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| "text": "इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ (१०-८)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I29"
| |
| },
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "नाशयामि'' (१०-११)",
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| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्'' । (१२-७)",
| |
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (५-२९)",
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| }
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
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| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ (७-२)",
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| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
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| |
| "id": "BGT_C01_I33"
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| "children": [
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| {
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| "text": "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ॥",
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| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I34"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । (७-६,७)",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I35"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I36"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'राजविद्या राजगुह्यम्'' ... । (९-१,२)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I37"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ (९-४)",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "id": "BGT_C01_I38"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "'भूतभृन्न च भूतस्थः'' ... । (९-५)",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BGT_C01_I39"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "'न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यः'' (११-४३)",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C01_I40"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "text": "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । (१४-१)",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I41"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I42"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । (१४-३)",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "introduction",
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| "id": "BGT_C01_I43"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "introduction",
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| "id": "BGT_C01_I44"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । (१४-२७)",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते ॥",
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "introduction",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥",
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अतोस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥",
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।",
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| {
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| "text": "एतद्बुध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (१५, १६-२०)",
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "introduction",
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| |
| "id": "BGT_C01_I50"
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| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानवाप्तमवाप्तव्यम् ... ॥ (३-२२)",
| |
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "इत्यादिना सर्वस्माद् भगवतो भेदः, सर्वस्य तदधीनत्वं, तस्यानन्याधीनत्वं, सर्वोत्तमत्वं, सर्वगुणपूर्णत्वं, सर्वशास्त्राणां तत्परत्वं, तथा तज्ज्ञानादेव मोक्ष इत्यादि ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "'अधा ते विष्णो विदुषा• चिदर्ध्यः स्तोमो• यज्ञश्च राध्यो• हविष्म•ता'' । (ऋ.मं १, सू. १५६-१)",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| "text": "पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्माविचारयन् ।",
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| {
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| "text": "यदात्मनः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| "text": "भक्त्या प्रसन्नः परमो दद्याज्ज्ञानमनाकुलम् ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "भक्तिं च भूयसीं ताभ्यां प्रसन्नो दर्शनं व्रजेत् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "ततोपि भूयसीं भक्तिं दद्यात्ताभ्यां विमोचयेत्",
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| |
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| {
| |
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| "text": "मुक्तोपि तद्वशो नित्यं भूयो भक्तिसमन्वितः ।",
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| "text": "सान्द्रानन्दस्वरूपैव भक्तिर्नैवात्र साधनम्",
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| |
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| {
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| "text": "ब्रह्मरुद्ररमादिभ्योप्युत्तमत्वं स्वतन्त्रताम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वस्य तदधीनत्वं सर्वसद्गुणपूर्णताम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "निर्दोषत्वं च विज्ञाय विष्णोस्तत्राखिलाधिकः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तः सर्वोपायोत्तमोत्तमः ।",
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| |
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| {
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| "text": "तेनैव मोक्षो नान्येन दृष्ट्यादिस्तस्य साधनम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "अधिकार्युत्तमा देवाः प्राणस्तत्रोत्तमोत्तमः ।",
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| "text": "नैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः ।",
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| "text": "तिरोहितं तथाप्येते शृण्वन्ति क्रीडयाथवा ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "यथा व्यासानुशिष्टानां देवानां क्षत्रजन्मनाम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "id": "BGT_C01_I58"
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| "children": [
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| "text": "पार्थानामतिरोधानं ज्ञानं सुस्थिरतां गतम् ।",
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| "text": "अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।",
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| "text": "विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विना विरावत् ॥ (ऋ. ७-४०-५)",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BGT_C01_I59"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत्तत एते व्यजायन्त",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I60"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा इति'' ।श्व",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I61"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः'' ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'यं यं कामयते विष्णुस्तं ब्रह्माणं च शङ्करम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्रं सूर्यं यमं स्कन्दं कुर्यात् कर्तास्य न क्वचित्'' ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I62"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति'' । (ऋ. ६-९९-१)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I63"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अनन्तगुणमाहात्म्यो निर्दोषो भगवान् हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न समो वाधिको वापि विद्यते तस्य कश्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नासीन्न च भविष्यो वा परतः स्वत एव च'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'यस्त्वात्मरतिरेव स्याद्'' इत्यादि तु मुक्तविषयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्त्वेवात्मरतो मुक्तः कार्यं तस्यैव नास्ति हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् कुर्वीत कर्माणीत्याह कृष्णोर्जुनं स्मयन् ॥ इति च स्कान्दे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् इत्यादि तु बाह्यकर्मसङ्कोचापेक्षया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (३-५)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I64"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः । (३-८)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I65"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्'' । (१८-६)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I66"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "'ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत ।''",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_I67"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न सर्वकर्मणां त्यागः कस्यचिद् भवति क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यागिनो यतयोपि स्युः सङ्कोचाद् बाह्यकर्मणाम् । इत्यादि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः'' इत्यादि चोत्पन्नज्ञानतिरो-भावनिवृत्त्यर्थम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_V02",
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| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "सञ्जय उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
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| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C01_V05",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
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| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
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| "id": "BGT_C01_V07",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते॥७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| "text": "भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।",
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| {
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "text": "अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।",
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| "text": "पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१० ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C01_V14",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| |
| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।",
| |
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| |
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| "text": "माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४ ॥",
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| |
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| "text": "नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।",
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| "text": "पृवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥२० ॥",
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| "text": "कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥२२ ॥",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः ।",
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| "text": "सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥२४ ॥",
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| "text": "न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥",
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| "text": "मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| |
| },
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| |
| "children": [
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| "tag": "line",
| |
| "text": "एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोपि मधुसूदन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥",
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥३६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "type": "shloka",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।",
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| "text": "कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C01_V39",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत॥४० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C01_V41",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१ ॥",
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| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।",
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| "text": "उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
| },
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| "children": [
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| "text": "उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।",
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| "text": "नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "॥ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोध्यायः ॥",
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| |
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| "children": [
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| "text": "विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C02_V03",
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| "children": [
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| "text": "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।",
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| {
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| "text": "क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V04",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "अजुर्न उवाच",
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| "children": [
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| "text": "कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।",
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| "text": "इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "id": "BGT_C02_V05",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
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| "text": "गुरूनहत्वा हि महानुभावान्",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।",
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| "text": "हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव",
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| |
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| "text": "भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C02_V06",
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| "text": "यानेव हत्वा न जिजीविषाम–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्तेवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृच्छामि त्वा धर्मसम्मूढचेताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "सञ्जय उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ज्ञानिनो अर्जुनस्येषन्मोहप्रकारनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V11"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V11_B01"
| |
| },
| |
| "text": "प्रकर्षेण जानन्तीति प्रज्ञाः, तदवादः प्रज्ञावादः । प्राज्ञमतविरुद्धवादं वदसि । कथम् ? गतासून् ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V12"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V12_B01"
| |
| },
| |
| "text": "बन्धुस्नेहादि्ध त्वया स्वधर्मनिवृत्तिः क्रियते । तत्र देहनाशभयात् किं वा चेतननाशभयात्? देहस्य सर्वथा विनाशित्वान्न तत्र भये प्रयोजनम् । न च चेतननाशभयात् । तस्याविनाशित्वादेव । न तावत्परमचेतनस्य मम नाशोस्ति । एवमेव तवान्येषां च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्'' ॥ इत्यादिश्रुतेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Skanda_id"
| |
| },
| |
| "text": "'स्वदेहयोगविगमौ नाम जन्ममृती पुरा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इष्येते ह्येव जीवस्य मुक्तेर्न तु हरेः क्वचित्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्कान्दे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ईश्वरस्यापि युद्धगतत्वान्मोहात् तस्याप्युभयविधानित्यत्वशङ्काप्राप्तौ तदपि निवार्यते न त्वेवाहमिति । यद्यप्येषा शङ्कार्जुनस्य नास्ति । तथापि प्राप्तलोकोपकारार्थं भगवता निवार्यते । एकान्ते कथयन्नपि व्यासरूपेण तदेव लोके प्रकाशयिष्यति हि ॥१२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V13_B01"
| |
| },
| |
| "text": "मम स्वकीयदेहान्तरप्राप्तिरपि नास्तीति दर्शयितुं देहिन इति विशेषणम् । भवदादीनां सा भविष्यतीत्यपि शोको न कर्तव्यः । देहस्येदानी- मप्यन्यथात्वदर्शनात् ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आगमापायिनोनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V14"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V14_B01"
| |
| },
| |
| "text": "तददर्शनादिनिमित्तं सोढव्यमित्याह - मात्रास्पर्शा इति । विषयसम्बन्धाः ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समदुःखसुखं धीरं सोमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V15"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V15_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "फलमाह । यं हीति । न केवलमव्यथामात्रेणामृतत्वं किन्तु पुरुषम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'पुरु ब्रह्म गुणाधिक्यात् तज्ज्ञानात्पुरुषः स्मृतः'' । इति प्रवृत्ते । पुरुसरणात् पुरुष इत्यर्थः ॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V16",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उभयोरपि दृष्टोन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V16"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V16_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "न च युद्धात्परलोकदुःखमिति शोकः । असत्कर्मणः सकाशात् भावो नास्ति सत्कर्मणः सकाशात् अभावो नास्तीति नियतत्वात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सद्भाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते सुखवाचकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते दुःखवाचकाः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Vakshaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति वक्ष्यमाणत्वात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "(गीता. १७-२६)"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'असन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत्'' इत्यादेश्च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्तो निर्णयः । न चाविद्यामानविद्यमानयोरुत्पत्तिनाशनिषेधकोयं श्लोकः । प्रत्यक्षविरोधात् । सन्निति व्यवह्रियमाणमेव पदार्थस्वरूपमुत्पत्तेः प्राङ्ग्नाशोत्तरं च नास्तीति सर्वलोको व्यवहरति । न च विपर्यये किञ्चिन्मानम् । इदं तु वाक्यमन्यथासिद्धम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'आद्यन्तयोः सर्वकार्यमसदेवेति निश्चितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यद्यसन्न विशेषोत्र जायते कोत्र जायते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "व्यक्तावपि समं ह्येतदनवस्थान्यथा भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं नाशेपि बोद्धव्यमतोसन्नेव जायते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथाप्यभेदानुभवात् कार्यकारणयोः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भेदस्य चाविशेषेण देहोगात् क्षितितामिति ॥ व्यवहारो भवेद्यस्माद्बल्येवानुभवः सदा ॥''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न च सदसद्विलक्षणं किञ्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न चासतः ख्यात्ययोगात् सतो बाधायोगादुभयविलक्षणं भ्रान्तिविषयम् । असतः ख्यात्ययोगादिति वदतोसतः ख्यातिरभून्न वा ? यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् तथापि । न चासतोसत्वेन भ्रान्तौ सत्वेन च ख्यातिर्नास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । असद्व्यवहारलोपप्रसङ्गाच्च । यदविद्यमानं रूपं तस्य सत्त्वेन प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वाच्च । अनिर्वचनीयत्वपक्षेपि सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्त्वप्रतीतिं विना न हि भ्रान्तित्वम् । भ्रान्तिसत्त्वाङ्गीकारेप्यभ्रान्तं सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्वप्रतीतौ हि प्रवर्तते । तस्मादुभयविलक्षणं न किञ्चित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'विश्वं सत्यम्'' । 'यच्चिकेत सत्यमित्'' । 'कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः'' इत्यादिश्रुतेश्च ॥१६ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V17"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V17_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavaraha_id"
| |
| },
| |
| "text": "यद्यपि नित्यत्वं जीवस्याप्यस्ति । तथापि सर्वप्रकारेणाविनाशित्वं विष्णोरेवेति तुशब्दः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अनित्यत्वं देहहानिर्दुःखप्राप्तिरपूर्णता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नाशश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तदभावो हरेः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदन्येषां तु सर्वेषां नाशाः केचिद् भवन्ति हि'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महावाराहे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paramashruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'देशतः कालतश्चैव गुणतश्च त्रिधा ततिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सा समस्ता हरेरेव न ह्यन्ये पूर्णसद्गुणाः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति परमश्रुतिः ॥१७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V18"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V18_B01"
| |
| },
| |
| "text": "शरीरिणां तु देहहान्यादिनाशो विद्यत एव । 'येन सर्वमिदं ततम्'' इति तस्यैव लक्षणकथनात् न जीवानां देशतो गुणतश्च पूर्णता । अनिच्छया देहहान्यादेरेव दुःखावाप्तिः सिद्धा । तस्मादनाशिनोप्रमेयस्य विष्णोः पूजार्थं युद्ध्यस्व । तत्प्रसादाधीनत्वाद् दुःखनिवृत्तेः सुखस्य च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषामहं समुद्धर्ता'' (गीता १२-६) इत्यादेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवपक्षे 'नित्यस्योक्ताः'' इत्युक्तत्वात् 'अनाशिनः'' इति पुनरुक्तिः । 'अविनाशि, येन सर्वमिदं ततम्'' इत्युक्तस्यैव 'अनाशिनोप्रमेयस्य'' इति प्रत्यभिज्ञानाच्च । 'इमे देहाः'' इति विशेषणान्नित्यश्चिदानन्दात्मकः स्वरूपभूतो देहो मुक्तानामपि विद्यत इति ज्ञायते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि - प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥ प्रवालवैडूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥ विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति हि भागवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चिदानन्दशरीरेण सर्वे मुक्ता यथा हरिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भुञ्जते कामतो भोगांस्तदन्तर्बहिरेव च ॥ इति परमश्रुतिः । न च जीवेश्वरैक्यं मुक्तावपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च'' । (गीता, १४-२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतत्सामगायन्नास्ते'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "किल्बिषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते'' 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्देहं संश्रिता अपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तारतम्येन तिष्ठन्ति गुणैरानन्दपूर्वकैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूपा मनुष्यगन्धर्वा देवाः पितर एव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आजानेयाः कर्मदेवास्तत्त्व(रूपाः)देवाः पुरन्दरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शिवो विरिञ्चिरित्येते क्रमाच्छतगुणोत्तराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तावपि तदन्ये ये भूपाच्छतगुणावराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न समो ब्रह्मणः कश्चिन्मुक्तावपि कथञ्चन ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततः सहस्रगुणिता श्रीस्ततः परमो हरिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्तगुणितत्वेन तत्समः परमोपि न'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्द्रो परिस्रव ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादि मोक्षानन्तरमपि भेदवचनेभ्यः । न च 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'तत् त्वमसि'' 'अहं ब्रह्मास्मि'' इत्यादिवाक्यविरोधः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सञ्ज्ञानाशो यदि भवेत्किमुक्त्या नः प्रयोजनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मोहं मां प्रापयामास भवानत्रेति चोदितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "याज्ञवल्क्यः प्रियामाह नाहं मोहं ब्रवीमि ते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूतजज्ञानलोपः स्यान्निजं ज्ञानं न लुप्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न च ज्ञेयविनाशः स्यादात्मनाशः कुतः पुनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वभावतः पराद्विष्णोर्विश्वं भिन्नमपि स्फुटम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्वातन्त्र्याद्भिन्नमिव स्थितमेव यदेदृशम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदा घ्राणादिभोगः स्यात्स्वरूपज्ञानशक्तितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदात्मानुभवोपि स्यादीश्वरज्ञानमेव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदान्यं न विजानाति नात्मानं नेश्वरं तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुषार्थता कुतस्तु स्यात्तदभावाय को यतेत् तस्मात्स्वभावज्ञानेन भिन्ना विष्णुसमीपगाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भुञ्जते सर्वभोगांश्च मुक्तिरेषा न चान्यथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यन्न पश्येत्परो विष्णुर्द्वितीयत्वेन स स्वतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्द्वितीयं न भवति प्रादुर्भावात्मकं वपुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रधानपुरुषादन्यद्यत्तस्माद्भिन्नमीश्वरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विभक्तत्वेन नियतं यस्मात्पश्यति सर्वदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पश्यन्नेव यतो विष्णुस्तदभेदं न पश्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चेतनाचेतनस्यास्य नाभेदोस्ति ततोमुना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न हि ज्ञानविलोपोस्ति सर्वज्ञस्य परेशितुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्माणि जीवाः सर्वेपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः नैव मुक्ता न प्रकृतिः क्वापि हि ब्रह्मवैभवम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्नुवन्त्यपि तज्ज्ञानान्निजं ब्रह्मत्वमाप्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\u003Eयद्यस्य परमेशि(श)त्वं तदा स्याद्दुःखिता कुतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दुःखी चेत्कुत ईशत्वमनीशो ह्येव दुःखभाक् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कुतः सर्वविदोज्ञत्वं क्व भ्रमोप्यज्ञतां विना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मान्नैवेश्वरो जीवस्तत्प्रसादात्तु मुच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ओयत्वादहंनामा भगवान्हरिरव्ययः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादस्म्यसावसनान्मितेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "असनादसिनामासौ तेजस्त्वात्त्वमितीरितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वैः क्रियापदैश्चैव सर्वैर्द्रव्यपदैरपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वैर्गुणपदैश्चैव वाच्य एको हरिः स्वयम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "युष्मत्पदैः प्रातियोग्यात्तद्युतैश्च क्रियापदैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्मत्पदैरान्तरत्वात्क्रियार्थैश्च तदन्वयैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परोक्षत्वात्तत्पदैश्च मुख्यवाच्यः स एव तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वान्वेदानधीत्यैव प्रज्ञाधिक्येन हेतुना श्वेतकेतुरहङ्कारात्प्रायशो नास्मि मानुषः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवो वा केशवांशो वा नैषा प्रज्ञान्यथा भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं महत्त्वबुद्ध्यैव दर्पपूर्णोभ्यगात्पितुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सकाशमकृताचारं तं दृष्ट्वा स्तब्धमज्ञवत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पितोवाच कुतः पुत्र स्तब्धता त्वामुपागता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रायो नारायणं देवं नैव त्वं पृष्टवानसि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यस्मिन् ज्ञाते त्वविज्ञातज्ञानादीनां फलं भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राधान्यात्सदृशत्वाच्च तदधीनमिति स्फुटम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्सृष्टं चेति विज्ञातं फलवदि्ध भवेज्जगत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वातन्त्र्येणास्य विज्ञानं मिथ्याज्ञानमनर्थकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथाचैवैकमृत्पिण्डज्ञानादेः सदृशत्वतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मृण्मयं तदकार्यं च ज्ञातं मृदिति वै भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथैव मृत्तिकेत्यादिनित्यनामप्रवेदनात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाचारब्धमनित्यं तु ज्ञातं तन्मूलमित्यपि ।"
| |
| },
| |
| {
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| |
| "tail": "एवं कारणभूतोसौ भगवान्पुरुषोत्तमः ।"
| |
| },
| |
| {
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| |
| "tail": "प्रधानश्च स्वतन्त्रश्च तन्मूलमखिलं जगत् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदाधारं विमुक्तौ च तदधीनं सदा स्थितम् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "स सूक्ष्मो व्यापकः पूर्णस्तदीयमखिलं जगत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात्तदीयस्त्वमसि नैव सोसि कथञ्चन ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा अपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा नद्यः समुद्रश्च यथा वृक्षपरावपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा धानाः परश्चैव यथैव लवणोदके ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा पुरुषदेशौ च यथाज्ञज्ञानदावपि ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा स्तेनापहार्यौ च तथा त्वं च परस्तथा ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "भिन्नौ स्वभावतो नित्यं नानयोरेकता क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं भेदोखिलस्यापि स्वतन्त्रात्परमेश्वरात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परतन्त्रं स्वतन्त्रेण कथमैक्यमवाप्नुयात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स जीवनामा भगवान्प्राणधारणहेतुतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपचारेण जीवाख्या संसारिणि निगद्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदधीनमिदं सर्वं नान्याधीनः स ईश्वरः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जडभेदो मिथश्चेति प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोः प्रज्ञामितं यस्माद्द्वैतं न भ्रान्तिकल्पितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "औतः परमार्थोसौ भगवान्विष्णुरव्ययः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परमत्वं स्वतन्त्रत्वं सर्वशक्तित्वमेव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वज्ञत्वं परानन्दः सर्वस्य तदधीनता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादयो गुणा विष्णोर्नैवान्यस्य कथञ्चन ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभावः परमद्वैते सन्त्येव ह्यपराणि तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "औतं ज्ञानिनां पक्षे न तस्माद्विद्यते क्वचिद्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादिश्रुतिभ्योर्थान्तरस्यैवावगतत्वात् । एकपिण्डनामधेयेतिशब्दानां वैयर्थ्यं चान्यथा । न चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तत्पक्षे । न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इति व्यवहारः । नवकृत्वोपि भेद एव दृष्टान्तोक्तेश्च । तस्मादतत्त्वमसीत्येवोच्यते । ऐतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमेवासि न सोसीति वा । तदिति लिङ्गसाम्यं चात्र । अविद्यमानमेवेश्वरं सृष्ट्यादिकं चाप्राप्तमेवात्मनो भिन्नत्वेन प्रापयित्वा तन्निषेधे कथं श्रुतेरुन्मत्तवाक्यत्वं न स्यात् ? अनुवादोपि 'यदिदं वदन्ति तन्न युज्यते'' इत्यादिवाक्यं परिहारे विशेषयुक्तिं च विना न दृष्टः । अतिप्रसङ्गश्चान्यथा । अभेदानुवादेन भेदोपदेशः किमिति न स्यात् ? सर्वशाखान्ते भेदोक्तेश्चैतदेव युक्तम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'नासंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् नाप्रवक्त्र इत्याचार्या आचार्याः'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति इति ब्रह्मविदो विदुः'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "'नमो विष्णवे महते करोमि'' । 'पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादि । न चेश्वरस्तद्भेदो वा प्रत्यक्षादिसिद्धः । तत्पक्षे त्वैक्यादेरपि मिथ्यात्वात्स्वरूपस्य च सिद्धत्वाद्व्यर्थैव श्रुतिः । लक्षितस्वरूपस्यापि न स्वरूपाद्विशेषः । निर्विशेषत्वोक्तेः । मिथ्याविशेषोक्तौ चाप्रामाण्यं श्रुतेः । मिथ्यात्वं च मिथ्यैव तेषाम् । अतः सत्यत्वं सत्यं स्यात् । उपाधिकृतभेदेप्युपाधेर्मिथ्यात्वे त्वप्राप्तमेवोपाधिभेदं प्रापयित्वा पुनर्निषिद्ध्यत इति स एव दोषः । सत्योपाधिपक्षेपि हस्तपादाद्युपाधिभेदेपि भोक्तुरेकत्वदृष्टेरेकेनैवेश्वरेण सर्वोपाधिगतं सुखं दुःखं भुज्यतेत्येवमादयो दोषाः समा एव । अचेतनानामनुभवाभावान्न तत्साम्यम् । अतो जीवेश्वरयोर्भेद एवेति सिद्धम् ॥ १८ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "text": "य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।",
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| "text": "उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥",
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| "text": "य एनं जीवं वेत्ति हन्तारं स्वातन्त्र्येण । अन्यथा 'मया हतांस्त्वं जहि'' इत्यादिविरोधः । चेतनं प्रति य एनमिति परमात्मनोपि समम् ॥ १९ ॥",
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| "text": "न जायते म्रियते वा कदाचि-",
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| "text": "न्ना()यं भूत्वा भविता वा न भूयः ।",
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| "text": "अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो",
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| "tag": "line",
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| "text": "न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २० ॥",
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| "text": "जीवेश्वरयोर्नित्यत्वे मन्त्रवर्णोप्यस्तीत्याह । न जायते म्रियत इति । अयं ना परमपुरुषो भूत्वा विद्यमान एव देहसम्बन्धरूपेणापि भविता न । मरणं तु देहवियोग इति प्रसिद्धमेव । न हि घटादीनां मरणव्यवहारः । स्वरूपानाशः कैमुत्येनैव सिद्धः । अयं जीवोप्यजो नित्यश्च । अन्यथा पुनरुक्तेः । शाश्वतश्च । न कदाचिदस्वातन्त्र्यादिकं जीवस्वरूपं जहाति ।",
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| "tag": "br",
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| "tail": "स्वाभाविकं तयोरेतन्नान्यथा स्यात्कथञ्चन ।"
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| "tag": "br",
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| "tail": "वदन्ति शाश्वतावेतावत एव महाजनाः'' ॥"
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| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ।"
| |
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| "tail": "पुराण्यणति गच्छतीति पुराणः ॥२० ॥\n "
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| "text": "कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥२१ ॥",
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| "text": "'कर्तृत्वं तु स्वतन्त्रत्वं तदेकस्य हरेर्भवेत् ।",
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| "text": "तच्चाव्ययं तस्य जानन् कथं कर्ता स्वयं भवेत्'' ॥ इति परमश्रुतिः ।",
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| "text": "अन्यथाविनाशिनं नित्यमिति पुनरुक्तिः ॥२१ ॥",
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| "attrs": {
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| "type": "Mahavishnu_id"
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| },
| |
| "text": "अच्छेद्यत्वादिकं जीवस्यापि तत्सममित्याह - अच्छेद्योयमिति । नित्यं सर्वगते स्थितः अणुश्चायमिति सर्वगतस्थाणुः । सर्वगतो विष्णुस्तदधीनत्वादिकं तत्स्थत्वम् । हेतुतोपि तत्स्थत्वान्न चलतीत्यचलः । नादेन शब्देन सह वर्तत इति सनादन एव सनातनः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'नित्यं सर्वगते विष्णावणुर्जीवो व्यवस्थितः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "न चास्य तदधीनत्वं हेतुतोपि विचाल्यते ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "निषेधविधिपात्रत्वात्सनातन इति स्मृऽतः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अच्छेद्योयमित्यादिपुनरुक्तिश्चान्यथा । यस्मिन्नयं स्थितः सोव्यक्ताचिन्त्यादिरूपः । एवं ज्ञातः परमेश्वरः सर्वदुःखनाशं करोतीति नानुशोचितुमर्हसि । 'तेषामहं समुद्धर्ता'' इत्यादेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'न त्वेवाहं जातु नासं न त्वम्'' इत्युभयोरपि प्रस्तुतत्वात् । देहिनः शरीरिणः देहीति विशेषितत्वाच्च जीवस्य तत्र तत्र ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अविनाशि तु ।'' 'येन सर्वमिदं ततम् ।'' 'अनाशिनोप्रमेयस्य ।'' 'न म्रियते ।'' 'भूत्वा भविता न ।'' 'अविनाशिनम् ।'' 'अव्ययम् ।'' 'अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयम्'' । इत्यादि परमात्मनश्च । न हि जीवेन ततं सर्वम् । न च मुख्यतोप्रमेयोसौ । न च न म्रियते । न चाविनाशिनं नित्यमिति नित्यत्वातिरिक्तमविनाशित्वं तस्य । न चाव्यक्तत्वमविकार्यत्वं च मुख्यम् । न च भूत्वा भविता वा नेति देहस्याप्यनुत्पत्तिः । परमात्मनस्तु देहवियोगादिकमपि नास्तीत्यविनाशि त्वित्यादिविशेषणम् । यस्मादेवं भूतस्तस्मात्स एव स्वतन्त्रः । तदधीनमन्यत्सर्वम् । अतः स एव सर्वपुरुषार्थदः । अतस्तत्पूजा सत्कर्मैव । अतस्तदर्थं युध्यस्व । अन्येषां त्वन्तवन्त एव देहाः । प्राकृतदेहिनश्च । अतोस्वतन्त्रत्वान्न हन्तुं तेषां सामर्थ्यम् । नित्यत्वान्न हन्यते च । तस्माद्धन्ता हत इति मन्यमानौ न विजानीतः । यस्मादयमेव परमेश्वरः शरीरवियोगरूपेणापि न म्रियते तत्संयोगरूपेणापि न जायते जीववत्कदापि । अतः स एव स्वतन्त्रत्वात्सर्वस्य हन्ता । जीवस्तु तेन शरीरे हन्यमाने स्वयं न हन्यत इत्येतावत् । अत एवमविनाशित्वादेः स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तारं परमात्मानं यो वेद स कथं घातयति हन्ति वा ? वाससो जरावत्स्वशरीरजरादावस्वातन्त्र्यदर्शनात्सर्वत्रास्वातन्त्र्यं ज्ञातव्यं जीवस्य । ईश्वरस्य तु देहस्यापि च्छेदादेरभावात्स्वातन्त्र्यम् । नैनं छिन्दन्तीति च्छेदनाद्यभावः साक्षादेव दर्शयितुं शक्यते स्वदेहस्येति वर्तमानापदेशः । छेदनादिकं त्वीश्वरो मोहाय मृषैव दर्शयति ॥ २४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V25",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते ।",
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| "text": "तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥",
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| "id": "BGT_C02_V25_B01"
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| "attrs": {
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| "type": "Painishruthi_id"
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| "text": "सर्वगतश्चेत्परमात्मा किमिति तथा न दृश्यत इत्यतो वक्ति - अव्यक्तोयमिति । कथमेतद्युज्यते ? अचिन्त्यशक्तित्वात् । न च सा शक्तिः कदाचिदन्यथा भवति । अविकार्यत्वात् । यानि यान्यस्य रूपाणि तानि सर्वाण्यप्येवं भूतानीति दर्शयितुमेनमयमित्यादिपृथग्वचनम् । जीवे तु सर्वजीवेष्वनुगमार्थम् । सर्वं चैतत् श्रुतिसिद्धम् ।",
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| "children": [
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| "tail": "'सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।"
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| "tail": "ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोक्षरः'' ।"
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| ]
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| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतिः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "'ओहो देहवांश्चैकः प्रोच्यते परमेश्वरः ।"
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| "tail": "अप्राकृतशरीरत्वाददेह इति कथ्यते ।"
| |
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| "tail": "शिरश्चरणबाह्वादिविग्रहोयं स्वयं हरिः ।"
| |
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| "tail": "स्वस्मान्नान्यो विग्रहोस्य ततश्चादेह उच्यते ।"
| |
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| "tail": "स्वयं स्वरूपवान्यस्माद्देहवांश्चोच्यते ततः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "शिरश्चरणबाह्वादिः सुखज्ञानादिरूपकः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "स च विष्णोर्न चान्योस्ति यस्मात्सोचिन्त्यशक्तिमान् ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "देहयोगवियोगादिस्ततो नास्य कथञ्चन ।"
| |
| },
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| "tail": "गुणरूपोपि भगवान् गुणभुक्च सदा श्रुतः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अहमित्यात्मभोगो यत्सर्वेषामनुभूयते ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अभिन्नेपि विशेषोयं सदानुभवगोचरः ।"
| |
| },
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| "tail": "विशेषोपि हि नान्योतः स च स्वस्यापि युज्यते ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "नानवस्था ततः क्वापि परमैश्वर्यतो हरेः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "युक्तायुक्तत्वमपि हि यदधीनं सदेष्यते ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "प्रमाणावगते तत्र कुत एव ह्ययुक्तता'' ॥ इत्यादिपरमश्रुतिः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "'गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः'' ॥ इत्यादि च ऋग्वेदे सौपर्णशाखायाम् ।"
| |
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| {
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "Mahavaraha_id"
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| "text": "'एकमेवाद्वितीयं'' 'नेह नानास्ति किञ्चिन'' ।",
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| "tail": "'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति'' ।"
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| "tail": "'यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।"
| |
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| "tail": "एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति'' ।"
| |
| },
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| "tail": "'मत्स्यकूर्मादिरूपाणां गुणानां कर्मणामपि ।"
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| "tail": "तथैवावयवानां च भेदं पश्यति यः क्वचित् ।"
| |
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| "tail": "भेदाभेदौ च यः पश्येत्स याति तम एव तु ।"
| |
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| "tail": "पश्येदभेदमेवैषां बुभूषुः पुरुषस्ततः ।"
| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "अभेदेपि विशेषोस्ति व्यवहारस्ततो भवेत् ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "विशेषिणां विशेषस्य तथा भेदविशेषयोः ।"
| |
| },
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| "tail": "विशेषस्तु स एवायं नानवस्था ततः क्वचित् ।"
| |
| },
| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "प्रादुर्भावादिरूपेषु मूलरूपेषु सर्वशः ।"
| |
| },
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| "tail": "न विशेषोस्ति सामर्थ्ये गुणेष्वपि कदाचन ।"
| |
| },
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| "tail": "मत्स्यकूर्मवराहाश्च नृसिंहवटुभार्गवाः ।"
| |
| },
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| "tail": "राघवः कृष्णबुद्धौ च कल्किव्यासैतरेयकाः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "दत्तो धन्वन्तरिर्यज्ञः कपिलो हंसतापसौ ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "शिंशुमारो हयास्यश्च हरिः कृष्णश्च धर्मजः ।"
| |
| },
| |
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| "tail": "नारायणस्तथेत्याद्याः साक्षान्नारायणः स्वयम् ।"
| |
| },
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| "tail": "ब्रह्मरुद्रौ शेषविपौ शक्राद्या नारदस्तथा ।"
| |
| },
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| "tail": "सनत्कुमारः कामभवोप्यनिरुद्धो विनायकः ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "सुदर्शनाद्यायुधानि पृथ्वाद्याश्चक्रवर्तिनः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "इत्याद्या विष्णुनाविष्टा भिन्नाः संसारिणो हरेः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "तेष्वेव लक्ष्मणाद्येषु त्रिष्वेवं च बलादिषु ।"
| |
| },
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| "tail": "नरार्जुनादिषु तथा पुनरावेश उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tail": "स्वल्पस्तु पुनरावेशो धर्मपुत्रादिषु प्रभोः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "एतज्जानाति यस्तस्मिन्प्रीतिरभ्यधिका हरेः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "सङ्करज्ञानिनस्तत्र पातस्तमसि च ध्रुवम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
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| "tail": " इत्यादि महावराहे ॥२५ ॥\n "
| |
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| "text": "अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।",
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| "text": "तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Brahma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'आश्चर्यो भगवान्विष्णुर्यस्मान्नैतादृशः क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात्तद्गोचरं ज्ञानं तद्गोचरवदेव तु'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनाश्चर्यवदप्यसुरादयः पश्यन्तीति कश्चिदिति विशेषणम् ॥२९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V30",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देही नित्यमवध्योयं देहे सर्वस्य भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥३० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V30"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V30_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "देही कुतोवध्यः ? यस्मादयमीश्वरः सर्वस्य जीवस्य सूक्ष्मे स्थूले च देहे रक्षकत्वेनावस्थितः अत एवावध्यः । न स्वसामर्थ्यं कस्यापि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया'' ॥ "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति हि भागवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'तत्र तत्र स्थितो विष्णुर्नित्यं रक्षति नित्यदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनित्यदैवानित्यं च नित्यानित्ये ततस्ततः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भावाभावनियन्ता हि तदेकः पुरुषोत्तमः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ॥३० ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V31",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्म्यादि्ध युद्धाच्छ्रेयोन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V32",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V33",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥३३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V34",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V35",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V36",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V37",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V37"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V37_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "जित्वा स्वर्गं महीं च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ये युद्ध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनुत्यजः''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति श्रुतेः ॥३७-३८॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V38",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥३८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V39",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एषा तेभिहिता साङ्ख्ये बुदि्धर्योगे त्विमां शृणु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V39"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V39_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "सम्यक् ख्यातिर्ज्ञानं साङ्ख्यम् । युज्यतेनेनेति योगस्तदुपायः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सम्यक्तत्वदृशिः साङ्ख्यं योगस्तत्साधनं स्मृऽतम्'' ।"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ब्रह्मतर्कस्तर्कशास्त्रं विष्णुना यत्समीरितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अक्षपादकणादौ च साङ्ख्ययोगौ च हैतुकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बौद्धपाशुपताद्यास्तु पाषण्डा इति कीर्तिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मीमांसा त्रिविधा प्रोक्ता ब्राह्मी दैवी च कार्मिकी ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मतर्कं च मीमांसां सेवेत ज्ञानसिद्धये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वैदिकज्ञानवैरूप्यान्नान्यत्सेवेत पण्डितः'' ॥ इत्यन्यसाङ्ख्ययोगयोर्निषिद्धत्वान्नारदीये । साङ्ख्यस्य निरीश्वरत्वादुक्तत्वाच्चेश्वरस्य । साङ्ख्यैर्योगैश्च विहितहिंसाया अप्यनर्थहेतुत्वाङ्गीकारात् । अत्र तु युद्धविधानाच्च मोक्षार्थत्वेनैव कर्मबन्धं प्रहास्यसीति । परमसाङ्ख्ययोगयोश्चोक्तार्थत्वेनैव न विरोधः ॥३९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V40",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V40"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V40_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmavaivarte_id"
| |
| },
| |
| "text": "'प्रारम्भमात्रमिच्छा वा विष्णुधर्मे न निष्फला ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न चान्यधर्माकरणाद्दोषवान्विष्णुधर्मकृत्'' ॥ इत्याग्नेये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'स्वोचितेनैव धर्मेण विष्णुपूजामृते क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नाप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा यत्र धर्मः स वैष्णवः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एनं धर्मं च देवाद्या वर्तन्ते सात्त्विका जनाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एष कार्तयुगो धर्मः पाञ्चरात्रश्च वैदिकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्प्रीत्यर्थं विनान्यस्मै नोदबिन्दुं न तण्डुलम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दद्यान्निराशीश्च सदा भवेद्भक्तश्च केशवे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नैतत्समेधिके वापि कुर्याच्छङ्कामपि क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जानीयात्तदधीनं च सर्वं तत्तत्त्ववित्सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथाक्रमं तु देवानां तारतम्यविदेव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एष भागवतो मुख्यस्त्रेतादिषु विशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एष धर्मोतिफलदो विशेषेण पुनः कलौ ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं भागवतो यस्तु स एव हि विमुच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रैविद्यस्त्वपरो धर्मो नानादैवतपूजनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्रापि विष्णुर्ज्ञातव्यः सर्वेभ्योभ्यधिको गुणैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समर्पयति यज्ञाद्यमन्ततस्त्वेव विष्णवे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रैविद्यधर्मा पुरुषः स्वर्गं भुक्त्वा निवर्तते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुनः कुर्यात्पुनः स्वर्गं याति यावद्धरेर्वशे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वान्देवान्प्रविज्ञाय तत्कर्मैव सदा भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सम्यक्तत्वापरिज्ञानादन्यकर्मकृतेरपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वर्गादिप्रार्थनाच्चैव रागादेश्चापरिक्षयात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सदा विष्णोरस्मरणात् त्रैविद्यो नाप्नुयात्परम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्रमेण मुच्यते विष्णौ कर्माण्यन्ते समर्पयन् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदि सर्वाणि नियमाज्जन्मभिर्बहुभिः शुभैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परं विष्णुं न यो वेत्ति कुर्वाणोपि त्रयीक्रियाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नासौ त्रैविद्य इत्युक्तो वेदवादी स उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वादो विवादः सम्प्रोक्तो वादो वचनमेव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेदोक्ते विष्णुमाहात्म्ये विवादात्पठनादपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अथवा निरर्थकात्पाठाद्वेदवादी स उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेभ्यो याति तमो घोरमन्धं यस्मान्न चोत्थितिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनारम्भमनन्तञ्च नित्यदुःखं सुखोज्झितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वव्रं यद्वेदगदितं तत्र यान्त्यसुरादयः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मवैवर्ते ॥४० ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V41",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यवसायात्मिका बुदि्धरेकेह कुरुनन्दन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोव्यवसायिनाम्॥४१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V41"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V41_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmavaivarte_id"
| |
| },
| |
| "text": "'बुदि्धर्निर्णीततत्त्वानामेका विष्णुपरायणा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोव्यवसायिनाम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मवैवर्ते ॥४१ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V42",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V43",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V44",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यवसायात्मिका बुदि्धः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V44"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V44_B01"
| |
| },
| |
| "text": "अव्यवसायबुदि्धः केषाम् ? यां वाचमविपश्चितः प्रवदन्ति । तयापहृतचेतसाम् । बुदि्धर्व्यवसायात्मकत्वेन समाधानेन वर्तते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'यथावस्तु यथा ज्ञानं तत्साम्यात्सममीरितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विषमं त्वन्यथाज्ञानं समाधानं समस्थितिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न तद्भवत्यसद्वाक्यैर्विषमीकृतचेतसाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वर्गादिपुष्पवाद्येव वचनं यदचेतसाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न मन्यन्ते फलं मोक्षं विष्णुसामीप्यरूपकम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "फलदं च न मन्यन्ते तं विष्णुं जगतः पतिम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भोगैश्वर्यानुगत्यर्थं क्रियाबाहुल्यसन्तताम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहुसंसारफलदामन्ते तमसि पातिनीम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यां वदन्ति दुरात्मानो वेदवाक्यविवादिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तया सम्मोहितधियां कथं तत्त्वज्ञता भवेत्'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Atharvana_id"
| |
| },
| |
| "text": "'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नाकस्य पृष्ठे सुकृते तेनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च आथर्वणश्रुतिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "'वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी'' ॥ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति हि भागवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Naradiya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'ये न जानन्ति तं विष्णुं याथातथ्येन संशयात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जिज्ञासवश्च नितरां श्रद्धावन्तः सुसाधवः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "निर्णेतॄणामभावेन केवलं ज्ञानवर्जिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यैर्निश्चितं परत्वं तु विष्णोः प्रायो न यातनाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्महत्यादिभिरपि यान्त्याधिक्ये चिरं न तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ये तु भागवताचार्यैः सम्यग्यज्ञादि कुर्वते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहिर्मुखा भगवतो निवृत्ताश्च विकर्मणः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दक्षिणातर्पितानां तु ह्याचार्याणां तु तेजसा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यान्ति स्वर्गं ततः क्षिप्रं तमोन्धं प्राप्नुवन्ति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदन्ये नैव च स्वर्गं यान्ति विष्णुबहिर्मुखाः''॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "॥ ४२-४४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V45",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V45"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V45_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रैगुण्याख्यं विषं यापयन्ति अपगमयन्तीति त्रैगुण्यविषयाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'आश्रित्य वेदांस्तु पुमांस्त्रैगुण्यविषहारिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निस्त्रैगुण्यो भवेन्नित्यं वासुदेवैकसंश्रयः'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सत्त्वं साधुगुणाद्विष्णुरात्मा सन्ततिहेतुतः'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सन्ततविष्णुस्मरणं नित्यसत्त्वस्थत्वम् । परमात्मा मम स्वामीति ज्ञानमात्मवत्त्वम् । तेनैक्यज्ञानं निवारयति । विरुद्धयोगक्षेमेच्छावर्जितः । अन्यथोत्थानादेरप्ययोगात् ॥४५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V46",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V46"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V46_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'उद्रेकात्पातृराहित्यादनत्वाच्चाखिलस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रलयेप्युदपानोसौ भगवान् हरिरीश्वरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतिर्ह्युदरूपेण सर्वमावृत्य तिष्ठति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रलयेतो लयं प्राहुः सर्वतः सम्प्लुतोदकम्'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'यावत्प्रयोजनं विष्णोः सकाशात्साधकस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "धर्ममोक्षादिकं तावत्सर्ववेदविदो भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदार्थनिर्णयो यस्माद्विष्णोर्ज्ञानं प्रकीर्तितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानात्प्रसन्नश्च हरिर्यतोखिलफलप्रदः'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वतः सम्प्लुतोदकेप्युद्रिक्तः पालकवर्जितः । कालाद्यनश्च यो विष्णुस्तस्माद्यावत्फलं तावत्सर्ववेदेषु विशेषज्ञस्यैव भवतीत्यर्थः । सर्वे हि विष्णोरन्ये प्रलयकाले नोद्रिक्ताः । ये चोद्रिक्ता मुक्ता रमा च तेपि न पालकवर्जिताः, विष्णुपाल्यत्वात् । न च मुक्ताः कालादिचेष्टकाः । नचोद्रिक्तत्वं तेषां तद्वत् । अत उदपानो विष्णुरेव । प्रलये विशेषतोपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तम आसीत्तमसा गू•हमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्'' ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'आपो वा इदमग्रे सलिलम् आसीत् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति'' ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यः ॥४६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V47",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि॥४७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V47"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V47_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "कर्माधिकारिण एव त्वदादयो जीवाः । फलं तु मदायत्तमिति भावः । मा कर्मफलहेतुर्भूः नेश्वरोहमिति भावं कुरु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'एष उ एव शुभाशुभैः कर्मफलैरेनं संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति यदेनं कर्मफलैः संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति तस्मादन्य एवासौ भगवान्वेदितव्य''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतिः ॥४७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V48",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V48"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V48_B01"
| |
| },
| |
| "text": "सङ्गं फलस्नेहम् ॥ ४८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V49",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "दूरेण ह्यवरं कर्म बुदि्धयोगाद् धनञ्जय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V49"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V49_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "बुद्धौ जातायामपि विष्णुमेव शरणमन्विच्छ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'अज्ञानां ज्ञानिनां चैव मुक्तानां शरणं हरिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तं ये स्वैक्येन मन्यन्ते सर्वभिन्नं गुणोच्छ्रयात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कृपणास्ते तमस्यन्धे निपतन्ति न संशयः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न तेषामुत्थितिः क्वापि नित्यातिशयदुःखिनाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गुणभेदविदां विष्णोर्भेदाभेदविदामपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देहकर्मादिषु तथा प्रादुर्भावादिकेपि वा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वोद्रिक्तानां तदीयानां निन्दां कुर्वन्ति येपि च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वेषामपि चैतेषां गतिरेषा न संशयः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ॥४९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V50",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुदि्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V50"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V50_B01"
| |
| },
| |
| "text": "यथावद्विष्णुं ज्ञात्वा तदर्थत्वेन कर्मकरणमित्येतत्कर्मकौशलमेव योगः । भगवज्झानमेव बुदि्धः ॥ ५०, ५१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V51",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मजं बुदि्धयुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V52",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा ते मोहकलिलं बुदि्धर्व्यतितरिष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V53",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यथा स्थास्यति निश्चला ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समाधावचला बुदि्धस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ ५३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "अर्जुन उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V53"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V53_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "निर्वेदं नितरां लाभम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'बुदि्धमोहो यदा न स्यादन्यथाज्ञानलक्षणः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्रोतव्यश्रुतसाफल्यं तदा प्राप्नोति मानवः ॥ श्रुतिमार्गं प्रपन्ना तु तदर्थज्ञाननिश्चला ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समाधानेन तु पुनरापरोक्ष्याच्च निश्चला ॥ विष्णौ प्राप्स्यति तद्योगं मुक्तो भूत्वा तदश्नुते'' ॥ "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति च पैङ्गिश्रुतौ विशेषेण प्रतिपन्ना ॥ ५२, ५३ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V54",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V54"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V54_B01"
| |
| },
| |
| "text": "का भाषा ? कथं भाष्यते ? कैर्गुणैः ? समाधिस्थस्य विषमबुदि्धवर्जितस्य ॥ ५४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V55",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C02_V55"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V55_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सर्वकामनिवृत्तिस्तु जानतो न कथञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिषिद्धकामितैवातो ह्यकामित्वमितीर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरोक्षदृशोपि स्याद्यदा नास्त्यपरोक्षदृक् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्वचिद्विरुद्धकामोपि यथायुद्ध्यद्धरो हरिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोनभिभवो यावद्दृशस्तावन्निगद्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थितप्रज्ञस्तथाप्यस्य कादाचित्क्यपि या दृशिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियमेनैव मोक्षाय भवेद्योग्या भवेद्यदि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयोग्या भक्तिजाता चेत्क्रमान्मुक्त्यै भवेत्तथा'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मनि विष्णौ, आत्मना विष्णुना । तत्प्रसादादेव तुष्टः ॥५५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V56",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V57",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| |
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| |
| "text": "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "children": [
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| "text": "यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V59",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥",
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| |
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "वशे हि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते॥६२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C02_V63",
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृऽतिविभ्रमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्मृऽतिभ्रंशाद् बुदि्धनाशो बुदि्धनाशाद् प्र(वि)नश्यति ॥६३ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C02_V63_B01"
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| "text": "संमोहान्मिथ्याज्ञानात् । ज्ञातमप्यन्यथा स्मर्यते । वाक्यार्थानामन्यथा स्मरणान्निर्णीतं ज्ञानमपि नश्यति ॥ ६२,६३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V64",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिंद्रियैश्चरन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
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| "id": "bhashya-BGT_C02_V64"
| |
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| "children": [
| |
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| "id": "BGT_C02_V64_B01"
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| |
| "text": "शान्तिर्भगवन्निष्ठा । 'शमो मन्निष्ठता'' इति हि भागवते ॥६४-६६॥",
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुदि्धः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V66",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नास्ति बुदि्धरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C02_V67",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V68",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "text": "तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V69",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| "id": "bhashya-BGT_C02_V69"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C02_V69_B01"
| |
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmavaivarte_id"
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| "text": "'देवेभ्योन्ये यदा ब्रह्म पश्यन्त्यन्यन्न दृश्यते ।",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "निशायामिव सुव्यक्तं यथान्यैर्ब्रह्म नेयते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आश्चर्यवस्तुदृग्यद्वद्व्यक्तमन्यन्न पश्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऐकाग्र्याद्वा सुखोद्रोकाद्देवाः सूर्यवदेव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रायशः सर्ववेत्तारस्तत्रापि ह्युत्तरोत्तरम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ॥६९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V70",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।",
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| |
| {
