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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमिति प्रतिज्ञातं निरूपयितुमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eवादो जल्पो वितण्डेति ॥\u003C/span\u003E वादादीनां लक्षणं निरूपयति– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतत्वनिर्णयमित्यादिना ॥\u003C/span\u003E केवलं तत्वनिर्णयं गुरुशिष्ययोरन्येषां वा सतां परस्परं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण समिता मनोहरा कथाऽसौ वाद इत्युच्यते । सत्सिद्धान्तं उत्सादयितुं यत्रासतः स्वपक्षसाधनं कुर्युस्तत्रासत्सु तत्वस्याकथनीयत्वात् स्वपक्षसाधनमकृत्वा सन्तस्तत्पक्षदूषणमेव कुर्युः , सेयं स्वपक्षस्थापनरहिता परपक्षदूषणरूपा कथा वितण्डेत्यर्थः । वादे तु प्रतिवादिना सहैव तत्वं निर्णेतव्यमिति नियमो नास्ति ॥ 1-3॥" | | "lines": [ |
| | "प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमिति प्रतिज्ञातं निरूपयितुमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eवादो जल्पो वितण्डेति ॥\u003C/span\u003E वादादीनां लक्षणं निरूपयति– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतत्वनिर्णयमित्यादिना ॥\u003C/span\u003E केवलं तत्वनिर्णयं गुरुशिष्ययोरन्येषां वा सतां परस्परं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण समिता मनोहरा कथाऽसौ वाद इत्युच्यते । सत्सिद्धान्तं उत्सादयितुं यत्रासतः स्वपक्षसाधनं कुर्युस्तत्रासत्सु तत्वस्याकथनीयत्वात् स्वपक्षसाधनमकृत्वा सन्तस्तत्पक्षदूषणमेव कुर्युः , सेयं स्वपक्षस्थापनरहिता परपक्षदूषणरूपा कथा वितण्डेत्यर्थः । वादे तु प्रतिवादिना सहैव तत्वं निर्णेतव्यमिति नियमो नास्ति ॥ 1-3॥" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "प्रतिवाद्यसामर्थ्ये प्राश्निकैः सहापि निर्णेतुं शक्यत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वयं वेति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "प्रतिवाद्यसामर्थ्ये प्राश्निकैः सहापि निर्णेतुं शक्यत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वयं वेति ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "प्राश्निकलक्षणमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eरागद्वेषविहीना इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E विषमसङ्ख्याका विषमा उच्यन्ते । सद्गुणानां समीचीनगुणवतां सर्वेषां चेतनानां विष्णुभक्तिरेव स्वलक्षणमव्यभिचरितलक्षणम् । विष्णुभक्त्यभावे सज्जना एव न सम्भवन्ति । अतो विष्णुभक्तिपरा एव प्राश्निका भाव्या इत्यर्थः ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राश्निकलक्षणमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eरागद्वेषविहीना इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E विषमसङ्ख्याका विषमा उच्यन्ते । सद्गुणानां समीचीनगुणवतां सर्वेषां चेतनानां विष्णुभक्तिरेव स्वलक्षणमव्यभिचरितलक्षणम् । विष्णुभक्त्यभावे सज्जना एव न सम्भवन्ति । अतो विष्णुभक्तिपरा एव प्राश्निका भाव्या इत्यर्थः ॥" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "चिन्तयेत्तत्वनिर्णयम् इत्युक्तम् । तच्चिन्ताप्रकारमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपृष्टेनेत्यादिना ॥\u003C/span\u003E प्रतिवादिना पृष्टेन वादिनेत्यर्थः । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ इति श्रुतेः परतत्वसिद्ध्यर्थमादावागम एव प्रयोक्तव्यः । गमानुगृहीतानुमानस्य प्रबलत्वेन प्रत्यनुमानासम्भवात् । आगमानन्तरमनुमानमपि प्रयोक्तुं शक्यते । प्रयुक्तस्यान्यार्थ एव प्रतिवादिना वक्तव्यः । न प्रत्यनुमानम् दुर्बलत्वादित्यर्थः ।" | | "lines": [ |
