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| "slug": "Pramaanalakshana-tika", | | "slug": "Pramaanalakshana-tika", |
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| "text": "प्रणम्यागण्यकल्याणगुणाब्धिं पुरुषोत्तमम् ।",
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| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णबोधानपि गुरून् व्याकुर्वे मानलक्षणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इह खलु ‘सुखमेव मे स्यात् दुःखं मनागपि मा भूत्’ इति निखिलापेक्षित मोक्षस्येश्वरसाक्षात्कारमन्तरेणासम्भवात्, तस्य च प्रमाणानि विनानुदयात्, प्रमाणानां च यथावद्विदितानामेव तद्धेतुत्वोपपत्तेस्तत्स्वरूपं यथावज्ज्ञापयितुकामो भगवानाचार्यवर्यः प्रारिप्सितग्रन्थाविघ्नपरिसमाप्त्यादिप्रयोजनाविगीतशिष्टाचारपरम्परादि प्राप्तेष्टदेवतानतिपूर्वकं श्रोतृशेमुषीमनुकूलयिष्यन् वक्ष्यमाणमेवाग्रे दर्शयति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नारायणस्यैव नमस्कारे को हेतुरित्यत उक्तम् अशेषगुरुमिति ॥ सर्वज्ञं गुरुमिति पाठे सार्वज्ञ्यं गुरूत्वस्योपपादकम् । किं च नारायणस्यैव अतिसमर्थत्वेनेष्ट प्रदानसम्भवात् तन्नतिरिति भावेनोक्तम् ",
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| "attrs": {
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| "text": " ईशेशमिति ॥",
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| "tail": " अपि च रागादिदोषरहिता हि लोके वन्द्या भवन्ति । नारायणश्चाशेषदोषदूर इति सूचयितुं अनामयमिति ॥ आमयपदं दोषान्तरोपलक्षणम् । प्रवक्ष्यामीति उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगिसङ्ग्रहायोपसर्गः । न हि तद्विना प्रकृष्टा लक्षणोक्तिः स्यात् । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "लक्ष्यमात्रव्यापको धर्मो लक्षणम् । तदुक्तिः शब्दव्यवहारार्था । सास्नादिमान् गौ इति ज्ञातलक्षणो हि यं पिण्डं सास्नादिमन्तं पश्यति तं गोशब्दवाच्यं प्रत्येति । यदा तु अयं गौरित्युपदेशादिना व्युत्पत्तिः तदापि व्यक्तिविशेष एव न सर्वत्र । तत्रोपदेशाद्यभावात् । अतस्तत्र व्यक्तिविशेषे व्युत्पन्नः तदन्यत्रापि व्युत्पित्सुः तद्धर्मेषु व्यवहारानालोच्य, व्यभिचारिणोऽव्यापकांश्च परिहृत्य, लक्षणभूतमेकं गृहीत्वा, तद्वत्सु गोशब्दसम्बन्धं गृह्णाति । प्राचीनपक्षे केवलव्यतिरेकिणा, अत्र अन्वयव्यतिरेकिणेति विशेषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्तनमुद्देशः । स च लक्षणाद्युक्तिसम्भावनार्थः । अनुद्दिश्य कस्य लक्षणादि ब्रूयात् । विधा विभागः । तदुक्तिरवान्तरोद्देशार्था । युक्तायुक्तचिन्ता परीक्षा । सोद्देशविषया न सम्भवति । फलाभावेन नाममात्रे विवादायोगात् । लक्षणपरीक्षा तस्य लिङ्गत्वनिश्चयार्था । न ह्यसम्भवाव्याप्त्यादिलक्षण स्वरूपासिद्धिभागासिद्धिव्यभिचारापरिहारे लिङ्गता निश्चीयते । विभागपरीक्षा न्यूनाधिकसङ्ख्याव्यवच्छेदमुखेन विभागसमर्थनार्था । बुद्धिदोषनिवृत्तिपर्यन्ता परीक्षायाः परीक्षा तत्सौष्ठवसिद्ध्यर्था । द्विधा चोद्देशादयः सामान्यतो विशेषतश्चेति । प्रमाणलक्षणस्यान्यैरेवोक्तत्वात् किमपूर्वनिर्माणेनेत्यतो वा प्रवक्ष्यामीत्युक्तम् । अन्योक्तीनामप्रकृष्टतां वक्ष्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविधं लक्षणम्, यावल्लक्ष्यभावि अयावल्लक्ष्यभावि चेति । तत्राद्यं यथा, पृथुबुध्नोदराकारो घट इति । द्वितीयं यथा, भोगायतनं शरीरमिति । तत्राद्यमेव व्युत्पाद्यम् । तस्यैव सार्वत्रिकव्यवहारोपयोगित्वादिति भावेनोक्तम् स्वलक्षणमिति ॥ तदेव हि स्वरूपभूतं लक्षणं यत् यावल्लक्ष्यभावीति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "text": "\n ",
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| "text": " प्रमाणानामित्युद्देशे सिद्धे प्रमाणसामान्यलक्षणमाह ",
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "यथार्थं प्रमाणम्\t",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमाणमिति लक्ष्यनिर्देशः । यथार्थमिति लक्षणोक्तिः । एवमुत्तरत्रापि ज्ञातव्यम् । यथार्थं यथावस्थितार्थविषयीकारि । अर्थविषयीकारित्वमात्रस्य संशयविपर्ययसाधारण्याद्विशेषणोपादानम् । अर्थविषयीकारित्वेनैव प्रमेयादिव्युदासः । अर्यत इत्यर्थो ज्ञेयमुच्यते । अतो न गम्यविषयीकारिगतावतिव्याप्तिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "तद्विभागमाह ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "तद्विविधम् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमाणानामानन्त्येऽपि साक्षात्पारम्पर्येण याथार्थ्यज्ञापनार्थोऽयं विभागः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "एतदेव दर्शयन् द्वे विधे उद्दिशति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "केवलमनुप्रमाणं च \t",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "साक्षाद्यथावस्थितार्थविषयीकारि केवलम् । परम्परया तादृशमनुप्रमाणमिति ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "प्राधान्याभिप्रायेण प्रथममुद्दिष्टं केवलं लक्षयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "यथार्थज्ञानं केवलम् \t\t",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सञ्ज्ञानिरूक्त्यैव लक्षणसिद्धौ श्रृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं पृथगारम्भः । यथार्थेति संशयादिव्युदासः । अनवधारणज्ञानं संशयः । स द्विविधः । अनिर्दिष्टकोटिको निर्दिष्टकोटिकश्चेति । तत्र कोटीनामतिबाहुल्यादनिर्दिष्टकोटिरनध्यवसायापरनामा । यथा, ‘किसञ्ज्ञकोऽयं वृक्षः’ इति । द्वितीयोऽपि समानानेककोटिरन्यतरकोटिप्रधानश्चेति द्वेधा । तत्राद्यो यथा, ‘किमयं ब्राह्मणस्तदितरोवा, इति । ऊहापरनामा द्वितीयो यथा, ‘प्रायेणायं ब्राह्मण’ इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रत्येकं निश्चायकाभावसहकृतसमानासमानधर्मविप्रतिपत्युपलब्ध्यनुपलब्धिजन्मा पञ्चधा भिद्यत इति । तद्यथा, समानधर्मात् दीर्घत्वात् ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति । असमानधर्मात् आकाशविशेषगुणत्वात् ‘शब्दो नित्योऽनित्यो वा’ इति । विप्रतिपत्तेः ‘भौतिकानीन्द्रियाणि उत अभौतिकानि’ इति । उपलब्धेः ‘किं सदिदमुदकमुतासत्’ इति । अनुपलब्धेः ‘किमत्र यक्षोऽस्ति न वा’ इति । उपलब्ध्यनुपलब्ध्योः समानधर्म एवान्तर्भावात् त्रैविध्यमित्यपरे । समाने हि सदसतोरुपलब्धत्वानुपलब्धत्वे इति ।असमानधर्मविप्रतिपत्त्योरपि समानधर्म एवान्तर्भावयितुं शक्यत्वात् ऐकविध्यमिति तत्त्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विपरीतनिश्चयो विपर्ययः । यथा, शुक्तिकायामिदं रजतमिति । ज्ञानमित्यनुप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि स्वविषये केवलत्वान्नातिव्याप्तिः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अनुप्रमाणलक्षणमाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "तत्साधनमनुप्रमाणम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तदिति यथार्थज्ञानपरामर्शः । यथार्थेति संशयादिसाधनदुष्टेन्द्रिय सन्निकर्षादिव्युदासः । ज्ञानग्रहणमनुप्रमाणसाधननिवृत्त्यर्थम् । साधनमिति केवलप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि लिङ्ग्यादिविषयेऽनुप्रमाणत्वात् । हेतुरित्युच्यमाने प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् साधनग्रहणम् । सतोरपि कर्तृकर्मणोर्यदभावात् कार्याभावो यदनन्तरं चासति प्रतिबन्धे भवत्येव कार्यं तदुच्यते साधनमिति । यथा व्यापारवान् कुठारः । अत एव न यादृच्छिकसंवादिलिङ्गविभ्रमादावतिव्याप्तिः । यथार्थमित्येवोक्ते केवलेऽतिव्याप्तिः । ज्ञानमित्येवोक्ते तत्र संशयादौ च । प्रत्यक्षे अव्यप्तिश्च । साधनमित्येवोक्ते कुठारादौ । अतो विशिष्टग्रहणम् । प्रमावान् प्रमाता । प्रमाविषयः प्रमेयम् । यथार्थज्ञानं प्रमा । प्रमातुः प्रमेयत्वेऽपि विवक्षावशात् पृथगुक्तिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "केवलप्रमाणं विभजति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "केवलं चतुर्विधम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अयमपि महावैलक्षण्यज्ञापनार्थो विभागः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "चतस्त्रो विधाः प्राधान्यक्रमेणोद्दिशति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ईशलक्ष्मीयोग्ययोगिभेदेन \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ज्ञानिनामेवं भेदेन निमित्तेन ज्ञानस्यापि चातुर्विध्यम् । ज्ञानपदं वा संयोज्यम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अनुप्रमाणस्य केवलप्रमाणसाधनत्वेनोक्तत्वात् चतुर्विधमपीदं तज्जन्यं, तत एवानित्यं चेति न मन्तव्यमित्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "पूर्वद्वयमनादि नित्यम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ईशलक्ष्मीज्ञानम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "द्वयोरप्यनादिनित्यत्वे को विशेषः ? येन पृथग्ग्रहणमित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनादिनित्यत्वसाम्येऽपि स्वसत्तादौ स्वतन्त्रमीशज्ञानं, तदधीनं लक्ष्मीज्ञानमिति महाविशेषात्पृथग्ग्रहणमुपपद्यते । अनेन स्वतन्त्रज्ञानमाद्यं, ईशैकाधीनं द्वितीयमिति द्वयोर्लक्षणं सूचितं भवति । आद्ये स्वतन्त्रमिति लक्ष्म्यादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमितीशव्युदासः । द्वितीये ईशाधीनमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । एकेति ब्रह्मादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमिति लक्ष्मीव्यावृत्तिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तयोर्विशेषान्तरमाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "पूर्वं स्वपरगताखिलविशेषविषयम् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "लक्ष्मीज्ञानस्याप्यतिमहत्वेनैतत्सम्भवात् कथमीशज्ञानस्य विशेषः ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "द्वितीयमीशेऽन्येभ्योऽधिकम् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "लक्ष्मीज्ञानमीशविषये ब्रह्मादिज्ञानेभ्य एवाधिकविषयम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "किं चातः इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "असार्वत्रिकम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न त्वीशे सर्वविशेषविषयम् । अतस्तयोरस्ति विशेषः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "यथेशे असार्वत्रिकं तथा किमन्यत्रापि ? नेत्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अन्यत्र सर्वविषयम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " किमीशलक्ष्मीज्ञानयोरन्यत्र तर्हि साम्यमेव ? नेत्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्पष्टत्वे भेदः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्वयमपीशादन्यत्र सर्वविषयं स्पष्टं च । तत्रेशज्ञानं निरतिशयस्पष्टम् । न तथा लक्ष्मीज्ञानमित्यस्त्येव विशेषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अथ वा पूर्वमित्यनेन कार्त्स्न्येनेशविषयत्वं लक्षणान्तरमीशज्ञानस्य सूचितम् । तत्र कार्त्स्न्येनेति लक्ष्म्यादिज्ञानव्युदासः । कृत्स्नं जगद्विषयं लक्ष्मीज्ञानमपि भवतीतीशग्रहणम् । ईशेऽन्येभ्योऽधिकमसार्वत्रिकमिति लक्ष्मीज्ञानस्य लक्षणान्तरम् । ईशग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । असार्वत्रिकत्वासम्भवनिवृत्त्यर्थं च । अन्येभ्योऽधिकमिति ब्रह्मादिज्ञानव्युदासः । असार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिरासः । ईशेऽसार्वत्रिकमन्यत्र सर्वविषयमिति तल्लक्षणान्तरमीशादन्यत्रग्रहणं व्याघातपरिहारार्थम् । ईशेऽसार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । अन्यत्र सर्वविषयमित्यस्मदादिज्ञानव्युदासः । ऋजुज्ञानेऽतिव्याप्तिपरिहारायानालोचनेऽपीति ग्राह्यम् । तस्याऽलोचनेऽन्यत्र सर्वविषयत्वं वक्ष्यति । स्पष्टत्वं इत्यनेनापि निरतिशयस्पष्टं ईशज्ञानं, ईशज्ञानमेव यतोऽधिकस्पष्टं तत् लक्ष्मीज्ञानम् इत्यनयोर्लक्षणान्तरं सूचितं भवति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "योगप्रभावलब्धातिशयं योगिज्ञानम् । तत्त्रिविधम् ऋजुतात्विकअतात्विकयोगिज्ञानभेदेन ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तत्र पूर्ववदृजुज्ञानं नानुप्रमाणजन्यमनित्यं चेत्याह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "योगिज्ञानमृजूनामनादिनित्यम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "केषां योगिनां ? ऋजूनाम् इति योज्यम् । योगिज्ञान इति पाठे ज्ञानमिति शेषः । असार्वत्रिकत्वात् योगविभागः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तल्लक्षणमाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ईशे जीवेभ्योऽधिकम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ऋजुव्यतिरिक्तजीवज्ञानेभ्य एव । ईश इति स्वरूपकथनम् । जीवेभ्योऽधिकमित्यस्मदादिज्ञाननिरासः । अवधारणेनेशलक्ष्मीज्ञाननिवृत्तिः । लक्षणान्तरं चाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अन्यत्राऽलोचने सर्वविषयम् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अन्यत्र ईशादिति शेषः । अन्यत्र ग्रहणमसम्भवनिवृत्यर्थम् । आलोचन इतीशलक्ष्मीज्ञाननिरासः । सर्वग्रहणमस्मदादिज्ञाननिरासार्थम् । ऋजुज्ञानं यद्यनादिनित्यं तर्हि कथं तत् योगिज्ञानम् ? योगजं हि योगिज्ञानमित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "क्रमेण वर्धमानम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "योगप्रभावेन वृद्धिसद्भावात् योगिज्ञानत्वं युक्तम् । क्रमेण वर्धमानत्वे मुक्तावपि किं वर्धत इति ? नेत्याह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "आमुक्तेः\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आङ् मर्यादायाम् । अभिवृद्धनदीवत् पुनः किं ह्रासो भवति? नेत्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ततोऽव्ययम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
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| "text": "तात्विकातात्विकयोगिज्ञानलक्षणं युगपदाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ततोऽर्वाक् क्रमेण ह्रसितम् ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ऋजुभ्योऽन्येषां योगिनां ज्ञानं ईशादन्यत्र क्रमेण किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "नेदं लक्षणं युक्तमन्योन्यमृजुज्ञानाच्च अव्यावृत्तेः । इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "सादि च तात्विकेभ्योऽन्यत्र \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नैतावदेव लक्षणम् । किं तु ? तात्विकयोगिज्ञानमनादि अतात्विकयोगिज्ञानं सादीत्यपि गृह्यते । एतेन अनादित्वे सति ईशादन्यत्र आलोचनेऽपि ह्रसितं तात्विकयोगिज्ञानम्, सादित्वे सति ईशादन्यत्र किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तमतात्विकयोगिज्ञानमित्युभयोर्लक्षणं सूचितं भवति । तत्राद्येऽनादित्वेन अतात्विकयोगिज्ञाननिवृत्तिः । ईशादन्यत्रेति ईशविषये अनादित्वे सत्यालोचनेऽपि ह्रसितलक्ष्म्यादिज्ञाननिरासः । ऋजुज्ञाननिरासार्थमालोचनेऽपीति । ह्रसितमित्यनेनैव ईशज्ञानव्युदासः । द्वितीये सादित्वग्रहणमृजुतात्विकज्ञाननिवृत्त्यर्थम् । किञ्चिन्मात्रहासयुक्तमित्ययोगिज्ञाननिरासः । ईशादन्यत्रेति तत्सम्भवार्थम् । ह्रसितत्वादिग्रहणेनैवेशादिज्ञानेऽप्रसङ्गः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अयोगिज्ञानं किमीश्वराऽदिज्ञानवदनादिनित्यमेव सदिन्द्रियसन्निकर्षादिनाभिव्यज्यते उत सादि विनाशि चेति । तत्राह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अयोगिज्ञानमुत्पत्तिविनाशवत्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तस्य लक्षणमाह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अल्पम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ईशादन्यत्राल्पविषयम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सर्वं चोत्पत्तिमत् केवलं त्रिविधम् । प्रत्यक्षजमनुमानजमागमजमिति । प्रत्यक्षादीनामवान्तरभेदेन पुनर्भिद्यत इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "PRL_C01_B03",
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| "name": ""
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| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "अनुप्रमाणविभागमाह–",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अनुप्रमाणं त्रिविधम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तिस्त्रो विधा उद्दिशति । न्यूनाधिकसङ्ख््यान्यतमान्तर्भावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रत्यक्षमनुमानमागम इति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रायेणासन्नाव्यवहितवर्तमानकतिपयार्थग्राहकं प्रत्यक्षम्, अनासन्नातीतानागतव्यवहितार्थगोचरमनुमानम्, स्वातन्त्र्येण अशेषार्थविषय आगम इति अर्थग्रहणक्रमेणोद्देशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रत्यक्षमेकमेवेति चार्वाकः । तस्येष्टानिष्टसाधनज्ञानाभावाज्जीवनमेवानुपपन्नम् । न हि प्रत्यक्षं तज्ज्ञानोपायः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रत्यक्षानुमाने एवेति कणादः सौगताश्च । तेषां किमागमो न बोधकः । बोधकोऽपि वा न यथार्थः । यथार्थोऽपि वान्यत्र अन्तर्भूतः । पक्षत्रयमप्यनुभवविरुद्धमिति । अर्थं प्रति स्थितमक्षं प्रत्यक्षम् । प्रमाणान्तरानुसरणेनैव अर्थप्रमापकमनुमानम् । सम्यगतीन्द्रियार्थावगमक आगम इति सञ्ज्ञानिरुक्त्यैव लक्षणसिद्धौ प्रत्यक्षे तस्यैव स्फुटीकरणार्थं अनुमानादौ शृृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं च पुनर्लक्षणारम्भः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तत्र प्रत्यक्षलक्षणमाह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "निर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षः प्रत्यक्षम् \t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "निर्दोषत्वमर्थेन्द्रिययोर्विशेषणम् । अर्थग्रहणेनाकाशादीनां चक्षुरादिसन्निकर्षव्युदासः । अत्र तत्तदिन्द्रियविषयोऽर्थ उच्यते । तन्निर्दोषत्वग्रहणेन अतिसामीप्यादिदोषयुक्तार्थानामिन्द्रियसन्निकर्षनिरासः । इन्द्रियग्रहणेन अर्थानामेव अन्योन्यसन्निकर्षनिरासः । तन्निर्दोषत्वग्रहणं मनोऽनधिष्ठितत्वादिदोषवदिन्द्रियाणा मर्थसन्निकर्षव्यावृत्त्यर्थम् । सन्निकर्ष इतीन्द्रियादिमात्रव्युदासः । सर्वेण प्रमाणान्तरव्युदासः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
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| "text": "अनुमानलक्षणमाह– ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "निर्दोषोपपत्तिरनुमानम्\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उपपत्तिरिति लिङ्गमुच्यते । साहचर्यबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । निर्दोषग्रहणमनुमानाऽभासव्युदासार्थम् । व्याप्त्याद्यनुमानलक्षण रहितोऽनुमानवदवभासमानोऽनुमानाभासः । उपपत्तिग्रहणं प्रत्यक्षादिव्यावृत्त्यर्थम् । उपपत्तिश्च यथार्थतो ज्ञातैवार्थं बोधयति । अन्यथातिप्रसङ्गात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "त्रिविधमनुमानम् । केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि अन्वयव्यतिरेकीति केचित् । साध्यधर्मवान् धर्मी पक्षः । साध्यसमानधर्मवान् धर्मी सपक्षः । साध्यतत्समानधर्मरहितो धर्मी विपक्षः । साध्यत्वाकारमन्तरेण स एव धर्मः साध्यसमानधर्मः । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति अविद्यमानविपक्षं केवलान्वयि । तद् द्विविधम् । सपक्षव्यापकं तदेकदेशवृत्तीति । तद्यथा, धर्माधर्मौ कस्यचित् प्रत्यक्षौ प्रमेयत्वात्, गुणत्वादिति । पक्षव्यापकमविद्यमानसपक्षं विपक्षाद्व्यावृत्तं केवलव्यतिरेकि । तद्यथा, ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वकर्तृत्वादिति । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति विपक्षात् व्यावृत्तमन्वयव्यतिरेकि पूर्ववत् सपक्षतदेकदेशवृत्तिभेदात् द्विविधम् । तद्यथा, जीवो नित्यः नाशकारणशून्यत्वात्, चेतनत्वादिति । सर्वत्र निर्दोषत्वानुवृत्तेर्न बाधितादौ प्रसङ्गः । तत्पुनर्द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं चेति । प्रत्यक्षयोग्यार्थानुमापकं दृष्टम् । यथा, धूमोऽग्नेः । प्रत्यक्षायोग्यार्थानुमापकं सामान्यतो दृष्टम् । यथा, रूपादिज्ञानं चक्षुरादेः । पुनस्त्रिविधम् । कारणानुमानं कार्यानुमानं सामान्यानुमानमिति । कारणं कार्यस्यानुमानमाद्यम् । यथा, विशिष्टमेघोन्नतिः वृष्टेः । कार्यं कारणस्यानुमानं द्वितीयम् । यथा, घूमोऽग्नेः । अकार्यकारणमकारणकार्यस्यानुमानं तृतीयम् । यथा, रसो रूपस्येति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "निर्दोषः शब्द आगमः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अज्ञानविपर्ययसंशयप्रमादविप्रलम्भादिपुरुषदोषपूर्वकत्वाभावो निर्दोषत्वम् । शब्दो वाक्यात्मा । विभक्त्यन्ता वर्णाः पदम् । आकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमन्ति पदानि वाक्यम् । श्रोतुराकाङ्क्षितार्थाभिधायकत्वं पूर्वपदसञ्ज•ताकाङ्क्षापूरकत्वं वा आकाङ्क्षावत्वम् । तेन विरक्तं प्रति वाणिज्योपदेशस्य, गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादेश्चावाक्यत्वं भवति । सन्निहितार्थाभिधायकत्वं अविलम्बेनोच्चरितत्वं वा सन्निहितत्वम् । तेन चोलेषु वर्तमानं तृषितं प्रति ‘सन्ति सुरसरिति शीतलानि जलानि’ इत्युपदेशस्य विलम्बेनोच्चरितपदानां च वाक्यत्वनिरासः । अन्योन्यान्वययोग्यतावदर्थाभिधायकत्वं योग्यतावत्वम् । तथा च ‘अग्निना सिञ्चेद्’ इत्यादेर्वाक्यत्वनिरासः । निर्दोष इत्यागमाभासनिवृत्तिः । शब्द इति प्रत्यक्षादिव्युदासः । आगमश्च सम्यग्ज्ञात एव बोधकः । अन्यथातिप्रसङ्गात् । स द्विविधः । नित्योऽनित्यश्च । नित्यो वेदः । अनित्यः पुराणादिः । वर्णानां च सर्वत्र नित्यत्वेऽपि प्रबन्धविशेषस्य नित्यत्वानित्यत्वाभ्यामयं विभागः । वर्णाश्च भेदकाभावात् सर्वगता एवेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "ननु कथं त्रीण्येव प्रमाणानि ? अर्थापत्त्युपमानयोरपि पृथक्प्रमाणत्वात् इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अर्थापत्त्युपमे अनुमाविशेषः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनुपपद्यमानप्रमितिरर्थापत्तिः । सा द्विविधा, श्रुतार्थापत्तिः दृष्टार्थापत्तिश्चेति । तत्राद्या यथा, ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति’ इति श्रुतवतो जीवतो गृहाभावप्रमितिः । द्वितीया यथा, जीवतो गृहाभावं दृष्टवतस्तत्प्रमितिरिति । तया बहिर्भावप्रमा भवतीति सा अनुमाने अन्तर्भवति । विमतो बहिरस्ति जीवनवत्वे सति गृहेऽसत्वात् यथाहम्’ इति प्रयोगसम्भवात् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सादृश्यप्रमासाधनमुपमानम् । तत्त्रिविधम् । गृह्यमाणे स्मर्यमाणप्रतियोगिकसादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, गां दृष्ट्वा वनङ्गतस्य गृह्यमाणगवये स्मर्यमाणगोसादृश्यप्रमाणं ‘गोसदृशोऽयं गवयः’ इति । गृह्यमाणप्रतियोगिकस्मर्यमाण गतसादृश्यप्रमासाधनं स्मर्यमाणप्रतियोगिकगृह्यमाणगतसादृश्यज्ञानम् । यथा, गामनुभूय वनं गतस्य गवये गोसादृश्यज्ञानं स्मर्यमाणे गवि गृह्यमाणगवयप्रतियोगिक सादृश्यप्रमासाधनम् । ‘गोसदृशोऽयं गवयः, तस्मात् गवयसदृशोऽसौ गौः’ इति । निर्दोषवाक्यं सादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, ‘यथा गौः गवयस्तथा’ इति । तदेतत्त्रयं क्रमेण प्रत्यक्षाद्यन्तर्भूतम् । विमतो गौः गवयसदृशः गवयगतसादृश्यप्रतियोगित्वात् यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तत्सदृशः यथा यमो यमान्तरेण’ इति प्रयोगसम्भवात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अकृतसमयसञ्ज्ञास्मरणसहायं तत्समभिव्याहृतवाक्यार्थप्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षं उपमानम् । सञ्ज्ञासञ्ज्ञिसम्बन्धप्रमितिस्तत्फलमित्यन्ये । तत्रातिदेशवाक्यार्थस्त्रिविधः । साधर्म्यं वैधर्म्यं धर्ममात्रं चेति । तद्भेदात् तत्प्रतिसन्धानात्मकमुपमानमपि त्रिधा भिद्यते । तत्र साधर्म्योपमानं यथा, ‘यथागौर्गवयस्तथा’ इति श्रुतातिदेशवाक्यस्य नागरिकस्य वनं गतस्य गोसदृशं गवयमवलोकयतोऽव्युत्पन्नगवयपदस्मरणवतः ‘अयमसौ गोसदृशः य आप्तेनोपदिष्टः’ इति प्रतिसन्धानं,तेन तस्य गवयपदार्थत्वप्रमास । वैधर्म्योपमानं यथा,‘गवादिवत् द्विशफो न भवत्यश्वः’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः अश्वं पश्यतः अश्वपदं स्मरतः ‘अयमसौ गवादिविसदृशः’ इति प्रतिसन्धानम्, तस्य तेनाश्वपदार्थत्वप्रमितिः । धर्ममात्रोपमानं यथा, ‘दीर्घग्रीवत्वाऽदिमान् पशुरुष्ट्र’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः क्रमेलकं पश्यतउष्ट्रपदस्मृतिमतः ‘अयमसौ तद्वर्मा’ इति प्रतिसन्धानम्, तेनोष्ट्रपदव्युत्पत्तिरिति । तदेतत् त्रयमप्यनुमान एवान्तर्भूतम् । विमतो गवयशब्दवाच्यः अगोत्वे सति गोसदृशत्वात् व्यतिरेेकेण घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । अतो न विभागानुपपत्तिः । अत्रोपमानद्वयस्य अन्तर्भावानुक्तिः अतिस्फुटप्रतिभासत्वात्, आगमान्तर्भूतत्वे विवादाभावाच्चेति । प्रयोगप्रकारवैचित्र्यात् कथमनुमानत्वमित्यत उक्तम् अनुमाविशेष इति ॥ यथाखल्वन्वयिनो व्यतिरेकिणश्च प्रयोगप्रकारवैचित्र्येऽपि नानुमानाद्बहिर्भावः अनुमानविशेषत्वात् अपेक्षितसाधर्म्यसद्धावाच्च तथात्रापीति । एतेनोपमानस्यार्थविशेषनिष्ठतया पार्थक्यशङ्कापि परास्ता । तादृशसम्प्रतिपन्नानुमान वदेव तदुपपत्तेः । अनेनैव ‘न च केवलतर्केण’ इत्यादिपृथगुक्तेर्गतिश्चोक्ता भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तथापि अभावाख्यं पृथक्प्रमाणमस्तीत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अभावोऽनुमा प्रत्यक्षं च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अभावविषयं प्रमाणमभावः । तत् त्रिविधम् । प्रत्यक्षार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘नास्त्यत्र घटः’ इति । आनुमानिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा, रूपज्ञानरहितस्य ‘नास्ति चक्षुः’ इति । आगमिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘वैधी हिंसा न पापसाधनम्’ इति । तत्र प्रथमं प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भवति । द्वितीयमनुमाने । विमतः चक्षूरहितः रूपाज्ञत्वात् घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । तृतीयमागमे । अतो युक्तो विभाग इति । अत्राभावद्वयस्यान्तर्भावानुक्तिस्तत्र वादिनामविवादात् । उभयत्रान्तर्भावात् योगविभागः । प्रायेणानुमानेऽन्तर्भावज्ञापनाय क्रमोल्लङ्घनम् । कथमेकप्रमाणस्योभयत्रान्तर्भाव इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "परामर्शापरामर्शविशेषात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदा ‘अत्र घटोऽस्ति न वा’ इति परामर्शपूर्वकं योग्यानुपलब्धिरूपं घटाभावप्रमाणं प्रवर्तते तदाऽनुमाने । ‘घटोऽत्र नास्ति योग्यत्वे सत्यनुपलभ्यमानत्वात् गजवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । यदा पुनरेवमपरामृश्य झडिति ‘नास्ति घटः’ इति प्रवर्तते तदा प्रत्यक्ष इति न विरोधः । अयं च बहिरेव विभागो न तु सुखाद्यभावप्रमाणे । साक्षिणः सुखादिस्वरूपे निश्चयरूपत्वेन परामर्शाभावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " सम्भवपरिशेषावपि पृथक्प्रमाणे विद्येते । अतः कथं त्रित्वम् ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "सम्भवपरिशेषावनुमा ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अल्पप्रमासाधनं बहुलज्ञानं सम्भवः । यथा ‘शतमस्य अस्ति’ इति ज्ञाने पञ्चाशज्ज्ञानम् । प्रसक्तव्यावृत्तिप्रतीतिः परिशिष्यमाणप्रमासाधनं परिशेषः । स द्विविधः । विधिमुखो निषेधमुखश्च । तत्राद्यो यथा ‘चैत्रमैत्रयोरयं चैत्रः’ इत्युक्तेऽन्यस्मिन् मैत्रप्रमा । द्वितीयो यथा ‘नायं चैत्र’ इत्युक्ते तस्मिन् मैत्रप्रमा इति । सम्भवपरिशेषयोरनुमानेऽन्तर्भावः । ‘विप्रतिपन्नः पञ्चाशद्वान् शतवत्वात् सम्प्रतिपन्नवत्, विमतो मैत्रः चैत्रमैत्रयोरन्यतरत्वे सत्यचैत्रत्वात् व्यतिरेकेण चैत्रवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । तस्मादुपपन्न्• प्रमाणानां त्रित्वमिति । वादिविवादभावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "ननु तर्कः प्रमाणं न वा । प्रमाणमिति ब्रूमः । कथं तर्हि त्रित्वम्? इत्यतस्तत्स्वरूपं विवृण्वन्नाह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "आत्मान्योन्याश्रयचक्रकानवस्थाकल्पनागौरवश्रुतदृष्टहानादयो दूषणानुमा\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आदिपदेनाश्रुतकल्पनमदृष्टकल्पनं च सङ्गृह्यते । एतत्प्रसञ्जनमिहोपलक्ष्यते । व्याप्याङ्गीकारेऽनिष्टव्यापकप्रसञ्जनं तर्कः । द्विविधमनिष्टम् । प्रामाणिकहानमप्रामाणिककल्पनं च । तत् पुनः पञ्चविधम् । आत्माश्रयान्योन्याश्रय चक्रकानवस्थानिष्टभेदात् । सर्वस्यानिष्टत्वेऽपि गोबलीवर्दन्यायेन पृथगुक्तिः । तत्राद्यचतुष्टयमप्रामाणिककल्पनात्मकम् । न हि कुत्राप्यात्माश्रयादिकं प्रमाणसिद्धम् । पञ्चममुभयात्मकम् । तत्राप्याद्यं द्विविधम् । श्रुतदृष्टहानभेदात् । द्वितीयमपि तथा । अश्रुतादृष्टकल्पनभेदात् । तदेव कल्प्यानेकत्वे कल्पनागौरवम् । एतत्प्रसञ्जनात्मकस्तर्कोऽपि पञ्चधा भिद्यते । तस्य पञ्चाङ्गानि । प्रसञ्जकस्य प्रसञ्जनीयेन व्याप्तिः, प्रतितर्कैरप्रतिघातः, प्रसञ्जनीयस्य विपर्यये पर्यवसानं, प्रसञ्जनीयस्यानिष्टत्वं, प्रतिपक्षासाधकत्वं चेति । तस्यैवोत्पत्तिज्ञप्त्यर्थं तदुत्पत्तिज्ञप्त्यपेक्षायामात्माश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्यादौ परम्परया तदुत्पत्त्याद्यपेक्षाया मन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायां चक्रकाप्रसङ्गः । उत्पत्त्यादावन्योत्पत्त्याद्यपेक्षाया अपर्यवसानेऽनवस्थाप्रसङ्गः । अत्र ‘यद्येवमभ्युपगमः तदात्माश्रयादिप्रसङ्गः । यत्रैवमभ्युपगमः तत्र तत्प्रसङ्गः यथामुत्र । यदि नात्माश्रयादिः तर्हि नैतदपि’ इति प्रवृत्तिप्रकारः । सामान्यत एव व्याप्तिर्वाच्या । श्रुतहानं यथा ‘यदीश्वरो न सर्वज्ञः तर्हि न जगत्कर्ता स्यात्’ इति । दृष्टहानं यथा ‘यदि पर्वतोऽनग्निमान् तर्हि निर्धूमः स्यात्’ इति । अश्रुतकल्पनं यथा ‘यदीश्वरो जीवाभिन्नः तर्हि दुःखी स्यात्’ इति । अदृष्टकल्पनं यथा ‘यदि पीतमुदकमन्तरधक्ष्यत् तर्हि मामपि दहेदविशेषात्’ इति । यत्रापाद्यापादकयोर्न साक्षात्सामानाधिकरण्यं तत्र तथैवानुपपत्तौ प्रकारान्तरेणैकाधिकरणतामापाद्य व्याप्तिरभिधातव्या । यथा ‘यदि देवदत्तः सर्वज्ञस्तर्हि यज्ञदत्तोऽपि तथा स्यात्’ इत्यत्र ‘यत्र यो धर्मो वर्तते स तदविशिष्टेऽपि वर्तत’ इत्यादि । सोऽयं तर्कोऽनुमान एवान्तर्भूतोऽतो न प्रमाणत्रित्वभङ्गः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्यादेतत् । न तर्कोऽनुमानम् । तर्के हि प्रामाणिकहानादि आपाद्यते । न च तत्साध्यं भवति अपसिद्धान्तात् प्रमाणविरोधाच्च, आरोपितलिङ्गत्वेनासिद्धेश्चेति । अत उक्तम् दूषणेति ॥ द्विविधं ह्यनुमानम् । स्वपक्षसाधनं परपक्षदूषणं च । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । द्वितीयमपि द्वेधा प्रवर्तते ‘नायं निरग्निकः अनिर्धूमत्वात्’ इति वा ‘निरग्निकत्वाङ्गीकारे निर्धूमत्वाभ्युपगमः’ इत्यनिष्टप्रसङ्गरूपेण वा ‘तत्र दूषणानुमाने तर्कस्यान्तर्भावः । प्रसङ्गरूपानुमाने च न साध्यवदापाद्यस्य प्रमाणविरोधाद्यसिद्धिश्च दूषणमिति वक्ष्यतीति न कश्चिद्विरोध इति । एतदर्थ एव योगविभागः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "तथाऽपि वाक्यतात्पर्यज्ञापकान्युपक्रमादीनि पृथक् प्रमाणानि सन्तीत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "उपक्रमोपसंहारतदैकरूप्याभ्यासापूर्वताफलार्थवादाश्च\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "चानुमेत्यस्यानुकर्षणार्थः । प्रकरणादिरुपक्रमः । तदन्त उपसंहारः । तयोरुपक्रमोपसंहारयोरेकार्थत्वं तदैकरूप्यम् । एकप्रकारासकृदुक्तिरभ्यासः । प्राचुर्येण प्रमाणान्तराप्राप्ततापूर्वता । फलवत्वं फलम् । स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः । एतेषां वाक्यतात्पर्येऽनुमात्वान्नोक्तविरोधः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " यद्येतेऽनुमानेऽन्तर्भूतास्तर्हि कथं तेषां ‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये’ इति उपपत्तितः पृथगुक्तिरित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "उपपत्तिविशेषाः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यथा खलु पाण्डवानां कौरवान्तर्भावेऽपि कौरवेभ्यः पृथगुक्तिः कौरवविशेषत्वेन साक्षादेकत्वाभावेन कौरवपदेन तदतिरिक्तग्रहणात्तथा प्रकृतेऽपीति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " नन्वेवं पृथगुक्तिमन्यथाव्याख्यायैषामनुमानान्तर्भावाङ्गीकारे को हेतुः ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "त एव सोपपत्तयो लिङ्गानि\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उक्ता इति शेषः । यथा ‘उपक्रमोपसंहारौ’ इत्यत्रोपपत्तेः लिङ्गत्वमुच्यते तथा उपक्रमादीनामपि । अतो युक्तमुक्तम् । किं च यथोपपत्तिर्लिङ्गम् व्याप्तिबलेनार्थधीहेतुः तथोपक्रमादयोऽपि ‘यत्र यत् उपक्रम्यते तत्रापवादाभावे तत् तात्पर्यगोचरः’ इत्यादिव्याप्तिबलेनैवार्थबोधकाः । अतः कथं नानुमानेऽन्तर्भावः ? इत्याह त एवेति ॥ एतेनागमान्तर्भावोऽपि परास्तः । नह्यागमवत् व्याप्तिमनपेक्ष्य बोधका एते अनुभूयन्ते । तेषामागमार्थविषयत्वज्ञापनार्थो योगविभागः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तथापि समाख्यादीनि पृथक्प्रमाणानि सन्तीत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "समाख्यावाक्यप्रकरणस्थानानि च",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनुमेत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः । निर्णीतस्थले समानोक्तिः समाख्या । सा द्विविधा । अर्थतः शब्दतोऽपीति । वाक्यमुक्तम् । कयाचिद्विवक्षयैकार्थावच्छिन्नं वाक्यजातं प्रकरणम् । तादृशं प्रकरणजातं स्थानम् । एतेषामनुमानेऽन्त र्भावादुक्तमुपपन्नम् । समाख्याया वाक्यादेरवरत्वेऽपि तदादित्वेन ग्रहणं ‘श्रुतिर्लिङ्गम् समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा’ इति अविवक्षितक्रमं वाक्यमनुसृत्य कृतम् । उपक्रमादीनां तात्पर्यलिङ्गत्वं, एतेषामर्थ एवेति विशेषज्ञापनार्थो योगविभागः । उपक्रमादीनां स्वार्थे आगमत्वेऽपि तात्पर्य एव लिङ्गत्वात् नोक्तविरोधः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तर्हि श्रुतिर्लिङ्गमिति समाख्यादीनां लिङ्गात् पृथगुक्तिः कथमित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "लिङ्गविशेषाः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पूर्ववत्परिहारः । अत्राप्यनुमानान्तर्भावे पूर्वोक्ता युक्तिरनुसन्धेयेति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "यदुक्तं निर्दोषं प्रमितं लिङ्गमनुमानमिति । तदयुक्तम् । नारिकेलद्वीपवासिनो धूमदर्शनेऽपि वह्निप्रमानुदयादित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "व्याप्तिरूपपत्तिमूलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "व्याप्तिरिति विषयेण विषयिणः प्रत्ययस्योपलक्षणम् । न केवलं प्रमितं लिङ्गमात्रमनुमितिजनकमङ्गीक्रियते । किं नाम ? निर्दोषत्वान्तर्गतव्याप्तिप्रमितिपूर्वकमेव । न च तादृशं नानुमितिजनकम् । अविनाभावो व्याप्तिः । सा द्विविधा अन्वयव्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिश्चेति । तत्र साध्येन साधनस्य व्याप्तिरन्वयव्याप्तिः । यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इति । साधनाभावेन साध्याभावस्य व्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिः । यथा, ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति’ इति । भूयो भूयो हि धूमं पश्यन् तत्राग्निं पश्यति, अग्न्यभावं पश्यंश्च धूमाभावम् । ततो निश्चिनोति धूमाग्न्योः साहचर्यादस्त्यविनाभाव इति । गृहीतव्याप्तिश्च पर्वते धूमं पश्यंस्तामनुस्मरति ‘यत्सन्निधौ यो दृष्टः स तस्य स्मारकः’ इति न्यायात् । स्मृतव्याप्तिश्च व्याप्तं धूमं पर्वते प्रत्यभिजानाति । तेनाग्न्यनुमितिरिति युक्तं लक्षणमिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविधमनुमानम् । स्वार्थं परार्थं चेति । परोपदेशानपेक्षं स्वार्थम् । तदपेक्षं परार्थम् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " व्याप्तिमल्लिङ्गबोधकं वाक्यं परोपदेशः ।तस्यावान्तरवाक्यान्यवयवाः ते च जिज्ञासासंशयशक्यप्राप्तिप्रयोजनसंशयव्युदासप्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानीति दशेति जरन्नैय्यायिकाः । प्रतिज्ञादयः पञ्चैवेति नवीनाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणानि उदाहरणोपनयनिगमनानि त्रय एवेति मीमांसकाः । उदाहरणोपनयौ द्वावेवेति बौद्धाः । तत्र तृतीयपक्षव्यतिरिक्तनियमपक्षास्तावन्नोपपन्ना इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "सा प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तरूपा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सेत्युपपत्तिप्रतिपादकं वाक्यमुपलक्ष्यते । दृष्टान्ते इति तत्प्रतिपादकमुदाहरणम् । प्रतिपादनाय पक्षवचनं प्रतिज्ञा । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इति । साधनत्वाभिव्यञ्जकविभक्त्यन्तं लिङ्गवचनं हेतुः । यथा ‘धूमवत्वात्’ इति । व्याप्तिदर्शनपुरस्सरं सम्यग्दृष्टान्ताभिधानमुदाहरणम् । व्याप्तिग्रहणस्थलं दृष्टान्तः । स द्विविधः । साधर्म्यदृष्टान्तो वैधर्म्यदृष्टान्तश्चेत्येके । अन्वयव्याप्तिग्रहणस्थलं साधर्म्यदृष्टान्तः । व्यतिरेकव्याप्तिग्रहणस्थलं वैधर्म्यद्दष्टान्तः । अत एवोदाहरणमप्येवं द्विविधम् । तत्र साधर्म्योदाहरणं यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इति । वैधर्म्योदाहरणं यथा ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति यथा हृदः’ इति । एतैस्त्रिभिरेवावयवैरुपपत्तेर्बोधयितुं शक्यत्वान्न तादृशावयवत्वादिनियमो युक्तः । अथ वा दृष्टान्तपदेन तद्वचनमात्रोपलक्षणेेनेदं पक्षान्तरम् । उपलक्षणं चैतत् । उदाहरणोपनयनिगमनैः उदाहरणोपनयाभ्यां वा शक्यते बोधयितुम् । दृष्टान्तोपमानेन लिङ्गस्य पक्षे उपसंहारः उपनयः । सोऽप्युदाहरणानुसारेण द्विविध इति । ‘तथा चायं धूमवान् पर्वतः’ इति साधर्म्योपनयः । ‘न तथायं निर्धूमः पर्वतः’ इति वैधर्म्योपनयः । हेतुपुरस्सरं पक्षे साध्योपसंहारो निगमनम् । यथा ‘तस्मात् पर्वतोऽग्निमानेव’ इति । किं च जिज्ञासादयः शब्दा एव न भवन्ति । कुतो वाक्यावयवाः । कुतस्तरां तन्नियमः । उपनयनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुभ्यां गतार्थत्वाच्चेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "त्र्यवयवादिनियमोऽप्यनुपपन्न इति भावेनाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "हेतुगर्भा प्रतिज्ञा केवलापि",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उपपत्तिज्ञापिकेति शेषः । ‘धूमवान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भा प्रतिज्ञा अवयवान्तरं विहायोपपत्तिज्ञापिका भवतीति न कोऽपि नियमपक्षो युज्यते । तावन्मात्रेणोपपत्तेर्बोधे जातेऽप्यवयवान्तरं वदत आधिक्यप्रसङ्गात् । न चैवं त्र्यवयवाभ्युपगमे व्याघातः । यस्यैतावता न बोधस्तं प्रति तदभिधानस्येष्टत्वात् । विचित्रबुद्धयो हि पुरुषा इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": " इतोऽपि न नियमपक्षो युज्यत इत्याह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "सिद्धौ प्रतिज्ञायां हेतुमात्रं च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पर्वतादग्निमानय इति नियुक्तः कश्चिद् ब्रूते ‘नाग्निमान् पर्वतः’ इति । अन्यस्तु ‘अग्निमान्’ इति । एवं विवादेनैव प्रतिज्ञासिद्धौ कुतोऽग्निमान् ? इति पृष्टो यदा ‘धूमवत्वात्’ इति ब्र्यात्तदापि भवत्येवोपपत्तिज्ञानमिति नावयवनियमो युक्त इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इतोऽपि न युक्त इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "दृष्टान्तः सप्रतिज्ञो हेतुगर्भः \t",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र दृष्टान्त इति तद्वचनोपलक्षणम् । ‘धूमान्महानसवत् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भेण सप्रतिज्ञेन दृष्टान्तवचनमात्रेण उपपत्तिज्ञानसम्भवात् । श्रोत्राकाङ्क्षानुसारेणैवावयवकल्पना युक्ता न तु तन्नियतिरिति ॥",