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| "text": "तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "id": "BGT_C02_V70_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "'भुञ्जानोपि हि यः कामान् मर्यादां न तरेत्क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "समुद्रवद्धर्ममयीं नासौ कामी स उच्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केति कुत्सितवाची स्यात्कुत्सितं मानमेव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामो मोक्षविरोधी स्यान्न सर्वेच्छाविरोधिनी'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च सर्वेच्छाभावे जीवनं भवति । 'शान्तिर्मोक्षो यतो ह्यत्र विष्णुनिष्ठा भवेद्ध्रुवा'' इति च ॥७० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V71",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।",
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "bhashya-BGT_C02_V71"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "id": "BGT_C02_V71_B01"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "निषिद्धस्पृहाभावमात्रेण सर्वविषयान् विहाय ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'अस्वरूपे स्वरूपत्वमतिरेव ह्यहङ्कृतिः ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्याज्या सर्वत्र ममता ज्ञात्वा सर्वं हरेर्वशे'' ॥ इति च ॥७१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
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| |
| "id": "BGT_C02_V72",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थित्वास्यामन्तकालेपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति॥७२ ॥",
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये द्वितीयोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C02_V72"
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C02_V72_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्राह्मी ब्रह्मविषया । ज्ञानिनामप्यन्तकालेन्यमनसां प्रारब्धकर्मभावाज्जन्मान्तरम् । प्रारब्धकर्मनाशकाले नियमेन भगवत्स्मृऽतिर्भवति । ततो मोक्षश्च । 'यं यं वापि स्मरन् भावम्'' इति हि वक्ष्यति । बाणं शरीरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अभावाज्जडदेहस्य विष्णुर्निर्बाण उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नदेहाभावतो वा स सहस्रशिरा अपि'' ॥ इति च ॥७२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n \n "
| |
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03",
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| "name": "तृतीयोऽध्यायः"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "तृतीयोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_I01"
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "ज्ञानसाधनत्वेनाकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये-",
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| |
| {
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुदि्धर्जनार्दन ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V02",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुदि्धं मोहयसीव मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम्॥२ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C03_V02"
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| "children": [
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ज्ञानं योगश्चोक्तौ । तत्र कर्मयोगं विशेषतः प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन । 'दूरेण ह्यवरं कर्म'' इति प्रश्नबीजम् ॥ १,२ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकेस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V03"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V03_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmavaivarte_id"
| |
| },
| |
| "text": "ज्ञानप्रचुरो योगो ज्ञानयोगः । कर्मप्रचुरोन्यः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'साङ्ख्या ज्ञानप्रधानत्वाद् देवाश्च यतयस्तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुख्यसाङ्ख्यास्तत्र देवा ज्ञानमेषां महद् यतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहुकर्मकृतोप्येते ततोपि बहुवेदनात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुख्यसाङ्ख्या इति ज्ञेयास्तदन्ये कर्मयोगिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानिनोप्यतिबाहुल्यात् कर्मणः कर्मयोगिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नोभयं तद् विना कश्चित् पुमान् हि पुरुषार्थभाक् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न च ज्ञानं विना कर्म पुरुषार्थकरं भवेत्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मवैवर्ते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "निष्ठा पर्यवसितिर्मुक्तिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paramashruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'ज्ञानिनो मोक्षनियमस्तथापि शुभकर्मणा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आनन्दवृदि्धरन्येन ह्रासो ज्ञानं तु कर्मणा'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति परमश्रुतेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'न कर्मणा न प्रजया धनेन'' इत्यादिविरोधो न । अन्यथा 'न कर्मणामनारम्भात्'' इत्याद्युभयसमवाक्यशेषविरोधश्च । समत्वं च 'न हि कश्चित्'' इत्यादेः । 'नान्यः पन्थाः'' इत्यपि ज्ञानमृते न मोक्ष इत्येवाह ॥ ३,४ ॥ \n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च संन्यसनादेव सिदि्धं समधिगच्छति॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V05_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'कर्तृत्वं द्विविधं प्रोक्तं विकारश्च स्वतन्त्रता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विकारः प्रकृतेरेव विष्णोरेव स्वतन्त्रता'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\n 'कार्यते ह्यवश'' इत्यत्रावशो विष्णुवशः । 'अः इति ब्रह्म'' इत्यादिश्रुतेः ॥५ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मेंद्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V09_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Barkshruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "कर्मणा बध्यते जन्तुरित्यादिकमप्यवैष्णवकर्मविषयमित्याह - यज्ञार्थादिति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ज्ञो नाम भगवान्विष्णुस्तं यात्युद्देश एष यः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स यज्ञ इति सम्प्रोक्तो विहिते कर्मणि स्थितः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति बर्कश्रुतिः ॥९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V10",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| |
| "text": "सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| |
| "type": "shloka",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमावाप्स्यथ॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V12",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| "text": "इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
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| |
| "type": "shloka",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V14",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| "text": "अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V15",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V16",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अघायुरिंद्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C03_V16"
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| "text": "\n ",
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| "type": "Naradiya_id"
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| "children": [
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| {
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| "tail": "स यज्ञात् कर्मणः सोपि समस्तं कर्म केशवात् ॥ स नित्योप्यक्षरततिरूपाद्वाक्यादि्ध गम्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाक्यमुच्चार्यते भूतैस्तान्यन्नात्तच्च मेघतः ॥ तस्मात्सर्वगतो विष्णुर्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स पापो विश्वहन्तृत्वान्नरके मज्जति ध्रुवम् ॥ वाचिको मानसो यज्ञो न्यासिनां तु विशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वनस्थस्याक्रतुर्यज्ञः क्रत्वादिर्ग्रहिणोखिलः ॥ शुश्रूषाद्यात्मको यज्ञो विहितो ब्रह्मचारिणः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विद्याभयादिदानं च सर्वेषामपि सम्मतम् ॥ गृहिणो वित्तदानं तु वनस्थस्यान्नपूर्वकम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वैः कार्यं तपो घोरमिति सर्वे त्रिकर्मिणः ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्माक्षरशब्दार्थयोर्व्यत्यासे तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म इति प्रत्यभिज्ञाविरोधश्चक्राप्रवेशश्च ॥ १४-१६ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V17",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C03_V17"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V_B01"
| |
| },
| |
| "text": "तृप्तिसन्तोषशब्दयोः पर्यायत्वेपि परमात्मना तृप्तः परमात्मनि तृप्त इति विशेषः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "'विष्णुप्रसादाद्रतिमांस्तृप्तो विष्णुप्रसादतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णावेवातितृप्तश्च मुक्तोसौ विध्यगोचरः'' ॥ इत्याग्नेये ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'रतिरानन्द उद्दिष्टस्तृप्तिस्तु कृतकृत्यता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रीतिस्तु द्विविधः स्नेहः कर्मजो निज एव च'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सन्तोषस्तृप्तिरापूर्तिः प्रीतिः पर्यायवाचकाः'' । इत्यभिधानम् ॥१७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V19",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V19_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मादमुक्तस्य कार्यमस्त्येव तस्मादसक्तः । असक्त आचरन्नेव यस्मा-त्परमाप्नोति । मुक्तस्यैव कार्यं नास्तीत्येवकारार्थोपि यस्त्विति तुशब्देनावगतः । 'तस्मात् कर्म समाचर'' इत्युपसंहारविरोधश्चान्यथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'ब्रह्मनिष्ठा ब्रह्मरता ब्रह्मज्ञानसुतर्पिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पाण्डवानां च मुक्तानामन्तरं किञ्चिदेव हि'' ॥ इति भविष्यत्पर्ववचनाच्च नार्जुनस्यामुख्याधिकारिता । आत्मरतिरेव स्यात् इत्येवशब्देन मुक्तानामेभ्यो विशेषो दर्शितः । एषां कदाचिद् दुःखाभासस्यापि भावात् ॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V20",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कर्मणैव हि संसिदि्धमास्थिता जनकादयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V20"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V20_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "'सहैव कर्मणा सिदि्धमास्थिता जनकादयः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञाननिष्ठा अपि ततः कार्यं वर्णाश्रमोचितम्'' ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अज्ञानां ज्ञानदं कर्म ज्ञानिनां लोकसङ्ग्रहात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अद्धैव तुष्टिदं मह्यं सा मुक्तानन्दपूर्तिदा ॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V21",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
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| "text": "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।",
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| |
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| "text": "स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥२१ ॥",
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V22",
| |
| "type": "shloka",
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।",
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| |
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| "text": "नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C03_V22"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V22_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Krishnasamhitha_id"
| |
| },
| |
| "text": "'ममैव केवलं नास्ति केनाप्यर्थस्तथाप्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्मकृल्लोकरक्षायै तस्मात् कुर्वीत मत्परः'' ॥ "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति कृष्णसंहितायाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Barkshruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'रक्षया वाथ सृष्ट्या वा संहृत्यादेर्न तु क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अर्थो विष्णोस्तथाप्येष स्वभावात्सर्वकर्मकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मत्तो नृत्तादिकं यद्वत्कुर्यात्सुखविशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परमानन्दरूपत्वात् कुर्याद्विष्णुस्तथैव तु'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति बर्कश्रुतिः ॥२२ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V25",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V26",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न बुदि्धभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V27",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| "text": "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V28",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V29",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V30",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V31",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धावन्तोनसूयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभिः॥३१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V32",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विदि्ध नष्टानचेतसः॥३२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V33",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V34",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V35",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C03_V35"
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C03_V35_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
| |
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'नाहं कर्ता हरिः कर्ता तत्पूजा कर्म चाखिलम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "tail": "तथापि मत्कृता पूजा तत्प्रसादेन नान्यथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्भक्तिस्तत्फलं मह्यं तत्प्रसादः पुनः पुनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्मन्यासो हरावेवं विष्णोस्तृप्तिकरः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यस्मात्स्वतन्त्रकर्तृत्वं विष्णोरेव न चान्यगम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदधीनं स्वतन्त्रत्वं स्वावरापेक्षयैव तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवस्य विकृतिर्नाम कर्तृत्वं जडसंश्रयम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुमान्दोग्धा च गौर्दोग्ध्री स्तनो दोग्धेतिवत्क्रमात्'' ॥ इति ब्रह्मतर्कवचनादीश्वरजीवप्रकृत्यादीनां कर्तृत्वमकर्तृत्वं च विभागेन ज्ञातव्यं सर्वत्र ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'क्वचित् स्वभावः प्रकृतिः क्वचिच्च त्रिगुणात्मिका ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्वचित् प्रकृष्टकर्तृत्वाद् भगवान्प्रकृतिर्हरिः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Prakashasamhitha_id"
| |
| },
| |
| "text": "'स्वभावतस्त्रिधा जीवा उत्तमाधममध्यमाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उत्तमास्तत्र देवाद्या मर्त्यमध्यास्तु मध्यमाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अधमा असुराद्याश्च नैषामस्त्यन्यथाभवः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरीरमात्रान्यथात्वे स्वजातिं पुनरेष्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उत्तमा मुक्तियोग्यास्तु सृतियोग्यास्तु मध्यमाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपरेन्धतमोयोग्याः प्राप्तिः साधनपूर्तितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पूर्त्यभावेन सर्वेषामनादिः संसृतिः स्मृऽता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नैव पूर्तिश्च सर्वेषां नित्यकालहरीच्छया ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतोनुवर्तते नित्यं संसारोयमनादिमान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतोधमानां जीवानां मिथ्याज्ञानादयोखिलाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वाभाविका गुणा ज्ञेया मध्यमर्त्येषु मिश्रिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्वज्ञानं विष्णुभक्तिरित्याद्या देवतादिषु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वैस्तैः प्राकृतैर्गुणैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वाभाविकगुणानेतान् हेतुं कृत्वैव विष्णुना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्मसु क्रियमाणेषु कर्ताहमिति मूढधीः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मन्यते तत्वविद्विष्णोर्गुणा इच्छादयस्तु ये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वाभाविकेषु जीवस्य कामाद्येषु सदैव तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रेरकत्वेन वर्तन्ते स्वातन्त्र्यं मम न क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति मत्वा न सक्तः स्यात्प्रीतोस्य भवति प्रभुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वभावगुणसम्मूढा ज्ञानादिगुणवत्तरम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वातन्त्र्येणैव कर्तारं चात्मानं प्रतिजानते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तान्गुणान् कर्म तच्चैव विष्ण्वधीनं न ते विदुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेष्वयोग्येषु तत्वज्ञस्तत्त्वं नातिप्रकाशयेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वदेद्विवादरूपेण नोपदेशात्मना क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सभ्यरूपेण वा ब्रूयात्पृष्टेव्यक्तिकृदेव वा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बुद्ध्वाप्यसौ यतो नित्यं स्वभावानुगचेष्टितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वभावं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादि प्रकाशसंहितायाम् ॥ २७-३५ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C03_V39",
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| "text": "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V40",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| "text": "इंद्रियाणि मनोबुदि्धरस्याधिष्ठानमुच्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V41",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C03_V41"
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V41_B01"
| |
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
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| "type": "Brahma_id"
| |
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| "text": "'अखिलप्रेरको विष्णुर्ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "tail": "असुरा अशुभेष्वेव कामादेरभिमानिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महाशनस्य तस्येदं नालं तेनानलोग्निवत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भुञ्जान इंद्रियाविष्टो ज्ञानास्त्रेणैव (दह्यते)हन्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानावरणरूपेणेदमावृणोतीत्यावृतं ज्ञानमिति पुनराह । न केवलं दुष्पूरो नालमिति मन्यते चेत्यनलः । 'अग्नेरप्यनलः कामो यन्नालमिति मन्यत'' इति च ॥ ३७-४१ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C03_V42",
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| "type": "shloka",
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| |
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| "children": [
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| "text": "इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| |
| "text": "मनसस्तु परा बुदि्धर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥४२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C03_V43",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्भगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये तृतीयोध्यायः ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "children": [
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| "id": "BGT_C03_V43_B01"
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| "text": "'सर्वेभ्यः प्रवरा देवा इन्द्राद्या इंद्रियात्मकाः ।",
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| "children": [
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| {
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| "tail": "तेभ्यो मनोभिमानी तु रुद्रस्तस्मात्सरस्वती ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बुध्द्यात्मिका ततो ब्रह्मा महानात्मा परः स्मृऽतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अव्यक्तरूपा लक्ष्मीश्च वरातोतो हरिः स्वयम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "tail": "न तत्समोधिको वेति ह्यानुपूर्वी प्रकीर्तिता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "यथाक्रमप्रबोधेन नाश्याः कामादिशत्रवः ।"
| |
| },
| |
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| |
| "tag": "br",
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| "tail": "प्राप्यते च परं स्थानं विष्णोरतुलमञ्जसा'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'न चेंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था रुद्रोहङ्कृतिरूपकः'' । इत्यादिविरोधः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सर्वाभिमानिनो देवाः सर्वेपि ह्युत्तरोत्तरम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "आधिक्यं वक्तुमेवैषां पृथक्स्थानमुदीर्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आधिक्यक्रम एवात्र शास्त्रतात्पर्यमिष्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्थानेषु त्ववरेषां च परे सन्ति न चेतरे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथापि पितुरर्थो यः पुत्रस्याप्युपचर्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अव्यक्तादिपदार्थानां सर्वे तदभिमानिनः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।"
| |
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| |
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| |
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
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| "text": "'बहुवाचिनां तुशब्दानां लिङ्गप्रकरणादिभिः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "प्रवृत्तिहेतोश्चाधिक्यान्निर्णयोर्थेषु गम्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "br"
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| "tag": "blockquote",
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
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| "type": "Brahma_id"
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| "text": "'लिङ्गादिसाम्यं यत्र स्यात्प्रयोगाधिक्यमेव तु ।",
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| "tail": "निर्णायकं भवेत्तत्र तेन स्यात्सुबहुश्रुतः'' ॥"
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| |
| ]
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| }
| |
| ],
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| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ॥४२ ॥\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n \n "
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| "text": "बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेस्मिन्नध्याये ।",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।",
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| "text": "विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V02",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| {
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| "text": "स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तोसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C04_V03"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V03_B01"
| |
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmavaivarte_id"
| |
| },
| |
| "text": "उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तरात्मकोयमध्यायः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ब्रह्मरुद्रेन्द्रसूर्याणां यद्दत्तं विष्णुना पुरा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पञ्चरात्रात्मकं ज्ञानं व्यासोदात्पाण्डवेषु तत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषामेवावतारेषु सेनामध्येर्जुनाय च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रादाद्गीतेति निर्दिष्टं सङ्क्षेपेणायुयुत्सवे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा कुर्वन्ति कर्माणि यथा जानन्ति देवताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वे कार्तयुगाश्चैव नृपाश्च मनुपूर्वकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञातव्यं चैव कर्तव्यं यथा सर्वैर्मुमुक्षुभिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रैतादित्रिषु जातैश्च गीतायां तदुदाहृतम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पाण्डवाद्याः क्षेमकान्ताः करिष्यन्ति च जानते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथैव तेन गीताया नास्ति शास्त्रं समं क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेदार्थपूर्वकं ज्ञेयं पञ्चरात्रं यतोखिलम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्सङ्क्षेपश्च गीतेयं तस्मान्नास्याः समं क्वचित्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १-३ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "अर्जुन उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V05"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'जानन्तोपि विशेषार्थज्ञानाय स्थापनाय वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृच्छन्ति साधवो यस्मात्तेन पृच्छसि पार्थिव ॥'' इत्याग्नेयवचनान्नार्जुनो भगवन्तं न जानाति ॥ ४-५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V07"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Narayanashruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "आत्ममायया आत्मेच्छया । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वभावम् । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' इत्यादिश्रुतेश्च । अत एव स्वशब्देन विशेषणं 'प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य'' इत्यादिषु । 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः'' इत्यादिषु तु न स्वशब्दः । 'प्रकृतिं विदि्ध मे पराम्'' इत्यादिषु सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरन्या । अत्र तु स्वशब्दः स्वरूपवाची । स्वभाव इत्यत्रापि स्वाख्यो भावः स्वभावः । भावशब्दस्तु सम्बन्ध्याशङ्कानिवृत्तये । स्वस्वभाव इति तु स्वस्वरूपमितिवदुपचारत्वाशङ्कां निवर्तयति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'स्रष्टृत्वादिस्वभावत्वात्स्वेच्छया विष्णुरव्ययः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सृष्ट्यादिकं करोत्यद्धा स्वयं च बहुधा भवेत्'' ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\u003E"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारायणश्रुतिः॥ ६,७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V09"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V09_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'येषां गुणानां ज्ञानेन मुक्तिरुक्ता पृथक्पृथक् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदेषु चेतिहासेषु सा तु तेषां समुच्चयात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेव शमादीनां नान्यथा तु कथञ्चन'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्तवचनाज्जन्म कर्म चेत्यादिषु न तावन्मात्रेण मोक्षः ॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V10"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V10_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मयं प्रधानमुद्दिष्टं प्राधान्यं यैर्हरेर्मतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भगवन्मयास्ते विज्ञेयास्ते मुच्यन्ते न चापरे'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मयि भावो मद्भावः ॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "काङ्क्षन्तः कर्मणां सिदि्धं यजन्त इह देवताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिदि्धर्भवति कर्मजा॥१२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V12"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V12_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
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| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "text": "तथैव भजामि । तदनुसारिफलदानरूपेण । अन्यदेवतायाजिनामपि मत्समर्पणेन वैष्णवमार्गानुवर्तनेनैव सम्यक् फलं भवति ॥"
| |
| },
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| "tag": "line",
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| "text": "अन्यदैवतपूजापि यस्मिन्नन्ते समर्पिता स्वर्गादिफलहेतुः स्यात् नान्यथा तं भजेद्धरिम् ॥ इत्याग्नेये ॥ ११-१२ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥",
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V13_B01"
| |
| },
| |
| "text": "'सत्वसत्वाधिकरजोरजोभिस्तमसा तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वर्णा विभक्ताश्चत्वारः सात्विका एव वैष्णवा'' इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्मविभागं शमो दम इत्यादिना वक्ष्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'वैष्णवाः सात्विका एव तामसा एव चापरे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दौर्लभ्यसुलभत्वेन तेषां वर्णादिभिन्नता'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Naradiya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'स्वाभाविको ब्राह्मणादिः शमाद्यैरेव भिद्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "योनिभेदकृतो भेदो ज्ञेय औपाधिकस्त्वयम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुभक्तिश्चानुगता सर्ववर्णेषु विश्पतिम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आरभ्य हीयतेथापि भेदः स्वाभाविकस्ततः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'कर्तापि भगवान्विष्णुरकर्तेति च कथ्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्य कर्ता यतो नान्यः स्वतन्त्रत्वात्परात्मनः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपिशब्दो गुणसमुच्चयार्थः । कर्ता मे नास्तीत्यपि विद्धीति ॥१३ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति मां योभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V14"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V14_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवाभेदनिवृत्त्यर्थं मामिति विशेषणम् ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V16",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V17"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V17_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मापि नो मत्त इति बोद्धव्यमित्यादि ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स बुदि्धमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V18"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V18_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Naradiya_id"
| |
| },
| |
| "text": "कर्मणि जीवे अस्वातन्त्र्यादकर्म कर्मविधिफलयोरभावात् । अकर्मणि विष्णौ । स्वातन्त्र्यात्सर्वकर्तृत्वम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "करोस्मिन् मीयत इति कर्म जीव उदाहृतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विधिशब्देनामितत्वात् अकर्म भगवान् हरिः ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर इति सकारान्तः अदृष्टवाची । क्रियावाची वा । तदधीनत्वात् । प्रसिद्धश्च जीवे कर्मशब्दः पञ्चरात्रे । कृत्स्नफलवत्वात् कृत्स्नकर्मकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "॥१८ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V19",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V20",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V20"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V20_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिराश्रयो भगवदाश्रयत्वात् । मुक्तस्य स्वातन्त्र्याभिमानात् ॥२०॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V21",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V22",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबद्ध्यते॥२२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C04_V24"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V24_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bharatha_id"
| |
| },
| |
| "text": "कथमभिमानत्यागः ? ब्रह्मार्पणमित्यादि । ब्रह्मण्यर्पणं ब्रह्मार्पणम् । ब्रह्मणो हविः । ब्रह्मणोग्नौ । ब्रह्मणः कर्मसमाधिना सह । समाधिरपि तदधीना इत्यर्थः ।'एकः स्वतन्त्रो भगवान् तदीयं त्वन्यदुच्यते'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भारते ॥२४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V25",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C04_V26",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शब्दादीन्विषयानन्य इंद्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥",
| |
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| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "दैवं विष्णुमेव यज्ञ इत्युपासते । स्वभोग्यत्वात्स्वयमेव यज्ञः । ब्रह्मा-ख्याग्नौ क्रियायज्ञं तेनैव यज्ञाख्येन विष्णुना समर्पयन्ति । तत्पूजात्वेन श्रोत्रादिसंयमं कुर्वन्ति । तत्पूजात्वेन विषयान् भुञ्जते ॥ २५, २६ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।",
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| "text": "आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥",
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| "type": "Brahmavaivarte_id"
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| "text": "तत्पूजात्वेनेंद्रियादिसंयमं कुर्वन्ति । यज्ञेनैवेति सर्वत्राप्यन्वीयते ।",
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एव विष्णोर्यज्ञः स्यान्मानसो वा स बाह्यकः'' ॥"
| |
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| |
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| "tail": " इति ब्रह्मवैवर्ते॥ २७ ॥\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| "text": "स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥२८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेपानं तथापरे ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वेप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
| },
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| "children": [
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| "text": "यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "नायं लोकोस्त्ययज्ञस्य कुतोन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।",
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| "text": "कर्मजान्विदि्ध तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "श्रोत्रादीनित्यादिष्विज्यानुक्तेरिज्योन्य इति शङ्कां निवारयति । वितता ब्रह्मणो मुख इति । 'सर्वयज्ञैः परं ब्रह्म याज्यं विष्ण्वाख्यमव्ययम्'' । इति च ॥ ३२ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।",
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| "text": "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥",
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| "text": "सर्वं कर्माखिलम् आसमन्तादल्पं ज्ञाने परिसमाप्यते । ज्ञाने जाते पूर्यते ।",
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| "text": "'समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् सप्त मन्यसे ।'' इतिवत्समाप्तिशब्दोत्र पूर्तिवाची । ज्ञानासिनात्मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।",
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| "text": "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "text": "योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| "text": "तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानयोगो नाम चतुर्थोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये चतुर्थोध्यायः ॥",
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| |
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| {
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| "text": "आत्मवन्तं परमात्मभक्तम् ॥ ४१ ॥",
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| "tail": " "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "text": "तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -'यदृच्छालाभसन्तुष्टः'' इत्यादि सन्न्यासम् ; 'कुरु कर्म'' इत्यादि कर्मयोगं च-",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥",
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| "id": "BGT_C05_V01_B01"
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| },
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| {
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| "text": "योगसंन्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयत्यनेनाध्यायेन । योगसंन्यस्तकर्माणमित्यादौ न्यासशब्दः सर्वकर्मत्यागविषयः इत्याशङ्क्य योगसंन्यासयोर्भिन्नपुन्निष्ठत्वाभिप्रायेण पृच्छति । संन्यासमिति ॥१॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "text": "\n ",
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| "text": "श्री भगवानुवाच",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥",
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C05_V02"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V02_B01"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line"
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एकपुंयोग्यावेतौ तयोर्मध्ये योग एव विशिष्ट इति परिहाराभिप्रायः । उभौ समुच्चितौ । 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगत'' इति वक्ष्यमाणत्वात् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V03",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C05_V03"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V03_B01"
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| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वेषादिवर्जनमेव संन्यासशब्दार्थो न यत्याश्रमोत्राभिप्रेत इत्याह ज्ञेय इति । न च 'काम्यानां कर्मणां न्यासम्'' इत्यनेन विरोधः । तेनापि सहितस्य न्यासत्वात् । न च त्यागस्य पृथग्वचनाद्विरोधः । कुरुपाण्डववत् न्यासावान्तरभेदत्वात्त्यागस्य ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V04",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V04_B01"
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| },
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| {
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| "text": "बालास्तु न्यासशब्देन यत्याश्रममेव स्वीकृत्य तत्स्थानामेव साङ्ख्य-शब्दोदितज्ञानाधिकारो गृहस्थानामेव योगशब्दोदितकर्माधिकार इति मन्यन्ते । तन्न पण्डिता मन्यन्ते । कुतः ? यस्माज्ज्ञानमार्गं कर्ममार्गं च सम्यगास्थितः उभयोरपि फलं प्राप्नोति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C05_V05"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V05_B01"
| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Vyasasmruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "तस्माज्ज्ञानिनां कर्माप्यनुष्ठेयम् । कर्मिणामपि गृहस्थानां ज्ञातव्यो भगवान् । न हि ज्ञानं विना कर्मणः सम्यगनुष्ठानं भवति ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "'निष्कामं ज्ञानपूर्वं च निवृत्तमिह चोच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "निवृत्तं सेवामानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "बुद्ध्याविहिंसन् पुष्पैर्वा प्रणवेन समर्चयेत् ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "वासुदेवात्मकं ब्रह्म मूलमन्त्रेण वा यतिः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "मुक्तिरस्तीति नियमो ब्रह्मदृग्यस्य विद्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "तस्याप्यानन्दवृदि्धः स्याद्वैष्णवं कर्म कुर्वतः ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्म ब्रह्मदृशा हीनं न मुख्यमिति कीर्तितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "तस्मात्कर्मेति तत्प्राहुर्यत्कृतं ब्रह्मदर्शिना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतस्मान्न्यासिनां लोकं संयान्ति गृहिणोपि हि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानमार्गः कर्ममार्ग इति भेदस्ततो न हि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मादाश्रमभेदोयं कर्मसङ्कोचसम्भवः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति व्यासस्मृऽतेः ॥५ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| "text": "'मोक्षोपायो योग इति तद्रूपो न्यास एव तु ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विष्ण्वर्पिततया भद्रो नान्यो न्यासः कथञ्चन'' । इत्याग्नेये । विष्ण्वर्पितत्वादियोगरूपत्वं विना केवलकर्मत्यागो नरकफल एव । 'यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव'' । इति वक्ष्यमाणत्वात् । योगविशेषत्वान्न्यासस्य पृथगुक्तिः ॥६ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C05_V07",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
| |
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| "text": "योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः",
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| |
| },
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "id": "BGT_C05_V07_B01"
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| "children": [
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| "text": "सर्वभूतात्मभूतात्मेति मुख्ययोगः ।",
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| |
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| "text": "'आदानात्सर्वभूतानां विष्णुरात्मा प्रकीर्तितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "सर्वभूतात्मभूतात्मा तत्र भूतमनाः पुमान्'' ॥ इति च ॥७ ॥",
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्यन् शृृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C05_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V09_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा न्यासस्य योगरूपत्वं तथाह नैव किञ्चिदित्यादिना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'विष्णुनार्थेष्वीरितानि मन आदीनि सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वर्तन्तेन्यो न स्वतन्त्र इति जानन् हि तत्ववित्'' ॥ इति च ॥ ८, ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C05_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V13_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्पूजात्मकानि तत्कृतानि मम शुभार्थमिति ब्रह्मण्याधानम् । स्वातन्त्र्याभावापेक्षयैव जीवस्याकर्तृत्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'स्ववन्दनं यथा पित्रा कारितं शिशुकर्तृकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं पूजा विष्ण्वधीना भवेज्जीवकृतेत्यपि'' ॥ इति प्रवृत्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो मनसैव कर्मन्यासोस्वातन्त्र्यापेक्षया ॥ १०-१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V16",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C05_V17"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V17_B01"
| |
| },
| |
| "text": "यथा पितॄदत्तं पालकत्वं राजपुत्राणाम् एवं परमात्मदत्तं क्रियास्वातन्त्र्य-लक्षणं कर्तृत्वम् । क्रियानिष्पन्नधर्मादिरूपकर्मणि स्वातन्त्र्यं च जीवानामप्यस्तीत्याशङ्कां परिहरति । न कर्तृत्वमित्यादिना । क्रियायामदृष्टोत्पादने फले च स्वातन्त्र्यं लोकस्य न सृजतीश्वर इत्यर्थः । अन्यथा लोकस्येति विशेषणं व्यर्थम् । जनपदे निवसतां तद्वित्त-भोजिनामप्याधिपत्यादानान्न दत्ता जनपदा राज्ञा स्वपुत्राणामितिवत्कर्मफलादिसंयोगिनामपि तत्स्वातन्त्र्यादानान्न सृजतीति युज्यते । स्वयमेव भवति भावयति चेति स्वभावो भगवान् । स्वभावत्वात्स्वयमेव कर्तृत्वादिषु प्रवर्तते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavaraha_id"
| |
| },
| |
| "text": "'स्वातन्त्र्याद्भगवान्विष्णुः स्वभाव इति कीर्तितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्स्वातन्त्र्यं कदाप्येष नान्यस्य सृजति क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वातन्त्र्यादेव पापादिसम्बन्धः कुर्वतोपि न ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अज्ञानावृतबुदि्धत्वादीदृशं तं न जानते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महावाराहे । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'अहं सर्वस्य प्रभवः'' । 'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णामि'' ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ।'' 'न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चिनारे'' । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'' । इत्यादेर्नास्यास्वाभाविकं कर्तृत्वमकर्तृत्वं वा । विपरीतप्रमाणाभावाच्च । अनिर्वाच्यनिरासादेव च निरस्तोयं पक्षः । न च सर्वविशेषराहित्यवादिनां शून्यवादात्कश्चिद्विशेषः । न हि सर्वविशेषरहितमित्युक्ते तदस्तीति सिद्ध्यति । वाच्यत्वलक्ष्यत्वास्तित्वादीनामपि विशेषत्वात् । अन्यथास्ति ब्रह्मेत्यादीनां शब्दानामपि पर्यायत्वादयो दोषाः । व्यावर्त्यविशेषश्च व्यावृत्तविशेषनिबन्धन एव । अन्यथा वैयर्थ्यमेव स्यात् । न च सर्वशब्दावाच्यस्य लक्ष्यत्वम् । न च सर्वप्रमाणागोचरमस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । नास्तित्वं तु सप्तमरसादिवददर्शनात्सिद्ध्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वप्रकाशत्वं च न अमानं सिद्ध्यति । स्वयम्प्रकाशत्वं च ततोतिरिक्तं चेद्विशेषाङ्गीकारः । न चेत्तदेव प्रमाणगोचरम् । तत्प्रमाणाभावे परप्रकाशत्वमात्रनिरासे स्वप्रकाशत्वे प्रमाणाभावादप्रकाशत्वमेव स्यात् । अर्थतः सिदि्धरित्यर्थापत्तितः सिदि्धस्तत्प्रमाणतः सिदि्धर्वा । उभयथापि प्रमेयत्वमेव स्यात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वप्रकाशशब्देन स्वमितत्वानङ्गीकारात्परमितत्वानङ्गीकाराच्चासिदि्धरेव । प्रकाश इत्युक्तेपि स्वमन्यं वा किञ्चित्प्रकाश्यं विना न दृष्ट एव भोजनादिवत् । कर्तृकर्मविरोधश्चानुभवविरुद्धः । ज्ञानं च ज्ञेयं ज्ञातारं च विना न दृष्टम् । अतः शून्यवादान्न कश्चिद्विशेषः । अतोनन्तदोषदुष्टत्वादुपरम्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हरिः स्वभावतः कर्ता सर्वमन्यत्तदीरितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतः सा कर्तृता तस्य न कदाचिद्विनश्यति ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ १४-१७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C05_V18"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V18_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'विषमेष्वपि जीवेषु समो विष्णुः सदैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्तृणादिगतस्यापि गुणाः पूर्णा हरेः सदा'' ॥ इति च ॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V19",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C05_V20",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थिरबुदि्धरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| |
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| |
| "children": [
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| "text": "बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "text": "स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।",
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| |
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| "text": "आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
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| "text": "कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| },
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| {
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| "text": "इदानीमपि परमात्मनि स्मृऽतमात्रे सुखं विन्दतीति यत्तदा स एव सम्यगुक्तः किमु ॥ २१-२३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n \n "
| |
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| {
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| "text": "ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "योन्तः सुखोन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| |
| "text": "स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोधिगच्छति॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| },
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| {
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| "text": "ब्रह्मणि भूतः । अन्यथा पुनर्ब्रह्म गच्छतीति विरोधाच्च । अन्तस्सुखादिकं च ब्रह्मदर्शनात् ॥ २४ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "छिन्नद्वैधायतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यतेंद्रियमनोबुदि्धर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये पञ्चमोध्यायः ॥",
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| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "'अमुक्तो मुक्तसादृश्यान्मुक्त एव हि तत्त्वदृक् ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "किमु मुक्तिगतस्तस्माज्ज्ञानमेवाधिकं नरे'' ॥ इति नारदीये ॥ २७, २८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोध्यायः ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| "text": "स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥",
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| "children": [
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| "tail": "\n "
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "इत्यादेर्न यतेरप्यनग्नित्वम् । आत्मसमारोपणाच्च ॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव ।",
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| "text": "न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
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| "text": "योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "type": "Paingishruthi_id"
| |
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| "text": "सम्पूर्णोपायो योगारूढः ।",
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "'नानाजनस्य शुश्रूषा कर्मेति करवन्मितेः ।"
| |
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "योगार्थिना तु सा कार्या योगस्थेन हरौ स्थितिः ।"
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "तेनापि स्वोत्तमानां तु कार्यान्यैरखिलेष्वपि ।"
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| "tail": "शक्तितः करणीयेति विशेषोसिद्धसिद्धयोः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्तोपायस्तु सिद्धः स्यात् प्रेप्सुः साधक उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्य प्राण्युपकारेण सन्तुष्टो भवतीश्वरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सिद्धोपायेन विष्णोस्तु ध्यानव्याख्यार्चनादिकम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कार्यं नान्यत् तस्य तेन तुष्टो भवति केशवः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्तवचनान्न विरोधः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भागवते ॥३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " \n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C06_V04"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथं नानुषज्यते ? सर्वसङ्कल्पसंन्यासी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मयि सर्वणि कर्माणि'' इत्युक्तत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मदधीनमिदं ज्ञात्वा मत्संन्यासीति चोच्यते'' । इति च ॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C06_V06"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "'उद्धरेतैव संसाराज्जीवात्मानं परात्मना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुर्बन्धुः सतां नित्यं परात्मा ह्यसतामरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रसादजया भक्तया जितो यस्य वशेत्विव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वर्तते तस्य मित्रं स तदन्यस्य च शत्रुवत्'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'परमात्मा समाहितः'' इति वाक्यशेषाच्च ॥ ५, ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेंद्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C06_V08"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V08_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सर्वत्र विष्णोरुत्कर्षज्ञानं ज्ञानमितीर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्विशेषपरिज्ञानं विज्ञानमिति गीयते'' ॥ इति च ॥ ७,८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "साधुष्वपि च पापेषु समबुदि्धर्विशिष्यते॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C06_V09"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V09_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "'यस्य यत्र यथा वृत्तिर्विहिता वर्तनं तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानं वापि समत्वं तद्विषमत्वमतोन्यथा'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Naradiya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'अनिमित्तस्नेहवांस्तु सुहृज्ज्ञात्वोपकारकृत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मित्रं वधादिकृदरिर्द्वेष्यस्त्वप्रियमात्रकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उदासीनः स्नेहवतोप्यस्नेही तत्कृतानुकृत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\u003Eमध्यस्थ इति विज्ञेयः सुहृदेषु विशिष्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ॥ ९-१९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपविश्यासने युञ्ज््याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V16",
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| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| {
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| |
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| {
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| "text": "न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥",
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| |
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| |
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| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V17",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V19",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृऽता ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V20",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥",
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V20_B01"
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| |
| },
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| {
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| "text": "आत्मानं विष्णुम् । आत्मना तत्प्रसादेन (तत्प्रसादादेव) ॥ २० ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "children": [
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| "text": "सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुदि्धग्राह्यमतींद्रियम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V23",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "text": "तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C06_V24",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "संङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मनसैवेंद्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V25",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V26",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V27",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "id": "BGT_C06_V27_B01"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line"
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| {
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| "text": "ब्रह्मणि भूतम् ॥ २७ ॥",
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| "tail": " "
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "युञ्जन् एवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V29",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वभूतेषु स्थितं परमात्मानम् ॥ २९ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V31",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सर्वथा वर्तमानोपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C06_V31"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "id": "BGT_C06_V31_B01"
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| "children": [
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| "tag": "line"
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| {
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| "text": "सर्वत्र विष्णुरेक इति स्थितः ॥ ३१ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योर्जुन ।",
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| |
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| {
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| "text": "सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BGT_C06_V32_B01"
| |
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
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| "text": "अतो विष्ण्वनुवर्तिषु स्ववत् स्नेहः कर्तव्यः ॥ ३२ ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V33",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| |
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| "children": [
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| {
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥",
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C06_V34",
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| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।",
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| |
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| |
| "text": "तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥",
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| |
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| "text": "असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "वश्यात्मना तु यतता शक्योवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "type": "shloka",
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| "children": [
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| |
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| "text": "अप्राप्य योगसंसिदि्धं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अयतिः अप्रयत्नः । ''प्रयत्नाद्यतमानस्तु\" इति वाक्यशेषात् । योगशब्द-स्योपायार्थत्वेप्यत्रोपायविशेष एव ध्यानयोगादिर्विवक्षित इति न विरोधः॥ ३७ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tail": "\n "
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| |
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| "text": "त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।",
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| "text": "न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥",
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| |
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| "children": [
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| "text": "शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतदि्ध दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "तत्र तं बुदि्धसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।",
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C06_V44",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "Paramayoga_id"
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| "text": "'मोक्षोपायस्य जिज्ञासुरपि केवलपाठकात् ।",
| |
| "children": [
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| "tail": "विशिष्टः किमु तद्विद्वान् किं पुनर्यस्तदास्थितः'' ॥"
| |
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| |
| ]
| |
| }
| |
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| |
| "tail": " इति परमयोगे ॥४४ ॥\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C06_V46",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "children": [
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| "text": "तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः ।",
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| "text": "कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥४६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C06_V47",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे समाधियोगप्रपञ्चनं नाम षष्ठोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये षष्ठोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C06_V47"
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| "children": [
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| "attrs": {
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| "type": "Dattatreya_id"
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| |
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| {
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| "tail": "अन्यसामान्यविद् यो मे यश्चान्यं नेति पश्यति ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "अवरत्वदृगुदासीनो विद्वेषी चेत्यभक्तयः ।"
| |
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| {
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| "tail": "मद्भक्तोपि हि कार्यार्थं यो ध्यायेदन्यदेवताः ।"
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| {
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| "tail": "परिवारतामृते तस्मात् केवलं मदुपासकः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "वरोन्यान् मदधीनांश्च सर्वान् जानन् विशुद्धधीः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च दत्तात्रेयवचनम् ॥ ४६,४७ ॥\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n \n "
| |
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| "tag": "chapter",
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| |
| {
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| "text": "साधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः । उत्तरैस्तु षड्भिर्भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह-",
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| {
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| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V02",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C07_V03"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V03_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "children": [
| |
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
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| "text": "'अनन्तानां तु जीवानां यतन्ते केचिदेव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्त्यै तेषु च मुच्यन्ते केचिन्मुक्तेषु च स्फुटम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "केचनैव हरिं सम्यग् ब्रह्मरुद्रादयो विदुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्येषां यावता मुक्तिस्तावत् ज्ञानं हरौ परम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "'मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भागवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Sattatva_id"
| |
| },
| |
| "text": "'सर्वे मुक्ता हरौ भक्तास्तेषु ब्रह्मैव मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोः परमभक्तस्तु तस्मात् जीवघनो मतः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति सत्तत्त्वे ॥३ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुदि्धरेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C07_V05",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विदि्ध मे पराम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C07_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C07_V06"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अचेतना चेतनेति द्विविधा प्रकृतिर्मता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रिगुणाचेतना तत्र चेतना श्रीर्हरिप्रिया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते उभे विष्णुवशगे जगतः कारणे मते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पिता विष्णुः स जगतो माता श्रीर्या त्वचेतना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपादानं तु जगतः सैव विष्णुबलेरिता'' ॥ इति ॥ ४-६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C07_V07"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्तोन्यत् परतरं नास्ति । परतरस्त्वहमेवेत्यर्थः । अन्यथान्यदिति व्यर्थम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अवरा दुःखसम्बन्धाज्जीवा एव प्रकीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यनिर्दुःखरूपत्वात् परा श्रीरेकलैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दुःखासम्पीडितत्वात्तु मध्यमो वायुरुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्याधीनरूपत्वादसमाधिकसौख्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तन्त्रत्वाच्च सर्वस्य स विष्णुः परतमो मतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभावादन्तरान्यस्य त्विहैकार्थौ तरप्तमौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्याः सम्बन्धयोग्यत्वाज्जीवा अप्यवरा मताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्या जडायाः प्रकृतेरवरत्वे क्व संशयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथावरतरा ये तु विमुखाश्चेतना हरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यदुःखैकयोग्यत्वान्न ह्येतत् स्यादचेतने ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः परत(रं)मं विष्णुं यो वेत्ति स विमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तस्तु स्यात् पराभासः सुनित्यसुखभोजनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्रापि तारतम्यं स्यात् तेषु ब्रह्माधिको मतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोराधिक्यसंवित्तिः सर्वस्माज्ज्ञानमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं विविच्य तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतच्च तारतम्येन वर्तते केशवादिषु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यविज्ञान्यतो विष्णुः किञ्चिद्विज्ञानिनोपरे ॥७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "रसोहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "text": "प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥",
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V09",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "बीजं मां सर्वभूतानां विदि्ध पार्थ सनातनम् ।",
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| |
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| {
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| "text": "बुदि्धर्बुदि्धमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥",
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| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C07_V11",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।",
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| |
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| "text": "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| "id": "bhashya-BGT_C07_V11"
| |
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
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| |
| "id": "BGT_C07_V11_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "सोप्सु स्थित्वा रसयति रसनामा ततः स्मृऽतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "सूर्यचन्द्रादिषु स्थित्वा प्रभानामा प्रभासनात् ।",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदस्थः प्रणवाख्योसावात्मानं यत् प्रणौत्यतः ।",
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| |
| },
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "खे स्थितः शब्दनामासौ यच्छब्दयति केशवः ॥८ ॥ पुण्यापुण्यं गन्धयति स्वयं पुण्यो धरास्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजयत्यग्निसंस्थः (स) सन् भूतस्थो जीवनप्रदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तपस्विसंस्थस्तपति ... ... ॥९ ॥ ... व्यञ्जनाद् बीजसञ्ज्ञितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बोधनाद् बुदि्धनामासौ बुदि्धमत्सु व्यवस्थितः ॥१० ॥ नित्यपूर्णबलत्वात्तु बलकामविवर्जितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरा(जस)गजबलश्चैव स्थानेभ्योन्येष्वयोजनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतादृशबलात्मासौ बलिनां बलदः स्वयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बेति पूर्णत्ववाची स्यात् तद्रतेर्बलमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रायो हि कामिता अर्था धर्मं हन्युर्हरिः पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न धर्महानिकृत् किन्तु कामितो धर्मवृदि्धकृत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्माविरुद्धकामोतो विष्णुर्भूतेषु संस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं स सर्वतश्चान्यः स्वतन्त्रश्चैव सर्वगः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "व्यवस्थयैव सर्वेषां सर्वदा सर्वदः प्रभुः ॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "text": "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।",
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| |
