहितं स्यात् पञ्चरूपाण्यजे हरौ ।",
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| "text": "स पन्था ब्रह्मणा ज्ञातः पद्मजेनैव सन्ततम् ।",
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| "text": "परब्रह्मस्वरूपज्ञो महातेजः श्रियस्तथा ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "सम्यक्स्वरूपविज्ञानात् तैजसत्वेन कीर्तितः ।",
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| {
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| "text": "भगवत्कर्मकर्तृत्वात् पुण्यकृच्चाभिधीयते ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "एवंविधोऽपि तस्यैव प्रसादाद्याति तां गतिम् ।",
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| "text": "अतः पन्थास्समुद्दिष्टो भगवान् केशवः स्वयम् ॥",
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| "text": "स्वगताखिलभेदेन विहीनोऽपि स सर्वदा ।",
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| "text": "सर्वेषां व्यवहाराणां भेदोत्थानां स ईश्वरः ॥",
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| "text": "अभिन्नोऽपि ह्यतो भिन्नः पञ्चभेदादिना मृषा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| |
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| "text": "अप्राप्तत्यागिनः प्राप्तनिष्ठाहीनो हि दोषवान् ॥",
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| |
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| "text": "तेऽपि यान्ति तमो घोरं नित्योद्रिक्तासुखात्मकम् ॥ इत्यादि च ।",
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| "id": "BR_C04_S04_V11_B1"
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| },
| |
| "text": "बुधः सकाशेऽप्यविद्वांस इत्यर्थः ।",
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| |
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| {
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "बोधनाज्ज्ञानवान् भुत् स्यात् तत्सकाशाच्च ये हरिम् ।",
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "न विदुस्ते तमो यान्ति सर्वदुःखात्मकं परम् ॥",
| |
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| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १२ ॥",
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| |
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| "children": [
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| "text": "यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योग्यः शरीरच्छेदादेः कथं दुःखी तदा भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दुःखी शरीरसम्बन्धाज्जीवो विष्णोः प्रसादतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदुःखी विप्लुडानन्दं मुक्त एव च भोक्ष्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यमुक्तः पूर्णसुखः स्वतंत्रः पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परतंत्रः कथं जीवो योग्यः सोऽस्मीति वेदितुम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सोऽस्मीति नैवायं विजानीयात् कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदीयोऽस्मीति जानीयात् सर्वदैव बुधस्ततः ॥ इति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "text": "यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मा अस्मिन् सन्दोघे गहने प्रविष्टः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य लोकः स एवैको यो लोकः परमात्मनः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स हि विष्णुः परो वायोरपि कर्ता प्रकीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विश्वो वायुः समुद्दिष्टः पूर्णत्वाज्जीवसङ्घतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदन्यस्यापि सर्वस्य कर्तैको विष्णुरेव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रविष्टो गहने देहमध्ये सन्दोहनामनि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तज्ज्ञानी याति तं लोकं तत्प्रसादाच्च वर्तते ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "यदैतमनुपश्यन्त्यात्मानं देवमंजसा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "यस्मादर्वाक् संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ १६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ज्योतिषां ज्योतिरचलं तद्देवाः समुपासते ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मूलप्रकृतिसंयुक्तं यद्गतं प्रतिपूरुषम् ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।",
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| "text": "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "तद्भेददर्शी संयाति मृत्योर्मृत्य्वभिधं तमः ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "विरजः पर आकाशादज आत्मा महान् ध्रुवः ॥ २० ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V21",
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| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "परिमाणविहीनत्वादप्रमेय इतीरितः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": " इत्यादिवचनादप्रमेयत्वमवाच्यत्वममनोविषयत्वं च सर्वात्मना न । मनसैवानुद्रष्टव्यमित्युक्तत्वात् ।",
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| "text": "न च केनाप्यवाच्यस्य लक्षणा दृष्टा । क्षीरमाधुर्यविशेषादेरपि तत्तच्छब्देनैव वाच्यत्वात् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "विशदं क्षीरमाधुर्यं गुडे तीक्ष्णं घृते स्थिरम् इत्यादि च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C04_S04_V21_B1"
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| "text": "न च निर्गुणस्य सत्वमेवास्ति । गुणभेदादीनामपि सन्त्येव गुणाः । न चानवस्था स्वनिर्वाहकत्वात् ॥ ",
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S04_V21_B1"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवाच्यममनोगम्यमगुणं चेत् कुतोऽस्ति तत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादेवं वदन् वस्तुशून्यतामर्थतो वदेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणाश्च गुणिनः सर्वे स्वेनैव गुणिनो गुणाः ॥\" इत्यादि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवत्येतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येतद्ध स्म वैतत् पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते । किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "सर्वमस्य वशे यस्माद्धरिः सर्ववशी ततः ।",
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| |
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| {
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| "text": "सर्वस्य ब्रह्मरुद्रादेरन ईशान एव च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "गुणाधिकः पालकश्चेत्यतोऽधिपतिरीरितः ॥ \"इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नित्यबोधात्मकत्वाद्यो मुनिः प्रोक्तो जनार्दनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं विद्वांश्च मुनिर्नाम बोधस्तस्याप्यमुख्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| |
| "text": "यं विदित्वा विमुक्ताश्चायुक्तकामविवर्जिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्पत्तिलयहीनाश्च नित्यानन्दैकभोगिनः । आनन्दभिक्षां विष्णूत्थां चरन्त्यज्ञानवर्जिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एष मोक्षदो विष्णुर्यत्कल्याणं कृतं मया। पापं कृतं मयेत्येतन्न कदाचित् करिष्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कृते मया पुण्यपापे इति यच्चेतनात्मनाम् ।तत्सर्वमत एवोक्तं विष्णोः सर्वेश्वरेश्वरात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तीर्णो हि वर्तते नित्यं पुण्यपापे जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैनं कदाचित् तपतः पुण्यपापे जनार्दनम् ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
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| "text": "तस्यैव स्यात् पदं वित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति ॥",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मादेवंवित् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राड् इति होवाच याज्ञवल्क्यः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| "text": "शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः ।",
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| |
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| "text": "हृदिस्थविष्णौ सन्तोषः सदैवोपरमः स्मृतः ॥",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तितिक्षा द्वन्द्वसहता क्षमा क्रोधासमुत्थितिः ॥इति शब्दनिर्णये ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "सर्वः पूर्णः समुद्दिष्टस्तथा ज्ञेयो जनार्दनः ।",
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| |
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| {
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| "text": "रागसन्देहपापानि तथा जानंस्तरिष्यति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यं हि रागपापादेर्मुक्तो यत्पुरुषोत्तमः । वेदाख्यब्रह्मणान्यत्वाद्विष्णुर्ब्राह्मण उच्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पूर्णत्वाज्ज्ञानरूपत्वाद् ब्रह्मलोकश्च स प्रभुः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति शारीरब्राह्मणम् ॥ ६४ ॥",
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| "text": "न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥",
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| "text": "ब्रह्मायमाप्तकामत्वादेवं यो वेद तं परम् ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "आप्तकामोऽभयश्चैव भवेद् विष्णोरनुग्रहात् ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "परमार्थेऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवतीति नित्यमेव तथा भवतीत्यर्थः । ",
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "अभूद्भविष्यति भवत्येवमाद्यपदानि तु ।",
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| "text": "नित्यभावाभिधायीनि यत्र वाच्या हरेर्गुणाः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः मैत्रेयी च कात्यायनी च । तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥",
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| "text": "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ २ ॥",
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥",
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेत्थ तदेव मे ब्रूहीति ॥ ४ ॥",
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| "text": "स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियामवृद्धं तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥",
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| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच न वा ओ पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा ओ जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा ओ पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा ओ वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा ओ पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा ओ ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा ओ क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा ओ लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । न वा ओ वेदानां कामाय वेदाः प्रियाः भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा ओ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ओ द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C04_S05_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो लोकान् । वेद देवास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V11",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथाऽऽर्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तमेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा ओऽयमात्माऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S05_V12"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V12_B1"
| |
| },
| |
| "text": " बाह्याभ्यन्तरविशेषाभावेन सर्वत्र लवणरसघन एव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन् न वा अहमिमं विजानातीति स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा ओऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S05_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V13_B1"
| |
| },
| |
| "text": " न वा अहमिमं विजानातीति । ओयमिमं परमात्मानं जीवो न विजानातीत्यत्रैव भगवान् मोहान्तं मोहाख्यं नाशमापीपिपत् प्रापयामास । अतोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाचीति सिद्धम् । अन्यथा कथमहं विजानातीति युज्येत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् केन कं जिघ्रेत् केन कं रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति मैत्रेयी ब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ६५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C04_S05_V14"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S05_V14_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतावद्विज्ञातुः परमात्मनो विज्ञानादिकमेव ह्यमृतत्वं मोक्षः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्ज्ञानादिकं मोक्षस्तदभावे कुतः सुखम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञेयाभावान्न हि ज्ञानं ज्ञानाभावे हि शून्यता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माज्ज्ञेययुतो मोक्षः सुखरूपत्वतः सदा ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S06",
| |
| "type": "brahmanam",
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| "name": "वंशब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "वंशब्राह्मणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गौपवनः पौतिमाष्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पौतिमाष्यो गौपवनात्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गौपवनः कौशिकात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कौशिकः कौंडिन्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कौंडिन्यः शांडिल्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शांडिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "गौतमः आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः गार्ग्याद् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गार्ग्यो गार्ग्याद् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गार्ग्यो गौतमात्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गौतमः सैतवात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैतवः पाराशर्यायणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गार्ग्यायण उद्दालकायनाद् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्यंदिनायनान्माध्यंदिनायनः सौकरायणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सौकरायणः काषायणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "काषायणः सायकायनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सायकायनः कौशिकायनेः॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C04_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कौशिकायनिः घृतकौशिकात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "घृतकौशिकः पाराशर्यायणात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पाराशर्यायणः पाराशर्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जातूकर्ण्यः आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः औपबन्धनेरौपन्धनिरासुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाजः आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः माण्टिर्गौतमात् गौतमो वात्स्यात् वात्स्यः शांडिल्यात् शांडिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवात् गालवो विदर्भी कौंडिन्यात् विदर्भीकौंडिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरो अयास्यात् आंगिरसादयास्य आंगिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणात् दध्यंग्ङाथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात् प्रध्वंसन एकऋषेः एकऋषिर्विप्रचित्तेः विप्रचित्तिः व्यष्टेः व्यष्टिः सनारोस्सनारुः सनातनात् सनातनः सनकात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सनकः परमेष्ठिनः।",
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| },
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| "text": "परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "॥ इति वंशब्राह्मणम् ॥",
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| |
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| |
| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति वंशब्राह्मणम् ॥ ६६ ॥ ",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "author-note",
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| "text": "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठोऽध्यायः ॥",
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| "text": "लौकिकव्यवहारो यो भूभारक्षपणादिकः ।",
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| "text": "तददृष्टिं विना नान्यो लयः कृष्णादिनां क्वचित् ॥",
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ १ ॥",
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| "text": "वायोश्च रतिदं यस्माद्वायुरं ब्रह्म तत्परम् ।",
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| "text": "ख्यातत्वाच्चापि तत्खं स्याद्रौहिणेयस्तथाऽवदत् ॥",
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| "text": "वेदोऽयं ज्ञानरूपत्वादिति यं ब्राह्मणा विदुः ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "निर्दोषत्वाद इत्युक्तस्तेन वेद्यं सदाऽखिलम् ॥ इति च ।",
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| "text": "त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं, देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्ठा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ २ ॥",
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| "text": "तमःप्राप्तिविलम्बाय दैत्यानां विहिता दया ॥ इति प्रवृत्ते ॥",
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| "text": "एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सत्यं तदेतत्त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥",
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| "text": "तद्धैतदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमांल्लोकान् जित इन्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यं ह्येव ब्रह्म ॥",
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥",
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| |
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ ४ ॥",
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| "text": "तदेतत् सत्यमेवासीद्वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "सत्यं ब्रह्मेति यो वेद महायाज्यं तु तं परम् ॥",
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| |
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| {
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| "text": "प्राप्नोत्येव हि तल्लोकांजीवन्नप्युत्तमो भवेत् । इति प्रध्याने ॥",
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| {
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| "text": "हृदयं भगवान् विष्णुः सत्यं तद्गुणरूपतः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "यस्मिन्नूषुर्ब्रह्मचर्यं देवासुरनरोऽब्जजे ॥",
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| "text": "एष वै भगवान् विष्णुर्मुख्यतस्तु प्रजापतिः ।",
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| |
| },
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| "text": "यज्ज्ञानान्मुक्तिमायान्ति स्वर्गाख्यां हृदयं च सः ॥",
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| },
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| {
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| "text": "हृतिसद्दानयानेभ्यः सत्यं सद्गुणरूपतः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्तद्धृदयमित्युक्तं ब्रह्म तत्सत्यतामगात् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सत्यत्वं सदनीयत्वमासाद्यं यन्मुमुक्षुभिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं तद्ब्रह्म यो वेद स हि लोकानिमांजयेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "एतल्लोकजयो नाम धर्मज्ञानादिपूर्णता ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जित एव ह्यसौ लोको यदा वेद जनार्दनम् ॥ इति गुणपरमे ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| }
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| |
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| "text": "द्वितीयं रूपमसृजद्वासुदेवं स आत्मनः ॥",
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| "text": "ब्रह्म सत्यमिति प्राहुर्वासुदेवाभिधं प्रभुम् ।",
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| "text": "तस्माद् ब्रह्माऽजनि ततो देवाः सर्वेऽपि जज्ञिरे ॥",
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| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्माद्ब्रह्मादयो देवा वासुदेवमुपासते ।",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "तदेतत् त्र्यक्षरं सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वांसमनृतं हिनस्ति ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥",
| |
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "ततत्वादन्यथाज्ञानं तीत्येव समुदीर्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याधस्तात् सदात्मा तु सादयन्ननृतं हरिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "उपरिष्टाच्च यन्नामा नाशयन्ननृतं स्थितः ॥",
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| |
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| {
| |
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| "text": "एवं यो वेद तं विष्णुं नास्य मिथ्यादृशिर्भवेत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "योग्यतापेक्षयोपासाऽथापरोक्ष्याच्च तत्फलम् ॥",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सम्यग्ददात्यन्यथा च भवेदेवोपकारिणी ।",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्ययोग्याय चेत् सा स्याद्विपरीतफलप्रदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "वैपरीत्यं तु विघ्नः स्यान्न तु पापं कथञ्चन ॥ इत्याधारे ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "तद्यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मंडलं पश्यति नैनमेते रश्मयःप्रत्याययन्ति ॥१॥",
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| |
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| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये षष्ठं ब्राह्मणम्॥",
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| "text": "आदित्यनामा सम्प्रोक्तो आदानाद्धविषां सदा ॥",
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| "text": "स एव दक्षिणाक्षिस्थस्तच्च रूपद्वयं हरेः ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "अन्योऽन्यस्मिन् स्थितं नित्यं प्राणैश्च सह रश्मिभिः ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "दक्षिणाक्षिस्थितो विष्णुर्यदाऽस्मादुत्क्रमिष्यति ।",
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| "text": "तदैव म्रियमाणस्तु जीवः पश्येद्विरश्मिकम् ॥",
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| |
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| "text": "सूर्यस्य मंडलं नास्य प्रतीयन्ते हि रश्मयः ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्क्षणे नियमेनैव केषाञ्चित् सप्तभिर्दिनैः ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BR_C05_S07",
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| "children": [
| |
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| "text": "सप्तमं ब्राह्मणम्",
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| |
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| "adhikarana": ""
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षर तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ १ ॥",
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तमं ब्राह्मणम् ॥",
| |
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| |
| },
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| {
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये सप्तमं ब्राह्मणम् ॥ ५ ॥",
| |
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| |
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| "text": "तस्य विष्णोः शिरो नाम भावनाद् भूरिति स्मृतम् ।",
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| |
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| {
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| "text": "भावनं रक्षणं प्रोक्तं दृष्ट्या वाचा च रक्षति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "उत्पादनाद्भुनामा स्याद् दक्षिणो बाहुरस्य तु ।",
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| "text": "विनाशनाद्व इत्युक्तः सव्यो बाहुः परात्मनः ॥",
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| "text": "स्वित्यानन्दस्समुद्दिष्टो वरिति ज्ञानमुच्यते ।",
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| "text": "मुक्तिदानेन तद्दानात् सुवस्य पदद्वयम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "दक्षिणश्चैव सव्यश्च क्रमाद्वर्णद्वयोदितौ ।",
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| |
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| "text": "पादावस्य हि तत्प्राप्तिर्मुक्तिरित्यभिधीयते ॥",
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| |
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| {
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| "text": "अहमेषो ह्यहेयत्वाज्जीवेन सहभावतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "असावहरिति प्रोक्तः सर्वलोकप्रकाशनात् ॥",
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| |
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| "text": "तद्वेदनात् सर्वपापं हन्ति चैव जहाति च ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "कानिचिद्धन्ति पापानि कल्पादीन् संजहाति च ॥ इति प्रवृत्ते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन् अन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥",
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये अष्टमं ब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये अष्टमं ब्राह्मणम् ॥ ६ ॥",
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| "text": "सर्वप्रशासको विष्णुः ......।",
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| "text": "विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युत् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये नवमं ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥",
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| "text": "य एनं वेद वेत्तारं सर्वस्य परमेश्वरम् ॥",
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| |
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| {
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| "text": "पादेभ्यो मोचयित्वैनं स्वात्मानं वेदयेद्धरिः ॥ इति माहात्म्ये ।",
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| |
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| "text": "वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये दशमं ब्राह्मणम् ॥",
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये दशमं ब्राह्मणम् ॥ ८ ॥",
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| "text": "स्तनानेवोपजीवन्ति तस्या वायुः पतिः प्रभुः ॥",
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| "text": "वत्सो मनोऽभिमान्यस्याः सरस्वत्याः सदाशिवः ॥ इति प्रभंजने ।",
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| "text": "अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तःपुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये एकादशं ब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "वैश्वानर इति प्रोक्तः सोऽग्निरंगप्रणेतृतः ।",
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| "text": "कर्णौ पिधाय या नित्यं श्रोतुं शक्याऽखिलैः सदा ॥ इति तंत्रमालायाम् ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
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| "text": "यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स चंद्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये द्वादशं ब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "प्रवहं वायुपुत्रं च सूर्यसोमौ च विद्युतम् ।",
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| "text": "प्राप्य प्रधानवायुं च याति तत्परमं पदम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।",
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| "name": "त्रयोदशं ब्राह्मणम्",
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| {
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| "tag": "section-heading",
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| },
| |
| {
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| "id": "BR_C05_S13_V01",
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| |
| },
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| "children": [
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| "text": "एतद्वै परमं तपो यद् व्याधितस्तप्यते परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेद ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S13_V01_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "व्याधीञ्छवहृतिं चैव शवदाहादिकं तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णवे तप इत्येव चिन्तयन् याति तत्परम् ॥ इति च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| {
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| "text": "ओशितोऽपि क्लेशादीनतीतैष्यानपीह यः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णवे तप इत्येव प्रार्पयेत् स परं व्रजेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः स्वरूपवेत्ता चेदन्यथा न कथञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा स्वरूपवेत्तुः स्यादेकैकापि ह्युपासना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोक्षाय सहिताः सर्वा अप्यज्ञस्य न तु क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथावत् केशवं ज्ञात्वा स्वयोग्यैकामुपासनाम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपि कृत्वा हरिं दृष्ट्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S14",
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| |
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| "text": "अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्यक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह्येव देवते एकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किंस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिनामा प्रातृदः कस्त्वेनयोरेकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्दशं ब्राह्मणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये चतुर्दशं ब्राह्मणम् ॥",
| |
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| |
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| {
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| "text": "अन्योन्यानुप्रविष्टौ तौ सर्वदैव सुसंस्थितौ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "वायुं विना ब्रह्मणोऽपि शरीरं पूतिमेष्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुश्च शोषमायाति विना ब्रह्माणमंजसा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तयोरेवं परिज्ञानी वासिष्ठः पाणिनामकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मवायुविदे कार्यं किं मया साध्वसाधु वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नासाधुना साधयितुं शक्योऽसौ साधुनाऽपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नार्थोऽस्य कृतकृत्यत्वाद्यदि वेद परं हरिम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति प्रशस्य तज्ज्ञानं वसिष्ठं प्राब्रवीत् ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्योन्यानुप्रवेशेन ब्रह्मवाय्वोर्विशेषतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रयोजनं कस्य भवेदिति तं प्रातृदोऽब्रवीत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा निवेशनीयः स्याद्वायुश्चास्य रतिप्रदः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः प्रयोजनं तुल्यमन्योन्यात्मप्रवेशनात् ॥ इति सन्धाने ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
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| "text": "उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मा उक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "सप्तदशं ब्राह्मणम्",
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| },
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| "attrs": {
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| "tag": "line",
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| "text": "साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "tag": "section",
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| "type": "brahmanam",
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| "children": [
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "अष्टादशं ब्राह्मणम्",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणे हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्र प्राप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "उत्थापनादुक्थनामा मोक्षे प्राप्यो यतोऽखिलैः ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19",
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| "text": "एकोनविंशं ब्राह्मणम्",
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| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19_V01",
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| "text": "भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "text": "ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "id": "bhashya-BR_C05_S19_V03"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C05_S19_V03_B01"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋग्यजुःसामसंस्थो यो भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स द्वितीयपदेनोक्तो गायत्र्याः प्रथमेन तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूम्यन्तरिक्षस्वर्गस्थतृतीयेन समीरगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V04",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परो रजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपति एवं हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C05_S19_V04"
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| "id": "BR_C05_S19_V04_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "चतुर्थपादो गायत्र्याः प्रणवः समुदीरितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वाच्यो भगवान् सूर्यमंडलस्था तु या रमा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्वात्मिक्येव तत्संस्थो रज आख्यप्रधानतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परः परोरजस्तस्माद्य एवं वेद तं प्रभुम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकानां चैव वेदानां सर्वेषां प्राणिनामपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सदैवाधिपतिर्भूत्वा यशःश्रीमांश्च जायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गायत्र्युपासने योग्यो ब्रह्मैव हि चतुर्मुखः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादुक्तफलं सर्वं सर्वोपासा च तस्य हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंशेनोपासनान्येषां फलमल्पं च योग्यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गायत्र्या न ह्ययोग्योऽपि द्विजो योग्योऽपि न क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋते विरिञ्चं तस्मात् तु तस्यैव ह्यखिलं फलम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "यः परोरजास्तपति स तुरीयपदेन प्रणवेन पद्यते । तुरीयं पदं ददृश इव दृष्ट इव । तदधीनतेजःपुंजस्य सूर्यमंडलस्य दृष्टत्वात् । \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19_V04_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यमंडलगो विष्णुः सर्वेषां दृष्टवत् स्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मात् तदुत्थितं तेजोमंडलं दृश्यतेऽखिलैः ॥ इति त्रैविद्ये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V04_B01"
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| |
| "text": "सर्वं रजः सर्वां प्रकृतिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V04_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "रंजनात् प्रकृतिः प्रोक्ता रज इत्येव वैदिकैः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्या अप्युत्तमो विष्णुर्यतोऽतः स परोरजाः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैषा गायत्र्येतस्मिंस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्धैतत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्श मिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादो जीय इत्येवमेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्मात् गायत्रीनाम स यामेवामूं सावित्रीमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BR_C05_S19_V05"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BR_C05_S19_V05_B01"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अभिमानिनी तु गायत्र्या मुख्या श्रीः परिकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्माण्यमुख्याऽतो ज्ञेया सा तु ब्रह्माणमाश्रिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा तु मुख्यगायत्री सा परोरज आश्रयेत् ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V05_B01"
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| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा एतज्जगत्सत्ये प्रतिष्ठितम् । भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यादिना प्रस्तुतत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा एतज्जगत्सर्वं चक्षुः सूर्याभिमानिनी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विराण्नामविशेषाख्ये सर्वदा सम्प्रतिष्ठितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शेषः प्रतिष्ठितो वायौ स ह्यस्माद्बलवत्तरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स सत्य इति सम्प्रोक्तः सन्नस्मिन् याति यद्धरिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुः समाश्रितो देवीं मुख्यां गायत्रिनामिकाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा चात्मनामधिपतिमेवं परममाश्रिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणानां रक्षणादेव गायत्री सा प्रकीर्तिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सावित्रीति च यामाह स विष्णुः परतोरजाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एषैव सा हि गायत्री सविता हि जनार्दनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्धि सूयते सर्वं सावित्री च तदाश्रिता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यस्तत्प्रतीकत्वात् सवितेति प्रकीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रतिमायां च तच्छब्दः प्रयोज्यो ह्युपचारतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मा आह स विष्णुस्तां गायत्रीं जगदीश्वरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणे तस्य सा प्राणान् सर्वदा पाति पुत्रवत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा हि पुत्रस्तस्यास्तु तत्पुत्रा इतरेऽखिलाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19_V06",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तां हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वाग् अनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति तन्न तथा कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद्यदि ह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न ह वै तद्गायत्र्या एकञ्च न पदं प्रति ॥६॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "तामाहुः परमां देवीं वृणीमह ऋगात्मिकाम् ॥",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नैव सा प्रतिमा मुख्या गायत्री परमा स्मृता ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "गायत्रीमुख्यवेत्तारो योग्या ब्रह्मपदस्य ये ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तेषां प्रतिग्रहाद्दोषो न कश्चन भविष्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| |
| "text": "न चैकपदविज्ञानफलायालं सुखानि च ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BR_C05_S19_V07",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स य इमांस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् । सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| |
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| "children": [
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| "text": "विष्णोर्यदा भगवतो लोकान् वेदांश्च चेतनान् ।",
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| |
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| {
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| "text": "विरिञ्चिजन्मन्यखिलान् प्रतिगृह्णन्ति कृत्स्नशः ॥",
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| |
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| {
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| "text": "गायत्रीपदविज्ञानफलमात्रं तदा भवेत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "प्रणवप्रतिपाद्यं यत् तुरीयं भगवत्पदम् ॥",
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| {
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| "text": "सर्वगं वासुदेवाख्यं न तत्केनचिदाप्यते ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "गायत्रीत्रिपदज्ञेयमनिरुद्धादिकं त्रयम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा व्याप्नोति मुक्तः सन् वासुदेवं न कश्चन ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "लोकस्थमनिरुद्धं च प्रद्युम्नं वेदगं तथा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संकर्षणं वायुसंस्थं व्याप्य ब्रह्मा विमुक्तिगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गायत्रीज्ञानसामर्थ्यात् प्रणवज्ञानशक्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वासुदेवं च सम्पश्येन्न व्याप्नोति कथञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्तत्वाद्वासुदेवः कथं व्याप्यो भवेत् प्रभुः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वर्णत्रयात्मप्रकृतिमतीतः सूर्यमंडले ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "गुणत्रयात्मिकां बाह्ये यतोऽतः स परोरजाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यतो न व्याप्यते सोऽसौ ब्रह्मणाऽपि कथञ्चन ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अतः प्रतिग्रहो नास्य वासुदेवस्य विद्यते ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C05_S19_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "तावदेतावत् प्रतिगृह्णीयादिति तस्यैव सामस्त्येन ग्रहणार्थम् । एतावदेव मम हस्ते विद्यते इतिवत् । न ह्यन्यदेवतावत् प्रतिग्राह्यमस्ति ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C05_S19_V08",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| },
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| |
| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स काम ऋद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठते अहमदः प्रापमिति वा ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| |
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| "text": "अष्टाक्षरत्वाद् गायत्र्याः प्रोक्ता सैकपदीति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "प्रणवेन सहैतास्तु गायत्र्याश्चतुरस्तदा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अकाराद्यतिशान्तान्तः प्रणवोऽष्टाक्षरो यतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "पादः प्रणवसंयुक्तो गायत्री सा पृथग्यदा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "द्विपदीति तदा प्रोक्ता त्रिपदी स्वपदैस्त्रिभिः ।",
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
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| "text": "चतुष्पदी सप्रणवा ब्रह्मणोऽन्यैर्न गम्यते ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "अपदी च ततः प्रोक्ता गायत्र्येवमुपस्थिता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "कामाप्राप्तिमपूर्तिं वा शत्रवे सा करिष्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असावदो मैव प्रापन्नास्मै कामः समृध्यताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "उपस्थिता चेदित्थं सा यद्यदोऽहं समाप्नुयाम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "इति सा कामपूर्तिं च स्वस्य सम्यक् करिष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्यग्ब्रह्मपदावाप्तिं तद्योग्यां मुक्तिमेव च ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मणोपासितो दद्याद् गायत्र्याः पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "अलेपं सर्वपापेभ्यो विशेषेण प्रतिग्रहात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्योग्यां मुक्तिमन्येषां यथायोग्यमुपासितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविदब्रूथा अथ कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदाञ्चकारेति होवाच तस्याग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्सन्दहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥९॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये एकोनविंशं ब्राह्मणम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये एकोनविंशं ब्राह्मणम् ॥",
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| "text": "अग्निमंडलगो नित्यमग्निनामाऽग्रणीत्वतः ।",
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| |
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| {
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| "text": "गायत्र्यास्तु परिज्ञानं ज्ञाते मुख्यगते हरौ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "सफलं भवेदन्यथा तु न सम्यक्फलदं भवेत् ।",
| |
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| |
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| |
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| "text": "गायत्रीमुखगो विष्णुर्ज्ञेयः सर्वात्मना ततः ॥",
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| |
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| |
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| "text": "संहर्ता सर्वदोषाणामग्निस्थः सर्वदाहकः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "नित्यानन्दोऽग्निवर्णश्च रामः परशुभृत् सदा ॥ इति गायत्रीसंहितायाम् ॥",
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| "text": "यतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥",
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| "text": "पूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।",
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| "text": "स्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥",
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| "text": "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।",
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| "text": "समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥",
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| "text": "यमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥",
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| "text": "ज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।",
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| "text": "तदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥",
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| "text": "सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च ।",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "जुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| "text": "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S01_V08",
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| "adhikarana": ""
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S01_V10",
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S01_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S01_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S01_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये प्रथमब्राह्मणम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C06_S01_V14"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S01_V14_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं श्रेयोविवादं तु येन कृत्वाऽखिलाः सुराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "असमर्थाः स्वरक्षायां स वायुः सुरनायकः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "विवदन्तोऽखिला देवा ययुर्नारायणं प्रभुम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं श्रेयानहं श्रेयानिति वायुपुरःसराः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उक्तं भगवता तेन येन त्यक्तेऽखिला अपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थातुं न शक्ताः स श्रेयानित्युक्ताः पुनरागताः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्क्रान्ताश्च पुनः सर्वे तद्विज्ञप्त्यै पृथक् पृथक् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुपर्णशेषरुद्रेंद्रसूर्यादिषु पृथक् पृथक् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उत्क्रान्तेषु ब्रह्मदेहाच्छरीरं न पपात ह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋत उत्क्रान्तमेकं तु तदन्ये निविशन्ति च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्राण उच्चिक्रमिषति स्थातुं नाशक्नुवन् परे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणं विना न च ब्रह्मा तं विना प्राण एव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्योन्यापाश्रयाच्छक्तौ स्थातुमन्ये कुतस्ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् प्राणो वरो देवेष्विति सर्वेऽपि मेनिरे ॥ इति पवमाने ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02",
| |
| "type": "brahmanam",
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| "name": "द्वितीयब्राह्मणम्",
| |
| "title": ""
| |
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "द्वितीयब्राह्मणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "id": "BR_C06_S02_V01",
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| "adhikarana": ""
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| {
| |
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| "text": "श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि नर्षेर्वचः श्रुतं",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानां",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "children": [
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| "text": "स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S02_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BR_C06_S02_V06",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "BR_C06_S02_V07",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V08",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V11",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V12",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V15",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोः वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ ततो जायन्ते ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतंगा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये द्वितीयब्राह्मणम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये द्वितीयब्राह्मणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BR_C06_S02_V15"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V15_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "पञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥",
| |
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| |
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| {
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| "text": "नास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V15_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "यथोपनिषदं जातो योग्यः स्वर्गापवर्गयोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भवेद्यदि मनः पित्रोर्विष्णोर्नान्यत्र गच्छति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कुर्याद्यदि कर्मैतन्मनः पित्रोस्तु विष्णुगम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "दृष्टसामर्थ्यहीनश्च मोक्षयोग्यः स्थिरं यदि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "दृष्टसामर्थ्यवांश्च स्यादाज्ञाद्यैः कारणैः क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विशेषकारणाभावे यथोक्तं नान्यथा भवेत् ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BR_C06_S02_V15_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणो द्युशब्दोक्तः सर्वदा द्युतिहेतुतः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वासुदेवस्तु पर्जन्यः परं स जनयेद्यतः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "संकर्षणस्तु पृथिवी प्रथितत्वात् सदैव हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नः पुरुषेत्युक्तः पूरयेत् स जगद्यतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्त्रीशब्दोक्तोऽनिरुद्धः स्यात् सहितस्त्रिषु यत्सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिरुद्धो हि वेदेषु सर्वदा त्रिषु संस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्युवादिषु प्रसिद्धेषु तत्सम्बन्धाद् द्युवादिकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शब्दो भवेत् तथाग्न्यादिरदनात् परमो भवेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंगत्वेनार्यते यस्मादंगारस्तेन कीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्च्यत्वादर्चिरुद्दिष्टो विष्वक्त्वाद् विष्फुलिंगकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समेधनाच्च समिधस्तत्र तत्र स्थितो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तच्छब्दैः सदा वाच्य इतरे तु तदन्वयात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यो रश्मिरित्याद्याः शब्दाश्चैवमवस्थिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकैकस्मिन् पञ्चभेदा अर्चिरादिविभागतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणादिभेदेन तथैव प्रतिपादिताः ॥ इति प्रवृत्ते ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "धूत्काराद् धूम उद्दिष्टः शत्रूणां पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अर्चिरर्च्यतमत्वाच्च स्वांगोऽङ्गार उदीर्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अंगित्वेनांगरूपेण यत एको व्यवस्थितः ॥ इति त्रैविद्ये ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "नीचादप्युत्तमा ज्ञानं शृणुयुर्लीलया क्वचित् ।",
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| |
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| {
| |
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| "text": "श्रोतृवक्तृविभेदोऽयं नाधिक्यज्ञापकस्ततः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्याधिक्यं तु वेदोक्तं पञ्चरात्रेऽथवा भवेत् ।",
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| |
| },
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| {
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| "text": "इतिहासपुराणे वा सोऽधिको नेतरः क्वचित् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "आदानादादित्यः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रमणाच्छासनाच्च रश्मयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहीनत्वादहः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "चन्दनाच्चंद्रः । अस्य क्षत्रमन्यन्नास्ति इति नक्षत्रम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "ज्ञानादायुष्ट्वाच्च वायुः ।",
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| |
| },
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| {
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| "text": "अन्यैरभरणीयत्वाद् अभ्रम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "विद्योतनाद् विद्युत् । अशनादशनिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "निह्लादनाद् ह्रादुनिः । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । सम्यग्वत्सान् रमयतीति संवत्सरः । आदेशनाद्दिशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवान्तरमादिशतीत्यवान्तरदिशः । रतिकरत्वात् रात्रिः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वचनात् वाक् । प्रणयनात् प्राणः । जहाति गमयतीति जिह्वा । चष्ट इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । उपस्थितत्वादुपस्थः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यापयति नयति चेति योनिः । अभिनन्दयतीत्यभिनन्दः । उपमंत्रणमन्तःकरणं च स एव करोति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "मुख्याभिधेयस्त्वन्यानि तत्संगादुपचारतः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": " तदधीनत्वादर्थवत् इति भगवद्वचनम् । समाकर्षात् इति च ।",
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| "text": "स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति",
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| |
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| "text": "यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामांस्तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि",
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| |
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| "text": "ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा",
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| "text": "या तिरश्चीनि पद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजेंसराधनीं महं स्वाहा ॥ १ ॥",
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| "text": "प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।",
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| |
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| {
| |
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| "text": "वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।",
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| {
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| "text": "चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।",
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| |
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| "text": "श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।",
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| |
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| {
| |
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| "text": "मनसे स्वाहा प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रव मवनयति ।",
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| "text": "रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥",
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| |
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| "text": "अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥",
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| "text": "अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥",
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| |
| }
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| |
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| "text": "तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥",
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| "text": "एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकाय आयस्थूणायन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥",
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| "text": "एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरन् शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥",
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| "text": "स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥",
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| "text": "तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥",
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| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥",
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| "text": "तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥",
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| "text": "सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥",
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| "text": "सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥",
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| "text": "स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् ।",
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| "text": "अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥",
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| "text": "अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥",
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| "text": "अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥",
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥",
| |
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| |
| }
| |
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| "text": "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥",
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| "text": "अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि ।",
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| |
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| "text": "विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।",
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| "text": "गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।",
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| "text": "हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।",
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| {
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| "text": "तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ॥",
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| |
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| {
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| "text": "यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिंद्रेण गर्भिणी ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥ २२ ॥",
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| "text": "सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥",
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| "tag": "line",
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| "text": "जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अग्निष्टस्त्विष्टकृद्विद्वान् स्विष्टं सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥",
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| "text": "अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥",
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| "text": "अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥",
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| "text": "अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥",