| | "चिन्तयेत्तत्वनिर्णयम् इत्युक्तम् । तच्चिन्ताप्रकारमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपृष्टेनेत्यादिना ॥\u003C/span\u003E प्रतिवादिना पृष्टेन वादिनेत्यर्थः । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ इति श्रुतेः परतत्वसिद्ध्यर्थमादावागम एव प्रयोक्तव्यः । गमानुगृहीतानुमानस्य प्रबलत्वेन प्रत्यनुमानासम्भवात् । आगमानन्तरमनुमानमपि प्रयोक्तुं शक्यते । प्रयुक्तस्यान्यार्थ एव प्रतिवादिना वक्तव्यः । न प्रत्यनुमानम् दुर्बलत्वादित्यर्थः ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "आगमशब्दार्थमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eऋग्यजुः इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "आगमशब्दार्थमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eऋग्यजुः इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "वादिप्रयुक्तागमस्य योऽन्यार्थः उक्तः तस्मिन्नागमोऽन्यो वक्तव्यः प्रतिवादिना । प्रतिवाद्युक्तागमस्यान्यार्थतां वादिनां स्वपक्षसिद्ध्यर्थं साधयित्वा स्वागमस्यान्यार्थता निश्चयेन निराकार्या उपपत्तिबलात् । एवमुपक्रमोपसंहारादिभिः स्वागमं निर्णीय तथैव परप्रयुक्तागमोऽपि यदा निर्णीयते स्वपक्षानुसारेण तदा निश्शेषनिर्णयो भवतीत्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वपक्ष इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "वादिप्रयुक्तागमस्य योऽन्यार्थः उक्तः तस्मिन्नागमोऽन्यो वक्तव्यः प्रतिवादिना । प्रतिवाद्युक्तागमस्यान्यार्थतां वादिनां स्वपक्षसिद्ध्यर्थं साधयित्वा स्वागमस्यान्यार्थता निश्चयेन निराकार्या उपपत्तिबलात् । एवमुपक्रमोपसंहारादिभिः स्वागमं निर्णीय तथैव परप्रयुक्तागमोऽपि यदा निर्णीयते स्वपक्षानुसारेण तदा निश्शेषनिर्णयो भवतीत्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वपक्ष इत्यादिना ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "एवमागमैकवेद्यत्वचिन्तां निर्वर्त्य प्रत्यक्षादिसिद्धार्थनिर्णयचिन्तां निर्वर्तयति–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रत्यक्षसिद्धेष्विति ॥\u003C/span\u003E घटादिसद्भावप्रत्यक्षेण प्रतिपादयेत् । सुखदुः खादिसद्भावमनुभवेन प्रतिपादयेत् । तद्दार्ढ्यायानन्तरमनुमानादिकमपि प्रयुञ्ज्यात् प्रतिवादिनं प्रतिवादीत्यर्थः ।" | | "lines": [ |
| | "एवमागमैकवेद्यत्वचिन्तां निर्वर्त्य प्रत्यक्षादिसिद्धार्थनिर्णयचिन्तां निर्वर्तयति–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रत्यक्षसिद्धेष्विति ॥\u003C/span\u003E घटादिसद्भावप्रत्यक्षेण प्रतिपादयेत् । सुखदुः खादिसद्भावमनुभवेन प्रतिपादयेत् । तद्दार्ढ्यायानन्तरमनुमानादिकमपि प्रयुञ्ज्यात् प्रतिवादिनं प्रतिवादीत्यर्थः ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "तत्वविषये यदागमवाक्यं वादी वा प्रतिवादी वा वदेत् तत्सतां तुष्टिकरमेव तावुभौ वदेतामित्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरतुष्टिकरमिति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "तत्वविषये यदागमवाक्यं वादी वा प्रतिवादी वा वदेत् तत्सतां तुष्टिकरमेव तावुभौ वदेतामित्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरतुष्टिकरमिति ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "एवंविधवादकथायां एक एव वादी एक एव प्रतिवादीत्यपि नियमो नास्ति । बहवो वादिनो बहवः प्रतिवादिनो बहुतराश्च प्राश्निकाः सभ्यादयश्चिरकालं वा तत्वनिर्णयपर्यन्तं प्रयतेरन् । तत्वनिर्णयावसानत्वाद्वादस्य । जल्पस्तु वादिप्रतिवादिपक्षिणोरन्यतरपराजयमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएवं निर्णयपर्यन्तमिति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "एवंविधवादकथायां एक एव वादी एक एव प्रतिवादीत्यपि नियमो नास्ति । बहवो वादिनो बहवः प्रतिवादिनो बहुतराश्च प्राश्निकाः सभ्यादयश्चिरकालं वा तत्वनिर्णयपर्यन्तं प्रयतेरन् । तत्वनिर्णयावसानत्वाद्वादस्य । जल्पस्तु वादिप्रतिवादिपक्षिणोरन्यतरपराजयमाह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएवं निर्णयपर्यन्तमिति ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "तत्वनिर्णयानुपयुक्ताग्रहेण वादे साक्षात्प्रतिपक्षिपराजयः न तु न्यूनोक्त्यधिकोक्त्यादिदूषणेन । तत्र सभ्यैः प्रतिपक्षी पराजित इत्युक्ते यद्यसौ संवादं करोति तर्हि श्लाघ्यो भवेत् । न दण्ड्यः । संवादाकरणे निन्द्यो वा यथायोग्यं दण्ड्यो वा भवेत् । तदेतदाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतत्वनिर्णयवैलोम्यमित्यादिना ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "तत्वनिर्णयानुपयुक्ताग्रहेण वादे साक्षात्प्रतिपक्षिपराजयः न तु