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| "text": "मत्त एवेति तान्विदि्ध न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥",
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| "text": "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत एव नचान्यस्मात् तदायत्तमिदं न सः ॥ अन्यायत्तः ... ॥ १२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।",
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| "text": "मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "text": "चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।",
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| {
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| "text": "वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥",
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| |
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "children": [
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| "text": "... अचेतनया तन्मेयत्वात्तु मायया ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "लक्ष्म्या वशगया लोको विष्णुनैव विमोहितः ।",
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| |
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये तु विष्णुं प्रपद्यन्ते ते मायां (तु) तां तरन्ति हि ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लक्ष्मीः सा जडमायाया देवता ते उभे अपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्वशे ततोनन्यभक्त्या तं शरणं व्रजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यादृशी तत्र भक्तिः स्यात् तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्यभक्तिः सा ज्ञेया विष्णावेव तु सा भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषु वैष्णवत्वेन लक्ष्मीब्रह्महरादिषु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुर्याद् भक्तिं नान्यथा तु तद्वशा एव ते यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं जानंस्तमाप्नोति नान्यथा तु कथञ्चन ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पूर्णं वस्तु यतो ह्येको वासुदेवो नचापरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवंविद् दुर्लभो लोके यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ १३-१९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "children": [
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| {
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| "text": "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेन्यदेवताः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C07_V22",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥२२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C07_V23",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "children": [
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| "text": "अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "bhashya-BGT_C07_V23"
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| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "BGT_C07_V23_B01"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "... ... यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ 'विष्णुं तत् परमज्ञात्वा रमाब्रह्महरादिकान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यजन्नपि तमो घोरं नित्युदुःखं प्रयाति हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञानां तु कुले जातो यावद् विष्णोः समर्चनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुतत्त्वं च जानीयात् तावत् सेवा पृथक् कृता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्याद्यैहिकभोगाय यदि बुद्ध्वा पुनर्न तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "परिवारतामृते कुर्यादन्यदेवार्चनं क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अजानता कृतं त्यक्तं न दोषाय भविष्यति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जन्मादिप्रदमेव स्यादत्यागे पुनरेव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्षिप्रं च ज्ञापयत्येव भगवान् स्वयमेव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यदि जन्मान्तरे स्वीयो निमित्तीकृत्य कञ्चन'' ॥ इत्यादि च ।",
| |
| "tail": "\n "
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्युपसंहाराच्च तत्तत्कारणत्वात् तत्तन्नामेत्यवसीयते । ''मयि सर्वमिदं प्रोतम्\" इति भेदेनैवोपक्रमाच्च । आप्नोति विष्णुमित्येवात्मशब्दो ज्ञानिनि । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते'' इत्यादेः । 'आस्थितः स हि'' 'मां प्रपद्यते'' इत्यादिवाक्यशेषाच्च । बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । ततो मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति पूर्णमिति जानन् । 'प्रपद्यन्तेन्यदेवताः'' इत्यादिवाक्यशेषे भेददर्शनाच्च । 'देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'' इति च ॥ २०-२२ ॥ 'ज्ञात्वा परत्वं विष्णोस्तु पृथग् देवान् यजन्नरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "याति देवांस्तदज्ञात्वा तम एव प्रपद्यते ।",
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| {
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| "text": "तथापि यावदन्यैस्तु साम्यं हीनत्वमेकताम् ।",
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| |
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| {
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| "text": "न निश्चिन्वन्ति जायन्ते संसारे ते पुनः पुनः'' ॥ इति च ॥२३ ॥",
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| "text": "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।",
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| "text": "जानन्ति किञ्चित् क्रमशो रमाद्यास्तत्प्रसादतः'' ॥ इति च ॥२६ ॥",
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| "text": "सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥",
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| "tail": "जीवेश्वरादिकं द्वन्द्वम् । तद्विषयो मोहो द्वन्द्वमोहः । सम्मोहः तदाग्रहः'तदाग्रहो महामोहस्तामिस्रः क्रोध उच्यते'' । इत्युक्तत्वात् ।"
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| "tail": "विद्याज्जीवेश्वरैक्यं वा द्वन्द्वमोही स उच्यते'' ॥ इत्याग्नेये ॥२७ ॥\n "
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोध्यायः ॥",
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये सप्तमोध्यायः ॥",
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| "text": "तदिति विशेषणात् ब्रह्मेत्युक्तमन्यदेव प्रकृत्यादीनां मध्ये किञ्चित्; उपरि 'साधियज्ञं च'' इति चशब्दादधिभूतादिसहितत्वेन विष्णुज्ञानमन्यदेवेति संशयः 'किं तद् ब्रह्म'' इति प्रश्नकारणम् ॥ १,२ ॥",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V04_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Tatvaviveka_id"
| |
| },
| |
| "text": "परमाक्षरं विष्णुरेव मुख्यत इति प्रसिद्धत्वात् तथैव (परिहार इति) परिहरति । अज्ञानां तदपि ज्ञापयितुं तथैव परिहारः । पुनरहमिति नोक्तमित्याशङ्का 'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्\" इति विष्णावेव प्रयुक्तेनाव्यक्तशब्देन 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तः'' इति परिह्रियते । 'ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्'' इत्यत्र तु पृथक् प्रश्नादुपासकयोः फलतारतम्यकथनात् 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युक्ताक्षरादपि चोत्तमः इति विष्णोरुत्तमत्वकथनाच्चान्यदेवेत्यवसीयते । 'अधियज्ञोहमेव'' इति साधियज्ञमित्युक्त्या प्राप्तभेदनिवृत्त्यर्थम् । तस्यैव सर्वप्राणिदेहस्थित-रूपान्तरापेक्षया सहितत्वं युज्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'प्राणिनां देहगो विष्णुरधियज्ञ इतीरितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एव व्याप्तरूपेण ब्रह्मेति परिकीर्त्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तैस्तैरधिकयाज्यत्वाद् बृंहितत्वाच्च हेतुतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अध्यात्मं तत्स्वभावो यदधिकः परमात्मगः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुंसां सजडभावानां सर्गः कर्म हरेः स्मृऽतम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूताधिकत्वतो जीवा अधिभूतमितीरिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अधिको दैवतं विष्णुरेव यस्यास्तु सा रमा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुप्राणाधिदैवाख्या त्विति ज्ञेयमिदं नरैः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति तत्त्वविवेके ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कथंरूपोधियज्ञ इति प्रश्नस्तु 'अहमेव'' इत्युक्तत्वात् तल्लक्षणोक्त्यैव परिहृतः ॥॥ ३,४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V08_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मद्भावं मयि भावम् । सदा तद्भावभावितानामेव स्मरंस्त्यजतीति केवलतत्कालस्मरणं भवति । न चेत् स्मरतोपि समाधिस्थस्खलनवत् पूर्वकर्मानुसारिस्मृऽत्या तत्प्राप्तिरेव भवति । अपरोक्षज्ञानिनां प्रारब्धकर्मावसाने स्मरंस्त्यजतीति भवत्येव । 'प्रयाणकालेपि च मां ते विदुः'' इत्युक्तत्वात् । 'युक्तचेतसः'' इति विशेषणान्नित्यं स्मरतामेवापरोक्षज्ञानं जायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'भक्त्या ज्ञानान्निषिद्धानां त्यागान्नित्यहरिस्मृऽतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरागाद् विहितात्यागादित्येतैरेव संयुतैः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरोक्षदर्शनं विष्णोर्जायते नान्यथा क्वचित्'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ ५-८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V10_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमसः परस्तात् अप्राकृतदेहम् ॥ ९, १० ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V11"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V11_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मन आदीनां ब्रह्मणि चरणं ब्रह्मचर्यम् ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूध््नर्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V13_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकाक्षरवाच्यत्वादेकाक्षरं परं ब्रह्म ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिदि्धं परमां गताः॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V16",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V16"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V16_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Tatvaviveka_id"
| |
| },
| |
| "text": "'नियमाज्जन्मनोभावो मुक्तस्यैव तथापि तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महर्लोकमतीतानां न जन्मांशलयौ विना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्राप्यवश्यं तत् स्थानं तैः क्षिप्रं पुनराप्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ॥१६ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
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| |
| "text": "रात्रिं युगसहस्रान्तां तेहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| |
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| |
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| {
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "सहस्रमिति बह्वेव । ब्रह्मणः परब्रह्मणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके'' ॥ इति वाक्यशेषात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नहि विरिञ्चाहन्येव सर्वव्यक्तलयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'नित्यस्यापि हरेः कालो द्विपरार्धात्मकस्त्वयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहःश्चासौ(श्वासो) निमेषश्चेत्यप्रवृत्त्योपचर्यते'' ॥ इति च ॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C08_V18",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C08_V19",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "रात्र्यागमेवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "परस्तस्मात्तुभावोन्योव्यक्तोव्यक्तात्सनातनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V21",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V22",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C08_V23"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C08_V23_B01"
| |
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| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्र कालाभिमानिदेवतासु मृत्यनन्तरं प्रयाताः । अग्निर्ज्योतिर्धूमानामकालाभिमानित्वेपि कालप्राचुर्यात् काल इत्युच्यते ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V25",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V26",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V26"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V26_B01"
| |
| },
| |
| "text": "'अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधा वह्नेः पुत्रो व्यवस्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तं प्राप्य याति ब्रह्मिष्ठो दिवसाद्यभिमानिनः'' ॥ इति सत्तत्त्वे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "तत्कालमरणविवक्षायामग्निज्योतिर्धूमानामयोगः । 'अथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं गच्छत्येतौ वै सूर्याचन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति'' इति विदुषो दक्षिणायनमरणेप्यपुनरावृत्त्या ब्रह्मप्राप्तिश्रुतेः । 'विद्वान् ब्रह्म समाप्नोति यत्र तत्र मृतोपि सन्''"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च पाद्मे ॥ २४-२६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V27",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V28",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "॥२८ ॥",
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| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये अष्टमोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C08_V28"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C08_V28_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मार्गौ ब्रह्म च यः पश्येत् साक्षादेवापरोक्षतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वपुण्यातिगोमुह्यन् यात्यसौ ब्रह्म तत् परम्'' ॥ इति च ।॥ २७-२८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09",
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| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "नवमोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_I01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सप्तमाध्यायोक्तं स्पष्टयत्यस्मिन्नध्याये-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "BGT_C09_I02"
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| "children": [
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| {
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V01",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V02",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V04",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C09_V08",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| |
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| "id": "bhashya-BGT_C09_V09"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V09_B01"
| |
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "'विष्णुगान्यप्यतत्स्थानि भूतान्येष ह्यसङ्गतः'' इति च । ममात्मा मम देह एव । तदनन्यत्वात् । देहस्याचेतनत्वाशङ्कानिवृत्तये 'ममात्मा'' इत्याह ॥ ४-९ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C09_V10"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V10_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'अध्यक्षोधिपतिः प्रोक्तो यदक्षाण्यस्य चोपरि'' ।"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।॥१० ॥ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C09_V14"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V14_B01"
| |
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| |
| "text": "मानुषीं मनुष्यसदृशीम् 'तन्वा विष्णुरनन्योपि स्वाधीनत्वात् तदाश्रितः'' । इति च ।",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhavishyath_id"
| |
| },
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| "text": "'ब्रह्मरुद्ररमादीनां साम्यदृष्टिरनन्यता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "प्रादुर्भावगतस्यापि दोषदृष्टिरपूर्णता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "धर्मदेहावतारादेर्भेददृष्टिश्च सङ्करः ।"
| |
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| |
| {
| |
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| |
| "tail": "अवतारेष्विति ज्ञेयमवज्ञानं जनार्दने ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वं मोघं शुभं तस्य योवजानाति केशवम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अवरं याति च तमः प्रादुर्भावगतोप्यतः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञेयः केवलचिद्देहो विदोषः पूर्णसद्गुणः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च भविष्यत्पर्वणि ॥ ११-१४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "text": "एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "id": "BGT_C09_V15_B01"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "'एकमूर्तिश्चतुर्मूर्तिरथवा पञ्चमूर्तिकः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "द्वादशादिप्रभेदो वा पूज्यते सज्जनैर्हरिः'' ॥ इति च ॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V16",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| {
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।",
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| {
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| "text": "वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥",
| |
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| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V18",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।",
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| |
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| {
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| |
| "text": "प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥",
| |
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| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "attrs": {
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| "tail": "याज्यत्वात् स यजुर्यज्ञः सार्वज्ञ्यात् पुरुषोत्तमः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "'क्रतुः कृतिस्वरूपत्वात् स्वधानन्यधृतो यतः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "मानात् त्रातीति मन्त्रोयमुष्टानां निधिरौषधम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आ ज्यायस्त्वादाज्यनामा दर्भोदरधरो यतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अहूतत्वाद्धुतं चायमग्निर्नेतागतेर्यतः'' ॥ इत्यादि च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'तत्तत्पदार्थभिन्नोपि तत्तन्नामैवमच्युतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वात् गुणानन्त्याच्च केवलम्'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'ओमित्याक्रियते यस्मादोङ्कारो भगवान् (हरिः) परः'' इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'पातीति पिता मानान्माता यत् स पितुर्महान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पितामहो निधातृत्वान्निधानं भीतरक्षणात् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरणं व्यञ्जनाच्चैव बीजमित्युच्यते प्रभुः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रलयकाले संहर्तृत्वात् प्रलयः । अन्यदापीति मृत्युः'प्राणगः प्राणधर्ता यदमृतं प्रविलापयन् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "विश्वं प्रलय इत्युक्तो मृत्युरन्यत्र मारणात्'' ॥ इति च ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br"
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| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "Shabdanirnaya_id"
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| {
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| "tail": "यतोतोसदिति प्रोक्तं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्'' ॥"
| |
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| |
| ]
| |
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| |
| ],
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| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "॥ १६-१९ ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं अश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥ २० ॥\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "type": "shloka",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना",
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| "tail": "\n "
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| "text": "गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
| },
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| "text": "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।",
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| },
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| {
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| "text": "तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| },
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| "children": [
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| "text": "येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।",
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| "text": "तेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V22_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "'अनन्यदेवतायागाद् भक्त्युद्रेकादकामनात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सदा योगाच्च वैशिष्ट्यं त्रैविद्याद् वैष्णवादपि ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्यादि्ध भागवतस्यैव तेन ब्रह्मादयोखिलाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरपि केशवयाजिनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैष्णवा इति बुद्ध्यैव मानयन्त्यन्यदेवताः ॥'' इत्याग्नेये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सम्यग्गुणगणज्ञानादुपासा पर्युपासना'' । इति च ॥ २०-२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोपि माम् ॥॥ २५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "text": "तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| "text": "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V27",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "bhashya-BGT_C09_V27"
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मामिष्ट्वा प्रार्थयन्त इत्युक्तत्वाज्जानन्तोपि नाभिजानन्ति तत्त्वेन ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'सर्वदेववरत्वेन यो न जानाति केशवम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्य पुण्यानि मोघानि याति चान्धं तमो ध्रुवम्'' ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'मोघाशा मोघकर्माणः'' इत्युक्तत्वाच्च न केवलाज्ञविषयं मिथ्याज्ञानिविषयं वा 'च्यवन्ति ते'' इत्यादि । अतः सर्वाधिक्यं विष्णोर्ज्ञात्वापि ब्रह्मादीनां तत्परिवारत्वादिकमजानतामिदं फलम् ॥ २४-२८ ॥",
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| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C09_V28",
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| "children": [
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| "text": "समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।",
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| "text": "ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "children": [
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| "text": "'नास्य भक्तोपि यो द्वेष्यो नचाभक्तोपि यः प्रियः ।",
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| "tail": "किन्तु भक्त्यनुसारेण फलदोतः समो हरिः''"
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| "tail": " इति पाद्मे ।"
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| "tag": "br",
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| "tail": "प्रीत्या मयि ते ॥२९ ॥"
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V29",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।",
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C09_V30",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "children": [
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| {
| |
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| |
| "text": "क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥",
| |
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V31",
| |
| "type": "shloka",
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| |
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| |
| "children": [
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| "text": "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "text": "किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V33",
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| "type": "shloka",
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| |
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज्यगुह्ययोगो नाम नवमोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये नवमोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C09_V33"
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| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C09_V33_B01"
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'पापादिकारिताश्चैव पुंसां स्वाभाविका अपि ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विप्रत्वाद्यास्तत्र पुण्याः स्वाभाव्या एव मुक्तिगाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यान्ति स्त्रीत्वं पुमांसोपि पापतः कामतोपि वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न स्त्रियो यान्ति पुंस्त्वं तु स्वभावादेव याः स्त्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुंसा सहैव पुन्देहस्थितिः स्याद् वरदानतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तज्जन्मनि वराः पापजाताभ्यो निजसत्स्त्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेषामपि जीवानामन्त्यदेहो यथा निजः। मुक्तौ च निजभावः स्यात् कर्मभोगान्ततोपि वा'' इति भविष्यत्पर्ववचनात् पापयोनयः पुण्या इति विशेषणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "॥ ३२-३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "chapter",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C10_I01"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "uvaaca",
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| "text": "श्री भगवानुवाच",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "children": [
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| {
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| "text": "भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यत्तेहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V02",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C10_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V02_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपलक्षणार्थं सुरगणा इत्यादि ॥ १,२ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V03_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अनस्यापि आदिः अनादिः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुदि्धर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखं दुःखं भवोभावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोयशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V05"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V05_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'बुदि्धर्बोधनिधित्वात् तदन्तःकरणमुच्यते'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "॥ ४-५ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V06_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahme_id"
| |
| },
| |
| "text": "'मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वसिष्ठश्च महातेजाः पूर्वे सप्तर्षयः स्मृऽताः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्राह्मे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavishnupurana_id"
| |
| },
| |
| "text": "'मनवो बोधवैशेष्याद् देवा ब्रह्मादयः स्मृऽताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "विप्रादिवर्णभेदेन चत्वारो बहवोपि ते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दीनत्वाद् देवनामानस्त्वन्ये ब्रह्मादिनामकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अवैष्णवकृतो यज्ञो दीनैर्देवैस्तु भुज्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वैष्णवैस्तु कृतो यज्ञो देवैर्हि मनुनामकैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मरीच्याद्यास्तु तत्पुत्रा मानवा नामतः स्मृऽताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्पुत्रपौत्रा मुनयस्तथा मानवमानवाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेभ्यो मनुष्या इत्येषा सृष्टिर्विष्णोः समुत्थिता'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ॥॥ ६ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V07_B01"
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
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| {
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| "text": "'युज्यते येन योगोसावुपायः शक्तिरेव वा'' । इति च । विशिष्टभवनं विभूतिः । महत्त्वम् । विविधभवनं वा । योगः सामर्थ्यम् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "text": "इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V10",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ददामि बुदि्धयोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V11",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V11"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V11_B01"
| |
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| "children": [
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| },
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| {
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| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "मद्गतप्राणाः मद्विषयचेष्टाः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V12",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥",
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V13",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
| |
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| "text": "आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V14",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V15",
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V16",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केषु केषु च भावेषु चिन्त्योसि भगवन्मया॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेमृतम्॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V19",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V20",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V21",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V22",
| |
| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
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| |
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| "text": "पुरोधसां च मुख्यं मां विदि्ध पार्थ बृहस्पतिम् ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V25",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।",
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| "text": "यज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V26",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "tag": "line",
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| "text": "गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
| "tail": "\n "
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V27",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्चैःश्रवसमश्वानां विदि्ध माममृतोद्भवम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V28",
| |
| "type": "shloka",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C10_V29",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V30",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृगाणां च मृगेन्द्रोहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V31",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V32",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V33",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V34",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृत्युः सर्वहरश्चाहं उद्भवश्च भविष्यताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृऽतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V35",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मासानां मार्गशीर्षोहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V36",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जयोस्मि व्यवसायोस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V37",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वृष्णीनां वासुदेवोस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V38",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V39",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V40",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C10_V40"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C10_V40_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'येषां विष्णुस्वरूपाणां सन्निधेरन्यवस्तुषु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशिष्टत्वं स्वजातेः स्याद् विभूत्याख्यानि तानि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मनामा ब्रह्मगतः सर्वदैवतसञ्चयात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आधिक्यहेतुर्भगवान् सामस्थः सामनामकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आधिक्यहेतुर्वेदेभ्यस्तथाश्वत्थस्थितो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्कर्षहेतुर्वृक्षेभ्यो य एवाश्वत्थनामकः'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'केषु केषु च भावेषु'' इत्युक्तत्वाच्च ब्रह्मादिजीवेभ्योन्यदेव विभूतिरूपम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'द्विविधं वैभवं रूपं प्रत्यक्षं च तिरोहितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कपिलव्यासकृष्णाद्यं प्रत्यक्षं वैभवं स्मृऽतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नं ब्रह्मादिजीवेभ्यो जडेभ्यश्चापि तद्गतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वजात्याधिक्यदं तेषां तत् तिरोहितवैभवम्'' ॥ इत्यादि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'आत्माततगुणत्वेन रवज्ञेयो यतो रविः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदवन्मेघचलनान्मरीचिः साम साम्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखात् सुखत्वात्तु शशी वेदो वेदनतो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वासवर्ती वासवोसौ चेतोनेता तु चेतना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पालकैर्वननीयत्वात् पवनो बोधनान्मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पावकः शोधनान्मेरुरीरो यन्मास्य सागरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सारस्य गरणात् स्कन्दो जगतः स्कन्दनाद् भृगुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भर्जनाज्जपयज्ञश्च जातपो याज्य एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्वाकारस्थितोश्वत्थ ऐरा श्रीश्च तदाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐरावतो नराणां यद् दद्यात् सर्वं स नारदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ह्रीश्रीसमाश्रयत्वाच्च हिमालय इतीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वर्ज्यत्वादरिभिर्वज्रो वैनतेयो नतास्पदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वासुकिर्वाससुखदः कन्दर्पः सुखभेदपः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्यमा ज्ञेयमातृत्वात् काल आकालनादपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वरुणो वरणाद् द्वन्द्वो द्विरूपोन्तर्बहिर्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मकरो मानकर्तृत्वाद् यमः संयमनाद् विभुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रह्लादः स महानन्दो मृगेन्द्रो मृगयत्पतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जाह्नवी जहतां स्थानमध्यात्मं चात्मनां पतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्या ज्ञप्तिस्वरूपत्वाद् वादो वाच्यत्वतो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कीर्त्यो वक्ताश्रयः कीर्तिर्वाक् श्रीरिति च नामतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्मरणीयः स्मृऽतिर्मेधा क्षमारूपस्तथेर्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यूतं क्रीडापरत्वाच्च गायत्री त्राति गायकान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्त्वं साधुगुणत्वाच्च दण्डनाद्दण्ड उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहत्सारोप्यमेयश्च बृहत्सामोशनोशतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुभाशुभज्ञानकरः कुसुमाकर ईरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानं ज्ञानात्मतो मौनं मुनीड््यो नीतिरानयन् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मार्गाणामन्तगत्वात्तु मार्गशीर्षः प्रकीर्तितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुखं पिबन् लीलयैव कपिलो व्यास एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशिष्टत्वाद् विष्णुनामा विशिष्टप्राणसौख्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं नानागुणैर्विष्णुर्नानानामभिरीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानाप्राण्यादिसंस्थश्च विभूतिरिति शब्दितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शश्यादिषु विजातीयस्वाम्यदः सारदः क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शर्वादिषु सजातीयश्रैष्ठ्यदत्वेन संस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्रोशनार्जुनाद्येषु सजातीयैकदेशतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवेष्वभ्यधिको ब्रह्मा यतो विष्णोरनन्तरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कवित्वादिगुणेष्वेवं यत्समो नास्ति कश्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा भीमश्च पार्थेषु ज्ञानं यज्ञेषु चोत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुदर्शनश्चायुधेषु वेदेष्वृग्वेद एव च'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्वचित् साम्न आधिक्यमभिमान्यपेक्षया 'ऋचः श्रीर्गीरुमाद्याश्च साम्नः प्राणशिवादयः'' इत्याद्यभिमानिभेदात् । तत्रापि यथायोग्यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "॥ २१-४० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।",
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| "text": "तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्॥४१ ॥",
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| "text": "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।",
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| "text": "विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥",
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोध्यायः ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये दशमोध्यायः ॥",
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| {
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| {
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| "text": "'किं ज्ञातेन'' इति वक्ष्यमाणस्याधिकफलत्वज्ञापकमेव । अन्यथोक्तेरेव वैयर्थ्यात् ।",
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| {
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| "text": "'अन्याधिक्यज्ञापनार्थं शुभं चाक्षिप्यते क्वचित् ।",
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| "text": "न तावतास्य निन्द्यत्वं ज्ञेयैवान्यवरिष्ठता ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "उभयं मिलितं चैव ततोप्यधिकशोभनम्'' ॥ इति च ॥४२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।",
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| "text": "यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोयं विगतो मम॥१ ॥",
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| "text": "त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥",
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| "children": [
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| "text": "पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।",
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| "text": "बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥",
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| "text": "दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥",
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| |
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| }
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| "tail": "\n "
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| "id": "BGT_C11_V12",
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| "text": "दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।",
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| "text": "यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥",
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| "text": "अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥",
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| "text": "'आत्मानमव्ययम्'' 'परमं रूपमैश्वरम्'' 'सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतो-मुखम्'' इत्यादिरूपविशेषणाच्च रूपस्येश्वरसाक्षात्स्वरूपत्वं नित्यत्वं तत एव चिदानन्दाद्यात्मकत्वं च सिद्धम् । 'मम देहे'' इत्युक्तत्वाच्चादित्यादीनां भेदः सिद्धः । 'मे रूपाणि'' 'सर्वतोनन्तरूपम्'' इत्यादेः 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इत्यादेश्चैकस्यैवाभिन्नानन्तरूपत्वं च ।",
| |
| "children": [
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "tail": "विशेषोपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहक एव च ।"
| |
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| "tail": "द्रव्यात्मना स नित्योपि विशेषात्मैव जायते ।"
| |
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| "tail": "नित्या एव विशेषाश्च केचिदेवं द्विधैव सः ।"
| |
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| "tail": "वस्तुस्वरूपमस्त्येवेत्येवमादिष्वभेदिनः ।"
| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "विशेषोनुभवादेव ज्ञायते सर्ववस्तुषु ।"
| |
| },
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| |
| "tag": "br",
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| "tail": "नचाविशेषितं किञ्चिद् वाच्यं लक्ष्यं तथा मितम् ।"
| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "विशिष्टस्य स्वतोन्यत्वे स्वस्यामेयत्वहेतुतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "नैव ज्ञेयं विशिष्टं च मानाभावाच्च नो भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "स्वयमित्यपि हि स्वत्वविशेषेण विवर्जितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "न ज्ञेयं तद्विशेष्यं च तथैवेत्यनवस्थितिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "अभेदे न विरोधोस्ति ज्ञाताज्ञातं यतोखिलम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "तदेव ज्ञातरूपेण ज्ञातमज्ञातमन्यथा ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अभिन्नस्य विशिष्टत्वान्न दोषद्वयमप्युत ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "एकत्वानुभवाच्चैव विशेषानुभवादपि ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "तज्ज्ञानानुभवाच्चैव न दोषद्वयसम्भवः ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भेदाभेदौ च तेनैव (तौ नैव) कर्तृभोक्तृविशेषणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "मदन्य इत्यनुभवो यतो नैवास्ति कस्यचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "भेदो विशेषणस्यापि नान्तरस्य क्वचिद् भवेत् ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "शुद्धस्वरूप इत्यादावभेदस्यैव दर्शनात् ।"
| |
| },
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| |
| "tag": "br",
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| "tail": "अपृथग्दृष्टिनियमाद् बलज्ञानादिकस्य च ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "ऐक्यं बाह्यविशेषाणां पृथग्दृष्ट्यैव तन्न तु ।"
| |
| },
| |
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| "tail": "विशेषहेत्वभावेपि द्वैविध्यं कल्प्यते यदि ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "कल्पनागौरवाद्यास्तु दोषास्तत्रातिसङ्गताः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "नैकत्वं वापि नानात्वं नियमादस्त्यचेतने ।"
| |
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| "tail": "भेदाभेदावनुभवादतस्तत्रान्यथागतेः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "एको मदन्यतोन्यश्चेत्येवमेव व्यवस्थितौ ।"
| |
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| "tail": "भेदाभेदौ चेतनेषु तस्मान्नैकप्रकारता ।"
| |
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| "tail": "एकमित्येव यज्ज्ञातं बहुत्वेनैव तत् पुनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "पटाद्यं ज्ञायते यस्माद् भेदाभेदौ कुतो न तत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तन्तुभ्योन्यः पटः साक्षात् कस्य दृष्टिपथं गतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "अनन्यश्चेत् तन्तुभावे पटाभावः कुतो भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "न चात्मनि विशेषोत्र दृष्टान्तत्वं गमिष्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "शुद्धोहम्प्रत्ययो यस्मात् तत्राभेदप्रदर्शकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "अत्रावयवभेदेन स्यादेव ह्यनवस्थितिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न चानवयवं वस्तु क्वचित् स्यान्मानगोचरम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "पूर्वापरादिभेदेन यतोंशोस्यावगम्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "उपाधिरप्येकदेशसम्बद्धः सन्तमेव हि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञापयेद् भेदमखिलं ग्रसन् स विभजेत् कथम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्माद् गुणादिकमपि नास्त्यनंशतया क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "भावाभावव्यवहृतेर्विद्यमानेपि वस्तुनि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "tail": "भेदाभेदौ गुणादेश्च जडे वस्तुनि संस्थितौ ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "चेतने शक्तिरूपेण गुणादेर्भाव इष्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "सुप्तोयं बलवान् विद्वानित्यादिव्यवहारतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "tail": "नचैवं शक्तिरूपेण जडे व्यवहृतिः क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकमेवाद्वितीयं तन्नेह नानास्ति किञ्चन ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| "tail": "एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादिश्रुतिमानाच्च परमैश्वर्यतस्तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वं तु घटते विष्णौ यत् कल्याणगुणात्मकम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादि ब्रह्मतर्के ।"
| |
| },
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "id": "bhashya-BGT_C11_V20"
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यावापृथिव्योरन्तरमेकेनैव रूपेण व्याप्तम् । 'नान्तं न मध्यम्'' इत्युक्त-त्वात् पुनः 'अनादिमध्यान्तम्'' इति गुणानन्त्यापेक्षया । 'त्वया ततं विश्वमनन्तरूप'' इति कालापेक्षया । स्वयमन्तं विद्यमानमपि न पश्यतीत्याशङ्क्य 'त्वया ततं विश्वम्'' इत्याह । अन्यत् तात्पर्यज्ञापनायाभ्यासरूपम् । 'सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः'' इति 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'' इत्यादिषु सर्वशब्दव्याख्यानरूपम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "text": "'त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरर्जुनाय प्रदर्शितम् ।",
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| |
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| |
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| "text": "दृष्टं विष्णोर्विश्वरूपं स्वयोग्यत्वानुरूपतः ।",
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| |
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| {
| |
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| |
| "text": "प्रायः सहैव पार्थेन प्रायो भीताश्च तेखिलाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
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| |
| "text": "दर्शनाभ्यासतो दृष्टिरानन्दोद्रेकता भवेत् ।",
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "तस्मिन् काले तु भूमेश्च भारहारार्थमुद्यमात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उग्रत्वमिव सर्वत्र न भीतिर्ब्रह्मदर्शिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्जुनादधिका ये तु तेषां भीतिर्न चाभवत् ।",
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "श्रीब्रह्मरुद्रपूर्वाणां कृष्णाया भीमरामयोः'' ॥ इत्याग्नेयवचनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादि युज्यते ॥ १९,२० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥",
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| "text": "गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥",
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| "text": "बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३ ॥",
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| "text": "दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥",
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| "text": "दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।",
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| "text": "दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥",
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| "text": "अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।",
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| "text": "भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥",
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| "text": "केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥",
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| "text": "यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।",
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| "text": "तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥",
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| "text": "यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।",
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| "text": "तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥",
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| |
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| "text": "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।",
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| "text": "विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥",
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| |
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| "text": "मुक्ताः सुरसङ्घा विशन्ति । 'प्रवेशो निर्गमश्चैव मुक्तानां स्वेच्छया भवेत्'' । इति हि ब्रह्माण्डे ॥ २१-२५ ॥"
| |
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "अन्यचेष्टां कुर्वतामपि भगवच्चेष्टयैव प्रलये प्रजानां प्रवेशवत् प्रवेशो युज्यते । सेनामध्यतो भगवन्मुखानामुभयाभिमुखत्वाच्चोभे सेने तत्र प्रविशतः । ये तु तस्मिन्नेव मुहूर्ते मरिष्यन्ति तेषां दशनान्तरेषु चूर्णितमपि शिरः सूक्ष्मदृष्टिगोचरत्वान्मानुषदृष्ट्या तथा न दृश्यते । यथा भिन्नमपि घटादिकं यावत् पृथङ्ग् न पतति तावन्मन्ददृष्टीनां न ज्ञायते । यथा पुरूरवसो जराश्विभ्यामेव दृष्टा ॥ २६-३० ॥"
| |
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| |
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| "text": "विशेषगुणकर्मविषय एव प्रश्नः । 'विष्णो'' इति सम्बोधनात् ॥ ३१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।",
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| "text": "ऋतेपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥",
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| |
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| |
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| "text": "जयद्रथस्य पितुर्वरादेव विशेषः । निहताः निहतप्राया । पश्चादर्जुनेपि स्थित्वा स एव हनिष्यति ॥ ३४ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V35",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| "text": "सञ्जय उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V36",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V37",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V38",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V39",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C11_V39"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V39_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "वायुर्बलज्ञानयोगात् शशाङ्कोतिसुखाङ्कितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रः स परमैश्वर्यादिति नानाभिधो हरिः । इति च ॥३९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V40",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥ ४० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V41",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V42",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकोथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C11_V42"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V42_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकः सर्वोत्तमोप्यसत्कृतः । 'एकः सर्वाधिको ज्ञेय एष एव करोति यत्'' इति च ॥ ४२ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V43",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V44",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V45",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V46",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C11_V46"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V46_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनैव रूपेण भवेति अनन्तरूपगोपनेन तदेव प्रकाशयेत्यर्थः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'पञ्चाननं चिन्त्यमचिन्त्यरूपं पद्मासनं गोपितविश्वरूपम्'' ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति हि वैहायससंहितायाम् ॥४६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V47",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C11_V47"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V47_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'विश्वनामा स भगवान् यतः पूर्णगुणः प्रभुः'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmanda_id"
| |
| },
| |
| "text": "'त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्'' इत्यनेन तेनैवेन्द्रशरीरेण दृष्टमिति ज्ञायते । त्वदन्येनेति तदवरापेक्षया । तैरपि तद्वन्न दृष्टमित्येव ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'विश्वरूपं प्रथमतो ब्रह्मापश्यच्चतुर्मुखः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तच्छतांशेन रुद्रस्तु तच्छतांशेन वासवः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथेन्द्रेण पुरा दृष्टमपश्यत् सोर्जुनोपि सन् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदन्ये क्रमयोगेन तच्छतांशादिदर्शिनः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्माण्डे ॥४७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V48",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C11_V48"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V48_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदादिभिरपि त्वदवरेणैवं द्रष्टुमशक्यः । अन्यथा 'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादिविरोधः ॥ ४८ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V49",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V50",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "सञ्जय उवाच",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C11_V50"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्ववत् क्रियत इति स्वकं रूपम् । विश्वरूपमज्ञानां स्वरूपवन्न दर्शयति । एतदज्ञानामपि तथैव दर्शयतीति विशेषः । अन्यथा 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इति विरुद्धं स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'परावरविभेदस्तु मुग्धदृष्टिमपेक्ष्य तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रादुर्भावस्वरूपाणां विश्वरूपस्य च प्रभोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यथा न विशेषोस्ति व्यक्तिर्ह्यज्ञव्यपेक्षया'' ॥ इति च ॥५० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V51",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "uvaaca",
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V51_B01"
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| {
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "किञ्चित् मनुष्यवद् दृश्यमानत्वात् मानुषम् ॥ ५१ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V52",
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये एकादशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C11_V52"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V52_B01"
| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ये दर्शनकाङ्क्षिणस्तैरपीदानीं दृष्टप्रायः ॥ ५२ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V53",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C11_V54",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C11_V55",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोध्यायः ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "द्वादशोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "id": "BGT_C12_I01"
| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "अव्यक्तोपासनाद् भगवदुपासनस्योत्तमत्वं प्रदर्श्य तदुपायं प्रदर्शयत्यस्मिन्नध्याये-",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C12_V01",
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| "type": "shloka",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "id": "BGT_C12_V01_B01"
| |
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "साधननिर्णयोत्र ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रिये जातः श्रिय आ निरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति । श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ'' 'उपासिता मुक्तिदा सद्य एव ह्यस्येशाना जगतो विष्णुपत्नी । या श्रीर्लक्ष्मीरौपला चाम्बिकेति ह्रीश्चेत्युक्ता संविदग््रया सुविद्या'' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'श्रीः सुतुष्टा हरेस्तोषं गमयेत् क्षिप्रमेव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतुष्टा तदतुष्टिं च तस्माद् ध्येयैव सा सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः कूटस्थं चाक्षरं च ताम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रधानमिति च प्राहुर्महापुरुष इत्यपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तां ब्रह्म महदित्याहुः परं जीवं परां चितिम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्यास्तु परमो विष्णुः यो ब्रह्म परमं महत्'' ॥ इति ब्रह्माण्डवचनाच्चाव्यक्तोपासनान्मोक्षाशङ्कया पृच्छति । 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युत्तरवचनात् 'कूटस्थमचलम्'' इत्यत्राप्युक्तेरव्यक्तशब्दश्चित्प्रकृतिवाची । अन्यथा 'ये त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरम्, तेषां के योगवित्तमाः'' इति भेदेन प्रश्नानुपपत्तिः । 'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्'' इति तेनैवोक्तत्वात् । ये तु 'ते मे युक्ततमा मताः'' 'मय्येव मन आधत्स्व'' इत्यादौ भगवतोक्तेप्यव्यक्तोपासकानामाधिक्यं वदन्ति ते त्वपलापकत्वादेवाति-साहसिका इति सुशोच्या एव ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C12_V02",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V03",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C12_V04",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
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| "text": "सन्नियम्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C12_V04"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C12_V04_B01"
| |
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Paramashruthi_id"
| |
| },
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| "text": "'अविष्णुज्ञैरतद्भक्तैस्तदुपासाविवर्जितैः ।",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शपेदुपासिताप्येषा श्रीस्तांस्तद्धरितत्त्ववित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्भक्तस्तमुपास्यैव श्रियं ध्यायीत नित्यदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेन तुष्टा तु साच्छिद्रं दद्याद् विष्णोरुपासनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततस्तद्दर्शनान्मुक्तिं यात्यसौ नात्र संशयः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथापि सर्वपरमां सर्वदोषविवर्जिताम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "tail": "ज्ञात्वा श्रियं तत्परमं तत्पतिं पुरुषोत्तमम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विज्ञायोपासते नित्यं ते हि युक्ततमा मताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यतः क्लेशोधिकस्तेषां पृथक् श्रियमुपासताम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुना सहिता ध्याता सापि तुष्टिं परां व्रजेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यथा तु पुनर्विष्णोः श्रीपतित्वेन चिन्तनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अच्छिद्रमेव कर्तव्यमिति मुक्तिश्चिराद् भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मादक्लेशतो मुक्तिः क्षिप्रं विष्णुमुपासताम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति परमश्रुतिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "युक्ततमाः साधकतमाः ॥२ ॥ 'न चलेत् स्वात् पदाद् यस्मादचला श्रीस्ततो मता'' । इत्याग्नेये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "type": "Naradiya_id"
| |
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| |
| "text": "'सूक्ष्मत्वादप्रसिद्धत्वाद् गुणबाहुल्यतस्तथा ।",
| |
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अनिर्देश्यौ तथाव्यक्तावचिन्त्यौ श्रीश्च माधवः'' ॥"
| |
| }
| |
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारदीये ॥३ ॥\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "text": "क्लेशोधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "attrs": {
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| "text": "ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "line",
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| "text": "भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "मय्येव मन आधत्स्व मयि बुदि्धं निवेशय ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C12_V09",
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| "children": [
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| "text": "अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V10",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अभ्यासेप्यसमर्थोसि मत्कर्मपरमो भव ।",
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| |
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| "text": "मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिदि्धमवाप्स्यसि॥१० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "अथैतदप्यशक्तोसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।",
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| "text": "सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥",
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।",
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| "text": "ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥",
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| "children": [
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| "id": "BGT_C12_V12_B01"
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| "attrs": {
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| "type": "Shanthirmukti_id"
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| },
| |
| "text": "'अन्तवत्तु फलं तेषाम्'' इत्यादिनान्यदेवोपासनायाः पूर्वमेव निन्दितत्वात् लक्ष्म्यास्त्वतिसामीप्याद् विशेषमाशङ्क्य तदुपासनाविषय एव प्रश्नः कृतः ।",
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| "children": [
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| |
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| "tail": "जपार्चामार्जनादीनि स्वाश्रमोक्तानि यानि च ।"
| |
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| "tail": "स तत्कर्मेति विज्ञेयो योन्यदेवादिपूजनम् ।"
| |
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| "tail": "कृत्वा हरावर्पयति स तु तद्योगमात्रवान् ।"
| |
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| "tail": "तत्र पूर्वोविशिष्टः स्यादादिमध्यान्ततः स्मृऽतेः ।"
| |
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| "tail": "मनसा वर्ततेन्योपि यथाशक्ति हरिस्मृऽतेः ।"
| |
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| "tail": "पूर्वोक्तयोग्यो भवति यदि नित्यं तदिच्छति ।"
| |
| },
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| "tail": "असम्यग्ज्ञानिनो ध्यानाज्ज्ञानमेव विशिष्यते ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "ज्ञात्वा ध्यानं ततस्तस्मात् तत् फलेच्छाविवर्जितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्माज्ज्ञानाद् भवेन्मुक्तिस्त्यागाद्ध्यानयुतात् स्फुटम्'' इति च ।"
| |
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| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": " शान्तिर्मुक्तिः ॥ ४-१२ ॥ "
| |
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C12_V17",
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| "text": "शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C12_V18",
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| "text": "शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V19",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C12_V19"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V19_B01"
| |
| },
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| "text": "अवैष्णवसर्वारम्भपरित्यागी । सर्वारम्भाभिमानत्यागेन फलत्यागेन भगवति समर्पणरूपेण च त्यागी । 'सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः'' 'मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा'' ॥ इत्यादेः ॥ 'भक्तिं ज्ञानं च वैराग्यमृते यो नेच्छति क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शुभाशुभपरित्यागी विद्वद्भिः कीर्तितो हि सः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'प्रायः सुखादिषु समः प्रायो हर्षादिवर्जितः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथोच्यते यथाल्पस्वो निःस्व इत्युच्यते बुधैः ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न हि मुख्यतया साम्यं कस्यचित् सुखदुःखयोः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "न च हर्षादिसन्त्यागो यावन्मुक्तिः कुतश्चन'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br"
| |
| },
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'हृतिर्मदादधर्माय हर्षो नाम प्रकीर्तितः'' । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति शब्दनिर्णये ॥१६-१९॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V20",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेतीव मे प्रियाः॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नम द्वादशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये द्वादशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C12_V20"
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| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C12_V20_B01"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यस्तेन प्रियाः समस्तेनातीव प्रियाः । भक्तिस्तु व्यस्तेप्युक्तैव । यस्मान्नोद्विजते इत्यत्रापि स चेत्यनेन भक्तिरनुषज्यते । धर्मसाधनं धर्म्यं तदेवामृतसाधनममृतं धर्म्यामृतम् ॥ २० ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n \n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "chapter",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13",
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| "type": "adhyaya",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "त्रयोदशोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "introduction",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_I01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वोक्तज्ञानज्ञेयक्षेत्रपुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन ।सर्वार्थसङ्क्षेपोयम् ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BGT_C13_V01",