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| "text": "अथास्य मातरमभिमंत्रयत इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।",
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| "text": "सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरदिति",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रायच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "पञ्चमब्राह्मणम्",
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| "text": "गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात्",
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| "text": "भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्",
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| "text": "औपस्वस्तिपुत्रः पाराशरीपुत्रात्",
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| "text": "पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्",
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| "text": "कात्यायनीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥",
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| "text": "गौतमीपुत्रात् गौतमीपुत्रः",
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| "text": "पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः",
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| "text": "वात्सीपुत्रात् वात्सीपुत्रः",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो बर्कारुणीपुत्रात्",
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| {
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| "text": "बार्कारुणीपुत्रो आर्तभागीपुत्रात्",
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| {
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| "text": "आर्तभागीपुत्रः शौंगीपुत्रात् शौंगीपुत्रः",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आलम्बायनीपुत्राद् आलम्बायनीपुत्रः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आलम्बीपुत्राद् आलम्बीपुत्रो",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जायन्तीपुत्रात् जायन्तीपुत्रो",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मांडूकायनीपुत्रात् माण्डूकायनीपुत्रः",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शांडिलीपुत्राच्छांडिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद् भालुकीपुत्रः",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ",
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| |
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| |
| {
| |
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| "text": "वेदभृतीपुत्रात् वेदभृतीपुत्रः",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कार्शिकेयीपुत्रात् कार्शिकेयीपुत्रः",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्राचीनयोगीपुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सांजीवीपुत्रात् सांजीवीपुत्रः",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्राश्नीपुत्रात् आसुरिवासिनः प्राश्नीपुत्रा",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आसुरायणाद् असुरायणः",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आसुरेरासुरिः ॥ २ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tag": "verse",
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| "id": "BR_C06_S05_V03",
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| | "ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः । संवत्सरः आत्मा अश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं, पृथिवी पाजस्यं, दिशः पार्श्वे । अवान्तरदिशः पर्शवः । ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा । नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसान्युवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचन् जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥" |
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| "text": "श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यप्रणीतं बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यम्\nप्राणादेरीशितारं परमसुखनिधिं सर्वदोषव्यपेतं सर्वान्तस्थं सुपूर्णं प्रकृतिपतिमजं सर्वबाह्यं सुनित्यम् ।\nसर्वज्ञं सर्वशक्तिं सुरमुनिमनुजाद्यैः सदा सेव्यमानं विष्णुं वन्दे सदाऽहं सकलजगदनाद्यन्तमानन्ददं तम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "अश्वपूर्वापरौ होम्यौ महिमानौ ग्रहौ स्मृतौ ।\nअहोरात्राभिमन्तारौ तयोरप्यभिमानिनौ ॥\nकामश्चाथ रतिश्चैव विष्णुब्रह्मशरीरजौ ।\nसमुद्रेकात् समुद्रस्तु विष्णुः पूर्वमुदाहृतः ॥\nउपचारेण तूद्रेकादपरश्च चतुर्मुखः ।\nस विष्णुर्हयनामा सन् देववाह्येषु संस्थितः ॥\nवाजिनामा तु गन्धर्वेष्वर्वनामाऽसुरेषु च ।\nमनुष्येष्वश्वनामाऽसौ तद्बन्धुः स्वयमेव सः ॥\nतस्मादेवोत्थितिस्तस्य रूपभेदो न तस्य च ।\nऐश्वर्यात् स तथापीशो व्यक्तिभावं गमिष्यति ॥\nहत्वा याति यतः शत्रून् हरिस्तस्मात् हयः स्मृतः ।\nसर्वदा युद्धकर्तृत्वाद्वाजी चापि प्रकीर्तितः ॥\nअर्वाऽभिगमनादुक्त आशुत्वादश्व उच्यते ॥ इति वैहायसे ।" | | "lines": [ |
| | "वाजिरूपेण सूर्येण प्रोक्तं वाजसनेयकम् ।", |
| | "कण्वाय याज्ञवल्क्योऽदात् काण्वं तेन प्रकीर्तितम् ॥ इति वाराहे ।" |
| | ] |
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| "text": "अश्वमेधब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "अश्वस्वरूपो ब्रह्माऽभूदश्वरूपाज्जनार्दनात् ।", |
| | "तत्र सन्निहितो विष्णुरश्वरूपः स्वयं प्रभुः ॥", |
| | "तयोश्च प्रतिमा मेध्यो यतोऽश्वोऽयं श्रुतौ श्रुतः ।", |
| | "सर्वं जगत्तदङ्गेषु तस्मात् सन्निहितं स्मृतम् ॥", |
| | "तयोरङ्गेष्विदं यस्मात् जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ इति प्रध्याने ।" |
| | ] |
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| "text": "नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् मृत्युनैवेदमावृतमासीद् अशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चतो ह वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कंह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "उच्चैःश्रवाः सन्निहितो मेध्येऽश्वे तत्र केशवः ।", |
| | "तस्मिन्निदं जगत्सर्वं ब्रह्मा चोच्चैःश्रवःस्थितः ॥ इति सौपर्णे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सर्वसंहारकं विष्णुं देवीं जीवांस्तथैव च ।\nकालं त्रिगुणसाम्यं च कर्माणि प्राणमिन्द्रियम् ॥ संस्कारं चैव वेदांश्च नर्ते किञ्चिल्लये त्वभूत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "पर्वताः सिकताश्चैव नद्यः कूपाः सरांसि च ।", |
| | "हविः कपालयूपाद्या देवता एव सर्वशः ॥", |
| | "तत्तन्नामैव नामैषां भिन्नानामभिमानतः ।", |
| | "नामानि तान्यपि हरेः स हि सर्वगुणाधिकः ॥ इति नारदीये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "आपो वा अर्कस्तद्यदपांशर आसीत् तत्समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "उषाः शिरो ब्रह्मनाम तत्त्वमस्यादयोऽखिलाः ।", |
| | "सप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः पञ्चम्यर्थास्तथा श्रुताः ॥", |
| | "षष्ठ्यर्थाश्च चतुर्थ्यर्थास्तृतीयार्थाश्च सर्वशः ।", |
| | "तदैक्यवाचिवच्छब्दाः अपि तद्गत्ववाचकाः ॥", |
| | "ऐक्यार्था नैव ते सर्वे भिन्नरूपाः यतः सदा ।", |
| | "ईशाङ्गवाचिनो वा स्युस्तेषामेव तदर्थतः ॥", |
| | "सप्तसु प्रथमा यस्मात् तत्तद्योग्यार्थता भवेत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अर्कशब्दस्यादित्ये प्रसिद्धत्वादप्शब्दोऽपि तत्रेत्याशङ्कां निवर्तयितुमापो वा अर्क इति पुनर्वचनम् । नादित्येऽर्कशब्दः किन्त्वप्स्वेवार्कशब्द इत्यर्थः । शरो मण्डः ।" | | "lines": [ |
| | "अङ्गप्रत्यङ्गशो व्याप्तो विष्णुरेव तुरङ्गमे ।", |
| | "अतो विष्ण्वङ्गगं सर्वं मेध्याङ्गस्थमुदीरितम् ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं अग्निं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मावथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे, द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरस्स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥३॥" | | "lines": [ |
| | "पुनरप्यश्वस्य मेध्यस्येतिवचनं कस्यचिदश्वस्यैवमासीदितीतिहासरूपेण नोच्यते किन्तु सर्वमेध्यानामेवमिति ज्ञापनार्थम् ।" |
| | ] |
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| "text": "वायुरग्निरिति प्रोक्तो ह्यग्रणीत्वादथाङ्गिनाम् ।\nनेतृत्वाददनाच्चापि तस्य स्रष्टा जनार्दनः ॥\nस वायुर्वायुरूपेण जगत्पाति शरीरगः ।\nआदित्यस्थेन रूपेण जगद्याति प्रकाशयन् ॥\nअग्निस्थेन तु रूपेण हूयते सर्वयष्टृभिः ।\nआदाय यात्यायुरिति स एवादित्य उच्यते ॥॥\nतत्सम्बन्धात्तु तन्नाम सूर्यस्याग्नेस्तथैव च ।\nस एष कूर्मरूपेण वायुरण्डोदके स्थितः ॥॥\nविष्णुना कूर्मरूपेण धारितोऽनन्तधारकः ।\nअस्य पादा हि चत्वारो ह्यण्डोदे कोणसंस्थिताः ॥\nउरस्तु भूमिसंश्लिष्टमतिरिच्य भुवं पुनः ।\nपार्श्वतः पृष्ठतश्चैव शिरश्चोदकसंस्थितम् ॥\nआकाशमुदरे तस्य द्यौः पृष्ठे संस्थिता विभोः ।\nएवंविद्वांस्तु यत्रैति तत्रैव प्रतितिष्ठति ॥ इति प्रभञ्जने ।" | | "lines": [ |
| | "सर्वव्यक्तिष्वभिव्याप्त्यै तात्पर्याधिक्यवित्तये ।", |
| | "प्रतीतानुपपत्तेरप्यभासत्वविवक्षया ॥", |
| | "पुनर्वचनमुद्दिष्टं शतशोऽपि पृथक् पृथक् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनायां मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवन्न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान् संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात् स भाणमकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "विष्णोः पुरीषस्थानीया काठिन्यात् पृथिवी श्रुता ।", |
| | "तत्स्थत्वात् सिकताः सर्वा उवध्यस्थाः प्रकीर्तिताः ॥", |
| | "उर्व्यास्तु पादगत्वेऽपि नोवध्यत्वं विरुध्यते ।", |
| | "यतस्तदभिमानिन्यो देवता अनुकीर्तिताः ॥", |
| | "तासां च बहुरूपत्वादैश्वर्याच्च परेशितुः । इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "आत्मा, ब्रह्मा मे द्वितीयो जायेतेत्यकामयत । वायुरेव ब्रह्मा भवतीति दर्शयितुं वायोः सृष्टिः प्रथममुक्ता ।" | | "lines": [ |
| | "अवान्तरदिशो विष्णोरस्थिपुच्छान्युदाहृताः ।", |
| | "पूर्वपश्चार्धभेदेन दिशः पार्श्वे प्रकीर्तिते ॥", |
| | "शिरश्च पादमूलानि पुच्छं षडृतवः स्मृताः ।", |
| | "संवत्सराभिमानी च ब्रह्मा सर्वशरीरगः ॥", |
| | "क्लोमानश्च यकृच्चैव मांसी गिर्यभिमानिनः ।", |
| | "आन्त्रेषु नद्यः सर्वाश्च सोऽयं विष्णुः सनातनः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "स ऐक्षत यदि ह वा इमभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तथा वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्चर्चो यजूंषि सामानि च्छन्दां सि यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वं सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "नभोऽभिमानी विघ्नेशो विष्णोर्मांसाश्रितः सदा ।", |
| | "अन्तरिक्षाभिमानी च तत्सूनुरुदरे स्थितः ॥ इति च ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अभिमंस्ये लीनं करिष्ये चेत् ।" | | "lines": [ |
| | "अहर्वा अश्वं पुरस्ताद् महिमाऽन्वजायत । तस्य पूर्वे समुद्रे योनौ रात्रिरेनं पश्चान्महिमाऽन्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुर्हयो भूत्वा देवानवहद् वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥॥ इति अश्वब्राह्मणम् ॥" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूमो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥"
| | "lines": [ |
| | "अश्वपूर्वापरौ होम्यौ महिमानौ ग्रहौ स्मृतौ ।", |
| | "अहोरात्राभिमन्तारौ तयोरप्यभिमानिनौ ॥", |
| | "कामश्चाथ रतिश्चैव विष्णुब्रह्मशरीरजौ ।", |
| | "समुद्रेकात् समुद्रस्तु विष्णुः पूर्वमुदाहृतः ॥", |
| | "उपचारेण तूद्रेकादपरश्च चतुर्मुखः ।", |
| | "स विष्णुर्हयनामा सन् देववाह्येषु संस्थितः ॥", |
| | "वाजिनामा तु गन्धर्वेष्वर्वनामाऽसुरेषु च ।", |
| | "मनुष्येष्वश्वनामाऽसौ तद्बन्धुः स्वयमेव सः ॥", |
| | "तस्मादेवोत्थितिस्तस्य रूपभेदो न तस्य च ।", |
| | "ऐश्वर्यात् स तथापीशो व्यक्तिभावं गमिष्यति ॥", |
| | "हत्वा याति यतः शत्रून् हरिस्तस्मात् हयः स्मृतः ।", |
| | "सर्वदा युद्धकर्तृत्वाद्वाजी चापि प्रकीर्तितः ॥", |
| | "अर्वाऽभिगमनादुक्त आशुत्वादश्व उच्यते ॥ इति वैहायसे ।" |
| | ] |
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| "text": "इच्छतो विष्णुयजनं ब्रह्मणः साधनास्मृतेः ।\nश्रमात् तापाच्च देहं तं त्यक्तुमिच्छा बभूव ह ॥\nइच्छया चाप्युदक्रामत् प्राणैः सह पितामहः ।\nयशोवीर्यनिमित्तत्वात् प्राणास्तन्नामकाः स्मृताः ॥\nअत्यल्पे चापि सञ्जाते श्रमेऽपि न तदिच्छया ।\nतापे प्राणा निःसरन्ति सा च क्रीडा विभोः स्मृता ॥\nबृंहमाणं शरीरं तु पुनर्दृष्ट्वा पितामहः ।\nप्रवेष्टुं तच्छरीरं च कामयामास स प्रभुः ॥" | | "lines": [ |
| | "तेषां तेषां वाहनेषु स्थित्वा तत्तत्कर्मकर्तृत्वात् तत्तन्नामा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मान्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "पतन्ति नियतं हन्तुं देवाश्वाः शत्रुमूर्धसु ।", |
| | "वेगाधिका आसुराश्वा वेगमात्रं नृवाहनः ॥ इति स्कान्दे ।" |
| | ] |
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| "text": "पुनस्तस्मिन् प्रवेशाय शवरूपस्य मेध्यताम् ।\nऐच्छत् तेनैव देही स्यामिति तस्मिन् विवेश च ॥\nतस्मिन् प्रविश्य स ब्रह्मा द्वितीयं वपुरग्रहीत् ।\nदृष्ट्वोपायं महायज्ञेऽथाश्वाकारं पितामहः ॥\nश्वैतीभावात् परं यस्मात् तज्जज्ञेऽतोऽश्वनामकम् ।\nयदर्थं श्वेततामाप तद्देहो मेध्यतामपि ॥\nअश्वमेधः स यज्ञोऽभून्नाम्ना तेन तदा कृतः ।\nश्वैतीभावं गते देहे पुनर्मेध्ये यतः स्थितः ॥\nअतोऽश्वमेधनामाऽसौ ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ।\nअश्वो भूत्वा यतो मेध्यः सोऽभवत् तेन वा स्मृतः ॥\nमेधो यज्ञः समुद्दिष्टो याज्ञीयं मेध्यमुच्यते ।\nशुद्धं मेध्यमथापि स्यादेवंविद्योऽश्वमेधवित् ॥" | | "lines": [ |
| | "गन्धर्वास्तु सदा युद्धरता देवानुगा यतः ।", |
| | "तदशक्तौ तु देवानां युध्यन्ते स्वामिनो यतः ॥", |
| | "केचिद् गानरता नित्यं गन्धर्वा नर्तकाः परे ।", |
| | "केचिद् वाद्यरता नित्यं चारणा देवचारकाः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "अश्वमेधब्राह्मणम्" |
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| "text": "तमनवरुध्यैवामन्यत । तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदैवत्यं प्रोक्षितं प्राजात्पत्यमालभन्त । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव अप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् मृत्युनैवेदमावृतमासीद् अशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चतो ह वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कंह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥" |
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| "text": "तमश्वरूपमात्मानमनिवारितवद्विभुः ।\nचारयामास रूपेण तदन्येन पुमात्मना ॥\nसर्वस्मिन् भुवने चाब्दं तदन्ते परमात्मने ।\nस्वस्मिन् स्थिताय सङ्कल्प्य यज्ञ आलभतात्मवान् ॥\nअजादिकान् पशूनन्यदेवस्थपरमात्मने ।\nकर्तृत्वेन पशुत्वेन यत्फलं तदशेषतः ॥\nमम स्यादिति मन्वानः सोऽश्वरूपमधारयत् ।\nअबुद्धिपूर्वमरणात् स्वर्गश्चापि पशोर्भवेत् ॥\nज्ञानपूर्वमृतेः पुंसः किमु वक्तव्यमित्यजः ।\nएवं सूर्योऽप्यश्वमेधनामा संवत्सराभिधः ॥\nसूर्ये स्थितो यतो ब्रह्मा ह्यश्वमेधाभिधः स्वयम् ।\nसूर्ये ततत्वात् सूर्यात्मा ब्रह्मासौ परिकीर्तितः ॥\nअग्नौ स्थितो यतः सोऽर्कस्तस्मादग्निरितीर्यते ।\nब्रह्मातता यतो लोकास्तदात्मानस्ततो मताः ॥\nब्रह्मसूर्याग्निलोकेषु व्याप्तैका देवता हरिः ।\nतादृशं नृहरिं ज्ञात्वा पुनर्मृत्युं जयन्नसौ ॥\nसदैव वर्तते ब्रह्मा पुनर्मृत्युर्मृतिः स्मृता ।\nनैनं मृत्व्यात्मको मृत्युः प्राप्नोति हरिसेवनात् ॥\nयस्मान्नृसिंहो मृत्योश्च मृत्युरात्माऽस्य वै भवेत् ।\nआततत्वात् तथात्तृत्वादात्मासौ ब्रह्मणः स्मृतः ॥\nआदानादात्तनिर्माणादात्तज्ञानात् तथैव च ।\nएतासां देवतानां च ब्रह्मेशत्वेन वर्तते ॥\nनृसिंहस्य सदा ज्ञानाद्ध्यानाच्च तदनुग्रहात् ॥ इति महासंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| },
| | "सर्वसंहारकं विष्णुं देवीं जीवांस्तथैव च ।", |
| {
| | "कालं त्रिगुणसाम्यं च कर्माणि प्राणमिन्द्रियम् ॥ संस्कारं चैव वेदांश्च नर्ते किञ्चिल्लये त्वभूत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
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| | ] |
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| "text": "उद्गीथब्राह्मणम्"
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| "text": "द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "लयकाले परमात्मनैवावृतमासीत् ।" |
| | ] |
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| "text": "द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।\nतमोरूपाः सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥\nबहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।\nयज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥\nजयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् ।" | | "lines": [ |
| | "अशनं जगदेतद्यन्नयत्यात्मेच्छया हरिः ।", |
| | "अशनाया ततः प्रोक्त उदन्या कर्मनामकः ॥ इति ब्राह्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्यत्र नेतृत्वप्रतीतावपि श्रुतिप्रसिद्धेः स एव नेतेत्याह अशनाया हि मृत्युरिति ॥ तत्तत एव मनोऽकुरुत यतः स्वयमेवासीन्नान्यत् । आत्मवान् स्यामित्यैच्छत् । शरीरवान् त्स्यामिति । अप्सृष्ट्यर्थं मनोऽकुरुत ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "ऐच्छद्विष्णुरदेहः सन् देहवान्त्स्यामिति प्रभुः ।", |
| | "यतो देह इदं सर्वं तस्य विष्णोरदेहिनः ॥", |
| | "तद्वशत्वात् स्वयं देवश्चिदानन्दशरीरकः ।", |
| | "सोऽत्मानमर्चन्नचरदप्सृष्ट्यर्थं जनार्दनः ॥", |
| | "यत्कुर्वन् यत्सृजेदीशस्तद्भवेद्धि तदात्मकम् ।", |
| | "अतोऽर्चतो यतो जाता आपोऽतोऽर्चनसाधनाः ॥", |
| | "अन्यथा कर्तुमीशोऽपि क्रीडया तत्तदात्मकम् ।", |
| | "कर्तुं तत्तत्प्रवृत्तिः संस्तत्करोति स्वयं प्रभुः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "मे सर्वाहेयस्य विष्णोः ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्मच्छब्दगतैर्विष्णुर्वाच्यः सप्तविभक्तिभिः ।", |
| | "सर्वाहेयत्वतस्त्वेकः सर्वस्य प्रतियोगितः ॥", |
| | "युष्मच्छब्दाभिधेयश्च तच्छब्दैश्च परोक्षतः ।", |
| | "स एव बहुरूपत्वाद् बहुशब्दाभिधानवान् ॥", |
| | "जीवेस्थितेन रूपेण हृद्गतेन द्विधोच्यते ।", |
| | "भिन्नोऽपि सर्वजीवेभ्यः सर्ववस्तुभ्य एव च ॥", |
| | "पूर्णानन्दादिरूपस्य कुतोऽल्पसुखिनैकता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "उदकं सुखहेतुत्वात् कमित्येवाभिधीयते ।", |
| | "तदेव ह्यर्चतो जातमतोऽर्क इति कीर्त्यते ॥ इति व्यासनिरुक्ते ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥" | | "lines": [ |
| | "अर्चतो जातं सुखसाधनं चेत्यर्क इत्यर्थः । कं सुखमस्मै भवति ।" |
| | ] |
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| "text": "औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥\nअसुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।\nदैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥\nपांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।\nतस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥\nशापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।\nस्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥\nएवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते ।" | | "lines": [ |
| | "अपां हि सुखहेतूनां वेद विष्णोर्जनिं हि सः ।", |
| | "स मुक्तः सुखभागेव स्याद्विष्णोस्तु प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ॥ १" |
| | ] |
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| "text": "ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "आपो वा अर्कस्तद्यदपांशर आसीत् तत्समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "अर्कशब्दस्यादित्ये प्रसिद्धत्वादप्शब्दोऽपि तत्रेत्याशङ्कां निवर्तयितुमापो वा अर्क इति पुनर्वचनम् । नादित्येऽर्कशब्दः किन्त्वप्स्वेवार्कशब्द इत्यर्थः । शरो मण्डः ।" |
| | ] |
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| "text": "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥"
| | "lines": [ |
| | "फेनरूपस्तु यो मण्डो जलस्यासौ सुसंहतः ।", |
| | "पृथिवीत्वं समापन्नस्तस्यां शिश्ये जनार्दनः ॥", |
| | "ततः स चिन्तयामास स्यादग्निरिति देवराट् ।", |
| | "तच्चिन्तनात् समुत्पन्नो वायुरग्न्यभिधानवान् ॥", |
| | "अग्रजत्वादग्रणीत्वाद्वायोरग्नित्वमिष्यते ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "शक्तिविस्रंसने चापि शयने चापि कीर्तितः ।", |
| | "श्रमशब्दो हरेर्नैव शक्तिविस्रंसनं क्वचित् ॥", |
| | "अतो हरेः श्रमो नाम शयनं सम्प्रकीर्तितम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्यामश्राम्यदिति साधिकरणत्वाच्च शयनं युक्तम् । न हि पृथिव्यां श्रमो नामान्तःकरणधर्मो युज्यते । अधिकरणपरम्पराकल्पनं च क्लिष्टकल्पनम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सृष्ट्वा स पृथिवीं विष्णुः शेतेऽनन्तेऽब्धिमध्यगः ।", |
| | "तस्यां पृथिव्यां श्वेताख्ये द्वीपे मुक्तैरुपासिते ॥ इति मुक्तिसंहितायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तप्त आलोचनायुक्तस्तस्मात् कार्र्यार्थकामना ।", |
| | "तप्तता तु हरेरुक्ता कुतो दुःखं हरेः प्रभोः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "तेजोरसः जगतः सामर्थ्यसारभूतः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं अग्निं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मावथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे, द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरस्स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥३॥" |
| | ] |
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| "text": "स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥\nविमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।\nउन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥\nअग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।\nसूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥" | | "lines": [ |
| | "वायुरग्निरिति प्रोक्तो ह्यग्रणीत्वादथाङ्गिनाम् ।", |
| | "नेतृत्वाददनाच्चापि तस्य स्रष्टा जनार्दनः ॥", |
| | "स वायुर्वायुरूपेण जगत्पाति शरीरगः ।", |
| | "आदित्यस्थेन रूपेण जगद्याति प्रकाशयन् ॥", |
| | "अग्निस्थेन तु रूपेण हूयते सर्वयष्टृभिः ।", |
| | "आदाय यात्यायुरिति स एवादित्य उच्यते ॥॥", |
| | "तत्सम्बन्धात्तु तन्नाम सूर्यस्याग्नेस्तथैव च ।", |
| | "स एष कूर्मरूपेण वायुरण्डोदके स्थितः ॥॥", |
| | "विष्णुना कूर्मरूपेण धारितोऽनन्तधारकः ।", |
| | "अस्य पादा हि चत्वारो ह्यण्डोदे कोणसंस्थिताः ॥", |
| | "उरस्तु भूमिसंश्लिष्टमतिरिच्य भुवं पुनः ।", |
| | "पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव शिरश्चोदकसंस्थितम् ॥", |
| | "आकाशमुदरे तस्य द्यौः पृष्ठे संस्थिता विभोः ।", |
| | "एवंविद्वांस्तु यत्रैति तत्रैव प्रतितिष्ठति ॥ इति प्रभञ्जने ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्थानेच्छा चेत् तत्रैव प्रतितिष्ठति ।", |
| | "उपास्ते कूर्मरूपं यो वायुं संस्थितिमाप्नुयात् ।", |
| | "इच्छया विनिवृत्तिं वा लोकं चावृत्तिवर्जितम् ॥ इत्यध्यात्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स एष प्राणस्त्रेधा विहित इति वचनाच्च वायुः ।", |
| | "बिभर्त्यण्डं हरिः कूर्मस्त्वण्डे चाप्युदकं महत् ।", |
| | "उदके कूर्मरूपस्य वायुः पुच्छं समाश्रितः ॥", |
| | "वायोः पुच्छं समाश्रित्य शेषस्तु पृथिवीमिमाम् ।", |
| | "बिभर्ति तस्यां च जगदिदं सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ इति वैभवे ।" |
| | ] |
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| "text": "सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "वायोस्तु कूर्मरूपस्य पूर्वतश्चोदके मुखम् ।", |
| | "आग्नेयेशानगौ बाहू पादौ निर्ऋतिवायुगौ ॥ इति प्रकृष्टे ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनायां मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवन्न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान् संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात् स भाणमकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४ ॥" |
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| "text": "स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।\nअनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥\nविष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः ।" | | "lines": [ |
| | "आत्मा, ब्रह्मा मे द्वितीयो जायेतेत्यकामयत । वायुरेव ब्रह्मा भवतीति दर्शयितुं वायोः सृष्टिः प्रथममुक्ता ।" |
| | ] |
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| "text": "एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥"
| | "lines": [ |
| | "वायुरेव यतो ब्रह्मपदं नियमतो व्रजेत् ।", |
| | "सहैव जननेऽप्यस्मात्पूर्वं वायोर्जनिं वदेत् ।", |
| | "क्वचित्तु ब्रह्मणः पूर्वं प्राधान्यात् तत्पदस्य च ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मा विरिञ्चः सुमनाः सुधौतश्चेति कथ्यते ।", |
| | "ब्रह्मा चतुर्मुखश्चेति पूर्वजो यः प्रजापतिः ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
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| "text": "एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "स मनसा स्वेच्छया वाचं श्रियं देवीं मिथुनं समभवत् ।", |
| | "मम द्वितीयो जायेत ब्रह्मेति भगवान् परः ।", |
| | "वेदाभिमानिनीं देवीं श्रियं समभवत् प्रभुः ॥", |
| | "स्वेच्छयैव यतः शक्तिस्तां विनाऽपि हरेः सदा ।", |
| | "ततः संवत्सरो नाम ब्रह्मा समभवत् प्रभोः ॥", |
| | "तं गर्भमुदरे बिभ्रद्यावत्संवत्सरं रमा ।", |
| | "तं जातमत्तुं स्वमुखं विदार्य पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "श्रुत्वा रावं पुनस्तस्य व्यदधात् सृष्टये प्रभुः ॥ इति कारणविवेके ।" |
| | ] |
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| "text": "सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥\nगीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।\nअर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥" | | "lines": [ |
| | "बिन्दुलोपेनाशनाया मृत्युरित्यर्थः । अशनाया हि मृत्युः इत्युक्तम् । सर्वाशननेतेत्यर्थे बिन्दुः । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । सम्यगात्मनो वत्सभूतान् देवादीन् रमयतीति संवत्सरः ।" |
| | ] |
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| "text": "तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मणो भाणिति वचो निःसृतं भयतो मुखात् ।", |
| | "तस्याभिमानिनी देवी तदैवोत्था चतुर्मुखात् ॥", |
| | "वागीश्वरीति तामाहुर्वाचं चापि सरस्वतीम् ॥ इति भावतत्त्वे ।" |
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| "text": "अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत ।" | | "lines": [ |
| | "तदभिमानित्वात् सैव वागित्युच्यते । भारूपो णरूपश्चेति भगवान् भाण् । तद्व्यञ्चकत्वाद् भणनं वाक् ॥ ४ ॥" |
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| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "स ऐक्षत यदि ह वा इमभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तथा वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्चर्चो यजूंषि सामानि च्छन्दां सि यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वं सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥" |
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| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अभिमंस्ये लीनं करिष्ये चेत् ।" |
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| "text": "गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥\nभूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः ।" | | "lines": [ |
| | "मानं ज्ञानं लयश्चैव मर्यादा चैव कथ्यते ।", |
| | "उत्पादनं च सङ्ख्यानं बलं च क्वचिदुच्यते ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
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| "text": "तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥" | | "lines": [ |
| | "वेदाभिमानिनः सर्वास्तथा यज्ञाभिमानिनः ।", |
| | "गायत्र्यामसृजद् ब्रह्मा स्वभार्यायां प्रजास्तथा ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।" |
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| "text": "वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥\nगानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् ।" | | "lines": [ |
| | "यद्यद्ब्रह्माऽसृजत् पूर्वं तत्तदत्ति जनार्दनः ।", |
| | "अदितिर्नाम तेनासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "उपास्ते यः परं देवमेवमत्तीति सर्वदा ।", |
| | "स्वयोग्यतानुसारेण सर्वात्ताऽसौ भवत्युत ॥", |
| | "ब्रह्मरुद्रसुपर्णानां सर्वात्तृत्वं विशेषतः ।", |
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| "text": "अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥"
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| | "आत्मनो यादृशा भोगा भोक्तुं योग्या हि तादृशान् ।", |
| | "भोक्ता विष्णुरिति ध्यायेत् सर्वात्तृत्वं हरेः स्मरेत् ॥", |
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| "text": "मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥" | | "lines": [ |
| | "सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूमो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥\nअनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।\nसर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥\nप्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।\nजपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥\nअसतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च ।\nद्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥\nनियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।\nसहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥\nगदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।\nवामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥\nअष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।\nचतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥\nअष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।\nअसद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥\nतमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।\nमृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥\nएवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।\nयदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥\nआत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।\nआगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥\nएवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।\nतस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥\nतस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।\nतेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥\nयस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "इच्छतो विष्णुयजनं ब्रह्मणः साधनास्मृतेः ।", |
| | "श्रमात् तापाच्च देहं तं त्यक्तुमिच्छा बभूव ह ॥", |
| | "इच्छया चाप्युदक्रामत् प्राणैः सह पितामहः ।", |
| | "यशोवीर्यनिमित्तत्वात् प्राणास्तन्नामकाः स्मृताः ॥", |
| | "अत्यल्पे चापि सञ्जाते श्रमेऽपि न तदिच्छया ।", |
| | "तापे प्राणा निःसरन्ति सा च क्रीडा विभोः स्मृता ॥", |
| | "बृंहमाणं शरीरं तु पुनर्दृष्ट्वा पितामहः ।", |
| | "प्रवेष्टुं तच्छरीरं च कामयामास स प्रभुः ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्रजापतिब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मान्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ततोऽहं नामाऽभवत् तस्मादप्येतर्ह्यामंत्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात् पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥"
| | "lines": [ |
| | "पुनस्तस्मिन् प्रवेशाय शवरूपस्य मेध्यताम् ।", |
| | "ऐच्छत् तेनैव देही स्यामिति तस्मिन् विवेश च ॥", |
| | "तस्मिन् प्रविश्य स ब्रह्मा द्वितीयं वपुरग्रहीत् ।", |
| | "दृष्ट्वोपायं महायज्ञेऽथाश्वाकारं पितामहः ॥", |
| | "श्वैतीभावात् परं यस्मात् तज्जज्ञेऽतोऽश्वनामकम् ।", |
| | "यदर्थं श्वेततामाप तद्देहो मेध्यतामपि ॥", |
| | "अश्वमेधः स यज्ञोऽभून्नाम्ना तेन तदा कृतः ।", |
| | "श्वैतीभावं गते देहे पुनर्मेध्ये यतः स्थितः ॥", |
| | "अतोऽश्वमेधनामाऽसौ ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ।", |
| | "अश्वो भूत्वा यतो मेध्यः सोऽभवत् तेन वा स्मृतः ॥", |
| | "मेधो यज्ञः समुद्दिष्टो याज्ञीयं मेध्यमुच्यते ।", |
| | "शुद्धं मेध्यमथापि स्यादेवंविद्योऽश्वमेधवित् ॥" |
| | ] |
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| "text": "इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवासीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः ।" | | "lines": [ |
| | "तमनवरुध्यैवामन्यत । तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदैवत्यं प्रोक्षितं प्राजात्पत्यमालभन्त । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव अप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी बिभेति सहायमीक्षाञ्चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभैष्यत् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "तमश्वरूपमात्मानमनिवारितवद्विभुः ।", |
| | "चारयामास रूपेण तदन्येन पुमात्मना ॥", |
| | "सर्वस्मिन् भुवने चाब्दं तदन्ते परमात्मने ।", |
| | "स्वस्मिन् स्थिताय सङ्कल्प्य यज्ञ आलभतात्मवान् ॥", |
| | "अजादिकान् पशूनन्यदेवस्थपरमात्मने ।", |
| | "कर्तृत्वेन पशुत्वेन यत्फलं तदशेषतः ॥", |
| | "मम स्यादिति मन्वानः सोऽश्वरूपमधारयत् ।", |
| | "अबुद्धिपूर्वमरणात् स्वर्गश्चापि पशोर्भवेत् ॥", |
| | "ज्ञानपूर्वमृतेः पुंसः किमु वक्तव्यमित्यजः ।", |
| | "एवं सूर्योऽप्यश्वमेधनामा संवत्सराभिधः ॥", |
| | "सूर्ये स्थितो यतो ब्रह्मा ह्यश्वमेधाभिधः स्वयम् ।", |
| | "सूर्ये ततत्वात् सूर्यात्मा ब्रह्मासौ परिकीर्तितः ॥", |
| | "अग्नौ स्थितो यतः सोऽर्कस्तस्मादग्निरितीर्यते ।", |
| | "ब्रह्मातता यतो लोकास्तदात्मानस्ततो मताः ॥", |
| | "ब्रह्मसूर्याग्निलोकेषु व्याप्तैका देवता हरिः ।", |
| | "तादृशं नृहरिं ज्ञात्वा पुनर्मृत्युं जयन्नसौ ॥", |
| | "सदैव वर्तते ब्रह्मा पुनर्मृत्युर्मृतिः स्मृता ।", |
| | "नैनं मृत्व्यात्मको मृत्युः प्राप्नोति हरिसेवनात् ॥", |
| | "यस्मान्नृसिंहो मृत्योश्च मृत्युरात्माऽस्य वै भवेत् ।", |
| | "आततत्वात् तथात्तृत्वादात्मासौ ब्रह्मणः स्मृतः ॥", |
| | "आदानादात्तनिर्माणादात्तज्ञानात् तथैव च ।", |
| | "एतासां देवतानां च ब्रह्मेशत्वेन वर्तते ॥", |
| | "नृसिंहस्य सदा ज्ञानाद्ध्यानाच्च तदनुग्रहात् ॥ इति महासंहितायाम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तस्य त्वेकस्य सहसा यतो भीः समजायत ।\nतस्मादद्यापि चैकस्य निर्विवेकं भयं भवेत् ॥\nविममर्श ततो ब्रह्मा यस्मान्मद्बाधको न हि ।\nमया सृज्या यतः सर्वे इतः पश्चात्तनो हरः ॥\nअतः कस्माद्बिभेमीति तस्य भीतिरपोहिता ।\nविष्णोरतिप्रियत्वात्तु तदन्येषां पितृत्वतः ॥\nकस्माद्भयं भवेत् तस्य समानाद्धि भयं भवेत् ।\nविरोधिनोऽधिकाद्वापि हीनाद्वा पारवश्यतः ॥\nहीनमेव यतस्तस्य सर्वमेव जगद्वशे ।\nन च जातं तदा सर्वं हरिरेव यतः परः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "भूयःशब्दः पूर्णत्ववाची । परमेश्वरं परिपूर्णं यजेयेति । अश्वदित्यश्वोऽभवत् तदेव रूपं मेध्यं यज्ञ आलभनीयं चाभवदित्यश्वमेधः । तमनवरुध्येवामन्यतेत्यादिवाक्यशेषादश्वभावः प्रतीयते । अश्वद् बृंहितं पश्चान्मेध्यं चाभूद्यस्य शरीरं सोऽश्वमेध इति च । निरोधमकृत्वा चारयिष्यामीत्यमन्यत । स्वेच्छयैव स्वरूपान्तरत्वादश्वरूपस्य ॥" |
| | ] |
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| "text": "स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयत् ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत् ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "उद्गीथब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "न रेमे स ततो ब्रह्मा तस्मादेकस्य नो रतिः ।\nअथापि पत्नीमैच्छच्च स स्थूलत्वमुपागतः ॥\nदम्पती सहितौ यावद्ब्रह्मा चैव सरस्वती ।\nतावद्देहोऽभवद्ब्रह्मा तदा देहं द्विधाऽकरोत् ॥\nपातनात् पतिपत्नीत्वशब्द एनोरजायत ।\nतस्मात् तयोरेकसुखं भवत्येवार्धपात्रवत् ॥\nततस्तस्यामुमेशादीन् देवान् सर्वान् मनूनपि ।\nजनयामास बोधस्य प्राधान्यं हि मनुष्यता ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सोहेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्तां समेवाभवत् । ततो गावो अजायन्त बडवेतराऽभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्तां समेवाभवत् तत एकशफमजायताऽजेतराभवद् वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्तां समेवाभवत् ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।", |
| | "तमोरूपाः सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥", |
| | "बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।", |
| | "यज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥", |
| | "जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सोऽवेदहं वाच सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सर्वज्ञाऽपि तु सा देवी विरिञ्चे भक्तिमत्यपि ।\nतद्भार्यतामात्मनश्च नितरां धर्ममीक्षती ॥\nअनाद्यनन्तसम्बन्धमुभयोरपि जानती ।\nस्त्रीस्वभावं दर्शयन्ती साऽधर्ममिव चैक्षत ॥\nनानासृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं सा गोत्वादिकमाव्रजत् ।\nवृषादिरूपतां सोऽपि प्राप्य सृष्ट्वेदमञ्जसा ॥\nसर्जनात् सृष्टिनामाऽभूत् तद्वित्तत्पुत्रतां व्रजेत् ।\nपिपीलिकान्तरुद्रादौ यथायोग्यत्वमात्मनः ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥" |
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| "text": "अथेत्यभ्यमन्थत् स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत । तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥" |
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| "text": "अथान्नादमथाप्यन्नं स्रक्ष्यामीति विचिन्तयन् ।\nओष्ठद्वयं ममन्थान्तर्हस्तौ चैव परस्परम् ॥\nतन्मुखाच्चैव हस्ताभ्यामन्तरग्निरजायत ।\nएवं सर्वस्य हेतुत्वात् सर्वस्यापि पतित्वतः ॥\nसर्वे देवा एष एवेत्याहुर्वेदविदो जनाः ।\nस्वतन्त्रेषु यतः शब्दा वर्तेयुः सर्व एव च ॥\nस रेतसः पुनः सोममसृजद्ब्रह्मविद्धरः ।\nसर्वाधिकोऽपि योग्यत्वान्मर्त्यधर्मतया पुरा ॥\nअवमो योग्यताहीनानप्यायुर्मात्रतोऽधिकान् ।\nयतोऽस्रागतिसृष्टिस्तं देवं यो वेद पूरुषः ॥\nविष्णोः प्रसादतः सृष्टिं देवलोके स जायते ।\nआत्मयोग्यानुसारेण सुखज्ञानादियुक्तता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥" |
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| "text": "अव्याकृतब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामाऽयमिदं रूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामायमिदं रूप इति स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात् विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये तं न पश्यन्त्यकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणनामा भवति वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्माऽनेन ह्येतत्सर्वं वेद यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥" |
| | ] |
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| "text": "विश्वम्भरो वायुः । अकृत्स्नो हि स इत्यस्याभिप्रायः स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदेत्यादि । प्राण इत्यादिनामानि परमेश्वरस्य न सर्वगुणसम्पूर्णतां वदन्ति । किन्तु प्राणनादिकर्मकर्तृत्वमेव वदन्ति । आत्मशब्द एव सर्वगुणपरिपूर्णत्वं वदति । अस्य सर्वस्य गुणजातस्यायमात्मैव पदनीय आश्रयो यस्मादतस्तं सर्वगुणवाचकेनात्मशब्देनैवोपासीत । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद यस्मात् सर्वज्ञानप्रदस्तस्मात् सर्वगुणसम्पूर्णः इत्येवोपासनं तस्य युक्तम् । तदुपासनादेव सर्वज्ञत्वादयो भवन्ति किमु तस्येति । पद्यते अनेनेति पदं साधनम् । यथा तत्तत्साधनेन तत्तत्फलं प्राप्नुयादेवं सर्वगुणयुक्तत्वेन भगवदुपासनात् कीर्तिं श्लोकं च विन्दते । शं लोकः श्लोकः परमानन्दं परमं ज्ञानं चेत्यर्थः ।" | | "lines": [ |
| | "औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥", |
| | "असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।", |
| | "दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥", |
| | "पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।", |
| | "तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥", |
| | "शापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।", |
| | "स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥", |
| | "एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "तदेतत् प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुतं भवति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स एष विष्णुर्भगवान् पुत्राद्वित्तात् तथाऽऽत्मनः ।\nअन्यस्मादपि सर्वस्मात् प्रेष्ठ एव स्वभावतः ॥\nआत्मनोऽपि प्रियत्वं तु तेनैव कृतमञ्जसा ।\nआत्मनो निरयायैव कुर्यात् कर्माणि नित्यशः ॥\nयतोऽतः स्वात्मनश्चापि स्वाप्रियत्वमुदाहृतम् ।\nस चेदप्रियकृद्विष्णुर्नात्माऽपि प्रियतां व्रजेत् ॥\nअस्मिन् प्रिये प्रियं सर्वं तस्मादेकः प्रियो हरिः ।\nस चात्मशब्देनोद्दिष्टो यस्मादाप्तगुणः प्रभुः ॥\nअतो विष्णोः प्रियं ब्रूयाद्यः स्वात्माद्यं दुरात्मवान् ।\nप्रियरोधं करोषीति तं ब्रूयाद्वैष्णवो महान् ॥\nएवं वदन् वैष्णवस्तु समर्थः प्रियरोधने ।\nतस्य स्याच्च विशेषेण तदुक्त्यैवापि दुःखिनः ॥\nतस्मात् सर्वप्रियो विष्णुरित्युपास्ते सदा प्रियः ।\nनास्य प्रियमनित्यं स्यादस्य प्रीतिः सदा भवेत् ॥\nतस्मात् सर्वप्रियं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।\nनित्यप्रियकरो विष्णुर्भवेत् तस्याप्यजः स्वयम् ॥इत्यध्यात्मे ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तदाहुर्- यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद् यस्मात् तत्सर्वमभवदिति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| "text": "ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्त आत्मयोग्यतापूर्तिमाप्नुवन्तो महान्तो यदाहुः ब्रह्मविद्यया स्वयोग्यं सर्वं प्राप्यत इति । नित्यनिर्दुःखानन्दानुभवरूपो हि स्वत उत्तमो जीवः । तादृशं रूपमज्ञानात् तिरोहितं ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते एव । न चान्यथाऽभिव्यज्यत इति सन्तो यदाहुः । तत्तत्र केचिन्मनुष्या इति मन्यन्ते । स्वरूपमपि ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते चेत् तद् ब्रह्मापि यस्मात् सर्वमभवत् परिपूर्णमभवत् तस्मात् स्वरूपं ज्ञात्वैवाभवत् किमिति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात् तत्सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत् पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषं समभवत्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सत्यम् । तदपि स्वरूपं नित्यापरोक्षज्ञानेन सर्वदा जानात्येव । अत एव सर्वदा परिपूर्णमिति तेषां परिहारः । तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत्सर्वमभवदिति । आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यादिवत् सदातनज्ञानं पूर्णभावं चाह ।" | | "lines": [ |
| | "अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सन्न व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत । क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात् क्षत्रात् परं नास्ति । तस्मात् ब्रह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मेवान्तत उप निःश्रयति स्वां योनिं य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयां सं हिंसित्वा ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "विष्णोर्ब्राह्मणजातिः सन् ब्रह्मा जज्ञे चतुर्मुखः ।\nइतोऽग्रे जगतस्तस्मात् क्षत्रजातिरजायत ॥\nवायुः सदाशिवोऽनन्तो गरुडः शक्र एव च ।\nकामश्च वरुणश्चैव सोमसूर्यौ यमस्तथा ॥\nएवमाद्याः क्षत्रियास्तु देवानां ब्रह्मनिर्मिताः ॥\nश्रेयसी सर्वजातिभ्यः क्षत्रजातिरिति श्रुतिः ।\nनैव क्षत्रात् परा जातिर्ब्रह्मजातिं विना क्वचित् ॥\nब्राह्मणाच्च परो राजा राजसूयाश्वमेधयोः ।\nउपास्ते राजसूयेऽतो ब्राह्मणो राजसूयिनम् ॥\nआसीन आसनाधस्तात् तथाऽपि ब्राह्मणो गुरुः ।\nतस्मात् स राजसूयान्ते ब्राह्मणान् वन्दयीत च ॥\nयः क्षत्रियो ब्राह्मणहा पितृहा स प्रकीर्तितः ।\nपापीयानेव भवति हत्वा स्वपितरं यथा ॥ इति वामने ।" | | "lines": [ |
| | "अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥" |
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| "text": "स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमिषं वै पूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥", |
| | "विमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।", |
| | "उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥", |
| | "अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।", |
| | "सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥" |
| | ] |
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| "text": "विवस्वदिन्द्रवरुणविष्णुभ्योऽन्ये दितेः सुताः ।\nरुद्रादन्ये तथा रुद्रा वायोरन्ये च वायवः ॥॥\nअग्नेरन्ये च वसवो वैश्या इत्येव कीर्तिताः ।\nएक एव हरेर्जातः परिवारविवर्जितः ॥॥\nवाय्वादीन् क्षत्रियान् सृष्ट्वा पुनरल्पपरिग्रहः ।\nइच्छन् बहुपरीवारं वैश्यान् देवान् ससर्ज ह ॥॥\nततो बहुतरानिच्छन् शूद्रान् देवान् ससर्ज ह ।\nअश्विनौ पृथिवी चैव काला मृत्यव एव च ॥ ॥\nशूद्रदेवाः समुद्दिष्टा देववर्णा इति स्मृताः ।" | | "lines": [ |
| | "अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥" |
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| "text": "स नैव व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात् परं नास्त्यथो अबलीयन् बलीयां समाशंसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वैतत् तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥" |
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| "text": "स्रष्टा स्वयं समुद्दिष्टः पालका देवता इमाः ॥ ॥\nधारणं कथमस्य स्याद्गतिश्चास्य कथं परा ।\nइति मत्वा हरेर्भक्तिर्धर्मरूपं पुनर्विभुः ॥॥\nप्राणिनां धैर्यरूपं च वायो रूपान्तरं पुनः ।\nससर्ज मतिमान् ब्रह्मा विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥॥\nतस्माद् वायोः परो नास्ति ऋते विष्णुं सनातनम् ।\nशेषादीनां क्षत्रियाणां वायुरेवाधिपः स्मृतः ॥॥\nधारणाद्धर्म इत्याहुर्वायुर्धारयति प्रजाः ।\nअबलोऽपि ततो वायोर्विष्णुभक्त्यादिरूपिणः ॥\nप्राप्तुमिच्छति युक्तः सन् विष्णुं सुबलवत्तरम् ।\nयथैव युवराजेन महाराजमभीप्सति ॥॥\nप्राप्तुं धर्माभिमानी स वायुः सत्याभिमानवान् ।\nतस्मादाहुर्धर्मविदं सत्यं वेत्तेति वेदिनः ॥\nसत्यज्ञमथ धर्मज्ञं वायुर्देवो यतस्तयोः ॥ इति नारदीये ।" | | "lines": [ |
| | "सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥" |
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| "text": "तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवत् ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यश्शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्यां रूपाभ्यां ब्रह्माभवदथ यो ह वा अस्माल्लोकात् स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽनूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवं विन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥" |
| | ] |
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| "text": "नैव व्यभवदिति परिवारबहुत्वेन यद्विशिष्टत्वं तन्नाभवदित्यर्थः ।" | | "lines": [ |
| | "स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।", |
| | "अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥", |
| | "विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः ।" |
| | ] |
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| "text": "अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेनर्षिणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवं हैवं विदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमांसितम् ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥" |
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| "text": "योऽयं सर्वेषु जीवेषु नियामकतया स्थितः ।\nस विष्णुराप्तकामत्वादात्मेत्येवोच्यते बुधैः ॥\nस लोकः सर्वभूतानां सर्वजीवेषु संस्थितः ।\nवैश्वदेवादिकान् होमान् यज्ञांश्च कुरुते विभुः ॥\nकारुण्यात् सर्वदेवेषु तेन देवाश्रयो हरिः ।\nऋषीणामाश्रयश्चापि स्वाध्यायेष्वषिसंस्मृतेः ॥\nस हि जीवेषु सन्दिष्टः पिण्डं पुत्रजनिं तथा ।\nयत्करोति पितॄणां च संश्रयस्तत एव सः ॥\nतृणोदकादिदानेन पशूनामन्नतो नृणाम् ।\nउपकाराच्च सर्वेषां प्राणिनामाश्रयो हरिः ॥\nयज्ञादीन् देवतादीनामन्नत्वेन पुरैव यत् ।\nब्रह्माद्यैरर्थितः प्रादात् क्षीराब्धेस्तट उत्तरे ॥\nअतश्च सर्वलोकानामाश्रयो विष्णुरेव सः ।\nएवं यो वेत्ति विष्णोस्तु सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥\nसर्वाण्यपि हि भूतानि तस्येच्छन्त्यविनाशिताम् ।\nस्वाश्रयस्य यथा नित्यमनाशं प्रार्थयन्ति हि ॥\nराजादेरपि तान्येवमुत्तमाश्रयवेदिनः ।\nतदेतद्वासुदेवस्य सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥\nविदितं सर्ववेदैश्च मीमांसाभिश्च निश्चितम् ॥\nइति भविष्यत्पर्वणि ।" | | "lines": [ |
| | "एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छंश्च नातो भूयो विन्देत् तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्योकृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवं श्रोत्रेण हि तच्छ्रुणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥११॥ ॥ इति अव्याकृतब्राह्मणम् ॥" | | "lines": [ |
| | "एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "एको नारायणः पूर्वमासीज्जायां स ऐच्छत ।\nविद्यमानामपि सदा भोगार्थं पुरुषोत्तमः ॥\nनित्यत्वेऽप्युभयोर्देवोऽवियुक्तस्तु तया यदा ।\nएक इत्युच्यते देव्या रममाणः सुतं विभुः ॥\nऐच्छद्ब्रह्मा ततो जज्ञे ततो देवांश्च सर्वशः ।\nजाते पुत्रे वित्तमैच्छद्भूतान्यण्डं ततोऽभवत् ॥\nअण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः कुर्यां कर्मेति चैच्छत ।\nततस्तु कृतवान् यज्ञं स्वस्मै स पुरुषोत्तमः ॥\nआहुरात्मेति तं देवं पूर्णत्वाद्विष्णुमव्ययम् ।\nतस्मादद्यापि यः कामी स ह्येतावन्तमिच्छति ॥\nदैवं वित्तं सुखाद्यं हि मित्राद्यं मानुषं तु यत् ।\nइदानीमपि तस्माद्धि कामयेदेवमेव तु ॥\nयः कश्चित् पुरुषो वाऽपि तद्वैकल्यादकृत्स्नवान् ।\nएकाकिनोऽप्यवैकल्यं यथैव स्यात् तथा शृणु ॥\nस्वात्मनस्त्वपृथग्यत्तज्ज्ञानरूपं मनः परम् ।\nमुक्तावपि न हेयं यत्तत्स्वात्मेत्येव चिन्तयेत् ॥\nजायां तु तादृशीं वाचं बलं तादृक्स्वमात्मजम् ।\nश्रोत्रं चक्षुश्च तादृग्यद्वित्तं दैवं च मानुषम् ॥\nएवम्भूतं चिन्तनं यत्तत्कर्मेत्येव चिन्तयेत् ।\nएतत्षट्कं च हरये सर्वेशाय समर्पयेत् ॥\nएवमात्मा प्रिया पुत्रो वित्तं द्विविधमित्यपि ।\nपञ्चभिः क्रियते यज्ञः पुरुषः पशुरेव च ॥\nमातापितृभ्यामन्नेन तयोः पूर्वेण कर्मणा ।\nजन्यस्य कर्मणा चैव साध्यः पञ्चभिरेव तु ॥\nएवं हि प्राणिनोऽन्येऽपि जायन्ते नात्र संशयः ।\nएतामुपासनां कुर्याद्यो ब्राह्मं पदमाप्य च ॥\nसर्वस्यास्य पतिर्भूयाद्विष्णोरेव प्रसादतः ।\nब्राह्मे पदे त्वयोग्या ये ते देवपदमाप्नुयुः ॥\nतस्याप्ययोग्या लोकस्य भवेयुरधिकं प्रियाः ।\nक्रमान्मुक्तिं व्रजेयुश्च केशवस्य प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ।" | | "lines": [ |
| | "सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥", |
| | "गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।", |
| | "अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥" |
| | ] |
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| "text": "सप्तान्नब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वै तामक्षितिं वेद । सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "पिता विष्णुः । यत् यदा । तपसा प्राणिनां कर्मभिः । मेधया स्वेच्छया ।" | | "lines": [ |
| | "तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते । स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रं ह्येतत् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च । तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्रजुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् ॥३॥" | | "lines": [ |
| | "गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥", |
| | "भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः ।" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति । तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाऽग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वाऽनुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदपपुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति ॥५॥" | | "lines": [ |
| | "वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥", |
| | "गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् ।" |
| | ] |
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| "text": "कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति । पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यो वैतामक्षितिं वेदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात् क्षीयेत ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनात्त्येतत् स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ ८ ॥"
| | "lines": [ |
| | "पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥", |
| | "अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।", |
| | "सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥", |
| | "प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।", |
| | "जपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥", |
| | "असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च ।", |
| | "द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥", |
| | "नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।", |
| | "सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥", |
| | "गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।", |
| | "वामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥", |
| | "अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।", |
| | "चतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥", |
| | "अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।", |
| | "असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥", |
| | "तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।", |
| | "मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥", |
| | "एवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।", |
| | "यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥", |
| | "आत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।", |
| | "आगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥", |
| | "एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।", |
| | "तस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥", |
| | "तस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥", |
| | "यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीभीरित्येतत् सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि नः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वाऽयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "आस्यादयत इत्ययास्यः । प्रसिद्धमृत्व्यमृतत्वान्नात्र तिरोहितमिवास्ति । एष उद्गातेति वायुत्वयोग्यः । तद्धैतल्लोकजिदेवेति तस्माद्वराभियाचनम् ॥", |
| | "॥ इति उद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सप्तान्नानि यदा विष्णुः परमः पुरुषो विभुः ।\nससर्ज तेषां स्वार्थानि चकार त्रीणि केशवः ॥\nमनो वाचं तथा प्राणं तस्मात् तैस्तुष्टिमेति सः ।\nतस्मात् तद्भक्तिकामः स्यात् सङ्कल्पं तत्कृतिं प्रति ॥\nकुर्यात् तद्वेदनेच्छां च श्रद्धां तस्य गुणोन्नतौ ।\nअश्रद्धामन्यसाम्ये वाऽप्यन्येषामुन्नतौ ततः ॥\nअन्येषां तत्स्वरूपत्वे प्राकृतत्वादिकेऽस्य च ।\nधृतिं तन्निन्दिवागादौ प्राप्ते तत्रैव चाधृतिम् ॥\nतन्मतस्य विसर्गार्थे ह्रियं तद्भक्तिवर्जने ।\nतद्विवेके धियं चैव तदज्ञाने भियं तथा ॥\nवाचं नित्यं तद्गुणोक्तौ प्राणं तत्कर्मणि स्फुटम् ।\nतदन्यकर्मसन्त्यागे चापानं व्यानमस्य च ॥\nविरोधिनां निरासित्वेऽथोदानं योगधारणे ।\nमनोवागादीन्द्रियाणां समानं नियमेऽत्र तु ॥\nअन्नमुक्तेषु सुस्थैर्ये नरः कुर्यात् सदैव हि ।\nअनेकगोचरेच्छा स्यात् काम एकाश्रये स्थितः ॥\nप्राणः प्रवृत्तिहेतुः स्यादपानस्तु निवर्तने ।\nबलकर्मा तथा व्यान उदानो योगकर्मकृत् ॥\nदेहेन्द्रियमनोनेता समानो नः स्थितिप्रदः ।\nमनोवाक्प्राणसान्निध्यप्राधान्याज्जीव उन्नतिः ॥\nमनोवाक्प्राणरूपोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nमनोवाक्प्राणतस्तस्य जाता अन्येऽभिमानिनः ॥\nब्रह्मा सरस्वती वायुर्मनआद्यभिमानिनः ।\nसर्वस्यान्तः स्थितं विष्णुमायत्ता वाग्घि नः सदा ॥\nसर्ववाचश्च घोषाश्च विष्णोर्नामेति कीर्तिताः ।\nतज्ज्ञानां तत्फलं च स्यादज्ञानां तत्फलं न तु ॥\nसर्वेन्द्रियगतं ज्ञानं मनआयत्तमीरितम् ।\nपृष्टे स्पृष्टोऽप्यनेनाहं स्पृष्ट इत्येव वेत्त्यतः ॥\nमनस्यव्याकुलेऽन्यत्र नैव वेत्ति कथञ्चन ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रजापतिब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ततोऽहं नामाऽभवत् तस्मादप्येतर्ह्यामंत्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात् पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥११॥" | | "lines": [ |
| | "इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवासीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः ।" |
| | ] |
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| "text": "देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवाः मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतस्य जगतो ह्यग्र आसीन्नारायणः परः ।", |
| | "एक एव श्रिया सार्धं तमात्मा पुरुषेत्यपि ॥", |
| | "आहुस्तस्मात् पुरुषविधो ब्रह्मा समभवद्विभोः ।", |
| | "ब्रह्मादेश्च श्रियश्चैव नित्यं विष्णुर्गुणाधिकः ॥", |
| | "यथा तथैव रुद्रादेर्ब्रह्मा यस्माद् गुणाधिकः ।", |
| | "एतस्मात् पुरुषविधता ब्रह्मणः सम्प्रकीर्तिता ॥", |
| | "स तु सर्वा दिशो दृष्ट्वा नान्यद् दृष्ट्वा पितामहः ।", |
| | "अब्रवीदहमस्मीति स्वाहेयत्वमनुस्मरन् ॥", |
| | "हातुं शक्यमिदं सर्वमासीदेकोऽभवं यतः ।", |
| | "ओयत्वं स्वरूपस्य स एवं समचिन्तयत् ॥", |
| | "ततोऽभवदहंनामा स चाभूत् पुरुषाभिधः ।", |
| | "ओषणात् सर्वपापानां पूर्वं पुरुष उच्यते ॥", |
| | "नारायणप्रसादेन य एवं पुरुषाभिधम् ।", |
| | "वेद स्वाभिमतं यस्तु पूर्वं प्राप्तुमभीप्सति ॥", |
| | "ओषेत् स्वयमनुष्टः सन् ब्रह्मविष्णुप्रसादतः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी बिभेति सहायमीक्षाञ्चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभैष्यत् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्धि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १४ ॥"
| | "lines": [ |
| | "तस्य त्वेकस्य सहसा यतो भीः समजायत ।", |
| | "तस्मादद्यापि चैकस्य निर्विवेकं भयं भवेत् ॥", |
| | "विममर्श ततो ब्रह्मा यस्मान्मद्बाधको न हि ।", |
| | "मया सृज्या यतः सर्वे इतः पश्चात्तनो हरः ॥", |
| | "अतः कस्माद्बिभेमीति तस्य भीतिरपोहिता ।", |
| | "विष्णोरतिप्रियत्वात्तु तदन्येषां पितृत्वतः ॥", |
| | "कस्माद्भयं भवेत् तस्य समानाद्धि भयं भवेत् ।", |
| | "विरोधिनोऽधिकाद्वापि हीनाद्वा पारवश्यतः ॥", |
| | "हीनमेव यतस्तस्य सर्वमेव जगद्वशे ।", |
| | "न च जातं तदा सर्वं हरिरेव यतः परः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयत् ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत् ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १६ ॥"
| | "lines": [ |
| | "न रेमे स ततो ब्रह्मा तस्मादेकस्य नो रतिः ।", |
| | "अथापि पत्नीमैच्छच्च स स्थूलत्वमुपागतः ॥", |
| | "दम्पती सहितौ यावद्ब्रह्मा चैव सरस्वती ।", |
| | "तावद्देहोऽभवद्ब्रह्मा तदा देहं द्विधाऽकरोत् ॥", |
| | "पातनात् पतिपत्नीत्वशब्द एनोरजायत ।", |
| | "तस्मात् तयोरेकसुखं भवत्येवार्धपात्रवत् ॥", |
| | "ततस्तस्यामुमेशादीन् देवान् सर्वान् मनूनपि ।", |
| | "जनयामास बोधस्य प्राधान्यं हि मनुष्यता ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "लोकवेदसुरज्ञातपित्रादेश्चाभिमानिनः ।" | | "lines": [ |
| | "सोहेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्तां समेवाभवत् । ततो गावो अजायन्त बडवेतराऽभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्तां समेवाभवत् तत एकशफमजायताऽजेतराभवद् वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्तां समेवाभवत् ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "सोऽवेदहं वाच सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १८ ॥"
| | "lines": [ |
| | "सर्वज्ञाऽपि तु सा देवी विरिञ्चे भक्तिमत्यपि ।", |
| | "तद्भार्यतामात्मनश्च नितरां धर्ममीक्षती ॥", |
| | "अनाद्यनन्तसम्बन्धमुभयोरपि जानती ।", |
| | "स्त्रीस्वभावं दर्शयन्ती साऽधर्ममिव चैक्षत ॥", |
| | "नानासृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं सा गोत्वादिकमाव्रजत् ।", |
| | "वृषादिरूपतां सोऽपि प्राप्य सृष्ट्वेदमञ्जसा ॥", |
| | "सर्जनात् सृष्टिनामाऽभूत् तद्वित्तत्पुत्रतां व्रजेत् ।", |
| | "पिपीलिकान्तरुद्रादौ यथायोग्यत्वमात्मनः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समास्सर्वेऽनन्तास्स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्ते अनन्तं स लोकं जयति ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथेत्यभ्यमन्थत् स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत । तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्युपृथिव्यग्निसूर्यापां सोमस्याप्यभिमानिनः ॥\nस इन्द्रः परमैश्वर्यादशत्रुः समवर्जनात् ।\nवायुरेते समा व्याप्तौ ब्रह्मेरौ गुणतोऽधिकौ ॥\nअनन्ताश्च गुणा ह्येषामन्यजीवव्यपेक्षया ।\nतेभ्योऽप्यनन्ता विष्णोस्तु तेषामेवमुपासकः ॥\nनित्यलोकोपभोगी स्यादनित्यस्यान्यथा भवेत् ।" | | "lines": [ |
| | "अथान्नादमथाप्यन्नं स्रक्ष्यामीति विचिन्तयन् ।", |
| | "ओष्ठद्वयं ममन्थान्तर्हस्तौ चैव परस्परम् ॥", |
| | "तन्मुखाच्चैव हस्ताभ्यामन्तरग्निरजायत ।", |
| | "एवं सर्वस्य हेतुत्वात् सर्वस्यापि पतित्वतः ॥", |
| | "सर्वे देवा एष एवेत्याहुर्वेदविदो जनाः ।", |
| | "स्वतन्त्रेषु यतः शब्दा वर्तेयुः सर्व एव च ॥", |
| | "स रेतसः पुनः सोममसृजद्ब्रह्मविद्धरः ।", |
| | "सर्वाधिकोऽपि योग्यत्वान्मर्त्यधर्मतया पुरा ॥", |
| | "अवमो योग्यताहीनानप्यायुर्मात्रतोऽधिकान् ।", |
| | "यतोऽस्रागतिसृष्टिस्तं देवं यो वेद पूरुषः ॥", |
| | "विष्णोः प्रसादतः सृष्टिं देवलोके स जायते ।", |
| | "आत्मयोग्यानुसारेण सुखज्ञानादियुक्तता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला ध्रुवैवास्य षोडशी कला ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "अव्याकृतब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "स रात्रिभिरेवाच पूर्यते अप च क्षीयते । सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते । तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामाऽयमिदं रूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामायमिदं रूप इति स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात् विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये तं न पश्यन्त्यकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणनामा भवति वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्माऽनेन ह्येतत्सर्वं वेद यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "वायुः प्रजापतिः सोऽसौ चन्द्रसंस्थो विशेषतः ॥\nरात्रौ रात्रौ क्षयादस्य पूरणाद् रात्रिनामकाः ।\nकलाः पञ्चदश प्रोक्ता ध्रुवैवास्य तु षोडशी ॥\nअकलोऽपि स चन्द्रस्य कलाभिः प्रोच्यते तथा ।\nसोऽमावास्यां यतो रात्रौ प्राणभृत्सु व्यवस्थितः ॥\nकल्यावेशादल्पदोषः कृकलासवधोऽपि सन् ।\nतस्यां रात्रौ महान् दोषो देवतावेशतो भवेत् ॥\nवायुः संवत्सरः प्रोक्तो वत्सो विष्णोरसौ यतः ।\nसम्यगेव रतिं याति ." | | "lines": [ |
| | "विश्वम्भरो वायुः । अकृत्स्नो हि स इत्यस्याभिप्रायः स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदेत्यादि । प्राण इत्यादिनामानि परमेश्वरस्य न सर्वगुणसम्पूर्णतां वदन्ति । किन्तु प्राणनादिकर्मकर्तृत्वमेव वदन्ति । आत्मशब्द एव सर्वगुणपरिपूर्णत्वं वदति । अस्य सर्वस्य गुणजातस्यायमात्मैव पदनीय आश्रयो यस्मादतस्तं सर्वगुणवाचकेनात्मशब्देनैवोपासीत । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद यस्मात् सर्वज्ञानप्रदस्तस्मात् सर्वगुणसम्पूर्णः इत्येवोपासनं तस्य युक्तम् । तदुपासनादेव सर्वज्ञत्वादयो भवन्ति किमु तस्येति । पद्यते अनेनेति पदं साधनम् । यथा तत्तत्साधनेन तत्तत्फलं प्राप्नुयादेवं सर्वगुणयुक्तत्वेन भगवदुपासनात् कीर्तिं श्लोकं च विन्दते । शं लोकः श्लोकः परमानन्दं परमं ज्ञानं चेत्यर्थः ।" |
| | ] |
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| "text": "यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित् पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नाभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनाऽगादित्येवाहुः ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "लुक् प्रकाश इति धातोः ।" |