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "PRL_C01_B04",
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| "name": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "निर्दोषोपपत्तिरनुमेत्युक्तम् । को दोष उपपत्तेः सम्भवति ? । द्विविध उपपत्तिदोषः । साक्षात् वाचनिकश्चेति । यस्तत्रोपपत्तेरेव साधनदूषणक्षमत्वापादकः स साक्षादुपपत्तिदोषः । तं विभज्य दर्शयति ॥",
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| |
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| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "उपपत्तिदोषौ विरोधासङ्गती\t",
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| |
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "उपपत्तिदोषो द्विविधः विरोधोऽसङ्गतिश्चेति । अन्वययोग्यताविरहो विरोधः । आकाङ्क्षाभावोऽसङ्गतिः । इमौ चार्थवचनयोरपि सम्भवतः । अर्थासाधुत्वे वचनस्यापि तथात्वादिति । वचनस्यैवासाधुत्वापादको वाचनिकदोषः । तं विभज्य दर्शयति ",
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "न्यूनाधिके वाचनिके",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "द्विविधो वाचनिकदोषः । न्यूनमधिकं चेति । अपेक्षितासम्पूर्तिर्न्यूनम् । अपेक्षिताधिकमधिकम् । न्यूनाधिके च परार्थप्रयोग एव सम्भवतः । वचनद्वारेणैवोपपत्तेरपि दूषिते स्यातामिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "न केवलमुपपत्तिदोषाणामेव विरोधादिभिः सङ्ग्रहः । किं नाम ? परनिरूपिताशेषनिग्रहस्थानान्यपि विरोधादिष्वेवान्तर्भवन्तीत्याह– ",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "संवादानुक्तियुता निग्रहाः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "निग्रहाः निग्रहस्थानानि । कथायामखण्डिताहङ्कारेण परेण परस्याहङ्कारखण्डनं पराजयो निग्रहस्तन्निमित्तं तत्त्वाप्रतिपत्तिलिङ्गम् वा निग्रहस्थानम् । सा द्विविधा अप्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिश्चेति । परोक्तस्ववक्तव्ययोरज्ञानम् अप्रतिपत्तिः । तयोरेव विपरीतज्ञानम् विप्रतिपत्तिः । तानि च प्रतिज्ञाहानिः (१) प्रतिज्ञान्तरम् (२) प्रतिज्ञाविरोधः (३) प्रतिज्ञासन्न्यासः (४) हेत्वन्तरम् (५) अर्थान्तरम् (६) निरर्थकम् (७) अविज्ञातार्थकम् (८) अपार्थकम् (९) अप्राप्तकालम् (१०) न्यूनम् (११) अधिकम् (१२) पुनरुक्तम् (१३) अननुभाषणम् (१४) अज्ञानम् (१५) अप्रतिभा (१६) विक्षेपः (१७) मतानुज्ञा (१८) पर्यनुयोज्योपेक्षणम् (१९) निरनुयोज्यानुयोगः (२०) अपसिद्धान्तः (२१) हेत्वाभासाः (२२) उदाहरणाभासाः (२३) तर्कपराहतिश्चेति । एतानि च कथाबाह्यानि कथायामपस्मारोन्मादादिदशापन्नानि झटिति संवरणेन तिरोहितोद्भावनावसराणि पुरःस्फूर्तिकानधिकृतोद्भावितानि न निग्रहस्थानानि । तात्कालिकातत्वज्ञानलिङ्गत्वेऽपि प्रतियोग्यपेक्षया तदभावात् इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्र येन यत् यथा साध्यत्वादिना निर्दिष्टं तस्य तथा निर्वाहादर्शनेन पुनस्त्यागः प्रतिज्ञाहानिः । द्विधा चैषा । साधनहानिर्धूषणहानिश्चेति । तत्राद्या द्वादशविधा । पक्षे तावत् साध्यसाधनधर्मितद्विशेषणहानिभेदात् षट्प्रकाराः । एवं दृष्टान्तेऽपीति । द्वितीयापि द्विविधा । स्वरूपतो विशेषतश्चेति । सर्वा पुनर्द्विविधा ।असद्विषया सद्विषया चेति । सर्वा चेयं द्विधा प्रवर्तते कण्ठतोऽर्थतश्चेति । ‘दुष्टं चेन्माभूत्’ इति कण्ठतः । ‘अन्यथास्तु’ इत्यर्थतः । तत्रासद्विषया पक्षे साध्यहानिर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्त्वग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तस्मिन्नेव हेतौ तथा दूषिते माऽस्त्वसौ हेतुरिति, धूमवत्वमस्त्विति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदपर्वतावग्निमन्तावित्यत्र भागे बाधाभिधाने मास्तु तर्हि हृदः पक्ष इति, पर्वत एवास्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा, पर्वत उष्णाग्निमान् इत्यत्र व्यर्थविशेषणतया प्रत्युक्ते मास्तु तर्हि तथेति, अग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा, सुरभिधूमवत्वादित्यत्र तथैव दूषिते मास्तु तर्ह्येवमिति, धूमवत्वादित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा, अयं पर्वतोऽग्निमानित्यत्र तथैव दूषिते तर्हि तथा मास्त्विति,पर्वत इत्येवास्त्विति वा । दृष्टान्ते साध्यहानिर्यथा, पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात् महानसवदित्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्तु तर्हि महानसोऽग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तत्रैव प्रयोगे तथैव प्रत्युक्ते माऽस्तु प्रमेयत्वात्, महानसोऽग्निमानिति, धूमवत्वादिति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदवदित्युक्ते साध्यवैकल्यात् प्रत्युक्ते मास्तु स दृष्टान्त इति, महानसोऽस्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा ‘यो धूमवानसावुष्णाग्निमान् यथा महानसः,इत्यत्र विशेषणवैयर्थ्येऽभिहिते माऽस्तु तथेति, सोऽग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा ‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्तु तर्हीत्थमिति, यो धूमवानित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा,‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् तन्महानसवत्’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्त्वेवमिति, महानसवदित्येवास्त्विति वा । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "दूषणहानिः स्वरूपतो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रासिद्धेरुद्भावने निरनुयोज्यानुयोगेन प्रत्युक्ते ‘तर्हि मा भूत्तत्’ इति ‘अनैकान्तिकता भवतु’ इति वा । विशेषतो यथा ‘हृदपर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’इत्यत्र स्वरूपासिद्ध्युद्भावने पूर्ववत् प्रत्युक्ते ‘तर्हि मास्तु’ इति ‘भागासिद्धो भवतु’ इति वा ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सद्विषया तु ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तर्हि मास्तु पर्वतोऽग्निमान्’ इत्याद्युदाहर्तव्या । सा च पर्यनुयोज्योपेक्षणसहचारिणीऽति । ननु यद्दोषभयादुक्तं त्यजति स एव निग्रहस्थानमस्तु किं हान्येति चेन्न । सद्धानौ तस्या एव निग्रहहेतुत्वात् । असद्धानावपि तत एव परिहृतत्वात् । हानिमनुद्भाव्यप्राचीनदोषस्थापनानुपपत्तेश्च । न चास्यास्तादर्थ्यं, स्वयमपि विप्रतिपत्तिसूचकत्वात् । न चैवं स्ववचनविरोध एव । हानिमनुद्भाव्य विरोधोद्भावनानुपपत्तेरिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "दोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाध्यभागेऽधिकप्रक्षेपः प्रतिज्ञान्तरम् । प्रतिज्ञा उदाहरणे प्रयोज्यभागः निगमनं चेति साध्यभागः । द्विविधं चेदं दोषपरिहारहेतुः तदहेतुश्चेति ॥ दोषसदसद्भावाभ्यां पुनर्द्विविधम् । तत् प्रतिज्ञायां चतुर्विधम् । पक्षतद्विशेषणसाध्यतद्विशेषणप्रक्षेपभेदात् । पक्षप्रक्षेपोऽपि द्वेधा । स्वरूपतः पक्षान्तरतश्चेति । एवं साध्यप्रक्षेपोऽपि । तत्र सद्दोषपरिहारार्थमाद्यं यथा ‘अनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । द्वितीयं यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्तिकत्वेऽभिहिते ‘तदपि पक्षः’ इति । तृतीयं यथा, तत्रैव ध्वनिभिः सिद्धसाधनत्वोद्भावने ‘वर्णात्मकः शब्दः पक्षः’ इति । चतुर्थं यथा ‘शब्दः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । पञ्चमं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् सुरभिमलिनधूमवत्वात्’ इत्यत्र विशेषणासामर्थ्येऽभिहिते ‘साग्निकृष्णागरुमान्’ इति । षष्ठं यथा ‘क्षित्यादिकं कारणपूर्वकं कार्यत्वात्’ इत्यत्र सिद्धसाधनत्वोक्तौ उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकमिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उदाहरणे प्रयोज्यभागे प्रयोज्यस्वरूपतदन्तरतद्विशेषणधर्मितद्विशेषणप्रक्षेपभेदेन पञ्चविधम् । तत्राद्यं यथा ‘यो धूमवान् यथा महानसः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘सोऽग्निमान्’इति । द्वितीयं यथा ‘यत् सुरभिमलिनधूमवत् तत् अग्निमत् यथा सम्प्रतिपन्नम्’इत्युक्ते प्रयोज्यभागे न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् साग्निकृष्णागरुमत्’ इति । तृतीयं यथा ‘यत् कार्यं तत् कारणपूर्वकं यथा घटः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकम्’ इति । चतुर्थः यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इत्येवोक्ते प्रागिव प्रत्युक्ते ‘यथा महानसः’ इति । पञ्चमं यथा ‘शब्दो नित्यः नित्यगुणत्वात् परमाणुरूपवत्’ इत्यत्र साध्यवैकल्येऽभिहिते ‘अपार्थिवपरमाणुरूपं दृष्टान्तः’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "निगमनेऽपि प्रतिज्ञायामिवोदाहर्तव्यम् । हेतुप्रक्षेपोऽत्राधिकः । स यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्येवोक्ते न्यूनतया प्रत्युक्ते, तस्मात् धूमवत्वात्पर्वतोऽग्निमान्’ इति । असद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’इत्यत्र बाधोक्तावुष्णाग्निमानित्यादि । सद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्ति कत्वोद्भावने ‘सर्वगतः शब्दः पक्षः’ इत्यादि । असद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येना नैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तदपि पक्षः इत्यादि । न च दोषापरिहारे अर्थान्तरता । प्रकृतोपयोगसद्भावाभिमानेन प्रतिज्ञान्तरत्वस्यैव सिद्धत्वात् । न चेयं हानिरेव । पूर्वाङ्गीकृतस्यात्यागात् । विशेषणाभावस्य प्रागनङ्गीकृतत्वादिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एकवाक्ये अवान्तरवाक्यानां पदानां च मिथो व्याघातः प्रतिज्ञाविरोधः । स च बहुप्रकारः । तत्र प्रतिज्ञायां धर्मिपदयोर्यथा ‘श्रोतृत्वे सति बधिरः’ इति । साध्यपदयोर्यथा ‘विमतो बधिरत्वे सति श्रोता’ इति । धर्मिसाध्यपदयोश्चतुर्विधः । तत्र धर्मविधानाद्यथा ‘मूको वक्ता’ इति । तन्निषेधाद्यथा ‘प्रमेयं न प्रमाणसापेक्षम्’ इति । धर्मिविधानाद् यथा ‘अतीतमस्ति’ इति । तन्निषेधाध्यथा‘वर्तमानं नास्ति इति । हेतुपदयोर्यथा ‘मूकत्वे सति वक्तृत्वात्’ इति । उदाहरणे साधनपदयोर्हेतुपदवत् । साध्यपदयोः प्रतिज्ञायामिव । परस्परं तु प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । दृष्टान्तधर्मिणि साध्यधर्मिवत् । साध्यधर्मिपदयोः प्रतिज्ञायामिव चतुर्विधः । उपनयपदयोर्हेतुपदवत् । निगमने प्रतिज्ञावत् । हेत्वंशेन विरोधः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रतिज्ञाहेत्वोर्यथा ‘द्रव्यं गुणव्यतिरिक्तं अव्यतिरिक्तत्वात्’ इति । प्रतिज्ञोदाहरणयोर्यथा ‘विप्रतिपन्नो वक्ता मूकवत्’ इति । प्रतिज्ञोपनययोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । प्रतिज्ञानिगमनयोर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् तस्मान्निरग्निकः’ इति।हेतूदाहरणयोर्यथा ‘वक्तृत्वान्मूकवत्’ इति । हेतूपनययोर्यथा ‘धूमवत्वात् तथा चायं निर्धूमः’ इति । हेतुनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । उदाहरणोपनययोर्हेतूदाहरणविरोधवत् । उदाहरणनिगमनयोः प्रतिज्ञोदाहरणविरोधवत् । उपनयनिगमनयोरपि प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । एवमन्यत्रापि विरोधो द्रष्टव्यः । न च विरुद्धहेत्वाभाससङ्करः । तत्र साध्यविपर्ययव्याप्तिदर्शनेन विरोधः । अत्र पुनः अस्ति नास्तीतिवत् उक्तिमात्रेणेति भेदात् । अत एव प्रथममुपलब्धेर्दोषान्तर सम्भवेप्येतदेवोद्भाव्यमिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्वोक्तापलापः प्रतिज्ञासन्न्यासः । हानिवदवान्तरभेदभिन्नः । चतुर्धा च प्रवर्तते । केनेदमुक्तम् ? इति वा परमतमेतन्मयोक्तम् इति वा त्वयेदमुक्तम् इति वा परोक्तं मयानूदितम् इति वेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "दोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाधकांशे अधिकप्रक्षेपो हेत्वन्तरम् । हेतुः उदाहरणे प्रयोजकभागः उपनय इति साधकांशः । तद् द्विविधम् साधनदूषणनिष्ठभेदात् । सर्वं स्वरूपतो विशेषतश्चेतिद्वेधा । तत्राद्यं यथा । हेत्वाद्यप्रयोगे न्यूनत्वोद्भावने तदुपादानम् । द्वितीयमपि दोषप्रतीकाराप्रतीकाराभ्यां दोषसदसद्भावाभ्यां च द्वेधा । तत्र साधने हेतौ सद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वेन दूषिते सामान्यवत्वे सतीति । उदाहरणे प्रयोजकभागे यथा ‘ऐन्द्रियकः सोऽनित्यः’ इत्यत्र न्यूनत्वेऽभिहिते पूर्ववत् विशेषणम् । उपनये यथा ‘तथा चायमैन्द्रियकः’ इत्युक्ते पूर्ववत् विशेषणम् । दूषणे हेतौ यथा ‘नायं साध्यसाधकः सपक्षे सत्त्वात्’ इत्यत्र व्यभिचारेण प्रत्युक्ते ‘विपक्षवृत्तित्वे सति’ इत्यादि । सद्दोषाप्रतीकारो यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषप्रतीकारो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र महानसे व्यभिचार इत्युक्ते ‘तदन्यत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषाप्रतीकारो यथा तत्रैव ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । अत्र हेत्वाभासादिसम्भवेऽपि तस्य साध्यत्वात् सिद्धं हेत्वन्तरमेवोद्भाव्यमिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रकृतानुपयुक्तान्वितोक्तिरर्थान्तरम् । तच्चतुर्विधम् । स्वपरोभयानुभयमतरीतिभेदात् । तत्र स्वमतेन नैयायिकस्य मीमांसकं प्रति यथा ‘शब्दोऽनित्यः स चाकाशविशेषगुणः’ इति । परमतेन यथा ‘द्रव्यं’ इत्यादि । उभयमतेन यथा ‘श्रोत्रग्राह्योऽसौ’ इत्यादि । अनुभयमतेन यथा ‘गन्धादिभिः समानाश्रयोऽसौ’ इत्यादि । अत्र न्यूनादिसम्भवेऽपि तस्योक्तग्राह्यत्वादस्य चोच्यमानग्राह्यत्वेन प्रथमप्राप्तत्वात् इदमेवोद्भाव्यमिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अबोधकशब्दप्रयोगो निरर्थकम् । तच्च बहुप्रकारम् । कचटतपेत्यादिमातृकापाठमात्रम् लिङ्गविभक्तिवर्णविपर्यासः कृत्तद्धित समासाख्यातविपर्यासः भाषान्तरसङ्करश्चेत्यादि । कथञ्चित् ज्ञापकत्वात् कथमेतन्निग्रहस्थानमिति चेन्मैवम् । नहि कथञ्चिज्ज्ञापकत्वं शब्दधर्मः प्रकरणादिनैव तत्र ज्ञानोदयात् । भाषान्तरसङ्करोऽपि समसमयत्वाभावे निग्रहस्थानम् । अन्यथा ज्ञानसङ्गूहनार्थं स्वभाषया प्रत्यवतिष्ठमानं प्रति तदनभिज्ञस्योत्तराभावप्रसङ्गादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "त्रिवारमुक्तेऽपि परिषत्प्रतिवादिभ्यामविज्ञातार्थबोधकपदप्रयोगोऽ विज्ञातार्थकम् । तच्चतुर्विधम् । स्वतन्त्रमात्रसिद्धम्,रूढिमनपेक्ष्य केवलयोगेन प्रवृत्तम्, निर्णायकाभावेन संशयाक्रान्तम्, अतिद्रुतोच्चारितं चेति । आद्यं यथा ‘कपालपुरोडाशादि’ मीमांसकानाम् । द्वितीयं यथा ‘कश्यपतनयाधृतिहेतुरयं त्रिणयनतनयासनसमाननामधेययुक्तः’ इत्यादि । तृतीयं यथा ‘श्वेतो धावति’ इत्यादि । तत्राद्यं परस्परसिद्धान्ताभिज्ञताशौण्डीर्याभिमानेन उपादीयेतापि । उत्तरं तु नोपादेयमेव । ज्ञापनार्थत्वात् शब्दस्य । अनवधानादिशङ्कानिरासाय पुनर्वचनं प्राश्निकैरपेक्ष्यते । त्रिरिति नियमश्च । ततः परमज्ञानस्य वचनदोषहेतुत्वनिश्चयात् । न हि प्राश्निकापेक्षयोच्यमाने तेषामनवधानं सम्भवति । नापि परिषदविदुषी, येनादोषमपि न जानीयादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनन्वितार्थवाचकपदादिप्रयोगोऽपार्थकम् । तत् त्रिविधम् । सर्वथाऽप्यसम्भवदन्वयं यथा ‘दश दाडिमानि षडपूूपाः कुण्डमजाजिनम्’ इत्यादि । व्यवहितान्वयं यथा ‘ओदनं स्नातो ग्रामं सरसि गत्वाश्नाति’ इत्यादि । सम्भवत्सर्वान्वयपक्षनिरासे सत्यसम्भवदन्वयं चेति । विवक्षितक्रमविपर्यासोऽप्राप्तकालम् । अयं वादजल्पयोः क्रमः । सभ्यादिसङ्ग्रहपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते वादिना प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्यः । प्रतिवादिनापि वादिसाधनमनूद्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्य इति । तत्र यदि वादी साधनमुक्त्वा कथानियमबन्धनमिच्छति तदारम्भविपर्यासः । यदाऽऽभासोद्धारानन्तरं साधनं प्रयुङ्क्ते तदा वादांशविपर्यासः । प्रतिवादी च यदा स्वपक्षे साधनमभिधाय परपक्षं दूषयति तदा वादविपर्यासः। धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् इत्याद्यवयवविपर्यासः । अग्निमान् पर्वत इत्याद्यवयवांशविपर्यासः । वितण्डायां तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनाभावात् वादविपर्यासाभाव इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अवश्योपादेयानामन्यतमानुपादानं न्यूनम् । तदपि बहुप्रकारम् । कथासमयबन्धमकृत्वा साधनप्रयोगे आरम्भन्यूनम् साधनमप्रयुज्याभासोद्धारे, तत्प्रयुज्य चाभासानुद्धारे अनुकूलतर्कानुुक्तौ च वादांशन्यूनम् । प्रतिवदिनापि वादिसाधनमदूषयित्वा स्वपक्षसाधनाभिधाने, दूषयित्वा वा तदनभिधाने वादन्यूनम् । प्रतिज्ञाद्यवयवाभावे अवयवन्यूनम् । धर्म्याद्यनुक्तावयवयवांशन्यूनम् । इदं च तत्तत्सिद्धान्तरीत्योद्भावनीयम् । न चैवमपसिद्धान्त एव । न हि सिद्धान्तविरुद्धकरणमपसिद्धान्तः । तथात्वे सर्वनिग्रहस्थानानामपि तथात्वप्राप्तेः । किं नाम ? तदभ्युपगमो वस्तुतत्वानुसारेण वेति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अन्वितोपयुक्तापुनरुक्तकृतकार्यप्रयोगोऽधिकम् । तत् पञ्चविधम् । हेतूदाहरणोपनयदूषणानुवादाधिकभेदेन । प्रतिज्ञानिगमनयोराधिक्यं एकार्थत्वे पुनरुक्तं, अन्यार्थत्वे प्रकृतसङ्गतावर्थान्तरं, असङ्गतावपार्थकम् । द्विविधं चैतत् विशेषतः सामान्यतश्च । तत्राऽद्यं यथा ‘धूमवत्वादालोकविशेषवत्वादिति, धूमवत्वादेः’ इति वा । द्वितीयं यथा ‘यथा महानसः पाकस्थानमिति, यथा महानसाऽदिः’ इति वा । तृतीयं यथा ‘तथा चायं धूमवानालोकविशेषवानिति, धूमाऽदिमान्’ इति वा । चतुर्थं यथा ‘अनैकान्तिको हेतुः कालातीतश्चेति, अनैकान्तिकाऽदिः’ इति वा । पञ्चमं तु अदूष्यभागस्य स्ववचनेनानुवादः आदिशब्देन वेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रतीतार्थस्य पुनः स्ववचनेन प्रयोजनेन विना अभिधानं पुनरुक्तम् । तत् त्रिविधम् । अर्थतः शब्दतोऽप्याक्षेपतश्चेति । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् गिरिर्वह्निमान्’ इति । द्वितीयं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति । तृतीयं यथा ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति इत्युक्त्वा ‘बहिरस्ति’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिनोक्तस्य प्राश्निकैर्विज्ञातार्थस्य वादिना परिषदा वा पुनरनूद्य दत्तस्योच्चारणयोग्यस्य स्वाज्ञानमनाविष्कुर्वता कथामविच्छिन्दता यत् अप्रत्युच्चारणम् तत् अननुभाषणम् । तत् पञ्चविधम् । यत्तदित्याद्यनुवादः दुष्यैकदेशानुवादः अन्यथानुवादः केवलं दूषणोक्तिः तूष्णीम्भावे दूषणाद्यप्रतीतेः, दूषणमात्राभिधाने निराश्रयदूषणस्यादूषकत्वात्, अन्यथानुवादे व्यधिकरणत्वात्, दूष्यैकदेशानुवादे विशिष्टादूषणात्, यत्तदित्याद्यनुवादे अननुवादाविशेषात् । न च दूषणस्वरूपयोग्यतया दूष्यविशेषसिद्धिः । सन्दिग्धत्वादिना सर्वस्यापि दूष्यत्वात् । योग्यमेवायं ब्रवीतीति नियमाभावात् । न च पञ्चममज्ञानमप्रतिभा वा । ज्ञातार्थस्य स्फुरदुत्तरस्यापि सभाक्षोभादिना तूष्णम्भावोपपत्तेः । तथा चाननुभाषणमेव निर्णीतं, नान्यदिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिना त्रिरभिहितस्यापि परिषदा विज्ञातार्थस्य वाक्यस्यार्थाप्रतिपत्तिरज्ञानम् । तच्चाज्ञानम् आविष्करणेन ज्ञातव्यम् । यथा ‘नास्यार्थो ज्ञायते मया’ इति । अनाविष्करणे तु अननुभाषणमेव ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिनोक्तस्य प्रत्युत्तराप्रतिपत्तिरप्रतिभा । सा चानूद्य तूष्णीम्भाव एव । अननुवादेत्वननुभाषणत्वात् । श्लोकपाठादावर्थान्तरप्रसङ्गात् इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "केनचित् व्याजेन कथाविच्छेदो विक्षेपः । यथा ‘अद्य मे महत् प्रयोजनमस्ति । तस्मिन्नवसिते वक्ष्यामि’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनिष्टभ्रमेणेष्टापादनं मतानुज्ञा । यथा केनचित् स्वस्य चोरत्वमभ्युपेत्य ‘त्वं चोरः पुरुषत्वात्’ इत्युक्ते ‘तर्हि तवापि चोरत्वप्रसङ्ग’ इति । न ह्यनेनात्मनश्चोरत्वं परिहृतम् । नाप्ययं प्रसङ्गः इष्टापत्तिरूपत्वात् इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अवश्योद्भाव्यतया प्राप्तनिग्रहस्थानानामनुद्भावनं पर्यनुयोज्योपेक्षणम् । न चेदमप्रतिभैव । स्फुरतोऽपि दोषस्याल्पत्वादिनोपेक्षणसम्भवात् । प्राश्निकैरुद्भाव्यमेतत् । वादिनैव वा ‘अस्य व्यामोहायेदं मयोक्तं नानेन ज्ञातम्’ इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अतन्निग्रहप्राप्तौ तन्निग्रहोद्भावनं निरनुयोज्यानुयोगः । तच्चतुर्विधम् । छलं जातिः हान्याद्याभासोऽप्राप्तकाले ग्रहणं चेति । छलजाती वक्ष्येते । हान्याद्याभासो द्विविधः । सर्वथा हान्याध्यभावप्राप्तौ तदुद्भावनम् अन्यप्राप्तावन्योद्भावनञ्चेति । तत्राद्योऽपि द्विविधः । सादृश्यादिना भ्रान्त्या, व्यामोहनाय वेति । द्वितीयो भ्रान्त्यैव । भ्रान्त्या यथा, अनेकविकल्पस्फुरणेन विकल्पयतोऽनिष्टविकल्पत्यागे प्रतिज्ञाहानिरित्यादि । द्वितीयो यथा । प्रतिज्ञाहान्यादौ प्रतिज्ञान्तरादि इत्यादि । तत्तदुद्भावनावसरमप्राप्य अतिक्रम्य वा तन्निग्रहस्थानोद्भावनं अप्राप्तकाले ग्रहणम् । अनुक्तोच्यमानोक्तग्राह्यभेदात् त्रिविधो ह्युद्भावनकालः । तत्रोच्यमानग्राह्यमुत्तरं उद्भावयतो निग्रहस्थानम् इत्यादि ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यत्किञ्चिच्छास्त्रसिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरुद्धाङ्गीकारेऽपसिद्धान्तः । प्रामाणिकतया अङ्कीकृतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः । सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसिद्धान्तभेदात् । सर्वशास्त्राविरुद्धोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः । यथा प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । स्वशास्त्रमात्रसिद्धोऽर्थः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः । यथा नैयायिकानामीश्वरप्रामाण्यम् । एकस्य सिद्धावानुपङ्गिको योऽर्थः सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा ईश्वरस्य र्स्वकर्तृत्वसिद्धौ सार्वज्ञ्यम् । शास्त्रान्तरे परीक्षितः स्वशास्त्रे चानिषिद्धोऽभ्युपगमसिद्धान्तः । यथा मनस इन्द्रियत्वम् । अपसिद्धान्तोऽप्यतश्चतुर्विधः । यथा इदानीमिव सर्वत्र दृष्टान्नाधिकमिष्यते इति प्रतितन्त्रसिद्धान्तमभ्युपगतवतो मीमांसकस्य सर्गप्रलयाभ्युपगम इत्यादि । न चायं प्रमाणविरोधः । उभयोस्तदाचार्याेक्तौ प्रामाण्यासम्मतेः । तत्रैव प्रमाणविरोधप्रसरात् । मूलप्रमाणे च सन्देहादिति ॥ २१ ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "हेतोरुक्तरूपेषु पक्षव्यापकत्वादिषु कैश्चिद्युक्ताः केनचिद् रहिता हेत्वाभासाः । ते चासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितकालात्ययापदिष्ट प्रकरणसमसत्प्रतिपक्षाः । तत्र व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वप्रतीतिः सिद्धिः । तद्रहितोऽसिद्धः । स चतुर्विधः । व्याप्तपक्षतद्धर्मत्वैतत्प्रतीतिराहित्यभेदात् । तत्र व्याप्यत्वासिद्धो द्वेधा । स्वरूपतो वैयर्थ्येन चेति । तत्राद्यो यथा ‘यत् सत् तत् क्षणिकं यथा घटः’ इति । व्यर्थविशेषणासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यः सामान्यवत्वे सति कृतकत्वात्, इति । व्यर्थविशेष्यासिद्धो यथा ‘कृतकत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । आश्रयासिद्धो द्वेधा । धर्मिणः साध्यत्वस्य चाभावात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्राद्यो यथा ‘प्रधानं नित्यं अकार्यत्वात्’ इति । आश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘प्रधानपुरुषौ नित्यौ अकार्यत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘परमाणवो नित्याः अकार्यत्वात्’ इति । पक्षधर्मत्वासिद्धः पञ्चविधः । तत्र स्वरूपासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यश्चाक्षुषत्वात्’ इति । व्यधिकरणासिद्धो यथा ‘घटस्य कृतकत्वात्’ इति । विशेषणासिद्धो यथा ‘चाक्षुषत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । विशेष्यासिद्धो यथा ‘सामान्यवत्वे सति चाक्षुषत्वात्’ इति । भागासिद्धो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सन्दिग्धव्याप्यत्वासिद्धो यथा ‘स श्यामो मित्रातनयत्वात्’ । सोपाधिकत्वेन व्याप्यत्वसन्देहात् । सन्दिग्धाश्रयासिद्धो यथा । ‘भविष्यद्देवदत्तपुत्रो ब्राह्मणः ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धाश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘देवदत्तः तद्भविष्यत्पुत्रश्च वेदयोग्यौ ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धासिद्धो यथा, धूमबाष्पाविवेके ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेषणासिद्धो यथा ‘विमतो रागादियुक्तः सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वे सति पुरुषत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेष्यासिद्धो यथा ‘पुरुषत्वे सति सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वात्’ इति । सन्दिग्धभागासिद्धो यथा । एकत्र धूमनिश्चये अन्यत्रानिश्चये ‘पर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’ इति । विशेषणवैयर्थ्यादौ सन्देहो न सम्भवति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षविपक्षयोरेव वर्तमानो हेतुर्विरुद्धः । स द्विविधः। विद्यमानसपक्षोऽविद्यमानसपक्षश्चेति । प्रत्येकं चतुर्विधः । तत्र सति पक्षे पक्षविपक्षव्यापको यथा ‘नित्यः शब्दः कार्यत्वात्’ इति । पक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सामान्यवत्वे सति अस्मदादिबाह्यैकेन्द्रियग्राह्यत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिविपक्षव्यापको यथा ‘पृथिवी नित्या कृतकत्वात्’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "असति सपक्षे प्रथमो यथा ‘शब्द आकाशविशेषगुणः प्रमेयत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । तृतीयो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । चतुर्थो यथा ‘अपदात्मकत्वात्’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षत्रयवृत्तिरनैकान्तिकः । सोऽपि बहुविधः । तत्र पक्षत्रयव्यापको यथा । शब्दोऽनित्यः प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षव्यापकः सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘अयं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘नायं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षत्रयैकदेशवृत्तिर्यथा ‘पृथिवी नित्या प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षैकदेशवृत्तिर्विपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः सपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी न द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति। सपक्षविपक्षव्यापकः पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा आकाशात्ममनांसि द्रव्याणि क्षणिकविशेषगुणरहितत्वात्’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साध्यासाधकः पक्ष एव वर्तमानो हेतुरनध्यवसितः । स चानेकप्रकारः । तत्राविद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘कार्यत्वात्’ इति । विद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘शब्दो नित्यः आकाशविशेषगुणत्वात्’ इति । तदेकदेशवृत्तिर्यथा ‘सर्वं द्रव्यमनित्यम् क्रियावत्वात्’ इति । विद्यमानविपक्षोऽविद्यमानसपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वं कार्यमनित्यं उत्पत्तिमत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सावयवत्वात् इति । एते चासिद्ध्यादयः उभयान्यतरसम्मत्या द्वेधा भवन्ति । विरुद्धादित्रयस्यासिद्धसाङ्कर्येऽपि उभयव्यवहारविषयत्वादविरोधः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमाणबाधितविषयः कालात्ययापदिष्टः । सोऽप्यनेकविधः। तत्र प्रत्यक्षबाधितो यथा ‘अग्निरनुष्णः पदार्थत्वात्’ इति । प्रत्यक्षबाधितैकदेशो यथा ‘जलानलौशी पदार्थत्वात्’ इति । अनुमानबाधितो यथा ‘देवदत्तश्चक्षूरहितः पुरुषत्वात्’ इति । अनुमानबाधितैकदेशो यथा ‘देवदत्तश्चक्षुर्विषाणरहितः पुरुषत्वात्’ इति । आगमबाधितो यथा ‘सुरा ब्राह्मणेन पेया द्रवद्रव्यत्वात् इति । आगमबाधितैकदेशो यथा ‘सुरासोमौ ब्राह्मणेन पेयौ द्रवद्रव्यत्वात्’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्वपरपक्षसिद्धावपि त्रिरूपो हेतुः प्रकरणसमः । यथा ‘विमतं मिथ्या दृश्यत्वात्’ इति । सत्यत्वेऽप्यस्य प्रयोक्तुं शक्यत्वात् । उभयत्र त्रैरूप्यञ्च वादिप्रतिवादिनोराभिमानिकमिति नासम्भवः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "समबलतयाभिमतप्रमाणविरुद्धः सत्प्रतिपक्षः । तत्र प्रत्यक्षविरुद्धो यथा ‘विमतः शङ्खः शुक्लः शङ्खत्वात्’ इत्यत्र प्रत्यक्षात् ‘पीतः किं न स्यात्’ इति । अनुमानविरुद्धो यथा ‘आकाशं नित्यं अमूर्तद्रव्यत्वात्’ इत्यत्र ‘आकाशमनित्यंअस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यगुणाश्रयत्वात्’ इत्यनुमानात् अनित्यमपि किं न स्यात् इति । आगमविरुद्वो यथा ‘प्रधानं न स्वतन्त्रं जडत्वात्’ इत्यत्र कापिलागमात् ‘स्वतन्त्रमपि किं न स्यात्’ इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उदाहरणरूपेषु कैश्चिद्युक्ताः कैश्चिद्रहिता उदाहरणाभासाः । ते चानेकप्रकाराः । तत्र साधर्म्योदाहरणे तावत् साध्यवैकल्यम् यथा, मनोऽनित्यं मूर्तत्वात् ‘यन्मूर्तं तदनित्यं यथा परमाणुः’ इति । साधनवैकल्यम् यथा ‘यथा कर्म’ इति । उभयवैकल्यम् यथा ‘यथाकाशम्’ इति । आश्रयहीनम् यथा ‘यथा शशविषाणम्’ इति । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् घटवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यदनित्यं तन्मूर्तम् यथा घटः’ इति । वैधर्म्योदाहरणे साध्याव्यावृत्तिर्यथा ‘यदनित्यं न भवति तत् मूर्तं न भवति यथा कर्म इति । साधनाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा परमाणुः’ इति । उभयाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा घटः’ इति । आश्रयहीनत्वम् पूर्ववत् । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् आकाशवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यन्मूर्तं न भवति तदनित्यं न भवति यथाकाशम्’ इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सन्दिग्धसाध्यो यथा ‘अयं महाराज्यं करिष्यति सोमवंशोद्भूतत्वात् राजपुत्रान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धसाधनो यथा ‘अयं न सर्वज्ञः रागादिमत्वात् रथ्यापुरुषवत्’ इति । सन्दिग्धोभयो यथा ‘देवदत्तपुत्रः स्वर्गं गमिष्यति धर्मवत्वात् देवतान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धाश्रयो यथा ‘यथा भविष्यद्देवदत्तपुत्रः’ इति । एतेष्वेव प्रयोगेषु सन्दिग्धसाध्याव्यवृत्तो यथा ‘यथा अन्यो राजपुत्रः’ इति । सन्दिग्धसाधनाव्यावृत्तो यथा ‘यथा समस्तशास्त्राभिज्ञः’ इति । सन्दिग्धोभयाव्यावृत्तो यथा ‘यथा रथ्यापुरुपः’ इति । सन्दिग्धाश्रयः पूर्ववदिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तर्कपराहतिश्च प्रागुदिताऽत्माश्रयाऽदिप्रसङ्गदुष्टत्वमिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनुकूलतर्काभावे तु उपाधिव्यभिचारशङ्क्या व्याप्यत्वासिद्धिर्भवति। यद्यप्युदाहरणाभासादयो हेत्वाभासेष्वन्तर्भवन्ति । तथापि तद्रूपेणोद्भाव्यत्वात् पृथगुपादानमिति । एतेषु यानि निग्रहस्थानानि विरोधादिष्वेवान्तर्भूतानि । वक्तृदोषाणां प्रतिज्ञाहान्यादीनां कथमुपपत्तिवचनदोषेषु विरोधादिष्वन्तर्भावः ? इत्यत उक्तम् ॥ संवादानुक्तियुता इति ॥ शक्तिवैकल्यात् विप्रतिपन्नप्रमेयाङ्गीकारः संवादः । वक्तव्ये प्राप्ते शक्तिवैकल्यादेव तूष्णीम्भावोऽनुक्तिरिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " यदुक्तम् त्रीण्येव प्रमाणानीति तदयुक्तम् । साक्षिणः पृथक् प्रमाणत्वात् इत्यतस्तस्य प्रत्यक्षान्तर्भावज्ञापनार्थम् सिंहावलोकनन्यायेन तद्विभागमाह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रत्यक्षं सप्तविधम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "साप्तविध्यं कथम् ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "साक्षिषडिन्द्रियभेदेन ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविधमिन्द्रियम् । प्रमातृस्वरूपं तदतिरिक्तञ्चेति । तत्र स्वरूपेन्द्रियं साक्षीत्युच्यते । स च ज्ञानरूपः । तस्य आत्मस्वरूपत्वम् तद्धर्माश्च सुखादयो बहिश्चाकाशकालादयोऽपि विषयाः । सुखादीनां भिन्नेन्द्रियविषयत्वे कदाचिदपरोक्षभ्रमविषयतापातात् । अनन्यथात्वनियमः साक्षिण एव हि धर्मः न त्वन्यस्य । न च कालादेरसाक्षिविषयत्वम् । रूपाद्यभावेन चक्षुराद्यविषयत्वात् । मनसो बहिरस्वातन्त्र्याभ्युपगमात् । अननुसंहितव्याप्तीनामपि प्रतीतेः नानुमानात् तज्ज्ञानम् । जातिबधिराणामप्युपलम्भेन नागमविषयतापीति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अस्वरूपं च षड्विधम् । श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणमनोभेदात् । एवमिन्द्रियाणां भेदेन तत्सन्निकर्षाऽत्मकं प्रत्यक्षमपि सप्तविधमिति ॥ इदं च न सार्वत्रिकमिति । चतुर्विधं हि प्रत्यक्षम् ईशलक्ष्मीयोग्ययोगिप्रत्यक्षभेदेन । तत्रेशलक्ष्मीप्रत्यक्षं सर्वदा स्वरूपेन्द्रियसन्निकर्षात्मकमेव। स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः । योगिनामयोगिनां च आ मुक्तेः उभयविधेन्द्रियसन्निकर्षात्मकम् । तत्र योगिनां देशकालवस्तुस्वभावव्यवहितार्थमपि विषयी करोति । अयोगिनां तु देशकालाद्यव्यवहितमेवेति । द्विविधं चैतत् । अतीतवर्तमानतावच्छिन्नविषयम् । यथा ‘सोऽयं घटः’ इति प्रत्यभिज्ञाहेतुसंस्कारसहकृतम् । वर्तमानविषयं च । यथा ‘अयं घटः’ इत्यादिज्ञानहेतुरिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "निर्विकल्पकसविकल्पकभेदात् द्विविधं प्रत्यक्षमित्येके । यत् द्रव्यगुणादिस्वरूपमात्रावगाहि न तु तद्विशेषणविशेष्यभावविषयं तत् निर्विकल्पकम् । यथा ‘यत्किञ्चिदेतत्’ इति, ज्ञानसाधनम्, प्राथमिकम् । सञ्ज्ञागुणकर्मजाति विशिष्टार्थविषयं सविकल्पकम् । यथा ‘शुक्लो ब्राह्मणो गच्छति’ इति । द्वितीयम् इति ।निर्विकल्पकमेव प्रत्यक्षमित्यपरे । तदेतदयुक्तम् । गुणाऽदेर्द्रव्येणात्यन्तभेदस्य निर्विशेषाभेदस्य चाभावेन विशिष्टबोधस्यैव साक्षिसिद्धत्वात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एतेनैतदपि निरस्तम् । यदाहुः ‘सन्निकर्षः षोढा भिद्यते। संयोगः संयुक्तसमवायः संयुक्तसमवेतसमवायः समवायः समवेतसमवायः विशेषणविशेष्यभावश्चेति । तत्र चक्षुःस्पर्शनाभ्यां संयोगेन घटादिज्ञानं,मनसा आत्मज्ञानम् । तैः संयुक्तसमवायेन स्वविषयद्रव्यसमवेतगुणकर्मसामान्यज्ञानं, घ्राणेन गन्धज्ञानं, रसनेन रसज्ञानम् । तैरेव संयुक्तसमवेतसमवायेन गुणकर्मसामवेतसामान्यज्ञानम् । श्रोत्रेण समवायेन शब्दज्ञानम् । तेनैव समवेतसमवायेन शब्समवेतसामान्यज्ञानम् । तत्तदिन्द्रियैर्विशेषणविशेष्य भावेन स्वस्वविषयवृत्तिसमवायाभावज्ञानम् । सोप्युक्तपञ्चविधसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशेष्यभावत्वेन पञ्चविधः । यथा ‘घटे रूपसमवायः’ इत्यादि । यथा च ‘इह भूतले घटाभावः’ इत्यादि । न हि द्रव्यात् गुणाऽदिकमन्यत् । येन तत्सम्बन्धः समवायः सम्भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "ननु स्मृतिः केवलप्रमाणम् न वा । आद्ये केवलस्य उत्पत्ति मतोऽनुप्रमाणजन्यत्वं वाच्यम् । अतःतद्धेतोः संस्कारस्य प्रामाण्यमङ्गीकार्यम् । ततश्च नोक्तविभागो युक्तः । नहि संस्कारो यादृच्छिकसंवादी । येनाप्रमाणमपि केवलस्य हेतुः स्यात् । चक्षुरादिसाम्यात् । नचासावुक्तेऽन्तर्भवति । अनिन्द्रियसन्निकर्षरूपत्वात् । अज्ञातस्यैव करणत्वात् नानुमानागमयोः । द्वितीये केवलप्रमाणलक्षणस्यातिव्याप्तिः । स्मृतेरपि यथार्थज्ञानत्वात् इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".मानसप्रत्यक्षजा स्मृतिः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "भवत्येव स्मृतिः केवलप्रमाणम् । न तैवं संस्कारस्य पृथक्प्रामाण्याभ्युपगमप्रसङ्गः । स्मृतेर्मानसप्रत्यक्षत्वाभ्युपगमात् । द्विविधं हि ज्ञानं मनो जनयति । तत्तदिन्द्रियाधिष्ठातृत्वेन तत्तदिन्द्रियविषयम्, स्वातन्त्र्येण स्मरणं चेति । संस्कारस्तु प्रत्यासत्तिमात्रम् । न तावता प्रत्यक्षजन्यत्वाभावः प्रत्यभिज्ञावदेवेति । न च वाच्यमतीतेन मनसः सन्निकर्षायोगेन अप्रत्यक्षजन्यत्वं स्मृतेरिति । अतीतादिविषययोगिप्रमायामपि तथात्वापातादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " स्मृतिः केवलप्रमाणमेव न भवति । गृहितमात्रग्राहित्वात् । अनुवादवत् । अतः कथं प्रत्यक्षप्रमाणजन्यत्वम्? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्मृत्यनुवादयोर्नाप्रामाण्यम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न हि गृहीतग्राहित्वेन स्मृतेरनुवादस्य चाप्रामाण्यं वाच्यम् । तथा सति प्रत्यक्षाऽदिसिद्धार्थानुवादकस्य ‘अग्निर्हिमस्य भेषजम्’ इत्यादरप्रामाण्यप्रसङ्गात् । अतो गृहीतग्राहित्वेऽपि स्मृतेरनुवादवत् प्रामाण्यमेव यथार्थत्वात् इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अन्यस्त्वाह । न स्मृतिः प्रमाणम् अयथार्थत्वात् । न हि यदा याहशोऽर्थः स्मर्यते तदाऽसौ तादृशः पूर्वावस्थाया निवृत्तत्वात् । अतो नानुप्रमाणजन्यत्वमिति । तत्राऽह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "यथार्थत्वानुभवात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्मृतेर्नाप्रामाण्यमित्यनुवर्तते । न हि यदा यादृशोऽर्थो विषयीक्रियते तदा तस्य तादृशत्वे प्रमाणस्य याथार्थ्यम् । तथा सति अतीतादिविषयानुमानादेः अयथार्थत्वाऽपातात् । किं नाम ? यद्देशकालतया योऽर्थो यादृशो विषयी क्रियते तस्य तद्देशकालयोस्तादृशत्वे । तादृशं च याथार्थ्यं स्मृतेः साक्षिसिद्धम् । ‘तत्र तदा असौ तादृशः’ इति स्मृतिरर्थं विषयीकरोति । न हि ‘तत्र तदासौ न तादृशः’ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न च वाच्यम् न निवृत्तपूर्वावस्थतया स्मृतिरर्थं विषयीकर्तुमीष्टे । तथाननुभवात् । अननुभूतविषयत्वे अतिप्रसङ्गात् इति । अननुभूतैतावन्मात्रविषयत्वस्य साक्षिसिद्धत्वेनातिप्रसङ्गायोगात् । तदिदमुक्तम् । यथार्थत्वानुभवादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "किञ्च स्मृतिप्रामाण्याङ्गीकारे अनिष्टाभावात् तदङ्गीकारो युक्त इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अहानेश्च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "हानिपदमनिष्टमात्रोपलक्षणम् । एतेनैव ‘तर्को न प्रमाणम् किं तु प्रमाणानामनुग्राहकः । प्रमाणविषयविपर्ययशङ्काव्यवच्छेदस्तदनुग्रहः’ इत्येतदपास्तम् । तस्याप्यनुमानवत् यथार्थत्वानुभवात् अहानेश्च इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "विरोधाऽदिषु सर्वनिग्रहस्थानानामन्तर्भाव इत्युक्तम् । तत्प्रदर्शनार्थं विरोधे तावद्विषयं विवेचयति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "विरोधो मानस्ववाक्याभ्याम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविध इति शेषः । विरोधो द्विविधः । समयबन्धाऽदिरूपवत्यां कथायां सर्वरूपसाधारणोऽसाधारणश्चेति । तत्र असाधारणः प्रमाणेन स्ववाक्येन चेति द्विविधो भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "स्ववाक्यविरोधं विभज्य दर्शयति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्ववाक्यविरोधोऽपसिद्धान्तजातिरूपेण ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविध इति शेषः । पूर्वाचार्यवचनस्यापि स्वाभ्युपगतत्वेन स्ववाक्यत्वात् अपसिद्धान्तः स्ववाक्यविरोधो भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्वव्याहतिर्जातिः । एकवाक्यविषयत्वान्नापसिद्धान्तेऽतिप्रसङ्गः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "त्रिविधा स्वव्याहतिः एकवाक्यगतपदादेरन्योन्यप्रतिस्पर्धित्वं स्वक्रियाविरोधः तद्वाक्यन्यायेन तद्वाक्यविरोधश्चेति । तत्र समयबन्धादौ प्रमाणविरोधादिप्रपञ्चः स्वयमेव उदाहर्तव्य इति सूचयन् आद्यजातिं तावत् प्रतिज्ञायामुदाहरति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "जातिः ‘न मेये मानापेक्षा ’\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इत्यादिका मानसापेक्षं हि ज्ञेयं मेयमुच्यते । तस्य प्रमाणनिरपेक्षत्वप्रतिज्ञा ‘मे माता वन्ध्या’ इतिवत् व्याहता भवति । आदिपदेन समयबन्धादावपि इयमेवोदाहर्तव्येति सूचयति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्वितीयजातेरपीदमेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥ मेयं मानानपेक्षम् इति वदति । तज्ज्ञापनाय प्रमाणं चाभिधत्ते । अतो ‘मूकोऽहम्’ इतिवत् स्वक्रियाविरोध इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तृतीयाया अप्येतदेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " तत्कथम् इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "मेये मानापेक्षाऽस्तीति च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तेनैव न्यायेन सिद्धत्वात् । यथा ‘मेये मानापेक्षा नास्ति’ इत्येतन्मेयं मानापेक्षम् । अन्यथा तत्प्रतिज्ञावैयर्थ्यात् । तन्न्यायेनैव ‘विप्रतिपन्नमेयेऽपि मानापेक्षाऽस्ति’ इत्यस्य अर्थस्य साधयितुं शक्यत्वात् इयमेव प्रतिज्ञा तृतीयजात्युदाहरणं भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "न केवलमियं जातिः स्ववाक्यविरोधान्तर्गता । किं तु ? मानविरोधेऽपि इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "मानविरोधश्च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘विप्रतिपन्नं प्रमेयं प्रमाणसापेक्षं प्रमेयत्वात् मेये मानापेक्षा नास्तीतित्येतन्मेयवत्’ इत्यनुमानसम्भवात् प्रमाणविरोधे चेयं जातिरन्तर्भवतीति पूर्वावृत्त्या योजनीयम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तदनेन प्रतिज्ञासन्न्यासविरोधापसिद्धान्तानां निरनुयोज्यानुयोगे च जातेः विरोध एवान्तर्भावः सूचितो भवति । सन्न्यासस्य मानसिद्धापलापरूपत्वात् । प्रतिज्ञाविरोधस्य एकवाक्यगतपदाऽदिविरोधरूपत्वात् । अपसिद्धान्तस्य साक्षात् ग्रहणात् । परोक्तजातेः प्रतिषेधाऽत्मकतृतीयजातिरूपत्वादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्रानभ्युपेतयुक्ताङ्केन प्रतिप्रमाणेन प्रतिपक्षतया प्रत्यवस्थानं प्रतिधर्मसमः । स च साधर्म्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमः वैधर्म्येण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमः । यथा ‘यदि महानससाधर्म्यात् हृदवैधर्म्यात् द्वाभ्यां वा धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि हृदसाधर्म्यात् द्रव्यत्वात् निरग्नि मान् किं न स्यात् अविशेषात्’ इति । तथा ‘महानसवैधर्म्यात् पर्वतत्वात् अनग्निकः किं न स्यात्’ । एवं द्वाभ्यां प्रत्यक्षाऽदिना च प्रत्यवस्थानोदाहरणं द्रष्टव्यम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र युक्ताङ्गहीनप्रतिप्रमाणोपलम्भो द्वारम् । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । व्याप्त्याद्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षायां ‘नेदं साधकं सत्प्रतिपक्षत्वात्’ इति जात्युत्तरमपि न दूषणं पदार्थत्वात् इति व्याघात इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिसाधनसामर्थ्येन साध्यस्यैव व्याप्तिं विना कस्यचिदनिष्टधर्मस्य दृष्टान्तात् पक्षे उत्कर्षः उत्कर्षसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् महानसवत् अग्निमान् पर्वतः तर्हि तत एव स्थाल्यादिमानपि स्यात् । अविशेषादिति । अत्र साधनसाहचर्यदर्शनमुत्थानबीजम् । विशेषविरुद्धत्वमारोप्यम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं विशेषविरुद्धत्वात् नित्यत्वसाधककृतकत्वत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि नित्यत्वसाधककृतकत्ववत् तत एव हेतोर्धूमवत्वस्यामूर्तवृत्तित्वं च स्यादित्युत्कर्शसाम्यात् व्याघात इति॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "दृष्टान्ते साध्यस्य साधनस्य वा व्यापकं किञ्ञ्चित् धर्ममारोप्य व्यापकनिवृत्त्य व्याप्यनिवृत्तिरिति पक्षे तन्निवृत्त्या साध्यसाधनयोरन्यतारपकर्षः अपकर्षसमः । यथा महानसे अग्निमत्वस्य धूमवत्वस्य वा व्यापकं स्थाल्यादिमत्वं पर्वतात् व्यावर्तमानं तत् व्यावर्तयति । व्यापकाभिमतव्यावृत्त्युपलम्भः अत्रोऽत्थानबीजम् । साध्यापकर्षे बाधितविषयत्वं सत्प्रतिपक्षत्वं वा आरोप्यम् । साधनापकर्षे असिद्धत्वम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गत्यागः । तदनभ्युपगमे ‘नेदं साधकं बाधितत्वात् अनुष्णत्वसाधकपदार्थत्ववत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि पदार्थत्वे असाधकत्वं बाधितविषयत्वं वा सर्वधर्मिनिष्ठत्वेन व्याप्तं दृष्टमिति धूमवत्वात् व्यावर्तमानमसाधकत्वाऽद्यपि व्यावर्तयतीत्यपकर्षसाम्यात् व्याहतिरिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः सपक्षस्यापि साध्यत्वाऽपादनं वर्ण्यसमः । असिद्धार्थत्वं आरब्धसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वं व्याप्तिग्राहकप्रमाणशून्यत्वं संशयसमानविषयत्वं स्वरूपविशेषश्चेत्येतानि हेतोः पक्षमाणविवक्षितरूपाणि । तत्रासिद्धार्थं पर्वत इव महानसे धूमवत्वं वर्तते न वा । आद्ये महानसोऽपि साध्यवत्वेन साध्यः स्यात् । अन्यथा साध्यवैकल्यापातात् । द्वितीये तद्रूपहेतुमत्या साध्यः स्यात् । अन्यथा साधनवैकल्यापातात् । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र पक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वादर्शनमुत्थानहेतुः साध्यसाधनवैकल्ये आरोप्ये ॥ ‘नायं दृष्टान्तः साधनाङ्गं साध्याऽदिविकलत्वात् सम्मतवत्’ इत्यत्रापि यथोक्तसाध्यत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । पक्षवृत्तिहेतुरूपाणां सपक्षवर्तिन्यपि सञ्चरणात् अविषयवृत्तित्वञ्च । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं वा सपक्षवृत्तिहेतोरयुक्तानामेवा सिद्धार्थत्वाऽदीनामङ्गीकारादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः पक्षस्य असाध्यत्वापादनमवर्ण्यसमः । सिद्धार्थत्वं प्रवृत्तसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वाभावः व्याप्तिग्राहकप्रमाणवत्वं निश्चयसमानविषयत्वं रूपभेदश्च इत्येतानि हेतोः सपक्षमात्रविवक्षितरूपाणि। तत्र सिद्धार्थं धूमवत्त्वं महानस इव पर्वते वर्तते न वा ? आद्ये साध्यस्य सिद्धत्वात् पक्षे न साध्यः स्यात् । द्वितीयेऽपि हेतोः स्वरूपासिद्धत्वेन असाध्यः स्यात् इति । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् । अत्र सपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्तया पक्षस्य असिद्धिः कारणम् । स्वरूपासिद्ध्यादि आरोप्यम् । वर्ण्यसमवदेव दुष्टत्वमूलमिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साधनस्य धर्मान्तरेण धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण वा व्यभिचारेण साधनस्यापि साध्यव्यभिचाराऽपादनं विकल्पसमः । तत्र साधनस्य धर्मान्तरेण व्यभिचारस्त्रिविधः । पक्षदृष्टान्तयोः पक्षयोर्दृष्टान्तयोश्चेति । तत्र आद्यो यथा ‘महानसे धूमवत्वमपर्वतत्वेन सह वर्तमानमपि यथा पक्षे तेन सह न वर्तते, तथा अत्र अग्निमत्वेन सह वर्तमानमपि पक्षे न तथा वर्तेत’ इति । द्वितीयो यथा ‘यथा गिरिशिखरयोरुच्चनीचत्वाभ्यां धूमवत्त्वस्य व्यभिचारस्तथाऽग्निमत्वेनापि स्यात्’ इति । तृतीयो यथा ‘यथा महानसयोरल्पत्वमहत्वाभ्यां धूमवत्वं व्यभिचरति तथा अग्निमत्वेनापि व्यभिचरेत्’ इति । धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण यथा ‘यथा द्रव्यत्वमग्निमत्वव्यभिचारि तथा धूमवत्वमपि स्यात्’ इति । धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण यथा ‘यथा रूपं रसव्यभिचारि तथा धूमवत्वमग्निमत्वव्यभिचारि स्यादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र क्वचिद्व्यभिचारदर्शनमुत्थानहेतुः । अनैकान्तिकत्वमारोप्यम्। अन्यत्र व्यभिचारेणत्र व्यभिचाराऽपादने व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं अनैकान्तिकत्वात्’ इति प्रतिषेधहेतोरपि तथात्वाऽपातेन व्याघातः’ इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षाऽदीनां सिद्धानामपि तेनैव हेतुना साध्यत्वापादनं साध्यसमः । यथा पर्वताऽदिसिद्ध्यर्थमपि धूमवत्वमेव प्रयोक्तव्यम् । अन्यथा क्रोडीकृतधर्म्यादिविषयस्य लिङ्गस्य तत्राप्रयोजकत्वे साध्येऽपि तथात्वाऽपातात् । दृष्टान्तेऽपि साध्यसिद्ध्यर्थमयमेव हेतुः प्रयोक्तव्यः । अन्यथा पक्षेऽपि अप्रयोजकत्वाऽपातात् । अन्यत्समानम् । तथा च तत्सिद्ध्यर्थ यावत् न प्रयुज्यते तावदाश्रयाऽसिद्ध्यादीति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र विशिष्टसाधकत्वाभिमान उत्थानहेतुः । आश्रयासिद्ध्यादिकमारोप्यम् । एवं प्रतिषेधहेतावपि वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च तेनैव हेतुना सिद्धेरयुक्तत्वात् । सिद्धत्वमात्रेण साध्यसिद्धिदर्शनादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साधनस्य साध्याप्राप्तिपक्षनिरासेन प्राप्तिपक्षमवशेष्य तद्दूषणं प्राप्तिसमः । यथा धूमवत्वज्ञानम् अग्निमत्वज्ञानं प्राप्य उत्पादयति अप्राप्य वा । द्वितीयेऽतिप्रसङ्गात् प्राप्येति वक्तव्यम् । सता च प्राप्तिः इति प्रागेव अग्निमत्वज्ञानसद्भावात् व्यर्थमनुमानम् । एवं धूमवत्वज्ञानं अग्निमत्वं ज्ञापयति प्राप्य अप्राप्य वा । द्वितीये अतिप्रसङ्गात् प्राप्य इति वक्तव्यम् । लिङ्गज्ञानस्य साध्यप्राप्तिश्च विषयविषयिभाव एव सम्भवति । तथा च धूमवत्वज्ञाने वह्निमत्वस्यापि स्फुरणात् व्यर्थमनुमानमिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्राप्तिपक्षनिरासेन अप्राप्तिपक्षं शेषयित्वा तद्दूषणम् अप्राप्तिसमः । यथा, पूर्ववत् प्राप्तिपक्षस्य दुष्टत्वात् अप्राप्य इति वक्तव्यम् । न च तत् युक्तम् । न हि अप्राप्याग्निः काष्ठं दहति । न हि अप्राप्य दीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति । प्राप्तावुक्तानुपपत्तिदर्शनमुत्थानहेतुः । साध्यप्राप्तेर्हेतुविशेषणत्वेन विशेषणासिद्धिरारोप्या । पुर्ववत् दुष्टत्वमूलम् इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सिद्धस्यापि पक्षाऽदेः उत्पादकज्ञापकानवस्थाप्रसञ्जनं प्रसङ्गसमः। यथा, पर्वतस्यापि किम् उत्पादकम् ? तस्यापि अन्यत् इत्यनवस्था । कस्यचित् कारणाभावे अन्यस्यापि तत्प्रसङ्गात् । तथा प्रमाणेऽपि किं प्रमाणं ? तत्राप्यन्यदित्यनवस्था । कस्यचित् प्रमाणान्तरं विना सिद्धावन्यत्रापि तथात्वापातादिति । कारणाऽदिनियमाभिमानोऽत्र द्वारम् । तर्कपराहतिरारोप्या । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः अवस्थाङ्गमूलक्षतेरभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "हेतुं विना प्रतिदृष्टान्तमात्रेण बाधप्रतिरोधोद्भावनं प्रतिदृष्टान्तसमः । यथा ‘हृदवत् पर्वतो निरग्निरेव’ इति । ‘निरग्निकोऽपि किं न स्यात्’ इति वा । अत्र हेतुरनङ्गं साध्यातिदेशे इत्यभिमान उत्थानबीजम् । बाधादि आरोप्यम् । बाधाद्यङ्गस्य अधिकबलादेरनभ्युपगमात् युक्ताङ्गत्यागः । साधनस्य हेतुसाहित्यात् । अत्र तदनुपन्यासात्। तस्यानङ्गत्वे ‘प्रतिदृष्टान्तो न दूषकः रासभादिवत इति व्याघात् इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षादीनां प्रागुत्पत्तेः हेतुवृत्त्यभावेन असिद्ध्याद्युद्भावनं अनुत्पत्तिसमः । यथा पर्वतस्योत्पत्तेः प्रागपि पक्षत्वात् अनुत्पन्ने तस्मिन् अवृत्तेः धूमवत्वस्याश्रयभागासिद्धिः इत्यादि । अत्र अनुत्पन्नस्य स्वकार्यसामर्थ्याभिमानमुत्थानकारणम् । असिद्ध्यादि आरोप्यम् । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अनुत्पन्नस्य अङ्गत्वादेरयुक्ताङ्गाधिक्यादीति चेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सत्यपि निर्णयकारणे संशयकारणमात्रेण संशयापादनं संशयसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् अग्निमत्वनिश्चयः तर्हि हृदमहानससाधर्म्येण द्रव्यत्वेन तत्संशयः स्यात्’ इत्यादि । अत्र समानधर्माऽदिमात्रदर्शनं तद्रहितस्यैव निश्चायकत्वाभिमानश्चोत्थानहेतुः । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । निर्णयकारणराहित्यस्य संशयाङ्गत्वानङ्गीकारात् संशयकारणराहित्यस्य अयुक्तस्यैव निर्णयाङ्गताङ्गीकारात् युक्ताङ्गहानिः अयुक्ताङ्गाधिक्यञ्च । अन्यथा दूषकादूषकसाधर्म्याऽदिना जातावपि संशय प्रसङ्गसाम्यात् व्याघात इति ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अङ्गीकृतानधिकबलत्वेन बाधचोदनं प्रकरणसमः । यथा ‘द्रव्यत्वात् पर्वतो नाग्निमानेव’ इति । अत्र प्रतिप्रमाणोपलम्भ उत्थानहेतुः । बाध आरोप्यः । बाधकत्वेऽधिकबलवत्वस्याङ्गत्वात् युक्ताङ्गहानिः । बाधकस्य अधिकबलत्वानङ्गीकारे स्थापनयैव जातेर्बाधकप्राप्तेर्व्याहतिरिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "हेतोः साध्यात् पूर्वापरसहभावनिरासेन ओतुत्वचोदनं ओतुसमः । यथा दूमवत्त्वज्ञानं अग्निमत्वज्ञानात् अग्निमत्वाद्वा किं पूर्वभावि उतानन्तरभावि उत तेन समभावीति । नाद्यः । साध्याभावे तस्य साधनत्वायोगात् । न द्वितीयः । साधनाभावे साध्यस्य तत्वायोगात् । न तृतीयः । अविशेषेण साध्यसाधनभावायोगादिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रतितर्कप्रतीतिरत्रोत्थानहेतुः । अन्योन्याश्रयत्वमारोप्यम् । प्रतिषेधोऽपि किं प्रतिषेध्यात् पूर्वभावीत्यादेर्वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । कृतौ पूर्वभाविना पश्चाद्भाविजन्मदर्शनात् ज्ञप्तौ च यथायथं पूर्वभाव्यादिना पश्चाद्भाव्यादेः सिद्धिदर्शनात् तर्कस्य व्याप्तिहीनत्वेन युक्ताङ्गहानिश्च । साधनत्वादिव्यवहारस्य बुद्धिस्थसाध्यादिनोपपत्तेः । व्यापारेष्वन्यानपेक्षणात् । सहभावे च सिद्ध्यसिद्धिभ्यां विशेषादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "व्याप्तिं विना वाद्युक्तिमात्रेण ‘अर्थात् इदमाक्षिप्तं’ इत्यभिमानेनोक्तविपरीतारोपणेन दोषाभिधानं अर्थापत्तिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते अर्थात् आपद्यते ‘अन्यत् अनग्निमत्’ इति । तथा च साध्यविकलो दृष्टान्त इत्यादि । अत्र ‘विशेषविधिः शेषनिषेधं गमयति’ इत्यभिमानमुत्थानबीजम् । साध्यविकलत्वादि आरोप्यम् । व्याप्तेरभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षणे ‘धूमवत्वं असाधकं’ इत्युक्ते अर्यादापद्यते ‘अन्यत् सर्वं साधकं ‘इति ॥ तथा च दृष्टान्ताभावः इति व्याघातः इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साधनप्रतिबन्द्या तदितरधर्मेण तद्वतां सर्वपदार्थानामविशेषापादनं अविशेषसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् पर्वतमहानसयोरग्निमत्वाविशेषः तर्हि द्रव्यत्वात् सर्वद्रव्याणां अनित्यत्वं स्यादिति । कस्यचिद्धर्मस्य किञ्चिदसाधकत्व दर्शनमत्रोऽत्थानबीजम् । तर्कपराहतिः आरोप्या । व्याप्तिहीनत्वात् तर्कस्य युक्ताङ्गहानिरिति । अन्यथा ‘अस्य सम्प्रतिपन्नस्य च तर्कपराहतत्वेन असाधकत्वविशेष पदार्थत्वात् सर्वस्यानित्यत्वाविशेषः स्यात्’ इति व्याघात इति । अस्य सम्प्रतिपन्नस्य चेति । ‘धूमवत्त्वं असाधकं तर्कपराहतत्वात् तर्कपराहतहेत्वन्तरवत्’इत्यत्र त्वया पक्षीकृतधूमवत्त्वस्य दृष्टान्तीकृतस्य चेत्यर्थः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "मत्पक्षेऽपि किञ्चित् प्रमाणं भविष्यतीति तदुपपादनमुपपत्तिसमः । यथा ‘धूमवत्वं यथा अस्ति त्वत्पक्षे प्रमाणं तथा मत्पक्षेऽपि किञ्चित् भविष्यति पक्षत्वात्’ इति । अत्र सामान्यतः प्रमाणसम्भावना उत्थानबीजम् । बाधः प्रतिरोधो वा आरोप्यः । तस्यापि कश्चित् दोषो भविष्यतीति वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । युक्ताङ्गहानिश्च । उपन्यस्तं प्रत्यनुप न्यस्तस्य प्राबल्यादेर्वाधाद्यङ्गस्य अनिश्चयादिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिवाक्यस्यावधारणे तात्पर्यमारोप्य विकल्प्य तद्दूषणमुपलब्धिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते किं पर्वत एवाग्निमान् ? उत पर्वतोऽग्निमानेव ? इति । नाद्यः महानसादेरप्यग्निमत्वात् । न द्वितीयः कदाचिदनग्निमत्वात् इत्यादि । वाक्यस्यावधारणे तात्पर्यावश्यम्भावाभिमानोऽत्रोत्थान बीजम् । बाधादि आरोप्यम् । जात्युतरेऽपि अस्य साम्यात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं च अन्ययोगायोगव्यवच्छेदस्य अयोगादिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उपलब्ध्यादिविषयिधर्माणां स्वात्मनि तदतद्रूपतां विकल्प्य उभयथा व्याघातापादनं अनुपलब्धिसमः । यथा ‘उपलब्धत्वात् इदमस्ति’ इत्युक्ते सा उपलब्धिः स्वस्मिन्न् उपलब्धितया वर्तते न वा । आद्ये नोपलब्धिः प्रमेयवदुपलब्धत्वात् । द्वितीयेऽपि तथा। प्रमेयवत् स्वात्मनि तथा अवृत्तेः । तथा च उपलब्धित्वमसिद्धम् । एवं ‘अनुपलब्धेरिदं नास्ति’ इत्युक्ते अनुपलब्धिः स्वात्मनि अनुपलब्धितया वर्तते चेत् प्रमेयवदसती स्यात् । अवृत्तौ घटवत् नानुषलब्धिः । अनुपलब्ध्यभावात् अनुपलब्धत्वासिद्धिः इत्यादि । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र विषयिधर्मोपलब्धिः उत्थानबीजम् । असिद्ध्याद्यारोप्यम् । ‘असिद्धो हेतुः’ इत्यत्रापि असिद्धिः स्वात्मनि तथा वर्तते न वेति जातावपि सम्भवात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च स्वात्मनि तथावृत्तेरयुक्तत्वात् । विषये तथावृत्त्या तत्त्वोपपत्तेरिति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विवक्षितस्य कस्यचिद्धर्मस्य तदतद्रूपतां विकल्प्य तद्दूषणेन धर्मिणः तद्विशिष्टत्वभङ्गो नित्यसमः । यथा ‘शब्दोऽनित्यः’ इत्युक्ते अनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा । आद्ये शब्दोऽपि तथा स्यात् । न हि धर्मो नित्यः धर्मी चानित्य इति युज्यते । द्वितीये यदाऽनित्यत्वाभावस्तदा शब्दस्य नित्यत्वमिति सारूप्येण । वैरूप्येण तु अनित्यत्वं शब्दात् भिन्नमभिन्नं वा । आद्ये अनवस्था । द्वितीये अन्यतरमात्रावशेषे आश्रयासिद्ध्यादीत्यादि । अत्र धर्मधर्मिभावदर्शनमुत्थानबीजम् । तर्कपराहतिरारोप्या । धर्मधर्मिभावनिरासे जातेरप्यनुत्थानात् व्याघातः। तर्कस्य व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिसाधनप्रतिबन्द्या धर्मान्तरेण सर्वस्य साध्यधर्मवत्वापादनमनित्यसमः । यथा ‘यदि महानसवत् धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि सत्त्वात् सर्वमप्यग्निमत् स्यात्’ इति । अविशेषसमायां तु सर्वाविशेषमात्रापादनम् । अन्यत् समानम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनभ्युपगमे ‘यदि असाधक प्रतिबन्दीग्रस्तत्वात् इदमसाधकं तर्हि पदार्थत्वात् सर्वमप्यसाधकं स्यात्’ इति व्याघात इति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पक्षादीनामन्यतमस्यासिद्धिमुद्भाव्य तत्साधकत्वेन स्वयमेवोत्प्रेक्षितस्य दूषणेन वादि साधनभङ्गः कार्यसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते पर्वतस्यैवाभावादाश्रयासिद्धिः । ‘यदिप्रतीयमानत्वात् सोऽस्तीत्युच्यते तन्न । शुक्तिरजतादौ व्यभिचारात्’ इति । व्यवहर्तव्यद्वैतमत्र हेतुरुत्थानस्य । तत्तदङ्गसिद्धिरारोप्या । अस्य जातावपि तुल्यत्वेन व्याघातः । उत्प्रेक्षितदोषेण वाद्युक्तस्यासाधकत्वोक्तेरविषयवृत्तित्वञ्चेति ॥।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " अथ निरनुयोज्यानुयोगांशस्य छलस्यापि उक्तान्तर्भावमाह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "छलमसङ्गतम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "परोक्तस्यार्थान्तरं परिकल्प्य तद्दूषणेन परोक्तभङ्गः छलम् परोक्तदूषणस्यैव सङ्गतत्वेन अनुक्तारोपितदूषणं छलं असङ्गते अन्तर्भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " न केवलमसङ्गतं छलम् । किं तर्हि ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अन्यच्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "असङ्गतात् अन्योऽर्थदोषो विरोधः । तत्राप्यन्तर्भवति छलम् । छलवाक्यस्याप्यर्थान्तरं परिकल्प्य दूषणसम्भवेन स्ववचनन्यायेन स्वविरोधेऽन्तर्भावात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " निरनुयोज्यानुयोगांशान्तरद्वयस्याप्यसङ्गतान्तर्भावमाह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अन्यच्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उक्तात् छलात् जातेश्च अन्यत् निरनुयोज्यानुयोगांशद्वयं च असङ्गतमेव । प्राप्तस्यैव हान्यादेरुद्भावनप्राप्तकाल एव ग्रहणस्य च सङ्गतत्वात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "निग्रहस्थानान्तरस्यापि असङ्गतान्तर्भावमाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अन्यच्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उक्तात् अन्यदपि निग्रहस्थानं किञ्चित् असङ्गतमेव । यथा अर्थान्तरम् । प्रकृतोपयोगिन एव सङ्गतत्वात् । परबोधनार्थं प्रवृत्तस्य तदङ्गपदप्रयोग एव सङ्गत इति निरर्थकमपि । अत एव अविज्ञातार्थम् । अपार्थकस्य स्फुटस्तत्रान्तर्भावः । अप्राप्तकाले तु अवयवविपर्यासादि निग्रहस्थानमेव न भवति अर्थाविरोधात् छन्दोभङ्गादिवत् । अर्थविरोधि असङ्गतमेव । विवक्षित क्रमानुल्लङ्घने हि सङ्गतिः स्यात् । अन्यथाृनुभाषणं च, उक्तानुवादस्यैव सङ्गतत्वात् । प्राप्तदूषणोद्भावनस्यैव सङ्गतत्वेन पर्यनुयोज्योपेक्षणमपि असङ्गतिरेवेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " एवमुक्तादन्यच्च यथासम्भवमुक्तान्तर्भूतं द्रष्टव्यमित्याह– ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "अन्यच्च",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यथा, प्रतिज्ञाहानिः संवादे, अन्तर्भवति । अर्थतो हानिरसङ्गतावपि । प्रकृतदोषपरिहारे प्राप्ते ‘अन्यथास्तु’ इत्यस्य सङ्गत्यदर्शनात् । एवं प्रतिज्ञान्तरमपि । अविशिष्टदूषणाभ्युपगमात् तद्दूषणपरिहारस्यैव सङ्गतत्वात् । हेत्वन्तरमप्यनेनोक्तम् । न्यूनाधिके न्यूनाधिकयोः । तत्र अवयवन्यूनमदूषणमित्युक्तम् । एवं आभासानुद्धारः अनुकूलतर्कानुक्तिश्च । अबुभुत्सितोक्तेरेव दोषत्वात् । तर्कस्य पृथक्प्रमाणत्वात् । पुनरुक्तमधिकम् । उक्तात् अन्यत् अननुभाषणं न्यूनम्। तृष्णीम्भावः अनुक्तौ । अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपश्च, यत्किञ्चिदुक्तावपि प्रकृतोपयोगाभिमानाद्यभावात् । न ह्यनुक्तिरप्यात्यन्तिकी । किं तु ? प्रकृतोप्योगाभिमानादिना अनुक्तिः । मतानुज्ञायाः प्रयोजनविशेषात् पृथगन्तर्भावं वक्ष्यतीति । नचानेन त्रिविधो विरोधः इत्यादेर्गतार्थता । अनुमानविरोधविवेकाभावे हेत्वाभासादेरुक्तान्तर्र्भावाप्रतीतेरिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "छलं त्रिविधम् वाक्छलं सामान्यछलं उपचारछलञ्चेति ॥ तत्र मुख्यार्थविवक्षया प्रत्युक्तस्य मुख्यार्थान्तरकल्पनया तद्दूषणं वाक्छलम् । अभिप्रायान्तरकल्पनया तद्दूषणं सामान्यछलम् । अमुख्यार्थाभिप्रायेण प्रयुक्तस्य मुख्यार्थकल्पनया दूषणमुपचारछलम् । तत्र वाक्छलादेरसङ्गताद्यन्तर्भावस्फुरणायोपलक्षणतया वाक्छलमुदाहरति । गृष्टिविवक्षया ‘गां आनय’ इत्युक्ते पृथिवीविवक्षया ‘गवानयनमशक्यम्’ इतिवत् । एकवारप्रसूता गौः गृष्टिः । द्वितीयं यथा ‘अनूचानोऽयं ब्राह्मणः’ इत्युक्ते ‘युक्त मेव हि ब्राह्मणे अनूचानत्वम्’ इति सम्भावनाभिप्रायेण परेणाभिहिते ब्राह्मणत्वस्य हेतुत्वाभिप्रायकल्पनया ‘नैवं, व्रात्ये व्यभिचारात्’ इति प्रतिषेधः । तृतीयं यथा ‘सिंहो देवदत्तः’ इत्युक्ते ‘नैवं, सटाद्यभावात्’ इति । अत्र ‘गवानयनं न विधेयं अशक्यत्वात्’ इत्यादिछलवाक्ये ‘गवा नयनम्’ इत्येतदयुक्तंअनन्वितत्वात्’ इत्यादेश्छलस्य प्रवृत्तेर्विरोधत्वं ज्ञातव्यम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "रूढ्या योगेन वा प्रतिपाद्योऽर्थो मुख्यः । बहुलप्रयोगमात्रसिद्धा रूढिः प्रवृत्तिनिमित्तविवक्षया प्रवृत्तिर्योगः । अखण्डवृत्तिः रूढिः अवयववृत्तिर्योग इति वा । गौण्या लक्षणया वा वृत्त्या शब्दबोध्योऽर्थः अमुख्यः । मुख्यार्थगुणयुक्तार्थान्तरवृत्तिर्गौणी। मुख्यार्थसम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्लक्षणेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "PRL_C01_B05",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "avataranika",
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| "text": " हेत्वाभासादेः क्वान्तर्भावः ? इत्यतस्तं वक्तुमनुमानविरोधविभागमाह– ",
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "त्रिविधो विरोधः ",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अनुमानस्य साधारणोऽसाधारणश्च सम्भावित इति शेषः ।",
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "कथं त्रैविध्यम् ? इत्यत आह ",
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तभेदेन ",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र प्रतिज्ञापदेन पक्षोऽप्युपलक्ष्यते । हेतुपदेन लिङ्गञ्च । तथा दृष्टान्तपदेनोदाहरणम् । विरोधस्योभयदूषणत्वात् । प्रतिज्ञादिभेदेन साधनांशानां त्रैविध्यात् तद्विरोधस्त्रिविधः । विरोधपदं संयोज्य वा योज्यम् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधः साधारणः। अन्यावसाधारणौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "प्रतिज्ञाविरोधं लक्षयति ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रमाणविरुद्धार्थप्रतिज्ञाविरोधः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र प्रमाणविरोध एव हेत्वाभासानामन्तर्भावात् तस्य ग्रहणं, न स्ववाक्यविरोधस्य । ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": " हेतुविरोधं दर्शयति ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "हेतुस्वरूपासिध्दिव्याप्तिश्चेति हेतुविरोधः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र प्रथमहेतुशब्देन लिङ्गमुच्यते । यत् यत्र वादिना विवक्षितं तत्र तस्याप्रमितिः स्वरूपासिद्धिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "दृष्टान्तविरोधं दर्शयति ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "साध्यस्य साधनस्य वा अननुगमो दृष्टान्तविरोधः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उभयोर्वेति ग्राह्यम् । अननुगमो अनुगत्यप्रमितिः । साधर्म्य दृष्टान्तस्यायं विरोधः । साध्यस्य साधनस्य उभयोर्वा व्यावृत्त्यप्रमितिर्वैधर्म्यदृष्टान्तविरोधोऽपि द्रष्टव्यः । अनेन पक्षसाधनदृष्टान्तलक्षणराहित्यं प्रतिज्ञाहेत्वादिविरोधलक्षणं सूचितं भवति । तल्लक्षणविभागादि सङ्ग्रहेणैव ज्ञापयितुमियमुक्तिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " बाध एव प्रमाणविरोध इति मन्वान आह - सप्रतिसाधनोऽप्यन्योऽनुमानविरोधोऽस्ति । अतः कथमेवं त्रैविध्यं? इति । तत्राह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एव सप्रतिसाधनः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "द्विविधो हि प्रतिज्ञायाः प्रमाणविरोधः प्रबलप्रमाणेन समबलेन चेति । आद्योबाधकत्वेन । द्वितीयः प्रतिबन्धकत्वेन । तत्र योऽयं प्रतिज्ञायाः समबलेन प्रमाणेन विरोधः स सप्रतिसाधनसञ्ज्ञो भवति । अतो युक्तमुक्तमिति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवकारेणास्य हेतुविरोधत्वं व्यवच्छिनत्ति । प्रतिज्ञामात्र एवास्य स्फुरणात् । व्याप्त्यादिहेत्वङ्गस्यानेनाखण्डितत्वाच्च । एतेन प्रबलप्रमाणविरोधस्यापि हेतुविरोधत्वं प्रत्युक्तम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "उपाधिविरोधोऽप्यन्योऽस्तीत्याह– ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स एवोपाधिदोषोऽपि ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नोपाधिः स्वयमेव दोषः । किं तु दोषोन्नायक एव । स चोपाधिना उन्नेयो दोषः उपाधिदोषः प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एवान्तर्भवतीति नोक्तविरोधः । प्रकृतसाध्यव्यापकः प्रकृतसाधनाव्यापकः उपाधिः । स हि पक्षात् व्यावर्तमानः साध्यं व्यावर्तयन् प्रतिपक्षोन्नायको भवति ॥ उपाध्यभावस्य साध्याभावे लिङ्गत्वात् । उपाधेर्हि पक्षात् व्यावृत्तिः स्वव्यावृत्त्या साध्यव्यावर्तने शक्तिश्चापेक्षिता । तत्र साध्यव्यापक इत्येवोक्ते साधनव्यापकस्य साधनस्येव पक्षे वर्तमानत्वात् साध्यव्यापकोऽप्युपाधिर्न पक्षात् साध्यं व्यावर्तयेदिति साधनाव्यापकत्वं ग्राह्यम् ।तावत्येवोच्यमाने साध्याव्यापकस्य पक्षात् व्यावृत्तावपि साध्यव्यावर्तनसामर्थ्याभावात् वैयर्थ्यं स्यादिति साध्यव्यापकत्वमपि ग्राह्यम् । तथा च साधनाव्यापकत्वात् पक्षात् व्यावृत्त उपाधिः साध्यव्यापकत्वात् व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यनिवृत्तिरिति साध्यं व्यावर्तयतीति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उपाधिगतव्याप्यत्वोपजीवनात् सोपाधिको हेतुर्व्याप्यत्वासिद्धो भवतीत्येके । साध्यरहितस्य पक्षस्यैव विपक्षत्वात् तत्र वर्तमानो हेतुः व्यभिचारी स्यादित्यपरे तत् एवकारेण व्यवच्छिद्यते । यदा उपाधिव्यावृत्त्या पक्षे साध्याभावः सिद्धः तदैव परानुमानं दुष्टं स्यादिति पश्चाद्भाविना दोषेण पिष्टं पिष्टं स्यादिति ॥ साध्याभावाविनाभाव्यभावत्वस्य अवश्याभ्युपगमनीयत्वात् प्रथमप्राप्तपरित्यागेन दोषान्तरान्वेषणे गौरवं च स्यात् । विषमव्याप्तौ व्याप्यत्वासिद्ध्यनुपपत्तिश्चेति । ",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| "text": " प्रतिज्ञाविरोधादेरुदाहरणमाह ",
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| "text": "सर्व एते दृश्यत्वानुमाने द्रष्टव्याः",
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "‘विवादपदं मिथ्या दृश्यत्वात् यत् दृश्यं तत् मिथ्या यथा शुक्तिरजतं तथा चेदं दृश्यं तस्मान्मिथ्या’ इत्येतदनुमानं प्रतिज्ञाविरोधादीनामुदाहरणं ज्ञातव्यमिति ॥",
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| "text": " तत्कथम् ? इत्यतः प्रतिज्ञायाः प्रबलप्रमाणविरोधं तावदुपपादयति ",
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "प्रत्यक्षागमादिभिर्जगतः सत्यत्वात्",
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| |
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सन् घटः इत्यादिप्रत्यक्षेण, विश्वं सत्यमित्याद्यागमेन, विवादपदं सत्यं अर्थक्रियाकारित्वात् इत्याद्यनुमानेन च जगतः सत्यत्वावधारणात् जगन्मिथ्या इति प्रतिज्ञा प्रबलप्रमाणविरुद्धा भवति ॥",
| |
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| |
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| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "हेतोः स्वरूपासिद्धिमुपपादयति ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "तत्पक्षे दृश्यत्वस्य च मिथ्यात्वात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘यत् दृश्यं तत् मिथ्या’ इति व्याप्तिमङ्गीकुर्वता दृश्यत्वस्यापि मिथ्यात्वमङ्गीकर्तव्यम् । अन्यथा दृश्यत्वस्य व्यभिचारापातात् । अतो दृश्यत्वहेतोर्मिथ्यात्वात् दृश्यत्वहेतुर्वादिनः स्वरूपासिद्ध एव ।न मिथ्येत्यसदुच्यते । येन हेतोः स्वरूपासिद्धिः स्यात् । किं नाम ? अनिर्वचनीयमेव । अतः अनिर्वचनीयदृश्यत्वस्य भावान्न स्वरूपासिद्धिरित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अनिर्वचनीयस्य प्रतिवादिनोऽसिद्धत्वात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वस्य हेतुत्वाङ्गीकारेऽपि प्रतिवादिनः स्वरूपासिद्धिर्भवत्येव । प्रतिवादिना जगति अनिर्वाच्यदृश्यत्वस्यानङ्गीकृतत्वादिति । यथा अग्निमत्वे साध्ये मलिनत्वामलिनत्वादिविशेषानपहाय धूममात्रं हेतुः तथा अनवधारितानिर्वचनीयत्वादिविशेषं दृश्यत्वमात्रं जगन्मिथ्यात्वे हेतुः किं न स्यात् ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "दृश्यत्वहेतोरव्याप्तिमुपपादयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "आत्मनोऽपि दृश्यत्वात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सत्यत्वेनाङ्गीकृतस्यात्मनो विपक्षत्वात् तत्र च दृश्यत्वहेतोर्वर्तमानत्वात् व्याप्तिहीनोऽप्यसौ भवति । एतेन व्यतिरेकदृष्टान्तात् साधनाव्यावृत्तिश्चोपपादिता भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "शुक्तिरजतादिदृष्टान्ते साध्याननुगममुपपादयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "शुक्तिरजतादेरनिर्वचनीयत्वाभावात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "मिथ्यापदेन अनिर्वचनीयत्वमभिमतं वादिनः । तच्च दृष्टान्ते शुक्तिरजतादौ न विद्यते । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्’ इति बाधकप्रत्ययेन असत्त्वावधारणात् । अतः शुक्तिरजतादिदृष्टान्तः साध्यविकलो भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तत्र साधनाननुगमं चोपपादयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अनिर्वचनीयदृश्यत्वाभावात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनिर्वचनीयं हि दृश्यत्वं साधनमभिमतम् । न तत् शुक्तिरजतादौ वर्तत इति दृष्टान्तः साधनविकलो भवति । अनिर्वचनीयतया अभिमतस्य शुक्तिरजतादेर्दृश्यत्वाभावादिति वा । शुक्त्यादेरेव दृग्विषयत्वेन ‘रजतादिकं दृष्टम्’ इति भ्रममात्रम् । तन्मतेऽपि अनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वाभावादिति वा । तैरपि शुक्तिरजतादेः न ऐन्द्रियकदृग्विषयत्वं अङ्गीकृतम् । प्रतीतिसमय एवोदयाभ्युपगमात् । इन्द्रियस्याधिष्ठानग्रहण एव व्यापारोररीकरणात् । शुक्त्याद्यवच्छिन्नाऽत्माविद्याकल्पितमारोपितयैव अवभासत इति तत्प्रक्रिया ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "प्राक् दृष्टान्तविरोधाभिधानानन्तरं प्रतिज्ञायाः समबलप्रमाणविरोधस्य सप्रतिसाधनसञ्ज्ञाविहिता । अतस्तेनैव क्रमेण तमुपपादयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "मानसिद्धत्वादिति सप्रतिसाधनत्वाच्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘जगत् सत्यं मानसिद्धत्वात् ब्रह्मवत्’ इत्यपि वक्तुं शक्यत्वात् जगन्मिथ्येति प्रतिज्ञासत्प्रतिपक्षा भवति । चशब्देन अमानसिद्धत्वमुपाधिं सूचयति । तद्धि मिथ्यात्वव्यापकं•ुक्ति रजतादौ दृष्टम् । दृश्यत्वाव्यापकं च, जगति दृश्यत्वे विद्यमानेऽप्यभावात् । अतो जगतो व्यावर्तमानं अमानसिद्धत्वं मिथ्यात्वमपि व्यावर्तयतीति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदुक्तं ‘जगन्मिथ्या’ इति प्रतिज्ञा प्रत्यक्षविरुद्धेति। तदयुक्तम् । अनुमानेन ह्येष्यत्कालीनब•ध्यत्वं साध्यते । न च तदभावं गोचरयितुं प्रत्यक्षमीष्टे येन तद्विरोधोऽनुमानस्य स्यात् । वर्तमानमात्रग्राहित्वात् प्रत्यक्षस्य । न हि भिन्नविषययोर्बाध्यबाधकभावोऽस्ति । न हि भवति आमघटश्यामताप्रत्यक्षेण पाकरक्तताप्रमाणस्य बाध इत्याशङ्क्य परिहरति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वे अनुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणोऽपि प्रत्यक्षत्वविशेषात् उत्तरक्षणे प्रामाण्यं न सेत्स्यतीति भेदादिवाक्यानामेव प्रामाण्यं स्यात् । यो जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वं अङ्गीकुर्यात् स प्रष्टव्यः जगन्मिथ्यात्वग्राहिणः अनुमानस्य ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्याद्यागमस्य च प्रामाण्यं केन गृह्यते ? इति । न तावत् स्वेन । स्वप्रामाण्यविषयत्वाननुभवात् । नाप्यनुमानाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत् तर्हि तस्यानुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणः प्रत्यक्षस्यापि प्रत्यक्षत्वाविशेषात् वर्तमानमात्रग्राहित्वं स्यात् । तथा च न तेनोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यसिद्धिः । जगन्मिथ्यात्वानुमानादेः उत्तरक्षणे प्रामाण्यासिद्धौ च ‘द्वा सुपर्णा’ इत्यादिभेदवाक्यानां ‘विश्वं सत्यं’ इत्यादिविश्वसत्यत्ववाक्यानां मानसिद्धत्वाद्यनुमानानां चोत्तरक्षणे प्रामाण्यं स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । न चोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यग्राहकं प्रत्यक्षान्तरं भविष्यतीति वाच्यम् । उक्तरीत्या तत्र प्रामाण्याभावस्य वक्तुं शक्यत्वात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " ननु न सर्वप्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहीत्युच्यते । किं तु ? साक्षिव्यतिरिक्तमेव । साक्षी तु एष्यदपि गृह्णाति । अतस्तेन उत्तरक्षणेऽपि अनुमानागमप्रामाण्यं सेत्स्यति इत्याशङ्क्य परिहरति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "तस्य साक्षिसिद्धत्वं चेत् जगत्सत्यत्वमपि साक्षिसिद्धम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि अनुमानादिप्रामाण्यस्य साक्षिसिद्धत्वमुच्यते हन्त तर्हि जगत्सत्यत्वमपि साक्षिप्रत्यक्षसिद्धमिति ब्रूमः । तथा च साक्षिणो वर्तमानमात्रग्राहित्वाभावात् तेन एष्यत्कालीनजगद्बाधाभाव सिद्धिसम्भवात् प्रत्यक्षविरोधोऽनुमानस्य दुर्वार एवेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अन्यस्त्वाह, न प्रत्यक्षेणानुमानस्य विरोधः । प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र शुक्तिरजतादौ व्यभिचारो दृश्यते । ततश्च न तत्प्रामाण्ये विश्वासः सम्भवति । अविश्वस्तप्रामाण्येन च कथमनुमानस्य विरोधः स्यात् ? इति । तत्राह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".व्यभिचारश्चेदागमार्थानुमानिर्दोषत्वाध्यवसाये च समः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रत्यक्षस्य व्यभिचारदर्शनात् अविश्वसनीयत्वं वदन् वादी प्रष्टव्यः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यागमस्य अशेषभेदाभावोऽर्थः, दृश्यत्वानुमानं निर्दोषं, मानसिद्धत्वाऽद्यनुमानं सदोषं इत्यध्यवसायः केन प्रमाणेन ? इति । न तावत् स्वेनैव । अननुभवात् । नाप्यागमाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत्, तर्हि प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र व्यभिचारदर्शनात् इदमपि प्रत्यक्षमविश्वसनीयं । तथा च न तेनागमार्थाध्यवसायः सिध्यतीति । अनुमाया अनिर्दोषत्वाध्यवसाय इति च योज्यम्। यद्यप्यत्र पूर्वोक्तमेवानिष्टं शक्यते वक्तुम् तथापि तत् शिष्यैरेव शक्यते ज्ञातुमिति दूषणान्तरमेवोक्तम् । अभेदागमस्य अभेदार्थत्वाध्यवसायानुपपत्तिरेवानिष्टा । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " अधिकं चाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".अत उत्तरदिवसे अभेदवाक्यस्य भेदोऽर्थः स्यात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " ‘नेहनाना इति वाक्यस्याभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायानुपपत्तौ भेदोऽर्थः स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । प्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वाभ्युपगमेऽप्ययं दोषः समान इति सूचयितुं उत्तरदिवस इत्युक्तम् । तथा हि, यदि प्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहि तर्हि ‘नेह नाना’ इति वाक्यस्य अभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायहेतोः प्रत्यक्षस्यापि तथात्वापत्त्या उत्तरदिवसेऽपि तदर्थत्वाध्यवसायो न स्यात् इति सिद्धं कृत्वा आह अत इति ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " दृश्यत्वानुमानिर्दोषत्वाध्यवसायायोगे अनिष्टमाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".