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| "type": "shloka",
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| |
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| "children": [
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C13_V02",
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| {
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| "tag": "uvaaca",
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥",
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_V03",
| |
| "type": "shloka",
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| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V04",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V04_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
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| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Narayanashruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'हिंसाहेतुश्च जीवस्य परेण प्रेर्यते च यत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अव्यक्तादि शरीरं तत् तत्क्षेत्रं क्षीयतेत्र यत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं देहो व्याप्तिश्च चेतसः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्विकारा इति ज्ञेयाश्चिद्रूपेच्छादिमिश्रिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विकारेच्छादिनिर्मुक्तश्चिन्मात्रेच्छादिसंयुतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्त इत्युच्यते जीवो मुक्तिश्च द्विविधा मता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चिन्मात्रद्वेषदुःखे च देहो मिथ्यादृगात्मकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "निषिद्धेच्छा च यत्र स्युर्नित्या सा मुक्तिरासुरी ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चिन्मात्रा वैष्णवी भक्तिर्देहः सम्यग्दृगात्मकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सुखमिच्छानुकूला च धृतिर्दैवी तु सा मता'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति नारायणश्रुतिः ॥२ ॥ 'क्षेत्रज्ञो भगवान् विष्णुर्नह्यन्यः क्षेत्रमञ्जसा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेत्त्यसौ भगवान् ज्ञेयो व्यक्ताव्यक्तविलक्षणः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स तु जीवेषु सर्वेषु बहिश्चैव व्यवस्थितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विलक्षणश्च जीवेभ्यः सर्वेभ्योपि सदैव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वतः पाणिपादादिर्यतः पाण्यादिशक्तिमान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "केशादिष्वपि सर्वत्र कृष्णकेशो हि यादवः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अणोरणुतरै रूपैः पाणिपादादिसंयुतैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वत्र संस्थितत्वाद् वा सर्वतः पाणिपादवान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वेंद्रियाणां विषयान् वेत्ति सोप्राकृतेंद्रियः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यतोतोनिंद्रियः प्रोक्तो यन्न भिन्नेंद्रियोथवा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गुणैः सत्त्वादिभिर्हीनः सर्वकल्याणमूर्तिमान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यथाभावराहित्यादचरश्चर एव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'चरणात् सर्वदेशेषु व्याप्तोणुर्मध्यमस्तथा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वगत्वात् समीपे च दूरे चैवान्तरे च सः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्ताव्ययशक्तित्वात् तदन्यत्र विरोधिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सन्ति सर्वे गुणास्तत्र न च तत्र विरोधिनः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavathe_id"
| |
| },
| |
| "text": "न च जीवस्य क्षेत्रज्ञनाम- 'क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति हि भागवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतः 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्ते जीवस्यापि किञ्चिज्ज्ञानात् तत्प्राप्तेस्तन्निवारणार्थं 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध'' इत्याह । अन्यथा 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्तेनैव सिद्धत्वात् 'क्षेत्रज्ञं चापि'' इति व्यर्थम् । भेदपक्षे तु नामनिरुक्त्यर्थं 'एतद् यो वेत्ति'' इति । सर्वाभेदमपि केचिद् वदन्तीति क्षेत्रं च ज्ञश्चेति व्युत्पत्तिं निवारयति । क्षेत्रज्ञं मां सर्वक्षेत्रेषु स्थितत्वेन विद्धीत्यर्थः । तत्पक्षे तु 'यो वेत्ति'' इत्युक्ते ईश्वरस्यापि क्षेत्रज्ञत्वं सिद्धमेव । सर्वाभेदविवक्षायां च सर्वं क्षेत्र(ज्ञ)मिति वक्तव्यम् । 'सर्वक्षेत्रेषु'' इति व्यर्थम् । न च तत्पक्षे मामित्यस्य कश्चिद् विशेषः । किन्त्वेक एव क्षेत्रज्ञ (अहम्) इति वक्तव्यम् ।॥३ ॥ यतश्च यत् । यतः परमेश्वरानुमतेरिदं याति प्रवर्तते । स चानुमन्ता यः । अनुसारिणी मतिरनुमतिः प्रेरणारूपा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रेरणानुमतिः प्रोक्ता क्वचित् संवाद उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रेरकत्वात्तु भगवाननुमन्ता प्रकीतितः ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपद्रष्टानुमन्ता चेत्यनेनैवानुमतिरनुमन्ता चोक्तः । ज्ञेयं यत्तदित्यादिना 'यत्प्रभाव'' इत्यपि ॥४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_V05",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।",
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| |
| "id": "BGT_C13_V06",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "महाभूतान्यहङ्कारो बुदि्धरव्यक्तमेव च ।",
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| "text": "इंद्रियाणि दशैकं च पञ्च चेंद्रियगोचराः॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_V07",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| {
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| "text": "इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।",
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| "text": "एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| |
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| "children": [
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| |
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| |
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| |
| "text": "'सङ्घातो देह उद्दिष्टश्चित्तव्याप्तिस्तु चेतना'' । इति च ॥७ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१२ ॥",
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| |
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्त्वज्ञानविषयस्य विष्णोः । अपरोक्षदर्शनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । ज्ञायतेनेनेति ज्ञानम्, ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति व्युत्पत्त्या 'एतज्ज्ञानम्'' इति ज्ञानसाधनं ज्ञानं चोक्तम् ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ।",
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| "text": "सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "अनादीत्युक्ते स्वयं कारणं न भवतीत्याशङ्का स्यादिति तन्निवृत्त्यर्थं 'अनादिमत्'' इत्याह ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "'मुख्यतो गुणपूर्णत्वात् परं ब्रह्म जनार्दनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूर्तामूर्तव्यतीतत्वान्न सन्नैवासदुच्यते'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मूर्तं सदवगम्यत्वादज्ञेयत्वादसत् परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुंसामर्थ्यादगम्यत्वात् सर्ववेदप्रसिदि्धतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विलक्षणः सदसतोर्भगवान् विष्णुरव्ययः'' ॥ इति च ॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| "text": "सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "ज्योतिषामपि तज्जयोतिस्तमसः परमुच्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "ज्ञानेन मुक्तौ प्राप्यत्वाज्ज्ञानगम्यम् । 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ'' इति स्वज्ञेयत्वाज्ज्ञेयम् । अन्यज्ञेयत्वस्य 'ज्ञेयं यत् तत्'' इति पूर्वमेव सिद्धत्वात् । कर्तृकर्मविरोधवादिमतं निराकरोत्युत्तरज्ञेयशब्देन ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "स्ववेत्ता वेदनं च स्वं स्वेन वेद्यश्च केशवः ।",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "परस्य वेत्ता वित्तिश्च वेद्यश्च स्यात् परैः क्वचित् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "तत्प्रसादं विना कश्चिन्नै(नं)वं वेत्तुं हि शक्नुयात् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "स्ववेदनेन्यवित्तौ वा नासावन्यदपेक्षते ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "स्वप्रकाश इति प्रोक्तस्तेनैकः पुरुषोत्तमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जीवानां स्वप्रकाशत्वं तत्प्रसादात् स्ववेदनम्'' । इति च ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "मद्भावाय मयि भावाय ॥ १५-१९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "विकारांश्च गुणांश्चैव विदि्ध प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "'प्रकृतिं पुरुषं च'' इत्यत्र पुरुषशब्देन जीवपरयोः प्रकृतिशब्देन चेतना-चेतनप्रकृत्योः स्वीकाराय उभावपीति । विकाराणां सत्वादीनां चोपादानत्वविवक्षया प्रकृतिसम्भवत्वम् । स्वातन्त्र्यं तु परमेश्वरस्यैव । 'उपद्रष्टानुमन्ता च'' इत्यादिवक्ष्यमाणत्वात् । गुणानां च विकारत्वेप्यधिकविकारत्वविवक्षयान्येषां 'विकारांश्च गुणांश्च'' इति पृथगुक्तिः ॥ २० ॥",
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| |
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| "id": "BGT_C13_V21",
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| "adhikarana": ""
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V21"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V21_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'स्वदेहेंद्रियहेतुत्वं यज्जीवस्य स्वकर्मभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आवृत्य विष्णुतत्त्वं तद्धेतुश्चित्प्रकृतिर्मता ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवस्य सुखदुःखानां भोगशक्तिप्रदः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परमः पुरुषो विष्णुः सर्वकर्तापि सन् सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषकर्ता केषाञ्चिदुक्तो यद्वद् विकुण्ठपः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्यते सर्वपालोपि विशेषेण स कर्मणा'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परमेश्वरस्यैव सर्वकर्तृत्वेपि भोक्तृत्वदाने देव्या अल्पप्रवृत्तिरिति दर्शयितुं 'उच्यते'' इति स्थानद्वयेप्युक्तम् । कर्तृत्वेपि स एव मुख्यहेतुः । तथापि भोक्तृत्वापेक्षया तस्या अधिकप्रवृत्तिरिति 'कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते'' इति, सर्वहेतुत्वेपि विष्णोः प्रकृतेर्जीवं प्रति भोक्तृत्वदानेल्पप्रवृत्तिरिति 'पुरुषो भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते'' इति विशेषहेतोरेवमुच्यत एव । मुख्यतस्तु सर्वहेतुत्वं विष्णोरेवेति भावः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V22",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः॥२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C13_V23"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V23_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'पुरुषः प्रकृतिस्थः'' इत्यत्र पुरुषशब्दो जीवे । उभयोरपि पुरुषशब्देन पूर्वं प्रस्तुतत्वात् । यथायोग्यमुपपत्तेः । कार्यकारणसम्बन्धं भोगं च मिथ्येति वदतां निवारणायाह । 'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि'' इति । हीत्यनुभवविरोधं दर्शयति तेषाम् । न हि ज्ञाना-ज्ञानसुखदुःखादिविषयस्यान्तरानुभवस्य भ्रान्तित्वं क्वचिद् दृष्टम् । नचास्य मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । शरीरमारभ्यैव ह्यपरोक्षभ्रमो दृष्टः । तत्रापि बलवत्प्रमाणविरोधादेव भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । साक्षिसिद्धस्यापि भ्रान्तित्वाङ्गीकारे येन सर्वस्य भ्रान्तित्वमभ्रान्तित्वं चात्मनोवगतं तदपि प्रमाणमात्मैव । व्यवहारतोप्यस्तीत्यत्र प्रमाणाभावाद् भ्रान्तिर-भ्रान्तिर्वा न किञ्चित् सिद्ध्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुभवो भ्रान्तिः इत्युक्ते भ्रान्तित्वे प्रमाणं तत्प्रामाण्यं च कुतः सिद्ध्येत् ? व्यवहारतः सर्वमङ्गीकुर्म इत्युक्ते व्यवहारो व्यवहर्ता च कुतः सिद्धः ? प्रतीतित इत्युक्ते सैव कुतः ? स्वत इत्युक्ते स्वस्य भ्रान्तित्वे प्रतीतिं विनैव प्रतीतिरस्तीति भ्रान्तिः स्यात् । स्वाभावोपि स्यात् । स्वयमस्तीति च भ्रमः स्यात् । निरालम्बनो भ्रमो नोपपद्यत इत्यस्यापि भ्रमत्वोपपत्तेः । तत्प्रमाणमप्यप्रमाणमेव । प्रमाणत्वभ्रम इति न किञ्चित् सिद्ध्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भ्रम इत्यस्यैव भ्रमत्वे अन्यस्याभ्रमत्वमेव भवति । सुखदुःखादिविषयं ज्ञानमात्मस्वरूपमेवेति तस्य भ्रमत्वे छद्मना विनैव शून्यवादो भवति । न हि वृत्तिज्ञानविषयमज्ञानादिकं तेषामपि । भ्रमस्य चाविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । आत्मस्वरूपस्याप्यविद्याकार्यत्वं स्यात् । दुर्घटत्वं भूषणमित्युक्ते दुर्घटत्वं सुघटत्वं चोभयं भूषणमस्माकमित्युत्तरम् । न हि प्रमाणसिद्धस्य दुर्घटत्वे सुघटत्वे वापवादो दृष्टः । दुर्घटत्वं भूषणमिति वदद्भिरात्मनोप्यविद्यात्वमङ्गीकृत्य तदयुक्तमित्युक्ते तत्रापि भूषणत्वं किमिति नाङ्गीक्रियते ? अतिसुकरत्वात् । न चात्मनोप्यविद्यात्वं वदतां तेषामुत्तरम् । अतोनन्तदोषदुष्टत्वाद्धीति प्रसिद्ध्यैव भगवता निराकृताः॥ २२ ॥ अस्य जीवस्य सदसद्योनिजन्मसु कारणं सत्त्वादिगुणसङ्गः । स्वतन्त्रकारणं तु परमेश्वर एवेत्याह उपद्रष्टानुमन्तेति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सर्वेभ्य उपरि द्रष्टा यदुपद्रष्टॄनामकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वातन्त्र्यात् स्वानुकूल्येन मत्या पे्ररयति स्म यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुमन्तेति कथितः स्वयं प्रभुरजो हरिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महाशक्तिर्यतो विष्णुर्महेश्वर इतीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परमत्वाच्च तस्यैव ह्यनुमन्तृत्वमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव सर्वदेहेषु देहिनोन्यो व्यवस्थितः'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु'' इति देहेप्युक्तः । तेनाहमेव स इति दर्शयति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "॥२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "य (एनं) एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते॥२४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
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| |
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| |
| "id": "BGT_C13_V24_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'द्विविधं पुरुषं चैव प्रकृतिं द्विविधामपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सह तत्तद्गुणैः सम्यग् ज्ञात्वा पश्यति यः पुमान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते'' ॥२४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_V25",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V26",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V26"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V26_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अनादियोग्यताभेदात् पुंसां दर्शनसाधनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नानैव तत्र विष्णोस्तु प्रसादाद् वैष्णवं वपुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वयं विज्ञायते किञ्चित् श्रूयते किञ्चिदन्यतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा ज्ञात्वा हरिं ध्यात्वा स्वान्तः पश्यन्ति केचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषयः केचिदृषयो नारदाद्या बहिस्त्वपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवा विष्णुप्रसादेन लब्धसत्प्रतिभाबलात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वं क्रमेण विज्ञाय प्रतिभास्पष्टताक्रमात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्यन्ति बहिरन्तश्च विष्णुं ध्यानमृतेपि तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येषां ध्यानमृते दृष्टिस्तेषां ध्यानेपि दर्शनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्यादेव साङ्ख्ययोगास्ते देवा ब्रह्माधिकोत्र च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केचित्तु क्षत्रियवरा अश्वमेधादिकर्मभिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यजन्तो भक्तिमन्तश्च यज्ञभागार्थमागतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रवणप्रतिभाभ्यां च स्मरन्तः पुरुषोत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्यन्त्यन्ये तथान्येभ्यः सर्वं श्रुत्वानुमत्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपास्यैव तु पश्यन्ति नान्यथा तु कथञ्चन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषीन् राज्ञस्तथारभ्य प्रतिभाभ्यधिका क्रमात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावद् ब्रह्मा ब्रह्मणस्तु प्रायो नाप्रतिभासितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोः प्रीत्यर्थमेवास्य श्रोतव्यं प्रायशो हरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषां श्रवणाज्ज्ञानं क्रमशो मानुषोत्तरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्यल्पप्रतिभानत्वान्मानुषाः श्रुतवेदिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे ते दर्शनात् तस्मात् स्वयोग्यान्मुक्तिगामिनः'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषामपि किञ्चिच्छ्रवणे विद्यमानेपि मानुषाणामत्यल्पप्रतिभानत्वात् 'श्रुत्वान्येभ्यः'' इति विशेषणम् । मनुष्याणां प्रतिभामूलप्रमाणापेक्षा प्रायो न सम्यगुत्पद्यते अल्पा चेति 'श्रुतिपरायणाः'' इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'अश्रुतप्रतिभा यस्य श्रुतिस्मृऽत्यविरोधिनी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विश्रुता नृषु जातं च तं विद्याद् देवसत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यश्च स्वमुखमानेन नवाधोदेहवान् पुमान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अष्टमानवती स्त्री च षण्णवत्यङ्गुलौ पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दशताौ सप्तपादौ विद्यात् तौ च सुरोत्तमौ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावत् पञ्चाङ्गुलोनं तद्देवमानं क्रमात् परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पादे त्वङ्गुलमात्रोनं तदूनं चतुरङ्गुलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावद्देवोपदेवानां पादे चोनाङ्गुलं पुनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तावन्मनुष्यमानं स्यात् ततोधस्त्वासुरं स्मृऽतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्विचत्वार्यधिकं तस्मात् षण्णवत्यङ्गुलादधः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञेयमङ्गुलमानं तदुपदेवादिषु स्फुटम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवेष्ववरवज्ज्ञेयमृषीणां चक्रवर्तिनाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावद् यावत् प्रियो विष्णोस्तावत् स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हरेः सादृश्यमस्य स्यादनादिक्रमसुस्थिरम्'' ॥ इति च ॥ २५-२६ ॥",
| |
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।",
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| "text": "क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्वि भरतर्षभ॥२७ ॥",
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| |
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| "text": "विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥",
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| "id": "BGT_C13_V29",
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| "text": "न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥",
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| "type": "Vakshyamana_id"
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| "text": "'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इत्यत्र क्षेत्रं श्रीः'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्''"
| |
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| "tail": " इति वक्ष्यमाणत्वात् ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "'अव्यक्तं च महद् ब्रह्म प्रधानं क्षेत्रमित्यपि ।"
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| "tail": "उच्यते श्रीः सदा विष्णोः प्रिया निर्दोषचिद्घना ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "सा हि न व्यज्यते विष्णुरत्र क्षेति महागुणा ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "जीवोत्तमा च तेनैतैः शब्दैरेकाभिधीयते ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "महान् ब्रह्मा जीवमहान् परात्मप्रेरिताः क्रियाः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अहं कर्तेति येनायं जीवो मंस्यत्यसौ शिवः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "सोहङ्कार इति प्रोक्तो जीवाहङ्कृतिकृद् यतः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "उमा बुदि्धरिति ज्ञेया शब्दादिज्ञानदा यतः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "मतिदो मन उद्दिष्ट इन्द्रः स्कन्दोपि तत्सुतः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "श्रोत्रं तु श्रावयंश्चन्द्रः स्पर्शो वायुसुतो मरुत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चक्षुः सूर्यश्चक्षयति जिह्वा वारिपतिर्हृतेः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "अश्विनौ घ्राणमाघ्रातेर्वागग्निर्वचनादपि ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "हस्तौ वायुसुतौ ज्ञेयौ मरुतौ हानिलाभयोः ।"
| |
| },
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| "tag": "br",
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| "tail": "पादौ तु विष्णुनाविष्टौ यज्ञशम्भू शचीसुतौ ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "पदनादेव पायुश्च भुक्तस्यैवाप्ययाद् यमः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "सन्तत्युपस्थितिकृतेरुपस्थः सशिवो मनुः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "विनायकस्तथाकाशो निरावृत्या प्रकाशनात् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "प्रधानवायुजो भूतवायुर्नाम्ना मरीचिकः ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्निश्च पृथिवी चैव प्रसिद्धौ वरुणो जलम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अदनात् प्रथनाज्जन्मजयहेतोस्तथाभिधाः ।"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "शब्दाद्याः पञ्च शिवजाः शब्दनात् स्पर्शनादपि ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "रूपणाद् रसनाच्चैव गन्धनाच्च तथाभिधाः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "सुखं धृतिश्चेतना च सुखनाद् विधृतेरपि ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "चेतोनेतृत्वतश्चैव मुख्यवायुः सरस्वती ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "श्रीश्चेच्छा चैव सा वायोः पत्नी त्वे(वं)व धृतिर्मता ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "इच्छादानात्तु सैवेच्छा स्थानभेदात्तु देवताः ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "पृथक् पृथक् च कथ्यन्ते लक्ष्म्याद्या उदिता अपि ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "दुःखद्वेषौ कलिश्चैव द्वापरो ब्रह्मणः सुतौ ।"
| |
| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "प्रवरावसुराणां तौ सङ्घातश्चेतनाः परे ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतैरभिमतं यच्च तत्तन्नाम्नाभिधीयते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चेतनाचेतनं त्वेतत् सर्वं क्षेत्रमितीरितम् ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षितिरेतद् भगवतो यदतः क्षेत्रमीर्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षिणोति त्राति चैवैतत् सोतो वा क्षेत्रमुच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षितिं कृत्वा त्राति चैतदतो वा क्षेत्रमीरितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतस्मात् क्षीणमेतेन त्रातमित्यथवा पुनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इच्छाद्यानां क्षेत्रनाम्नामपि नामान्तरं स्मृऽतम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विकारा (विशेषा) इति यस्मात् ते विशेषविकृतिस्थिताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विशेषात् क्रियते यस्माद् विकारं कार्यम(न्तिमम्)न्तगम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विगतं करणं वात्र पुनर्नाशमृते यतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्सम्बन्धाद् विकाराख्या इच्छाद्या अभिमानिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतत् सर्वं सर्वदैव निर्दोषेणैव चक्षुषा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रेरयन्नेव जानाति यत् क्षेत्रज्ञो हरिस्ततः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'यस्यात्मा शरीरम्'' इत्यादिश्रुतेश्चेतनस्यापि 'इदं शरीरं कौन्तेय'' इति शरीरत्वोक्तिर्युज्यते ।"
| |
| },
| |
| {
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| {
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| "children": [
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "type": "Shabdanirnaya_id"
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| "text": "'सत्त्वं जीवः क्वचित् प्रोक्तः क्वचित् सत्त्वं जनार्दनः ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "सत्त्वं नाम गुणः क्वापि क्वचित् साधुत्वमुच्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
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| |
| {
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| },
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| {
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| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
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| "text": "'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम्''"
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| ],
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| "tail": " इति च पैङ्गिश्रुतिः ।"
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'जनी प्रादुर्भावे'' इति धातोर्जीवस्यापि शरीरे व्यक्त्यपेक्षया जनिर्युज्यते ।॥२७ ॥ जीवेषु दुःखयोगादिरूपेण विनश्यत्स्वप्यतथाभूतम् 'दुःखयोगादिरूपेण जीवेषु विनश्यत्स्वपि ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "दुःखयोगादिरहितः सर्वजीवेष्ववस्थितः ।"
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "गुणैः सर्वैः समो नित्यं न हीनो हीनगोपि सन् ।"
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "इति पश्यति यो विष्णुं स एव न तमो व्रजेत्'' ॥"
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| }
| |
| ]
| |
| }
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| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ॥ २८,२९ ॥\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C13_V30",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥३० ॥",
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| "id": "bhashya-BGT_C13_V30"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "id": "BGT_C13_V30_B01"
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| "children": [
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| "attrs": {
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| "type": "Bhagavad_id"
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| },
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| "text": "प्रकृत्य स्वयमेव प्रारभ्य विष्णुना क्रियमाणानि । विष्णोर्नान्य पूर्वप्रेरक इति । 'पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्''"
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| }
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| "tail": " इति भगवद्वचनात् ।"
| |
| },
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| {
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| "tail": "'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।"
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| },
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया'' ॥ इति च ।"
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "text": "'स्वयं प्रकृत्य भगवान् करोति निखिलं जगत् ।",
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| {
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| "tail": "नैव कर्ता हरेः कश्चिदकर्ता तेन केशवः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्कान्दे ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "तेनेति प्रस्तुतत्वादेव सिद्धम् । 'अहं सर्वस्य प्रभवः'' 'स हि कर्ता'' 'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्'' 'जन्माद्यस्य यतः'' 'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्यादिसकलप्रमाणविरोधश्चान्यथा । 'प्रकृत्यैव च'' इति चशब्दाच्चैतेनैवेति सिद्ध्यति ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "'प्रकृतेन क्रियायोगं चशब्दः क्वचिदीरयेत् ।"
| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "क्वचित् समुच्चयं ब्रूयात् क्वचिद् दौर्लभ्यवाचकः'' ॥"
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| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "प्रकृतेः कर्तृत्वं 'रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्'' इत्यादिना च निरस्तम् । 'न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे'' इति च । केवलप्रकृतेः कर्तृत्वाङ्गीकारे चशब्दोपि व्यर्थः । 'तत एव च विस्तारम्'' इति वाक्यशेषविरोधश्च । 'अहं बीजप्रदः पिता'' इति वक्ष्यमाणमत्रापि 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इति प्रकृतमिति तेनापि विरोधः । अचेतनं करोतीति स्वोक्तिविरोधश्च ।"
| |
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| |
| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": " 'इच्छापूर्वक्रियादानं कर्तृत्वं मुख्यमीरितम्''"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति हि पैङ्गिश्रुतिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": " विकारलक्षणं कर्तृत्वं तु प्रकृतेरङ्गीकृतमेव । तथापि लक्ष्मीपरमेश्वरमुक्तचेष्टासु तदभावात् 'सर्वशः'' इत्यस्य सङ्कोचप्राप्तिः ।"
| |
| },
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| |
| "tag": "br",
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| "tail": "'अचेतनाश्रितं कर्म विकारात्मकमीरितम् ।"
| |
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| "tail": "यत्तु केवलचित्संस्थं प्रत्यभिज्ञाप्रमाणतः ।"
| |
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| "tail": "अविकारात्मकं ज्ञेयं तन्न तत् प्राकृतं भवेत्'' ॥ इति च ॥३० ॥\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "BGT_C13_V31",
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| "adhikarana": ""
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| "tag": "line",
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| "text": "यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V31"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V31_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'एकविष्ण्वा(श्रितानां)श्रयाणां तु जीवानां भेदमेव यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततः परस्परं चैव तारतम्येन पश्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोरेव च विस्तारं जगतः स विमुच्यते'' ॥ इति च ॥३१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V32",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V33",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V34",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V34"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V34_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "शरीरस्थो जीवः । 'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्य असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति''"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति श्रुतेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "'शरीरस्थस्तु संसारी शरीराभिमतेर्मतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुः शरीरगोप्येष न शरीरस्थ उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरीराभिमतिर्यस्मान्नैवास्यास्ति कदाचन ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्गतानां तु दुःखानां भोगोभिमतिरुच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदभावान्नाभिमानी भगवान् पुरुषोत्तमः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनादित्वान्निर्गुणत्वाच्च परमात्मा जीवोपि न । किमुत जडं न भवतीति ? शरीरोत्पत्तिलक्षणमप्यादिमत्त्वं परमस्य नास्तीति विशेषः । जीवस्य हि तदस्तीति । सत्त्वादिगुणसम्बन्धश्च । सर्वं करोति परमात्मा । तथापि न लिप्यते । वादिसिद्धत्वादेव 'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठम्'' इत्यादिवन्निषेधः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'कुर्वाणोपि यतः सर्वं पुण्यपापैर्न लिप्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जन्ममृत्यादिरहितः सत्त्वादिगुणवर्जितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुस्तद्विपरीतस्तु जीवोतस्तौ पृथक् सदा'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'स एष नेति नेति'' इत्यादि च ॥ ३२-३४ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V35",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोगो नाम त्रयोदशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये त्रयोदशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C13_V35"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C13_V35_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवानामचेतनप्रकृतेर्मोक्षं भूतप्रकृतिमोक्षम् ॥ ३५ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14",
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| "type": "adhyaya",
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| "name": "चतुर्दशोऽध्यायः"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_I01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "साधनं प्राधान्येनोत्तरैरध्यायैर्वक्ति-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "introduction",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_I02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्पष्टीकरणपूर्वकं त्रैगुण्यं विविच्य दर्शयति ।",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V01",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिदि्धमितो गताः॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V02",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C14_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V03_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'योनिर्भार्या तथा स्थानं योनिः कारणमेव च'' "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति शब्दनिर्णये । अत्र योनिर्भार्या 'तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्'' इति वाक्यशेषात् ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V06",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
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| "text": "रजो रागात्मकं विदि्ध तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।",
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| "tail": "\n "
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तमस्त्वज्ञानजं विदि्ध मोहनं सर्वदेहिनाम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्प्रकाश उपजायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्रकाशोप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदोत्तमविदां लोकानमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V16",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V17",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रमादमोहौ तमसो भवतोज्ञानमेव च॥१७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V18",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V19",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोधिगच्छति॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V20",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोमृतमश्नुते॥२० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V21",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "अर्जुन उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणानतिवर्तते॥२१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C14_V21"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V21_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavishnu_id"
| |
| },
| |
| "text": "एतेभ्यः सत्त्वादिगुणेभ्योन्यं कर्तारमीशं यदा पश्यति तदैवायं ना पुरुषः । अन्यथा पशुसमः । न केवलमन्यत्वेन पश्यन् ना तं कर्तारं विष्णुम् किन्तु गुणेभ्य उत्तमत्वेन च । कथं स एव ना ? यस्मात् 'मद्भावं सोधिगच्छति'' ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'महालक्ष्मीरिति परा भार्या नारायणस्य या ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकृतिर्नाम सा ज्ञेया प्रकर्षेण करोति यत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्यास्तु त्रीणि रूपाणि सत्त्वं नाम रजस्तमः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सृष्टिकाले विभज्यन्ते सत्त्वं श्रीः सद्गुणप्र(भा)दा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रजो रञ्जनकर्तृत्वाद् भूः सा सृष्टिकरी यतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदावेशादियं पृथ्वी भूमिरित्येव कथ्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवानां ग्लपनाद् दुर्गा तम इत्येव कीर्तिता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एताभिस्तिसृभिर्जीवाः सर्वे बद्धा अमुक्तिगाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वान् बध्नन्ति सर्वाश्च तथापि तु विशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्रीर्देवबन्धिका नॄणां भूर्दैत्यानामथापरा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एताभ्योन्यं परं चैव विष्णुं ज्ञात्वा विमुच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सामर्थ्यातिशयादासां नैताभ्यो विद्यते परः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति यावद् विजानाति तावत् तं नृपशुं विदुः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मादाभ्योधिकगुणो विष्णुर्ज्ञेयः सदैव च'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'रजसस्तु फलं दुःखम्'' इत्यत्र दुःखमिति दुःखमिश्रं सुखम्- 'दुखं दुरिति सम्प्रोक्तं खं नाम सुखमुच्यते'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Skanda_id"
| |
| },
| |
| "text": "'कर्मणो राजसस्योक्तं दुःखमिश्रं सुखं फलम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अज्ञानजं तामसस्य नित्यदुःखं फलं विदुः'' ।"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्कान्दे ॥१६-२१॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V22",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुणा वर्तन्त इत्येव योवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C14_V23"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C14_V23_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "'लोकस्थितान् प्रकाशादीन् प्रायो न द्वेष्टि नेच्छति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वयम्प्रकाशी मोहोज्झस्तथापि पुनरिच्छति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णौ प्रकाशं तं चैव नित्यभक्त्याभिसेवते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सुखदुःखादिभावेपि विष्णुभक्तौ समः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अर्थार्थं वा प्रियार्थं वा निन्दादीनां भयादपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न विष्णुभक्तिह्रासोस्य किन्तु साम्यमथोन्नतिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अवैष्णवारम्भवर्जी विष्णुं याति न संशयः'' ॥ इति च ॥२२ ॥ उदासीनवदित्युक्तेश्च न केवलोदासीनत्वम् । नेङ्गते इत्युदासीनप्रवृत्ति-निषेधः । सर्वारम्भपरित्यागीति विशेषप्रयोजनापेक्षयापि न अवैष्णवारम्भः इति । 'इङ्गनं क्षणिकं कर्म दीर्घमारम्भ उच्यते''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ॥ २३ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C14_V25",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C14_V26",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मां च योव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "children": [
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| "text": "'लक्ष्म्यादिभिः कृतो बन्धो योनादिः पुरुषस्य तु ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तमत्येतीह यो विद्वान् स विज्ञेयो गुणात्ययी'' ॥ इति च प्रवृत्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तत्कृतबन्धात्ययात् तदधिकविष्णुप्राप्तेश्च तदत्ययीत्युच्यते । यथा द्वारपालमतीत्य राजानं गच्छतीति । ब्रह्मणि भूयं ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मेति प्रकृता महालक्ष्मीः 'अतीत्य त्रीणि रूपाणि महालक्ष्मीं प्रपद्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तया त्वनुगृहीतोसौ वैष्णवो विष्णुगो भवेत्'' ॥ इति च ॥२६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C14_V27",
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| "type": "shloka",
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| "children": [
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| "text": "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिगुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये चतुर्दशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C14_V27_B01"
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| {
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| "tag": "line"
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ब्रह्म प्राप्तो मत्प्राप्त (इव) एव भवतीत्याह- ब्रह्मणो हीति । मदवियोगात् तस्या अपि मत्स्थ एव भवतीत्यर्थः । तथापि प्राप्तिक्रमविवक्षया तदुक्तिः । एकान्तिकस्य सुखस्य मोक्षस्य ॥ २७ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n \n "
| |
| },
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| "tail": "\n "
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "त्रयोदशोक्तं विविच्य दर्शयति-",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "श्री भगवानुवाच",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥",
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| |
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| "id": "BGT_C15_V01_B01"
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| "children": [
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| {
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| "text": "'पृथङ्ग् मूलं हरिस्त्वस्य जगद्वृक्षस्य भूमिवत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्त्वादियुक्ते चिदचित्प्रकृती मूलभागवत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्रापि चिदचिद्योगो वृक्षवत् सम्प्रकीर्तितः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिवीदेवतावत् तद्धरिर्मृद्वदचेतना ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमत्वात्तु मूलानामूर्ध्वमूलस्त्वयं स्मृऽतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नीचास्ततो महदहम्बुद्धयो भूतसंयुताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शाखाश्छन्दांसि पर्णानि काममोक्षफले ह्यतः'' ॥१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C15_V02",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
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| {
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| "text": "कारणेषु स्थितं कार्यं व्याप्तं कार्येषु कारणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्योन्यसंयुताः शाखाः मूलानि च सदैव तु ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विषयाः दर्शनीयत्वात् प्रवालसदृशाः मताः ॥२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C15_V03",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C15_V04",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
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| "text": "ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "id": "bhashya-BGT_C15_V04"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जगद्वृक्षोयमश्वत्थो ह्यश्ववच्चञ्चलात्मकः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "अव्ययोयं प्रवाहेण स्वस(क्ति)क्तज्ञानहेतिना ।",
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| {
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| "text": "विष्णोः सम्यक् पृथग्दृष्टिनामच्छेदनभाक् सदा ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अव्यक्तादिसमस्तं तु नेति नेत्यादिवाक्यतः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "बोधेनैव पृथग् विष्णोः कृत्वा मृग्यः स केशवः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तमेवाद्यं प्रपद्येत यदंशाभासको ह्ययम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "जीवराशिः समस्तोपि ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकः ॥ ३-४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C15_V05",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C15_V06",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| {
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| "text": "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "text": "मनःपष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ शब्दादीन् प्रति ... ॥ ७ ॥",
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| "text": "गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "text": "अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।",
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| {
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| "text": "प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "type": "shloka",
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| "text": "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृऽतिर्ज्ञानमपोहनं च ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "adhikarana": ""
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "BGT_C15_V20",
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| "text": "एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥",
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोध्यायः ॥",
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये पञ्चदशोध्यायः ॥",
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| "children": [
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| "text": "पुमर्थसाधनविरोधीनि अनेनाध्यायेन दर्शयति-",
| |
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
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| "text": "अभयं सत्त्वसंशुदि्धर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C16_V04",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "दम्भो दर्पोभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥",
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| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "text": "दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
| "text": "मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव॥५ ॥",
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "द्वौ भूतसर्गौ लोकेस्मिन् दैव आसुर एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| |
| "text": "न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C16_V09",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।",
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेशुचिव्रताः॥१० ॥",
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C16_V14",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ईश्वरोहमहं भोगी सिद्धोहं बलवान् सुखी॥१४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "आढ््योभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशो मया ।",
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| "text": "यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।",
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| "text": "प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेशुचौ॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C16_V18",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।",
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| {
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| "text": "मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोम्यसूयकाः॥१८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C16_V19",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C16_V20",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।",
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| "text": "मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C16_V21",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥",
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| "text": "ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥",
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| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोध्यायः ॥",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये षोडशोध्यायः ॥",
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| "text": "देवासुरलक्षणम्- 'येतिमानेन मन्यन्ते परमेशोहमित्यपि मिथ्या जगदिदं सर्वं भ्रमजत्वान्न तिष्ठति ।",
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| "tail": "यस्मात् तेतोसुरा ज्ञेया एवमन्येपि तादृशाः ।"
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| "tail": "ये तु विष्णुं परं ज्ञात्वा यजन्तेनन्यदेवताः ।"
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| "tail": "देवासुराख्यौ द्वावेव गन्धर्वाद्यास्तदन्तराः ।"
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| "tail": "मुक्तिगा एव विज्ञेया देवा एव विमुक्तिगाः'' ॥ इति च ।"
| |
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| "tail": "'विमोक्षाय'' इत्यत्र वीत्युपसर्गादेव च मोक्षनानात्वं ज्ञायते ।"
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| "tail": "अशोच्य एव विज्ञेयो मोक्षयोग्यो हरेः प्रियः'' ॥ इति च ॥ १-२४ ॥\n "
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| "text": "शिष्यते संसृतिस्थानां श्रद्धारूपं मनोपरम् ।",
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| "text": "तत्र स्वरूपश्रद्धैव व्यज्यते प्रायशः क्वचित् ।",
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| "text": "सात्विकस्य तमोरूपा श्रद्धान्तःकरणात्मिका ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सात्त्विकी तामसस्यापि भूयस्त्वात् तद् विविच्यते ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "श्रद्धेत्यास्तिक्यनिष्ठोक्ता सा येषां दैवतोत्तमे ।",
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| "text": "ते सात्त्विका इति ज्ञेयास्तैरिष्टं विष्णुरेव तु ।",
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| "text": "श्रीश्च साध्यक्षविद्याख्या ब्रह्मेन्द्राद्याश्च देवताः ।",
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| |
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| {
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| "text": "विबुधत्वात्तु मन्वाख्या भुञ्जते प्रीतिपूर्वकम् ।",
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| |
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| "text": "व्यामिश्रयाजिनो ये तु विष्ण्वाधिक्ये ससंशयाः ।",
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| |
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| "text": "स्वरूपमात्रे देवानां श्रद्धायुक्ताश्च सर्वदा ।",
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| |
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| "text": "राजसास्ते तु विज्ञेयास्तैरिष्टं यक्षराक्षसाः ।",
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| "text": "दीनत्वाद् देवनामानो ब्रह्मेन्द्रादिसनामकाः ।",
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| "text": "गृह्णन्ति ये हरिं त्वन्यदेवादिसममेव वा ।",
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| "text": "नीचं ब्रह्माद्यनन्यं वा मन्यन्ते नेति चाखिलम् ।",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V07_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपोधनाः (तपो जनाः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "डम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अकृशानपि लक्ष्म्यादीन् देवान् विष्णुपरायणान् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुं च सर्वदेहस्थान् कृशत्वेन विजानते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषामल्पगुणत्वेन कल्पनात् ते तमो ध्रुवम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यान्ति ज्ञेयाश्च ते दैत्याः पिशाचा वाथ राक्षसाः ॥ अन्नैश्चैवाथ यज्ञाद्यैः प्रायो ज्ञेया इमे नराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सात्त्विका सात्त्विकान् कुर्युर्यस्मादन्ये तथेतरान् ॥ ओन्तत्सदिति यद् विष्णोर्नामत्रयमुदाहृतम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रसिद्धं वैदिकं तस्मात् कर्म सद्विषयं हि सत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्राश्रद्धाकृतं तस्मादसदित्येव कीर्त्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मादोताः परस्परम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विहिता विष्णुना तेन विष्णुरोमिति कीर्तितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ओतमस्मिन्निदं सर्वमिति चोक्तः स ओमिति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मादोमिति यज्ञादीन् प्रवर्तन्ते हि वैदिकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनोङ्कृतं ह्यासुरं स्याद् यत् तस्मादोङ्कृतं त्वपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ओङ्कारार्थहरेः सम्यगज्ञानादासुरं भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "फलं त्वनभिसन्धाय तद् ब्रह्म स्यान्ममास्पदम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति यत् क्रियते कर्म तन्नामातो जनार्दनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभिसन्धितं हि तत् प्रोक्तं ततं वा स्वगुणैः सदा'' ॥ इत्यादि च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'मयः(मयं) प्रधानमुद्दिष्टं स्वरूपं कार्यमेव च''"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "शास्त्रविहितमपि भगवच्छ्रद्धाहीनमसदेवेति वक्ष्यति'अश्रद्धया हुतम्'' इति । भगवच्छ्रद्धारहितत्वादेव चाशास्त्रविहितं भवति । 'विष्णुभक्तिविधानार्थं सर्वं शास्त्रं प्रवर्तते'' ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ ४-७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V08_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "स्थिराः स्थिरगुणाः घृतादयः । कवादीनामप्यारोग्यरसाद्यर्थत्वेन सात्त्विकत्वमेव । रस्यादीनामपि राजसत्वमनारोग्यादिहेतुत्वे ।'दुःखशोकामयप्रदाः'' इत्युक्तेः । सत्त्वं साधुभावः । भवति हि सोपि शुच्यन्नात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'हृद्यं पश्चान्मनोहारि प्रियं तत्कालसौख्यदम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सुखदं दीर्घसुखदं रस्यमभ्यास सौख्यदम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ॥८ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V09_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रूक्षं नीरसम् । तीक्ष्णं सर्षपादि ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V10_B01"
| |
| },
| |
| "text": "'यामान्तरितपाकं तु यातयाममुदीर्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्वचिच्च गतसारं स्यान्नियम्यं यातमस्य यत्'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "पूर्वं स्वादु पश्चादन्यथाजातं गतरसम्'शुद्धभागवतानां तु स्वभावापेक्षयैव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वादुत्वादि विजानीयात् पदार्थानां न चान्यथा'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति सूदशास्त्रे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "॥१० ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विदि्ध राजसम्॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V15",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V15"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V15_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'यागात्तु राजसात् स्वर्गः साङ्कल्पिक उदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "लोकः स दीनदेवानां सनाम्नां वासवादिभिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णावश्रद्धयायोग्यकामाच्चैषां पुनर्भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नरकं च विना यज्ञं राजसा नरलोकगाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "निषिद्धकर्म कुर्युश्चेदीयुस्ते नरकं ध्रुवम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'कदाचित् सात्त्विकाः कुर्युः कर्म राजसतामसम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्येन्यच्च तथाप्येषां स्थितिः स्वाभावि(की)के पुनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वं स्वं कर्म तु सर्वेषां सदैव स्यान्महत्फलम् । अन्यदल्पफलं चैव बाहुल्यं तेषु लक्षणम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ॥ १२-१५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "BGT_C17_V16",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "children": [
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
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| "tail": " "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "attrs": {
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| "children": [
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| "text": "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C17_V18",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "children": [
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| "text": "सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
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| |
| "text": "क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C17_V19",
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| "type": "shloka",
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
| "text": "परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृऽतम्॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C17_V21",
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| "type": "shloka",
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| "children": [
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| "tail": "\n "
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| },
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| "text": "दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृऽतम्॥२१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C17_V22",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "ओशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| |
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line"
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "युक्तैः भगवदर्पणादियोगयुक्तैः । युक्तैरिति दानादिषु सर्वत्र समम् ॥ १७-२२ ॥",
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| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V23",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V24",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V25",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C17_V26",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V27",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C17_V28",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये सप्तदशोध्यायः ॥",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C17_V28"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| |
| "id": "BGT_C17_V28_B01"
| |
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| |
| "attrs": {
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| "type": "Shruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "तत्सम्बन्धित्वादेव कर्मादि सत् । ओं तत्सदिति नाम्नां विष्णौ प्रसिद्धत्वात् । ''स्रवत्यनोङ्कृतं ब्रह्म परस्ताच्च विशीर्यते । अनोङ्कृतं आसुरं कर्म\""
| |
| }
| |
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| "tail": " इति श्रुतेः अनोङ्कृतस्य आसुरत्वप्रसिद्धेः ।"
| |
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| {
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| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Paingishruthi_id"
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| "text": "''अनर्थज्ञोदितो मन्त्रो निरर्थस्त्राति मानतः ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "यन्मन्त्रस्तेन कथितो मन्त्रार्थो ज्ञेय एव तत्\" ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पैङ्गिश्रुतेश्च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदर्थत्वेन फलानभिसन्धिपूर्वककर्मणः एव सात्विकत्वाच्च । तद्भक्त्या तत्स्मरणपूर्वकमेव कर्म सत् अन्यदसदेवेति भावः । राजसस्यापि असदन्तर्भाव एव । विष्णुश्रद्धारहितत्वात् ॥ 'सात्त्विकं मोक्षदं कर्म राजसं सृतिदुःखदम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तामसं पातदं ज्ञेयं तत् कुर्यात् कर्म वैष्णवम्'' ॥ इत्याग्नेये॥२३-२८॥\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18",
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| |
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| "text": "अष्टादशोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "introduction",
| |
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरति अनेनाध्यायेन-",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C18_I02"
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| "children": [
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| {
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| "text": "सर्वाध्यायोक्तधर्मस्य समासतो निर्णयात्मकोनुक्तत्रैगुण्यवादी चायम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "id": "BGT_C18_V01",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "अर्जुन उवाच",
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| |
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| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V02",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "श्रीभगवानुवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V03",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V03"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V03_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "'मनीषिणः'' इत्युक्तत्वात् तेप्यनिन्द्याः । अतः 'त्याज्यं दोषवत्'' इत्यस्यार्थः 'सङ्गं त्यक्त्वा फलं च'' इति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V04",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V05",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V06",
| |
| "type": "shloka",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C18_V06"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V06_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्रव्ययज्ञादीनां मध्ये स्वोचितो यज्ञो विद्यादानादिषु स्वोचितं दानं स्वोचितं तपश्च सर्वैर्वर्णाश्रमिभिरन्यैश्च कार्यमेवेत्यर्थः । विष्णुनामस्वाध्यायोन्त्यानां सत्योपवासादितपश्च ॥ ५,६ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V07",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-BGT_C18_V07"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V07_B01"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "सङ्गफलत्यागमृते स्वरूपत्यागः कार्य इति मिथ्याज्ञानाख्यमोहात् । 'स्वयज्ञादीन् परित्यज्य निरयं यात्यसंशयम्'' ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ॥ ७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V08",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V09",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V09_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "मोहं विना दृष्टदुःखमित्येव । दुःखशब्देन केवलमानसम् । कायक्लेशस्य पृथगुक्तेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विशेषस्य विवक्षायामन्यथा सर्वमेव तु'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ॥ ८,९ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V10",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V11",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V11"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V11_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म केवलं दृष्टदुःखदम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जन्मान्तरकृते पुण्ये न सज्जेत् सात्त्विकश्चले ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः सम्यक् तत्त्वविद् विष्णोस्तदर्पणधियैव तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "फलेच्छावर्जितस्तस्य कर्मबन्धाय नो भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहुलं चेदल्पदोषं यावदेवापरोक्षदृक्'' ॥ इति च ॥ १०,११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V12",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V12"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
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| |
| "id": "BGT_C18_V12_B01"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषामिष्टम् । अस्य तु त्यागित्वादेव नेष्टम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'ज्ञानादेर्मोक्षभोग्याच्च नान्यत् स्यात् कर्मणः फलम् ॥ त्यागिनस्तत्त्वसंवेत्तुरन्येषां तदृते फलम्'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केवलकाम्यकर्मणां फलानपेक्षयाप्यकरणमित्येतावांस्त्यागात् संन्यासस्य विशेष इत्यत्यागिनां प्रतियोगित्वेन न्यासिन उक्ताः । त्यागित्वं तेषामपि ह्यस्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'परेच्छयापि ये काम्यं कर्म कुर्युर्न तु क्वचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न्यासिनो नाम तेन्येभ्यः फलत्यागिभ्य उत्तमाः'' ॥ इति च ॥१२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V13",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।",
| |
| "tail": "\n "
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| {
| |
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| "text": "साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| |
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| "children": [
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| |
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| |
| "id": "BGT_C18_V13_B01"
| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "'कथितं परमं साङ्ख्यं कपिलाख्येन विष्णुना ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सेश्वरं वैदिकं साक्षाज्ज्ञेयमन्यदवैदिकम्'' ॥ इति च ॥१३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| |
| "id": "BGT_C18_V14",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| |
| "text": "विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| "text": "न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥",
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| "text": "पश्यत्यकृतबुदि्धत्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "'स्वातन्त्र्यमीश्वरे वेत्ति नैवात्मनि कदाचन ।",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "ईश्वराधीनमेवात्मन् स्वातन्त्र्यं तु जडान् प्रति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तारतम्येन लक्ष्म्यादेर्जीवान् प्रति च सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्तदर्थं समुत्पन्नो यथा रुद्रो यथा यमः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञस्तदर्थं जातोपि ब(व)द्ध्यते दैत्यवद् ध्रुवम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपरोक्षदृङ्ग् न जातो यस्तदर्थं मुक्तिगं सुखम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ह्रसेत् तस्य परोक्षज्ञः किञ्चिद् दोषेण लिप्यते'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्वातन्त्र्यज्ञानात् हन्मीति भावोप्यस्य नास्तीति न हन्ति । अन्यस्य भावोस्तीति विशेषः । 'बुदि्धर्यस्य न लिप्यते'' इति । रागान्न हन्ति, किन्तु धर्मबुद्ध्या ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "'स्वातन्त्र्यं मन्यमानस्य रागाद् धर्मं च कुर्वतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तन्निमित्तस्तु दोषः स्याद् गुणश्च स्यात् सुकर्मजः'' ॥ इति च ॥१७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।",
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| "text": "करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥",
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| "children": [
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| "text": "'सम्प्रेरयितुरीशस्य कर्मस्वखिलचेतनान् ।",
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| "text": "ज्ञातृज्ञेयज्ञानरूपा प्रेरणा सा स एव यत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "स्वरूपेणैव नित्या सा विशेषात्मतया भवेत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषोपि स्वरूपेण नित्यश्च स्याद् विशेषतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वनिर्वाहकता यस्मान्नानवस्था विशिष्टवत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेष्यस्य विशिष्टस्याप्यभेदे(प्य)पि विवादिनि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषोस्त्येव नात्रापि ह्यनवस्था कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञातुरन्योहमिति तु कस्याप्यनुभवो न हि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्मि ज्ञातैवाहमिति भेदस्तस्मात् तयोः कुतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पश्यामीति विशेषोयमिदानीं मे समुत्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्याद्यनुभवाद् भेदो न विशेष्यविशिष्टयोः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विशेषणं तु द्विविधं विशेषाख्यं तथेतरत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विशेषमणयेद् येन प्रोक्तं तेन विशेषणम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "विशेषोपि विशेषस्य स्वस्यैव गमको भवेत्'' ॥ इत्यादि तत्त्वविवेके ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सङ्ग्रहः पञ्चकारणानां सङ्क्षेपः । अधिष्ठानस्य करणेन्तर्भावात् । दैवशब्दोदितेश्वरस्यैव मुख्यकर्तृत्वात् स्वतन्त्रकर्त्रोः कर्तृशब्देनैवोक्तेः त्रैविध्यम् । कर्म चेष्टा ॥१८ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "text": "ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥",