| | ] |
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| "text": "....................... स एवं विदुषि स्थितः ॥\nअध्रुवास्तु कला यद्वत् सौम्यस्तस्य तथा धनम् ।\nआगमापायवत्त्वात् तु ध्रुवावद्देह उच्यते ॥\nनाभिस्थानं शरीरं तु चक्रस्य प्रधिवद्धनम् ।\nसर्वस्वविजयेऽप्यस्मात् प्रधिमात्रं हि गच्छति ॥\nएवं महागुणान् देवानेवं यो वेद पूरुषः ।\nन चैभ्योऽतिप्रियः कश्चिद्विष्णोरस्ति कदाचन ॥\nचतुर्थं भोज्यमेवान्नं सर्वसाधारणं स्मृतम् ।\nआत्मनोऽतिसमीपत्वं तस्य योऽन्नस्य मन्यते ॥\nअक्षयं पापमस्य स्याद्देवब्रह्मस्वहारिणः ।\nतदेवमन्त्रयुक्तत्वाद् बलिहोमात्मना द्वयम् ॥\nदेवानां प्रददौ विष्णुस्तस्मान्नैवेच्छया यजेत् ।\nयदीच्छया यजेत् तेषामपहर्ता भविष्यति ॥\nदेवस्वं तेन येनैव काम्यार्थं विनियोजितम् ।\nपरकीयेन वित्तेन तस्मिन् विनिमये यथा ॥\nचतुष्पाद्भ्यो द्विपद्भ्यश्च पशुभ्यः पयआत्मकम् ।\nप्रायच्छत् सप्तमान्नं स गोक्षीरं मुख्यमत्र च ॥\nआत्मने चैव देवानां तद्धोमार्थं प्रकल्पितम् ।\nसंवत्सरं गोपयसा येन होमो हरेः कृतः ॥\nभगवत्तत्त्वविदुषा तस्य मुक्तिर्न संशयः ।\nअदृष्टभगवद्रूपस्यैतद्दर्शनकारणम् ॥\nभगवद्दृष्टिपूतस्तु विना होमेन मुच्यते ।\nसप्तान्नसृष्टितत्त्वज्ञस्त्वेकहोमेन मुच्यते ॥\nविशेषज्ञो यतः सोऽयं भगवत्तत्त्ववेदने ।\nको नाम भगवान् विष्णुः परमानन्दरूपतः ॥\nप्राणिनां कर्मभिश्चैव स्वेच्छया च पुनः पुनः ।\nसप्तान्नं सृजते यस्मादन्नानामक्षयस्ततः ॥\nतस्मादक्षितिनामासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nय एवमक्षितिं वेद भगवन्तं सनातनम् ॥\nअप्रयत्नेन भोगाः स्युर्यथेष्टास्तस्य सर्वदा ।\nसप्तान्नोपासनं यस्माद्देवानां योग्यमुत्तमम् ॥\nतस्माद्देवत्वमाप्नोति योग्यो देवपदस्य यः ।\nऊर्जं देवान्नमुद्दिष्टं ऊर्जितास्तु गुणास्तथा ॥\nतदप्याप्नोति न नरा योग्या एतदुपासते ।\nज्ञानमात्रेण देवानां सामीप्यं प्राप्नुवन्ति ते ॥\nइति नारायणीये ॥" | | "lines": [ |
| | "आसीदेको हरिः पूर्वं देवी नारायणी तथा ।", |
| | "अन्यदव्यक्ततां यातं तद्व्यक्तमकरोद्धरिः ॥", |
| | "सृष्ट्वा जगदिदं सर्वं सृष्ट्वा देहांश्च सर्वशः ।", |
| | "आकेशादानखाग्रेभ्यः प्रविष्टः पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "यथा प्राणः शरीरेषु क्षुरो यद्वत् क्षुरस्तुके ।", |
| | "प्रविष्टमपि तं विष्णुं न पश्यन्ति पृथग्जनाः ॥", |
| | "प्रविष्ट इति जानंश्च नैनं जानाति सर्वशः ।", |
| | "यस्मात् तद्गुणभागोऽयं प्रवेशः प्राणनादि च ॥", |
| | "तस्मात् प्राणादिनामानि कर्मनामानि तस्य तु ।", |
| | "तस्मात् प्राणादिनाम्ना य उपास्ते हरिमव्ययम् ॥", |
| | "अकृत्स्नोपासकः स स्याद्यस्मात् तद्गुणभागवित् ।", |
| | "पूर्णत्वेऽपि परेशस्य यस्तु तद्गुणभागवित् ॥", |
| | "अकृत्स्नवित् स्यात् कृत्स्नस्य वेत्ताऽऽत्मेतिविदेव यः ।", |
| | "चिदानन्दादयो यस्य गुणा आप्ताः सदैव तु ॥", |
| | "स आत्मेति प्रविज्ञेयो गुणानामाप्तितो हरिः ।", |
| | "प्राणनादीनि कर्माणि चात्मशब्दोदितानि तु ॥", |
| | "तदेतदात्मरूपं हि गुणानामश्रयत्वतः ।", |
| | "पदनीयमिति प्रोक्तं यतस्तज्ज्ञोऽपि सर्ववित् ॥", |
| | "सार्वज्ञ्यादिगुणास्तस्य किमुतात्मेश्वरस्य तु ।", |
| | "एवं सर्वगुणैर्युक्तं सर्वजीवेश्वरं हरिम् ॥", |
| | "यो वेद तत्तत्साध्यं तु यथा तैस्तैस्तु साधनैः ।", |
| | "प्राप्नुयादेवमेवासौ कीर्तिं च परमं सुखम् ॥", |
| | "ज्ञानं च परमं विन्देन्मुक्तः सन्नात्र संशयः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेतत् प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुतं भवति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स एष विष्णुर्भगवान् पुत्राद्वित्तात् तथाऽऽत्मनः ।", |
| | "अन्यस्मादपि सर्वस्मात् प्रेष्ठ एव स्वभावतः ॥", |
| | "आत्मनोऽपि प्रियत्वं तु तेनैव कृतमञ्जसा ।", |
| | "आत्मनो निरयायैव कुर्यात् कर्माणि नित्यशः ॥", |
| | "यतोऽतः स्वात्मनश्चापि स्वाप्रियत्वमुदाहृतम् ।", |
| | "स चेदप्रियकृद्विष्णुर्नात्माऽपि प्रियतां व्रजेत् ॥", |
| | "अस्मिन् प्रिये प्रियं सर्वं तस्मादेकः प्रियो हरिः ।", |
| | "स चात्मशब्देनोद्दिष्टो यस्मादाप्तगुणः प्रभुः ॥", |
| | "अतो विष्णोः प्रियं ब्रूयाद्यः स्वात्माद्यं दुरात्मवान् ।", |
| | "प्रियरोधं करोषीति तं ब्रूयाद्वैष्णवो महान् ॥", |
| | "एवं वदन् वैष्णवस्तु समर्थः प्रियरोधने ।", |
| | "तस्य स्याच्च विशेषेण तदुक्त्यैवापि दुःखिनः ॥", |
| | "तस्मात् सर्वप्रियो विष्णुरित्युपास्ते सदा प्रियः ।", |
| | "नास्य प्रियमनित्यं स्यादस्य प्रीतिः सदा भवेत् ॥", |
| | "तस्मात् सर्वप्रियं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।", |
| | "नित्यप्रियकरो विष्णुर्भवेत् तस्याप्यजः स्वयम् ॥इत्यध्यात्मे ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| "text": "अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माऽहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता ये वै के च यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता एतावद्वा इदं सर्वमेतस्मात् सर्वं सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः । तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात् प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात् पुत्रो मुञ्चति तस्मात् पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिंल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणाः अमृता आविशन्ति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदाहुर्- यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद् यस्मात् तत्सर्वमभवदिति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "ब्रह्मेति वेदः । स्वाध्यायादिकर्तृत्वात् पुत्रस्त्वं ब्रह्मेत्याद्युच्यते । आत्मा भवति व्यापको भवति ।" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्त आत्मयोग्यतापूर्तिमाप्नुवन्तो महान्तो यदाहुः ब्रह्मविद्यया स्वयोग्यं सर्वं प्राप्यत इति । नित्यनिर्दुःखानन्दानुभवरूपो हि स्वत उत्तमो जीवः । तादृशं रूपमज्ञानात् तिरोहितं ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते एव । न चान्यथाऽभिव्यज्यत इति सन्तो यदाहुः । तत्तत्र केचिन्मनुष्या इति मन्यन्ते । स्वरूपमपि ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते चेत् तद् ब्रह्मापि यस्मात् सर्वमभवत् परिपूर्णमभवत् तस्मात् स्वरूपं ज्ञात्वैवाभवत् किमिति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात् तत्सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत् पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषं समभवत्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| },
| | "सत्यम् । तदपि स्वरूपं नित्यापरोक्षज्ञानेन सर्वदा जानात्येव । अत एव सर्वदा परिपूर्णमिति तेषां परिहारः । तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत्सर्वमभवदिति । आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यादिवत् सदातनज्ञानं पूर्णभावं चाह ।" |
| {
| | ] |
| "id": "Bruhadaranyaka-130",
| |
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| |
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| |
| "text": "अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स य एवंवित् सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २७ ॥"
| |
| }, | | }, |
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| "text": "पृथिव्यादिस्थिता देवाः सरस्वत्यादिकास्त्रयः ॥\nअधिकावेशतो देवेष्वतो देवा इति स्मृताः ।\nयदावेशात् सर्वमुक्तं सत्यं देवी तु वाघ्धि सा ॥\nयदावेशान्न दुःखी स्यादानन्दी दैवतं मनः ।\nयदावेशात् सर्वकार्येष्वम्लानः प्राण एव सः ॥\nसर्वसामर्थ्ययुक्तः स्यान्न म्रियेत कदाचन ।\nएवं सप्तान्नविन्मुक्तस्त्रिभिराविष्ट एव तु ॥\nसर्वेषु व्याप्तिमन्वेति न दुःखी प्राणिषु स्थितेः ।\nसप्तान्नोपासनायोग्या देवा एकान्ततो हि यत् ॥\nदेवांश्च पापं नाप्नोति तस्मात् पापं न तस्य तु ।\nदेवा मनुष्यतामंशैराप्ता ये पुत्रतः फलम् ॥\nस्यात् तेषामेव चामुक्तेर्मुक्तानां न तु किञ्चन ।\nमुक्तानां देववागादेरावेशः सम्प्रकीर्तितः ॥\nप्राणज्ञानं यथाऽवन्ति रहस्यमिति सर्वदा ।\nएवं मुक्तस्वरूपं चाप्यवन्त्येव रहस्यतः ॥" | | "lines": [ |
| | "इदमग्रे अस्याग्र इति षष्ठ्यर्थे द्वितीया । अहं अहेयं, ब्रह्म परिपूर्णम् । अस्मि सर्वदाऽस्तीति मेयमित्येतैर्विशेषणैरात्मानं स्वरूपमेवावेत् । यद्यहंशब्दोऽस्मच्छब्दार्थवाची अस्मिशब्दश्चोत्तमपुरुषे तदाऽऽत्मानमिति व्यर्थं स्यात् । अतोऽहमस्मिशब्दावुक्तार्थावेव । अग्रे अनादिकालत एव विद्यमानमात्मानं जानाति च तद्ब्रह्मेत्यर्थः । सर्वनियन्तृत्वेन सर्वगतत्वादहेयम् । तद्योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहं योऽसावसौ पुरुषः सोहमस्मि इत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽन्तर्यामित्वेनाहेयत्ववाची । तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसीति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासात् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथातो व्रतमीमांसा । प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे । तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त ।\nवदिष्याम्येवाहमिति वाग् ।\nदध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः।\nश्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् ।\nएवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत् तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्धत्तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिरेऽयं वै नः श्रेष्ठो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवं स्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद । य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २८ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्योऽहं सोऽसौ अहं ब्रह्मास्मि इत्यादिवाक्यानां सम्यगर्थापरिज्ञानात् भ्रान्तिप्राप्तोऽभेदोऽतत्त्वमसीति नवकृत्वो निराक्रियते । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यात् कथमसतः सज्जायेत इत्यादिना असद्वा इदमग्र आसीदसतः सदजायत इत्यादिश्रुत्यर्थापरिज्ञानोत्थभ्रमो यथा निवार्यते । एवमतत्त्वमसीतिवाक्येनापि । स आत्मेतिशब्दाच्च । आत्मशब्दस्य परमात्मनि मुख्यत्वेऽपि जीवे भ्रान्तिरुपपद्यते । तन्निवृत्यर्थं चातत्त्वमसीत्याह ।" |
| | ] |
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| "text": "अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति ।\nचन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतं स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुर्म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुस्सैषा नास्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।", |
| | "यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैष श्लोको भवति ॥\nयतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति । प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ।\nतं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति । यद्वा एतेऽमुं ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति ।\nतस्मादेकमेव व्रतं चरेत् प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति ।\nयद्युच्चरेत् समापिपयिषेत् तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ॥ ३० ॥" | | "lines": [ |
| | "इत्यादिना आप्त्यादिकमैतदात्म्यमिदं सर्वमित्यनेनोच्यते । पूर्णत्ववाच्यात्मशब्द आत्मा पूर्णत्वतो हरिः इत्यादिना स आत्मेति पूर्णत्वमभिधीयते । यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन इति सदृशविज्ञानेन सदृशान्तरं विज्ञातं भवतीत्युक्तम् । लोहमणिनेति मणिशब्दात् प्रधानविज्ञानेनाप्रधानं सर्वं विज्ञातं भवतीति । मणिर्मुखं प्रधानञ्चेत्युत्तमस्य वचो भवेत् इति वचनात् । यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात् इति पुनरपि सदृशेन विज्ञातेन सदृशान्तरं विज्ञातं भवतीत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः ।", |
| | "उपादानविवक्षायामेकत्वविवक्षायां चैकेनेति विशेषणं, पिण्डेनेति एकेन मणिनेति पुनरेकेनेति च विशेषणानि व्यर्थानि भवेयुः । तस्मिन् पक्षे मृदा विज्ञातया लोहेन विज्ञातेन कार्ष्णायसेन च विज्ञातेन सर्वं विज्ञातं भवतीति वक्तव्यम् । न ह्येकमृत्पिण्डविकारभूतं सर्वं मृण्मयम् । न च तेनैक्यं सर्वस्य विद्यते । न चैकलोहमणिकार्यं सर्वलोहमयम् । न च तेनैकीभूतम् ।", |
| | "न चैकनखनिकृन्तनकार्यं सर्वं कार्ष्णायसम् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्यादि प्रधानपरिज्ञाने गुणभूतं परिज्ञातमिव भवतीत्यत्र दृष्टान्तान्तरम् । वाचा नाम्ना आरम्भणं विकारः विविधत्वेन कर्तुं योग्यमिति विकारः । सत्यं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्येव । सङ्केतरूपेण नानाविधानि नामानि कर्तुं शक्यते । तथापि शास्त्रप्रयोगसिद्धमृत्तिकादिनामपरिज्ञानात् तत्तन्नामविद् भवति ।", |
| | "एवं नित्यासाम्यातिशयसर्वगुणपरिपूर्णपरमेश्वरपरिज्ञानात् सर्वविद्भवतीति । यथैकस्मिन् जनपदे प्रधानपुरुषेषु परिज्ञातेष्वाहूतेष्वागतेषु विनाशितेषु रक्षितेषु वा सर्वो जनपदः परिज्ञात आहूत आगतो विनाशितो रक्षित इत्युच्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "उत्तमः सर्वदेवेषु प्राण एव हरेरनु ।\nचतुर्मुखस्य प्राणस्य न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥\nतस्माद् विष्णोर्व्रतस्यानु नित्यं प्राणव्रतं चरेत् ।\nहंसोपास्तिः श्वासरूपे तयोर्व्रतमुदीरितम् ॥\nहंसरूपी हि तौ देवौ श्वसोच्छ्वासप्रवर्तकौ ।\nतस्मात् प्राण्यादपान्याच्च सद्रूपं संस्मरन् सदा ॥\nनान्यस्योपासनं कुर्यात् तद्भृत्यत्वं विना क्वचित् ।\nइन्द्रियाणि ससर्जादौ वासुदेवः प्रजापतिः ॥\nअध्यात्ममिन्द्रियाण्याहुरधिदैवं तु देवताः ।\nअध्यात्ममग्निर्वाङ्ग्नामा चक्षुरादित्य उच्यते ॥\nश्रोत्रं तु चन्द्रमा नाम मनः स्थूलं तु वासवः ।\nयेन यज्ञादिकं कुर्याच्छेषरुद्रविपास्तथा ॥\nमनः सूक्ष्मं ज्ञानयोग्यं शेषो व्याख्यानगोचरम् ।\nरुद्रस्तु मननाख्यं च गरुडो ध्यानगोचरम् ॥\nवायुः प्राण इति प्रोक्तो येन सर्वं नियम्यते ।\nत एते भगवत्सृष्टा व्यूदिरेऽध्यात्मसंस्थिताः ॥\nअधिदैवे ज्वलत्कर्मा वह्निः सूर्यस्तु तापकः ।\nसोमः कान्तौ वृष्टिकर्मा वासवः शेष एव तु ॥\nपञ्चरात्रप्रवृत्तीशो रुद्रस्तत्स्थक्रियापरः ।\nसर्वप्रवर्तको वायुर्ज्ञानमोक्षप्रदस्तथा ॥\nवेदप्रवृत्तिकृद्धीन्द्रस्तेऽधिदैवे च पस्पृधुः ।\nअहं श्रेयानहं श्रेयानिति तानब्रवीद्धरिः ॥\nस्वकर्म यस्त्वविश्रान्तं कुर्याच्छ्रेयान् स वः स्मृतः ।\nइति श्रुत्वा ततश्चक्रुः कर्म स्वं स्वमनारतम् ॥॥\nतानेताञ्छ्रमरूपेण प्राप ब्रह्मा प्रजापतिः ।\nश्रान्ताः स्वं भगवत्कर्म न शेकुः सर्वदेवताः ॥\nवायुं तु समशक्तित्वान्नाप ब्रह्मा प्रजापतिः ।\nतेनासौ भगवत्कर्म सर्वं च कृतवान् सदा ॥\nश्रमात् पापात्मको मृत्युर्भगवत्कर्मवर्जनात् ।\nअन्यान् देवानवापाशु नैव वायुं कदाचन ॥॥\nते वायुं ज्ञानमैच्छन्त श्रेष्ठोऽयमिति निश्चिताः ।\nतं ज्ञात्वा तेन चाविष्टास्तद्भृत्यत्वमुपागताः ॥\nतस्मात् प्राणाश्च मरुत इत्येषां नाम संस्थितम् ।\nवायोर्देवा हि जायन्ते लयमेष्यन्ति तत्र च ॥\nतस्मान्नित्यं तद्व्रताश्च तद्व्रतोऽतो भवेत् सदा ।\nअन्यदेवव्रतारम्भं यदि कुर्यात् समापयेत् ॥\nतेनासौ वायुना साकं भगवन्तमुपेष्यति ॥ इति नारायणश्रुतौ ।" | | "lines": [ |
| | "यथा वा राजसु नाशितेषु ।\t नाशिता पृथिवी सर्वा धार्तराष्ट्रेण दुर्नयैः इति ।" |
| | ] |
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| "text": "त्रयब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "यथा च केषाञ्चित् पुरुषाणां रक्षणेन । शशास पृथिवीं सर्वां सशैलवनकाननाम् इति ।" |
| | ] |
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| "text": "त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं सर्वोत्तमस्य परमेश्वरस्य विज्ञानात् सर्वं विज्ञातमिव भवति । न च मृन्मात्रविज्ञानाद् घटशरावादिसंस्था विज्ञाता भवन्ति मुख्यतः । तथा सति दृष्टमृदः पुरुषस्य घटशरावादिजिज्ञासा न स्यात् ।सृष्टिकथनं च प्राधान्यार्थम् । त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यमित्यपि प्राधान्यार्थमेवाभिमानिदेवतापेक्षया ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C01", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामेतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "तेजोऽभिमानवान् ब्रह्मा वायुश्चाबभिमानवान् ।", |
| | "रुद्रः क्षित्यभिमानी चाप्येतन्मयमिदं जगत् ॥", |
| | "अभिमन्यमानसहितास्त्रय एतेऽभिमानिनः ।", |
| | "विष्णोर्जाताः क्रमेणैव पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ॥", |
| | "तेजोऽबन्नाभिधा तस्मादेषामेव प्रकीर्तिता ।", |
| | "एते च त्रीणि रूपाणीत्यभिधागोचराः सुराः ॥", |
| | "ब्रह्मवायुगिरीशेभ्यस्तेभ्यो जातमिदं जगत् ।", |
| | "अतोऽग्निसूर्यसोमानामपि रूपं तदुद्भवम् ॥", |
| | "अतोऽग्निसूर्यसोमानां नामाप्येषां प्रकीर्तितम् ।", |
| | "सादनाद्यमनाच्चैव सत्यमेषां त्रयः सुराः ॥", |
| | "तेषां सत्यं हरिः साक्षाद्यतस्तेषां नियामकः ।", |
| | "प्रधाने सत्यशब्दोऽयं श्रुतिभिः समुदाहृतः ॥", |
| | "यथैव सर्वलोहानां प्रधानं काञ्चनं स्मृतम् ।", |
| | "यथा मृत्पिण्डसदृशा मृण्मयाः सर्व एव च ॥", |
| | "यथा कार्ष्णायसं सर्वं समं कार्ष्णायसान्तरे ।", |
| | "एवं सर्वस्य जगतः सदृशः श्रेष्ठ एव च ॥", |
| | "हरिस्तेन तु तज्ज्ञानाज्जगज्ज्ञातमिवाखिलम् ।", |
| | "स स्रष्टा चैव संहर्ता नियन्ता रक्षिता हरिः ॥", |
| | "तेन व्याप्तमिदं सर्वमैतदात्म्यमतो विदुः ।", |
| | "स आत्मा पूर्णगुणतः स सूक्ष्मः सर्वगः सदा ॥", |
| | "सर्वोत्तमत्वात् सत्यं तज्जीवाभिन्नं तदासुराः ।", |
| | "विदुर्न त्वं तथा विद्धि श्वेतकेतो कदाचन ॥", |
| | "किन्तु विष्णुः पृथक् सर्वदेवदेवेश्वरः प्रभुः ।", |
| | "पृथगेवाहमत्यल्पशक्तिज्ञानसुखादिकः ॥", |
| | "इत्येव विद्धि सततमतो मोक्षमवाप्स्यसि ।", |
| | "सवोत्तम इति ज्ञातो विष्णुर्मोक्षमिमं नयेत् ॥", |
| | "जीवरूपतया ज्ञातस्तमोऽन्धं प्रापयेत् प्रभुः ।", |
| | "विष्णोर्दासतया विष्णोः सामीप्यं मोक्ष उच्यते ॥", |
| | "न विष्णुत्वं तु मोक्षः स्यादेषोऽहमिति वा स्मृतेः ।", |
| | "संसारसागरात् तीर्णो मुक्तोऽहमिति वा स्मृतिः ॥", |
| | "यदा तदा विमोक्षेण किं फलं ज्ञानिनो भवेत् ।", |
| | "यथा मधुकरैर्नानाविधपुष्परसैः सह ॥", |
| | "मधुत्वं प्रापितः संविदभावान्न सुखी भवेत् ।", |
| | "यथा नद्यो न मुक्ता हि समुद्रं प्रापिता अपि ॥", |
| | "इयमस्मीति चाज्ञानाद्यथा सुप्तो न मुच्यते ।", |
| | "प्रलयेऽपि हरिं प्राप्तः पृथक्त्वज्ञानवर्जनात् ॥", |
| | "एवं जीवोशयोर्भेदज्ञानाद् विष्णोः सदोच्चताम् ।", |
| | "ज्ञात्वैव मुच्यते तस्मादेवं जानीहि पुत्रक ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्माऽऽत्मैकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् इति च मोक्षधर्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "सहैव माति जानातीति समम् । आत्मा प्राणः । नामरूपयोरपि प्राणाधीनत्वादेकमित्युच्यते ।\nप्राणो वायुरिति प्रोक्तस्तत्पत्नी नाम भारती ।\nरूपं तु तत्सुतो रुद्रो वशे प्राणस्य तद्द्वयम् ॥\nअमृतो वायुरुद्दिष्टो नित्यज्ञानात्मकत्वतः ।\nसत्यं यथार्थवक्तृत्वाद्भारती रुद्र एव च ॥ इति ।" | | "lines": [ |
| | "तस्मै स्वलोकं भगवान् सभाजितः सन्दर्शयामास इत्युक्त्वा", |
| | "न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।", |
| | "न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ इति च भागवते ।" |
| | ] |
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| "text": "रुद्रं वेदेषु च प्राणः प्रविष्टश्छादितः सदा ।\nसत्य इत्युच्यते नित्यं स्वरूपेणामृतः स्मृतः ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "अदर्शयत् स्वकं लोकं ब्रह्मणे विष्णुरव्ययः ।", |
| | "यस्मात् पदात् परं नास्ति यत्र मुक्ता उपासते ॥ इति हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
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| "text": "अजातशत्रुब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अतः परं न यत्पदमित्यत्रापि यच्छब्दस्य यस्मादित्यर्थः । यत्तदित्यादयः शब्दाः पञ्चम्यर्थाश्च कीर्तिताः इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स्वह्रदिस्थभगवद्रूपोपासनाया एव मोक्षजनकत्वसमर्थनम्" | | "lines": [ |
| | "विद्यात्मनि भिदाबोधः" |
| | ] |
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| "text": "दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाच । अजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "क्ष्माम्भोनलानिलवियन्मन इन्द्रियार्थं भूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।", |
| | "अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टा ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।", |
| | "तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः ॥" |
| | ] |
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| "text": "अतीत्य जगद् धर्मवर्जितत्वेन स्थितत्वादतिष्ठाः । उत्तमत्वात् मूर्धा ।" | | "lines": [ |
| | "भेददृष्ट्याभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा इत्यादि च ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा बृहत्पाण्डुरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्तेऽहरहः सुतः प्रसूतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "आधिपत्यमृते चैव आनन्देनापि कर्मणा ।", |
| | "सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या भोगेन विषयेण च ॥", |
| | "नानात्वेनापि सम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।", |
| | "प्रकृतौ कारणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥", |
| | "प्रदर्शयित्वा ह्यात्मानं प्रकृतिस्तेषु सर्वशः ।", |
| | "पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥", |
| | "प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ।", |
| | "संयोगः प्रकृतेर्नैव मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥", |
| | "समा दुःखनिवृत्तिस्तु मुक्तानामपि सर्वशः ।", |
| | "मानुषादिविरिञ्चान्तं सुखं मुक्तौ शतोत्तरम् ॥ इत्यादि वायुप्रोक्ते ।", |
| | "ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।", |
| | "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥", |
| | "कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।", |
| | "याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥", |
| | "ब्रह्मस्तेना निरानन्दाः अपक्वमनसोऽशिवाः ।", |
| | "वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥", |
| | "तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ।", |
| | "अन्य ईशस्तथाऽन्योऽहमिति ज्ञानं विपश्चिताम् ॥॥", |
| | "आधिक्यज्ञानमीशस्य यतोऽन्यत्वेन युज्यते ।", |
| | "यतः स्वरूपश्चान्यो जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।", |
| | "कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः स्यादसंहितः ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥"
| | "lines": [ |
| | "बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु ।", |
| | "को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥", |
| | "वैशम्पायन उवाच–॥", |
| | "नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।", |
| | "बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥", |
| | "तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ इति च मोक्षधर्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ आकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात् प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥"
| | "lines": [ |
| | "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।", |
| | "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥", |
| | "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।", |
| | "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥", |
| | "यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।", |
| | "अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।", |
| | "स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥", |
| | "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।", |
| | "एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥"
| | "lines": [ |
| | "ब्रह्मणस्तद्गुणानां च भेददर्श्यधरं तमः ।", |
| | "भेदाभेदप्रदर्शी च मध्यमं तु तमो विशेत् ॥", |
| | "ईषद्भेदप्रदर्शी च तम एवोत्तरं व्रजे ।", |
| | "विजानीयात् ततो ब्रह्म सदा सर्वगुणात्मकम् ॥", |
| | "गुणानां च विशेषोऽस्ति न विभेदः कथञ्चन ।", |
| | "ते च सर्वे गुणाः पूर्णास्तच्छरीरः परः स्मृतः ॥", |
| | "आनन्दज्ञानशक्त्यादिदेहं विष्णुं तु ये जनाः ।", |
| | "ओहं भूतदेहं वा विदुस्ते चाधरं तमः ॥", |
| | "तथा प्रकृतिदेहज्ञाः कर्मदेहविदोऽपि वा ।", |
| | "तस्मादानन्दचिद्देहं चिदानन्दशिरोमुखम् ॥", |
| | "चिदानन्दभुजं ज्ञानसुखैकपदसाङ्गुलिम् ।", |
| | "आकेशादानखाग्रेभ्यः पूर्णचित्सुखशक्तिकम् ॥", |
| | "प्रत्येकं तु गुणांस्तांस्तु सदा सर्वगुणात्मकम् ।", |
| | "ज्ञात्वा विमुच्यते विष्णोः प्रसादान्मानुषोऽपि सन् ॥", |
| | "जीवाभेदं तथाऽभेदं जगता ये विदुः प्रभोः ।", |
| | "तेऽपि यान्ति तमो घोरमधरं ब्रह्मतस्कराः ॥", |
| | "भेदाभेदं विदुर्ये च जीवैस्तु जगताऽपि वा ।", |
| | "परस्य ब्रह्मणो यान्ति तमस्तेऽप्युत्तरं सदा ॥", |
| | "अभेदज्ञाः प्रकृत्याऽपि भेदाभेदविदस्तथा ।", |
| | "तेऽपि यान्ति तमो घोरमधरं चोत्तरं क्रमात् ॥", |
| | "तस्मात् सर्वोत्तमं विष्णुं पूर्णसर्वगुणोच्छ्रितम् ।", |
| | "विजानीयाद्विमुक्त्यर्थं सर्वतश्च विलक्षणम् ॥", |
| | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये देहं परमात्मनः ।", |
| | "भिन्नं विजानते विष्णोर्भिन्नाभिन्नविदोऽपि वा ॥", |
| | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति प्रादुर्भावांस्तु येऽपि वा ।", |
| | "सर्वभूतस्थितान् वाऽपि भिन्नान् जानन्ति येऽखिलान् ॥", |
| | "भिन्नाभिन्नविदो वापि शिरःपाण्यादिकं तथा ।", |
| | "भिन्नं मिथो विजानीयुर्भिन्नाभिन्नविदोऽपि वा ॥", |
| | "तेऽपि यान्ति तमो घोरं यतो नैवोत्थितिः क्वचित् ।", |
| | "प्रादुर्भावतया ये च तदन्यान् जानते विभोः ॥", |
| | "तेऽपि यान्ति तमो घोरं तस्मान्नैवंविदो विदुः ।", |
| | "मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः ॥", |
| | "कृष्णबुद्धौ कल्किदत्तहयशीर्षैतरेयकाः ।", |
| | "पाराशर्यश्च कपिलो वैकुण्ठो वृषभस्तथा ॥", |
| | "यज्ञो धन्वन्तरिश्चैव स्त्रीरूपस्तापसो मनुः ।", |
| | "नारायणो हरिः कृष्णः उपेन्द्रः सर्व एव च ॥", |
| | "एवमाद्याः हरेः साक्षात्प्रादुर्भावाः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "श्रीर्भूर्दुर्गाऽम्भृणी ह्रीश्च महालक्ष्मीश्च दक्षिणा ॥", |
| | "सीता जयन्ती सत्या च रुक्मिणीत्यादिभेदिता ।", |
| | "प्रकृतिस्तेन चाविष्टा तद्वशा न हरिः स्वयम् ॥", |
| | "ततोऽनन्तांशहीना च बलज्ञप्तिसुखादिभिः ।", |
| | "गुणैः सर्वैस्तथाऽप्यस्य प्रसादाद् दोषवर्जिता ॥", |
| | "सर्वदा सुखरूपा च सर्वदा ज्ञानरूपिणी ।", |
| | "प्राणः सूत्रं महान् ब्रह्मा चित्तं वायुर्बलं धृतिः ॥", |
| | "स्थितिर्योगश्च वैराग्यं ज्ञानं प्रज्ञा स्मृतिः सुखम् ।", |
| | "मेधा मुक्तिर्विष्णुभक्तिरादिगोपो महाप्रभुः ॥", |
| | "ऋजुः समानो विज्ञाता महाध्याता महागुरुः ।", |
| | "हनूमान् भीम आनन्द इत्यादिबहुरूपिणः ॥", |
| | "हिरण्यगर्भा येऽतीताः ये भाव्या यश्च वर्तते ।", |
| | "सर्वे विष्णुवशा नित्यं विमुक्तेरप्यनन्तरम् ॥", |
| | "एभ्यः श्रीस्तु विमुक्तेभ्यो गुणैः कोटिगुणोत्तरा ।", |
| | "ज्ञानानन्दबलादिभ्यः सर्वेभ्यः सर्वदैव हि ॥", |
| | "भिन्नाभिन्नाश्च ते सर्वे ब्रह्माणस्तु परस्परम् ।", |
| | "अभिमानः पृथक्तेषामानन्दः सह भुज्यते ॥", |
| | "ते तु भिन्ना हरेर्नित्यं श्रियोऽन्येभ्यस्तथैव च ।", |
| | "आविष्टो विष्णुरेतेषु न विष्णुस्तत्स्वरूपकः ॥", |
| | "विष्णोरतिप्रियत्वात् ते ह्यध्यर्धा इति चोदिताः ।", |
| | "विष्णोः केवलभेदेऽपि शेषादिभ्यः प्रिया यतः ॥", |
| | "विष्णोः प्रियत्वे तद्भक्तौ तज्ज्ञाने च श्रियस्तु ते ।", |
| | "मुक्ता अप्यवरा नित्यं सर्वे कोटिगुणेन च ॥", |
| | "सरस्वती च गायत्री श्रद्धाऽऽद्या प्रीतिरेव च ।", |
| | "सर्ववेदात्मिका बुद्धिरनुभूतिः सुखात्मिका ॥", |
| | "गुरुभक्तिर्हरौ प्रीतिः सर्वमन्त्रात्मिका भुजिः ।", |
| | "शिवकन्येन्द्रसेना च द्रौपदी काशिजा तथा ॥", |
| | "चन्द्रेत्यादिस्वरूपा यास्तेभ्यः शतगुणावराः ।", |
| | "विष्णुभक्तौ च तत्प्रीतौ ज्ञानानन्दादिकेष्वपि ॥", |
| | "मुक्तेः पश्चादपि गुणैः सर्वैर्ब्रह्मभ्य ईरिताः ।", |
| | "शेषः सदाशिवश्चोर्ध्वस्तपोऽहङ्कार एव च ॥", |
| | "नरोऽपटो लक्ष्मणश्च रौहिणेयः शुकस्तथा ।", |
| | "सद्योजातो वामदेवश्चाघोरस्तत्पुमानपि ॥", |
| | "दुर्वासा द्रौणिरौर्वश्च जैगीषव्यादिरूपकाः ।", |
| | "पूर्वोक्तैश्च गुणैः सर्वैस्ताभ्यः शतगुणावराः ॥", |
| | "मुक्तेः पश्चादपि सदा अतीतानागताश्च याः ।", |
| | "अतीतानागता ये च सर्वशोऽप्यवराः सदा ॥", |
| | "एवं सुपर्णाः सर्वेऽपि समाः शेषैः सदैव तु ।", |
| | "सर्वैर्गुणैस्तथा मुक्तौ तद्भार्यास्तच्छतावराः ॥", |
| | "ताभ्यः शतावरास्त्विन्द्राः पुरन्दर इतीरिताः ।", |
| | "तेभ्यः शतावरास्त्वन्ये इन्द्राश्चान्याश्च देवताः ॥", |
| | "द्वित्रिपञ्चादिगुणतः परस्परविशेषिणः ।", |
| | "सनत्कुमारास्तु सदा पुरन्दरसमा मताः ॥", |
| | "सनकाद्या नारदश्च दक्षभृग्वादयोऽपि च ।", |
| | "देवावरा यथा तद्वन्मनवोऽपि प्रकीर्तिताः ॥", |
| | "त्रिचतुर्भागभेदेन तेऽप्यन्योन्यविशेषिणः ।", |
| | "वाली गाधिर्विकुक्षिश्च पार्थ इन्द्रः पुरन्दरः ॥", |
| | "सुदर्शनश्च भरतः प्रद्युम्नः स्कन्द एव च ।", |
| | "सनत्कुमारः कामश्चेत्येक एव व्यवस्थितः ॥", |
| | "स्वायम्भुवो मनुर्दक्षो वायुः स्पर्शाधिपस्तथा ।", |
| | "बृहस्पतिश्चानिरुद्ध एते सूर्यादितोऽधिकाः ॥", |
| | "सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव यमश्चैते त्रयः सुराः ।", |
| | "प्रोक्तेभ्यस्त्ववराश्चान्यदेवेभ्योऽपि सदाऽधिकाः ॥", |
| | "कार्तवीर्यः पृथुश्चैव दौष्यन्तिर्भरतस्तथा ।", |
| | "शशबिन्दुश्च मान्धाता ककुत्स्थाद्यास्तथाऽपरे ॥", |
| | "सर्वे ते विष्णुनाऽऽविष्टाः विष्णोर्भिन्नाः सदैव तु ।", |
| | "शतावराश्च देवेभ्यः कर्मदेवा इति स्मृताः ॥", |
| | "तुम्बुरुप्रमुखा ये च तथोर्वश्यादिका अपि ।", |
| | "सूर्यादिभ्योऽधमाश्चैव मन्वादिभ्यस्तथैव च ।", |
| | "वैवस्वतो मनुर्नित्यं विष्ण्वावेशी ततोऽधिकः ॥", |
| | "कार्तवीर्यादिराजभ्यो देवभृत्याः शतावराः ।", |
| | "आजानदेवास्ते प्रोक्तास्तेभ्यश्च पितरश्चिराः ॥", |
| | "पितॄणां सप्तकं यत्तत्कर्मदेवसमं मतम् ।", |
| | "विश्वामित्रो ब्रह्मपुत्रैः समो मुनिरुदाहृतः ॥", |
| | "आचार्यः पितृणां चासौ पितृभिः सह पठ्यते ।", |
| | "आजानेभ्यस्तु पितरो ह्यष्टभ्योऽन्ये शतावराः ॥", |
| | "कर्मदेवगणा अष्टगन्धर्वास्तत्परे शतम् ।", |
| | "आजानदेवास्तेभ्योऽन्ये पितृभ्यश्च शतावराः ॥", |
| | "स्वमुखेनैव देवैर्ये आज्ञाप्याः सर्वदा गणाः ।", |
| | "आख्याता देवगन्धर्वा ये त्वन्यमुखगोचराः ॥", |
| | "मानुषास्ते तु गन्धर्वास्तेभ्यस्ते च शतावराः ।", |
| | "तेभ्यः शतावराश्चैव मनुष्येषूत्तमा गणाः ॥", |
| | "देवादिष्वेषु सर्वेषु प्रोक्ता अपि विशेषिणः ।", |
| | "पञ्चांशतो दशांशाद्वा स्वस्वजात्यां परस्परम् ॥", |
| | "देवस्त्रियो दशांशोनाः स्वपतिभ्यस्तथाऽपराः ।", |
| | "अष्टांशोनाः प्रविज्ञेया यासां मुक्तौ सह स्थितिः ॥", |
| | "अनादिश्च विशेषोऽयं सर्वेषां मानुषादिनाम् ।", |
| | "इयं नीचोच्चता क्वापि न केनापि ह्यपोदितुम् ॥", |
| | "शक्यते योऽन्यथाकर्तुमिच्छेत् सोऽपि तमो व्रजेत् ।", |
| | "योऽपि वेद समत्वेन सर्वान्नीचोच्चतः स्थितान् ॥", |
| | "सोऽपि याति तमो घोरं यश्च साम्यमुदीरयेत् ।", |
| | "मानुषोत्तममारभ्य ब्रह्मान्तानां प्रयत्नतः ॥", |
| | "विष्णोर्भक्तिज्ञानपूर्वं भवेन्मुक्तिः प्रसादतः ।", |
| | "भक्तिज्ञानादयः सर्वे सर्वेषामप्यनादयः ॥", |
| | "अनादिकालादारभ्य वृद्धानामुत्तरोत्तरम् ।", |
| | "तत्तद्योग्यतया पूर्तौ विष्णोर्दृष्टिः प्रजायते ॥", |
| | "यथोदञ्चनकुम्भादेः सरित्सागरयोरपि ।", |
| | "अल्पेन महता वाऽपि पूर्तिर्योग्यतया भवेत् ॥", |
| | "एवं नरादिब्रह्मान्तजीवानां साधनैरपि ।", |
| | "अनादिसिद्धैर्भक्त्याद्यैः पूर्तिर्योग्यतया भवेत् ॥", |
| | "अल्पैः पूर्तिस्तथाल्पानां महद्भिर्महतामपि ।", |
| | "भक्त्याद्यैर्जायते तेषां साधनैर्नान्यथा क्वचित् ॥", |
| | "श्रवणं मननं चैव ध्यानं भक्तिस्तथा दृशिः ।", |
| | "ज्ञानञ्चोक्तविशेषाणां सर्वेषां साधनं भवेत् ॥", |
| | "त्यक्त्वैतानि न कस्यापि भवेन्मोक्षः कदाचन ।", |
| | "सर्वोत्तमतया ज्ञानपूर्वकः स्नेह एव तु ॥", |
| | "भक्तिर्विष्णौ समुद्दिष्टा तदन्येषां च योग्यतः ।", |
| | "विष्णुभक्तिर्देवभक्तिर्गुरौ भक्तिस्तथैव च ॥", |
| | "तत्तच्छ्रैष्ठ्यानुसारेण मुक्तौ नियतसाधनम् ।", |
| | "भक्तिपूर्तौ भवेन्मुक्तिस्तदभावे च नो भवेत् ॥", |
| | "भक्तिर्ज्ञानं तथा ध्यानं मुक्तानामपि सर्वशः ।", |
| | "नियमेन न हीयन्ते मुक्तानां ते स्वरूपकाः ॥", |
| | "साधनानि तु सर्वाणि भक्तिज्ञानप्रवृद्धये ।", |
| | "नैवान्यसाधनं भक्तिः फलरूपा हि सा यतः ॥", |
| | "स्वात्मोत्तमेषु विद्वेषात् तमो नियमतो व्रजेत् ।", |
| | "गुणानामल्पताज्ञानं तत्स्त्रीरागस्तथैव च ॥", |
| | "तत्प्रतीपे च या बुद्धिस्त्रिविधो द्वेष उच्यते ।", |
| | "द्वेषोज्झिता च या भक्तिः सा मोक्षं नियमान्नयेत् ॥", |
| | "निर्दुःखं तु सुखं नित्यं मोक्ष इत्यभिधीयते ।", |
| | "चिदानन्दशिरोदेहपाणिपादात्मकाः सदा ॥", |
| | "सर्वदोषविनिर्मुक्ता मुक्ताः क्रीडन्ति नित्यशः ।", |
| | "अनादिकालादारभ्य या भार्यास्ताः सदैव तु ॥", |
| | "ब्रह्मादीनां विमुक्तौ च भार्याः स्युर्नियमात् सदा ।", |
| | "न कदाचिद्विमुक्तानां भार्याः काश्चित् स्युरन्यगाः ॥", |
| | "न कदाचिद्वियोगश्च न विद्वेषो न वाऽरतिः ।", |
| | "मोदन्ते सहिताः सर्वे सदा विष्णुपरायणाः ॥ इत्यादि पैङ्गिश्रुतिः ।" |
| | ] |
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| "text": "स्वयमेवापराजितबहुरूपत्वादपराजिता सेना भगवान् । जिष्णुरुत्तमः । अन्येषां जेता अन्यतस्त्यजायी ।" | | "lines": [ |
| | "एकमेवाद्वितीयम्", |
| | "नेह नानास्ति किञ्चन", |
| | "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ अग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।", |
| | "मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥" |
| | ] |
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| "text": "विषासहिः असह्यः ।" | | "lines": [ |
| | "एकधैवानुदृष्टव्यं नेहनानाऽस्ति किञ्चन ।", |
| | "मृत्योः समृत्युं गच्छति य इह नानेवपश्यति ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।", |
| | "एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानु विधावति ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
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| | "इहेति परमेश्वररूपेषु अवयवेषु धर्मेषु च किञ्चन नाना नास्तीत्यर्थः । एकमेवाद्वितीयमिति तत्समोऽधिको वा तदनधीनो वा नास्तीति सतात्पर्यं निषिध्यते ।" |
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| | "एक एवाद्वितीयोऽसौ हरिर्वेदेषु सर्वदा ।", |
| | "एक एवाद्वितीयोऽसावश्वमेधः क्रतुष्वपि ॥" |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "एकैव वाऽद्वितीया सा विष्णुभक्तिर्हि साधने ।", |
| | "एक एवाद्वितीयोऽसौ प्रणवो मन्त्र उच्यते ॥ इत्यादिवचनात् ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथैकमुत्तमं पुरुषमपेक्ष्य, तस्मिन् पुरे एक एव नान्योऽस्तीत्युक्तेऽपि तत्सदृशस्तदधिको वाऽन्यो नास्तीत्युक्तं भवति ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "एक एवाद्वितीयोऽसौ तदतन्त्रस्य वर्जनात् ।", |
| | "तत्समस्याधिकस्यापि ह्यभावात् पुरुषोत्तमः ॥ इति च ब्राह्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "आत्मनि हिरण्यगर्भे । आत्मन्वी चित्तवान् । चित्ताभिमानित्वात् तस्य ।" | | "lines": [ |
| | "स्वगतभेदाविवक्षायामिहेति विशेषणं व्यर्थं स्यात् । नानेवेति भेदाभेदनिराकरणार्थम् । विरुद्धोभयसंयोग इव शब्दः प्रदृश्यते इति शब्दतत्त्वे । पर्वतेषु दुर्गे पर्वताग्रे वृष्टं यथाऽधो विधावति एवं पृथक् दृष्टान् धर्मानन्वेव तदनन्तरमेवाधोऽन्धे तमसि विधावति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति, नैतावता विदितं भवतीति । स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "भेदेन दर्शनाद्वाऽपि भेदाभेदेन दर्शनात् ।", |
| | "विष्णोर्गुणानां रूपाणां तदङ्गानां मुखादिनाम् ॥", |
| | "तथा दर्शनकालात्तु क्षिप्रमेव तमो व्रजेत् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| | ] |
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| "text": "स्वहृदि स्थितं स्वनियामकं भगद्रूपमुपास्यैव मोक्षो भवति । देवतासु भगवन्तमुपास्य तत्तद्देवतासमीपं प्राप्य पुनः स्वहृदिस्थमुपास्यैव मोक्षो भवतीत्यतो नैतावता विदितं भवतीत्युक्तम् ।" | | "lines": [ |
| | "जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः,", |
| | "द्वा सुपर्णा सयुजा साखाया,", |
| | "यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्", |
| | "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति", |
| | "एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य, इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यारभ्य मानुषादिब्रह्मान्तानां मुक्तानामानन्दे शतगुणविशेषश्चोच्यते । मुक्तानां चायं विशेषः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य इति विशेषणात् । न हि ब्रह्मादीनामनधिगतः श्रुत्यर्थः केषाञ्चिदस्ति । न च ब्रह्माण एव केचन कामहताः केचनाकामहताः इत्यत्र प्रमाणमस्ति । तस्माच्छ्रोत्रिय इति प्राप्तश्रुतिफलत्वान्मुक्त उच्यते । अकामहतत्वं च मुख्यं मुक्तस्यैव ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C02", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं वै तद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद् ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञापयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन्पाण्डुरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राप्तश्रुतिफलत्वात्तु श्रोत्रियाः प्राप्तमोक्षिणः ।", |
| | "त एव चाप्तकामत्वात् तथाऽकामहताः श्रुताः ॥ इति च भारते ।" |
| | ] |
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| "text": "स्वहृदिस्थभगवद्रूपस्य स्वस्मिन् विशेषसम्बन्धज्ञापनार्थं बृहत्पाण्डुरवास इत्याद्यामन्त्रणम् । तेभ्यो नामभ्योऽप्यस्य शरीरे विशेषसम्बन्ध इत्यतः पाणिपेषणेन जीवमुत्थापयामास भगवान् । येषां बहिरुपासनेन मोक्षस्तेषामपि ह्रद्युपासनं किञ्चित् कर्तव्यमेव ।" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मणोऽपि ह्यमुक्तस्य नाकामहतता परा ।", |
| | "यतस्तस्यापि कामस्य क्षणव्यवहितिर्भवेत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाऽभूत्स, कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "कामहतता कामेनोपद्रवः ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच । अजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् , य एष विज्ञानमयः पुरुषस् तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते तानि यदा गृह्णाति अथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मणोऽप्यल्पदुःखं स्यात् तदप्यनभिमानतः ।", |
| | "नास्त्यात्मसम्बद्धतया भोगाभावात् कथञ्चन ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स्वहृदिस्थेन भगवद्रूपेण विशेषसम्बन्धदर्शनार्थमेव यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदित्यादि प्रश्नप्रतिवचनं समस्तम् । यत्र यस्मिन् परमेश्वरे विज्ञानमये एष जीवः सुप्तोऽभूत् । यत्रेत्यधिकरणभूत एव य एष विज्ञानमय इति परामृश्यते । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद इत्यादिश्रुतेः । तानि यदा परमात्मा गृह्णाति तदैतत्पुरुषो जीवः स्वपिति नाम ।" | | "lines": [ |
| | "न चान्यस्य कस्यचिच्छ्रोत्रियस्याकामहतस्य च ब्रह्मणा समं सुखं युज्यते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यत्रैत् स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जनपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगत्पतेः ।", |
| | "ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सहसिद्धं चतुष्टयम् ॥ इत्यादिना श्रोत्रियत्वादिगुणैस्तस्यैवान्येभ्य आधिक्यात् । न चेन्द्रपदाद्विरक्तस्येन्द्रसमं सुखं ब्रह्मपदाद्विरक्तस्य तत्सममित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । दृष्टवस्तुनि विरागे आयासाभावात् कश्चित् सुखविशेषो दृश्यते । अन्यत्र ब्रह्मपदाद्विरक्तस्य न कश्चिद्विशेषो दृश्यते । अतोऽनुभवविरुद्धत्वाद्यत्किञ्चिदेतत् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यत्र परमात्मा स्वप्नया नाड्या चरति तदा जीवः उच्चावचं निर्गच्छतीव । सर्वदा महाराजवत् प्राणान् गृहीत्वा परमात्मा परिवर्तते । जीवस्तु कदाचिदेव स्वप्ने राजवदात्मानं पश्यति कदाचिद्ब्राह्मणवच्छ्वमार्जरादिवद् वा ।" | | "lines": [ |
| | "नरादिब्रह्मपर्यन्तं विमुक्तानां शतोच्छ्रयः ।", |
| | "निःशेषदुःखहीनानां नित्यानन्दैकभोगिनाम् ॥", |
| | "अप्यानन्दो मिथोऽप्युक्तस्त्वध्वर्यूणां श्रुतौ पृथक् ॥इति हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथ यदा सुषुप्तो भवति तदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥१९॥" | | "lines": [ |
| | "यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते इत्यत्राप्येतस्मिन्निति विशेषणात् स्वगतभेदनिषेध एव ।" |
| | ] |
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| "text": "आनन्दस्य परमात्मनोऽतिघ्नीं समीपम् । कुमारो रुद्रः । महाराजो वायुः । महाब्राह्मणो ब्रह्मा । न हि जीवो विज्ञानपूर्वकं प्राणानां विज्ञानमादत्ते । न च सर्वप्राणलोकदेवभूतानां स्रष्टा ।" | | "lines": [ |
| | "अभेदमीशरूपाणां भेदं जीवेशयोरपि ।", |
| | "यः पश्येत् स्थिरया बुद्ध्या भक्तिमान् स विमुच्यते ॥इति भविष्यत्पुराणे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाऽग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । स उत्तमः पुरुषः ।", |
| | "स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "आदित्यचन्द्रविद्युत्सु भूतेष्वादर्श एव च ।\nगच्छत्पाश्चात्यशब्देन चक्षुश्छायागतं तथा ॥\nहिरण्यगर्भसंस्थं च सदोपास्य हरिं परम् ।\nतद्देवसार्ष्णितामेत्य हृद्युपास्य हरिं पुनः ॥\nमुक्तिमेत्यथ यो बाह्यान् मुक्तिमेष्यति सोऽपि तु ।\nहृदि किञ्चिदुपास्यैव विष्णुं मुक्तिमनुव्रजेत् ॥\nयानि सूर्यादिनामानि विष्णोस्तानि न संशयः ।\nतदुक्तान्येव सूर्यादिराकृष्यैवोपचारतः ॥\nविशेषेण तु सम्बन्धो यतः स्वहृदि संस्थिते ।\nजीवस्यातो न सोमादिनाम्नाऽऽहूतो हरिः परः ॥\nजीवं च वारयेत् तत्र यदा विष्णुः सनातनः ।\nस्वप्नं पश्यति जीवोऽयं यदा विज्ञानरूपिणम् ॥\nसुषुम्नासंस्थितं विष्णुमेति तत्सुप्तिमेष्यति ।\nसम्यग्ज्ञानमयाद्विष्णोरुत्थानं चाप्ययं व्रजेत् ॥\nप्राणानां चैव लोकानां देवानां प्राणिनामपि ।\nसत्यसत्यो हरिः स्रष्टा पाता विलयकृत् तथा ॥\nनियन्ता मोक्षदश्चैव विष्णुरेव सनातनः ॥\nइति नारायणश्रुतौ ॥" | | "lines": [ |
| | "यस्य लोकं समासाद्य स्वरूपमभिपद्यते ।", |
| | "जीवः पर्येति विष्णोश्च समीपे तत्प्रसादतः ॥ यत्प्रसादात् स पर्येति स विष्णुः पुरुषोत्तमः ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C02", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "शिशुब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।", |
| | "आदध्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमे वाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणा अन्नं दाम ॥१॥"
| | "lines": [ |
| | "दुग्धसागरगाः केचित् केचिदश्वत्थकक्षगाः ।", |
| | "अमृतह्रदेषु केचिच्च पिबन्ति स्नातवत् सदा ॥", |
| | "केचित् पश्यन्ति तं देवं सदा केचित् समीपगाः ॥" |
| | ] |
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| "text": "आधानमवस्थानं सूक्ष्मशरीरम् । प्रत्याधानं विधानं स्थूलशरीरम् । प्राणो नारायणः स्थूणा ।" | | "lines": [ |
| | "आणिं न रथ्यममृताधितस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत् रथ्यमाणिमिवाश्रित्य मुक्ताः सर्वे व्यवस्थिताः ।", |
| | "यं विष्णुं देवदेवेशं नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥ इत्यादि ।" |
| | ] |
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| "text": "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनिका तयाऽदित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥" | | "lines": [ |
| | "तौ यत्र विहीयेते इत्यत्रापि परमात्मैव ।" |
| | ] |
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| "text": "दक्षिणाक्षिस्थितं वायुं सप्तदेवा उपासते ।\nअक्षीणज्ञानमनसः सदाशिवापुरःसराः ॥\nउपास्यमानं तैर्देवैर्मोक्षार्थे वायुमीश्वरम् ।\nस्थूणया विष्णुना सार्धं यो विद्यात् सोऽन्नमश्नुते ॥\nअक्षीणमेव मुक्तः सन् सर्वदुःखविवर्जितः ।" | | "lines": [ |
| | "शरीरानभिमानी यो हृदि संस्थो जनार्दनः ।", |
| | "अभिमानवतो देहे जीवस्य स नियामकः ॥", |
| | "स एव सूर्यसंस्थश्च हंसः सोऽहमिति श्रुतः ।", |
| | "हन्तृत्वाद्धंसनामासौ सोऽहं चासावहेयतः ॥", |
| | "स एव सूर्यसंस्थेन रूपेणैवाक्षिणि स्थितः ।", |
| | "सूर्यसंस्थाद्धि रूपात् स विभक्तोऽक्षिणि संस्थितः ॥", |
| | "गच्छतो म्रियमाणस्य तावुभावपि देहतः ।", |
| | "तयोर्देहविहाने तु भवेतारिष्टदर्शनम् ॥", |
| | "तदा सञ्चिन्तयेद्देवं तमेव पुरुषोत्तमम् ॥ इत्यादि हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
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| "text": "तदेष श्लोको भवति अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहतं विश्वरूपं तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपमिति । प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेव तदाह तस्याऽऽसत ऋषयः सप्त तीरे इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी संवित्ता ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।", |
| | "आविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥ क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात् स्वयञ्ज्योतिरजः परेशः ।", |
| | "नारायणो भगवान् वासुदेवः स्वमाययाऽत्मन् व्यवधीयमानः ॥ इति भागवते ।" |
| | ] |
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| "text": "विश्वरूपं यशश्चेति नाम्ना विष्णू रमा तथा ॥\nवायुश्च संस्थिता नित्यं सर्वेषां दक्षिणाक्षिगाः ।\nपूर्णत्वाद्विश्वतो विष्णो रमायाः स्त्रीषु पूर्णतः ॥\nवायोर्जीवेषु पूर्णत्वाद्यशोज्ञानसुखात्मकाः ।\nप्राणाश्चैते प्रणेतृत्वात् ऋषयो रुद्रपूर्वकाः ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वेच्छयैवावृतो विष्णुर्जीवे तिष्ठति सर्वदा ।", |
| | "योऽसौ नियमयन् जीवं क्षेत्रज्ञ इति शब्दितः ॥ इति हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
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| "text": "इमावेव गौतमभरद्वाजावयमेव गौतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठ कश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचो ह्यन्नमद्यतेऽत्रिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अशरीरः प्रज्ञात्मेति विशेषणाच्च परमात्मा । न हि जीवस्याशरीरत्वममुक्तस्य । एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः अतोऽन्यदार्तम् इति च । न हि जीवादन्यस्यार्तिरुपपद्यते । सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "गौतमो नाम रुद्रस्तु सर्वज्ञत्वात् प्रकीर्तितः ।\nभरद्वाजस्तु पर्जन्यो वाजमन्नं भरेद्यतः ॥\nवृष्ट्यैव विश्वामित्रख्य आदित्यो यत्प्रकाशनात् ।\nविश्वं विज्ञापयन्नित्यमग्निस्तु जमदग्निकः ॥\nजातं मितं चात्ति यस्माद्वसिष्ठाख्यस्तु वासवः ।\nवसतामुत्तमो यस्मात् पृथ्वी कश्यपनामिका ॥\nमेघवृष्टं पिबेद्यत्कं शयानैव हि सा सदा ।\nद्यौरत्रिरिति सम्प्रोक्ता तत्स्थैर्हि हुतमद्यते ॥\nश्रोत्रदिङ्ग्नासिकाबाहुदक्षिणाक्षिषु संस्थिताः ।\nद्वितीयेन तु रूपेण देवा एते शिवादयः ॥\nएवमेषां तु नामानि वेत्ति यः सर्वभुग्भवेत् ।\nउपास्ते वायुमेवैकं सस्थूणं ब्रह्मवेदिना ।\nब्रह्मनामा सदा वायुरेनां वेत्ति विशेषतः ॥\nइति तां वेद यो विद्वान् सर्वात्ता स भविष्यति ॥ इति नारायणीये ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मादयो हि भूतानि तेषामन्तर्गतो हरिः ।", |
| | "समः स सर्वभूतेषु य एवं वेद तत्त्ववित् ॥ इति भारते ।" |
| | ] |
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| "text": "मूर्तामूर्तब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "न च मुख्ये सति लक्षणा नाम युज्यते । न च मुख्यत एव जीवेशयोरैक्यं युक्तम् । प्रत्यक्षविरोधादेव । तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते इत्यादेः । सहस्रशीर्षत्वादिसर्वेशत्वसर्वज्यायस्त्वादिज्ञानादेव मोक्षः प्रतीयतेऽनन्ययोगेन । न चात्रैक्यज्ञानमुक्तम् । पुरुष एवेदं सर्वम् इत्यत्रापि सर्वेशितृत्वमेवोक्तम् । उतामृतत्वस्येशानः इति वाक्यशेषात् ।" |
| | ] |
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| "text": "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे । मूर्तं चैवामूर्तं च, मर्त्यं चामृतं, स्थितं च यच्च, सच्च त्यञ्च ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "पुरुष एवेदं सर्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।", |
| | "इत्युच्यते तदीयत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः ॥", |
| | "भूतभव्यादिजातस्य मुक्तानामपि चेश्वरः ।", |
| | "इत्युच्यते श्रुतौ विष्णुः सर्वदा पुरुषोत्तमः ॥ इति भारते ।" |
| | ] |
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| "text": "विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् ।" | | "lines": [ |
| | "सर्वस्मादुत्तम इति सम्यक् स्नेहयुता मतिः ।", |
| | "सुस्थिरा भक्तिरुद्दिष्टा तया मोक्षो न चान्यतः ॥", |
| | "तया मोक्षो भवत्येव सा चेत् पूर्णा स्वयोग्यतः ।", |
| | "अपरोक्षदृशा युक्ता सा पूर्णेत्यभिधीयते ॥", |
| | "अपरोक्षदृशिश्चापि महाचार्योक्तदर्शनम् ।", |
| | "सोऽपि यन्मोक्षनियतं मनसा समुदीरयेत् ॥", |
| | "तस्य दर्शनतो याति मुक्तिं नास्त्यत्र संशयः ।", |
| | "ध्यानं च गुरुशुश्रूषा नित्यनैमित्तिकाः क्रियाः ॥", |
| | "तीर्थदानजपाद्याश्च स्वाध्यायो हरिकीर्तनम् ।", |
| | "द्वादश्यादिव्रतं चैव तुलस्याद्यैरथार्चनम् ॥", |
| | "सर्वं भक्त्यर्थमुद्दिष्टं निष्फलन्तु तया विना ।", |
| | "विष्णुभक्तियुतो मुक्तिं याति नान्यः कथञ्चन ॥", |
| | "एतदन्यत्तु यच्छास्त्रं न तच्छास्त्रं कुवर्त्म तत् ।", |
| | "विष्णोर्भक्तिमृते मुक्तिर्जीवाभेदो हरेरपि ॥", |
| | "शिवब्रह्मादिसाम्यं च हरेर्मोहार्थमुच्यते ।", |
| | "दैत्यानां मोहनार्थाय विष्णोरन्यसमानता ॥", |
| | "हीनता चोच्यते शास्त्रैर्न तद्ग्राह्यं मनीषिभिः ।", |
| | "विष्णुवायुगिरीशेन्द्रदेवविप्राः क्रमात् सदा ॥", |
| | "सामर्थ्यतो विहीनास्तु गुणैः सर्वैस्तथैव च ।", |
| | "हीनो विष्णुर्न कस्यापि सर्वतश्चोत्तमो मतः ॥", |
| | "एतदन्यत्तु यच्छास्त्रं तदासुरविमोहनम् ।", |
| | "तस्मात् सर्वोत्तमं विष्णुं निश्चित्य परमं व्रजेत् ॥ इति हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत् स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "तुलापुरुषदानाद्यैरश्वमेधादिभिर्मखैः ।", |
| | "वाराणसीप्रयागादितीर्थस्नानादिभिः प्रिये ॥", |
| | "गयाश्राद्धादिभिः पित्र्यैर्वेदपाठादिभिर्जपैः ।", |
| | "तपोभिरुग्रैर्नियमैर्यमैर्भूतदयादिभिः ॥", |
| | "गुरुशुश्रूषणैः सत्यैः धर्मैर्वर्णाश्रमोचितैः ।", |
| | "ज्ञानध्यानादिभिः सम्यक् चरितैर्जन्मजन्मभिः ॥", |
| | "न यान्ति तत्परं श्रेयो विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम् ।", |
| | "सर्वभावैरनाश्रित्य पुराणपुरुषोत्तमम् ॥ इति पाद्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते ।" | | "lines": [ |
| | "भावो भक्तिः समुद्दिष्टस्तद्वान् भावुक उच्यते इति नारसिंहे ।" |
| | ] |
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| "text": "अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद् यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।", |
| | "सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामते ॥ इति भागवतवचनम् ।" |
| | ] |
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| "text": "मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः ।" | | "lines": [ |
| | "परायण इति विशेषणान्न नारायणायनत्वं विना मुक्तिद्योतकम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथाध्यात्मम् इदमेव मूर्तं यदन्यत् प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "न च सिद्धेऽर्थे तात्पर्याभावो वक्तुं युक्तः । अस्त्यत्र तव पिता राजेत्यादिषु सिद्ध एव तात्पर्यदर्शनात् । न च तत्र कार्ये तात्पर्यं कल्पयितुं युक्तम् । सुखसाधनत्वविज्ञानेनैव प्रवृत्त्युपपत्तेः । वाक्यस्य स्वार्थमात्रे तात्पर्यपर्यवसानात् । अधिककल्पनायामश्रुतकल्पनाप्रसक्तिः । यजेतेत्यादिष्वपि यजनादेः सुखसाधनतामात्रं प्रतीयते । न शब्दस्य प्रेरकता । वाक्यमात्रस्य प्रेरकत्वे सर्वैर्विहितमनिष्टसाधनमपि क्रियेत । व्युत्पत्तिरपि सिद्धे साङ्गुलिनिर्देशादिना युज्यते । न च कुत्रचित् सुखसाधनं विना कार्यान्वितं विद्यते । लिङ्गाद्यर्थोऽपि सुखसाधनत्वमेव । न च कार्यान्वित एव तात्पर्यमित्यत्र किञ्चिन्मानम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥"
| | "lines": [ |
| | "सुखसाधनमेवैकं नृणां वेदः प्रदर्शयेत् ।", |
| | "न कुर्विति नरं क्वापि प्रेरयत्यत्र कञ्चन ॥", |
| | "सुखसाधनताज्ञानात् सुखप्राप्त्यर्थमिच्छया ।", |
| | "प्रवर्तते ततो वेदः सिद्धस्यैव प्रदर्शकः ॥", |
| | "न तु कारकतां क्वापि वेदः प्राप्नोति कस्यचित् ॥ इति ब्राह्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च ।" | | "lines": [ |
| | "अतस्तद्विरोधिकथनं मोहत एव । कार्यान्विते शक्तिरिति वदता सिद्धवाक्यानां प्रामाण्यमङ्गीकृतं च । अन्यथा वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेतेत्यादौ वसन्तादिलक्षणवाक्यानां स्थानान्तरस्थानां स्वार्थे प्रामाण्याभावाद् वसन्ताद्यसिद्धेर्यागाद्यसिद्धिः । कार्यान्विते शक्तिरित्युक्ते कार्यपदस्य कार्यान्वयाभावादशक्या विध्यादेरसिद्धिश्च । कार्यपदस्य स्वत एव शक्तिरन्येषां कार्यान्वितत्वेनेत्यङ्गीकारे कल्पनागौरवम् । स्वार्थे शक्तिरित्यङ्गीकारे न कश्चिद्विरोधः । कर्तव्यतामात्रे वाक्यप्रामाण्याङ्गीकारे कर्मप्रयोजने प्रमाणाभावात् तत्रापि तात्पर्यमङ्गीकर्तव्यमेवेति सिद्धमेव सिद्धे तात्पर्यम् ।" |
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| "text": "एतस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तं सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत् परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "चित्रादितारकाद्वन्द्वं यदा पूर्णेन्दुसंयुतम् । चैत्रादिमासा विज्ञेयाः ॥" |
| | ] |
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| "text": "तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् ।" | | "lines": [ |
| | "इत्यादौ वस्तुयाथार्थ्ये तज्ज्ञाने चोभयत्र तात्पर्यदर्शनात् । उपासनावाक्येष्वप्युपासनायां वस्तुयाथार्थ्ये चोभयत्र तात्पर्यं युक्तम् ।" |
| | ] |
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| "text": "मैत्रेयीब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "उभयत्रापि तात्पर्यमात्मोपासादिके विधौ ।", |
| | "तस्मादसत्यं न ध्यायेद्ध्यायेत् तत्सत्यता तथा ।", |
| | "विचार्य मतिमान् वाक्यैर्बहुभिः स्वार्थवाचकैः ॥इति हरिवंशेषु ।" |
| | ] |
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| "text": "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मादिष्टसाधनमेव सर्ववाक्यार्थः । तार्किकाणां तूक्तवचनानां प्रामाण्यं सिद्धमेव । अतस्तद्विरोधिकथनं मोहत एव ।" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अनुमाया विरोधश्चेत् प्रत्यक्षेणागमेन वा ।", |
| | "सैवाप्रमाणतां गच्छेदागमद्विट् तथाऽक्षजम् ॥", |
| | "तस्मादागम एवैको मानानामुत्तमोत्तमः ।", |
| | "धर्मार्थकाममोक्षाणां साक्षादेव प्रदायकः ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "इति वायुप्रोक्तवचनान्नानुमानविरोधो वक्तुं युज्यते । सर्वत्रानिवार्यत्वाच्च प्रत्यनुमानस्य ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "निर्णयस्त्वागमेनैव नानुमाऽऽगमवर्जिता ।", |
| | "क्वचिन्निर्णीतिहेतुः स्यादतः शास्त्राद्विनिर्णयः ॥ इति भारते ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।\nन वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।\nन वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।\nन वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ।\nन वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति ।\nन वा ओ अरेक्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति ।\nन वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति ।\nन वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति ।\nन वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति ।\nन वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।\nआत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "न च वेदात्मकेतिहासपुराणोक्तन्यायं परित्यज्य येन केनचित् क्ऌप्तन्यायो युज्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः ।" | | "lines": [ |
| | "अक्षपादकणादौ च साङ्ख्ययोगार्हतास्तथा ।", |
| | "शिवशक्तिमहायानलोकायतपुरःसराः ॥", |
| | "गाणपत्याश्च सौराश्च सर्वे प्रोक्ता दुरागमाः ।", |
| | "ऋग्यजुःसामथर्वाश्चेतिहासपुराणकौ ॥", |
| | "स्वागमा इति सम्प्रोक्ता मीमांसा धर्म एव च ॥ इति पाद्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः ।\nयोऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा ।", |
| | "इतिहास इति प्रोक्तो ब्राह्माद्यं च पुराणकम् ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् ।" | | "lines": [ |
| | "वेदाश्चैवेतिहासाश्च पुराणं भागवतं तथा ।", |
| | "मूलप्रमाणमुद्दिष्टं मीमांसा च तथोत्तरा ॥", |
| | "एतेषामविरोधे तु मानमन्यदुदीरितम् ।", |
| | "एतेषां तु विरुद्धं यदप्रमाणं विदो विदुः ॥ इति व्यासस्मृतौ ।" |
| | ] |
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| "text": "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "विष्णोः सर्वोत्तमत्वस्य ज्ञानार्थं शास्त्रमिष्यते ।", |
| | "अतस्तत्साधकं शास्त्रं दुःशास्त्रं तद्विरोधि यत् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| | ] |
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| "text": "स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "विष्णोः सर्वोत्तमत्वं च तद्भक्त्या मोक्ष एव च ।", |
| | "शास्त्रार्थ इति निर्दिष्टः सर्वशास्त्रार्थनिर्णयात् ॥ इति पाद्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "न चागमस्याप्रामाण्यं वक्तुं युक्तं तत्प्रमाणाभावात् । स्वतः प्रामाण्याच्च । तदनङ्गीकारे चानवस्थानात् । आगमप्रामाण्यसाधकानुमानादेरप्यागमवदप्रामाण्यप्राप्तेश्च । विशेषप्रमाणाभावात् । स्वीकृतत्वाच्च तैरपि स्वागमप्रामाण्यस्य । न ह्यनुमानादिना सप्तमलधारणचैत्यवन्दनादेः स्वर्गसाधनत्वं ज्ञातुं शक्यम् । न च प्रत्यक्षमात्रप्रामाण्यवादिनस्तत्सिद्धमागमाप्रामाण्यम् । अतस्तेषां प्रत्यक्षवदनुमानवच्चाङ्गीकर्तव्यमागमप्रामाण्यम्" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव ।" | | "lines": [ |
| | "उक्तं च भविष्यत्पर्वणि ।", |
| | "येनोक्तमागमामात्वं कुतस्तदिति तं वदेत् ।", |
| | "प्रत्यक्षादेर्यदि ब्रूयात् तन्मात्वं क्वेति तं वदेत् ॥", |
| | "तत्स्वतश्चेदागमस्य प्रामाण्यं न स्वतः कुतः ।", |
| | "परतश्चेत् प्रमाणस्य न कस्यापि स्थितिर्भवेत् ॥", |
| | "अङ्गीकृतं च प्रामाण्यं सर्वैरप्यागमस्य तु ।", |
| | "यतः स्वपक्षप्रामाण्यं विरोधेऽप्यक्षजादिना ॥", |
| | "अङ्गीकुर्वन्ति तत्पक्षः प्रत्यक्षादिविरोधकः ।", |
| | "शून्यता क्षणिकत्वं च ज्ञानमात्रत्वमेव च ॥", |
| | "भावाभावात्मता साकं शरीरात्मत्वमेव च ।", |
| | "प्रत्यक्षेण विरुध्यन्ते मद्देह इति दर्शनात् ॥", |
| | "भावरूपस्थिरत्वादेर्ज्ञानाद्भेदस्य दर्शनात् ।", |
| | "देहभेदो यद्यमुख्यो देहैक्ये मुख्यता कुतः ॥", |
| | "जातिस्मृतिप्रमाणाच्च न युक्ता देहरूपता ।", |
| | "अनुष्ठाय च शास्त्रार्थं फलभोगस्य दर्शनात् ॥", |
| | "प्रत्यक्षादेर्विरुद्धत्वात् सौगताद्या दुरागमाः ।", |
| | "बह्वागमविरोधाच्च दुष्टत्वं तेषु संस्थितम् ॥", |
| | "प्रामाण्यं स्वीकृतं यैस्तु वेदानामागमा हि ते ।", |
| | "शतकोट्यः पञ्चरात्रं पुराणं तावदेव च ॥", |
| | "रामस्य चरितं तावत् तावदन्यच्च सर्वशः ।", |
| | "अनन्ताश्च तथा वेदाः साङ्गोपाङ्गाश्च सर्वशः ॥", |
| | "सर्वाधिक्यं यत्र विष्णोस्तात्पर्यात् समुदीर्यते ।", |
| | "विंशदेव सहस्राणि श्लोकानां समुदीरितम् ॥", |
| | "बार्हस्पत्यं तथा बौद्धं भावाभावमतं तथा ।", |
| | "शिवशक्त्यादिकं यच्च किञ्चित् प्रामाण्यसंयुतम् ॥", |
| | "त्रिंशत्कोट्येव तत्सर्वमतो मानं न तत्स्मृतम् ।", |
| | "बहुमानविरुद्धं यन्न तन्मानं विदो विदुः ॥", |
| | "गुणसाम्येऽपि किमुत गुणाधिकविरोधि यत् ।", |
| | "यथा बहूनां ज्ञानानां समानां गुणतोऽपि च ॥", |
| | "विरोध्येकं तु यज्ज्ञानं न मानत्वं गमिष्यति ।", |
| | "प्रत्यक्षादौ हि बहुभिः समैरेकमपोद्यते ॥", |
| | "तस्माद्वेदाः प्रमाणं स्युर्बाहुल्यादेव किं पुनः ।", |
| | "अदोषत्वाद्गुणाच्चैव बलवत्कार्यसाधनात् ॥", |
| | "वेदोक्तकर्मयुक्तानां तथा सिद्धिमतामपि ।", |
| | "वेदबाह्यक्रियायोगान्न बाधः क्वापि दृश्यते ॥", |
| | "वेदोक्तकर्मसिद्धानां न बाध्यं दृश्यते क्वचित् ।", |
| | "असाध्यं वा ततो वेदाः प्रामाण्यं निश्चयाद्गताः ॥ इति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥"
| | "lines": [ |
| | "प्रत्यक्षमनुमानं च वाक्यं चेति त्रिधा प्रमा ।", |
| | "उपमाद्यं प्रमाणं यदेतेष्वन्तर्गतं हि तत् ॥", |
| | "निर्दोषेन्द्रियसंयोगः प्रत्यक्षमिति गीयते ।", |
| | "निर्दोषयुक्तिरनुमा तादृशोक्तिस्तथाऽऽगमः ॥", |
| | "मानं चैव विशेषेण निर्दोषज्ञानसाधनम् ।", |
| | "अर्थापत्तिश्चोपमा च सम्भवाद्यनुमैव तु ॥", |
| | "दुःखाद्यभावः प्रत्यक्षं बाह्यगश्चानुमा स्मृता ।", |
| | "योग्यस्यानुपलब्ध्याख्या युक्तिरेव हि बाह्यगा ॥", |
| | "मनसः सम्प्रयोगो यो दुःखादिरहितात्मनि ।", |
| | "अभावरूपं प्रत्यक्षं मनश्च द्विविधं मतम् ॥", |
| | "चेतनं च जडं चेति चक्षुराद्यं तथैव च ।", |
| | "चेतनं त्विन्द्रियं ह्यात्मस्वरूपान्नापरं स्मृतम् ॥", |
| | "मुक्तानां चेतनं त्वेव बद्धानामुभयं तथा ।", |
| | "स्वरूपेणापि संयोगः स्वरूपस्यैव युज्यते ॥", |
| | "यथा रत्नस्य संयोगस्तत्प्रकाशेन नित्यदा ।", |
| | "रत्नस्य च प्रकाशस्य न भेदः कश्चिदिष्यते ॥", |
| | "विशेषो नाम विज्ञेयो विशेषाद् दृष्टिगोचरः ।", |
| | "विष्णोरेव स्वरूपाणां तद्गुणानां तथैव च ॥", |
| | "तस्यैव शिरआदीनां नैव भेदोऽस्ति कश्चन ।", |
| | "अभेदेऽपि विशेषेण व्यवहारः पृथग्भवेत् ॥", |
| | "विष्णोर्जडेन जीवैश्च भेद एव श्रिया तथा ।", |
| | "विष्णोः क्रियाश्च याः कश्चिदभेदस्तैरपि ध्रुवः ॥", |
| | "कादाचित्कत्वमप्यासां विशेषेणैव युज्यते ।", |
| | "एवं विमुक्तजीवानां स्वरूपैः स्वगुणैरपि ॥", |
| | "स्वक्रियाभिस्तथैवैक्यं नित्यं स्वावयवैरपि ।", |
| | "भेदाभेदस्तु बद्धानां गुणैः स्वैः कर्मभिस्तथा ॥", |
| | "अंशांशिनोर्गुणस्यापि गुणिनः कर्म तद्वतोः ।", |
| | "कार्योपादानयोश्चैव व्यक्तिसामान्ययोरपि ॥", |
| | "भेदाभेदः समुद्दिष्टो विनाशो यत्र दृश्यते ।", |
| | "एकस्मिन् विद्यमानेऽपि तयोरेकस्य कस्यचित् ॥", |
| | "अविनाभावनियमो यत्राभेदस्तु तत्र हि ।", |
| | "अभेदश्च स्वभिन्नेन भेदाभेदस्तु तत्र च ॥", |
| | "भेदाभेदो न तु क्वापि विष्णोरस्ति कदाचन ।", |
| | "भेद एव तु जीवाद्यैः केवलाभेद आत्मनि ॥", |
| | "स्वरूपेषु विशेषो यः स्वरूपं तस्य सोऽपि तु ।", |
| | "क्रियाणां च न नाशोऽस्ति तच्छक्तेः पूर्वकालतः ॥", |
| | "विशेष एवोपरतिः क्रियायाः समुदीरिता ।", |
| | "विशेषस्य विशेषोऽन्यो न चैवास्ति कथञ्चन ॥", |
| | "स्वस्यापि तु विशेषश्च स्वयमेव भविष्यति ।", |
| | "यथा जनेर्जनिर्नान्या तस्या वस्तुजनिर्जनिः ॥", |
| | "तथाऽपि तु जनित्वात् सा सत्वं वस्तुन आनयेत् ।", |
| | "एवमेव विशेषोऽसौ विशेषान्तरवर्जितः ॥", |
| | "करोति न करोतीति विशेषव्यवहारकृत् ।", |
| | "व्यक्तिभावं गता या तु करोतीति स्वरूपिणी ॥", |
| | "शक्तिरूपस्थिता सैव क्रिया शक्तिरितीर्यते ।", |
| | "सा च व्यक्तिस्तु जनिवत् क्रियाया रूपमेव तु ॥", |
| | "तथापि तु विशेषेण स्वरूपेण विशेषिणी ।", |
| | "जनेर्जनिवदेवासौ ज्ञातव्या व्यतिरेकतः ॥", |
| | "एवं मुक्तक्रिया नित्या नान्येषां भ्रान्तिसम्भवात् ।", |
| | "मुक्तावुच्छेदतश्चैव निःशेषेणाखिलस्य च ॥", |
| | "नैवं मुक्तक्रियायास्तु तस्याश्च पुनरुद्भवात् ।", |
| | "अमुक्तानां क्रिया याश्च मुक्तावपि समास्थिताः ॥", |
| | "अभिन्ना इति ता ज्ञेया अभिव्यक्तेः पुनः पुनः ।", |
| | "चिन्तनादिक्रियाणां तु मुक्तावुच्छेदतः सदा ॥", |
| | "किं मया कार्यमादीनां भेदाभेद उदीरितः ।", |
| | "अचेतनेष्वस्वतन्त्राः क्रिया यस्मात् सदैव तु ॥", |
| | "भेदाभेदस्ततो ज्ञेयः सर्वत्र नियमेन तु ।", |
| | "ईश्वरः प्रकृतिर्जीवो जडं चेति चतुष्टयम् ॥", |
| | "पदार्थानां समुद्दिष्टं तत्रेशो विष्णुरुच्यते ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च इत्यादिश्रुतयश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते ।" | | "lines": [ |
| | "शक्तिशक्तिमतोश्चैव विशेषस्य विशेषिणः ।", |
| | "अविनाभाविता यत्र न भेदस्तत्र विद्यते ॥", |
| | "सर्वाधिकसुखत्वं च ज्ञानं सर्वाधिकं तथा ।", |
| | "सर्वाधिका सर्वशक्तिस्तेजः सर्वाधिकं तथा ।", |
| | "इत्यादयो गुणाः सर्वे स्वरूपं वैष्णवं तथा ॥", |
| | "भेदान्यत्वादयः शब्दाः अतद्रूपत्ववाचकाः ।", |
| | "क्वचिदन्तरशब्दश्च विशेषस्यैव वाचकः ॥", |
| | "एकस्मिन्नेव शब्दानां यस्तु नानास्वरूपिणाम् ।", |
| | "प्रयोजकत्वहेतुः स्यात् स विशेषः प्रकीर्तितः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥"
| | "lines": [ |
| | "यदाहुर्ब्रह्मविज्ञानात् समग्रत्वं यियासवः ।", |
| | "ब्रह्मज्ञानात् समग्रत्वं नान्यतश्चेति निश्चयात् ॥", |
| | "तत्र केचिन्मनुष्यास्तु मन्यन्ते ब्रह्म किं मतेः ।", |
| | "समग्रभावमगमदिति ब्रूयाच्च तानिति ॥", |
| | "ब्रह्माऽपि सर्वदाऽत्मानमहेयं गुणबृंहितम् ।", |
| | "सर्वदाऽस्तीति मेयं च विजानाति तथैव तु ॥", |
| | "अत एव समग्रत्वं स्वत एवास्य सर्वदा ।", |
| | "तदहेयं परं ब्रह्म यो योऽवेद्गुणबृंहितम् ॥", |
| | "सर्वदाऽस्तीति मेयं च स स याति समग्रताम् ।", |
| | "मुख्यं समग्रं तद्ब्रह्म ज्ञानस्यापि समग्रतः ॥", |
| | "किञ्चित्समग्रतां देवास्तेषां ज्ञानं हि तादृशम् ।", |
| | "आपुस्ततोऽधमां ज्ञानतादृक्त्वादृषयोऽपि तु ॥", |