निर्दोषानुमायाः सदोषत्वम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "निर्दोषत्वेनाभ्युपगतानुमायाः प्रत्यक्षेण क्वचित् व्यभिचारदर्शनेन अविश्वसनीयेन निर्दोषत्वाध्यवसायानुपपत्तौ सदोषत्वं स्यात् । अभावाभावे भावनियमात् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " मानसिद्धत्वाद्यनुमानं सदोषमित्यध्यवसायानुपपत्तौ दोषमाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".सदोषानुमाया निर्दोषत्वम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सदोषानुमायाः सदोषत्वेनाभ्युपगताया अनुमायाः । न केवलं प्रत्यक्षस्या विश्वसनीयत्वाङ्गीकृतौ आगमार्थाव्यवस्था । किं तु सर्वव्यवस्थानां प्रत्यक्षमूलत्वेन न काऽपि व्यावस्था सिध्यतीति सर्वव्यवहारोच्छेदः स्यादित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "इत्यव्यवस्था",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उक्तप्रकारसूचनार्थ इतिशब्दः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "यदुक्तं हेतुस्वरूपासिद्धिरव्याप्तिरिति हेतुविरोध इति तदयुक्तम् । आश्रयासिद्धिसाध्यासिद्धिव्यधिकरणासिद्धीनामपि हेतुविरोधित्वात् इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "आश्रयसाध्यव्यधिकरणासिद्धयो न दूषणम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आश्रयासिद्धिव्यधिकरणासिद्धी दर्शिते । ततः प्राक् साध्यधर्मस्याप्रसिद्धिः साध्यासिद्धिः । यथा ‘इयं भूः शशविषणोल्लिखिता भूत्वात्’ इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "कुतो न दूषणमित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".अतिप्रसङ्गाभावात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आश्रयासिद्ध्यादीनामदूषणत्वाङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गाभावात् न दूषणम् । अतिप्र्रसङ्गाभावेऽपि कथमदूषणम् ? इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अतिप्रसङ्गेन हि दोषत्वादोषत्वे कल्प्ये ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यस्य दोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य दोषत्वम् । यथा स्वरूपासिद्धेः अदोषत्वे हृदादेरग्निमत्वप्रसङ्गेन दोषत्वम्। यस्य च अदोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य अदोषत्वम् । यथा व्याप्तेः अदोषत्वानङ्गीकारे साध्यासिद्धिप्रसङ्गेन अदोषत्वम् एवं दोषत्वादेरतिप्रसङ्गाधीनत्वात् अत्र च तदभावात् न दोषत्वम् । अत्र अदोषत्वोक्तिः दृष्टान्ततया उपयुज्यते । अतिप्रसङ्गशब्देन भावाभावावुपलक्ष्य अन्वयव्यतिरेकोक्तिर्वा । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इतोपि नाश्रयासिद्ध्यादेर्दोषत्वमित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "व्याप्तिरेव हि प्रयोजिका",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साध्यसिद्धौ हि साधनस्य व्याप्तिरेव प्रयोजिका । न तु सदाश्रयत्वं साध्यप्रसिद्धिः साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वं वा। व्यतिरेकाभावात् । न हि सत्यां व्याप्तौ दोषान्तरासङ्गीर्णाश्रयासिद्ध्यादिना साध्यासिद्धिर्दृष्टेति । उपलक्षणमेतत् । विवक्षितस्थले सिद्धिश्चेति ज्ञातव्यम् । हेतुस्वरूपासिद्धिरिति ह्युक्तम् । एवकारस्तु सदाश्रयत्वादिव्यावर्तकः । व्याप्तिमत्साधनं हि विवक्षितस्थले विद्यमानं विवक्षितस्थले साध्यं प्रयोजयति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "किमतो यदि व्याप्तिरेव प्रयोजिका ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".असत्यपि व्याप्तिरस्त्येव",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रयोजिका च व्याप्तिः असत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो नाश्रयासिद्धिर्दूषणमिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवं असत्यपि साध्यस्य प्रसिद्धत्वे प्रयोजिका व्याप्तिरस्त्येव ‘जीवच्छरीरजातं सात्मकं प्राणादिमत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो न साध्यासिद्धिर्दूषणमिति ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तथा असत्यपि साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वे प्रयोजिका व्याप्तितरस्त्येव । चन्द्रोदयादिना समुद्रवृद्धि्याद्यनुमानदर्शनात् । अतो न व्यधिकरणासिद्धिरपि दूषणमिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " असादाश्रयस्य हेतोर्व्याप्त्यनङ्गीकारे बाधकं चाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इत्यपि व्याप्तिं विना कथं निवार्यते ? ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति ब्रुवंस्तत्र किञ्चित् प्रमाणमाचष्टे न वा । न द्वितीयाः । प्रमाणं विना अर्थसिद्धेरभावात् । आद्ये न तावत् प्रत्यक्षमागमो वा तत्रास्ति । अतोऽनुमानमेव वाच्यम् । तत् किमसत् तदाश्रयं हेतुं वा पक्षीकृत्य प्रवर्तते ? उभयमप्यसदाश्रयं स्यात् । सतः असद्धर्मत्वानङ्गीकारात् । तत्र प्रष्टव्यं, तस्य व्याप्तिरस्ति न वा ? इति । नाद्यः सर्वत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये ‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति निवारणं न स्यात् । अव्याप्तस्य साधनबाधनानङ्गत्वादिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नन्वसतो निर्धर्मकत्वेन साध्यसाधनाश्रयत्वानुपपत्तेः कथमसदाश्रयो हेतुः साधकः स्य•त् ? इत्यत आह असदाश्रयस्येति ॥ अत्र व्याप्तिरिति तद्वतोः साध्यसाधनयोराश्रयत्वमुपलक्ष्यते । प्रागपिर्हेतुसमुच्चये अत्रासद्विषयव्यवहारान्तरानुपपत्तिं समुच्चिनोति । अन्यत्समानम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इतोऽपि न निर्धर्मकत्वेन असतः साध्यसाधनाश्रयत्वाभावो वाच्य इत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "असदाश्रयमित्यादिविशेषणत्वसम्भवे कथमव्याप्तिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘असदाश्रयं साधनं न साधकं’ इति वदता असतः साधनव्यावर्तकतया तद्विशेषणत्वं अङ्गीकृतमेव । अन्यथा तथा वक्तुमेवाशक्यत्वात् । एवञ्च असतो विशेषणत्वलक्षणधर्मसम्भवे कथं साध्यसाधनधर्माश्रयत्वासम्भवः ? विशेष हेत्वभावादिति । एवं असदाश्रयत्वं आश्रयसिद्धिरिति मतं निराकृतम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ये पुनरभावस्य निर्धर्मकत्वात् तदाश्रयत्वं आश्रयासिद्धिदूषणं ब्रुवते तन्निरासायाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "न चात्यन्ताभावोऽपि सर्वधर्मरहितः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "किमुत प्रागभावादिः प्रामाणिकप्रतियोगिक इति शेषः । कुतो न ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रमेयत्वाद्यनुभवात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनुभूयन्ते हि प्रमेयत्वाभिधेयत्वादयः अत्यन्ताभावेऽपि धर्माः । कथमन्यथा तस्य सर्वधर्मराहित्यादि जानीयात् ? कथं च शिष्यं प्रत्युपदिशेत् ? अनुपदिष्टश्च कथमसौ जानीयात् ? इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "हेत्वन्तरेण अप्रसिद्धसाध्यस्य हेतोः साधकत्वं साधयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "परिशेषार्थापत्तिप्रामाण्याभ्युपगमाच्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "परिशेषस्य अर्थापत्तेश्च प्रामाण्यं तावत् सर्वैरङ्गीकृतम् । तत्साध्यं अप्रसिद्धमपि दृश्यते । अतो न कुत्रापि साध्याप्रसिद्धेर्दूषणत्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इतोऽपि नाप्रसिद्धसाध्यस्य असाधकत्वमित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "‘विमतं सकर्तृकं’ इत्यत्र सर्वज्ञत्वस्य पक्षधर्मताबलेन सिद्ध्यङ्गीकारात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘भूभूधरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्’ इत्यनुमानेन परैः ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्धिरङ्गीक्रियते । यद्यपि कार्यत्वं सकर्तृकत्वमात्रेण व्याप्तं भूभूधरादिपक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञमेव कर्तारं गमयति । उपादानाऽदिविषयज्ञानवत एव कर्तृत्वात् । न च सर्वज्ञत्वं प्रसिद्धम् । अतस्तद्वत् न कुत्रापि अप्रसिद्धसाध्यस्य दूषणत्वमिति । अनेनैव व्यधिकरणत्वेऽपि साधकत्वं चोपपादितं भवति। भूभूधराऽदिनिष्ठेन कार्यत्वेन हेतुना ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्ध्यङ्गीकारात् न कुत्रापि साध्यसाधनयोर्व्यधिकरणत्वं दूषणमिति । एतेनैव अवयवनियमश्च परास्तः । न हि पक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञत्वसिद्धाववयवनियमोऽस्ति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "PRL_C01_B08",
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "नन्वप्रसिद्धसाध्ययोः परिशेषार्थापत्त्योः प्रामाण्याभ्युपगमेऽपि किमायातमप्रसिद्धसाध्यस्यानुमानस्य साधकत्वे ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "परिशेषोऽर्थापत्तिरनुमानमित्यविशेषः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अप्रसिद्धसाध्यस्य परिशेषादेः साधकत्वे अनुमानस्यैव तदुक्तं स्यात् । परिशेषादिरनुमानमित्यनतिभिन्नार्थत्वात् ।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "तत्कुतः ? इत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "उपपत्तिमात्रत्वात् ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इहोपपत्तिरन्यथानुपपत्तिर्ज्ञातव्या । ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "परिशेषार्थापत्त्योः अन्यथानुपपत्तित्वेऽपि कुतोऽनुमानत्वं ? इत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "उपपत्तेश्च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्येत्याग्रहमात्रेण भेदः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अन्यथानुपपत्तिर्हि केनचित् विना कस्यचिदसम्भवः । असम्भवश्च न तावदनुत्पत्तिः । बहिर्भावादिनाऽपि गूहाभावादेरजन्यत्वात् । अतोऽनवस्थानमेवासम्भव इति वाच्यम् । तस्य च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्या । केनचिद्विना कस्यचिदनवस्थानं हि तयोर्व्याप्तिं विना नोपपद्यते । व्याप्त्यपेक्षया अर्थावगमकमनुमानमिति चोक्तम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवमपि परिशेषादेरनुमानत्वानङ्गीकारे धूमोऽप्यन्यथानुपपत्त्या अग्निं गमयन् नानुमानं स्यात् । अतो दुर्दर्शनाभ्यासविशेषविजृम्भिताऽग्रहमात्रेण अनुमानात् अर्थापत्यादेर्भेदो वादिभिरङ्गीक्रियत इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "प्रसङ्गात् उपमानस्याप्यनुमानत्वं प्रागुक्तं साधयितुमाह– ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "उपमानस्यापि",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अपिपदेन ‘आग्रहमात्रेण भेदः’ इत्यनुकृष्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "कुतः ? इत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "व्याप्तिरूपत्वात् ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "व्याप्तिसापेक्षमर्थगमकं ह्यनुमानम् । उपमानस्यापि व्याप्तिसापेक्षत्वात् नानुमानात् भेदः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "कथमुपमाने व्याप्तिः ? इत्यतस्तामुपपादयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".न हि स्वसदृशेनासदृशं क्वचित् दृष्टम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तेन सदृशः’ इति हि व्याप्तिरुपमाने विवक्षिता । ‘न हि यत् येन सदृशं तत् तेन असदृशं क्वापि दृष्टम्’ येनेयं व्याप्तिरनुपपन्ना स्यादिति मीमांसकोपमानस्य व्याप्तिरुपपादिता भवति । नैयायिकोपमानेऽपि न हि योऽगोत्वे सति गोसदृशः असौ गवयशब्दवाच्यात् अन्यो दृष्ट’ इत्यादिरूपेण व्याप्तिरुपपादनीया । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अभावप्रमाणस्यापि अनुमानेऽन्तर्भावमुपपादयति ",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "योग्यानुपलब्धेश्च लिङ्गत्वम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "भावानुपलब्धिरभावप्रमाणमङ्गीक्रियते । सापि अर्थे लिङ्गमेव । न तु पृथक्प्रमाणम् । कुतः ? न ह्यनुपलब्धिमात्रमभावगमकमङ्गीक्रियते । किं तु ? उपलब्धियोग्यस्यानुपलब्धिः । तथापि कुतोऽनुमानत्वं इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अविशेषात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनुपलब्धिमभावप्रमाणमङ्गीकुर्वता योग्यस्यानुपलब्धिरिति कस्मादुच्यते ? अनुपलब्धिमात्रस्य अभावव्यभिचारादिति चेत् । तत् किं योग्यानुपलब्धिरभावाव्यभिचारिणी ? बाढमिति चेत् हन्त तर्हि व्याप्तिसापेक्षा अर्थं गमयतीत्यङ्गीकृतं स्यात् । तथा च प्रसिद्धानुमादविशेषादनुमानमेवेति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "किं चानुपलब्धेरभावगमकत्वे अभावत्वाविशेषात् अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षेत्यनवस्था स्यादित्याह– ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अविशेषात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अस्मत्पक्षे स्वप्रकाशसाक्षिसिद्धत्वाददोषः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "न च वाच्यमनुपलब्धिरज्ञातैवार्थं बोधयतीति । तथासत्यनुपलब्धित्वाविशेषात् सुषुप्त्यादावपि बोधयेदित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अविशेषात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " नच चक्षुरादिवदुपपत्तिः । तस्य सम्प्रयोगादिविशेषापेक्षत्वात् । अनुपलब्धेस्तदभावादित्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "अविशेषात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "त्रिविधो विरोध इत्यादिनोक्तस्योपयोगमाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "उक्तदोषेष्वेवाशेषानुमानदोषाणामन्तर्भावः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ये प्रतिज्ञाविराधादयो दोषा उक्ताः तेष्वेव अशेषानुमानदोषाणां हेत्वाभासादीनामन्तर्भावः । अतो नोक्तदोषातिरेक इति । तत्र प्रबलप्रमाणविरोधः कालातीतः । समबलेन हेत्वन्तरेण विरोधः सन्देहतो व्याप्यत्वासिद्धिः सत्प्रतिपक्षश्चेत्युक्तम् । तेनैव हेतुना चेत् प्रकरणसमः । असिद्धिः स्वरूपासिद्धिः । व्यर्थविशेषणासिद्ध्यादेराधिक्ये अन्तर्भावः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "व्याप्यत्वासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितानामव्याप्तौ । आद्यस्य साध्यसम्बन्धाभावात् । उत्तरयोस्तु विपक्षवृत्तित्वेन साध्यव्यभिचारात् । अनध्यवसितस्यापि पक्ष एव वर्तमानत्वेन व्याप्तेरग्रहणात् । व्यतिरेकव्याप्तिस्तत्र गृह्यतामिति चेन्न । सपक्षविपक्षाभावे सपक्षमात्रभावे वा तदयोगात् । सपक्षविपक्षभावे च अन्वयस्यैव प्रथमप्राप्तत्वेन सत्यपि सपक्षे तदनुपलब्धौ व्याप्त्यनिश्चयात् । सपक्षैकदेशवृत्यन्वयव्यतिरेकिवत् अस्य व्याप्तिः किं न गृह्यते ? इति चेन्न । सपक्षैकृदेशेऽपि अवृत्त्या किमत्र व्याप्तिरेव नास्ति ? उत सपक्षैकदेशवृत्तिवत् अस्ति व्याप्तिः ? इति सन्देहावस्कन्दनात् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "व्यतिरेकतोऽनैकान्तिक एवानध्यवसित इत्येके । तदसत् । सपक्षविपक्षरहिते तदयोगात् । असिद्धविरुद्धयोरपि तत्त्वप्रसङ्गाच्चेति ।दृष्टान्तविरोध एव उदाहरणाभासानामन्तर्भावः । आश्रयहीनत्वं पूर्ववत् अदूषणम् । अव्याप्त्यभिधानं न्यूने विपरीत व्याप्त्यभिधानं असङ्गतौ । तर्कपराहतेरसिद्ध्यादाविति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तथापि साध्याविशिष्टत्वं हेतोर्दूषणान्तरमस्तीत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "साध्याविशिष्टोऽसिद्धः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पर्वतोऽग्निमान् अग्निमत्वादिति साध्याविशिष्टो हेतुरसिद्ध एवान्तर्भवति । साध्यमेव ह्यत्र हेतुः । न हि साध्यं सिद्धम् । व्याहतेरेव । न च वाच्यं साध्याविशिष्टो हेतुरव्याप्तौ किं नान्तर्भवति ? व्याप्तेरुभयधर्मत्वेन स्वेनैव स्वस्य व्याप्त्ययोगादिति । विवक्षितस्थले लिङ्गदर्शनानन्तरं हि व्याप्तिस्मृतिः स्यात् । तत्र साध्यभूतलिङ्गस्य अदर्शनेनैव अनुमानदोषसिद्धौ व्याप्तिचिन्ताया एवानुदयात् । आश्रयासिद्धिरदूषणमित्युक्तम् । तत् किं सर्वापि ? न धर्म्यभावादिनिमित्तैव । यदभाषता असत्यपि व्याप्तिरस्तीत्यादि । अत्र भगवत्पादोक्तं ज्ञापकमाह यदभाषतेति ॥ असत्यपीति ॥ प्रयोजिका च व्याप्तिरसत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् इति तदर्थः पूर्वमुक्तो द्रष्टव्यः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तर्हि सिद्धसाधकत्वं दोषान्तरमस्तीत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".सिद्धसाधकोऽसङ्गतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "बुभुत्सितसाधनस्यैव सङ्गतत्वात् सिद्धसाधकोऽसङ्गतो भवति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " एवं प्रमाणतदाभासस्वरूपं निरूप्य स्वोक्तलक्षणदृढीकरणाय वाद्यन्तरोक्तलक्षणानि निराकुर्वन् भाट्टानां लक्षणं तावन्निराचष्टे ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".न प्रमासाधनं प्रमाणम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमेयगतं ज्ञाततापरपर्यायं प्राकट्यं प्रमेत्युच्यते । तत्साधनं प्रमाणम् अत्र प्रमाग्रहणं कुठारादिव्यावृत्त्यर्थम् । साधनग्रहणं प्रमायामतिव्याप्तिं प्रत्यक्षादावसम्भवं च व्यवच्छिनत्ति । न चेन्द्रियसन्निकर्षादावव्याप्तिः । ज्ञानस्यैव मुख्यतः प्रामाण्यात् । न च भ्रमादावतिव्याप्तिः । अर्थानुसारिणो ज्ञातता विशेषस्यैव प्रमात्वात् । भ्रमादिना च तदजननात् । इदमित्याद्याकारेण जननेऽपि तत्र प्रामाण्याभ्युपगमात् । ज्ञाते पुनर्ज्ञाततानुदयेन न स्मृतावतिव्याप्तिः । साधनग्रहणेनैव प्रमात्रादिव्युदास इति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तदेतल्लक्षणं नोपपद्यते । कुतः ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ज्ञानव्यतिरिक्तप्रमायां प्रमाणाभावात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमेयाश्रयायाः प्रमाया एवाभावेन असम्भवित्वादयुक्तमिदं लक्षणम् । न हि प्रमेयनिष्ठप्रमायां प्रमाणमस्ति । ज्ञातो घटः, प्रकटो घटः इति प्रमेयधर्मतया प्रमा प्रत्यक्षत एवानुभूयत इत्यत उक्तम् ॥ ज्ञानव्यतिरिक्तेति ॥ ज्ञातो घटः इत्यादौ हि ज्ञानमेवप्रमेयविशेषणतया दृश्यते । न तु ततोऽन्या प्रमेति । न च आत्मधर्मस्य ज्ञानस्य प्रमेयविशेषणताऽनुपपत्तिः । इष्टो घटः इत्यादावपि तदभावापातात् । विषयविषयिभावात् तत्रोपपत्तिरिति चेत् समं प्रकृतेऽति । न च वाच्यं ज्ञातताऽभावे ज्ञानस्य विषयनियम एव अयुक्तः । यदाकारं यत् विज्ञानं तत् तद्विषयमिति हि बौद्धानामेव शोभत इति । तथा सति इच्छादीनामपि विषयनियमाभावप्रसङ्गादिति ॥ करणविषयतया तत्रोपपत्तिरिति चेत् तुल्यम् । अन्यथा तेनैव ज्ञानेन अत्रैव ज्ञातता जायत इति नियमो न स्यादिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अन्यस्त्वाह, प्रमासाधनत्वमेव लक्षणम् । प्रमा च नार्थप्राकट्यम् । किं तु ? अज्ञातार्थस्य यथार्थज्ञानम् । अतो नोक्तदूषणमित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "न चाज्ञातपरिच्छित्तिरेव प्रमेत्यत्र किञ्चिन्मानम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "परिच्छित्तिरिति यथार्थज्ञानमुच्यते । अज्ञातेति स्मृतिसाधनव्युदासार्थम् । यथार्थग्रहणं भ्रमादिसाधनव्युदासार्थम् । अस्तु नाम अज्ञातपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधनं च प्रमाणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तथापि न लक्षणमेतद्युक्तम् ज्ञातपरिच्छित्तेरपि प्रमात्वेन तत्साधनस्य च प्रमाणत्वेन तत्राव्याप्तेः । न हि ज्ञातपरिच्छित्यादेः अमात्वादौ प्रमाणमस्ति । ज्ञातपरिच्छित्त्यादेः प्रमात्वादौ स्मृत्यादेरपि तत् स्यादित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकारात् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्मृत्यादेः प्रमात्वादिप्रसङ्गो नानिष्टः । याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकुर्वद्भिः स्मृत्यादिकस्य प्रमात्वादेरङ्गीकृतत्वादिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "प्राभाकराणां लक्षणं दूषयति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "न चानुभूतिरेव प्रमाणम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानमनुभूतिः । स्मृतिश्च संस्कारमात्रजं ज्ञानम् । न च अयथार्थानुभवे अतिव्याप्तिः । ‘प्रमाणं स्मृतिश्च नः प्रत्ययः’ इत्यङ्गीकृतत्वेन तत्स्वरूपस्यैवानभ्युपगमात् । व्यवहारस्तु ग्रहणस्मरणयोरेव ग्रहणयोरेव वा स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहमात्रेण भवतीति । एतदपि लक्षणमयुक्तम् । कुतः ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ". स्मृत्यादावव्याप्तेः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आदिपदेन वेदाद्यनुप्रमाणसङ्ग्रहः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "स्मृत्यादेः सति प्रामाण्ये भवेदव्याप्तिदोषः । तदेव कुतः? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "वेदादिप्रामाण्यप्रसिद्धेश्च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र आदिपदेन स्मृत्यादिग्रहणम् । प्रसिद्धिर्लौकिकी । न हि सा निर्मूला याथार्थ्यहेतुसिद्धा । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
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| "parent": "PRL_C01_B09",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " श्रौती चास्तीत्याह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "‘‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्युमनुमानश्चतुष्टयम् । प्रमाणमिति विज्ञेयं धर्माद्यर्थे बुभूषुभिः’’ इति श्रुतेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नन्विदं शान्तिके कर्मणि वेतालोत्थानमिव । यावता स्मृत्यादिप्रामाण्यसिद्ध्यर्थं उदाहृतश्रुतौ ऐतिह्यं चतुर्थ प्रमाणमापतितमित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ऐतिह्यमागमभेदः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पुरावृत्तोक्तिरैतिह्यम् । तत् यथार्थमागम एवान्तर्भावति । ऐतिह्यमित्यशेषागमोपलक्षणम् । स्मृतिपदञ्च अशेषकेवलप्रमाणस्य । तथा च केवलमेकं अनुप्रमाणं प्रत्यक्षादिभेदेन त्रिविधमिति चतुष्टयमित्युक्तं भवति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "नैयायिकलक्षणं निराकरोति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "न च सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सम्यग्ग्रहणं संशयविपर्ययापोहनम् । अनुभव इति कुठारादेर्निरासः । ज्ञानग्रहणे स्मृतौ प्रसङ्गादनुभवग्रहणम् । साधनग्रहणं फलात् भेदज्ञापनार्थं प्रमातृप्रमेयव्यवच्छेदार्थं चेति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " एतदपि लक्षणं नोपपद्यते । कस्मात् ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ईश्वरज्ञानादावव्याप्तेः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नैयायिकैः खल्वीश्वरस्यापि प्रमाण्यमङ्गीकृतम् । अतः तस्मिन्नीश्वरे तज्ज्ञाने अस्मदादिज्ञाने चाव्याप्तत्वादिदमलक्षणम् । न हीश्वरादेः सम्यगनुभवसाधनत्वमस्ति । ईश्वरातिरिक्तप्रमाणलक्षणं तत् इत्यङ्गीकारेऽपि तज्ज्ञानादावव्याप्तिरपरिहार्यैवेति ज्ञापनाय स्वरुपेण तज्ज्ञानग्रहणम् । ज्ञानं प्रमाणमेव न भवति । किं तु ? तत्फलमेव । अतः कथं तत्राव्याप्तिर्दूषणम् इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".अप्रामाण्ये प्रमाणाभावाच्च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ज्ञानस्येति शेषः । चशब्देन ‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्यं’ इत्यादि प्रमाणविरोधं समुच्चिनोति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " साक्षिज्ञानेऽपि अव्याप्तिं वक्तुं तस्य प्रामाण्यानङ्गीकारे बाधकं तावदाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्रामाण्यज्ञाने च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमाणाभावादिति चशब्देन अनुकृष्यते । तादर्थ्ये सप्तमी। साक्षिणोऽप्रामाण्ये सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमप्रामाणिकं स्यात् । प्रामाण्यज्ञानार्थं प्रमाणान्तराभावात् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "प्रामाण्यज्ञानार्थमपि सम्यगनुभवसाधनमेव किञ्चित् अङ्गीक्रियते । अतो न तस्याप्रमाणिकत्वापात इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "तत्राप्यङ्गीकारेऽनवस्थितेः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि प्रामाण्यज्ञानार्थं सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणमङ्गीक्रियते तर्हि तत्प्रामाण्यं प्रामाणिकं न वा ? नेति पक्षे न स्यात् । आद्ये किं स्वेनैव सिद्धं ? प्रमाणान्तरेण वा ? नाद्यः अन्यत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये तस्यापि प्रामाण्यं प्रमाणान्तरवेद्यमित्यनवस्थितिः स्यात् । तस्मात् साक्षिज्ञानेनैव सर्वप्रमाणप्रामाण्यं ज्ञायत इत्यङ्गीकार्यम् । तस्य च स्वप्रकाशत्वेन स्वप्रामाण्यविषयत्वात् नानवस्था । ‘मामहं जानामि’ इति आत्मनः स्वप्रकाशत्वदर्शनात् । साक्षिणश्चात्मत्वादिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "एवं स्वप्रकाशात्मरूपसाक्षिज्ञानस्य प्रमाणप्रामाण्यज्ञानार्थमङ्गीकारे किं स्यात् ? इत्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".स्वप्रकाशात्माङ्गीकारे तत्राव्याप्तेः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्वप्रकाशात्मभूतसाक्षिज्ञाने प्रमाणे अङ्गीकृते तस्य सम्यगनुभवत्वेन तत्साधनत्वाभावात् तत्राव्याप्तेरयुक्तमेतल्लक्षणमिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यथार्थस्मृतावव्याप्तिश्च प्राक् आदिशब्देन सङ्गृहीता । तत्र स्मृतिर्न प्रमाणमिति न वाच्यम् । साधितत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तदनङ्गीकारे बाधकं चाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्मृतेश्च प्रामाण्यानङ्गीकारे अनुभूतं मया इत्यत्र प्रमाणाभावात्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि स्मृतिर्न प्रमाणं तर्ह्यनुभूतमप्रामाणिकं स्यात् । ‘अनुभूतं मयेदं’ इत्यत्र स्मृतिं विना प्रमाणाभावात् । सत्यम्, स्मृतिरेवानुभूते प्रमाणम् । किं नाम ? लिङ्गत्वेनैव । पटुतरो ह्यनुभवः संस्कारं जनयति । स च सदृशदर्शनादिना समुद्वुद्धः स्मृतिमिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "संस्कारजन्या स्मृतिः संस्कारे लिङ्गम् । स च पूर्वानुभवे भविष्यति । अतो नानुभूतस्याप्रामाणिकत्वं नापि लक्षणस्याव्याप्तिः । स्मृतेरपि सम्यगनुभवसाधनत्वादित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "लिङ्गत्वेन प्रामाण्ये कल्पनागौरवम् ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं कल्प्यते तर्हि कल्पनागौरवं स्यात् । साक्षात् अर्थ एव प्रामाण्यसम्भवेऽपि स्मृतेः संस्कारे लिङ्गत्वं, तस्यानुभव इत्यप्रामाणिकस्यानेकस्य कल्प्यमानत्वादिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "दोषान्तरं चाह– ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "दृष्टहानिश्च ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं तर्हि पृथक्प्रमाणतया दृष्टस्य अपि प्रत्यक्षादेः लिङ्गत्वमेव स्यात् तत्रापि प्रत्यक्षादिना कर्मकारकस्यार्थस्यानुमानसम्भवात् । अतः प्रत्यक्षादिवत् स्मृतेरपि साक्षात्प्रामाण्यात् तत्राव्याप्तं परोक्तप्रमाणलक्षणमयुक्तमेवेति यथावस्थितार्थविषयत्वमेव लक्षणमुपपन्नमिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इदमपि लक्षणं न युक्तम् । द्विविध एव हि प्रत्ययः स्मृतिरनुभवश्चेति । तत्रानुभवः सर्वोऽपि प्रमाणमेव । स्मृतिरपि यदि प्रमाणं तदा यथावस्थितविशेषणस्य कृत्याभावादित्यत आह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्मृतिप्रमाणद्वैविध्यमात्रकल्पने मिथ्याज्ञानादेर्निरासादनुभवविरोधः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्मृतिश्च प्रमाणं चेति प्रत्ययद्वैविध्यमात्रकल्पनं युज्यते । तथा सति विपर्ययसंशययोः अपाकरणप्रसङ्गात् । न च तथास्त्विति वाच्यम् । विपर्ययादेरनुभवसिद्धत्वेन तद्विरोधादिति ।",
| |
| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "विपर्ययादिविषयोऽनुभव एव नास्ति । किन्तु ? व्यवहारमात्रमित्यत आह ",
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| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "तदनुभवाभाव इत्युक्ते अनुभवः स्मृतिश्च नास्तीत्युक्ते किमुत्तरम्?",
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "यदि विपर्ययादिविषयोऽनुभवः स्वयं प्रकाशमानोऽपि नास्तीत्युच्यते तर्हि पराभ्युपगतं अनुभवमात्रं स्मृतिमात्रं च न स्यात् । अविशेषात् । तथा च जगदान्ध्यं स्यात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अथ वा विपर्ययाद्यनङ्गीकारे दूषणान्तरमेतत् । यदि शुक्तिकायां ‘इदं रजतं’ इत्यादिरूपोविपर्ययाद्यनुभवो नास्ति किं तु ? पुरोवृत्यनुभवे सति रजतस्मृतौ तयोः स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहादेव ‘इदं रजतं’ इत्यादिव्यवहार इत्युच्यते तर्हि पुरोवृत्त्यनुभवो रजतस्मृतिश्च नास्तीति वदामः । ज्ञानपूर्वकत्वात् व्यवहारस्य कथं तदभावेऽसौ स्यात् ? इति चेत् हन्त तर्हि विशिष्टज्ञानपूर्वकत्वात् विशिष्टव्यवहारस्य कथमसावपि तद्विना स्यात् । स्मृत्यनुभवयोरगृहीतविवेकत्वेन विशिष्टज्ञानसादृश्यात् व्यवहार इति चेत् तर्हि अविवेकाग्रहेण अविशिष्टज्ञानसादृश्यात् तदभावस्याप्यापातः स्यात् । तस्मात् विपर्ययादेर्व्यावर्तनीयस्य सद्भावात् याथार्थ्यमेवोपपन्नं लक्षणमिति । ",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "ननु विपर्ययाद्यनुभवाभावे अनुभवस्मृत्योरभावः स्यादित्ययुक्तम् । अपसिद्धान्तप्रमाणबाधा सिद्धिदोषादिति चेन्न । तर्कस्य दूषणानुमानत्वात् । तथापि कुतो नापसिद्धान्तादि ? इत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "स्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषणम् ",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "साधनमेव स्वसिद्धान्तसिद्धन्यायैः कर्तव्यम् । न तु दूषणमपि । तत् परसिद्धन्यायैरपि भवति ।",
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| "tail": "\n "
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "किमतो यद्येवम् ? इत्यत आह ",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "अतो न दूषणे अपसिद्धान्तादि ",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अतः परसिद्धन्यायेन परोक्तस्य दूषणीयत्वात् दूषणानुमाने नापसिद्धान्ताद्युद्भावनीयमिति ।",
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| },
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| {
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| "tag": "avataranika",
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| "text": "स्वपक्षदोषमनुद्धृत्य प्रतिबन्दीग्रहणं मतानुज्ञेत्येके । तदनुपपन्नम् । प्रतिबन्दीग्रहणस्य परोक्तव्यभिचारोद्भावनरूपत्वेन बाधकतर्कोद्भावनरूपेण वा परोक्तदूषणत्वात् । स्वपक्षास्थापनेन प्रवृत्तेर्दोषत्वमिति चेत् तर्हि अप्राप्तकालसाङ्कर्यापातात् । स्वपक्षे दोषमनुद्धृत्य परस्येष्टापादनमित्यन्ये । तदप्यसत् । विशेषणासामर्थ्यात् । तस्मात् इष्टापादनमेव मतानुज्ञेति भावेन तत्स्वरूपानुवादेन सिंहावलोकनन्यायेन प्रकृतदूषणानुमानदोषस्य मतानुज्ञाया उक्तान्तर्भावमाह–",
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| "tag": "mulaprateeka",
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| "text": "इष्टापत्तिः सिद्धसाधनत्वात् असङ्गतमेव",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "इष्टापादनरूपा मतानुज्ञा असङ्गतावन्तर्भूता । परसिद्धार्थसाधनस्वरूपत्वात् । सिद्धसाधनस्य च असङ्गतत्वमुक्तम् । अनिष्टापादनस्यैव सङ्गतत्वादिति न विरोधादिभ्यो दूषणान्तरमस्तीति । व्याप्त्यभावादीनामन्तर्भावस्तु स्फुटत्वान्नोक्तः ।",
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| "text": " एवं प्रमाणदिस्वरूपं निरूप्य तन्निरूपणस्य प्रयोजनादिकं दर्शयति",
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| {
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| "text": "आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्काक्तिमार्गतः । प्रमाणलक्षणमित्युक्तं सङ्क्षेपाद्ब्रह्मसिद्धये ॥",
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "लक्षणादिनिरूपणेन संशोधितैरेव खलु वेदादिभिर्ब्रह्मज्ञानं भवति । तदिदं न वाद्यन्तरोक्तवदेवेति मन्तव्यम् । परमाप्ततमेन सुरवरावतारेणोक्तत्वादिति भावेनोक्तम् ",
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| "text": "ब्रह्मतर्कोक्तिमार्गत इति ॥",
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| "text": " इत्युक्तमिति ॥",
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| "tail": " युक्त्यादियुक्तता प्राक् प्रदर्शितेति इतिशब्देन स्मर्यते । यद्येवं कथं तर्हि स्वल्पेनैव ग्रन्थेन समाप्तं ? इत्यत उक्तम् ॥ सङ्क्षेपादिति ॥ श्रोतृबुद्धिमनुसृत्य शब्दसङ्क्षेपेणोक्तमिति ।"
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| "text": " अथ समापितप्रकरणोऽपि भगवनाचार्यः स्वेष्टदेवतां प्रणमति ",
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| "text": "अशेषमानमेयैकसाक्षिणेऽक्षयमूर्तये । अजेशपुरुहूतेड्य नमो नारायणाय ते ॥",
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं प्रमाणलक्षणं सम्पूर्णम् ॥ ",
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| "text": "नारायणस्यैव प्रणामे को हेतुः ? इत्यतो यत् उक्तं प्रमाणादि तत् प्रेरकत्वेन नारायणस्यैव ? मुख्यतः तदभिज्ञत्वात् इति भावेनोक्तम् ",
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| "text": " ननु नारायणस्य शरीरमस्ति न वा आद्ये मरणादिप्रसङ्गः । द्वितीये कथं तस्येन्द्रियशून्यस्याशेषमानादिसाक्षित्वम् ? इत्यत उक्तम् ",
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| "tail": " अस्त्येवेश्वरस्य शरीरम् । तच्च सच्चिदानन्दादिरूपत्वेन अक्षयमेवेति न कश्चिद्दोष इति । अजादिवन्द्यत्वाच्च नारायण एव नमस्कार्य इति भावेनोक्तम् "
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितस्य प्रमाणलक्षणस्य न्यायकल्पलता जयतीर्थभिक्षुविरचिता सम्पूर्णा ॥ ",
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "इह खलु ‘सुखमेव मे स्यात् दुःखं मनागपि मा भूत्’ इति निखिलापेक्षित मोक्षस्येश्वरसाक्षात्कारमन्तरेणासम्भवात्, तस्य च प्रमाणानि विनानुदयात्, प्रमाणानां च यथावद्विदितानामेव तद्धेतुत्वोपपत्तेस्तत्स्वरूपं यथावज्ज्ञापयितुकामो भगवानाचार्यवर्यः प्रारिप्सितग्रन्थाविघ्नपरिसमाप्त्यादिप्रयोजनाविगीतशिष्टाचारपरम्परादि प्राप्तेष्टदेवतानतिपूर्वकं श्रोतृशेमुषीमनुकूलयिष्यन् वक्ष्यमाणमेवाग्रे दर्शयति ।\nनारायणस्यैव नमस्कारे को हेतुरित्यत उक्तम् अशेषगुरुमिति ॥ सर्वज्ञं गुरुमिति पाठे सार्वज्ञ्यं गुरूत्वस्योपपादकम् । किं च नारायणस्यैव अतिसमर्थत्वेनेष्ट प्रदानसम्भवात् तन्नतिरिति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eईशेशमिति ॥\u003C/span\u003E अपि च रागादिदोषरहिता हि लोके वन्द्या भवन्ति । नारायणश्चाशेषदोषदूर इति सूचयितुं अनामयमिति ॥ आमयपदं दोषान्तरोपलक्षणम् । प्रवक्ष्यामीति उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगिसङ्ग्रहायोपसर्गः । न हि तद्विना प्रकृष्टा लक्षणोक्तिः स्यात् ।\nलक्ष्यमात्रव्यापको धर्मो लक्षणम् । तदुक्तिः शब्दव्यवहारार्था । सास्नादिमान् गौ इति ज्ञातलक्षणो हि यं पिण्डं सास्नादिमन्तं पश्यति तं गोशब्दवाच्यं प्रत्येति । यदा तु अयं गौरित्युपदेशादिना व्युत्पत्तिः तदापि व्यक्तिविशेष एव न सर्वत्र । तत्रोपदेशाद्यभावात् । अतस्तत्र व्यक्तिविशेषे व्युत्पन्नः तदन्यत्रापि व्युत्पित्सुः तद्धर्मेषु व्यवहारानालोच्य, व्यभिचारिणोऽव्यापकांश्च परिहृत्य, लक्षणभूतमेकं गृहीत्वा, तद्वत्सु गोशब्दसम्बन्धं गृह्णाति । प्राचीनपक्षे केवलव्यतिरेकिणा, अत्र अन्वयव्यतिरेकिणेति विशेषः ।\nनाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्तनमुद्देशः । स च लक्षणाद्युक्तिसम्भावनार्थः । अनुद्दिश्य कस्य लक्षणादि ब्रूयात् । विधा विभागः । तदुक्तिरवान्तरोद्देशार्था । युक्तायुक्तचिन्ता परीक्षा । सोद्देशविषया न सम्भवति । फलाभावेन नाममात्रे विवादायोगात् । लक्षणपरीक्षा तस्य लिङ्गत्वनिश्चयार्था । न ह्यसम्भवाव्याप्त्यादिलक्षण स्वरूपासिद्धिभागासिद्धिव्यभिचारापरिहारे लिङ्गता निश्चीयते । विभागपरीक्षा न्यूनाधिकसङ्ख्याव्यवच्छेदमुखेन विभागसमर्थनार्था । बुद्धिदोषनिवृत्तिपर्यन्ता परीक्षायाः परीक्षा तत्सौष्ठवसिद्ध्यर्था । द्विधा चोद्देशादयः सामान्यतो विशेषतश्चेति । प्रमाणलक्षणस्यान्यैरेवोक्तत्वात् किमपूर्वनिर्माणेनेत्यतो वा प्रवक्ष्यामीत्युक्तम् । अन्योक्तीनामप्रकृष्टतां वक्ष्यति ।\nद्विविधं लक्षणम्, यावल्लक्ष्यभावि अयावल्लक्ष्यभावि चेति । तत्राद्यं यथा, पृथुबुध्नोदराकारो घट इति । द्वितीयं यथा, भोगायतनं शरीरमिति । तत्राद्यमेव व्युत्पाद्यम् । तस्यैव सार्वत्रिकव्यवहारोपयोगित्वादिति भावेनोक्तम् स्वलक्षणमिति ॥ तदेव हि स्वरूपभूतं लक्षणं यत् यावल्लक्ष्यभावीति ।" | | "lines": [ |
| | "इह खलु ‘सुखमेव मे स्यात् दुःखं मनागपि मा भूत्’ इति निखिलापेक्षित मोक्षस्येश्वरसाक्षात्कारमन्तरेणासम्भवात्, तस्य च प्रमाणानि विनानुदयात्, प्रमाणानां च यथावद्विदितानामेव तद्धेतुत्वोपपत्तेस्तत्स्वरूपं यथावज्ज्ञापयितुकामो भगवानाचार्यवर्यः प्रारिप्सितग्रन्थाविघ्नपरिसमाप्त्यादिप्रयोजनाविगीतशिष्टाचारपरम्परादि प्राप्तेष्टदेवतानतिपूर्वकं श्रोतृशेमुषीमनुकूलयिष्यन् वक्ष्यमाणमेवाग्रे दर्शयति ।", |
| | "नारायणस्यैव नमस्कारे को हेतुरित्यत उक्तम् अशेषगुरुमिति ॥ सर्वज्ञं गुरुमिति पाठे सार्वज्ञ्यं गुरूत्वस्योपपादकम् । किं च नारायणस्यैव अतिसमर्थत्वेनेष्ट प्रदानसम्भवात् तन्नतिरिति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eईशेशमिति ॥\u003C/span\u003E अपि च रागादिदोषरहिता हि लोके वन्द्या भवन्ति । नारायणश्चाशेषदोषदूर इति सूचयितुं अनामयमिति ॥ आमयपदं दोषान्तरोपलक्षणम् । प्रवक्ष्यामीति उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगिसङ्ग्रहायोपसर्गः । न हि तद्विना प्रकृष्टा लक्षणोक्तिः स्यात् ।", |
| | "लक्ष्यमात्रव्यापको धर्मो लक्षणम् । तदुक्तिः शब्दव्यवहारार्था । सास्नादिमान् गौ इति ज्ञातलक्षणो हि यं पिण्डं सास्नादिमन्तं पश्यति तं गोशब्दवाच्यं प्रत्येति । यदा तु अयं गौरित्युपदेशादिना व्युत्पत्तिः तदापि व्यक्तिविशेष एव न सर्वत्र । तत्रोपदेशाद्यभावात् । अतस्तत्र व्यक्तिविशेषे व्युत्पन्नः तदन्यत्रापि व्युत्पित्सुः तद्धर्मेषु व्यवहारानालोच्य, व्यभिचारिणोऽव्यापकांश्च परिहृत्य, लक्षणभूतमेकं गृहीत्वा, तद्वत्सु गोशब्दसम्बन्धं गृह्णाति । प्राचीनपक्षे केवलव्यतिरेकिणा, अत्र अन्वयव्यतिरेकिणेति विशेषः ।", |
| | "नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्तनमुद्देशः । स च लक्षणाद्युक्तिसम्भावनार्थः । अनुद्दिश्य कस्य लक्षणादि ब्रूयात् । विधा विभागः । तदुक्तिरवान्तरोद्देशार्था । युक्तायुक्तचिन्ता परीक्षा । सोद्देशविषया न सम्भवति । फलाभावेन नाममात्रे विवादायोगात् । लक्षणपरीक्षा तस्य लिङ्गत्वनिश्चयार्था । न ह्यसम्भवाव्याप्त्यादिलक्षण स्वरूपासिद्धिभागासिद्धिव्यभिचारापरिहारे लिङ्गता निश्चीयते । विभागपरीक्षा न्यूनाधिकसङ्ख्याव्यवच्छेदमुखेन विभागसमर्थनार्था । बुद्धिदोषनिवृत्तिपर्यन्ता परीक्षायाः परीक्षा तत्सौष्ठवसिद्ध्यर्था । द्विधा चोद्देशादयः सामान्यतो विशेषतश्चेति । प्रमाणलक्षणस्यान्यैरेवोक्तत्वात् किमपूर्वनिर्माणेनेत्यतो वा प्रवक्ष्यामीत्युक्तम् । अन्योक्तीनामप्रकृष्टतां वक्ष्यति ।", |