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| |
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| "children": [
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| "text": "'अस्तित्वाद् भूतनामभ्यः सर्वजीवेभ्य एव यत् ।",
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| },
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| {
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| "text": "मुक्तेभ्योपि पृथक्त्वेन विष्णोः सर्वत्रगस्य च ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "text": "ऐक्येन च स्वरूपाणां प्रादुर्भावादिकात्मनाम् ।",
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| "text": "तारतम्येन जीवानां भेदेनैव परस्परम् ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जडेभ्यश्चैव जीवानां जडानां च परस्परम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तेभ्यो विष्णोश्च सम्यक् तल्लक्षणज्ञानपूर्वकम् ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "ज्ञानं सात्त्विकमुद्दिष्टं यत् साक्षान्मुक्तिकारणम्'' ॥२० ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "id": "BGT_C18_V21",
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| "text": "वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विदि्ध राजसम्॥२१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "adhikarana": ""
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| "text": "यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।",
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| "tail": "अकार्यं ब्रह्म जानाति स एवाखिलमित्यपि । एकजीवपरिज्ञानात् कृत्स्नज्ञोस्मीति मन्यते ।"
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| "tail": "अतत्त्वार्थं जगद् ब्रूते तत्त्वार्थज्ञानवर्जनात् ।"
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| "tail": "स मुख्यतामसज्ञानी ह्येकैकेनापि किं पुनः ।"
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| "tag": "br",
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| "tail": "सर्वैरेतैर्विशेषैश्च युक्तः पापतमाधिकः'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्'' इत्यस्य व्याख्यानम्'नानाभावान्'' इत्यादि । सर्वगतमेकमीश्वरं न जानातीत्येतावतैव राजसत्वम् । एकस्य कृत्स्नवज्ज्ञानमेव तामसम् । मुक्तत्वादिरूपेण अन्यथा करणीयत्वात् पराधीनत्वेनाल्पस्य जीवस्य स्वातन्त्र्यादिगुणपूर्णत्वात् कृत्स्नेन ब्रह्मणैक्यज्ञानं च महातामसम् । किं पुनस्तावन्मात्रं सर्वमिति ज्ञानम् । किं पुनस्तत्राप्येकजीवादन्यत् किमपि नास्तीति औतुकं ज्ञानं सर्वमपि तामसम् । किमु तदेवोक्तलक्षणम् । अतत्त्वार्थवत् सदसद्वैलक्षण्याद्यन्यथार्थकल्पनायुक्तमेव तामसम् । किमु तदेवोक्तविशेषणैर्युक्तम् । प्रायोल्पज्ञानमपि तामसम् । अज्ञानबहुलत्वात् किमु तदेवोक्तमिथ्याज्ञानबहुलमित्यपुनरुक्तिः । एकस्मिन् सर्ववज्ज्ञानं कार्ये जीवे पूर्णब्रह्मेति सक्तं ज्ञानं निर्युक्तिकं चातत्त्वार्थकल्पनायुक्तमल्पज्ञानं च पृथक्पृथगपि तामसानीति च । मायावादे त्वेतानि समस्तानि । अन्यत्रापि त्वहैतुकत्वादिकं विरुद्धवादिषु समं सर्वेषु ॥ २१,२२ ॥"
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "type": "shloka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "tag": "line",
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| "text": "अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "text": "यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।",
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| |
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| "tag": "line",
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| "text": "क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| "text": "अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।",
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| "tail": "\n "
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| "text": "मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "bhashya",
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| "children": [
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| "text": "'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा'' इत्युक्त्वा 'ये मे मतम्'' 'ये त्वेतत्'' इति च तस्य मोक्षसाधनत्वस्याकरणे प्रत्यवायस्य चोक्तेर्भगवदर्पितत्वेन सर्वकर्मकरणं तस्य विष्णोः सर्वपरमत्वज्ञानं च नियतमेवेति ज्ञायते । 'अध्यात्मचेतसा'' इत्युक्तत्वात् तत्स्व(तत्व)रूपयाथार्थ्यज्ञानादि । 'ये तु सर्वाणि'' इत्यस्मिन् श्लोकेध्यात्मचेतस्त्वस्य 'मत्पराः अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्तः'' इति व्याख्यातत्वात् । एवं सर्वमपि भगवद्भक्तियुक्तमेव सात्त्विकम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| "type": "shloka",
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| "text": "सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥",
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| "text": "हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥",
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| "text": "अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोलसः ।",
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| "text": "विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥",
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| "text": "बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।",
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| "text": "प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥",
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| "text": "स प्राकृतो दीर्घसूत्री कुर्यां पश्चादिति स्मरन्'' ॥ इति शब्दतत्त्वे ।",
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| "text": "प्राप्तकालस्य कर्मणो दीर्घकालेनैव कृतिं सूचयन् दीर्घसूत्रीत्यर्थः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "'अलसो दीर्घसूत्री च सत्त्वयुक् तामसो मतः ।",
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| {
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| "text": "अयुक्तो राजसः स्तब्धः प्राकृतो नैकृतिः शठः ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एकैकेनैव दोषेण प्रोक्तस्तामसतामसः ।",
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "दुर्नरत्वं च तिर्यक्त्वं तमश्चैतत्फलं क्रमात्'' ॥ इति च ॥ २८-२९ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| "text": "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।",
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| "text": "बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुदि्धः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥",
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| "text": "अयथावत्प्रजानाति बुदि्धः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥",
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| "text": "यया बुद्ध्या राजसी सा मिथ्यादृक्त्वेव तामसी'' ॥ इति च ॥३१,३२॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "text": "योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "'वैष्णवो भक्तियोगो यस्त(दुक्ता)द्युक्ता सात्त्विकी धृतिः'' । इति च । विहित-विषयैवेत्यव्यभिचारिणी ॥ ३३,३४ ॥",
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| "text": "सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।",
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| "text": "अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥",
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| |
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| |
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| |
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| "tail": "'महात्मानस्तु मां पार्थ'' 'अभयं सत्त्वसंशुदि्धः'' इत्यादिना वृद्धाश्चोक्ताः ॥ ३५, ३६ ॥\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "text": "यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| {
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| "text": "सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| {
| |
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| |
| "text": "'यथेष्टं सञ्चरन्तोपि मुक्ता भूम्यादिगा न तु ।",
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| |
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| |
| {
| |
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| |
| "text": "ग्रामस्था अपि न ग्राम्या वैलक्षण्यादि्ध सज्जनाः ।",
| |
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| |
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| {
| |
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| |
| "text": "नराधमास्तामसेषु सात्त्विकास्तत्र राजसाः ।",
| |
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दैत्यभृत्या महादैत्या मुख्यतामसतामसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राजसास्तु नरास्तत्र विप्रा राजससात्त्विकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्रस्थशुद्धसत्त्वास्तु परहंसाः प्रकीर्तिताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हंसो बहूदः कुटिको वनस्थो नैष्ठिको गृही ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्रमाद् रजोधिका बाह्यं कर्मैषामधिकं यतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्माः परमहंसानां ब्राह्मा एव शमादिकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवादेः कर्मबाहुल्यं न लिङ्गं रजसः क्वचित् । न हि विष्णोश्चलेत् तेषां मनः कर्मकृतावपि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषां चलचित्तत्वात् प्रायः स्यात् कर्म राजसम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि तत् स्मारकं विष्णोर्विद्यात् सात्त्विकमेव तत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्मार्थहिंसनाग्निश्च विशेषो ब्रह्मचारिण; ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पैतृकं चापि यतितो दारास्तु गृहिणस्ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असर्गो (असङ्गो) ग्राम्यसन्त्यागः पश्वहिंसा गृहस्थतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वनस्थस्य विशेषोयं सर्वेषामितरत् समम्'' ॥ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सात्त्विकाः स्वल्परजसः क्षत्रियाः सत्त्वराजसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैश्याः शूद्रा अतिस्वल्पसत्त्वाधिक्येन तामसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये तु भागवता वर्णास्तेषां भेदोयमीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्त्वाधिकः पुल्कसोपि यस्तु भागवतः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रैविद्यमात्रा विष्णोर्ये सर्वाधिक्ये ससंशयाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्याधिक्यं न मन्यन्ते श्रीशाद् राजसराजसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञा विष्णौ द्वेषहीनाः सर्वे राजसतामसाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पितृगन्धर्वपूर्वाश्च मुनयो देवता इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सात्त्विकास्त्रिविधास्तत्र श्रेष्ठा एवोत्तरोत्तराः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवा इन्द्रो विरिञ्चाद्या इति त्रेधैव देवताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "क्रमोत्तराः शिवो वाणी ब्रह्मा चैवोत्तरोत्तराः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| "text": "सत्त्वसत्त्वमहासत्त्वसूक्ष्मसत्त्वश्चतुर्मुखः ।",
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्माद् यावद् विमुक्तिः स्यान्मुक्तावेवं सुखक्रमः'' ॥ इति च ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "विष्णौ किञ्चिदप्रीतियुक्तास्तामसमध्ये सात्त्विका नराधमा इत्यर्थः । राजसानां मध्ये सात्त्विका एव भागवतविप्रादयः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "राजसस्थसात्त्विकेष्वेव शुद्धसात्त्विकाः किञ्चिद्रजोयुक्तसात्त्विकाः समरजोयुक्तसात्त्विकाः सत्त्वात् किञ्चिदूनतमोयुक्तसात्त्विका इति वर्णभेदः । सत्त्वप्रधानत्वादेव तानारभ्योत्तरोत्तरं सर्वेपि मोक्षयोग्याः । 'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्'' इत्यादेः ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "'सत्त्वाधिको मोक्षयोग्यो योग्योन्धतमसस्तथा ।",
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| "text": "तम उत्तरो रजो भूयान् समो वा सृतिपात्रकः'' ॥ इति च ॥ ४०,४१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V45",
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| "type": "shloka",
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| |
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| "text": "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिदि्धं लभते नरः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "स्वकर्मनिरतः सिदि्धं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V46",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिदि्धं विन्दति मानवः॥४६ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V47",
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| "children": [
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| "text": "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V48",
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| "type": "shloka",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| "tag": "line",
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| "text": "सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "id": "bhashya-BGT_C18_V48"
| |
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| "children": [
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| |
| "id": "BGT_C18_V48_B01"
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| "children": [
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
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| "type": "Bhagavathe_id"
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| "text": "'क्षत्रियोनब्रह्मगुणो वैश्यः कृष्यादिजीवनः ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tail": "\u003Eतत ऊनः शमाद्यैर्यः शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अधिकाश्चेद् गुणाः शूद्रे ब्राह्मणादिः स उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्राह्मणोप्यल्पगुणकः शूद्र एवेति कीर्तितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।नरोपि यो देवगुणो ज्ञेयो देवो नृतां गतः'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'' इति वचनाच्च क्षत्रियादिष्वपि शमाद्यनुवृत्ति-र्ज्ञायते । न हि शमादिकं विना तस्याभितोर्चनं भवति । सम्यक् शमादिभिरर्चनं ह्यभ्यर्चनम् । न च शमादीन् विना सिदि्धं विन्दति । 'यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यम्'' इत्युक्तत्वाच्च । 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' इति हि भागवते । न च क्षत्रियादिभिरपि शौचतपःक्षमा(शमा)दिभिर्हीनैर्भाव्यमिति तत्तद्धर्मेषूच्यते । युक्ता ह्येतैः सर्वैर्गुणैर्जनकतुलाधारादयः । अतो युद्धेपलायनमैश्वर्यं च क्षत्रियस्य विशेषगुणौ । तौ, च कृष्यादयः, जीवनार्थं शुश्रूषा, याजनं, जीवनार्थं प्रतिग्रहश्चेत्येत एवान्येषां परधर्माः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं दानं च क्षत्रियेधिकाः ।"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ]
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्धीना ब्राह्मणे तस्माद् वैश्ये शूद्रे ततोल्पकाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अध्यापनं च शुश्रूषा जीवनार्थमृते सदा (सताम्) ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विप्रादिषु क्रमात् ज्ञेयाः शूद्रस्याध्यापनं विना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्माच्छूद्रोल्पशुश्रूषुः स्वभावाज्जीवनं विना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एते नैसर्गिका भावाः स्याद् भावोन्योपि कुत्रचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बलाद् विरुद्धभावस्तु हेयः स्वाभाविकोपि यः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनिसर्गोपि हि शुभो वर्धनीयः प्रयत्नतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "याजनैश्वर्यपूर्वास्तु नान्यैः कार्याः शुभा अपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपलायनं च शूद्राणां ब्रह्मक्षत्रार्थमिष्यते'' ॥ इति च ।"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "br"
| |
| },
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| {
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| |
| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
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| "type": "Vyasasmruthi_id"
| |
| },
| |
| "text": "'प्रसह्य वित्ताहरणं शारीरो दण्ड एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अशिष्याणां शासनं च तथैवार्थविनाशनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एष ईश्वरभावः स्यान्न कार्यः क्षत्रियेतरैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वे विधर्मिणः शास्याः क्षत्रियैर्यत्नतः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अङ्गाद्यहानिकृद् दण्डः शिष्येषु ब्राह्मणादिभिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कार्यो देहेपि शिष्यश्च स्वामिना स्वेन वार्पितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुत्रानुजादयः सर्वे शिष्या एव निसर्गतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गुरवश्चैव मित्राणि सखिसब्रह्मचारिणः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सम्बन्धिनश्च सर्वेपि तत्तद्योग्यतयाखिलैः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शिक्षणीयेषु भावेषु शिक्षणीयाः प्रयत्नतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उन्मादे बन्धानाद्यैर्वा ताडनं न गुरोः क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पापं चरन्तस्त्वन्येपि सर्वैर्दृष्टिपथं गताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शक्तितो वारणीयाः स्युर्देशकालानुसारतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदुत्तमविरोद्धारः सन्त्याज्या गुरवोपि तु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथाशक्त्यनुशास्यैव कालतोपि न चेच्छुभाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णौ परमभक्तस्तु न त्याज्यः शास्य एव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शिक्षयंश्च गुरून् शिष्यो गुरुवन्नैव शिक्षयेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महान्तो नानुशास्याश्च विरुद्धाचरिता अपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदि च स्वोत्तमानां ते विरोधं नैव कुर्वते'' ॥ इत्यादि च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'आपत्सु विप्रः क्षात्रं तु विशां वा धर्ममाचरेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षात्रासिद्धौ न शूद्रस्तु विप्रक्षत्रिययोः क्वचित् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षत्रियो ब्राह्ममापत्सु तदापत्सु विशामपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षत्रियो विप्रधर्मापि नैव भैक्ष्यप्रतिग्रही ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वैश्य आपत्सु शौद्रं तु धर्ममेकं न चापरम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "\u003Eशूद्र आपत्सु विड्धर्मा तदापत्सु च कारुकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शूद्रस्तु वैश्यधर्मापि नैव वेदाक्षरो भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत्यापदि क्षत्रियोपि पादशुश्रूषणं विना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शौद्रधर्मं चरन् विप्रक्षत्रियेषु न दुष्यति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "येषु कर्मसु याच्यः स्यात् स्वामिनापि न याचिता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शौद्राण्यपि स्वधर्मत्वे क्षत्रियस्यापदो यदि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आत्मनश्चेद् बलाधिक्यं सानुबन्धादपि प्रभोः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "धर्मार्थं सेवतोर्थार्थं विप्रधर्माधिकाद् वरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रभुणा याच्यवृत्तिस्तु विशेषेणापि धर्मभाक् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बाह्वोर्बलेधिको यः स्यात् क्षत्रियो विद्ययाधिकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विप्रो भागवतौ चैतौ सेशा लोकास्तयोरिमे'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति व्यासस्मृऽतौ ।॥ ४४-४८ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "BGT_C18_V49",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "असक्तबुदि्धः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।",
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| "text": "नैष्कर्म्यसिदि्धं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥",
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| |
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| "text": "'नैष्कर्म्यसिदि्धम्'' अनिष्टसर्वकर्मनाशाख्यसिदि्धम् ॥ ४९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "सिदि्धं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "adhikarana": ""
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| |
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "type": "Vakshya_id"
| |
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| "text": "वक्ष्यमाणप्रकारेण वर्तमानस्तदनन्तरं नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मा-ख्यायाः महालक्ष्म्याः सकाशं यथाप्नोति तथा निबोध । 'मम योनिर्महद् ब्रह्म'' 'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्'' इत्युक्तत्वात् । 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'' इत्युक्त्वा 'मद्भक्तिं लभते पराम्''"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति वक्ष्यमाणत्वाच्च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavaraha_id"
| |
| },
| |
| "text": "'सर्वपापक्षयाद् देहं त्यक्त्वा देवान् क्रमाद् व्रजन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्य लक्ष्मीं तत्प्रसादात् पुनः स्वृद्धा हरौ यदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भक्तिस्तया पुनर्ज्ञाने स्वृद्धे विष्णुं प्रपद्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपरोक्षदृशो विष्णोः शरीरेपि सतः पुरा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्यक्तदेहादिकस्यापि यावद् विष्णुं प्रपद्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तावद् गुणा विवर्धन्ते स्थिताः स्युः प्राप्य केशवम्'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महावराहे॥ ५०-५२ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V53",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V53"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V53_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'विमुच्य निर्ममः शान्तः'' नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मणि भूयाय भवतीत्यर्थः ॥ ५३ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V54",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V55",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्त्या मां अभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V56",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V56"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V56_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विहितानि सर्वकर्माण्यपि मद्व्यपाश्रयो भूत्वा सदा कुर्वाणः । न हि यथेष्टाचरणे तात्पर्यमत्र । तथा सति विहिताकरणेपि समत्वात् 'मामनुस्मर युद्ध्य च'' 'ततः स्वधर्मं किर्तिं च'' इत्यादिप्रस्तुतविरोधः । अपिशब्दस्त्वेकमपि कर्मातदाश्रयेण न कार्यमित्यर्थे ॥ ५६ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V57",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बुदि्धयोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V57"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V57_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भगवत्संश्रितस्य त्रैविद्यस्य च चेतसैव विशेष इत्याहचेतसा सर्व-कर्माणीति । स एव सर्वस्मात् परम इति भावोस्येति तत्परः । तत्र चित्तवृत्तिनिरोधोपि यो बुदि्धयोगः प्रत्याहारादिः ॥ ५७ ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V58",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V59",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V60",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत्॥६० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V60"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V60_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृतिरीश्वरेच्छा । 'प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छानन्त कथ्यते'' इत्यादि-वचनात् । एषा तु 'प्रकृत्यैव च कर्माणि'' इत्यादिष्वपि युज्यते । तस्या एव हि मुख्यतो नियोक्तृत्वं स्वभावकर्मादिभिर्बद्ध्वा ॥ ५९,६० ॥",
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V61",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V62",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V63",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V64",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V65",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V65"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V65_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "तदेवाह ईश्वरः सर्वभूतानामिति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'निश्चितार्थः स तु ज्ञेयो यत्रात्मैव परोक्षतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उच्यते विष्णुना यद्वत् तद् ब्रह्मेत्यादि कथ्यते'' ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'मन्मनाः'' इत्युपसंहाराच्च ॥६१ ॥ शाश्वतं स्थानं वैकुण्ठादि- 'श्रीरेव लोकरूपेण विष्णोस्तिष्ठति सर्वदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतो हि वैष्णवा लोका नित्यास्ते चेतना अपि'' ॥ इत्याग्नेये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च'' इत्याद्युक्तं च ॥६२ ॥ तत्त्वसारकथनं 'द्वाविमौ पुरुषौ'' इत्यत्रैवोपसंहृतम् । तत्त्वप्रशंसार्थमेव तद्बुदि्धप्रशंसा कृता । अत्र तु साधनसारोपसंहारः सर्वगुह्यतममिति । 'मन्मनाः'' इत्यादेः पूर्वमेवोक्तत्वात् भूय इति । अर्थतस्त्वत्रापि विष्ण्वाधिक्यमेवोक्तं भवति ॥ ६४,६५ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V66",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V66"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V66_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahavishnu_id"
| |
| },
| |
| "text": "अन्यसर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्तशेषत्वेनैव सर्वधर्मानिति वचनम् । 'मामेकं शरणं व्रज'' इत्यपि 'मन्मना'' इत्याद्युक्तनिगमनात्मना तद्व्याख्यानम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वं तत्र मनः सदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वाधिकप्रेमयुक्तं सर्वस्यात्र समर्पणम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोहमिति स्मृऽतिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरणागतिरेषा स्याद् विष्णौ मोक्षफलप्रदा'' ।"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति महाविष्णुपुराणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनादिजन्मकृतसर्वपापेभ्यः । अत्र प्राप्त्यभावात् । धर्मपरित्यागे पापपरित्यागस्य कैमुत्येनैव सिद्धत्वात् ॥६६ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V67",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योभ्यसूयति॥६७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V67"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V67_B01"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Sbhbdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "अतपस्कायैव न वाच्यम् । अशुश्रूषवे पुनश्चेति दोषाधिक्यमशुश्रूषोर्दर्शयितुं चशब्दः । एवमभक्ताय कदापि न वाच्यम् । कदाचिदल्पतपसोल्पशुश्रूषोरपि भक्त्याधिक्ये वाच्यं भवतीति कदाचनेति विशेषः । अभक्ताच्च न वाच्यमसूयोरिति तत्रापि चशब्दः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "'समुच्चये तथाधिक्ये न्यूनत्वे चः प्रयुज्यते'' ।"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "'अभक्तादपि पापः स्यादसूयुर्दोषदृग् यतः'' "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति च पाद्मे ॥६७ ॥\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V68",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V69",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V70",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V71",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "॥७१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V72",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कच्चिदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V73",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "अर्जुन उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नष्टो मोहः स्मृऽतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थितोस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V74",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "uvaaca",
| |
| "text": "सञ्जय उवाच",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V75",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यासप्रसादात् श्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V76",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राजन् संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य संवादमिममद्भुतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V77",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तच्च संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V78",
| |
| "type": "shloka",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नाम अष्टादशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये अष्टादशोध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "गीताप्रस्थानं समाप्तम् श्रीकृष्णार्पणमस्तु",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-BGT_C18_V78"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "BGT_C18_V78_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'सोपि मुक्तः'' 'न च तस्मान्मनुष्येषु'' इत्युक्तेश्च मुक्तानां महत् तारतम्यं ज्ञायते । 'मनुष्येषु'' इति विशेषणात् तत्रापि देवानामाधिक्यं च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "'मुक्तिर्ज्ञात्वापि विष्णुं स्याच्छास्त्रं श्रुत्वा ततोधिकम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तौ सुखं तत्पठतस्ततोप्यधिकमिष्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्याख्यातुस्तु समं मुक्तौ सुखं नान्यस्य कस्यचित् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततोधिकं तु देवानां मुख्यव्याख्याकृतो यतः'' ॥ इति ॥ ६८-७२ ॥ 'यथेच्छसि तथा कुरु'' इत्याक्षेपपरिहाराय 'करिष्ये वचनं तव'' इत्यनुसरति भगवन्तम् ॥ ७३-७८ ॥ नमस्ते वासुदेवाय प्रेयसां मे प्रियोत्तम ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समस्तगुणसम्पूर्णनिर्दोषानन्ददायिने ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेव हि कृतो ग्रन्थोमुना केशवे ॥ निःशेषदोषरहित कल्पाणाखिलसद्गुण ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतिस्वयम्भुशर्वादिवन्द्यं त्वां नौमि मे प्रियम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "text": "समस्तगुणसम्पूर्णं सर्वदोषविवर्जितम् ।\nनारायणं नमस्कृत्य गीतातात्पर्यमुच्यते ॥" | | "lines": [ |
| | "समस्तगुणसम्पूर्णं सर्वदोषविवर्जितम् ।", |
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| | "शास्त्रेषु भारतं सारं तत्र नामसहस्रकम् ।", |
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| "text": "न भारतसमं शास्त्रं कुत एवानयोः समम् ।\nभारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ॥" | | "lines": [ |
| | "न भारतसमं शास्त्रं कुत एवानयोः समम् ।", |
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| "text": "देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैर्ऋषिभिश्च समन्वितैः ।\nव्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ।\nमहत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ॥" | | "lines": [ |
| | "देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैर्ऋषिभिश्च समन्वितैः ।", |
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| "text": "निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।\nस्वयं नारायणो देवैर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकैः ॥" | | "lines": [ |
| | "निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।", |
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| "text": "अर्थितो व्यासतां प्राप्य केवलं तत्त्वनिर्णयम् ।\nचकार पञ्चमं वेदं महाभारतसञ्ज्ञितम् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।\nतत्र साक्षादिन्द्रावतारमुत्तमाधिकारिणमात्मनः प्रियतमर्जुनं क्षत्रियाणां विशेषतोपि परमधर्मं नारायणद्वितदनुबन्धिनिग्रहं बन्धुस्नेहादधर्मत्वेनाशङ्क्य ततो निवृत्तप्रायं स्वविहितवृत्त्या भक्त्या भगवदाराधनमेव परमो धर्मः, तद्विरुद्धः सर्वोप्यधर्मः, भगवदधीनत्वात् सर्वस्येति बोधयति भगवान् नारायणः । सर्वं चैतदत्रैवावगम्यते -" | | "lines": [ |
| | "अर्थितो व्यासतां प्राप्य केवलं तत्त्वनिर्णयम् ।", |
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| | "तत्र साक्षादिन्द्रावतारमुत्तमाधिकारिणमात्मनः प्रियतमर्जुनं क्षत्रियाणां विशेषतोपि परमधर्मं नारायणद्वितदनुबन्धिनिग्रहं बन्धुस्नेहादधर्मत्वेनाशङ्क्य ततो निवृत्तप्रायं स्वविहितवृत्त्या भक्त्या भगवदाराधनमेव परमो धर्मः, तद्विरुद्धः सर्वोप्यधर्मः, भगवदधीनत्वात् सर्वस्येति बोधयति भगवान् नारायणः । सर्वं चैतदत्रैवावगम्यते -" |
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| | "''अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।", |
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| | "इत्यादिना युद्धस्य स्वधर्मत्वम् ।", |
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| | "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।", |
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| | "सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।", |
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| | "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।", |
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| | "इत्यादिना स्वधर्मेणैव भगवदाराधनस्यैव कर्तव्यत्वं तदन्यस्य त्याज्यत्वं च ।", |
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| | "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।", |
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| "text": "इत्यादिना विष्णुभक्तेरेव सर्वसाधनोत्तमत्वं परोक्षापरोक्षज्ञानयोर्ज्ञानिनोपि मोक्षस्य तदधीनत्वं च ।\nमत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।\nनिर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ (११-५५)" | | "lines": [ |
| | "इत्यादिना विष्णुभक्तेरेव सर्वसाधनोत्तमत्वं परोक्षापरोक्षज्ञानयोर्ज्ञानिनोपि मोक्षस्य तदधीनत्वं च ।", |
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| | "इत्यादिना भक्तस्यापि तत्कर्म विकर्मत्यागश्च ।", |
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| | "'भूतभृन्न च भूतस्थः'' ... । (९-५)" |
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| | "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।", |
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| | "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।", |
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| "text": "इत्यादिना सर्वस्माद् भगवतो भेदः, सर्वस्य तदधीनत्वं, तस्यानन्याधीनत्वं, सर्वोत्तमत्वं, सर्वगुणपूर्णत्वं, सर्वशास्त्राणां तत्परत्वं, तथा तज्ज्ञानादेव मोक्ष इत्यादि ।\n'अधा ते विष्णो विदुषा• चिदर्ध्यः स्तोमो• यज्ञश्च राध्यो• हविष्म•ता'' । (ऋ.मं १, सू. १५६-१)" | | "lines": [ |
| | "इत्यादिना सर्वस्माद् भगवतो भेदः, सर्वस्य तदधीनत्वं, तस्यानन्याधीनत्वं, सर्वोत्तमत्वं, सर्वगुणपूर्णत्वं, सर्वशास्त्राणां तत्परत्वं, तथा तज्ज्ञानादेव मोक्ष इत्यादि ।", |
| | "'अधा ते विष्णो विदुषा• चिदर्ध्यः स्तोमो• यज्ञश्च राध्यो• हविष्म•ता'' । (ऋ.मं १, सू. १५६-१)" |
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| "text": "पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्माविचारयन् ।\nयदात्मनः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात् ।\nभक्त्या प्रसन्नः परमो दद्याज्ज्ञानमनाकुलम् ।\nभक्तिं च भूयसीं ताभ्यां प्रसन्नो दर्शनं व्रजेत् ॥" | | "lines": [ |
| | "पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्माविचारयन् ।", |
| | "यदात्मनः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात् ।", |
| | "भक्त्या प्रसन्नः परमो दद्याज्ज्ञानमनाकुलम् ।", |
| | "भक्तिं च भूयसीं ताभ्यां प्रसन्नो दर्शनं व्रजेत् ॥" |
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| "text": "ततोपि भूयसीं भक्तिं दद्यात्ताभ्यां विमोचयेत्\nमुक्तोपि तद्वशो नित्यं भूयो भक्तिसमन्वितः ।\nसान्द्रानन्दस्वरूपैव भक्तिर्नैवात्र साधनम्\nब्रह्मरुद्ररमादिभ्योप्युत्तमत्वं स्वतन्त्रताम् ॥" | | "lines": [ |
| | "ततोपि भूयसीं भक्तिं दद्यात्ताभ्यां विमोचयेत्", |
| | "मुक्तोपि तद्वशो नित्यं भूयो भक्तिसमन्वितः ।", |
| | "सान्द्रानन्दस्वरूपैव भक्तिर्नैवात्र साधनम्", |
| | "ब्रह्मरुद्ररमादिभ्योप्युत्तमत्वं स्वतन्त्रताम् ॥" |
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| | "सर्वस्य तदधीनत्वं सर्वसद्गुणपूर्णताम् ।", |
| | "निर्दोषत्वं च विज्ञाय विष्णोस्तत्राखिलाधिकः ॥" |
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| | "स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तः सर्वोपायोत्तमोत्तमः ।", |
| | "तेनैव मोक्षो नान्येन दृष्ट्यादिस्तस्य साधनम् ॥" |
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| "text": "अधमाधिकारिणो मर्त्या मुक्तावृष्यादिकाः समाः ।\nअधिकार्युत्तमा देवाः प्राणस्तत्रोत्तमोत्तमः ।\nनैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः ।\nतिरोहितं तथाप्येते शृण्वन्ति क्रीडयाथवा ॥" | | "lines": [ |
| | "अधमाधिकारिणो मर्त्या मुक्तावृष्यादिकाः समाः ।", |
| | "अधिकार्युत्तमा देवाः प्राणस्तत्रोत्तमोत्तमः ।", |
| | "नैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः ।", |
| | "तिरोहितं तथाप्येते शृण्वन्ति क्रीडयाथवा ॥" |
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| | "बहुवारतदभ्यासात्तिरोभावोपि नो भवेत् ।", |
| | "यथा व्यासानुशिष्टानां देवानां क्षत्रजन्मनाम् ॥" |
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| "text": "पार्थानामतिरोधानं ज्ञानं सुस्थिरतां गतम् ।\nअस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।\nविदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विना विरावत् ॥ (ऋ. ७-४०-५)" | | "lines": [ |
| | "पार्थानामतिरोधानं ज्ञानं सुस्थिरतां गतम् ।", |
| | "अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।", |
| | "विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विना विरावत् ॥ (ऋ. ७-४०-५)" |
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| "text": "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।\nस मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत्तत एते व्यजायन्त" | | "lines": [ |
| | "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।", |
| | "स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत्तत एते व्यजायन्त" |
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| | "विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा इति'' ।श्व" |
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| "text": "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः'' ।\n'वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।\n'यं यं कामयते विष्णुस्तं ब्रह्माणं च शङ्करम् ।\nशक्रं सूर्यं यमं स्कन्दं कुर्यात् कर्तास्य न क्वचित्'' ॥" | | "lines": [ |
| | "'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः'' ।", |
| | "'वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।", |
| | "'यं यं कामयते विष्णुस्तं ब्रह्माणं च शङ्करम् ।", |
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| "text": "सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।\nअवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।\n'परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति'' । (ऋ. ६-९९-१)" | | "lines": [ |
| | "सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।", |
| | "अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।", |
| | "'परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति'' । (ऋ. ६-९९-१)" |
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| "text": "'अनन्तगुणमाहात्म्यो निर्दोषो भगवान् हरिः ।\nन समो वाधिको वापि विद्यते तस्य कश्चन ।\nनासीन्न च भविष्यो वा परतः स्वत एव च'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।\n'यस्त्वात्मरतिरेव स्याद्'' इत्यादि तु मुक्तविषयम् ।\nयस्त्वेवात्मरतो मुक्तः कार्यं तस्यैव नास्ति हि ।\nतस्मात् कुर्वीत कर्माणीत्याह कृष्णोर्जुनं स्मयन् ॥ इति च स्कान्दे ।\nज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् इत्यादि तु बाह्यकर्मसङ्कोचापेक्षया ।\nन हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (३-५)" | | "lines": [ |
| | "'अनन्तगुणमाहात्म्यो निर्दोषो भगवान् हरिः ।", |
| | "न समो वाधिको वापि विद्यते तस्य कश्चन ।", |
| | "नासीन्न च भविष्यो वा परतः स्वत एव च'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।", |
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| | "यस्त्वेवात्मरतो मुक्तः कार्यं तस्यैव नास्ति हि ।", |
| | "तस्मात् कुर्वीत कर्माणीत्याह कृष्णोर्जुनं स्मयन् ॥ इति च स्कान्दे ।", |
| | "ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् इत्यादि तु बाह्यकर्मसङ्कोचापेक्षया ।", |
| | "न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (३-५)" |
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| | "एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।", |
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| | "'ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत ।''" |
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| "text": "न सर्वकर्मणां त्यागः कस्यचिद् भवति क्वचित् ।\nत्यागिनो यतयोपि स्युः सङ्कोचाद् बाह्यकर्मणाम् । इत्यादि ।\n'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः'' इत्यादि चोत्पन्नज्ञानतिरो-भावनिवृत्त्यर्थम् ॥" | | "lines": [ |
| | "न सर्वकर्मणां त्यागः कस्यचिद् भवति क्वचित् ।", |
| | "त्यागिनो यतयोपि स्युः सङ्कोचाद् बाह्यकर्मणाम् । इत्यादि ।", |
| | "'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः'' इत्यादि चोत्पन्नज्ञानतिरो-भावनिवृत्त्यर्थम् ॥" |
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| "text": "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।\nमामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१ ॥" | | "lines": [ |
| | "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।", |
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| "text": "दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।\nआचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥" | | "lines": [ |
| | "दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।", |
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| | "युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।", |
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| | "अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।", |
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| | "अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।", |
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| "text": "दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।\nउत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३ ॥" | | "lines": [ |
| | "दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।", |
| | "उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३ ॥" |
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| "text": "उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।\nनरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४ ॥" | | "lines": [ |
| | "उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।", |
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| | "अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।", |
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| | "यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।", |
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| | "एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।", |
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| | "तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।", |
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| | "कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।", |
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| "text": "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।\nक्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥" | | "lines": [ |
| | "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।", |
| | "क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥" |
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| | "कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।", |
| | "इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥" |
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| | "गुरूनहत्वा हि महानुभावान्", |
| | "श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।", |
| | "हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव", |
| | "भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५ ॥" |
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| | "न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो", |
| | "यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।", |
| | "यानेव हत्वा न जिजीविषाम–", |
| | "स्तेवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६ ॥" |
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| | "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः", |
| | "पृच्छामि त्वा धर्मसम्मूढचेताः ।", |
| | "यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे", |
| | "शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥" |
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| "text": "न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्\nयच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।\nअवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं\nराज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८ ॥" | | "lines": [ |
| | "न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्", |
| | "यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।", |
| | "अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं", |
| | "राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८ ॥" |
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| | "एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।", |
| | "न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥" |
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| | "तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।", |
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| | "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।", |
| | "गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥" |
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| "text": "प्रकर्षेण जानन्तीति प्रज्ञाः, तदवादः प्रज्ञावादः । प्राज्ञमतविरुद्धवादं वदसि । कथम् ? गतासून् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रकर्षेण जानन्तीति प्रज्ञाः, तदवादः प्रज्ञावादः । प्राज्ञमतविरुद्धवादं वदसि । कथम् ? गतासून् ॥ ११ ॥" |
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| "text": "न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।\nन चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।", |
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| "text": "बन्धुस्नेहादि्ध त्वया स्वधर्मनिवृत्तिः क्रियते । तत्र देहनाशभयात् किं वा चेतननाशभयात्? देहस्य सर्वथा विनाशित्वान्न तत्र भये प्रयोजनम् । न च चेतननाशभयात् । तस्याविनाशित्वादेव । न तावत्परमचेतनस्य मम नाशोस्ति । एवमेव तवान्येषां च ।\n'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्'' ॥ इत्यादिश्रुतेः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skanda-id\"\u003E'स्वदेहयोगविगमौ नाम जन्ममृती पुरा ।\u003Cbr/\u003Eइष्येते ह्येव जीवस्य मुक्तेर्न तु हरेः क्वचित्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति स्कान्दे ।\nईश्वरस्यापि युद्धगतत्वान्मोहात् तस्याप्युभयविधानित्यत्वशङ्काप्राप्तौ तदपि निवार्यते न त्वेवाहमिति । यद्यप्येषा शङ्कार्जुनस्य नास्ति । तथापि प्राप्तलोकोपकारार्थं भगवता निवार्यते । एकान्ते कथयन्नपि व्यासरूपेण तदेव लोके प्रकाशयिष्यति हि ॥१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "बन्धुस्नेहादि्ध त्वया स्वधर्मनिवृत्तिः क्रियते । तत्र देहनाशभयात् किं वा चेतननाशभयात्? देहस्य सर्वथा विनाशित्वान्न तत्र भये प्रयोजनम् । न च चेतननाशभयात् । तस्याविनाशित्वादेव । न तावत्परमचेतनस्य मम नाशोस्ति । एवमेव तवान्येषां च ।", |
| | "'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्'' ॥ इत्यादिश्रुतेः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skanda-id\"\u003E'स्वदेहयोगविगमौ नाम जन्ममृती पुरा ।\u003Cbr/\u003Eइष्येते ह्येव जीवस्य मुक्तेर्न तु हरेः क्वचित्'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति स्कान्दे ।", |
| | "ईश्वरस्यापि युद्धगतत्वान्मोहात् तस्याप्युभयविधानित्यत्वशङ्काप्राप्तौ तदपि निवार्यते न त्वेवाहमिति । यद्यप्येषा शङ्कार्जुनस्य नास्ति । तथापि प्राप्तलोकोपकारार्थं भगवता निवार्यते । एकान्ते कथयन्नपि व्यासरूपेण तदेव लोके प्रकाशयिष्यति हि ॥१२ ॥" |
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| "text": "देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।\nतथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥" | | "lines": [ |
| | "देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।", |
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| "text": "मम स्वकीयदेहान्तरप्राप्तिरपि नास्तीति दर्शयितुं देहिन इति विशेषणम् । भवदादीनां सा भविष्यतीत्यपि शोको न कर्तव्यः । देहस्येदानी- मप्यन्यथात्वदर्शनात् ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "मम स्वकीयदेहान्तरप्राप्तिरपि नास्तीति दर्शयितुं देहिन इति विशेषणम् । भवदादीनां सा भविष्यतीत्यपि शोको न कर्तव्यः । देहस्येदानी- मप्यन्यथात्वदर्शनात् ॥ १३ ॥" |
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| | "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।", |
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| | "तददर्शनादिनिमित्तं सोढव्यमित्याह - मात्रास्पर्शा इति । विषयसम्बन्धाः ॥ १४ ॥" |
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| "text": "फलमाह । यं हीति । न केवलमव्यथामात्रेणामृतत्वं किन्तु पुरुषम् ।\n'पुरु ब्रह्म गुणाधिक्यात् तज्ज्ञानात्पुरुषः स्मृतः'' । इति प्रवृत्ते । पुरुसरणात् पुरुष इत्यर्थः ॥१५ ॥" | | "lines": [ |
| | "फलमाह । यं हीति । न केवलमव्यथामात्रेणामृतत्वं किन्तु पुरुषम् ।", |
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| "text": "नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सतः ।\nउभयोरपि दृष्टोन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eन च युद्धात्परलोकदुःखमिति शोकः । असत्कर्मणः सकाशात् भावो नास्ति सत्कर्मणः सकाशात् अभावो नास्तीति नियतत्वात् ।\u003Cbr/\u003E'सद्भाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते सुखवाचकाः ।\u003Cbr/\u003Eअभाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते दुःखवाचकाः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vakshaya-id\"\u003E'सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।\u003Cbr/\u003Eप्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥''\u003C/span\u003E\nइति वक्ष्यमाणत्वात् ।\n(गीता. १७-२६)\n'असन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत्'' इत्यादेश्च ।\nअन्तो निर्णयः । न चाविद्यामानविद्यमानयोरुत्पत्तिनाशनिषेधकोयं श्लोकः । प्रत्यक्षविरोधात् । सन्निति व्यवह्रियमाणमेव पदार्थस्वरूपमुत्पत्तेः प्राङ्ग्नाशोत्तरं च नास्तीति सर्वलोको व्यवहरति । न च विपर्यये किञ्चिन्मानम् । इदं तु वाक्यमन्यथासिद्धम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'आद्यन्तयोः सर्वकार्यमसदेवेति निश्चितम् ।\u003Cbr/\u003Eयद्यसन्न विशेषोत्र जायते कोत्र जायते ॥\u003Cbr/\u003Eव्यक्तावपि समं ह्येतदनवस्थान्यथा भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eएवं नाशेपि बोद्धव्यमतोसन्नेव जायते ॥\u003Cbr/\u003Eतथाप्यभेदानुभवात् कार्यकारणयोः सदा ।\u003Cbr/\u003Eभेदस्य चाविशेषेण देहोगात् क्षितितामिति ॥ व्यवहारो भवेद्यस्माद्बल्येवानुभवः सदा ॥''\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मतर्के ।\nन च सदसद्विलक्षणं किञ्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न चासतः ख्यात्ययोगात् सतो बाधायोगादुभयविलक्षणं भ्रान्तिविषयम् । असतः ख्यात्ययोगादिति वदतोसतः ख्यातिरभून्न वा ? यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् तथापि । न चासतोसत्वेन भ्रान्तौ सत्वेन च ख्यातिर्नास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । असद्व्यवहारलोपप्रसङ्गाच्च । यदविद्यमानं रूपं तस्य सत्त्वेन प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वाच्च । अनिर्वचनीयत्वपक्षेपि सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्त्वप्रतीतिं विना न हि भ्रान्तित्वम् । भ्रान्तिसत्त्वाङ्गीकारेप्यभ्रान्तं सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्वप्रतीतौ हि प्रवर्तते । तस्मादुभयविलक्षणं न किञ्चित् ।\n'विश्वं सत्यम्'' । 'यच्चिकेत सत्यमित्'' । 'कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः'' इत्यादिश्रुतेश्च ॥१६ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eन च युद्धात्परलोकदुःखमिति शोकः । असत्कर्मणः सकाशात् भावो नास्ति सत्कर्मणः सकाशात् अभावो नास्तीति नियतत्वात् ।\u003Cbr/\u003E'सद्भाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते सुखवाचकाः ।\u003Cbr/\u003Eअभाववाचिनः शब्दाः सर्वे ते दुःखवाचकाः'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vakshaya-id\"\u003E'सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।\u003Cbr/\u003Eप्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥''\u003C/span\u003E", |
| | "इति वक्ष्यमाणत्वात् ।", |
| | "(गीता. १७-२६)", |
| | "'असन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत्'' इत्यादेश्च ।", |
| | "अन्तो निर्णयः । न चाविद्यामानविद्यमानयोरुत्पत्तिनाशनिषेधकोयं श्लोकः । प्रत्यक्षविरोधात् । सन्निति व्यवह्रियमाणमेव पदार्थस्वरूपमुत्पत्तेः प्राङ्ग्नाशोत्तरं च नास्तीति सर्वलोको व्यवहरति । न च विपर्यये किञ्चिन्मानम् । इदं तु वाक्यमन्यथासिद्धम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'आद्यन्तयोः सर्वकार्यमसदेवेति निश्चितम् ।\u003Cbr/\u003Eयद्यसन्न विशेषोत्र जायते कोत्र जायते ॥\u003Cbr/\u003Eव्यक्तावपि समं ह्येतदनवस्थान्यथा भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eएवं नाशेपि बोद्धव्यमतोसन्नेव जायते ॥\u003Cbr/\u003Eतथाप्यभेदानुभवात् कार्यकारणयोः सदा ।\u003Cbr/\u003Eभेदस्य चाविशेषेण देहोगात् क्षितितामिति ॥ व्यवहारो भवेद्यस्माद्बल्येवानुभवः सदा ॥''\u003C/span\u003E", |
| | "इति ब्रह्मतर्के ।", |
| | "न च सदसद्विलक्षणं किञ्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न चासतः ख्यात्ययोगात् सतो बाधायोगादुभयविलक्षणं भ्रान्तिविषयम् । असतः ख्यात्ययोगादिति वदतोसतः ख्यातिरभून्न वा ? यदि नाभूत् न तत्ख्यातिनिराकरणम् । यद्यभूत् तथापि । न चासतोसत्वेन भ्रान्तौ सत्वेन च ख्यातिर्नास्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । असद्व्यवहारलोपप्रसङ्गाच्च । यदविद्यमानं रूपं तस्य सत्त्वेन प्रतीतेरेव भ्रान्तित्वाच्च । अनिर्वचनीयत्वपक्षेपि सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्त्वप्रतीतिं विना न हि भ्रान्तित्वम् । भ्रान्तिसत्त्वाङ्गीकारेप्यभ्रान्तं सदिदं रजतमित्यविद्यमानसत्वप्रतीतौ हि प्रवर्तते । तस्मादुभयविलक्षणं न किञ्चित् ।", |
| | "'विश्वं सत्यम्'' । 'यच्चिकेत सत्यमित्'' । 'कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः'' इत्यादिश्रुतेश्च ॥१६ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।\nविनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥" | | "lines": [ |
| | "अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।", |
| | "विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id\"\u003Eयद्यपि नित्यत्वं जीवस्याप्यस्ति । तथापि सर्वप्रकारेणाविनाशित्वं विष्णोरेवेति तुशब्दः ।\u003Cbr/\u003E'अनित्यत्वं देहहानिर्दुःखप्राप्तिरपूर्णता ।\u003Cbr/\u003Eनाशश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तदभावो हरेः सदा ।\u003Cbr/\u003Eतदन्येषां तु सर्वेषां नाशाः केचिद् भवन्ति हि'' ॥\u003C/span\u003E\nइति महावाराहे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id\"\u003E'देशतः कालतश्चैव गुणतश्च त्रिधा ततिः ।\u003Cbr/\u003Eसा समस्ता हरेरेव न ह्यन्ये पूर्णसद्गुणाः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति परमश्रुतिः ॥१७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id\"\u003Eयद्यपि नित्यत्वं जीवस्याप्यस्ति । तथापि सर्वप्रकारेणाविनाशित्वं विष्णोरेवेति तुशब्दः ।\u003Cbr/\u003E'अनित्यत्वं देहहानिर्दुःखप्राप्तिरपूर्णता ।\u003Cbr/\u003Eनाशश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तदभावो हरेः सदा ।\u003Cbr/\u003Eतदन्येषां तु सर्वेषां नाशाः केचिद् भवन्ति हि'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति महावाराहे ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id\"\u003E'देशतः कालतश्चैव गुणतश्च त्रिधा ततिः ।\u003Cbr/\u003Eसा समस्ता हरेरेव न ह्यन्ये पूर्णसद्गुणाः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति परमश्रुतिः ॥१७ ॥" |
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| "text": "अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।\nअनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।", |
| | "अनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत॥१८ ॥" |
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| "text": "शरीरिणां तु देहहान्यादिनाशो विद्यत एव । 'येन सर्वमिदं ततम्'' इति तस्यैव लक्षणकथनात् न जीवानां देशतो गुणतश्च पूर्णता । अनिच्छया देहहान्यादेरेव दुःखावाप्तिः सिद्धा । तस्मादनाशिनोप्रमेयस्य विष्णोः पूजार्थं युद्ध्यस्व । तत्प्रसादाधीनत्वाद् दुःखनिवृत्तेः सुखस्य च ।\n'ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।\nतेषामहं समुद्धर्ता'' (गीता १२-६) इत्यादेः ।\nजीवपक्षे 'नित्यस्योक्ताः'' इत्युक्तत्वात् 'अनाशिनः'' इति पुनरुक्तिः । 'अविनाशि, येन सर्वमिदं ततम्'' इत्युक्तस्यैव 'अनाशिनोप्रमेयस्य'' इति प्रत्यभिज्ञानाच्च । 'इमे देहाः'' इति विशेषणान्नित्यश्चिदानन्दात्मकः स्वरूपभूतो देहो मुक्तानामपि विद्यत इति ज्ञायते ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।\u003Cbr/\u003Eन यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि - प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥ प्रवालवैडूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eभ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥ विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति हि भागवते ।\nचिदानन्दशरीरेण सर्वे मुक्ता यथा हरिः ।\nभुञ्जते कामतो भोगांस्तदन्तर्बहिरेव च ॥ इति परमश्रुतिः । न च जीवेश्वरैक्यं मुक्तावपि ।\n'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।\nसर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च'' । (गीता, १४-२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।\nसोश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता'' ।\n'एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।\nइमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन् ।\nएतत्सामगायन्नास्ते'' ।\n'सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः ।\nकिल्बिषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय'' ।\n'ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।\nब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः'' ।\n'परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते'' 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा'' ।\n'तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'' ।\n'मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्देहं संश्रिता अपि ।\nतारतम्येन तिष्ठन्ति गुणैरानन्दपूर्वकैः ।\nभूपा मनुष्यगन्धर्वा देवाः पितर एव च ।\nआजानेयाः कर्मदेवास्तत्त्व(रूपाः)देवाः पुरन्दरः ।\nशिवो विरिञ्चिरित्येते क्रमाच्छतगुणोत्तराः ।\nमुक्तावपि तदन्ये ये भूपाच्छतगुणावराः ।\nन समो ब्रह्मणः कश्चिन्मुक्तावपि कथञ्चन ।\nततः सहस्रगुणिता श्रीस्ततः परमो हरिः ।\nअनन्तगुणितत्वेन तत्समः परमोपि न'' ।\n'अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।\nआदघ्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ।\nकामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्द्रो परिस्रव ।\nइत्यादि मोक्षानन्तरमपि भेदवचनेभ्यः । न च 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्'' ।\n'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति'' ।\n'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते'' ।\n'अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्'' ।\n'परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'' ।\n'तत् त्वमसि'' 'अहं ब्रह्मास्मि'' इत्यादिवाक्यविरोधः ।\n'सञ्ज्ञानाशो यदि भवेत्किमुक्त्या नः प्रयोजनम् ।\nमोहं मां प्रापयामास भवानत्रेति चोदितः ।\nयाज्ञवल्क्यः प्रियामाह नाहं मोहं ब्रवीमि ते ।\nभूतजज्ञानलोपः स्यान्निजं ज्ञानं न लुप्यते ।\nन च ज्ञेयविनाशः स्यादात्मनाशः कुतः पुनः ।\nस्वभावतः पराद्विष्णोर्विश्वं भिन्नमपि स्फुटम् ।\nअस्वातन्त्र्याद्भिन्नमिव स्थितमेव यदेदृशम् ।\nतदा घ्राणादिभोगः स्यात्स्वरूपज्ञानशक्तितः ।\nतदात्मानुभवोपि स्यादीश्वरज्ञानमेव च ।\nयदान्यं न विजानाति नात्मानं नेश्वरं तथा ।\nपुरुषार्थता कुतस्तु स्यात्तदभावाय को यतेत् तस्मात्स्वभावज्ञानेन भिन्ना विष्णुसमीपगाः ।\nभुञ्जते सर्वभोगांश्च मुक्तिरेषा न चान्यथा ।\nयन्न पश्येत्परो विष्णुर्द्वितीयत्वेन स स्वतः ।\nतद्द्वितीयं न भवति प्रादुर्भावात्मकं वपुः ।\nप्रधानपुरुषादन्यद्यत्तस्माद्भिन्नमीश्वरः ।\nविभक्तत्वेन नियतं यस्मात्पश्यति सर्वदा ।\nपश्यन्नेव यतो विष्णुस्तदभेदं न पश्यति ।\nचेतनाचेतनस्यास्य नाभेदोस्ति ततोमुना ।\nन हि ज्ञानविलोपोस्ति सर्वज्ञस्य परेशितुः ।\nब्रह्माणि जीवाः सर्वेपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः नैव मुक्ता न प्रकृतिः क्वापि हि ब्रह्मवैभवम् ।\nप्राप्नुवन्त्यपि तज्ज्ञानान्निजं ब्रह्मत्वमाप्यते ।\n\u003Eयद्यस्य परमेशि(श)त्वं तदा स्याद्दुःखिता कुतः ।\nदुःखी चेत्कुत ईशत्वमनीशो ह्येव दुःखभाक् ।\nकुतः सर्वविदोज्ञत्वं क्व भ्रमोप्यज्ञतां विना ।\nतस्मान्नैवेश्वरो जीवस्तत्प्रसादात्तु मुच्यते ।\nओयत्वादहंनामा भगवान्हरिरव्ययः ।\nब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादस्म्यसावसनान्मितेः ।\nअसनादसिनामासौ तेजस्त्वात्त्वमितीरितः ।\nसर्वैः क्रियापदैश्चैव सर्वैर्द्रव्यपदैरपि ।\nसर्वैर्गुणपदैश्चैव वाच्य एको हरिः स्वयम् ।\nयुष्मत्पदैः प्रातियोग्यात्तद्युतैश्च क्रियापदैः ।\nअस्मत्पदैरान्तरत्वात्क्रियार्थैश्च तदन्वयैः ।\nपरोक्षत्वात्तत्पदैश्च मुख्यवाच्यः स एव तु ।\nसर्वान्वेदानधीत्यैव प्रज्ञाधिक्येन हेतुना श्वेतकेतुरहङ्कारात्प्रायशो नास्मि मानुषः ।\nदेवो वा केशवांशो वा नैषा प्रज्ञान्यथा भवेत् ।\nएवं महत्त्वबुद्ध्यैव दर्पपूर्णोभ्यगात्पितुः ।\nसकाशमकृताचारं तं दृष्ट्वा स्तब्धमज्ञवत् ।\nपितोवाच कुतः पुत्र स्तब्धता त्वामुपागता ।\nप्रायो नारायणं देवं नैव त्वं पृष्टवानसि ।\nयस्मिन् ज्ञाते त्वविज्ञातज्ञानादीनां फलं भवेत् ।\nप्राधान्यात्सदृशत्वाच्च तदधीनमिति स्फुटम् ।\nतत्सृष्टं चेति विज्ञातं फलवदि्ध भवेज्जगत् ।\nस्वातन्त्र्येणास्य विज्ञानं मिथ्याज्ञानमनर्थकृत् ।\nयथाचैवैकमृत्पिण्डज्ञानादेः सदृशत्वतः ।\nमृण्मयं तदकार्यं च ज्ञातं मृदिति वै भवेत् ।\nयथैव मृत्तिकेत्यादिनित्यनामप्रवेदनात् ।\nवाचारब्धमनित्यं तु ज्ञातं तन्मूलमित्यपि ।\nएवं कारणभूतोसौ भगवान्पुरुषोत्तमः ।\nप्रधानश्च स्वतन्त्रश्च तन्मूलमखिलं जगत् ।\nतदाधारं विमुक्तौ च तदधीनं सदा स्थितम् ।\nस सूक्ष्मो व्यापकः पूर्णस्तदीयमखिलं जगत् ।\nतस्मात्तदीयस्त्वमसि नैव सोसि कथञ्चन ।\nयथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा अपि ।\nयथा नद्यः समुद्रश्च यथा वृक्षपरावपि ।\nयथा धानाः परश्चैव यथैव लवणोदके ।\nयथा पुरुषदेशौ च यथाज्ञज्ञानदावपि ।\nयथा स्तेनापहार्यौ च तथा त्वं च परस्तथा ।\nभिन्नौ स्वभावतो नित्यं नानयोरेकता क्वचित् ।\nएवं भेदोखिलस्यापि स्वतन्त्रात्परमेश्वरात् ।\nपरतन्त्रं स्वतन्त्रेण कथमैक्यमवाप्नुयात् ।\nस जीवनामा भगवान्प्राणधारणहेतुतः ।\nउपचारेण जीवाख्या संसारिणि निगद्यते ।\nतदधीनमिदं सर्वं नान्याधीनः स ईश्वरः ।\nजीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा ।\nजीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ।\nजडभेदो मिथश्चेति प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।\nविष्णोः प्रज्ञामितं यस्माद्द्वैतं न भ्रान्तिकल्पितम् ।\nऔतः परमार्थोसौ भगवान्विष्णुरव्ययः ।\nपरमत्वं स्वतन्त्रत्वं सर्वशक्तित्वमेव च ।\nसर्वज्ञत्वं परानन्दः सर्वस्य तदधीनता ।\nइत्यादयो गुणा विष्णोर्नैवान्यस्य कथञ्चन ।\nअभावः परमद्वैते सन्त्येव ह्यपराणि तु ।\nविकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।\nऔतं ज्ञानिनां पक्षे न तस्माद्विद्यते क्वचिद्'' ।\nइत्यादिश्रुतिभ्योर्थान्तरस्यैवावगतत्वात् । एकपिण्डनामधेयेतिशब्दानां वैयर्थ्यं चान्यथा । न चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तत्पक्षे । न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इति व्यवहारः । नवकृत्वोपि भेद एव दृष्टान्तोक्तेश्च । तस्मादतत्त्वमसीत्येवोच्यते । ऐतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमेवासि न सोसीति वा । तदिति लिङ्गसाम्यं चात्र । अविद्यमानमेवेश्वरं सृष्ट्यादिकं चाप्राप्तमेवात्मनो भिन्नत्वेन प्रापयित्वा तन्निषेधे कथं श्रुतेरुन्मत्तवाक्यत्वं न स्यात् ? अनुवादोपि 'यदिदं वदन्ति तन्न युज्यते'' इत्यादिवाक्यं परिहारे विशेषयुक्तिं च विना न दृष्टः । अतिप्रसङ्गश्चान्यथा । अभेदानुवादेन भेदोपदेशः किमिति न स्यात् ? सर्वशाखान्ते भेदोक्तेश्चैतदेव युक्तम् ।\n'नासंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् नाप्रवक्त्र इत्याचार्या आचार्याः'' ।\n'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्'' ।\n'अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति इति ब्रह्मविदो विदुः'' ।\n'नमो विष्णवे महते करोमि'' । 'पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्'' ।\nइत्यादि । न चेश्वरस्तद्भेदो वा प्रत्यक्षादिसिद्धः । तत्पक्षे त्वैक्यादेरपि मिथ्यात्वात्स्वरूपस्य च सिद्धत्वाद्व्यर्थैव श्रुतिः । लक्षितस्वरूपस्यापि न स्वरूपाद्विशेषः । निर्विशेषत्वोक्तेः । मिथ्याविशेषोक्तौ चाप्रामाण्यं श्रुतेः । मिथ्यात्वं च मिथ्यैव तेषाम् । अतः सत्यत्वं सत्यं स्यात् । उपाधिकृतभेदेप्युपाधेर्मिथ्यात्वे त्वप्राप्तमेवोपाधिभेदं प्रापयित्वा पुनर्निषिद्ध्यत इति स एव दोषः । सत्योपाधिपक्षेपि हस्तपादाद्युपाधिभेदेपि भोक्तुरेकत्वदृष्टेरेकेनैवेश्वरेण सर्वोपाधिगतं सुखं दुःखं भुज्यतेत्येवमादयो दोषाः समा एव । अचेतनानामनुभवाभावान्न तत्साम्यम् । अतो जीवेश्वरयोर्भेद एवेति सिद्धम् ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "शरीरिणां तु देहहान्यादिनाशो विद्यत एव । 'येन सर्वमिदं ततम्'' इति तस्यैव लक्षणकथनात् न जीवानां देशतो गुणतश्च पूर्णता । अनिच्छया देहहान्यादेरेव दुःखावाप्तिः सिद्धा । तस्मादनाशिनोप्रमेयस्य विष्णोः पूजार्थं युद्ध्यस्व । तत्प्रसादाधीनत्वाद् दुःखनिवृत्तेः सुखस्य च ।", |
| | "'ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।", |
| | "तेषामहं समुद्धर्ता'' (गीता १२-६) इत्यादेः ।", |
| | "जीवपक्षे 'नित्यस्योक्ताः'' इत्युक्तत्वात् 'अनाशिनः'' इति पुनरुक्तिः । 'अविनाशि, येन सर्वमिदं ततम्'' इत्युक्तस्यैव 'अनाशिनोप्रमेयस्य'' इति प्रत्यभिज्ञानाच्च । 'इमे देहाः'' इति विशेषणान्नित्यश्चिदानन्दात्मकः स्वरूपभूतो देहो मुक्तानामपि विद्यत इति ज्ञायते ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।\u003Cbr/\u003Eन यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि - प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥ प्रवालवैडूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eभ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥ विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति हि भागवते ।", |
| | "चिदानन्दशरीरेण सर्वे मुक्ता यथा हरिः ।", |
| | "भुञ्जते कामतो भोगांस्तदन्तर्बहिरेव च ॥ इति परमश्रुतिः । न च जीवेश्वरैक्यं मुक्तावपि ।", |
| | "'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।", |
| | "सर्गेपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च'' । (गीता, १४-२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।", |
| | "सोश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता'' ।", |
| | "'एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।", |