| | "ऋषिभ्योऽप्यधमां प्रापुर्मानुषाश्च समग्रताम् ।", |
| | "ओयं च गुणैः पूर्णं नित्यास्तिज्ञानगोचरम् ॥", |
| | "ब्रह्म पश्यन्वामदेवः सूक्तमेतद्ददर्श ह ।", |
| | "अहं मनुः सूर्य इति स्वान्तर्यामिव्यपेक्षया ॥", |
| | "अहंशब्दो यतो विष्णौ ततश्चोत्तमपूरुषाः ।", |
| | "वर्तन्तेऽभवमित्याद्याः सर्वान्तस्थे जनार्दने ॥", |
| | "मनुरेषोऽवबोधत्वान्मन्वन्तस्थो जनार्दनः ।", |
| | "स ह्याचारानुवाचेशः प्रेरयन्मनुमानसम् ॥", |
| | "स एव सूरिभिः प्राप्यः सूर्यान्तस्थो मुमुक्षुभिः ।", |
| | "स एव कक्षगैः सेव्यः कक्षीवति समास्थितः ॥", |
| | "स एव शुक्रसंस्थस्तु नीतीः कवयति स्वयम् ।", |
| | "यतः कविः स कामस्य प्रेरणादुशनाः स्मृतः ॥", |
| | "स एव शम्बरपुरो बिभेदेन्द्रे व्यवस्थितः ।", |
| | "सर्वान्तर्यामकत्वात् तु सर्वकर्मा स एव हि ॥", |
| | "ततः सूक्ते तथोवाच वामदेवः श्रियः पतिम् ।", |
| | "यो योऽहेयं परं ब्रह्म सदैवास्तीति मानगम् ॥", |
| | "इदानीमपि जानाति स्वयोग्यां स समग्रताम् ।", |
| | "प्राप्नोति तस्य देवाश्च नाभूतिं कर्तुमीशते ॥", |
| | "आत्मा हि विष्णुर्देवानां तेषु व्याप्तो यतः सदा ।", |
| | "नियोक्तृत्वेन कार्येषु तज्ज्ञो यस्माच्च साधकः ॥", |
| | "यस्य प्रीतो हरिर्नित्यं तस्य प्रीताश्च देवताः ।", |
| | "प्रीतियोगान्नैव तस्य विरुद्धं कर्तुमीशते ॥", |
| | "एवं विलक्षणं देवमुपास्ते जीवरूपिणम् ।", |
| | "ओयोऽस्तीति मेयोऽन्योऽथान्योऽसौ हरिरित्यपि ॥", |
| | "न स वेद परं विष्णुं जीवरूपेण वेत्ति यत् ।", |
| | "नाहेयत्वं च वेदास्य तस्मात् पशुवदीरितः ॥", |
| | "पशवो बहवो यद्वत् पुरुषं भोजयन्त्युत ।", |
| | "तत्वज्ञः पुरुषस्तद्वदेकोऽपि बहुगा यथा ॥", |
| | "देवानां पशुवच्चासौ यो वेदाहेयरूपिणम् ।", |
| | "देवान् भोजयति ज्ञानसम्पत्त्या विष्णुसंश्रयात् ।", |
| | "स्वीकारे तु पशोः प्रीतिरेकस्यापि भविष्यति ॥", |
| | "बहूनां हि गवां लाभे परा प्रीतिश्च किं पुनः ।", |
| | "तस्मात् सुबहुगोरूपे देवानां तत्त्ववेदिनि ॥", |
| | "भवेदभ्यधिका प्रीतिर्विष्ण्वहेयत्ववेदनात् ।", |
| | "नित्याहेयस्तथैवान्यस्तदन्यो विष्णुरित्यपि ॥", |
| | "देवानामप्रियं ज्ञानं नैवं विद्यादतः पुमान् ।", |
| | "विष्णोरहेयतां चैव नित्यत्वं पूर्णतामपि ॥", |
| | "यो न वेद, तथा यश्च जीवैरैक्यं हरेर्वदेत् ।", |
| | "यश्चासत्यं जगद्ब्रूयात् सर्वे ते तमसि स्फुटम् ॥", |
| | "मज्जन्ति सर्ववेदैर्हि गुणैः सर्वैहरिर्यतः ।", |
| | "पूर्णो नित्यमपूर्णाश्च जीवा मुक्ता अपि स्फुटम् ॥", |
| | "निःशेषदुःखमोकेन सुखैकानुभवस्तु यः ।", |
| | "मोक्ष इत्युच्यते वेदैस्तेऽपि मुक्ता हरिं सदा ॥", |
| | "उपासते जगच्चैतत्सर्वदाऽऽद्यन्तवर्जितम् ।", |
| | "न कदाचिज्जगन्नाशो न कदाचित् तदन्यथा ॥", |
| | "जगत् प्रवाहरूपेण सर्वदैवं व्यवस्थितम् ।", |
| | "ज्ञानतः कर्मतो वाऽपि तपसा शक्तितोऽपि वा ॥", |
| | "न कस्याप्यन्यथा भाव्यं जगदेतत् कदाचन ।", |
| | "सत्यो विष्णुः श्रीश्च सत्या जीवाः सत्या जडं तथा ॥", |
| | "असत्यं नास्ति किञ्चिच्च सर्वेषां ज्ञानगोचरम् ।", |
| | "ज्ञात्वा विष्णुमतो मुक्तिं प्राप्नुयात् पुरुषोत्तमम् ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ।" |
| | ] |
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| "text": "एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् ।" | | "lines": [ |
| | "इदमित्यात्मनो योग्यं सर्वं समग्रं भवति । निर्दुःखानन्दस्यापेक्षितत्वान्मनसि स्थितत्वेनेदमिति युज्यते । तत्सर्वमभवत् सर्वं भविष्यन्त इत्यादिना समग्रभावस्य प्रस्तुतत्वात् । ब्रह्म पश्यन्वामदेवो ब्रह्मणो मन्वादिजीवैरहेयत्वं प्रतिपेदे ।" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति\nस होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्म पश्यन्वामदेवो ब्रह्मणोऽहेयतां सदा ।", |
| | "मन्वादिभिः सर्वजीवैः प्रतिपेदे हि मन्त्रदृक् ॥ इति ब्राह्मे ।" |
| | ] |
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| "text": "यत्र हि द्वैतमिव भवति ।\nतदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति ।\nतदितर इतरं शृणोति ।\nतदितर इतरमभिवदति ।\nतदितर इतरं मनुते ।\nतदितर इतरं विजानाति ।\nयत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्।\nकेन कं पश्येत् केन कं शृणुयात् ।\nतत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं मन्वीत ।\nतत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति ।\nतं केन विजानीयाद् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदिदं ब्रह्म योऽहेयत्वादिगुणमेतर्ह्यपि वेद । अहंशब्दस्याहेयत्वानङ्गीकारे इदंशब्दोऽपि व्यर्थः । सर्वस्वरूपत्वं हि दुर्विद्वद्भिरङ्गीक्रियते । इदंशब्देन परब्रह्मविवक्षायां ब्रह्मशब्दो व्यर्थः स्यात् । इदं योऽहमिति वेदेत्येव स्यात् । एवंशब्दश्च व्यर्थः । अस्मत्पक्षे तु तदात्मानमेवावेदित्यपि ज्ञातव्यमित्येवंशब्दार्थः । तत्पक्षे तदपि व्यर्थमेव । न हि तत्पक्षे तत्स्वात्मानं वेत्ति । व्याख्यानव्याख्येयभावश्चागतिका गतिः ।" |
| | ] |
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| "text": "मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः ।" | | "lines": [ |
| | "अभावे पृथगर्थानां व्याख्यामभ्यासमेव वा ।", |
| | "कल्पयेन्नैव तद्भावे व्याख्याऽभ्यासश्च युज्यते ॥ इति भारते ।" |
| | ] |
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| "text": "मधुब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "स्वरूपज्ञं तथाऽहेयं नित्यं च ब्रह्म वेत्ति यः ।", |
| | "समग्रभावं गच्छेत् स तत्प्रसादान्न संशयः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स ईश्वरः एषां देवानामात्मा भवति । पुल्लिङ्गं च तत्सत्यं स आत्मा इत्यादिवद् भवति ।" |
| | ] |
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| "text": "इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं रेतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "देवानां व्यापकत्वात्तु तेषामात्मा हरिः सदा ।", |
| | "तज्ज्ञः प्रियस्ततस्तेषां तस्य नाभूतिदास्ततः ॥ इति वामने ।" |
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| "text": "अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वेभ्योऽन्यां विलक्षणां देवतां स्वगुणेभ्योऽहेयत्वादिभ्यश्चान्यां य उपास्ते ओयोऽस्मीति मेयश्चान्योऽन्यश्चासौ विष्णुरिति मत्वा यो विष्णोरन्यां देवतामुपास्ते अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेदेति वा ।" |
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| | "जीवादिभ्यो हरिर्भिन्नस्तं यः स्वगुणभेदतः ।", |
| | "ओयोऽन्यो हरिश्चान्य इति मत्वाऽन्यमेव वा ॥", |
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| "text": "अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं स देवानामित्यत्र पूर्वः सम्यग्ज्ञानी परामृश्यते । एतन्मनुष्या विद्युरित्यत्रैतच्छब्देन विष्णोरन्यदेवतोपासनमुच्यते । न ह्यज्ञान्येव देवानां भोजकः । ज्ञानी हि विशेषेण भोजकः । अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः इति वचनात् । स य एवंवित् सर्वेषां भूतानां ब्रह्मविच्च तत्रोच्यते । प्रस्तुतत्वात्" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तत्त्वविद् देवगौः प्रोक्तो नरगौश्चाप्यतत्त्ववित् ।", |
| | "तस्माद्देवास्तत्त्वविदे प्रियं कुवर्न्त्यतन्द्रिताः ॥ इत्याग्नेये ।" |
| | ] |
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| "text": "अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत इति देवानां तत्त्वज्ञानं प्रियमित्युक्तं च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥"
| | "lines": [ |
| | "असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।", |
| | "यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता ।", |
| | "सत्यो जीवेशयोर्भेदः सत्या विष्णोर्गुणा अपि ।", |
| | "सत्यं जगदिदं सर्वं सत्येशजगतोर्भिदिः ॥ इत्यादेश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "भेदेनैव जगत्सर्वं भेदेनेशं गुणैः सह ।", |
| | "भेदेन जीवानन्योन्यं मुक्ताः पश्यन्ति सर्वशः ॥", |
| | "निःशेषदुःखहीनाश्च केवलं सुखभोगिनः ।", |
| | "जन्ममृत्युविहीनाश्च कालसम्बन्धवर्जिताः ।", |
| | "रजस्तमःसत्वहीनाः प्रकृत्यादिविवर्जिताः ॥" |
| | ] |
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| "text": "अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "इत्यादि गारुडवचनान्न ज्ञाननिवर्त्यता वक्तुं युक्ता ।" |
| | ] |
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| "text": "अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ११ ॥"
| | "lines": [ |
| | "तिर्यङ्मानुषदेवादिविष्णुरूपेष्वशक्तता ।", |
| | "यस्मिन् कस्मिंश्च विषये दुःखित्वं भिन्नताऽपि वा ॥", |
| | "प्रकृतेर्विकारिता वाऽपि च्छेदभेदव्रणादि वा ।", |
| | "अज्ञानं नाशिता वाऽपि जन्म जीवैरभिन्नता ॥", |
| | "प्रकृत्यभिन्नता वाऽपि जीवाभेदः परस्परम् ।", |
| | "जडाभेदोऽथ वा विष्णोर्मिथ्यात्वं जगतोऽपि वा ॥", |
| | "अगुणत्वमदेहत्वमकर्तृत्वं तथा हरेः ।", |
| | "सम्यग्भक्तिमृते मुक्तिर्विष्णौ तद्द्वेषतस्तथा ॥", |
| | "मुक्तावभोगो जीवानां मुक्तौ साम्यं तथैव च ।", |
| | "अरूपत्वं च जीवानां मुक्तानां बन्धिनामपि ॥", |
| | "नामतीर्थादिभिर्मुक्तिस्तत्त्वज्ञानं विनाऽपि तु ।", |
| | "विष्णोः सकाशात् प्रकृतेर्ब्रह्मणोऽनन्तरुद्रयोः ॥", |
| | "गरुडेन्द्रसूर्यविघ्नादेरग्निसोमगुहादिनाम् ।", |
| | "प्रद्युम्नस्यानिरुद्धस्य देवविप्रादिनामपि ॥", |
| | "यैः कैश्चापि गुणैर्विष्णोः सकाशाद्वरता तथा ।", |
| | "यदा कदापि यत्नैर्वा वरशापादिनाऽपि वा ॥", |
| | "तपसा वाऽप्युपायैर्वा योगज्ञानादिनाऽपि वा ।", |
| | "साम्यं वा विष्ण्वधीनत्वादन्यथैषां स्थितिः कृतिः ॥", |
| | "असंसारित्वमेषां वाऽप्येषामीश्वरताऽपि वा ।", |
| | "विना विष्णुप्रसादेन मुक्तिरेषां सकाशतः ॥", |
| | "विष्णोः प्रयोजनावाप्तिर्विष्णोर्दोषश्च कश्चन ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १२ ॥"
| | "lines": [ |
| | "विष्णोः सर्वेषु रूपेषु सम्पूर्णगुणहीनता ।", |
| | "भेदो वा विष्णुरूपेषु विशेषो वा गुणेषु च ॥", |
| | "श्रियः सकाशादाधिक्यं ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ।", |
| | "ब्रह्मवाय्वोरनन्तस्य रुद्रस्य गरुडस्य च ॥", |
| | "तेभ्यश्चैवेन्द्रसूर्यादेर्विप्रभूपादिनां ततः ।", |
| | "बद्धानां मुक्तिगानां वा दैत्यानां मोक्ष एव च ॥", |
| | "सर्वं मोहार्थमुद्दिष्टं वेदेषु हरिणाऽपि वा ।", |
| | "ब्रह्मणा वाऽथ रुद्रेण देवैश्च मुनिभिस्तथा ॥", |
| | "यथा सुराणां सज्ज्ञाने तात्पर्यं सर्वदा श्रुतेः ।", |
| | "तथा दुर्ज्ञानजनने तात्पर्यमसुरेषु च ॥", |
| | "एवमेव च देवानां विष्णुब्रह्मादिनामपि ।", |
| | "विष्णोः सर्वगुणैः पूर्तिरपि मत्स्यादिरूपिणः ॥", |
| | "अजेयत्वमभेद्यत्वमच्छेद्यत्वं च सर्वशः ।", |
| | "सर्वावताररूपाणामपि चित्सुखरूपता ॥", |
| | "श्रीब्रह्मरुद्राद्याधिक्यं सर्वेशत्वं स्वतन्त्रता ।", |
| | "सर्वशक्तिस्तत्प्रसादान्मोक्षो ब्रह्मादिनामपि ॥", |
| | "तद्भक्त्यैव विमोक्षश्च भेदो जीवेशयोरपि ।", |
| | "श्रीब्रह्मरुद्रशक्रादेः क्रमेणैव निजा गुणाः ॥", |
| | "सर्वदोषव्यपेतत्वं विष्णोः सर्वत्र सर्वदा ।", |
| | "एतत्सर्वं सर्ववेदैर्विष्ण्वाद्यैर्देवतागणैः ॥", |
| | "ऋषिभिः क्षत्रियाद्यैश्च सम्यक्तात्पर्यतः सदा ।", |
| | "उक्तं सर्वेषु शास्त्रेषु तस्माद् ग्राह्यं बुभूषुभिः ॥", |
| | "इदं सत्यमिदं सत्यमिदं सत्यं न संशयः ।", |
| | "कोटिभिः शपथैश्चापि निर्णीतं देवतागणैः ॥", |
| | "अनादिकालतश्चायं शास्त्रार्थो नान्यथा क्वचित् ।", |
| | "पुनश्चानन्तकालीन एष एव न संशयः ॥", |
| | "ज्ञातव्यश्चैष एवार्थः सर्वदैव बुभूषुभिः ।", |
| | "एवं तु स्थिरया बुद्ध्या ज्ञात्वा यास्यथ तत्परम् ॥", |
| | "एवं ते हंसरूपेण विष्णुना देवतागणाः ।", |
| | "ब्रह्माद्या बोधिताः सर्वे तथा ज्ञात्वा परं गताः ॥", |
| | "साक्षाद्विष्णुर्हंसरूप उक्त्वैवं तु दिवौकसाम् ।", |
| | "वासुदेवाख्यरूपेण तेन सर्वहृदि स्थितः ॥", |
| | "सङ्कर्षणाख्यरूपेण विवेशानन्तमेव च ।", |
| | "तं ध्यायति सदाऽनन्तस्तस्मान्मुक्तिपदेच्छया ॥", |
| | "प्रद्युम्नाख्येन रूपेण काममेव विवेश सः ।", |
| | "हंसस्तद्ध्यानतो मुक्तिं काम इच्छति सर्वदा ॥", |
| | "अनिरुद्धाख्यरूपेण सोऽनिरुद्धं विवेश ह ।", |
| | "हंसस्तद्ध्यानतो मुक्तिमनिरुद्धस्तथेच्छति ॥", |
| | "इत्यादि ब्रह्माण्डपुराणे तत्त्वनिर्णयगीतायाम् ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "text": "इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सन्न व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत । क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात् क्षत्रात् परं नास्ति । तस्मात् ब्रह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मेवान्तत उप निःश्रयति स्वां योनिं य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयां सं हिंसित्वा ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अयं आत्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं आत्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥"
| | "lines": [ |
| | "विष्णोर्ब्राह्मणजातिः सन् ब्रह्मा जज्ञे चतुर्मुखः ।", |
| | "इतोऽग्रे जगतस्तस्मात् क्षत्रजातिरजायत ॥", |
| | "वायुः सदाशिवोऽनन्तो गरुडः शक्र एव च ।", |
| | "कामश्च वरुणश्चैव सोमसूर्यौ यमस्तथा ॥", |
| | "एवमाद्याः क्षत्रियास्तु देवानां ब्रह्मनिर्मिताः ॥", |
| | "श्रेयसी सर्वजातिभ्यः क्षत्रजातिरिति श्रुतिः ।", |
| | "नैव क्षत्रात् परा जातिर्ब्रह्मजातिं विना क्वचित् ॥", |
| | "ब्राह्मणाच्च परो राजा राजसूयाश्वमेधयोः ।", |
| | "उपास्ते राजसूयेऽतो ब्राह्मणो राजसूयिनम् ॥", |
| | "आसीन आसनाधस्तात् तथाऽपि ब्राह्मणो गुरुः ।", |
| | "तस्मात् स राजसूयान्ते ब्राह्मणान् वन्दयीत च ॥", |
| | "यः क्षत्रियो ब्राह्मणहा पितृहा स प्रकीर्तितः ।", |
| | "पापीयानेव भवति हत्वा स्वपितरं यथा ॥ इति वामने ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।\nतद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वतोऽधिकगुणं हत्वा साक्षाच्च पितरं पुनः ।", |
| | "क्षत्रस्य ब्राह्मणं हत्वा तावान् दोषो भवेद् ध्रुवम् ॥ इत्याग्नेये ।" |
| | ] |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।\nतदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।\nदध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "ईशानो मारुतः प्राणो वायुर्जिष्णुस्तथैव च ।", |
| | "धृष्णुश्च पवमानश्च पवनश्चेति कथ्यते ॥ इति शब्दतत्त्वे ।" |
| | ] |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।\nतदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।\nदध्यङ् ह वा मधु प्रवोचदृतायं त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "मृत्युः सङ्कर्षणः शेषः शेताऽनन्तस्तथैव च ।", |
| | "बलिर्महाविषश्चेति भूधरश्चेति कथ्यते ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।\nदपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥\nइति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरि शयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "इन्द्रः सुपर्णो गरुडो महाभारो धुरन्धरः ।", |
| | "विश्वजिच्चाप्यवध्यश्च वैनतेयश्च कथ्यते ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।\nतदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।\nरूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥\nइत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "पर्जन्यो मघवांश्चैव पुरुहूतः पुरन्दरः ।", |
| | "प्राचीनबर्हिर्हर्यश्वः सोमपो मेषभुक्तथा ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे ।" | | "lines": [ |
| | "यशोनिधिर्ब्राह्मणस्तु तद्दातुं क्षत्रिये स्वयम् ।", |
| | "अधो ब्राह्मण आसीनो राजसूये हि सेवते ॥ इति प्रत्यये ।" |
| | ] |
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| "text": "वंशब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "ऋच्छति विनाशयति । रीङ्ग् क्षये इति धातोः ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।\nगौपवनः पौतिमाष्यात् ।\nपौतिमाष्यो गौपवनात्।\nगौपवनः कौशिकात् ।\nकौशिकः कौण्डिन्यात् ।\nकौण्डिन्यः शाण्डिल्यात् ।\nशाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ।\nगौतमः आग्निवेश्यात्॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "आग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्च अनभिम्लाताच्च ।\nअनभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमात् ।\nगौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्यां ।\nसैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् ।\nपाराशर्यो भारद्वाजात् ।\nभारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च ।\nगौतमो भारद्वाजात्।\nभारद्वाजः पाराशर्यात्, ।\nपाराशर्यो बैजवापायनाद् बैजवापायनः ।\nकौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमिषं वै पूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "धृतकौशिकात् धृतकौशिकः।\nपाराशर्यायणात् पाराशर्यायणः ।\nपाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् जातूकर्ण्यः ।\nआसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः ।\nऔपबन्धनेरौपबन्धनिः ।\nआसुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाज\nआत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः।\nमाण्टिर्गौतमात् ।\nगौतमो वात्स्यात् ।\nवात्स्यः शाण्डिल्यात् ।\nशाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात्।\nकैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्।\nकुमारहारितो गालवात् ।\nगालवो विदर्भीकौण्डिन्यात् ।\nविदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात्, ।\nवत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः ।\nसौभरो अयास्यात् आङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् ।\nआभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् ।\nविश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्याम् ।\nअश्विनौ दधीच आथर्वणात् ।\nदध्यङ् आथर्वणोथर्वणो दैवाद्।\nअथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् ।\nमृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्।\nप्रध्वंसन एकऋषेः ।\nएकऋषिर्विप्रचित्तेः ।\nविप्रचित्तिः व्यष्टेः ।\nव्यष्टिः सनारोः ।\nसनारुः सनातनात् ।\nसनातनः सनकात् ।\nसनकः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो।\nब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "विवस्वदिन्द्रवरुणविष्णुभ्योऽन्ये दितेः सुताः ।", |
| | "रुद्रादन्ये तथा रुद्रा वायोरन्ये च वायवः ॥॥", |
| | "अग्नेरन्ये च वसवो वैश्या इत्येव कीर्तिताः ।", |
| | "एक एव हरेर्जातः परिवारविवर्जितः ॥॥", |
| | "वाय्वादीन् क्षत्रियान् सृष्ट्वा पुनरल्पपरिग्रहः ।", |
| | "इच्छन् बहुपरीवारं वैश्यान् देवान् ससर्ज ह ॥॥", |
| | "ततो बहुतरानिच्छन् शूद्रान् देवान् ससर्ज ह ।", |
| | "अश्विनौ पृथिवी चैव काला मृत्यव एव च ॥ ॥", |
| | "शूद्रदेवाः समुद्दिष्टा देववर्णा इति स्मृताः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C02", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "पाराशर्यो जातुकर्ण्यः पराशरसुतावुभौ ।\nविप्रायामेव भार्यायां तृतीयः कृष्ण एव च ॥ इति ब्रह्माण्डे ।\nपरस्य ब्रह्मणो विष्णोर्हयशीर्षादधीतवान् ।\nब्रह्मविद्यामिमां ब्रह्मा ततः सनक एव च ॥ इति गारुडे ॥" | | "lines": [ |
| | "स नैव व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात् परं नास्त्यथो अबलीयन् बलीयां समाशंसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वैतत् तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "id": "Bruhadaranyaka-242", | | "id": "Bruhadaranyaka-242", |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": null, |
| "text": "आश्वलब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "स्रष्टा स्वयं समुद्दिष्टः पालका देवता इमाः ॥ ॥", |
| | "धारणं कथमस्य स्याद्गतिश्चास्य कथं परा ।", |
| | "इति मत्वा हरेर्भक्तिर्धर्मरूपं पुनर्विभुः ॥॥", |
| | "प्राणिनां धैर्यरूपं च वायो रूपान्तरं पुनः ।", |
| | "ससर्ज मतिमान् ब्रह्मा विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥॥", |
| | "तस्माद् वायोः परो नास्ति ऋते विष्णुं सनातनम् ।", |
| | "शेषादीनां क्षत्रियाणां वायुरेवाधिपः स्मृतः ॥॥", |
| | "धारणाद्धर्म इत्याहुर्वायुर्धारयति प्रजाः ।", |
| | "अबलोऽपि ततो वायोर्विष्णुभक्त्यादिरूपिणः ॥", |
| | "प्राप्तुमिच्छति युक्तः सन् विष्णुं सुबलवत्तरम् ।", |
| | "यथैव युवराजेन महाराजमभीप्सति ॥॥", |
| | "प्राप्तुं धर्माभिमानी स वायुः सत्याभिमानवान् ।", |
| | "तस्मादाहुर्धर्मविदं सत्यं वेत्तेति वेदिनः ॥", |
| | "सत्यज्ञमथ धर्मज्ञं वायुर्देवो यतस्तयोः ॥ इति नारदीये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "id": "Bruhadaranyaka-243", | | "id": "Bruhadaranyaka-243", |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानां अनूचानतमः इति स ह गवां सहस्रमवरुरोध दश दश पादाः एकैकस्याः शृंगयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवत् ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यश्शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्यां रूपाभ्यां ब्रह्माभवदथ यो ह वा अस्माल्लोकात् स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽनूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवं विन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-244", | | "id": "Bruhadaranyaka-244", |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सौम्योदज सामश्रवा३ इति ता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होता आश्वलो बभूव । सहैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "नैव व्यभवदिति परिवारबहुत्वेन यद्विशिष्टत्वं तन्नाभवदित्यर्थः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-245", | | "id": "Bruhadaranyaka-245", |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्युनाऽऽप्तं सर्वं मृत्युनाऽभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाऽग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "बृहत्वात् सर्ववर्णानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ।", |
| | "क्षतत्राणात् क्षत्रियश्च त्रिषूनत्वाद् विशः स्मृताः ॥", |
| | "ऊनवाची हि विट्शब्दः शुभे दत्ते त्रिभिर्यतः ।", |
| | "रमते स ततः शूद्रः स ब्राह्मण्याभिमानवान् ॥", |
| | "ब्रह्माऽग्निना सहैवास्ते देवेष्वथ नरेषु च ।", |
| | "ब्राह्मणेन सहैवास्ते ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ॥", |
| | "क्षत्रजात्यभिमानी तु पवनो देवराजभिः ।", |
| | "सुपर्णशेषरुद्राद्यैर्मानुषेषु च राजभिः ॥", |
| | "वैश्यजात्यभिमानी च नासिक्यो वायुरूर्जितः ।", |
| | "वस्वादिभिः सहैवास्ते देवेष्वथ नरेषु च ॥", |
| | "विड्भिः शूद्राभिमानी च निर्ऋतिर्देवतासु च ।", |
| | "नासत्ययोः पृथिव्यां च शूद्रेष्वेव तु मानुषे ॥", |
| | "यस्मादग्नौ विशेषेण ब्रह्मणः सन्निधिर्भवेत् ।", |
| | "अतोऽग्नावेव देवानां सर्वेषां नियमाद्धविः ॥", |
| | "हुत्वा लोकान् प्रार्थयन्ति तथा विप्रेषु मानुषे ।", |
| | "सर्वजात्युत्तमो ब्रह्मा यतो विप्राग्निसंस्थितः ॥", |
| | "तस्माद्विप्रांस्तथैवाग्निं तर्पयेद्ब्रह्मतुष्टिकृत् ।", |
| | "तुष्टे ब्रह्मणि विष्णुश्च तुष्टो लोकान् प्रदास्यति ॥", |
| | "अग्निविप्रार्चकोऽप्येवं यो न वेद, हरिं परम् ।", |
| | "आश्रयं सर्वजीवानां हरिस्तं नैव भोजयेत् ॥", |
| | "यथाऽनधीतो वेदस्तु यथा कर्माकृतं तथा ।", |
| | "न सम्यक् फलदो विष्णुरज्ञातो जगदीश्वरः ॥", |
| | "यद्यवेत्ता महदपि हयमेधादिकं हरेः ।", |
| | "कुर्यात् क्षयिष्णुफलवान् स भवेन्नात्र संशयः ॥", |
| | "आप्तकामतयाऽत्मेति यो विष्णुः समुदीरितः ।", |
| | "सर्वाश्रयमुपासीत तमेव पुरुषं सुधीः ॥", |
| | "विष्णुं सर्वाश्रय इति सदोपास्ते य आत्मवान् ।", |
| | "क्षीयन्ते नास्य कर्माणि शुभान्येव कदाचन ॥", |
| | "उपासनाबलान्मुक्तो भोगान् कर्मफलान् सदा ।", |
| | "भुङ्क्ते विष्णोः समीपस्थः सर्वदोषविवर्जितः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तं सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणार्त्विजा चक्षुषाऽऽदित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "एताभ्यां रूपाभ्यां सहितं हि ब्रह्माऽभवत् । स्वं लोकं स्वाश्रयम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-247", | | "id": "Bruhadaranyaka-247", |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं पूर्वपक्षमपरपक्षाभ्यामाप्तं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षायोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेनर्षिणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवं हैवं विदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमांसितम् ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "योऽयं सर्वेषु जीवेषु नियामकतया स्थितः ।", |
| | "स विष्णुराप्तकामत्वादात्मेत्येवोच्यते बुधैः ॥", |
| | "स लोकः सर्वभूतानां सर्वजीवेषु संस्थितः ।", |
| | "वैश्वदेवादिकान् होमान् यज्ञांश्च कुरुते विभुः ॥", |
| | "कारुण्यात् सर्वदेवेषु तेन देवाश्रयो हरिः ।", |
| | "ऋषीणामाश्रयश्चापि स्वाध्यायेष्वषिसंस्मृतेः ॥", |
| | "स हि जीवेषु सन्दिष्टः पिण्डं पुत्रजनिं तथा ।", |
| | "यत्करोति पितॄणां च संश्रयस्तत एव सः ॥", |
| | "तृणोदकादिदानेन पशूनामन्नतो नृणाम् ।", |
| | "उपकाराच्च सर्वेषां प्राणिनामाश्रयो हरिः ॥", |
| | "यज्ञादीन् देवतादीनामन्नत्वेन पुरैव यत् ।", |
| | "ब्रह्माद्यैरर्थितः प्रादात् क्षीराब्धेस्तट उत्तरे ॥", |
| | "अतश्च सर्वलोकानामाश्रयो विष्णुरेव सः ।", |
| | "एवं यो वेत्ति विष्णोस्तु सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥", |
| | "सर्वाण्यपि हि भूतानि तस्येच्छन्त्यविनाशिताम् ।", |
| | "स्वाश्रयस्य यथा नित्यमनाशं प्रार्थयन्ति हि ॥", |
| | "राजादेरपि तान्येवमुत्तमाश्रयवेदिनः ।", |
| | "तदेतद्वासुदेवस्य सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥", |
| | "विदितं सर्ववेदैश्च मीमांसाभिश्च निश्चितम् ॥", |
| | "इति भविष्यत्पर्वणि ।" |
| | ] |
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| "text": "होतर्यग्नौ वाचि चैव यो विष्णुं मुक्तिदं स्मरेत् ।\nनित्यं स मुच्यतेऽध्वर्युसूर्यचक्षुष्षु यः स्मरेत् ॥\nअधिकः प्रकाश एवास्य मुक्तावन्येभ्यः इष्यते ।\nमुक्तेभ्योऽपि तथोद्गातृवायुप्राणेषु यः स्मरेत् ॥\nपूर्णचंद्रं सदा पश्येदधिकाह्लादसंयुतः ।\nमनोब्रह्मनिशेशेषु यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ॥\nअप्रयत्नेन लोकं स विष्णोर्याति न संशयः ।\nहोत्रग्न्यादीनि नामानि विष्णोः सर्वाणि मुख्यतः ॥\nतत्सम्बन्धात् तदन्येषां स वै होत्रादिकर्मकृत् ।\nतस्माद्धोत्राग्निवागादेरैक्यं श्रुतिषु चोच्यते ॥\nहोत्रादिषु चतुर्ष्वेष वासुदेवादिरूपधृक् ।\nव्यवस्थितो हि तज्ज्ञानादचिरान्मुक्तिमेष्यति ॥\nमुक्तिनामा स भगवान् मोक्षदत्वात् प्रकीर्तितः ।\nमनुष्येभ्योऽधिकसुखं देवेभ्यो यत्प्रयच्छति ॥\nमुक्तावप्यतिमोक्षः स तेन देवः प्रकीर्तितः ।\nएता ह्युपासना नित्यं नैव योग्या नृणां श्रुताः ॥\nअतिमुक्तिप्रदा यस्माद्देवाद्यास्तासु योगिनः ॥" | | "lines": [ |
| | "किन्तु ब्रह्मादिभिर्देवैः पुरा दृष्ट्वा निरंहसः ।", |
| | "निर्भयान् विष्णुनाम्नैव यथेष्टं पदमागतान् ॥", |
| | "अलब्ध्वा चात्मनः पूजां सम्यगाराधितो हरिः ।", |
| | "मया चास्मादपि श्रैष्ठ्यं वाञ्छताऽहङ्कृतात्मना ॥", |
| | "ततः साक्षाज्जगन्नाथः प्रसन्नो भक्तवत्सलः ।", |
| | "अंशाशेनात्मनैवैतान् पूजयामास केशवः ॥", |
| | "देवान् पितॄन् द्विजान् हव्यकव्याद्यैः करुणामयः ।", |
| | "ततः प्रभृति पूज्यन्ते त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ इति च पाद्मे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथ सम्पदः याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्रः इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्यजतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छंश्च नातो भूयो विन्देत् तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्योकृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवं श्रोत्रेण हि तच्छ्रुणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥११॥ ॥ इति अव्याकृतब्राह्मणम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "याज्याशस्यापुरोवाक्यासंस्थितं यो हरिं स्मरेत् ॥\nसर्वप्राणभृतामीशः स भवेन्नात्र संशयः ॥" | | "lines": [ |
| | "एको नारायणः पूर्वमासीज्जायां स ऐच्छत ।", |
| | "विद्यमानामपि सदा भोगार्थं पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "नित्यत्वेऽप्युभयोर्देवोऽवियुक्तस्तु तया यदा ।", |
| | "एक इत्युच्यते देव्या रममाणः सुतं विभुः ॥", |
| | "ऐच्छद्ब्रह्मा ततो जज्ञे ततो देवांश्च सर्वशः ।", |
| | "जाते पुत्रे वित्तमैच्छद्भूतान्यण्डं ततोऽभवत् ॥", |
| | "अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः कुर्यां कर्मेति चैच्छत ।", |
| | "ततस्तु कृतवान् यज्ञं स्वस्मै स पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "आहुरात्मेति तं देवं पूर्णत्वाद्विष्णुमव्ययम् ।", |
| | "तस्मादद्यापि यः कामी स ह्येतावन्तमिच्छति ॥", |
| | "दैवं वित्तं सुखाद्यं हि मित्राद्यं मानुषं तु यत् ।", |
| | "इदानीमपि तस्माद्धि कामयेदेवमेव तु ॥", |
| | "यः कश्चित् पुरुषो वाऽपि तद्वैकल्यादकृत्स्नवान् ।", |
| | "एकाकिनोऽप्यवैकल्यं यथैव स्यात् तथा शृणु ॥", |
| | "स्वात्मनस्त्वपृथग्यत्तज्ज्ञानरूपं मनः परम् ।", |
| | "मुक्तावपि न हेयं यत्तत्स्वात्मेत्येव चिन्तयेत् ॥", |
| | "जायां तु तादृशीं वाचं बलं तादृक्स्वमात्मजम् ।", |
| | "श्रोत्रं चक्षुश्च तादृग्यद्वित्तं दैवं च मानुषम् ॥", |
| | "एवम्भूतं चिन्तनं यत्तत्कर्मेत्येव चिन्तयेत् ।", |
| | "एतत्षट्कं च हरये सर्वेशाय समर्पयेत् ॥", |
| | "एवमात्मा प्रिया पुत्रो वित्तं द्विविधमित्यपि ।", |
| | "पञ्चभिः क्रियते यज्ञः पुरुषः पशुरेव च ॥", |
| | "मातापितृभ्यामन्नेन तयोः पूर्वेण कर्मणा ।", |
| | "जन्यस्य कर्मणा चैव साध्यः पञ्चभिरेव तु ॥", |
| | "एवं हि प्राणिनोऽन्येऽपि जायन्ते नात्र संशयः ।", |
| | "एतामुपासनां कुर्याद्यो ब्राह्मं पदमाप्य च ॥", |
| | "सर्वस्यास्य पतिर्भूयाद्विष्णोरेव प्रसादतः ।", |
| | "ब्राह्मे पदे त्वयोग्या ये ते देवपदमाप्नुयुः ॥", |
| | "तस्याप्ययोग्या लोकस्य भवेयुरधिकं प्रियाः ।", |
| | "क्रमान्मुक्तिं व्रजेयुश्च केशवस्य प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अविशेषेण ततोऽन्यत् स्यादितीच्छन्नपि न विन्देत् । ततोऽन्यस्याभावात् ।" |
| | ] |
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| "text": "उज्ज्वलच्छब्दवद्द्राविष्वेकमेव हरिं स्मरेत् ॥\nसर्वलोकाधिपत्यं स लभते पुरुषोत्तमात् ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मा मनश्चिन्तनं च शेमुषी बुद्धिरित्यपि ।", |
| | "एकार्थवाचका धीश्च मनीषा तप इत्यपि ॥ इति शब्दतत्त्वे ।" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥"
| | "lines": [ |
| | "सर्वाश्रयं च पितरं सर्वेषामधिकं गुणैः ।", |
| | "अविदित्वा महत्पुण्यं कृत्वा न फलभाग् भवेत् ॥", |
| | "तथा ज्ञात्वा हरिं यस्तु कुर्यात् कर्म सदोदितम् ।", |
| | "अनन्तफलवान् स स्यात् प्राप्नोति च मनोगतम् ॥ इति बृहच्छ्रुतौ ।" |
| | ] |
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| "text": "मनसो देवता ब्रह्मा सर्वदेवेषु संस्थितः ॥\nदेवब्रह्ममनस्स्वेकं यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ।\nअनन्तनामकं तेन तल्लोकं नित्यमश्नुते ॥\nनिश्चयेन विमोक्ष्यत्वाद्विश्वे देवा अनन्तकाः ।\nअनन्तनामकं विष्णुमुपास्यापि ह्यनन्तकाः ॥" | | "lines": [ |
| | "परमात्मैव गृहस्थान्तर्यामित्वेन सर्वेषां लोक आश्रयः ।", |
| | "गृहस्थान्तर्गतो विष्णुर्यज्ञैर्देवाश्रयो भवेत् ।", |
| | "स्वाध्याये ऋषिसंस्मृत्या ऋषीणां च सदाश्रयः ॥", |
| | "स्वाध्यायाच्छ्राद्धतश्चैव पितॄणामन्नदानतः ।", |
| | "मनुष्यादेरतो वेत्ति य एवं सततं गृही ॥", |
| | "स्वस्यान्तर्यामिणं विष्णुं सुरादीन् पूजयेत् तथा ।", |
| | "तस्याविनाशमिच्छन्ति स्वाश्रयस्य यथा सुराः ॥", |
| | "तदेतत् सर्वशास्त्रेषु ऋषिसङ्घैर्विचारितम् ॥ इति नारायणश्रुतौ ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्या अपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ततो ह होता आश्वल उपरराम ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "नराणामाश्रया देवा न देवानां नराः क्वचित् ।", |
| | "नराणां च सुराणां च गतिरेको जनार्दनः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "पुरोवाक्यादिषु प्राणादिषूपासां करोति यः ।\nएकमेव हरिं लोकव्याप्तिमेव लभेदसौ ॥\nअत्रापि वासुदेवाद्याश्चत्वारो देवताः स्मृताः ।\nदेवानां पदहेतुत्वात् सम्पन्नाम्न्य उपासनाः ॥\nमुक्तौ भोगविशेषस्य हेतुत्वाच्च प्रकीर्तिताः ।\nएताश्च देवतायोग्या न मनुष्येषु कुत्रचित् ॥\nमनुष्याणां ज्ञानमात्राद् गुणाधिक्यं भविष्यति ॥इति परमश्रुतौ ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मा ब्रह्मा ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "आत्मा तु जगतां ब्रह्मा तस्यात्मा भगवान् हरिः ।", |
| | "स एव जातः प्रथमं वासुदेवाच्चतुर्मुखः ॥", |
| | "सोऽकामयत भार्या मे स्यात् पुत्रस्तदनन्तरम् ।", |
| | "ततो वित्तं मम स्याच्च कर्म कुर्यां ततो हरेः ॥", |
| | "इति सोऽपि न तान् प्राप ततोऽपूर्णत्वमात्मनः ।", |
| | "मत्वा पूर्णत्वसिद्ध्यर्थं भार्यां वाचमकल्पयत् ॥", |
| | "प्राणं पुत्रं तथा वित्तं चक्षुर्बाह्यमथान्तरम् ।", |
| | "ज्ञानाख्यं श्रोत्रमेवासौ कर्म स्वात्मानमेव तु ॥", |
| | "एवं स मानसे यज्ञे त्वयजत् केशवं विभुम् ।", |
| | "ततोऽस्य वाचः सम्भूता भार्या तस्य सरस्वती ॥", |
| | "पुत्रः प्राणादभूर्द्वायुर्दिशो लोका हिरण्मयाः ।", |
| | "तस्यापरोक्षतां यातो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "सर्वविद्या ददौ ताश्च श्रोत्रेण जगृहे विभुः ।", |
| | "आत्मना सर्वकर्माणि चकार भगवत्परः ॥", |
| | "पुराऽऽसीन्मन एवास्य तेनेदं पञ्चकं विभुः ।", |
| | "अवाप कर्मपर्यन्तं देहान्तात् पञ्चकात् स्वयम् ॥", |
| | "तस्मादद्यापि यो विद्वानुपास्ते पञ्चकं तथा ।", |
| | "विष्णूपकरणत्वेन स इदं सर्वमाप्स्यति ॥", |
| | "मुक्तिश्चान्ते भवत्यस्य पञ्चानां देवतां हरिम् ।", |
| | "नारायणं वासुदेवं तथा सङ्कर्षणं विभुम् ॥", |
| | "प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च स्मरतो नित्यमेव तु ।", |
| | "सवनत्रयं तथा पूर्वमुत्तरं चेति पञ्चकम् ॥", |
| | "यज्ञे मध्यं शिरः पक्षौ पुच्छं पशुषु पूरुषे ।", |
| | "चतुर्दिशं तथा मध्यमिति सर्वत्र पञ्चकम् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "brahmanam", |
| "text": "आर्तभागब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "सप्तान्नब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| |
| "text": "अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥"
| |
| },
| |
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| "text": "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वै तामक्षितिं वेद । सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥" | | "lines": [ |
| | "पिता विष्णुः । यत् यदा । तपसा प्राणिनां कर्मभिः । मेधया स्वेच्छया ।" |
| | ] |
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| "text": "जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिः इति वचनात् ।" |
| | ] |
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| "text": "चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पितैकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते । स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रं ह्येतत् ॥ २ ॥" |
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| "text": "श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च । तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्रजुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् ॥३॥" |
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| "text": "मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति । तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाऽग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वाऽनुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदपपुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति ॥५॥" |
| | ] |
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| "text": "त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "कस्मात् तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति । पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥" | | "lines": [ |
| | "यो वैतामक्षितिं वेदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात् क्षीयेत ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनात्त्येतत् स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीभीरित्येतत् सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि नः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वाऽयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "सप्तान्नानि यदा विष्णुः परमः पुरुषो विभुः ।", |
| | "ससर्ज तेषां स्वार्थानि चकार त्रीणि केशवः ॥", |
| | "मनो वाचं तथा प्राणं तस्मात् तैस्तुष्टिमेति सः ।", |
| | "तस्मात् तद्भक्तिकामः स्यात् सङ्कल्पं तत्कृतिं प्रति ॥", |
| | "कुर्यात् तद्वेदनेच्छां च श्रद्धां तस्य गुणोन्नतौ ।", |
| | "अश्रद्धामन्यसाम्ये वाऽप्यन्येषामुन्नतौ ततः ॥", |
| | "अन्येषां तत्स्वरूपत्वे प्राकृतत्वादिकेऽस्य च ।", |
| | "धृतिं तन्निन्दिवागादौ प्राप्ते तत्रैव चाधृतिम् ॥", |
| | "तन्मतस्य विसर्गार्थे ह्रियं तद्भक्तिवर्जने ।", |
| | "तद्विवेके धियं चैव तदज्ञाने भियं तथा ॥", |
| | "वाचं नित्यं तद्गुणोक्तौ प्राणं तत्कर्मणि स्फुटम् ।", |
| | "तदन्यकर्मसन्त्यागे चापानं व्यानमस्य च ॥", |
| | "विरोधिनां निरासित्वेऽथोदानं योगधारणे ।", |
| | "मनोवागादीन्द्रियाणां समानं नियमेऽत्र तु ॥", |
| | "अन्नमुक्तेषु सुस्थैर्ये नरः कुर्यात् सदैव हि ।", |
| | "अनेकगोचरेच्छा स्यात् काम एकाश्रये स्थितः ॥", |
| | "प्राणः प्रवृत्तिहेतुः स्यादपानस्तु निवर्तने ।", |
| | "बलकर्मा तथा व्यान उदानो योगकर्मकृत् ॥", |
| | "देहेन्द्रियमनोनेता समानो नः स्थितिप्रदः ।", |
| | "मनोवाक्प्राणसान्निध्यप्राधान्याज्जीव उन्नतिः ॥", |
| | "मनोवाक्प्राणरूपोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "मनोवाक्प्राणतस्तस्य जाता अन्येऽभिमानिनः ॥", |
| | "ब्रह्मा सरस्वती वायुर्मनआद्यभिमानिनः ।", |
| | "सर्वस्यान्तः स्थितं विष्णुमायत्ता वाग्घि नः सदा ॥", |
| | "सर्ववाचश्च घोषाश्च विष्णोर्नामेति कीर्तिताः ।", |
| | "तज्ज्ञानां तत्फलं च स्यादज्ञानां तत्फलं न तु ॥", |
| | "सर्वेन्द्रियगतं ज्ञानं मनआयत्तमीरितम् ।", |
| | "पृष्टे स्पृष्टोऽप्यनेनाहं स्पृष्ट इत्येव वेत्त्यतः ॥", |
| | "मनस्यव्याकुलेऽन्यत्र नैव वेत्ति कथञ्चन ॥" |
| | ] |
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| "text": "आकाशं परमात्मानमेव ।" | | "lines": [ |
| | "त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| "text": "भुज्युब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥११॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्यक्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतंजलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति । तं यदा लोकानामन्तान् अपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवाः मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "पारीक्षिताः प्रद्युम्नाः ।" | | "lines": [ |
| | "पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिंद्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत् तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद् यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्मात् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्धि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अश्वमेधयाजिन इंद्राः ।" | | "lines": [ |
| | "यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| |
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| "text": "अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तर य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यः समानेन समानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वाऽवति ॥ १६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यत्साक्षादपरोक्षात् । साक्षादेवापरोक्षमत्ति अनुभवति स्वरूपमन्यच्च सर्वं पश्यतीति साक्षादपरोक्षात् । आपरोक्ष्येण पश्यतामप्यन्येषां भगवत्प्रसादादेव दर्शनं भवति । न भगवतोऽन्यापेक्षयेति साक्षादिति विशेषणम् । अनन्यापेक्षस्याप्यपूर्णत्वं भवतीत्यतो ब्रह्मेति । अन्येषां नियन्तृत्वं चास्तीत्यत आत्मा । अन्यनियन्तृत्वेप्यन्यापेक्षा नास्तीत्यतः सर्वान्तरः । सर्वं सामार्थ्यं स्वान्तरेवास्तीति । जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मेति । साक्षादपरोक्षत्वादिगुणैरेव भेदे सिद्धेऽपि परमार्थतोऽपि जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मा इति । तत्र प्रधानतात्पर्यज्ञापनार्थं पुनः पुनरभ्यासः ।" | | "lines": [ |
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| | ] |
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| | "तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ १७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीया न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "देवतान्तरस्यापीदं लक्षणं समानमिति पृच्छति यथा विब्रूयादित्यादिना । चतुष्पात्वादिलक्षणं गोरश्वस्यापि यथा सममेवमेव साक्षादपरोक्षत्वादिलक्षणं तत्तद्देवतावादिभिस्तस्यास्तस्या अंगीक्रियत एव । अतो विशेषनाम वक्ति । अ इति । अतोऽन्यद्विष्णोरन्यदार्तम् । अ इति विष्णोर्हि नाम । न ते विष्णो परो मात्रया इत्यादि श्रुतिप्रसिद्धं विष्णोर्लक्षणम् न दृष्टेर्द्रष्टारमित्यादिना वक्ति ।" | | "lines": [ |
| | "अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समास्सर्वेऽनन्तास्स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्ते अनन्तं स लोकं जयति ॥ १९ ॥" |
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| | "lines": [ |
| | "द्युपृथिव्यग्निसूर्यापां सोमस्याप्यभिमानिनः ॥", |
| | "स इन्द्रः परमैश्वर्यादशत्रुः समवर्जनात् ।", |
| | "वायुरेते समा व्याप्तौ ब्रह्मेरौ गुणतोऽधिकौ ॥", |
| | "अनन्ताश्च गुणा ह्येषामन्यजीवव्यपेक्षया ।", |
| | "तेभ्योऽप्यनन्ता विष्णोस्तु तेषामेवमुपासकः ॥", |
| | "नित्यलोकोपभोगी स्यादनित्यस्यान्यथा भवेत् ।" |
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| "text": "अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाच । । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तमेव मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ।\nएतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।\nया ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा । या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्मात् ब्राह्मणः पांडित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद् । बाल्यं च पांडित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तम् । ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला ध्रुवैवास्य षोडशी कला ॥ २० ॥" |
| | ] |
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| "text": "ये दव साक्षादिति पुनः प्रश्नो मुक्तानामपि भगवतो भेदोऽस्तीति ज्ञापयितुम् । यदेव ब्रह्म तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि यन्नैव भवन्ति कदाचन । तमेव मे व्याचक्ष्व मुक्तजीववैलक्षण्येन सहेति द्वितीय एव शब्दार्थः । स तु भगवान् स्वत एवातीताशनायादिरतीतानागतवर्तमानकालेषु ब्रह्मादयस्तु तं विदित्वा तत्प्रसादादेव पश्चादत्येष्यन्ति एतं वै तमित्येतादृशैर्गुणैः साक्षादपरोक्षत्वजीवभेदादिभिर्युक्तमित्यर्थः" | | "lines": [ |
| | "स रात्रिभिरेवाच पूर्यते अप च क्षीयते । सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते । तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ २१ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "गार्गिब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "वायुः प्रजापतिः सोऽसौ चन्द्रसंस्थो विशेषतः ॥", |
| | "रात्रौ रात्रौ क्षयादस्य पूरणाद् रात्रिनामकाः ।", |
| | "कलाः पञ्चदश प्रोक्ता ध्रुवैवास्य तु षोडशी ॥", |
| | "अकलोऽपि स चन्द्रस्य कलाभिः प्रोच्यते तथा ।", |
| | "सोऽमावास्यां यतो रात्रौ प्राणभृत्सु व्यवस्थितः ॥", |
| | "कल्यावेशादल्पदोषः कृकलासवधोऽपि सन् ।", |
| | "तस्यां रात्रौ महान् दोषो देवतावेशतो भवेत् ॥", |
| | "वायुः संवत्सरः प्रोक्तो वत्सो विष्णोरसौ यतः ।", |
| | "सम्यगेव रतिं याति ." |
| | ] |
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| "text": "अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी प्रपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति, कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नुखलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु चंद्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति इंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु इंद्रलोकाः ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि माऽतिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित् पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नाभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनाऽगादित्येवाहुः ॥ २२ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "मुक्तानां तारतम्यं हि गार्गिब्राह्मणेनोच्यते । लोका इति मुक्तानामानन्दानुभवाः स्वरूपभूताः । अप्सु वायाविति स्वरूपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । अनतिप्रश्नां वै देवतामतिपृच्छसीति देवतास्वरूपप्रश्नस्यैवावगम्यमानत्वाच्च । न चोपरितनलोकेषु अधस्तनलोकाः आश्रिताः । न च वायुर्गन्धर्वलोकाश्रितः । वाय्वाश्रयत्वश्रुतेः सर्वलोकानाम् । वायुना हि सर्वे लोका नेनीयन्ते इत्यादिना । सप्तस्कन्धगतो लोकान् यो बिभर्ति महाबलः इति हरिवंशेषु । न चानतिप्रश्नत्वं लोकमात्रस्यास्ति । अधस्तनेषु चोपरितना लोकास्तिष्ठन्ति । न च मरुतामेकोऽपि गन्धर्वलोकादवरो विद्यते ।" | | "lines": [ |
| | "....................... स एवं विदुषि स्थितः ॥", |
| | "अध्रुवास्तु कला यद्वत् सौम्यस्तस्य तथा धनम् ।", |
| | "आगमापायवत्त्वात् तु ध्रुवावद्देह उच्यते ॥", |
| | "नाभिस्थानं शरीरं तु चक्रस्य प्रधिवद्धनम् ।", |
| | "सर्वस्वविजयेऽप्यस्मात् प्रधिमात्रं हि गच्छति ॥", |
| | "एवं महागुणान् देवानेवं यो वेद पूरुषः ।", |
| | "न चैभ्योऽतिप्रियः कश्चिद्विष्णोरस्ति कदाचन ॥", |
| | "चतुर्थं भोज्यमेवान्नं सर्वसाधारणं स्मृतम् ।", |
| | "आत्मनोऽतिसमीपत्वं तस्य योऽन्नस्य मन्यते ॥", |
| | "अक्षयं पापमस्य स्याद्देवब्रह्मस्वहारिणः ।", |
| | "तदेवमन्त्रयुक्तत्वाद् बलिहोमात्मना द्वयम् ॥", |
| | "देवानां प्रददौ विष्णुस्तस्मान्नैवेच्छया यजेत् ।", |
| | "यदीच्छया यजेत् तेषामपहर्ता भविष्यति ॥", |
| | "देवस्वं तेन येनैव काम्यार्थं विनियोजितम् ।", |
| | "परकीयेन वित्तेन तस्मिन् विनिमये यथा ॥", |
| | "चतुष्पाद्भ्यो द्विपद्भ्यश्च पशुभ्यः पयआत्मकम् ।", |
| | "प्रायच्छत् सप्तमान्नं स गोक्षीरं मुख्यमत्र च ॥", |
| | "आत्मने चैव देवानां तद्धोमार्थं प्रकल्पितम् ।", |
| | "संवत्सरं गोपयसा येन होमो हरेः कृतः ॥", |
| | "भगवत्तत्त्वविदुषा तस्य मुक्तिर्न संशयः ।", |
| | "अदृष्टभगवद्रूपस्यैतद्दर्शनकारणम् ॥", |
| | "भगवद्दृष्टिपूतस्तु विना होमेन मुच्यते ।", |
| | "सप्तान्नसृष्टितत्त्वज्ञस्त्वेकहोमेन मुच्यते ॥", |
| | "विशेषज्ञो यतः सोऽयं भगवत्तत्त्ववेदने ।", |
| | "को नाम भगवान् विष्णुः परमानन्दरूपतः ॥", |
| | "प्राणिनां कर्मभिश्चैव स्वेच्छया च पुनः पुनः ।", |
| | "सप्तान्नं सृजते यस्मादन्नानामक्षयस्ततः ॥", |
| | "तस्मादक्षितिनामासौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "य एवमक्षितिं वेद भगवन्तं सनातनम् ॥", |
| | "अप्रयत्नेन भोगाः स्युर्यथेष्टास्तस्य सर्वदा ।", |
| | "सप्तान्नोपासनं यस्माद्देवानां योग्यमुत्तमम् ॥", |
| | "तस्माद्देवत्वमाप्नोति योग्यो देवपदस्य यः ।", |
| | "ऊर्जं देवान्नमुद्दिष्टं ऊर्जितास्तु गुणास्तथा ॥", |
| | "तदप्याप्नोति न नरा योग्या एतदुपासते ।", |
| | "ज्ञानमात्रेण देवानां सामीप्यं प्राप्नुवन्ति ते ॥", |
| | "इति नारायणीये ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अन्तर्यामिब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ २३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C01", |
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| "text": "अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माऽहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता ये वै के च यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता एतावद्वा इदं सर्वमेतस्मात् सर्वं सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः । तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात् प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात् पुत्रो मुञ्चति तस्मात् पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिंल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणाः अमृता आविशन्ति ॥ २४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "पुनस्तस्यैव सर्वनियन्तृत्वमुच्यते ।\nयोऽन्तरो यमयतीति द्वितीययशब्दो विष्णुशब्दपर्यायः ।\nअकयप्रविसम्भूमसखहा विष्णुवाचकाः ।\nएकाक्षरा अ इत्येष निर्दोषत्वाज्जनार्दनः ॥\nआनन्दत्वात् क इत्युक्तः पूर्णत्वाद्य इतीर्यते । इत्यादि शब्दनिर्णये इति स्वप्रतिज्ञातप्रकारेण ।" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मेति वेदः । स्वाध्यायादिकर्तृत्वात् पुत्रस्त्वं ब्रह्मेत्याद्युच्यते । आत्मा भवति व्यापको भवति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "पुनः पुनः कर्मकृतिर्मानुष्यजय उच्यते ।", |
| | "जन्मान्तरं विना नैव कर्मणा तत्तु युज्यते ॥", |
| | "पुत्रेण विद्यया नित्यमेकैकेनापि युज्यते ।", |
| | "उभाभ्यां किमु वक्तव्यमष्टभागफलं सुतात् ॥", |
| | "विद्यया त्वर्धमाप्नोति सर्वं सप्तान्नविल्लभेत् ।", |
| | "पुत्रमाविश्य सामर्थ्यान्मुच्यतेऽच्छिद्रकर्मणः ॥", |
| | "अक्ष्णं पुदिति च च्छिद्रं पुत्रस्तत्त्राणको भवेत् ।" |
| | ] |
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| "text": "स्यूतं जगदिदं यस्मिन् सूत्रं वायुरसौ स्मृतः ।\nतं चापि यमयेद्यस्मादन्तर्यामी हरिः स्मृतः ॥" | | "lines": [ |
| | "पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ २५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ २६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स य एवंवित् सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥"
| | "lines": [ |
| | "पृथिव्यादिस्थिता देवाः सरस्वत्यादिकास्त्रयः ॥", |
| | "अधिकावेशतो देवेष्वतो देवा इति स्मृताः ।", |
| | "यदावेशात् सर्वमुक्तं सत्यं देवी तु वाघ्धि सा ॥", |
| | "यदावेशान्न दुःखी स्यादानन्दी दैवतं मनः ।", |
| | "यदावेशात् सर्वकार्येष्वम्लानः प्राण एव सः ॥", |
| | "सर्वसामर्थ्ययुक्तः स्यान्न म्रियेत कदाचन ।", |
| | "एवं सप्तान्नविन्मुक्तस्त्रिभिराविष्ट एव तु ॥", |
| | "सर्वेषु व्याप्तिमन्वेति न दुःखी प्राणिषु स्थितेः ।", |
| | "सप्तान्नोपासनायोग्या देवा एकान्ततो हि यत् ॥", |
| | "देवांश्च पापं नाप्नोति तस्मात् पापं न तस्य तु ।", |
| | "देवा मनुष्यतामंशैराप्ता ये पुत्रतः फलम् ॥", |
| | "स्यात् तेषामेव चामुक्तेर्मुक्तानां न तु किञ्चन ।", |
| | "मुक्तानां देववागादेरावेशः सम्प्रकीर्तितः ॥", |
| | "प्राणज्ञानं यथाऽवन्ति रहस्यमिति सर्वदा ।", |
| | "एवं मुक्तस्वरूपं चाप्यवन्त्येव रहस्यतः ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः अन्तरिक्षे तिष्ठन्, अन्तरिक्षात् अन्तरो यं अन्तरिक्षं न वेद, यस्य अन्तरिक्षं शरीरं यः अन्तरिक्षमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथातो व्रतमीमांसा । प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे । तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त ।", |
| | "वदिष्याम्येवाहमिति वाग् ।", |
| | "दध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः।", |
| | "श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् ।", |
| | "एवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत् तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्धत्तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिरेऽयं वै नः श्रेष्ठो यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवं स्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद । य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुः न वेद, यस्य वायुः शरीरं यः वायुमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति ।", |
| | "चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतं स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुर्म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुस्सैषा नास्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथैष श्लोको भवति ॥", |
| | "यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति । प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ।", |
| | "तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति । यद्वा एतेऽमुं ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति ।", |
| | "तस्मादेकमेव व्रतं चरेत् प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति ।", |
| | "यद्युच्चरेत् समापिपयिषेत् तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ॥ ३० ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "उत्तमः सर्वदेवेषु प्राण एव हरेरनु ।", |
| | "चतुर्मुखस्य प्राणस्य न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥", |
| | "तस्माद् विष्णोर्व्रतस्यानु नित्यं प्राणव्रतं चरेत् ।", |
| | "हंसोपास्तिः श्वासरूपे तयोर्व्रतमुदीरितम् ॥", |
| | "हंसरूपी हि तौ देवौ श्वसोच्छ्वासप्रवर्तकौ ।", |
| | "तस्मात् प्राण्यादपान्याच्च सद्रूपं संस्मरन् सदा ॥", |
| | "नान्यस्योपासनं कुर्यात् तद्भृत्यत्वं विना क्वचित् ।", |
| | "इन्द्रियाणि ससर्जादौ वासुदेवः प्रजापतिः ॥", |
| | "अध्यात्ममिन्द्रियाण्याहुरधिदैवं तु देवताः ।", |
| | "अध्यात्ममग्निर्वाङ्ग्नामा चक्षुरादित्य उच्यते ॥", |
| | "श्रोत्रं तु चन्द्रमा नाम मनः स्थूलं तु वासवः ।", |
| | "येन यज्ञादिकं कुर्याच्छेषरुद्रविपास्तथा ॥", |
| | "मनः सूक्ष्मं ज्ञानयोग्यं शेषो व्याख्यानगोचरम् ।", |
| | "रुद्रस्तु मननाख्यं च गरुडो ध्यानगोचरम् ॥", |
| | "वायुः प्राण इति प्रोक्तो येन सर्वं नियम्यते ।", |
| | "त एते भगवत्सृष्टा व्यूदिरेऽध्यात्मसंस्थिताः ॥", |
| | "अधिदैवे ज्वलत्कर्मा वह्निः सूर्यस्तु तापकः ।", |
| | "सोमः कान्तौ वृष्टिकर्मा वासवः शेष एव तु ॥", |
| | "पञ्चरात्रप्रवृत्तीशो रुद्रस्तत्स्थक्रियापरः ।", |
| | "सर्वप्रवर्तको वायुर्ज्ञानमोक्षप्रदस्तथा ॥", |
| | "वेदप्रवृत्तिकृद्धीन्द्रस्तेऽधिदैवे च पस्पृधुः ।", |
| | "अहं श्रेयानहं श्रेयानिति तानब्रवीद्धरिः ॥", |
| | "स्वकर्म यस्त्वविश्रान्तं कुर्याच्छ्रेयान् स वः स्मृतः ।", |
| | "इति श्रुत्वा ततश्चक्रुः कर्म स्वं स्वमनारतम् ॥॥", |
| | "तानेताञ्छ्रमरूपेण प्राप ब्रह्मा प्रजापतिः ।", |
| | "श्रान्ताः स्वं भगवत्कर्म न शेकुः सर्वदेवताः ॥", |
| | "वायुं तु समशक्तित्वान्नाप ब्रह्मा प्रजापतिः ।", |
| | "तेनासौ भगवत्कर्म सर्वं च कृतवान् सदा ॥", |
| | "श्रमात् पापात्मको मृत्युर्भगवत्कर्मवर्जनात् ।", |
| | "अन्यान् देवानवापाशु नैव वायुं कदाचन ॥॥", |
| | "ते वायुं ज्ञानमैच्छन्त श्रेष्ठोऽयमिति निश्चिताः ।", |
| | "तं ज्ञात्वा तेन चाविष्टास्तद्भृत्यत्वमुपागताः ॥", |
| | "तस्मात् प्राणाश्च मरुत इत्येषां नाम संस्थितम् ।", |
| | "वायोर्देवा हि जायन्ते लयमेष्यन्ति तत्र च ॥", |
| | "तस्मान्नित्यं तद्व्रताश्च तद्व्रतोऽतो भवेत् सदा ।", |
| | "अन्यदेवव्रतारम्भं यदि कुर्यात् समापयेत् ॥", |
| | "तेनासौ वायुना साकं भगवन्तमुपेष्यति ॥ इति नारायणश्रुतौ ।" |
| | ] |
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| "text": "यः दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्यो अन्तरो यं दिशो न विदुः, यस्य दिशः शरीरं यः दिशोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "आनन्द्येव भवति । न शोचतीत्यतो मुक्त इत्यवगम्यते ॥", |
| | "॥ इति सप्तान्नब्राह्मणम् ॥ ३६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रयब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद, यस्य तमः शरीरं यः तमसोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामेतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषां सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्माऽऽत्मैकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "सहैव माति जानातीति समम् । आत्मा प्राणः । नामरूपयोरपि प्राणाधीनत्वादेकमित्युच्यते ।", |
| | "प्राणो वायुरिति प्रोक्तस्तत्पत्नी नाम भारती ।", |
| | "रूपं तु तत्सुतो रुद्रो वशे प्राणस्य तद्द्वयम् ॥", |
| | "अमृतो वायुरुद्दिष्टो नित्यज्ञानात्मकत्वतः ।", |
| | "सत्यं यथार्थवक्तृत्वाद्भारती रुद्र एव च ॥ इति ।" |
| | ] |
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| "text": "यः प्राणे तिष्ठन् प्राणाद् अन्तरो यं प्राणो न वेद, यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "रुद्रं वेदेषु च प्राणः प्रविष्टश्छादितः सदा ।", |
| | "सत्य इत्युच्यते नित्यं स्वरूपेणामृतः स्मृतः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "अजातशत्रुब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "यश्चक्षुषि तिष्ठंश्चक्षुषो अन्तरो यं चक्षुः न वेद, यस्य चक्षुः शरीरं यः चक्षुरन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वह्रदिस्थभगवद्रूपोपासनाया एव मोक्षजनकत्वसमर्थनम्" |
| | ] |
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| "text": "यः श्रोत्रे तिष्ठन् श्रोत्रादन्तरो यं श्रोत्रं न वेद, यस्य श्रोत्रं शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाच । अजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यस्त्वचि तिष्ठंस्त्वचो अन्तरो यं त्वंग् न वेद, यस्य त्वक् शरीरं यः त्वचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "अतीत्य जगद् धर्मवर्जितत्वेन स्थितत्वादतिष्ठाः । उत्तमत्वात् मूर्धा ।" |
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| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा बृहत्पाण्डुरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्तेऽहरहः सुतः प्रसूतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥" |
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| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "पृथिव्याद्या देवतास्तु देहवद्यद्वशत्वतः ।\nशरीरमिति चोच्यन्ते यस्य विष्णोर्महात्मनः ॥\nअन्तस्थो देवतानां च न विदुर्यं च देवताः ।\nप्रविष्टत्वाद्देवतास्थः सोऽन्तरः स्ववशत्वतः ॥\nबाह्यापेक्षां विना यस्तु रमते सोऽन्तरः स्मृतः ।\nअतिप्रियत्वाच्च हरेरन्तरत्वमुदाहृतम् ॥\nजीवानां स्वप्रियत्वं च विष्णुना नियतं यतः ।\nतस्य प्रियत्वं नान्येन देवस्य नियतं क्वचित् ॥\nस्वतंत्रः सन्नियन्ताऽसावन्तर्यामी ततः स्मृतः ।\nदेवतानां स्वभावोऽपि स्वरूपमपि सर्वदा ॥\nतदधीनं ततो यामी वासुदेवः प्रकीर्तितः ।\nस्वभावसत्तादातृत्वं यन्तृत्वमिति कथ्यते ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ आकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात् प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥" |
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| "text": "अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥" |
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| "text": "पूर्वं गार्ग्या जीवानामुत्तरोत्तराश्रयत्वं सर्वेषां भगवदाश्रयत्वं च श्रुतम् । न तु मूलप्रकृतेराधारत्वमाधेयत्वं वा । अतः पुनः पृच्छति । विजिगीषुकथात्वाद् ब्राह्मणानुज्ञया । स्वभर्तुर्विद्याबलं जानन्त्यपि युष्माकमयं जेतुं न शक्य इति ज्ञापयित्वा तेषामुपकारार्थं च पप्रच्छ । न च युक्त्या पूर्वमुपरता । भार्यात्वाद् भगवतोऽन्याधारत्वं नाशंक्यमित्युक्ते भीत्यैवोपरता । भगवतोऽन्याधारत्वं च सर्वाधारमूलप्रकृतेरपि भगवानेवाधार इत्युक्ते युक्तित एव निवारितं भवति । नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रित्यादियुक्तिभिश्च । अस्थूलत्वादियुक्तिभिश्च ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वयमेवापराजितबहुरूपत्वादपराजिता सेना भगवान् । जिष्णुरुत्तमः । अन्येषां जेता अन्यतस्त्यजायी ।" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवासौ अग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥" |
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| "text": "बाणस्त्वयोमयः प्रोक्तः शरो नालोऽस्य कीर्तितः इत्यभिधानम् ॥" | | "lines": [ |
| | "विषासहिः असह्यः ।" |
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| | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥ ८ ॥" |
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| "text": "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वांस्तानतिरोचते ॥९॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठा असुरीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात् प्राणो जहाति ॥ १० ॥" |
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| "text": "दीप्तेराकाशशब्दोक्ता श्रीर्हि सर्वाश्रया मता ।\nतदाश्रयः परो विष्णुः सोऽस्थूलादिगुणो मतः ॥ इति स्कान्दे ।" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥" |
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| "text": "सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽथापरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाच । अजातशत्रुर्मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति ।स य एतमेवमुपास्ते आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मनि हिरण्यगर्भे । आत्मन्वी चित्तवान् । चित्ताभिमानित्वात् तस्य ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति, नैतावता विदितं भवतीति । स होवाच गार्ग्य उप त्वा यानीति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्रसिद्धस्थूलसूक्ष्मादिवैलक्षण्याज्जनार्दनः ।\nअस्थूलादिरिति प्रोक्तो नैव स्थौल्याद्यभावतः ॥ अनावृत्तेस्तमो नास्य स्वातंत्र्यान्नाद्यते क्वचित् ।" | | "lines": [ |
| | "स्वहृदि स्थितं स्वनियामकं भगद्रूपमुपास्यैव मोक्षो भवति । देवतासु भगवन्तमुपास्य तत्तद्देवतासमीपं प्राप्य पुनः स्वहृदिस्थमुपास्यैव मोक्षो भवतीत्यतो नैतावता विदितं भवतीत्युक्तम् ।" |
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| "text": "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासाः मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृताः तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यो पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं वै तद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद् ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञापयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहन्पाण्डुरवासः सोम राजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वहृदिस्थभगवद्रूपस्य स्वस्मिन् विशेषसम्बन्धज्ञापनार्थं बृहत्पाण्डुरवास इत्याद्यामन्त्रणम् । तेभ्यो नामभ्योऽप्यस्य शरीरे विशेषसम्बन्ध इत्यतः पाणिपेषणेन जीवमुत्थापयामास भगवान् । येषां बहिरुपासनेन मोक्षस्तेषामपि ह्रद्युपासनं किञ्चित् कर्तव्यमेव ।" |
| | ] |
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| "text": "तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मंत्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाऽभूत्स, कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥" |
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| "text": "सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच । अजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् , य एष विज्ञानमयः पुरुषस् तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते तानि यदा गृह्णाति अथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग्गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्यावापृथिव्यौ श्रीभूमी केशौ सूर्यविधू मतौ ॥\nदीप्तेः पृथुत्वाज्ज्ञानाच्च तथाऽऽह्लादविधेरपि ।\nतदाधारो हरिर्नित्यं स्वातंत्र्येण प्रशासकः ॥\nआधारत्वं श्रियो यच्च तच्च विष्णोः प्रशासनात् ।\nतद्वशान्न स्वतंत्रत्वं स स्वतंत्रो हरिः सदा ॥ इति महामीमांसायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "स्वहृदिस्थेन भगवद्रूपेण विशेषसम्बन्धदर्शनार्थमेव यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूदित्यादि प्रश्नप्रतिवचनं समस्तम् । यत्र यस्मिन् परमेश्वरे विज्ञानमये एष जीवः सुप्तोऽभूत् । यत्रेत्यधिकरणभूत एव य एष विज्ञानमय इति परामृश्यते । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद इत्यादिश्रुतेः । तानि यदा परमात्मा गृह्णाति तदैतत्पुरुषो जीवः स्वपिति नाम ।" |
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| "text": "शाकल्यब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "स यत्रैत् स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जनपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यत्र परमात्मा स्वप्नया नाड्या चरति तदा जीवः उच्चावचं निर्गच्छतीव । सर्वदा महाराजवत् प्राणान् गृहीत्वा परमात्मा परिवर्तते । जीवस्तु कदाचिदेव स्वप्ने राजवदात्मानं पश्यति कदाचिद्ब्राह्मणवच्छ्वमार्जरादिवद् वा ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यदा सुषुप्तो भवति तदा न कस्यचन वेद, हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥१९॥" |
| | ] |
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| "text": "ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः ।\nमहीत्युक्तं हि माहात्म्यं महिमानो हि तन्मिताः ॥\nएवं हि महिमाशब्दस्तद्वशत्वं वदत्ययम् ।\nयत्र माहात्म्यवाची स्यान्महत्वं महिमा तथा ॥\nत्रयस्त्रिंशत्सुराणां हि परिवारास्ततः परे ।\nषण्णामेते त्रयाणां ते ते द्वयोः साधिकस्य तौ ॥\nएकस्य सोऽपि क्रमतः पराधीनस्वरूपिणः ।\nपराधीनबलाश्चैव पराधीनप्रवृत्तयः ॥\nएक एव स्वतंत्रोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।" | | "lines": [ |
| | "आनन्दस्य परमात्मनोऽतिघ्नीं समीपम् । कुमारो रुद्रः । महाराजो वायुः । महाब्राह्मणो ब्रह्मा । न हि जीवो विज्ञानपूर्वकं प्राणानां विज्ञानमादत्ते । न च सर्वप्राणलोकदेवभूतानां स्रष्टा ।" |