| | "द्विविधं लक्षणम्, यावल्लक्ष्यभावि अयावल्लक्ष्यभावि चेति । तत्राद्यं यथा, पृथुबुध्नोदराकारो घट इति । द्वितीयं यथा, भोगायतनं शरीरमिति । तत्राद्यमेव व्युत्पाद्यम् । तस्यैव सार्वत्रिकव्यवहारोपयोगित्वादिति भावेनोक्तम् स्वलक्षणमिति ॥ तदेव हि स्वरूपभूतं लक्षणं यत् यावल्लक्ष्यभावीति ।" |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "प्रमाणानामित्युद्देशे सिद्धे प्रमाणसामान्यलक्षणमाह\nयथार्थं प्रमाणम्\nप्रमाणमिति लक्ष्यनिर्देशः । यथार्थमिति लक्षणोक्तिः । एवमुत्तरत्रापि ज्ञातव्यम् । यथार्थं यथावस्थितार्थविषयीकारि । अर्थविषयीकारित्वमात्रस्य संशयविपर्ययसाधारण्याद्विशेषणोपादानम् । अर्थविषयीकारित्वेनैव प्रमेयादिव्युदासः । अर्यत इत्यर्थो ज्ञेयमुच्यते । अतो न गम्यविषयीकारिगतावतिव्याप्तिः ।\nतद्विभागमाह\nतद्विविधम्\nप्रमाणानामानन्त्येऽपि साक्षात्पारम्पर्येण याथार्थ्यज्ञापनार्थोऽयं विभागः ।\nएतदेव दर्शयन् द्वे विधे उद्दिशति\nकेवलमनुप्रमाणं च\nसाक्षाद्यथावस्थितार्थविषयीकारि केवलम् । परम्परया तादृशमनुप्रमाणमिति ।\nप्राधान्याभिप्रायेण प्रथममुद्दिष्टं केवलं लक्षयति\nयथार्थज्ञानं केवलम्\nसञ्ज्ञानिरूक्त्यैव लक्षणसिद्धौ श्रृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं पृथगारम्भः । यथार्थेति संशयादिव्युदासः । अनवधारणज्ञानं संशयः । स द्विविधः । अनिर्दिष्टकोटिको निर्दिष्टकोटिकश्चेति । तत्र कोटीनामतिबाहुल्यादनिर्दिष्टकोटिरनध्यवसायापरनामा । यथा, ‘किसञ्ज्ञकोऽयं वृक्षः’ इति । द्वितीयोऽपि समानानेककोटिरन्यतरकोटिप्रधानश्चेति द्वेधा । तत्राद्यो यथा, ‘किमयं ब्राह्मणस्तदितरोवा, इति । ऊहापरनामा द्वितीयो यथा, ‘प्रायेणायं ब्राह्मण’ इति ।\nप्रत्येकं निश्चायकाभावसहकृतसमानासमानधर्मविप्रतिपत्युपलब्ध्यनुपलब्धिजन्मा पञ्चधा भिद्यत इति । तद्यथा, समानधर्मात् दीर्घत्वात् ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति । असमानधर्मात् आकाशविशेषगुणत्वात् ‘शब्दो नित्योऽनित्यो वा’ इति । विप्रतिपत्तेः ‘भौतिकानीन्द्रियाणि उत अभौतिकानि’ इति । उपलब्धेः ‘किं सदिदमुदकमुतासत्’ इति । अनुपलब्धेः ‘किमत्र यक्षोऽस्ति न वा’ इति । उपलब्ध्यनुपलब्ध्योः समानधर्म एवान्तर्भावात् त्रैविध्यमित्यपरे । समाने हि सदसतोरुपलब्धत्वानुपलब्धत्वे इति ।असमानधर्मविप्रतिपत्त्योरपि समानधर्म एवान्तर्भावयितुं शक्यत्वात् ऐकविध्यमिति तत्त्वम् ।\nविपरीतनिश्चयो विपर्ययः । यथा, शुक्तिकायामिदं रजतमिति । ज्ञानमित्यनुप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि स्वविषये केवलत्वान्नातिव्याप्तिः।\nअनुप्रमाणलक्षणमाह\nतत्साधनमनुप्रमाणम्\nतदिति यथार्थज्ञानपरामर्शः । यथार्थेति संशयादिसाधनदुष्टेन्द्रिय सन्निकर्षादिव्युदासः । ज्ञानग्रहणमनुप्रमाणसाधननिवृत्त्यर्थम् । साधनमिति केवलप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि लिङ्ग्यादिविषयेऽनुप्रमाणत्वात् । हेतुरित्युच्यमाने प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् साधनग्रहणम् । सतोरपि कर्तृकर्मणोर्यदभावात् कार्याभावो यदनन्तरं चासति प्रतिबन्धे भवत्येव कार्यं तदुच्यते साधनमिति । यथा व्यापारवान् कुठारः । अत एव न यादृच्छिकसंवादिलिङ्गविभ्रमादावतिव्याप्तिः । यथार्थमित्येवोक्ते केवलेऽतिव्याप्तिः । ज्ञानमित्येवोक्ते तत्र संशयादौ च । प्रत्यक्षे अव्यप्तिश्च । साधनमित्येवोक्ते कुठारादौ । अतो विशिष्टग्रहणम् । प्रमावान् प्रमाता । प्रमाविषयः प्रमेयम् । यथार्थज्ञानं प्रमा । प्रमातुः प्रमेयत्वेऽपि विवक्षावशात् पृथगुक्तिः ।\nकेवलप्रमाणं विभजति\nकेवलं चतुर्विधम्\nअयमपि महावैलक्षण्यज्ञापनार्थो विभागः ।\nचतस्त्रो विधाः प्राधान्यक्रमेणोद्दिशति\nईशलक्ष्मीयोग्ययोगिभेदेन\nज्ञानिनामेवं भेदेन निमित्तेन ज्ञानस्यापि चातुर्विध्यम् । ज्ञानपदं वा संयोज्यम् ।\nअनुप्रमाणस्य केवलप्रमाणसाधनत्वेनोक्तत्वात् चतुर्विधमपीदं तज्जन्यं, तत एवानित्यं चेति न मन्तव्यमित्याह\nपूर्वद्वयमनादि नित्यम्\nईशलक्ष्मीज्ञानम् ।\nद्वयोरप्यनादिनित्यत्वे को विशेषः ? येन पृथग्ग्रहणमित्यत आह\nस्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः\nअनादिनित्यत्वसाम्येऽपि स्वसत्तादौ स्वतन्त्रमीशज्ञानं, तदधीनं लक्ष्मीज्ञानमिति महाविशेषात्पृथग्ग्रहणमुपपद्यते । अनेन स्वतन्त्रज्ञानमाद्यं, ईशैकाधीनं द्वितीयमिति द्वयोर्लक्षणं सूचितं भवति । आद्ये स्वतन्त्रमिति लक्ष्म्यादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमितीशव्युदासः । द्वितीये ईशाधीनमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । एकेति ब्रह्मादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमिति लक्ष्मीव्यावृत्तिः ।\nतयोर्विशेषान्तरमाह\nपूर्वं स्वपरगताखिलविशेषविषयम्\nलक्ष्मीज्ञानस्याप्यतिमहत्वेनैतत्सम्भवात् कथमीशज्ञानस्य विशेषः ? इत्यत आह\nद्वितीयमीशेऽन्येभ्योऽधिकम्\nलक्ष्मीज्ञानमीशविषये ब्रह्मादिज्ञानेभ्य एवाधिकविषयम् ।\nकिं चातः इत्यत आह\nअसार्वत्रिकम्\nन त्वीशे सर्वविशेषविषयम् । अतस्तयोरस्ति विशेषः ॥\nयथेशे असार्वत्रिकं तथा किमन्यत्रापि ? नेत्याह\nअन्यत्र सर्वविषयम्\nकिमीशलक्ष्मीज्ञानयोरन्यत्र तर्हि साम्यमेव ? नेत्याह\nस्पष्टत्वे भेदः\nद्वयमपीशादन्यत्र सर्वविषयं स्पष्टं च । तत्रेशज्ञानं निरतिशयस्पष्टम् । न तथा लक्ष्मीज्ञानमित्यस्त्येव विशेषः ।\nअथ वा पूर्वमित्यनेन कार्त्स्न्येनेशविषयत्वं लक्षणान्तरमीशज्ञानस्य सूचितम् । तत्र कार्त्स्न्येनेति लक्ष्म्यादिज्ञानव्युदासः । कृत्स्नं जगद्विषयं लक्ष्मीज्ञानमपि भवतीतीशग्रहणम् । ईशेऽन्येभ्योऽधिकमसार्वत्रिकमिति लक्ष्मीज्ञानस्य लक्षणान्तरम् । ईशग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । असार्वत्रिकत्वासम्भवनिवृत्त्यर्थं च । अन्येभ्योऽधिकमिति ब्रह्मादिज्ञानव्युदासः । असार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिरासः । ईशेऽसार्वत्रिकमन्यत्र सर्वविषयमिति तल्लक्षणान्तरमीशादन्यत्रग्रहणं व्याघातपरिहारार्थम् । ईशेऽसार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । अन्यत्र सर्वविषयमित्यस्मदादिज्ञानव्युदासः । ऋजुज्ञानेऽतिव्याप्तिपरिहारायानालोचनेऽपीति ग्राह्यम् । तस्याऽलोचनेऽन्यत्र सर्वविषयत्वं वक्ष्यति । स्पष्टत्वं इत्यनेनापि निरतिशयस्पष्टं ईशज्ञानं, ईशज्ञानमेव यतोऽधिकस्पष्टं तत् लक्ष्मीज्ञानम् इत्यनयोर्लक्षणान्तरं सूचितं भवति ।\nयोगप्रभावलब्धातिशयं योगिज्ञानम् । तत्त्रिविधम् ऋजुतात्विकअतात्विकयोगिज्ञानभेदेन ।\nतत्र पूर्ववदृजुज्ञानं नानुप्रमाणजन्यमनित्यं चेत्याह\nयोगिज्ञानमृजूनामनादिनित्यम्\nकेषां योगिनां ? ऋजूनाम् इति योज्यम् । योगिज्ञान इति पाठे ज्ञानमिति शेषः । असार्वत्रिकत्वात् योगविभागः ।\nतल्लक्षणमाह\nईशे जीवेभ्योऽधिकम्\nऋजुव्यतिरिक्तजीवज्ञानेभ्य एव । ईश इति स्वरूपकथनम् । जीवेभ्योऽधिकमित्यस्मदादिज्ञाननिरासः । अवधारणेनेशलक्ष्मीज्ञाननिवृत्तिः । लक्षणान्तरं चाह\nअन्यत्राऽलोचने सर्वविषयम्\nअन्यत्र ईशादिति शेषः । अन्यत्र ग्रहणमसम्भवनिवृत्यर्थम् । आलोचन इतीशलक्ष्मीज्ञाननिरासः । सर्वग्रहणमस्मदादिज्ञाननिरासार्थम् । ऋजुज्ञानं यद्यनादिनित्यं तर्हि कथं तत् योगिज्ञानम् ? योगजं हि योगिज्ञानमित्यत आह\nक्रमेण वर्धमानम्\nयोगप्रभावेन वृद्धिसद्भावात् योगिज्ञानत्वं युक्तम् । क्रमेण वर्धमानत्वे मुक्तावपि किं वर्धत इति ? नेत्याह\nआमुक्तेः\nआङ् मर्यादायाम् । अभिवृद्धनदीवत् पुनः किं ह्रासो भवति? नेत्याह\nततोऽव्ययम्\nतात्विकातात्विकयोगिज्ञानलक्षणं युगपदाह\nततोऽर्वाक् क्रमेण ह्रसितम्\nऋजुभ्योऽन्येषां योगिनां ज्ञानं ईशादन्यत्र क्रमेण किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तं भवति ।\nनेदं लक्षणं युक्तमन्योन्यमृजुज्ञानाच्च अव्यावृत्तेः । इत्यत आह\nसादि च तात्विकेभ्योऽन्यत्र\nनैतावदेव लक्षणम् । किं तु ? तात्विकयोगिज्ञानमनादि अतात्विकयोगिज्ञानं सादीत्यपि गृह्यते । एतेन अनादित्वे सति ईशादन्यत्र आलोचनेऽपि ह्रसितं तात्विकयोगिज्ञानम्, सादित्वे सति ईशादन्यत्र किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तमतात्विकयोगिज्ञानमित्युभयोर्लक्षणं सूचितं भवति । तत्राद्येऽनादित्वेन अतात्विकयोगिज्ञाननिवृत्तिः । ईशादन्यत्रेति ईशविषये अनादित्वे सत्यालोचनेऽपि ह्रसितलक्ष्म्यादिज्ञाननिरासः । ऋजुज्ञाननिरासार्थमालोचनेऽपीति । ह्रसितमित्यनेनैव ईशज्ञानव्युदासः । द्वितीये सादित्वग्रहणमृजुतात्विकज्ञाननिवृत्त्यर्थम् । किञ्चिन्मात्रहासयुक्तमित्ययोगिज्ञाननिरासः । ईशादन्यत्रेति तत्सम्भवार्थम् । ह्रसितत्वादिग्रहणेनैवेशादिज्ञानेऽप्रसङ्गः ।\nअयोगिज्ञानं किमीश्वराऽदिज्ञानवदनादिनित्यमेव सदिन्द्रियसन्निकर्षादिनाभिव्यज्यते उत सादि विनाशि चेति । तत्राह–\nअयोगिज्ञानमुत्पत्तिविनाशवत्\nतस्य लक्षणमाह–\nअल्पम्\nईशादन्यत्राल्पविषयम् ।\nसर्वं चोत्पत्तिमत् केवलं त्रिविधम् । प्रत्यक्षजमनुमानजमागमजमिति । प्रत्यक्षादीनामवान्तरभेदेन पुनर्भिद्यत इति ।" | | "lines": [ |
| | "प्रमाणानामित्युद्देशे सिद्धे प्रमाणसामान्यलक्षणमाह", |
| | "यथार्थं प्रमाणम्", |
| | "प्रमाणमिति लक्ष्यनिर्देशः । यथार्थमिति लक्षणोक्तिः । एवमुत्तरत्रापि ज्ञातव्यम् । यथार्थं यथावस्थितार्थविषयीकारि । अर्थविषयीकारित्वमात्रस्य संशयविपर्ययसाधारण्याद्विशेषणोपादानम् । अर्थविषयीकारित्वेनैव प्रमेयादिव्युदासः । अर्यत इत्यर्थो ज्ञेयमुच्यते । अतो न गम्यविषयीकारिगतावतिव्याप्तिः ।", |
| | "तद्विभागमाह", |
| | "तद्विविधम्", |
| | "प्रमाणानामानन्त्येऽपि साक्षात्पारम्पर्येण याथार्थ्यज्ञापनार्थोऽयं विभागः ।", |
| | "एतदेव दर्शयन् द्वे विधे उद्दिशति", |
| | "केवलमनुप्रमाणं च", |
| | "साक्षाद्यथावस्थितार्थविषयीकारि केवलम् । परम्परया तादृशमनुप्रमाणमिति ।", |
| | "प्राधान्याभिप्रायेण प्रथममुद्दिष्टं केवलं लक्षयति", |
| | "यथार्थज्ञानं केवलम्", |
| | "सञ्ज्ञानिरूक्त्यैव लक्षणसिद्धौ श्रृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं पृथगारम्भः । यथार्थेति संशयादिव्युदासः । अनवधारणज्ञानं संशयः । स द्विविधः । अनिर्दिष्टकोटिको निर्दिष्टकोटिकश्चेति । तत्र कोटीनामतिबाहुल्यादनिर्दिष्टकोटिरनध्यवसायापरनामा । यथा, ‘किसञ्ज्ञकोऽयं वृक्षः’ इति । द्वितीयोऽपि समानानेककोटिरन्यतरकोटिप्रधानश्चेति द्वेधा । तत्राद्यो यथा, ‘किमयं ब्राह्मणस्तदितरोवा, इति । ऊहापरनामा द्वितीयो यथा, ‘प्रायेणायं ब्राह्मण’ इति ।", |
| | "प्रत्येकं निश्चायकाभावसहकृतसमानासमानधर्मविप्रतिपत्युपलब्ध्यनुपलब्धिजन्मा पञ्चधा भिद्यत इति । तद्यथा, समानधर्मात् दीर्घत्वात् ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति । असमानधर्मात् आकाशविशेषगुणत्वात् ‘शब्दो नित्योऽनित्यो वा’ इति । विप्रतिपत्तेः ‘भौतिकानीन्द्रियाणि उत अभौतिकानि’ इति । उपलब्धेः ‘किं सदिदमुदकमुतासत्’ इति । अनुपलब्धेः ‘किमत्र यक्षोऽस्ति न वा’ इति । उपलब्ध्यनुपलब्ध्योः समानधर्म एवान्तर्भावात् त्रैविध्यमित्यपरे । समाने हि सदसतोरुपलब्धत्वानुपलब्धत्वे इति ।असमानधर्मविप्रतिपत्त्योरपि समानधर्म एवान्तर्भावयितुं शक्यत्वात् ऐकविध्यमिति तत्त्वम् ।", |
| | "विपरीतनिश्चयो विपर्ययः । यथा, शुक्तिकायामिदं रजतमिति । ज्ञानमित्यनुप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि स्वविषये केवलत्वान्नातिव्याप्तिः।", |
| | "अनुप्रमाणलक्षणमाह", |
| | "तत्साधनमनुप्रमाणम्", |
| | "तदिति यथार्थज्ञानपरामर्शः । यथार्थेति संशयादिसाधनदुष्टेन्द्रिय सन्निकर्षादिव्युदासः । ज्ञानग्रहणमनुप्रमाणसाधननिवृत्त्यर्थम् । साधनमिति केवलप्रमाणव्युदासः । अनुमानादेरपि लिङ्ग्यादिविषयेऽनुप्रमाणत्वात् । हेतुरित्युच्यमाने प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् साधनग्रहणम् । सतोरपि कर्तृकर्मणोर्यदभावात् कार्याभावो यदनन्तरं चासति प्रतिबन्धे भवत्येव कार्यं तदुच्यते साधनमिति । यथा व्यापारवान् कुठारः । अत एव न यादृच्छिकसंवादिलिङ्गविभ्रमादावतिव्याप्तिः । यथार्थमित्येवोक्ते केवलेऽतिव्याप्तिः । ज्ञानमित्येवोक्ते तत्र संशयादौ च । प्रत्यक्षे अव्यप्तिश्च । साधनमित्येवोक्ते कुठारादौ । अतो विशिष्टग्रहणम् । प्रमावान् प्रमाता । प्रमाविषयः प्रमेयम् । यथार्थज्ञानं प्रमा । प्रमातुः प्रमेयत्वेऽपि विवक्षावशात् पृथगुक्तिः ।", |
| | "केवलप्रमाणं विभजति", |
| | "केवलं चतुर्विधम्", |
| | "अयमपि महावैलक्षण्यज्ञापनार्थो विभागः ।", |
| | "चतस्त्रो विधाः प्राधान्यक्रमेणोद्दिशति", |
| | "ईशलक्ष्मीयोग्ययोगिभेदेन", |
| | "ज्ञानिनामेवं भेदेन निमित्तेन ज्ञानस्यापि चातुर्विध्यम् । ज्ञानपदं वा संयोज्यम् ।", |
| | "अनुप्रमाणस्य केवलप्रमाणसाधनत्वेनोक्तत्वात् चतुर्विधमपीदं तज्जन्यं, तत एवानित्यं चेति न मन्तव्यमित्याह", |
| | "पूर्वद्वयमनादि नित्यम्", |
| | "ईशलक्ष्मीज्ञानम् ।", |
| | "द्वयोरप्यनादिनित्यत्वे को विशेषः ? येन पृथग्ग्रहणमित्यत आह", |
| | "स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः", |
| | "अनादिनित्यत्वसाम्येऽपि स्वसत्तादौ स्वतन्त्रमीशज्ञानं, तदधीनं लक्ष्मीज्ञानमिति महाविशेषात्पृथग्ग्रहणमुपपद्यते । अनेन स्वतन्त्रज्ञानमाद्यं, ईशैकाधीनं द्वितीयमिति द्वयोर्लक्षणं सूचितं भवति । आद्ये स्वतन्त्रमिति लक्ष्म्यादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमितीशव्युदासः । द्वितीये ईशाधीनमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । एकेति ब्रह्मादिज्ञाननिवृत्तिः । ज्ञानमिति लक्ष्मीव्यावृत्तिः ।", |
| | "तयोर्विशेषान्तरमाह", |
| | "पूर्वं स्वपरगताखिलविशेषविषयम्", |
| | "लक्ष्मीज्ञानस्याप्यतिमहत्वेनैतत्सम्भवात् कथमीशज्ञानस्य विशेषः ? इत्यत आह", |
| | "द्वितीयमीशेऽन्येभ्योऽधिकम्", |
| | "लक्ष्मीज्ञानमीशविषये ब्रह्मादिज्ञानेभ्य एवाधिकविषयम् ।", |
| | "किं चातः इत्यत आह", |
| | "असार्वत्रिकम्", |
| | "न त्वीशे सर्वविशेषविषयम् । अतस्तयोरस्ति विशेषः ॥", |
| | "यथेशे असार्वत्रिकं तथा किमन्यत्रापि ? नेत्याह", |
| | "अन्यत्र सर्वविषयम्", |
| | "किमीशलक्ष्मीज्ञानयोरन्यत्र तर्हि साम्यमेव ? नेत्याह", |
| | "स्पष्टत्वे भेदः", |
| | "द्वयमपीशादन्यत्र सर्वविषयं स्पष्टं च । तत्रेशज्ञानं निरतिशयस्पष्टम् । न तथा लक्ष्मीज्ञानमित्यस्त्येव विशेषः ।", |
| | "अथ वा पूर्वमित्यनेन कार्त्स्न्येनेशविषयत्वं लक्षणान्तरमीशज्ञानस्य सूचितम् । तत्र कार्त्स्न्येनेति लक्ष्म्यादिज्ञानव्युदासः । कृत्स्नं जगद्विषयं लक्ष्मीज्ञानमपि भवतीतीशग्रहणम् । ईशेऽन्येभ्योऽधिकमसार्वत्रिकमिति लक्ष्मीज्ञानस्य लक्षणान्तरम् । ईशग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । असार्वत्रिकत्वासम्भवनिवृत्त्यर्थं च । अन्येभ्योऽधिकमिति ब्रह्मादिज्ञानव्युदासः । असार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिरासः । ईशेऽसार्वत्रिकमन्यत्र सर्वविषयमिति तल्लक्षणान्तरमीशादन्यत्रग्रहणं व्याघातपरिहारार्थम् । ईशेऽसार्वत्रिकमिति ईशज्ञाननिवृत्तिः । अन्यत्र सर्वविषयमित्यस्मदादिज्ञानव्युदासः । ऋजुज्ञानेऽतिव्याप्तिपरिहारायानालोचनेऽपीति ग्राह्यम् । तस्याऽलोचनेऽन्यत्र सर्वविषयत्वं वक्ष्यति । स्पष्टत्वं इत्यनेनापि निरतिशयस्पष्टं ईशज्ञानं, ईशज्ञानमेव यतोऽधिकस्पष्टं तत् लक्ष्मीज्ञानम् इत्यनयोर्लक्षणान्तरं सूचितं भवति ।", |
| | "योगप्रभावलब्धातिशयं योगिज्ञानम् । तत्त्रिविधम् ऋजुतात्विकअतात्विकयोगिज्ञानभेदेन ।", |
| | "तत्र पूर्ववदृजुज्ञानं नानुप्रमाणजन्यमनित्यं चेत्याह", |
| | "योगिज्ञानमृजूनामनादिनित्यम्", |
| | "केषां योगिनां ? ऋजूनाम् इति योज्यम् । योगिज्ञान इति पाठे ज्ञानमिति शेषः । असार्वत्रिकत्वात् योगविभागः ।", |
| | "तल्लक्षणमाह", |
| | "ईशे जीवेभ्योऽधिकम्", |
| | "ऋजुव्यतिरिक्तजीवज्ञानेभ्य एव । ईश इति स्वरूपकथनम् । जीवेभ्योऽधिकमित्यस्मदादिज्ञाननिरासः । अवधारणेनेशलक्ष्मीज्ञाननिवृत्तिः । लक्षणान्तरं चाह", |
| | "अन्यत्राऽलोचने सर्वविषयम्", |
| | "अन्यत्र ईशादिति शेषः । अन्यत्र ग्रहणमसम्भवनिवृत्यर्थम् । आलोचन इतीशलक्ष्मीज्ञाननिरासः । सर्वग्रहणमस्मदादिज्ञाननिरासार्थम् । ऋजुज्ञानं यद्यनादिनित्यं तर्हि कथं तत् योगिज्ञानम् ? योगजं हि योगिज्ञानमित्यत आह", |
| | "क्रमेण वर्धमानम्", |
| | "योगप्रभावेन वृद्धिसद्भावात् योगिज्ञानत्वं युक्तम् । क्रमेण वर्धमानत्वे मुक्तावपि किं वर्धत इति ? नेत्याह", |
| | "आमुक्तेः", |
| | "आङ् मर्यादायाम् । अभिवृद्धनदीवत् पुनः किं ह्रासो भवति? नेत्याह", |
| | "ततोऽव्ययम्", |
| | "तात्विकातात्विकयोगिज्ञानलक्षणं युगपदाह", |
| | "ततोऽर्वाक् क्रमेण ह्रसितम्", |
| | "ऋजुभ्योऽन्येषां योगिनां ज्ञानं ईशादन्यत्र क्रमेण किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तं भवति ।", |
| | "नेदं लक्षणं युक्तमन्योन्यमृजुज्ञानाच्च अव्यावृत्तेः । इत्यत आह", |
| | "सादि च तात्विकेभ्योऽन्यत्र", |
| | "नैतावदेव लक्षणम् । किं तु ? तात्विकयोगिज्ञानमनादि अतात्विकयोगिज्ञानं सादीत्यपि गृह्यते । एतेन अनादित्वे सति ईशादन्यत्र आलोचनेऽपि ह्रसितं तात्विकयोगिज्ञानम्, सादित्वे सति ईशादन्यत्र किञ्चिन्मात्रह्रासयुक्तमतात्विकयोगिज्ञानमित्युभयोर्लक्षणं सूचितं भवति । तत्राद्येऽनादित्वेन अतात्विकयोगिज्ञाननिवृत्तिः । ईशादन्यत्रेति ईशविषये अनादित्वे सत्यालोचनेऽपि ह्रसितलक्ष्म्यादिज्ञाननिरासः । ऋजुज्ञाननिरासार्थमालोचनेऽपीति । ह्रसितमित्यनेनैव ईशज्ञानव्युदासः । द्वितीये सादित्वग्रहणमृजुतात्विकज्ञाननिवृत्त्यर्थम् । किञ्चिन्मात्रहासयुक्तमित्ययोगिज्ञाननिरासः । ईशादन्यत्रेति तत्सम्भवार्थम् । ह्रसितत्वादिग्रहणेनैवेशादिज्ञानेऽप्रसङ्गः ।", |
| | "अयोगिज्ञानं किमीश्वराऽदिज्ञानवदनादिनित्यमेव सदिन्द्रियसन्निकर्षादिनाभिव्यज्यते उत सादि विनाशि चेति । तत्राह–", |
| | "अयोगिज्ञानमुत्पत्तिविनाशवत्", |
| | "तस्य लक्षणमाह–", |
| | "अल्पम्", |
| | "ईशादन्यत्राल्पविषयम् ।", |
| | "सर्वं चोत्पत्तिमत् केवलं त्रिविधम् । प्रत्यक्षजमनुमानजमागमजमिति । प्रत्यक्षादीनामवान्तरभेदेन पुनर्भिद्यत इति ।" |
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| "text": "अनुप्रमाणविभागमाह–\nअनुप्रमाणं त्रिविधम्\nतिस्त्रो विधा उद्दिशति । न्यूनाधिकसङ्ख््यान्यतमान्तर्भावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः\nप्रत्यक्षमनुमानमागम इति\nप्रायेणासन्नाव्यवहितवर्तमानकतिपयार्थग्राहकं प्रत्यक्षम्, अनासन्नातीतानागतव्यवहितार्थगोचरमनुमानम्, स्वातन्त्र्येण अशेषार्थविषय आगम इति अर्थग्रहणक्रमेणोद्देशः ।\nप्रत्यक्षमेकमेवेति चार्वाकः । तस्येष्टानिष्टसाधनज्ञानाभावाज्जीवनमेवानुपपन्नम् । न हि प्रत्यक्षं तज्ज्ञानोपायः ।\nप्रत्यक्षानुमाने एवेति कणादः सौगताश्च । तेषां किमागमो न बोधकः । बोधकोऽपि वा न यथार्थः । यथार्थोऽपि वान्यत्र अन्तर्भूतः । पक्षत्रयमप्यनुभवविरुद्धमिति । अर्थं प्रति स्थितमक्षं प्रत्यक्षम् । प्रमाणान्तरानुसरणेनैव अर्थप्रमापकमनुमानम् । सम्यगतीन्द्रियार्थावगमक आगम इति सञ्ज्ञानिरुक्त्यैव लक्षणसिद्धौ प्रत्यक्षे तस्यैव स्फुटीकरणार्थं अनुमानादौ शृृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं च पुनर्लक्षणारम्भः ।\nतत्र प्रत्यक्षलक्षणमाह–\nनिर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षः प्रत्यक्षम्\nनिर्दोषत्वमर्थेन्द्रिययोर्विशेषणम् । अर्थग्रहणेनाकाशादीनां चक्षुरादिसन्निकर्षव्युदासः । अत्र तत्तदिन्द्रियविषयोऽर्थ उच्यते । तन्निर्दोषत्वग्रहणेन अतिसामीप्यादिदोषयुक्तार्थानामिन्द्रियसन्निकर्षनिरासः । इन्द्रियग्रहणेन अर्थानामेव अन्योन्यसन्निकर्षनिरासः । तन्निर्दोषत्वग्रहणं मनोऽनधिष्ठितत्वादिदोषवदिन्द्रियाणा मर्थसन्निकर्षव्यावृत्त्यर्थम् । सन्निकर्ष इतीन्द्रियादिमात्रव्युदासः । सर्वेण प्रमाणान्तरव्युदासः ।\nअनुमानलक्षणमाह–\nनिर्दोषोपपत्तिरनुमानम्\nउपपत्तिरिति लिङ्गमुच्यते । साहचर्यबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । निर्दोषग्रहणमनुमानाऽभासव्युदासार्थम् । व्याप्त्याद्यनुमानलक्षण रहितोऽनुमानवदवभासमानोऽनुमानाभासः । उपपत्तिग्रहणं प्रत्यक्षादिव्यावृत्त्यर्थम् । उपपत्तिश्च यथार्थतो ज्ञातैवार्थं बोधयति । अन्यथातिप्रसङ्गात् ।\nत्रिविधमनुमानम् । केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि अन्वयव्यतिरेकीति केचित् । साध्यधर्मवान् धर्मी पक्षः । साध्यसमानधर्मवान् धर्मी सपक्षः । साध्यतत्समानधर्मरहितो धर्मी विपक्षः । साध्यत्वाकारमन्तरेण स एव धर्मः साध्यसमानधर्मः । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति अविद्यमानविपक्षं केवलान्वयि । तद् द्विविधम् । सपक्षव्यापकं तदेकदेशवृत्तीति । तद्यथा, धर्माधर्मौ कस्यचित् प्रत्यक्षौ प्रमेयत्वात्, गुणत्वादिति । पक्षव्यापकमविद्यमानसपक्षं विपक्षाद्व्यावृत्तं केवलव्यतिरेकि । तद्यथा, ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वकर्तृत्वादिति । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति विपक्षात् व्यावृत्तमन्वयव्यतिरेकि पूर्ववत् सपक्षतदेकदेशवृत्तिभेदात् द्विविधम् । तद्यथा, जीवो नित्यः नाशकारणशून्यत्वात्, चेतनत्वादिति । सर्वत्र निर्दोषत्वानुवृत्तेर्न बाधितादौ प्रसङ्गः । तत्पुनर्द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं चेति । प्रत्यक्षयोग्यार्थानुमापकं दृष्टम् । यथा, धूमोऽग्नेः । प्रत्यक्षायोग्यार्थानुमापकं सामान्यतो दृष्टम् । यथा, रूपादिज्ञानं चक्षुरादेः । पुनस्त्रिविधम् । कारणानुमानं कार्यानुमानं सामान्यानुमानमिति । कारणं कार्यस्यानुमानमाद्यम् । यथा, विशिष्टमेघोन्नतिः वृष्टेः । कार्यं कारणस्यानुमानं द्वितीयम् । यथा, घूमोऽग्नेः । अकार्यकारणमकारणकार्यस्यानुमानं तृतीयम् । यथा, रसो रूपस्येति ।\nनिर्दोषः शब्द आगमः\nअज्ञानविपर्ययसंशयप्रमादविप्रलम्भादिपुरुषदोषपूर्वकत्वाभावो निर्दोषत्वम् । शब्दो वाक्यात्मा । विभक्त्यन्ता वर्णाः पदम् । आकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमन्ति पदानि वाक्यम् । श्रोतुराकाङ्क्षितार्थाभिधायकत्वं पूर्वपदसञ्ज•ताकाङ्क्षापूरकत्वं वा आकाङ्क्षावत्वम् । तेन विरक्तं प्रति वाणिज्योपदेशस्य, गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादेश्चावाक्यत्वं भवति । सन्निहितार्थाभिधायकत्वं अविलम्बेनोच्चरितत्वं वा सन्निहितत्वम् । तेन चोलेषु वर्तमानं तृषितं प्रति ‘सन्ति सुरसरिति शीतलानि जलानि’ इत्युपदेशस्य विलम्बेनोच्चरितपदानां च वाक्यत्वनिरासः । अन्योन्यान्वययोग्यतावदर्थाभिधायकत्वं योग्यतावत्वम् । तथा च ‘अग्निना सिञ्चेद्’ इत्यादेर्वाक्यत्वनिरासः । निर्दोष इत्यागमाभासनिवृत्तिः । शब्द इति प्रत्यक्षादिव्युदासः । आगमश्च सम्यग्ज्ञात एव बोधकः । अन्यथातिप्रसङ्गात् । स द्विविधः । नित्योऽनित्यश्च । नित्यो वेदः । अनित्यः पुराणादिः । वर्णानां च सर्वत्र नित्यत्वेऽपि प्रबन्धविशेषस्य नित्यत्वानित्यत्वाभ्यामयं विभागः । वर्णाश्च भेदकाभावात् सर्वगता एवेति ।\nननु कथं त्रीण्येव प्रमाणानि ? अर्थापत्त्युपमानयोरपि पृथक्प्रमाणत्वात् इत्यत आह\nअर्थापत्त्युपमे अनुमाविशेषः\nअनुपपद्यमानप्रमितिरर्थापत्तिः । सा द्विविधा, श्रुतार्थापत्तिः दृष्टार्थापत्तिश्चेति । तत्राद्या यथा, ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति’ इति श्रुतवतो जीवतो गृहाभावप्रमितिः । द्वितीया यथा, जीवतो गृहाभावं दृष्टवतस्तत्प्रमितिरिति । तया बहिर्भावप्रमा भवतीति सा अनुमाने अन्तर्भवति । विमतो बहिरस्ति जीवनवत्वे सति गृहेऽसत्वात् यथाहम्’ इति प्रयोगसम्भवात् ।\nसादृश्यप्रमासाधनमुपमानम् । तत्त्रिविधम् । गृह्यमाणे स्मर्यमाणप्रतियोगिकसादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, गां दृष्ट्वा वनङ्गतस्य गृह्यमाणगवये स्मर्यमाणगोसादृश्यप्रमाणं ‘गोसदृशोऽयं गवयः’ इति । गृह्यमाणप्रतियोगिकस्मर्यमाण गतसादृश्यप्रमासाधनं स्मर्यमाणप्रतियोगिकगृह्यमाणगतसादृश्यज्ञानम् । यथा, गामनुभूय वनं गतस्य गवये गोसादृश्यज्ञानं स्मर्यमाणे गवि गृह्यमाणगवयप्रतियोगिक सादृश्यप्रमासाधनम् । ‘गोसदृशोऽयं गवयः, तस्मात् गवयसदृशोऽसौ गौः’ इति । निर्दोषवाक्यं सादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, ‘यथा गौः गवयस्तथा’ इति । तदेतत्त्रयं क्रमेण प्रत्यक्षाद्यन्तर्भूतम् । विमतो गौः गवयसदृशः गवयगतसादृश्यप्रतियोगित्वात् यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तत्सदृशः यथा यमो यमान्तरेण’ इति प्रयोगसम्भवात् ।\nअकृतसमयसञ्ज्ञास्मरणसहायं तत्समभिव्याहृतवाक्यार्थप्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षं उपमानम् । सञ्ज्ञासञ्ज्ञिसम्बन्धप्रमितिस्तत्फलमित्यन्ये । तत्रातिदेशवाक्यार्थस्त्रिविधः । साधर्म्यं वैधर्म्यं धर्ममात्रं चेति । तद्भेदात् तत्प्रतिसन्धानात्मकमुपमानमपि त्रिधा भिद्यते । तत्र साधर्म्योपमानं यथा, ‘यथागौर्गवयस्तथा’ इति श्रुतातिदेशवाक्यस्य नागरिकस्य वनं गतस्य गोसदृशं गवयमवलोकयतोऽव्युत्पन्नगवयपदस्मरणवतः ‘अयमसौ गोसदृशः य आप्तेनोपदिष्टः’ इति प्रतिसन्धानं,तेन तस्य गवयपदार्थत्वप्रमास । वैधर्म्योपमानं यथा,‘गवादिवत् द्विशफो न भवत्यश्वः’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः अश्वं पश्यतः अश्वपदं स्मरतः ‘अयमसौ गवादिविसदृशः’ इति प्रतिसन्धानम्, तस्य तेनाश्वपदार्थत्वप्रमितिः । धर्ममात्रोपमानं यथा, ‘दीर्घग्रीवत्वाऽदिमान् पशुरुष्ट्र’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः क्रमेलकं पश्यतउष्ट्रपदस्मृतिमतः ‘अयमसौ तद्वर्मा’ इति प्रतिसन्धानम्, तेनोष्ट्रपदव्युत्पत्तिरिति । तदेतत् त्रयमप्यनुमान एवान्तर्भूतम् । विमतो गवयशब्दवाच्यः अगोत्वे सति गोसदृशत्वात् व्यतिरेेकेण घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । अतो न विभागानुपपत्तिः । अत्रोपमानद्वयस्य अन्तर्भावानुक्तिः अतिस्फुटप्रतिभासत्वात्, आगमान्तर्भूतत्वे विवादाभावाच्चेति । प्रयोगप्रकारवैचित्र्यात् कथमनुमानत्वमित्यत उक्तम् अनुमाविशेष इति ॥ यथाखल्वन्वयिनो व्यतिरेकिणश्च प्रयोगप्रकारवैचित्र्येऽपि नानुमानाद्बहिर्भावः अनुमानविशेषत्वात् अपेक्षितसाधर्म्यसद्धावाच्च तथात्रापीति । एतेनोपमानस्यार्थविशेषनिष्ठतया पार्थक्यशङ्कापि परास्ता । तादृशसम्प्रतिपन्नानुमान वदेव तदुपपत्तेः । अनेनैव ‘न च केवलतर्केण’ इत्यादिपृथगुक्तेर्गतिश्चोक्ता भवति ।\nतथापि अभावाख्यं पृथक्प्रमाणमस्तीत्यत आह\nअभावोऽनुमा प्रत्यक्षं च\nअभावविषयं प्रमाणमभावः । तत् त्रिविधम् । प्रत्यक्षार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘नास्त्यत्र घटः’ इति । आनुमानिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा, रूपज्ञानरहितस्य ‘नास्ति चक्षुः’ इति । आगमिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘वैधी हिंसा न पापसाधनम्’ इति । तत्र प्रथमं प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भवति । द्वितीयमनुमाने । विमतः चक्षूरहितः रूपाज्ञत्वात् घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । तृतीयमागमे । अतो युक्तो विभाग इति । अत्राभावद्वयस्यान्तर्भावानुक्तिस्तत्र वादिनामविवादात् । उभयत्रान्तर्भावात् योगविभागः । प्रायेणानुमानेऽन्तर्भावज्ञापनाय क्रमोल्लङ्घनम् । कथमेकप्रमाणस्योभयत्रान्तर्भाव इत्यत आह\nपरामर्शापरामर्शविशेषात्\nयदा ‘अत्र घटोऽस्ति न वा’ इति परामर्शपूर्वकं योग्यानुपलब्धिरूपं घटाभावप्रमाणं प्रवर्तते तदाऽनुमाने । ‘घटोऽत्र नास्ति योग्यत्वे सत्यनुपलभ्यमानत्वात् गजवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । यदा पुनरेवमपरामृश्य झडिति ‘नास्ति घटः’ इति प्रवर्तते तदा प्रत्यक्ष इति न विरोधः । अयं च बहिरेव विभागो न तु सुखाद्यभावप्रमाणे । साक्षिणः सुखादिस्वरूपे निश्चयरूपत्वेन परामर्शाभावात् ।\nसम्भवपरिशेषावपि पृथक्प्रमाणे विद्येते । अतः कथं त्रित्वम् ? इत्यत आह\nसम्भवपरिशेषावनुमा\nअल्पप्रमासाधनं बहुलज्ञानं सम्भवः । यथा ‘शतमस्य अस्ति’ इति ज्ञाने पञ्चाशज्ज्ञानम् । प्रसक्तव्यावृत्तिप्रतीतिः परिशिष्यमाणप्रमासाधनं परिशेषः । स द्विविधः । विधिमुखो निषेधमुखश्च । तत्राद्यो यथा ‘चैत्रमैत्रयोरयं चैत्रः’ इत्युक्तेऽन्यस्मिन् मैत्रप्रमा । द्वितीयो यथा ‘नायं चैत्र’ इत्युक्ते तस्मिन् मैत्रप्रमा इति । सम्भवपरिशेषयोरनुमानेऽन्तर्भावः । ‘विप्रतिपन्नः पञ्चाशद्वान् शतवत्वात् सम्प्रतिपन्नवत्, विमतो मैत्रः चैत्रमैत्रयोरन्यतरत्वे सत्यचैत्रत्वात् व्यतिरेकेण चैत्रवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । तस्मादुपपन्न्• प्रमाणानां त्रित्वमिति । वादिविवादभावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः ।\nननु तर्कः प्रमाणं न वा । प्रमाणमिति ब्रूमः । कथं तर्हि त्रित्वम्? इत्यतस्तत्स्वरूपं विवृण्वन्नाह–\nआत्मान्योन्याश्रयचक्रकानवस्थाकल्पनागौरवश्रुतदृष्टहानादयो दूषणानुमा\nआदिपदेनाश्रुतकल्पनमदृष्टकल्पनं च सङ्गृह्यते । एतत्प्रसञ्जनमिहोपलक्ष्यते । व्याप्याङ्गीकारेऽनिष्टव्यापकप्रसञ्जनं तर्कः । द्विविधमनिष्टम् । प्रामाणिकहानमप्रामाणिककल्पनं च । तत् पुनः पञ्चविधम् । आत्माश्रयान्योन्याश्रय चक्रकानवस्थानिष्टभेदात् । सर्वस्यानिष्टत्वेऽपि गोबलीवर्दन्यायेन पृथगुक्तिः । तत्राद्यचतुष्टयमप्रामाणिककल्पनात्मकम् । न हि कुत्राप्यात्माश्रयादिकं प्रमाणसिद्धम् । पञ्चममुभयात्मकम् । तत्राप्याद्यं द्विविधम् । श्रुतदृष्टहानभेदात् । द्वितीयमपि तथा । अश्रुतादृष्टकल्पनभेदात् । तदेव कल्प्यानेकत्वे कल्पनागौरवम् । एतत्प्रसञ्जनात्मकस्तर्कोऽपि पञ्चधा भिद्यते । तस्य पञ्चाङ्गानि । प्रसञ्जकस्य प्रसञ्जनीयेन व्याप्तिः, प्रतितर्कैरप्रतिघातः, प्रसञ्जनीयस्य विपर्यये पर्यवसानं, प्रसञ्जनीयस्यानिष्टत्वं, प्रतिपक्षासाधकत्वं चेति । तस्यैवोत्पत्तिज्ञप्त्यर्थं तदुत्पत्तिज्ञप्त्यपेक्षायामात्माश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्यादौ परम्परया तदुत्पत्त्याद्यपेक्षाया मन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायां चक्रकाप्रसङ्गः । उत्पत्त्यादावन्योत्पत्त्याद्यपेक्षाया अपर्यवसानेऽनवस्थाप्रसङ्गः । अत्र ‘यद्येवमभ्युपगमः तदात्माश्रयादिप्रसङ्गः । यत्रैवमभ्युपगमः तत्र तत्प्रसङ्गः यथामुत्र । यदि नात्माश्रयादिः तर्हि नैतदपि’ इति प्रवृत्तिप्रकारः । सामान्यत एव व्याप्तिर्वाच्या । श्रुतहानं यथा ‘यदीश्वरो न सर्वज्ञः तर्हि न जगत्कर्ता स्यात्’ इति । दृष्टहानं यथा ‘यदि पर्वतोऽनग्निमान् तर्हि निर्धूमः स्यात्’ इति । अश्रुतकल्पनं यथा ‘यदीश्वरो जीवाभिन्नः तर्हि दुःखी स्यात्’ इति । अदृष्टकल्पनं यथा ‘यदि पीतमुदकमन्तरधक्ष्यत् तर्हि मामपि दहेदविशेषात्’ इति । यत्रापाद्यापादकयोर्न साक्षात्सामानाधिकरण्यं तत्र तथैवानुपपत्तौ प्रकारान्तरेणैकाधिकरणतामापाद्य व्याप्तिरभिधातव्या । यथा ‘यदि देवदत्तः सर्वज्ञस्तर्हि यज्ञदत्तोऽपि तथा स्यात्’ इत्यत्र ‘यत्र यो धर्मो वर्तते स तदविशिष्टेऽपि वर्तत’ इत्यादि । सोऽयं तर्कोऽनुमान एवान्तर्भूतोऽतो न प्रमाणत्रित्वभङ्गः ।\nस्यादेतत् । न तर्कोऽनुमानम् । तर्के हि प्रामाणिकहानादि आपाद्यते । न च तत्साध्यं भवति अपसिद्धान्तात् प्रमाणविरोधाच्च, आरोपितलिङ्गत्वेनासिद्धेश्चेति । अत उक्तम् दूषणेति ॥ द्विविधं ह्यनुमानम् । स्वपक्षसाधनं परपक्षदूषणं च । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । द्वितीयमपि द्वेधा प्रवर्तते ‘नायं निरग्निकः अनिर्धूमत्वात्’ इति वा ‘निरग्निकत्वाङ्गीकारे निर्धूमत्वाभ्युपगमः’ इत्यनिष्टप्रसङ्गरूपेण वा ‘तत्र दूषणानुमाने तर्कस्यान्तर्भावः । प्रसङ्गरूपानुमाने च न साध्यवदापाद्यस्य प्रमाणविरोधाद्यसिद्धिश्च दूषणमिति वक्ष्यतीति न कश्चिद्विरोध इति । एतदर्थ एव योगविभागः ।\nतथाऽपि वाक्यतात्पर्यज्ञापकान्युपक्रमादीनि पृथक् प्रमाणानि सन्तीत्यत आह\nउपक्रमोपसंहारतदैकरूप्याभ्यासापूर्वताफलार्थवादाश्च\nचानुमेत्यस्यानुकर्षणार्थः । प्रकरणादिरुपक्रमः । तदन्त उपसंहारः । तयोरुपक्रमोपसंहारयोरेकार्थत्वं तदैकरूप्यम् । एकप्रकारासकृदुक्तिरभ्यासः । प्राचुर्येण प्रमाणान्तराप्राप्ततापूर्वता । फलवत्वं फलम् । स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः । एतेषां वाक्यतात्पर्येऽनुमात्वान्नोक्तविरोधः ।\nयद्येतेऽनुमानेऽन्तर्भूतास्तर्हि कथं तेषां ‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये’ इति उपपत्तितः पृथगुक्तिरित्यत आह\nउपपत्तिविशेषाः\nयथा खलु पाण्डवानां कौरवान्तर्भावेऽपि कौरवेभ्यः पृथगुक्तिः कौरवविशेषत्वेन साक्षादेकत्वाभावेन कौरवपदेन तदतिरिक्तग्रहणात्तथा प्रकृतेऽपीति ।\nनन्वेवं पृथगुक्तिमन्यथाव्याख्यायैषामनुमानान्तर्भावाङ्गीकारे को हेतुः ? इत्यत आह\nत एव सोपपत्तयो लिङ्गानि\nउक्ता इति शेषः । यथा ‘उपक्रमोपसंहारौ’ इत्यत्रोपपत्तेः लिङ्गत्वमुच्यते तथा उपक्रमादीनामपि । अतो युक्तमुक्तम् । किं च यथोपपत्तिर्लिङ्गम् व्याप्तिबलेनार्थधीहेतुः तथोपक्रमादयोऽपि ‘यत्र यत् उपक्रम्यते तत्रापवादाभावे तत् तात्पर्यगोचरः’ इत्यादिव्याप्तिबलेनैवार्थबोधकाः । अतः कथं नानुमानेऽन्तर्भावः ? इत्याह त एवेति ॥ एतेनागमान्तर्भावोऽपि परास्तः । नह्यागमवत् व्याप्तिमनपेक्ष्य बोधका एते अनुभूयन्ते । तेषामागमार्थविषयत्वज्ञापनार्थो योगविभागः ॥\nतथापि समाख्यादीनि पृथक्प्रमाणानि सन्तीत्यत आह\nसमाख्यावाक्यप्रकरणस्थानानि च\nअनुमेत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः । निर्णीतस्थले समानोक्तिः समाख्या । सा द्विविधा । अर्थतः शब्दतोऽपीति । वाक्यमुक्तम् । कयाचिद्विवक्षयैकार्थावच्छिन्नं वाक्यजातं प्रकरणम् । तादृशं प्रकरणजातं स्थानम् । एतेषामनुमानेऽन्त र्भावादुक्तमुपपन्नम् । समाख्याया वाक्यादेरवरत्वेऽपि तदादित्वेन ग्रहणं ‘श्रुतिर्लिङ्गम् समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा’ इति अविवक्षितक्रमं वाक्यमनुसृत्य कृतम् । उपक्रमादीनां तात्पर्यलिङ्गत्वं, एतेषामर्थ एवेति विशेषज्ञापनार्थो योगविभागः । उपक्रमादीनां स्वार्थे आगमत्वेऽपि तात्पर्य एव लिङ्गत्वात् नोक्तविरोधः ।\nतर्हि श्रुतिर्लिङ्गमिति समाख्यादीनां लिङ्गात् पृथगुक्तिः कथमित्यत आह\nलिङ्गविशेषाः\nपूर्ववत्परिहारः । अत्राप्यनुमानान्तर्भावे पूर्वोक्ता युक्तिरनुसन्धेयेति ॥\nयदुक्तं निर्दोषं प्रमितं लिङ्गमनुमानमिति । तदयुक्तम् । नारिकेलद्वीपवासिनो धूमदर्शनेऽपि वह्निप्रमानुदयादित्यत आह\nव्याप्तिरूपपत्तिमूलम्\nव्याप्तिरिति विषयेण विषयिणः प्रत्ययस्योपलक्षणम् । न केवलं प्रमितं लिङ्गमात्रमनुमितिजनकमङ्गीक्रियते । किं नाम ? निर्दोषत्वान्तर्गतव्याप्तिप्रमितिपूर्वकमेव । न च तादृशं नानुमितिजनकम् । अविनाभावो व्याप्तिः । सा द्विविधा अन्वयव्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिश्चेति । तत्र साध्येन साधनस्य व्याप्तिरन्वयव्याप्तिः । यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इति । साधनाभावेन साध्याभावस्य व्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिः । यथा, ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति’ इति । भूयो भूयो हि धूमं पश्यन् तत्राग्निं पश्यति, अग्न्यभावं पश्यंश्च धूमाभावम् । ततो निश्चिनोति धूमाग्न्योः साहचर्यादस्त्यविनाभाव इति । गृहीतव्याप्तिश्च पर्वते धूमं पश्यंस्तामनुस्मरति ‘यत्सन्निधौ यो दृष्टः स तस्य स्मारकः’ इति न्यायात् । स्मृतव्याप्तिश्च व्याप्तं धूमं पर्वते प्रत्यभिजानाति । तेनाग्न्यनुमितिरिति युक्तं लक्षणमिति ॥\nद्विविधमनुमानम् । स्वार्थं परार्थं चेति । परोपदेशानपेक्षं स्वार्थम् । तदपेक्षं परार्थम् ॥\nव्याप्तिमल्लिङ्गबोधकं वाक्यं परोपदेशः ।तस्यावान्तरवाक्यान्यवयवाः ते च जिज्ञासासंशयशक्यप्राप्तिप्रयोजनसंशयव्युदासप्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानीति दशेति जरन्नैय्यायिकाः । प्रतिज्ञादयः पञ्चैवेति नवीनाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणानि उदाहरणोपनयनिगमनानि त्रय एवेति मीमांसकाः । उदाहरणोपनयौ द्वावेवेति बौद्धाः । तत्र तृतीयपक्षव्यतिरिक्तनियमपक्षास्तावन्नोपपन्ना इत्याह–\nसा प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तरूपा\nसेत्युपपत्तिप्रतिपादकं वाक्यमुपलक्ष्यते । दृष्टान्ते इति तत्प्रतिपादकमुदाहरणम् । प्रतिपादनाय पक्षवचनं प्रतिज्ञा । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इति । साधनत्वाभिव्यञ्जकविभक्त्यन्तं लिङ्गवचनं हेतुः । यथा ‘धूमवत्वात्’ इति । व्याप्तिदर्शनपुरस्सरं सम्यग्दृष्टान्ताभिधानमुदाहरणम् । व्याप्तिग्रहणस्थलं दृष्टान्तः । स द्विविधः । साधर्म्यदृष्टान्तो वैधर्म्यदृष्टान्तश्चेत्येके । अन्वयव्याप्तिग्रहणस्थलं साधर्म्यदृष्टान्तः । व्यतिरेकव्याप्तिग्रहणस्थलं वैधर्म्यद्दष्टान्तः । अत एवोदाहरणमप्येवं द्विविधम् । तत्र साधर्म्योदाहरणं यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इति । वैधर्म्योदाहरणं यथा ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति यथा हृदः’ इति । एतैस्त्रिभिरेवावयवैरुपपत्तेर्बोधयितुं शक्यत्वान्न तादृशावयवत्वादिनियमो युक्तः । अथ वा दृष्टान्तपदेन तद्वचनमात्रोपलक्षणेेनेदं पक्षान्तरम् । उपलक्षणं चैतत् । उदाहरणोपनयनिगमनैः उदाहरणोपनयाभ्यां वा शक्यते बोधयितुम् । दृष्टान्तोपमानेन लिङ्गस्य पक्षे उपसंहारः उपनयः । सोऽप्युदाहरणानुसारेण द्विविध इति । ‘तथा चायं धूमवान् पर्वतः’ इति साधर्म्योपनयः । ‘न तथायं निर्धूमः पर्वतः’ इति वैधर्म्योपनयः । हेतुपुरस्सरं पक्षे साध्योपसंहारो निगमनम् । यथा ‘तस्मात् पर्वतोऽग्निमानेव’ इति । किं च जिज्ञासादयः शब्दा एव न भवन्ति । कुतो वाक्यावयवाः । कुतस्तरां तन्नियमः । उपनयनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुभ्यां गतार्थत्वाच्चेति ।\nत्र्यवयवादिनियमोऽप्यनुपपन्न इति भावेनाह–\nहेतुगर्भा प्रतिज्ञा केवलापि\nउपपत्तिज्ञापिकेति शेषः । ‘धूमवान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भा प्रतिज्ञा अवयवान्तरं विहायोपपत्तिज्ञापिका भवतीति न कोऽपि नियमपक्षो युज्यते । तावन्मात्रेणोपपत्तेर्बोधे जातेऽप्यवयवान्तरं वदत आधिक्यप्रसङ्गात् । न चैवं त्र्यवयवाभ्युपगमे व्याघातः । यस्यैतावता न बोधस्तं प्रति तदभिधानस्येष्टत्वात् । विचित्रबुद्धयो हि पुरुषा इति ॥\nइतोऽपि न नियमपक्षो युज्यत इत्याह–\nसिद्धौ प्रतिज्ञायां हेतुमात्रं च\nपर्वतादग्निमानय इति नियुक्तः कश्चिद् ब्रूते ‘नाग्निमान् पर्वतः’ इति । अन्यस्तु ‘अग्निमान्’ इति । एवं विवादेनैव प्रतिज्ञासिद्धौ कुतोऽग्निमान् ? इति पृष्टो यदा ‘धूमवत्वात्’ इति ब्र्यात्तदापि भवत्येवोपपत्तिज्ञानमिति नावयवनियमो युक्त इति ॥\nइतोऽपि न युक्त इत्याह–\nदृष्टान्तः सप्रतिज्ञो हेतुगर्भः\nअत्र दृष्टान्त इति तद्वचनोपलक्षणम् । ‘धूमान्महानसवत् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भेण सप्रतिज्ञेन दृष्टान्तवचनमात्रेण उपपत्तिज्ञानसम्भवात् । श्रोत्राकाङ्क्षानुसारेणैवावयवकल्पना युक्ता न तु तन्नियतिरिति ॥" | | "lines": [ |
| | "अनुप्रमाणविभागमाह–", |
| | "अनुप्रमाणं त्रिविधम्", |
| | "तिस्त्रो विधा उद्दिशति । न्यूनाधिकसङ्ख््यान्यतमान्तर्भावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः", |
| | "प्रत्यक्षमनुमानमागम इति", |
| | "प्रायेणासन्नाव्यवहितवर्तमानकतिपयार्थग्राहकं प्रत्यक्षम्, अनासन्नातीतानागतव्यवहितार्थगोचरमनुमानम्, स्वातन्त्र्येण अशेषार्थविषय आगम इति अर्थग्रहणक्रमेणोद्देशः ।", |
| | "प्रत्यक्षमेकमेवेति चार्वाकः । तस्येष्टानिष्टसाधनज्ञानाभावाज्जीवनमेवानुपपन्नम् । न हि प्रत्यक्षं तज्ज्ञानोपायः ।", |
| | "प्रत्यक्षानुमाने एवेति कणादः सौगताश्च । तेषां किमागमो न बोधकः । बोधकोऽपि वा न यथार्थः । यथार्थोऽपि वान्यत्र अन्तर्भूतः । पक्षत्रयमप्यनुभवविरुद्धमिति । अर्थं प्रति स्थितमक्षं प्रत्यक्षम् । प्रमाणान्तरानुसरणेनैव अर्थप्रमापकमनुमानम् । सम्यगतीन्द्रियार्थावगमक आगम इति सञ्ज्ञानिरुक्त्यैव लक्षणसिद्धौ प्रत्यक्षे तस्यैव स्फुटीकरणार्थं अनुमानादौ शृृङ्गग्राहिकया तज्ज्ञापनार्थं च पुनर्लक्षणारम्भः ।", |
| | "तत्र प्रत्यक्षलक्षणमाह–", |
| | "निर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षः प्रत्यक्षम्", |