| | "इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन् ।", |
| | "एतत्सामगायन्नास्ते'' ।", |
| | "'सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः ।", |
| | "किल्बिषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय'' ।", |
| | "'ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।", |
| | "ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः'' ।", |
| | "'परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते'' 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा'' ।", |
| | "'तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'' ।", |
| | "'मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्देहं संश्रिता अपि ।", |
| | "तारतम्येन तिष्ठन्ति गुणैरानन्दपूर्वकैः ।", |
| | "भूपा मनुष्यगन्धर्वा देवाः पितर एव च ।", |
| | "आजानेयाः कर्मदेवास्तत्त्व(रूपाः)देवाः पुरन्दरः ।", |
| | "शिवो विरिञ्चिरित्येते क्रमाच्छतगुणोत्तराः ।", |
| | "मुक्तावपि तदन्ये ये भूपाच्छतगुणावराः ।", |
| | "न समो ब्रह्मणः कश्चिन्मुक्तावपि कथञ्चन ।", |
| | "ततः सहस्रगुणिता श्रीस्ततः परमो हरिः ।", |
| | "अनन्तगुणितत्वेन तत्समः परमोपि न'' ।", |
| | "'अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।", |
| | "आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ।", |
| | "कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्द्रो परिस्रव ।", |
| | "इत्यादि मोक्षानन्तरमपि भेदवचनेभ्यः । न च 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्'' ।", |
| | "'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति'' ।", |
| | "'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते'' ।", |
| | "'अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्'' ।", |
| | "'परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'' ।", |
| | "'तत् त्वमसि'' 'अहं ब्रह्मास्मि'' इत्यादिवाक्यविरोधः ।", |
| | "'सञ्ज्ञानाशो यदि भवेत्किमुक्त्या नः प्रयोजनम् ।", |
| | "मोहं मां प्रापयामास भवानत्रेति चोदितः ।", |
| | "याज्ञवल्क्यः प्रियामाह नाहं मोहं ब्रवीमि ते ।", |
| | "भूतजज्ञानलोपः स्यान्निजं ज्ञानं न लुप्यते ।", |
| | "न च ज्ञेयविनाशः स्यादात्मनाशः कुतः पुनः ।", |
| | "स्वभावतः पराद्विष्णोर्विश्वं भिन्नमपि स्फुटम् ।", |
| | "अस्वातन्त्र्याद्भिन्नमिव स्थितमेव यदेदृशम् ।", |
| | "तदा घ्राणादिभोगः स्यात्स्वरूपज्ञानशक्तितः ।", |
| | "तदात्मानुभवोपि स्यादीश्वरज्ञानमेव च ।", |
| | "यदान्यं न विजानाति नात्मानं नेश्वरं तथा ।", |
| | "पुरुषार्थता कुतस्तु स्यात्तदभावाय को यतेत् तस्मात्स्वभावज्ञानेन भिन्ना विष्णुसमीपगाः ।", |
| | "भुञ्जते सर्वभोगांश्च मुक्तिरेषा न चान्यथा ।", |
| | "यन्न पश्येत्परो विष्णुर्द्वितीयत्वेन स स्वतः ।", |
| | "तद्द्वितीयं न भवति प्रादुर्भावात्मकं वपुः ।", |
| | "प्रधानपुरुषादन्यद्यत्तस्माद्भिन्नमीश्वरः ।", |
| | "विभक्तत्वेन नियतं यस्मात्पश्यति सर्वदा ।", |
| | "पश्यन्नेव यतो विष्णुस्तदभेदं न पश्यति ।", |
| | "चेतनाचेतनस्यास्य नाभेदोस्ति ततोमुना ।", |
| | "न हि ज्ञानविलोपोस्ति सर्वज्ञस्य परेशितुः ।", |
| | "ब्रह्माणि जीवाः सर्वेपि परब्रह्माणि मुक्तिगाः प्रकृतिः परमं ब्रह्म परमं महदच्युतः नैव मुक्ता न प्रकृतिः क्वापि हि ब्रह्मवैभवम् ।", |
| | "प्राप्नुवन्त्यपि तज्ज्ञानान्निजं ब्रह्मत्वमाप्यते ।", |
| | "\u003Eयद्यस्य परमेशि(श)त्वं तदा स्याद्दुःखिता कुतः ।", |
| | "दुःखी चेत्कुत ईशत्वमनीशो ह्येव दुःखभाक् ।", |
| | "कुतः सर्वविदोज्ञत्वं क्व भ्रमोप्यज्ञतां विना ।", |
| | "तस्मान्नैवेश्वरो जीवस्तत्प्रसादात्तु मुच्यते ।", |
| | "ओयत्वादहंनामा भगवान्हरिरव्ययः ।", |
| | "ब्रह्मासौ गुणपूर्णत्वादस्म्यसावसनान्मितेः ।", |
| | "असनादसिनामासौ तेजस्त्वात्त्वमितीरितः ।", |
| | "सर्वैः क्रियापदैश्चैव सर्वैर्द्रव्यपदैरपि ।", |
| | "सर्वैर्गुणपदैश्चैव वाच्य एको हरिः स्वयम् ।", |
| | "युष्मत्पदैः प्रातियोग्यात्तद्युतैश्च क्रियापदैः ।", |
| | "अस्मत्पदैरान्तरत्वात्क्रियार्थैश्च तदन्वयैः ।", |
| | "परोक्षत्वात्तत्पदैश्च मुख्यवाच्यः स एव तु ।", |
| | "सर्वान्वेदानधीत्यैव प्रज्ञाधिक्येन हेतुना श्वेतकेतुरहङ्कारात्प्रायशो नास्मि मानुषः ।", |
| | "देवो वा केशवांशो वा नैषा प्रज्ञान्यथा भवेत् ।", |
| | "एवं महत्त्वबुद्ध्यैव दर्पपूर्णोभ्यगात्पितुः ।", |
| | "सकाशमकृताचारं तं दृष्ट्वा स्तब्धमज्ञवत् ।", |
| | "पितोवाच कुतः पुत्र स्तब्धता त्वामुपागता ।", |
| | "प्रायो नारायणं देवं नैव त्वं पृष्टवानसि ।", |
| | "यस्मिन् ज्ञाते त्वविज्ञातज्ञानादीनां फलं भवेत् ।", |
| | "प्राधान्यात्सदृशत्वाच्च तदधीनमिति स्फुटम् ।", |
| | "तत्सृष्टं चेति विज्ञातं फलवदि्ध भवेज्जगत् ।", |
| | "स्वातन्त्र्येणास्य विज्ञानं मिथ्याज्ञानमनर्थकृत् ।", |
| | "यथाचैवैकमृत्पिण्डज्ञानादेः सदृशत्वतः ।", |
| | "मृण्मयं तदकार्यं च ज्ञातं मृदिति वै भवेत् ।", |
| | "यथैव मृत्तिकेत्यादिनित्यनामप्रवेदनात् ।", |
| | "वाचारब्धमनित्यं तु ज्ञातं तन्मूलमित्यपि ।", |
| | "एवं कारणभूतोसौ भगवान्पुरुषोत्तमः ।", |
| | "प्रधानश्च स्वतन्त्रश्च तन्मूलमखिलं जगत् ।", |
| | "तदाधारं विमुक्तौ च तदधीनं सदा स्थितम् ।", |
| | "स सूक्ष्मो व्यापकः पूर्णस्तदीयमखिलं जगत् ।", |
| | "तस्मात्तदीयस्त्वमसि नैव सोसि कथञ्चन ।", |
| | "यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्षरसा अपि ।", |
| | "यथा नद्यः समुद्रश्च यथा वृक्षपरावपि ।", |
| | "यथा धानाः परश्चैव यथैव लवणोदके ।", |
| | "यथा पुरुषदेशौ च यथाज्ञज्ञानदावपि ।", |
| | "यथा स्तेनापहार्यौ च तथा त्वं च परस्तथा ।", |
| | "भिन्नौ स्वभावतो नित्यं नानयोरेकता क्वचित् ।", |
| | "एवं भेदोखिलस्यापि स्वतन्त्रात्परमेश्वरात् ।", |
| | "परतन्त्रं स्वतन्त्रेण कथमैक्यमवाप्नुयात् ।", |
| | "स जीवनामा भगवान्प्राणधारणहेतुतः ।", |
| | "उपचारेण जीवाख्या संसारिणि निगद्यते ।", |
| | "तदधीनमिदं सर्वं नान्याधीनः स ईश्वरः ।", |
| | "जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा ।", |
| | "जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ।", |
| | "जडभेदो मिथश्चेति प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।", |
| | "विष्णोः प्रज्ञामितं यस्माद्द्वैतं न भ्रान्तिकल्पितम् ।", |
| | "औतः परमार्थोसौ भगवान्विष्णुरव्ययः ।", |
| | "परमत्वं स्वतन्त्रत्वं सर्वशक्तित्वमेव च ।", |
| | "सर्वज्ञत्वं परानन्दः सर्वस्य तदधीनता ।", |
| | "इत्यादयो गुणा विष्णोर्नैवान्यस्य कथञ्चन ।", |
| | "अभावः परमद्वैते सन्त्येव ह्यपराणि तु ।", |
| | "विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।", |
| | "औतं ज्ञानिनां पक्षे न तस्माद्विद्यते क्वचिद्'' ।", |
| | "इत्यादिश्रुतिभ्योर्थान्तरस्यैवावगतत्वात् । एकपिण्डनामधेयेतिशब्दानां वैयर्थ्यं चान्यथा । न चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तत्पक्षे । न हि शुक्तिज्ञो रजतज्ञ इति व्यवहारः । नवकृत्वोपि भेद एव दृष्टान्तोक्तेश्च । तस्मादतत्त्वमसीत्येवोच्यते । ऐतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमित्येतदात्मसम्बन्धि । तत्स्वामिकम् । त्वमपि तदैतदात्म्यमेवासि न सोसीति वा । तदिति लिङ्गसाम्यं चात्र । अविद्यमानमेवेश्वरं सृष्ट्यादिकं चाप्राप्तमेवात्मनो भिन्नत्वेन प्रापयित्वा तन्निषेधे कथं श्रुतेरुन्मत्तवाक्यत्वं न स्यात् ? अनुवादोपि 'यदिदं वदन्ति तन्न युज्यते'' इत्यादिवाक्यं परिहारे विशेषयुक्तिं च विना न दृष्टः । अतिप्रसङ्गश्चान्यथा । अभेदानुवादेन भेदोपदेशः किमिति न स्यात् ? सर्वशाखान्ते भेदोक्तेश्चैतदेव युक्तम् ।", |
| | "'नासंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् नाप्रवक्त्र इत्याचार्या आचार्याः'' ।", |
| | "'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्'' ।", |
| | "'अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति इति ब्रह्मविदो विदुः'' ।", |
| | "'नमो विष्णवे महते करोमि'' । 'पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्'' ।", |
| | "इत्यादि । न चेश्वरस्तद्भेदो वा प्रत्यक्षादिसिद्धः । तत्पक्षे त्वैक्यादेरपि मिथ्यात्वात्स्वरूपस्य च सिद्धत्वाद्व्यर्थैव श्रुतिः । लक्षितस्वरूपस्यापि न स्वरूपाद्विशेषः । निर्विशेषत्वोक्तेः । मिथ्याविशेषोक्तौ चाप्रामाण्यं श्रुतेः । मिथ्यात्वं च मिथ्यैव तेषाम् । अतः सत्यत्वं सत्यं स्यात् । उपाधिकृतभेदेप्युपाधेर्मिथ्यात्वे त्वप्राप्तमेवोपाधिभेदं प्रापयित्वा पुनर्निषिद्ध्यत इति स एव दोषः । सत्योपाधिपक्षेपि हस्तपादाद्युपाधिभेदेपि भोक्तुरेकत्वदृष्टेरेकेनैवेश्वरेण सर्वोपाधिगतं सुखं दुःखं भुज्यतेत्येवमादयो दोषाः समा एव । अचेतनानामनुभवाभावान्न तत्साम्यम् । अतो जीवेश्वरयोर्भेद एवेति सिद्धम् ॥ १८ ॥" |
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| | "य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।", |
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| | "य एनं जीवं वेत्ति हन्तारं स्वातन्त्र्येण । अन्यथा 'मया हतांस्त्वं जहि'' इत्यादिविरोधः । चेतनं प्रति य एनमिति परमात्मनोपि समम् ॥ १९ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id\"\u003Eअच्छेद्यत्वादिकं जीवस्यापि तत्सममित्याह - अच्छेद्योयमिति । नित्यं सर्वगते स्थितः अणुश्चायमिति सर्वगतस्थाणुः । सर्वगतो विष्णुस्तदधीनत्वादिकं तत्स्थत्वम् । हेतुतोपि तत्स्थत्वान्न चलतीत्यचलः । नादेन शब्देन सह वर्तत इति सनादन एव सनातनः ।\u003Cbr/\u003E'नित्यं सर्वगते विष्णावणुर्जीवो व्यवस्थितः ।\u003Cbr/\u003Eन चास्य तदधीनत्वं हेतुतोपि विचाल्यते ।\u003Cbr/\u003Eनिषेधविधिपात्रत्वात्सनातन इति स्मृऽतः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति महाविष्णुपुराणे ।\nअच्छेद्योयमित्यादिपुनरुक्तिश्चान्यथा । यस्मिन्नयं स्थितः सोव्यक्ताचिन्त्यादिरूपः । एवं ज्ञातः परमेश्वरः सर्वदुःखनाशं करोतीति नानुशोचितुमर्हसि । 'तेषामहं समुद्धर्ता'' इत्यादेः ।\n'न त्वेवाहं जातु नासं न त्वम्'' इत्युभयोरपि प्रस्तुतत्वात् । देहिनः शरीरिणः देहीति विशेषितत्वाच्च जीवस्य तत्र तत्र ।\n'अविनाशि तु ।'' 'येन सर्वमिदं ततम् ।'' 'अनाशिनोप्रमेयस्य ।'' 'न म्रियते ।'' 'भूत्वा भविता न ।'' 'अविनाशिनम् ।'' 'अव्ययम् ।'' 'अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयम्'' । इत्यादि परमात्मनश्च । न हि जीवेन ततं सर्वम् । न च मुख्यतोप्रमेयोसौ । न च न म्रियते । न चाविनाशिनं नित्यमिति नित्यत्वातिरिक्तमविनाशित्वं तस्य । न चाव्यक्तत्वमविकार्यत्वं च मुख्यम् । न च भूत्वा भविता वा नेति देहस्याप्यनुत्पत्तिः । परमात्मनस्तु देहवियोगादिकमपि नास्तीत्यविनाशि त्वित्यादिविशेषणम् । यस्मादेवं भूतस्तस्मात्स एव स्वतन्त्रः । तदधीनमन्यत्सर्वम् । अतः स एव सर्वपुरुषार्थदः । अतस्तत्पूजा सत्कर्मैव । अतस्तदर्थं युध्यस्व । अन्येषां त्वन्तवन्त एव देहाः । प्राकृतदेहिनश्च । अतोस्वतन्त्रत्वान्न हन्तुं तेषां सामर्थ्यम् । नित्यत्वान्न हन्यते च । तस्माद्धन्ता हत इति मन्यमानौ न विजानीतः । यस्मादयमेव परमेश्वरः शरीरवियोगरूपेणापि न म्रियते तत्संयोगरूपेणापि न जायते जीववत्कदापि । अतः स एव स्वतन्त्रत्वात्सर्वस्य हन्ता । जीवस्तु तेन शरीरे हन्यमाने स्वयं न हन्यत इत्येतावत् । अत एवमविनाशित्वादेः स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तारं परमात्मानं यो वेद स कथं घातयति हन्ति वा ? वाससो जरावत्स्वशरीरजरादावस्वातन्त्र्यदर्शनात्सर्वत्रास्वातन्त्र्यं ज्ञातव्यं जीवस्य । ईश्वरस्य तु देहस्यापि च्छेदादेरभावात्स्वातन्त्र्यम् । नैनं छिन्दन्तीति च्छेदनाद्यभावः साक्षादेव दर्शयितुं शक्यते स्वदेहस्येति वर्तमानापदेशः । छेदनादिकं त्वीश्वरो मोहाय मृषैव दर्शयति ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
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| | "'अविनाशि तु ।'' 'येन सर्वमिदं ततम् ।'' 'अनाशिनोप्रमेयस्य ।'' 'न म्रियते ।'' 'भूत्वा भविता न ।'' 'अविनाशिनम् ।'' 'अव्ययम् ।'' 'अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयम्'' । इत्यादि परमात्मनश्च । न हि जीवेन ततं सर्वम् । न च मुख्यतोप्रमेयोसौ । न च न म्रियते । न चाविनाशिनं नित्यमिति नित्यत्वातिरिक्तमविनाशित्वं तस्य । न चाव्यक्तत्वमविकार्यत्वं च मुख्यम् । न च भूत्वा भविता वा नेति देहस्याप्यनुत्पत्तिः । परमात्मनस्तु देहवियोगादिकमपि नास्तीत्यविनाशि त्वित्यादिविशेषणम् । यस्मादेवं भूतस्तस्मात्स एव स्वतन्त्रः । तदधीनमन्यत्सर्वम् । अतः स एव सर्वपुरुषार्थदः । अतस्तत्पूजा सत्कर्मैव । अतस्तदर्थं युध्यस्व । अन्येषां त्वन्तवन्त एव देहाः । प्राकृतदेहिनश्च । अतोस्वतन्त्रत्वान्न हन्तुं तेषां सामर्थ्यम् । नित्यत्वान्न हन्यते च । तस्माद्धन्ता हत इति मन्यमानौ न विजानीतः । यस्मादयमेव परमेश्वरः शरीरवियोगरूपेणापि न म्रियते तत्संयोगरूपेणापि न जायते जीववत्कदापि । अतः स एव स्वतन्त्रत्वात्सर्वस्य हन्ता । जीवस्तु तेन शरीरे हन्यमाने स्वयं न हन्यत इत्येतावत् । अत एवमविनाशित्वादेः स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तारं परमात्मानं यो वेद स कथं घातयति हन्ति वा ? वाससो जरावत्स्वशरीरजरादावस्वातन्त्र्यदर्शनात्सर्वत्रास्वातन्त्र्यं ज्ञातव्यं जीवस्य । ईश्वरस्य तु देहस्यापि च्छेदादेरभावात्स्वातन्त्र्यम् । नैनं छिन्दन्तीति च्छेदनाद्यभावः साक्षादेव दर्शयितुं शक्यते स्वदेहस्येति वर्तमानापदेशः । छेदनादिकं त्वीश्वरो मोहाय मृषैव दर्शयति ॥ २४ ॥" |
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| "text": "अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते ।\nतस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Painishruthi-id\"\u003Eसर्वगतश्चेत्परमात्मा किमिति तथा न दृश्यत इत्यतो वक्ति - अव्यक्तोयमिति । कथमेतद्युज्यते ? अचिन्त्यशक्तित्वात् । न च सा शक्तिः कदाचिदन्यथा भवति । अविकार्यत्वात् । यानि यान्यस्य रूपाणि तानि सर्वाण्यप्येवं भूतानीति दर्शयितुमेनमयमित्यादिपृथग्वचनम् । जीवे तु सर्वजीवेष्वनुगमार्थम् । सर्वं चैतत् श्रुतिसिद्धम् ।\u003Cbr/\u003E'सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।\u003Cbr/\u003Eज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोक्षरः'' ।\u003C/span\u003E\nइति पैङ्गिश्रुतिः ।\n'ओहो देहवांश्चैकः प्रोच्यते परमेश्वरः ।\nअप्राकृतशरीरत्वाददेह इति कथ्यते ।\nशिरश्चरणबाह्वादिविग्रहोयं स्वयं हरिः ।\nस्वस्मान्नान्यो विग्रहोस्य ततश्चादेह उच्यते ।\nस्वयं स्वरूपवान्यस्माद्देहवांश्चोच्यते ततः ।\nशिरश्चरणबाह्वादिः सुखज्ञानादिरूपकः ।\nस च विष्णोर्न चान्योस्ति यस्मात्सोचिन्त्यशक्तिमान् ।\nदेहयोगवियोगादिस्ततो नास्य कथञ्चन ।\nगुणरूपोपि भगवान् गुणभुक्च सदा श्रुतः ।\nअहमित्यात्मभोगो यत्सर्वेषामनुभूयते ।\nअभिन्नेपि विशेषोयं सदानुभवगोचरः ।\nविशेषोपि हि नान्योतः स च स्वस्यापि युज्यते ।\nनानवस्था ततः क्वापि परमैश्वर्यतो हरेः ।\nयुक्तायुक्तत्वमपि हि यदधीनं सदेष्यते ।\nप्रमाणावगते तत्र कुत एव ह्ययुक्तता'' ॥ इत्यादिपरमश्रुतिः ।\n'गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।\nचिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः'' ॥ इत्यादि च ऋग्वेदे सौपर्णशाखायाम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id\"\u003E'एकमेवाद्वितीयं'' 'नेह नानास्ति किञ्चिन'' ।\u003Cbr/\u003E'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति'' ।\u003Cbr/\u003E'यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।\u003Cbr/\u003Eएवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति'' ।\u003Cbr/\u003E'मत्स्यकूर्मादिरूपाणां गुणानां कर्मणामपि ।\u003Cbr/\u003Eतथैवावयवानां च भेदं पश्यति यः क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ च यः पश्येत्स याति तम एव तु ।\u003Cbr/\u003Eपश्येदभेदमेवैषां बुभूषुः पुरुषस्ततः ।\u003Cbr/\u003Eअभेदेपि विशेषोस्ति व्यवहारस्ततो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eविशेषिणां विशेषस्य तथा भेदविशेषयोः ।\u003Cbr/\u003Eविशेषस्तु स एवायं नानवस्था ततः क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eप्रादुर्भावादिरूपेषु मूलरूपेषु सर्वशः ।\u003Cbr/\u003Eन विशेषोस्ति सामर्थ्ये गुणेष्वपि कदाचन ।\u003Cbr/\u003Eमत्स्यकूर्मवराहाश्च नृसिंहवटुभार्गवाः ।\u003Cbr/\u003Eराघवः कृष्णबुद्धौ च कल्किव्यासैतरेयकाः ।\u003Cbr/\u003Eदत्तो धन्वन्तरिर्यज्ञः कपिलो हंसतापसौ ।\u003Cbr/\u003Eशिंशुमारो हयास्यश्च हरिः कृष्णश्च धर्मजः ।\u003Cbr/\u003Eनारायणस्तथेत्याद्याः साक्षान्नारायणः स्वयम् ।\u003Cbr/\u003Eब्रह्मरुद्रौ शेषविपौ शक्राद्या नारदस्तथा ।\u003Cbr/\u003Eसनत्कुमारः कामभवोप्यनिरुद्धो विनायकः ।\u003Cbr/\u003Eसुदर्शनाद्यायुधानि पृथ्वाद्याश्चक्रवर्तिनः ।\u003Cbr/\u003Eइत्याद्या विष्णुनाविष्टा भिन्नाः संसारिणो हरेः ।\u003Cbr/\u003Eतेष्वेव लक्ष्मणाद्येषु त्रिष्वेवं च बलादिषु ।\u003Cbr/\u003Eनरार्जुनादिषु तथा पुनरावेश उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eस्वल्पस्तु पुनरावेशो धर्मपुत्रादिषु प्रभोः ।\u003Cbr/\u003Eएतज्जानाति यस्तस्मिन्प्रीतिरभ्यधिका हरेः ।\u003Cbr/\u003Eसङ्करज्ञानिनस्तत्र पातस्तमसि च ध्रुवम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइत्यादि महावराहे ॥२५ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Painishruthi-id\"\u003Eसर्वगतश्चेत्परमात्मा किमिति तथा न दृश्यत इत्यतो वक्ति - अव्यक्तोयमिति । कथमेतद्युज्यते ? अचिन्त्यशक्तित्वात् । न च सा शक्तिः कदाचिदन्यथा भवति । अविकार्यत्वात् । यानि यान्यस्य रूपाणि तानि सर्वाण्यप्येवं भूतानीति दर्शयितुमेनमयमित्यादिपृथग्वचनम् । जीवे तु सर्वजीवेष्वनुगमार्थम् । सर्वं चैतत् श्रुतिसिद्धम् ।\u003Cbr/\u003E'सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।\u003Cbr/\u003Eज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोक्षरः'' ।\u003C/span\u003E", |
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| | "अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।", |
| | "ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥३३ ॥" |
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| "text": "अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।\nसम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥३४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।", |
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| | "भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।", |
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| | "अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।", |
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| | "हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।", |
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| | "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।", |
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| | "एषा तेभिहिता साङ्ख्ये बुदि्धर्योगे त्विमां शृणु ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eसम्यक् ख्यातिर्ज्ञानं साङ्ख्यम् । युज्यतेनेनेति योगस्तदुपायः ।\u003Cbr/\u003E'सम्यक्तत्वदृशिः साङ्ख्यं योगस्तत्साधनं स्मृऽतम्'' ।\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n'ब्रह्मतर्कस्तर्कशास्त्रं विष्णुना यत्समीरितम् ।\nअक्षपादकणादौ च साङ्ख्ययोगौ च हैतुकाः ।\nबौद्धपाशुपताद्यास्तु पाषण्डा इति कीर्तिताः ।\nमीमांसा त्रिविधा प्रोक्ता ब्राह्मी दैवी च कार्मिकी ।\nब्रह्मतर्कं च मीमांसां सेवेत ज्ञानसिद्धये ।\nवैदिकज्ञानवैरूप्यान्नान्यत्सेवेत पण्डितः'' ॥ इत्यन्यसाङ्ख्ययोगयोर्निषिद्धत्वान्नारदीये । साङ्ख्यस्य निरीश्वरत्वादुक्तत्वाच्चेश्वरस्य । साङ्ख्यैर्योगैश्च विहितहिंसाया अप्यनर्थहेतुत्वाङ्गीकारात् । अत्र तु युद्धविधानाच्च मोक्षार्थत्वेनैव कर्मबन्धं प्रहास्यसीति । परमसाङ्ख्ययोगयोश्चोक्तार्थत्वेनैव न विरोधः ॥३९ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eसम्यक् ख्यातिर्ज्ञानं साङ्ख्यम् । युज्यतेनेनेति योगस्तदुपायः ।\u003Cbr/\u003E'सम्यक्तत्वदृशिः साङ्ख्यं योगस्तत्साधनं स्मृऽतम्'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "'ब्रह्मतर्कस्तर्कशास्त्रं विष्णुना यत्समीरितम् ।", |
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| | "वैदिकज्ञानवैरूप्यान्नान्यत्सेवेत पण्डितः'' ॥ इत्यन्यसाङ्ख्ययोगयोर्निषिद्धत्वान्नारदीये । साङ्ख्यस्य निरीश्वरत्वादुक्तत्वाच्चेश्वरस्य । साङ्ख्यैर्योगैश्च विहितहिंसाया अप्यनर्थहेतुत्वाङ्गीकारात् । अत्र तु युद्धविधानाच्च मोक्षार्थत्वेनैव कर्मबन्धं प्रहास्यसीति । परमसाङ्ख्ययोगयोश्चोक्तार्थत्वेनैव न विरोधः ॥३९ ॥" |
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| "text": "नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।\nस्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥" | | "lines": [ |
| | "नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।", |
| | "स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id\"\u003E'प्रारम्भमात्रमिच्छा वा विष्णुधर्मे न निष्फला ।\u003Cbr/\u003Eन चान्यधर्माकरणाद्दोषवान्विष्णुधर्मकृत्'' ॥ इत्याग्नेये ।\u003Cbr/\u003E'स्वोचितेनैव धर्मेण विष्णुपूजामृते क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eनाप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा यत्र धर्मः स वैष्णवः ।\u003Cbr/\u003Eएनं धर्मं च देवाद्या वर्तन्ते सात्त्विका जनाः ।\u003Cbr/\u003Eएष कार्तयुगो धर्मः पाञ्चरात्रश्च वैदिकः ।\u003Cbr/\u003Eतत्प्रीत्यर्थं विनान्यस्मै नोदबिन्दुं न तण्डुलम् ।\u003Cbr/\u003Eदद्यान्निराशीश्च सदा भवेद्भक्तश्च केशवे ।\u003Cbr/\u003Eनैतत्समेधिके वापि कुर्याच्छङ्कामपि क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eजानीयात्तदधीनं च सर्वं तत्तत्त्ववित्सदा ।\u003Cbr/\u003Eयथाक्रमं तु देवानां तारतम्यविदेव च ।\u003Cbr/\u003Eएष भागवतो मुख्यस्त्रेतादिषु विशेषतः ।\u003Cbr/\u003Eएष धर्मोतिफलदो विशेषेण पुनः कलौ ।\u003Cbr/\u003Eएवं भागवतो यस्तु स एव हि विमुच्यते ।\u003Cbr/\u003Eत्रैविद्यस्त्वपरो धर्मो नानादैवतपूजनम् ।\u003Cbr/\u003Eतत्रापि विष्णुर्ज्ञातव्यः सर्वेभ्योभ्यधिको गुणैः ।\u003Cbr/\u003Eसमर्पयति यज्ञाद्यमन्ततस्त्वेव विष्णवे ।\u003Cbr/\u003Eत्रैविद्यधर्मा पुरुषः स्वर्गं भुक्त्वा निवर्तते ।\u003Cbr/\u003Eपुनः कुर्यात्पुनः स्वर्गं याति यावद्धरेर्वशे ।\u003Cbr/\u003Eसर्वान्देवान्प्रविज्ञाय तत्कर्मैव सदा भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eसम्यक्तत्वापरिज्ञानादन्यकर्मकृतेरपि ।\u003Cbr/\u003Eस्वर्गादिप्रार्थनाच्चैव रागादेश्चापरिक्षयात् ।\u003Cbr/\u003Eसदा विष्णोरस्मरणात् त्रैविद्यो नाप्नुयात्परम् ।\u003Cbr/\u003Eक्रमेण मुच्यते विष्णौ कर्माण्यन्ते समर्पयन् ।\u003Cbr/\u003Eयदि सर्वाणि नियमाज्जन्मभिर्बहुभिः शुभैः ।\u003Cbr/\u003Eपरं विष्णुं न यो वेत्ति कुर्वाणोपि त्रयीक्रियाः ।\u003Cbr/\u003Eनासौ त्रैविद्य इत्युक्तो वेदवादी स उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eवादो विवादः सम्प्रोक्तो वादो वचनमेव च ।\u003Cbr/\u003Eवेदोक्ते विष्णुमाहात्म्ये विवादात्पठनादपि ।\u003Cbr/\u003Eअथवा निरर्थकात्पाठाद्वेदवादी स उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eवेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी ।\u003Cbr/\u003Eतेभ्यो याति तमो घोरमन्धं यस्मान्न चोत्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eअनारम्भमनन्तञ्च नित्यदुःखं सुखोज्झितम् ।\u003Cbr/\u003Eवव्रं यद्वेदगदितं तत्र यान्त्यसुरादयः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मवैवर्ते ॥४० ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "अव्यवसायबुदि्धः केषाम् ? यां वाचमविपश्चितः प्रवदन्ति । तयापहृतचेतसाम् । बुदि्धर्व्यवसायात्मकत्वेन समाधानेन वर्तते ।\n'यथावस्तु यथा ज्ञानं तत्साम्यात्सममीरितम् ।\nविषमं त्वन्यथाज्ञानं समाधानं समस्थितिः ।\nन तद्भवत्यसद्वाक्यैर्विषमीकृतचेतसाम् ।\nस्वर्गादिपुष्पवाद्येव वचनं यदचेतसाम् ।\nन मन्यन्ते फलं मोक्षं विष्णुसामीप्यरूपकम् ।\nफलदं च न मन्यन्ते तं विष्णुं जगतः पतिम् ।\nभोगैश्वर्यानुगत्यर्थं क्रियाबाहुल्यसन्तताम् ।\nबहुसंसारफलदामन्ते तमसि पातिनीम् ।\nयां वदन्ति दुरात्मानो वेदवाक्यविवादिनः ।\nतया सम्मोहितधियां कथं तत्त्वज्ञता भवेत्'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Atharvana-id\"\u003E'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।\u003Cbr/\u003Eनाकस्य पृष्ठे सुकृते तेनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति'' ॥\u003C/span\u003E\nइति च आथर्वणश्रुतिः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी'' ॥\u003C/span\u003E\nइति हि भागवते ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003E'ये न जानन्ति तं विष्णुं याथातथ्येन संशयात् ।\u003Cbr/\u003Eजिज्ञासवश्च नितरां श्रद्धावन्तः सुसाधवः ।\u003Cbr/\u003Eनिर्णेतॄणामभावेन केवलं ज्ञानवर्जिताः ।\u003Cbr/\u003Eयैर्निश्चितं परत्वं तु विष्णोः प्रायो न यातनाम् ।\u003Cbr/\u003Eब्रह्महत्यादिभिरपि यान्त्याधिक्ये चिरं न तु ।\u003Cbr/\u003Eये तु भागवताचार्यैः सम्यग्यज्ञादि कुर्वते ।\u003Cbr/\u003Eबहिर्मुखा भगवतो निवृत्ताश्च विकर्मणः ।\u003Cbr/\u003Eदक्षिणातर्पितानां तु ह्याचार्याणां तु तेजसा ।\u003Cbr/\u003Eयान्ति स्वर्गं ततः क्षिप्रं तमोन्धं प्राप्नुवन्ति च ।\u003Cbr/\u003Eतदन्ये नैव च स्वर्गं यान्ति विष्णुबहिर्मुखाः''॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ।\n॥ ४२-४४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अव्यवसायबुदि्धः केषाम् ? यां वाचमविपश्चितः प्रवदन्ति । तयापहृतचेतसाम् । बुदि्धर्व्यवसायात्मकत्वेन समाधानेन वर्तते ।", |
| | "'यथावस्तु यथा ज्ञानं तत्साम्यात्सममीरितम् ।", |
| | "विषमं त्वन्यथाज्ञानं समाधानं समस्थितिः ।", |
| | "न तद्भवत्यसद्वाक्यैर्विषमीकृतचेतसाम् ।", |
| | "स्वर्गादिपुष्पवाद्येव वचनं यदचेतसाम् ।", |
| | "न मन्यन्ते फलं मोक्षं विष्णुसामीप्यरूपकम् ।", |
| | "फलदं च न मन्यन्ते तं विष्णुं जगतः पतिम् ।", |
| | "भोगैश्वर्यानुगत्यर्थं क्रियाबाहुल्यसन्तताम् ।", |
| | "बहुसंसारफलदामन्ते तमसि पातिनीम् ।", |
| | "यां वदन्ति दुरात्मानो वेदवाक्यविवादिनः ।", |
| | "तया सम्मोहितधियां कथं तत्त्वज्ञता भवेत्'' ॥ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Atharvana-id\"\u003E'इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।\u003Cbr/\u003Eनाकस्य पृष्ठे सुकृते तेनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति च आथर्वणश्रुतिः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति हि भागवते ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003E'ये न जानन्ति तं विष्णुं याथातथ्येन संशयात् ।\u003Cbr/\u003Eजिज्ञासवश्च नितरां श्रद्धावन्तः सुसाधवः ।\u003Cbr/\u003Eनिर्णेतॄणामभावेन केवलं ज्ञानवर्जिताः ।\u003Cbr/\u003Eयैर्निश्चितं परत्वं तु विष्णोः प्रायो न यातनाम् ।\u003Cbr/\u003Eब्रह्महत्यादिभिरपि यान्त्याधिक्ये चिरं न तु ।\u003Cbr/\u003Eये तु भागवताचार्यैः सम्यग्यज्ञादि कुर्वते ।\u003Cbr/\u003Eबहिर्मुखा भगवतो निवृत्ताश्च विकर्मणः ।\u003Cbr/\u003Eदक्षिणातर्पितानां तु ह्याचार्याणां तु तेजसा ।\u003Cbr/\u003Eयान्ति स्वर्गं ततः क्षिप्रं तमोन्धं प्राप्नुवन्ति च ।\u003Cbr/\u003Eतदन्ये नैव च स्वर्गं यान्ति विष्णुबहिर्मुखाः''॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति नारदीये ।", |
| | "॥ ४२-४४ ॥" |
| | ] |
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| "text": "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।\nनिर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।", |
| | "निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "त्रैगुण्याख्यं विषं यापयन्ति अपगमयन्तीति त्रैगुण्यविषयाः ।\n'आश्रित्य वेदांस्तु पुमांस्त्रैगुण्यविषहारिणः ।\nनिस्त्रैगुण्यो भवेन्नित्यं वासुदेवैकसंश्रयः'' ॥ इति च ।\n'सत्त्वं साधुगुणाद्विष्णुरात्मा सन्ततिहेतुतः'' ॥ इति च ।\nसन्ततविष्णुस्मरणं नित्यसत्त्वस्थत्वम् । परमात्मा मम स्वामीति ज्ञानमात्मवत्त्वम् । तेनैक्यज्ञानं निवारयति । विरुद्धयोगक्षेमेच्छावर्जितः । अन्यथोत्थानादेरप्ययोगात् ॥४५ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रैगुण्याख्यं विषं यापयन्ति अपगमयन्तीति त्रैगुण्यविषयाः ।", |
| | "'आश्रित्य वेदांस्तु पुमांस्त्रैगुण्यविषहारिणः ।", |
| | "निस्त्रैगुण्यो भवेन्नित्यं वासुदेवैकसंश्रयः'' ॥ इति च ।", |
| | "'सत्त्वं साधुगुणाद्विष्णुरात्मा सन्ततिहेतुतः'' ॥ इति च ।", |
| | "सन्ततविष्णुस्मरणं नित्यसत्त्वस्थत्वम् । परमात्मा मम स्वामीति ज्ञानमात्मवत्त्वम् । तेनैक्यज्ञानं निवारयति । विरुद्धयोगक्षेमेच्छावर्जितः । अन्यथोत्थानादेरप्ययोगात् ॥४५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।\nतावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥" | | "lines": [ |
| | "यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।", |
| | "तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "'उद्रेकात्पातृराहित्यादनत्वाच्चाखिलस्य च ।\nप्रलयेप्युदपानोसौ भगवान् हरिरीश्वरः ।\nप्रकृतिर्ह्युदरूपेण सर्वमावृत्य तिष्ठति ।\nप्रलयेतो लयं प्राहुः सर्वतः सम्प्लुतोदकम्'' ॥ इति च ।\n'यावत्प्रयोजनं विष्णोः सकाशात्साधकस्य च ।\nधर्ममोक्षादिकं तावत्सर्ववेदविदो भवेत् ।\nवेदार्थनिर्णयो यस्माद्विष्णोर्ज्ञानं प्रकीर्तितम् ।\nज्ञानात्प्रसन्नश्च हरिर्यतोखिलफलप्रदः'' ॥ इति च ।\nसर्वतः सम्प्लुतोदकेप्युद्रिक्तः पालकवर्जितः । कालाद्यनश्च यो विष्णुस्तस्माद्यावत्फलं तावत्सर्ववेदेषु विशेषज्ञस्यैव भवतीत्यर्थः । सर्वे हि विष्णोरन्ये प्रलयकाले नोद्रिक्ताः । ये चोद्रिक्ता मुक्ता रमा च तेपि न पालकवर्जिताः, विष्णुपाल्यत्वात् । न च मुक्ताः कालादिचेष्टकाः । नचोद्रिक्तत्वं तेषां तद्वत् । अत उदपानो विष्णुरेव । प्रलये विशेषतोपि ।\n'आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ।\nतम आसीत्तमसा गू•हमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्'' ।\n'आपो वा इदमग्रे सलिलम् आसीत् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति'' ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यः ॥४६ ॥" | | "lines": [ |
| | "'उद्रेकात्पातृराहित्यादनत्वाच्चाखिलस्य च ।", |
| | "प्रलयेप्युदपानोसौ भगवान् हरिरीश्वरः ।", |
| | "प्रकृतिर्ह्युदरूपेण सर्वमावृत्य तिष्ठति ।", |
| | "प्रलयेतो लयं प्राहुः सर्वतः सम्प्लुतोदकम्'' ॥ इति च ।", |
| | "'यावत्प्रयोजनं विष्णोः सकाशात्साधकस्य च ।", |
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| | "वेदार्थनिर्णयो यस्माद्विष्णोर्ज्ञानं प्रकीर्तितम् ।", |
| | "ज्ञानात्प्रसन्नश्च हरिर्यतोखिलफलप्रदः'' ॥ इति च ।", |
| | "सर्वतः सम्प्लुतोदकेप्युद्रिक्तः पालकवर्जितः । कालाद्यनश्च यो विष्णुस्तस्माद्यावत्फलं तावत्सर्ववेदेषु विशेषज्ञस्यैव भवतीत्यर्थः । सर्वे हि विष्णोरन्ये प्रलयकाले नोद्रिक्ताः । ये चोद्रिक्ता मुक्ता रमा च तेपि न पालकवर्जिताः, विष्णुपाल्यत्वात् । न च मुक्ताः कालादिचेष्टकाः । नचोद्रिक्तत्वं तेषां तद्वत् । अत उदपानो विष्णुरेव । प्रलये विशेषतोपि ।", |
| | "'आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ।", |
| | "तम आसीत्तमसा गू•हमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्'' ।", |
| | "'आपो वा इदमग्रे सलिलम् आसीत् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति'' ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यः ॥४६ ॥" |
| | ] |
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| "text": "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।\nमा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि॥४७ ॥" | | "lines": [ |
| | "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।", |
| | "मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि॥४७ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eकर्माधिकारिण एव त्वदादयो जीवाः । फलं तु मदायत्तमिति भावः । मा कर्मफलहेतुर्भूः नेश्वरोहमिति भावं कुरु ।\u003Cbr/\u003E'एष उ एव शुभाशुभैः कर्मफलैरेनं संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति यदेनं कर्मफलैः संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति तस्मादन्य एवासौ भगवान्वेदितव्य''\u003C/span\u003E\nइति पैङ्गिश्रुतिः ॥४७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eकर्माधिकारिण एव त्वदादयो जीवाः । फलं तु मदायत्तमिति भावः । मा कर्मफलहेतुर्भूः नेश्वरोहमिति भावं कुरु ।\u003Cbr/\u003E'एष उ एव शुभाशुभैः कर्मफलैरेनं संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति यदेनं कर्मफलैः संयोजयति न स्वयं संयुक्तो भवति तस्मादन्य एवासौ भगवान्वेदितव्य''\u003C/span\u003E", |
| | "इति पैङ्गिश्रुतिः ॥४७ ॥" |
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| | "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।", |
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| | "सङ्गं फलस्नेहम् ॥ ४८ ॥" |
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| | "दूरेण ह्यवरं कर्म बुदि्धयोगाद् धनञ्जय ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eबुद्धौ जातायामपि विष्णुमेव शरणमन्विच्छ ।\u003Cbr/\u003E'अज्ञानां ज्ञानिनां चैव मुक्तानां शरणं हरिः ।\u003Cbr/\u003Eतं ये स्वैक्येन मन्यन्ते सर्वभिन्नं गुणोच्छ्रयात् ।\u003Cbr/\u003Eकृपणास्ते तमस्यन्धे निपतन्ति न संशयः ।\u003Cbr/\u003Eन तेषामुत्थितिः क्वापि नित्यातिशयदुःखिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eगुणभेदविदां विष्णोर्भेदाभेदविदामपि ।\u003Cbr/\u003Eदेहकर्मादिषु तथा प्रादुर्भावादिकेपि वा ।\u003Cbr/\u003Eस्वोद्रिक्तानां तदीयानां निन्दां कुर्वन्ति येपि च ।\u003Cbr/\u003Eसर्वेषामपि चैतेषां गतिरेषा न संशयः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ॥४९ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eबुद्धौ जातायामपि विष्णुमेव शरणमन्विच्छ ।\u003Cbr/\u003E'अज्ञानां ज्ञानिनां चैव मुक्तानां शरणं हरिः ।\u003Cbr/\u003Eतं ये स्वैक्येन मन्यन्ते सर्वभिन्नं गुणोच्छ्रयात् ।\u003Cbr/\u003Eकृपणास्ते तमस्यन्धे निपतन्ति न संशयः ।\u003Cbr/\u003Eन तेषामुत्थितिः क्वापि नित्यातिशयदुःखिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eगुणभेदविदां विष्णोर्भेदाभेदविदामपि ।\u003Cbr/\u003Eदेहकर्मादिषु तथा प्रादुर्भावादिकेपि वा ।\u003Cbr/\u003Eस्वोद्रिक्तानां तदीयानां निन्दां कुर्वन्ति येपि च ।\u003Cbr/\u003Eसर्वेषामपि चैतेषां गतिरेषा न संशयः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति नारदीये ॥४९ ॥" |
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| | "बुदि्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।", |
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| "text": "यथावद्विष्णुं ज्ञात्वा तदर्थत्वेन कर्मकरणमित्येतत्कर्मकौशलमेव योगः । भगवज्झानमेव बुदि्धः ॥ ५०, ५१ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथावद्विष्णुं ज्ञात्वा तदर्थत्वेन कर्मकरणमित्येतत्कर्मकौशलमेव योगः । भगवज्झानमेव बुदि्धः ॥ ५०, ५१ ॥" |
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| | "कर्मजं बुदि्धयुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।", |
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| | "यदा ते मोहकलिलं बुदि्धर्व्यतितरिष्यति ।", |
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| "text": "'सर्वकामनिवृत्तिस्तु जानतो न कथञ्चन ।\nअनिषिद्धकामितैवातो ह्यकामित्वमितीर्यते ।\nअपरोक्षदृशोपि स्याद्यदा नास्त्यपरोक्षदृक् ।\nक्वचिद्विरुद्धकामोपि यथायुद्ध्यद्धरो हरिम् ।\nअतोनभिभवो यावद्दृशस्तावन्निगद्यते ।\nस्थितप्रज्ञस्तथाप्यस्य कादाचित्क्यपि या दृशिः ।\nनियमेनैव मोक्षाय भवेद्योग्या भवेद्यदि ।\nअयोग्या भक्तिजाता चेत्क्रमान्मुक्त्यै भवेत्तथा'' ॥ इति च ।\nआत्मनि विष्णौ, आत्मना विष्णुना । तत्प्रसादादेव तुष्टः ॥५५ ॥" | | "lines": [ |
| | "'सर्वकामनिवृत्तिस्तु जानतो न कथञ्चन ।", |
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| | "यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः ।", |
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| | "ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।", |
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| | "क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृऽतिविभ्रमः ।", |
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| | "संमोहान्मिथ्याज्ञानात् । ज्ञातमप्यन्यथा स्मर्यते । वाक्यार्थानामन्यथा स्मरणान्निर्णीतं ज्ञानमपि नश्यति ॥ ६२,६३ ॥" |
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| | "प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।", |
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| | "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।", |
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| "text": "'भुञ्जानोपि हि यः कामान् मर्यादां न तरेत्क्वचित् ।\nसमुद्रवद्धर्ममयीं नासौ कामी स उच्यते ।\nकेति कुत्सितवाची स्यात्कुत्सितं मानमेव तु ।\nकामो मोक्षविरोधी स्यान्न सर्वेच्छाविरोधिनी'' ॥ इति च ।\nन च सर्वेच्छाभावे जीवनं भवति । 'शान्तिर्मोक्षो यतो ह्यत्र विष्णुनिष्ठा भवेद्ध्रुवा'' इति च ॥७० ॥" | | "lines": [ |
| | "'भुञ्जानोपि हि यः कामान् मर्यादां न तरेत्क्वचित् ।", |
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| | "ब्राह्मी ब्रह्मविषया । ज्ञानिनामप्यन्तकालेन्यमनसां प्रारब्धकर्मभावाज्जन्मान्तरम् । प्रारब्धकर्मनाशकाले नियमेन भगवत्स्मृऽतिर्भवति । ततो मोक्षश्च । 'यं यं वापि स्मरन् भावम्'' इति हि वक्ष्यति । बाणं शरीरम् ।", |
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| | "आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र ।", |
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| | "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003E'कर्तृत्वं द्विविधं प्रोक्तं विकारश्च स्वतन्त्रता ।\u003Cbr/\u003Eविकारः प्रकृतेरेव विष्णोरेव स्वतन्त्रता'' ॥\u003C/span\u003E\nइति पैङ्गिश्रुतेः ।\n'कार्यते ह्यवश'' इत्यत्रावशो विष्णुवशः । 'अः इति ब्रह्म'' इत्यादिश्रुतेः ॥५ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003E'कर्तृत्वं द्विविधं प्रोक्तं विकारश्च स्वतन्त्रता ।\u003Cbr/\u003Eविकारः प्रकृतेरेव विष्णोरेव स्वतन्त्रता'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।", |
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| | "यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Barkshruthi-id\"\u003Eकर्मणा बध्यते जन्तुरित्यादिकमप्यवैष्णवकर्मविषयमित्याह - यज्ञार्थादिति ।\u003Cbr/\u003E'ज्ञो नाम भगवान्विष्णुस्तं यात्युद्देश एष यः ।\u003Cbr/\u003Eस यज्ञ इति सम्प्रोक्तो विहिते कर्मणि स्थितः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति बर्कश्रुतिः ॥९ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।\nअनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्॥१० ॥" | | "lines": [ |
| | "सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।", |
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| | "देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।", |
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| "text": "इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।\nतैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।", |
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| "text": "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।\nभुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।", |
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| | "अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।", |
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| "text": "कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।\nतस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५ ॥" | | "lines": [ |
| | "कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003Eजननात् परसस्यादेः पर्जन्यो मेघसन्ततिः ।\u003Cbr/\u003Eस यज्ञात् कर्मणः सोपि समस्तं कर्म केशवात् ॥ स नित्योप्यक्षरततिरूपाद्वाक्यादि्ध गम्यते ।\u003Cbr/\u003Eवाक्यमुच्चार्यते भूतैस्तान्यन्नात्तच्च मेघतः ॥ तस्मात्सर्वगतो विष्णुर्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः ।\u003Cbr/\u003Eएवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।\u003Cbr/\u003Eस पापो विश्वहन्तृत्वान्नरके मज्जति ध्रुवम् ॥ वाचिको मानसो यज्ञो न्यासिनां तु विशेषतः ।\u003Cbr/\u003Eवनस्थस्याक्रतुर्यज्ञः क्रत्वादिर्ग्रहिणोखिलः ॥ शुश्रूषाद्यात्मको यज्ञो विहितो ब्रह्मचारिणः ।\u003Cbr/\u003Eविद्याभयादिदानं च सर्वेषामपि सम्मतम् ॥ गृहिणो वित्तदानं तु वनस्थस्यान्नपूर्वकम् ।\u003Cbr/\u003Eसर्वैः कार्यं तपो घोरमिति सर्वे त्रिकर्मिणः ॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ।\nब्रह्माक्षरशब्दार्थयोर्व्यत्यासे तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म इति प्रत्यभिज्ञाविरोधश्चक्राप्रवेशश्च ॥ १४-१६ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003Eजननात् परसस्यादेः पर्जन्यो मेघसन्ततिः ।\u003Cbr/\u003Eस यज्ञात् कर्मणः सोपि समस्तं कर्म केशवात् ॥ स नित्योप्यक्षरततिरूपाद्वाक्यादि्ध गम्यते ।\u003Cbr/\u003Eवाक्यमुच्चार्यते भूतैस्तान्यन्नात्तच्च मेघतः ॥ तस्मात्सर्वगतो विष्णुर्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः ।\u003Cbr/\u003Eएवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।\u003Cbr/\u003Eस पापो विश्वहन्तृत्वान्नरके मज्जति ध्रुवम् ॥ वाचिको मानसो यज्ञो न्यासिनां तु विशेषतः ।\u003Cbr/\u003Eवनस्थस्याक्रतुर्यज्ञः क्रत्वादिर्ग्रहिणोखिलः ॥ शुश्रूषाद्यात्मको यज्ञो विहितो ब्रह्मचारिणः ।\u003Cbr/\u003Eविद्याभयादिदानं च सर्वेषामपि सम्मतम् ॥ गृहिणो वित्तदानं तु वनस्थस्यान्नपूर्वकम् ।\u003Cbr/\u003Eसर्वैः कार्यं तपो घोरमिति सर्वे त्रिकर्मिणः ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति नारदीये ।", |
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| | "यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।", |
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| | "तृप्तिसन्तोषशब्दयोः पर्यायत्वेपि परमात्मना तृप्तः परमात्मनि तृप्त इति विशेषः ।", |
| | "'विष्णुप्रसादाद्रतिमांस्तृप्तो विष्णुप्रसादतः ।", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'रतिरानन्द उद्दिष्टस्तृप्तिस्तु कृतकृत्यता ।\u003Cbr/\u003Eप्रीतिस्तु द्विविधः स्नेहः कर्मजो निज एव च'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| "text": "नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।\nन चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।", |
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| "text": "यस्मादमुक्तस्य कार्यमस्त्येव तस्मादसक्तः । असक्त आचरन्नेव यस्मा-त्परमाप्नोति । मुक्तस्यैव कार्यं नास्तीत्येवकारार्थोपि यस्त्विति तुशब्देनावगतः । 'तस्मात् कर्म समाचर'' इत्युपसंहारविरोधश्चान्यथा ।\n'ब्रह्मनिष्ठा ब्रह्मरता ब्रह्मज्ञानसुतर्पिताः ।\nपाण्डवानां च मुक्तानामन्तरं किञ्चिदेव हि'' ॥ इति भविष्यत्पर्ववचनाच्च नार्जुनस्यामुख्याधिकारिता । आत्मरतिरेव स्यात् इत्येवशब्देन मुक्तानामेभ्यो विशेषो दर्शितः । एषां कदाचिद् दुःखाभासस्यापि भावात् ॥१९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यस्मादमुक्तस्य कार्यमस्त्येव तस्मादसक्तः । असक्त आचरन्नेव यस्मा-त्परमाप्नोति । मुक्तस्यैव कार्यं नास्तीत्येवकारार्थोपि यस्त्विति तुशब्देनावगतः । 'तस्मात् कर्म समाचर'' इत्युपसंहारविरोधश्चान्यथा ।", |
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| | "पाण्डवानां च मुक्तानामन्तरं किञ्चिदेव हि'' ॥ इति भविष्यत्पर्ववचनाच्च नार्जुनस्यामुख्याधिकारिता । आत्मरतिरेव स्यात् इत्येवशब्देन मुक्तानामेभ्यो विशेषो दर्शितः । एषां कदाचिद् दुःखाभासस्यापि भावात् ॥१९ ॥" |
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| "text": "'सहैव कर्मणा सिदि्धमास्थिता जनकादयः ।\nज्ञाननिष्ठा अपि ततः कार्यं वर्णाश्रमोचितम्'' ॥ इति च ।\nअज्ञानां ज्ञानदं कर्म ज्ञानिनां लोकसङ्ग्रहात् ।\nअद्धैव तुष्टिदं मह्यं सा मुक्तानन्दपूर्तिदा ॥२० ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Krishnasamhitha-id\"\u003E'ममैव केवलं नास्ति केनाप्यर्थस्तथाप्यहम् ।\u003Cbr/\u003Eकर्मकृल्लोकरक्षायै तस्मात् कुर्वीत मत्परः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति कृष्णसंहितायाम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Barkshruthi-id\"\u003E'रक्षया वाथ सृष्ट्या वा संहृत्यादेर्न तु क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eअर्थो विष्णोस्तथाप्येष स्वभावात्सर्वकर्मकृत् ।\u003Cbr/\u003Eमत्तो नृत्तादिकं यद्वत्कुर्यात्सुखविशेषतः ।\u003Cbr/\u003Eपरमानन्दरूपत्वात् कुर्याद्विष्णुस्तथैव तु'' ॥\u003C/span\u003E\nइति बर्कश्रुतिः ॥२२ ॥" | | "lines": [ |
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| | "यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ।", |
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| | "उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।", |
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| | "सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।", |
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| | "न बुदि्धभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।", |
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| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Prakashasamhitha-id\"\u003E'स्वभावतस्त्रिधा जीवा उत्तमाधममध्यमाः ।\u003Cbr/\u003Eउत्तमास्तत्र देवाद्या मर्त्यमध्यास्तु मध्यमाः ।\u003Cbr/\u003Eअधमा असुराद्याश्च नैषामस्त्यन्यथाभवः ।\u003Cbr/\u003Eशरीरमात्रान्यथात्वे स्वजातिं पुनरेष्यति ।\u003Cbr/\u003Eउत्तमा मुक्तियोग्यास्तु सृतियोग्यास्तु मध्यमाः ।\u003Cbr/\u003Eअपरेन्धतमोयोग्याः प्राप्तिः साधनपूर्तितः ।\u003Cbr/\u003Eपूर्त्यभावेन सर्वेषामनादिः संसृतिः स्मृऽता ।\u003Cbr/\u003Eनैव पूर्तिश्च सर्वेषां नित्यकालहरीच्छया ।\u003Cbr/\u003Eअतोनुवर्तते नित्यं संसारोयमनादिमान् ।\u003Cbr/\u003Eअतोधमानां जीवानां मिथ्याज्ञानादयोखिलाः ।\u003Cbr/\u003Eस्वाभाविका गुणा ज्ञेया मध्यमर्त्येषु मिश्रिताः ।\u003Cbr/\u003Eतत्वज्ञानं विष्णुभक्तिरित्याद्या देवतादिषु ।\u003Cbr/\u003Eकार्यते ह्यवशः कर्म सर्वैस्तैः प्राकृतैर्गुणैः ।\u003Cbr/\u003Eस्वाभाविकगुणानेतान् हेतुं कृत्वैव विष्णुना ।\u003Cbr/\u003Eकर्मसु क्रियमाणेषु कर्ताहमिति मूढधीः ।\u003Cbr/\u003Eमन्यते तत्वविद्विष्णोर्गुणा इच्छादयस्तु ये ।\u003Cbr/\u003Eस्वाभाविकेषु जीवस्य कामाद्येषु सदैव तु ।\u003Cbr/\u003Eप्रेरकत्वेन वर्तन्ते स्वातन्त्र्यं मम न क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eइति मत्वा न सक्तः स्यात्प्रीतोस्य भवति प्रभुः ।\u003Cbr/\u003Eस्वभावगुणसम्मूढा ज्ञानादिगुणवत्तरम् ।\u003Cbr/\u003Eस्वातन्त्र्येणैव कर्तारं चात्मानं प्रतिजानते ।\u003Cbr/\u003Eतान्गुणान् कर्म तच्चैव विष्ण्वधीनं न ते विदुः ।\u003Cbr/\u003Eतेष्वयोग्येषु तत्वज्ञस्तत्त्वं नातिप्रकाशयेत् ।\u003Cbr/\u003Eवदेद्विवादरूपेण नोपदेशात्मना क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eसभ्यरूपेण वा ब्रूयात्पृष्टेव्यक्तिकृदेव वा ।\u003Cbr/\u003Eबुद्ध्वाप्यसौ यतो नित्यं स्वभावानुगचेष्टितः ।\u003Cbr/\u003Eस्वभावं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'अखिलप्रेरको विष्णुर्ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः ।\u003Cbr/\u003Eअसुरा अशुभेष्वेव कामादेरभिमानिनः ।\u003Cbr/\u003Eतत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् ।\u003Cbr/\u003Eशुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति ।\u003Cbr/\u003Eमहाशनस्य तस्येदं नालं तेनानलोग्निवत् ।\u003Cbr/\u003Eभुञ्जान इंद्रियाविष्टो ज्ञानास्त्रेणैव (दह्यते)हन्यते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मतर्के ।\nज्ञानावरणरूपेणेदमावृणोतीत्यावृतं ज्ञानमिति पुनराह । न केवलं दुष्पूरो नालमिति मन्यते चेत्यनलः । 'अग्नेरप्यनलः कामो यन्नालमिति मन्यत'' इति च ॥ ३७-४१ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'अखिलप्रेरको विष्णुर्ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः ।\u003Cbr/\u003Eअसुरा अशुभेष्वेव कामादेरभिमानिनः ।\u003Cbr/\u003Eतत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् ।\u003Cbr/\u003Eशुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति ।\u003Cbr/\u003Eमहाशनस्य तस्येदं नालं तेनानलोग्निवत् ।\u003Cbr/\u003Eभुञ्जान इंद्रियाविष्टो ज्ञानास्त्रेणैव (दह्यते)हन्यते'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।", |
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| "text": "एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।\nजहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।", |
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| "text": "'सर्वेभ्यः प्रवरा देवा इन्द्राद्या इंद्रियात्मकाः ।\nतेभ्यो मनोभिमानी तु रुद्रस्तस्मात्सरस्वती ।\nबुध्द्यात्मिका ततो ब्रह्मा महानात्मा परः स्मृऽतः ।\nअव्यक्तरूपा लक्ष्मीश्च वरातोतो हरिः स्वयम् ।\nन तत्समोधिको वेति ह्यानुपूर्वी प्रकीर्तिता ।\nयथाक्रमप्रबोधेन नाश्याः कामादिशत्रवः ।\nप्राप्यते च परं स्थानं विष्णोरतुलमञ्जसा'' ॥ इति च ।\n'न चेंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था रुद्रोहङ्कृतिरूपकः'' । इत्यादिविरोधः ।\n'सर्वाभिमानिनो देवाः सर्वेपि ह्युत्तरोत्तरम् ।\nआधिक्यं वक्तुमेवैषां पृथक्स्थानमुदीर्यते ।\nआधिक्यक्रम एवात्र शास्त्रतात्पर्यमिष्यते ।\nस्थानेषु त्ववरेषां च परे सन्ति न चेतरे ।\nतथापि पितुरर्थो यः पुत्रस्याप्युपचर्यते ।\nअव्यक्तादिपदार्थानां सर्वे तदभिमानिनः'' ॥ इति च ।\n'यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'बहुवाचिनां तुशब्दानां लिङ्गप्रकरणादिभिः ।\u003Cbr/\u003Eप्रवृत्तिहेतोश्चाधिक्यान्निर्णयोर्थेषु गम्यते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'लिङ्गादिसाम्यं यत्र स्यात्प्रयोगाधिक्यमेव तु ।\u003Cbr/\u003Eनिर्णायकं भवेत्तत्र तेन स्यात्सुबहुश्रुतः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मतर्के ॥४२ ॥" | | "lines": [ |
| | "'सर्वेभ्यः प्रवरा देवा इन्द्राद्या इंद्रियात्मकाः ।", |
| | "तेभ्यो मनोभिमानी तु रुद्रस्तस्मात्सरस्वती ।", |
| | "बुध्द्यात्मिका ततो ब्रह्मा महानात्मा परः स्मृऽतः ।", |
| | "अव्यक्तरूपा लक्ष्मीश्च वरातोतो हरिः स्वयम् ।", |
| | "न तत्समोधिको वेति ह्यानुपूर्वी प्रकीर्तिता ।", |
| | "यथाक्रमप्रबोधेन नाश्याः कामादिशत्रवः ।", |
| | "प्राप्यते च परं स्थानं विष्णोरतुलमञ्जसा'' ॥ इति च ।", |
| | "'न चेंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था रुद्रोहङ्कृतिरूपकः'' । इत्यादिविरोधः ।", |
| | "'सर्वाभिमानिनो देवाः सर्वेपि ह्युत्तरोत्तरम् ।", |
| | "आधिक्यं वक्तुमेवैषां पृथक्स्थानमुदीर्यते ।", |
| | "आधिक्यक्रम एवात्र शास्त्रतात्पर्यमिष्यते ।", |
| | "स्थानेषु त्ववरेषां च परे सन्ति न चेतरे ।", |
| | "तथापि पितुरर्थो यः पुत्रस्याप्युपचर्यते ।", |
| | "अव्यक्तादिपदार्थानां सर्वे तदभिमानिनः'' ॥ इति च ।", |
| | "'यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'बहुवाचिनां तुशब्दानां लिङ्गप्रकरणादिभिः ।\u003Cbr/\u003Eप्रवृत्तिहेतोश्चाधिक्यान्निर्णयोर्थेषु गम्यते'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahma-id\"\u003E'लिङ्गादिसाम्यं यत्र स्यात्प्रयोगाधिक्यमेव तु ।\u003Cbr/\u003Eनिर्णायकं भवेत्तत्र तेन स्यात्सुबहुश्रुतः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति ब्रह्मतर्के ॥४२ ॥" |
| | ] |
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| | "बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेस्मिन्नध्याये ।" |
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| "text": "इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।\nविवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्॥१ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id\"\u003Eउक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तरात्मकोयमध्यायः ।\u003Cbr/\u003E'ब्रह्मरुद्रेन्द्रसूर्याणां यद्दत्तं विष्णुना पुरा ।\u003Cbr/\u003Eपञ्चरात्रात्मकं ज्ञानं व्यासोदात्पाण्डवेषु तत् ।\u003Cbr/\u003Eतेषामेवावतारेषु सेनामध्येर्जुनाय च ।\u003Cbr/\u003Eप्रादाद्गीतेति निर्दिष्टं सङ्क्षेपेणायुयुत्सवे ।\u003Cbr/\u003Eयथा कुर्वन्ति कर्माणि यथा जानन्ति देवताः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वे कार्तयुगाश्चैव नृपाश्च मनुपूर्वकाः ।\u003Cbr/\u003Eज्ञातव्यं चैव कर्तव्यं यथा सर्वैर्मुमुक्षुभिः ।\u003Cbr/\u003Eत्रैतादित्रिषु जातैश्च गीतायां तदुदाहृतम् ।\u003Cbr/\u003Eपाण्डवाद्याः क्षेमकान्ताः करिष्यन्ति च जानते ।\u003Cbr/\u003Eतथैव तेन गीताया नास्ति शास्त्रं समं क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eवेदार्थपूर्वकं ज्ञेयं पञ्चरात्रं यतोखिलम् ।\u003Cbr/\u003Eतत्सङ्क्षेपश्च गीतेयं तस्मान्नास्याः समं क्वचित्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १-३ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "'जानन्तोपि विशेषार्थज्ञानाय स्थापनाय वा ।\nपृच्छन्ति साधवो यस्मात्तेन पृच्छसि पार्थिव ॥'' इत्याग्नेयवचनान्नार्जुनो भगवन्तं न जानाति ॥ ४-५ ॥" | | "lines": [ |
| | "'जानन्तोपि विशेषार्थज्ञानाय स्थापनाय वा ।", |
| | "पृच्छन्ति साधवो यस्मात्तेन पृच्छसि पार्थिव ॥'' इत्याग्नेयवचनान्नार्जुनो भगवन्तं न जानाति ॥ ४-५ ॥" |
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| | "अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।", |
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| | "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id\"\u003Eआत्ममायया आत्मेच्छया । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वभावम् । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' इत्यादिश्रुतेश्च । अत एव स्वशब्देन विशेषणं 'प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य'' इत्यादिषु । 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः'' इत्यादिषु तु न स्वशब्दः । 'प्रकृतिं विदि्ध मे पराम्'' इत्यादिषु सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरन्या । अत्र तु स्वशब्दः स्वरूपवाची । स्वभाव इत्यत्रापि स्वाख्यो भावः स्वभावः । भावशब्दस्तु सम्बन्ध्याशङ्कानिवृत्तये । स्वस्वभाव इति तु स्वस्वरूपमितिवदुपचारत्वाशङ्कां निवर्तयति ।\u003Cbr/\u003E'स्रष्टृत्वादिस्वभावत्वात्स्वेच्छया विष्णुरव्ययः ।\u003Cbr/\u003Eसृष्ट्यादिकं करोत्यद्धा स्वयं च बहुधा भवेत्'' ॥\u003C/span\u003E\u003E\nइति नारायणश्रुतिः॥ ६,७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id\"\u003Eआत्ममायया आत्मेच्छया । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वभावम् । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' इत्यादिश्रुतेश्च । अत एव स्वशब्देन विशेषणं 'प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य'' इत्यादिषु । 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः'' इत्यादिषु तु न स्वशब्दः । 'प्रकृतिं विदि्ध मे पराम्'' इत्यादिषु सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरन्या । अत्र तु स्वशब्दः स्वरूपवाची । स्वभाव इत्यत्रापि स्वाख्यो भावः स्वभावः । भावशब्दस्तु सम्बन्ध्याशङ्कानिवृत्तये । स्वस्वभाव इति तु स्वस्वरूपमितिवदुपचारत्वाशङ्कां निवर्तयति ।\u003Cbr/\u003E'स्रष्टृत्वादिस्वभावत्वात्स्वेच्छया विष्णुरव्ययः ।\u003Cbr/\u003Eसृष्ट्यादिकं करोत्यद्धा स्वयं च बहुधा भवेत्'' ॥\u003C/span\u003E\u003E", |
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| "text": "'येषां गुणानां ज्ञानेन मुक्तिरुक्ता पृथक्पृथक् ।\nवेदेषु चेतिहासेषु सा तु तेषां समुच्चयात् ।\nएवमेव शमादीनां नान्यथा तु कथञ्चन'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्तवचनाज्जन्म कर्म चेत्यादिषु न तावन्मात्रेण मोक्षः ॥९ ॥" | | "lines": [ |
| | "'येषां गुणानां ज्ञानेन मुक्तिरुक्ता पृथक्पृथक् ।", |
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| | "'मयं प्रधानमुद्दिष्टं प्राधान्यं यैर्हरेर्मतम् ।", |
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| | "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।", |
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| | "काङ्क्षन्तः कर्मणां सिदि्धं यजन्त इह देवताः ।", |
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| | "तथैव भजामि । तदनुसारिफलदानरूपेण । अन्यदेवतायाजिनामपि मत्समर्पणेन वैष्णवमार्गानुवर्तनेनैव सम्यक् फलं भवति ॥", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003Eकर्मणि जीवे अस्वातन्त्र्यादकर्म कर्मविधिफलयोरभावात् । अकर्मणि विष्णौ । स्वातन्त्र्यात्सर्वकर्तृत्वम् ।\u003Cbr/\u003Eकरोस्मिन् मीयत इति कर्म जीव उदाहृतः ।\u003Cbr/\u003Eविधिशब्देनामितत्वात् अकर्म भगवान् हरिः ॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ।\nकर इति सकारान्तः अदृष्टवाची । क्रियावाची वा । तदधीनत्वात् । प्रसिद्धश्च जीवे कर्मशब्दः पञ्चरात्रे । कृत्स्नफलवत्वात् कृत्स्नकर्मकृत् ।\n॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003Eकर्मणि जीवे अस्वातन्त्र्यादकर्म कर्मविधिफलयोरभावात् । अकर्मणि विष्णौ । स्वातन्त्र्यात्सर्वकर्तृत्वम् ।\u003Cbr/\u003Eकरोस्मिन् मीयत इति कर्म जीव उदाहृतः ।\u003Cbr/\u003Eविधिशब्देनामितत्वात् अकर्म भगवान् हरिः ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।", |
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| | "त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।", |
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| | "अनिराश्रयो भगवदाश्रयत्वात् । मुक्तस्य स्वातन्त्र्याभिमानात् ॥२०॥" |
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| | "यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।", |
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| | "गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।", |
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| "text": "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।\nब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bharatha-id\"\u003Eकथमभिमानत्यागः ? ब्रह्मार्पणमित्यादि । ब्रह्मण्यर्पणं ब्रह्मार्पणम् । ब्रह्मणो हविः । ब्रह्मणोग्नौ । ब्रह्मणः कर्मसमाधिना सह । समाधिरपि तदधीना इत्यर्थः ।'एकः स्वतन्त्रो भगवान् तदीयं त्वन्यदुच्यते'' ।\u003C/span\u003E\nइति भारते ॥२४ ॥" | | "lines": [ |
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| | "दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।", |
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| "text": "दैवं विष्णुमेव यज्ञ इत्युपासते । स्वभोग्यत्वात्स्वयमेव यज्ञः । ब्रह्मा-ख्याग्नौ क्रियायज्ञं तेनैव यज्ञाख्येन विष्णुना समर्पयन्ति । तत्पूजात्वेन श्रोत्रादिसंयमं कुर्वन्ति । तत्पूजात्वेन विषयान् भुञ्जते ॥ २५, २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "दैवं विष्णुमेव यज्ञ इत्युपासते । स्वभोग्यत्वात्स्वयमेव यज्ञः । ब्रह्मा-ख्याग्नौ क्रियायज्ञं तेनैव यज्ञाख्येन विष्णुना समर्पयन्ति । तत्पूजात्वेन श्रोत्रादिसंयमं कुर्वन्ति । तत्पूजात्वेन विषयान् भुञ्जते ॥ २५, २६ ॥" |
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| | "तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।", |
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| | "यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।", |
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| | "'ज्ञानं तेहं सविज्ञानम्'' इति वक्ष्यमाणत्वात्स्वयमेवोपदेक्ष्यति ॥ ३४ ॥", |
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| | "अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।", |
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| | "यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेर्जुन ।", |
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| | "तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -'यदृच्छालाभसन्तुष्टः'' इत्यादि सन्न्यासम् ; 'कुरु कर्म'' इत्यादि कर्मयोगं च-" |
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| | "योगसंन्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयत्यनेनाध्यायेन । योगसंन्यस्तकर्माणमित्यादौ न्यासशब्दः सर्वकर्मत्यागविषयः इत्याशङ्क्य योगसंन्यासयोर्भिन्नपुन्निष्ठत्वाभिप्रायेण पृच्छति । संन्यासमिति ॥१॥" |
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| "text": "संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।\nयोगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६ ॥" | | "lines": [ |
| | "संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।", |
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| "text": "'मोक्षोपायो योग इति तद्रूपो न्यास एव तु ।\nविष्ण्वर्पिततया भद्रो नान्यो न्यासः कथञ्चन'' । इत्याग्नेये । विष्ण्वर्पितत्वादियोगरूपत्वं विना केवलकर्मत्यागो नरकफल एव । 'यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव'' । इति वक्ष्यमाणत्वात् । योगविशेषत्वान्न्यासस्य पृथगुक्तिः ॥६ ॥" | | "lines": [ |
| | "'मोक्षोपायो योग इति तद्रूपो न्यास एव तु ।", |
| | "विष्ण्वर्पिततया भद्रो नान्यो न्यासः कथञ्चन'' । इत्याग्नेये । विष्ण्वर्पितत्वादियोगरूपत्वं विना केवलकर्मत्यागो नरकफल एव । 'यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव'' । इति वक्ष्यमाणत्वात् । योगविशेषत्वान्न्यासस्य पृथगुक्तिः ॥६ ॥" |
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| | "योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः", |
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| | "सर्वभूतात्मभूतात्मेति मुख्ययोगः ।", |
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| "text": "नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।\nपश्यन् शृृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥" | | "lines": [ |
| | "नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।", |
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| | "प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।", |
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| "text": "यथा न्यासस्य योगरूपत्वं तथाह नैव किञ्चिदित्यादिना ।\n'विष्णुनार्थेष्वीरितानि मन आदीनि सर्वशः ।\nवर्तन्तेन्यो न स्वतन्त्र इति जानन् हि तत्ववित्'' ॥ इति च ॥ ८, ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथा न्यासस्य योगरूपत्वं तथाह नैव किञ्चिदित्यादिना ।", |
| | "'विष्णुनार्थेष्वीरितानि मन आदीनि सर्वशः ।", |
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| | "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।", |
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| | "कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।", |
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| | "युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।", |
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| | "सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।", |
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| | "तत्पूजात्मकानि तत्कृतानि मम शुभार्थमिति ब्रह्मण्याधानम् । स्वातन्त्र्याभावापेक्षयैव जीवस्याकर्तृत्वम् ।", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id\"\u003E'स्वातन्त्र्याद्भगवान्विष्णुः स्वभाव इति कीर्तितः ।\u003Cbr/\u003Eतत्स्वातन्त्र्यं कदाप्येष नान्यस्य सृजति क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eस्वातन्त्र्यादेव पापादिसम्बन्धः कुर्वतोपि न ।\u003Cbr/\u003Eअज्ञानावृतबुदि्धत्वादीदृशं तं न जानते'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति महावाराहे ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003E'अहं सर्वस्य प्रभवः'' । 'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णामि'' ।\u003Cbr/\u003E'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ।'' 'न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चिनारे'' । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' ।\u003Cbr/\u003E'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'' । इत्यादेर्नास्यास्वाभाविकं कर्तृत्वमकर्तृत्वं वा । विपरीतप्रमाणाभावाच्च । अनिर्वाच्यनिरासादेव च निरस्तोयं पक्षः । न च सर्वविशेषराहित्यवादिनां शून्यवादात्कश्चिद्विशेषः । न हि सर्वविशेषरहितमित्युक्ते तदस्तीति सिद्ध्यति । वाच्यत्वलक्ष्यत्वास्तित्वादीनामपि विशेषत्वात् । अन्यथास्ति ब्रह्मेत्यादीनां शब्दानामपि पर्यायत्वादयो दोषाः । व्यावर्त्यविशेषश्च व्यावृत्तविशेषनिबन्धन एव । अन्यथा वैयर्थ्यमेव स्यात् । न च सर्वशब्दावाच्यस्य लक्ष्यत्वम् । न च सर्वप्रमाणागोचरमस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । नास्तित्वं तु सप्तमरसादिवददर्शनात्सिद्ध्यति ।\u003Cbr/\u003Eस्वप्रकाशत्वं च न अमानं सिद्ध्यति । स्वयम्प्रकाशत्वं च ततोतिरिक्तं चेद्विशेषाङ्गीकारः । न चेत्तदेव प्रमाणगोचरम् । तत्प्रमाणाभावे परप्रकाशत्वमात्रनिरासे स्वप्रकाशत्वे प्रमाणाभावादप्रकाशत्वमेव स्यात् । अर्थतः सिदि्धरित्यर्थापत्तितः सिदि्धस्तत्प्रमाणतः सिदि्धर्वा । उभयथापि प्रमेयत्वमेव स्यात् ।\u003Cbr/\u003Eस्वप्रकाशशब्देन स्वमितत्वानङ्गीकारात्परमितत्वानङ्गीकाराच्चासिदि्धरेव । प्रकाश इत्युक्तेपि स्वमन्यं वा किञ्चित्प्रकाश्यं विना न दृष्ट एव भोजनादिवत् । कर्तृकर्मविरोधश्चानुभवविरुद्धः । ज्ञानं च ज्ञेयं ज्ञातारं च विना न दृष्टम् । अतः शून्यवादान्न कश्चिद्विशेषः । अतोनन्तदोषदुष्टत्वादुपरम्यते ।\u003Cbr/\u003Eहरिः स्वभावतः कर्ता सर्वमन्यत्तदीरितम् ।\u003Cbr/\u003Eअतः सा कर्तृता तस्य न कदाचिद्विनश्यति ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ १४-१७ ॥" |
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| | "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।", |
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| | "'विषमेष्वपि जीवेषु समो विष्णुः सदैव तु ।", |
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| | "इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।", |
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| | "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।", |
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| | "शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।", |
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| | "इदानीमपि परमात्मनि स्मृऽतमात्रे सुखं विन्दतीति यत्तदा स एव सम्यगुक्तः किमु ॥ २१-२३ ॥" |
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| | "योन्तः सुखोन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।", |
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| | "ब्रह्मणि भूतः । अन्यथा पुनर्ब्रह्म गच्छतीति विरोधाच्च । अन्तस्सुखादिकं च ब्रह्मदर्शनात् ॥ २४ ॥" |
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| | "कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।", |
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| | "'अमुक्तो मुक्तसादृश्यान्मुक्त एव हि तत्त्वदृक् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eसम्पूर्णोपायो योगारूढः ।\u003Cbr/\u003E'नानाजनस्य शुश्रूषा कर्मेति करवन्मितेः ।\u003Cbr/\u003Eयोगार्थिना तु सा कार्या योगस्थेन हरौ स्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eतेनापि स्वोत्तमानां तु कार्यान्यैरखिलेष्वपि ।\u003Cbr/\u003Eशक्तितः करणीयेति विशेषोसिद्धसिद्धयोः ।\u003Cbr/\u003Eप्राप्तोपायस्तु सिद्धः स्यात् प्रेप्सुः साधक उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eतस्य प्राण्युपकारेण सन्तुष्टो भवतीश्वरः ।\u003Cbr/\u003Eसिद्धोपायेन विष्णोस्तु ध्यानव्याख्यार्चनादिकम् ।\u003Cbr/\u003Eकार्यं नान्यत् तस्य तेन तुष्टो भवति केशवः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्तवचनान्न विरोधः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' ।\u003C/span\u003E\nइति भागवते ॥३ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eसम्पूर्णोपायो योगारूढः ।\u003Cbr/\u003E'नानाजनस्य शुश्रूषा कर्मेति करवन्मितेः ।\u003Cbr/\u003Eयोगार्थिना तु सा कार्या योगस्थेन हरौ स्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eतेनापि स्वोत्तमानां तु कार्यान्यैरखिलेष्वपि ।\u003Cbr/\u003Eशक्तितः करणीयेति विशेषोसिद्धसिद्धयोः ।\u003Cbr/\u003Eप्राप्तोपायस्तु सिद्धः स्यात् प्रेप्सुः साधक उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eतस्य प्राण्युपकारेण सन्तुष्टो भवतीश्वरः ।\u003Cbr/\u003Eसिद्धोपायेन विष्णोस्तु ध्यानव्याख्यार्चनादिकम् ।\u003Cbr/\u003Eकार्यं नान्यत् तस्य तेन तुष्टो भवति केशवः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्तवचनान्न विरोधः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इंद्रियनिग्रहः'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति भागवते ॥३ ॥" |
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| "text": "यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।\nसर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।", |
| | "सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥" |
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| "text": "कथं नानुषज्यते ? सर्वसङ्कल्पसंन्यासी ।\n'मयि सर्वणि कर्माणि'' इत्युक्तत्वात् ।\n'मदधीनमिदं ज्ञात्वा मत्संन्यासीति चोच्यते'' । इति च ॥४ ॥" | | "lines": [ |
| | "कथं नानुषज्यते ? सर्वसङ्कल्पसंन्यासी ।", |
| | "'मयि सर्वणि कर्माणि'' इत्युक्तत्वात् ।", |
| | "'मदधीनमिदं ज्ञात्वा मत्संन्यासीति चोच्यते'' । इति च ॥४ ॥" |
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| | "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।", |
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| "text": "बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।\nअनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६ ॥" | | "lines": [ |
| | "बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।", |
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| "text": "'उद्धरेतैव संसाराज्जीवात्मानं परात्मना ।\nविष्णुर्बन्धुः सतां नित्यं परात्मा ह्यसतामरिः ।\nतत्प्रसादजया भक्तया जितो यस्य वशेत्विव ।\nवर्तते तस्य मित्रं स तदन्यस्य च शत्रुवत्'' ॥ इति च ।\n'परमात्मा समाहितः'' इति वाक्यशेषाच्च ॥ ५, ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "'उद्धरेतैव संसाराज्जीवात्मानं परात्मना ।", |
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| | "तत्प्रसादजया भक्तया जितो यस्य वशेत्विव ।", |
| | "वर्तते तस्य मित्रं स तदन्यस्य च शत्रुवत्'' ॥ इति च ।", |
| | "'परमात्मा समाहितः'' इति वाक्यशेषाच्च ॥ ५, ६ ॥" |
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| "text": "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।\nशीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥" | | "lines": [ |
| | "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।", |
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| "text": "ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेंद्रियः ।\nयुक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८ ॥" | | "lines": [ |
| | "ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेंद्रियः ।", |
| | "युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८ ॥" |
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| "text": "'सर्वत्र विष्णोरुत्कर्षज्ञानं ज्ञानमितीर्यते ।\nतद्विशेषपरिज्ञानं विज्ञानमिति गीयते'' ॥ इति च ॥ ७,८ ॥" | | "lines": [ |
| | "'सर्वत्र विष्णोरुत्कर्षज्ञानं ज्ञानमितीर्यते ।", |
| | "तद्विशेषपरिज्ञानं विज्ञानमिति गीयते'' ॥ इति च ॥ ७,८ ॥" |
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| "text": "सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।\nसाधुष्वपि च पापेषु समबुदि्धर्विशिष्यते॥९ ॥" | | "lines": [ |