| | ] |
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| "text": "कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाऽग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥" |
| | ] |
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| "text": "अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥\nप्रथितं हरिमादाय वातीति प्रथिवः स्मृतः ।\nतद्भार्या पृथिवी नाम यत्तदिच्छानुसारिणी ॥\nसर्वज्ञानात् तथायुष्ट्वात् सूत्रात्मा वायुरुच्यते ।\nश्रद्धानामैव तत्पत्नी सर्वस्यान्तर्निरीक्षणात् ॥\nअन्तरिक्षमिति प्रोक्ता देवेभ्योऽधिकवीक्षणात् ।\nआदिकालस्थितो यस्मादादित्यस्तु सदाशिवः ॥\nद्यौरुमा च समुद्दिष्टा वाग्रूपा द्योतिका यतः ।\nत एते सर्वदेवेभ्यो विशिष्टास्तद्वशाः परे ॥\nनक्षत्रमिंद्र उद्दिष्टश्चंद्रः काम उदाहृतः ।\nअत्राणात् सूर्यचंद्राद्यैराह्लादाच्चैव हेतुतः ॥\nवासयन्ति जगद्यस्मादेतेऽष्टौ वसवः स्मृताः ।\nज्ञानादिषड्गुणाः षट्सु तदन्येभ्योऽधिका यतः ॥\nवसुष्वपि त एवोच्चा वींद्राद्याः पूर्वकीर्तिताः ।" | | "lines": [ |
| | "आदित्यचन्द्रविद्युत्सु भूतेष्वादर्श एव च ।", |
| | "गच्छत्पाश्चात्यशब्देन चक्षुश्छायागतं तथा ॥", |
| | "हिरण्यगर्भसंस्थं च सदोपास्य हरिं परम् ।", |
| | "तद्देवसार्ष्णितामेत्य हृद्युपास्य हरिं पुनः ॥", |
| | "मुक्तिमेत्यथ यो बाह्यान् मुक्तिमेष्यति सोऽपि तु ।", |
| | "हृदि किञ्चिदुपास्यैव विष्णुं मुक्तिमनुव्रजेत् ॥", |
| | "यानि सूर्यादिनामानि विष्णोस्तानि न संशयः ।", |
| | "तदुक्तान्येव सूर्यादिराकृष्यैवोपचारतः ॥", |
| | "विशेषेण तु सम्बन्धो यतः स्वहृदि संस्थिते ।", |
| | "जीवस्यातो न सोमादिनाम्नाऽऽहूतो हरिः परः ॥", |
| | "जीवं च वारयेत् तत्र यदा विष्णुः सनातनः ।", |
| | "स्वप्नं पश्यति जीवोऽयं यदा विज्ञानरूपिणम् ॥", |
| | "सुषुम्नासंस्थितं विष्णुमेति तत्सुप्तिमेष्यति ।", |
| | "सम्यग्ज्ञानमयाद्विष्णोरुत्थानं चाप्ययं व्रजेत् ॥", |
| | "प्राणानां चैव लोकानां देवानां प्राणिनामपि ।", |
| | "सत्यसत्यो हरिः स्रष्टा पाता विलयकृत् तथा ॥", |
| | "नियन्ता मोक्षदश्चैव विष्णुरेव सनातनः ॥", |
| | "इति नारायणश्रुतौ ॥" |
| | ] |
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| "text": "कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "शिशुब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥\nबृहस्पतिरिति ह्येते रुद्रा इत्येव कीर्तिताः ।" | | "lines": [ |
| | "यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमे वाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणा अन्नं दाम ॥१॥" |
| | ] |
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| "text": "कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "आधानमवस्थानं सूक्ष्मशरीरम् । प्रत्याधानं विधानं स्थूलशरीरम् । प्राणो नारायणः स्थूणा ।" |
| | ] |
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| "text": "मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥\nधात्रर्यमाद्या आदित्या इंद्राविष्णू विनैव तु ।" | | "lines": [ |
| | "वायुर्गोवत्सरूपेण सर्वप्राणिषु संस्थितः ।", |
| | "सूक्ष्मदेहो गृहं तस्य वितानं स्थूल उच्यते ॥", |
| | "अन्नं दामात्मकं तस्य स्थूणा तु भगवान् हरिः ।", |
| | "ध्यायत्येवं हि यो वायुं श्रोत्रादीन् मनसा सह ॥", |
| | "बुद्धिं च सप्तशत्रून् स विषयेष्वभिधावतः ।", |
| | "असुरान् सन्निरुध्यैव वेत्ति नारायणं परम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यो या कनीनिका तयाऽदित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥२॥" |
| | ] |
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| "text": "स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥\nस एव वज्र इंद्रस्य सोऽशनिश्चाशनादरेः ।\nयज्ञो नामेंद्रपुत्रो यो जयन्त इति चोच्यते ॥\nस एव पशुमानित्वात् पशवश्चेति कथ्यते ।" | | "lines": [ |
| | "दक्षिणाक्षिस्थितं वायुं सप्तदेवा उपासते ।", |
| | "अक्षीणज्ञानमनसः सदाशिवापुरःसराः ॥", |
| | "उपास्यमानं तैर्देवैर्मोक्षार्थे वायुमीश्वरम् ।", |
| | "स्थूणया विष्णुना सार्धं यो विद्यात् सोऽन्नमश्नुते ॥", |
| | "अक्षीणमेव मुक्तः सन् सर्वदुःखविवर्जितः ।" |
| | ] |
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| "text": "कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेष श्लोको भवति अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहतं विश्वरूपं तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपमिति । प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेव तदाह तस्याऽऽसत ऋषयः सप्त तीरे इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्घ्यष्टमी संवित्ता ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥"
| | "lines": [ |
| | "विश्वरूपं यशश्चेति नाम्ना विष्णू रमा तथा ॥", |
| | "वायुश्च संस्थिता नित्यं सर्वेषां दक्षिणाक्षिगाः ।", |
| | "पूर्णत्वाद्विश्वतो विष्णो रमायाः स्त्रीषु पूर्णतः ॥", |
| | "वायोर्जीवेषु पूर्णत्वाद्यशोज्ञानसुखात्मकाः ।", |
| | "प्राणाश्चैते प्रणेतृत्वात् ऋषयो रुद्रपूर्वकाः ॥" |
| | ] |
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| "text": "तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "इमावेव गौतमभरद्वाजावयमेव गौतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठ कश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचो ह्यन्नमद्यतेऽत्रिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥\nदक्षाग्निप्रमुखाः सर्वे प्राणा एव हि वायुजाः ।\nरुद्रा अपि तदावेशात् पृथंग्नोदीरिता इह ॥\nकाम एवानुविष्टत्वादनिरुद्धश्च नोदितः ।\nमन्वावेशादिंद्रजस्तु संख्यायामनुवेशितः ॥\nअश्विनौ निर्ऋतिश्चैव कुबेरश्च विनायकः ।\nअर्यम्ण्यंशादिचतुर्षु विशेषावेशसंयुताः ॥\nअत्रोक्ता अपि पृथिव्याद्या अन्तर्यामिब्राह्मणे भवन्ति ।\nषट्सु प्रधानास्तिस्रो हि वायुवींद्रमहेश्वराः ।\nस्वभार्याणां स्वाश्रयत्वात् ते लोका ज्ञानरूपतः ॥\nपदैक्याद्ब्रह्मवाय्वोस्तु पदसाम्याच्छिवस्य च ।\nशेषस्यापि तु नैवोक्तिः पृथक् श्रद्धा च मारुतः ॥\nद्वौ देवाविति सम्प्रोक्तावन्नं श्रद्धा प्रकीर्तिता ।\nअतीतत्वाद्देवताभ्यो नेतृत्वाच्चान्नमुच्यते ॥\nश्रद्धेति वायोः पत्नी सा प्राणो वै विष्णुरुत्तमः ।\nणेत्येवानन्द उद्दिष्ट आसमन्तात् प्रकृष्टतः ॥\nप्राणो हि भगवान् विष्णुरध्यर्धो वायुरुच्यते ।\nअध्यर्धा हि गुणा नित्यं वायोरध्यर्ध एव तत् ॥\nन चैकत्वं भवेद्वायोस्तद्विशिष्टो यतो हरिः ।\nन च द्वितीयता तस्मिन् प्रीतिरत्यधिका हरेः ॥\nतेनाध्यर्द्धगुणो यस्मात् सर्वस्माद् देवतागणात् ।\nन चाशक्यं न चाप्राप्यमतोऽध्यर्ध इतीरितः ॥\nअत्यन्तरंगं यत्तस्मान्न हरेः पृथगीरिता ।\nश्रीः स्वरूपविभेदेऽपि सर्वोत्कृष्टाऽपि नित्यशः ॥\nतस्या अपि परो विष्णुर्गुणैः सर्वैरदोषवान् ।\nएक इत्युच्यते नित्यं यस्मान्नान्यस्तथाविधः ॥\nतत्परो वा गुणोद्रेके ब्रह्माऽसौ गुणपूर्तितः ।\nतथात्वेन यतो नित्यमविकारेण याति हि ॥ त्यदित्युक्तास्ततो विष्णुः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "गौतमो नाम रुद्रस्तु सर्वज्ञत्वात् प्रकीर्तितः ।", |
| | "भरद्वाजस्तु पर्जन्यो वाजमन्नं भरेद्यतः ॥", |
| | "वृष्ट्यैव विश्वामित्रख्य आदित्यो यत्प्रकाशनात् ।", |
| | "विश्वं विज्ञापयन्नित्यमग्निस्तु जमदग्निकः ॥", |
| | "जातं मितं चात्ति यस्माद्वसिष्ठाख्यस्तु वासवः ।", |
| | "वसतामुत्तमो यस्मात् पृथ्वी कश्यपनामिका ॥", |
| | "मेघवृष्टं पिबेद्यत्कं शयानैव हि सा सदा ।", |
| | "द्यौरत्रिरिति सम्प्रोक्ता तत्स्थैर्हि हुतमद्यते ॥", |
| | "श्रोत्रदिङ्ग्नासिकाबाहुदक्षिणाक्षिषु संस्थिताः ।", |
| | "द्वितीयेन तु रूपेण देवा एते शिवादयः ॥", |
| | "एवमेषां तु नामानि वेत्ति यः सर्वभुग्भवेत् ।", |
| | "उपास्ते वायुमेवैकं सस्थूणं ब्रह्मवेदिना ।", |
| | "ब्रह्मनामा सदा वायुरेनां वेत्ति विशेषतः ॥", |
| | "इति तां वेद यो विद्वान् सर्वात्ता स भविष्यति ॥ इति नारायणीये ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "मूर्तामूर्तब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे । मूर्तं चैवामूर्तं च, मर्त्यं चामृतं, स्थितं च यच्च, सच्च त्यञ्च ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् ।" |
| | ] |
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| "text": "आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्चैतन्मर्त्यमेतत् स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद् यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| | "मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः ।" |
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| "text": "आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथाध्यात्मम् इदमेव मूर्तं यदन्यत् प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत् सत् तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत् त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य ह्येष रसः ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते ।\nआदित्यस्थस्तथा रुद्रः श्रोत्रश्चंद्र उदाहृतः ॥\nछायामयस्तु निर्ऋतिरादर्शे सूर्य एव च ।\nपर्जन्यस्त्वप्सु पुरुषः शक्रः पुत्राभिमानवान् ॥\nअमृतं वायुरुद्दिष्टं स्त्रियः श्रीर्गीरुमा तथा ।\nसत्यं ब्रह्मा समुद्दिष्टो गरुत्मच्छेषका दिशः ॥\nआदेशनाद्दिशः प्रोक्ताः मृत्युर्यम उदाहृतः ।\nअन्तर्गतेन रूपेण वायुरेव त्वसुः स्मृतः ॥\nपालकेन स्वरूपेण ब्रह्मैवात्र प्रजापतिः ।\nप्रकाशस्त्वान्तरो ज्योतिर्लोको बाह्य इतीर्यते ॥\nमनःस्थिता मनोनाम्नी बोधरूपत्वतो रमा ।।\nसैवाग्निस्थाऽदनान्नित्यमग्निरित्येव गीयते ॥\nहृदयं बुद्धिसंस्था सा त्वयनं हृदि यत्ततः ।\nचक्षुः सा दृष्टिहेतुत्वाद्दृष्टानां लोक एव सा ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तं सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत् परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥"
| |
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| "text": "दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् ।" | | "lines": [ |
| | "तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C02", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥"
| | "lines": [ |
| | "मूर्तामूर्तमिदं रूपं ब्रह्मणः प्रतिमात्मकम् ।", |
| | "नैतत्स्वरूपमेतत् स्यात् तद्धि सर्वपरं सदा ॥", |
| | "श्रियो वायोर्विरिञ्चाच्च येऽन्ये मूर्ता हि ते स्मृताः ।", |
| | "मूरं पापं हि तेनाप्तं मूर्तमित्यभिधीयते ॥", |
| | "विशीर्णं चावसन्नं च तदेवातः सदुच्यते ।", |
| | "पराधीनगतित्वाच्च स्थितमित्यभिधीयते ॥", |
| | "तस्य सारो विरिञ्चस्तु तद्विरुद्धस्वभावकः ।", |
| | "मूर्ताद्विरुद्धरूपत्वाच्छ्रीर्वायुश्चाप्यमूर्तकौ ॥", |
| | "सर्वज्ञौ च ततौ चैव नियतो हरिणैव तौ ।", |
| | "तयोः सारस्तु भगवान् हरिर्नारायणः परः ॥", |
| | "आदित्यमण्डले चैव चक्षुष्वपि च सुस्थितः ।", |
| | "तत्रैव संस्थितो ब्रह्मा मूर्तसारोऽपि तस्य च ॥", |
| | "विष्णुरेव परः सारस्तस्य रूपाण्यनेकधा ।", |
| | "महारजनवासोवत् पाण्ड्वाविकवदेव च ॥", |
| | "विद्युत्पद्मेन्द्रगोपादिवह्निवत् सुखभास्वरः ।", |
| | "नैवासौ मूर्तवद्विष्णुर्न च मूर्तरसोपमः ॥", |
| | "न चामूर्तोपमो देवः स एव परमः सदा ।", |
| | "तस्यान्यदपरं सर्वं सत्यसत्यः स एकराट् ॥", |
| | "मूर्तामूर्तात्मकाः प्राणास्तेषां सत्यः स एव हि ॥", |
| | "इति नारायणश्रुतौ ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C02", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् ।" | | "lines": [ |
| | "प्रथमनिषेधेनैव मूर्तरससादृश्यमपि निषिद्धम् ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C03", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "मैत्रेयीब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥\nदक्षिणामानिनी देवी रतिरेव तदाश्रयः ।\nश्रद्धारूपः सदा कामस्तस्या अपि समाश्रयः ॥\nहृदयात्मिक्युमा तस्य कामस्यापि समाश्रयः ।" | | "lines": [ |
| | "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥\nरेत आत्मा सुरगुरुः सोमस्यापि समाश्रयः ।\nतस्याप्युमैवाश्रयः स्यात् .." | | "lines": [ |
| | "सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।", |
| | "न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।", |
| | "न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।", |
| | "न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ।", |
| | "न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति ।", |
| | "न वा ओ अरेक्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति ।", |
| | "न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति ।", |
| | "न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति ।", |
| | "न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति ।", |
| | "न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।", |
| | "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥\nसोमस्य दीक्षारूपा तु शतरूपा समाश्रयः ।\nतस्याः सत्यात्मको देवो मनुरेव समाश्रयः ॥\nतस्याप्युमैवाश्रया सा स्रष्टृरूपस्य नित्यदा ।" | | "lines": [ |
| | "आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः ।" |
| | ] |
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| "text": "किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः ।", |
| | "योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥\nतस्याप्युमैव हृदयरूपा नित्यं समाश्रयः ।" | | "lines": [ |
| | "अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| },
| | "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥" |
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| | ] |
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| "text": "तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥\nअहंकारात्मको नित्यमात्मोमा परिकीर्तिता ।\nबुद्ध्यात्मनैवाततत्वाद्यद्यस्यानाश्रयो हरः ॥\nतदा बोधात्मिका शक्तिर्नास्या देहाभिरक्षणे ।\nअरक्षितान्मानुषादीन् श्वानो वाऽद्युर्वयांसि वा ॥"
| |
| }, | | }, |
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| "text": "कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः ।\nशेषस्यापानरूपा सा भारत्येव व्यपाश्रयः ॥\nतस्या व्यानाभिधो वायुर्विशिष्टानो यतो हि सः ।\nउन्नेतृत्वादुदानाख्या तस्या श्रीराश्रयः सदा ॥\nसमानाख्यो हरिस्तस्याः सहैव ह्यनयत्यसौ ।\nस्वावरस्यानकास्त्वन्ये सर्वेषां चेष्टको हि सः ॥\nस एष भगवान्नैवं श्रीवदन्याश्रयो हरिः ।\nन च ब्रह्मादिवद्विष्णुर्नैवासौ बद्धवत् क्वचित् ॥\nन च मुक्तवदीशेशः कुत एव जडोपमः ।\nअग्राह्योऽशीर्यसंगोऽसावसितश्च न रिष्यति ॥\nन हि सर्वात्मना क्वापि केनचिज्ज्ञायते क्वचित् ।\nस्वल्पोऽपि शीर्यते नैव कारणात् कालतोऽपि वा ॥\nन लिप्यते जगन्नाथः क्वचिद्दोषेण केनचित् ।\nभूतपूर्वो भविष्यो वा बन्धो नास्य कुतश्चन ॥\nन च नाशो भवेत् क्वापि न नशिष्यति च क्वचित् ।\nअन्यत् सर्वं गृहीतं हि तेन ज्ञानादिना सदा ॥\nअशीर्यत्वादयोऽन्येषां सर्वेषां तत्प्रसादतः ।\nअतस्तस्यापि वैषम्यान्नेति नेत्याह तं श्रुतिः ॥ इत्यादि च ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥" | | "lines": [ |
| | "दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव ।" |
| | ] |
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| "text": "तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ ।\nयथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।\nतस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ २८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| "text": "त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः ।\nतस्मात् तदा तृणात् प्रैति रसो वृक्षादिवाऽहतात् ॥ २९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥" |
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| "text": "मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् ।\nअस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३० ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते ।" |
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| "text": "यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।\nमर्त्यः स्विन् मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३१ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते ।\nधानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥ ३२ ॥" | | "lines": [ |
| | "एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् ।" |
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| | "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति", |
| | "स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥" |
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| "text": "जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।\nविज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् ॥ तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥ ७ ॥ ३४ ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्र हि द्वैतमिव भवति ।", |
| | "तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति ।", |
| | "तदितर इतरं शृणोति ।", |
| | "तदितर इतरमभिवदति ।", |
| | "तदितर इतरं मनुते ।", |
| | "तदितर इतरं विजानाति ।", |
| | "यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्।", |
| | "केन कं पश्येत् केन कं शृणुयात् ।", |
| | "तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं मन्वीत ।", |
| | "तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति ।", |
| | "तं केन विजानीयाद् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यथा वनस्पतौ वृक्ष इत्ययंशब्दोऽमृषा तथैव पुरुषे पुरुषशब्दो विद्यमान एव । स च नित्यत्वे सम्भवति । पुरुकालेऽपि सन्पुरुष इति । स्रावमध्ये यत्स्थिरं विद्यतेऽस्थि सल्लीनं तद्दारुसंश्लिष्टपाशवत् । वृक्षो मूलाद्रोहतीत्यंगीकारमात्रम् । यत्समूलमावृहेयुरिति तस्यापि दूषणात् । अन्यस्य रेतसो जननमपि जीवतः पुरुषान्तरस्य भावे । प्रलये तु सर्वप्रलयात् कस्मादुत्पत्तिः । तत्पृष्टं सर्वं वक्तुमशक्यत्वात् पुरुषस्य पुनरुत्पत्तौ कारणं भगवन्तं जानन्तोऽपि तूष्णीमृषयो बभूवुः । पुरुषनामकत्वान्नित्यस्य जीवस्य यावन्मुक्तिः पुनरुत्पत्या भवितव्यं न शरीरेण सह नाशः । तस्य च स्वोत्पत्तावस्वातंत्र्यादन्येनोत्पादकेन भाव्यम् । कोऽसाविति प्रश्नाशयः । तेषु तूष्णीम्भूतेषु स्वयमेव परिहरति विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेति । तस्याप्यन्य उत्पादक इत्याशंका मा भूदिति जात एव न जायत इत्याह । पुरुषान्तरापेक्षया पुनःशब्दो न तु क्रियाभ्यासापेक्षया । एक एव हरिर्बन्धुः पुनरन्यो न विद्यते इतिवत् । रातिरिष्टः । तिष्ठमानस्य तद्विदः परायणम् ॥" | | "lines": [ |
| | "मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः ।" |
| | ] |
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| "text": "षडाचार्यब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे । अथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तं होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उयुभयमेव सम्राड् इति होवाच ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "नानात्वेनाभिसम्बन्धास्तदा तत्कालभाविना ।", |
| | "संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥", |
| | "प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ।", |
| | "आनन्देन विना चैव भोगेन विषयेण च ॥", |
| | "सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या आधिपत्येन चैव हि ॥ इति वायुप्रोक्ते ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "अणुर्भगवान् तद्विषयान् निर्णयान् वक्तुं वा ।" | | "lines": [ |
| | "इवशब्दस्त्वस्वातन्त्र्यार्थे । न हि तदधीनं पृथगित्येवोच्यते । तस्मादमुक्तैर्न ज्ञायते इति सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्तम् ।", |
| | "पतिर्जाया प्रिया नैव स्वेच्छया तु भविष्यति ।", |
| | "विष्णोरिच्छाबलेनैव स्वयं च स्वप्रियो भवेत् ॥", |
| | "विष्णोरिच्छावशेनैव हन्ति ह्यात्मानमात्मना ।", |
| | "स्वात्मानमप्रियं कृत्वा निरये पातयत्यपि ॥", |
| | "प्राधान्येन हरेर्ज्ञानात् सर्वं विदितवद्भवेत् ।", |
| | "ब्रह्मजात्यात्मकं वेत्ति नैव विष्णुवशं हि यः ॥", |
| | "ब्रह्माणं तं ततो ब्रह्मा पातयेत् तमसि ध्रुवम् ।", |
| | "एवं क्षत्रात्मको वायुर्वित्तरूपश्च वित्तपः ॥", |
| | "पञ्चभूतानि विश्वे च देवा लोकाभिमानिनः ।", |
| | "सर्वाभिमानिनो देवी मूलप्रकृतिरेव च ॥", |
| | "सर्वं विष्णौ स्थितं विष्णोर्जातं विष्णोर्वशे सदा ।", |
| | "शङ्खशब्दो यथा शङ्खदेवतावशगः स्थितः ॥", |
| | "तस्माद्वेदाः समुत्पन्ना विद्याख्या मूलिका श्रुतिः ।", |
| | "सर्वोपनिषदश्चैव पञ्चरात्राख्यसंहिताः ॥", |
| | "ब्रह्मसूत्राणि वेदानां व्याख्यास्तासां च विस्तरः ।", |
| | "सर्वमेतज्जगच्चैव निःसृतं तुरगाननात् ॥", |
| | "वरुणस्य वशे यद्वदाप एवं वशे हरेः ।", |
| | "सर्वे बद्धाश्च मुक्ताश्च तारतम्यात्मना स्थिताः ॥", |
| | "यदि मुक्तस्य विज्ञानं गन्धादिविषये न चेत् ।", |
| | "तथैव भगवद्रूपे स्वरूपे च परस्परम् ॥", |
| | "एवमज्ञानरूपां तां मुक्तिं को नाम वाञ्छति ।", |
| | "तस्माद्विष्णोर्वशे सर्वे यथेष्टमुपभोगिनः ॥", |
| | "मुक्ताः सदा तारतम्यात् तिष्ठन्त्याब्रह्मणोऽखिलाः ॥ इति हयग्रीवसंहितायाम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "यत्ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणवामेत्यब्रवीत् । मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छैलिनोऽब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य वागेव सम्राति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥२॥" | | "lines": [ |
| | "सर्गे सर्गे तु यो नैव शब्दतोऽप्यन्यथा भवेत् ।", |
| | "श्रुत्याख्यः स तु विज्ञेय इतिहासादिरर्थतः ॥", |
| | "भगवद्दृष्टमेवान्यैर्ब्रह्माद्यैर्दृश्यते यदि ।", |
| | "ऋषिभेदस्तु तत्र स्याद्वेदो नाविष्णुनिर्गतः ॥", |
| | "वेद इत्येव विष्णूक्तस्तपसा दृश्यते परैः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः ।\nप्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥\nदीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते ।\nप्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥" | | "lines": [ |
| | "मधुब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् म उदंकः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत् प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपासीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं याजयत्यप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशंकं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् ।\nतदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥\nतथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥" | | "lines": [ |
| | "इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं रेतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे बर्कुः वार्ष्णः चक्षुः वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": null, | | "verseType": "mantra", |
| "text": "यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते ।\nशब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥\nतद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा ।\nतदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥\nचक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह ।\nचक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीत् श्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदुपासीत का अनन्ता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशः दिशो वै सम्राट् श्रोत्रं श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः ।\nदिङ्नामा स तु विज्ञेयो दिक्षुस्थो नित्यदेशनात् ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालः मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तज्जाबालोऽब्रवीत् मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनोजहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥६॥" | | "lines": [ |
| | "अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः ।\nजातः सुतः सुखे हेतुः परानन्दो हरिः किमु ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥" |
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| "text": "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यः हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छाकल्योऽब्रवीत् हृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनं हृदयं वै सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥७॥" | | "lines": [ |
| | "अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| "text": "कूर्चब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| "text": "जनको वै वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्माऽस्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तद्भगवान् वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति स होवाच ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स्वयोग्यं ज्ञानं श्रोतुं सिंहासनादवरुह्योपसदनं कृत्वोवाच । यत्स्वात्मना प्राप्यं मुक्तौ तदुपास्यैव मुक्तिर्भवतीत्यतः प्राप्यं पृच्छति ।" | | "lines": [ |
| | "इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिंद्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयं आत्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं आत्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैतद्वामेऽक्षिणि पुरुषरूपमेषाऽस्य पत्नी विराट् तयोरेष संस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिंडोऽथैनयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणीयैषा हृदयदूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतददास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।", |
| | "तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "राज्ञां हृदयसंस्थो य इंद्रो नाम जनार्दनः ।\nस इंद्रे च यमे चैव स प्राप्यो मुक्तराजभिः ॥\nतस्मात् तेषामुपास्यः स विराण् नाम तदाश्रया ।\nश्रीस्तयोः स्तुतिरेषा हि प्राणेन क्रियते सदा ॥\nकर्णौ पिधाय या ज्ञेया सर्ववेदात्मिका हि सा ।\nकाशनात् सर्वजीवानामाकाश इति सा स्तुतिः ॥\nजाग्रतां सर्वजीवानां स विष्णुर्दक्षिणाक्षिगः ॥" | | "lines": [ |
| | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।", |
| | "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।", |
| | "दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणाः दक्षिणा दिक् दक्षिणाः प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अर्वाची दिगर्वाञ्चः प्राणाः सर्वाः दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्यते असितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स होवाच जनको ह वैदेहोऽभयं त्वागच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।", |
| | "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।", |
| | "दध्यङ् ह वा मधु प्रवोचदृतायं त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तस्य पूर्वदिशींद्राग्नी सभार्यौ सम्प्रतिष्ठितौ ॥\nयमराक्षसौ दक्षिणस्यां वरुणो वायुरेव च ।\nपश्चिमस्यामुत्तरस्यां सोमेशानौ प्रतिष्ठितौ ॥\nब्रह्मा प्रधानवायुश्च तथोर्ध्वायां दिशि स्थितौ ।\nअधरायां शेषकामौ सभार्याः सर्व एव च ॥\nएकैकस्यां हि चत्वारो नेतृत्वात् प्राणनामकाः ।\nइंद्रियाभिमतेश्चैव प्राणा इत्येव शब्दिताः ॥" | | "lines": [ |
| | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।", |
| | "दपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥", |
| | "इति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरि शयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "ज्योतिर्ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।", |
| | "तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।", |
| | "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥", |
| | "इत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
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| "text": "याज्ञवल्क्यो वरं दत्वा राज्ञा संवादकामुकः ।\nवैदेहनगरं प्रायात् सन्तो यच्छास्त्रलोलुपाः ॥ इति स्कान्दे ॥" | | "lines": [ |
| | "सुखदा सर्वभूतानां पृथ्वी मधुवदुच्यते ।", |
| | "पृथिव्याश्चैव भूतानि तथा सर्वाश्च देवताः ॥", |
| | "पृथिव्यादिषु देवेषु शरीरादिषु च स्थितः ।", |
| | "एक एव परो विष्णुर्हयशीर्षस्वरूपधृक् ॥", |
| | "अनन्ततेजा नित्यश्च स एव ब्रह्म सर्वगम् ।", |
| | "तदेव गुणपूर्णत्वाद् ब्रह्म सर्वमनूनतः ॥", |
| | "आत्मनामा परो विष्णुः सर्वगो यः प्रकीर्तितः ।", |
| | "स एव हयशीर्षाख्यस्त्वधिदैवादिषु स्थितः ॥", |
| | "अराणामाश्रयो यद्वद् बहिरन्तः प्रतिष्ठितौ ।", |
| | "नाभिनेमी तथा विष्णुर्जीवानामाश्रयः स्थितः ॥", |
| | "स एव दशधा प्रोक्तो विष्णुर्मत्स्यादिरूपकः ।", |
| | "शतं नारायणाद्यात्मा विश्वाद्यात्मा सहस्रकः ॥", |
| | "परादिरूपो बहुधा सोऽनन्तात्माऽजितादिकः ।", |
| | "भूताख्यः सर्वजीवानां विरिञ्चानां च सर्वशः ॥", |
| | "आत्मनाम्नां स एवैको राजाधिपतिरेव च ।", |
| | "स्वामित्वाद्राजशब्दोऽयमाधिक्यात् पालनात् तथा ॥", |
| | "अधिपश्चेति सम्प्रोक्तः पुरुषः पुरुषस्थितेः ।", |
| | "पुराख्येष्वेव देहेषु हृत्पुर्यपि वसत्यसौ ॥", |
| | "नानेन किञ्चिदव्याप्तं नानेनाच्छादितं न च ।", |
| | "नैवास्मात् पूर्वकं किञ्चिन्नैवास्मादपरं तथा ॥", |
| | "सर्वस्माद् बाह्यतश्चासौ सर्वस्मादन्तरस्तथा ।", |
| | "व्याप्तेरात्मेति सप्रोक्तो ब्रह्मेति गुणपूर्तितः ॥", |
| | "स सर्वस्यापरोक्षज्ञ इति वेदानुशासनम् ।", |
| | "विरिञ्चस्त्वात्मशब्दोक्तो मानुषं मनुरुच्यते ॥", |
| | "सत्यं च स्तनयित्नुश्च वायो रूपान्तरे स्मृते ।", |
| | "एत एव स्वरे सत्ये जीवे चाध्यात्मसंस्थिताः ॥", |
| | "तेषां नियामको विष्णुस्तत्र तत्रैव संस्थितः ।", |
| | "जीवे स्थितस्त्वात्मनामा सौवरः स्वरगः स्मृतः ॥", |
| | "सत्यगः सात्यनामासौ धर्मगो धार्म एव च ।", |
| | "मनोः स्वायम्भुवस्याख्या मानुषेत्येव देहिषु ॥", |
| | "बहिश्च तद्गतो विष्णुर्मानुषेत्येव कीर्त्यते ।", |
| | "प्रातिश्रुत्क इति श्रोत्रे तैजसो विद्युति स्थितः ॥", |
| | "इति नानाविधैर्नामसमूहैर्विष्णुरिज्यते ।", |
| | "दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामेतां विद्यामदात् पुरा ॥", |
| | "हयग्रीवब्रह्मविद्येत्येषा ब्रह्मादिभिर्धृता ॥ इति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C02", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रत्यैरयतं प्रतिसमधत्तम् । ऋतायन् सत्यं कुर्वन् । कक्ष्यं नारायणकवचम् । त्वाष्ट्रं त्वष्टुः पुत्रेण विश्वरूपेणेन्द्रायोक्तम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "वंशब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।", |
| | "गौपवनः पौतिमाष्यात् ।", |
| | "पौतिमाष्यो गौपवनात्।", |
| | "गौपवनः कौशिकात् ।", |
| | "कौशिकः कौण्डिन्यात् ।", |
| | "कौण्डिन्यः शाण्डिल्यात् ।", |
| | "शाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ।", |
| | "गौतमः आग्निवेश्यात्॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "आग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्च अनभिम्लाताच्च ।", |
| | "अनभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमात् ।", |
| | "गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्यां ।", |
| | "सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् ।", |
| | "पाराशर्यो भारद्वाजात् ।", |
| | "भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च ।", |
| | "गौतमो भारद्वाजात्।", |
| | "भारद्वाजः पाराशर्यात्, ।", |
| | "पाराशर्यो बैजवापायनाद् बैजवापायनः ।", |
| | "कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "धृतकौशिकात् धृतकौशिकः।", |
| | "पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणः ।", |
| | "पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् जातूकर्ण्यः ।", |
| | "आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः ।", |
| | "औपबन्धनेरौपबन्धनिः ।", |
| | "आसुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाज", |
| | "आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः।", |
| | "माण्टिर्गौतमात् ।", |
| | "गौतमो वात्स्यात् ।", |
| | "वात्स्यः शाण्डिल्यात् ।", |
| | "शाण्डिल्यः कैशोर्यात् काप्यात्।", |
| | "कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्।", |
| | "कुमारहारितो गालवात् ।", |
| | "गालवो विदर्भीकौण्डिन्यात् ।", |
| | "विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात्, ।", |
| | "वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः ।", |
| | "सौभरो अयास्यात् आङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् ।", |
| | "आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् ।", |
| | "विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्याम् ।", |
| | "अश्विनौ दधीच आथर्वणात् ।", |
| | "दध्यङ् आथर्वणोथर्वणो दैवाद्।", |
| | "अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् ।", |
| | "मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्।", |
| | "प्रध्वंसन एकऋषेः ।", |
| | "एकऋषिर्विप्रचित्तेः ।", |
| | "विप्रचित्तिः व्यष्टेः ।", |
| | "व्यष्टिः सनारोः ।", |
| | "सनारुः सनातनात् ।", |
| | "सनातनः सनकात् ।", |
| | "सनकः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो।", |
| | "ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "आत्मा भगवानेवास्य ज्योतिः ।\nभावेऽभावेऽपि सूर्यादेर्जीवानां विष्णुरेव हि ।\nज्योतिस्तथाप्यभावे तु तज्ज्ञेयं हि विशेषतः ॥\nअस्वतांत्र्यात्तु जीवस्य द्योतयन् बुद्धिमस्य सः ।\nप्रवर्तयति सर्वेशस्तमस्यपि जनार्दनः ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "पाराशर्यो जातुकर्ण्यः पराशरसुतावुभौ ।", |
| | "विप्रायामेव भार्यायां तृतीयः कृष्ण एव च ॥ इति ब्रह्माण्डे ।", |
| | "परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्हयशीर्षादधीतवान् ।", |
| | "ब्रह्मविद्यामिमां ब्रह्मा ततः सनक एव च ॥ इति गारुडे ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "आश्वलब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानां अनूचानतमः इति स ह गवां सहस्रमवरुरोध दश दश पादाः एकैकस्याः शृंगयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स्वातंत्र्याद्ध्यायतीवासौ ध्याययन् जीवमंजसा ।\nगृह्णातीव ग्राहयन् स जीवं सर्वेश्वरेश्वरः ॥\nसदा विज्ञानपूर्णोऽसौ समानोऽसौ सदा समः ।\nअविकारात् समानः सन् जीवमादाय सञ्चरेत् ॥\nउभौ लौकौ स्वापकत्वाद्भूत्वाऽसौ स्वप्ननामकः ।\nइमं लोकं जाग्रदाख्यं मृत्युरूपात्मकं सदा ॥\nबहुपापैकहेतुत्वात् तारयेत् स्वप्नमानयन् ।\nइमं लोकं च भूराख्यं तारयित्वाऽन्तरिक्षगम् ॥\nजीवं कुर्यान्मृतौ विष्णुर्भूलोकः क्षिप्रमृत्युमान् ।\nबहवो मृत्यवश्चात्र मृत्यो रूपाण्यतस्त्वयम् ॥\nपापहेतुत्वतश्चायं भूर्लोको मृत्युरूपकः ।\nजाग्रच्च पृथिवी चैव द्यौः सुषुप्तिस्तथैव च ॥\nस्वप्नश्चैवान्तरिक्षं च ज्ञेया अन्योन्यनामकाः ।\nतद्द्ययभिप्रायिका तस्मादुभौ लोकाविति श्रुतिः ॥"
| |
| },
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| "text": "स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सौम्योदज सामश्रवा३ इति ता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होता आश्वलो बभूव । सहैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स वा अयं जायमान इति च द्व्याश्रया श्रुतिः ।\nयस्य ज्योतिरयं विष्णुः स परामृश्यते तथा ॥\nयदा तु भगवानुक्तस्तदा स्वातंत्र्यतो विभुः ।\nम्रियमाणो जायमान इत्युक्तस्तन्नियामकः ॥\nफलदानाय पापानां ग्रहस्संसर्ग उच्यते ।\nमोक्षदाने फलादानाद्विजहातीति चोच्यते ॥\nजीवोऽपि मुक्तिकाले तु हाता पापस्य कथ्यते ।" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्युनाऽऽप्तं सर्वं मृत्युनाऽभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाऽग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तं सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणार्त्विजा चक्षुषाऽऽदित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं पूर्वपक्षमपरपक्षाभ्यामाप्तं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षायोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः साऽतिमुक्तिः ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स्वर्गः सुषुप्तिरित्याख्या मुक्तेरपि यतः समा ॥\nपरलोको यतो मुख्यो मुक्तिरेव न चापरः ।\nअतो द्युसुप्तिमोक्षाणामभिप्रायमिदं वचः ॥\nसुप्तिरित्यादिकं स्वेति विष्णोराख्या सुखत्वतः ।\nपुनरागमनं नाम मुक्तानामपि विद्यते ॥\nप्रलये तु प्रविश्यैनं भगवन्तं जनार्दनम् ।\nस्थित्वा ज्ञानाविलोपेन निर्गच्छन्ति पुनस्ततः ॥\nन च ज्ञानसुखादीनां तेषां सृष्टौ लयेऽपि वा ।\nविशेषः कश्चिदन्तश्च बहिश्चैव रमन्ति ते ॥\nस्वापयत्येनमिति स स्वपितीत्युच्यते हरिः ।\nआनन्दपापलोकादेर्दर्शनं स्वप्नसुप्तयोः ॥\nअपि विष्णोः सदैवास्ति न जीवस्य कथञ्चन ।\nअत्रायं भगवान् विष्णुर्जीवस्य स्वयमेव तु ॥\nज्योतिर्विशेषतो भूयान्नैवान्यज्ज्योतिरत्र यत् ।\nन हि जीवः स्वयं द्रष्टुं सुप्तः शक्नोति हि ध्रुवम् ॥\nअतः स नैव जीवोऽयं सर्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ।\nस्वप्नेऽन्तरिक्षे स्वर्गे वा न रथाद्याः पुरा स्थिताः ॥\nतदैव तत्कर्मयोग्यान्निर्मिमीते हरिः स्वयम् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "होतर्यग्नौ वाचि चैव यो विष्णुं मुक्तिदं स्मरेत् ।", |
| | "नित्यं स मुच्यतेऽध्वर्युसूर्यचक्षुष्षु यः स्मरेत् ॥", |
| | "अधिकः प्रकाश एवास्य मुक्तावन्येभ्यः इष्यते ।", |
| | "मुक्तेभ्योऽपि तथोद्गातृवायुप्राणेषु यः स्मरेत् ॥", |
| | "पूर्णचंद्रं सदा पश्येदधिकाह्लादसंयुतः ।", |
| | "मनोब्रह्मनिशेशेषु यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ॥", |
| | "अप्रयत्नेन लोकं स विष्णोर्याति न संशयः ।", |
| | "होत्रग्न्यादीनि नामानि विष्णोः सर्वाणि मुख्यतः ॥", |
| | "तत्सम्बन्धात् तदन्येषां स वै होत्रादिकर्मकृत् ।", |
| | "तस्माद्धोत्राग्निवागादेरैक्यं श्रुतिषु चोच्यते ॥", |
| | "होत्रादिषु चतुर्ष्वेष वासुदेवादिरूपधृक् ।", |
| | "व्यवस्थितो हि तज्ज्ञानादचिरान्मुक्तिमेष्यति ॥", |
| | "मुक्तिनामा स भगवान् मोक्षदत्वात् प्रकीर्तितः ।", |
| | "मनुष्येभ्योऽधिकसुखं देवेभ्यो यत्प्रयच्छति ॥", |
| | "मुक्तावप्यतिमोक्षः स तेन देवः प्रकीर्तितः ।", |
| | "एता ह्युपासना नित्यं नैव योग्या नृणां श्रुताः ॥", |
| | "अतिमुक्तिप्रदा यस्माद्देवाद्यास्तासु योगिनः ॥" |
| | ] |
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| "text": "तदेते श्लोका भवन्ति ।\nस्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ।\nशुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ सम्पदः याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्रः इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्यजतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "शुक्रं जीवमादाय ।\nशोकेन रत्या युक्तत्वाच्छुक्रो जीव उदाहृतः ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्याशस्यापुरोवाक्यासंस्थितं यो हरिं स्मरेत् ॥", |
| | "सर्वप्राणभृतामीशः स भवेन्नात्र संशयः ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।\nस ईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥" |
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| "text": "अंशेन जीवमादाय क्वचिदीशो बहिर्नयेत् ।\nस्वप्नेषु फल्गुनं यद्वत् कृष्णः कैलासमानयत् ॥\nवासनारूपकान् प्रायस्त्वन्तरेव प्रदर्शयेत् ।\nअतो बहिः कुलायादित्यपि वाङ्ग् न विरुद्ध्यते ॥ इति ॥" | | "lines": [ |
| | "उज्ज्वलच्छब्दवद्द्राविष्वेकमेव हरिं स्मरेत् ॥", |
| | "सर्वलोकाधिपत्यं स लभते पुरुषोत्तमात् ॥" |
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| "text": "स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि ।\nउतेव स्त्रीभिस्सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "उच्चावचेषु रूपेषु प्रविशन् पुरुषोत्तमः ।\nबहुरूपत्वमायाति स्वप्ने स जगतः प्रभुः ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "मनसो देवता ब्रह्मा सर्वदेवेषु संस्थितः ॥", |
| | "देवब्रह्ममनस्स्वेकं यो विष्णुं सर्वदा स्मरेत् ।", |
| | "अनन्तनामकं तेन तल्लोकं नित्यमश्नुते ॥", |
| | "निश्चयेन विमोक्ष्यत्वाद्विश्वे देवा अनन्तकाः ।", |
| | "अनन्तनामकं विष्णुमुपास्यापि ह्यनन्तकाः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति ।\nतं नायतं बोधयेदित्याहुर्दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्या अपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ततो ह होता आश्वल उपरराम ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "जीवस्य मृतिकाले च स्वप्नकाले च केशवः ॥\nएवंविधानि कर्माणि कुर्वाणोऽपि न दृश्यते ।\nतथा जागरिते सुप्तौ मुक्तैरेव तु दृश्यते ॥\nतथाऽपि नायतेऽभ्यस्तं ज्ञानी ब्रूयाज्जनार्दनम् ।\nयस्य गोचरतां विष्णुः कदाचिन्न प्रपद्यते ॥\nतस्यायतस्य पापस्य भेषजं न हि विद्यते ।\nसुप्तिकालोऽप्ययं विष्णोः सदा जागरितात्मकः ॥\nयानि जागरिते पश्येत् तानि सुप्तेऽपि पश्यति ।\nनित्यज्ञानस्वरूपत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥\nनित्यानन्यप्रकाशत्वेऽप्यन्यज्योतिर्यदा भवेत् ।\nतदा स्यात् संशयोऽज्ञानामित्यत्रेति विशेषणम् ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| },
| | "पुरोवाक्यादिषु प्राणादिषूपासां करोति यः ।", |
| {
| | "एकमेव हरिं लोकव्याप्तिमेव लभेदसौ ॥", |
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| | "अत्रापि वासुदेवाद्याश्चत्वारो देवताः स्मृताः ।", |
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| | "देवानां पदहेतुत्वात् सम्पन्नाम्न्य उपासनाः ॥", |
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| | "मुक्तौ भोगविशेषस्य हेतुत्वाच्च प्रकीर्तिताः ।", |
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| | "एताश्च देवतायोग्या न मनुष्येषु कुत्रचित् ॥", |
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| | "मनुष्याणां ज्ञानमात्राद् गुणाधिक्यं भविष्यति ॥इति परमश्रुतौ ॥" |
| "verseType": "mantra",
| | ] |
| "text": "स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥" | |
| }, | | }, |
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| "text": "तत्र सुषुप्तिमात्राभिप्रायेण स वा एष एतस्मिन् प्रसाद इत्याह ॥" | | "lines": [ |
| | "आर्तभागब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स्वप्नाख्योऽन्तः स्थानं स्वप्नान्तम् ।\nअन्तः स्थानं स्थलं वासः प्रदेश इति चोच्यते । इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "शुभाशुभं तु दृष्ट्वैव स्वप्ने जागरितेऽपि च ।\nअसंस्पृष्टः सदा दुःखैश्चरतीशः पुनः पुनः ॥\nस्वप्नसुप्त्यात्मकं कूलमेकं बुद्धात्मकं परम् ।\nमहामत्स्य इवासंगी चरत्येको जनार्दनः ॥" | | "lines": [ |
| | "चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यं विष्णुं श्येनवच्छ्रान्तो जीवो जागरिते भ्रमन् ।\nस्वप्ने च सुप्तावभ्येति संश्रान्तः सद्गृहं यथा ॥\nस्वित्यानन्दः परो विष्णुस्तमाप्तः सुप्तः उच्यते ।\nसम्प्राप्य तमयं जीवः कामयेन्नैव किञ्चन ॥\nन च स्वप्नसमभ्रान्तिज्ञानं याति कदाचन ।\nसुषुप्तौ च किमु ज्ञानान्मुक्तौ प्राप्तो जनार्दनम् ॥" | | "lines": [ |
| | "मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "निहितो भगवान्यत्र हिता नाड्यः प्रकीर्तिताः ।\nनानावर्णो हरिस्तासु नानारूपी व्यवस्थितः ॥\nतासां मध्ये सुषुम्ना च तत्र सुप्तिं व्रजत्ययम् ।\nता एव कण्ठदेशस्था जीवस्तत्र व्यवस्थितः ॥\nस्वप्नान् पश्यति जाग्रद्वद्भयं च प्रतिपद्यते ।\nअ इत्यादिश्यते विष्णुरविद्या तन्निरीक्षणम् ॥\nतेन स्वप्नानयं पश्येज्जीवो जागरितं तथा ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥" |
| | ] |
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| "text": "छन्दसामप्यवाच्यत्वादतिच्छन्दा हरिः स्मृतः ।\nतेनाश्लिष्टो ह्ययं जीवः सुप्तो मुक्तोऽथवा भवेत् ॥\nविष्णोरूपं हि यन्नित्यमभयं पापवर्जितम् ।\nआप्तकामं च पूर्णत्वादात्मकामं सुखत्वतः ॥\nशोकं विना सुरमणाच्छोकान्तरमितीरितम् ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तेनाश्लिष्टः स्वपुत्राणां दायादानां न वै पिता ॥\nतेषां दुःखाददुःखित्वान्न माता लोकमान्यपि ।\nअलोकमानान्नो लोको देवोऽपि स्वाधिकारतः ॥\nवर्षणादेर्व्युत्थितत्वान्न देवो वेदमान्यपि ।\nअवेदमानान्नो वेदः पापी पापफलाप्ययात् ॥\nअपापः श्रमणश्चापि यतिधर्मात् समुत्थितेः ।\nअयतिस्तापसश्चैवमनिष्टं पुण्यमप्यमुम् ॥\nनान्वेत्येवंविधो मुक्तो विष्णोः सम्प्राप्तिमात्रतः ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "आकाशं परमात्मानमेव ।" |
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| "text": "यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥"
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| | "केचित्तु मानुषा मुक्तिमनुक्रम्यैव देहतः ।", |
| | "देहपाते तु देहस्य दोषान् भुक्त्वैव सर्वशः ॥", |
| | "मरणोच्छूनतादींस्तु स्वकीयारब्धकर्मजान् ।", |
| | "देहे क्षीणे तु गच्छन्ति दृष्ट्वा विष्णुमनुज्ञया ॥", |
| | "पुनरत्रैव तिष्ठन्ति नित्यानन्दैकभोगिनः ।", |
| | "देहादुत्क्रम्य देवास्तु यान्ति विष्णुं सनातनम् ॥", |
| | "देहादुत्क्रम्य यातानां देवा भागत एव तु ।", |
| | "स्वाधिदैवं व्रजन्त्यद्धा भागतोऽनुव्रजन्ति तान् ॥", |
| | "आकाशाख्यं स्वरूपं तु विष्णुस्तद्धृदि संस्थितः ।", |
| | "भागतो भागतश्चैनाननुयाति जनार्दनः ॥", |
| | "ज्ञानस्थितेन रूपेण देवानां मुक्तिदो हरिः ।", |
| | "पुण्यस्थितेन रूपेण स्वर्गं निरयमन्यगः ॥", |
| | "रहस्यमेतद्देवानां विदुः कर्मेति मानुषाः ।", |
| | "तस्मान्नैव जनेष्वेतद्विष्णोः कर्म प्रकाशयेत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अत एव याज्ञवल्क्यो न जनेषूवाच ।" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "कर्मनामा तु भगवान् फलकर्तृत्वतो हरिः ।", |
| | "पातनात् पापनामासौ पुनातेः पुण्यनामवान् ॥ इति भारते ॥" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥" | | "lines": [ |
| | "भुज्युब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्यक्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतंजलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति । तं यदा लोकानामन्तान् अपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥" | | "lines": [ |
| | "पारीक्षिताः प्रद्युम्नाः ।" |
| | ] |
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| "text": "यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिंद्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत् तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद् यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्मात् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्रष्ट्रन्तरनिषेधेन तस्यैव सर्वद्रष्टृत्वमेव च यत्र वा अन्यदिव स्यादित्यादिनोपसंह्रीयते । अन्यथाऽन्योऽन्यत् पश्येदित्यादिकमनर्थकम् । न ह्येकस्यान्यत्वेऽन्यस्यानन्यत्वं भवति । अतो द्वितीयोऽन्यशब्दः व्यर्थ एव स्यात् । न च तत्पक्षे दृश्यत्वादिकमात्मनो विद्यते । तस्माद् यत्र किञ्चिदपि स्वातंत्र्यमन्यस्य भवति तत्रैव भगवतोऽन्यः पुरुषो भगवद्दृष्टादन्यत् पश्यतीत्यादि युज्यते तदेव नास्ति स्वतः । अतो नान्योऽन्यत्पश्येदित्यर्थः । अन्यदिवेतीवशब्दोऽल्पस्वातंत्र्याद्यर्थे । राज्ञः पृथगिव भृत्य इतिवत् ।" | | "lines": [ |
| | "अश्वमेधयाजिन इंद्राः ।" |
| | ] |
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| "text": "यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥"
| | "lines": [ |
| | "प्रद्युम्नः कामनामासौ पारीक्षित इतीरितः ।", |
| | "सर्वेक्षणात् परो विष्णुः परीक्षिदिति कीर्तितः ॥", |
| | "तत्पुत्रत्वात् कामदेवः पारीक्षित इति स्मृतः ।", |
| | "शताश्वमेधयाजित्वादिंद्रा एवाश्वमेधिनः ॥", |
| | "अतीतानागतानां च कामानां वज्रिणामपि ।", |
| | "एकमेव हि मुक्तानां स्थानं वेदोदितं सदा ॥", |
| | "इंद्रनामा तु गरुडः सामर्थ्यादेव कथ्यते ।", |
| | "तस्य रूपद्वयं नित्यं सौपर्णं पौरुषं तथा ॥", |
| | "तत्र पौरुषरूपी सन् भूत्वा सौपर्णरूपवान् ।", |
| | "कामदेवानुपादाय मुक्तौ वायोः प्रयच्छति ॥", |
| | "वायुस्तान् स्वशरीरस्थान् कृत्वेंद्रा यत्र मुक्तिगाः ।", |
| | "प्रद्युम्ननामके विष्णावेवं वायुर्हि मोक्षदः ॥", |
| | "तस्मात् सर्वोत्तमो वायुर्विविधं तु यदष्टकम् ।", |
| | "देवानृषीन् पितॄन् यक्षान् गन्धर्वान् मानुषोरगान् ॥", |
| | "असुरांश्च वशे नित्यं नयत्यमितपौरुषः ।", |
| | "सम्पूर्णाश्च सुपर्णेशशेषेंद्रांस्तत्स्त्रियोऽपि च ॥", |
| | "अष्टौ नयत्युन्नयति वशीकृत्य स्वयं प्रभुः ।", |
| | "अतो व्यष्टिः समष्टिश्च वायुरेवाभिधीयते ॥", |
| | "एवं व्यष्टिं समष्टिं च यो वायुं वेद तत्त्वतः ।", |
| | "तत्परं च हरिं नित्यं मुच्यते संसृतेः पुमान् ॥", |
| | "इति परमसंहितायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥" | | "lines": [ |
| | "चरकस्तीर्थसञ्चारी वित्तार्थी करकः स्मृतः इत्यभिधानम् ।" |
| | ] |
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| "text": "यदि जगदेव न स्यात् तदा कथं मोक्षेऽप्यन्यानि भूतानि मात्रां उपजीवन्तीति युज्यते । मोक्षप्रकरणं चैतत् । स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति भगवद्वचनम् ।" | | "lines": [ |
| | "अहर्मुहूर्तं विज्ञेयमहर्मासोऽपि भण्यते ।", |
| | "अहर्दिनं प्रकाशश्च क्वचिज्ज्ञानं बलं तथा ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥" | | "lines": [ |
| | "मुहूर्तमष्टभागोनघटिकाद्वयमिष्यते ।", |
| | "क्वचिद्विघटिकापि स्यात् क्वचित् स्यात्तावदुत्तरः ॥ इति कालनिर्णये ।" |
| | ] |
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| "text": "अन्येभ्यस्तु विमुक्तेभ्य आनन्दश्चक्रवर्तिनाम् ।\nमुक्तानां हि शतोद्रिक्तः पितॄणां तेभ्य एव च ॥\nतेभ्योऽप्यृषीणां मुक्तानां कर्मदेवाभिधायिनाम् ।\nतेभ्यश्च मुक्तदेवानां तेभ्यश्चोमापतेस्तथा ॥\nतस्माच्च ब्रह्मणस्त्वेवं मुक्तस्य गरुडादपि ।\nएष एव ततो विष्णुः पूर्णानन्दः प्रकीर्तितः ॥\nयस्य ब्रह्माऽपि मुक्तः सन् विप्लुण्मात्रं समश्नुते ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वात्रिंशत्तु मुहूर्तानां दिनमेकं विदुर्बुधाः ।", |
| | "त्रिंशन्मुहूर्तमथवा मुहूर्तोन्मानभेदतः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥"
| |
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| "text": "सर्वदा जीवमादाय नियमाद् विष्णुरेव हि ।\nजाग्रदादिषु संयाति नान्यथा तु कथञ्चन ॥\nएवं नियमविज्ञप्त्यै जीवास्वातंत्र्यवित्तये ।\nपरिवृत्तिमवस्थासु साभ्यासा वक्ति हि श्रुतिः ॥ इति निर्णये ॥" | | "lines": [ |
| | "सप्तकोटिं च लक्षाणां चतुर्दश च नित्यशः ।", |
| | "अष्टाविंशत्सहस्रं च सप्तांशशतपञ्चकम् ॥ सौरो रथस्त्वहोरात्रात् परियाति दिवि स्थितः ।", |
| | "तत्त्रिभागाधिकं चक्रं मानसोत्तरगं चरेत् ॥", |
| | "नृणां कार्तयुगानां तु योजना मानतो भवेत् ।", |
| | "यावत्सूर्यरथो याति दिवारात्रेण पार्श्वयोः ॥", |
| | "सूर्यस्य तावदेव स्यात् प्रकाशः सर्वतस्तथा ।", |
| | "तमोऽन्धं द्विगुणं तस्माद् काठिन्यात् पृथ्विनामकम् ॥", |
| | "ततो मंडोदकं चापि द्विगुणं परिकीर्तितम् ।॥", |
| | "पञ्चाशत्कोटिविस्तारमेवमंडान्तमुच्यते ॥", |
| | "ततस्त्वंडं च सौवर्णं तद्भिन्नं हरिणा पुरा ।", |
| | "सुषिरं सर्वतो दिक्षु क्षुरधारासमं ततः ॥", |
| | "सुपर्णो वायवे तेन मुक्तान् कामान् प्रयच्छति ॥ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥" |
| | ] |
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| | "उषस्तब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तर य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यः समानेन समानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ग्रामादिकमुत्सर्जद्यायात् ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्साक्षादपरोक्षात् । साक्षादेवापरोक्षमत्ति अनुभवति स्वरूपमन्यच्च सर्वं पश्यतीति साक्षादपरोक्षात् । आपरोक्ष्येण पश्यतामप्यन्येषां भगवत्प्रसादादेव दर्शनं भवति । न भगवतोऽन्यापेक्षयेति साक्षादिति विशेषणम् । अनन्यापेक्षस्याप्यपूर्णत्वं भवतीत्यतो ब्रह्मेति । अन्येषां नियन्तृत्वं चास्तीत्यत आत्मा । अन्यनियन्तृत्वेप्यन्यापेक्षा नास्तीत्यतः सर्वान्तरः । सर्वं सामार्थ्यं स्वान्तरेवास्तीति । जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मेति । साक्षादपरोक्षत्वादिगुणैरेव भेदे सिद्धेऽपि परमार्थतोऽपि जीवेश्वराभेदनिवृत्त्यर्थं त आत्मा इति । तत्र प्रधानतात्पर्यज्ञापनार्थं पुनः पुनरभ्यासः ।" |
| | ] |
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| "text": "स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीया न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अणिमानं भगवन्तम् ।\nस य एषोऽणिमा तेजः परस्यां देवतायाम् इति हि श्रुतिः ।" | | "lines": [ |
| | "देवतान्तरस्यापीदं लक्षणं समानमिति पृच्छति यथा विब्रूयादित्यादिना । चतुष्पात्वादिलक्षणं गोरश्वस्यापि यथा सममेवमेव साक्षादपरोक्षत्वादिलक्षणं तत्तद्देवतावादिभिस्तस्यास्तस्या अंगीक्रियत एव । अतो विशेषनाम वक्ति । अ इति । अतोऽन्यद्विष्णोरन्यदार्तम् । अ इति विष्णोर्हि नाम । न ते विष्णो परो मात्रया इत्यादि श्रुतिप्रसिद्धं विष्णोर्लक्षणम् न दृष्टेर्द्रष्टारमित्यादिना वक्ति ।" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥"
| | "lines": [ |
| | "विनैवान्यप्रसादेन पूर्णसर्वगुणात्मकम् ।", |
| | "पश्यन्ननुभवत्येव स्वरूपं केशवः प्रभुः ॥", |
| | "पश्यत्यव्यवधानेन सर्वं चान्यज्जडाजडम् ।", |
| | "साक्षादेवापरोक्षात् स विष्णुरेव ततः स्मृतः ॥", |
| | "साक्षाच्छब्दः स्वतंत्रत्वमपरोक्षस्त्वनावृतिम् ।", |
| | "अदनं भोग उद्दिष्टस्तस्माद्विष्णुस्तथा स्मृतः ॥", |
| | "ब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादात्मा सर्वनियन्तृतः ।", |
| | "अनियम्यत्वतो नित्यं सर्वैः सर्वान्तरः स्मृतः ॥", |
| | "प्राणादिपञ्चरूपो यो वायुः सर्वनियामकः ।", |
| | "नियन्ता परमो विष्णुर्वायोस्तस्यापि सर्वदा ॥", |
| | "न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न मनोबुद्धिगोचरः ।", |
| | "अनन्तत्वान्महाविष्णुरवाच्योऽश्राव्य एव च ॥", |
| | "यद्यप्येते गुणाः सर्वे विष्णोरेव न चान्यगाः ।", |
| | "तथाऽप्येतैर्गुणैर्युक्तानज्ञाः प्राहुः शिवादिकान् ॥", |
| | "अनाम्नैव ततो विष्णुमाहुर्वेदा अदोषतः ।", |
| | "अदोषत्वाद्गुणोद्रेकाद इत्युक्तो हरिः स्वयम् ॥", |
| | "अगम्यत्वाच्च बुध्यादेरतोऽन्ये सर्व एव तु ।", |
| | "ब्रह्मरुद्रादयो जीवा दुःखिनस्तत्प्रसादतः ॥", |
| | "दुःखमुक्ता निजानन्दं प्राप्नुयुर्नित्यमंजसा ।", |
| | "मुक्तानामपि सर्वेषां विष्णुरेव नियामकः ॥", |
| | "पूर्णानन्दस्य तस्यैव मुक्ता विप्लुट्सुखात्मकाः ।", |
| | "तारतम्येन तिष्ठन्ति ब्रह्मा तेष्वधिकः सदा ॥", |
| | "यथा चंद्रात् सदा भिन्नाः सर्वे तुहिनबिन्दवः ।", |
| | "एवं विष्णोः सदा भिन्ना मुक्ता ब्रह्मादिका गणाः ॥", |
| | "एवं नियन्ता भगवान् पूर्णसर्वगुणार्णवः ।", |
| | "एक एव परो विष्णुरनियम्यः सदोदितः ॥ इत्यादि बृहच्छ्रुतिः ॥" |
| | ] |
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| "text": "इदं मुक्तजीवस्वरूपमायाति । अतोऽनेन सहेदं परं ब्रह्मायातीति परब्रह्मणः पूजार्थं प्रतिकल्पन्ते । यथा राज्ञो ध्वजादिकं दृष्ट्वाऽयं ध्वज आगच्छति तस्माद् राजाऽऽयातीति पूजां प्रतिकल्पन्ते तद्वत् । अन्यथेदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति द्विरुक्तिर्व्यर्था स्यात् । वीप्सात्वे त्वयमायातीत्येकप्रकारेण शब्दाभ्यासः स्यात् ।" | | "lines": [ |
| | "आर्तिर्दुःखं समुद्दिष्टमनार्तो विष्णुरव्ययः इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अतोऽन्यदार्तमित्येतस्माच्च जीवानां भेदः प्रसिद्धः । न हि जीवादन्यस्यार्तिर्युज्यते । अतो जीवेभ्योऽन्यश्च विष्णुरेव । तदन्ये ब्रह्मरुद्रादयः सर्वे जीवा एवेति सिद्धम् ।" |
| | ] |
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| "text": "जीवमादाय गच्छन्तमनुयान्ति दिवौकसः ।\nप्राणाभिमानिनो विष्णुं नृपं परिजना यथा ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "प्रकृतिस्त्वतिसामीप्यादनार्ताऽपि पृथंग् न तु ।", |
| | "उच्यते न स्त्रियो यद्वत् त्रयस्त्रिंशत्सु भेदिताः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "शारीरब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "कहोळब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति । स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति । स यत्रैव चाक्षुषः पुरुषः परांग् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाच । । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तमेव मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ।", |
| | "एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।", |
| | "या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा । या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्मात् ब्राह्मणः पांडित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद् । बाल्यं च पांडित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तम् । ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः ।\nतं यदा प्राप्य जीवात्मा मृतेः पूर्वं विमुग्धताम् ॥\nयाति विष्णुं तदा देवा यान्ति तेजःस्वरूपिणः ।\nतानादाय हरिश्चक्षुःस्थानाद्धृदयमाव्रजेत् ॥\nतदा न किञ्चिज्जानाति जीवो ब्रह्मसमाश्रितः ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "ये दव साक्षादिति पुनः प्रश्नो मुक्तानामपि भगवतो भेदोऽस्तीति ज्ञापयितुम् । यदेव ब्रह्म तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि यन्नैव भवन्ति कदाचन । तमेव मे व्याचक्ष्व मुक्तजीववैलक्षण्येन सहेति द्वितीय एव शब्दार्थः । स तु भगवान् स्वत एवातीताशनायादिरतीतानागतवर्तमानकालेषु ब्रह्मादयस्तु तं विदित्वा तत्प्रसादादेव पश्चादत्येष्यन्ति एतं वै तमित्येतादृशैर्गुणैः साक्षादपरोक्षत्वजीवभेदादिभिर्युक्तमित्यर्थः" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति स विज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "भिक्षाचर्यं चरन्ति मुक्ता अपि ब्रह्मादयस्तस्मादेव परमेश्वराद्विप्लुडानन्दमेव भिक्षन्तो वर्तन्ते । ब्रह्माणनान्मुक्ता एव ब्राह्मणशब्देनोच्यन्ते । न हि ज्ञानादनन्तरं सन्यासस्य कर्तव्यता । येषां तद्योग्यता तेषामपि ज्ञानार्थत्वेनैव सन्यासः । मुक्ता अपि यं भिक्षन्ते सोऽतिपरिपूर्णमहानन्दो भगवान् स्वत एव । तदन्ये ब्रह्मादयो मुक्ता अपि तत एव विप्लुडानन्दभिक्षुका इति विशेषः । तथापि तेषामेषणातीतत्वान्न दुःखम् । पुत्रस्य वित्तस्य च लोकार्थत्वात् लोकैषणायामन्तर्भावः । वित्तस्यापि प्रायः पुत्रार्थत्वात् पुत्रैषणायाम् । लोकैषणाया अपि दुःखरूपत्वात् सापि तेषां नास्त्येवेति दर्शयितुमुभे ह्येते एषणे एव भवत इत्याह । उभे अपि दृष्टादृष्टविषये एषणात्वाद् दुःखरूपे एवेत्यर्थः । पुत्रवित्तैषणे उभे अपि दृष्टविषयत्वादेकैवेत्युभे एवेत्युक्तम् ।" |
| | ] |
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| "text": "हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा ।\nचक्षुरादिषु रूपाणि जाग्रत्काले तयोः सदा ॥\nबहूनि सन्ति तान्येव यदैकीभावमाप्नुयुः ।\nहृदयस्थेन रूपेण तदा जीवो न किञ्चन ॥\nजानातीति विदुः प्राज्ञास्तदा विष्णोः स्वतेजसा ।\nद्योतते हृदयाग्रं च तेन द्वारेण केशवः ॥\nनिष्क्रामेज्जीवमादाय प्राण एनमनुव्रजेत् ।\nप्राणमन्ये तथा देवा विद्या कर्म च योग्यता ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "द्वितीयो ब्राह्मणो ब्रह्माणितुं योग्यः । पांडित्यमागमजज्ञानम् । बाल्यं युक्तिसहितम् । बलयुक्तत्वात् । मौनमुपासनाजम् । अमौनमपरोक्षजज्ञानम् । निर्विद्य नितरां प्राप्य लब्ध्वा । विदलृ लाभ इति धातोः । अथ ब्राह्मणो मुक्तो भवतीत्यर्थः । स मुक्तो येन केनापि वर्तयन्नीदृश एव भिक्षुक एव । न कदाचित् स्वतंत्रो भवति । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति च वक्ष्यति । मुक्तविषयं चैतत् । अत्र पिताऽपिता भवतीत्यादि तत्प्रस्तावे ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ओम् इति भगवद्वचनम् । तत्रैव मुक्तानामानन्दतारतम्यं चोक्तम् । स यो मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवति इत्यादिना । श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानां मुक्तेष्वेव मुख्यत्वात् । यश्च श्रोत्रिय इति ह्यभ्यासः । न ह्यमुक्ता अवृजिना अकामहता वा । न च श्रुतिफलं सम्यक्प्राप्ताः । श्रुतिफलप्राप्तिर्हि श्रोत्रियत्वम् । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः इति भागवते शरीरसम्बंधिनां मोहादियुतत्वम् । मोहदियुतानां न श्रोत्रियत्वमदुःखत्वमकामहतत्वं वा । वृजिनं व्रजनं दुःखं क्लेशो बाधेति चोच्यते इत्यभिधानम् । न च देवादिपदाकामानामिंद्रादिपदाकामानां कश्चिद्विशेषो दृश्यते । अतो मुक्तविषयमेवैतत् ।" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वा अन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति" |
| | ] |
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| "text": "यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nजीवस्य सूक्ष्मरूपं तु प्राप्य स्थूलं परित्यजेत् ॥\nइदं शरीरं भूतेषु विलापयति केशवः ।\nअविद्यां चैव जीवस्य गमयेज्ज्ञानसर्जनात् ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।", |
| | "तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥" |
| | ] |
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| "text": "तद्यथा पेशस्करी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वा अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "मुक्तानां परमागतिः कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादिवचनैश्च भगवदनुग्राह्यत्वं तदानन्दानवाप्तिश्च मुक्तानां दृश्यते ।" |
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| "text": "स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च ।\nशुद्धेन तेन चात्मेष्टं कुरुते रूपमंजसा ॥\nएवं स भगवान् विष्णुर्जीवस्वर्णस्य यन्मलम् ।\nअविद्याकामकर्माद्यमात्माग्नौ नाश्य सर्वकृत् ॥\nस्वेच्छया कुरुते रूपं यद्योग्यं तस्य मुक्तिगम् ।\nपितृजीवस्य पित्र्यं स गान्धर्वं तस्य चैव हि ॥\nदैवं तु देवजीवस्य प्राजापत्यं प्रजापतेः ।\nब्रह्मणो ब्राह्ममेवेति नित्यानन्दस्वरूपकम् ॥\nन योग्यतां विना क्वापि पूर्वप्रज्ञाश्रुतेः क्वचित् ।\nयदा मुक्तो भवेद् ब्रह्मा तदा ब्रह्मा स मुख्यतः ॥\nएवं प्रजापतिश्चैव तथैवान्येऽपि सर्वशः ।\nयथा हि स्वर्णरूप्याद्यं मलहानौ हि तद्भवेत् ॥\nपूर्वं तु योग्यतामात्रं द्विजत्वं बालके यथा ॥ इत्यादि च ।" | | "lines": [ |
| | "बह्वभ्यासात् त आत्मेति मुक्तौ जीवेशयोर्भिदा ।", |
| | "प्रधानतत्परत्वेन दृश्यतेऽत्यादरात् सदा ॥", |
| | "महातात्पर्ययोगाच्च स एवार्थोऽवगम्यते ।", |
| | "तात्पर्यं परमं विष्णोरत्युद्रेके विशेषतः ॥", |
| | "सर्वश्रुतिस्मृतीनां च दृश्यतेऽन्यत् तदर्थतः ।", |
| | "स च जीवेशयोर्भेदे सर्वोद्रेको हि युज्यते ॥", |
| | "बह्वभ्यासस्त आत्मेति श्रुतावादरतस्ततः ।", |
| | "ममात्मेति वचो यत्र विष्णोऽरपि च दृश्यते ॥", |
| | "देहस्यापि स्वरूपत्वज्ञापनं तत्प्रयोजनम् ।", |
| | "न ह्यप्रयोजकं वेदपदं वर्णोऽथवा स्वरः ॥", |
| | "देहस्वरूपता विष्णोर्न ममेति पदं विना ।", |
| | "सम्यक् ज्ञापयितुं शक्या ततस्तत्पदमिष्यते ॥", |
| | "ततस्त आत्मेति वचो भेदाभावे न युज्यते ।", |
| | "भिक्षया भक्षणं तस्मादानन्दस्य ततोऽवदत् ॥", |
| | "मुक्तानामेकदेशत्वं ब्रह्मानन्दव्यपेक्षया ।", |
| | "विप्लुट्त्वं प्रतिबिम्बत्वं श्रुतिषूक्तं हि सर्वशः ॥", |
| | "तथापि पूर्णानन्दत्वममुक्तानां व्यपेक्षया ।", |
| | "ब्रह्मादेस्तारतम्यं च मुक्तावेव सदातनम् ॥", |
| | "दृष्टादृष्टेषणानाशान्निर्दुःखत्वं च सर्वदा ।", |
| | "परब्रह्मत्ववचनं मुक्तानां यत्र दृश्यते ॥", |
| | "जीवेषु ब्रह्मशब्दोक्तैः परत्वं तु विमुक्तितः ।", |
| | "तत्परब्रह्मता तेषां बद्धजीवोच्चता मता ॥", |
| | "ततो ब्रह्माणने योग्यः पांडित्यं प्राप्नुयात् परम् ।", |
| | "पांडित्यमागमज्ञत्वं बाल्यं युक्तिसहायता ॥", |
| | "मौनं तूपासनासिद्धिरमौनं भगवद्दृशिः ।", |
| | "एतान्याप्य भवेन्मुक्तिर्मुक्तो वै भिक्षुको भवेत् ॥", |
| | "न ह्यन्यभिक्षितं विष्णुर्दद्यान्नियमतः क्वचित् ।", |
| | "मुक्तस्य भिक्षितं सर्वं दद्यान्नियमतो हरिः ॥", |
| | "अयोग्यभिक्षणं तेषां न कदाचित्तु युज्यते ।", |
| | "येन केनापि नैतेषां भिक्षावृत्तिर्विनश्यति ॥", |
| | "प्रथमो ब्राह्मणो मुक्तो द्वितीयो योग्य उच्यते ।", |
| | "अपरोक्षविन्मुक्तयोस्तु तार्तीयेनोभयोर्ग्रहः ॥", |
| | "अतो मुक्ता अमुक्ताश्च न स्वतंत्राः कदाचन ।", |
| | "स्वतंत्रस्तु स एवैको भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयोः वायुमयः आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयस्सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनाथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥"
| | "lines": [ |
| | "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।", |
| | "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥", |
| | "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ इत्यादिना च भेदेन महोत्कर्षे परमतात्पर्यं सर्वशाखाणामाह ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च ।" | | "lines": [ |
| | "गार्गिब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "तदेष श्लोको भवति ।\nतदेव सक्तः सह कर्मणैति लिंगं मनो यत्र निषिक्तमस्य ।\nप्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् ॥\nतस्माल्लोकात् पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकामः आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी प्रपच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति, कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नुखलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु चंद्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति इंद्रलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु इंद्रलोकाः ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति, कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माऽतिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपतदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि माऽतिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते ।\nअ इत्युक्तः परो विष्णुस्तत्कामोऽकाम ईरितः ॥\nतथा कामयमानः स योग्यकामस्य चापि तु ।\nकादाचित्कसमुद्भूतेर्भगवत्कामनां विना ॥\nकामितस्याखिलस्याप्तेराप्तकामश्च मुक्तिगः ।\nचिदानन्दात्मकं रूपं कामत्वेन भविष्यति ॥\nयतस्तेनैवाप्तकाम इति मुक्तोऽभिधीयते ।\nमुक्तस्य न पुनः प्राणा उत्क्रामन्ति कदाचन ॥\nजीवोऽपि ब्रह्मशब्दोक्तो जडाद्गुणबृहत्वतः ।\nप्राप्नोति परमं ब्रह्म प्रलये प्रलये सदा ॥\nमअन्यदा स्वेच्छया विष्णोः स्वरूपाद् बहिरेष्यति ।\nस्वेच्छयाऽन्तर्बहिर्वैवं रमते मुक्त आत्मवान् ॥ इत्यादि च ।" | | "lines": [ |