| | "निर्दोषत्वमर्थेन्द्रिययोर्विशेषणम् । अर्थग्रहणेनाकाशादीनां चक्षुरादिसन्निकर्षव्युदासः । अत्र तत्तदिन्द्रियविषयोऽर्थ उच्यते । तन्निर्दोषत्वग्रहणेन अतिसामीप्यादिदोषयुक्तार्थानामिन्द्रियसन्निकर्षनिरासः । इन्द्रियग्रहणेन अर्थानामेव अन्योन्यसन्निकर्षनिरासः । तन्निर्दोषत्वग्रहणं मनोऽनधिष्ठितत्वादिदोषवदिन्द्रियाणा मर्थसन्निकर्षव्यावृत्त्यर्थम् । सन्निकर्ष इतीन्द्रियादिमात्रव्युदासः । सर्वेण प्रमाणान्तरव्युदासः ।", |
| | "अनुमानलक्षणमाह–", |
| | "निर्दोषोपपत्तिरनुमानम्", |
| | "उपपत्तिरिति लिङ्गमुच्यते । साहचर्यबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । निर्दोषग्रहणमनुमानाऽभासव्युदासार्थम् । व्याप्त्याद्यनुमानलक्षण रहितोऽनुमानवदवभासमानोऽनुमानाभासः । उपपत्तिग्रहणं प्रत्यक्षादिव्यावृत्त्यर्थम् । उपपत्तिश्च यथार्थतो ज्ञातैवार्थं बोधयति । अन्यथातिप्रसङ्गात् ।", |
| | "त्रिविधमनुमानम् । केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि अन्वयव्यतिरेकीति केचित् । साध्यधर्मवान् धर्मी पक्षः । साध्यसमानधर्मवान् धर्मी सपक्षः । साध्यतत्समानधर्मरहितो धर्मी विपक्षः । साध्यत्वाकारमन्तरेण स एव धर्मः साध्यसमानधर्मः । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति अविद्यमानविपक्षं केवलान्वयि । तद् द्विविधम् । सपक्षव्यापकं तदेकदेशवृत्तीति । तद्यथा, धर्माधर्मौ कस्यचित् प्रत्यक्षौ प्रमेयत्वात्, गुणत्वादिति । पक्षव्यापकमविद्यमानसपक्षं विपक्षाद्व्यावृत्तं केवलव्यतिरेकि । तद्यथा, ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वकर्तृत्वादिति । पक्षव्यापकं सपक्षवृत्ति विपक्षात् व्यावृत्तमन्वयव्यतिरेकि पूर्ववत् सपक्षतदेकदेशवृत्तिभेदात् द्विविधम् । तद्यथा, जीवो नित्यः नाशकारणशून्यत्वात्, चेतनत्वादिति । सर्वत्र निर्दोषत्वानुवृत्तेर्न बाधितादौ प्रसङ्गः । तत्पुनर्द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं चेति । प्रत्यक्षयोग्यार्थानुमापकं दृष्टम् । यथा, धूमोऽग्नेः । प्रत्यक्षायोग्यार्थानुमापकं सामान्यतो दृष्टम् । यथा, रूपादिज्ञानं चक्षुरादेः । पुनस्त्रिविधम् । कारणानुमानं कार्यानुमानं सामान्यानुमानमिति । कारणं कार्यस्यानुमानमाद्यम् । यथा, विशिष्टमेघोन्नतिः वृष्टेः । कार्यं कारणस्यानुमानं द्वितीयम् । यथा, घूमोऽग्नेः । अकार्यकारणमकारणकार्यस्यानुमानं तृतीयम् । यथा, रसो रूपस्येति ।", |
| | "निर्दोषः शब्द आगमः", |
| | "अज्ञानविपर्ययसंशयप्रमादविप्रलम्भादिपुरुषदोषपूर्वकत्वाभावो निर्दोषत्वम् । शब्दो वाक्यात्मा । विभक्त्यन्ता वर्णाः पदम् । आकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमन्ति पदानि वाक्यम् । श्रोतुराकाङ्क्षितार्थाभिधायकत्वं पूर्वपदसञ्ज•ताकाङ्क्षापूरकत्वं वा आकाङ्क्षावत्वम् । तेन विरक्तं प्रति वाणिज्योपदेशस्य, गौरश्वः पुरुषो हस्तीत्यादेश्चावाक्यत्वं भवति । सन्निहितार्थाभिधायकत्वं अविलम्बेनोच्चरितत्वं वा सन्निहितत्वम् । तेन चोलेषु वर्तमानं तृषितं प्रति ‘सन्ति सुरसरिति शीतलानि जलानि’ इत्युपदेशस्य विलम्बेनोच्चरितपदानां च वाक्यत्वनिरासः । अन्योन्यान्वययोग्यतावदर्थाभिधायकत्वं योग्यतावत्वम् । तथा च ‘अग्निना सिञ्चेद्’ इत्यादेर्वाक्यत्वनिरासः । निर्दोष इत्यागमाभासनिवृत्तिः । शब्द इति प्रत्यक्षादिव्युदासः । आगमश्च सम्यग्ज्ञात एव बोधकः । अन्यथातिप्रसङ्गात् । स द्विविधः । नित्योऽनित्यश्च । नित्यो वेदः । अनित्यः पुराणादिः । वर्णानां च सर्वत्र नित्यत्वेऽपि प्रबन्धविशेषस्य नित्यत्वानित्यत्वाभ्यामयं विभागः । वर्णाश्च भेदकाभावात् सर्वगता एवेति ।", |
| | "ननु कथं त्रीण्येव प्रमाणानि ? अर्थापत्त्युपमानयोरपि पृथक्प्रमाणत्वात् इत्यत आह", |
| | "अर्थापत्त्युपमे अनुमाविशेषः", |
| | "अनुपपद्यमानप्रमितिरर्थापत्तिः । सा द्विविधा, श्रुतार्थापत्तिः दृष्टार्थापत्तिश्चेति । तत्राद्या यथा, ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति’ इति श्रुतवतो जीवतो गृहाभावप्रमितिः । द्वितीया यथा, जीवतो गृहाभावं दृष्टवतस्तत्प्रमितिरिति । तया बहिर्भावप्रमा भवतीति सा अनुमाने अन्तर्भवति । विमतो बहिरस्ति जीवनवत्वे सति गृहेऽसत्वात् यथाहम्’ इति प्रयोगसम्भवात् ।", |
| | "सादृश्यप्रमासाधनमुपमानम् । तत्त्रिविधम् । गृह्यमाणे स्मर्यमाणप्रतियोगिकसादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, गां दृष्ट्वा वनङ्गतस्य गृह्यमाणगवये स्मर्यमाणगोसादृश्यप्रमाणं ‘गोसदृशोऽयं गवयः’ इति । गृह्यमाणप्रतियोगिकस्मर्यमाण गतसादृश्यप्रमासाधनं स्मर्यमाणप्रतियोगिकगृह्यमाणगतसादृश्यज्ञानम् । यथा, गामनुभूय वनं गतस्य गवये गोसादृश्यज्ञानं स्मर्यमाणे गवि गृह्यमाणगवयप्रतियोगिक सादृश्यप्रमासाधनम् । ‘गोसदृशोऽयं गवयः, तस्मात् गवयसदृशोऽसौ गौः’ इति । निर्दोषवाक्यं सादृश्यप्रमासाधनम् । यथा, ‘यथा गौः गवयस्तथा’ इति । तदेतत्त्रयं क्रमेण प्रत्यक्षाद्यन्तर्भूतम् । विमतो गौः गवयसदृशः गवयगतसादृश्यप्रतियोगित्वात् यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तत्सदृशः यथा यमो यमान्तरेण’ इति प्रयोगसम्भवात् ।", |
| | "अकृतसमयसञ्ज्ञास्मरणसहायं तत्समभिव्याहृतवाक्यार्थप्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षं उपमानम् । सञ्ज्ञासञ्ज्ञिसम्बन्धप्रमितिस्तत्फलमित्यन्ये । तत्रातिदेशवाक्यार्थस्त्रिविधः । साधर्म्यं वैधर्म्यं धर्ममात्रं चेति । तद्भेदात् तत्प्रतिसन्धानात्मकमुपमानमपि त्रिधा भिद्यते । तत्र साधर्म्योपमानं यथा, ‘यथागौर्गवयस्तथा’ इति श्रुतातिदेशवाक्यस्य नागरिकस्य वनं गतस्य गोसदृशं गवयमवलोकयतोऽव्युत्पन्नगवयपदस्मरणवतः ‘अयमसौ गोसदृशः य आप्तेनोपदिष्टः’ इति प्रतिसन्धानं,तेन तस्य गवयपदार्थत्वप्रमास । वैधर्म्योपमानं यथा,‘गवादिवत् द्विशफो न भवत्यश्वः’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः अश्वं पश्यतः अश्वपदं स्मरतः ‘अयमसौ गवादिविसदृशः’ इति प्रतिसन्धानम्, तस्य तेनाश्वपदार्थत्वप्रमितिः । धर्ममात्रोपमानं यथा, ‘दीर्घग्रीवत्वाऽदिमान् पशुरुष्ट्र’ इत्यतिदेशवाक्यं श्रुतवतः क्रमेलकं पश्यतउष्ट्रपदस्मृतिमतः ‘अयमसौ तद्वर्मा’ इति प्रतिसन्धानम्, तेनोष्ट्रपदव्युत्पत्तिरिति । तदेतत् त्रयमप्यनुमान एवान्तर्भूतम् । विमतो गवयशब्दवाच्यः अगोत्वे सति गोसदृशत्वात् व्यतिरेेकेण घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । अतो न विभागानुपपत्तिः । अत्रोपमानद्वयस्य अन्तर्भावानुक्तिः अतिस्फुटप्रतिभासत्वात्, आगमान्तर्भूतत्वे विवादाभावाच्चेति । प्रयोगप्रकारवैचित्र्यात् कथमनुमानत्वमित्यत उक्तम् अनुमाविशेष इति ॥ यथाखल्वन्वयिनो व्यतिरेकिणश्च प्रयोगप्रकारवैचित्र्येऽपि नानुमानाद्बहिर्भावः अनुमानविशेषत्वात् अपेक्षितसाधर्म्यसद्धावाच्च तथात्रापीति । एतेनोपमानस्यार्थविशेषनिष्ठतया पार्थक्यशङ्कापि परास्ता । तादृशसम्प्रतिपन्नानुमान वदेव तदुपपत्तेः । अनेनैव ‘न च केवलतर्केण’ इत्यादिपृथगुक्तेर्गतिश्चोक्ता भवति ।", |
| | "तथापि अभावाख्यं पृथक्प्रमाणमस्तीत्यत आह", |
| | "अभावोऽनुमा प्रत्यक्षं च", |
| | "अभावविषयं प्रमाणमभावः । तत् त्रिविधम् । प्रत्यक्षार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘नास्त्यत्र घटः’ इति । आनुमानिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा, रूपज्ञानरहितस्य ‘नास्ति चक्षुः’ इति । आगमिकार्थप्रतियोगिकाभावविषयं प्रमाणं यथा ‘वैधी हिंसा न पापसाधनम्’ इति । तत्र प्रथमं प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भवति । द्वितीयमनुमाने । विमतः चक्षूरहितः रूपाज्ञत्वात् घटवदिति प्रयोगसम्भवात् । तृतीयमागमे । अतो युक्तो विभाग इति । अत्राभावद्वयस्यान्तर्भावानुक्तिस्तत्र वादिनामविवादात् । उभयत्रान्तर्भावात् योगविभागः । प्रायेणानुमानेऽन्तर्भावज्ञापनाय क्रमोल्लङ्घनम् । कथमेकप्रमाणस्योभयत्रान्तर्भाव इत्यत आह", |
| | "परामर्शापरामर्शविशेषात्", |
| | "यदा ‘अत्र घटोऽस्ति न वा’ इति परामर्शपूर्वकं योग्यानुपलब्धिरूपं घटाभावप्रमाणं प्रवर्तते तदाऽनुमाने । ‘घटोऽत्र नास्ति योग्यत्वे सत्यनुपलभ्यमानत्वात् गजवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । यदा पुनरेवमपरामृश्य झडिति ‘नास्ति घटः’ इति प्रवर्तते तदा प्रत्यक्ष इति न विरोधः । अयं च बहिरेव विभागो न तु सुखाद्यभावप्रमाणे । साक्षिणः सुखादिस्वरूपे निश्चयरूपत्वेन परामर्शाभावात् ।", |
| | "सम्भवपरिशेषावपि पृथक्प्रमाणे विद्येते । अतः कथं त्रित्वम् ? इत्यत आह", |
| | "सम्भवपरिशेषावनुमा", |
| | "अल्पप्रमासाधनं बहुलज्ञानं सम्भवः । यथा ‘शतमस्य अस्ति’ इति ज्ञाने पञ्चाशज्ज्ञानम् । प्रसक्तव्यावृत्तिप्रतीतिः परिशिष्यमाणप्रमासाधनं परिशेषः । स द्विविधः । विधिमुखो निषेधमुखश्च । तत्राद्यो यथा ‘चैत्रमैत्रयोरयं चैत्रः’ इत्युक्तेऽन्यस्मिन् मैत्रप्रमा । द्वितीयो यथा ‘नायं चैत्र’ इत्युक्ते तस्मिन् मैत्रप्रमा इति । सम्भवपरिशेषयोरनुमानेऽन्तर्भावः । ‘विप्रतिपन्नः पञ्चाशद्वान् शतवत्वात् सम्प्रतिपन्नवत्, विमतो मैत्रः चैत्रमैत्रयोरन्यतरत्वे सत्यचैत्रत्वात् व्यतिरेकेण चैत्रवत्’ इति प्रयोगसम्भवात् । तस्मादुपपन्न्• प्रमाणानां त्रित्वमिति । वादिविवादभावाभावज्ञापनार्थोऽयं विभागः ।", |
| | "ननु तर्कः प्रमाणं न वा । प्रमाणमिति ब्रूमः । कथं तर्हि त्रित्वम्? इत्यतस्तत्स्वरूपं विवृण्वन्नाह–", |
| | "आत्मान्योन्याश्रयचक्रकानवस्थाकल्पनागौरवश्रुतदृष्टहानादयो दूषणानुमा", |
| | "आदिपदेनाश्रुतकल्पनमदृष्टकल्पनं च सङ्गृह्यते । एतत्प्रसञ्जनमिहोपलक्ष्यते । व्याप्याङ्गीकारेऽनिष्टव्यापकप्रसञ्जनं तर्कः । द्विविधमनिष्टम् । प्रामाणिकहानमप्रामाणिककल्पनं च । तत् पुनः पञ्चविधम् । आत्माश्रयान्योन्याश्रय चक्रकानवस्थानिष्टभेदात् । सर्वस्यानिष्टत्वेऽपि गोबलीवर्दन्यायेन पृथगुक्तिः । तत्राद्यचतुष्टयमप्रामाणिककल्पनात्मकम् । न हि कुत्राप्यात्माश्रयादिकं प्रमाणसिद्धम् । पञ्चममुभयात्मकम् । तत्राप्याद्यं द्विविधम् । श्रुतदृष्टहानभेदात् । द्वितीयमपि तथा । अश्रुतादृष्टकल्पनभेदात् । तदेव कल्प्यानेकत्वे कल्पनागौरवम् । एतत्प्रसञ्जनात्मकस्तर्कोऽपि पञ्चधा भिद्यते । तस्य पञ्चाङ्गानि । प्रसञ्जकस्य प्रसञ्जनीयेन व्याप्तिः, प्रतितर्कैरप्रतिघातः, प्रसञ्जनीयस्य विपर्यये पर्यवसानं, प्रसञ्जनीयस्यानिष्टत्वं, प्रतिपक्षासाधकत्वं चेति । तस्यैवोत्पत्तिज्ञप्त्यर्थं तदुत्पत्तिज्ञप्त्यपेक्षायामात्माश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्यादौ परम्परया तदुत्पत्त्याद्यपेक्षाया मन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । यदुत्पत्त्याद्यधीनं यदुत्पत्त्यादि तदुत्पत्त्याद्यर्थं तदुत्पत्त्याद्यपेक्षायां चक्रकाप्रसङ्गः । उत्पत्त्यादावन्योत्पत्त्याद्यपेक्षाया अपर्यवसानेऽनवस्थाप्रसङ्गः । अत्र ‘यद्येवमभ्युपगमः तदात्माश्रयादिप्रसङ्गः । यत्रैवमभ्युपगमः तत्र तत्प्रसङ्गः यथामुत्र । यदि नात्माश्रयादिः तर्हि नैतदपि’ इति प्रवृत्तिप्रकारः । सामान्यत एव व्याप्तिर्वाच्या । श्रुतहानं यथा ‘यदीश्वरो न सर्वज्ञः तर्हि न जगत्कर्ता स्यात्’ इति । दृष्टहानं यथा ‘यदि पर्वतोऽनग्निमान् तर्हि निर्धूमः स्यात्’ इति । अश्रुतकल्पनं यथा ‘यदीश्वरो जीवाभिन्नः तर्हि दुःखी स्यात्’ इति । अदृष्टकल्पनं यथा ‘यदि पीतमुदकमन्तरधक्ष्यत् तर्हि मामपि दहेदविशेषात्’ इति । यत्रापाद्यापादकयोर्न साक्षात्सामानाधिकरण्यं तत्र तथैवानुपपत्तौ प्रकारान्तरेणैकाधिकरणतामापाद्य व्याप्तिरभिधातव्या । यथा ‘यदि देवदत्तः सर्वज्ञस्तर्हि यज्ञदत्तोऽपि तथा स्यात्’ इत्यत्र ‘यत्र यो धर्मो वर्तते स तदविशिष्टेऽपि वर्तत’ इत्यादि । सोऽयं तर्कोऽनुमान एवान्तर्भूतोऽतो न प्रमाणत्रित्वभङ्गः ।", |
| | "स्यादेतत् । न तर्कोऽनुमानम् । तर्के हि प्रामाणिकहानादि आपाद्यते । न च तत्साध्यं भवति अपसिद्धान्तात् प्रमाणविरोधाच्च, आरोपितलिङ्गत्वेनासिद्धेश्चेति । अत उक्तम् दूषणेति ॥ द्विविधं ह्यनुमानम् । स्वपक्षसाधनं परपक्षदूषणं च । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । द्वितीयमपि द्वेधा प्रवर्तते ‘नायं निरग्निकः अनिर्धूमत्वात्’ इति वा ‘निरग्निकत्वाङ्गीकारे निर्धूमत्वाभ्युपगमः’ इत्यनिष्टप्रसङ्गरूपेण वा ‘तत्र दूषणानुमाने तर्कस्यान्तर्भावः । प्रसङ्गरूपानुमाने च न साध्यवदापाद्यस्य प्रमाणविरोधाद्यसिद्धिश्च दूषणमिति वक्ष्यतीति न कश्चिद्विरोध इति । एतदर्थ एव योगविभागः ।", |
| | "तथाऽपि वाक्यतात्पर्यज्ञापकान्युपक्रमादीनि पृथक् प्रमाणानि सन्तीत्यत आह", |
| | "उपक्रमोपसंहारतदैकरूप्याभ्यासापूर्वताफलार्थवादाश्च", |
| | "चानुमेत्यस्यानुकर्षणार्थः । प्रकरणादिरुपक्रमः । तदन्त उपसंहारः । तयोरुपक्रमोपसंहारयोरेकार्थत्वं तदैकरूप्यम् । एकप्रकारासकृदुक्तिरभ्यासः । प्राचुर्येण प्रमाणान्तराप्राप्ततापूर्वता । फलवत्वं फलम् । स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः । एतेषां वाक्यतात्पर्येऽनुमात्वान्नोक्तविरोधः ।", |
| | "यद्येतेऽनुमानेऽन्तर्भूतास्तर्हि कथं तेषां ‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये’ इति उपपत्तितः पृथगुक्तिरित्यत आह", |
| | "उपपत्तिविशेषाः", |
| | "यथा खलु पाण्डवानां कौरवान्तर्भावेऽपि कौरवेभ्यः पृथगुक्तिः कौरवविशेषत्वेन साक्षादेकत्वाभावेन कौरवपदेन तदतिरिक्तग्रहणात्तथा प्रकृतेऽपीति ।", |
| | "नन्वेवं पृथगुक्तिमन्यथाव्याख्यायैषामनुमानान्तर्भावाङ्गीकारे को हेतुः ? इत्यत आह", |
| | "त एव सोपपत्तयो लिङ्गानि", |
| | "उक्ता इति शेषः । यथा ‘उपक्रमोपसंहारौ’ इत्यत्रोपपत्तेः लिङ्गत्वमुच्यते तथा उपक्रमादीनामपि । अतो युक्तमुक्तम् । किं च यथोपपत्तिर्लिङ्गम् व्याप्तिबलेनार्थधीहेतुः तथोपक्रमादयोऽपि ‘यत्र यत् उपक्रम्यते तत्रापवादाभावे तत् तात्पर्यगोचरः’ इत्यादिव्याप्तिबलेनैवार्थबोधकाः । अतः कथं नानुमानेऽन्तर्भावः ? इत्याह त एवेति ॥ एतेनागमान्तर्भावोऽपि परास्तः । नह्यागमवत् व्याप्तिमनपेक्ष्य बोधका एते अनुभूयन्ते । तेषामागमार्थविषयत्वज्ञापनार्थो योगविभागः ॥", |
| | "तथापि समाख्यादीनि पृथक्प्रमाणानि सन्तीत्यत आह", |
| | "समाख्यावाक्यप्रकरणस्थानानि च", |
| | "अनुमेत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः । निर्णीतस्थले समानोक्तिः समाख्या । सा द्विविधा । अर्थतः शब्दतोऽपीति । वाक्यमुक्तम् । कयाचिद्विवक्षयैकार्थावच्छिन्नं वाक्यजातं प्रकरणम् । तादृशं प्रकरणजातं स्थानम् । एतेषामनुमानेऽन्त र्भावादुक्तमुपपन्नम् । समाख्याया वाक्यादेरवरत्वेऽपि तदादित्वेन ग्रहणं ‘श्रुतिर्लिङ्गम् समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा’ इति अविवक्षितक्रमं वाक्यमनुसृत्य कृतम् । उपक्रमादीनां तात्पर्यलिङ्गत्वं, एतेषामर्थ एवेति विशेषज्ञापनार्थो योगविभागः । उपक्रमादीनां स्वार्थे आगमत्वेऽपि तात्पर्य एव लिङ्गत्वात् नोक्तविरोधः ।", |
| | "तर्हि श्रुतिर्लिङ्गमिति समाख्यादीनां लिङ्गात् पृथगुक्तिः कथमित्यत आह", |
| | "लिङ्गविशेषाः", |
| | "पूर्ववत्परिहारः । अत्राप्यनुमानान्तर्भावे पूर्वोक्ता युक्तिरनुसन्धेयेति ॥", |
| | "यदुक्तं निर्दोषं प्रमितं लिङ्गमनुमानमिति । तदयुक्तम् । नारिकेलद्वीपवासिनो धूमदर्शनेऽपि वह्निप्रमानुदयादित्यत आह", |
| | "व्याप्तिरूपपत्तिमूलम्", |
| | "व्याप्तिरिति विषयेण विषयिणः प्रत्ययस्योपलक्षणम् । न केवलं प्रमितं लिङ्गमात्रमनुमितिजनकमङ्गीक्रियते । किं नाम ? निर्दोषत्वान्तर्गतव्याप्तिप्रमितिपूर्वकमेव । न च तादृशं नानुमितिजनकम् । अविनाभावो व्याप्तिः । सा द्विविधा अन्वयव्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिश्चेति । तत्र साध्येन साधनस्य व्याप्तिरन्वयव्याप्तिः । यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इति । साधनाभावेन साध्याभावस्य व्याप्तिर्व्यतिरेकव्याप्तिः । यथा, ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति’ इति । भूयो भूयो हि धूमं पश्यन् तत्राग्निं पश्यति, अग्न्यभावं पश्यंश्च धूमाभावम् । ततो निश्चिनोति धूमाग्न्योः साहचर्यादस्त्यविनाभाव इति । गृहीतव्याप्तिश्च पर्वते धूमं पश्यंस्तामनुस्मरति ‘यत्सन्निधौ यो दृष्टः स तस्य स्मारकः’ इति न्यायात् । स्मृतव्याप्तिश्च व्याप्तं धूमं पर्वते प्रत्यभिजानाति । तेनाग्न्यनुमितिरिति युक्तं लक्षणमिति ॥", |
| | "द्विविधमनुमानम् । स्वार्थं परार्थं चेति । परोपदेशानपेक्षं स्वार्थम् । तदपेक्षं परार्थम् ॥", |
| | "व्याप्तिमल्लिङ्गबोधकं वाक्यं परोपदेशः ।तस्यावान्तरवाक्यान्यवयवाः ते च जिज्ञासासंशयशक्यप्राप्तिप्रयोजनसंशयव्युदासप्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानीति दशेति जरन्नैय्यायिकाः । प्रतिज्ञादयः पञ्चैवेति नवीनाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणानि उदाहरणोपनयनिगमनानि त्रय एवेति मीमांसकाः । उदाहरणोपनयौ द्वावेवेति बौद्धाः । तत्र तृतीयपक्षव्यतिरिक्तनियमपक्षास्तावन्नोपपन्ना इत्याह–", |
| | "सा प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तरूपा", |
| | "सेत्युपपत्तिप्रतिपादकं वाक्यमुपलक्ष्यते । दृष्टान्ते इति तत्प्रतिपादकमुदाहरणम् । प्रतिपादनाय पक्षवचनं प्रतिज्ञा । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इति । साधनत्वाभिव्यञ्जकविभक्त्यन्तं लिङ्गवचनं हेतुः । यथा ‘धूमवत्वात्’ इति । व्याप्तिदर्शनपुरस्सरं सम्यग्दृष्टान्ताभिधानमुदाहरणम् । व्याप्तिग्रहणस्थलं दृष्टान्तः । स द्विविधः । साधर्म्यदृष्टान्तो वैधर्म्यदृष्टान्तश्चेत्येके । अन्वयव्याप्तिग्रहणस्थलं साधर्म्यदृष्टान्तः । व्यतिरेकव्याप्तिग्रहणस्थलं वैधर्म्यद्दष्टान्तः । अत एवोदाहरणमप्येवं द्विविधम् । तत्र साधर्म्योदाहरणं यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इति । वैधर्म्योदाहरणं यथा ‘योऽग्निमान्न भवति स धूमवान्न भवति यथा हृदः’ इति । एतैस्त्रिभिरेवावयवैरुपपत्तेर्बोधयितुं शक्यत्वान्न तादृशावयवत्वादिनियमो युक्तः । अथ वा दृष्टान्तपदेन तद्वचनमात्रोपलक्षणेेनेदं पक्षान्तरम् । उपलक्षणं चैतत् । उदाहरणोपनयनिगमनैः उदाहरणोपनयाभ्यां वा शक्यते बोधयितुम् । दृष्टान्तोपमानेन लिङ्गस्य पक्षे उपसंहारः उपनयः । सोऽप्युदाहरणानुसारेण द्विविध इति । ‘तथा चायं धूमवान् पर्वतः’ इति साधर्म्योपनयः । ‘न तथायं निर्धूमः पर्वतः’ इति वैधर्म्योपनयः । हेतुपुरस्सरं पक्षे साध्योपसंहारो निगमनम् । यथा ‘तस्मात् पर्वतोऽग्निमानेव’ इति । किं च जिज्ञासादयः शब्दा एव न भवन्ति । कुतो वाक्यावयवाः । कुतस्तरां तन्नियमः । उपनयनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुभ्यां गतार्थत्वाच्चेति ।", |
| | "त्र्यवयवादिनियमोऽप्यनुपपन्न इति भावेनाह–", |
| | "हेतुगर्भा प्रतिज्ञा केवलापि", |
| | "उपपत्तिज्ञापिकेति शेषः । ‘धूमवान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भा प्रतिज्ञा अवयवान्तरं विहायोपपत्तिज्ञापिका भवतीति न कोऽपि नियमपक्षो युज्यते । तावन्मात्रेणोपपत्तेर्बोधे जातेऽप्यवयवान्तरं वदत आधिक्यप्रसङ्गात् । न चैवं त्र्यवयवाभ्युपगमे व्याघातः । यस्यैतावता न बोधस्तं प्रति तदभिधानस्येष्टत्वात् । विचित्रबुद्धयो हि पुरुषा इति ॥", |
| | "इतोऽपि न नियमपक्षो युज्यत इत्याह–", |
| | "सिद्धौ प्रतिज्ञायां हेतुमात्रं च", |
| | "पर्वतादग्निमानय इति नियुक्तः कश्चिद् ब्रूते ‘नाग्निमान् पर्वतः’ इति । अन्यस्तु ‘अग्निमान्’ इति । एवं विवादेनैव प्रतिज्ञासिद्धौ कुतोऽग्निमान् ? इति पृष्टो यदा ‘धूमवत्वात्’ इति ब्र्यात्तदापि भवत्येवोपपत्तिज्ञानमिति नावयवनियमो युक्त इति ॥", |
| | "इतोऽपि न युक्त इत्याह–", |
| | "दृष्टान्तः सप्रतिज्ञो हेतुगर्भः", |
| | "अत्र दृष्टान्त इति तद्वचनोपलक्षणम् । ‘धूमान्महानसवत् पर्वतोऽग्निमान्’ इति हेतुगर्भेण सप्रतिज्ञेन दृष्टान्तवचनमात्रेण उपपत्तिज्ञानसम्भवात् । श्रोत्राकाङ्क्षानुसारेणैवावयवकल्पना युक्ता न तु तन्नियतिरिति ॥" |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "निर्दोषोपपत्तिरनुमेत्युक्तम् । को दोष उपपत्तेः सम्भवति ? । द्विविध उपपत्तिदोषः । साक्षात् वाचनिकश्चेति । यस्तत्रोपपत्तेरेव साधनदूषणक्षमत्वापादकः स साक्षादुपपत्तिदोषः । तं विभज्य दर्शयति ॥\nउपपत्तिदोषौ विरोधासङ्गती\nउपपत्तिदोषो द्विविधः विरोधोऽसङ्गतिश्चेति । अन्वययोग्यताविरहो विरोधः । आकाङ्क्षाभावोऽसङ्गतिः । इमौ चार्थवचनयोरपि सम्भवतः । अर्थासाधुत्वे वचनस्यापि तथात्वादिति । वचनस्यैवासाधुत्वापादको वाचनिकदोषः । तं विभज्य दर्शयति\nन्यूनाधिके वाचनिके\nद्विविधो वाचनिकदोषः । न्यूनमधिकं चेति । अपेक्षितासम्पूर्तिर्न्यूनम् । अपेक्षिताधिकमधिकम् । न्यूनाधिके च परार्थप्रयोग एव सम्भवतः । वचनद्वारेणैवोपपत्तेरपि दूषिते स्यातामिति ॥\nन केवलमुपपत्तिदोषाणामेव विरोधादिभिः सङ्ग्रहः । किं नाम ? परनिरूपिताशेषनिग्रहस्थानान्यपि विरोधादिष्वेवान्तर्भवन्तीत्याह–\nसंवादानुक्तियुता निग्रहाः\nनिग्रहाः निग्रहस्थानानि । कथायामखण्डिताहङ्कारेण परेण परस्याहङ्कारखण्डनं पराजयो निग्रहस्तन्निमित्तं तत्त्वाप्रतिपत्तिलिङ्गम् वा निग्रहस्थानम् । सा द्विविधा अप्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिश्चेति । परोक्तस्ववक्तव्ययोरज्ञानम् अप्रतिपत्तिः । तयोरेव विपरीतज्ञानम् विप्रतिपत्तिः । तानि च प्रतिज्ञाहानिः (१) प्रतिज्ञान्तरम् (२) प्रतिज्ञाविरोधः (३) प्रतिज्ञासन्न्यासः (४) हेत्वन्तरम् (५) अर्थान्तरम् (६) निरर्थकम् (७) अविज्ञातार्थकम् (८) अपार्थकम् (९) अप्राप्तकालम् (१०) न्यूनम् (११) अधिकम् (१२) पुनरुक्तम् (१३) अननुभाषणम् (१४) अज्ञानम् (१५) अप्रतिभा (१६) विक्षेपः (१७) मतानुज्ञा (१८) पर्यनुयोज्योपेक्षणम् (१९) निरनुयोज्यानुयोगः (२०) अपसिद्धान्तः (२१) हेत्वाभासाः (२२) उदाहरणाभासाः (२३) तर्कपराहतिश्चेति । एतानि च कथाबाह्यानि कथायामपस्मारोन्मादादिदशापन्नानि झटिति संवरणेन तिरोहितोद्भावनावसराणि पुरःस्फूर्तिकानधिकृतोद्भावितानि न निग्रहस्थानानि । तात्कालिकातत्वज्ञानलिङ्गत्वेऽपि प्रतियोग्यपेक्षया तदभावात् इति ॥\nतत्र येन यत् यथा साध्यत्वादिना निर्दिष्टं तस्य तथा निर्वाहादर्शनेन पुनस्त्यागः प्रतिज्ञाहानिः । द्विधा चैषा । साधनहानिर्धूषणहानिश्चेति । तत्राद्या द्वादशविधा । पक्षे तावत् साध्यसाधनधर्मितद्विशेषणहानिभेदात् षट्प्रकाराः । एवं दृष्टान्तेऽपीति । द्वितीयापि द्विविधा । स्वरूपतो विशेषतश्चेति । सर्वा पुनर्द्विविधा ।असद्विषया सद्विषया चेति । सर्वा चेयं द्विधा प्रवर्तते कण्ठतोऽर्थतश्चेति । ‘दुष्टं चेन्माभूत्’ इति कण्ठतः । ‘अन्यथास्तु’ इत्यर्थतः । तत्रासद्विषया पक्षे साध्यहानिर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्त्वग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तस्मिन्नेव हेतौ तथा दूषिते माऽस्त्वसौ हेतुरिति, धूमवत्वमस्त्विति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदपर्वतावग्निमन्तावित्यत्र भागे बाधाभिधाने मास्तु तर्हि हृदः पक्ष इति, पर्वत एवास्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा, पर्वत उष्णाग्निमान् इत्यत्र व्यर्थविशेषणतया प्रत्युक्ते मास्तु तर्हि तथेति, अग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा, सुरभिधूमवत्वादित्यत्र तथैव दूषिते मास्तु तर्ह्येवमिति, धूमवत्वादित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा, अयं पर्वतोऽग्निमानित्यत्र तथैव दूषिते तर्हि तथा मास्त्विति,पर्वत इत्येवास्त्विति वा । दृष्टान्ते साध्यहानिर्यथा, पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात् महानसवदित्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्तु तर्हि महानसोऽग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तत्रैव प्रयोगे तथैव प्रत्युक्ते माऽस्तु प्रमेयत्वात्, महानसोऽग्निमानिति, धूमवत्वादिति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदवदित्युक्ते साध्यवैकल्यात् प्रत्युक्ते मास्तु स दृष्टान्त इति, महानसोऽस्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा ‘यो धूमवानसावुष्णाग्निमान् यथा महानसः,इत्यत्र विशेषणवैयर्थ्येऽभिहिते माऽस्तु तथेति, सोऽग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा ‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्तु तर्हीत्थमिति, यो धूमवानित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा,‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् तन्महानसवत्’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्त्वेवमिति, महानसवदित्येवास्त्विति वा ।\nदूषणहानिः स्वरूपतो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रासिद्धेरुद्भावने निरनुयोज्यानुयोगेन प्रत्युक्ते ‘तर्हि मा भूत्तत्’ इति ‘अनैकान्तिकता भवतु’ इति वा । विशेषतो यथा ‘हृदपर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’इत्यत्र स्वरूपासिद्ध्युद्भावने पूर्ववत् प्रत्युक्ते ‘तर्हि मास्तु’ इति ‘भागासिद्धो भवतु’ इति वा ॥\nसद्विषया तु ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तर्हि मास्तु पर्वतोऽग्निमान्’ इत्याद्युदाहर्तव्या । सा च पर्यनुयोज्योपेक्षणसहचारिणीऽति । ननु यद्दोषभयादुक्तं त्यजति स एव निग्रहस्थानमस्तु किं हान्येति चेन्न । सद्धानौ तस्या एव निग्रहहेतुत्वात् । असद्धानावपि तत एव परिहृतत्वात् । हानिमनुद्भाव्यप्राचीनदोषस्थापनानुपपत्तेश्च । न चास्यास्तादर्थ्यं, स्वयमपि विप्रतिपत्तिसूचकत्वात् । न चैवं स्ववचनविरोध एव । हानिमनुद्भाव्य विरोधोद्भावनानुपपत्तेरिति ॥।\nदोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाध्यभागेऽधिकप्रक्षेपः प्रतिज्ञान्तरम् । प्रतिज्ञा उदाहरणे प्रयोज्यभागः निगमनं चेति साध्यभागः । द्विविधं चेदं दोषपरिहारहेतुः तदहेतुश्चेति ॥ दोषसदसद्भावाभ्यां पुनर्द्विविधम् । तत् प्रतिज्ञायां चतुर्विधम् । पक्षतद्विशेषणसाध्यतद्विशेषणप्रक्षेपभेदात् । पक्षप्रक्षेपोऽपि द्वेधा । स्वरूपतः पक्षान्तरतश्चेति । एवं साध्यप्रक्षेपोऽपि । तत्र सद्दोषपरिहारार्थमाद्यं यथा ‘अनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । द्वितीयं यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्तिकत्वेऽभिहिते ‘तदपि पक्षः’ इति । तृतीयं यथा, तत्रैव ध्वनिभिः सिद्धसाधनत्वोद्भावने ‘वर्णात्मकः शब्दः पक्षः’ इति । चतुर्थं यथा ‘शब्दः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । पञ्चमं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् सुरभिमलिनधूमवत्वात्’ इत्यत्र विशेषणासामर्थ्येऽभिहिते ‘साग्निकृष्णागरुमान्’ इति । षष्ठं यथा ‘क्षित्यादिकं कारणपूर्वकं कार्यत्वात्’ इत्यत्र सिद्धसाधनत्वोक्तौ उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकमिति ॥\nउदाहरणे प्रयोज्यभागे प्रयोज्यस्वरूपतदन्तरतद्विशेषणधर्मितद्विशेषणप्रक्षेपभेदेन पञ्चविधम् । तत्राद्यं यथा ‘यो धूमवान् यथा महानसः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘सोऽग्निमान्’इति । द्वितीयं यथा ‘यत् सुरभिमलिनधूमवत् तत् अग्निमत् यथा सम्प्रतिपन्नम्’इत्युक्ते प्रयोज्यभागे न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् साग्निकृष्णागरुमत्’ इति । तृतीयं यथा ‘यत् कार्यं तत् कारणपूर्वकं यथा घटः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकम्’ इति । चतुर्थः यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इत्येवोक्ते प्रागिव प्रत्युक्ते ‘यथा महानसः’ इति । पञ्चमं यथा ‘शब्दो नित्यः नित्यगुणत्वात् परमाणुरूपवत्’ इत्यत्र साध्यवैकल्येऽभिहिते ‘अपार्थिवपरमाणुरूपं दृष्टान्तः’ इति ॥\nनिगमनेऽपि प्रतिज्ञायामिवोदाहर्तव्यम् । हेतुप्रक्षेपोऽत्राधिकः । स यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्येवोक्ते न्यूनतया प्रत्युक्ते, तस्मात् धूमवत्वात्पर्वतोऽग्निमान्’ इति । असद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’इत्यत्र बाधोक्तावुष्णाग्निमानित्यादि । सद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्ति कत्वोद्भावने ‘सर्वगतः शब्दः पक्षः’ इत्यादि । असद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येना नैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तदपि पक्षः इत्यादि । न च दोषापरिहारे अर्थान्तरता । प्रकृतोपयोगसद्भावाभिमानेन प्रतिज्ञान्तरत्वस्यैव सिद्धत्वात् । न चेयं हानिरेव । पूर्वाङ्गीकृतस्यात्यागात् । विशेषणाभावस्य प्रागनङ्गीकृतत्वादिति ॥।\nएकवाक्ये अवान्तरवाक्यानां पदानां च मिथो व्याघातः प्रतिज्ञाविरोधः । स च बहुप्रकारः । तत्र प्रतिज्ञायां धर्मिपदयोर्यथा ‘श्रोतृत्वे सति बधिरः’ इति । साध्यपदयोर्यथा ‘विमतो बधिरत्वे सति श्रोता’ इति । धर्मिसाध्यपदयोश्चतुर्विधः । तत्र धर्मविधानाद्यथा ‘मूको वक्ता’ इति । तन्निषेधाद्यथा ‘प्रमेयं न प्रमाणसापेक्षम्’ इति । धर्मिविधानाद् यथा ‘अतीतमस्ति’ इति । तन्निषेधाध्यथा‘वर्तमानं नास्ति इति । हेतुपदयोर्यथा ‘मूकत्वे सति वक्तृत्वात्’ इति । उदाहरणे साधनपदयोर्हेतुपदवत् । साध्यपदयोः प्रतिज्ञायामिव । परस्परं तु प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । दृष्टान्तधर्मिणि साध्यधर्मिवत् । साध्यधर्मिपदयोः प्रतिज्ञायामिव चतुर्विधः । उपनयपदयोर्हेतुपदवत् । निगमने प्रतिज्ञावत् । हेत्वंशेन विरोधः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् ।\nप्रतिज्ञाहेत्वोर्यथा ‘द्रव्यं गुणव्यतिरिक्तं अव्यतिरिक्तत्वात्’ इति । प्रतिज्ञोदाहरणयोर्यथा ‘विप्रतिपन्नो वक्ता मूकवत्’ इति । प्रतिज्ञोपनययोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । प्रतिज्ञानिगमनयोर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् तस्मान्निरग्निकः’ इति।हेतूदाहरणयोर्यथा ‘वक्तृत्वान्मूकवत्’ इति । हेतूपनययोर्यथा ‘धूमवत्वात् तथा चायं निर्धूमः’ इति । हेतुनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । उदाहरणोपनययोर्हेतूदाहरणविरोधवत् । उदाहरणनिगमनयोः प्रतिज्ञोदाहरणविरोधवत् । उपनयनिगमनयोरपि प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । एवमन्यत्रापि विरोधो द्रष्टव्यः । न च विरुद्धहेत्वाभाससङ्करः । तत्र साध्यविपर्ययव्याप्तिदर्शनेन विरोधः । अत्र पुनः अस्ति नास्तीतिवत् उक्तिमात्रेणेति भेदात् । अत एव प्रथममुपलब्धेर्दोषान्तर सम्भवेप्येतदेवोद्भाव्यमिति ॥।\nस्वोक्तापलापः प्रतिज्ञासन्न्यासः । हानिवदवान्तरभेदभिन्नः । चतुर्धा च प्रवर्तते । केनेदमुक्तम् ? इति वा परमतमेतन्मयोक्तम् इति वा त्वयेदमुक्तम् इति वा परोक्तं मयानूदितम् इति वेति ॥।\nदोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाधकांशे अधिकप्रक्षेपो हेत्वन्तरम् । हेतुः उदाहरणे प्रयोजकभागः उपनय इति साधकांशः । तद् द्विविधम् साधनदूषणनिष्ठभेदात् । सर्वं स्वरूपतो विशेषतश्चेतिद्वेधा । तत्राद्यं यथा । हेत्वाद्यप्रयोगे न्यूनत्वोद्भावने तदुपादानम् । द्वितीयमपि दोषप्रतीकाराप्रतीकाराभ्यां दोषसदसद्भावाभ्यां च द्वेधा । तत्र साधने हेतौ सद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वेन दूषिते सामान्यवत्वे सतीति । उदाहरणे प्रयोजकभागे यथा ‘ऐन्द्रियकः सोऽनित्यः’ इत्यत्र न्यूनत्वेऽभिहिते पूर्ववत् विशेषणम् । उपनये यथा ‘तथा चायमैन्द्रियकः’ इत्युक्ते पूर्ववत् विशेषणम् । दूषणे हेतौ यथा ‘नायं साध्यसाधकः सपक्षे सत्त्वात्’ इत्यत्र व्यभिचारेण प्रत्युक्ते ‘विपक्षवृत्तित्वे सति’ इत्यादि । सद्दोषाप्रतीकारो यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषप्रतीकारो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र महानसे व्यभिचार इत्युक्ते ‘तदन्यत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषाप्रतीकारो यथा तत्रैव ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । अत्र हेत्वाभासादिसम्भवेऽपि तस्य साध्यत्वात् सिद्धं हेत्वन्तरमेवोद्भाव्यमिति ॥।\nप्रकृतानुपयुक्तान्वितोक्तिरर्थान्तरम् । तच्चतुर्विधम् । स्वपरोभयानुभयमतरीतिभेदात् । तत्र स्वमतेन नैयायिकस्य मीमांसकं प्रति यथा ‘शब्दोऽनित्यः स चाकाशविशेषगुणः’ इति । परमतेन यथा ‘द्रव्यं’ इत्यादि । उभयमतेन यथा ‘श्रोत्रग्राह्योऽसौ’ इत्यादि । अनुभयमतेन यथा ‘गन्धादिभिः समानाश्रयोऽसौ’ इत्यादि । अत्र न्यूनादिसम्भवेऽपि तस्योक्तग्राह्यत्वादस्य चोच्यमानग्राह्यत्वेन प्रथमप्राप्तत्वात् इदमेवोद्भाव्यमिति ॥।\nअबोधकशब्दप्रयोगो निरर्थकम् । तच्च बहुप्रकारम् । कचटतपेत्यादिमातृकापाठमात्रम् लिङ्गविभक्तिवर्णविपर्यासः कृत्तद्धित समासाख्यातविपर्यासः भाषान्तरसङ्करश्चेत्यादि । कथञ्चित् ज्ञापकत्वात् कथमेतन्निग्रहस्थानमिति चेन्मैवम् । नहि कथञ्चिज्ज्ञापकत्वं शब्दधर्मः प्रकरणादिनैव तत्र ज्ञानोदयात् । भाषान्तरसङ्करोऽपि समसमयत्वाभावे निग्रहस्थानम् । अन्यथा ज्ञानसङ्गूहनार्थं स्वभाषया प्रत्यवतिष्ठमानं प्रति तदनभिज्ञस्योत्तराभावप्रसङ्गादिति ॥\nत्रिवारमुक्तेऽपि परिषत्प्रतिवादिभ्यामविज्ञातार्थबोधकपदप्रयोगोऽ विज्ञातार्थकम् । तच्चतुर्विधम् । स्वतन्त्रमात्रसिद्धम्,रूढिमनपेक्ष्य केवलयोगेन प्रवृत्तम्, निर्णायकाभावेन संशयाक्रान्तम्, अतिद्रुतोच्चारितं चेति । आद्यं यथा ‘कपालपुरोडाशादि’ मीमांसकानाम् । द्वितीयं यथा ‘कश्यपतनयाधृतिहेतुरयं त्रिणयनतनयासनसमाननामधेययुक्तः’ इत्यादि । तृतीयं यथा ‘श्वेतो धावति’ इत्यादि । तत्राद्यं परस्परसिद्धान्ताभिज्ञताशौण्डीर्याभिमानेन उपादीयेतापि । उत्तरं तु नोपादेयमेव । ज्ञापनार्थत्वात् शब्दस्य । अनवधानादिशङ्कानिरासाय पुनर्वचनं प्राश्निकैरपेक्ष्यते । त्रिरिति नियमश्च । ततः परमज्ञानस्य वचनदोषहेतुत्वनिश्चयात् । न हि प्राश्निकापेक्षयोच्यमाने तेषामनवधानं सम्भवति । नापि परिषदविदुषी, येनादोषमपि न जानीयादिति ॥\nअनन्वितार्थवाचकपदादिप्रयोगोऽपार्थकम् । तत् त्रिविधम् । सर्वथाऽप्यसम्भवदन्वयं यथा ‘दश दाडिमानि षडपूूपाः कुण्डमजाजिनम्’ इत्यादि । व्यवहितान्वयं यथा ‘ओदनं स्नातो ग्रामं सरसि गत्वाश्नाति’ इत्यादि । सम्भवत्सर्वान्वयपक्षनिरासे सत्यसम्भवदन्वयं चेति । विवक्षितक्रमविपर्यासोऽप्राप्तकालम् । अयं वादजल्पयोः क्रमः । सभ्यादिसङ्ग्रहपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते वादिना प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्यः । प्रतिवादिनापि वादिसाधनमनूद्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्य इति । तत्र यदि वादी साधनमुक्त्वा कथानियमबन्धनमिच्छति तदारम्भविपर्यासः । यदाऽऽभासोद्धारानन्तरं साधनं प्रयुङ्क्ते तदा वादांशविपर्यासः । प्रतिवादी च यदा स्वपक्षे साधनमभिधाय परपक्षं दूषयति तदा वादविपर्यासः। धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् इत्याद्यवयवविपर्यासः । अग्निमान् पर्वत इत्याद्यवयवांशविपर्यासः । वितण्डायां तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनाभावात् वादविपर्यासाभाव इति ॥\nअवश्योपादेयानामन्यतमानुपादानं न्यूनम् । तदपि बहुप्रकारम् । कथासमयबन्धमकृत्वा साधनप्रयोगे आरम्भन्यूनम् साधनमप्रयुज्याभासोद्धारे, तत्प्रयुज्य चाभासानुद्धारे अनुकूलतर्कानुुक्तौ च वादांशन्यूनम् । प्रतिवदिनापि वादिसाधनमदूषयित्वा स्वपक्षसाधनाभिधाने, दूषयित्वा वा तदनभिधाने वादन्यूनम् । प्रतिज्ञाद्यवयवाभावे अवयवन्यूनम् । धर्म्याद्यनुक्तावयवयवांशन्यूनम् । इदं च तत्तत्सिद्धान्तरीत्योद्भावनीयम् । न चैवमपसिद्धान्त एव । न हि सिद्धान्तविरुद्धकरणमपसिद्धान्तः । तथात्वे सर्वनिग्रहस्थानानामपि तथात्वप्राप्तेः । किं नाम ? तदभ्युपगमो वस्तुतत्वानुसारेण वेति ॥\nअन्वितोपयुक्तापुनरुक्तकृतकार्यप्रयोगोऽधिकम् । तत् पञ्चविधम् । हेतूदाहरणोपनयदूषणानुवादाधिकभेदेन । प्रतिज्ञानिगमनयोराधिक्यं एकार्थत्वे पुनरुक्तं, अन्यार्थत्वे प्रकृतसङ्गतावर्थान्तरं, असङ्गतावपार्थकम् । द्विविधं चैतत् विशेषतः सामान्यतश्च । तत्राऽद्यं यथा ‘धूमवत्वादालोकविशेषवत्वादिति, धूमवत्वादेः’ इति वा । द्वितीयं यथा ‘यथा महानसः पाकस्थानमिति, यथा महानसाऽदिः’ इति वा । तृतीयं यथा ‘तथा चायं धूमवानालोकविशेषवानिति, धूमाऽदिमान्’ इति वा । चतुर्थं यथा ‘अनैकान्तिको हेतुः कालातीतश्चेति, अनैकान्तिकाऽदिः’ इति वा । पञ्चमं तु अदूष्यभागस्य स्ववचनेनानुवादः आदिशब्देन वेति ॥।\nप्रतीतार्थस्य पुनः स्ववचनेन प्रयोजनेन विना अभिधानं पुनरुक्तम् । तत् त्रिविधम् । अर्थतः शब्दतोऽप्याक्षेपतश्चेति । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् गिरिर्वह्निमान्’ इति । द्वितीयं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति । तृतीयं यथा ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति इत्युक्त्वा ‘बहिरस्ति’ इति ॥\nवादिनोक्तस्य प्राश्निकैर्विज्ञातार्थस्य वादिना परिषदा वा पुनरनूद्य दत्तस्योच्चारणयोग्यस्य स्वाज्ञानमनाविष्कुर्वता कथामविच्छिन्दता यत् अप्रत्युच्चारणम् तत् अननुभाषणम् । तत् पञ्चविधम् । यत्तदित्याद्यनुवादः दुष्यैकदेशानुवादः अन्यथानुवादः केवलं दूषणोक्तिः तूष्णीम्भावे दूषणाद्यप्रतीतेः, दूषणमात्राभिधाने निराश्रयदूषणस्यादूषकत्वात्, अन्यथानुवादे व्यधिकरणत्वात्, दूष्यैकदेशानुवादे विशिष्टादूषणात्, यत्तदित्याद्यनुवादे अननुवादाविशेषात् । न च दूषणस्वरूपयोग्यतया दूष्यविशेषसिद्धिः । सन्दिग्धत्वादिना सर्वस्यापि दूष्यत्वात् । योग्यमेवायं ब्रवीतीति नियमाभावात् । न च पञ्चममज्ञानमप्रतिभा वा । ज्ञातार्थस्य स्फुरदुत्तरस्यापि सभाक्षोभादिना तूष्णम्भावोपपत्तेः । तथा चाननुभाषणमेव निर्णीतं, नान्यदिति ॥\nवादिना त्रिरभिहितस्यापि परिषदा विज्ञातार्थस्य वाक्यस्यार्थाप्रतिपत्तिरज्ञानम् । तच्चाज्ञानम् आविष्करणेन ज्ञातव्यम् । यथा ‘नास्यार्थो ज्ञायते मया’ इति । अनाविष्करणे तु अननुभाषणमेव ॥\nवादिनोक्तस्य प्रत्युत्तराप्रतिपत्तिरप्रतिभा । सा चानूद्य तूष्णीम्भाव एव । अननुवादेत्वननुभाषणत्वात् । श्लोकपाठादावर्थान्तरप्रसङ्गात् इति ।\nकेनचित् व्याजेन कथाविच्छेदो विक्षेपः । यथा ‘अद्य मे महत् प्रयोजनमस्ति । तस्मिन्नवसिते वक्ष्यामि’ इति ॥\nअनिष्टभ्रमेणेष्टापादनं मतानुज्ञा । यथा केनचित् स्वस्य चोरत्वमभ्युपेत्य ‘त्वं चोरः पुरुषत्वात्’ इत्युक्ते ‘तर्हि तवापि चोरत्वप्रसङ्ग’ इति । न ह्यनेनात्मनश्चोरत्वं परिहृतम् । नाप्ययं प्रसङ्गः इष्टापत्तिरूपत्वात् इति ॥।\nअवश्योद्भाव्यतया प्राप्तनिग्रहस्थानानामनुद्भावनं पर्यनुयोज्योपेक्षणम् । न चेदमप्रतिभैव । स्फुरतोऽपि दोषस्याल्पत्वादिनोपेक्षणसम्भवात् । प्राश्निकैरुद्भाव्यमेतत् । वादिनैव वा ‘अस्य व्यामोहायेदं मयोक्तं नानेन ज्ञातम्’ इति ॥।\nअतन्निग्रहप्राप्तौ तन्निग्रहोद्भावनं निरनुयोज्यानुयोगः । तच्चतुर्विधम् । छलं जातिः हान्याद्याभासोऽप्राप्तकाले ग्रहणं चेति । छलजाती वक्ष्येते । हान्याद्याभासो द्विविधः । सर्वथा हान्याध्यभावप्राप्तौ तदुद्भावनम् अन्यप्राप्तावन्योद्भावनञ्चेति । तत्राद्योऽपि द्विविधः । सादृश्यादिना भ्रान्त्या, व्यामोहनाय वेति । द्वितीयो भ्रान्त्यैव । भ्रान्त्या यथा, अनेकविकल्पस्फुरणेन विकल्पयतोऽनिष्टविकल्पत्यागे प्रतिज्ञाहानिरित्यादि । द्वितीयो यथा । प्रतिज्ञाहान्यादौ प्रतिज्ञान्तरादि इत्यादि । तत्तदुद्भावनावसरमप्राप्य अतिक्रम्य वा तन्निग्रहस्थानोद्भावनं अप्राप्तकाले ग्रहणम् । अनुक्तोच्यमानोक्तग्राह्यभेदात् त्रिविधो ह्युद्भावनकालः । तत्रोच्यमानग्राह्यमुत्तरं उद्भावयतो निग्रहस्थानम् इत्यादि ॥।\nयत्किञ्चिच्छास्त्रसिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरुद्धाङ्गीकारेऽपसिद्धान्तः । प्रामाणिकतया अङ्कीकृतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः । सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसिद्धान्तभेदात् । सर्वशास्त्राविरुद्धोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः । यथा प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । स्वशास्त्रमात्रसिद्धोऽर्थः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः । यथा नैयायिकानामीश्वरप्रामाण्यम् । एकस्य सिद्धावानुपङ्गिको योऽर्थः सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा ईश्वरस्य र्स्वकर्तृत्वसिद्धौ सार्वज्ञ्यम् । शास्त्रान्तरे परीक्षितः स्वशास्त्रे चानिषिद्धोऽभ्युपगमसिद्धान्तः । यथा मनस इन्द्रियत्वम् । अपसिद्धान्तोऽप्यतश्चतुर्विधः । यथा इदानीमिव सर्वत्र दृष्टान्नाधिकमिष्यते इति प्रतितन्त्रसिद्धान्तमभ्युपगतवतो मीमांसकस्य सर्गप्रलयाभ्युपगम इत्यादि । न चायं प्रमाणविरोधः । उभयोस्तदाचार्याेक्तौ प्रामाण्यासम्मतेः । तत्रैव प्रमाणविरोधप्रसरात् । मूलप्रमाणे च सन्देहादिति ॥ २१ ॥।