| | "सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'यस्य यत्र यथा वृत्तिर्विहिता वर्तनं तथा ।\u003Cbr/\u003Eज्ञानं वापि समत्वं तद्विषमत्वमतोन्यथा'' ॥\u003C/span\u003E\nइति महाविष्णुपुराणे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003E'अनिमित्तस्नेहवांस्तु सुहृज्ज्ञात्वोपकारकृत् ।\u003Cbr/\u003Eमित्रं वधादिकृदरिर्द्वेष्यस्त्वप्रियमात्रकृत् ।\u003Cbr/\u003Eउदासीनः स्नेहवतोप्यस्नेही तत्कृतानुकृत् ।\u003Cbr/\u003E\u003Eमध्यस्थ इति विज्ञेयः सुहृदेषु विशिष्यते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ॥ ९-१९ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003E'यस्य यत्र यथा वृत्तिर्विहिता वर्तनं तथा ।\u003Cbr/\u003Eज्ञानं वापि समत्वं तद्विषमत्वमतोन्यथा'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| "text": "योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।\nएकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥" | | "lines": [ |
| | "योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।", |
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| "text": "शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।\nनात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥" | | "lines": [ |
| | "शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।", |
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| | "तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।", |
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| "text": "समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।\nसम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥" | | "lines": [ |
| | "समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।", |
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| | "प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।", |
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| "text": "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।\nशान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥" | | "lines": [ |
| | "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।", |
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| | "नात्यश्नतस्तु योगोस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।", |
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| | "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।", |
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| | "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृऽता ।", |
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| "text": "अयतिः अप्रयत्नः । ''प्रयत्नाद्यतमानस्तु\" इति वाक्यशेषात् । योगशब्द-स्योपायार्थत्वेप्यत्रोपायविशेष एव ध्यानयोगादिर्विवक्षित इति न विरोधः॥ ३७ ॥" | | "lines": [ |
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| | "पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः ।", |
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| | "'अचेतना चेतनेति द्विविधा प्रकृतिर्मता ।", |
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| "text": "मत्तोन्यत् परतरं नास्ति । परतरस्त्वहमेवेत्यर्थः । अन्यथान्यदिति व्यर्थम् ।\n'अवरा दुःखसम्बन्धाज्जीवा एव प्रकीर्तिताः ।\nनित्यनिर्दुःखरूपत्वात् परा श्रीरेकलैव तु ।\nदुःखासम्पीडितत्वात्तु मध्यमो वायुरुच्यते ।\nअनन्याधीनरूपत्वादसमाधिकसौख्यतः ।\nतत्तन्त्रत्वाच्च सर्वस्य स विष्णुः परतमो मतः ।\nअभावादन्तरान्यस्य त्विहैकार्थौ तरप्तमौ ।\nयस्याः सम्बन्धयोग्यत्वाज्जीवा अप्यवरा मताः ।\nतस्या जडायाः प्रकृतेरवरत्वे क्व संशयः ।\nअथावरतरा ये तु विमुखाश्चेतना हरेः ।\nनित्यदुःखैकयोग्यत्वान्न ह्येतत् स्यादचेतने ।\nअतः परत(रं)मं विष्णुं यो वेत्ति स विमुच्यते ।\nमुक्तस्तु स्यात् पराभासः सुनित्यसुखभोजनात् ।\nतत्रापि तारतम्यं स्यात् तेषु ब्रह्माधिको मतः ।\nविष्णोराधिक्यसंवित्तिः सर्वस्माज्ज्ञानमुच्यते ।\nएवं विविच्य तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ।\nएतच्च तारतम्येन वर्तते केशवादिषु ।\nमुख्यविज्ञान्यतो विष्णुः किञ्चिद्विज्ञानिनोपरे ॥७ ॥" | | "lines": [ |
| | "मत्तोन्यत् परतरं नास्ति । परतरस्त्वहमेवेत्यर्थः । अन्यथान्यदिति व्यर्थम् ।", |
| | "'अवरा दुःखसम्बन्धाज्जीवा एव प्रकीर्तिताः ।", |
| | "नित्यनिर्दुःखरूपत्वात् परा श्रीरेकलैव तु ।", |
| | "दुःखासम्पीडितत्वात्तु मध्यमो वायुरुच्यते ।", |
| | "अनन्याधीनरूपत्वादसमाधिकसौख्यतः ।", |
| | "तत्तन्त्रत्वाच्च सर्वस्य स विष्णुः परतमो मतः ।", |
| | "अभावादन्तरान्यस्य त्विहैकार्थौ तरप्तमौ ।", |
| | "यस्याः सम्बन्धयोग्यत्वाज्जीवा अप्यवरा मताः ।", |
| | "तस्या जडायाः प्रकृतेरवरत्वे क्व संशयः ।", |
| | "अथावरतरा ये तु विमुखाश्चेतना हरेः ।", |
| | "नित्यदुःखैकयोग्यत्वान्न ह्येतत् स्यादचेतने ।", |
| | "अतः परत(रं)मं विष्णुं यो वेत्ति स विमुच्यते ।", |
| | "मुक्तस्तु स्यात् पराभासः सुनित्यसुखभोजनात् ।", |
| | "तत्रापि तारतम्यं स्यात् तेषु ब्रह्माधिको मतः ।", |
| | "विष्णोराधिक्यसंवित्तिः सर्वस्माज्ज्ञानमुच्यते ।", |
| | "एवं विविच्य तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ।", |
| | "एतच्च तारतम्येन वर्तते केशवादिषु ।", |
| | "मुख्यविज्ञान्यतो विष्णुः किञ्चिद्विज्ञानिनोपरे ॥७ ॥" |
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| | "रसोहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।", |
| | "प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥" |
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| | "पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।", |
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| | "बीजं मां सर्वभूतानां विदि्ध पार्थ सनातनम् ।", |
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| | "बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।", |
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| "text": "सोप्सु स्थित्वा रसयति रसनामा ततः स्मृऽतः ।\nसूर्यचन्द्रादिषु स्थित्वा प्रभानामा प्रभासनात् ।\nवेदस्थः प्रणवाख्योसावात्मानं यत् प्रणौत्यतः ।\nखे स्थितः शब्दनामासौ यच्छब्दयति केशवः ॥८ ॥ पुण्यापुण्यं गन्धयति स्वयं पुण्यो धरास्थितः ।\nतेजयत्यग्निसंस्थः (स) सन् भूतस्थो जीवनप्रदः ।\nतपस्विसंस्थस्तपति ... ... ॥९ ॥ ... व्यञ्जनाद् बीजसञ्ज्ञितः ।\nबोधनाद् बुदि्धनामासौ बुदि्धमत्सु व्यवस्थितः ॥१० ॥ नित्यपूर्णबलत्वात्तु बलकामविवर्जितः ।\nअरा(जस)गजबलश्चैव स्थानेभ्योन्येष्वयोजनात् ।\nएतादृशबलात्मासौ बलिनां बलदः स्वयम् ।\nबेति पूर्णत्ववाची स्यात् तद्रतेर्बलमुच्यते ।\nप्रायो हि कामिता अर्था धर्मं हन्युर्हरिः पुनः ।\nन धर्महानिकृत् किन्तु कामितो धर्मवृदि्धकृत् ।\nधर्माविरुद्धकामोतो विष्णुर्भूतेषु संस्थितः ।\nएवं स सर्वतश्चान्यः स्वतन्त्रश्चैव सर्वगः ।\nव्यवस्थयैव सर्वेषां सर्वदा सर्वदः प्रभुः ॥११ ॥" | | "lines": [ |
| | "सोप्सु स्थित्वा रसयति रसनामा ततः स्मृऽतः ।", |
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| | "अरा(जस)गजबलश्चैव स्थानेभ्योन्येष्वयोजनात् ।", |
| | "एतादृशबलात्मासौ बलिनां बलदः स्वयम् ।", |
| | "बेति पूर्णत्ववाची स्यात् तद्रतेर्बलमुच्यते ।", |
| | "प्रायो हि कामिता अर्था धर्मं हन्युर्हरिः पुनः ।", |
| | "न धर्महानिकृत् किन्तु कामितो धर्मवृदि्धकृत् ।", |
| | "धर्माविरुद्धकामोतो विष्णुर्भूतेषु संस्थितः ।", |
| | "एवं स सर्वतश्चान्यः स्वतन्त्रश्चैव सर्वगः ।", |
| | "व्यवस्थयैव सर्वेषां सर्वदा सर्वदः प्रभुः ॥११ ॥" |
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| | "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।", |
| | "मत्त एवेति तान्विदि्ध न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥" |
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| | "ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।", |
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| | "त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।", |
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| | "न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।", |
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| "text": "... अचेतनया तन्मेयत्वात्तु मायया ।\nलक्ष्म्या वशगया लोको विष्णुनैव विमोहितः ।\nये तु विष्णुं प्रपद्यन्ते ते मायां (तु) तां तरन्ति हि ।\nलक्ष्मीः सा जडमायाया देवता ते उभे अपि ।\nविष्णोर्वशे ततोनन्यभक्त्या तं शरणं व्रजेत् ।\nयादृशी तत्र भक्तिः स्यात् तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।\nअनन्यभक्तिः सा ज्ञेया विष्णावेव तु सा भवेत् ।\nअन्येषु वैष्णवत्वेन लक्ष्मीब्रह्महरादिषु ।\nकुर्याद् भक्तिं नान्यथा तु तद्वशा एव ते यतः ।\nएवं जानंस्तमाप्नोति नान्यथा तु कथञ्चन ।\nपूर्णं वस्तु यतो ह्येको वासुदेवो नचापरः ।\nएवंविद् दुर्लभो लोके यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ १३-१९ ॥" | | "lines": [ |
| | "... अचेतनया तन्मेयत्वात्तु मायया ।", |
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| | "अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।", |
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| "text": "... ... यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ 'विष्णुं तत् परमज्ञात्वा रमाब्रह्महरादिकान् ।\nयजन्नपि तमो घोरं नित्युदुःखं प्रयाति हि ।\nअज्ञानां तु कुले जातो यावद् विष्णोः समर्चनम् ।\nविष्णुतत्त्वं च जानीयात् तावत् सेवा पृथक् कृता ।\nविद्याद्यैहिकभोगाय यदि बुद्ध्वा पुनर्न तु ।\nपरिवारतामृते कुर्यादन्यदेवार्चनं क्वचित् ।\nअजानता कृतं त्यक्तं न दोषाय भविष्यति ।\nजन्मादिप्रदमेव स्यादत्यागे पुनरेव तु ।\nक्षिप्रं च ज्ञापयत्येव भगवान् स्वयमेव तु ।\nयदि जन्मान्तरे स्वीयो निमित्तीकृत्य कञ्चन'' ॥ इत्यादि च ।\n'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्युपसंहाराच्च तत्तत्कारणत्वात् तत्तन्नामेत्यवसीयते । ''मयि सर्वमिदं प्रोतम्\" इति भेदेनैवोपक्रमाच्च । आप्नोति विष्णुमित्येवात्मशब्दो ज्ञानिनि । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते'' इत्यादेः । 'आस्थितः स हि'' 'मां प्रपद्यते'' इत्यादिवाक्यशेषाच्च । बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । ततो मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति पूर्णमिति जानन् । 'प्रपद्यन्तेन्यदेवताः'' इत्यादिवाक्यशेषे भेददर्शनाच्च । 'देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'' इति च ॥ २०-२२ ॥ 'ज्ञात्वा परत्वं विष्णोस्तु पृथग् देवान् यजन्नरः ।\nयाति देवांस्तदज्ञात्वा तम एव प्रपद्यते ।\nतथापि यावदन्यैस्तु साम्यं हीनत्वमेकताम् ।\nन निश्चिन्वन्ति जायन्ते संसारे ते पुनः पुनः'' ॥ इति च ॥२३ ॥" | | "lines": [ |
| | "... ... यत् सर्वे मिश्रयाजिनः ॥ 'विष्णुं तत् परमज्ञात्वा रमाब्रह्महरादिकान् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id\"\u003Eपरमाक्षरं विष्णुरेव मुख्यत इति प्रसिद्धत्वात् तथैव (परिहार इति) परिहरति । अज्ञानां तदपि ज्ञापयितुं तथैव परिहारः । पुनरहमिति नोक्तमित्याशङ्का 'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्\" इति विष्णावेव प्रयुक्तेनाव्यक्तशब्देन 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तः'' इति परिह्रियते । 'ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्'' इत्यत्र तु पृथक् प्रश्नादुपासकयोः फलतारतम्यकथनात् 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युक्ताक्षरादपि चोत्तमः इति विष्णोरुत्तमत्वकथनाच्चान्यदेवेत्यवसीयते । 'अधियज्ञोहमेव'' इति साधियज्ञमित्युक्त्या प्राप्तभेदनिवृत्त्यर्थम् । तस्यैव सर्वप्राणिदेहस्थित-रूपान्तरापेक्षया सहितत्वं युज्यते ।\u003Cbr/\u003E'प्राणिनां देहगो विष्णुरधियज्ञ इतीरितः ।\u003Cbr/\u003Eस एव व्याप्तरूपेण ब्रह्मेति परिकीर्त्यते ।\u003Cbr/\u003Eतैस्तैरधिकयाज्यत्वाद् बृंहितत्वाच्च हेतुतः ।\u003Cbr/\u003Eअध्यात्मं तत्स्वभावो यदधिकः परमात्मगः ।\u003Cbr/\u003Eपुंसां सजडभावानां सर्गः कर्म हरेः स्मृऽतम् ।\u003Cbr/\u003Eभूताधिकत्वतो जीवा अधिभूतमितीरिताः ।\u003Cbr/\u003Eअधिको दैवतं विष्णुरेव यस्यास्तु सा रमा ।\u003Cbr/\u003Eपुरुप्राणाधिदैवाख्या त्विति ज्ञेयमिदं नरैः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति तत्त्वविवेके ।\nकथंरूपोधियज्ञ इति प्रश्नस्तु 'अहमेव'' इत्युक्तत्वात् तल्लक्षणोक्त्यैव परिहृतः ॥॥ ३,४ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id\"\u003Eपरमाक्षरं विष्णुरेव मुख्यत इति प्रसिद्धत्वात् तथैव (परिहार इति) परिहरति । अज्ञानां तदपि ज्ञापयितुं तथैव परिहारः । पुनरहमिति नोक्तमित्याशङ्का 'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्\" इति विष्णावेव प्रयुक्तेनाव्यक्तशब्देन 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तः'' इति परिह्रियते । 'ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्'' इत्यत्र तु पृथक् प्रश्नादुपासकयोः फलतारतम्यकथनात् 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युक्ताक्षरादपि चोत्तमः इति विष्णोरुत्तमत्वकथनाच्चान्यदेवेत्यवसीयते । 'अधियज्ञोहमेव'' इति साधियज्ञमित्युक्त्या प्राप्तभेदनिवृत्त्यर्थम् । तस्यैव सर्वप्राणिदेहस्थित-रूपान्तरापेक्षया सहितत्वं युज्यते ।\u003Cbr/\u003E'प्राणिनां देहगो विष्णुरधियज्ञ इतीरितः ।\u003Cbr/\u003Eस एव व्याप्तरूपेण ब्रह्मेति परिकीर्त्यते ।\u003Cbr/\u003Eतैस्तैरधिकयाज्यत्वाद् बृंहितत्वाच्च हेतुतः ।\u003Cbr/\u003Eअध्यात्मं तत्स्वभावो यदधिकः परमात्मगः ।\u003Cbr/\u003Eपुंसां सजडभावानां सर्गः कर्म हरेः स्मृऽतम् ।\u003Cbr/\u003Eभूताधिकत्वतो जीवा अधिभूतमितीरिताः ।\u003Cbr/\u003Eअधिको दैवतं विष्णुरेव यस्यास्तु सा रमा ।\u003Cbr/\u003Eपुरुप्राणाधिदैवाख्या त्विति ज्ञेयमिदं नरैः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति तत्त्वविवेके ।", |
| | "कथंरूपोधियज्ञ इति प्रश्नस्तु 'अहमेव'' इत्युक्तत्वात् तल्लक्षणोक्त्यैव परिहृतः ॥॥ ३,४ ॥" |
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| | "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।", |
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| | "यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।", |
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| "text": "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।\nमय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।", |
| | "मय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥" |
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| "text": "अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।\nपरमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।", |
| | "परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥" |
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| "text": "मद्भावं मयि भावम् । सदा तद्भावभावितानामेव स्मरंस्त्यजतीति केवलतत्कालस्मरणं भवति । न चेत् स्मरतोपि समाधिस्थस्खलनवत् पूर्वकर्मानुसारिस्मृऽत्या तत्प्राप्तिरेव भवति । अपरोक्षज्ञानिनां प्रारब्धकर्मावसाने स्मरंस्त्यजतीति भवत्येव । 'प्रयाणकालेपि च मां ते विदुः'' इत्युक्तत्वात् । 'युक्तचेतसः'' इति विशेषणान्नित्यं स्मरतामेवापरोक्षज्ञानं जायते ।\n'भक्त्या ज्ञानान्निषिद्धानां त्यागान्नित्यहरिस्मृऽतेः ।\nअरागाद् विहितात्यागादित्येतैरेव संयुतैः ।\nअपरोक्षदर्शनं विष्णोर्जायते नान्यथा क्वचित्'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ ५-८ ॥" | | "lines": [ |
| | "मद्भावं मयि भावम् । सदा तद्भावभावितानामेव स्मरंस्त्यजतीति केवलतत्कालस्मरणं भवति । न चेत् स्मरतोपि समाधिस्थस्खलनवत् पूर्वकर्मानुसारिस्मृऽत्या तत्प्राप्तिरेव भवति । अपरोक्षज्ञानिनां प्रारब्धकर्मावसाने स्मरंस्त्यजतीति भवत्येव । 'प्रयाणकालेपि च मां ते विदुः'' इत्युक्तत्वात् । 'युक्तचेतसः'' इति विशेषणान्नित्यं स्मरतामेवापरोक्षज्ञानं जायते ।", |
| | "'भक्त्या ज्ञानान्निषिद्धानां त्यागान्नित्यहरिस्मृऽतेः ।", |
| | "अरागाद् विहितात्यागादित्येतैरेव संयुतैः ।", |
| | "अपरोक्षदर्शनं विष्णोर्जायते नान्यथा क्वचित्'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ ५-८ ॥" |
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| "text": "कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।\nसर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।", |
| | "सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥" |
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| "text": "प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।\nभ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।", |
| | "भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥" |
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| | "तमसः परस्तात् अप्राकृतदेहम् ॥ ९, १० ॥" |
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| "text": "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।\nयदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।", |
| | "यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥" |
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| | "मन आदीनां ब्रह्मणि चरणं ब्रह्मचर्यम् ॥ ११ ॥" |
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| | "सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।", |
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| | "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id\"\u003E'नियमाज्जन्मनोभावो मुक्तस्यैव तथापि तु ।\u003Cbr/\u003Eमहर्लोकमतीतानां न जन्मांशलयौ विना ।\u003Cbr/\u003Eतत्राप्यवश्यं तत् स्थानं तैः क्षिप्रं पुनराप्यते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ॥१६ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Tatvaviveka-id\"\u003E'नियमाज्जन्मनोभावो मुक्तस्यैव तथापि तु ।\u003Cbr/\u003Eमहर्लोकमतीतानां न जन्मांशलयौ विना ।\u003Cbr/\u003Eतत्राप्यवश्यं तत् स्थानं तैः क्षिप्रं पुनराप्यते'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| "text": "सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।\nरात्रिं युगसहस्रान्तां तेहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "सहस्रमिति बह्वेव । ब्रह्मणः परब्रह्मणः ।\n'अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके'' ॥ इति वाक्यशेषात् ।\nनहि विरिञ्चाहन्येव सर्वव्यक्तलयः ।\n'नित्यस्यापि हरेः कालो द्विपरार्धात्मकस्त्वयम् ।\nअहःश्चासौ(श्वासो) निमेषश्चेत्यप्रवृत्त्योपचर्यते'' ॥ इति च ॥१७ ॥" | | "lines": [ |
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| | "यत्र कालाभिमानिदेवतासु मृत्यनन्तरं प्रयाताः । अग्निर्ज्योतिर्धूमानामकालाभिमानित्वेपि कालप्राचुर्यात् काल इत्युच्यते ॥ २३ ॥" |
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| | "अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।", |
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| | "शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।", |
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| | "'अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधा वह्नेः पुत्रो व्यवस्थितः ।", |
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| | "नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।", |
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| | "वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।", |
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| | "'मार्गौ ब्रह्म च यः पश्येत् साक्षादेवापरोक्षतः ।", |
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| "text": "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।\nउदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥" | | "lines": [ |
| | "न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।", |
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| | "'विष्णुगान्यप्यतत्स्थानि भूतान्येष ह्यसङ्गतः'' इति च । ममात्मा मम देह एव । तदनन्यत्वात् । देहस्याचेतनत्वाशङ्कानिवृत्तये 'ममात्मा'' इत्याह ॥ ४-९ ॥" |
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| | "मानुषीं मनुष्यसदृशीम् 'तन्वा विष्णुरनन्योपि स्वाधीनत्वात् तदाश्रितः'' । इति च ।", |
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| | "'एकमूर्तिश्चतुर्मूर्तिरथवा पञ्चमूर्तिकः ।", |
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| "text": "'अर्च्यत्वादृक्समत्वाच्च निजरूपेषु साम सः ।\nयाज्यत्वात् स यजुर्यज्ञः सार्वज्ञ्यात् पुरुषोत्तमः ।\n'क्रतुः कृतिस्वरूपत्वात् स्वधानन्यधृतो यतः ।\nमानात् त्रातीति मन्त्रोयमुष्टानां निधिरौषधम् ।\nआ ज्यायस्त्वादाज्यनामा दर्भोदरधरो यतः ।\nअहूतत्वाद्धुतं चायमग्निर्नेतागतेर्यतः'' ॥ इत्यादि च ।\n'तत्तत्पदार्थभिन्नोपि तत्तन्नामैवमच्युतः ।\nस्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वात् गुणानन्त्याच्च केवलम्'' ॥ इति च ।\n'ओमित्याक्रियते यस्मादोङ्कारो भगवान् (हरिः) परः'' इति च ।\n'पातीति पिता मानान्माता यत् स पितुर्महान् ।\nपितामहो निधातृत्वान्निधानं भीतरक्षणात् ।\nशरणं व्यञ्जनाच्चैव बीजमित्युच्यते प्रभुः'' ॥ इति च ।\nप्रलयकाले संहर्तृत्वात् प्रलयः । अन्यदापीति मृत्युः'प्राणगः प्राणधर्ता यदमृतं प्रविलापयन् ।\nविश्वं प्रलय इत्युक्तो मृत्युरन्यत्र मारणात्'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'सत् साधुगुणपूर्णत्वादस्मान्नान्यो गुणाधिकः ।\u003Cbr/\u003Eयतोतोसदिति प्रोक्तं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n॥ १६-१९ ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।\nते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं अश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "'अर्च्यत्वादृक्समत्वाच्च निजरूपेषु साम सः ।", |
| | "याज्यत्वात् स यजुर्यज्ञः सार्वज्ञ्यात् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "'क्रतुः कृतिस्वरूपत्वात् स्वधानन्यधृतो यतः ।", |
| | "मानात् त्रातीति मन्त्रोयमुष्टानां निधिरौषधम् ।", |
| | "आ ज्यायस्त्वादाज्यनामा दर्भोदरधरो यतः ।", |
| | "अहूतत्वाद्धुतं चायमग्निर्नेतागतेर्यतः'' ॥ इत्यादि च ।", |
| | "'तत्तत्पदार्थभिन्नोपि तत्तन्नामैवमच्युतः ।", |
| | "स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वात् गुणानन्त्याच्च केवलम्'' ॥ इति च ।", |
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| | "'पातीति पिता मानान्माता यत् स पितुर्महान् ।", |
| | "पितामहो निधातृत्वान्निधानं भीतरक्षणात् ।", |
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| | "विश्वं प्रलय इत्युक्तो मृत्युरन्यत्र मारणात्'' ॥ इति च ।", |
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| | "॥ १६-१९ ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।", |
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| "text": "ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं\nक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।\nएवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना\nगतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं", |
| | "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।", |
| | "एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना", |
| | "गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।\nतेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।\nतेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "'अनन्यदेवतायागाद् भक्त्युद्रेकादकामनात् ।\nसदा योगाच्च वैशिष्ट्यं त्रैविद्याद् वैष्णवादपि ।\nस्यादि्ध भागवतस्यैव तेन ब्रह्मादयोखिलाः ।\nअश्वमेधादिभिर्यज्ञैरपि केशवयाजिनः ।\nवैष्णवा इति बुद्ध्यैव मानयन्त्यन्यदेवताः ॥'' इत्याग्नेये ।\n'सम्यग्गुणगणज्ञानादुपासा पर्युपासना'' । इति च ॥ २०-२३ ॥" | | "lines": [ |
| | "'अनन्यदेवतायागाद् भक्त्युद्रेकादकामनात् ।", |
| | "सदा योगाच्च वैशिष्ट्यं त्रैविद्याद् वैष्णवादपि ।", |
| | "स्यादि्ध भागवतस्यैव तेन ब्रह्मादयोखिलाः ।", |
| | "अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरपि केशवयाजिनः ।", |
| | "वैष्णवा इति बुद्ध्यैव मानयन्त्यन्यदेवताः ॥'' इत्याग्नेये ।", |
| | "'सम्यग्गुणगणज्ञानादुपासा पर्युपासना'' । इति च ॥ २०-२३ ॥" |
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| | "अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।", |
| | "न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥" |
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| | "यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।", |
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| | "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।", |
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| | "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।", |
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| | "शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।", |
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| "text": "मामिष्ट्वा प्रार्थयन्त इत्युक्तत्वाज्जानन्तोपि नाभिजानन्ति तत्त्वेन ।\n'सर्वदेववरत्वेन यो न जानाति केशवम् ।\nतस्य पुण्यानि मोघानि याति चान्धं तमो ध्रुवम्'' ॥ इति च ।\n'मोघाशा मोघकर्माणः'' इत्युक्तत्वाच्च न केवलाज्ञविषयं मिथ्याज्ञानिविषयं वा 'च्यवन्ति ते'' इत्यादि । अतः सर्वाधिक्यं विष्णोर्ज्ञात्वापि ब्रह्मादीनां तत्परिवारत्वादिकमजानतामिदं फलम् ॥ २४-२८ ॥" | | "lines": [ |
| | "मामिष्ट्वा प्रार्थयन्त इत्युक्तत्वाज्जानन्तोपि नाभिजानन्ति तत्त्वेन ।", |
| | "'सर्वदेववरत्वेन यो न जानाति केशवम् ।", |
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| | "'मोघाशा मोघकर्माणः'' इत्युक्तत्वाच्च न केवलाज्ञविषयं मिथ्याज्ञानिविषयं वा 'च्यवन्ति ते'' इत्यादि । अतः सर्वाधिक्यं विष्णोर्ज्ञात्वापि ब्रह्मादीनां तत्परिवारत्वादिकमजानतामिदं फलम् ॥ २४-२८ ॥" |
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| | "समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।", |
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| | "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।", |
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| | "क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।", |
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| | "मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।", |
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| | "किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।", |
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| | "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।", |
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| "text": "'पापादिकारिताश्चैव पुंसां स्वाभाविका अपि ।\nविप्रत्वाद्यास्तत्र पुण्याः स्वाभाव्या एव मुक्तिगाः ।\nयान्ति स्त्रीत्वं पुमांसोपि पापतः कामतोपि वा ।\nन स्त्रियो यान्ति पुंस्त्वं तु स्वभावादेव याः स्त्रियः ।\nपुंसा सहैव पुन्देहस्थितिः स्याद् वरदानतः ।\nतज्जन्मनि वराः पापजाताभ्यो निजसत्स्त्रियः ।\nसर्वेषामपि जीवानामन्त्यदेहो यथा निजः। मुक्तौ च निजभावः स्यात् कर्मभोगान्ततोपि वा'' इति भविष्यत्पर्ववचनात् पापयोनयः पुण्या इति विशेषणम् ।\n॥ ३२-३४ ॥" | | "lines": [ |
| | "'पापादिकारिताश्चैव पुंसां स्वाभाविका अपि ।", |
| | "विप्रत्वाद्यास्तत्र पुण्याः स्वाभाव्या एव मुक्तिगाः ।", |
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| | "उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-" |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'बुदि्धर्बोधनिधित्वात् तदन्तःकरणमुच्यते'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "॥ ४-५ ॥" |
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| | "महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।", |
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| | "'युज्यते येन योगोसावुपायः शक्तिरेव वा'' । इति च । विशिष्टभवनं विभूतिः । महत्त्वम् । विविधभवनं वा । योगः सामर्थ्यम् ॥ ७ ॥" |
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| | "सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।", |
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| | "वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।", |
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| | "कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।", |
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| | "विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।", |
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| | "उत्कर्षहेतुर्वृक्षेभ्यो य एवाश्वत्थनामकः'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।", |
| | "'केषु केषु च भावेषु'' इत्युक्तत्वाच्च ब्रह्मादिजीवेभ्योन्यदेव विभूतिरूपम् ।", |
| | "'द्विविधं वैभवं रूपं प्रत्यक्षं च तिरोहितम् ।", |
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| | "स्वजात्याधिक्यदं तेषां तत् तिरोहितवैभवम्'' ॥ इत्यादि च ।", |
| | "'आत्माततगुणत्वेन रवज्ञेयो यतो रविः ।", |
| | "उदवन्मेघचलनान्मरीचिः साम साम्यतः ।", |
| | "सुखात् सुखत्वात्तु शशी वेदो वेदनतो हरिः ।", |
| | "वासवर्ती वासवोसौ चेतोनेता तु चेतना ।", |
| | "पालकैर्वननीयत्वात् पवनो बोधनान्मनः ।", |
| | "पावकः शोधनान्मेरुरीरो यन्मास्य सागरः ।", |
| | "सारस्य गरणात् स्कन्दो जगतः स्कन्दनाद् भृगुः ।", |
| | "भर्जनाज्जपयज्ञश्च जातपो याज्य एव च ।", |
| | "अश्वाकारस्थितोश्वत्थ ऐरा श्रीश्च तदाश्रयः ।", |
| | "ऐरावतो नराणां यद् दद्यात् सर्वं स नारदः ।", |
| | "ह्रीश्रीसमाश्रयत्वाच्च हिमालय इतीरितः ।", |
| | "वर्ज्यत्वादरिभिर्वज्रो वैनतेयो नतास्पदः ।", |
| | "वासुकिर्वाससुखदः कन्दर्पः सुखभेदपः ।", |
| | "अर्यमा ज्ञेयमातृत्वात् काल आकालनादपि ।", |
| | "वरुणो वरणाद् द्वन्द्वो द्विरूपोन्तर्बहिर्यतः ।", |
| | "मकरो मानकर्तृत्वाद् यमः संयमनाद् विभुः ।", |
| | "प्रह्लादः स महानन्दो मृगेन्द्रो मृगयत्पतिः ।", |
| | "जाह्नवी जहतां स्थानमध्यात्मं चात्मनां पतिः ।", |
| | "विद्या ज्ञप्तिस्वरूपत्वाद् वादो वाच्यत्वतो हरिः ।", |
| | "कीर्त्यो वक्ताश्रयः कीर्तिर्वाक् श्रीरिति च नामतः ।", |
| | "स्मरणीयः स्मृऽतिर्मेधा क्षमारूपस्तथेर्यते ।", |
| | "द्यूतं क्रीडापरत्वाच्च गायत्री त्राति गायकान् ।", |
| | "सत्त्वं साधुगुणत्वाच्च दण्डनाद्दण्ड उच्यते ।", |
| | "बृहत्सारोप्यमेयश्च बृहत्सामोशनोशतेः ।", |
| | "शुभाशुभज्ञानकरः कुसुमाकर ईरितः ।", |
| | "ज्ञानं ज्ञानात्मतो मौनं मुनीड््यो नीतिरानयन् ।", |
| | "मार्गाणामन्तगत्वात्तु मार्गशीर्षः प्रकीर्तितः ।", |
| | "सुखं पिबन् लीलयैव कपिलो व्यास एव च ।", |
| | "विशिष्टत्वाद् विष्णुनामा विशिष्टप्राणसौख्यतः ।", |
| | "एवं नानागुणैर्विष्णुर्नानानामभिरीरितः ।", |
| | "नानाप्राण्यादिसंस्थश्च विभूतिरिति शब्दितः ।", |
| | "शश्यादिषु विजातीयस्वाम्यदः सारदः क्वचित् ।", |
| | "शर्वादिषु सजातीयश्रैष्ठ्यदत्वेन संस्थितः ।", |
| | "शक्रोशनार्जुनाद्येषु सजातीयैकदेशतः ।", |
| | "देवेष्वभ्यधिको ब्रह्मा यतो विष्णोरनन्तरः ।", |
| | "कवित्वादिगुणेष्वेवं यत्समो नास्ति कश्चन ।", |
| | "तथा भीमश्च पार्थेषु ज्ञानं यज्ञेषु चोत्तमम् ।", |
| | "सुदर्शनश्चायुधेषु वेदेष्वृग्वेद एव च'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।", |
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| | "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।", |
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| | "'किं ज्ञातेन'' इति वक्ष्यमाणस्याधिकफलत्वज्ञापकमेव । अन्यथोक्तेरेव वैयर्थ्यात् ।", |
| | "'अन्याधिक्यज्ञापनार्थं शुभं चाक्षिप्यते क्वचित् ।", |
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| | "था श्रुते ध्यानं कर्तुं शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते-" |
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| | "मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।", |
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| | "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।", |
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| | "इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।", |
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| | "न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahme-id\"\u003E'आत्मानमव्ययम्'' 'परमं रूपमैश्वरम्'' 'सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतो-मुखम्'' इत्यादिरूपविशेषणाच्च रूपस्येश्वरसाक्षात्स्वरूपत्वं नित्यत्वं तत एव चिदानन्दाद्यात्मकत्वं च सिद्धम् । 'मम देहे'' इत्युक्तत्वाच्चादित्यादीनां भेदः सिद्धः । 'मे रूपाणि'' 'सर्वतोनन्तरूपम्'' इत्यादेः 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इत्यादेश्चैकस्यैवाभिन्नानन्तरूपत्वं च ।\u003Cbr/\u003E'एकं रूपं हरेर्नित्यमचिन्त्यैश्वर्ययोगतः ।\u003Cbr/\u003Eबहुसङ्ख्यागोचरं च विशेषादेव केवलम् ।\u003Cbr/\u003Eअभावो यत्र भेदस्य प्रमाणावसितो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eविशेषनामा तत्रैव विशेषव्यवहारवान् ।\u003Cbr/\u003Eविशेषोपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहक एव च ।\u003Cbr/\u003Eद्रव्यात्मना स नित्योपि विशेषात्मैव जायते ।\u003Cbr/\u003Eनित्या एव विशेषाश्च केचिदेवं द्विधैव सः ।\u003Cbr/\u003Eवस्तुस्वरूपमस्त्येवेत्येवमादिष्वभेदिनः ।\u003Cbr/\u003Eविशेषोनुभवादेव ज्ञायते सर्ववस्तुषु ।\u003Cbr/\u003Eनचाविशेषितं किञ्चिद् वाच्यं लक्ष्यं तथा मितम् ।\u003Cbr/\u003Eविशिष्टस्य स्वतोन्यत्वे स्वस्यामेयत्वहेतुतः ।\u003Cbr/\u003Eनैव ज्ञेयं विशिष्टं च मानाभावाच्च नो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eस्वयमित्यपि हि स्वत्वविशेषेण विवर्जितम् ।\u003Cbr/\u003Eन ज्ञेयं तद्विशेष्यं च तथैवेत्यनवस्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eअभेदे न विरोधोस्ति ज्ञाताज्ञातं यतोखिलम् ।\u003Cbr/\u003Eतदेव ज्ञातरूपेण ज्ञातमज्ञातमन्यथा ।\u003Cbr/\u003Eअभिन्नस्य विशिष्टत्वान्न दोषद्वयमप्युत ।\u003Cbr/\u003Eएकत्वानुभवाच्चैव विशेषानुभवादपि ।\u003Cbr/\u003Eतज्ज्ञानानुभवाच्चैव न दोषद्वयसम्भवः ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ च तेनैव (तौ नैव) कर्तृभोक्तृविशेषणे ।\u003Cbr/\u003Eमदन्य इत्यनुभवो यतो नैवास्ति कस्यचित् ।\u003Cbr/\u003Eभेदो विशेषणस्यापि नान्तरस्य क्वचिद् भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eशुद्धस्वरूप इत्यादावभेदस्यैव दर्शनात् ।\u003Cbr/\u003Eअपृथग्दृष्टिनियमाद् बलज्ञानादिकस्य च ।\u003Cbr/\u003Eऐक्यं बाह्यविशेषाणां पृथग्दृष्ट्यैव तन्न तु ।\u003Cbr/\u003Eविशेषहेत्वभावेपि द्वैविध्यं कल्प्यते यदि ।\u003Cbr/\u003Eकल्पनागौरवाद्यास्तु दोषास्तत्रातिसङ्गताः ।\u003Cbr/\u003Eनैकत्वं वापि नानात्वं नियमादस्त्यचेतने ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदावनुभवादतस्तत्रान्यथागतेः ।\u003Cbr/\u003Eएको मदन्यतोन्यश्चेत्येवमेव व्यवस्थितौ ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ चेतनेषु तस्मान्नैकप्रकारता ।\u003Cbr/\u003Eएकमित्येव यज्ज्ञातं बहुत्वेनैव तत् पुनः ।\u003Cbr/\u003Eपटाद्यं ज्ञायते यस्माद् भेदाभेदौ कुतो न तत् ।\u003Cbr/\u003Eतन्तुभ्योन्यः पटः साक्षात् कस्य दृष्टिपथं गतः ।\u003Cbr/\u003Eअनन्यश्चेत् तन्तुभावे पटाभावः कुतो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eन चात्मनि विशेषोत्र दृष्टान्तत्वं गमिष्यति ।\u003Cbr/\u003Eशुद्धोहम्प्रत्ययो यस्मात् तत्राभेदप्रदर्शकः ।\u003Cbr/\u003Eअत्रावयवभेदेन स्यादेव ह्यनवस्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eन चानवयवं वस्तु क्वचित् स्यान्मानगोचरम् ।\u003Cbr/\u003Eपूर्वापरादिभेदेन यतोंशोस्यावगम्यते ।\u003Cbr/\u003Eउपाधिरप्येकदेशसम्बद्धः सन्तमेव हि ।\u003Cbr/\u003Eज्ञापयेद् भेदमखिलं ग्रसन् स विभजेत् कथम् ।\u003Cbr/\u003Eतस्माद् गुणादिकमपि नास्त्यनंशतया क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eभावाभावव्यवहृतेर्विद्यमानेपि वस्तुनि ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ गुणादेश्च जडे वस्तुनि संस्थितौ ।\u003Cbr/\u003Eचेतने शक्तिरूपेण गुणादेर्भाव इष्यते ।\u003Cbr/\u003Eसुप्तोयं बलवान् विद्वानित्यादिव्यवहारतः ।\u003Cbr/\u003Eनचैवं शक्तिरूपेण जडे व्यवहृतिः क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eएकमेवाद्वितीयं तन्नेह नानास्ति किञ्चन ।\u003Cbr/\u003Eमृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।\u003Cbr/\u003Eयथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।\u003Cbr/\u003Eएवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ।\u003Cbr/\u003Eइत्यादिश्रुतिमानाच्च परमैश्वर्यतस्तथा ।\u003Cbr/\u003Eसर्वं तु घटते विष्णौ यत् कल्याणगुणात्मकम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइत्यादि ब्रह्मतर्के ।\n॥ १-१४ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahme-id\"\u003E'आत्मानमव्ययम्'' 'परमं रूपमैश्वरम्'' 'सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतो-मुखम्'' इत्यादिरूपविशेषणाच्च रूपस्येश्वरसाक्षात्स्वरूपत्वं नित्यत्वं तत एव चिदानन्दाद्यात्मकत्वं च सिद्धम् । 'मम देहे'' इत्युक्तत्वाच्चादित्यादीनां भेदः सिद्धः । 'मे रूपाणि'' 'सर्वतोनन्तरूपम्'' इत्यादेः 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इत्यादेश्चैकस्यैवाभिन्नानन्तरूपत्वं च ।\u003Cbr/\u003E'एकं रूपं हरेर्नित्यमचिन्त्यैश्वर्ययोगतः ।\u003Cbr/\u003Eबहुसङ्ख्यागोचरं च विशेषादेव केवलम् ।\u003Cbr/\u003Eअभावो यत्र भेदस्य प्रमाणावसितो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eविशेषनामा तत्रैव विशेषव्यवहारवान् ।\u003Cbr/\u003Eविशेषोपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहक एव च ।\u003Cbr/\u003Eद्रव्यात्मना स नित्योपि विशेषात्मैव जायते ।\u003Cbr/\u003Eनित्या एव विशेषाश्च केचिदेवं द्विधैव सः ।\u003Cbr/\u003Eवस्तुस्वरूपमस्त्येवेत्येवमादिष्वभेदिनः ।\u003Cbr/\u003Eविशेषोनुभवादेव ज्ञायते सर्ववस्तुषु ।\u003Cbr/\u003Eनचाविशेषितं किञ्चिद् वाच्यं लक्ष्यं तथा मितम् ।\u003Cbr/\u003Eविशिष्टस्य स्वतोन्यत्वे स्वस्यामेयत्वहेतुतः ।\u003Cbr/\u003Eनैव ज्ञेयं विशिष्टं च मानाभावाच्च नो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eस्वयमित्यपि हि स्वत्वविशेषेण विवर्जितम् ।\u003Cbr/\u003Eन ज्ञेयं तद्विशेष्यं च तथैवेत्यनवस्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eअभेदे न विरोधोस्ति ज्ञाताज्ञातं यतोखिलम् ।\u003Cbr/\u003Eतदेव ज्ञातरूपेण ज्ञातमज्ञातमन्यथा ।\u003Cbr/\u003Eअभिन्नस्य विशिष्टत्वान्न दोषद्वयमप्युत ।\u003Cbr/\u003Eएकत्वानुभवाच्चैव विशेषानुभवादपि ।\u003Cbr/\u003Eतज्ज्ञानानुभवाच्चैव न दोषद्वयसम्भवः ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ च तेनैव (तौ नैव) कर्तृभोक्तृविशेषणे ।\u003Cbr/\u003Eमदन्य इत्यनुभवो यतो नैवास्ति कस्यचित् ।\u003Cbr/\u003Eभेदो विशेषणस्यापि नान्तरस्य क्वचिद् भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eशुद्धस्वरूप इत्यादावभेदस्यैव दर्शनात् ।\u003Cbr/\u003Eअपृथग्दृष्टिनियमाद् बलज्ञानादिकस्य च ।\u003Cbr/\u003Eऐक्यं बाह्यविशेषाणां पृथग्दृष्ट्यैव तन्न तु ।\u003Cbr/\u003Eविशेषहेत्वभावेपि द्वैविध्यं कल्प्यते यदि ।\u003Cbr/\u003Eकल्पनागौरवाद्यास्तु दोषास्तत्रातिसङ्गताः ।\u003Cbr/\u003Eनैकत्वं वापि नानात्वं नियमादस्त्यचेतने ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदावनुभवादतस्तत्रान्यथागतेः ।\u003Cbr/\u003Eएको मदन्यतोन्यश्चेत्येवमेव व्यवस्थितौ ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ चेतनेषु तस्मान्नैकप्रकारता ।\u003Cbr/\u003Eएकमित्येव यज्ज्ञातं बहुत्वेनैव तत् पुनः ।\u003Cbr/\u003Eपटाद्यं ज्ञायते यस्माद् भेदाभेदौ कुतो न तत् ।\u003Cbr/\u003Eतन्तुभ्योन्यः पटः साक्षात् कस्य दृष्टिपथं गतः ।\u003Cbr/\u003Eअनन्यश्चेत् तन्तुभावे पटाभावः कुतो भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eन चात्मनि विशेषोत्र दृष्टान्तत्वं गमिष्यति ।\u003Cbr/\u003Eशुद्धोहम्प्रत्ययो यस्मात् तत्राभेदप्रदर्शकः ।\u003Cbr/\u003Eअत्रावयवभेदेन स्यादेव ह्यनवस्थितिः ।\u003Cbr/\u003Eन चानवयवं वस्तु क्वचित् स्यान्मानगोचरम् ।\u003Cbr/\u003Eपूर्वापरादिभेदेन यतोंशोस्यावगम्यते ।\u003Cbr/\u003Eउपाधिरप्येकदेशसम्बद्धः सन्तमेव हि ।\u003Cbr/\u003Eज्ञापयेद् भेदमखिलं ग्रसन् स विभजेत् कथम् ।\u003Cbr/\u003Eतस्माद् गुणादिकमपि नास्त्यनंशतया क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eभावाभावव्यवहृतेर्विद्यमानेपि वस्तुनि ।\u003Cbr/\u003Eभेदाभेदौ गुणादेश्च जडे वस्तुनि संस्थितौ ।\u003Cbr/\u003Eचेतने शक्तिरूपेण गुणादेर्भाव इष्यते ।\u003Cbr/\u003Eसुप्तोयं बलवान् विद्वानित्यादिव्यवहारतः ।\u003Cbr/\u003Eनचैवं शक्तिरूपेण जडे व्यवहृतिः क्वचित् ।\u003Cbr/\u003Eएकमेवाद्वितीयं तन्नेह नानास्ति किञ्चन ।\u003Cbr/\u003Eमृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।\u003Cbr/\u003Eयथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।\u003Cbr/\u003Eएवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ।\u003Cbr/\u003Eइत्यादिश्रुतिमानाच्च परमैश्वर्यतस्तथा ।\u003Cbr/\u003Eसर्वं तु घटते विष्णौ यत् कल्याणगुणात्मकम्'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।", |
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| | "अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोनन्तरूपम् ।", |
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| | "किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।", |
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| | "त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।", |
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| | "अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।", |
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| "text": "द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।\nदृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।", |
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| "text": "द्यावापृथिव्योरन्तरमेकेनैव रूपेण व्याप्तम् । 'नान्तं न मध्यम्'' इत्युक्त-त्वात् पुनः 'अनादिमध्यान्तम्'' इति गुणानन्त्यापेक्षया । 'त्वया ततं विश्वमनन्तरूप'' इति कालापेक्षया । स्वयमन्तं विद्यमानमपि न पश्यतीत्याशङ्क्य 'त्वया ततं विश्वम्'' इत्याह । अन्यत् तात्पर्यज्ञापनायाभ्यासरूपम् । 'सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः'' इति 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'' इत्यादिषु सर्वशब्दव्याख्यानरूपम् ।\n'त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरर्जुनाय प्रदर्शितम् ।\nदृष्टं विष्णोर्विश्वरूपं स्वयोग्यत्वानुरूपतः ।\nप्रायः सहैव पार्थेन प्रायो भीताश्च तेखिलाः ।\nदर्शनाभ्यासतो दृष्टिरानन्दोद्रेकता भवेत् ।\nतस्मिन् काले तु भूमेश्च भारहारार्थमुद्यमात् ।\nउग्रत्वमिव सर्वत्र न भीतिर्ब्रह्मदर्शिनाम् ।\nअर्जुनादधिका ये तु तेषां भीतिर्न चाभवत् ।\nश्रीब्रह्मरुद्रपूर्वाणां कृष्णाया भीमरामयोः'' ॥ इत्याग्नेयवचनात् ।\n'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादि युज्यते ॥ १९,२० ॥" | | "lines": [ |
| | "द्यावापृथिव्योरन्तरमेकेनैव रूपेण व्याप्तम् । 'नान्तं न मध्यम्'' इत्युक्त-त्वात् पुनः 'अनादिमध्यान्तम्'' इति गुणानन्त्यापेक्षया । 'त्वया ततं विश्वमनन्तरूप'' इति कालापेक्षया । स्वयमन्तं विद्यमानमपि न पश्यतीत्याशङ्क्य 'त्वया ततं विश्वम्'' इत्याह । अन्यत् तात्पर्यज्ञापनायाभ्यासरूपम् । 'सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः'' इति 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'' इत्यादिषु सर्वशब्दव्याख्यानरूपम् ।", |
| | "'त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरर्जुनाय प्रदर्शितम् ।", |
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| | "दर्शनाभ्यासतो दृष्टिरानन्दोद्रेकता भवेत् ।", |
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| | "उग्रत्वमिव सर्वत्र न भीतिर्ब्रह्मदर्शिनाम् ।", |
| | "अर्जुनादधिका ये तु तेषां भीतिर्न चाभवत् ।", |
| | "श्रीब्रह्मरुद्रपूर्वाणां कृष्णाया भीमरामयोः'' ॥ इत्याग्नेयवचनात् ।", |
| | "'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादि युज्यते ॥ १९,२० ॥" |
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| "text": "रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।\nगन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।", |
| | "गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥" |
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| "text": "रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।\nबहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।", |
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| "text": "नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।\nदृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।", |
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| "text": "दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।\nदिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।", |
| | "दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥" |
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| "text": "अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।\nभीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।", |
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| "text": "वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।\nकेचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥" | | "lines": [ |
| | "वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।", |
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| "text": "यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।\nतथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।", |
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| "text": "यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।\nतथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।", |
| | "तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥" |
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| "text": "लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्- लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।\nतेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥" | | "lines": [ |
| | "लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्- लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।", |
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| "text": "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।\nविज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥" | | "lines": [ |
| | "आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।", |
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| "text": "मुक्ताः सुरसङ्घा विशन्ति । 'प्रवेशो निर्गमश्चैव मुक्तानां स्वेच्छया भवेत्'' । इति हि ब्रह्माण्डे ॥ २१-२५ ॥\nअन्यचेष्टां कुर्वतामपि भगवच्चेष्टयैव प्रलये प्रजानां प्रवेशवत् प्रवेशो युज्यते । सेनामध्यतो भगवन्मुखानामुभयाभिमुखत्वाच्चोभे सेने तत्र प्रविशतः । ये तु तस्मिन्नेव मुहूर्ते मरिष्यन्ति तेषां दशनान्तरेषु चूर्णितमपि शिरः सूक्ष्मदृष्टिगोचरत्वान्मानुषदृष्ट्या तथा न दृश्यते । यथा भिन्नमपि घटादिकं यावत् पृथङ्ग् न पतति तावन्मन्ददृष्टीनां न ज्ञायते । यथा पुरूरवसो जराश्विभ्यामेव दृष्टा ॥ २६-३० ॥\nविशेषगुणकर्मविषय एव प्रश्नः । 'विष्णो'' इति सम्बोधनात् ॥ ३१ ॥" | | "lines": [ |
| | "मुक्ताः सुरसङ्घा विशन्ति । 'प्रवेशो निर्गमश्चैव मुक्तानां स्वेच्छया भवेत्'' । इति हि ब्रह्माण्डे ॥ २१-२५ ॥", |
| | "अन्यचेष्टां कुर्वतामपि भगवच्चेष्टयैव प्रलये प्रजानां प्रवेशवत् प्रवेशो युज्यते । सेनामध्यतो भगवन्मुखानामुभयाभिमुखत्वाच्चोभे सेने तत्र प्रविशतः । ये तु तस्मिन्नेव मुहूर्ते मरिष्यन्ति तेषां दशनान्तरेषु चूर्णितमपि शिरः सूक्ष्मदृष्टिगोचरत्वान्मानुषदृष्ट्या तथा न दृश्यते । यथा भिन्नमपि घटादिकं यावत् पृथङ्ग् न पतति तावन्मन्ददृष्टीनां न ज्ञायते । यथा पुरूरवसो जराश्विभ्यामेव दृष्टा ॥ २६-३० ॥", |
| | "विशेषगुणकर्मविषय एव प्रश्नः । 'विष्णो'' इति सम्बोधनात् ॥ ३१ ॥" |
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| "text": "कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।\nऋतेपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥" | | "lines": [ |
| | "कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।", |
| | "ऋतेपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥" |
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| "text": "तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।\nमयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।", |
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| "text": "द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।\nमया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥" | | "lines": [ |
| | "द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।", |
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| "text": "जयद्रथस्य पितुर्वरादेव विशेषः । निहताः निहतप्राया । पश्चादर्जुनेपि स्थित्वा स एव हनिष्यति ॥ ३४ ॥" | | "lines": [ |
| | "जयद्रथस्य पितुर्वरादेव विशेषः । निहताः निहतप्राया । पश्चादर्जुनेपि स्थित्वा स एव हनिष्यति ॥ ३४ ॥" |
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| "text": "एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।\nनमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।", |
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| "text": "स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।\nरक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।", |
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| "text": "कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥" | | "lines": [ |
| | "कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥" |
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| "text": "वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।\nनमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।\nअनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥ ४० ॥" | | "lines": [ |
| | "नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।", |
| | "अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥ ४० ॥" |
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| "text": "सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।\nअजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥" | | "lines": [ |
| | "सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।", |
| | "अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥" |
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| "text": "यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।\nएकोथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥" | | "lines": [ |
| | "यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।", |
| | "एकोथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥" |
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| | "एकः सर्वोत्तमोप्यसत्कृतः । 'एकः सर्वाधिको ज्ञेय एष एव करोति यत्'' इति च ॥ ४२ ॥" |
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| "text": "पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।\nन त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥" | | "lines": [ |
| | "पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।", |
| | "न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥" |
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| "text": "तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।\nपितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।", |
| | "पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥" |
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| "text": "अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।\nतदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।", |
| | "तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥" |
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| "text": "किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।\nतेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥" | | "lines": [ |
| | "किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।", |
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| "text": "तेनैव रूपेण भवेति अनन्तरूपगोपनेन तदेव प्रकाशयेत्यर्थः ।\n'पञ्चाननं चिन्त्यमचिन्त्यरूपं पद्मासनं गोपितविश्वरूपम्'' ।\nइति हि वैहायससंहितायाम् ॥४६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तेनैव रूपेण भवेति अनन्तरूपगोपनेन तदेव प्रकाशयेत्यर्थः ।", |
| | "'पञ्चाननं चिन्त्यमचिन्त्यरूपं पद्मासनं गोपितविश्वरूपम्'' ।", |
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| "text": "मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।\nतेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥" | | "lines": [ |
| | "मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।", |
| | "तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'विश्वनामा स भगवान् यतः पूर्णगुणः प्रभुः'' ।\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmanda-id\"\u003E'त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्'' इत्यनेन तेनैवेन्द्रशरीरेण दृष्टमिति ज्ञायते । त्वदन्येनेति तदवरापेक्षया । तैरपि तद्वन्न दृष्टमित्येव ।\u003Cbr/\u003E'विश्वरूपं प्रथमतो ब्रह्मापश्यच्चतुर्मुखः ।\u003Cbr/\u003Eतच्छतांशेन रुद्रस्तु तच्छतांशेन वासवः ।\u003Cbr/\u003Eयथेन्द्रेण पुरा दृष्टमपश्यत् सोर्जुनोपि सन् ।\u003Cbr/\u003Eतदन्ये क्रमयोगेन तच्छतांशादिदर्शिनः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्माण्डे ॥४७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'विश्वनामा स भगवान् यतः पूर्णगुणः प्रभुः'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति पाद्मे ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmanda-id\"\u003E'त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्'' इत्यनेन तेनैवेन्द्रशरीरेण दृष्टमिति ज्ञायते । त्वदन्येनेति तदवरापेक्षया । तैरपि तद्वन्न दृष्टमित्येव ।\u003Cbr/\u003E'विश्वरूपं प्रथमतो ब्रह्मापश्यच्चतुर्मुखः ।\u003Cbr/\u003Eतच्छतांशेन रुद्रस्तु तच्छतांशेन वासवः ।\u003Cbr/\u003Eयथेन्द्रेण पुरा दृष्टमपश्यत् सोर्जुनोपि सन् ।\u003Cbr/\u003Eतदन्ये क्रमयोगेन तच्छतांशादिदर्शिनः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति ब्रह्माण्डे ॥४७ ॥" |
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| "text": "न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।\nएवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥" | | "lines": [ |
| | "न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।", |
| | "एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥" |
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| | "वेदादिभिरपि त्वदवरेणैवं द्रष्टुमशक्यः । अन्यथा 'दृष्ट्वाद्भुतं रूपम्'' इत्यादिविरोधः ॥ ४८ ॥" |
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| "text": "मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।\nव्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥" | | "lines": [ |
| | "मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।", |
| | "व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥" |
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| "text": "इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।\nआश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥" | | "lines": [ |
| | "इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।", |
| | "आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥" |
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| "text": "स्ववत् क्रियत इति स्वकं रूपम् । विश्वरूपमज्ञानां स्वरूपवन्न दर्शयति । एतदज्ञानामपि तथैव दर्शयतीति विशेषः । अन्यथा 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इति विरुद्धं स्यात् ।\n'परावरविभेदस्तु मुग्धदृष्टिमपेक्ष्य तु ।\nप्रादुर्भावस्वरूपाणां विश्वरूपस्य च प्रभोः ।\nअन्यथा न विशेषोस्ति व्यक्तिर्ह्यज्ञव्यपेक्षया'' ॥ इति च ॥५० ॥" | | "lines": [ |
| | "स्ववत् क्रियत इति स्वकं रूपम् । विश्वरूपमज्ञानां स्वरूपवन्न दर्शयति । एतदज्ञानामपि तथैव दर्शयतीति विशेषः । अन्यथा 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्'' इति विरुद्धं स्यात् ।", |
| | "'परावरविभेदस्तु मुग्धदृष्टिमपेक्ष्य तु ।", |
| | "प्रादुर्भावस्वरूपाणां विश्वरूपस्य च प्रभोः ।", |
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| | "दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।", |
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| | "किञ्चित् मनुष्यवद् दृश्यमानत्वात् मानुषम् ॥ ५१ ॥" |
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| "text": "ये दर्शनकाङ्क्षिणस्तैरपीदानीं दृष्टप्रायः ॥ ५२ ॥" | | "lines": [ |
| | "ये दर्शनकाङ्क्षिणस्तैरपीदानीं दृष्टप्रायः ॥ ५२ ॥" |
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| | "नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।", |
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| "text": "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।\nज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥" | | "lines": [ |
| | "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।", |
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| "text": "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।\nनिर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥" | | "lines": [ |
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| | "एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।", |
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| "text": "साधननिर्णयोत्र ।\nश्रिये जातः श्रिय आ निरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति । श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ'' 'उपासिता मुक्तिदा सद्य एव ह्यस्येशाना जगतो विष्णुपत्नी । या श्रीर्लक्ष्मीरौपला चाम्बिकेति ह्रीश्चेत्युक्ता संविदग््रया सुविद्या'' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।\n'श्रीः सुतुष्टा हरेस्तोषं गमयेत् क्षिप्रमेव तु ।\nअतुष्टा तदतुष्टिं च तस्माद् ध्येयैव सा सदा ।\nअव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः कूटस्थं चाक्षरं च ताम् ।\nप्रधानमिति च प्राहुर्महापुरुष इत्यपि ।\nतां ब्रह्म महदित्याहुः परं जीवं परां चितिम् ।\nतस्यास्तु परमो विष्णुः यो ब्रह्म परमं महत्'' ॥ इति ब्रह्माण्डवचनाच्चाव्यक्तोपासनान्मोक्षाशङ्कया पृच्छति । 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युत्तरवचनात् 'कूटस्थमचलम्'' इत्यत्राप्युक्तेरव्यक्तशब्दश्चित्प्रकृतिवाची । अन्यथा 'ये त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरम्, तेषां के योगवित्तमाः'' इति भेदेन प्रश्नानुपपत्तिः । 'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्'' इति तेनैवोक्तत्वात् । ये तु 'ते मे युक्ततमा मताः'' 'मय्येव मन आधत्स्व'' इत्यादौ भगवतोक्तेप्यव्यक्तोपासकानामाधिक्यं वदन्ति ते त्वपलापकत्वादेवाति-साहसिका इति सुशोच्या एव ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
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| | "सन्नियम्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paramashruthi-id\"\u003E'अविष्णुज्ञैरतद्भक्तैस्तदुपासाविवर्जितैः ।\u003Cbr/\u003Eशपेदुपासिताप्येषा श्रीस्तांस्तद्धरितत्त्ववित् ।\u003Cbr/\u003Eतद्भक्तस्तमुपास्यैव श्रियं ध्यायीत नित्यदा ।\u003Cbr/\u003Eतेन तुष्टा तु साच्छिद्रं दद्याद् विष्णोरुपासनम् ।\u003Cbr/\u003Eततस्तद्दर्शनान्मुक्तिं यात्यसौ नात्र संशयः ।\u003Cbr/\u003Eतथापि सर्वपरमां सर्वदोषविवर्जिताम् ।\u003Cbr/\u003Eज्ञात्वा श्रियं तत्परमं तत्पतिं पुरुषोत्तमम् ।\u003Cbr/\u003Eविज्ञायोपासते नित्यं ते हि युक्ततमा मताः ।\u003Cbr/\u003Eयतः क्लेशोधिकस्तेषां पृथक् श्रियमुपासताम् ।\u003Cbr/\u003Eविष्णुना सहिता ध्याता सापि तुष्टिं परां व्रजेत् ।\u003Cbr/\u003Eअन्यथा तु पुनर्विष्णोः श्रीपतित्वेन चिन्तनम् ।\u003Cbr/\u003Eअच्छिद्रमेव कर्तव्यमिति मुक्तिश्चिराद् भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eतस्मादक्लेशतो मुक्तिः क्षिप्रं विष्णुमुपासताम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति परमश्रुतिः ।\nयुक्ततमाः साधकतमाः ॥२ ॥ 'न चलेत् स्वात् पदाद् यस्मादचला श्रीस्ततो मता'' । इत्याग्नेये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Naradiya-id\"\u003E'सूक्ष्मत्वादप्रसिद्धत्वाद् गुणबाहुल्यतस्तथा ।\u003Cbr/\u003Eअनिर्देश्यौ तथाव्यक्तावचिन्त्यौ श्रीश्च माधवः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति नारदीये ॥३ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "'विष्णोरन्यं न स्मरेद् यो विना तत्परिवारताम् ।\nतदधीनतां वानन्ययोगी स परिकीर्तितः'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shanthirmukti-id\"\u003E'अन्तवत्तु फलं तेषाम्'' इत्यादिनान्यदेवोपासनायाः पूर्वमेव निन्दितत्वात् लक्ष्म्यास्त्वतिसामीप्याद् विशेषमाशङ्क्य तदुपासनाविषय एव प्रश्नः कृतः ।\u003Cbr/\u003E'वैष्णवान्येव कर्माणि यः करोति सदा नरः ।\u003Cbr/\u003Eजपार्चामार्जनादीनि स्वाश्रमोक्तानि यानि च ।\u003Cbr/\u003Eस तत्कर्मेति विज्ञेयो योन्यदेवादिपूजनम् ।\u003Cbr/\u003Eकृत्वा हरावर्पयति स तु तद्योगमात्रवान् ।\u003Cbr/\u003Eतत्र पूर्वोविशिष्टः स्यादादिमध्यान्ततः स्मृऽतेः ।\u003Cbr/\u003Eअवान्तरे च नियमाद् विष्णोस्तद्दासतास्य यत् ।\u003Cbr/\u003Eमनसा वर्ततेन्योपि यथाशक्ति हरिस्मृऽतेः ।\u003Cbr/\u003Eपूर्वोक्तयोग्यो भवति यदि नित्यं तदिच्छति ।\u003Cbr/\u003Eअसम्यग्ज्ञानिनो ध्यानाज्ज्ञानमेव विशिष्यते ।\u003Cbr/\u003Eज्ञात्वा ध्यानं ततस्तस्मात् तत् फलेच्छाविवर्जितम् ।\u003Cbr/\u003Eतस्माज्ज्ञानाद् भवेन्मुक्तिस्त्यागाद्ध्यानयुतात् स्फुटम्'' इति च ।\u003C/span\u003E\nशान्तिर्मुक्तिः ॥ ४-१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "'विष्णोरन्यं न स्मरेद् यो विना तत्परिवारताम् ।", |
| | "तदधीनतां वानन्ययोगी स परिकीर्तितः'' ॥ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shanthirmukti-id\"\u003E'अन्तवत्तु फलं तेषाम्'' इत्यादिनान्यदेवोपासनायाः पूर्वमेव निन्दितत्वात् लक्ष्म्यास्त्वतिसामीप्याद् विशेषमाशङ्क्य तदुपासनाविषय एव प्रश्नः कृतः ।\u003Cbr/\u003E'वैष्णवान्येव कर्माणि यः करोति सदा नरः ।\u003Cbr/\u003Eजपार्चामार्जनादीनि स्वाश्रमोक्तानि यानि च ।\u003Cbr/\u003Eस तत्कर्मेति विज्ञेयो योन्यदेवादिपूजनम् ।\u003Cbr/\u003Eकृत्वा हरावर्पयति स तु तद्योगमात्रवान् ।\u003Cbr/\u003Eतत्र पूर्वोविशिष्टः स्यादादिमध्यान्ततः स्मृऽतेः ।\u003Cbr/\u003Eअवान्तरे च नियमाद् विष्णोस्तद्दासतास्य यत् ।\u003Cbr/\u003Eमनसा वर्ततेन्योपि यथाशक्ति हरिस्मृऽतेः ।\u003Cbr/\u003Eपूर्वोक्तयोग्यो भवति यदि नित्यं तदिच्छति ।\u003Cbr/\u003Eअसम्यग्ज्ञानिनो ध्यानाज्ज्ञानमेव विशिष्यते ।\u003Cbr/\u003Eज्ञात्वा ध्यानं ततस्तस्मात् तत् फलेच्छाविवर्जितम् ।\u003Cbr/\u003Eतस्माज्ज्ञानाद् भवेन्मुक्तिस्त्यागाद्ध्यानयुतात् स्फुटम्'' इति च ।\u003C/span\u003E", |
| | "शान्तिर्मुक्तिः ॥ ४-१२ ॥" |
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| | "ओष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।", |
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| "text": "सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।\nमय्यर्पितमनोबुदि्धर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥" | | "lines": [ |
| | "सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।", |
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| | "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।", |
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| | "अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।", |
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| | "यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।", |
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| "text": "समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।\nशीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।", |
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| "text": "तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।\nअनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥" | | "lines": [ |
| | "तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।", |
| | "अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥" |
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| "text": "अवैष्णवसर्वारम्भपरित्यागी । सर्वारम्भाभिमानत्यागेन फलत्यागेन भगवति समर्पणरूपेण च त्यागी । 'सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः'' 'मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा'' ॥ इत्यादेः ॥ 'भक्तिं ज्ञानं च वैराग्यमृते यो नेच्छति क्वचित् ।\nशुभाशुभपरित्यागी विद्वद्भिः कीर्तितो हि सः'' ॥ इति च ।\n'प्रायः सुखादिषु समः प्रायो हर्षादिवर्जितः ।\nतथोच्यते यथाल्पस्वो निःस्व इत्युच्यते बुधैः ।\nन हि मुख्यतया साम्यं कस्यचित् सुखदुःखयोः ।\nन च हर्षादिसन्त्यागो यावन्मुक्तिः कुतश्चन'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'हृतिर्मदादधर्माय हर्षो नाम प्रकीर्तितः'' ।\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ॥१६-१९॥" | | "lines": [ |
| | "अवैष्णवसर्वारम्भपरित्यागी । सर्वारम्भाभिमानत्यागेन फलत्यागेन भगवति समर्पणरूपेण च त्यागी । 'सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः'' 'मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा'' ॥ इत्यादेः ॥ 'भक्तिं ज्ञानं च वैराग्यमृते यो नेच्छति क्वचित् ।", |
| | "शुभाशुभपरित्यागी विद्वद्भिः कीर्तितो हि सः'' ॥ इति च ।", |
| | "'प्रायः सुखादिषु समः प्रायो हर्षादिवर्जितः ।", |
| | "तथोच्यते यथाल्पस्वो निःस्व इत्युच्यते बुधैः ।", |
| | "न हि मुख्यतया साम्यं कस्यचित् सुखदुःखयोः ।", |
| | "न च हर्षादिसन्त्यागो यावन्मुक्तिः कुतश्चन'' ॥ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'हृतिर्मदादधर्माय हर्षो नाम प्रकीर्तितः'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ॥१६-१९॥" |
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| "text": "ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।\nश्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेतीव मे प्रियाः॥२० ॥" | | "lines": [ |
| | "ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।", |
| | "श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेतीव मे प्रियाः॥२० ॥" |
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| "text": "व्यस्तेन प्रियाः समस्तेनातीव प्रियाः । भक्तिस्तु व्यस्तेप्युक्तैव । यस्मान्नोद्विजते इत्यत्रापि स चेत्यनेन भक्तिरनुषज्यते । धर्मसाधनं धर्म्यं तदेवामृतसाधनममृतं धर्म्यामृतम् ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "व्यस्तेन प्रियाः समस्तेनातीव प्रियाः । भक्तिस्तु व्यस्तेप्युक्तैव । यस्मान्नोद्विजते इत्यत्रापि स चेत्यनेन भक्तिरनुषज्यते । धर्मसाधनं धर्म्यं तदेवामृतसाधनममृतं धर्म्यामृतम् ॥ २० ॥" |
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| "text": "पूर्वोक्तज्ञानज्ञेयक्षेत्रपुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन ।सर्वार्थसङ्क्षेपोयम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "पूर्वोक्तज्ञानज्ञेयक्षेत्रपुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन ।सर्वार्थसङ्क्षेपोयम् ॥ १ ॥" |
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| "text": "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।\nएतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।", |
| | "एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥" |
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| | "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।", |
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| | "तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id\"\u003E'हिंसाहेतुश्च जीवस्य परेण प्रेर्यते च यत् ।\u003Cbr/\u003Eअव्यक्तादि शरीरं तत् तत्क्षेत्रं क्षीयतेत्र यत् ।\u003Cbr/\u003Eइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं देहो व्याप्तिश्च चेतसः ।\u003Cbr/\u003Eतद्विकारा इति ज्ञेयाश्चिद्रूपेच्छादिमिश्रिताः ।\u003Cbr/\u003Eविकारेच्छादिनिर्मुक्तश्चिन्मात्रेच्छादिसंयुतः ।\u003Cbr/\u003Eमुक्त इत्युच्यते जीवो मुक्तिश्च द्विविधा मता ।\u003Cbr/\u003Eचिन्मात्रद्वेषदुःखे च देहो मिथ्यादृगात्मकः ।\u003Cbr/\u003Eनिषिद्धेच्छा च यत्र स्युर्नित्या सा मुक्तिरासुरी ।\u003Cbr/\u003Eचिन्मात्रा वैष्णवी भक्तिर्देहः सम्यग्दृगात्मकः ।\u003Cbr/\u003Eसुखमिच्छानुकूला च धृतिर्दैवी तु सा मता'' ॥\u003C/span\u003E\nइति नारायणश्रुतिः ॥२ ॥ 'क्षेत्रज्ञो भगवान् विष्णुर्नह्यन्यः क्षेत्रमञ्जसा ।\nवेत्त्यसौ भगवान् ज्ञेयो व्यक्ताव्यक्तविलक्षणः ।\nस तु जीवेषु सर्वेषु बहिश्चैव व्यवस्थितः ।\nविलक्षणश्च जीवेभ्यः सर्वेभ्योपि सदैव च ।\nसर्वतः पाणिपादादिर्यतः पाण्यादिशक्तिमान् ।\nकेशादिष्वपि सर्वत्र कृष्णकेशो हि यादवः ।\nअणोरणुतरै रूपैः पाणिपादादिसंयुतैः ।\nसर्वत्र संस्थितत्वाद् वा सर्वतः पाणिपादवान् ।\nसर्वेंद्रियाणां विषयान् वेत्ति सोप्राकृतेंद्रियः ।\nयतोतोनिंद्रियः प्रोक्तो यन्न भिन्नेंद्रियोथवा ।\nगुणैः सत्त्वादिभिर्हीनः सर्वकल्याणमूर्तिमान् ।\nअन्यथाभावराहित्यादचरश्चर एव च ।\n'चरणात् सर्वदेशेषु व्याप्तोणुर्मध्यमस्तथा ।\nसर्वगत्वात् समीपे च दूरे चैवान्तरे च सः ।\nअनन्ताव्ययशक्तित्वात् तदन्यत्र विरोधिनः ।\nसन्ति सर्वे गुणास्तत्र न च तत्र विरोधिनः'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003Eन च जीवस्य क्षेत्रज्ञनाम- 'क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।\u003Cbr/\u003Eआविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति हि भागवते ।\nअतः 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्ते जीवस्यापि किञ्चिज्ज्ञानात् तत्प्राप्तेस्तन्निवारणार्थं 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध'' इत्याह । अन्यथा 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्तेनैव सिद्धत्वात् 'क्षेत्रज्ञं चापि'' इति व्यर्थम् । भेदपक्षे तु नामनिरुक्त्यर्थं 'एतद् यो वेत्ति'' इति । सर्वाभेदमपि केचिद् वदन्तीति क्षेत्रं च ज्ञश्चेति व्युत्पत्तिं निवारयति । क्षेत्रज्ञं मां सर्वक्षेत्रेषु स्थितत्वेन विद्धीत्यर्थः । तत्पक्षे तु 'यो वेत्ति'' इत्युक्ते ईश्वरस्यापि क्षेत्रज्ञत्वं सिद्धमेव । सर्वाभेदविवक्षायां च सर्वं क्षेत्र(ज्ञ)मिति वक्तव्यम् । 'सर्वक्षेत्रेषु'' इति व्यर्थम् । न च तत्पक्षे मामित्यस्य कश्चिद् विशेषः । किन्त्वेक एव क्षेत्रज्ञ (अहम्) इति वक्तव्यम् ।॥३ ॥ यतश्च यत् । यतः परमेश्वरानुमतेरिदं याति प्रवर्तते । स चानुमन्ता यः । अनुसारिणी मतिरनुमतिः प्रेरणारूपा ।\nप्रेरणानुमतिः प्रोक्ता क्वचित् संवाद उच्यते ।\nप्रेरकत्वात्तु भगवाननुमन्ता प्रकीतितः ॥ इति च ।\nउपद्रष्टानुमन्ता चेत्यनेनैवानुमतिरनुमन्ता चोक्तः । ज्ञेयं यत्तदित्यादिना 'यत्प्रभाव'' इत्यपि ॥४ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Narayanashruthi-id\"\u003E'हिंसाहेतुश्च जीवस्य परेण प्रेर्यते च यत् ।\u003Cbr/\u003Eअव्यक्तादि शरीरं तत् तत्क्षेत्रं क्षीयतेत्र यत् ।\u003Cbr/\u003Eइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं देहो व्याप्तिश्च चेतसः ।\u003Cbr/\u003Eतद्विकारा इति ज्ञेयाश्चिद्रूपेच्छादिमिश्रिताः ।\u003Cbr/\u003Eविकारेच्छादिनिर्मुक्तश्चिन्मात्रेच्छादिसंयुतः ।\u003Cbr/\u003Eमुक्त इत्युच्यते जीवो मुक्तिश्च द्विविधा मता ।\u003Cbr/\u003Eचिन्मात्रद्वेषदुःखे च देहो मिथ्यादृगात्मकः ।\u003Cbr/\u003Eनिषिद्धेच्छा च यत्र स्युर्नित्या सा मुक्तिरासुरी ।\u003Cbr/\u003Eचिन्मात्रा वैष्णवी भक्तिर्देहः सम्यग्दृगात्मकः ।\u003Cbr/\u003Eसुखमिच्छानुकूला च धृतिर्दैवी तु सा मता'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति नारायणश्रुतिः ॥२ ॥ 'क्षेत्रज्ञो भगवान् विष्णुर्नह्यन्यः क्षेत्रमञ्जसा ।", |