| | "मुक्तानां तारतम्यं हि गार्गिब्राह्मणेनोच्यते । लोका इति मुक्तानामानन्दानुभवाः स्वरूपभूताः । अप्सु वायाविति स्वरूपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । अनतिप्रश्नां वै देवतामतिपृच्छसीति देवतास्वरूपप्रश्नस्यैवावगम्यमानत्वाच्च । न चोपरितनलोकेषु अधस्तनलोकाः आश्रिताः । न च वायुर्गन्धर्वलोकाश्रितः । वाय्वाश्रयत्वश्रुतेः सर्वलोकानाम् । वायुना हि सर्वे लोका नेनीयन्ते इत्यादिना । सप्तस्कन्धगतो लोकान् यो बिभर्ति महाबलः इति हरिवंशेषु । न चानतिप्रश्नत्वं लोकमात्रस्यास्ति । अधस्तनेषु चोपरितना लोकास्तिष्ठन्ति । न च मरुतामेकोऽपि गन्धर्वलोकादवरो विद्यते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "id": "Bruhadaranyaka-484", | | "id": "Bruhadaranyaka-484", |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥" | | "lines": [ |
| | "उक्तं च", |
| | "आ पिबन्त्यखिलान् भोगानित्यापश्चक्रवर्तिनः ।", |
| | "मुक्तास्तेषां वायुसुतश्चक्रो नाम व्यपाश्रयः ॥", |
| | "मुक्तस्तस्य च मुक्तस्तु मरुद्गन्धर्वनामवान् ।", |
| | "सुतो वायोस्तत्सुखानां मौक्तानामन्तरिक्षगः ॥", |
| | "मरुतामेक एवासावन्तरिक्षस्तु वायुजः ।", |
| | "तत्सुखानां च मौक्तानामानन्दाः सूर्यरूपकाः ॥", |
| | "सौराणां चापि मौक्तानामानन्दाश्चंद्ररूपकाः ।", |
| | "आह्लादनाच्चन्द्रनामा देवोऽसावनिरुद्धकः ॥", |
| | "स एव चन्द्रमाविश्य स्थितश्तन्नामकोऽपि सः ।", |
| | "अनिरुद्धसुखानां च मौक्तानामिन्द्र आश्रयः ॥", |
| | "नक्षत्रनामवानिन्द्रो नैवान्यः क्षत्रियोऽस्य हि ।", |
| | "विद्यते त्रिषु लोकेषु ब्रह्माद्यास्तूर्ध्वलोकगाः ॥", |
| | "आनन्दानां तथेंद्राणां मौक्तानां देव आश्रयः ।", |
| | "देवेति लिङ्गगनाम स्याल्लिङ्गात्मा रुद्र उच्यते ॥", |
| | "इन्द्राश्रयः शिवस्यापि सुखानां मुक्तिगामिनाम् ।", |
| | "शिवो हीश्वरनामा स्यात् तत्पारम्यात् सरस्वती ॥", |
| | "इंद्रेत्युक्ता तत्सुखानां ब्रह्माधिर्मुक्तिगामिनाम् ।", |
| | "तत्सुखानां परं ब्रह्म मुक्तिगानां पराश्रयः ॥", |
| | "एवमेव च संसारे बिम्बत्वादुत्तरोत्तरम् ।", |
| | "न परब्रह्मणः कश्चिदाश्रयः स्वाश्रयं यतः ॥", |
| | "तस्याश्रयोऽस्ति चेत्येवं पृच्छतोऽपि शिरः सदा ।", |
| | "भिद्यते पर्वतैरन्धे तमसिस्थस्य दैवतैः ॥", |
| | "तस्माद्ब्रह्म परं नित्यं ज्ञेयं पूर्णमनाश्रयम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तदेष श्लोको भवति ।\nयदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।\nअथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥\nतद्यथाऽहिर्निलयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।", |
| | "ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः ॥ इति भारते ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥" | | "lines": [ |
| | "अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च । संसाराल्लुप्तानां मुक्तानां कानि सुखानि लोकाः रोचमानानि कानि लोकाः । लीनं सुखं क इत्युक्तं कं नाम क्षीयतेऽत्र यत् ॥" |
| | ] |
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| "text": "तदेते श्लोका भवन्ति ।\nअणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।\nतेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वो विमुक्ताः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्तर्यामिब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| |
| "text": "तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः ।\nअणुश्च विततश्चासौ यतोऽन्तर्बहिरेव च ॥\nश्रिया स्पृष्टः श्रीपतित्वादनु वित्तस्तथैव च ।\nतस्य प्रसादात् संयान्ति तल्लोकं सर्वमोक्षिणः ॥\nऊर्ध्वः स भगवान् सर्वविशिष्टो यत्सदैव हि ॥"
| |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "तस्मिञ्च्छ्लुक्लमुत नीलमाहुः पिंगलं हरितं लोहितं च ।\nएष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् तैजसश्च ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हैनमुद्दालकः आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । । मद्रेष्ववसाम पतंजलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता । तमपृच्छाम कोऽसीति । सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति । सोऽब्रवीत् पतंजलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति । सोऽब्रवीत् पतंजलं काप्यं याज्ञिकांश्च यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात् तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत् तदहं वेद तच्चेत् त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयात् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "रूपमाहुः पञ्चविधं तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥\nशुक्लं तु वासुदेवाख्यमनिरुद्धं तु नीलकम् ।\nसंकर्षणं पिंगलं च प्रद्युम्नं हरितं स्मृतम् ॥\nनारायणं लोहितं स्यात् पञ्चरूपाण्यजे हरौ ।\nपञ्चभेदविभिन्नो यस्त्वभिन्नोऽपि स्वरूपतः ॥\nस पन्था ब्रह्मणा ज्ञातः पद्मजेनैव सन्ततम् ।\nपरब्रह्मस्वरूपज्ञो महातेजः श्रियस्तथा ॥\nसम्यक्स्वरूपविज्ञानात् तैजसत्वेन कीर्तितः ।\nभगवत्कर्मकर्तृत्वात् पुण्यकृच्चाभिधीयते ॥\nएवंविधोऽपि तस्यैव प्रसादाद्याति तां गतिम् ।\nअतः पन्थास्समुद्दिष्टो भगवान् केशवः स्वयम् ॥\nस्वगताखिलभेदेन विहीनोऽपि स सर्वदा ।\nसर्वेषां व्यवहाराणां भेदोत्थानां स ईश्वरः ॥\nअभिन्नोऽपि ह्यतो भिन्नः पञ्चभेदादिना मृषा ॥" | | "lines": [ |
| | "पुनस्तस्यैव सर्वनियन्तृत्वमुच्यते ।", |
| | "योऽन्तरो यमयतीति द्वितीययशब्दो विष्णुशब्दपर्यायः ।", |
| | "अकयप्रविसम्भूमसखहा विष्णुवाचकाः ।", |
| | "एकाक्षरा अ इत्येष निर्दोषत्वाज्जनार्दनः ॥", |
| | "आनन्दत्वात् क इत्युक्तः पूर्णत्वाद्य इतीर्यते । इत्यादि शब्दनिर्णये इति स्वप्रतिज्ञातप्रकारेण ।" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C03", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "ब्रह्मवित्पूर्णविज्ञानाल्लोकानां कर्तृवेदनात् ।", |
| | "लोकविद्देवविच्चासौ देवानां देववेदनात् ॥", |
| | "वेदार्थवेदनाच्चैव वेदविद्भूतवित् तथा ।", |
| | "तन्नियन्तृपरिज्ञानादात्मविच्चाप्तवेदनात् ॥", |
| | "सर्ववित् सर्वसारज्ञो यो वेद पुरुषोत्तमम् ।", |
| | "देशाधिष्ठातृविज्ञानाद् देशज्ञ इति चोच्यते ॥", |
| | "यथा तद्वद्धरेर्ज्ञानात् सर्वज्ञ इति वैदिकम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।\nततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्यांगानीति वायुना हि गौतम सूत्रेण सन्दृब्धानि भवन्तीत्येवमेवैतत् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अन्यथोपासका येऽस्य ते यान्ति ह्यधरं तमः ॥\nततः किञ्चिद्विशेषेण दुर्ज्ञानस्याविनिन्दकाः ।\nसम्यगाचार्यवचनमवज्ञाय विरोधिनि ॥\nसत्वबुद्धिं यतः कुर्युरतस्तेऽधिकपापिनः ।\nअप्राप्तत्यागिनः प्राप्तनिष्ठाहीनो हि दोषवान् ॥" | | "lines": [ |
| | "स्यूतं जगदिदं यस्मिन् सूत्रं वायुरसौ स्मृतः ।", |
| | "तं चापि यमयेद्यस्मादन्तर्यामी हरिः स्मृतः ॥" |
| | ] |
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| "text": "अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।\nतांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वांसो बुधो जनाः ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ३ ॥" |
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| "text": "नित्यदुःखस्वरूपत्वादनन्दं तत्तमो मतम् ।\nबोधके विद्यमानेऽपि ये विदुर्न परं हरिम् ॥\nतेऽपि यान्ति तमो घोरं नित्योद्रिक्तासुखात्मकम् ॥ इत्यादि च ।" | | "lines": [ |
| | "यः अप्सु तिष्ठन् अद्भ्यो अन्तरो यं आपो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ४ ॥" |
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| "text": "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।\nकिमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः अग्नौ तिष्ठन्, अग्नेः अन्तरो यं अग्निः न वेद, यस्य अग्निः शरीरं यः अग्निमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥५॥" |
| | ] |
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| "text": "यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् ।\nयोग्यः शरीरच्छेदादेः कथं दुःखी तदा भवेत् ॥\nदुःखी शरीरसम्बन्धाज्जीवो विष्णोः प्रसादतः ।\nअदुःखी विप्लुडानन्दं मुक्त एव च भोक्ष्यति ॥\nनित्यमुक्तः पूर्णसुखः स्वतंत्रः पुरुषोत्तमः ।\nपरतंत्रः कथं जीवो योग्यः सोऽस्मीति वेदितुम् ॥\nतस्मात् सोऽस्मीति नैवायं विजानीयात् कदाचन ।\nतदीयोऽस्मीति जानीयात् सर्वदैव बुधस्ततः ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "यः अन्तरिक्षे तिष्ठन्, अन्तरिक्षात् अन्तरो यं अन्तरिक्षं न वेद, यस्य अन्तरिक्षं शरीरं यः अन्तरिक्षमन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ ६ ॥" |
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| "text": "यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मा अस्मिन् सन्दोघे गहने प्रविष्टः ।\nस विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुः न वेद, यस्य वायुः शरीरं यः वायुमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ७ ॥" |
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| "text": "यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nतस्य लोकः स एवैको यो लोकः परमात्मनः ॥\nस हि विष्णुः परो वायोरपि कर्ता प्रकीर्तितः ।\nविश्वो वायुः समुद्दिष्टः पूर्णत्वाज्जीवसङ्घतः ॥\nतदन्यस्यापि सर्वस्य कर्तैको विष्णुरेव हि ।\nप्रविष्टो गहने देहमध्ये सन्दोहनामनि ॥\nतज्ज्ञानी याति तं लोकं तत्प्रसादाच्च वर्तते ॥" | | "lines": [ |
| | "यः दिवि तिष्ठन् दिवः अन्तरो यं द्यौः न वेद, यस्य द्यौः शरीरं यः दिवमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ८ ॥" |
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| "text": "इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।\nय एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः आदित्ये तिष्ठन् आदित्यात् अन्तरो यं आदित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरं यः आदित्यमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ९ ॥" |
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| "text": "यदैतमनुपश्यन्त्यात्मानं देवमंजसा ।\nईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्यो अन्तरो यं दिशो न विदुः, यस्य दिशः शरीरं यः दिशोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १० ॥" |
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| "text": "यस्मादर्वाक् संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।\nतद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः चंद्रतारके तिष्ठंश्चंद्रतारकाद् अन्तरो यं चंद्रतारकं न वेद, यस्य चंद्रतारकं शरीरं यश्चंद्रतारकमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ ११ ॥" |
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| "text": "न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥\nज्योतिषां ज्योतिरचलं तद्देवाः समुपासते ॥" | | "lines": [ |
| | "यः आकाशे तिष्ठन् आकाशात् अन्तरो यं आकाशो न वेद, यस्य आकाशः शरीरं यः आकाशमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १२ ॥" |
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| "text": "यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।\nतमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद, यस्य तमः शरीरं यः तमसोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १३ ॥" |
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| "text": "प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥\nमूलप्रकृतिसंयुक्तं यद्गतं प्रतिपूरुषम् ॥" | | "lines": [ |
| | "यः तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद, यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिदैवतमथाधिभूतम् ॥ १४ ॥" |
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| "text": "प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ।\nमनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो अन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।\nमृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः प्राणे तिष्ठन् प्राणाद् अन्तरो यं प्राणो न वेद, यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १६ ॥" |
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| "text": "तस्य रूपगुणाद्येषु न कश्चिद्भेद इष्यते ॥\nतद्भेददर्शी संयाति मृत्योर्मृत्य्वभिधं तमः ॥" | | "lines": [ |
| | "यः वाचि तिष्ठन् वाचो अन्तरो यं वांग् न वेद, यस्य वाक् शरीरं यः वाचमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥" |
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| "text": "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।\nविरजः पर आकाशादज आत्मा महान् ध्रुवः ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "यश्चक्षुषि तिष्ठंश्चक्षुषो अन्तरो यं चक्षुः न वेद, यस्य चक्षुः शरीरं यः चक्षुरन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १८ ॥" |
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| "text": "तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।\nनानुध्यायेद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् \" इति ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "यः श्रोत्रे तिष्ठन् श्रोत्रादन्तरो यं श्रोत्रं न वेद, यस्य श्रोत्रं शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ॥ १९ ॥" |
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| | "यः मनसि तिष्ठन् मनसो अन्तरो यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीरं यः मनोऽन्तरो यमयति, एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ २० ॥" |
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| "text": "स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवत्येतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येतद्ध स्म वैतत् पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते । किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् ।\nनित्यबोधात्मकत्वाद्यो मुनिः प्रोक्तो जनार्दनः ।\nतं विद्वांश्च मुनिर्नाम बोधस्तस्याप्यमुख्यतः ।\nयं विदित्वा विमुक्ताश्चायुक्तकामविवर्जिताः ॥\nउत्पत्तिलयहीनाश्च नित्यानन्दैकभोगिनः । आनन्दभिक्षां विष्णूत्थां चरन्त्यज्ञानवर्जिताः ॥\nस एष मोक्षदो विष्णुर्यत्कल्याणं कृतं मया। पापं कृतं मयेत्येतन्न कदाचित् करिष्यति ॥\nकृते मया पुण्यपापे इति यच्चेतनात्मनाम् ।तत्सर्वमत एवोक्तं विष्णोः सर्वेश्वरेश्वरात् ॥\nतीर्णो हि वर्तते नित्यं पुण्यपापे जनार्दनः ।\nनैनं कदाचित् तपतः पुण्यपापे जनार्दनम् ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "यः रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यं रेतो न वेद, यस्य रेतः शरीरं यः रेतोऽन्तरो यमयति, एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता अमतो मन्ता अविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम् । ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥ २३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तदेतदृचाभ्युक्तम् ।\nएष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।\nतस्यैव स्यात् पदं वित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति ॥\nतस्मादेवंवित् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति\nनैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति\nनैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति\nविपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राड् इति होवाच याज्ञवल्क्यः\nसोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "पृथिव्याद्या देवतास्तु देहवद्यद्वशत्वतः ।", |
| | "शरीरमिति चोच्यन्ते यस्य विष्णोर्महात्मनः ॥", |
| | "अन्तस्थो देवतानां च न विदुर्यं च देवताः ।", |
| | "प्रविष्टत्वाद्देवतास्थः सोऽन्तरः स्ववशत्वतः ॥", |
| | "बाह्यापेक्षां विना यस्तु रमते सोऽन्तरः स्मृतः ।", |
| | "अतिप्रियत्वाच्च हरेरन्तरत्वमुदाहृतम् ॥", |
| | "जीवानां स्वप्रियत्वं च विष्णुना नियतं यतः ।", |
| | "तस्य प्रियत्वं नान्येन देवस्य नियतं क्वचित् ॥", |
| | "स्वतंत्रः सन्नियन्ताऽसावन्तर्यामी ततः स्मृतः ।", |
| | "देवतानां स्वभावोऽपि स्वरूपमपि सर्वदा ॥", |
| | "तदधीनं ततो यामी वासुदेवः प्रकीर्तितः ।", |
| | "स्वभावसत्तादातृत्वं यन्तृत्वमिति कथ्यते ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः ।\nहृदिस्थविष्णौ सन्तोषः सदैवोपरमः स्मृतः ॥\nतितिक्षा द्वन्द्वसहता क्षमा क्रोधासमुत्थितिः ॥इति शब्दनिर्णये ॥" | | "lines": [ |
| | "अधिभूतं सर्वजीवा अध्यात्मं तच्छरीरगाः ।", |
| | "देवतास्ताः स्वलोकस्था अधिदैवाभिधा मताः ॥", |
| | "लोकाभिमानिन्यस्ता एवाधिलोका इतीरिताः ।", |
| | "यज्ञाभिमानिनो देवा अधियज्ञा इति स्मृताः ॥ इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "भवनाधिकारे स्थितत्वादधिभूतम् ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २६ ॥"
| | "lines": [ |
| | "पृथुं नारायणं वाति समादायैव पक्षिराट् ।", |
| | "अतः स पृथिवीत्युक्तस्त्वन्तरिक्षं हरः स्मृतः ॥", |
| | "स्वान्तर्गतं यतः सर्वमिच्छया क्षपयेदसौ ।", |
| | "द्यौर्नाम देवी विद्युत्स्यात् साक्षादेव सरस्वती ॥", |
| | "द्योतनात् सर्ववस्तूनां तमो दुर्गा प्रकीर्तिता ।", |
| | "यतः संग्ग्लपयेत् सर्वांस्तेजः श्रीः परिकीर्तिता ॥", |
| | "आकाशो विघ्न उद्दिष्टः काशते हि पृथूदरः ।", |
| | "आपो वरुण उद्दिष्टो तदेतत् पालयत्यसौ ॥", |
| | "आत्मा विज्ञानमिति तु सर्वजीवाभिमानवान् ।", |
| | "ब्रह्मैवोक्तस्त्विमे सर्वेऽप्यनुक्ता याश्च देवताः ॥", |
| | "ये च जीवाः परे सर्वे नियता विष्णुनैव हि ।", |
| | "जीवानां नियमेऽजीवं किमु वाच्यमिति श्रुतिः ॥", |
| | "पृथक्तन्नियमं नैषा वक्ति सिद्धत्वतः स्वतः ।", |
| | "स एष सर्ववेत्ता हि परमात्परमो हरिः ॥", |
| | "नान्यो वेत्ता स्वतंत्रोऽस्ति जीवाः सर्वे हि दुःखिनः ।", |
| | "यदि स्वतंत्रा नैवैते दुःखिनः स्युः कदाचन ॥", |
| | "अत आर्तिमतामार्तिदाता मुक्तिप्रदश्च सः ।", |
| | "भगवान् परमो विष्णुः स्वतंत्रः सर्वदैकराट् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04",
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| |
| "text": "न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥\nब्रह्मायमाप्तकामत्वादेवं यो वेद तं परम् ।\nआप्तकामोऽभयश्चैव भवेद् विष्णोरनुग्रहात् ॥ इति च ।"
| |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "brahmanam", |
| "text": "मैत्रेयीब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "अक्षरब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः मैत्रेयी च कात्यायनी च । तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "पूर्वं गार्ग्या जीवानामुत्तरोत्तराश्रयत्वं सर्वेषां भगवदाश्रयत्वं च श्रुतम् । न तु मूलप्रकृतेराधारत्वमाधेयत्वं वा । अतः पुनः पृच्छति । विजिगीषुकथात्वाद् ब्राह्मणानुज्ञया । स्वभर्तुर्विद्याबलं जानन्त्यपि युष्माकमयं जेतुं न शक्य इति ज्ञापयित्वा तेषामुपकारार्थं च पप्रच्छ । न च युक्त्या पूर्वमुपरता । भार्यात्वाद् भगवतोऽन्याधारत्वं नाशंक्यमित्युक्ते भीत्यैवोपरता । भगवतोऽन्याधारत्वं च सर्वाधारमूलप्रकृतेरपि भगवानेवाधार इत्युक्ते युक्तित एव निवारितं भवति । नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रित्यादियुक्तिभिश्च । अस्थूलत्वादियुक्तिभिश्च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "वादो जल्पो वितंडेति त्रिविधा विदुषां कथा ।", |
| | "केवलं तत्त्वविज्ञानमुद्दिश्य गुरुशिष्ययोः ॥", |
| | "अन्ययोर्वा बहूनां वा निर्दुष्टमनसां कथा ।", |
| | "वाद इत्युच्यते सद्भिर्जयस्तत्रार्थिको भवेत् ॥", |
| | "विजये शिष्यताऽन्येषां पूजा च जयिनः सदा ।", |
| | "पुनश्च संशयो यत् स्यात् तेषां तस्यापि वारणम् ॥", |
| | "कर्तव्यं जयिना नित्यमशक्तस्य स्वतोऽधिकात् ।", |
| | "अन्योन्यनिर्णयश्चेत् स्यात् तदा सब्रह्मचारिणः ॥", |
| | "पृष्टेन प्रथमं मानं वक्तव्यं वादिना शुभम् ।", |
| | "वेदाः सर्वे शुभं मानं सेतिहासपुराणकाः ॥", |
| | "सपञ्चरात्रमीमांसाः स्मृतयश्चाप्यनन्तरम् ।", |
| | "तदन्यदशुभं प्रोक्तं न प्रयोज्यं कथासु च ॥", |
| | "मिश्रमक्षानुमाने तु ग्राह्ये शब्दार्थनिर्णये ।", |
| | "अदुष्टमिंद्रियं त्वक्षमुपपत्तिस्तथाऽनुमा ॥", |
| | "अनुमैव त्वभावाख्यो ह्यर्थापत्त्युपमे तथा ।", |
| | "उपपत्तिभेदा यत्तेऽपि वाक्यमेवागमः शुभम् ॥", |
| | "तत्त्वनिर्णयवैलोम्यं संवादो वा विरोधिते ।", |
| | "पराजय इति प्रोक्तः समः सर्वकथासु च ॥", |
| | "तत्त्वनिर्णयवैलोम्ये दण्ड्या वादकथास्वपि ।", |
| | "गुरुणैव त्ववश्यानां राजा दंडं प्रयोजयेत् ॥", |
| | "गुरुदंडस्तु वाचा स्याद् राजदंडोऽर्थदेहतः ।", |
| | "गुरुदंडोऽप्यर्थतः स्यात् संवादे व्रततोऽपि वा ॥", |
| | "राजदंडो बलाच्च स्याद्दोषस्य गुरुलाघवात् ।", |
| | "संवादे दण्ड्यता नास्ति जल्पादौ च कथञ्चन ॥", |
| | "तत्त्वविप्लवकर्तारं संसत्सु च पराजितम् ।", |
| | "छित्वा जिह्वां च काकांकं राजा राज्याद्विवासयेत् ॥", |
| | "अन्यसाम्यमभेदो वा नीचता वा कुतश्चन ।", |
| | "विष्णोः श्रीपूर्वकाणां च व्यत्यासो गुणदोषतः ॥", |
| | "तद्भक्तेरन्यधर्मत्वं पञ्चैते तत्त्वविप्लवाः ।", |
| | "तत्त्वविप्लावकं शूद्रं वैश्यं क्षत्रियमेव वा ॥", |
| | "हन्यादेवाविचारेण विप्रजिह्वां तथोद्धरेत् ।", |
| | "स्वसिद्धान्ते प्रमाणं च परसिद्धान्तदूषणम् ॥", |
| | "वक्तव्यमुभयं वादे जल्पे चेति सतां मतम् ।", |
| | "अवाक्यदूषणं तर्कादागमादेव साधनम् ॥", |
| | "वाक्यतात्पर्यविज्ञप्त्यै मानमन्यन्न चान्यथा ।", |
| | "सतोरेव यदा स्पर्धा गुणतोऽर्थार्थमेव वा ॥", |
| | "तदा जल्पः समुद्दिष्टस्तत्र विद्यां परीक्षयेत् ।", |
| | "विद्यापरीक्षापूर्वा हि सत्कथा जल्प उच्यते ॥", |
| | "सर्वज्ञा वैष्णवाः पञ्च सप्त वोभयसंमताः ।", |
| | "अधिका वा यथालब्धाः प्राश्निकास्तु परीक्षकाः ॥", |
| | "उभयोः प्रश्नकर्तृत्वात् प्राश्निका इति कीर्तिताः ।", |
| | "तदभावे गुणोद्रेकं दर्शयेतां पृथग्जने ॥", |
| | "विद्यासाम्ये कथा कार्या ह्यन्यथैकपराजयः ।", |
| | "विद्योनो दण्ड्य एव स्याद्यदि नोच्चस्य शिष्यताम् ॥", |
| | "व्रजेत् पश्चाद्यथा वाद एवं जल्पः प्रकीर्तितः ।", |
| | "अर्थनिर्णयहेतुत्वाद्वादे प्रश्नो जयेऽपि तु ॥", |
| | "न जल्पे तु पुनः प्रश्नः सभ्यानुज्ञां विना भवेत् ।", |
| | "स्पर्धा सतां वितंडा स्यात् तत्त्वविप्लावकैर्यदा ॥", |
| | "मूलपक्षग्रहापेता वितंडा कविभिर्मता ।", |
| | "सतामेव वितंडा स्यादसतां जल्प एव तु ॥", |
| | "एवं जल्पो वितंडेति ह्युभयोः सहिता कथा ।", |
| | "अप्रकाश्यः स्वपक्षो हि पाषंडानां यतस्ततः ॥", |
| | "अग्रहेणैव पक्षस्य तर्कागमबलेन तु ।", |
| | "दूषयेदेव पाषंडास्तत्त्वविप्लावकान् सदा ॥", |
| | "तत्पक्षाणां निषेध्यत्वात् तेषां पक्षग्रहो भवेत् ।", |
| | "विष्णुभक्त्यन्यधर्माख्यस्तत्त्वविप्लव एव तु ॥", |
| | "बौद्धादीनां यतः सर्वे तत्त्वविप्लावकास्ततः ।", |
| | "सर्वनास्तिकवादी वा स्वमनीषामतोऽपि वा ॥", |
| | "तस्यापि पक्षं संश्रित्य दूषयेद्वाक्ययुक्तितः ।", |
| | "यस्य नैवागमो मानं तं ब्रूयादागमाश्रयः ॥", |
| | "धर्मार्थोऽथ वृथैवायं तव पक्षस्य सङ्ग्रहः ।", |
| | "धर्मार्थश्चेन्न धर्मो हि शक्यो द्रष्टुं विनाऽगमात् ॥", |
| | "यथाऽनुमीयते हिंसा पापहेतुस्तथैव हि ।", |
| | "धर्महेतुत्वमप्यस्या अनुमातुं सुशक्यते ॥", |
| | "वृथा पक्षं वृथा हन्याद्यदि कश्चित् किमुत्तरम् ।", |
| | "इत्यशक्तौ सतां सर्वे सम्भूयापि निवारणम् ॥", |
| | "कुर्युरेवासतां सन्तस्तत्त्वविप्लाविनां जये ।", |
| | "येषां विष्णोः समं किञ्चिदधिकं वा न तु क्वचित् ॥", |
| | "क्षराक्षराभ्यां भिन्नं च विष्णुं पश्यन्ति ये सदा ।", |
| | "तारतम्यविदः सर्वजीवानां प्रकृतेरपि ॥", |
| | "भगवद्धर्मिणो नित्यं ते सन्तः परिकीर्तिताः ।", |
| | "पराजितेष्वसत्सूक्तं राजा दंडं प्रपातयेत् ॥", |
| | "जितेषु सत्स्वसद्भिस्तु राजोदासीनतां व्रजेत् ।", |
| | "यावदेषां विजेता स्यादथ दंडं निपातयेत् ॥ इत्यादि ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेत्थ तदेव मे ब्रूहीति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "बाणस्त्वयोमयः प्रोक्तः शरो नालोऽस्य कीर्तितः इत्यभिधानम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियामवृद्धं तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "कर्मारस्तु तदा बाणं तीक्ष्णमंजलिकाभिधम् ।", |
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| "text": "स होवाच न वा ओ पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा ओ जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा ओ पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा ओ वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा ओ पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा ओ ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा ओ क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा ओ लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । न वा ओ वेदानां कामाय वेदाः प्रियाः भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा ओ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ओ द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो लोकान् । वेद देवास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "दीप्तेराकाशशब्दोक्ता श्रीर्हि सर्वाश्रया मता ।", |
| | "तदाश्रयः परो विष्णुः सोऽस्थूलादिगुणो मतः ॥ इति स्कान्दे ।" |
| | ] |
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| "text": "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽथापरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "स यथाऽऽर्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥"
| | "lines": [ |
| | "पुनः प्रश्नः सर्वाधारा प्रकृतिरित्यनुपचरितत्वेनावधारणार्थम् । आकाश एवेत्यवधारणात् ।", |
| | "पुनरुक्तिःशब्ददोषो न्यूनाधिक्यादिकं तथा ।", |
| | "न जिगीषुकथायां च कारणं स्यात् पराजये ॥", |
| | "क्वचिद्विद्याधिकस्यापि स्खलनं सम्भवेद्यतः ।", |
| | "तत्त्वनिर्णयवैलोम्यं विलम्बो वा मुहूर्ततः ॥", |
| | "विद्यादौर्बल्यहेतुः स्यादतस्तस्मिन् पराजयः ॥ इति ब्रह्मांडे ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तमेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा ओऽयमात्माऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥"
| |
| },
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| "text": "बाह्याभ्यन्तरविशेषाभावेन सर्वत्र लवणरसघन एव ।" | | "lines": [ |
| | "अतस्तत्त्वनिर्णयविरोधिपुनरुक्त्यादीनि निग्रहः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन् न वा अहमिमं विजानातीति स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा ओऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "न वा अहमिमं विजानातीति । ओयमिमं परमात्मानं जीवो न विजानातीत्यत्रैव भगवान् मोहान्तं मोहाख्यं नाशमापीपिपत् प्रापयामास । अतोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाचीति सिद्धम् । अन्यथा कथमहं विजानातीति युज्येत ।" | | "lines": [ |
| | "प्रसिद्धस्थूलसूक्ष्मादिवैलक्षण्याज्जनार्दनः ।", |
| | "अस्थूलादिरिति प्रोक्तो नैव स्थौल्याद्यभावतः ॥ अनावृत्तेस्तमो नास्य स्वातंत्र्यान्नाद्यते क्वचित् ।" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् केन कं जिघ्रेत् केन कं रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासाः मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृताः तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यो पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "एतावद्विज्ञातुः परमात्मनो विज्ञानादिकमेव ह्यमृतत्वं मोक्षः ।\nविष्णोर्ज्ञानादिकं मोक्षस्तदभावे कुतः सुखम् ।\nज्ञेयाभावान्न हि ज्ञानं ज्ञानाभावे हि शून्यता ।\nतस्माज्ज्ञेययुतो मोक्षः सुखरूपत्वतः सदा ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥"
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| "text": "वंशब्राह्मणम्"
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| "text": "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।\nगौपवनः पौतिमाष्यात् ।\nपौतिमाष्यो गौपवनात्।\nगौपवनः कौशिकात् ।\nकौशिकः कौंडिन्यात् ।\nकौंडिन्यः शांडिल्यात् ।\nशांडिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "गौतमः आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः गार्ग्याद् ।\nगार्ग्यो गार्ग्याद् ।\nगार्ग्यो गौतमात्।\nगौतमः सैतवात् ।\nसैतवः पाराशर्यायणात् ।\nपाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् ।\nगार्ग्यायण उद्दालकायनाद् ।\nउद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्यंदिनायनान्माध्यंदिनायनः सौकरायणात् ।\nसौकरायणः काषायणात् ।\nकाषायणः सायकायनात् ।\nसायकायनः कौशिकायनेः॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मंत्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "कौशिकायनिः घृतकौशिकात्\nघृतकौशिकः पाराशर्यायणात् ।\nपाराशर्यायणः पाराशर्यात् ।\nपाराशर्यो जातूकर्ण्यात् ।\nजातूकर्ण्यः आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः औपबन्धनेरौपन्धनिरासुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाजः आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः माण्टिर्गौतमात् गौतमो वात्स्यात् वात्स्यः शांडिल्यात् शांडिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवात् गालवो विदर्भी कौंडिन्यात् विदर्भीकौंडिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरो अयास्यात् आंगिरसादयास्य आंगिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणात् दध्यंग्ङाथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात् प्रध्वंसन एकऋषेः एकऋषिर्विप्रचित्तेः विप्रचित्तिः व्यष्टेः व्यष्टिः सनारोस्सनारुः सनातनात् सनातनः सनकात् ।\nसनकः परमेष्ठिनः।\nपरमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C04", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "अवरेभ्योऽपि शृण्वन्ति परमाश्च क्वचित् क्वचित् ।\nलीलयैव न चैतेषां परमत्वं विहीयते ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "द्यावापृथिव्यौ श्रीभूमी केशौ सूर्यविधू मतौ ॥", |
| | "दीप्तेः पृथुत्वाज्ज्ञानाच्च तथाऽऽह्लादविधेरपि ।", |
| | "तदाधारो हरिर्नित्यं स्वातंत्र्येण प्रशासकः ॥", |
| | "आधारत्वं श्रियो यच्च तच्च विष्णोः प्रशासनात् ।", |
| | "तद्वशान्न स्वतंत्रत्वं स स्वतंत्रो हरिः सदा ॥ इति महामीमांसायाम् ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।", |
| | "न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥ इति वाराहे ।" |
| | ] |
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| | "आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे इत्यादेश्च । न सत्तन्नासदुच्यते अदुःखमसुखं समम् न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् इत्यादि च ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्रथमं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "शाकल्यब्राह्मणम्" |
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| | "अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।\nपूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिंद्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशा इति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः ।\nपूर्णं च तत्परं रूपं पूर्णात् पूर्णाः समुद्गताः ॥\nपरावरत्वं तेषां तु व्यक्तिमात्रविशेषतः ।\nन देशकालसामथ्यैः पारावर्यं कथञ्चन ॥\nपूर्वरूपस्य पूर्णस्य पूर्णं यदवतारगम् ।\nरूपं तदात्मन्यादाय पूर्णमेवावतिष्ठते ॥\nलौकिकव्यवहारो यो भूभारक्षपणादिकः ।\nतददृष्टिं विना नान्यो लयः कृष्णादिनां क्वचित् ॥" | | "lines": [ |
| | "ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः ।", |
| | "महीत्युक्तं हि माहात्म्यं महिमानो हि तन्मिताः ॥", |
| | "एवं हि महिमाशब्दस्तद्वशत्वं वदत्ययम् ।", |
| | "यत्र माहात्म्यवाची स्यान्महत्वं महिमा तथा ॥", |
| | "त्रयस्त्रिंशत्सुराणां हि परिवारास्ततः परे ।", |
| | "षण्णामेते त्रयाणां ते ते द्वयोः साधिकस्य तौ ॥", |
| | "एकस्य सोऽपि क्रमतः पराधीनस्वरूपिणः ।", |
| | "पराधीनबलाश्चैव पराधीनप्रवृत्तयः ॥", |
| | "एक एव स्वतंत्रोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
| | ] |
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| "text": "ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदेनैन यद्वेदितव्यम् ॥" | | "lines": [ |
| | "कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चंद्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीदंवसु सर्वं हितमिति तस्मात् वसव इति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते ।\nखं प्रकाशस्वरूपत्वात् ब्रह्मतद्व्याप्तरूपतः ॥\nपुनः खं सुखरूपत्वम् पुराणं तदनादितः ॥\nवायोश्च रतिदं यस्माद्वायुरं ब्रह्म तत्परम् ।\nख्यातत्वाच्चापि तत्खं स्याद्रौहिणेयस्तथाऽवदत् ॥\nवेदोऽयं ज्ञानरूपत्वादिति यं ब्राह्मणा विदुः ।\nनिर्दोषत्वाद इत्युक्तस्तेन वेद्यं सदाऽखिलम् ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥", |
| | "प्रथितं हरिमादाय वातीति प्रथिवः स्मृतः ।", |
| | "तद्भार्या पृथिवी नाम यत्तदिच्छानुसारिणी ॥", |
| | "सर्वज्ञानात् तथायुष्ट्वात् सूत्रात्मा वायुरुच्यते ।", |
| | "श्रद्धानामैव तत्पत्नी सर्वस्यान्तर्निरीक्षणात् ॥", |
| | "अन्तरिक्षमिति प्रोक्ता देवेभ्योऽधिकवीक्षणात् ।", |
| | "आदिकालस्थितो यस्मादादित्यस्तु सदाशिवः ॥", |
| | "द्यौरुमा च समुद्दिष्टा वाग्रूपा द्योतिका यतः ।", |
| | "त एते सर्वदेवेभ्यो विशिष्टास्तद्वशाः परे ॥", |
| | "नक्षत्रमिंद्र उद्दिष्टश्चंद्रः काम उदाहृतः ।", |
| | "अत्राणात् सूर्यचंद्राद्यैराह्लादाच्चैव हेतुतः ॥", |
| | "वासयन्ति जगद्यस्मादेतेऽष्टौ वसवः स्मृताः ।", |
| | "ज्ञानादिषड्गुणाः षट्सु तदन्येभ्योऽधिका यतः ॥", |
| | "वसुष्वपि त एवोच्चा वींद्राद्याः पूर्वकीर्तिताः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "द्वितीयं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदाऽस्माच्छरीरात् मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं, देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्ठा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥", |
| | "बृहस्पतिरिति ह्येते रुद्रा इत्येव कीर्तिताः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥", |
| | "धात्रर्यमाद्या आदित्या इंद्राविष्णू विनैव तु ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रयं शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "कतम इंद्र कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेंद्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ज्ञानदानं तु देवानां फलदानं तु कर्मणाम् ।\nविष्णुना विहितं पूर्वं पुनर्देवनरासुराः ॥\nब्रह्माणमपि पप्रच्छुर्देवानां सद्गुणोच्छ्रितेः ।\nअनहंकारमात्रं तु ब्रह्मणा विहितं सदा ॥\nसर्वोच्चमोक्षसम्प्राप्त्यै नराणां ज्ञानसाधनम् ॥\nदेवादीनां दानमेव हविरादेः प्रकीर्तितम् ।\nतमःप्राप्तिविलम्बाय दैत्यानां विहिता दया ॥ इति प्रवृत्ते ॥" | | "lines": [ |
| | "स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥", |
| | "स एव वज्र इंद्रस्य सोऽशनिश्चाशनादरेः ।", |
| | "यज्ञो नामेंद्रपुत्रो यो जयन्त इति चोच्यते ॥", |
| | "स एव पशुमानित्वात् पशवश्चेति कथ्यते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "तृतीयं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेतेषु हीदं सर्वं षडिति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सत्यं तदेतत्त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥" | | "lines": [ |
| },
| | "कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥" |
| {
| | ] |
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| |
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| |
| "text": "हरणाद्यज्ञभागादेर्ज्ञानादेर्दानतस्तथा ।\nयानादव्यवधानेन परस्य ब्रह्मणस्तथा ॥\nब्रह्मा हृदय इत्युक्तस्तस्यैवंविदपि ध्रुवम् ।\nहृतिदानस्वर्गयानपात्रं स्यात् तत्प्रसादतः ॥\nहृत्वैवास्मै ददत्यद्धा स्वकीयाश्चान्य एव च ॥ इति निर्णये ।"
| |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "चतुर्थं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "तद्धैतदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमांल्लोकान् जित इन्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यं ह्येव ब्रह्म ॥"
| | "lines": [ |
| | "एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥", |
| | "दक्षाग्निप्रमुखाः सर्वे प्राणा एव हि वायुजाः ।", |
| | "रुद्रा अपि तदावेशात् पृथंग्नोदीरिता इह ॥", |
| | "काम एवानुविष्टत्वादनिरुद्धश्च नोदितः ।", |
| | "मन्वावेशादिंद्रजस्तु संख्यायामनुवेशितः ॥", |
| | "अश्विनौ निर्ऋतिश्चैव कुबेरश्च विनायकः ।", |
| | "अर्यम्ण्यंशादिचतुर्षु विशेषावेशसंयुताः ॥", |
| | "अत्रोक्ता अपि पृथिव्याद्या अन्तर्यामिब्राह्मणे भवन्ति ।", |
| | "षट्सु प्रधानास्तिस्रो हि वायुवींद्रमहेश्वराः ।", |
| | "स्वभार्याणां स्वाश्रयत्वात् ते लोका ज्ञानरूपतः ॥", |
| | "पदैक्याद्ब्रह्मवाय्वोस्तु पदसाम्याच्छिवस्य च ।", |
| | "शेषस्यापि तु नैवोक्तिः पृथक् श्रद्धा च मारुतः ॥", |
| | "द्वौ देवाविति सम्प्रोक्तावन्नं श्रद्धा प्रकीर्तिता ।", |
| | "अतीतत्वाद्देवताभ्यो नेतृत्वाच्चान्नमुच्यते ॥", |
| | "श्रद्धेति वायोः पत्नी सा प्राणो वै विष्णुरुत्तमः ।", |
| | "णेत्येवानन्द उद्दिष्ट आसमन्तात् प्रकृष्टतः ॥", |
| | "प्राणो हि भगवान् विष्णुरध्यर्धो वायुरुच्यते ।", |
| | "अध्यर्धा हि गुणा नित्यं वायोरध्यर्ध एव तत् ॥", |
| | "न चैकत्वं भवेद्वायोस्तद्विशिष्टो यतो हरिः ।", |
| | "न च द्वितीयता तस्मिन् प्रीतिरत्यधिका हरेः ॥", |
| | "तेनाध्यर्द्धगुणो यस्मात् सर्वस्माद् देवतागणात् ।", |
| | "न चाशक्यं न चाप्राप्यमतोऽध्यर्ध इतीरितः ॥", |
| | "अत्यन्तरंगं यत्तस्मान्न हरेः पृथगीरिता ।", |
| | "श्रीः स्वरूपविभेदेऽपि सर्वोत्कृष्टाऽपि नित्यशः ॥", |
| | "तस्या अपि परो विष्णुर्गुणैः सर्वैरदोषवान् ।", |
| | "एक इत्युच्यते नित्यं यस्मान्नान्यस्तथाविधः ॥", |
| | "तत्परो वा गुणोद्रेके ब्रह्माऽसौ गुणपूर्तितः ।", |
| | "तथात्वेन यतो नित्यमविकारेण याति हि ॥ त्यदित्युक्तास्ततो विष्णुः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "पञ्चमं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "पृथिव्येव यस्यायतनं अग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| "text": "आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवांस्ते देवाः सत्यमेवोपासते ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सदा सर्वगुणापानादापो नारायणः स्मृतः ।\nद्वितीयं रूपमसृजद्वासुदेवं स आत्मनः ॥\nब्रह्म सत्यमिति प्राहुर्वासुदेवाभिधं प्रभुम् ।\nतस्माद् ब्रह्माऽजनि ततो देवाः सर्वेऽपि जज्ञिरे ॥\nतस्माद्ब्रह्मादयो देवा वासुदेवमुपासते ।" | | "lines": [ |
| | "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावदित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥" |
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| "text": "तदेतत् त्र्यक्षरं सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वांसमनृतं हिनस्ति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "आकाश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥" |
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| "text": "ततत्वादन्यथाज्ञानं तीत्येव समुदीर्यते ॥\nतस्याधस्तात् सदात्मा तु सादयन्ननृतं हरिः ।\nउपरिष्टाच्च यन्नामा नाशयन्ननृतं स्थितः ॥\nएवं यो वेद तं विष्णुं नास्य मिथ्यादृशिर्भवेत् ।\nयोग्यतापेक्षयोपासाऽथापरोक्ष्याच्च तत्फलम् ॥\nसम्यग्ददात्यन्यथा च भवेदेवोपकारिणी ।\nअत्ययोग्याय चेत् सा स्याद्विपरीतफलप्रदा ॥\nवैपरीत्यं तु विघ्नः स्यान्न तु पापं कथञ्चन ॥ इत्याधारे ॥" | | "lines": [ |
| | "तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "षष्ठं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति असुरिति होवाच ॥ १५ ॥" |
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| "text": "तद्यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मंडलं पश्यति नैनमेते रश्मयःप्रत्याययन्ति ॥१॥" | | "lines": [ |
| | "आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् । सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥" |
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| "text": "स वासुदेवो भगवानादित्यस्थो जनार्दनः ।\nआदित्यनामा सम्प्रोक्तो आदानाद्धविषां सदा ॥\nस एव दक्षिणाक्षिस्थस्तच्च रूपद्वयं हरेः ।\nअन्योऽन्यस्मिन् स्थितं नित्यं प्राणैश्च सह रश्मिभिः ॥\nदक्षिणाक्षिस्थितो विष्णुर्यदाऽस्मादुत्क्रमिष्यति ।\nतदैव म्रियमाणस्तु जीवः पश्येद्विरश्मिकम् ॥\nसूर्यस्य मंडलं नास्य प्रतीयन्ते हि रश्मयः ।\nतत्क्षणे नियमेनैव केषाञ्चित् सप्तभिर्दिनैः ॥" | | "lines": [ |
| | "रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्,सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद् याज्ञवल्क्य,वेद वा अहं तं पुरुषम् ।सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य, तस्य का देवता इति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सप्तमं ब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते ।", |
| | "आदित्यस्थस्तथा रुद्रः श्रोत्रश्चंद्र उदाहृतः ॥", |
| | "छायामयस्तु निर्ऋतिरादर्शे सूर्य एव च ।", |
| | "पर्जन्यस्त्वप्सु पुरुषः शक्रः पुत्राभिमानवान् ॥", |
| | "अमृतं वायुरुद्दिष्टं स्त्रियः श्रीर्गीरुमा तथा ।", |
| | "सत्यं ब्रह्मा समुद्दिष्टो गरुत्मच्छेषका दिशः ॥", |
| | "आदेशनाद्दिशः प्रोक्ताः मृत्युर्यम उदाहृतः ।", |
| | "अन्तर्गतेन रूपेण वायुरेव त्वसुः स्मृतः ॥", |
| | "पालकेन स्वरूपेण ब्रह्मैवात्र प्रजापतिः ।", |
| | "प्रकाशस्त्वान्तरो ज्योतिर्लोको बाह्य इतीर्यते ॥", |
| | "मनःस्थिता मनोनाम्नी बोधरूपत्वतो रमा ।।", |
| | "सैवाग्निस्थाऽदनान्नित्यमग्निरित्येव गीयते ॥", |
| | "हृदयं बुद्धिसंस्था सा त्वयनं हृदि यत्ततः ।", |
| | "चक्षुः सा दृष्टिहेतुत्वाद्दृष्टानां लोक एव सा ॥ इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षर तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "बुद्धिवृत्त्यपेक्षया बहिः प्रकाशहेतुत्वमपि देव्या न विरुध्यते । इम एव त्रयो लोका इति पूर्वोक्तानां देवानामनुक्तौ कथं लोकमात्रे सर्वदेवानामन्तर्भावः । उक्ताङ्गीकारेऽनन्तर्भावः कथम् । कथं चाग्न्यादिषु । न चावासमात्रमत्र विवक्षितम् । प्रतिशरीरमपि सर्वदेवानामावासान्न लोकादीनां विशेषः । सामर्थ्याधिक्यं चात्र विवक्षितम् । एतेषु हीदं सर्वं षडिति । यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते महिमान एवैषाम् इत्यादिषु षड्गुणोद्रेकादीनामुक्तेः । अन्तर्भावस्य च महिमकारणकत्वोक्तेः । इदं सर्वं गुणषट्कं पूर्णं गुणषट्कमित्यर्थः । इदंशब्दोविवक्षितत्वादयं भगवानितिवत् । एवमेवेदं सर्वमध्यार्ध्नोदिति च । गुणाधिक्येन तदधीनत्वे विवक्षिते निवासत्वादिकमन्तर्भवति । उत्तमानामधिकव्याप्त्यादेः । न तु निवासत्वादौ गुणाधिक्यादिकम् । कथं च तन्महिमत्वेनान्तर्भावमुक्त्वा निवासत्वमात्रेणान्तर्भाव उच्यते । कथं चान्यथा कामादीनां प्रसिद्धमहिमानां स्त्रीमात्रादिकं देवतोच्यते । प्रसिद्धं चैतत् । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भः आत्मा वै वातः इंद्रो वै देवानामोजिष्ठःब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव अयं वाव शिशुर्योयं मध्यमः प्राणः तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तो यच्छुक्लं तेनेन्द्रः ।" |
| | ] |
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| "text": "योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।", |
| | "ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठस्तु मारुतः ॥" |
| | ] |
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| "text": "तस्य विष्णोः शिरो नाम भावनाद् भूरिति स्मृतम् ।\nभावनं रक्षणं प्रोक्तं दृष्ट्या वाचा च रक्षति ॥\nउत्पादनाद्भुनामा स्याद् दक्षिणो बाहुरस्य तु ।\nविनाशनाद्व इत्युक्तः सव्यो बाहुः परात्मनः ॥\nस्वित्यानन्दस्समुद्दिष्टो वरिति ज्ञानमुच्यते ।\nमुक्तिदानेन तद्दानात् सुवस्य पदद्वयम् ॥\nदक्षिणश्चैव सव्यश्च क्रमाद्वर्णद्वयोदितौ ।\nपादावस्य हि तत्प्राप्तिर्मुक्तिरित्यभिधीयते ॥\nअहमेषो ह्यहेयत्वाज्जीवेन सहभावतः ।\nअसावहरिति प्रोक्तः सर्वलोकप्रकाशनात् ॥\nतद्वेदनात् सर्वपापं हन्ति चैव जहाति च ।\nकानिचिद्धन्ति पापानि कल्पादीन् संजहाति च ॥ इति प्रवृत्ते ॥" | | "lines": [ |
| | "वायुर्भीमो भीमनादो महौजास्सर्वेषाञ्च प्राणिनां प्राणभूतः ।", |
| | "अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते तस्माद्वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥" |
| | ] |
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| "text": "अष्टमं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः ।" |
| | ] |
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| "text": "मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन् अन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मत एष प्राणो जायते ।", |
| | "यो वायौ तिष्ठन्" |
| | ] |
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| "text": "मनोमयो ज्ञानमयः प्रधानं मय उच्यते ।\nमहाज्ञानात्मकश्चैव भारूपः सद्गुणात्मकः ॥\nसर्वप्रशासको विष्णुः ......।" | | "lines": [ |
| | "देवानां देवता वायुर्वायोर्देवो जनार्दनः।" |
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| "text": "विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युत् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥" | | "lines": [ |
| | "रुद्रं समाश्रिता देवाः रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।", |
| | "ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः ॥ इत्यादिषु सर्वत्र ।" |
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| "text": "......... विद्युत्सर्वस्य वेदनात् ।\nय एनं वेद वेत्तारं सर्वस्य परमेश्वरम् ॥\nपादेभ्यो मोचयित्वैनं स्वात्मानं वेदयेद्धरिः ॥ इति माहात्म्ये ।" | | "lines": [ |
| | "श्रियः प्रसादं स कुशेशयेशयः श्रितः स चिन्त्यः प्रशशंस शौरिम् इत्यादि च ।" |
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| "text": "दशमं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "शाकल्येति होवाच । याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अंगारावक्रयणमकृता३ इति ॥ १८ ॥" |
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| "text": "वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्येति होवाच । शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवा सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥" |
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| "text": "सरस्वती तु गोरूपा तस्या देवादयोऽखिलाः ।\nस्तनानेवोपजीवन्ति तस्या वायुः पतिः प्रभुः ॥\nवत्सो मनोऽभिमान्यस्याः सरस्वत्याः सदाशिवः ॥ इति प्रभंजने ।" | | "lines": [ |
| | "दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् ।" |
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| "text": "एकादशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "किं देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति आदित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २० ॥" |
| | ] |
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| "text": "अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तःपुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥" | | "lines": [ |
| | "यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् ।" |
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| "text": "अग्निनामा तु भगवानौदर्याग्नौ प्रतिष्ठितः ।\nविश्वैर्गुणैः समेतत्वादनन्तत्वाच्च स प्रभुः ॥\nवैश्वानर इति प्रोक्तः सोऽग्निरंगप्रणेतृतः ।\nतस्य विष्णोस्तुतिरियं क्रियते वायुना सदा ॥\nकर्णौ पिधाय या नित्यं श्रोतुं शक्याऽखिलैः सदा ॥ इति तंत्रमालायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "आदित्यस्याश्रयश्चक्षुर्नामा स्वायम्भुवो मनुः ।", |
| | "चक्षुस्थो दृष्टिशक्तीशो रूपात्मेंद्रस्तदाश्रयः ॥", |
| | "बुद्धितत्त्वात्मिकोमा च शक्रस्यापि समाश्रयः ।" |
| | ] |
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| "text": "द्वादशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "किं देवतोऽस्यां दक्षिणस्यां दिश्यसीति यमदेवत इति स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन् यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स चंद्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥", |
| | "दक्षिणामानिनी देवी रतिरेव तदाश्रयः ।", |
| | "श्रद्धारूपः सदा कामस्तस्या अपि समाश्रयः ॥", |
| | "हृदयात्मिक्युमा तस्य कामस्यापि समाश्रयः ।" |
| | ] |
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| "text": "प्रवहं वायुपुत्रं च सूर्यसोमौ च विद्युतम् ।\nप्राप्य प्रधानवायुं च याति तत्परमं पदम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।" | | "lines": [ |
| | "किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति अप्स्विति कस्मिन्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥" |
| | ] |
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| "text": "त्रयोदशं ब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥", |
| | "रेत आत्मा सुरगुरुः सोमस्यापि समाश्रयः ।", |
| | "तस्याप्युमैवाश्रयः स्यात् .." |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "एतद्वै परमं तपो यद् व्याधितस्तप्यते परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेद ॥" | | "lines": [ |
| | "किं देवतोस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "व्याधीञ्छवहृतिं चैव शवदाहादिकं तथा ।\nविष्णवे तप इत्येव चिन्तयन् याति तत्परम् ॥ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥", |
| | "सोमस्य दीक्षारूपा तु शतरूपा समाश्रयः ।", |
| | "तस्याः सत्यात्मको देवो मनुरेव समाश्रयः ॥", |
| | "तस्याप्युमैवाश्रया सा स्रष्टृरूपस्य नित्यदा ।" |
| | ] |
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| "text": "ओशितोऽपि क्लेशादीनतीतैष्यानपीह यः ।\nविष्णवे तप इत्येव प्रार्पयेत् स परं व्रजेत् ॥\nविष्णोः स्वरूपवेत्ता चेदन्यथा न कथञ्चन ।\nयथा स्वरूपवेत्तुः स्यादेकैकापि ह्युपासना ॥\nमोक्षाय सहिताः सर्वा अप्यज्ञस्य न तु क्वचित् ।\nयथावत् केशवं ज्ञात्वा स्वयोग्यैकामुपासनाम् ॥\nअपि कृत्वा हरिं दृष्ट्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "किं देवतोस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन्नु प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "चतुर्दशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥", |
| | "तस्याप्युमैव हृदयरूपा नित्यं समाश्रयः ।" |
| | ] |
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| "text": "अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्यक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह्येव देवते एकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किंस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिनामा प्रातृदः कस्त्वेनयोरेकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥" | | "lines": [ |
| | "अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत् स्यात् श्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अन्नाभिमानी ब्रह्मैव प्राणो वायुरुदाहृतः ।\nअन्योन्यानुप्रविष्टौ तौ सर्वदैव सुसंस्थितौ ॥\nवायुं विना ब्रह्मणोऽपि शरीरं पूतिमेष्यति ।\nवायुश्च शोषमायाति विना ब्रह्माणमंजसा ॥\nतयोरेवं परिज्ञानी वासिष्ठः पाणिनामकः ।\nब्रह्मवायुविदे कार्यं किं मया साध्वसाधु वा ॥\nनासाधुना साधयितुं शक्योऽसौ साधुनाऽपि वा ।\nनार्थोऽस्य कृतकृत्यत्वाद्यदि वेद परं हरिम् ॥\nइति प्रशस्य तज्ज्ञानं वसिष्ठं प्राब्रवीत् ततः ।\nअन्योन्यानुप्रवेशेन ब्रह्मवाय्वोर्विशेषतः ॥\nप्रयोजनं कस्य भवेदिति तं प्रातृदोऽब्रवीत् ।\nब्रह्मा निवेशनीयः स्याद्वायुश्चास्य रतिप्रदः ॥\nअतः प्रयोजनं तुल्यमन्योन्यात्मप्रवेशनात् ॥ इति सन्धाने ।" | | "lines": [ |
| | "तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥", |
| | "अहंकारात्मको नित्यमात्मोमा परिकीर्तिता ।", |
| | "बुद्ध्यात्मनैवाततत्वाद्यद्यस्यानाश्रयो हरः ॥", |
| | "तदा बोधात्मिका शक्तिर्नास्या देहाभिरक्षणे ।", |
| | "अरक्षितान्मानुषादीन् श्वानो वाऽद्युर्वयांसि वा ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "पञ्चदशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति अपान इति कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नुदान प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान् पुरुषान् निरूह्य प्रत्यूह्यात्यक्रामत् तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति तंह न मे शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः ॥ २६ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मा उक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥"
| | "lines": [ |
| | "शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः ।", |
| | "शेषस्यापानरूपा सा भारत्येव व्यपाश्रयः ॥", |
| | "तस्या व्यानाभिधो वायुर्विशिष्टानो यतो हि सः ।", |
| | "उन्नेतृत्वादुदानाख्या तस्या श्रीराश्रयः सदा ॥", |
| | "समानाख्यो हरिस्तस्याः सहैव ह्यनयत्यसौ ।", |
| | "स्वावरस्यानकास्त्वन्ये सर्वेषां चेष्टको हि सः ॥", |
| | "स एष भगवान्नैवं श्रीवदन्याश्रयो हरिः ।", |
| | "न च ब्रह्मादिवद्विष्णुर्नैवासौ बद्धवत् क्वचित् ॥", |
| | "न च मुक्तवदीशेशः कुत एव जडोपमः ।", |
| | "अग्राह्योऽशीर्यसंगोऽसावसितश्च न रिष्यति ॥", |
| | "न हि सर्वात्मना क्वापि केनचिज्ज्ञायते क्वचित् ।", |
| | "स्वल्पोऽपि शीर्यते नैव कारणात् कालतोऽपि वा ॥", |
| | "न लिप्यते जगन्नाथः क्वचिद्दोषेण केनचित् ।", |
| | "भूतपूर्वो भविष्यो वा बन्धो नास्य कुतश्चन ॥", |
| | "न च नाशो भवेत् क्वापि न नशिष्यति च क्वचित् ।", |
| | "अन्यत् सर्वं गृहीतं हि तेन ज्ञानादिना सदा ॥", |
| | "अशीर्यत्वादयोऽन्येषां सर्वेषां तत्प्रसादतः ।", |
| | "अतस्तस्यापि वैषम्यान्नेति नेत्याह तं श्रुतिः ॥ इत्यादि च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "षोडशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "तद्गुणानां सुपूर्णानां विप्लुट्कं प्रतिबिम्बितम् ।", |
| | "श्रीर्भुंक्ते तद्गुणान् ब्रह्मा तस्य रुद्रादयोऽपि च ॥ इत्यादि च ॥" |
| | ] |
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| "text": "यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" | | "lines": [ |
| | "अहर्ज्ञानमस्य लीनमित्यहर्लीक एवाहल्लिकः । अज्ञेत्याक्षिपति । न हि गृह्यते इत्यादिना ग्रहणशीरणादिषु सर्वप्रमाणाभावं दर्शयति ॥" |
| | ] |
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| "text": "सप्तदशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "नेति नेत्यादिरूपेण विज्ञापितगुणोऽपि तु ।", |
| | "विशेषापेक्षया पृष्टो न शाकल्यो विवेद तम् ॥ इति ब्रह्मांडे ॥" |
| | ] |
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| "text": "साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥"
| | "lines": [ |
| | "तदपेक्षां विनैवासौ निर्गत्य पुरुषोत्तमः ।", |
| | "वहत्येवानिशं सर्वं निरूढं तेन तज्जगत् ॥", |
| | "प्रति प्रतिस्थितो रूपैर्यस्माद्धत्ते हरिः सदा ।", |
| | "अतः प्रत्यूह्यते तेन व्यक्ताव्यक्तमिदं जगत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
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| "text": "अष्टादशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "न विनोपनिषद्भिः स ज्ञेयः केनापि कस्यचित् ।", |
| | "अत औपनिषत्कं तं प्राहुर्विष्णुं सनातनम् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणे हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्र प्राप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥"
| | "lines": [ |
| | "प्रश्नो वादे च जल्पादौ कर्तव्यः प्रतिवादिना ।", |
| | "तदुक्तिमात्रे प्रामाण्ये यदि नास्यागमान्तरम् ॥", |
| | "अपेक्षितं यदा शंका दर्शनीयस्तदाऽऽगमः ।", |
| | "निःशंकत्वेन यो वक्ता प्रश्नानामुत्तरं सदा ॥", |
| | "आनुकूल्येनागमानां नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् ।", |
| | "दशतालो दशमुखो ललाटत्रिंशकस्तथा ॥", |
| | "सार्धोन्नतश्चैव पुनः पर्यग्दशशिरास्तथा ।", |
| | "पञ्चोराः सप्तपादो यो नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् ॥", |
| | "नवांगुलमुखो यस्तु गले च चतुरंगुलः ।", |
| | "चतुर्विशांगुलतनुस्तद्वाक्यं देवपूजितम् ॥", |
| | "प्राधान्यल्लक्षणोपेतो दुर्लक्षणयुतोऽपि सन् ।", |
| | "तस्यापि वाक्यं मानं स्यात् किमु सर्वयुतस्य तु ॥", |
| | "प्रायो देवाश्च ऋषयो न सर्वशुभलक्षणाः ।", |
| | "ऋते विष्णुं सुरश्रेष्ठं ब्रह्माणं वाऽप्यनन्तरम् ॥", |
| | "यस्मान्न विदुषां वाक्यमाशंक्यं केनचित् क्वचित् ।", |
| | "तस्माद्वेदेषु सर्वेषु कथाः प्रश्नोत्तरात्मिकाः ॥", |
| | "न प्रमाणान्तरं तत्र पृच्छन्ति घटनां विना ।", |
| | "एतस्मादाश्वलाद्याश्च पप्रच्छुर्नैव कुत्रचित् ॥", |
| | "आगमं याज्ञवल्क्योक्तेरन्यं तं मिथिलोऽपि च ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "उत्थापनादुक्थनामा मोक्षे प्राप्यो यतोऽखिलैः ।\nयजुश्चाथ क्षतात्त्राणात् क्षत्रं सम्यक्त्वकारणात् ॥\nसर्वेषां साम च प्रोक्तो वायुरेव जगत्पतिः ॥ इति च ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यश्छिन्नविचिकित्सस्तु च्छिनत्त्यपि च संशयान् ।", |
| | "तस्य पर्येषणं कुर्यात् प्रतीच्छन्नोत दक्षिणाम् ॥ इति च भारते ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "एकोनविंशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "षण्णवत्यंगुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमंडलः ।", |
| | "दशतालश्चतुर्हस्तः स देवैरपि पूज्यते ॥ इति वायुप्रोक्ते ॥" |
| | ] |
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| "text": "भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अत एव च सर्वागमेषु प्रतिसंहितमाचार्यलक्षणमुच्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो व कामयते तं वः पृच्छामीति सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणाः न दधृषुः ॥ २७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ ।", |
| | "यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।", |
| | "तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ २८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ऋग्यजुःसामसंस्थो यो भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nस द्वितीयपदेनोक्तो गायत्र्याः प्रथमेन तु ॥\nभूम्यन्तरिक्षस्वर्गस्थतृतीयेन समीरगः ।" | | "lines": [ |
| | "त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यंदि त्वच उत्पटः ।", |
| | "तस्मात् तदा तृणात् प्रैति रसो वृक्षादिवाऽहतात् ॥ २९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परो रजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपति एवं हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "मांसान्यस्य शकराणि किन्नाटं स्राव तत्स्थिरम् ।", |
| | "अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "चतुर्थपादो गायत्र्याः प्रणवः समुदीरितः ॥\nतद्वाच्यो भगवान् सूर्यमंडलस्था तु या रमा ।\nसत्वात्मिक्येव तत्संस्थो रज आख्यप्रधानतः ॥\nपरः परोरजस्तस्माद्य एवं वेद तं प्रभुम् ।\nलोकानां चैव वेदानां सर्वेषां प्राणिनामपि ॥\nसदैवाधिपतिर्भूत्वा यशःश्रीमांश्च जायते ।\nगायत्र्युपासने योग्यो ब्रह्मैव हि चतुर्मुखः ॥\nतस्मादुक्तफलं सर्वं सर्वोपासा च तस्य हि ।\nअंशेनोपासनान्येषां फलमल्पं च योग्यतः ॥\nगायत्र्या न ह्ययोग्योऽपि द्विजो योग्योऽपि न क्वचित् ।\nऋते विरिञ्चं तस्मात् तु तस्यैव ह्यखिलं फलम् ॥" | | "lines": [ |
| | "यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।", |
| | "मर्त्यः स्विन् मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३१ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सैषा गायत्र्येतस्मिंस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्धैतत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्श मिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादो जीय इत्येवमेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्मात् गायत्रीनाम स यामेवामूं सावित्रीमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते ।", |
| | "धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥ ३२ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C03", |
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| "text": "अभिमानिनी तु गायत्र्या मुख्या श्रीः परिकीर्तिता ।\nब्रह्माण्यमुख्याऽतो ज्ञेया सा तु ब्रह्माणमाश्रिता ॥\nब्रह्मा तु मुख्यगायत्री सा परोरज आश्रयेत् ॥ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।", |
| | "मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ३३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तां हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वाग् अनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति तन्न तथा कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद्यदि ह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न ह वै तद्गायत्र्या एकञ्च न पदं प्रति ॥६॥" | | "lines": [ |
| | "जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।", |
| | "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् ॥ तिष्ठमानस्य तद्विद इति ॥ ७ ॥ ३४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तामाहुः परमां देवीं वृणीमह ऋगात्मिकाम् ॥\nनैव सा प्रतिमा मुख्या गायत्री परमा स्मृता ।\nगायत्रीमुख्यवेत्तारो योग्या ब्रह्मपदस्य ये ॥\nतेषां प्रतिग्रहाद्दोषो न कश्चन भविष्यति ।\nन चैकपदविज्ञानफलायालं सुखानि च ॥" | | "lines": [ |
| | "यथा वनस्पतौ वृक्ष इत्ययंशब्दोऽमृषा तथैव पुरुषे पुरुषशब्दो विद्यमान एव । स च नित्यत्वे सम्भवति । पुरुकालेऽपि सन्पुरुष इति । स्रावमध्ये यत्स्थिरं विद्यतेऽस्थि सल्लीनं तद्दारुसंश्लिष्टपाशवत् । वृक्षो मूलाद्रोहतीत्यंगीकारमात्रम् । यत्समूलमावृहेयुरिति तस्यापि दूषणात् । अन्यस्य रेतसो जननमपि जीवतः पुरुषान्तरस्य भावे । प्रलये तु सर्वप्रलयात् कस्मादुत्पत्तिः । तत्पृष्टं सर्वं वक्तुमशक्यत्वात् पुरुषस्य पुनरुत्पत्तौ कारणं भगवन्तं जानन्तोऽपि तूष्णीमृषयो बभूवुः । पुरुषनामकत्वान्नित्यस्य जीवस्य यावन्मुक्तिः पुनरुत्पत्या भवितव्यं न शरीरेण सह नाशः । तस्य च स्वोत्पत्तावस्वातंत्र्यादन्येनोत्पादकेन भाव्यम् । कोऽसाविति प्रश्नाशयः । तेषु तूष्णीम्भूतेषु स्वयमेव परिहरति विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेति । तस्याप्यन्य उत्पादक इत्याशंका मा भूदिति जात एव न जायत इत्याह । पुरुषान्तरापेक्षया पुनःशब्दो न तु क्रियाभ्यासापेक्षया । एक एव हरिर्बन्धुः पुनरन्यो न विद्यते इतिवत् । रातिरिष्टः । तिष्ठमानस्य तद्विदः परायणम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "स य इमांस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् । सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥"
| | "lines": [ |
| | "विजित्य सर्वान् प्रपच्छ याज्ञवल्क्यः पुनर्मुनीन् ।", |
| | "यथा वनस्पतौ वृक्षशब्द एवं यथार्थतः ॥", |
| | "पुरुषेऽपि हि तच्छब्दो नित्यत्वादेव युज्यते ।", |
| | "तस्मान्नास्य शरीरेण नाशस्तस्मात् पुनर्जनिः ॥", |
| | "आमुक्तेर्भविता नित्यं कुतस्तदिति चोच्यताम् ।", |
| | "रेतसो जननं यावत्प्रलयस्तावदेव हि ॥", |
| | "निर्मूलस्य च वृक्षस्य प्रलये पुरुषस्य च ।", |
| | "पुनरुत्पादको यस्तं वदन्तु मम कृत्स्नशः ॥", |
| | "धानाजात इवायं हि दृश्यते विदुषां तरुः ।", |
| | "अस्वातंत्र्यात् तु विदुषां नैव तत्कारणं भवेत् ॥", |
| | "अंजसा प्रेत्य सम्भूतिकारणं तद्वदन्तु नः ।", |
| | "प्रेत्य सम्भूतिकर्ता हि स्वतंत्रो घटते यतः ॥", |
| | "इति पृष्टास्तु मुनयो न वक्तुं शेकुरंजसा ।", |
| | "तद्वेत्तारोऽपि तत्प्रश्ननिर्मूलनबलोज्झिताः ॥", |
| | "अधार्ष्ट्यात्तत्प्रभावेन धर्षिता नाशकन्यदा ।", |
| | "स्वयमेव तदोवाच याज्ञवल्क्यो महामुनिः ॥", |
| | "पूर्णानन्दो हरिर्नान्यः कारणं सृज्यसर्जने ।", |
| | "नैवास्य जनकः कश्चिन्नित्यजातो ह्यसौ हरिः ॥", |
| | "स प्रियः सर्वदातॄणां ज्ञानिनां परमप्रियः ।", |
| | "ये तु तद्भाविता नित्यं तेषामेष परायणम् ॥ इति नारदीये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C05", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "विष्णोर्यदा भगवतो लोकान् वेदांश्च चेतनान् ।\nविरिञ्चिजन्मन्यखिलान् प्रतिगृह्णन्ति कृत्स्नशः ॥\nगायत्रीपदविज्ञानफलमात्रं तदा भवेत् ।\nप्रणवप्रतिपाद्यं यत् तुरीयं भगवत्पदम् ॥\nसर्वगं वासुदेवाख्यं न तत्केनचिदाप्यते ।\nगायत्रीत्रिपदज्ञेयमनिरुद्धादिकं त्रयम् ॥\nब्रह्मा व्याप्नोति मुक्तः सन् वासुदेवं न कश्चन ।\nलोकस्थमनिरुद्धं च प्रद्युम्नं वेदगं तथा ॥\nसंकर्षणं वायुसंस्थं व्याप्य ब्रह्मा विमुक्तिगः ।\nगायत्रीज्ञानसामर्थ्यात् प्रणवज्ञानशक्तितः ॥\nवासुदेवं च सम्पश्येन्न व्याप्नोति कथञ्चन ।\nअनन्तत्वाद्वासुदेवः कथं व्याप्यो भवेत् प्रभुः ॥\nवर्णत्रयात्मप्रकृतिमतीतः सूर्यमंडले ।\nगुणत्रयात्मिकां बाह्ये यतोऽतः स परोरजाः ॥\nयतो न व्याप्यते सोऽसौ ब्रह्मणाऽपि कथञ्चन ।\nअतः प्रतिग्रहो नास्य वासुदेवस्य विद्यते ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "षडाचार्यब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स काम ऋद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठते अहमदः प्रापमिति वा ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रे । अथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज । तं होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्नण्वन्तानिति उयुभयमेव सम्राड् इति होवाच ॥ १ ॥" |