\nहेतोरुक्तरूपेषु पक्षव्यापकत्वादिषु कैश्चिद्युक्ताः केनचिद् रहिता हेत्वाभासाः । ते चासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितकालात्ययापदिष्ट प्रकरणसमसत्प्रतिपक्षाः । तत्र व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वप्रतीतिः सिद्धिः । तद्रहितोऽसिद्धः । स चतुर्विधः । व्याप्तपक्षतद्धर्मत्वैतत्प्रतीतिराहित्यभेदात् । तत्र व्याप्यत्वासिद्धो द्वेधा । स्वरूपतो वैयर्थ्येन चेति । तत्राद्यो यथा ‘यत् सत् तत् क्षणिकं यथा घटः’ इति । व्यर्थविशेषणासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यः सामान्यवत्वे सति कृतकत्वात्, इति । व्यर्थविशेष्यासिद्धो यथा ‘कृतकत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । आश्रयासिद्धो द्वेधा । धर्मिणः साध्यत्वस्य चाभावात् ॥\nतत्राद्यो यथा ‘प्रधानं नित्यं अकार्यत्वात्’ इति । आश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘प्रधानपुरुषौ नित्यौ अकार्यत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘परमाणवो नित्याः अकार्यत्वात्’ इति । पक्षधर्मत्वासिद्धः पञ्चविधः । तत्र स्वरूपासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यश्चाक्षुषत्वात्’ इति । व्यधिकरणासिद्धो यथा ‘घटस्य कृतकत्वात्’ इति । विशेषणासिद्धो यथा ‘चाक्षुषत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । विशेष्यासिद्धो यथा ‘सामान्यवत्वे सति चाक्षुषत्वात्’ इति । भागासिद्धो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति ।\nसन्दिग्धव्याप्यत्वासिद्धो यथा ‘स श्यामो मित्रातनयत्वात्’ । सोपाधिकत्वेन व्याप्यत्वसन्देहात् । सन्दिग्धाश्रयासिद्धो यथा । ‘भविष्यद्देवदत्तपुत्रो ब्राह्मणः ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धाश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘देवदत्तः तद्भविष्यत्पुत्रश्च वेदयोग्यौ ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धासिद्धो यथा, धूमबाष्पाविवेके ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेषणासिद्धो यथा ‘विमतो रागादियुक्तः सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वे सति पुरुषत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेष्यासिद्धो यथा ‘पुरुषत्वे सति सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वात्’ इति । सन्दिग्धभागासिद्धो यथा । एकत्र धूमनिश्चये अन्यत्रानिश्चये ‘पर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’ इति । विशेषणवैयर्थ्यादौ सन्देहो न सम्भवति ॥।\nपक्षविपक्षयोरेव वर्तमानो हेतुर्विरुद्धः । स द्विविधः। विद्यमानसपक्षोऽविद्यमानसपक्षश्चेति । प्रत्येकं चतुर्विधः । तत्र सति पक्षे पक्षविपक्षव्यापको यथा ‘नित्यः शब्दः कार्यत्वात्’ इति । पक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सामान्यवत्वे सति अस्मदादिबाह्यैकेन्द्रियग्राह्यत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिविपक्षव्यापको यथा ‘पृथिवी नित्या कृतकत्वात्’ इति ॥\nअसति सपक्षे प्रथमो यथा ‘शब्द आकाशविशेषगुणः प्रमेयत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । तृतीयो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । चतुर्थो यथा ‘अपदात्मकत्वात्’ इति ॥\nपक्षत्रयवृत्तिरनैकान्तिकः । सोऽपि बहुविधः । तत्र पक्षत्रयव्यापको यथा । शब्दोऽनित्यः प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षव्यापकः सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘अयं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘नायं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षत्रयैकदेशवृत्तिर्यथा ‘पृथिवी नित्या प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षैकदेशवृत्तिर्विपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः सपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी न द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति। सपक्षविपक्षव्यापकः पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा आकाशात्ममनांसि द्रव्याणि क्षणिकविशेषगुणरहितत्वात्’ इति ॥\nसाध्यासाधकः पक्ष एव वर्तमानो हेतुरनध्यवसितः । स चानेकप्रकारः । तत्राविद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘कार्यत्वात्’ इति । विद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘शब्दो नित्यः आकाशविशेषगुणत्वात्’ इति । तदेकदेशवृत्तिर्यथा ‘सर्वं द्रव्यमनित्यम् क्रियावत्वात्’ इति । विद्यमानविपक्षोऽविद्यमानसपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वं कार्यमनित्यं उत्पत्तिमत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सावयवत्वात् इति । एते चासिद्ध्यादयः उभयान्यतरसम्मत्या द्वेधा भवन्ति । विरुद्धादित्रयस्यासिद्धसाङ्कर्येऽपि उभयव्यवहारविषयत्वादविरोधः ॥\nप्रमाणबाधितविषयः कालात्ययापदिष्टः । सोऽप्यनेकविधः। तत्र प्रत्यक्षबाधितो यथा ‘अग्निरनुष्णः पदार्थत्वात्’ इति । प्रत्यक्षबाधितैकदेशो यथा ‘जलानलौशी पदार्थत्वात्’ इति । अनुमानबाधितो यथा ‘देवदत्तश्चक्षूरहितः पुरुषत्वात्’ इति । अनुमानबाधितैकदेशो यथा ‘देवदत्तश्चक्षुर्विषाणरहितः पुरुषत्वात्’ इति । आगमबाधितो यथा ‘सुरा ब्राह्मणेन पेया द्रवद्रव्यत्वात् इति । आगमबाधितैकदेशो यथा ‘सुरासोमौ ब्राह्मणेन पेयौ द्रवद्रव्यत्वात्’ इति ॥\nस्वपरपक्षसिद्धावपि त्रिरूपो हेतुः प्रकरणसमः । यथा ‘विमतं मिथ्या दृश्यत्वात्’ इति । सत्यत्वेऽप्यस्य प्रयोक्तुं शक्यत्वात् । उभयत्र त्रैरूप्यञ्च वादिप्रतिवादिनोराभिमानिकमिति नासम्भवः ।\nसमबलतयाभिमतप्रमाणविरुद्धः सत्प्रतिपक्षः । तत्र प्रत्यक्षविरुद्धो यथा ‘विमतः शङ्खः शुक्लः शङ्खत्वात्’ इत्यत्र प्रत्यक्षात् ‘पीतः किं न स्यात्’ इति । अनुमानविरुद्धो यथा ‘आकाशं नित्यं अमूर्तद्रव्यत्वात्’ इत्यत्र ‘आकाशमनित्यंअस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यगुणाश्रयत्वात्’ इत्यनुमानात् अनित्यमपि किं न स्यात् इति । आगमविरुद्वो यथा ‘प्रधानं न स्वतन्त्रं जडत्वात्’ इत्यत्र कापिलागमात् ‘स्वतन्त्रमपि किं न स्यात्’ इति ।\nउदाहरणरूपेषु कैश्चिद्युक्ताः कैश्चिद्रहिता उदाहरणाभासाः । ते चानेकप्रकाराः । तत्र साधर्म्योदाहरणे तावत् साध्यवैकल्यम् यथा, मनोऽनित्यं मूर्तत्वात् ‘यन्मूर्तं तदनित्यं यथा परमाणुः’ इति । साधनवैकल्यम् यथा ‘यथा कर्म’ इति । उभयवैकल्यम् यथा ‘यथाकाशम्’ इति । आश्रयहीनम् यथा ‘यथा शशविषाणम्’ इति । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् घटवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यदनित्यं तन्मूर्तम् यथा घटः’ इति । वैधर्म्योदाहरणे साध्याव्यावृत्तिर्यथा ‘यदनित्यं न भवति तत् मूर्तं न भवति यथा कर्म इति । साधनाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा परमाणुः’ इति । उभयाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा घटः’ इति । आश्रयहीनत्वम् पूर्ववत् । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् आकाशवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यन्मूर्तं न भवति तदनित्यं न भवति यथाकाशम्’ इति ।\nसन्दिग्धसाध्यो यथा ‘अयं महाराज्यं करिष्यति सोमवंशोद्भूतत्वात् राजपुत्रान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धसाधनो यथा ‘अयं न सर्वज्ञः रागादिमत्वात् रथ्यापुरुषवत्’ इति । सन्दिग्धोभयो यथा ‘देवदत्तपुत्रः स्वर्गं गमिष्यति धर्मवत्वात् देवतान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धाश्रयो यथा ‘यथा भविष्यद्देवदत्तपुत्रः’ इति । एतेष्वेव प्रयोगेषु सन्दिग्धसाध्याव्यवृत्तो यथा ‘यथा अन्यो राजपुत्रः’ इति । सन्दिग्धसाधनाव्यावृत्तो यथा ‘यथा समस्तशास्त्राभिज्ञः’ इति । सन्दिग्धोभयाव्यावृत्तो यथा ‘यथा रथ्यापुरुपः’ इति । सन्दिग्धाश्रयः पूर्ववदिति ॥\nतर्कपराहतिश्च प्रागुदिताऽत्माश्रयाऽदिप्रसङ्गदुष्टत्वमिति ।\nअनुकूलतर्काभावे तु उपाधिव्यभिचारशङ्क्या व्याप्यत्वासिद्धिर्भवति। यद्यप्युदाहरणाभासादयो हेत्वाभासेष्वन्तर्भवन्ति । तथापि तद्रूपेणोद्भाव्यत्वात् पृथगुपादानमिति । एतेषु यानि निग्रहस्थानानि विरोधादिष्वेवान्तर्भूतानि । वक्तृदोषाणां प्रतिज्ञाहान्यादीनां कथमुपपत्तिवचनदोषेषु विरोधादिष्वन्तर्भावः ? इत्यत उक्तम् ॥ संवादानुक्तियुता इति ॥ शक्तिवैकल्यात् विप्रतिपन्नप्रमेयाङ्गीकारः संवादः । वक्तव्ये प्राप्ते शक्तिवैकल्यादेव तूष्णीम्भावोऽनुक्तिरिति ।\nयदुक्तम् त्रीण्येव प्रमाणानीति तदयुक्तम् । साक्षिणः पृथक् प्रमाणत्वात् इत्यतस्तस्य प्रत्यक्षान्तर्भावज्ञापनार्थम् सिंहावलोकनन्यायेन तद्विभागमाह\nप्रत्यक्षं सप्तविधम्\nसाप्तविध्यं कथम् ? इत्यत आह\nसाक्षिषडिन्द्रियभेदेन\nद्विविधमिन्द्रियम् । प्रमातृस्वरूपं तदतिरिक्तञ्चेति । तत्र स्वरूपेन्द्रियं साक्षीत्युच्यते । स च ज्ञानरूपः । तस्य आत्मस्वरूपत्वम् तद्धर्माश्च सुखादयो बहिश्चाकाशकालादयोऽपि विषयाः । सुखादीनां भिन्नेन्द्रियविषयत्वे कदाचिदपरोक्षभ्रमविषयतापातात् । अनन्यथात्वनियमः साक्षिण एव हि धर्मः न त्वन्यस्य । न च कालादेरसाक्षिविषयत्वम् । रूपाद्यभावेन चक्षुराद्यविषयत्वात् । मनसो बहिरस्वातन्त्र्याभ्युपगमात् । अननुसंहितव्याप्तीनामपि प्रतीतेः नानुमानात् तज्ज्ञानम् । जातिबधिराणामप्युपलम्भेन नागमविषयतापीति ॥\nअस्वरूपं च षड्विधम् । श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणमनोभेदात् । एवमिन्द्रियाणां भेदेन तत्सन्निकर्षाऽत्मकं प्रत्यक्षमपि सप्तविधमिति ॥ इदं च न सार्वत्रिकमिति । चतुर्विधं हि प्रत्यक्षम् ईशलक्ष्मीयोग्ययोगिप्रत्यक्षभेदेन । तत्रेशलक्ष्मीप्रत्यक्षं सर्वदा स्वरूपेन्द्रियसन्निकर्षात्मकमेव। स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः । योगिनामयोगिनां च आ मुक्तेः उभयविधेन्द्रियसन्निकर्षात्मकम् । तत्र योगिनां देशकालवस्तुस्वभावव्यवहितार्थमपि विषयी करोति । अयोगिनां तु देशकालाद्यव्यवहितमेवेति । द्विविधं चैतत् । अतीतवर्तमानतावच्छिन्नविषयम् । यथा ‘सोऽयं घटः’ इति प्रत्यभिज्ञाहेतुसंस्कारसहकृतम् । वर्तमानविषयं च । यथा ‘अयं घटः’ इत्यादिज्ञानहेतुरिति ॥\nनिर्विकल्पकसविकल्पकभेदात् द्विविधं प्रत्यक्षमित्येके । यत् द्रव्यगुणादिस्वरूपमात्रावगाहि न तु तद्विशेषणविशेष्यभावविषयं तत् निर्विकल्पकम् । यथा ‘यत्किञ्चिदेतत्’ इति, ज्ञानसाधनम्, प्राथमिकम् । सञ्ज्ञागुणकर्मजाति विशिष्टार्थविषयं सविकल्पकम् । यथा ‘शुक्लो ब्राह्मणो गच्छति’ इति । द्वितीयम् इति ।निर्विकल्पकमेव प्रत्यक्षमित्यपरे । तदेतदयुक्तम् । गुणाऽदेर्द्रव्येणात्यन्तभेदस्य निर्विशेषाभेदस्य चाभावेन विशिष्टबोधस्यैव साक्षिसिद्धत्वात् ॥\nएतेनैतदपि निरस्तम् । यदाहुः ‘सन्निकर्षः षोढा भिद्यते। संयोगः संयुक्तसमवायः संयुक्तसमवेतसमवायः समवायः समवेतसमवायः विशेषणविशेष्यभावश्चेति । तत्र चक्षुःस्पर्शनाभ्यां संयोगेन घटादिज्ञानं,मनसा आत्मज्ञानम् । तैः संयुक्तसमवायेन स्वविषयद्रव्यसमवेतगुणकर्मसामान्यज्ञानं, घ्राणेन गन्धज्ञानं, रसनेन रसज्ञानम् । तैरेव संयुक्तसमवेतसमवायेन गुणकर्मसामवेतसामान्यज्ञानम् । श्रोत्रेण समवायेन शब्दज्ञानम् । तेनैव समवेतसमवायेन शब्समवेतसामान्यज्ञानम् । तत्तदिन्द्रियैर्विशेषणविशेष्य भावेन स्वस्वविषयवृत्तिसमवायाभावज्ञानम् । सोप्युक्तपञ्चविधसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशेष्यभावत्वेन पञ्चविधः । यथा ‘घटे रूपसमवायः’ इत्यादि । यथा च ‘इह भूतले घटाभावः’ इत्यादि । न हि द्रव्यात् गुणाऽदिकमन्यत् । येन तत्सम्बन्धः समवायः सम्भवति ॥\nननु स्मृतिः केवलप्रमाणम् न वा । आद्ये केवलस्य उत्पत्ति मतोऽनुप्रमाणजन्यत्वं वाच्यम् । अतःतद्धेतोः संस्कारस्य प्रामाण्यमङ्गीकार्यम् । ततश्च नोक्तविभागो युक्तः । नहि संस्कारो यादृच्छिकसंवादी । येनाप्रमाणमपि केवलस्य हेतुः स्यात् । चक्षुरादिसाम्यात् । नचासावुक्तेऽन्तर्भवति । अनिन्द्रियसन्निकर्षरूपत्वात् । अज्ञातस्यैव करणत्वात् नानुमानागमयोः । द्वितीये केवलप्रमाणलक्षणस्यातिव्याप्तिः । स्मृतेरपि यथार्थज्ञानत्वात् इत्यत आह\n.मानसप्रत्यक्षजा स्मृतिः\nभवत्येव स्मृतिः केवलप्रमाणम् । न तैवं संस्कारस्य पृथक्प्रामाण्याभ्युपगमप्रसङ्गः । स्मृतेर्मानसप्रत्यक्षत्वाभ्युपगमात् । द्विविधं हि ज्ञानं मनो जनयति । तत्तदिन्द्रियाधिष्ठातृत्वेन तत्तदिन्द्रियविषयम्, स्वातन्त्र्येण स्मरणं चेति । संस्कारस्तु प्रत्यासत्तिमात्रम् । न तावता प्रत्यक्षजन्यत्वाभावः प्रत्यभिज्ञावदेवेति । न च वाच्यमतीतेन मनसः सन्निकर्षायोगेन अप्रत्यक्षजन्यत्वं स्मृतेरिति । अतीतादिविषययोगिप्रमायामपि तथात्वापातादिति ॥\nस्मृतिः केवलप्रमाणमेव न भवति । गृहितमात्रग्राहित्वात् । अनुवादवत् । अतः कथं प्रत्यक्षप्रमाणजन्यत्वम्? इत्यत आह\nस्मृत्यनुवादयोर्नाप्रामाण्यम्\nन हि गृहीतग्राहित्वेन स्मृतेरनुवादस्य चाप्रामाण्यं वाच्यम् । तथा सति प्रत्यक्षाऽदिसिद्धार्थानुवादकस्य ‘अग्निर्हिमस्य भेषजम्’ इत्यादरप्रामाण्यप्रसङ्गात् । अतो गृहीतग्राहित्वेऽपि स्मृतेरनुवादवत् प्रामाण्यमेव यथार्थत्वात् इति ॥\nअन्यस्त्वाह । न स्मृतिः प्रमाणम् अयथार्थत्वात् । न हि यदा याहशोऽर्थः स्मर्यते तदाऽसौ तादृशः पूर्वावस्थाया निवृत्तत्वात् । अतो नानुप्रमाणजन्यत्वमिति । तत्राऽह\nयथार्थत्वानुभवात्\nस्मृतेर्नाप्रामाण्यमित्यनुवर्तते । न हि यदा यादृशोऽर्थो विषयीक्रियते तदा तस्य तादृशत्वे प्रमाणस्य याथार्थ्यम् । तथा सति अतीतादिविषयानुमानादेः अयथार्थत्वाऽपातात् । किं नाम ? यद्देशकालतया योऽर्थो यादृशो विषयी क्रियते तस्य तद्देशकालयोस्तादृशत्वे । तादृशं च याथार्थ्यं स्मृतेः साक्षिसिद्धम् । ‘तत्र तदा असौ तादृशः’ इति स्मृतिरर्थं विषयीकरोति । न हि ‘तत्र तदासौ न तादृशः’ इति ॥\nन च वाच्यम् न निवृत्तपूर्वावस्थतया स्मृतिरर्थं विषयीकर्तुमीष्टे । तथाननुभवात् । अननुभूतविषयत्वे अतिप्रसङ्गात् इति । अननुभूतैतावन्मात्रविषयत्वस्य साक्षिसिद्धत्वेनातिप्रसङ्गायोगात् । तदिदमुक्तम् । यथार्थत्वानुभवादिति ॥\nकिञ्च स्मृतिप्रामाण्याङ्गीकारे अनिष्टाभावात् तदङ्गीकारो युक्त इत्याह–\nअहानेश्च\nहानिपदमनिष्टमात्रोपलक्षणम् । एतेनैव ‘तर्को न प्रमाणम् किं तु प्रमाणानामनुग्राहकः । प्रमाणविषयविपर्ययशङ्काव्यवच्छेदस्तदनुग्रहः’ इत्येतदपास्तम् । तस्याप्यनुमानवत् यथार्थत्वानुभवात् अहानेश्च इति ॥\nविरोधाऽदिषु सर्वनिग्रहस्थानानामन्तर्भाव इत्युक्तम् । तत्प्रदर्शनार्थं विरोधे तावद्विषयं विवेचयति ॥\nविरोधो मानस्ववाक्याभ्याम्\nद्विविध इति शेषः । विरोधो द्विविधः । समयबन्धाऽदिरूपवत्यां कथायां सर्वरूपसाधारणोऽसाधारणश्चेति । तत्र असाधारणः प्रमाणेन स्ववाक्येन चेति द्विविधो भवति ॥\nस्ववाक्यविरोधं विभज्य दर्शयति ॥\nस्ववाक्यविरोधोऽपसिद्धान्तजातिरूपेण\nद्विविध इति शेषः । पूर्वाचार्यवचनस्यापि स्वाभ्युपगतत्वेन स्ववाक्यत्वात् अपसिद्धान्तः स्ववाक्यविरोधो भवति ॥\nस्वव्याहतिर्जातिः । एकवाक्यविषयत्वान्नापसिद्धान्तेऽतिप्रसङ्गः ।\nत्रिविधा स्वव्याहतिः एकवाक्यगतपदादेरन्योन्यप्रतिस्पर्धित्वं स्वक्रियाविरोधः तद्वाक्यन्यायेन तद्वाक्यविरोधश्चेति । तत्र समयबन्धादौ प्रमाणविरोधादिप्रपञ्चः स्वयमेव उदाहर्तव्य इति सूचयन् आद्यजातिं तावत् प्रतिज्ञायामुदाहरति\nजातिः ‘न मेये मानापेक्षा ’\nइत्यादिका मानसापेक्षं हि ज्ञेयं मेयमुच्यते । तस्य प्रमाणनिरपेक्षत्वप्रतिज्ञा ‘मे माता वन्ध्या’ इतिवत् व्याहता भवति । आदिपदेन समयबन्धादावपि इयमेवोदाहर्तव्येति सूचयति ॥\nद्वितीयजातेरपीदमेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥ मेयं मानानपेक्षम् इति वदति । तज्ज्ञापनाय प्रमाणं चाभिधत्ते । अतो ‘मूकोऽहम्’ इतिवत् स्वक्रियाविरोध इति ।\nतृतीयाया अप्येतदेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥\nतत्कथम् इत्यत आह\nमेये मानापेक्षाऽस्तीति च\nतेनैव न्यायेन सिद्धत्वात् । यथा ‘मेये मानापेक्षा नास्ति’ इत्येतन्मेयं मानापेक्षम् । अन्यथा तत्प्रतिज्ञावैयर्थ्यात् । तन्न्यायेनैव ‘विप्रतिपन्नमेयेऽपि मानापेक्षाऽस्ति’ इत्यस्य अर्थस्य साधयितुं शक्यत्वात् इयमेव प्रतिज्ञा तृतीयजात्युदाहरणं भवति ॥\nन केवलमियं जातिः स्ववाक्यविरोधान्तर्गता । किं तु ? मानविरोधेऽपि इत्याह–\nमानविरोधश्च\n‘विप्रतिपन्नं प्रमेयं प्रमाणसापेक्षं प्रमेयत्वात् मेये मानापेक्षा नास्तीतित्येतन्मेयवत्’ इत्यनुमानसम्भवात् प्रमाणविरोधे चेयं जातिरन्तर्भवतीति पूर्वावृत्त्या योजनीयम् ।\nतदनेन प्रतिज्ञासन्न्यासविरोधापसिद्धान्तानां निरनुयोज्यानुयोगे च जातेः विरोध एवान्तर्भावः सूचितो भवति । सन्न्यासस्य मानसिद्धापलापरूपत्वात् । प्रतिज्ञाविरोधस्य एकवाक्यगतपदाऽदिविरोधरूपत्वात् । अपसिद्धान्तस्य साक्षात् ग्रहणात् । परोक्तजातेः प्रतिषेधाऽत्मकतृतीयजातिरूपत्वादिति ॥\nतत्रानभ्युपेतयुक्ताङ्केन प्रतिप्रमाणेन प्रतिपक्षतया प्रत्यवस्थानं प्रतिधर्मसमः । स च साधर्म्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमः वैधर्म्येण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमः । यथा ‘यदि महानससाधर्म्यात् हृदवैधर्म्यात् द्वाभ्यां वा धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि हृदसाधर्म्यात् द्रव्यत्वात् निरग्नि मान् किं न स्यात् अविशेषात्’ इति । तथा ‘महानसवैधर्म्यात् पर्वतत्वात् अनग्निकः किं न स्यात्’ । एवं द्वाभ्यां प्रत्यक्षाऽदिना च प्रत्यवस्थानोदाहरणं द्रष्टव्यम् ॥\nअत्र युक्ताङ्गहीनप्रतिप्रमाणोपलम्भो द्वारम् । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । व्याप्त्याद्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षायां ‘नेदं साधकं सत्प्रतिपक्षत्वात्’ इति जात्युत्तरमपि न दूषणं पदार्थत्वात् इति व्याघात इति ॥\nवादिसाधनसामर्थ्येन साध्यस्यैव व्याप्तिं विना कस्यचिदनिष्टधर्मस्य दृष्टान्तात् पक्षे उत्कर्षः उत्कर्षसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् महानसवत् अग्निमान् पर्वतः तर्हि तत एव स्थाल्यादिमानपि स्यात् । अविशेषादिति । अत्र साधनसाहचर्यदर्शनमुत्थानबीजम् । विशेषविरुद्धत्वमारोप्यम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं विशेषविरुद्धत्वात् नित्यत्वसाधककृतकत्वत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि नित्यत्वसाधककृतकत्ववत् तत एव हेतोर्धूमवत्वस्यामूर्तवृत्तित्वं च स्यादित्युत्कर्शसाम्यात् व्याघात इति॥\nदृष्टान्ते साध्यस्य साधनस्य वा व्यापकं किञ्ञ्चित् धर्ममारोप्य व्यापकनिवृत्त्य व्याप्यनिवृत्तिरिति पक्षे तन्निवृत्त्या साध्यसाधनयोरन्यतारपकर्षः अपकर्षसमः । यथा महानसे अग्निमत्वस्य धूमवत्वस्य वा व्यापकं स्थाल्यादिमत्वं पर्वतात् व्यावर्तमानं तत् व्यावर्तयति । व्यापकाभिमतव्यावृत्त्युपलम्भः अत्रोऽत्थानबीजम् । साध्यापकर्षे बाधितविषयत्वं सत्प्रतिपक्षत्वं वा आरोप्यम् । साधनापकर्षे असिद्धत्वम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गत्यागः । तदनभ्युपगमे ‘नेदं साधकं बाधितत्वात् अनुष्णत्वसाधकपदार्थत्ववत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि पदार्थत्वे असाधकत्वं बाधितविषयत्वं वा सर्वधर्मिनिष्ठत्वेन व्याप्तं दृष्टमिति धूमवत्वात् व्यावर्तमानमसाधकत्वाऽद्यपि व्यावर्तयतीत्यपकर्षसाम्यात् व्याहतिरिति ॥\nपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः सपक्षस्यापि साध्यत्वाऽपादनं वर्ण्यसमः । असिद्धार्थत्वं आरब्धसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वं व्याप्तिग्राहकप्रमाणशून्यत्वं संशयसमानविषयत्वं स्वरूपविशेषश्चेत्येतानि हेतोः पक्षमाणविवक्षितरूपाणि । तत्रासिद्धार्थं पर्वत इव महानसे धूमवत्वं वर्तते न वा । आद्ये महानसोऽपि साध्यवत्वेन साध्यः स्यात् । अन्यथा साध्यवैकल्यापातात् । द्वितीये तद्रूपहेतुमत्या साध्यः स्यात् । अन्यथा साधनवैकल्यापातात् । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् ।\nअत्र पक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वादर्शनमुत्थानहेतुः साध्यसाधनवैकल्ये आरोप्ये ॥ ‘नायं दृष्टान्तः साधनाङ्गं साध्याऽदिविकलत्वात् सम्मतवत्’ इत्यत्रापि यथोक्तसाध्यत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । पक्षवृत्तिहेतुरूपाणां सपक्षवर्तिन्यपि सञ्चरणात् अविषयवृत्तित्वञ्च । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं वा सपक्षवृत्तिहेतोरयुक्तानामेवा सिद्धार्थत्वाऽदीनामङ्गीकारादिति ॥\nसपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः पक्षस्य असाध्यत्वापादनमवर्ण्यसमः । सिद्धार्थत्वं प्रवृत्तसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वाभावः व्याप्तिग्राहकप्रमाणवत्वं निश्चयसमानविषयत्वं रूपभेदश्च इत्येतानि हेतोः सपक्षमात्रविवक्षितरूपाणि। तत्र सिद्धार्थं धूमवत्त्वं महानस इव पर्वते वर्तते न वा ? आद्ये साध्यस्य सिद्धत्वात् पक्षे न साध्यः स्यात् । द्वितीयेऽपि हेतोः स्वरूपासिद्धत्वेन असाध्यः स्यात् इति । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् । अत्र सपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्तया पक्षस्य असिद्धिः कारणम् । स्वरूपासिद्ध्यादि आरोप्यम् । वर्ण्यसमवदेव दुष्टत्वमूलमिति ॥\nसाधनस्य धर्मान्तरेण धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण वा व्यभिचारेण साधनस्यापि साध्यव्यभिचाराऽपादनं विकल्पसमः । तत्र साधनस्य धर्मान्तरेण व्यभिचारस्त्रिविधः । पक्षदृष्टान्तयोः पक्षयोर्दृष्टान्तयोश्चेति । तत्र आद्यो यथा ‘महानसे धूमवत्वमपर्वतत्वेन सह वर्तमानमपि यथा पक्षे तेन सह न वर्तते, तथा अत्र अग्निमत्वेन सह वर्तमानमपि पक्षे न तथा वर्तेत’ इति । द्वितीयो यथा ‘यथा गिरिशिखरयोरुच्चनीचत्वाभ्यां धूमवत्त्वस्य व्यभिचारस्तथाऽग्निमत्वेनापि स्यात्’ इति । तृतीयो यथा ‘यथा महानसयोरल्पत्वमहत्वाभ्यां धूमवत्वं व्यभिचरति तथा अग्निमत्वेनापि व्यभिचरेत्’ इति । धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण यथा ‘यथा द्रव्यत्वमग्निमत्वव्यभिचारि तथा धूमवत्वमपि स्यात्’ इति । धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण यथा ‘यथा रूपं रसव्यभिचारि तथा धूमवत्वमग्निमत्वव्यभिचारि स्यादिति ॥\nअत्र क्वचिद्व्यभिचारदर्शनमुत्थानहेतुः । अनैकान्तिकत्वमारोप्यम्। अन्यत्र व्यभिचारेणत्र व्यभिचाराऽपादने व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं अनैकान्तिकत्वात्’ इति प्रतिषेधहेतोरपि तथात्वाऽपातेन व्याघातः’ इति ॥।\nपक्षाऽदीनां सिद्धानामपि तेनैव हेतुना साध्यत्वापादनं साध्यसमः । यथा पर्वताऽदिसिद्ध्यर्थमपि धूमवत्वमेव प्रयोक्तव्यम् । अन्यथा क्रोडीकृतधर्म्यादिविषयस्य लिङ्गस्य तत्राप्रयोजकत्वे साध्येऽपि तथात्वाऽपातात् । दृष्टान्तेऽपि साध्यसिद्ध्यर्थमयमेव हेतुः प्रयोक्तव्यः । अन्यथा पक्षेऽपि अप्रयोजकत्वाऽपातात् । अन्यत्समानम् । तथा च तत्सिद्ध्यर्थ यावत् न प्रयुज्यते तावदाश्रयाऽसिद्ध्यादीति ॥\nअत्र विशिष्टसाधकत्वाभिमान उत्थानहेतुः । आश्रयासिद्ध्यादिकमारोप्यम् । एवं प्रतिषेधहेतावपि वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च तेनैव हेतुना सिद्धेरयुक्तत्वात् । सिद्धत्वमात्रेण साध्यसिद्धिदर्शनादिति ॥\nसाधनस्य साध्याप्राप्तिपक्षनिरासेन प्राप्तिपक्षमवशेष्य तद्दूषणं प्राप्तिसमः । यथा धूमवत्वज्ञानम् अग्निमत्वज्ञानं प्राप्य उत्पादयति अप्राप्य वा । द्वितीयेऽतिप्रसङ्गात् प्राप्येति वक्तव्यम् । सता च प्राप्तिः इति प्रागेव अग्निमत्वज्ञानसद्भावात् व्यर्थमनुमानम् । एवं धूमवत्वज्ञानं अग्निमत्वं ज्ञापयति प्राप्य अप्राप्य वा । द्वितीये अतिप्रसङ्गात् प्राप्य इति वक्तव्यम् । लिङ्गज्ञानस्य साध्यप्राप्तिश्च विषयविषयिभाव एव सम्भवति । तथा च धूमवत्वज्ञाने वह्निमत्वस्यापि स्फुरणात् व्यर्थमनुमानमिति ॥\nप्राप्तिपक्षनिरासेन अप्राप्तिपक्षं शेषयित्वा तद्दूषणम् अप्राप्तिसमः । यथा, पूर्ववत् प्राप्तिपक्षस्य दुष्टत्वात् अप्राप्य इति वक्तव्यम् । न च तत् युक्तम् । न हि अप्राप्याग्निः काष्ठं दहति । न हि अप्राप्य दीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति । प्राप्तावुक्तानुपपत्तिदर्शनमुत्थानहेतुः । साध्यप्राप्तेर्हेतुविशेषणत्वेन विशेषणासिद्धिरारोप्या । पुर्ववत् दुष्टत्वमूलम् इति ॥।\nसिद्धस्यापि पक्षाऽदेः उत्पादकज्ञापकानवस्थाप्रसञ्जनं प्रसङ्गसमः। यथा, पर्वतस्यापि किम् उत्पादकम् ? तस्यापि अन्यत् इत्यनवस्था । कस्यचित् कारणाभावे अन्यस्यापि तत्प्रसङ्गात् । तथा प्रमाणेऽपि किं प्रमाणं ? तत्राप्यन्यदित्यनवस्था । कस्यचित् प्रमाणान्तरं विना सिद्धावन्यत्रापि तथात्वापातादिति । कारणाऽदिनियमाभिमानोऽत्र द्वारम् । तर्कपराहतिरारोप्या । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः अवस्थाङ्गमूलक्षतेरभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।\nहेतुं विना प्रतिदृष्टान्तमात्रेण बाधप्रतिरोधोद्भावनं प्रतिदृष्टान्तसमः । यथा ‘हृदवत् पर्वतो निरग्निरेव’ इति । ‘निरग्निकोऽपि किं न स्यात्’ इति वा । अत्र हेतुरनङ्गं साध्यातिदेशे इत्यभिमान उत्थानबीजम् । बाधादि आरोप्यम् । बाधाद्यङ्गस्य अधिकबलादेरनभ्युपगमात् युक्ताङ्गत्यागः । साधनस्य हेतुसाहित्यात् । अत्र तदनुपन्यासात्। तस्यानङ्गत्वे ‘प्रतिदृष्टान्तो न दूषकः रासभादिवत इति व्याघात् इति ॥।\nपक्षादीनां प्रागुत्पत्तेः हेतुवृत्त्यभावेन असिद्ध्याद्युद्भावनं अनुत्पत्तिसमः । यथा पर्वतस्योत्पत्तेः प्रागपि पक्षत्वात् अनुत्पन्ने तस्मिन् अवृत्तेः धूमवत्वस्याश्रयभागासिद्धिः इत्यादि । अत्र अनुत्पन्नस्य स्वकार्यसामर्थ्याभिमानमुत्थानकारणम् । असिद्ध्यादि आरोप्यम् । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अनुत्पन्नस्य अङ्गत्वादेरयुक्ताङ्गाधिक्यादीति चेति ॥।\nसत्यपि निर्णयकारणे संशयकारणमात्रेण संशयापादनं संशयसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् अग्निमत्वनिश्चयः तर्हि हृदमहानससाधर्म्येण द्रव्यत्वेन तत्संशयः स्यात्’ इत्यादि । अत्र समानधर्माऽदिमात्रदर्शनं तद्रहितस्यैव निश्चायकत्वाभिमानश्चोत्थानहेतुः । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । निर्णयकारणराहित्यस्य संशयाङ्गत्वानङ्गीकारात् संशयकारणराहित्यस्य अयुक्तस्यैव निर्णयाङ्गताङ्गीकारात् युक्ताङ्गहानिः अयुक्ताङ्गाधिक्यञ्च । अन्यथा दूषकादूषकसाधर्म्याऽदिना जातावपि संशय प्रसङ्गसाम्यात् व्याघात इति ॥ १३ ॥\nअङ्गीकृतानधिकबलत्वेन बाधचोदनं प्रकरणसमः । यथा ‘द्रव्यत्वात् पर्वतो नाग्निमानेव’ इति । अत्र प्रतिप्रमाणोपलम्भ उत्थानहेतुः । बाध आरोप्यः । बाधकत्वेऽधिकबलवत्वस्याङ्गत्वात् युक्ताङ्गहानिः । बाधकस्य अधिकबलत्वानङ्गीकारे स्थापनयैव जातेर्बाधकप्राप्तेर्व्याहतिरिति ॥\nहेतोः साध्यात् पूर्वापरसहभावनिरासेन ओतुत्वचोदनं ओतुसमः । यथा दूमवत्त्वज्ञानं अग्निमत्वज्ञानात् अग्निमत्वाद्वा किं पूर्वभावि उतानन्तरभावि उत तेन समभावीति । नाद्यः । साध्याभावे तस्य साधनत्वायोगात् । न द्वितीयः । साधनाभावे साध्यस्य तत्वायोगात् । न तृतीयः । अविशेषेण साध्यसाधनभावायोगादिति ।\nप्रतितर्कप्रतीतिरत्रोत्थानहेतुः । अन्योन्याश्रयत्वमारोप्यम् । प्रतिषेधोऽपि किं प्रतिषेध्यात् पूर्वभावीत्यादेर्वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । कृतौ पूर्वभाविना पश्चाद्भाविजन्मदर्शनात् ज्ञप्तौ च यथायथं पूर्वभाव्यादिना पश्चाद्भाव्यादेः सिद्धिदर्शनात् तर्कस्य व्याप्तिहीनत्वेन युक्ताङ्गहानिश्च । साधनत्वादिव्यवहारस्य बुद्धिस्थसाध्यादिनोपपत्तेः । व्यापारेष्वन्यानपेक्षणात् । सहभावे च सिद्ध्यसिद्धिभ्यां विशेषादिति ॥\nव्याप्तिं विना वाद्युक्तिमात्रेण ‘अर्थात् इदमाक्षिप्तं’ इत्यभिमानेनोक्तविपरीतारोपणेन दोषाभिधानं अर्थापत्तिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते अर्थात् आपद्यते ‘अन्यत् अनग्निमत्’ इति । तथा च साध्यविकलो दृष्टान्त इत्यादि । अत्र ‘विशेषविधिः शेषनिषेधं गमयति’ इत्यभिमानमुत्थानबीजम् । साध्यविकलत्वादि आरोप्यम् । व्याप्तेरभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षणे ‘धूमवत्वं असाधकं’ इत्युक्ते अर्यादापद्यते ‘अन्यत् सर्वं साधकं ‘इति ॥ तथा च दृष्टान्ताभावः इति व्याघातः इति ॥\nसाधनप्रतिबन्द्या तदितरधर्मेण तद्वतां सर्वपदार्थानामविशेषापादनं अविशेषसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् पर्वतमहानसयोरग्निमत्वाविशेषः तर्हि द्रव्यत्वात् सर्वद्रव्याणां अनित्यत्वं स्यादिति । कस्यचिद्धर्मस्य किञ्चिदसाधकत्व दर्शनमत्रोऽत्थानबीजम् । तर्कपराहतिः आरोप्या । व्याप्तिहीनत्वात् तर्कस्य युक्ताङ्गहानिरिति । अन्यथा ‘अस्य सम्प्रतिपन्नस्य च तर्कपराहतत्वेन असाधकत्वविशेष पदार्थत्वात् सर्वस्यानित्यत्वाविशेषः स्यात्’ इति व्याघात इति । अस्य सम्प्रतिपन्नस्य चेति । ‘धूमवत्त्वं असाधकं तर्कपराहतत्वात् तर्कपराहतहेत्वन्तरवत्’इत्यत्र त्वया पक्षीकृतधूमवत्त्वस्य दृष्टान्तीकृतस्य चेत्यर्थः ॥\nमत्पक्षेऽपि किञ्चित् प्रमाणं भविष्यतीति तदुपपादनमुपपत्तिसमः । यथा ‘धूमवत्वं यथा अस्ति त्वत्पक्षे प्रमाणं तथा मत्पक्षेऽपि किञ्चित् भविष्यति पक्षत्वात्’ इति । अत्र सामान्यतः प्रमाणसम्भावना उत्थानबीजम् । बाधः प्रतिरोधो वा आरोप्यः । तस्यापि कश्चित् दोषो भविष्यतीति वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । युक्ताङ्गहानिश्च । उपन्यस्तं प्रत्यनुप न्यस्तस्य प्राबल्यादेर्वाधाद्यङ्गस्य अनिश्चयादिति ॥।\nवादिवाक्यस्यावधारणे तात्पर्यमारोप्य विकल्प्य तद्दूषणमुपलब्धिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते किं पर्वत एवाग्निमान् ? उत पर्वतोऽग्निमानेव ? इति । नाद्यः महानसादेरप्यग्निमत्वात् । न द्वितीयः कदाचिदनग्निमत्वात् इत्यादि । वाक्यस्यावधारणे तात्पर्यावश्यम्भावाभिमानोऽत्रोत्थान बीजम् । बाधादि आरोप्यम् । जात्युतरेऽपि अस्य साम्यात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं च अन्ययोगायोगव्यवच्छेदस्य अयोगादिति ॥\nउपलब्ध्यादिविषयिधर्माणां स्वात्मनि तदतद्रूपतां विकल्प्य उभयथा व्याघातापादनं अनुपलब्धिसमः । यथा ‘उपलब्धत्वात् इदमस्ति’ इत्युक्ते सा उपलब्धिः स्वस्मिन्न् उपलब्धितया वर्तते न वा । आद्ये नोपलब्धिः प्रमेयवदुपलब्धत्वात् । द्वितीयेऽपि तथा। प्रमेयवत् स्वात्मनि तथा अवृत्तेः । तथा च उपलब्धित्वमसिद्धम् । एवं ‘अनुपलब्धेरिदं नास्ति’ इत्युक्ते अनुपलब्धिः स्वात्मनि अनुपलब्धितया वर्तते चेत् प्रमेयवदसती स्यात् । अवृत्तौ घटवत् नानुषलब्धिः । अनुपलब्ध्यभावात् अनुपलब्धत्वासिद्धिः इत्यादि ।\nअत्र विषयिधर्मोपलब्धिः उत्थानबीजम् । असिद्ध्याद्यारोप्यम् । ‘असिद्धो हेतुः’ इत्यत्रापि असिद्धिः स्वात्मनि तथा वर्तते न वेति जातावपि सम्भवात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च स्वात्मनि तथावृत्तेरयुक्तत्वात् । विषये तथावृत्त्या तत्त्वोपपत्तेरिति ॥।\nविवक्षितस्य कस्यचिद्धर्मस्य तदतद्रूपतां विकल्प्य तद्दूषणेन धर्मिणः तद्विशिष्टत्वभङ्गो नित्यसमः । यथा ‘शब्दोऽनित्यः’ इत्युक्ते अनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा । आद्ये शब्दोऽपि तथा स्यात् । न हि धर्मो नित्यः धर्मी चानित्य इति युज्यते । द्वितीये यदाऽनित्यत्वाभावस्तदा शब्दस्य नित्यत्वमिति सारूप्येण । वैरूप्येण तु अनित्यत्वं शब्दात् भिन्नमभिन्नं वा । आद्ये अनवस्था । द्वितीये अन्यतरमात्रावशेषे आश्रयासिद्ध्यादीत्यादि । अत्र धर्मधर्मिभावदर्शनमुत्थानबीजम् । तर्कपराहतिरारोप्या । धर्मधर्मिभावनिरासे जातेरप्यनुत्थानात् व्याघातः। तर्कस्य व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।\nवादिसाधनप्रतिबन्द्या धर्मान्तरेण सर्वस्य साध्यधर्मवत्वापादनमनित्यसमः । यथा ‘यदि महानसवत् धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि सत्त्वात् सर्वमप्यग्निमत् स्यात्’ इति । अविशेषसमायां तु सर्वाविशेषमात्रापादनम् । अन्यत् समानम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनभ्युपगमे ‘यदि असाधक प्रतिबन्दीग्रस्तत्वात् इदमसाधकं तर्हि पदार्थत्वात् सर्वमप्यसाधकं स्यात्’ इति व्याघात इति ॥।\nपक्षादीनामन्यतमस्यासिद्धिमुद्भाव्य तत्साधकत्वेन स्वयमेवोत्प्रेक्षितस्य दूषणेन वादि साधनभङ्गः कार्यसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते पर्वतस्यैवाभावादाश्रयासिद्धिः । ‘यदिप्रतीयमानत्वात् सोऽस्तीत्युच्यते तन्न । शुक्तिरजतादौ व्यभिचारात्’ इति । व्यवहर्तव्यद्वैतमत्र हेतुरुत्थानस्य । तत्तदङ्गसिद्धिरारोप्या । अस्य जातावपि तुल्यत्वेन व्याघातः । उत्प्रेक्षितदोषेण वाद्युक्तस्यासाधकत्वोक्तेरविषयवृत्तित्वञ्चेति ॥।\nअथ निरनुयोज्यानुयोगांशस्य छलस्यापि उक्तान्तर्भावमाह\nछलमसङ्गतम्\nपरोक्तस्यार्थान्तरं परिकल्प्य तद्दूषणेन परोक्तभङ्गः छलम् परोक्तदूषणस्यैव सङ्गतत्वेन अनुक्तारोपितदूषणं छलं असङ्गते अन्तर्भवति ॥\nन केवलमसङ्गतं छलम् । किं तर्हि ? इत्यत आह\nअन्यच्च\nअसङ्गतात् अन्योऽर्थदोषो विरोधः । तत्राप्यन्तर्भवति छलम् । छलवाक्यस्याप्यर्थान्तरं परिकल्प्य दूषणसम्भवेन स्ववचनन्यायेन स्वविरोधेऽन्तर्भावात् ॥\nनिरनुयोज्यानुयोगांशान्तरद्वयस्याप्यसङ्गतान्तर्भावमाह\nअन्यच्च\nउक्तात् छलात् जातेश्च अन्यत् निरनुयोज्यानुयोगांशद्वयं च असङ्गतमेव । प्राप्तस्यैव हान्यादेरुद्भावनप्राप्तकाल एव ग्रहणस्य च सङ्गतत्वात् ॥\nनिग्रहस्थानान्तरस्यापि असङ्गतान्तर्भावमाह–\nअन्यच्च\nउक्तात् अन्यदपि निग्रहस्थानं किञ्चित् असङ्गतमेव । यथा अर्थान्तरम् । प्रकृतोपयोगिन एव सङ्गतत्वात् । परबोधनार्थं प्रवृत्तस्य तदङ्गपदप्रयोग एव सङ्गत इति निरर्थकमपि । अत एव अविज्ञातार्थम् । अपार्थकस्य स्फुटस्तत्रान्तर्भावः । अप्राप्तकाले तु अवयवविपर्यासादि निग्रहस्थानमेव न भवति अर्थाविरोधात् छन्दोभङ्गादिवत् । अर्थविरोधि असङ्गतमेव । विवक्षित क्रमानुल्लङ्घने हि सङ्गतिः स्यात् । अन्यथाृनुभाषणं च, उक्तानुवादस्यैव सङ्गतत्वात् । प्राप्तदूषणोद्भावनस्यैव सङ्गतत्वेन पर्यनुयोज्योपेक्षणमपि असङ्गतिरेवेति ।\nएवमुक्तादन्यच्च यथासम्भवमुक्तान्तर्भूतं द्रष्टव्यमित्याह–\nअन्यच्च\nयथा, प्रतिज्ञाहानिः संवादे, अन्तर्भवति । अर्थतो हानिरसङ्गतावपि । प्रकृतदोषपरिहारे प्राप्ते ‘अन्यथास्तु’ इत्यस्य सङ्गत्यदर्शनात् । एवं प्रतिज्ञान्तरमपि । अविशिष्टदूषणाभ्युपगमात् तद्दूषणपरिहारस्यैव सङ्गतत्वात् । हेत्वन्तरमप्यनेनोक्तम् । न्यूनाधिके न्यूनाधिकयोः । तत्र अवयवन्यूनमदूषणमित्युक्तम् । एवं आभासानुद्धारः अनुकूलतर्कानुक्तिश्च । अबुभुत्सितोक्तेरेव दोषत्वात् । तर्कस्य पृथक्प्रमाणत्वात् । पुनरुक्तमधिकम् । उक्तात् अन्यत् अननुभाषणं न्यूनम्। तृष्णीम्भावः अनुक्तौ । अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपश्च, यत्किञ्चिदुक्तावपि प्रकृतोपयोगाभिमानाद्यभावात् । न ह्यनुक्तिरप्यात्यन्तिकी । किं तु ? प्रकृतोप्योगाभिमानादिना अनुक्तिः । मतानुज्ञायाः प्रयोजनविशेषात् पृथगन्तर्भावं वक्ष्यतीति । नचानेन त्रिविधो विरोधः इत्यादेर्गतार्थता । अनुमानविरोधविवेकाभावे हेत्वाभासादेरुक्तान्तर्र्भावाप्रतीतेरिति ॥\nछलं त्रिविधम् वाक्छलं सामान्यछलं उपचारछलञ्चेति ॥ तत्र मुख्यार्थविवक्षया प्रत्युक्तस्य मुख्यार्थान्तरकल्पनया तद्दूषणं वाक्छलम् । अभिप्रायान्तरकल्पनया तद्दूषणं सामान्यछलम् । अमुख्यार्थाभिप्रायेण प्रयुक्तस्य मुख्यार्थकल्पनया दूषणमुपचारछलम् । तत्र वाक्छलादेरसङ्गताद्यन्तर्भावस्फुरणायोपलक्षणतया वाक्छलमुदाहरति । गृष्टिविवक्षया ‘गां आनय’ इत्युक्ते पृथिवीविवक्षया ‘गवानयनमशक्यम्’ इतिवत् । एकवारप्रसूता गौः गृष्टिः । द्वितीयं यथा ‘अनूचानोऽयं ब्राह्मणः’ इत्युक्ते ‘युक्त मेव हि ब्राह्मणे अनूचानत्वम्’ इति सम्भावनाभिप्रायेण परेणाभिहिते ब्राह्मणत्वस्य हेतुत्वाभिप्रायकल्पनया ‘नैवं, व्रात्ये व्यभिचारात्’ इति प्रतिषेधः । तृतीयं यथा ‘सिंहो देवदत्तः’ इत्युक्ते ‘नैवं, सटाद्यभावात्’ इति । अत्र ‘गवानयनं न विधेयं अशक्यत्वात्’ इत्यादिछलवाक्ये ‘गवा नयनम्’ इत्येतदयुक्तंअनन्वितत्वात्’ इत्यादेश्छलस्य प्रवृत्तेर्विरोधत्वं ज्ञातव्यम् ॥\nरूढ्या योगेन वा प्रतिपाद्योऽर्थो मुख्यः । बहुलप्रयोगमात्रसिद्धा रूढिः प्रवृत्तिनिमित्तविवक्षया प्रवृत्तिर्योगः । अखण्डवृत्तिः रूढिः अवयववृत्तिर्योग इति वा । गौण्या लक्षणया वा वृत्त्या शब्दबोध्योऽर्थः अमुख्यः । मुख्यार्थगुणयुक्तार्थान्तरवृत्तिर्गौणी। मुख्यार्थसम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्लक्षणेति ।" | | "lines": [ |
| | "निर्दोषोपपत्तिरनुमेत्युक्तम् । को दोष उपपत्तेः सम्भवति ? । द्विविध उपपत्तिदोषः । साक्षात् वाचनिकश्चेति । यस्तत्रोपपत्तेरेव साधनदूषणक्षमत्वापादकः स साक्षादुपपत्तिदोषः । तं विभज्य दर्शयति ॥", |
| | "उपपत्तिदोषौ विरोधासङ्गती", |
| | "उपपत्तिदोषो द्विविधः विरोधोऽसङ्गतिश्चेति । अन्वययोग्यताविरहो विरोधः । आकाङ्क्षाभावोऽसङ्गतिः । इमौ चार्थवचनयोरपि सम्भवतः । अर्थासाधुत्वे वचनस्यापि तथात्वादिति । वचनस्यैवासाधुत्वापादको वाचनिकदोषः । तं विभज्य दर्शयति", |
| | "न्यूनाधिके वाचनिके", |
| | "द्विविधो वाचनिकदोषः । न्यूनमधिकं चेति । अपेक्षितासम्पूर्तिर्न्यूनम् । अपेक्षिताधिकमधिकम् । न्यूनाधिके च परार्थप्रयोग एव सम्भवतः । वचनद्वारेणैवोपपत्तेरपि दूषिते स्यातामिति ॥", |
| | "न केवलमुपपत्तिदोषाणामेव विरोधादिभिः सङ्ग्रहः । किं नाम ? परनिरूपिताशेषनिग्रहस्थानान्यपि विरोधादिष्वेवान्तर्भवन्तीत्याह–", |
| | "संवादानुक्तियुता निग्रहाः", |
| | "निग्रहाः निग्रहस्थानानि । कथायामखण्डिताहङ्कारेण परेण परस्याहङ्कारखण्डनं पराजयो निग्रहस्तन्निमित्तं तत्त्वाप्रतिपत्तिलिङ्गम् वा निग्रहस्थानम् । सा द्विविधा अप्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिश्चेति । परोक्तस्ववक्तव्ययोरज्ञानम् अप्रतिपत्तिः । तयोरेव विपरीतज्ञानम् विप्रतिपत्तिः । तानि च प्रतिज्ञाहानिः (१) प्रतिज्ञान्तरम् (२) प्रतिज्ञाविरोधः (३) प्रतिज्ञासन्न्यासः (४) हेत्वन्तरम् (५) अर्थान्तरम् (६) निरर्थकम् (७) अविज्ञातार्थकम् (८) अपार्थकम् (९) अप्राप्तकालम् (१०) न्यूनम् (११) अधिकम् (१२) पुनरुक्तम् (१३) अननुभाषणम् (१४) अज्ञानम् (१५) अप्रतिभा (१६) विक्षेपः (१७) मतानुज्ञा (१८) पर्यनुयोज्योपेक्षणम् (१९) निरनुयोज्यानुयोगः (२०) अपसिद्धान्तः (२१) हेत्वाभासाः (२२) उदाहरणाभासाः (२३) तर्कपराहतिश्चेति । एतानि च कथाबाह्यानि कथायामपस्मारोन्मादादिदशापन्नानि झटिति संवरणेन तिरोहितोद्भावनावसराणि पुरःस्फूर्तिकानधिकृतोद्भावितानि न निग्रहस्थानानि । तात्कालिकातत्वज्ञानलिङ्गत्वेऽपि प्रतियोग्यपेक्षया तदभावात् इति ॥", |
| | "तत्र येन यत् यथा साध्यत्वादिना निर्दिष्टं तस्य तथा निर्वाहादर्शनेन पुनस्त्यागः प्रतिज्ञाहानिः । द्विधा चैषा । साधनहानिर्धूषणहानिश्चेति । तत्राद्या द्वादशविधा । पक्षे तावत् साध्यसाधनधर्मितद्विशेषणहानिभेदात् षट्प्रकाराः । एवं दृष्टान्तेऽपीति । द्वितीयापि द्विविधा । स्वरूपतो विशेषतश्चेति । सर्वा पुनर्द्विविधा ।असद्विषया सद्विषया चेति । सर्वा चेयं द्विधा प्रवर्तते कण्ठतोऽर्थतश्चेति । ‘दुष्टं चेन्माभूत्’ इति कण्ठतः । ‘अन्यथास्तु’ इत्यर्थतः । तत्रासद्विषया पक्षे साध्यहानिर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्त्वग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तस्मिन्नेव हेतौ तथा दूषिते माऽस्त्वसौ हेतुरिति, धूमवत्वमस्त्विति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदपर्वतावग्निमन्तावित्यत्र भागे बाधाभिधाने मास्तु तर्हि हृदः पक्ष इति, पर्वत एवास्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा, पर्वत उष्णाग्निमान् इत्यत्र व्यर्थविशेषणतया प्रत्युक्ते मास्तु तर्हि तथेति, अग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा, सुरभिधूमवत्वादित्यत्र तथैव दूषिते मास्तु तर्ह्येवमिति, धूमवत्वादित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा, अयं पर्वतोऽग्निमानित्यत्र तथैव दूषिते तर्हि तथा मास्त्विति,पर्वत इत्येवास्त्विति वा । दृष्टान्ते साध्यहानिर्यथा, पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात् महानसवदित्यत्रानैकान्तिकत्वोद्भावने मास्तु तर्हि महानसोऽग्निमानिति, निरग्निकोऽस्त्विति वा । साधनहानिर्यथा, तत्रैव प्रयोगे तथैव प्रत्युक्ते माऽस्तु प्रमेयत्वात्, महानसोऽग्निमानिति, धूमवत्वादिति वा । धर्मिहानिर्यथा, हृदवदित्युक्ते साध्यवैकल्यात् प्रत्युक्ते मास्तु स दृष्टान्त इति, महानसोऽस्त्विति वा । साध्यविशेषणहानिर्यथा ‘यो धूमवानसावुष्णाग्निमान् यथा महानसः,इत्यत्र विशेषणवैयर्थ्येऽभिहिते माऽस्तु तथेति, सोऽग्निमानित्येवास्त्विति वा । साधनविशेषणहानिर्यथा ‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् यथा महानसः’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्तु तर्हीत्थमिति, यो धूमवानित्येवास्त्विति वा । धर्मिविशेषणहानिर्यथा,‘यः सुरभिधूमवानसावग्निमान् तन्महानसवत्’ इत्यत्र तथैव प्रत्युक्ते मास्त्वेवमिति, महानसवदित्येवास्त्विति वा ।", |