न्यूनोक्त्यधिकोक्त्यादिदूषणेन । तत्र सभ्यैः प्रतिपक्षी पराजित इत्युक्ते यद्यसौ संवादं करोति तर्हि श्लाघ्यो भवेत् । न दण्ड्यः । संवादाकरणे निन्द्यो वा यथायोग्यं दण्ड्यो वा भवेत् । तदेतदाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतत्वनिर्णयवैलोम्यमित्यादिना ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति प्राश्निकैरनुवादः कर्तव्य इति वादजल्पयोः नियमो नास्ति । अननुवादेऽपि दूषणाभावात् । अनुवादाभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्या मेव जल्पकथायाः कर्तुं शक्यत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअनुवादेति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति प्राश्निकैरनुवादः कर्तव्य इति वादजल्पयोः नियमो नास्ति । अननुवादेऽपि दूषणाभावात् । अनुवादाभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्या मेव जल्पकथायाः कर्तुं शक्यत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअनुवादेति ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "विरोधासङ्गतिन्यूनोक्त्यादिदूषणमिव विद्याहीनत्वलिङ्गमपि वादिनः प्रतिवादिपराजयनिमित्तं भवति । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिच्छेदः । न हि हीनविद्यस्याधिकविद्येन जल्पो वा वितण्डा वा युज्यते । समानविद्ययोरेव तदर्हत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविद्याहीनत्वलिङ्गेऽपीति ॥\u003C/span\u003E यत्पराजयनिमित्तनिग्रहस्थानं तद्विरोधासङ्गतिन्यूनाधिकसंवादानुक्त्याख्यषट्कमेव । साध्याविशिष्टत्वादिनिग्रहस्थानानां विरोधादिषु अन्तर्भावादनन्तर्भूतनिग्रहस्थानाभावादित्याह–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतदभावादिति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "विरोधासङ्गतिन्यूनोक्त्यादिदूषणमिव विद्याहीनत्वलिङ्गमपि वादिनः प्रतिवादिपराजयनिमित्तं भवति । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिच्छेदः । न हि हीनविद्यस्याधिकविद्येन जल्पो वा वितण्डा वा युज्यते । समानविद्ययोरेव तदर्हत्वादित्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविद्याहीनत्वलिङ्गेऽपीति ॥\u003C/span\u003E यत्पराजयनिमित्तनिग्रहस्थानं तद्विरोधासङ्गतिन्यूनाधिकसंवादानुक्त्याख्यषट्कमेव । साध्याविशिष्टत्वादिनिग्रहस्थानानां विरोधादिषु अन्तर्भावादनन्तर्भूतनिग्रहस्थानाभावादित्याह–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतदभावादिति ॥\u003C/span\u003E" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "यद्विद्याहीनत्वं तद्वादिप्रतिवादिविद्यापरीक्षाकाले प्राश्निकैरेव मन्तव्यम् । न तु वादिना प्रतिवादिना वा उद्भाव्यम् । अतो न तन्निगृहस्थानान्तरमित्याशयवानाह–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोरिति ॥\u003C/span\u003E यद्यप्यत्र जल्पवितण्डयोः न्यूनोक्त्याधिकोक्त्यादिदूषणं पराजयनिमित्तमुक्तं तदौत्सर्गिकं ज्ञातव्यम् ।" | | "lines": [ |
| | "यद्विद्याहीनत्वं तद्वादिप्रतिवादिविद्यापरीक्षाकाले प्राश्निकैरेव मन्तव्यम् । न तु वादिना प्रतिवादिना वा उद्भाव्यम् । अतो न तन्निगृहस्थानान्तरमित्याशयवानाह–\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोरिति ॥\u003C/span\u003E यद्यप्यत्र जल्पवितण्डयोः न्यूनोक्त्याधिकोक्त्यादिदूषणं पराजयनिमित्तमुक्तं तदौत्सर्गिकं ज्ञातव्यम् ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "क्वचिदपवादोऽस्तीत्याह– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजय इति ॥\u003C/span\u003E न्यूनोक्त्यनन्तरमेवाधिकोक्तौ न न्यूनोक्त्यादिना पराजयो भवतीत्यर्थः । एवं जल्पवितण्डालक्षणं शोधितमित्युपसंहरति– \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eवादजल्पवितण्डानामिति ॥\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "वादजल्पवितण्डाभिः भगवत्प्रतिपक्षनिरासाद्भगवत्पक्षस्थापनात् कथालक्षणकथनेन भगवत्प्रीतिः भवतीत्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआनन्दतीर्थमुनिनेति ॥\u003C/span\u003E\n॥ इति श्रीपद्मनाभतीर्थभट्टारकविरचिता श्रीकथालक्षणटीका समाप्ता ॥" | | "lines": [ |
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