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| "text": "अष्टाक्षरत्वाद् गायत्र्याः प्रोक्ता सैकपदीति च ।\nप्रणवेन सहैतास्तु गायत्र्याश्चतुरस्तदा ॥\nअकाराद्यतिशान्तान्तः प्रणवोऽष्टाक्षरो यतः ।\nपादः प्रणवसंयुक्तो गायत्री सा पृथग्यदा ॥\nद्विपदीति तदा प्रोक्ता त्रिपदी स्वपदैस्त्रिभिः ।\nचतुष्पदी सप्रणवा ब्रह्मणोऽन्यैर्न गम्यते ॥\nअपदी च ततः प्रोक्ता गायत्र्येवमुपस्थिता ।\nकामाप्राप्तिमपूर्तिं वा शत्रवे सा करिष्यति ॥\nअसावदो मैव प्रापन्नास्मै कामः समृध्यताम् ।\nउपस्थिता चेदित्थं सा यद्यदोऽहं समाप्नुयाम् ॥\nइति सा कामपूर्तिं च स्वस्य सम्यक् करिष्यति ।\nसम्यग्ब्रह्मपदावाप्तिं तद्योग्यां मुक्तिमेव च ॥\nब्रह्मणोपासितो दद्याद् गायत्र्याः पुरुषोत्तमः ।\nअलेपं सर्वपापेभ्यो विशेषेण प्रतिग्रहात् ॥\nतद्योग्यां मुक्तिमन्येषां यथायोग्यमुपासितः ।" | | "lines": [ |
| | "अणुर्भगवान् तद्विषयान् निर्णयान् वक्तुं वा ।" |
| | ] |
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| "text": "एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविदब्रूथा अथ कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदाञ्चकारेति होवाच तस्याग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्सन्दहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥९॥" | | "lines": [ |
| | "यत्ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणवामेत्यब्रवीत् । मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छैलिनोऽब्रवीद् वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञता याज्ञवल्क्य वागेव सम्राति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥२॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "वक्तव्यो भगवान् विष्णुर्गायत्र्या मुखसंस्थितः ॥\nअग्निमंडलगो नित्यमग्निनामाऽग्रणीत्वतः ।\nगायत्र्यास्तु परिज्ञानं ज्ञाते मुख्यगते हरौ ॥\nसफलं भवेदन्यथा तु न सम्यक्फलदं भवेत् ।\nगायत्रीमुखगो विष्णुर्ज्ञेयः सर्वात्मना ततः ॥\nसंहर्ता सर्वदोषाणामग्निस्थः सर्वदाहकः ।\nनित्यानन्दोऽग्निवर्णश्च रामः परशुभृत् सदा ॥ इति गायत्रीसंहितायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रतिष्ठा प्रतिमा प्रोक्ता प्रतिरूपेण संस्थितेः ।", |
| | "प्रतिमाधिकसादृश्यान्मुख्या विष्णोः सदा रमा ॥", |
| | "दीप्तत्वादासमन्तात् सा चाकाश इति गीयते ।", |
| | "प्रत्येकं विष्णुरूपाणामन्यदायतनं पृथक् ॥ इत्यध्यात्मे ॥" |
| | ] |
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| "text": "विंशं ब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "प्रतिमानमवस्थानं रहस्यं नाम सार्थकम् ।", |
| | "चतुष्टयं यदा ज्ञानं सम्यग्विद्याफलं तदा ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।\nतत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "का प्रज्ञता वागेवेत्यादेर्धर्मधर्म्यभेदः ।", |
| | "अमिताक्षरं पञ्चरात्रं विद्येत्याहुर्मनीषिणः ।", |
| | "मिताक्षरं श्लोकवाच्यमुभयं वेद ईर्यते ॥ इति ब्रह्मांडे ॥" |
| | ] |
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| "text": "सूर्यमंडलनाम्ना तु पात्रेण स्वमुखं हरिः ।\nपिधायैव जगत्सर्वं पश्यत्यमितविक्रमः ॥\nउदकं पीयते तेन तमसस्त्रायते जगत् ।\nयतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥\nपूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।\nस्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥" | | "lines": [ |
| | "सूत्रं तु ब्रह्मसूत्राख्यं महामीमांसिका तथा ।", |
| | "तथा सांकर्षणं सूत्रं ब्रह्मतर्कादयस्तथा ॥", |
| | "प्रकाशिका निर्णयश्च तत्त्वनिर्णय एव च ।", |
| | "व्याख्येति कथिताः सर्वाः स्वयं भगवता कृताः ॥", |
| | "बृहत्तर्कादयः सर्वा अनुव्याख्याः प्रकीर्तिताः ॥।", |
| | "इति प्रतिसंख्याने ॥" |
| | ] |
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| "text": "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।\nसमूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "वाग्विष्णुर्वाचकत्वेन प्राणः प्रणयनात् स्वयम् ।", |
| | "मनो मन्तृत्वतो नित्यं स चक्षुः सर्वदर्शनात् ॥", |
| | "श्रोत्रं श्रवणशक्तित्वाद्धृदयं हृद्गतो यतः ॥ इति प्रत्याहारे ॥" |
| | ] |
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| "text": "नान्यो यत्तादृशो ज्ञाता तस्मादेकऋषिर्हरिः ।\nयमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥\nज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।" | | "lines": [ |
| | "अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचम् इत्यादि च ॥" |
| | ] |
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| "text": "योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥" | | "lines": [ |
| | "वागादिषु स्थितं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु ।", |
| | "वागादिनाम्ना नैनं स प्रजहाति कदाचन ॥ इति सत्तत्त्वे ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्राणे स्थितो यः पुरुषः सोऽसावहमिति स्मृतः ॥\nअहेयत्वादसुत्वाच्च मेयत्वाच्चास्मिनामकः ॥" | | "lines": [ |
| | "अत आयतनमेव वागिंद्रियादि । परमं ब्रह्मेतिवचनान्न वागिंद्रियादिमात्रमुपास्यम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "प्रतिमाद्यं हरित्वेन पृथिव्याद्यमथापि वा ।", |
| | "इंद्रियप्राणजीवाद्यमथवा य उपासते ॥", |
| | "मिथ्योपास्तिमतां तेषां निष्कृतिर्न कदाचन ।", |
| | "अतिदुःखे पतन्त्यद्धा तमस्यन्धे पतंगवत् ॥ इत्युपासानिर्णये ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अदोषत्वाद् अ इत्युक्तो वायुस्तन्निलयो यतः ॥\nअनिलं तत एवासावमृतं चेति कीर्त्यते ।\nतदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वेंद्रियेषु या विष्णोरुपासा युगपत् सदा ।", |
| | "देवानामेव योग्या सा तया देवत्वमाप्नुयुः ॥", |
| | "सर्वे देवपदे योग्याः सायुज्यं स्वोत्तमेष्वथ ।", |
| | "सम्प्राप्य ब्रह्मणा सार्धं प्राप्नुयुः पुरुषोत्तमम् ॥", |
| | "दुहन्ति सर्वभोगांश्च तेभ्योऽन्ये मुक्तिगा नराः ।", |
| | "स्वोत्तमेभ्यश्च देवेभ्यस्ते मुक्ता हरये सदा ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रविश्य देहं यो भोगः स्वरूपव्यतिरेकतः ।", |
| | "सायुज्यमिति तं प्राहुः संयुक्तत्वाद्विशेषतः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "क्रतुश्च ज्ञानरूपत्वात् स एव हि जनार्दनः ।" | | "lines": [ |
| | "इंद्रियेषु स्थितं विष्णुमुपासीत क्रमेण तु ।", |
| | "सदा देवपदायोग्यः स मानुषसुरो भवेत् ॥", |
| | "मानुषा देवलोकस्थास्ते प्रोक्ताः मानुषाः सुराः ।", |
| | "मानुषा देवसायुज्यं यान्त्युपासनयाऽनया ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।\nयुयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "ऋषभान् गजमिश्रांस्तु क्षत्रियो गुरुदक्षिणाम् ।", |
| | "विप्रो दद्याद् वृषानेव वैश्यो गाः प्रतिविद्यकम् ॥ इति मानसंहितायाम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च ।\nजुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्यथा विद्यया मुक्तिः सुराणामन्यथा नृणाम् ।", |
| | "तत्रापि योग्यताभेदात् प्रतिभेदा अवान्तराः ॥", |
| | "यया यस्य विमुक्तिः स्यात् तद्दाता मुख्यतो गुरुः ।", |
| | "एकदेशगुरुत्वं स्यादन्यविद्याप्रदस्य तु ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "प्रथमब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् म उदंकः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवीत् प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपासीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट् कामायायाज्यं याजयत्यप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशंकं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट् कामाय प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणसंस्थस्य वै विष्णोः सम्प्रीत्यै भोजनं भवेत् ।", |
| | "तदिच्छयैव चौर्यादि कुर्युरज्ञा अपि ध्रुवम् ॥", |
| | "तथापि तं न जानीयुः प्राणात्मानं जनार्दनम् ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
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| "text": "यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे बर्कुः वार्ष्णः चक्षुः वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति तत्सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "यच्चक्षुषि स्थितं रूपं विष्णोश्चक्षुस्तदुच्यते ।", |
| | "शब्दादेरप्यापरोक्ष्ये तद्धेतुर्विश्वनामकम् ॥", |
| | "तद्गतस्य ततो विष्णोः कण्ठस्थानागमो यदा ।", |
| | "तदा स्वप्नो भवेज्जाग्रद्दर्शनं नैव जायते ॥", |
| | "चक्षुर्निमीलनं च स्यात् सर्वेंद्रियगुणैः सह ।", |
| | "चक्षुरात्मा ततो विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीत् मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीत् श्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदुपासीत का अनन्ता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशः दिशो वै सम्राट् श्रोत्रं श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वव्यापी तु भगवाननन्त इति कीर्तितः ।", |
| | "दिङ्नामा स तु विज्ञेयो दिक्षुस्थो नित्यदेशनात् ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालः मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तज्जाबालोऽब्रवीत् मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनोजहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥६॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "मनःस्थितस्य यद्विष्णोः सम्बन्धादेव कामतः ।", |
| | "जातः सुतः सुखे हेतुः परानन्दो हरिः किमु ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदेव ते कश्चिदब्रवीत् तच्छृणुवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यः हृदयं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् तथा तच्छाकल्योऽब्रवीत् हृदयं वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य किं स्यादित्यब्रवीत् तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत का स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतनं हृदयं वै सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥७॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "सदा प्रतिष्ठितानि भवन्ति । विशेषतोपि प्रतिष्ठितानि सुप्तौ ॥" |
| | ] |
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| "text": "श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥"
| | "lines": [ |
| | "हृदये सर्वशो व्यापी प्रादेशः पुरुषोत्तमः ।", |
| | "जीवानां स्थानमुद्दिष्टः सर्वदैव सनातनः ॥", |
| | "हृत्कर्णिकामूलगतः सोऽङ्गुष्ठाग्रप्रमाणकः ।", |
| | "मूलेश इति नामास्मिन् सर्वे जीवाः प्रतिष्ठिताः ॥", |
| | "अंगुष्ठमात्रे पुरुषे कर्णिकाग्रस्थिते हरौ ।", |
| | "प्रविशन्ति सुषुप्तौ तु प्रबुध्यन्ते ततस्तथा ॥", |
| | "सोऽयं त्रिरूपो भगवान् हृदयाख्यः प्रकीर्तितः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्थानमायतनं प्रोक्तं प्रतिष्ठा धारकः पुमान् इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "कूर्चब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥" | | "lines": [ |
| | "जनको वै वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्माऽस्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तद्भगवान् वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति स होवाच ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वयोग्यं ज्ञानं श्रोतुं सिंहासनादवरुह्योपसदनं कृत्वोवाच । यत्स्वात्मना प्राप्यं मुक्तौ तदुपास्यैव मुक्तिर्भवतीत्यतः प्राप्यं पृच्छति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अहं श्रेयोविवादं तु येन कृत्वाऽखिलाः सुराः ।\nअसमर्थाः स्वरक्षायां स वायुः सुरनायकः ॥\nविवदन्तोऽखिला देवा ययुर्नारायणं प्रभुम् ।\nअहं श्रेयानहं श्रेयानिति वायुपुरःसराः ॥\nउक्तं भगवता तेन येन त्यक्तेऽखिला अपि ।\nस्थातुं न शक्ताः स श्रेयानित्युक्ताः पुनरागताः ॥\nउत्क्रान्ताश्च पुनः सर्वे तद्विज्ञप्त्यै पृथक् पृथक् ।\nसुपर्णशेषरुद्रेंद्रसूर्यादिषु पृथक् पृथक् ॥\nउत्क्रान्तेषु ब्रह्मदेहाच्छरीरं न पपात ह ।\nऋत उत्क्रान्तमेकं तु तदन्ये निविशन्ति च ॥\nप्राण उच्चिक्रमिषति स्थातुं नाशक्नुवन् परे ।\nप्राणं विना न च ब्रह्मा तं विना प्राण एव च ॥\nअन्योन्यापाश्रयाच्छक्तौ स्थातुमन्ये कुतस्ततः ।\nतस्मात् प्राणो वरो देवेष्विति सर्वेऽपि मेनिरे ॥ इति पवमाने ॥" | | "lines": [ |
| | "वृन्दैः प्राप्यतमत्वात् तु वृन्दारक इति स्मृतः इति च पाद्मे ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "द्वितीयब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिंद्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथैतद्वामेऽक्षिणि पुरुषरूपमेषाऽस्य पत्नी विराट् तयोरेष संस्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरेतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिंडोऽथैनयोरेतत् प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः सञ्चरणीयैषा हृदयदूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतददास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच\nवेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच ।\nवेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोव ।\nअथ वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि नर्षेर्वचः श्रुतं\nद्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानां\nताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति\nनाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "राज्ञां हृदयसंस्थो य इंद्रो नाम जनार्दनः ।", |
| | "स इंद्रे च यमे चैव स प्राप्यो मुक्तराजभिः ॥", |
| | "तस्मात् तेषामुपास्यः स विराण् नाम तदाश्रया ।", |
| | "श्रीस्तयोः स्तुतिरेषा हि प्राणेन क्रियते सदा ॥", |
| | "कर्णौ पिधाय या ज्ञेया सर्ववेदात्मिका हि सा ।", |
| | "काशनात् सर्वजीवानामाकाश इति सा स्तुतिः ॥", |
| | "जाग्रतां सर्वजीवानां स विष्णुर्दक्षिणाक्षिगः ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणाः दक्षिणा दिक् दक्षिणाः प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अर्वाची दिगर्वाञ्चः प्राणाः सर्वाः दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्यते असितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स होवाच जनको ह वैदेहोऽभयं त्वागच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥" |
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| "text": "स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य पूर्वदिशींद्राग्नी सभार्यौ सम्प्रतिष्ठितौ ॥", |
| | "यमराक्षसौ दक्षिणस्यां वरुणो वायुरेव च ।", |
| | "पश्चिमस्यामुत्तरस्यां सोमेशानौ प्रतिष्ठितौ ॥", |
| | "ब्रह्मा प्रधानवायुश्च तथोर्ध्वायां दिशि स्थितौ ।", |
| | "अधरायां शेषकामौ सभार्याः सर्व एव च ॥", |
| | "एकैकस्यां हि चत्वारो नेतृत्वात् प्राणनामकाः ।", |
| | "इंद्रियाभिमतेश्चैव प्राणा इत्येव शब्दिताः ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्वत्प्रसादाद्यदभयमस्माकं प्राप्तं तदेव तव तृप्तयेऽस्तु नान्यद्वयं प्रत्युपकर्तुं शक्नुम इत्यर्थः । स भगवान् स्वकृतेन तुष्येत् इतिवत् । इन्धो दीप्तः ।" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "जीवभोगस्य भोक्तेशो जीवस्तद्भोगभुंग् न तु ।", |
| | "विविक्तभुगिवातोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ इति पाद्मे ॥" |
| | ] |
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| "text": "स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास ।\nतां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "ज्योतिर्ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| "text": "असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्यो वरं दत्वा राज्ञा संवादकामुकः ।", |
| | "वैदेहनगरं प्रायात् सन्तो यच्छास्त्रलोलुपाः ॥ इति स्कान्दे ॥" |
| | ] |
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| "text": "अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "तथापि सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥" |
| | ] |
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| "text": "पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति ।\nमासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति\nते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति ।\nमासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।\nतेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोः वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ ततो जायन्ते ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।\nअथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतंगा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् ।\nनारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥\nप्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा ।\nपञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥\nनास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्मा भगवानेवास्य ज्योतिः ।", |
| | "भावेऽभावेऽपि सूर्यादेर्जीवानां विष्णुरेव हि ।", |
| | "ज्योतिस्तथाप्यभावे तु तज्ज्ञेयं हि विशेषतः ॥", |
| | "अस्वतांत्र्यात्तु जीवस्य द्योतयन् बुद्धिमस्य सः ।", |
| | "प्रवर्तयति सर्वेशस्तमस्यपि जनार्दनः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "तृतीयब्राह्मणम्" | | "lines": [ |
| | "कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति\nयावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामांस्तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि\nते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा\nया तिरश्चीनि पद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजेंसराधनीं महं स्वाहा ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वातंत्र्याद्ध्यायतीवासौ ध्याययन् जीवमंजसा ।", |
| | "गृह्णातीव ग्राहयन् स जीवं सर्वेश्वरेश्वरः ॥", |
| | "सदा विज्ञानपूर्णोऽसौ समानोऽसौ सदा समः ।", |
| | "अविकारात् समानः सन् जीवमादाय सञ्चरेत् ॥", |
| | "उभौ लौकौ स्वापकत्वाद्भूत्वाऽसौ स्वप्ननामकः ।", |
| | "इमं लोकं जाग्रदाख्यं मृत्युरूपात्मकं सदा ॥", |
| | "बहुपापैकहेतुत्वात् तारयेत् स्वप्नमानयन् ।", |
| | "इमं लोकं च भूराख्यं तारयित्वाऽन्तरिक्षगम् ॥", |
| | "जीवं कुर्यान्मृतौ विष्णुर्भूलोकः क्षिप्रमृत्युमान् ।", |
| | "बहवो मृत्यवश्चात्र मृत्यो रूपाण्यतस्त्वयम् ॥", |
| | "पापहेतुत्वतश्चायं भूर्लोको मृत्युरूपकः ।", |
| | "जाग्रच्च पृथिवी चैव द्यौः सुषुप्तिस्तथैव च ॥", |
| | "स्वप्नश्चैवान्तरिक्षं च ज्ञेया अन्योन्यनामकाः ।", |
| | "तद्द्ययभिप्रायिका तस्मादुभौ लोकाविति श्रुतिः ॥" |
| | ] |
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| "text": "ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।\nप्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।\nवाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।\nचक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।\nश्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।\nमनसे स्वाहा प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रव मवनयति ।\nरेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "स वा अयं जायमान इति च द्व्याश्रया श्रुतिः ।", |
| | "यस्य ज्योतिरयं विष्णुः स परामृश्यते तथा ॥", |
| | "यदा तु भगवानुक्तस्तदा स्वातंत्र्यतो विभुः ।", |
| | "म्रियमाणो जायमान इत्युक्तस्तन्नियामकः ॥", |
| | "फलदानाय पापानां ग्रहस्संसर्ग उच्यते ।", |
| | "मोक्षदाने फलादानाद्विजहातीति चोच्यते ॥", |
| | "जीवोऽपि मुक्तिकाले तु हाता पापस्य कथ्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥"
| | "lines": [ |
| | "स्वर्गः सुषुप्तिरित्याख्या मुक्तेरपि यतः समा ॥", |
| | "परलोको यतो मुख्यो मुक्तिरेव न चापरः ।", |
| | "अतो द्युसुप्तिमोक्षाणामभिप्रायमिदं वचः ॥", |
| | "सुप्तिरित्यादिकं स्वेति विष्णोराख्या सुखत्वतः ।", |
| | "पुनरागमनं नाम मुक्तानामपि विद्यते ॥", |
| | "प्रलये तु प्रविश्यैनं भगवन्तं जनार्दनम् ।", |
| | "स्थित्वा ज्ञानाविलोपेन निर्गच्छन्ति पुनस्ततः ॥", |
| | "न च ज्ञानसुखादीनां तेषां सृष्टौ लयेऽपि वा ।", |
| | "विशेषः कश्चिदन्तश्च बहिश्चैव रमन्ति ते ॥", |
| | "स्वापयत्येनमिति स स्वपितीत्युच्यते हरिः ।", |
| | "आनन्दपापलोकादेर्दर्शनं स्वप्नसुप्तयोः ॥", |
| | "अपि विष्णोः सदैवास्ति न जीवस्य कथञ्चन ।", |
| | "अत्रायं भगवान् विष्णुर्जीवस्य स्वयमेव तु ॥", |
| | "ज्योतिर्विशेषतो भूयान्नैवान्यज्ज्योतिरत्र यत् ।", |
| | "न हि जीवः स्वयं द्रष्टुं सुप्तः शक्नोति हि ध्रुवम् ॥", |
| | "अतः स नैव जीवोऽयं सर्वं पश्यति सूक्ष्मदृक् ।", |
| | "स्वप्नेऽन्तरिक्षे स्वर्गे वा न रथाद्याः पुरा स्थिताः ॥", |
| | "तदैव तत्कर्मयोग्यान्निर्मिमीते हरिः स्वयम् ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "जीवपक्षे प्रसिद्धत्वात् कतम आत्मेति प्रश्नो न युक्तः । न च जीवः समानः सन्नुभौ लोकौ सञ्चरति । सुखदुःखविशेषवत्वात् । न च सुखदुःखादेर्मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः । असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् इत्यादि वचनविरुद्धत्वाच्च । न चैतन्नासीदस्ति भविष्यतीत्यनुभवः कदाचिद्भविष्यतीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । किञ्चित्कालस्थिरत्वमात्रस्य शून्यवादिनामपि सिद्धत्वाद् वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवदित्यादिवचनं व्यर्थं स्यात् । अतो न कदाचिदस्य नासीदस्ति भविष्यतीत्यनुभवो भविष्यतीत्यभिप्रायेणैव तद्वचनम् । न च तथानुभवे शून्यस्यानिर्वचनीयस्य च कश्चिद्विशेषः । न च शून्यवादिनां तद्वादिनां च कश्चिद्विशेषो मोक्षे । न च नित्यज्ञानस्वरूपमस्तीति वचनेन कश्चिद्विशेषः ज्ञेयाभावे ज्ञानस्याप्यभावात् । न हि ज्ञेयरहितं ज्ञानं नामास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च स्वविषयं तदिति तेषां पक्षः । तदा कर्तृकर्मविरोध इति हि तेषां वचनम् । न च जानातीत्यादिकर्तृत्वं ज्ञानस्य तैरंगीक्रियते । निर्विशेषत्वांगीकारात् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । स्वप्नो भूत्वा स्वापको भूत्वा । न हि जीवोऽपि स्वप्न एव भवति । स्वापं नयतीति स्वप्न इति च व्युत्पत्तिः । जायमानो म्रियमाणो प्रस्वपितीत्यादि ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैंग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥"
| | "lines": [ |
| | "कृत्वा विवाहं तु कुरुप्रवीराः", |
| | "तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे ।", |
| | "सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं येषां भवदनुग्रहात् ॥", |
| | "जज्ञे बहुज्ञं परमाभ्युदारम् द्रष्टुश्चक्षुषो नास्ति जिह्वा इत्यादिवदन्तर्णितणिच्त्वेन भवति ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "एतमु हैव मधुकः पैंग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वातंत्र्यस्नेहयोरन्तर्णीतणिच् इति हि सूत्रम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकाय आयस्थूणायन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "कथमन्यथा स्वयं निहत्य स्वयं निर्माय स्रवन्त्यः सृजते । स हि कर्ता स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति इत्यादि युज्यते । उक्तार्थे च स्वप्नेन शारीरमित्यादि जीवेश्वरभेदमंत्रा उक्ताः प्रमाणत्वेन । ईश्वरो जीवस्य भयानि पश्यन् जक्षदिव अहसदिव । प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इत्यादिषु चाभ्यासेन सर्वत्र भेद एव निर्दिश्यते सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् । न चावस्थाभेदेन जीवभेदो व्यावहारिकोऽप्यस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न हि जाग्रत्स्वप्नस्थश्च द्वावित्यज्ञप्रयोगोऽपि कश्चिदस्ति लौकिकः । न च भ्रमस्तादृशः । तस्माद् भगवानेवात्रोच्यते सर्वकर्तृत्वेन । वेशान्ता वेश्यागृहाः । सुषुप्तिमोक्षोभयविवक्षयैव तद्वचनमिति भगवताऽप्युक्तं स्वाप्ययसम्पत्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति । उभयापेक्षमित्युक्ते मोक्षस्थसुप्तिरिति मन्दस्याशंका स्यादतो मोक्षे सुप्तिरेव नास्तीति ज्ञापयितुमन्यतरापेक्षमित्युक्तं न त्वन्यतर एवार्थ इति । ज्ञाने विकल्पायोगात् । अतोऽवस्थाश्च लोकाश्च सर्वेऽपि विवक्षिताः । सर्वावतः आसमन्तात् सर्ववतः सर्वज्ञानान्युपादाय ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "बाह्यप्रकाशो भेत्युक्तो ज्योतिरान्तर उच्यते ।", |
| | "सुखं स्वरूपभूतं यदानन्द इति कथ्यते ॥", |
| | "मुन्नामविषयोत्थं यत्प्रकृष्टविषयात् प्रमुत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरन् शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेते श्लोका भवन्ति ।", |
| | "स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ।", |
| | "शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
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| "text": "चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "शुक्रं जीवमादाय ।", |
| | "शोकेन रत्या युक्तत्वाच्छुक्रो जीव उदाहृतः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
| "verseType": "brahmanam", | | "verseType": null, |
| "text": "चतुर्थब्राह्मणम्"
| | "lines": [ |
| | "रत्यानन्दौ पूर्णनित्यौ हितौ तेन हिरण्मयः ।", |
| | "स्वर्णवर्णतया वापि वासुदेवो हिरण्मयः ॥", |
| | "प्रधानहंसरूपत्वादेकहंस इतीरितः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।", |
| | "स ईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C04", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "अंशेन जीवमादाय क्वचिदीशो बहिर्नयेत् ।", |
| | "स्वप्नेषु फल्गुनं यद्वत् कृष्णः कैलासमानयत् ॥", |
| | "वासनारूपकान् प्रायस्त्वन्तरेव प्रदर्शयेत् ।", |
| | "अतो बहिः कुलायादित्यपि वाङ्ग् न विरुद्ध्यते ॥ इति ॥" |
| | ] |
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| "text": "तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि ।", |
| | "उतेव स्त्रीभिस्सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "उच्चावचेषु रूपेषु प्रविशन् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "बहुरूपत्वमायाति स्वप्ने स जगतः प्रभुः ॥ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "मोदरूपत्वतो विष्णोः स्त्रीभिर्मोदो विडम्बनम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति ।", |
| | "तं नायतं बोधयेदित्याहुर्दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥"
| | "lines": [ |
| | "जीवस्य मृतिकाले च स्वप्नकाले च केशवः ॥", |
| | "एवंविधानि कर्माणि कुर्वाणोऽपि न दृश्यते ।", |
| | "तथा जागरिते सुप्तौ मुक्तैरेव तु दृश्यते ॥", |
| | "तथाऽपि नायतेऽभ्यस्तं ज्ञानी ब्रूयाज्जनार्दनम् ।", |
| | "यस्य गोचरतां विष्णुः कदाचिन्न प्रपद्यते ॥", |
| | "तस्यायतस्य पापस्य भेषजं न हि विद्यते ।", |
| | "सुप्तिकालोऽप्ययं विष्णोः सदा जागरितात्मकः ॥", |
| | "यानि जागरिते पश्येत् तानि सुप्तेऽपि पश्यति ।", |
| | "नित्यज्ञानस्वरूपत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "नित्यानन्यप्रकाशत्वेऽप्यन्यज्योतिर्यदा भवेत् ।", |
| | "तदा स्यात् संशयोऽज्ञानामित्यत्रेति विशेषणम् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "जीवस्यापि स्वप्नावस्थायां जागरितत्वेऽस्येति विशेषणं व्यर्थम् । पूवोक्तमपि मोक्षायैव भवति । अत ऊर्ध्वं विशिष्टमोक्षाय ब्रूहि ॥" |
| | ] |
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| "text": "सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥\nस यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् ।\nअङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे ॥\nस त्वमंगकषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वयोग्यभगवद्दृष्टेः सर्वैर्मुक्तिरवाप्यते ।", |
| | "पुनर्ज्ञानान्तराधिक्यात् सुखाधिक्यं विमोक्षगम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| "text": "अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वप्नसुषुप्त्युभयाभिप्रायेण तानि सुप्त इत्युक्तम् ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥" | | "lines": [ |
| | "तत्र सुषुप्तिमात्राभिप्रायेण स वा एष एतस्मिन् प्रसाद इत्याह ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥" | | "lines": [ |
| | "यत्रोभयविवक्षा स्यात् परामर्शस्तदोभयोः ।", |
| | "एकस्यापि भवेन्नैकविवक्षायां क्वचिद् द्वयोः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥" |
| | ] |
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| "text": "स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वप्नाख्योऽन्तः स्थानं स्वप्नान्तम् ।", |
| | "अन्तः स्थानं स्थलं वासः प्रदेश इति चोच्यते । इति च ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं चेत्यत्रापि स्वप्नान्तशब्दः स्वप्नसुषुप्त्युभयाभिप्रायेण ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "शुभाशुभं तु दृष्ट्वैव स्वप्ने जागरितेऽपि च ।", |
| | "असंस्पृष्टः सदा दुःखैश्चरतीशः पुनः पुनः ॥", |
| | "स्वप्नसुप्त्यात्मकं कूलमेकं बुद्धात्मकं परम् ।", |
| | "महामत्स्य इवासंगी चरत्येको जनार्दनः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| }, | | "तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "यं विष्णुं श्येनवच्छ्रान्तो जीवो जागरिते भ्रमन् ।", |
| | "स्वप्ने च सुप्तावभ्येति संश्रान्तः सद्गृहं यथा ॥", |
| | "स्वित्यानन्दः परो विष्णुस्तमाप्तः सुप्तः उच्यते ।", |
| | "सम्प्राप्य तमयं जीवः कामयेन्नैव किञ्चन ॥", |
| | "न च स्वप्नसमभ्रान्तिज्ञानं याति कदाचन ।", |
| | "सुषुप्तौ च किमु ज्ञानान्मुक्तौ प्राप्तो जनार्दनम् ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "निहितो भगवान्यत्र हिता नाड्यः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "नानावर्णो हरिस्तासु नानारूपी व्यवस्थितः ॥", |
| | "तासां मध्ये सुषुम्ना च तत्र सुप्तिं व्रजत्ययम् ।", |
| | "ता एव कण्ठदेशस्था जीवस्तत्र व्यवस्थितः ॥", |
| | "स्वप्नान् पश्यति जाग्रद्वद्भयं च प्रतिपद्यते ।", |
| | "अ इत्यादिश्यते विष्णुरविद्या तन्निरीक्षणम् ॥", |
| | "तेन स्वप्नानयं पश्येज्जीवो जागरितं तथा ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
| | ] |
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| | "जिनन्तीव ताडयन्तीव । विच्छाययति भयेन विच्छायं करोति । ओमेवेदं सर्वोऽस्मि स्वयोग्यतापेक्षया पूर्णोऽस्मि । विषयभोगानन्वितस्वरूपानन्देनेत्येवशब्दः ।\tइदमिति पूर्णत्वविशेषणम् । अजानता महिमानं तवेदम् इतिवत् स्वपूर्णतामापरोक्ष्येणानुभूयेदं पूर्णोऽस्मीति मन्यते ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "क्वचित्तद्भावशेषः स्यात् क्रियाशेषः क्वचिद्भवेत् ।", |
| | "क्वचिद् पदार्थशेषः स्यादिदमादिस्त्रिधा स्मृतः ॥", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
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| | "न हि राजा देवो वा सर्वजगद्भवति । राज्ञो भोगापेक्षया पूर्तिर्भवतीति देवदृष्टान्तः । प्रत्यक्षदर्शनार्थं राजदृष्टान्तः ॥" |
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| | "स्वयोग्यपूर्तेः स्वातंत्र्याद्राज्ञो देवगणस्य च ।", |
| | "सर्वभावस्तथा मोक्षे न तु सर्वस्वरूपतः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "छन्दसामप्यवाच्यत्वादतिच्छन्दा हरिः स्मृतः ।", |
| | "तेनाश्लिष्टो ह्ययं जीवः सुप्तो मुक्तोऽथवा भवेत् ॥", |
| | "विष्णोरूपं हि यन्नित्यमभयं पापवर्जितम् ।", |
| | "आप्तकामं च पूर्णत्वादात्मकामं सुखत्वतः ॥", |
| | "शोकं विना सुरमणाच्छोकान्तरमितीरितम् ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-709", |
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| | "lines": [ |
| | "तेनाश्लिष्टः स्वपुत्राणां दायादानां न वै पिता ॥", |
| | "तेषां दुःखाददुःखित्वान्न माता लोकमान्यपि ।", |
| | "अलोकमानान्नो लोको देवोऽपि स्वाधिकारतः ॥", |
| | "वर्षणादेर्व्युत्थितत्वान्न देवो वेदमान्यपि ।", |
| | "अवेदमानान्नो वेदः पापी पापफलाप्ययात् ॥", |
| | "अपापः श्रमणश्चापि यतिधर्मात् समुत्थितेः ।", |
| | "अयतिस्तापसश्चैवमनिष्टं पुण्यमप्यमुम् ॥", |
| | "नान्वेत्येवंविधो मुक्तो विष्णोः सम्प्राप्तिमात्रतः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-711", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "यत्तन्न विष्णुः पश्येत पश्यन् वै तन्न पश्यति ।", |
| | "नित्यज्ञानस्वरूपत्वात् तत्समं नान्यदिष्यते ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-712", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यत्किञ्चिद्वस्तु भगवता न दृष्टं तन्नास्त्येव । विद्यमानं सर्वं पश्यत्येव । न हि द्वितीयो द्रष्टा यो विभक्तत्वेन जगत्पश्यति । तद्विरोधेन पश्यत्यभ्रान्तः । तद्दृष्टादन्यद्वा । नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इत्यादि श्रुतेः ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "यत्तद्दृष्टं भगवता तदेवास्ति न चापरम् ।", |
| | "न ह्यन्यो विद्यते द्रष्टा यः पश्येत् तददर्शितम् ॥", |
| | "ब्रह्मादिरपि यो द्रष्टा पश्येत् तस्य प्रसादतः ।", |
| | "तददृष्टं कुतः पश्येदतः को वा विरोधतः ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यदवतारादिकं द्वैतत्वेन न पश्यति न तु तत्ततो द्वितीयम् । नित्यज्ञानत्वाद् भ्रमाभावात् । यद्विभक्तत्वेन विष्णुः पश्यति तत्ततोऽन्यदस्ति च इति च । यस्माद्विष्णुर्विश्वं विभक्तत्वेनैव पश्यति तस्मात् तदन्यदस्त्येव । न च जगदभावोऽत्रोच्यते । अन्यद्विभक्तमिति विशेषणवैयर्थ्यात् । न च भ्रान्तिकल्पितं जगदित्यत्र किञ्चिन्मानम् । असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् इत्यादि निन्दनाच्च ।" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-716", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥" |
| | ] |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-717", |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "द्रष्ट्रन्तरनिषेधेन तस्यैव सर्वद्रष्टृत्वमेव च यत्र वा अन्यदिव स्यादित्यादिनोपसंह्रीयते । अन्यथाऽन्योऽन्यत् पश्येदित्यादिकमनर्थकम् । न ह्येकस्यान्यत्वेऽन्यस्यानन्यत्वं भवति । अतो द्वितीयोऽन्यशब्दः व्यर्थ एव स्यात् । न च तत्पक्षे दृश्यत्वादिकमात्मनो विद्यते । तस्माद् यत्र किञ्चिदपि स्वातंत्र्यमन्यस्य भवति तत्रैव भगवतोऽन्यः पुरुषो भगवद्दृष्टादन्यत् पश्यतीत्यादि युज्यते तदेव नास्ति स्वतः । अतो नान्योऽन्यत्पश्येदित्यर्थः । अन्यदिवेतीवशब्दोऽल्पस्वातंत्र्याद्यर्थे । राज्ञः पृथगिव भृत्य इतिवत् ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "उपमार्थे तथाऽल्पत्वेऽपीवशब्दः प्रयुज्यते ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स्वरूपभेदे स्वातंत्र्ये विरोधे च विलक्षणे ।", |
| | "अन्यशब्दश्चतुर्ष्वेषु प्रयोक्तव्यो मनीषिभिः ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "अनन्याः सर्व एवैते योधाः कुन्तीसुतादपि । इति प्रयोगाच्च ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "दशरात्रैर्भुक्तमिव न सम्यक् स्वल्पभोजनात् । इति च" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "प्रकृतेः पुरुषाणां च नाणुमात्रमपि क्वचित् ।", |
| | "स्वातंत्र्यं विष्णुना सर्वे नियताः सर्वदैव हि ॥", |
| | "तददृष्टं ततः को हि पश्येत् किं वाऽपि तद्भवेत् ॥ इति महामीमांसायाम् ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "अभेदेन स्वावतारांजीवाजीवं तु भेदतः ।", |
| | "यदभ्रमो हरिर्वेत्ति स तदन्यच्च तद्द्वयम् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "अन्यदप्यस्वातंत्र्येणान्यवदवस्थितं यस्मिन् पक्षेऽस्ति तत्रैवान्यदर्शनादिव्यवहारो युज्यते । सप्तमरसादिदर्शनाभावादिति च । सर्वेंद्रियोपभोगोऽपि विष्णोः स्वात्मनि विद्यते ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-731", |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यदि जगदेव न स्यात् तदा कथं मोक्षेऽप्यन्यानि भूतानि मात्रां उपजीवन्तीति युज्यते । मोक्षप्रकरणं चैतत् । स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि इति भगवद्वचनम् ।" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यदा हि सलिलत्वेन प्रकृतिर्व्याप्य तिष्ठति ।", |
| | "तदा तस्यां परो विष्णुरेको द्रष्टा व्यवस्थितः ॥", |
| | "अविरोधादद्वितीय एकोऽसौ समवर्जनात् ।", |
| | "बृहज्ज्ञानाद् ब्रह्मलोकः सदैव पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "सार्वगत्वादस्य गतिः परा विष्णोः सदैव हि ।", |
| | "पूर्णैश्वर्यादस्य सम्पत् परमा सम्प्रकीर्तिता ॥", |
| | "सार्वज्ञ्यात् परमो लोको विष्णोरानन्द एव च ।", |
| | "स्वातंत्र्यात् परमो ज्ञेयः स हि पूर्णः सदोदितः ॥", |
| | "प्रतिबिम्बरूपविप्लुट्कांस्तदानन्दस्य चाखिलाः ।", |
| | "मुक्ता ब्रह्मादयोऽश्नन्ति तारतम्येन नित्यदा ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-734", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "सलीलः सलिल इति वा ।" |
| | ] |
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| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-735", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-736", |
| | "oldKey": "BR_C04_S03_V33_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S03", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अन्येभ्यस्तु विमुक्तेभ्य आनन्दश्चक्रवर्तिनाम् ।", |
| | "मुक्तानां हि शतोद्रिक्तः पितॄणां तेभ्य एव च ॥", |
| | "तेभ्योऽप्यृषीणां मुक्तानां कर्मदेवाभिधायिनाम् ।", |
| | "तेभ्यश्च मुक्तदेवानां तेभ्यश्चोमापतेस्तथा ॥", |
| | "तस्माच्च ब्रह्मणस्त्वेवं मुक्तस्य गरुडादपि ।", |
| | "एष एव ततो विष्णुः पूर्णानन्दः प्रकीर्तितः ॥", |
| | "यस्य ब्रह्माऽपि मुक्तः सन् विप्लुण्मात्रं समश्नुते ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-737", |
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| | "parent": "BR_C04_S03", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "राद्धो मुक्तः । मनुष्याणां योग्यतया स्वसमेभ्यः प्रयत्नाधिक्यादाधिक्यं मुक्तौ प्राप्तुं शक्यत इत्यतः समृद्ध इत्युक्तम् । यावत्साधयितुं शक्यते तावत् साधनैः सम्पूर्णत्वेन मुक्त इत्यर्थः । स्वराष्ट्रे ज्ञानोपदेष्टृत्वात् मुक्तावपि तेषामधिपतिः । ज्ञानपूर्वकत्वेन मनुष्यत्वे दानादिकं कृत्वा तत्फलैरपि भोगैर्मुक्तौ सम्पन्नतमः । न हास्य कर्म क्षीयते इति श्रुतेः । अन्यथा राद्ध इति विशेषणं व्यर्थं भवति । स मनुष्याणां परम आनन्द इति स्वरूपानन्दश्चात्रोच्यते । न ह्यमुक्तानां स्वरूपानन्दानुभवोऽस्ति ॥" |
| | ] |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-738", |
| | "oldKey": "BR_C04_S03_V33_B1", |
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| | "parent": "BR_C04_S03", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "भुज्यते स्वसुखं मुक्तैराभासोऽन्यैस्ततोऽपरः इति च ॥" |
| | ] |
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| | "जितलोका इत्यपि मुक्ता एवोच्यन्ते । गन्धर्वलोके गन्धर्वाणां ब्रह्मज्ञाने मुक्तावित्यर्थः । तदा हि ब्रह्मज्ञानं सदोदितमवतिष्ठते । एष ब्रह्मलोकः सम्रात्यिदिषु ज्ञानस्यैव लोकशब्दोदितत्वात् । यश्च श्रोत्रिय इति वचनं तेषामाजानादीनामपि मुक्तानामेवायं नियमेनानन्दशतगुणोद्रेकः । अन्यदा तु कदाचिद्भवति । कदाचिद्व्याकुलतया न भवतीति दर्शयितुम् । चशब्दस्तु श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानां गुणानां मुक्तौ समुच्चयार्थः । मुक्तस्यैवैते गुणा भवन्तीति मुक्तस्वीकारार्थं य इति विशेषणम् ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सर्वं श्रुतिफलं मुक्तैः प्राप्यं नान्येन केनचित् ।", |
| | "अतस्तु श्रोत्रियो मुक्तो ह्यन्यः श्रोत्रियको भवेत् ॥", |
| | "अदुःखत्वं च तस्यैव कामैरहतता तथा ।", |
| | "यः कामितं न प्राप्नोति स कामहत उच्यते ॥", |
| | "काम्याप्राप्तेश्च पापाच्च कामात् कामहतः स्मृतः ।", |
| | "उभयस्याप्यभावेन मुक्तोऽकामहतो मतः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "आजानदेवा इंद्राद्या जातेभ्यस्ते वरा यतः इति च ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "प्रजापतिलोक इत्युक्तेनैव मुक्तप्रजापतिसिद्धावपि मुक्तस्यैव प्रजापतेर्ब्रह्मणश्चायं विशेष इति स्वरूपकथनार्थं यश्च श्रोत्रिय इत्यादि । अनुपचरितश्रोत्रियादित्वमिति ज्ञापयितुमभ्यासः । सर्वेषामपि मुक्तानां नियमेन तदस्तीति ज्ञापयितुं च ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "प्रजास्तु पशुशब्दोक्ताः पशुपस्तु प्रजापतिः इति च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अथशब्दादेष ब्रह्मलोक इति विशेषणाच्च द्वितीयब्रह्मलोकशब्देन परब्रह्मैवोच्यते । अन्यथैष एव परम आनन्द इत्युक्त्वा पुनरेष इतिशब्दोऽनर्थकः स्यात् । तस्यैव ब्रह्मलोकशब्देन पूर्वमभ्यासाच्च । न च तैत्तिरीयादिश्रुतिविरोधः । शतशब्दस्यायुते दशलक्षादावपि समत्वात् । अतश्चक्रवर्तिभ्यो मनुष्यगन्धर्वाः शताधिकाः । देवगन्धर्वा अयुताधिकाः । पितरो दशलक्षाधिका इत्यविरोधः । उत्तमगन्धर्वापेक्षया पितृभ्यो गन्धर्वाणामाधिक्यं च युज्यते । आजानदेवेभ्यो जाता आजानजा इत्यतस्तत्राप्यविरोधः । यत्राजानजा इत्येवोपरिपाठस्तत्राजानेभ्यो ब्रह्मादिभ्यो जाता इति भवति । इंद्रबृहस्पत्यादीनां विशेषस्तु विशेषवचनत्वादत्राप्यंगीकर्तव्य एव ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सामान्यधर्मो बलवान् धर्माद्वैशेषिकाद्यथा ।", |
| | "बलवद्विशेषवचनं सामान्यवचनात् तथा ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "नृपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरस्तथा ।", |
| | "देवैः सहितगन्धर्वा ऋषयो देवतास्तथा ॥", |
| | "इंद्रो बृहस्पतिश्चैवं प्रधानेंद्रः पुरन्दरः ।", |
| | "रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशो मुक्ताः शतगुणोत्तराः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अतिप्रयत्नतो यावत्प्राप्तुं शक्यं विमुक्तिगम् ।", |
| | "सुखाद्यं तस्य सम्प्राप्त्यै ज्ञानश्रेण्यः क्रमात् स्मृताः ॥", |
| | "एकां श्रेणीं प्रविज्ञाय तदुत्कृष्टां च तद्वराम् ।", |
| | "क्रमेणैव विजिज्ञासुर्जनकः पृच्छति स्म ह ॥", |
| | "पुनः पुनर्विमोक्षाय ब्रूहीत्यद्धा वरात् पुरा ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "रहस्यमस्यायोग्यं च यदि मामेष पृच्छति ।", |
| | "दत्तो मया वरोऽस्येति वक्तव्यं मे भविष्यति ॥", |
| | "इति भीतोऽभवद्राज्ञो याज्ञवल्क्यः सुमेधया ॥ इति ब्रह्मांडे ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "तेभ्योऽश्वलादिभ्यः ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सर्वदा जीवमादाय नियमाद् विष्णुरेव हि ।", |
| | "जाग्रदादिषु संयाति नान्यथा तु कथञ्चन ॥", |
| | "एवं नियमविज्ञप्त्यै जीवास्वातंत्र्यवित्तये ।", |
| | "परिवृत्तिमवस्थासु साभ्यासा वक्ति हि श्रुतिः ॥ इति निर्णये ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अतस्तात्पर्यार्थं पुनर्वचनम् ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "ग्रामादिकमुत्सर्जद्यायात् ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यथा ग्रामं परित्यज्य यात्यनः पुमधिष्ठितम् ।", |
| | "एवं देहं परित्यज्य विष्णुनाऽधिष्ठितः पुमान् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अणिमानं भगवन्तम् ।", |
| | "स य एषोऽणिमा तेजः परस्यां देवतायाम् इति हि श्रुतिः ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "उपतपता रोगादिना ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "आम्रं बाल्येऽपि पतति परिणामे ह्युदम्बरम् ।", |
| | "सम्यक् पाके यथाऽश्वत्थफलं जीवमृतिस्तथा ॥", |
| | "कलावाम्रोपमा जीवास्त्रेतास्वौदुम्बरोपमाः ।", |
| | "कृतेऽश्वत्थसमाश्चैव यान्ति ब्रह्मवशाः सदा ॥ इति पाद्मे ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "प्राणायैव ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "वायुमेवाद्रवत्येष जीवो मोक्षाय तत्त्ववित् ।", |
| | "तदनुज्ञयैव ज्ञानित्वमतस्तं पुनराव्रजेत् ॥", |
| | "सर्वेऽपि वायुमासाद्य जायस्व ज्ञानमाप्नुहि ।", |
| | "इति तस्य वरादेव जायन्ते ज्ञानिनोऽखिलाः ॥", |
| | "पुनस्तं प्राप्य मुक्तिञ्च प्राप्नुयुस्तदनुज्ञया ॥ इति प्रवृत्ते ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "इदं मुक्तजीवस्वरूपमायाति । अतोऽनेन सहेदं परं ब्रह्मायातीति परब्रह्मणः पूजार्थं प्रतिकल्पन्ते । यथा राज्ञो ध्वजादिकं दृष्ट्वाऽयं ध्वज आगच्छति तस्माद् राजाऽऽयातीति पूजां प्रतिकल्पन्ते तद्वत् । अन्यथेदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति द्विरुक्तिर्व्यर्था स्यात् । वीप्सात्वे त्वयमायातीत्येकप्रकारेण शब्दाभ्यासः स्यात् ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "एकप्रकारशब्दानामभ्यासस्त्वादरार्थकः ।", |
| | "स्वरवर्णादिमात्रं वाऽप्यन्यथा चेत् तदा परः ॥", |
| | "अर्थः स्यादेष नियमो वाक्ये वीप्सापदे तथा ।", |
| | "प्रातिस्विकार्थेऽपि भवेदभ्यासे वा तथा स्थिते ॥इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "न च कुत्रचिदादरार्थे द्विरूपप्रयोगो दृष्टोऽनन्तरितः ।" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यदा मुक्तो व्रजत्यूर्ध्वं तदा तत्सहितो हरिः ।", |
| | "नियमाद् दृश्यते देवैरमुक्ते नियमो न तु ॥", |
| | "यथा ध्वजादिकं दृष्ट्वा पूजां राज्ञः प्रकुर्वते ।", |
| | "एवं विमुक्तिगं दृष्ट्वा विष्णोः पूजां प्रकुर्वते ॥इति तत्त्वनिर्णये ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "तस्मादणिमानं न्येतीत्यादिना जीवगतं ब्रह्मैवोच्यते । जीवोपतापादि तु नैव ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "जीवमादाय गच्छन्तमनुयान्ति दिवौकसः ।", |
| | "प्राणाभिमानिनो विष्णुं नृपं परिजना यथा ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "उग्रास्तु श्रेणयः प्रोक्ताः योधाः प्रत्येनसः स्मृताः ।", |
| | "ग्रामण्यस्तु चमूपालास्ते सर्वे द्विविधा मताः ॥", |
| | "राज्ञा सह स्थिताश्चैव तथा जनपदे स्थिताः ।", |
| | "ते सर्वेऽपि नियन्तव्या श्रेणिभिर्द्विविधैः सदा ॥ इति राजनीतौ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अनुयान्ति शरीरस्था अभियान्ति स्वलोकगाः ।", |
| | "मुक्तमादाय गच्छन्तं विष्णुं सर्वे दिवौकसः ॥ इत्यध्यात्मे ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "शारीरब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति । स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति । स यत्रैव चाक्षुषः पुरुषः परांग् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः ।", |
| | "तं यदा प्राप्य जीवात्मा मृतेः पूर्वं विमुग्धताम् ॥", |
| | "याति विष्णुं तदा देवा यान्ति तेजःस्वरूपिणः ।", |
| | "तानादाय हरिश्चक्षुःस्थानाद्धृदयमाव्रजेत् ॥", |
| | "तदा न किञ्चिज्जानाति जीवो ब्रह्मसमाश्रितः ॥ इति च ॥" |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "एनं बल्यमभिसमायान्ति । पराक् स्थितश्चाक्षुषो भगवान् प्रत्यक्परावर्तते ।", |
| | "इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः इत्यादिश्रुतेः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-776", |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति स विज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा ।", |
| | "चक्षुरादिषु रूपाणि जाग्रत्काले तयोः सदा ॥", |
| | "बहूनि सन्ति तान्येव यदैकीभावमाप्नुयुः ।", |
| | "हृदयस्थेन रूपेण तदा जीवो न किञ्चन ॥", |
| | "जानातीति विदुः प्राज्ञास्तदा विष्णोः स्वतेजसा ।", |
| | "द्योतते हृदयाग्रं च तेन द्वारेण केशवः ॥", |
| | "निष्क्रामेज्जीवमादाय प्राण एनमनुव्रजेत् ।", |
| | "प्राणमन्ये तथा देवा विद्या कर्म च योग्यता ॥ इति महामीमांसायाम् ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "कर्माभिमानी गरुडो ब्रह्मा ज्ञानाभिमानवान् ।", |
| | "पूर्वप्रज्ञा योग्यता स्याद्रमा तदभिमानिनी ॥", |
| | "एतेऽपि विष्णुं गच्छन्तमनुयान्ति सदैव हि ।", |
| | "वायुर्ज्ञानात्मकश्चैव प्राणात्मक इति द्विधा ॥अनुयाति हृषीकेशं सर्वैर्देवैः समन्वितः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "देवलोके चिरं रत्वा यस्तु मुक्तिं व्रजिष्यति ।", |
| | "स तु तद्देवताद्वारेणोत्क्रामति न संशयः ॥", |
| | "विष्णोर्लोकं परं गच्छन्नुत्क्रामेन्मूर्ध्न एव तु ।", |
| | "तथैव ब्रह्मणो लोकं सुषुम्नाया विभेदतः ॥ इत्यध्यात्मे ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "सविज्ञानो भवति । जीवेन सहितो भवति । सविज्ञानं जीवमेवान्ववक्रामति । जीवमारुह्य गच्छति भगवान् प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इति ह्युक्तम् । यो विज्ञाने तिष्ठन् य आत्मनि तिष्ठन् इत्युभयोर्जीवाभिप्रायेण हि पाठः । शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इति भगवद्वचनम् । विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "एष आत्मा निष्क्रामतीति जीवांगीकारे शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते इत्यादिकमयुक्तं स्यात् । न हि जीवः शरीरं निहत्याविद्यां गमयति रूपान्तरं वा करोति । न च सर्वमयत्वं जीवस्य । ब्रह्मेति विशेषणाच्च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C04_S04_V03", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वा अन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-783", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V03_B1", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "जीवस्य सूक्ष्मरूपं तु प्राप्य स्थूलं परित्यजेत् ॥", |
| | "इदं शरीरं भूतेषु विलापयति केशवः ।", |
| | "अविद्यां चैव जीवस्य गमयेज्ज्ञानसर्जनात् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-784", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्यथा पेशस्करी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वा अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-785", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च ।", |
| | "शुद्धेन तेन चात्मेष्टं कुरुते रूपमंजसा ॥", |
| | "एवं स भगवान् विष्णुर्जीवस्वर्णस्य यन्मलम् ।", |
| | "अविद्याकामकर्माद्यमात्माग्नौ नाश्य सर्वकृत् ॥", |
| | "स्वेच्छया कुरुते रूपं यद्योग्यं तस्य मुक्तिगम् ।", |
| | "पितृजीवस्य पित्र्यं स गान्धर्वं तस्य चैव हि ॥", |
| | "दैवं तु देवजीवस्य प्राजापत्यं प्रजापतेः ।", |
| | "ब्रह्मणो ब्राह्ममेवेति नित्यानन्दस्वरूपकम् ॥", |
| | "न योग्यतां विना क्वापि पूर्वप्रज्ञाश्रुतेः क्वचित् ।", |
| | "यदा मुक्तो भवेद् ब्रह्मा तदा ब्रह्मा स मुख्यतः ॥", |
| | "एवं प्रजापतिश्चैव तथैवान्येऽपि सर्वशः ।", |
| | "यथा हि स्वर्णरूप्याद्यं मलहानौ हि तद्भवेत् ॥", |
| | "पूर्वं तु योग्यतामात्रं द्विजत्वं बालके यथा ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "न ह्यमुक्तानां कल्याणतरत्वम् । न च मृगादीनां कल्याणत्वमपि । मरणमात्रं चेदत्रोच्यते तदा कल्याणतरमिति विशेषणं व्यर्थमेव स्यात् । पूर्वोक्तश्रोत्रियावृजिनाकामहतदेवादीनां चात्रोक्तिः । पूर्वाननुभूतत्वान्नवतरं च भवति ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-787", |
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| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अल्पतेजस्तथैवाल्पं जीवरूपं हि संसृतौ ।", |
| | "तथैव सुमहत्तेजः करोति भगवान् महत् ॥", |
| | "अतो नवतरं चैतद्ब्रह्मादीनां करोत्यजः ॥ अन्येषां वा भूतानां मनुष्यादीनाम् । नासुरादीनां भविष्यतीति च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "मयं तु मानुषं स्वर्णं पीतं गान्धर्वमेव च ।", |
| | "इंद्रगोपनिभं नाम्ना जाम्बूनदमिति स्मृतम् ॥", |
| | "दैवं चामीकरं नाम प्रोद्यदादित्यसन्निभम् ।", |
| | "नैजो विशेषः स्वर्णानामेतेषां सर्वदैव च ॥", |
| | "नाग्न्यादिनापि समतां यान्ति तानि कथञ्चन ।", |
| | "एवं मानुषगन्धर्वपितृदेवाः प्रजापतिः ॥", |
| | "ब्रह्मेति क्रमशो जीवा विशिष्टा उत्तरोत्तरम् ।", |
| | "स्वभावेनैव मुक्तानां स्वभावो व्यक्तिमाव्रजेत् ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "स यत्राणिमानं न्येति तस्य ह वै तस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वा विमुक्ताः तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च इत्येवमादेश्च मुक्तविषयमेवैतत् । मुक्तविषयत्वेन चैतत्प्रकरणं सूत्रयामास भगवान् । तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् इत्यादिना ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "न चान्या मुक्तिरस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् ब्रह्मणा विपश्चिता । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स य एवंविदेवं पश्यन्नेवं मन्वानस्तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति स एकधा भवति त्रिधा भवति" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "पञ्चधा सप्तधा पुनश्चैकादश स्मृतः" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।", |
| | "एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "परं भूयःप्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।", |
| | "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।", |
| | "सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।", |
| | "न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशंगवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-799", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "इत्यादिश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तेषां निर्गुणमुक्तिविषयत्वेन प्रसिद्धेष्वेव स्थलेषु मुक्त्यनन्तरं भोगोक्तेश्च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C04_S04_V04_B1", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अशरीरक्रिया गौणदेहादेस्ते ह्यभावतः ।", |
| | "चिदानन्दशरीरादेः सदेहाद्या विमोक्षिणः ॥", |
| | "अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दा सुगंधिनः ॥ इत्यादेश्च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयोः वायुमयः आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयस्सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनाथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-802", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V05_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-803", |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "आत्माऽयमाततत्वाद्धि ब्रह्म पूर्णगुणत्वतः ।", |
| | "दूरस्थत्वात् स इत्युक्तः समीपस्थो ह्ययं स्मृतः ॥", |
| | "पूर्णज्ञानस्वरूपत्वाद् विज्ञानमय ईर्यते ।", |
| | "सर्वमन्तृस्वरूपत्वात् स एवोक्तो मनोमयः ॥", |
| | "बलपूर्णस्वरूपत्वात् स प्राणमय ईरितः ।", |
| | "सर्वद्रष्टृस्वरूपत्वाच्चक्षुर्मय इतीर्यते ॥", |
| | "सर्वश्रोतृस्वरूपत्वात् स श्रोत्रमय ईरितः ।", |
| | "सर्वाधारात् सुगन्धत्वात् पृथिवीमय उच्यते ॥", |
| | "सर्वतृप्तिकरत्वाच्च विष्णुरापोमयः स्मृतः ।", |
| | "सर्वकर्तृस्वरूपत्वाच्छ्रुतो वायुमयो हरिः ॥", |
| | "अवकाशप्रदातृत्वादाकाशमय ईर्यते ।", |
| | "पूर्णतेजःस्वरूपत्वात् तेजोमय उदाहृतः ॥", |
| | "सृष्ट्यादीच्छास्वरूपत्वात् स्मृतः काममयो हरिः ।", |
| | "सर्वदुष्टप्रतीपत्वात् स हि क्रोधमयो मतः ॥", |
| | "सुखादिधर्मरूपत्वाज्ज्ञेयो धर्ममयः प्रभुः ।", |
| | "अप्राकृतस्वरूपत्वादनेतन्मय एव च ॥", |
| | "अपार्थिवो हरेर्गन्धो न तृप्तिश्चाप्यबात्मिका ।", |
| | "नाग्नेयं तस्य तेजोऽपि न च वायुर्बलं हरेः ॥", |
| | "श्रोत्राद्या नास्य चाकाशो मनस्तत्त्वं न तन्मनः ।", |
| | "बुद्धितत्त्वं न तद्बुद्धिर्नाहमस्याहमुच्यते ॥", |
| | "महदात्मकं न तच्चितं प्रकृतिर्नास्य चेतना ।", |
| | "प्रकृत्यादिगुणा यस्मात् तद्गुणप्रतिबिम्बकाः ॥", |
| | "अतः सर्वमयो विष्णुः सर्वाद्यत्वादतन्मयः ।", |
| | "चिदानन्दात्मकास्तस्य गुणाः सर्वगुणात्मकाः ॥", |
| | "सर्वदाऽतः सर्ववैलक्षण्यमेषां प्रकीर्तितम् ।", |
| | "क्रोधः क्षमात्मको यस्य चिदानन्दात्मकस्तथा ॥", |
| | "अन्यक्रोधसमः क्रोधस्तस्य विष्णोः कथं भवेत् ।", |
| | "एवं सर्वगुणास्तस्य सर्वेभ्योऽपि विलक्षणाः ॥", |
| | "पूर्वप्रज्ञानुसारेण विमुक्तस्तमुपेष्यति ।", |
| | "अनादिकालसम्बद्धा या प्रज्ञा विष्णुसंश्रया ॥", |
| | "पूर्वप्रज्ञेति सा प्रोक्ता ब्रह्मादेस्तारतम्यतः ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-804", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V05_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "वर्तमानं यतो विष्णोर्वशे तस्मादिदम्मयः ।", |
| | "अतीतानागतं यस्मात् तद्वशेऽतो ह्यदोमयः ॥", |
| | "प्राधान्ये च मयट् प्रोक्तः स्वरूपे च यतो भवेत् ।", |
| | "इदंरूपोऽप्यदोरूपस्ततो नित्यत्वतो हरिः ॥", |
| | "अस्य तस्य प्रधानस्य नित्यपूर्णबलत्वतः ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-805", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V05_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यथा पूर्वं तथेदानीमिति विष्णुस्तदुच्यते ।", |
| | "यथा बाह्ये तथैवान्ते ततो यदिति चोच्यते ॥", |
| | "यथेदानीं तथा नित्यं यस्मादेष भविष्यति ।", |
| | "अत एतदिति प्रोक्तो वासुदेवो जगत्पतिः ॥", |
| | "स यथा करोति पुरुषं तथैवायं भविष्यति ।", |
| | "साधुर्भवति साधुं चेत् करोति पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "पापो भवति पापं चेत् स करोति जनार्दनः ।", |
| | "तत्प्रेरितेन पुण्येन पुण्यो भवति मानवः ॥", |
| | "तत्प्रेरितेन पापेन तथा पापः पुमान् भवेत् ।", |
| | "आहुश्च तत्कामाधीनं जीवमेनं सदैव हि ॥", |
| | "तत्कामादस्य कामः स्याद्यथाकामस्तथा भवेत् ।", |
| | "कामानुसारिणी निष्ठा कर्मनिष्ठानुसारतः ॥", |
| | "फलं कर्मानुसारेण विष्णोः काममयस्ततः ।", |
| | "जीवोऽयं सर्वदैव स्यान्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "जीवेश्वराभेदांगीकारे सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति सूत्रविरोधः । प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः इत्यादि श्रुतिविरोधश्च । न च व्यावहारिकभेदो नाम कश्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । भ्रान्तिभेदत्वे श्रुतिसिद्धत्वमेव न स्यात् । न हि निर्दोषश्रुतिवाक्यसिद्धं भ्रान्तमिति युक्तम् । उन्मत्तवाक्यवत् सर्ववेदस्याप्रामाण्यप्रसक्तेः । न च स्वविषयस्य भ्रमत्वादन्यदप्रामाण्यं नाम किञ्चित् । तन्मते ह्युन्मत्तवाक्यविषयस्याप्यनिर्वचनीयत्वमेव" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-807", |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवः । त एते सत्याः कामाः इत्यादिश्रुतिभिर्भगवद्गुणानां सत्यत्वमेव ज्ञायते । सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः इति सर्वजीवानां भगवदनुजीवनं च सत्यमित्येवोच्यते । तदा कथं जीवभेदस्यासत्यता । न च सर्वविध्यर्थक्रियासिद्धस्य कुत्रचिद् बाधो दृष्टः । न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते इति मुक्त्यनन्तरमपि तदधीनत्वप्रतीतेश्च । न भेदस्यासत्यता । न हि संसारावस्थायामक्षीणकर्मता भवति । न च मुख्यार्थं परित्यज्यामुख्यो युक्तः । अतः सत्य एव भेदः । स भगवान् यथाकारी तथा कारयति यथाचारी यथा चारयति तथा भवति । स भगवान् यथा कामो भवति तथा कामो जीवो भवति । इत्थं कामोऽस्य भूयादिति भगवदिच्छावशादस्य कामो भवतीत्यर्थः । क्रतुरितीत्थं करिष्याम्येवेति निश्चयरूपः कामः । स भगवदिच्छया हि भवति । कामेन मे काम आगात् इति च श्रुतिः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-808", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V06", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदेष श्लोको भवति ।", |
| | "तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिंगं मनो यत्र निषिक्तमस्य ।", |
| | "प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् ॥", |
| | "तस्माल्लोकात् पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकामः आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-809", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V06_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते ।", |
| | "अ इत्युक्तः परो विष्णुस्तत्कामोऽकाम ईरितः ॥", |
| | "तथा कामयमानः स योग्यकामस्य चापि तु ।", |
| | "कादाचित्कसमुद्भूतेर्भगवत्कामनां विना ॥", |
| | "कामितस्याखिलस्याप्तेराप्तकामश्च मुक्तिगः ।", |
| | "चिदानन्दात्मकं रूपं कामत्वेन भविष्यति ॥", |
| | "यतस्तेनैवाप्तकाम इति मुक्तोऽभिधीयते ।", |
| | "मुक्तस्य न पुनः प्राणा उत्क्रामन्ति कदाचन ॥", |
| | "जीवोऽपि ब्रह्मशब्दोक्तो जडाद्गुणबृहत्वतः ।", |
| | "प्राप्नोति परमं ब्रह्म प्रलये प्रलये सदा ॥", |
| | "मअन्यदा स्वेच्छया विष्णोः स्वरूपाद् बहिरेष्यति ।", |
| | "स्वेच्छयाऽन्तर्बहिर्वैवं रमते मुक्त आत्मवान् ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-810", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V06_B2", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-811", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V07", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदेष श्लोको भवति ।", |
| | "यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।", |
| | "अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥", |
| | "तद्यथाऽहिर्निलयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-812", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V07_B1", |
| | "type": "bhashya", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-813", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V07_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यावद्विमुच्येत् पुरुषस्तावत् कामा हृदि श्रिताः । चित्ताभावाद्विमुक्तस्य स्युः कामास्तद्गताः कुतः ॥", |
| | "स्वरूपभूतचित्तेन कामाद्याः स्युः सुखात्मकाः ।", |
| | "दुःखात्मकाः प्राकृता वा मुक्तानां न कथञ्चन ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-814", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V07_B1", |
| | "type": "bhashya", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अयं जीवोऽथ मुक्त्यनन्तरमेवाशरीरो भवति । अमृतः कदाऽपि न मृतः । प्राणाख्यं परब्रह्मैव । कतम एको देव इति प्राण इति । स ब्रह्मेत्याचक्षते इत्यादिश्रुतेः । तेज एव च । तेज इति श्रीः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अन्येषाममृतत्वं तु भवेद् विष्णोः प्रसादतः ।", |
| | "नित्यामृतः स भगवान् श्रीश्च नान्यः कथञ्चन ॥", |
| | "इति नारदीये ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "प्राणस्तु भगवान् विष्णुः सर्वनेतृत्वतो विभुः ।", |
| | "तेजस्तु सर्वतेजस्त्वाच्छ्रीरेव समुदाहृता ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-817", |
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| | "type": "verse", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदेते श्लोका भवन्ति ।", |
| | "अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।", |
| | "तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वो विमुक्ताः ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः ।", |
| | "अणुश्च विततश्चासौ यतोऽन्तर्बहिरेव च ॥", |
| | "श्रिया स्पृष्टः श्रीपतित्वादनु वित्तस्तथैव च ।", |
| | "तस्य प्रसादात् संयान्ति तल्लोकं सर्वमोक्षिणः ॥", |
| | "ऊर्ध्वः स भगवान् सर्वविशिष्टो यत्सदैव हि ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-819", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V09", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तस्मिञ्च्छ्लुक्लमुत नीलमाहुः पिंगलं हरितं लोहितं च ।", |
| | "एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् तैजसश्च ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-820", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V09_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "रूपमाहुः पञ्चविधं तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥", |
| | "शुक्लं तु वासुदेवाख्यमनिरुद्धं तु नीलकम् ।", |
| | "संकर्षणं पिंगलं च प्रद्युम्नं हरितं स्मृतम् ॥", |
| | "नारायणं लोहितं स्यात् पञ्चरूपाण्यजे हरौ ।", |
| | "पञ्चभेदविभिन्नो यस्त्वभिन्नोऽपि स्वरूपतः ॥", |
| | "स पन्था ब्रह्मणा ज्ञातः पद्मजेनैव सन्ततम् ।", |
| | "परब्रह्मस्वरूपज्ञो महातेजः श्रियस्तथा ॥", |
| | "सम्यक्स्वरूपविज्ञानात् तैजसत्वेन कीर्तितः ।", |
| | "भगवत्कर्मकर्तृत्वात् पुण्यकृच्चाभिधीयते ॥", |
| | "एवंविधोऽपि तस्यैव प्रसादाद्याति तां गतिम् ।", |
| | "अतः पन्थास्समुद्दिष्टो भगवान् केशवः स्वयम् ॥", |
| | "स्वगताखिलभेदेन विहीनोऽपि स सर्वदा ।", |
| | "सर्वेषां व्यवहाराणां भेदोत्थानां स ईश्वरः ॥", |
| | "अभिन्नोऽपि ह्यतो भिन्नः पञ्चभेदादिना मृषा ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-821", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।", |
| | "ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ १० ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-822", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V10_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अन्यथोपासका येऽस्य ते यान्ति ह्यधरं तमः ॥", |
| | "ततः किञ्चिद्विशेषेण दुर्ज्ञानस्याविनिन्दकाः ।", |
| | "सम्यगाचार्यवचनमवज्ञाय विरोधिनि ॥", |
| | "सत्वबुद्धिं यतः कुर्युरतस्तेऽधिकपापिनः ।", |
| | "अप्राप्तत्यागिनः प्राप्तनिष्ठाहीनो हि दोषवान् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-823", |
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| | "type": "verse", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।", |
| | "तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वांसो बुधो जनाः ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "नित्यदुःखस्वरूपत्वादनन्दं तत्तमो मतम् ।", |
| | "बोधके विद्यमानेऽपि ये विदुर्न परं हरिम् ॥", |
| | "तेऽपि यान्ति तमो घोरं नित्योद्रिक्तासुखात्मकम् ॥ इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "बुधः सकाशेऽप्यविद्वांस इत्यर्थः ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "बोधनाज्ज्ञानवान् भुत् स्यात् तत्सकाशाच्च ये हरिम् ।", |
| | "न विदुस्ते तमो यान्ति सर्वदुःखात्मकं परम् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-827", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V12", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।", |
| | "किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-828", |