| | "वेत्त्यसौ भगवान् ज्ञेयो व्यक्ताव्यक्तविलक्षणः ।", |
| | "स तु जीवेषु सर्वेषु बहिश्चैव व्यवस्थितः ।", |
| | "विलक्षणश्च जीवेभ्यः सर्वेभ्योपि सदैव च ।", |
| | "सर्वतः पाणिपादादिर्यतः पाण्यादिशक्तिमान् ।", |
| | "केशादिष्वपि सर्वत्र कृष्णकेशो हि यादवः ।", |
| | "अणोरणुतरै रूपैः पाणिपादादिसंयुतैः ।", |
| | "सर्वत्र संस्थितत्वाद् वा सर्वतः पाणिपादवान् ।", |
| | "सर्वेंद्रियाणां विषयान् वेत्ति सोप्राकृतेंद्रियः ।", |
| | "यतोतोनिंद्रियः प्रोक्तो यन्न भिन्नेंद्रियोथवा ।", |
| | "गुणैः सत्त्वादिभिर्हीनः सर्वकल्याणमूर्तिमान् ।", |
| | "अन्यथाभावराहित्यादचरश्चर एव च ।", |
| | "'चरणात् सर्वदेशेषु व्याप्तोणुर्मध्यमस्तथा ।", |
| | "सर्वगत्वात् समीपे च दूरे चैवान्तरे च सः ।", |
| | "अनन्ताव्ययशक्तित्वात् तदन्यत्र विरोधिनः ।", |
| | "सन्ति सर्वे गुणास्तत्र न च तत्र विरोधिनः'' ॥ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavathe-id\"\u003Eन च जीवस्य क्षेत्रज्ञनाम- 'क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचिता अनित्याः ।\u003Cbr/\u003Eआविर्हिताश्चापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति हि भागवते ।", |
| | "अतः 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्ते जीवस्यापि किञ्चिज्ज्ञानात् तत्प्राप्तेस्तन्निवारणार्थं 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध'' इत्याह । अन्यथा 'एतद् यो वेत्ति'' इत्युक्तेनैव सिद्धत्वात् 'क्षेत्रज्ञं चापि'' इति व्यर्थम् । भेदपक्षे तु नामनिरुक्त्यर्थं 'एतद् यो वेत्ति'' इति । सर्वाभेदमपि केचिद् वदन्तीति क्षेत्रं च ज्ञश्चेति व्युत्पत्तिं निवारयति । क्षेत्रज्ञं मां सर्वक्षेत्रेषु स्थितत्वेन विद्धीत्यर्थः । तत्पक्षे तु 'यो वेत्ति'' इत्युक्ते ईश्वरस्यापि क्षेत्रज्ञत्वं सिद्धमेव । सर्वाभेदविवक्षायां च सर्वं क्षेत्र(ज्ञ)मिति वक्तव्यम् । 'सर्वक्षेत्रेषु'' इति व्यर्थम् । न च तत्पक्षे मामित्यस्य कश्चिद् विशेषः । किन्त्वेक एव क्षेत्रज्ञ (अहम्) इति वक्तव्यम् ।॥३ ॥ यतश्च यत् । यतः परमेश्वरानुमतेरिदं याति प्रवर्तते । स चानुमन्ता यः । अनुसारिणी मतिरनुमतिः प्रेरणारूपा ।", |
| | "प्रेरणानुमतिः प्रोक्ता क्वचित् संवाद उच्यते ।", |
| | "प्रेरकत्वात्तु भगवाननुमन्ता प्रकीतितः ॥ इति च ।", |
| | "उपद्रष्टानुमन्ता चेत्यनेनैवानुमतिरनुमन्ता चोक्तः । ज्ञेयं यत्तदित्यादिना 'यत्प्रभाव'' इत्यपि ॥४ ॥" |
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| "text": "ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।\nब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥" | | "lines": [ |
| | "ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।", |
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| | "महाभूतान्यहङ्कारो बुदि्धरव्यक्तमेव च ।", |
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| | "इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।", |
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| | "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।", |
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| | "तत्त्वज्ञानविषयस्य विष्णोः । अपरोक्षदर्शनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । ज्ञायतेनेनेति ज्ञानम्, ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति व्युत्पत्त्या 'एतज्ज्ञानम्'' इति ज्ञानसाधनं ज्ञानं चोक्तम् ॥ १२ ॥" |
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| | "अनादीत्युक्ते स्वयं कारणं न भवतीत्याशङ्का स्यादिति तन्निवृत्त्यर्थं 'अनादिमत्'' इत्याह ।", |
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| "text": "'प्रकृतिं पुरुषं च'' इत्यत्र पुरुषशब्देन जीवपरयोः प्रकृतिशब्देन चेतना-चेतनप्रकृत्योः स्वीकाराय उभावपीति । विकाराणां सत्वादीनां चोपादानत्वविवक्षया प्रकृतिसम्भवत्वम् । स्वातन्त्र्यं तु परमेश्वरस्यैव । 'उपद्रष्टानुमन्ता च'' इत्यादिवक्ष्यमाणत्वात् । गुणानां च विकारत्वेप्यधिकविकारत्वविवक्षयान्येषां 'विकारांश्च गुणांश्च'' इति पृथगुक्तिः ॥ २० ॥" | | "lines": [ |
| | "'प्रकृतिं पुरुषं च'' इत्यत्र पुरुषशब्देन जीवपरयोः प्रकृतिशब्देन चेतना-चेतनप्रकृत्योः स्वीकाराय उभावपीति । विकाराणां सत्वादीनां चोपादानत्वविवक्षया प्रकृतिसम्भवत्वम् । स्वातन्त्र्यं तु परमेश्वरस्यैव । 'उपद्रष्टानुमन्ता च'' इत्यादिवक्ष्यमाणत्वात् । गुणानां च विकारत्वेप्यधिकविकारत्वविवक्षयान्येषां 'विकारांश्च गुणांश्च'' इति पृथगुक्तिः ॥ २० ॥" |
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| "text": "कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।\nपुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥" | | "lines": [ |
| | "कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।", |
| | "पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥" |
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| "text": "'स्वदेहेंद्रियहेतुत्वं यज्जीवस्य स्वकर्मभिः ।\nआवृत्य विष्णुतत्त्वं तद्धेतुश्चित्प्रकृतिर्मता ।\nजीवस्य सुखदुःखानां भोगशक्तिप्रदः सदा ।\nपरमः पुरुषो विष्णुः सर्वकर्तापि सन् सदा ।\nविशेषकर्ता केषाञ्चिदुक्तो यद्वद् विकुण्ठपः ।\nउच्यते सर्वपालोपि विशेषेण स कर्मणा'' ॥ इति च ।\nपरमेश्वरस्यैव सर्वकर्तृत्वेपि भोक्तृत्वदाने देव्या अल्पप्रवृत्तिरिति दर्शयितुं 'उच्यते'' इति स्थानद्वयेप्युक्तम् । कर्तृत्वेपि स एव मुख्यहेतुः । तथापि भोक्तृत्वापेक्षया तस्या अधिकप्रवृत्तिरिति 'कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते'' इति, सर्वहेतुत्वेपि विष्णोः प्रकृतेर्जीवं प्रति भोक्तृत्वदानेल्पप्रवृत्तिरिति 'पुरुषो भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते'' इति विशेषहेतोरेवमुच्यत एव । मुख्यतस्तु सर्वहेतुत्वं विष्णोरेवेति भावः ।\n॥२१ ॥" | | "lines": [ |
| | "'स्वदेहेंद्रियहेतुत्वं यज्जीवस्य स्वकर्मभिः ।", |
| | "आवृत्य विष्णुतत्त्वं तद्धेतुश्चित्प्रकृतिर्मता ।", |
| | "जीवस्य सुखदुःखानां भोगशक्तिप्रदः सदा ।", |
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| | "उच्यते सर्वपालोपि विशेषेण स कर्मणा'' ॥ इति च ।", |
| | "परमेश्वरस्यैव सर्वकर्तृत्वेपि भोक्तृत्वदाने देव्या अल्पप्रवृत्तिरिति दर्शयितुं 'उच्यते'' इति स्थानद्वयेप्युक्तम् । कर्तृत्वेपि स एव मुख्यहेतुः । तथापि भोक्तृत्वापेक्षया तस्या अधिकप्रवृत्तिरिति 'कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते'' इति, सर्वहेतुत्वेपि विष्णोः प्रकृतेर्जीवं प्रति भोक्तृत्वदानेल्पप्रवृत्तिरिति 'पुरुषो भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते'' इति विशेषहेतोरेवमुच्यत एव । मुख्यतस्तु सर्वहेतुत्वं विष्णोरेवेति भावः ।", |
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| | "पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।", |
| | "कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥" |
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| "text": "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।\nपरमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः॥२३ ॥" | | "lines": [ |
| | "उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।", |
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| "text": "'पुरुषः प्रकृतिस्थः'' इत्यत्र पुरुषशब्दो जीवे । उभयोरपि पुरुषशब्देन पूर्वं प्रस्तुतत्वात् । यथायोग्यमुपपत्तेः । कार्यकारणसम्बन्धं भोगं च मिथ्येति वदतां निवारणायाह । 'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि'' इति । हीत्यनुभवविरोधं दर्शयति तेषाम् । न हि ज्ञाना-ज्ञानसुखदुःखादिविषयस्यान्तरानुभवस्य भ्रान्तित्वं क्वचिद् दृष्टम् । नचास्य मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । शरीरमारभ्यैव ह्यपरोक्षभ्रमो दृष्टः । तत्रापि बलवत्प्रमाणविरोधादेव भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । साक्षिसिद्धस्यापि भ्रान्तित्वाङ्गीकारे येन सर्वस्य भ्रान्तित्वमभ्रान्तित्वं चात्मनोवगतं तदपि प्रमाणमात्मैव । व्यवहारतोप्यस्तीत्यत्र प्रमाणाभावाद् भ्रान्तिर-भ्रान्तिर्वा न किञ्चित् सिद्ध्यति ।\nअनुभवो भ्रान्तिः इत्युक्ते भ्रान्तित्वे प्रमाणं तत्प्रामाण्यं च कुतः सिद्ध्येत् ? व्यवहारतः सर्वमङ्गीकुर्म इत्युक्ते व्यवहारो व्यवहर्ता च कुतः सिद्धः ? प्रतीतित इत्युक्ते सैव कुतः ? स्वत इत्युक्ते स्वस्य भ्रान्तित्वे प्रतीतिं विनैव प्रतीतिरस्तीति भ्रान्तिः स्यात् । स्वाभावोपि स्यात् । स्वयमस्तीति च भ्रमः स्यात् । निरालम्बनो भ्रमो नोपपद्यत इत्यस्यापि भ्रमत्वोपपत्तेः । तत्प्रमाणमप्यप्रमाणमेव । प्रमाणत्वभ्रम इति न किञ्चित् सिद्ध्यति ।\nभ्रम इत्यस्यैव भ्रमत्वे अन्यस्याभ्रमत्वमेव भवति । सुखदुःखादिविषयं ज्ञानमात्मस्वरूपमेवेति तस्य भ्रमत्वे छद्मना विनैव शून्यवादो भवति । न हि वृत्तिज्ञानविषयमज्ञानादिकं तेषामपि । भ्रमस्य चाविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । आत्मस्वरूपस्याप्यविद्याकार्यत्वं स्यात् । दुर्घटत्वं भूषणमित्युक्ते दुर्घटत्वं सुघटत्वं चोभयं भूषणमस्माकमित्युत्तरम् । न हि प्रमाणसिद्धस्य दुर्घटत्वे सुघटत्वे वापवादो दृष्टः । दुर्घटत्वं भूषणमिति वदद्भिरात्मनोप्यविद्यात्वमङ्गीकृत्य तदयुक्तमित्युक्ते तत्रापि भूषणत्वं किमिति नाङ्गीक्रियते ? अतिसुकरत्वात् । न चात्मनोप्यविद्यात्वं वदतां तेषामुत्तरम् । अतोनन्तदोषदुष्टत्वाद्धीति प्रसिद्ध्यैव भगवता निराकृताः॥ २२ ॥ अस्य जीवस्य सदसद्योनिजन्मसु कारणं सत्त्वादिगुणसङ्गः । स्वतन्त्रकारणं तु परमेश्वर एवेत्याह उपद्रष्टानुमन्तेति ।\n'सर्वेभ्य उपरि द्रष्टा यदुपद्रष्टॄनामकः ।\nस्वातन्त्र्यात् स्वानुकूल्येन मत्या पे्ररयति स्म यत् ।\nअनुमन्तेति कथितः स्वयं प्रभुरजो हरिः ।\nमहाशक्तिर्यतो विष्णुर्महेश्वर इतीरितः ।\nपरमत्वाच्च तस्यैव ह्यनुमन्तृत्वमुच्यते ।\nस एव सर्वदेहेषु देहिनोन्यो व्यवस्थितः'' ॥ इति च ।\n'मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु'' इति देहेप्युक्तः । तेनाहमेव स इति दर्शयति ।\n॥२३ ॥" | | "lines": [ |
| | "'पुरुषः प्रकृतिस्थः'' इत्यत्र पुरुषशब्दो जीवे । उभयोरपि पुरुषशब्देन पूर्वं प्रस्तुतत्वात् । यथायोग्यमुपपत्तेः । कार्यकारणसम्बन्धं भोगं च मिथ्येति वदतां निवारणायाह । 'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि'' इति । हीत्यनुभवविरोधं दर्शयति तेषाम् । न हि ज्ञाना-ज्ञानसुखदुःखादिविषयस्यान्तरानुभवस्य भ्रान्तित्वं क्वचिद् दृष्टम् । नचास्य मिथ्यात्वे किञ्चिन्मानम् । शरीरमारभ्यैव ह्यपरोक्षभ्रमो दृष्टः । तत्रापि बलवत्प्रमाणविरोधादेव भ्रान्तित्वं कल्प्यम् । साक्षिसिद्धस्यापि भ्रान्तित्वाङ्गीकारे येन सर्वस्य भ्रान्तित्वमभ्रान्तित्वं चात्मनोवगतं तदपि प्रमाणमात्मैव । व्यवहारतोप्यस्तीत्यत्र प्रमाणाभावाद् भ्रान्तिर-भ्रान्तिर्वा न किञ्चित् सिद्ध्यति ।", |
| | "अनुभवो भ्रान्तिः इत्युक्ते भ्रान्तित्वे प्रमाणं तत्प्रामाण्यं च कुतः सिद्ध्येत् ? व्यवहारतः सर्वमङ्गीकुर्म इत्युक्ते व्यवहारो व्यवहर्ता च कुतः सिद्धः ? प्रतीतित इत्युक्ते सैव कुतः ? स्वत इत्युक्ते स्वस्य भ्रान्तित्वे प्रतीतिं विनैव प्रतीतिरस्तीति भ्रान्तिः स्यात् । स्वाभावोपि स्यात् । स्वयमस्तीति च भ्रमः स्यात् । निरालम्बनो भ्रमो नोपपद्यत इत्यस्यापि भ्रमत्वोपपत्तेः । तत्प्रमाणमप्यप्रमाणमेव । प्रमाणत्वभ्रम इति न किञ्चित् सिद्ध्यति ।", |
| | "भ्रम इत्यस्यैव भ्रमत्वे अन्यस्याभ्रमत्वमेव भवति । सुखदुःखादिविषयं ज्ञानमात्मस्वरूपमेवेति तस्य भ्रमत्वे छद्मना विनैव शून्यवादो भवति । न हि वृत्तिज्ञानविषयमज्ञानादिकं तेषामपि । भ्रमस्य चाविद्याकार्यत्वाङ्गीकारात् । आत्मस्वरूपस्याप्यविद्याकार्यत्वं स्यात् । दुर्घटत्वं भूषणमित्युक्ते दुर्घटत्वं सुघटत्वं चोभयं भूषणमस्माकमित्युत्तरम् । न हि प्रमाणसिद्धस्य दुर्घटत्वे सुघटत्वे वापवादो दृष्टः । दुर्घटत्वं भूषणमिति वदद्भिरात्मनोप्यविद्यात्वमङ्गीकृत्य तदयुक्तमित्युक्ते तत्रापि भूषणत्वं किमिति नाङ्गीक्रियते ? अतिसुकरत्वात् । न चात्मनोप्यविद्यात्वं वदतां तेषामुत्तरम् । अतोनन्तदोषदुष्टत्वाद्धीति प्रसिद्ध्यैव भगवता निराकृताः॥ २२ ॥ अस्य जीवस्य सदसद्योनिजन्मसु कारणं सत्त्वादिगुणसङ्गः । स्वतन्त्रकारणं तु परमेश्वर एवेत्याह उपद्रष्टानुमन्तेति ।", |
| | "'सर्वेभ्य उपरि द्रष्टा यदुपद्रष्टॄनामकः ।", |
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| | "य (एनं) एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।", |
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| | "'द्विविधं पुरुषं चैव प्रकृतिं द्विविधामपि ।", |
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| "text": "'अनादियोग्यताभेदात् पुंसां दर्शनसाधनम् ।\nनानैव तत्र विष्णोस्तु प्रसादाद् वैष्णवं वपुः ।\nस्वयं विज्ञायते किञ्चित् श्रूयते किञ्चिदन्यतः ।\nतथा ज्ञात्वा हरिं ध्यात्वा स्वान्तः पश्यन्ति केचन ।\nऋषयः केचिदृषयो नारदाद्या बहिस्त्वपि ।\nदेवा विष्णुप्रसादेन लब्धसत्प्रतिभाबलात् ।\nसर्वं क्रमेण विज्ञाय प्रतिभास्पष्टताक्रमात् ।\nपश्यन्ति बहिरन्तश्च विष्णुं ध्यानमृतेपि तु ।\nयेषां ध्यानमृते दृष्टिस्तेषां ध्यानेपि दर्शनम् ।\nस्यादेव साङ्ख्ययोगास्ते देवा ब्रह्माधिकोत्र च ।\nकेचित्तु क्षत्रियवरा अश्वमेधादिकर्मभिः ।\nयजन्तो भक्तिमन्तश्च यज्ञभागार्थमागतम् ।\nश्रवणप्रतिभाभ्यां च स्मरन्तः पुरुषोत्तमम् ।\nपश्यन्त्यन्ये तथान्येभ्यः सर्वं श्रुत्वानुमत्य च ।\nउपास्यैव तु पश्यन्ति नान्यथा तु कथञ्चन ।\nऋषीन् राज्ञस्तथारभ्य प्रतिभाभ्यधिका क्रमात् ।\nयावद् ब्रह्मा ब्रह्मणस्तु प्रायो नाप्रतिभासितम् ।\nविष्णोः प्रीत्यर्थमेवास्य श्रोतव्यं प्रायशो हरेः ।\nअन्येषां श्रवणाज्ज्ञानं क्रमशो मानुषोत्तरम् ।\nअत्यल्पप्रतिभानत्वान्मानुषाः श्रुतवेदिनः ।\nसर्वे ते दर्शनात् तस्मात् स्वयोग्यान्मुक्तिगामिनः'' ॥ इति च ।\nअन्येषामपि किञ्चिच्छ्रवणे विद्यमानेपि मानुषाणामत्यल्पप्रतिभानत्वात् 'श्रुत्वान्येभ्यः'' इति विशेषणम् । मनुष्याणां प्रतिभामूलप्रमाणापेक्षा प्रायो न सम्यगुत्पद्यते अल्पा चेति 'श्रुतिपरायणाः'' इति ।\n'अश्रुतप्रतिभा यस्य श्रुतिस्मृऽत्यविरोधिनी ।\nविश्रुता नृषु जातं च तं विद्याद् देवसत्तमम् ।\nयश्च स्वमुखमानेन नवाधोदेहवान् पुमान् ।\nअष्टमानवती स्त्री च षण्णवत्यङ्गुलौ पुनः ।\nदशताौ सप्तपादौ विद्यात् तौ च सुरोत्तमौ ।\nयावत् पञ्चाङ्गुलोनं तद्देवमानं क्रमात् परम् ।\nपादे त्वङ्गुलमात्रोनं तदूनं चतुरङ्गुलम् ।\nयावद्देवोपदेवानां पादे चोनाङ्गुलं पुनः ।\nतावन्मनुष्यमानं स्यात् ततोधस्त्वासुरं स्मृऽतम् ।\nद्विचत्वार्यधिकं तस्मात् षण्णवत्यङ्गुलादधः ।\nज्ञेयमङ्गुलमानं तदुपदेवादिषु स्फुटम् ।\nदेवेष्ववरवज्ज्ञेयमृषीणां चक्रवर्तिनाम् ।\nयावद् यावत् प्रियो विष्णोस्तावत् स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।\nहरेः सादृश्यमस्य स्यादनादिक्रमसुस्थिरम्'' ॥ इति च ॥ २५-२६ ॥" | | "lines": [ |
| | "'अनादियोग्यताभेदात् पुंसां दर्शनसाधनम् ।", |
| | "नानैव तत्र विष्णोस्तु प्रसादाद् वैष्णवं वपुः ।", |
| | "स्वयं विज्ञायते किञ्चित् श्रूयते किञ्चिदन्यतः ।", |
| | "तथा ज्ञात्वा हरिं ध्यात्वा स्वान्तः पश्यन्ति केचन ।", |
| | "ऋषयः केचिदृषयो नारदाद्या बहिस्त्वपि ।", |
| | "देवा विष्णुप्रसादेन लब्धसत्प्रतिभाबलात् ।", |
| | "सर्वं क्रमेण विज्ञाय प्रतिभास्पष्टताक्रमात् ।", |
| | "पश्यन्ति बहिरन्तश्च विष्णुं ध्यानमृतेपि तु ।", |
| | "येषां ध्यानमृते दृष्टिस्तेषां ध्यानेपि दर्शनम् ।", |
| | "स्यादेव साङ्ख्ययोगास्ते देवा ब्रह्माधिकोत्र च ।", |
| | "केचित्तु क्षत्रियवरा अश्वमेधादिकर्मभिः ।", |
| | "यजन्तो भक्तिमन्तश्च यज्ञभागार्थमागतम् ।", |
| | "श्रवणप्रतिभाभ्यां च स्मरन्तः पुरुषोत्तमम् ।", |
| | "पश्यन्त्यन्ये तथान्येभ्यः सर्वं श्रुत्वानुमत्य च ।", |
| | "उपास्यैव तु पश्यन्ति नान्यथा तु कथञ्चन ।", |
| | "ऋषीन् राज्ञस्तथारभ्य प्रतिभाभ्यधिका क्रमात् ।", |
| | "यावद् ब्रह्मा ब्रह्मणस्तु प्रायो नाप्रतिभासितम् ।", |
| | "विष्णोः प्रीत्यर्थमेवास्य श्रोतव्यं प्रायशो हरेः ।", |
| | "अन्येषां श्रवणाज्ज्ञानं क्रमशो मानुषोत्तरम् ।", |
| | "अत्यल्पप्रतिभानत्वान्मानुषाः श्रुतवेदिनः ।", |
| | "सर्वे ते दर्शनात् तस्मात् स्वयोग्यान्मुक्तिगामिनः'' ॥ इति च ।", |
| | "अन्येषामपि किञ्चिच्छ्रवणे विद्यमानेपि मानुषाणामत्यल्पप्रतिभानत्वात् 'श्रुत्वान्येभ्यः'' इति विशेषणम् । मनुष्याणां प्रतिभामूलप्रमाणापेक्षा प्रायो न सम्यगुत्पद्यते अल्पा चेति 'श्रुतिपरायणाः'' इति ।", |
| | "'अश्रुतप्रतिभा यस्य श्रुतिस्मृऽत्यविरोधिनी ।", |
| | "विश्रुता नृषु जातं च तं विद्याद् देवसत्तमम् ।", |
| | "यश्च स्वमुखमानेन नवाधोदेहवान् पुमान् ।", |
| | "अष्टमानवती स्त्री च षण्णवत्यङ्गुलौ पुनः ।", |
| | "दशताौ सप्तपादौ विद्यात् तौ च सुरोत्तमौ ।", |
| | "यावत् पञ्चाङ्गुलोनं तद्देवमानं क्रमात् परम् ।", |
| | "पादे त्वङ्गुलमात्रोनं तदूनं चतुरङ्गुलम् ।", |
| | "यावद्देवोपदेवानां पादे चोनाङ्गुलं पुनः ।", |
| | "तावन्मनुष्यमानं स्यात् ततोधस्त्वासुरं स्मृऽतम् ।", |
| | "द्विचत्वार्यधिकं तस्मात् षण्णवत्यङ्गुलादधः ।", |
| | "ज्ञेयमङ्गुलमानं तदुपदेवादिषु स्फुटम् ।", |
| | "देवेष्ववरवज्ज्ञेयमृषीणां चक्रवर्तिनाम् ।", |
| | "यावद् यावत् प्रियो विष्णोस्तावत् स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।", |
| | "हरेः सादृश्यमस्य स्यादनादिक्रमसुस्थिरम्'' ॥ इति च ॥ २५-२६ ॥" |
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| | "क्षिणोति त्राति चैवैतत् सोतो वा क्षेत्रमुच्यते ।", |
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| | "प्रेरयन्नेव जानाति यत् क्षेत्रज्ञो हरिस्ततः'' ॥ इति च ।", |
| | "'यस्यात्मा शरीरम्'' इत्यादिश्रुतेश्चेतनस्यापि 'इदं शरीरं कौन्तेय'' इति शरीरत्वोक्तिर्युज्यते ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'सत्त्वं जीवः क्वचित् प्रोक्तः क्वचित् सत्त्वं जनार्दनः ।\u003Cbr/\u003Eसत्त्वं नाम गुणः क्वापि क्वचित् साधुत्वमुच्यते'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavad-id\"\u003Eप्रकृत्य स्वयमेव प्रारभ्य विष्णुना क्रियमाणानि । विष्णोर्नान्य पूर्वप्रेरक इति । 'पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्''\u003C/span\u003E\nइति भगवद्वचनात् ।\n'द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।\nयदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skanda-id\"\u003E'स्वयं प्रकृत्य भगवान् करोति निखिलं जगत् ।\u003Cbr/\u003Eनैव कर्ता हरेः कश्चिदकर्ता तेन केशवः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति स्कान्दे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eतेनेति प्रस्तुतत्वादेव सिद्धम् । 'अहं सर्वस्य प्रभवः'' 'स हि कर्ता'' 'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्'' 'जन्माद्यस्य यतः'' 'मत्त एवेति तान् विदि्ध'' इत्यादिसकलप्रमाणविरोधश्चान्यथा । 'प्रकृत्यैव च'' इति चशब्दाच्चैतेनैवेति सिद्ध्यति ।\u003Cbr/\u003E'प्रकृतेन क्रियायोगं चशब्दः क्वचिदीरयेत् ।\u003Cbr/\u003Eक्वचित् समुच्चयं ब्रूयात् क्वचिद् दौर्लभ्यवाचकः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\nप्रकृतेः कर्तृत्वं 'रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्'' इत्यादिना च निरस्तम् । 'न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे'' इति च । केवलप्रकृतेः कर्तृत्वाङ्गीकारे चशब्दोपि व्यर्थः । 'तत एव च विस्तारम्'' इति वाक्यशेषविरोधश्च । 'अहं बीजप्रदः पिता'' इति वक्ष्यमाणमत्रापि 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इति प्रकृतमिति तेनापि विरोधः । अचेतनं करोतीति स्वोक्तिविरोधश्च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003E'इच्छापूर्वक्रियादानं कर्तृत्वं मुख्यमीरितम्''\u003C/span\u003E\nइति हि पैङ्गिश्रुतिः ।\nविकारलक्षणं कर्तृत्वं तु प्रकृतेरङ्गीकृतमेव । तथापि लक्ष्मीपरमेश्वरमुक्तचेष्टासु तदभावात् 'सर्वशः'' इत्यस्य सङ्कोचप्राप्तिः ।\n'अचेतनाश्रितं कर्म विकारात्मकमीरितम् ।\nयत्तु केवलचित्संस्थं प्रत्यभिज्ञाप्रमाणतः ।\nअविकारात्मकं ज्ञेयं तन्न तत् प्राकृतं भवेत्'' ॥ इति च ॥३० ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavad-id\"\u003Eप्रकृत्य स्वयमेव प्रारभ्य विष्णुना क्रियमाणानि । विष्णोर्नान्य पूर्वप्रेरक इति । 'पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्''\u003C/span\u003E", |
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| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "प्रकृतेः कर्तृत्वं 'रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्'' इत्यादिना च निरस्तम् । 'न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे'' इति च । केवलप्रकृतेः कर्तृत्वाङ्गीकारे चशब्दोपि व्यर्थः । 'तत एव च विस्तारम्'' इति वाक्यशेषविरोधश्च । 'अहं बीजप्रदः पिता'' इति वक्ष्यमाणमत्रापि 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्'' इति प्रकृतमिति तेनापि विरोधः । अचेतनं करोतीति स्वोक्तिविरोधश्च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003E'इच्छापूर्वक्रियादानं कर्तृत्वं मुख्यमीरितम्''\u003C/span\u003E", |
| | "इति हि पैङ्गिश्रुतिः ।", |
| | "विकारलक्षणं कर्तृत्वं तु प्रकृतेरङ्गीकृतमेव । तथापि लक्ष्मीपरमेश्वरमुक्तचेष्टासु तदभावात् 'सर्वशः'' इत्यस्य सङ्कोचप्राप्तिः ।", |
| | "'अचेतनाश्रितं कर्म विकारात्मकमीरितम् ।", |
| | "यत्तु केवलचित्संस्थं प्रत्यभिज्ञाप्रमाणतः ।", |
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| | "यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।", |
| | "तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥" |
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| | "'एकविष्ण्वा(श्रितानां)श्रयाणां तु जीवानां भेदमेव यः ।", |
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| "text": "अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।\nशरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥" | | "lines": [ |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruthi-id\"\u003Eशरीरस्थो जीवः । 'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्य असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति''\u003C/span\u003E", |
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| | "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id\"\u003Eएतेभ्यः सत्त्वादिगुणेभ्योन्यं कर्तारमीशं यदा पश्यति तदैवायं ना पुरुषः । अन्यथा पशुसमः । न केवलमन्यत्वेन पश्यन् ना तं कर्तारं विष्णुम् किन्तु गुणेभ्य उत्तमत्वेन च । कथं स एव ना ? यस्मात् 'मद्भावं सोधिगच्छति'' ।\u003Cbr/\u003E'महालक्ष्मीरिति परा भार्या नारायणस्य या ।\u003Cbr/\u003Eप्रकृतिर्नाम सा ज्ञेया प्रकर्षेण करोति यत् ।\u003Cbr/\u003Eतस्यास्तु त्रीणि रूपाणि सत्त्वं नाम रजस्तमः ।\u003Cbr/\u003Eसृष्टिकाले विभज्यन्ते सत्त्वं श्रीः सद्गुणप्र(भा)दा ।\u003Cbr/\u003Eरजो रञ्जनकर्तृत्वाद् भूः सा सृष्टिकरी यतः ।\u003Cbr/\u003Eयदावेशादियं पृथ्वी भूमिरित्येव कथ्यते ।\u003Cbr/\u003Eजीवानां ग्लपनाद् दुर्गा तम इत्येव कीर्तिता ।\u003Cbr/\u003Eएताभिस्तिसृभिर्जीवाः सर्वे बद्धा अमुक्तिगाः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वान् बध्नन्ति सर्वाश्च तथापि तु विशेषतः ।\u003Cbr/\u003Eश्रीर्देवबन्धिका नॄणां भूर्दैत्यानामथापरा ।\u003Cbr/\u003Eएताभ्योन्यं परं चैव विष्णुं ज्ञात्वा विमुच्यते ।\u003Cbr/\u003Eसामर्थ्यातिशयादासां नैताभ्यो विद्यते परः ।\u003Cbr/\u003Eइति यावद् विजानाति तावत् तं नृपशुं विदुः ।\u003Cbr/\u003Eतस्मादाभ्योधिकगुणो विष्णुर्ज्ञेयः सदैव च'' ॥\u003C/span\u003E\nइति महाविष्णुपुराणे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E'रजसस्तु फलं दुःखम्'' इत्यत्र दुःखमिति दुःखमिश्रं सुखम्- 'दुखं दुरिति सम्प्रोक्तं खं नाम सुखमुच्यते'' ।\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skanda-id\"\u003E'कर्मणो राजसस्योक्तं दुःखमिश्रं सुखं फलम् ।\u003Cbr/\u003Eअज्ञानजं तामसस्य नित्यदुःखं फलं विदुः'' ।\u003C/span\u003E\nइति स्कान्दे ॥१६-२१॥" | | "lines": [ |
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| "text": "ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।\nछन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥" | | "lines": [ |
| | "ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।", |
| | "छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥" |
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| "text": "'पृथङ्ग् मूलं हरिस्त्वस्य जगद्वृक्षस्य भूमिवत् ।\nसत्त्वादियुक्ते चिदचित्प्रकृती मूलभागवत् ।\nअत्रापि चिदचिद्योगो वृक्षवत् सम्प्रकीर्तितः ।\nपृथिवीदेवतावत् तद्धरिर्मृद्वदचेतना ।\nउत्तमत्वात्तु मूलानामूर्ध्वमूलस्त्वयं स्मृऽतः ।\nनीचास्ततो महदहम्बुद्धयो भूतसंयुताः ।\nशाखाश्छन्दांसि पर्णानि काममोक्षफले ह्यतः'' ॥१ ॥" | | "lines": [ |
| | "'पृथङ्ग् मूलं हरिस्त्वस्य जगद्वृक्षस्य भूमिवत् ।", |
| | "सत्त्वादियुक्ते चिदचित्प्रकृती मूलभागवत् ।", |
| | "अत्रापि चिदचिद्योगो वृक्षवत् सम्प्रकीर्तितः ।", |
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| | "नीचास्ततो महदहम्बुद्धयो भूतसंयुताः ।", |
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| "text": "अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।\nअधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।", |
| | "अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥" |
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| "text": "कारणेषु स्थितं कार्यं व्याप्तं कार्येषु कारणम् ।\nअन्योन्यसंयुताः शाखाः मूलानि च सदैव तु ।\nविषयाः दर्शनीयत्वात् प्रवालसदृशाः मताः ॥२ ॥" | | "lines": [ |
| | "कारणेषु स्थितं कार्यं व्याप्तं कार्येषु कारणम् ।", |
| | "अन्योन्यसंयुताः शाखाः मूलानि च सदैव तु ।", |
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| "text": "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।\nअश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।", |
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| "text": "ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।\nतमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।", |
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| "text": "जगद्वृक्षोयमश्वत्थो ह्यश्ववच्चञ्चलात्मकः ।\nअव्ययोयं प्रवाहेण स्वस(क्ति)क्तज्ञानहेतिना ।\nविष्णोः सम्यक् पृथग्दृष्टिनामच्छेदनभाक् सदा ।\nअव्यक्तादिसमस्तं तु नेति नेत्यादिवाक्यतः ।\nबोधेनैव पृथग् विष्णोः कृत्वा मृग्यः स केशवः ।\nतमेवाद्यं प्रपद्येत यदंशाभासको ह्ययम् ।\nजीवराशिः समस्तोपि ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकः ॥ ३-४ ॥" | | "lines": [ |
| | "जगद्वृक्षोयमश्वत्थो ह्यश्ववच्चञ्चलात्मकः ।", |
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| "text": "निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।\nद्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।", |
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| | "न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।", |
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| | "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।", |
| | "मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥" |
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| "text": "किञ्चित् सादृश्यमात्रेण भिन्नोप्यंश इवोच्यते ।\nईश्वरस्तु यदा त्वस्य शरीरं विशति प्रभुः ।\nमनःपष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ शब्दादीन् प्रति ... ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "किञ्चित् सादृश्यमात्रेण भिन्नोप्यंश इवोच्यते ।", |
| | "ईश्वरस्तु यदा त्वस्य शरीरं विशति प्रभुः ।", |
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| | "शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।", |
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| | "... अथ यदा जीवमादाय यात्यतः ।", |
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| | "श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।", |
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| | "उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।", |
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| | "भुङ्क्ते हरिः शुभान् भोगानिंद्रियेषु व्यवस्थितः ।", |
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| | "गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।", |
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| | "अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।", |
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| | "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।", |
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| | "आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।", |
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| | "त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।", |
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| | "एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।", |
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| | "यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id\"\u003Eदेवासुरलक्षणम्- 'येतिमानेन मन्यन्ते परमेशोहमित्यपि मिथ्या जगदिदं सर्वं भ्रमजत्वान्न तिष्ठति ।\u003Cbr/\u003Eमिथ्यात्वान्नेश्वरोस्यास्ति परेभ्यो न च जायते ।\u003Cbr/\u003Eस्वस्मिन्नपि तथान्यस्मिन् नियन्तान्य इतीरिते ।\u003Cbr/\u003Eप्रद्विषन्त्यसुरास्ते तु सर्वे यान्त्यधरं तमः ।\u003Cbr/\u003Eअयोग्येशत्वकामत्वात् लोभाच्चात्मसमर्पणे ।\u003Cbr/\u003Eतत्त्व(वेदेषु)वादिषु कोपाच्च तत(तम)स्तेषां न दुर्लभम् ।\u003Cbr/\u003Eअक्षानुमागमानां च स्वोक्तेरपि विरोधिनः ।\u003Cbr/\u003Eयस्मात् तेतोसुरा ज्ञेया एवमन्येपि तादृशाः ।\u003Cbr/\u003Eये तु विष्णुं परं ज्ञात्वा यजन्तेनन्यदेवताः ।\u003Cbr/\u003Eप्रत्यक्षाद्यविसंवादिज्ञानादेव विमुक्तिगाः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मवैवर्ते ।\n'निबन्धाय'' नीचस्थानेन्धे तमसि बन्धाय ।\n'सर्गाणां सुबहुत्वेपि शुभाशुभपथाधिकौ ।\nदेवासुराख्यौ द्वावेव गन्धर्वाद्यास्तदन्तराः ।\nमुक्तिगा एव विज्ञेया देवा एव विमुक्तिगाः'' ॥ इति च ।\n'विमोक्षाय'' इत्यत्र वीत्युपसर्गादेव च मोक्षनानात्वं ज्ञायते ।\n'देवासुरनरत्वाद्या जीवानां तु निसर्गतः ।\nनिसर्गो नान्यथैतेषां केनचित् क्वचिदेव वा ।\nदेवाः शापबलादेव प्रह्लादादित्वमागताः ।\nअतः पुनश्च देवत्वं ते यान्ति निजमेव तु ।\nहेतुतः सोन्यथाभावो रक्तता स्फटिके यथा ।\nततो नित्यश्च नाप्येष स्वभाव विनिवर्तकः ।\nकिञ्चाक्रम्यैव तं तिष्ठेद् देवसर्गस्ततो हि यः ।\nअशोच्य एव विज्ञेयो मोक्षयोग्यो हरेः प्रियः'' ॥ इति च ॥ १-२४ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmavaivarte-id\"\u003Eदेवासुरलक्षणम्- 'येतिमानेन मन्यन्ते परमेशोहमित्यपि मिथ्या जगदिदं सर्वं भ्रमजत्वान्न तिष्ठति ।\u003Cbr/\u003Eमिथ्यात्वान्नेश्वरोस्यास्ति परेभ्यो न च जायते ।\u003Cbr/\u003Eस्वस्मिन्नपि तथान्यस्मिन् नियन्तान्य इतीरिते ।\u003Cbr/\u003Eप्रद्विषन्त्यसुरास्ते तु सर्वे यान्त्यधरं तमः ।\u003Cbr/\u003Eअयोग्येशत्वकामत्वात् लोभाच्चात्मसमर्पणे ।\u003Cbr/\u003Eतत्त्व(वेदेषु)वादिषु कोपाच्च तत(तम)स्तेषां न दुर्लभम् ।\u003Cbr/\u003Eअक्षानुमागमानां च स्वोक्तेरपि विरोधिनः ।\u003Cbr/\u003Eयस्मात् तेतोसुरा ज्ञेया एवमन्येपि तादृशाः ।\u003Cbr/\u003Eये तु विष्णुं परं ज्ञात्वा यजन्तेनन्यदेवताः ।\u003Cbr/\u003Eप्रत्यक्षाद्यविसंवादिज्ञानादेव विमुक्तिगाः'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।सदसत्कर्मविवेकः ।" |
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| "text": "सत्त्वानुरूपा जीवानुरूपा अतो ये सात्त्विकश्रद्धास्ते सात्त्विका इति (ज्ञेयाः) ज्ञायन्तेन्येन्य इति । श्रद्धामयः श्रद्धास्वरूपः ।\n'श्रद्धा स्वरूपं जीवस्य तस्माच्छ्रद्धाविभेदतः ।\nउत्तमाधममध्यास्तु जीवा ज्ञेयाः पृथक् पृथक् ।\nस्वरूपभूता श्रद्धैव तमोगानां च मोक्षिणाम् ।\nशिष्यते संसृतिस्थानां श्रद्धारूपं मनोपरम् ।\nतत्र स्वरूपश्रद्धैव व्यज्यते प्रायशः क्वचित् ।\nसात्विकस्य तमोरूपा श्रद्धान्तःकरणात्मिका ।\nसात्त्विकी तामसस्यापि भूयस्त्वात् तद् विविच्यते ।\nश्रद्धेत्यास्तिक्यनिष्ठोक्ता सा येषां दैवतोत्तमे ।\nविष्णौ तद्भक्तबुद्ध्यैव रमाब्रह्मादिकेषु तु ।\nते सात्त्विका इति ज्ञेयास्तैरिष्टं विष्णुरेव तु ।\nश्रीश्च साध्यक्षविद्याख्या ब्रह्मेन्द्राद्याश्च देवताः ।\nविबुधत्वात्तु मन्वाख्या भुञ्जते प्रीतिपूर्वकम् ।\nव्यामिश्रयाजिनो ये तु विष्ण्वाधिक्ये ससंशयाः ।\nस्वरूपमात्रे देवानां श्रद्धायुक्ताश्च सर्वदा ।\nराजसास्ते तु विज्ञेयास्तैरिष्टं यक्षराक्षसाः ।\nदीनत्वाद् देवनामानो ब्रह्मेन्द्रादिसनामकाः ।\nगृह्णन्ति ये हरिं त्वन्यदेवादिसममेव वा ।\nनीचं ब्रह्माद्यनन्यं वा मन्यन्ते नेति चाखिलम् ।\nतत्तच्छ्रद्धायुतास्ते तु तामसाः परिकीर्तिताः ।\nभूतप्रेतास्तु तैरिष्टं शिवस्कन्दादिनामकाः ।\nसाक्षाच्छिवपरीवारा भुञ्जते ह्यतितामसाः ।\nमोक्षः साङ्कल्पिकः स्वर्गो भूतादित्वं फलं क्रमात् ।\nत्यक्त्वापि शास्त्रविहितं मिथ्याज्ञानविवर्जिताः ।\nभक्त्या विष्णुं यजन्तो ये निषिद्धाचरणोज्ज्ञिताः ।\nतेपि यान्ति हरिं शास्त्रविधानस्थाः कुतः पुनः ॥३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सत्त्वानुरूपा जीवानुरूपा अतो ये सात्त्विकश्रद्धास्ते सात्त्विका इति (ज्ञेयाः) ज्ञायन्तेन्येन्य इति । श्रद्धामयः श्रद्धास्वरूपः ।", |
| | "'श्रद्धा स्वरूपं जीवस्य तस्माच्छ्रद्धाविभेदतः ।", |
| | "उत्तमाधममध्यास्तु जीवा ज्ञेयाः पृथक् पृथक् ।", |
| | "स्वरूपभूता श्रद्धैव तमोगानां च मोक्षिणाम् ।", |
| | "शिष्यते संसृतिस्थानां श्रद्धारूपं मनोपरम् ।", |
| | "तत्र स्वरूपश्रद्धैव व्यज्यते प्रायशः क्वचित् ।", |
| | "सात्विकस्य तमोरूपा श्रद्धान्तःकरणात्मिका ।", |
| | "सात्त्विकी तामसस्यापि भूयस्त्वात् तद् विविच्यते ।", |
| | "श्रद्धेत्यास्तिक्यनिष्ठोक्ता सा येषां दैवतोत्तमे ।", |
| | "विष्णौ तद्भक्तबुद्ध्यैव रमाब्रह्मादिकेषु तु ।", |
| | "ते सात्त्विका इति ज्ञेयास्तैरिष्टं विष्णुरेव तु ।", |
| | "श्रीश्च साध्यक्षविद्याख्या ब्रह्मेन्द्राद्याश्च देवताः ।", |
| | "विबुधत्वात्तु मन्वाख्या भुञ्जते प्रीतिपूर्वकम् ।", |
| | "व्यामिश्रयाजिनो ये तु विष्ण्वाधिक्ये ससंशयाः ।", |
| | "स्वरूपमात्रे देवानां श्रद्धायुक्ताश्च सर्वदा ।", |
| | "राजसास्ते तु विज्ञेयास्तैरिष्टं यक्षराक्षसाः ।", |
| | "दीनत्वाद् देवनामानो ब्रह्मेन्द्रादिसनामकाः ।", |
| | "गृह्णन्ति ये हरिं त्वन्यदेवादिसममेव वा ।", |
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| | "तत्तच्छ्रद्धायुतास्ते तु तामसाः परिकीर्तिताः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eअशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपोधनाः (तपो जनाः) ।\u003Cbr/\u003Eडम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।\u003Cbr/\u003Eअकृशानपि लक्ष्म्यादीन् देवान् विष्णुपरायणान् ।\u003Cbr/\u003Eविष्णुं च सर्वदेहस्थान् कृशत्वेन विजानते ।\u003Cbr/\u003Eतेषामल्पगुणत्वेन कल्पनात् ते तमो ध्रुवम् ।\u003Cbr/\u003Eयान्ति ज्ञेयाश्च ते दैत्याः पिशाचा वाथ राक्षसाः ॥ अन्नैश्चैवाथ यज्ञाद्यैः प्रायो ज्ञेया इमे नराः ।\u003Cbr/\u003Eसात्त्विका सात्त्विकान् कुर्युर्यस्मादन्ये तथेतरान् ॥ ओन्तत्सदिति यद् विष्णोर्नामत्रयमुदाहृतम् ।\u003Cbr/\u003Eप्रसिद्धं वैदिकं तस्मात् कर्म सद्विषयं हि सत् ।\u003Cbr/\u003Eतत्राश्रद्धाकृतं तस्मादसदित्येव कीर्त्यते ।\u003Cbr/\u003Eविप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मादोताः परस्परम् ।\u003Cbr/\u003Eविहिता विष्णुना तेन विष्णुरोमिति कीर्तितः ।\u003Cbr/\u003Eओतमस्मिन्निदं सर्वमिति चोक्तः स ओमिति ।\u003Cbr/\u003Eतस्मादोमिति यज्ञादीन् प्रवर्तन्ते हि वैदिकाः ।\u003Cbr/\u003Eअनोङ्कृतं ह्यासुरं स्याद् यत् तस्मादोङ्कृतं त्वपि ।\u003Cbr/\u003Eओङ्कारार्थहरेः सम्यगज्ञानादासुरं भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eफलं त्वनभिसन्धाय तद् ब्रह्म स्यान्ममास्पदम् ।\u003Cbr/\u003Eइति यत् क्रियते कर्म तन्नामातो जनार्दनः ।\u003Cbr/\u003Eअभिसन्धितं हि तत् प्रोक्तं ततं वा स्वगुणैः सदा'' ॥ इत्यादि च ।\u003Cbr/\u003E'मयः(मयं) प्रधानमुद्दिष्टं स्वरूपं कार्यमेव च''\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Paingishruthi-id\"\u003Eशास्त्रविहितमपि भगवच्छ्रद्धाहीनमसदेवेति वक्ष्यति'अश्रद्धया हुतम्'' इति । भगवच्छ्रद्धारहितत्वादेव चाशास्त्रविहितं भवति । 'विष्णुभक्तिविधानार्थं सर्वं शास्त्रं प्रवर्तते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ ४-७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eअशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपोधनाः (तपो जनाः) ।\u003Cbr/\u003Eडम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।\u003Cbr/\u003Eअकृशानपि लक्ष्म्यादीन् देवान् विष्णुपरायणान् ।\u003Cbr/\u003Eविष्णुं च सर्वदेहस्थान् कृशत्वेन विजानते ।\u003Cbr/\u003Eतेषामल्पगुणत्वेन कल्पनात् ते तमो ध्रुवम् ।\u003Cbr/\u003Eयान्ति ज्ञेयाश्च ते दैत्याः पिशाचा वाथ राक्षसाः ॥ अन्नैश्चैवाथ यज्ञाद्यैः प्रायो ज्ञेया इमे नराः ।\u003Cbr/\u003Eसात्त्विका सात्त्विकान् कुर्युर्यस्मादन्ये तथेतरान् ॥ ओन्तत्सदिति यद् विष्णोर्नामत्रयमुदाहृतम् ।\u003Cbr/\u003Eप्रसिद्धं वैदिकं तस्मात् कर्म सद्विषयं हि सत् ।\u003Cbr/\u003Eतत्राश्रद्धाकृतं तस्मादसदित्येव कीर्त्यते ।\u003Cbr/\u003Eविप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मादोताः परस्परम् ।\u003Cbr/\u003Eविहिता विष्णुना तेन विष्णुरोमिति कीर्तितः ।\u003Cbr/\u003Eओतमस्मिन्निदं सर्वमिति चोक्तः स ओमिति ।\u003Cbr/\u003Eतस्मादोमिति यज्ञादीन् प्रवर्तन्ते हि वैदिकाः ।\u003Cbr/\u003Eअनोङ्कृतं ह्यासुरं स्याद् यत् तस्मादोङ्कृतं त्वपि ।\u003Cbr/\u003Eओङ्कारार्थहरेः सम्यगज्ञानादासुरं भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eफलं त्वनभिसन्धाय तद् ब्रह्म स्यान्ममास्पदम् ।\u003Cbr/\u003Eइति यत् क्रियते कर्म तन्नामातो जनार्दनः ।\u003Cbr/\u003Eअभिसन्धितं हि तत् प्रोक्तं ततं वा स्वगुणैः सदा'' ॥ इत्यादि च ।\u003Cbr/\u003E'मयः(मयं) प्रधानमुद्दिष्टं स्वरूपं कार्यमेव च''\u003C/span\u003E", |
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| | "आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eस्थिराः स्थिरगुणाः घृतादयः । कवादीनामप्यारोग्यरसाद्यर्थत्वेन सात्त्विकत्वमेव । रस्यादीनामपि राजसत्वमनारोग्यादिहेतुत्वे ।'दुःखशोकामयप्रदाः'' इत्युक्तेः । सत्त्वं साधुभावः । भवति हि सोपि शुच्यन्नात् ।\u003Cbr/\u003E'हृद्यं पश्चान्मनोहारि प्रियं तत्कालसौख्यदम् ।\u003Cbr/\u003Eसुखदं दीर्घसुखदं रस्यमभ्यास सौख्यदम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ॥८ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।\nआहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥" | | "lines": [ |
| | "कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।", |
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| "text": "रूक्षं नीरसम् । तीक्ष्णं सर्षपादि ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
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| | "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।", |
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| "text": "'यामान्तरितपाकं तु यातयाममुदीर्यते ।\nक्वचिच्च गतसारं स्यान्नियम्यं यातमस्य यत्'' ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eपूर्वं स्वादु पश्चादन्यथाजातं गतरसम्'शुद्धभागवतानां तु स्वभावापेक्षयैव तु ।\u003Cbr/\u003Eस्वादुत्वादि विजानीयात् पदार्थानां न चान्यथा'' ॥\u003C/span\u003E\nइति सूदशास्त्रे ।\n॥१० ॥" | | "lines": [ |
| | "'यामान्तरितपाकं तु यातयाममुदीर्यते ।", |
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| | "अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।", |
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| | "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'यागात्तु राजसात् स्वर्गः साङ्कल्पिक उदाहृतः ।\u003Cbr/\u003Eलोकः स दीनदेवानां सनाम्नां वासवादिभिः ।\u003Cbr/\u003Eविष्णावश्रद्धयायोग्यकामाच्चैषां पुनर्भवेत् ।\u003Cbr/\u003Eनरकं च विना यज्ञं राजसा नरलोकगाः ।\u003Cbr/\u003Eनिषिद्धकर्म कुर्युश्चेदीयुस्ते नरकं ध्रुवम् ।\u003Cbr/\u003E'कदाचित् सात्त्विकाः कुर्युः कर्म राजसतामसम् ।\u003Cbr/\u003Eअन्येन्यच्च तथाप्येषां स्थितिः स्वाभावि(की)के पुनः ।\u003Cbr/\u003Eस्वं स्वं कर्म तु सर्वेषां सदैव स्यान्महत्फलम् । अन्यदल्पफलं चैव बाहुल्यं तेषु लक्षणम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ॥ १२-१५ ॥" | | "lines": [ |
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| | "मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।", |
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| | "दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003Eसङ्गफलत्यागमृते स्वरूपत्यागः कार्य इति मिथ्याज्ञानाख्यमोहात् । 'स्वयज्ञादीन् परित्यज्य निरयं यात्यसंशयम्'' ।\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003Eसङ्गफलत्यागमृते स्वरूपत्यागः कार्य इति मिथ्याज्ञानाख्यमोहात् । 'स्वयज्ञादीन् परित्यज्य निरयं यात्यसंशयम्'' ।\u003C/span\u003E", |
| | "इति पाद्मे ॥ ७ ॥" |
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| | "दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।", |
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| | "कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eमोहं विना दृष्टदुःखमित्येव । दुःखशब्देन केवलमानसम् । कायक्लेशस्य पृथगुक्तेः ।\u003Cbr/\u003E'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।\u003Cbr/\u003E'दुःखं तु मानसं ज्ञेयमायासो बाह्य उच्यते ।\u003Cbr/\u003Eविशेषस्य विवक्षायामन्यथा सर्वमेव तु'' ॥\u003C/span\u003E", |
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| | "न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।", |
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| | "न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।", |
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| "text": "'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म केवलं दृष्टदुःखदम् ।\nजन्मान्तरकृते पुण्ये न सज्जेत् सात्त्विकश्चले ।\nयः सम्यक् तत्त्वविद् विष्णोस्तदर्पणधियैव तु ।\nफलेच्छावर्जितस्तस्य कर्मबन्धाय नो भवेत् ।\nबहुलं चेदल्पदोषं यावदेवापरोक्षदृक्'' ॥ इति च ॥ १०,११ ॥" | | "lines": [ |
| | "'न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म केवलं दृष्टदुःखदम् ।", |
| | "जन्मान्तरकृते पुण्ये न सज्जेत् सात्त्विकश्चले ।", |
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| "text": "अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।\nभवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।", |
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| "text": "अन्येषामिष्टम् । अस्य तु त्यागित्वादेव नेष्टम् ।\n'ज्ञानादेर्मोक्षभोग्याच्च नान्यत् स्यात् कर्मणः फलम् ॥ त्यागिनस्तत्त्वसंवेत्तुरन्येषां तदृते फलम्'' ॥ इति च ।\nकेवलकाम्यकर्मणां फलानपेक्षयाप्यकरणमित्येतावांस्त्यागात् संन्यासस्य विशेष इत्यत्यागिनां प्रतियोगित्वेन न्यासिन उक्ताः । त्यागित्वं तेषामपि ह्यस्ति ।\n'परेच्छयापि ये काम्यं कर्म कुर्युर्न तु क्वचित् ।\nन्यासिनो नाम तेन्येभ्यः फलत्यागिभ्य उत्तमाः'' ॥ इति च ॥१२ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्येषामिष्टम् । अस्य तु त्यागित्वादेव नेष्टम् ।", |
| | "'ज्ञानादेर्मोक्षभोग्याच्च नान्यत् स्यात् कर्मणः फलम् ॥ त्यागिनस्तत्त्वसंवेत्तुरन्येषां तदृते फलम्'' ॥ इति च ।", |
| | "केवलकाम्यकर्मणां फलानपेक्षयाप्यकरणमित्येतावांस्त्यागात् संन्यासस्य विशेष इत्यत्यागिनां प्रतियोगित्वेन न्यासिन उक्ताः । त्यागित्वं तेषामपि ह्यस्ति ।", |
| | "'परेच्छयापि ये काम्यं कर्म कुर्युर्न तु क्वचित् ।", |
| | "न्यासिनो नाम तेन्येभ्यः फलत्यागिभ्य उत्तमाः'' ॥ इति च ॥१२ ॥" |
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| | "पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।", |
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| | "'कथितं परमं साङ्ख्यं कपिलाख्येन विष्णुना ।", |
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| | "अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।", |
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| | "शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।", |
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| "text": "यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।\nहत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥" | | "lines": [ |
| | "यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।", |
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| "text": "'स्वातन्त्र्यमीश्वरे वेत्ति नैवात्मनि कदाचन ।\nईश्वराधीनमेवात्मन् स्वातन्त्र्यं तु जडान् प्रति ।\nतारतम्येन लक्ष्म्यादेर्जीवान् प्रति च सर्वशः ।\nयस्तदर्थं समुत्पन्नो यथा रुद्रो यथा यमः ।\nहत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ।\nअज्ञस्तदर्थं जातोपि ब(व)द्ध्यते दैत्यवद् ध्रुवम् ।\nअपरोक्षदृङ्ग् न जातो यस्तदर्थं मुक्तिगं सुखम् ।\nह्रसेत् तस्य परोक्षज्ञः किञ्चिद् दोषेण लिप्यते'' ॥ इति च ।\nअस्वातन्त्र्यज्ञानात् हन्मीति भावोप्यस्य नास्तीति न हन्ति । अन्यस्य भावोस्तीति विशेषः । 'बुदि्धर्यस्य न लिप्यते'' इति । रागान्न हन्ति, किन्तु धर्मबुद्ध्या ।\n'स्वातन्त्र्यं मन्यमानस्य रागाद् धर्मं च कुर्वतः ।\nतन्निमित्तस्तु दोषः स्याद् गुणश्च स्यात् सुकर्मजः'' ॥ इति च ॥१७ ॥" | | "lines": [ |
| | "'स्वातन्त्र्यमीश्वरे वेत्ति नैवात्मनि कदाचन ।", |
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| "text": "ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।\nकरणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।", |
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| "text": "'सम्प्रेरयितुरीशस्य कर्मस्वखिलचेतनान् ।\nज्ञातृज्ञेयज्ञानरूपा प्रेरणा सा स एव यत् ।\nस्वरूपेणैव नित्या सा विशेषात्मतया भवेत् ।\nविशेषोपि स्वरूपेण नित्यश्च स्याद् विशेषतः ।\nस्वनिर्वाहकता यस्मान्नानवस्था विशिष्टवत् ।\nविशेष्यस्य विशिष्टस्याप्यभेदे(प्य)पि विवादिनि ।\nविशेषोस्त्येव नात्रापि ह्यनवस्था कदाचन ।\nज्ञातुरन्योहमिति तु कस्याप्यनुभवो न हि ।\nअस्मि ज्ञातैवाहमिति भेदस्तस्मात् तयोः कुतः ।\nपश्यामीति विशेषोयमिदानीं मे समुत्थितः ।\nइत्याद्यनुभवाद् भेदो न विशेष्यविशिष्टयोः ।\nविशेषणं तु द्विविधं विशेषाख्यं तथेतरत् ।\nविशेषमणयेद् येन प्रोक्तं तेन विशेषणम् ।\nविशेषोपि विशेषस्य स्वस्यैव गमको भवेत्'' ॥ इत्यादि तत्त्वविवेके ।\nसङ्ग्रहः पञ्चकारणानां सङ्क्षेपः । अधिष्ठानस्य करणेन्तर्भावात् । दैवशब्दोदितेश्वरस्यैव मुख्यकर्तृत्वात् स्वतन्त्रकर्त्रोः कर्तृशब्देनैवोक्तेः त्रैविध्यम् । कर्म चेष्टा ॥१८ ॥" | | "lines": [ |
| | "'सम्प्रेरयितुरीशस्य कर्मस्वखिलचेतनान् ।", |
| | "ज्ञातृज्ञेयज्ञानरूपा प्रेरणा सा स एव यत् ।", |
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| | "विशेषणं तु द्विविधं विशेषाख्यं तथेतरत् ।", |
| | "विशेषमणयेद् येन प्रोक्तं तेन विशेषणम् ।", |
| | "विशेषोपि विशेषस्य स्वस्यैव गमको भवेत्'' ॥ इत्यादि तत्त्वविवेके ।", |
| | "सङ्ग्रहः पञ्चकारणानां सङ्क्षेपः । अधिष्ठानस्य करणेन्तर्भावात् । दैवशब्दोदितेश्वरस्यैव मुख्यकर्तृत्वात् स्वतन्त्रकर्त्रोः कर्तृशब्देनैवोक्तेः त्रैविध्यम् । कर्म चेष्टा ॥१८ ॥" |
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| | "सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।", |
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| | "'अस्तित्वाद् भूतनामभ्यः सर्वजीवेभ्य एव यत् ।", |
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| | "पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।", |
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| | "यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'विष्णोरन्यस्य याथार्थ्यज्ञानं राजसमुच्यते ।\u003Cbr/\u003Eयदि विष्णुं न जानाति यदि वा मिश्रतत्त्ववित् ।\u003Cbr/\u003Eअन्यथाकरणीयत्वात् कार्याख्यं जीवमेव यः ।\u003Cbr/\u003Eअकार्यं ब्रह्म जानाति स एवाखिलमित्यपि । एकजीवपरिज्ञानात् कृत्स्नज्ञोस्मीति मन्यते ।\u003Cbr/\u003Eयुक्तिभिर्ज्ञान(युक्तिविज्ञान)राहित्यात् स्वपक्षस्याल्पयुक्तितः ।\u003Cbr/\u003Eअयुक्ततामेव गुणं मन्यते चाल्पदर्शनः ।\u003Cbr/\u003Eअतत्त्वार्थं जगद् ब्रूते तत्त्वार्थज्ञानवर्जनात् ।\u003Cbr/\u003Eस मुख्यतामसज्ञानी ह्येकैकेनापि किं पुनः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वैरेतैर्विशेषैश्च युक्तः पापतमाधिकः'' ॥\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ।\n'पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्'' इत्यस्य व्याख्यानम्'नानाभावान्'' इत्यादि । सर्वगतमेकमीश्वरं न जानातीत्येतावतैव राजसत्वम् । एकस्य कृत्स्नवज्ज्ञानमेव तामसम् । मुक्तत्वादिरूपेण अन्यथा करणीयत्वात् पराधीनत्वेनाल्पस्य जीवस्य स्वातन्त्र्यादिगुणपूर्णत्वात् कृत्स्नेन ब्रह्मणैक्यज्ञानं च महातामसम् । किं पुनस्तावन्मात्रं सर्वमिति ज्ञानम् । किं पुनस्तत्राप्येकजीवादन्यत् किमपि नास्तीति औतुकं ज्ञानं सर्वमपि तामसम् । किमु तदेवोक्तलक्षणम् । अतत्त्वार्थवत् सदसद्वैलक्षण्याद्यन्यथार्थकल्पनायुक्तमेव तामसम् । किमु तदेवोक्तविशेषणैर्युक्तम् । प्रायोल्पज्ञानमपि तामसम् । अज्ञानबहुलत्वात् किमु तदेवोक्तमिथ्याज्ञानबहुलमित्यपुनरुक्तिः । एकस्मिन् सर्ववज्ज्ञानं कार्ये जीवे पूर्णब्रह्मेति सक्तं ज्ञानं निर्युक्तिकं चातत्त्वार्थकल्पनायुक्तमल्पज्ञानं च पृथक्पृथगपि तामसानीति च । मायावादे त्वेतानि समस्तानि । अन्यत्रापि त्वहैतुकत्वादिकं विरुद्धवादिषु समं सर्वेषु ॥ २१,२२ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'विष्णोरन्यस्य याथार्थ्यज्ञानं राजसमुच्यते ।\u003Cbr/\u003Eयदि विष्णुं न जानाति यदि वा मिश्रतत्त्ववित् ।\u003Cbr/\u003Eअन्यथाकरणीयत्वात् कार्याख्यं जीवमेव यः ।\u003Cbr/\u003Eअकार्यं ब्रह्म जानाति स एवाखिलमित्यपि । एकजीवपरिज्ञानात् कृत्स्नज्ञोस्मीति मन्यते ।\u003Cbr/\u003Eयुक्तिभिर्ज्ञान(युक्तिविज्ञान)राहित्यात् स्वपक्षस्याल्पयुक्तितः ।\u003Cbr/\u003Eअयुक्ततामेव गुणं मन्यते चाल्पदर्शनः ।\u003Cbr/\u003Eअतत्त्वार्थं जगद् ब्रूते तत्त्वार्थज्ञानवर्जनात् ।\u003Cbr/\u003Eस मुख्यतामसज्ञानी ह्येकैकेनापि किं पुनः ।\u003Cbr/\u003Eसर्वैरेतैर्विशेषैश्च युक्तः पापतमाधिकः'' ॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति पाद्मे ।", |
| | "'पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्'' इत्यस्य व्याख्यानम्'नानाभावान्'' इत्यादि । सर्वगतमेकमीश्वरं न जानातीत्येतावतैव राजसत्वम् । एकस्य कृत्स्नवज्ज्ञानमेव तामसम् । मुक्तत्वादिरूपेण अन्यथा करणीयत्वात् पराधीनत्वेनाल्पस्य जीवस्य स्वातन्त्र्यादिगुणपूर्णत्वात् कृत्स्नेन ब्रह्मणैक्यज्ञानं च महातामसम् । किं पुनस्तावन्मात्रं सर्वमिति ज्ञानम् । किं पुनस्तत्राप्येकजीवादन्यत् किमपि नास्तीति औतुकं ज्ञानं सर्वमपि तामसम् । किमु तदेवोक्तलक्षणम् । अतत्त्वार्थवत् सदसद्वैलक्षण्याद्यन्यथार्थकल्पनायुक्तमेव तामसम् । किमु तदेवोक्तविशेषणैर्युक्तम् । प्रायोल्पज्ञानमपि तामसम् । अज्ञानबहुलत्वात् किमु तदेवोक्तमिथ्याज्ञानबहुलमित्यपुनरुक्तिः । एकस्मिन् सर्ववज्ज्ञानं कार्ये जीवे पूर्णब्रह्मेति सक्तं ज्ञानं निर्युक्तिकं चातत्त्वार्थकल्पनायुक्तमल्पज्ञानं च पृथक्पृथगपि तामसानीति च । मायावादे त्वेतानि समस्तानि । अन्यत्रापि त्वहैतुकत्वादिकं विरुद्धवादिषु समं सर्वेषु ॥ २१,२२ ॥" |
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| | "अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।", |
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| | "'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा'' इत्युक्त्वा 'ये मे मतम्'' 'ये त्वेतत्'' इति च तस्य मोक्षसाधनत्वस्याकरणे प्रत्यवायस्य चोक्तेर्भगवदर्पितत्वेन सर्वकर्मकरणं तस्य विष्णोः सर्वपरमत्वज्ञानं च नियतमेवेति ज्ञायते । 'अध्यात्मचेतसा'' इत्युक्तत्वात् तत्स्व(तत्व)रूपयाथार्थ्यज्ञानादि । 'ये तु सर्वाणि'' इत्यस्मिन् श्लोकेध्यात्मचेतस्त्वस्य 'मत्पराः अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्तः'' इति व्याख्यातत्वात् । एवं सर्वमपि भगवद्भक्तियुक्तमेव सात्त्विकम् ।", |
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| | "रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोशुचिः ।", |
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| | "बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।", |
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| "text": "'भगवद्भक्तिसामर्थ्यात् प्रकृष्टो न कृतो हि यः ।\nस प्राकृतो दीर्घसूत्री कुर्यां पश्चादिति स्मरन्'' ॥ इति शब्दतत्त्वे ।\nप्राप्तकालस्य कर्मणो दीर्घकालेनैव कृतिं सूचयन् दीर्घसूत्रीत्यर्थः ।\n'अलसो दीर्घसूत्री च सत्त्वयुक् तामसो मतः ।\nअयुक्तो राजसः स्तब्धः प्राकृतो नैकृतिः शठः ।\nएकैकेनैव दोषेण प्रोक्तस्तामसतामसः ।\nदुर्नरत्वं च तिर्यक्त्वं तमश्चैतत्फलं क्रमात्'' ॥ इति च ॥ २८-२९ ॥" | | "lines": [ |
| | "'भगवद्भक्तिसामर्थ्यात् प्रकृष्टो न कृतो हि यः ।", |
| | "स प्राकृतो दीर्घसूत्री कुर्यां पश्चादिति स्मरन्'' ॥ इति शब्दतत्त्वे ।", |
| | "प्राप्तकालस्य कर्मणो दीर्घकालेनैव कृतिं सूचयन् दीर्घसूत्रीत्यर्थः ।", |
| | "'अलसो दीर्घसूत्री च सत्त्वयुक् तामसो मतः ।", |
| | "अयुक्तो राजसः स्तब्धः प्राकृतो नैकृतिः शठः ।", |
| | "एकैकेनैव दोषेण प्रोक्तस्तामसतामसः ।", |
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| "text": "प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।\nबन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुदि्धः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥" | | "lines": [ |
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| | "यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।", |
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| | "'किञ्चिद् यथावद् धर्मादीनयथावच्च पश्यति ।", |
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| | "'वैष्णवो भक्तियोगो यस्त(दुक्ता)द्युक्ता सात्त्विकी धृतिः'' । इति च । विहित-विषयैवेत्यव्यभिचारिणी ॥ ३३,३४ ॥" |
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| | "सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।", |
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| | "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम् ।", |
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| "text": "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।\nसत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "सत्त्वं जीवजातम् । मुक्तानां गुणातीतत्वात् 'पृथिव्यां दिवि देवेषु वा'' इति विशेषः ।\n'यथेष्टं सञ्चरन्तोपि मुक्ता भूम्यादिगा न तु ।\nग्रामस्था अपि न ग्राम्या वैलक्षण्यादि्ध सज्जनाः ।\nनराधमास्तामसेषु सात्त्विकास्तत्र राजसाः ।\nदैत्यभृत्या महादैत्या मुख्यतामसतामसाः ।\nराजसास्तु नरास्तत्र विप्रा राजससात्त्विकाः ।\nतत्रस्थशुद्धसत्त्वास्तु परहंसाः प्रकीर्तिताः ।\nहंसो बहूदः कुटिको वनस्थो नैष्ठिको गृही ।\nक्रमाद् रजोधिका बाह्यं कर्मैषामधिकं यतः ।\nधर्माः परमहंसानां ब्राह्मा एव शमादिकाः ।\nदेवादेः कर्मबाहुल्यं न लिङ्गं रजसः क्वचित् । न हि विष्णोश्चलेत् तेषां मनः कर्मकृतावपि ।\nअन्येषां चलचित्तत्वात् प्रायः स्यात् कर्म राजसम् ।\nयदि तत् स्मारकं विष्णोर्विद्यात् सात्त्विकमेव तत् ।\nधर्मार्थहिंसनाग्निश्च विशेषो ब्रह्मचारिण; ।\nपैतृकं चापि यतितो दारास्तु गृहिणस्ततः ।\nअसर्गो (असङ्गो) ग्राम्यसन्त्यागः पश्वहिंसा गृहस्थतः ।\nवनस्थस्य विशेषोयं सर्वेषामितरत् समम्'' ॥ इति च ।\n'सात्त्विकाः स्वल्परजसः क्षत्रियाः सत्त्वराजसाः ।\nवैश्याः शूद्रा अतिस्वल्पसत्त्वाधिक्येन तामसाः ।\nये तु भागवता वर्णास्तेषां भेदोयमीरितः ।\nसत्त्वाधिकः पुल्कसोपि यस्तु भागवतः सदा ।\nत्रैविद्यमात्रा विष्णोर्ये सर्वाधिक्ये ससंशयाः ।\nअन्याधिक्यं न मन्यन्ते श्रीशाद् राजसराजसाः ।\nअज्ञा विष्णौ द्वेषहीनाः सर्वे राजसतामसाः ।\nपितृगन्धर्वपूर्वाश्च मुनयो देवता इति ।\nसात्त्विकास्त्रिविधास्तत्र श्रेष्ठा एवोत्तरोत्तराः ।\nदेवा इन्द्रो विरिञ्चाद्या इति त्रेधैव देवताः ।\nक्रमोत्तराः शिवो वाणी ब्रह्मा चैवोत्तरोत्तराः ।\nसत्त्वसत्त्वमहासत्त्वसूक्ष्मसत्त्वश्चतुर्मुखः ।\nतस्माद् यावद् विमुक्तिः स्यान्मुक्तावेवं सुखक्रमः'' ॥ इति च ।\nविष्णौ किञ्चिदप्रीतियुक्तास्तामसमध्ये सात्त्विका नराधमा इत्यर्थः । राजसानां मध्ये सात्त्विका एव भागवतविप्रादयः ।\nराजसस्थसात्त्विकेष्वेव शुद्धसात्त्विकाः किञ्चिद्रजोयुक्तसात्त्विकाः समरजोयुक्तसात्त्विकाः सत्त्वात् किञ्चिदूनतमोयुक्तसात्त्विका इति वर्णभेदः । सत्त्वप्रधानत्वादेव तानारभ्योत्तरोत्तरं सर्वेपि मोक्षयोग्याः । 'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्'' इत्यादेः ।\n'सत्त्वाधिको मोक्षयोग्यो योग्योन्धतमसस्तथा ।\nतम उत्तरो रजो भूयान् समो वा सृतिपात्रकः'' ॥ इति च ॥ ४०,४१ ॥" | | "lines": [ |
| | "सत्त्वं जीवजातम् । मुक्तानां गुणातीतत्वात् 'पृथिव्यां दिवि देवेषु वा'' इति विशेषः ।", |
| | "'यथेष्टं सञ्चरन्तोपि मुक्ता भूम्यादिगा न तु ।", |
| | "ग्रामस्था अपि न ग्राम्या वैलक्षण्यादि्ध सज्जनाः ।", |
| | "नराधमास्तामसेषु सात्त्विकास्तत्र राजसाः ।", |
| | "दैत्यभृत्या महादैत्या मुख्यतामसतामसाः ।", |
| | "राजसास्तु नरास्तत्र विप्रा राजससात्त्विकाः ।", |
| | "तत्रस्थशुद्धसत्त्वास्तु परहंसाः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "हंसो बहूदः कुटिको वनस्थो नैष्ठिको गृही ।", |
| | "क्रमाद् रजोधिका बाह्यं कर्मैषामधिकं यतः ।", |
| | "धर्माः परमहंसानां ब्राह्मा एव शमादिकाः ।", |
| | "देवादेः कर्मबाहुल्यं न लिङ्गं रजसः क्वचित् । न हि विष्णोश्चलेत् तेषां मनः कर्मकृतावपि ।", |
| | "अन्येषां चलचित्तत्वात् प्रायः स्यात् कर्म राजसम् ।", |
| | "यदि तत् स्मारकं विष्णोर्विद्यात् सात्त्विकमेव तत् ।", |
| | "धर्मार्थहिंसनाग्निश्च विशेषो ब्रह्मचारिण; ।", |
| | "पैतृकं चापि यतितो दारास्तु गृहिणस्ततः ।", |
| | "असर्गो (असङ्गो) ग्राम्यसन्त्यागः पश्वहिंसा गृहस्थतः ।", |
| | "वनस्थस्य विशेषोयं सर्वेषामितरत् समम्'' ॥ इति च ।", |
| | "'सात्त्विकाः स्वल्परजसः क्षत्रियाः सत्त्वराजसाः ।", |
| | "वैश्याः शूद्रा अतिस्वल्पसत्त्वाधिक्येन तामसाः ।", |
| | "ये तु भागवता वर्णास्तेषां भेदोयमीरितः ।", |
| | "सत्त्वाधिकः पुल्कसोपि यस्तु भागवतः सदा ।", |
| | "त्रैविद्यमात्रा विष्णोर्ये सर्वाधिक्ये ससंशयाः ।", |
| | "अन्याधिक्यं न मन्यन्ते श्रीशाद् राजसराजसाः ।", |
| | "अज्ञा विष्णौ द्वेषहीनाः सर्वे राजसतामसाः ।", |
| | "पितृगन्धर्वपूर्वाश्च मुनयो देवता इति ।", |
| | "सात्त्विकास्त्रिविधास्तत्र श्रेष्ठा एवोत्तरोत्तराः ।", |
| | "देवा इन्द्रो विरिञ्चाद्या इति त्रेधैव देवताः ।", |
| | "क्रमोत्तराः शिवो वाणी ब्रह्मा चैवोत्तरोत्तराः ।", |
| | "सत्त्वसत्त्वमहासत्त्वसूक्ष्मसत्त्वश्चतुर्मुखः ।", |
| | "तस्माद् यावद् विमुक्तिः स्यान्मुक्तावेवं सुखक्रमः'' ॥ इति च ।", |
| | "विष्णौ किञ्चिदप्रीतियुक्तास्तामसमध्ये सात्त्विका नराधमा इत्यर्थः । राजसानां मध्ये सात्त्विका एव भागवतविप्रादयः ।", |
| | "राजसस्थसात्त्विकेष्वेव शुद्धसात्त्विकाः किञ्चिद्रजोयुक्तसात्त्विकाः समरजोयुक्तसात्त्विकाः सत्त्वात् किञ्चिदूनतमोयुक्तसात्त्विका इति वर्णभेदः । सत्त्वप्रधानत्वादेव तानारभ्योत्तरोत्तरं सर्वेपि मोक्षयोग्याः । 'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्'' इत्यादेः ।", |
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| "text": "शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।\nज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥४२ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "'शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।\nज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म (विप्रकर्म) स्वभावजम् ।\nएते गुणाः किञ्चिदूना विप्रात् क्षत्रिय एव च ।\nअधिका वा ब्राह्मणेभ्यः केषुचिच्चक्रवर्तिषु ।\nऋषयस्त्वेव विज्ञेयाः कार्तवीर्यादयो नृपाः ॥४२ ॥" | | "lines": [ |
| | "'शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।", |
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| "text": "विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।\nध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥" | | "lines": [ |
| | "विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vakshya-id\"\u003Eवक्ष्यमाणप्रकारेण वर्तमानस्तदनन्तरं नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मा-ख्यायाः महालक्ष्म्याः सकाशं यथाप्नोति तथा निबोध । 'मम योनिर्महद् ब्रह्म'' 'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्'' इत्युक्तत्वात् । 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'' इत्युक्त्वा 'मद्भक्तिं लभते पराम्''\u003C/span\u003E\nइति वक्ष्यमाणत्वाच्च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavaraha-id\"\u003E'सर्वपापक्षयाद् देहं त्यक्त्वा देवान् क्रमाद् व्रजन् ।\u003Cbr/\u003Eप्राप्य लक्ष्मीं तत्प्रसादात् पुनः स्वृद्धा हरौ यदा ।\u003Cbr/\u003Eभक्तिस्तया पुनर्ज्ञाने स्वृद्धे विष्णुं प्रपद्यते ।\u003Cbr/\u003Eअपरोक्षदृशो विष्णोः शरीरेपि सतः पुरा ।\u003Cbr/\u003Eत्यक्तदेहादिकस्यापि यावद् विष्णुं प्रपद्यते ।\u003Cbr/\u003Eतावद् गुणा विवर्धन्ते स्थिताः स्युः प्राप्य केशवम्'' ॥\u003C/span\u003E\nइति महावराहे॥ ५०-५२ ॥" | | "lines": [ |
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| | "अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।", |
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| | "'विमुच्य निर्ममः शान्तः'' नैष्कर्म्यसिदि्धं प्राप्तो भूत्वा ब्रह्मणि भूयाय भवतीत्यर्थः ॥ ५३ ॥" |
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| | "भक्त्या मां अभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।", |
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| | "सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।", |
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| "text": "विहितानि सर्वकर्माण्यपि मद्व्यपाश्रयो भूत्वा सदा कुर्वाणः । न हि यथेष्टाचरणे तात्पर्यमत्र । तथा सति विहिताकरणेपि समत्वात् 'मामनुस्मर युद्ध्य च'' 'ततः स्वधर्मं किर्तिं च'' इत्यादिप्रस्तुतविरोधः । अपिशब्दस्त्वेकमपि कर्मातदाश्रयेण न कार्यमित्यर्थे ॥ ५६ ॥" | | "lines": [ |
| | "विहितानि सर्वकर्माण्यपि मद्व्यपाश्रयो भूत्वा सदा कुर्वाणः । न हि यथेष्टाचरणे तात्पर्यमत्र । तथा सति विहिताकरणेपि समत्वात् 'मामनुस्मर युद्ध्य च'' 'ततः स्वधर्मं किर्तिं च'' इत्यादिप्रस्तुतविरोधः । अपिशब्दस्त्वेकमपि कर्मातदाश्रयेण न कार्यमित्यर्थे ॥ ५६ ॥" |
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| | "चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।", |
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| "text": "भगवत्संश्रितस्य त्रैविद्यस्य च चेतसैव विशेष इत्याहचेतसा सर्व-कर्माणीति । स एव सर्वस्मात् परम इति भावोस्येति तत्परः । तत्र चित्तवृत्तिनिरोधोपि यो बुदि्धयोगः प्रत्याहारादिः ॥ ५७ ॥" | | "lines": [ |
| | "भगवत्संश्रितस्य त्रैविद्यस्य च चेतसैव विशेष इत्याहचेतसा सर्व-कर्माणीति । स एव सर्वस्मात् परम इति भावोस्येति तत्परः । तत्र चित्तवृत्तिनिरोधोपि यो बुदि्धयोगः प्रत्याहारादिः ॥ ५७ ॥" |
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| "text": "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।\nअथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥" | | "lines": [ |
| | "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।", |
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| | "यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।", |
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| "text": "स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।\nकर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत्॥६० ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।", |
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| "text": "प्रकृतिरीश्वरेच्छा । 'प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छानन्त कथ्यते'' इत्यादि-वचनात् । एषा तु 'प्रकृत्यैव च कर्माणि'' इत्यादिष्वपि युज्यते । तस्या एव हि मुख्यतो नियोक्तृत्वं स्वभावकर्मादिभिर्बद्ध्वा ॥ ५९,६० ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रकृतिरीश्वरेच्छा । 'प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छानन्त कथ्यते'' इत्यादि-वचनात् । एषा तु 'प्रकृत्यैव च कर्माणि'' इत्यादिष्वपि युज्यते । तस्या एव हि मुख्यतो नियोक्तृत्वं स्वभावकर्मादिभिर्बद्ध्वा ॥ ५९,६० ॥" |
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| "text": "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।\nभ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥" | | "lines": [ |
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| | "तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003Eतदेवाह ईश्वरः सर्वभूतानामिति ।\u003Cbr/\u003E'निश्चितार्थः स तु ज्ञेयो यत्रात्मैव परोक्षतः ।\u003Cbr/\u003Eउच्यते विष्णुना यद्वत् तद् ब्रह्मेत्यादि कथ्यते'' ॥\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n'मन्मनाः'' इत्युपसंहाराच्च ॥६१ ॥ शाश्वतं स्थानं वैकुण्ठादि- 'श्रीरेव लोकरूपेण विष्णोस्तिष्ठति सर्वदा ।\nअतो हि वैष्णवा लोका नित्यास्ते चेतना अपि'' ॥ इत्याग्नेये ।\n'न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च'' इत्याद्युक्तं च ॥६२ ॥ तत्त्वसारकथनं 'द्वाविमौ पुरुषौ'' इत्यत्रैवोपसंहृतम् । तत्त्वप्रशंसार्थमेव तद्बुदि्धप्रशंसा कृता । अत्र तु साधनसारोपसंहारः सर्वगुह्यतममिति । 'मन्मनाः'' इत्यादेः पूर्वमेवोक्तत्वात् भूय इति । अर्थतस्त्वत्रापि विष्ण्वाधिक्यमेवोक्तं भवति ॥ ६४,६५ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।\nअहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।", |
| | "अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id\"\u003Eअन्यसर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्तशेषत्वेनैव सर्वधर्मानिति वचनम् । 'मामेकं शरणं व्रज'' इत्यपि 'मन्मना'' इत्याद्युक्तनिगमनात्मना तद्व्याख्यानम् ।\u003Cbr/\u003E'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वं तत्र मनः सदा ।\u003Cbr/\u003Eसर्वाधिकप्रेमयुक्तं सर्वस्यात्र समर्पणम् ।\u003Cbr/\u003Eअखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः ।\u003Cbr/\u003Eरक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोहमिति स्मृऽतिः ।\u003Cbr/\u003Eशरणागतिरेषा स्याद् विष्णौ मोक्षफलप्रदा'' ।\u003C/span\u003E\nइति महाविष्णुपुराणे ।\nअनादिजन्मकृतसर्वपापेभ्यः । अत्र प्राप्त्यभावात् । धर्मपरित्यागे पापपरित्यागस्य कैमुत्येनैव सिद्धत्वात् ॥६६ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahavishnu-id\"\u003Eअन्यसर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्तशेषत्वेनैव सर्वधर्मानिति वचनम् । 'मामेकं शरणं व्रज'' इत्यपि 'मन्मना'' इत्याद्युक्तनिगमनात्मना तद्व्याख्यानम् ।\u003Cbr/\u003E'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वं तत्र मनः सदा ।\u003Cbr/\u003Eसर्वाधिकप्रेमयुक्तं सर्वस्यात्र समर्पणम् ।\u003Cbr/\u003Eअखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः ।\u003Cbr/\u003Eरक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोहमिति स्मृऽतिः ।\u003Cbr/\u003Eशरणागतिरेषा स्याद् विष्णौ मोक्षफलप्रदा'' ।\u003C/span\u003E", |
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| | "इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Sbhbdanirnaya-id\"\u003Eअतपस्कायैव न वाच्यम् । अशुश्रूषवे पुनश्चेति दोषाधिक्यमशुश्रूषोर्दर्शयितुं चशब्दः । एवमभक्ताय कदापि न वाच्यम् । कदाचिदल्पतपसोल्पशुश्रूषोरपि भक्त्याधिक्ये वाच्यं भवतीति कदाचनेति विशेषः । अभक्ताच्च न वाच्यमसूयोरिति तत्रापि चशब्दः ।\u003Cbr/\u003E'समुच्चये तथाधिक्ये न्यूनत्वे चः प्रयुज्यते'' ।\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E'अभक्तादपि पापः स्यादसूयुर्दोषदृग् यतः''\u003C/span\u003E\nइति च पाद्मे ॥६७ ॥" | | "lines": [ |
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| | "य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।", |
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| "text": "न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।\nभविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥" | | "lines": [ |
| | "न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।", |
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| | "अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।", |
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| "text": "श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।\nसोपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।\n॥७१ ॥" | | "lines": [ |
| | "श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।", |
| | "सोपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।", |
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| | "कच्चिदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।", |
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| | "नष्टो मोहः स्मृऽतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।", |
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| | "व्यासप्रसादात् श्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।", |
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| "text": "यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।\nतत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "'सोपि मुक्तः'' 'न च तस्मान्मनुष्येषु'' इत्युक्तेश्च मुक्तानां महत् तारतम्यं ज्ञायते । 'मनुष्येषु'' इति विशेषणात् तत्रापि देवानामाधिक्यं च ।\n'मुक्तिर्ज्ञात्वापि विष्णुं स्याच्छास्त्रं श्रुत्वा ततोधिकम् ।\nमुक्तौ सुखं तत्पठतस्ततोप्यधिकमिष्यते ।\nव्याख्यातुस्तु समं मुक्तौ सुखं नान्यस्य कस्यचित् ।\nततोधिकं तु देवानां मुख्यव्याख्याकृतो यतः'' ॥ इति ॥ ६८-७२ ॥ 'यथेच्छसि तथा कुरु'' इत्याक्षेपपरिहाराय 'करिष्ये वचनं तव'' इत्यनुसरति भगवन्तम् ॥ ७३-७८ ॥ नमस्ते वासुदेवाय प्रेयसां मे प्रियोत्तम ।\nसमस्तगुणसम्पूर्णनिर्दोषानन्ददायिने ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।\nवायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेव हि कृतो ग्रन्थोमुना केशवे ॥ निःशेषदोषरहित कल्पाणाखिलसद्गुण ।\nभूतिस्वयम्भुशर्वादिवन्द्यं त्वां नौमि मे प्रियम् ॥" | | "lines": [ |
| | "'सोपि मुक्तः'' 'न च तस्मान्मनुष्येषु'' इत्युक्तेश्च मुक्तानां महत् तारतम्यं ज्ञायते । 'मनुष्येषु'' इति विशेषणात् तत्रापि देवानामाधिक्यं च ।", |
| | "'मुक्तिर्ज्ञात्वापि विष्णुं स्याच्छास्त्रं श्रुत्वा ततोधिकम् ।", |
| | "मुक्तौ सुखं तत्पठतस्ततोप्यधिकमिष्यते ।", |
| | "व्याख्यातुस्तु समं मुक्तौ सुखं नान्यस्य कस्यचित् ।", |
| | "ततोधिकं तु देवानां मुख्यव्याख्याकृतो यतः'' ॥ इति ॥ ६८-७२ ॥ 'यथेच्छसि तथा कुरु'' इत्याक्षेपपरिहाराय 'करिष्ये वचनं तव'' इत्यनुसरति भगवन्तम् ॥ ७३-७८ ॥ नमस्ते वासुदेवाय प्रेयसां मे प्रियोत्तम ।", |
| | "समस्तगुणसम्पूर्णनिर्दोषानन्ददायिने ॥ यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।", |
| | "वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेव हि कृतो ग्रन्थोमुना केशवे ॥ निःशेषदोषरहित कल्पाणाखिलसद्गुण ।", |
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