| | "oldKey": "BR_C04_S04_V12_B1", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् ।", |
| | "योग्यः शरीरच्छेदादेः कथं दुःखी तदा भवेत् ॥", |
| | "दुःखी शरीरसम्बन्धाज्जीवो विष्णोः प्रसादतः ।", |
| | "अदुःखी विप्लुडानन्दं मुक्त एव च भोक्ष्यति ॥", |
| | "नित्यमुक्तः पूर्णसुखः स्वतंत्रः पुरुषोत्तमः ।", |
| | "परतंत्रः कथं जीवो योग्यः सोऽस्मीति वेदितुम् ॥", |
| | "तस्मात् सोऽस्मीति नैवायं विजानीयात् कदाचन ।", |
| | "तदीयोऽस्मीति जानीयात् सर्वदैव बुधस्ततः ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S04", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मा अस्मिन् सन्दोघे गहने प्रविष्टः ।", |
| | "स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "तस्य लोकः स एवैको यो लोकः परमात्मनः ॥", |
| | "स हि विष्णुः परो वायोरपि कर्ता प्रकीर्तितः ।", |
| | "विश्वो वायुः समुद्दिष्टः पूर्णत्वाज्जीवसङ्घतः ॥", |
| | "तदन्यस्यापि सर्वस्य कर्तैको विष्णुरेव हि ।", |
| | "प्रविष्टो गहने देहमध्ये सन्दोहनामनि ॥", |
| | "तज्ज्ञानी याति तं लोकं तत्प्रसादाच्च वर्तते ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।", |
| | "य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यदैतमनुपश्यन्त्यात्मानं देवमंजसा ।", |
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| | "यस्मादर्वाक् संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।", |
| | "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ १६ ॥" |
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| | "न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥", |
| | "ज्योतिषां ज्योतिरचलं तद्देवाः समुपासते ॥" |
| | ] |
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| | "यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।", |
| | "तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥" |
| | ] |
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| | "प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥", |
| | "मूलप्रकृतिसंयुक्तं यद्गतं प्रतिपूरुषम् ॥" |
| | ] |
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| | "प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रम् ।", |
| | "मनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥" |
| | ] |
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| | "मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।", |
| | "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १९ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "तस्य रूपगुणाद्येषु न कश्चिद्भेद इष्यते ॥", |
| | "तद्भेददर्शी संयाति मृत्योर्मृत्य्वभिधं तमः ॥" |
| | ] |
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| | "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।", |
| | "विरजः पर आकाशादज आत्मा महान् ध्रुवः ॥ २० ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।", |
| | "नानुध्यायेद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् \" इति ॥ २१ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "तस्मादेकप्रकारेण द्रष्टव्यो भगवान् हरिः ॥", |
| | "परिमाणविहीनत्वादप्रमेय इतीरितः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "इत्यादिवचनादप्रमेयत्वमवाच्यत्वममनोविषयत्वं च सर्वात्मना न । मनसैवानुद्रष्टव्यमित्युक्तत्वात् ।" |
| | ] |
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| | "न च केनाप्यवाच्यस्य लक्षणा दृष्टा । क्षीरमाधुर्यविशेषादेरपि तत्तच्छब्देनैव वाच्यत्वात् ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "विशदं क्षीरमाधुर्यं गुडे तीक्ष्णं घृते स्थिरम् इत्यादि च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "न च निर्गुणस्य सत्वमेवास्ति । गुणभेदादीनामपि सन्त्येव गुणाः । न चानवस्था स्वनिर्वाहकत्वात् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "अवाच्यममनोगम्यमगुणं चेत् कुतोऽस्ति तत् ।", |
| | "तस्मादेवं वदन् वस्तुशून्यतामर्थतो वदेत् ॥", |
| | "गुणाश्च गुणिनः सर्वे स्वेनैव गुणिनो गुणाः ॥\" इत्यादि च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन् शेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवत्येतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येतद्ध स्म वैतत् पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते । किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-849", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "सर्वमस्य वशे यस्माद्धरिः सर्ववशी ततः ।", |
| | "सर्वस्य ब्रह्मरुद्रादेरन ईशान एव च ॥", |
| | "गुणाधिकः पालकश्चेत्यतोऽधिपतिरीरितः ॥ \"इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-850", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् ।", |
| | "नित्यबोधात्मकत्वाद्यो मुनिः प्रोक्तो जनार्दनः ।", |
| | "तं विद्वांश्च मुनिर्नाम बोधस्तस्याप्यमुख्यतः ।", |
| | "यं विदित्वा विमुक्ताश्चायुक्तकामविवर्जिताः ॥", |
| | "उत्पत्तिलयहीनाश्च नित्यानन्दैकभोगिनः । आनन्दभिक्षां विष्णूत्थां चरन्त्यज्ञानवर्जिताः ॥", |
| | "स एष मोक्षदो विष्णुर्यत्कल्याणं कृतं मया। पापं कृतं मयेत्येतन्न कदाचित् करिष्यति ॥", |
| | "कृते मया पुण्यपापे इति यच्चेतनात्मनाम् ।तत्सर्वमत एवोक्तं विष्णोः सर्वेश्वरेश्वरात् ॥", |
| | "तीर्णो हि वर्तते नित्यं पुण्यपापे जनार्दनः ।", |
| | "नैनं कदाचित् तपतः पुण्यपापे जनार्दनम् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदेतदृचाभ्युक्तम् ।", |
| | "एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।", |
| | "तस्यैव स्यात् पदं वित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति ॥", |
| | "तस्मादेवंवित् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति", |
| | "नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति", |
| | "नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति", |
| | "विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राड् इति होवाच याज्ञवल्क्यः", |
| | "सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः ।", |
| | "हृदिस्थविष्णौ सन्तोषः सदैवोपरमः स्मृतः ॥", |
| | "तितिक्षा द्वन्द्वसहता क्षमा क्रोधासमुत्थितिः ॥इति शब्दनिर्णये ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "सर्वः पूर्णः समुद्दिष्टस्तथा ज्ञेयो जनार्दनः ।", |
| | "रागसन्देहपापानि तथा जानंस्तरिष्यति ॥", |
| | "नित्यं हि रागपापादेर्मुक्तो यत्पुरुषोत्तमः । वेदाख्यब्रह्मणान्यत्वाद्विष्णुर्ब्राह्मण उच्यते ॥", |
| | "पूर्णत्वाज्ज्ञानरूपत्वाद् ब्रह्मलोकश्च स प्रभुः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २५ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २६ ॥" |
| | ] |
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| | { |
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| | "lines": [ |
| | "न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥", |
| | "ब्रह्मायमाप्तकामत्वादेवं यो वेद तं परम् ।", |
| | "आप्तकामोऽभयश्चैव भवेद् विष्णोरनुग्रहात् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "परमार्थेऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवतीति नित्यमेव तथा भवतीत्यर्थः ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अभूद्भविष्यति भवत्येवमाद्यपदानि तु ।", |
| | "नित्यभावाभिधायीनि यत्र वाच्या हरेर्गुणाः ॥ इति शब्दनिर्णये ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "मैत्रेयीब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः मैत्रेयी च कात्यायनी च । तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेत्थ तदेव मे ब्रूहीति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियामवृद्धं तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "प्रियां वाचमवर्धयद्भवती ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स होवाच न वा ओ पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा ओ जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा ओ पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा ओ वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा ओ पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा ओ ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा ओ क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा ओ लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । न वा ओ वेदानां कामाय वेदाः प्रियाः भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा ओ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ओ द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो लोकान् । वेद देवास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स यथाऽऽर्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तमेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा ओऽयमात्माऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-873", |
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| | "lines": [ |
| | "बाह्याभ्यन्तरविशेषाभावेन सर्वत्र लवणरसघन एव ।" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन् न वा अहमिमं विजानातीति स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा ओऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "bhashya", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
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| | "lines": [ |
| | "न वा अहमिमं विजानातीति । ओयमिमं परमात्मानं जीवो न विजानातीत्यत्रैव भगवान् मोहान्तं मोहाख्यं नाशमापीपिपत् प्रापयामास । अतोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाचीति सिद्धम् । अन्यथा कथमहं विजानातीति युज्येत ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-876", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् केन कं जिघ्रेत् केन कं रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-877", |
| | "oldKey": "BR_C04_S05_V14_B1", |
| | "type": "bhashya", |
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| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "एतावद्विज्ञातुः परमात्मनो विज्ञानादिकमेव ह्यमृतत्वं मोक्षः ।", |
| | "विष्णोर्ज्ञानादिकं मोक्षस्तदभावे कुतः सुखम् ।", |
| | "ज्ञेयाभावान्न हि ज्ञानं ज्ञानाभावे हि शून्यता ।", |
| | "तस्माज्ज्ञेययुतो मोक्षः सुखरूपत्वतः सदा ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-878", |
| | "oldKey": "BR_C04_S06", |
| | "type": "section", |
| | "parent": null, |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "वंशब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-879", |
| | "oldKey": "BR_C04_S06_V01", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S06", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनात् ।", |
| | "गौपवनः पौतिमाष्यात् ।", |
| | "पौतिमाष्यो गौपवनात्।", |
| | "गौपवनः कौशिकात् ।", |
| | "कौशिकः कौंडिन्यात् ।", |
| | "कौंडिन्यः शांडिल्यात् ।", |
| | "शांडिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-880", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S06", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "गौतमः आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः गार्ग्याद् ।", |
| | "गार्ग्यो गार्ग्याद् ।", |
| | "गार्ग्यो गौतमात्।", |
| | "गौतमः सैतवात् ।", |
| | "सैतवः पाराशर्यायणात् ।", |
| | "पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद् ।", |
| | "गार्ग्यायण उद्दालकायनाद् ।", |
| | "उद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्यंदिनायनान्माध्यंदिनायनः सौकरायणात् ।", |
| | "सौकरायणः काषायणात् ।", |
| | "काषायणः सायकायनात् ।", |
| | "सायकायनः कौशिकायनेः॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-881", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C04_S06", |
| | "chapter": "BR_C04", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "कौशिकायनिः घृतकौशिकात्", |
| | "घृतकौशिकः पाराशर्यायणात् ।", |
| | "पाराशर्यायणः पाराशर्यात् ।", |
| | "पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् ।", |
| | "जातूकर्ण्यः आसुरायणाच्च यास्काच्च आसुरायणस्त्रैवर्णेस्त्रैवर्णिः औपबन्धनेरौपन्धनिरासुरेः आसुरिर्भारद्वाजात् भारद्वाजः आत्रेयात् आत्रेयो माण्टेः माण्टिर्गौतमात् गौतमो वात्स्यात् वात्स्यः शांडिल्यात् शांडिल्यः कैशोर्यात् काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवात् गालवो विदर्भी कौंडिन्यात् विदर्भीकौंडिन्यो वत्सनपादो बाभ्रवात् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरो अयास्यात् आंगिरसादयास्य आंगिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात् त्वाष्ट्रात् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणात् दध्यंग्ङाथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात् प्रध्वंसन एकऋषेः एकऋषिर्विप्रचित्तेः विप्रचित्तिः व्यष्टेः व्यष्टिः सनारोस्सनारुः सनातनात् सनातनः सनकात् ।", |
| | "सनकः परमेष्ठिनः।", |
| | "परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "अवरेभ्योऽपि शृण्वन्ति परमाश्च क्वचित् क्वचित् ।", |
| | "लीलयैव न चैतेषां परमत्वं विहीयते ॥ इति च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "प्रथमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-884", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।", |
| | "पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C05_S01_V01_B01", |
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| | "parent": "BR_C05_S01", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "पूर्णं च तत्परं रूपं पूर्णात् पूर्णाः समुद्गताः ॥", |
| | "परावरत्वं तेषां तु व्यक्तिमात्रविशेषतः ।", |
| | "न देशकालसामथ्यैः पारावर्यं कथञ्चन ॥", |
| | "पूर्वरूपस्य पूर्णस्य पूर्णं यदवतारगम् ।", |
| | "रूपं तदात्मन्यादाय पूर्णमेवावतिष्ठते ॥", |
| | "लौकिकव्यवहारो यो भूभारक्षपणादिकः ।", |
| | "तददृष्टिं विना नान्यो लयः कृष्णादिनां क्वचित् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-886", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S01", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदेनैन यद्वेदितव्यम् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S01", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते ।", |
| | "खं प्रकाशस्वरूपत्वात् ब्रह्मतद्व्याप्तरूपतः ॥", |
| | "पुनः खं सुखरूपत्वम् पुराणं तदनादितः ॥", |
| | "वायोश्च रतिदं यस्माद्वायुरं ब्रह्म तत्परम् ।", |
| | "ख्यातत्वाच्चापि तत्खं स्याद्रौहिणेयस्तथाऽवदत् ॥", |
| | "वेदोऽयं ज्ञानरूपत्वादिति यं ब्राह्मणा विदुः ।", |
| | "निर्दोषत्वाद इत्युक्तस्तेन वेद्यं सदाऽखिलम् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "बाह्लीकसुता हि रोहिणी । अतो बलभद्रः कौरव्यायणीपुत्रः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "section", |
| | "parent": null, |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "द्वितीयं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
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| | "parent": "BR_C05_S02", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं, देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्ठा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-891", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S02", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-892", |
| | "oldKey": "BR_C05_S02_V03", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S02", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रयं शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-893", |
| | "oldKey": "BR_C05_S02_V03_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S02", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "ज्ञानदानं तु देवानां फलदानं तु कर्मणाम् ।", |
| | "विष्णुना विहितं पूर्वं पुनर्देवनरासुराः ॥", |
| | "ब्रह्माणमपि पप्रच्छुर्देवानां सद्गुणोच्छ्रितेः ।", |
| | "अनहंकारमात्रं तु ब्रह्मणा विहितं सदा ॥", |
| | "सर्वोच्चमोक्षसम्प्राप्त्यै नराणां ज्ञानसाधनम् ॥", |
| | "देवादीनां दानमेव हविरादेः प्रकीर्तितम् ।", |
| | "तमःप्राप्तिविलम्बाय दैत्यानां विहिता दया ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "section", |
| | "parent": null, |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "तृतीयं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सत्यं तदेतत्त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-896", |
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| | "parent": "BR_C05_S03", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "हरणाद्यज्ञभागादेर्ज्ञानादेर्दानतस्तथा ।", |
| | "यानादव्यवधानेन परस्य ब्रह्मणस्तथा ॥", |
| | "ब्रह्मा हृदय इत्युक्तस्तस्यैवंविदपि ध्रुवम् ।", |
| | "हृतिदानस्वर्गयानपात्रं स्यात् तत्प्रसादतः ॥", |
| | "हृत्वैवास्मै ददत्यद्धा स्वकीयाश्चान्य एव च ॥ इति निर्णये ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "परमात्मा च प्रजापतिः ।" |
| | ] |
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| | "type": "section", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "चतुर्थं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-899", |
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| | "parent": "BR_C05_S04", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्धैतदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमांल्लोकान् जित इन्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यं ह्येव ब्रह्म ॥" |
| | ] |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-900", |
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| | "lines": [ |
| | "ततत्वादेकरूपत्वात् तत्परं ब्रह्म कीर्तितम् ।", |
| | "तदेव तादृशं प्रोक्तं नैवान्यत् तादृशं क्वचित् ॥", |
| | "तदेतत् सत्यमेवासीद्वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
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| | "तदेव हि तत् । तन्नारायणाख्यं परं ब्रह्मैतदेव सत्यं वासुदेवाख्यमासीदित्यर्थः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "स्वस्मात् स्वयं समुत्पन्नो वासुदेवात्मना प्रभुः ।", |
| | "सत्यं ब्रह्मेति यो वेद महायाज्यं तु तं परम् ॥", |
| | "प्राप्नोत्येव हि तल्लोकांजीवन्नप्युत्तमो भवेत् । इति प्रध्याने ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स्वभागहरणाद्दानात् फलानां यापनान्नृणाम् ।", |
| | "हृदयं भगवान् विष्णुः सत्यं तद्गुणरूपतः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥" |
| | ] |
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| | "प्रजापतिरिति ब्रह्मा वेदेषूक्तो ह्यमुख्यतः ।", |
| | "यस्मिन्नूषुर्ब्रह्मचर्यं देवासुरनरोऽब्जजे ॥", |
| | "एष वै भगवान् विष्णुर्मुख्यतस्तु प्रजापतिः ।", |
| | "यज्ज्ञानान्मुक्तिमायान्ति स्वर्गाख्यां हृदयं च सः ॥", |
| | "हृतिसद्दानयानेभ्यः सत्यं सद्गुणरूपतः ।", |
| | "यत्तद्धृदयमित्युक्तं ब्रह्म तत्सत्यतामगात् ॥", |
| | "सत्यत्वं सदनीयत्वमासाद्यं यन्मुमुक्षुभिः ।", |
| | "एवं तद्ब्रह्म यो वेद स हि लोकानिमांजयेत् ॥", |
| | "एतल्लोकजयो नाम धर्मज्ञानादिपूर्णता ।", |
| | "जित एव ह्यसौ लोको यदा वेद जनार्दनम् ॥ इति गुणपरमे ॥" |
| | ] |
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| | "परलोको जित एवाभवदित्यर्थः ॥" |
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| | "पञ्चमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवांस्ते देवाः सत्यमेवोपासते ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सदा सर्वगुणापानादापो नारायणः स्मृतः ।", |
| | "द्वितीयं रूपमसृजद्वासुदेवं स आत्मनः ॥", |
| | "ब्रह्म सत्यमिति प्राहुर्वासुदेवाभिधं प्रभुम् ।", |
| | "तस्माद् ब्रह्माऽजनि ततो देवाः सर्वेऽपि जज्ञिरे ॥", |
| | "तस्माद्ब्रह्मादयो देवा वासुदेवमुपासते ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदेतत् त्र्यक्षरं सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वांसमनृतं हिनस्ति ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "ततत्वादन्यथाज्ञानं तीत्येव समुदीर्यते ॥", |
| | "तस्याधस्तात् सदात्मा तु सादयन्ननृतं हरिः ।", |
| | "उपरिष्टाच्च यन्नामा नाशयन्ननृतं स्थितः ॥", |
| | "एवं यो वेद तं विष्णुं नास्य मिथ्यादृशिर्भवेत् ।", |
| | "योग्यतापेक्षयोपासाऽथापरोक्ष्याच्च तत्फलम् ॥", |
| | "सम्यग्ददात्यन्यथा च भवेदेवोपकारिणी ।", |
| | "अत्ययोग्याय चेत् सा स्याद्विपरीतफलप्रदा ॥", |
| | "वैपरीत्यं तु विघ्नः स्यान्न तु पापं कथञ्चन ॥ इत्याधारे ॥" |
| | ] |
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| | "षष्ठं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तद्यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मंडलं पश्यति नैनमेते रश्मयःप्रत्याययन्ति ॥१॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "स वासुदेवो भगवानादित्यस्थो जनार्दनः ।", |
| | "आदित्यनामा सम्प्रोक्तो आदानाद्धविषां सदा ॥", |
| | "स एव दक्षिणाक्षिस्थस्तच्च रूपद्वयं हरेः ।", |
| | "अन्योऽन्यस्मिन् स्थितं नित्यं प्राणैश्च सह रश्मिभिः ॥", |
| | "दक्षिणाक्षिस्थितो विष्णुर्यदाऽस्मादुत्क्रमिष्यति ।", |
| | "तदैव म्रियमाणस्तु जीवः पश्येद्विरश्मिकम् ॥", |
| | "सूर्यस्य मंडलं नास्य प्रतीयन्ते हि रश्मयः ।", |
| | "तत्क्षणे नियमेनैव केषाञ्चित् सप्तभिर्दिनैः ॥" |
| | ] |
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| | "सप्तमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षर तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे सुवरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "तस्य विष्णोः शिरो नाम भावनाद् भूरिति स्मृतम् ।", |
| | "भावनं रक्षणं प्रोक्तं दृष्ट्या वाचा च रक्षति ॥", |
| | "उत्पादनाद्भुनामा स्याद् दक्षिणो बाहुरस्य तु ।", |
| | "विनाशनाद्व इत्युक्तः सव्यो बाहुः परात्मनः ॥", |
| | "स्वित्यानन्दस्समुद्दिष्टो वरिति ज्ञानमुच्यते ।", |
| | "मुक्तिदानेन तद्दानात् सुवस्य पदद्वयम् ॥", |
| | "दक्षिणश्चैव सव्यश्च क्रमाद्वर्णद्वयोदितौ ।", |
| | "पादावस्य हि तत्प्राप्तिर्मुक्तिरित्यभिधीयते ॥", |
| | "अहमेषो ह्यहेयत्वाज्जीवेन सहभावतः ।", |
| | "असावहरिति प्रोक्तः सर्वलोकप्रकाशनात् ॥", |
| | "तद्वेदनात् सर्वपापं हन्ति चैव जहाति च ।", |
| | "कानिचिद्धन्ति पापानि कल्पादीन् संजहाति च ॥ इति प्रवृत्ते ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "अष्टमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन् अन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "मनोमयो ज्ञानमयः प्रधानं मय उच्यते ।", |
| | "महाज्ञानात्मकश्चैव भारूपः सद्गुणात्मकः ॥", |
| | "सर्वप्रशासको विष्णुः ......।" |
| | ] |
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| | "नवमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युत् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥" |
| | ] |
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| | "......... विद्युत्सर्वस्य वेदनात् ।", |
| | "य एनं वेद वेत्तारं सर्वस्य परमेश्वरम् ॥", |
| | "पादेभ्यो मोचयित्वैनं स्वात्मानं वेदयेद्धरिः ॥ इति माहात्म्ये ।" |
| | ] |
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| | "दशमं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सरस्वती तु गोरूपा तस्या देवादयोऽखिलाः ।", |
| | "स्तनानेवोपजीवन्ति तस्या वायुः पतिः प्रभुः ॥", |
| | "वत्सो मनोऽभिमान्यस्याः सरस्वत्याः सदाशिवः ॥ इति प्रभंजने ।" |
| | ] |
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| | "एकादशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तःपुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अग्निनामा तु भगवानौदर्याग्नौ प्रतिष्ठितः ।", |
| | "विश्वैर्गुणैः समेतत्वादनन्तत्वाच्च स प्रभुः ॥", |
| | "वैश्वानर इति प्रोक्तः सोऽग्निरंगप्रणेतृतः ।", |
| | "तस्य विष्णोस्तुतिरियं क्रियते वायुना सदा ॥", |
| | "कर्णौ पिधाय या नित्यं श्रोतुं शक्याऽखिलैः सदा ॥ इति तंत्रमालायाम् ॥" |
| | ] |
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| | "द्वादशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स चंद्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्वं आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "प्रवहं वायुपुत्रं च सूर्यसोमौ च विद्युतम् ।", |
| | "प्राप्य प्रधानवायुं च याति तत्परमं पदम् ॥ इति ब्रह्मांडे ।" |
| | ] |
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| | "त्रयोदशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एतद्वै परमं तपो यद् व्याधितस्तप्यते परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेद ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "व्याधीञ्छवहृतिं चैव शवदाहादिकं तथा ।", |
| | "विष्णवे तप इत्येव चिन्तयन् याति तत्परम् ॥ इति च ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "ओशितोऽपि क्लेशादीनतीतैष्यानपीह यः ।", |
| | "विष्णवे तप इत्येव प्रार्पयेत् स परं व्रजेत् ॥", |
| | "विष्णोः स्वरूपवेत्ता चेदन्यथा न कथञ्चन ।", |
| | "यथा स्वरूपवेत्तुः स्यादेकैकापि ह्युपासना ॥", |
| | "मोक्षाय सहिताः सर्वा अप्यज्ञस्य न तु क्वचित् ।", |
| | "यथावत् केशवं ज्ञात्वा स्वयोग्यैकामुपासनाम् ॥", |
| | "अपि कृत्वा हरिं दृष्ट्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
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| | "चतुर्दशं ब्राह्मणम्" |
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| | "lines": [ |
| | "अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्यक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह्येव देवते एकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किंस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिनामा प्रातृदः कस्त्वेनयोरेकधा भूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-939", |
| | "oldKey": "BR_C05_S14_V01_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अन्नाभिमानी ब्रह्मैव प्राणो वायुरुदाहृतः ।", |
| | "अन्योन्यानुप्रविष्टौ तौ सर्वदैव सुसंस्थितौ ॥", |
| | "वायुं विना ब्रह्मणोऽपि शरीरं पूतिमेष्यति ।", |
| | "वायुश्च शोषमायाति विना ब्रह्माणमंजसा ॥", |
| | "तयोरेवं परिज्ञानी वासिष्ठः पाणिनामकः ।", |
| | "ब्रह्मवायुविदे कार्यं किं मया साध्वसाधु वा ॥", |
| | "नासाधुना साधयितुं शक्योऽसौ साधुनाऽपि वा ।", |
| | "नार्थोऽस्य कृतकृत्यत्वाद्यदि वेद परं हरिम् ॥", |
| | "इति प्रशस्य तज्ज्ञानं वसिष्ठं प्राब्रवीत् ततः ।", |
| | "अन्योन्यानुप्रवेशेन ब्रह्मवाय्वोर्विशेषतः ॥", |
| | "प्रयोजनं कस्य भवेदिति तं प्रातृदोऽब्रवीत् ।", |
| | "ब्रह्मा निवेशनीयः स्याद्वायुश्चास्य रतिप्रदः ॥", |
| | "अतः प्रयोजनं तुल्यमन्योन्यात्मप्रवेशनात् ॥ इति सन्धाने ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "पञ्चदशं ब्राह्मणम्" |
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| | "lines": [ |
| | "उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मा उक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
| | ] |
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| | "oldKey": "BR_C05_S16", |
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| | "lines": [ |
| | "षोडशं ब्राह्मणम्" |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
| | ] |
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| | "सप्तदशं ब्राह्मणम्" |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
| | ] |
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| | "अष्टादशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणे हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्र प्राप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-948", |
| | "oldKey": "BR_C05_S18_V01_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "उत्थापनादुक्थनामा मोक्षे प्राप्यो यतोऽखिलैः ।", |
| | "यजुश्चाथ क्षतात्त्राणात् क्षत्रं सम्यक्त्वकारणात् ॥", |
| | "सर्वेषां साम च प्रोक्तो वायुरेव जगत्पतिः ॥ इति च ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "एकोनविंशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "ऋग्यजुःसामसंस्थो यो भगवान् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "स द्वितीयपदेनोक्तो गायत्र्याः प्रथमेन तु ॥", |
| | "भूम्यन्तरिक्षस्वर्गस्थतृतीयेन समीरगः ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परो रजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपति एवं हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-955", |
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| | "lines": [ |
| | "चतुर्थपादो गायत्र्याः प्रणवः समुदीरितः ॥", |
| | "तद्वाच्यो भगवान् सूर्यमंडलस्था तु या रमा ।", |
| | "सत्वात्मिक्येव तत्संस्थो रज आख्यप्रधानतः ॥", |
| | "परः परोरजस्तस्माद्य एवं वेद तं प्रभुम् ।", |
| | "लोकानां चैव वेदानां सर्वेषां प्राणिनामपि ॥", |
| | "सदैवाधिपतिर्भूत्वा यशःश्रीमांश्च जायते ।", |
| | "गायत्र्युपासने योग्यो ब्रह्मैव हि चतुर्मुखः ॥", |
| | "तस्मादुक्तफलं सर्वं सर्वोपासा च तस्य हि ।", |
| | "अंशेनोपासनान्येषां फलमल्पं च योग्यतः ॥", |
| | "गायत्र्या न ह्ययोग्योऽपि द्विजो योग्योऽपि न क्वचित् ।", |
| | "ऋते विरिञ्चं तस्मात् तु तस्यैव ह्यखिलं फलम् ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "यः परोरजास्तपति स तुरीयपदेन प्रणवेन पद्यते । तुरीयं पदं ददृश इव दृष्ट इव । तदधीनतेजःपुंजस्य सूर्यमंडलस्य दृष्टत्वात् ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C05_S19_V04_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "सूर्यमंडलगो विष्णुः सर्वेषां दृष्टवत् स्थितः ।", |
| | "यस्मात् तदुत्थितं तेजोमंडलं दृश्यतेऽखिलैः ॥ इति त्रैविद्ये ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C05_S19_V04_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "सर्वं रजः सर्वां प्रकृतिम् ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "रंजनात् प्रकृतिः प्रोक्ता रज इत्येव वैदिकैः ।", |
| | "तस्या अप्युत्तमो विष्णुर्यतोऽतः स परोरजाः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "सैषा गायत्र्येतस्मिंस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्धैतत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्श मिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादो जीय इत्येवमेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्मात् गायत्रीनाम स यामेवामूं सावित्रीमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-961", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V05_B01", |
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| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "अभिमानिनी तु गायत्र्या मुख्या श्रीः परिकीर्तिता ।", |
| | "ब्रह्माण्यमुख्याऽतो ज्ञेया सा तु ब्रह्माणमाश्रिता ॥", |
| | "ब्रह्मा तु मुख्यगायत्री सा परोरज आश्रयेत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-962", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V05_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "तद्वा एतज्जगत्सत्ये प्रतिष्ठितम् । भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यादिना प्रस्तुतत्वात् ।", |
| | "तद्वा एतज्जगत्सर्वं चक्षुः सूर्याभिमानिनी ।", |
| | "विराण्नामविशेषाख्ये सर्वदा सम्प्रतिष्ठितम् ॥", |
| | "शेषः प्रतिष्ठितो वायौ स ह्यस्माद्बलवत्तरः ।", |
| | "स सत्य इति सम्प्रोक्तः सन्नस्मिन् याति यद्धरिः ॥", |
| | "वायुः समाश्रितो देवीं मुख्यां गायत्रिनामिकाम् ।", |
| | "सा चात्मनामधिपतिमेवं परममाश्रिता ॥", |
| | "प्राणानां रक्षणादेव गायत्री सा प्रकीर्तिता ।", |
| | "सावित्रीति च यामाह स विष्णुः परतोरजाः ॥", |
| | "एषैव सा हि गायत्री सविता हि जनार्दनः ।", |
| | "तस्माद्धि सूयते सर्वं सावित्री च तदाश्रिता ॥", |
| | "आदित्यस्तत्प्रतीकत्वात् सवितेति प्रकीर्तितः ।", |
| | "प्रतिमायां च तच्छब्दः प्रयोज्यो ह्युपचारतः ॥", |
| | "यस्मा आह स विष्णुस्तां गायत्रीं जगदीश्वरः ।", |
| | "ब्रह्मणे तस्य सा प्राणान् सर्वदा पाति पुत्रवत् ॥", |
| | "ब्रह्मा हि पुत्रस्तस्यास्तु तत्पुत्रा इतरेऽखिलाः ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-963", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V06", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तां हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वाग् अनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति तन्न तथा कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद्यदि ह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न ह वै तद्गायत्र्या एकञ्च न पदं प्रति ॥६॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-964", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V06_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "तामाहुः परमां देवीं वृणीमह ऋगात्मिकाम् ॥", |
| | "नैव सा प्रतिमा मुख्या गायत्री परमा स्मृता ।", |
| | "गायत्रीमुख्यवेत्तारो योग्या ब्रह्मपदस्य ये ॥", |
| | "तेषां प्रतिग्रहाद्दोषो न कश्चन भविष्यति ।", |
| | "न चैकपदविज्ञानफलायालं सुखानि च ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-965", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V07", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स य इमांस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् । सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-966", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V07_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "विष्णोर्यदा भगवतो लोकान् वेदांश्च चेतनान् ।", |
| | "विरिञ्चिजन्मन्यखिलान् प्रतिगृह्णन्ति कृत्स्नशः ॥", |
| | "गायत्रीपदविज्ञानफलमात्रं तदा भवेत् ।", |
| | "प्रणवप्रतिपाद्यं यत् तुरीयं भगवत्पदम् ॥", |
| | "सर्वगं वासुदेवाख्यं न तत्केनचिदाप्यते ।", |
| | "गायत्रीत्रिपदज्ञेयमनिरुद्धादिकं त्रयम् ॥", |
| | "ब्रह्मा व्याप्नोति मुक्तः सन् वासुदेवं न कश्चन ।", |
| | "लोकस्थमनिरुद्धं च प्रद्युम्नं वेदगं तथा ॥", |
| | "संकर्षणं वायुसंस्थं व्याप्य ब्रह्मा विमुक्तिगः ।", |
| | "गायत्रीज्ञानसामर्थ्यात् प्रणवज्ञानशक्तितः ॥", |
| | "वासुदेवं च सम्पश्येन्न व्याप्नोति कथञ्चन ।", |
| | "अनन्तत्वाद्वासुदेवः कथं व्याप्यो भवेत् प्रभुः ॥", |
| | "वर्णत्रयात्मप्रकृतिमतीतः सूर्यमंडले ।", |
| | "गुणत्रयात्मिकां बाह्ये यतोऽतः स परोरजाः ॥", |
| | "यतो न व्याप्यते सोऽसौ ब्रह्मणाऽपि कथञ्चन ।", |
| | "अतः प्रतिग्रहो नास्य वासुदेवस्य विद्यते ॥ इति प्रकाशिकायाम् ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-967", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V07_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "तावदेतावत् प्रतिगृह्णीयादिति तस्यैव सामस्त्येन ग्रहणार्थम् । एतावदेव मम हस्ते विद्यते इतिवत् । न ह्यन्यदेवतावत् प्रतिग्राह्यमस्ति ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-968", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V08", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स काम ऋद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठते अहमदः प्रापमिति वा ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-969", |
| | "oldKey": "BR_C05_S19_V08_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C05_S19", |
| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अष्टाक्षरत्वाद् गायत्र्याः प्रोक्ता सैकपदीति च ।", |
| | "प्रणवेन सहैतास्तु गायत्र्याश्चतुरस्तदा ॥", |
| | "अकाराद्यतिशान्तान्तः प्रणवोऽष्टाक्षरो यतः ।", |
| | "पादः प्रणवसंयुक्तो गायत्री सा पृथग्यदा ॥", |
| | "द्विपदीति तदा प्रोक्ता त्रिपदी स्वपदैस्त्रिभिः ।", |
| | "चतुष्पदी सप्रणवा ब्रह्मणोऽन्यैर्न गम्यते ॥", |
| | "अपदी च ततः प्रोक्ता गायत्र्येवमुपस्थिता ।", |
| | "कामाप्राप्तिमपूर्तिं वा शत्रवे सा करिष्यति ॥", |
| | "असावदो मैव प्रापन्नास्मै कामः समृध्यताम् ।", |
| | "उपस्थिता चेदित्थं सा यद्यदोऽहं समाप्नुयाम् ॥", |
| | "इति सा कामपूर्तिं च स्वस्य सम्यक् करिष्यति ।", |
| | "सम्यग्ब्रह्मपदावाप्तिं तद्योग्यां मुक्तिमेव च ॥", |
| | "ब्रह्मणोपासितो दद्याद् गायत्र्याः पुरुषोत्तमः ।", |
| | "अलेपं सर्वपापेभ्यो विशेषेण प्रतिग्रहात् ॥", |
| | "तद्योग्यां मुक्तिमन्येषां यथायोग्यमुपासितः ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्रीविदब्रूथा अथ कथं हस्तीभूतो वहसीति मुखं ह्यस्याः सम्राण्न विदाञ्चकारेति होवाच तस्याग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्सन्दहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥९॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "वक्तव्यो भगवान् विष्णुर्गायत्र्या मुखसंस्थितः ॥", |
| | "अग्निमंडलगो नित्यमग्निनामाऽग्रणीत्वतः ।", |
| | "गायत्र्यास्तु परिज्ञानं ज्ञाते मुख्यगते हरौ ॥", |
| | "सफलं भवेदन्यथा तु न सम्यक्फलदं भवेत् ।", |
| | "गायत्रीमुखगो विष्णुर्ज्ञेयः सर्वात्मना ततः ॥", |
| | "संहर्ता सर्वदोषाणामग्निस्थः सर्वदाहकः ।", |
| | "नित्यानन्दोऽग्निवर्णश्च रामः परशुभृत् सदा ॥ इति गायत्रीसंहितायाम् ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C05_S20", |
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| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "विंशं ब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।", |
| | "तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "oldKey": "BR_C05_S20_V01_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "सूर्यमंडलनाम्ना तु पात्रेण स्वमुखं हरिः ।", |
| | "पिधायैव जगत्सर्वं पश्यत्यमितविक्रमः ॥", |
| | "उदकं पीयते तेन तमसस्त्रायते जगत् ।", |
| | "यतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥", |
| | "पूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।", |
| | "स्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।", |
| | "समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "oldKey": "BR_C05_S20_V02_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "नान्यो यत्तादृशो ज्ञाता तस्मादेकऋषिर्हरिः ।", |
| | "यमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥", |
| | "ज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥" |
| | ] |
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| | "oldKey": "BR_C05_S20_V03_B01", |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "प्राणे स्थितो यः पुरुषः सोऽसावहमिति स्मृतः ॥", |
| | "अहेयत्वादसुत्वाच्च मेयत्वाच्चास्मिनामकः ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C05", |
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| | "lines": [ |
| | "अदोषत्वाद् अ इत्युक्तो वायुस्तन्निलयो यतः ॥", |
| | "अनिलं तत एवासावमृतं चेति कीर्त्यते ।", |
| | "तदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "क्रतुश्च ज्ञानरूपत्वात् स एव हि जनार्दनः ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।", |
| | "युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च ।", |
| | "जुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥" |
| | ] |
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| | "प्रथमब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1000", |
| | "oldKey": "BR_C06_S01_V14_B01", |
| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C06_S01", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "अहं श्रेयोविवादं तु येन कृत्वाऽखिलाः सुराः ।", |
| | "असमर्थाः स्वरक्षायां स वायुः सुरनायकः ॥", |
| | "विवदन्तोऽखिला देवा ययुर्नारायणं प्रभुम् ।", |
| | "अहं श्रेयानहं श्रेयानिति वायुपुरःसराः ॥", |
| | "उक्तं भगवता तेन येन त्यक्तेऽखिला अपि ।", |
| | "स्थातुं न शक्ताः स श्रेयानित्युक्ताः पुनरागताः ॥", |
| | "उत्क्रान्ताश्च पुनः सर्वे तद्विज्ञप्त्यै पृथक् पृथक् ।", |
| | "सुपर्णशेषरुद्रेंद्रसूर्यादिषु पृथक् पृथक् ॥", |
| | "उत्क्रान्तेषु ब्रह्मदेहाच्छरीरं न पपात ह ।", |
| | "ऋत उत्क्रान्तमेकं तु तदन्ये निविशन्ति च ॥", |
| | "प्राण उच्चिक्रमिषति स्थातुं नाशक्नुवन् परे ।", |
| | "प्राणं विना न च ब्रह्मा तं विना प्राण एव च ॥", |
| | "अन्योन्यापाश्रयाच्छक्तौ स्थातुमन्ये कुतस्ततः ।", |
| | "तस्मात् प्राणो वरो देवेष्विति सर्वेऽपि मेनिरे ॥ इति पवमाने ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1001", |
| | "oldKey": "BR_C06_S02", |
| | "type": "section", |
| | "parent": null, |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "द्वितीयब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1002", |
| | "oldKey": "BR_C06_S02_V01", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C06_S02", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1003", |
| | "oldKey": "BR_C06_S02_V02", |
| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C06_S02", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच", |
| | "वेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच ।", |
| | "वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोव ।", |
| | "अथ वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि नर्षेर्वचः श्रुतं", |
| | "द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानां", |
| | "ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति", |
| | "नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1004", |
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| | "lines": [ |
| | "अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥" |
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| | "lines": [ |
| | "स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास ।", |
| | "तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-1010", |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1014", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-1015", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति ।", |
| | "मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति", |
| | "ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति ।", |
| | "मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।", |
| | "तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोः वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ ततो जायन्ते ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते ।", |
| | "अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतंगा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १५ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C06", |
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| | "lines": [ |
| | "द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् ।", |
| | "नारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥", |
| | "प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा ।", |
| | "पञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥", |
| | "नास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C06", |
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| | "lines": [ |
| | "यथोपनिषदं जातो योग्यः स्वर्गापवर्गयोः ।", |
| | "भवेद्यदि मनः पित्रोर्विष्णोर्नान्यत्र गच्छति ॥", |
| | "न कुर्याद्यदि कर्मैतन्मनः पित्रोस्तु विष्णुगम् ।", |
| | "दृष्टसामर्थ्यहीनश्च मोक्षयोग्यः स्थिरं यदि ॥", |
| | "दृष्टसामर्थ्यवांश्च स्यादाज्ञाद्यैः कारणैः क्वचित् ।", |
| | "विशेषकारणाभावे यथोक्तं नान्यथा भवेत् ॥ इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "नारायणो द्युशब्दोक्तः सर्वदा द्युतिहेतुतः ।", |
| | "वासुदेवस्तु पर्जन्यः परं स जनयेद्यतः ॥", |
| | "संकर्षणस्तु पृथिवी प्रथितत्वात् सदैव हि ।", |
| | "प्रद्युम्नः पुरुषेत्युक्तः पूरयेत् स जगद्यतः ॥", |
| | "स्त्रीशब्दोक्तोऽनिरुद्धः स्यात् सहितस्त्रिषु यत्सदा ।", |
| | "अनिरुद्धो हि वेदेषु सर्वदा त्रिषु संस्थितः ॥", |
| | "द्युवादिषु प्रसिद्धेषु तत्सम्बन्धाद् द्युवादिकः ।", |
| | "शब्दो भवेत् तथाग्न्यादिरदनात् परमो भवेत् ॥", |
| | "अंगत्वेनार्यते यस्मादंगारस्तेन कीर्तितः ।", |
| | "अर्च्यत्वादर्चिरुद्दिष्टो विष्वक्त्वाद् विष्फुलिंगकः ॥", |
| | "समेधनाच्च समिधस्तत्र तत्र स्थितो हरिः ।", |
| | "तत्तच्छब्दैः सदा वाच्य इतरे तु तदन्वयात् ॥", |
| | "आदित्यो रश्मिरित्याद्याः शब्दाश्चैवमवस्थिताः ।", |
| | "एकैकस्मिन् पञ्चभेदा अर्चिरादिविभागतः ॥", |
| | "नारायणादिभेदेन तथैव प्रतिपादिताः ॥ इति प्रवृत्ते ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1020", |
| | "oldKey": "BR_C06_S02_V15_B01", |
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| | "parent": "BR_C06_S02", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "धूत्काराद् धूम उद्दिष्टः शत्रूणां पुरुषोत्तमः ।", |
| | "अर्चिरर्च्यतमत्वाच्च स्वांगोऽङ्गार उदीर्यते ॥", |
| | "अंगित्वेनांगरूपेण यत एको व्यवस्थितः ॥ इति त्रैविद्ये ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "type": "bhashya", |
| | "parent": "BR_C06_S02", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": null, |
| | "lines": [ |
| | "नीचादप्युत्तमा ज्ञानं शृणुयुर्लीलया क्वचित् ।", |
| | "श्रोतृवक्तृविभेदोऽयं नाधिक्यज्ञापकस्ततः ॥", |
| | "यस्याधिक्यं तु वेदोक्तं पञ्चरात्रेऽथवा भवेत् ।", |
| | "इतिहासपुराणे वा सोऽधिको नेतरः क्वचित् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
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| | "lines": [ |
| | "आदानादादित्यः ।", |
| | "रमणाच्छासनाच्च रश्मयः ।", |
| | "अहीनत्वादहः ।", |
| | "चन्दनाच्चंद्रः । अस्य क्षत्रमन्यन्नास्ति इति नक्षत्रम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् ।", |
| | "ज्ञानादायुष्ट्वाच्च वायुः ।", |
| | "अन्यैरभरणीयत्वाद् अभ्रम् ।", |
| | "विद्योतनाद् विद्युत् । अशनादशनिः ।", |
| | "निह्लादनाद् ह्रादुनिः । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । सम्यग्वत्सान् रमयतीति संवत्सरः । आदेशनाद्दिशः ।", |
| | "अवान्तरमादिशतीत्यवान्तरदिशः । रतिकरत्वात् रात्रिः ।", |
| | "वचनात् वाक् । प्रणयनात् प्राणः । जहाति गमयतीति जिह्वा । चष्ट इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । उपस्थितत्वादुपस्थः ।", |
| | "यापयति नयति चेति योनिः । अभिनन्दयतीत्यभिनन्दः । उपमंत्रणमन्तःकरणं च स एव करोति ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "तदधीनं यतः सर्वं सर्वशब्दैस्ततो हरिः ।", |
| | "मुख्याभिधेयस्त्वन्यानि तत्संगादुपचारतः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "तदधीनत्वादर्थवत् इति भगवद्वचनम् । समाकर्षात् इति च ।" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "oldKey": "BR_C06_S03", |
| | "type": "section", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "brahmanam", |
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| | "तृतीयब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1026", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति", |
| | "यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामांस्तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि", |
| | "ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा", |
| | "या तिरश्चीनि पद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजेंसराधनीं महं स्वाहा ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1027", |
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| | "parent": "BR_C06_S03", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।", |
| | "प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।", |
| | "वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।", |
| | "चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।", |
| | "श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।", |
| | "मनसे स्वाहा प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रव मवनयति ।", |
| | "रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1029", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
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| | "तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| | "एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैंग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "एतमु हैव मधुकः पैंग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकाय आयस्थूणायन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-1037", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरन् शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-1039", |
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| | "चतुर्थब्राह्मणम्" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1045", |
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| | "lines": [ |
| | "अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "lines": [ |
| | "श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥", |
| | "स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् ।", |
| | "अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे ॥", |
| | "स त्वमंगकषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "lines": [ |
| | "अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥" |
| | ] |
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| | "अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "chapter": "BR_C06", |
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| | "lines": [ |
| | "स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥" |
| | ] |
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| | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥" |
| | ] |
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| | "अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥" |
| | ] |
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| | "अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥" |
| | ] |
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| | "अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥" |
| | ] |
| | }, |
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| | "id": "Bruhadaranyaka-1059", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1060", |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि ।", |
| | "विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।", |
| | "आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥", |
| | "गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।", |
| | "गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।", |
| | "तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ॥", |
| | "यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिंद्रेण गर्भिणी ।", |
| | "वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥ २२ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
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| | "सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।", |
| | "यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।", |
| | "अग्निष्टस्त्विष्टकृद्विद्वान् स्विष्टं सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥" |
| | ] |
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| | "अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥" |
| | ] |
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| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥" |
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| | "अथास्य मातरमभिमंत्रयत इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।", |
| | "सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरदिति", |
| | "तं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रायच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1068", |
| | "oldKey": "BR_C06_S05", |
| | "type": "section", |
| | "parent": null, |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "brahmanam", |
| | "lines": [ |
| | "पञ्चमब्राह्मणम्" |
| | ] |
| | }, |
| | { |
| | "id": "Bruhadaranyaka-1069", |
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| | "type": "verse", |
| | "parent": "BR_C06_S05", |
| | "chapter": "BR_C06", |
| | "verseType": "mantra", |
| | "lines": [ |
| | "अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्", |
| | "कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्रात्", |
| | "गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात्", |
| | "भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्", |
| | "पाराशरीपुत्र औपस्वस्तिपुत्रात्", |
| | "औपस्वस्तिपुत्रः पाराशरीपुत्रात्", |
| | "पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्", |
| | "कात्यायनीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥" |
| | ] |
| | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-699", | | "id": "Bruhadaranyaka-1070", |
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| "type": "verse", | | "type": "verse", |
| "parent": "BR_C06_S04", | | "parent": "BR_C06_S05", |
| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि ।\nविष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।\nआ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥\nगर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके ।\nगर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "आत्रेयीपुत्रात् आत्रेयीपुत्रो", |
| | "गौतमीपुत्रात् गौतमीपुत्रः", |
| | "भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः", |
| | "पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः", |
| | "वात्सीपुत्रात् वात्सीपुत्रः", |
| | "पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो बर्कारुणीपुत्रात्", |
| | "बार्कारुणीपुत्रो आर्तभागीपुत्रात्", |
| | "आर्तभागीपुत्रः शौंगीपुत्रात् शौंगीपुत्रः", |
| | "सांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र", |
| | "आलम्बायनीपुत्राद् आलम्बायनीपुत्रः", |
| | "आलम्बीपुत्राद् आलम्बीपुत्रो", |
| | "जायन्तीपुत्रात् जायन्तीपुत्रो", |
| | "मांडूकायनीपुत्रात् माण्डूकायनीपुत्रः", |
| | "माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शांडिलीपुत्राच्छांडिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्", |
| | "राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद् भालुकीपुत्रः", |
| | "क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ", |
| | "वेदभृतीपुत्रात् वेदभृतीपुत्रः", |
| | "कार्शिकेयीपुत्रात् कार्शिकेयीपुत्रः", |
| | "प्राचीनयोगीपुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः", |
| | "सांजीवीपुत्रात् सांजीवीपुत्रः", |
| | "प्राश्नीपुत्रात् आसुरिवासिनः प्राश्नीपुत्रा", |
| | "आसुरायणाद् असुरायणः", |
| | "आसुरेरासुरिः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-700", | | "id": "Bruhadaranyaka-1071", |
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| "type": "verse", | | "type": "verse", |
| "parent": "BR_C06_S04", | | "parent": "BR_C06_S05", |
| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।\nतं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ॥\nयथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिंद्रेण गर्भिणी ।\nवायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "याज्ञवल्क्याद् याज्ञवल्क्यः", |
| | "उद्दालकाद् उद्दालकः", |
| | "अरुणात् अरुणः", |
| | "उपवेशेः उपवेशिः", |
| | "कुश्रेः कुश्रिः", |
| | "वाजस्रवसो वाजश्रवा", |
| | "जिह्वावतो बाध्योगात् जिह्वावान् बाध्योगो", |
| | "असितात् वार्षगणाद् असितो वार्षगणः", |
| | "हरितात् कश्यापात् हरितः कश्यपः", |
| | "शिल्पात् कश्यपात् शिल्पः कश्यपः", |
| | "कश्यपात् नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविः", |
| | "वाचो वागम्भ्रिण्या अम्भ्रिण्यादादित्यादादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-701", | | "id": "Bruhadaranyaka-1072", |
| "oldKey": "BR_C06_S04_V23", | | "oldKey": "BR_C06_S05_V04", |
| "type": "verse", | | "type": "verse", |
| "parent": "BR_C06_S04", | | "parent": "BR_C06_S05", |
| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "समानमा सांजीवीपुत्रात्", |
| | "सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेः", |
| | "माण्डूकायनिः मांडव्यात्", |
| | "मांडव्यः कौत्सात्", |
| | "कौत्सो माहिक्लेः", |
| | "माहिक्लिः वामकक्षायणात्", |
| | "वामकक्षायणः शाण्डिल्यात्", |
| | "शाण्डिल्यो वात्स्यात्", |
| | "वात्स्यः कुश्रेः", |
| | "कुश्रिर्यज्ञवर्चसो", |
| | "राजस्तम्बायनात् यज्ञवर्चा राजस्तम्बायनः", |
| | "तुरात् कावषेयात् तुरः कावषेयः", |
| | "प्रजापतेः प्रजापतिः ब्रह्मणो", |
| | "ब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-702", | | "id": "Bruhadaranyaka-1073", |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।\nयत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।\nअग्निष्टस्त्विष्टकृद्विद्वान् स्विष्टं सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "पञ्चाग्निविद्यया चैव तथैव प्राणविद्यया ।", |
| | "प्रजातिकर्मणा चैव तथा ज्ञानप्रदानतः ॥", |
| | "आचार्यवंशविज्ञानाद्यः पूज्यः पुरुषोत्तमः ।", |
| | "सर्वान्तर्यामिको नित्यो नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति सद्भावे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-703", | | "id": "Bruhadaranyaka-1074", |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "BR_C06",
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| "verseType": "mantra",
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| "text": "अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥"
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| "text": "अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥"
| |
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| "text": "अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥"
| |
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| "text": "अथास्य मातरमभिमंत्रयत इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।\nसा त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरदिति\nतं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रायच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥"
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| "text": "पञ्चमब्राह्मणम्"
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्\nकात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्रात्\nगौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्रात्\nभारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्\nपाराशरीपुत्र औपस्वस्तिपुत्रात्\nऔपस्वस्तिपुत्रः पाराशरीपुत्रात्\nपाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्\nकात्यायनीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "नित्यानन्दमनौपमं परमजं सर्वत्रगं सुस्थिरं सर्वज्ञं प्रतिबोधमात्रममलं पूर्णं गुणैरच्युतैः ।", |
| | "विश्वोत्पत्तिलयस्थितिप्रमितिसन्मोक्षे परं कारणं प्रेष्ठं मे सततं प्रियात् प्रियतमं नित्यं सदोपास्महे ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "आत्रेयीपुत्रात् आत्रेयीपुत्रो\nगौतमीपुत्रात् गौतमीपुत्रः\nभारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः\nपाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रः\nवात्सीपुत्रात् वात्सीपुत्रः\nपाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो बर्कारुणीपुत्रात्\nबार्कारुणीपुत्रो आर्तभागीपुत्रात्\nआर्तभागीपुत्रः शौंगीपुत्रात् शौंगीपुत्रः\nसांकृतीपुत्रात् सांकृतीपुत्र\nआलम्बायनीपुत्राद् आलम्बायनीपुत्रः\nआलम्बीपुत्राद् आलम्बीपुत्रो\nजायन्तीपुत्रात् जायन्तीपुत्रो\nमांडूकायनीपुत्रात् माण्डूकायनीपुत्रः\nमाण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शांडिलीपुत्राच्छांडिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्\nराथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद् भालुकीपुत्रः\nक्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ\nवेदभृतीपुत्रात् वेदभृतीपुत्रः\nकार्शिकेयीपुत्रात् कार्शिकेयीपुत्रः\nप्राचीनयोगीपुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः\nसांजीवीपुत्रात् सांजीवीपुत्रः\nप्राश्नीपुत्रात् आसुरिवासिनः प्राश्नीपुत्रा\nआसुरायणाद् असुरायणः\nआसुरेरासुरिः ॥ २ ॥"
| | "lines": [ |
| | "यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं", |
| | "बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।", |
| | "वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्मध्वो", |
| | "यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-710", | | "id": "Bruhadaranyaka-1076", |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "याज्ञवल्क्याद् याज्ञवल्क्यः\nउद्दालकाद् उद्दालकः\nअरुणात् अरुणः\nउपवेशेः उपवेशिः\nकुश्रेः कुश्रिः\nवाजस्रवसो वाजश्रवा\nजिह्वावतो बाध्योगात् जिह्वावान् बाध्योगो\nअसितात् वार्षगणाद् असितो वार्षगणः\nहरितात् कश्यापात् हरितः कश्यपः\nशिल्पात् कश्यपात् शिल्पः कश्यपः\nकश्यपात् नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविः\nवाचो वागम्भ्रिण्या अम्भ्रिण्यादादित्यादादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३ ॥"
| | "lines": [ |
| | "हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।", |
| | "रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥", |
| | "भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः ।", |
| | "ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥", |
| | "प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृताः ।", |
| | "मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ॥", |
| | "मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ।", |
| | "इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ॥ यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-711", | | "id": "Bruhadaranyaka-1077", |
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| "type": "verse", | | "type": "bhashya", |
| "parent": "BR_C06_S05", | | "parent": "BR_C06_S05", |
| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": null, |
| "text": "समानमा सांजीवीपुत्रात्\nसांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेः\nमाण्डूकायनिः मांडव्यात्\nमांडव्यः कौत्सात्\nकौत्सो माहिक्लेः\nमाहिक्लिः वामकक्षायणात्\nवामकक्षायणः शाण्डिल्यात्\nशाण्डिल्यो वात्स्यात्\nवात्स्यः कुश्रेः\nकुश्रिर्यज्ञवर्चसो\nराजस्तम्बायनात् यज्ञवर्चा राजस्तम्बायनः\nतुरात् कावषेयात् तुरः कावषेयः\nप्रजापतेः प्रजापतिः ब्रह्मणो\nब्रह्म स्वयम्भुब्रह्मणे नमः ॥ ४ ॥"
| | "lines": [ |
| | "साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा ।", |
| | "हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥", |
| | "पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः ।", |
| | "पूर्णप्रज्ञस्तथाऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः ॥", |
| | "दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते ।", |
| | "प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः ॥", |
| | "आसमन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् ।", |
| | "असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् ॥", |
| | "वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति ।", |
| | "येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणानज्ञासिषुः परान् ॥", |
| | "ईशानाशः सूरयश्च निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः ।", |
| | "त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः ॥", |
| | "येषां हि परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः ।", |
| | "स्वयं तु ब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः॥ इति च ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Bruhadaranyaka-712", | | "id": "Bruhadaranyaka-1078", |
| "oldKey": "BR_C06_S05_V04_B01", | | "oldKey": "BR_C06_S05_V04_B01", |
| "type": "bhashya", | | "type": "bhashya", |
| Line 41,496: |
Line 14,465: |
| "chapter": "BR_C06", | | "chapter": "BR_C06", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "पञ्चाग्निविद्यया चैव तथैव प्राणविद्यया ।\nप्रजातिकर्मणा चैव तथा ज्ञानप्रदानतः ॥\nआचार्यवंशविज्ञानाद्यः पूज्यः पुरुषोत्तमः ।\nसर्वान्तर्यामिको नित्यो नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति सद्भावे ।" | | "lines": [ |
| | "पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे ।", |
| | "अमन्दानन्दसांद्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥", |
| | "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्यायः ॥" |
| | ] |
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| ] | | ] |
| } | | } |