| | "दूषणहानिः स्वरूपतो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् प्रमेयत्वात्’ इत्यत्रासिद्धेरुद्भावने निरनुयोज्यानुयोगेन प्रत्युक्ते ‘तर्हि मा भूत्तत्’ इति ‘अनैकान्तिकता भवतु’ इति वा । विशेषतो यथा ‘हृदपर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’इत्यत्र स्वरूपासिद्ध्युद्भावने पूर्ववत् प्रत्युक्ते ‘तर्हि मास्तु’ इति ‘भागासिद्धो भवतु’ इति वा ॥", |
| | "सद्विषया तु ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तर्हि मास्तु पर्वतोऽग्निमान्’ इत्याद्युदाहर्तव्या । सा च पर्यनुयोज्योपेक्षणसहचारिणीऽति । ननु यद्दोषभयादुक्तं त्यजति स एव निग्रहस्थानमस्तु किं हान्येति चेन्न । सद्धानौ तस्या एव निग्रहहेतुत्वात् । असद्धानावपि तत एव परिहृतत्वात् । हानिमनुद्भाव्यप्राचीनदोषस्थापनानुपपत्तेश्च । न चास्यास्तादर्थ्यं, स्वयमपि विप्रतिपत्तिसूचकत्वात् । न चैवं स्ववचनविरोध एव । हानिमनुद्भाव्य विरोधोद्भावनानुपपत्तेरिति ॥।", |
| | "दोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाध्यभागेऽधिकप्रक्षेपः प्रतिज्ञान्तरम् । प्रतिज्ञा उदाहरणे प्रयोज्यभागः निगमनं चेति साध्यभागः । द्विविधं चेदं दोषपरिहारहेतुः तदहेतुश्चेति ॥ दोषसदसद्भावाभ्यां पुनर्द्विविधम् । तत् प्रतिज्ञायां चतुर्विधम् । पक्षतद्विशेषणसाध्यतद्विशेषणप्रक्षेपभेदात् । पक्षप्रक्षेपोऽपि द्वेधा । स्वरूपतः पक्षान्तरतश्चेति । एवं साध्यप्रक्षेपोऽपि । तत्र सद्दोषपरिहारार्थमाद्यं यथा ‘अनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । द्वितीयं यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्तिकत्वेऽभिहिते ‘तदपि पक्षः’ इति । तृतीयं यथा, तत्रैव ध्वनिभिः सिद्धसाधनत्वोद्भावने ‘वर्णात्मकः शब्दः पक्षः’ इति । चतुर्थं यथा ‘शब्दः कृतकत्वात्’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘शब्दोऽनित्यः’ इति । पञ्चमं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् सुरभिमलिनधूमवत्वात्’ इत्यत्र विशेषणासामर्थ्येऽभिहिते ‘साग्निकृष्णागरुमान्’ इति । षष्ठं यथा ‘क्षित्यादिकं कारणपूर्वकं कार्यत्वात्’ इत्यत्र सिद्धसाधनत्वोक्तौ उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकमिति ॥", |
| | "उदाहरणे प्रयोज्यभागे प्रयोज्यस्वरूपतदन्तरतद्विशेषणधर्मितद्विशेषणप्रक्षेपभेदेन पञ्चविधम् । तत्राद्यं यथा ‘यो धूमवान् यथा महानसः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘सोऽग्निमान्’इति । द्वितीयं यथा ‘यत् सुरभिमलिनधूमवत् तत् अग्निमत् यथा सम्प्रतिपन्नम्’इत्युक्ते प्रयोज्यभागे न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् साग्निकृष्णागरुमत्’ इति । तृतीयं यथा ‘यत् कार्यं तत् कारणपूर्वकं यथा घटः’ इत्यत्र न्यूनतया प्रत्युक्ते ‘तत् उपादानादिबुद्धिमत्कारणपूर्वकम्’ इति । चतुर्थः यथा ‘यो धूमवानसावग्निमान्’ इत्येवोक्ते प्रागिव प्रत्युक्ते ‘यथा महानसः’ इति । पञ्चमं यथा ‘शब्दो नित्यः नित्यगुणत्वात् परमाणुरूपवत्’ इत्यत्र साध्यवैकल्येऽभिहिते ‘अपार्थिवपरमाणुरूपं दृष्टान्तः’ इति ॥", |
| | "निगमनेऽपि प्रतिज्ञायामिवोदाहर्तव्यम् । हेतुप्रक्षेपोऽत्राधिकः । स यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्येवोक्ते न्यूनतया प्रत्युक्ते, तस्मात् धूमवत्वात्पर्वतोऽग्निमान्’ इति । असद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’इत्यत्र बाधोक्तावुष्णाग्निमानित्यादि । सद्दोषपरिहाराहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येनानैकान्ति कत्वोद्भावने ‘सर्वगतः शब्दः पक्षः’ इत्यादि । असद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्’ इत्यत्र सामान्येना नैकान्तिकत्वोद्भावने ‘तदपि पक्षः इत्यादि । न च दोषापरिहारे अर्थान्तरता । प्रकृतोपयोगसद्भावाभिमानेन प्रतिज्ञान्तरत्वस्यैव सिद्धत्वात् । न चेयं हानिरेव । पूर्वाङ्गीकृतस्यात्यागात् । विशेषणाभावस्य प्रागनङ्गीकृतत्वादिति ॥।", |
| | "एकवाक्ये अवान्तरवाक्यानां पदानां च मिथो व्याघातः प्रतिज्ञाविरोधः । स च बहुप्रकारः । तत्र प्रतिज्ञायां धर्मिपदयोर्यथा ‘श्रोतृत्वे सति बधिरः’ इति । साध्यपदयोर्यथा ‘विमतो बधिरत्वे सति श्रोता’ इति । धर्मिसाध्यपदयोश्चतुर्विधः । तत्र धर्मविधानाद्यथा ‘मूको वक्ता’ इति । तन्निषेधाद्यथा ‘प्रमेयं न प्रमाणसापेक्षम्’ इति । धर्मिविधानाद् यथा ‘अतीतमस्ति’ इति । तन्निषेधाध्यथा‘वर्तमानं नास्ति इति । हेतुपदयोर्यथा ‘मूकत्वे सति वक्तृत्वात्’ इति । उदाहरणे साधनपदयोर्हेतुपदवत् । साध्यपदयोः प्रतिज्ञायामिव । परस्परं तु प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । दृष्टान्तधर्मिणि साध्यधर्मिवत् । साध्यधर्मिपदयोः प्रतिज्ञायामिव चतुर्विधः । उपनयपदयोर्हेतुपदवत् । निगमने प्रतिज्ञावत् । हेत्वंशेन विरोधः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् ।", |
| | "प्रतिज्ञाहेत्वोर्यथा ‘द्रव्यं गुणव्यतिरिक्तं अव्यतिरिक्तत्वात्’ इति । प्रतिज्ञोदाहरणयोर्यथा ‘विप्रतिपन्नो वक्ता मूकवत्’ इति । प्रतिज्ञोपनययोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । प्रतिज्ञानिगमनयोर्यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् तस्मान्निरग्निकः’ इति।हेतूदाहरणयोर्यथा ‘वक्तृत्वान्मूकवत्’ इति । हेतूपनययोर्यथा ‘धूमवत्वात् तथा चायं निर्धूमः’ इति । हेतुनिगमनयोः प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । उदाहरणोपनययोर्हेतूदाहरणविरोधवत् । उदाहरणनिगमनयोः प्रतिज्ञोदाहरणविरोधवत् । उपनयनिगमनयोरपि प्रतिज्ञाहेतुविरोधवत् । एवमन्यत्रापि विरोधो द्रष्टव्यः । न च विरुद्धहेत्वाभाससङ्करः । तत्र साध्यविपर्ययव्याप्तिदर्शनेन विरोधः । अत्र पुनः अस्ति नास्तीतिवत् उक्तिमात्रेणेति भेदात् । अत एव प्रथममुपलब्धेर्दोषान्तर सम्भवेप्येतदेवोद्भाव्यमिति ॥।", |
| | "स्वोक्तापलापः प्रतिज्ञासन्न्यासः । हानिवदवान्तरभेदभिन्नः । चतुर्धा च प्रवर्तते । केनेदमुक्तम् ? इति वा परमतमेतन्मयोक्तम् इति वा त्वयेदमुक्तम् इति वा परोक्तं मयानूदितम् इति वेति ॥।", |
| | "दोषपरिजिहीर्षया निर्दिष्टसाधकांशे अधिकप्रक्षेपो हेत्वन्तरम् । हेतुः उदाहरणे प्रयोजकभागः उपनय इति साधकांशः । तद् द्विविधम् साधनदूषणनिष्ठभेदात् । सर्वं स्वरूपतो विशेषतश्चेतिद्वेधा । तत्राद्यं यथा । हेत्वाद्यप्रयोगे न्यूनत्वोद्भावने तदुपादानम् । द्वितीयमपि दोषप्रतीकाराप्रतीकाराभ्यां दोषसदसद्भावाभ्यां च द्वेधा । तत्र साधने हेतौ सद्दोषपरिहारहेतुर्यथा ‘शब्दोऽनित्यः ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्रानैकान्तिकत्वेन दूषिते सामान्यवत्वे सतीति । उदाहरणे प्रयोजकभागे यथा ‘ऐन्द्रियकः सोऽनित्यः’ इत्यत्र न्यूनत्वेऽभिहिते पूर्ववत् विशेषणम् । उपनये यथा ‘तथा चायमैन्द्रियकः’ इत्युक्ते पूर्ववत् विशेषणम् । दूषणे हेतौ यथा ‘नायं साध्यसाधकः सपक्षे सत्त्वात्’ इत्यत्र व्यभिचारेण प्रत्युक्ते ‘विपक्षवृत्तित्वे सति’ इत्यादि । सद्दोषाप्रतीकारो यथा ‘शब्दोऽनित्य ऐन्द्रियकत्वात्’ इत्यत्र अनैकान्तिकत्वोद्भावने ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषप्रतीकारो यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इत्यत्र महानसे व्यभिचार इत्युक्ते ‘तदन्यत्वे सति’ इत्यादि । असद्दोषाप्रतीकारो यथा तत्रैव ‘प्रमेयत्वे सति’ इत्यादि । अत्र हेत्वाभासादिसम्भवेऽपि तस्य साध्यत्वात् सिद्धं हेत्वन्तरमेवोद्भाव्यमिति ॥।", |
| | "प्रकृतानुपयुक्तान्वितोक्तिरर्थान्तरम् । तच्चतुर्विधम् । स्वपरोभयानुभयमतरीतिभेदात् । तत्र स्वमतेन नैयायिकस्य मीमांसकं प्रति यथा ‘शब्दोऽनित्यः स चाकाशविशेषगुणः’ इति । परमतेन यथा ‘द्रव्यं’ इत्यादि । उभयमतेन यथा ‘श्रोत्रग्राह्योऽसौ’ इत्यादि । अनुभयमतेन यथा ‘गन्धादिभिः समानाश्रयोऽसौ’ इत्यादि । अत्र न्यूनादिसम्भवेऽपि तस्योक्तग्राह्यत्वादस्य चोच्यमानग्राह्यत्वेन प्रथमप्राप्तत्वात् इदमेवोद्भाव्यमिति ॥।", |
| | "अबोधकशब्दप्रयोगो निरर्थकम् । तच्च बहुप्रकारम् । कचटतपेत्यादिमातृकापाठमात्रम् लिङ्गविभक्तिवर्णविपर्यासः कृत्तद्धित समासाख्यातविपर्यासः भाषान्तरसङ्करश्चेत्यादि । कथञ्चित् ज्ञापकत्वात् कथमेतन्निग्रहस्थानमिति चेन्मैवम् । नहि कथञ्चिज्ज्ञापकत्वं शब्दधर्मः प्रकरणादिनैव तत्र ज्ञानोदयात् । भाषान्तरसङ्करोऽपि समसमयत्वाभावे निग्रहस्थानम् । अन्यथा ज्ञानसङ्गूहनार्थं स्वभाषया प्रत्यवतिष्ठमानं प्रति तदनभिज्ञस्योत्तराभावप्रसङ्गादिति ॥", |
| | "त्रिवारमुक्तेऽपि परिषत्प्रतिवादिभ्यामविज्ञातार्थबोधकपदप्रयोगोऽ विज्ञातार्थकम् । तच्चतुर्विधम् । स्वतन्त्रमात्रसिद्धम्,रूढिमनपेक्ष्य केवलयोगेन प्रवृत्तम्, निर्णायकाभावेन संशयाक्रान्तम्, अतिद्रुतोच्चारितं चेति । आद्यं यथा ‘कपालपुरोडाशादि’ मीमांसकानाम् । द्वितीयं यथा ‘कश्यपतनयाधृतिहेतुरयं त्रिणयनतनयासनसमाननामधेययुक्तः’ इत्यादि । तृतीयं यथा ‘श्वेतो धावति’ इत्यादि । तत्राद्यं परस्परसिद्धान्ताभिज्ञताशौण्डीर्याभिमानेन उपादीयेतापि । उत्तरं तु नोपादेयमेव । ज्ञापनार्थत्वात् शब्दस्य । अनवधानादिशङ्कानिरासाय पुनर्वचनं प्राश्निकैरपेक्ष्यते । त्रिरिति नियमश्च । ततः परमज्ञानस्य वचनदोषहेतुत्वनिश्चयात् । न हि प्राश्निकापेक्षयोच्यमाने तेषामनवधानं सम्भवति । नापि परिषदविदुषी, येनादोषमपि न जानीयादिति ॥", |
| | "अनन्वितार्थवाचकपदादिप्रयोगोऽपार्थकम् । तत् त्रिविधम् । सर्वथाऽप्यसम्भवदन्वयं यथा ‘दश दाडिमानि षडपूूपाः कुण्डमजाजिनम्’ इत्यादि । व्यवहितान्वयं यथा ‘ओदनं स्नातो ग्रामं सरसि गत्वाश्नाति’ इत्यादि । सम्भवत्सर्वान्वयपक्षनिरासे सत्यसम्भवदन्वयं चेति । विवक्षितक्रमविपर्यासोऽप्राप्तकालम् । अयं वादजल्पयोः क्रमः । सभ्यादिसङ्ग्रहपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते वादिना प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्यः । प्रतिवादिनापि वादिसाधनमनूद्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणमभिधायाभासोद्धारः कर्तव्य इति । तत्र यदि वादी साधनमुक्त्वा कथानियमबन्धनमिच्छति तदारम्भविपर्यासः । यदाऽऽभासोद्धारानन्तरं साधनं प्रयुङ्क्ते तदा वादांशविपर्यासः । प्रतिवादी च यदा स्वपक्षे साधनमभिधाय परपक्षं दूषयति तदा वादविपर्यासः। धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् इत्याद्यवयवविपर्यासः । अग्निमान् पर्वत इत्याद्यवयवांशविपर्यासः । वितण्डायां तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनाभावात् वादविपर्यासाभाव इति ॥", |
| | "अवश्योपादेयानामन्यतमानुपादानं न्यूनम् । तदपि बहुप्रकारम् । कथासमयबन्धमकृत्वा साधनप्रयोगे आरम्भन्यूनम् साधनमप्रयुज्याभासोद्धारे, तत्प्रयुज्य चाभासानुद्धारे अनुकूलतर्कानुुक्तौ च वादांशन्यूनम् । प्रतिवदिनापि वादिसाधनमदूषयित्वा स्वपक्षसाधनाभिधाने, दूषयित्वा वा तदनभिधाने वादन्यूनम् । प्रतिज्ञाद्यवयवाभावे अवयवन्यूनम् । धर्म्याद्यनुक्तावयवयवांशन्यूनम् । इदं च तत्तत्सिद्धान्तरीत्योद्भावनीयम् । न चैवमपसिद्धान्त एव । न हि सिद्धान्तविरुद्धकरणमपसिद्धान्तः । तथात्वे सर्वनिग्रहस्थानानामपि तथात्वप्राप्तेः । किं नाम ? तदभ्युपगमो वस्तुतत्वानुसारेण वेति ॥", |
| | "अन्वितोपयुक्तापुनरुक्तकृतकार्यप्रयोगोऽधिकम् । तत् पञ्चविधम् । हेतूदाहरणोपनयदूषणानुवादाधिकभेदेन । प्रतिज्ञानिगमनयोराधिक्यं एकार्थत्वे पुनरुक्तं, अन्यार्थत्वे प्रकृतसङ्गतावर्थान्तरं, असङ्गतावपार्थकम् । द्विविधं चैतत् विशेषतः सामान्यतश्च । तत्राऽद्यं यथा ‘धूमवत्वादालोकविशेषवत्वादिति, धूमवत्वादेः’ इति वा । द्वितीयं यथा ‘यथा महानसः पाकस्थानमिति, यथा महानसाऽदिः’ इति वा । तृतीयं यथा ‘तथा चायं धूमवानालोकविशेषवानिति, धूमाऽदिमान्’ इति वा । चतुर्थं यथा ‘अनैकान्तिको हेतुः कालातीतश्चेति, अनैकान्तिकाऽदिः’ इति वा । पञ्चमं तु अदूष्यभागस्य स्ववचनेनानुवादः आदिशब्देन वेति ॥।", |
| | "प्रतीतार्थस्य पुनः स्ववचनेन प्रयोजनेन विना अभिधानं पुनरुक्तम् । तत् त्रिविधम् । अर्थतः शब्दतोऽप्याक्षेपतश्चेति । तत्राद्यं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् गिरिर्वह्निमान्’ इति । द्वितीयं यथा ‘पर्वतोऽग्निमान् पर्वतोऽग्निमान्’ इति । तृतीयं यथा ‘जीवंश्चैत्रो गृहे नास्ति इत्युक्त्वा ‘बहिरस्ति’ इति ॥", |
| | "वादिनोक्तस्य प्राश्निकैर्विज्ञातार्थस्य वादिना परिषदा वा पुनरनूद्य दत्तस्योच्चारणयोग्यस्य स्वाज्ञानमनाविष्कुर्वता कथामविच्छिन्दता यत् अप्रत्युच्चारणम् तत् अननुभाषणम् । तत् पञ्चविधम् । यत्तदित्याद्यनुवादः दुष्यैकदेशानुवादः अन्यथानुवादः केवलं दूषणोक्तिः तूष्णीम्भावे दूषणाद्यप्रतीतेः, दूषणमात्राभिधाने निराश्रयदूषणस्यादूषकत्वात्, अन्यथानुवादे व्यधिकरणत्वात्, दूष्यैकदेशानुवादे विशिष्टादूषणात्, यत्तदित्याद्यनुवादे अननुवादाविशेषात् । न च दूषणस्वरूपयोग्यतया दूष्यविशेषसिद्धिः । सन्दिग्धत्वादिना सर्वस्यापि दूष्यत्वात् । योग्यमेवायं ब्रवीतीति नियमाभावात् । न च पञ्चममज्ञानमप्रतिभा वा । ज्ञातार्थस्य स्फुरदुत्तरस्यापि सभाक्षोभादिना तूष्णम्भावोपपत्तेः । तथा चाननुभाषणमेव निर्णीतं, नान्यदिति ॥", |
| | "वादिना त्रिरभिहितस्यापि परिषदा विज्ञातार्थस्य वाक्यस्यार्थाप्रतिपत्तिरज्ञानम् । तच्चाज्ञानम् आविष्करणेन ज्ञातव्यम् । यथा ‘नास्यार्थो ज्ञायते मया’ इति । अनाविष्करणे तु अननुभाषणमेव ॥", |
| | "वादिनोक्तस्य प्रत्युत्तराप्रतिपत्तिरप्रतिभा । सा चानूद्य तूष्णीम्भाव एव । अननुवादेत्वननुभाषणत्वात् । श्लोकपाठादावर्थान्तरप्रसङ्गात् इति ।", |
| | "केनचित् व्याजेन कथाविच्छेदो विक्षेपः । यथा ‘अद्य मे महत् प्रयोजनमस्ति । तस्मिन्नवसिते वक्ष्यामि’ इति ॥", |
| | "अनिष्टभ्रमेणेष्टापादनं मतानुज्ञा । यथा केनचित् स्वस्य चोरत्वमभ्युपेत्य ‘त्वं चोरः पुरुषत्वात्’ इत्युक्ते ‘तर्हि तवापि चोरत्वप्रसङ्ग’ इति । न ह्यनेनात्मनश्चोरत्वं परिहृतम् । नाप्ययं प्रसङ्गः इष्टापत्तिरूपत्वात् इति ॥।", |
| | "अवश्योद्भाव्यतया प्राप्तनिग्रहस्थानानामनुद्भावनं पर्यनुयोज्योपेक्षणम् । न चेदमप्रतिभैव । स्फुरतोऽपि दोषस्याल्पत्वादिनोपेक्षणसम्भवात् । प्राश्निकैरुद्भाव्यमेतत् । वादिनैव वा ‘अस्य व्यामोहायेदं मयोक्तं नानेन ज्ञातम्’ इति ॥।", |
| | "अतन्निग्रहप्राप्तौ तन्निग्रहोद्भावनं निरनुयोज्यानुयोगः । तच्चतुर्विधम् । छलं जातिः हान्याद्याभासोऽप्राप्तकाले ग्रहणं चेति । छलजाती वक्ष्येते । हान्याद्याभासो द्विविधः । सर्वथा हान्याध्यभावप्राप्तौ तदुद्भावनम् अन्यप्राप्तावन्योद्भावनञ्चेति । तत्राद्योऽपि द्विविधः । सादृश्यादिना भ्रान्त्या, व्यामोहनाय वेति । द्वितीयो भ्रान्त्यैव । भ्रान्त्या यथा, अनेकविकल्पस्फुरणेन विकल्पयतोऽनिष्टविकल्पत्यागे प्रतिज्ञाहानिरित्यादि । द्वितीयो यथा । प्रतिज्ञाहान्यादौ प्रतिज्ञान्तरादि इत्यादि । तत्तदुद्भावनावसरमप्राप्य अतिक्रम्य वा तन्निग्रहस्थानोद्भावनं अप्राप्तकाले ग्रहणम् । अनुक्तोच्यमानोक्तग्राह्यभेदात् त्रिविधो ह्युद्भावनकालः । तत्रोच्यमानग्राह्यमुत्तरं उद्भावयतो निग्रहस्थानम् इत्यादि ॥।", |
| | "यत्किञ्चिच्छास्त्रसिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरुद्धाङ्गीकारेऽपसिद्धान्तः । प्रामाणिकतया अङ्कीकृतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः । सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसिद्धान्तभेदात् । सर्वशास्त्राविरुद्धोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः । यथा प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । स्वशास्त्रमात्रसिद्धोऽर्थः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः । यथा नैयायिकानामीश्वरप्रामाण्यम् । एकस्य सिद्धावानुपङ्गिको योऽर्थः सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा ईश्वरस्य र्स्वकर्तृत्वसिद्धौ सार्वज्ञ्यम् । शास्त्रान्तरे परीक्षितः स्वशास्त्रे चानिषिद्धोऽभ्युपगमसिद्धान्तः । यथा मनस इन्द्रियत्वम् । अपसिद्धान्तोऽप्यतश्चतुर्विधः । यथा इदानीमिव सर्वत्र दृष्टान्नाधिकमिष्यते इति प्रतितन्त्रसिद्धान्तमभ्युपगतवतो मीमांसकस्य सर्गप्रलयाभ्युपगम इत्यादि । न चायं प्रमाणविरोधः । उभयोस्तदाचार्याेक्तौ प्रामाण्यासम्मतेः । तत्रैव प्रमाणविरोधप्रसरात् । मूलप्रमाणे च सन्देहादिति ॥ २१ ॥।", |
| | "हेतोरुक्तरूपेषु पक्षव्यापकत्वादिषु कैश्चिद्युक्ताः केनचिद् रहिता हेत्वाभासाः । ते चासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितकालात्ययापदिष्ट प्रकरणसमसत्प्रतिपक्षाः । तत्र व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वप्रतीतिः सिद्धिः । तद्रहितोऽसिद्धः । स चतुर्विधः । व्याप्तपक्षतद्धर्मत्वैतत्प्रतीतिराहित्यभेदात् । तत्र व्याप्यत्वासिद्धो द्वेधा । स्वरूपतो वैयर्थ्येन चेति । तत्राद्यो यथा ‘यत् सत् तत् क्षणिकं यथा घटः’ इति । व्यर्थविशेषणासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यः सामान्यवत्वे सति कृतकत्वात्, इति । व्यर्थविशेष्यासिद्धो यथा ‘कृतकत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । आश्रयासिद्धो द्वेधा । धर्मिणः साध्यत्वस्य चाभावात् ॥", |
| | "तत्राद्यो यथा ‘प्रधानं नित्यं अकार्यत्वात्’ इति । आश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘प्रधानपुरुषौ नित्यौ अकार्यत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘परमाणवो नित्याः अकार्यत्वात्’ इति । पक्षधर्मत्वासिद्धः पञ्चविधः । तत्र स्वरूपासिद्धो यथा ‘शब्दोऽनित्यश्चाक्षुषत्वात्’ इति । व्यधिकरणासिद्धो यथा ‘घटस्य कृतकत्वात्’ इति । विशेषणासिद्धो यथा ‘चाक्षुषत्वे सति सामान्यवत्वात्’ इति । विशेष्यासिद्धो यथा ‘सामान्यवत्वे सति चाक्षुषत्वात्’ इति । भागासिद्धो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति ।", |
| | "सन्दिग्धव्याप्यत्वासिद्धो यथा ‘स श्यामो मित्रातनयत्वात्’ । सोपाधिकत्वेन व्याप्यत्वसन्देहात् । सन्दिग्धाश्रयासिद्धो यथा । ‘भविष्यद्देवदत्तपुत्रो ब्राह्मणः ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धाश्रयैकदेशासिद्धो यथा ‘देवदत्तः तद्भविष्यत्पुत्रश्च वेदयोग्यौ ब्राह्मणपुत्रत्वात्’ इति । सन्दिग्धासिद्धो यथा, धूमबाष्पाविवेके ‘पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेषणासिद्धो यथा ‘विमतो रागादियुक्तः सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वे सति पुरुषत्वात्’ इति । सन्दिग्धविशेष्यासिद्धो यथा ‘पुरुषत्वे सति सर्वदा तत्वज्ञानरहितत्वात्’ इति । सन्दिग्धभागासिद्धो यथा । एकत्र धूमनिश्चये अन्यत्रानिश्चये ‘पर्वतावग्निमन्तौ धूमवत्वात्’ इति । विशेषणवैयर्थ्यादौ सन्देहो न सम्भवति ॥।", |
| | "पक्षविपक्षयोरेव वर्तमानो हेतुर्विरुद्धः । स द्विविधः। विद्यमानसपक्षोऽविद्यमानसपक्षश्चेति । प्रत्येकं चतुर्विधः । तत्र सति पक्षे पक्षविपक्षव्यापको यथा ‘नित्यः शब्दः कार्यत्वात्’ इति । पक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सामान्यवत्वे सति अस्मदादिबाह्यैकेन्द्रियग्राह्यत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिविपक्षव्यापको यथा ‘पृथिवी नित्या कृतकत्वात्’ इति ॥", |
| | "असति सपक्षे प्रथमो यथा ‘शब्द आकाशविशेषगुणः प्रमेयत्वात्’ इति । द्वितीयो यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । तृतीयो यथा ‘प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्’ इति । चतुर्थो यथा ‘अपदात्मकत्वात्’ इति ॥", |
| | "पक्षत्रयवृत्तिरनैकान्तिकः । सोऽपि बहुविधः । तत्र पक्षत्रयव्यापको यथा । शब्दोऽनित्यः प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षव्यापकः सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘अयं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘नायं गौर्विषाणित्वात्’ इति । पक्षत्रयैकदेशवृत्तिर्यथा ‘पृथिवी नित्या प्रत्यक्षत्वात्’ इति । पक्षसपक्षैकदेशवृत्तिर्विपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः सपक्षव्यापको यथा ‘आत्ममनसी न द्रव्ये अमूर्तत्वात्’ इति। सपक्षविपक्षव्यापकः पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा आकाशात्ममनांसि द्रव्याणि क्षणिकविशेषगुणरहितत्वात्’ इति ॥", |
| | "साध्यासाधकः पक्ष एव वर्तमानो हेतुरनध्यवसितः । स चानेकप्रकारः । तत्राविद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘कार्यत्वात्’ इति । विद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘शब्दो नित्यः आकाशविशेषगुणत्वात्’ इति । तदेकदेशवृत्तिर्यथा ‘सर्वं द्रव्यमनित्यम् क्रियावत्वात्’ इति । विद्यमानविपक्षोऽविद्यमानसपक्षः पक्षव्यापको यथा ‘सर्वं कार्यमनित्यं उत्पत्तिमत्वात्’ इति । पक्षैकदेशवृत्तिर्यथा ‘सावयवत्वात् इति । एते चासिद्ध्यादयः उभयान्यतरसम्मत्या द्वेधा भवन्ति । विरुद्धादित्रयस्यासिद्धसाङ्कर्येऽपि उभयव्यवहारविषयत्वादविरोधः ॥", |
| | "प्रमाणबाधितविषयः कालात्ययापदिष्टः । सोऽप्यनेकविधः। तत्र प्रत्यक्षबाधितो यथा ‘अग्निरनुष्णः पदार्थत्वात्’ इति । प्रत्यक्षबाधितैकदेशो यथा ‘जलानलौशी पदार्थत्वात्’ इति । अनुमानबाधितो यथा ‘देवदत्तश्चक्षूरहितः पुरुषत्वात्’ इति । अनुमानबाधितैकदेशो यथा ‘देवदत्तश्चक्षुर्विषाणरहितः पुरुषत्वात्’ इति । आगमबाधितो यथा ‘सुरा ब्राह्मणेन पेया द्रवद्रव्यत्वात् इति । आगमबाधितैकदेशो यथा ‘सुरासोमौ ब्राह्मणेन पेयौ द्रवद्रव्यत्वात्’ इति ॥", |
| | "स्वपरपक्षसिद्धावपि त्रिरूपो हेतुः प्रकरणसमः । यथा ‘विमतं मिथ्या दृश्यत्वात्’ इति । सत्यत्वेऽप्यस्य प्रयोक्तुं शक्यत्वात् । उभयत्र त्रैरूप्यञ्च वादिप्रतिवादिनोराभिमानिकमिति नासम्भवः ।", |
| | "समबलतयाभिमतप्रमाणविरुद्धः सत्प्रतिपक्षः । तत्र प्रत्यक्षविरुद्धो यथा ‘विमतः शङ्खः शुक्लः शङ्खत्वात्’ इत्यत्र प्रत्यक्षात् ‘पीतः किं न स्यात्’ इति । अनुमानविरुद्धो यथा ‘आकाशं नित्यं अमूर्तद्रव्यत्वात्’ इत्यत्र ‘आकाशमनित्यंअस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यगुणाश्रयत्वात्’ इत्यनुमानात् अनित्यमपि किं न स्यात् इति । आगमविरुद्वो यथा ‘प्रधानं न स्वतन्त्रं जडत्वात्’ इत्यत्र कापिलागमात् ‘स्वतन्त्रमपि किं न स्यात्’ इति ।", |
| | "उदाहरणरूपेषु कैश्चिद्युक्ताः कैश्चिद्रहिता उदाहरणाभासाः । ते चानेकप्रकाराः । तत्र साधर्म्योदाहरणे तावत् साध्यवैकल्यम् यथा, मनोऽनित्यं मूर्तत्वात् ‘यन्मूर्तं तदनित्यं यथा परमाणुः’ इति । साधनवैकल्यम् यथा ‘यथा कर्म’ इति । उभयवैकल्यम् यथा ‘यथाकाशम्’ इति । आश्रयहीनम् यथा ‘यथा शशविषाणम्’ इति । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् घटवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यदनित्यं तन्मूर्तम् यथा घटः’ इति । वैधर्म्योदाहरणे साध्याव्यावृत्तिर्यथा ‘यदनित्यं न भवति तत् मूर्तं न भवति यथा कर्म इति । साधनाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा परमाणुः’ इति । उभयाव्यावृत्तिर्यथा ‘यथा घटः’ इति । आश्रयहीनत्वम् पूर्ववत् । अव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘मूर्तत्वात् आकाशवत्’ इति । विपरीतव्याप्त्यभिधानम् यथा ‘यन्मूर्तं न भवति तदनित्यं न भवति यथाकाशम्’ इति ।", |
| | "सन्दिग्धसाध्यो यथा ‘अयं महाराज्यं करिष्यति सोमवंशोद्भूतत्वात् राजपुत्रान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धसाधनो यथा ‘अयं न सर्वज्ञः रागादिमत्वात् रथ्यापुरुषवत्’ इति । सन्दिग्धोभयो यथा ‘देवदत्तपुत्रः स्वर्गं गमिष्यति धर्मवत्वात् देवतान्तरवत्’ इति । सन्दिग्धाश्रयो यथा ‘यथा भविष्यद्देवदत्तपुत्रः’ इति । एतेष्वेव प्रयोगेषु सन्दिग्धसाध्याव्यवृत्तो यथा ‘यथा अन्यो राजपुत्रः’ इति । सन्दिग्धसाधनाव्यावृत्तो यथा ‘यथा समस्तशास्त्राभिज्ञः’ इति । सन्दिग्धोभयाव्यावृत्तो यथा ‘यथा रथ्यापुरुपः’ इति । सन्दिग्धाश्रयः पूर्ववदिति ॥", |
| | "तर्कपराहतिश्च प्रागुदिताऽत्माश्रयाऽदिप्रसङ्गदुष्टत्वमिति ।", |
| | "अनुकूलतर्काभावे तु उपाधिव्यभिचारशङ्क्या व्याप्यत्वासिद्धिर्भवति। यद्यप्युदाहरणाभासादयो हेत्वाभासेष्वन्तर्भवन्ति । तथापि तद्रूपेणोद्भाव्यत्वात् पृथगुपादानमिति । एतेषु यानि निग्रहस्थानानि विरोधादिष्वेवान्तर्भूतानि । वक्तृदोषाणां प्रतिज्ञाहान्यादीनां कथमुपपत्तिवचनदोषेषु विरोधादिष्वन्तर्भावः ? इत्यत उक्तम् ॥ संवादानुक्तियुता इति ॥ शक्तिवैकल्यात् विप्रतिपन्नप्रमेयाङ्गीकारः संवादः । वक्तव्ये प्राप्ते शक्तिवैकल्यादेव तूष्णीम्भावोऽनुक्तिरिति ।", |
| | "यदुक्तम् त्रीण्येव प्रमाणानीति तदयुक्तम् । साक्षिणः पृथक् प्रमाणत्वात् इत्यतस्तस्य प्रत्यक्षान्तर्भावज्ञापनार्थम् सिंहावलोकनन्यायेन तद्विभागमाह", |
| | "प्रत्यक्षं सप्तविधम्", |
| | "साप्तविध्यं कथम् ? इत्यत आह", |
| | "साक्षिषडिन्द्रियभेदेन", |
| | "द्विविधमिन्द्रियम् । प्रमातृस्वरूपं तदतिरिक्तञ्चेति । तत्र स्वरूपेन्द्रियं साक्षीत्युच्यते । स च ज्ञानरूपः । तस्य आत्मस्वरूपत्वम् तद्धर्माश्च सुखादयो बहिश्चाकाशकालादयोऽपि विषयाः । सुखादीनां भिन्नेन्द्रियविषयत्वे कदाचिदपरोक्षभ्रमविषयतापातात् । अनन्यथात्वनियमः साक्षिण एव हि धर्मः न त्वन्यस्य । न च कालादेरसाक्षिविषयत्वम् । रूपाद्यभावेन चक्षुराद्यविषयत्वात् । मनसो बहिरस्वातन्त्र्याभ्युपगमात् । अननुसंहितव्याप्तीनामपि प्रतीतेः नानुमानात् तज्ज्ञानम् । जातिबधिराणामप्युपलम्भेन नागमविषयतापीति ॥", |
| | "अस्वरूपं च षड्विधम् । श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणमनोभेदात् । एवमिन्द्रियाणां भेदेन तत्सन्निकर्षाऽत्मकं प्रत्यक्षमपि सप्तविधमिति ॥ इदं च न सार्वत्रिकमिति । चतुर्विधं हि प्रत्यक्षम् ईशलक्ष्मीयोग्ययोगिप्रत्यक्षभेदेन । तत्रेशलक्ष्मीप्रत्यक्षं सर्वदा स्वरूपेन्द्रियसन्निकर्षात्मकमेव। स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषः । योगिनामयोगिनां च आ मुक्तेः उभयविधेन्द्रियसन्निकर्षात्मकम् । तत्र योगिनां देशकालवस्तुस्वभावव्यवहितार्थमपि विषयी करोति । अयोगिनां तु देशकालाद्यव्यवहितमेवेति । द्विविधं चैतत् । अतीतवर्तमानतावच्छिन्नविषयम् । यथा ‘सोऽयं घटः’ इति प्रत्यभिज्ञाहेतुसंस्कारसहकृतम् । वर्तमानविषयं च । यथा ‘अयं घटः’ इत्यादिज्ञानहेतुरिति ॥", |
| | "निर्विकल्पकसविकल्पकभेदात् द्विविधं प्रत्यक्षमित्येके । यत् द्रव्यगुणादिस्वरूपमात्रावगाहि न तु तद्विशेषणविशेष्यभावविषयं तत् निर्विकल्पकम् । यथा ‘यत्किञ्चिदेतत्’ इति, ज्ञानसाधनम्, प्राथमिकम् । सञ्ज्ञागुणकर्मजाति विशिष्टार्थविषयं सविकल्पकम् । यथा ‘शुक्लो ब्राह्मणो गच्छति’ इति । द्वितीयम् इति ।निर्विकल्पकमेव प्रत्यक्षमित्यपरे । तदेतदयुक्तम् । गुणाऽदेर्द्रव्येणात्यन्तभेदस्य निर्विशेषाभेदस्य चाभावेन विशिष्टबोधस्यैव साक्षिसिद्धत्वात् ॥", |
| | "एतेनैतदपि निरस्तम् । यदाहुः ‘सन्निकर्षः षोढा भिद्यते। संयोगः संयुक्तसमवायः संयुक्तसमवेतसमवायः समवायः समवेतसमवायः विशेषणविशेष्यभावश्चेति । तत्र चक्षुःस्पर्शनाभ्यां संयोगेन घटादिज्ञानं,मनसा आत्मज्ञानम् । तैः संयुक्तसमवायेन स्वविषयद्रव्यसमवेतगुणकर्मसामान्यज्ञानं, घ्राणेन गन्धज्ञानं, रसनेन रसज्ञानम् । तैरेव संयुक्तसमवेतसमवायेन गुणकर्मसामवेतसामान्यज्ञानम् । श्रोत्रेण समवायेन शब्दज्ञानम् । तेनैव समवेतसमवायेन शब्समवेतसामान्यज्ञानम् । तत्तदिन्द्रियैर्विशेषणविशेष्य भावेन स्वस्वविषयवृत्तिसमवायाभावज्ञानम् । सोप्युक्तपञ्चविधसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशेष्यभावत्वेन पञ्चविधः । यथा ‘घटे रूपसमवायः’ इत्यादि । यथा च ‘इह भूतले घटाभावः’ इत्यादि । न हि द्रव्यात् गुणाऽदिकमन्यत् । येन तत्सम्बन्धः समवायः सम्भवति ॥", |
| | "ननु स्मृतिः केवलप्रमाणम् न वा । आद्ये केवलस्य उत्पत्ति मतोऽनुप्रमाणजन्यत्वं वाच्यम् । अतःतद्धेतोः संस्कारस्य प्रामाण्यमङ्गीकार्यम् । ततश्च नोक्तविभागो युक्तः । नहि संस्कारो यादृच्छिकसंवादी । येनाप्रमाणमपि केवलस्य हेतुः स्यात् । चक्षुरादिसाम्यात् । नचासावुक्तेऽन्तर्भवति । अनिन्द्रियसन्निकर्षरूपत्वात् । अज्ञातस्यैव करणत्वात् नानुमानागमयोः । द्वितीये केवलप्रमाणलक्षणस्यातिव्याप्तिः । स्मृतेरपि यथार्थज्ञानत्वात् इत्यत आह", |
| | ".मानसप्रत्यक्षजा स्मृतिः", |
| | "भवत्येव स्मृतिः केवलप्रमाणम् । न तैवं संस्कारस्य पृथक्प्रामाण्याभ्युपगमप्रसङ्गः । स्मृतेर्मानसप्रत्यक्षत्वाभ्युपगमात् । द्विविधं हि ज्ञानं मनो जनयति । तत्तदिन्द्रियाधिष्ठातृत्वेन तत्तदिन्द्रियविषयम्, स्वातन्त्र्येण स्मरणं चेति । संस्कारस्तु प्रत्यासत्तिमात्रम् । न तावता प्रत्यक्षजन्यत्वाभावः प्रत्यभिज्ञावदेवेति । न च वाच्यमतीतेन मनसः सन्निकर्षायोगेन अप्रत्यक्षजन्यत्वं स्मृतेरिति । अतीतादिविषययोगिप्रमायामपि तथात्वापातादिति ॥", |
| | "स्मृतिः केवलप्रमाणमेव न भवति । गृहितमात्रग्राहित्वात् । अनुवादवत् । अतः कथं प्रत्यक्षप्रमाणजन्यत्वम्? इत्यत आह", |
| | "स्मृत्यनुवादयोर्नाप्रामाण्यम्", |
| | "न हि गृहीतग्राहित्वेन स्मृतेरनुवादस्य चाप्रामाण्यं वाच्यम् । तथा सति प्रत्यक्षाऽदिसिद्धार्थानुवादकस्य ‘अग्निर्हिमस्य भेषजम्’ इत्यादरप्रामाण्यप्रसङ्गात् । अतो गृहीतग्राहित्वेऽपि स्मृतेरनुवादवत् प्रामाण्यमेव यथार्थत्वात् इति ॥", |
| | "अन्यस्त्वाह । न स्मृतिः प्रमाणम् अयथार्थत्वात् । न हि यदा याहशोऽर्थः स्मर्यते तदाऽसौ तादृशः पूर्वावस्थाया निवृत्तत्वात् । अतो नानुप्रमाणजन्यत्वमिति । तत्राऽह", |
| | "यथार्थत्वानुभवात्", |
| | "स्मृतेर्नाप्रामाण्यमित्यनुवर्तते । न हि यदा यादृशोऽर्थो विषयीक्रियते तदा तस्य तादृशत्वे प्रमाणस्य याथार्थ्यम् । तथा सति अतीतादिविषयानुमानादेः अयथार्थत्वाऽपातात् । किं नाम ? यद्देशकालतया योऽर्थो यादृशो विषयी क्रियते तस्य तद्देशकालयोस्तादृशत्वे । तादृशं च याथार्थ्यं स्मृतेः साक्षिसिद्धम् । ‘तत्र तदा असौ तादृशः’ इति स्मृतिरर्थं विषयीकरोति । न हि ‘तत्र तदासौ न तादृशः’ इति ॥", |
| | "न च वाच्यम् न निवृत्तपूर्वावस्थतया स्मृतिरर्थं विषयीकर्तुमीष्टे । तथाननुभवात् । अननुभूतविषयत्वे अतिप्रसङ्गात् इति । अननुभूतैतावन्मात्रविषयत्वस्य साक्षिसिद्धत्वेनातिप्रसङ्गायोगात् । तदिदमुक्तम् । यथार्थत्वानुभवादिति ॥", |
| | "किञ्च स्मृतिप्रामाण्याङ्गीकारे अनिष्टाभावात् तदङ्गीकारो युक्त इत्याह–", |
| | "अहानेश्च", |
| | "हानिपदमनिष्टमात्रोपलक्षणम् । एतेनैव ‘तर्को न प्रमाणम् किं तु प्रमाणानामनुग्राहकः । प्रमाणविषयविपर्ययशङ्काव्यवच्छेदस्तदनुग्रहः’ इत्येतदपास्तम् । तस्याप्यनुमानवत् यथार्थत्वानुभवात् अहानेश्च इति ॥", |
| | "विरोधाऽदिषु सर्वनिग्रहस्थानानामन्तर्भाव इत्युक्तम् । तत्प्रदर्शनार्थं विरोधे तावद्विषयं विवेचयति ॥", |
| | "विरोधो मानस्ववाक्याभ्याम्", |
| | "द्विविध इति शेषः । विरोधो द्विविधः । समयबन्धाऽदिरूपवत्यां कथायां सर्वरूपसाधारणोऽसाधारणश्चेति । तत्र असाधारणः प्रमाणेन स्ववाक्येन चेति द्विविधो भवति ॥", |
| | "स्ववाक्यविरोधं विभज्य दर्शयति ॥", |
| | "स्ववाक्यविरोधोऽपसिद्धान्तजातिरूपेण", |
| | "द्विविध इति शेषः । पूर्वाचार्यवचनस्यापि स्वाभ्युपगतत्वेन स्ववाक्यत्वात् अपसिद्धान्तः स्ववाक्यविरोधो भवति ॥", |
| | "स्वव्याहतिर्जातिः । एकवाक्यविषयत्वान्नापसिद्धान्तेऽतिप्रसङ्गः ।", |
| | "त्रिविधा स्वव्याहतिः एकवाक्यगतपदादेरन्योन्यप्रतिस्पर्धित्वं स्वक्रियाविरोधः तद्वाक्यन्यायेन तद्वाक्यविरोधश्चेति । तत्र समयबन्धादौ प्रमाणविरोधादिप्रपञ्चः स्वयमेव उदाहर्तव्य इति सूचयन् आद्यजातिं तावत् प्रतिज्ञायामुदाहरति", |
| | "जातिः ‘न मेये मानापेक्षा ’", |
| | "इत्यादिका मानसापेक्षं हि ज्ञेयं मेयमुच्यते । तस्य प्रमाणनिरपेक्षत्वप्रतिज्ञा ‘मे माता वन्ध्या’ इतिवत् व्याहता भवति । आदिपदेन समयबन्धादावपि इयमेवोदाहर्तव्येति सूचयति ॥", |
| | "द्वितीयजातेरपीदमेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥ मेयं मानानपेक्षम् इति वदति । तज्ज्ञापनाय प्रमाणं चाभिधत्ते । अतो ‘मूकोऽहम्’ इतिवत् स्वक्रियाविरोध इति ।", |
| | "तृतीयाया अप्येतदेवोदाहरणम् ॥ जातिरिति ॥", |
| | "तत्कथम् इत्यत आह", |
| | "मेये मानापेक्षाऽस्तीति च", |
| | "तेनैव न्यायेन सिद्धत्वात् । यथा ‘मेये मानापेक्षा नास्ति’ इत्येतन्मेयं मानापेक्षम् । अन्यथा तत्प्रतिज्ञावैयर्थ्यात् । तन्न्यायेनैव ‘विप्रतिपन्नमेयेऽपि मानापेक्षाऽस्ति’ इत्यस्य अर्थस्य साधयितुं शक्यत्वात् इयमेव प्रतिज्ञा तृतीयजात्युदाहरणं भवति ॥", |
| | "न केवलमियं जातिः स्ववाक्यविरोधान्तर्गता । किं तु ? मानविरोधेऽपि इत्याह–", |
| | "मानविरोधश्च", |
| | "‘विप्रतिपन्नं प्रमेयं प्रमाणसापेक्षं प्रमेयत्वात् मेये मानापेक्षा नास्तीतित्येतन्मेयवत्’ इत्यनुमानसम्भवात् प्रमाणविरोधे चेयं जातिरन्तर्भवतीति पूर्वावृत्त्या योजनीयम् ।", |
| | "तदनेन प्रतिज्ञासन्न्यासविरोधापसिद्धान्तानां निरनुयोज्यानुयोगे च जातेः विरोध एवान्तर्भावः सूचितो भवति । सन्न्यासस्य मानसिद्धापलापरूपत्वात् । प्रतिज्ञाविरोधस्य एकवाक्यगतपदाऽदिविरोधरूपत्वात् । अपसिद्धान्तस्य साक्षात् ग्रहणात् । परोक्तजातेः प्रतिषेधाऽत्मकतृतीयजातिरूपत्वादिति ॥", |
| | "तत्रानभ्युपेतयुक्ताङ्केन प्रतिप्रमाणेन प्रतिपक्षतया प्रत्यवस्थानं प्रतिधर्मसमः । स च साधर्म्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमः वैधर्म्येण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमः । यथा ‘यदि महानससाधर्म्यात् हृदवैधर्म्यात् द्वाभ्यां वा धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि हृदसाधर्म्यात् द्रव्यत्वात् निरग्नि मान् किं न स्यात् अविशेषात्’ इति । तथा ‘महानसवैधर्म्यात् पर्वतत्वात् अनग्निकः किं न स्यात्’ । एवं द्वाभ्यां प्रत्यक्षाऽदिना च प्रत्यवस्थानोदाहरणं द्रष्टव्यम् ॥", |
| | "अत्र युक्ताङ्गहीनप्रतिप्रमाणोपलम्भो द्वारम् । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । व्याप्त्याद्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षायां ‘नेदं साधकं सत्प्रतिपक्षत्वात्’ इति जात्युत्तरमपि न दूषणं पदार्थत्वात् इति व्याघात इति ॥", |
| | "वादिसाधनसामर्थ्येन साध्यस्यैव व्याप्तिं विना कस्यचिदनिष्टधर्मस्य दृष्टान्तात् पक्षे उत्कर्षः उत्कर्षसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् महानसवत् अग्निमान् पर्वतः तर्हि तत एव स्थाल्यादिमानपि स्यात् । अविशेषादिति । अत्र साधनसाहचर्यदर्शनमुत्थानबीजम् । विशेषविरुद्धत्वमारोप्यम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं विशेषविरुद्धत्वात् नित्यत्वसाधककृतकत्वत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि नित्यत्वसाधककृतकत्ववत् तत एव हेतोर्धूमवत्वस्यामूर्तवृत्तित्वं च स्यादित्युत्कर्शसाम्यात् व्याघात इति॥", |
| | "दृष्टान्ते साध्यस्य साधनस्य वा व्यापकं किञ्ञ्चित् धर्ममारोप्य व्यापकनिवृत्त्य व्याप्यनिवृत्तिरिति पक्षे तन्निवृत्त्या साध्यसाधनयोरन्यतारपकर्षः अपकर्षसमः । यथा महानसे अग्निमत्वस्य धूमवत्वस्य वा व्यापकं स्थाल्यादिमत्वं पर्वतात् व्यावर्तमानं तत् व्यावर्तयति । व्यापकाभिमतव्यावृत्त्युपलम्भः अत्रोऽत्थानबीजम् । साध्यापकर्षे बाधितविषयत्वं सत्प्रतिपक्षत्वं वा आरोप्यम् । साधनापकर्षे असिद्धत्वम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गत्यागः । तदनभ्युपगमे ‘नेदं साधकं बाधितत्वात् अनुष्णत्वसाधकपदार्थत्ववत्’ इति प्रतिषेधहेतावपि पदार्थत्वे असाधकत्वं बाधितविषयत्वं वा सर्वधर्मिनिष्ठत्वेन व्याप्तं दृष्टमिति धूमवत्वात् व्यावर्तमानमसाधकत्वाऽद्यपि व्यावर्तयतीत्यपकर्षसाम्यात् व्याहतिरिति ॥", |
| | "पक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः सपक्षस्यापि साध्यत्वाऽपादनं वर्ण्यसमः । असिद्धार्थत्वं आरब्धसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वं व्याप्तिग्राहकप्रमाणशून्यत्वं संशयसमानविषयत्वं स्वरूपविशेषश्चेत्येतानि हेतोः पक्षमाणविवक्षितरूपाणि । तत्रासिद्धार्थं पर्वत इव महानसे धूमवत्वं वर्तते न वा । आद्ये महानसोऽपि साध्यवत्वेन साध्यः स्यात् । अन्यथा साध्यवैकल्यापातात् । द्वितीये तद्रूपहेतुमत्या साध्यः स्यात् । अन्यथा साधनवैकल्यापातात् । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् ।", |
| | "अत्र पक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वादर्शनमुत्थानहेतुः साध्यसाधनवैकल्ये आरोप्ये ॥ ‘नायं दृष्टान्तः साधनाङ्गं साध्याऽदिविकलत्वात् सम्मतवत्’ इत्यत्रापि यथोक्तसाध्यत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । पक्षवृत्तिहेतुरूपाणां सपक्षवर्तिन्यपि सञ्चरणात् अविषयवृत्तित्वञ्च । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं वा सपक्षवृत्तिहेतोरयुक्तानामेवा सिद्धार्थत्वाऽदीनामङ्गीकारादिति ॥", |
| | "सपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्वतदभावयोः पक्षस्य असाध्यत्वापादनमवर्ण्यसमः । सिद्धार्थत्वं प्रवृत्तसाध्यज्ञापनशक्तिमत्वाभावः व्याप्तिग्राहकप्रमाणवत्वं निश्चयसमानविषयत्वं रूपभेदश्च इत्येतानि हेतोः सपक्षमात्रविवक्षितरूपाणि। तत्र सिद्धार्थं धूमवत्त्वं महानस इव पर्वते वर्तते न वा ? आद्ये साध्यस्य सिद्धत्वात् पक्षे न साध्यः स्यात् । द्वितीयेऽपि हेतोः स्वरूपासिद्धत्वेन असाध्यः स्यात् इति । एवं रूपान्तरेष्वपि द्रष्टव्यम् । अत्र सपक्षमात्रविवक्षितरूपवद्धेतुमत्तया पक्षस्य असिद्धिः कारणम् । स्वरूपासिद्ध्यादि आरोप्यम् । वर्ण्यसमवदेव दुष्टत्वमूलमिति ॥", |
| | "साधनस्य धर्मान्तरेण धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण वा व्यभिचारेण साधनस्यापि साध्यव्यभिचाराऽपादनं विकल्पसमः । तत्र साधनस्य धर्मान्तरेण व्यभिचारस्त्रिविधः । पक्षदृष्टान्तयोः पक्षयोर्दृष्टान्तयोश्चेति । तत्र आद्यो यथा ‘महानसे धूमवत्वमपर्वतत्वेन सह वर्तमानमपि यथा पक्षे तेन सह न वर्तते, तथा अत्र अग्निमत्वेन सह वर्तमानमपि पक्षे न तथा वर्तेत’ इति । द्वितीयो यथा ‘यथा गिरिशिखरयोरुच्चनीचत्वाभ्यां धूमवत्त्वस्य व्यभिचारस्तथाऽग्निमत्वेनापि स्यात्’ इति । तृतीयो यथा ‘यथा महानसयोरल्पत्वमहत्वाभ्यां धूमवत्वं व्यभिचरति तथा अग्निमत्वेनापि व्यभिचरेत्’ इति । धर्मान्तरस्य साध्यधर्मेण यथा ‘यथा द्रव्यत्वमग्निमत्वव्यभिचारि तथा धूमवत्वमपि स्यात्’ इति । धर्मान्तरस्य धर्मान्तरेण यथा ‘यथा रूपं रसव्यभिचारि तथा धूमवत्वमग्निमत्वव्यभिचारि स्यादिति ॥", |
| | "अत्र क्वचिद्व्यभिचारदर्शनमुत्थानहेतुः । अनैकान्तिकत्वमारोप्यम्। अन्यत्र व्यभिचारेणत्र व्यभिचाराऽपादने व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनङ्गीकारे ‘नेदं साधकं अनैकान्तिकत्वात्’ इति प्रतिषेधहेतोरपि तथात्वाऽपातेन व्याघातः’ इति ॥।", |
| | "पक्षाऽदीनां सिद्धानामपि तेनैव हेतुना साध्यत्वापादनं साध्यसमः । यथा पर्वताऽदिसिद्ध्यर्थमपि धूमवत्वमेव प्रयोक्तव्यम् । अन्यथा क्रोडीकृतधर्म्यादिविषयस्य लिङ्गस्य तत्राप्रयोजकत्वे साध्येऽपि तथात्वाऽपातात् । दृष्टान्तेऽपि साध्यसिद्ध्यर्थमयमेव हेतुः प्रयोक्तव्यः । अन्यथा पक्षेऽपि अप्रयोजकत्वाऽपातात् । अन्यत्समानम् । तथा च तत्सिद्ध्यर्थ यावत् न प्रयुज्यते तावदाश्रयाऽसिद्ध्यादीति ॥", |
| | "अत्र विशिष्टसाधकत्वाभिमान उत्थानहेतुः । आश्रयासिद्ध्यादिकमारोप्यम् । एवं प्रतिषेधहेतावपि वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च तेनैव हेतुना सिद्धेरयुक्तत्वात् । सिद्धत्वमात्रेण साध्यसिद्धिदर्शनादिति ॥", |
| | "साधनस्य साध्याप्राप्तिपक्षनिरासेन प्राप्तिपक्षमवशेष्य तद्दूषणं प्राप्तिसमः । यथा धूमवत्वज्ञानम् अग्निमत्वज्ञानं प्राप्य उत्पादयति अप्राप्य वा । द्वितीयेऽतिप्रसङ्गात् प्राप्येति वक्तव्यम् । सता च प्राप्तिः इति प्रागेव अग्निमत्वज्ञानसद्भावात् व्यर्थमनुमानम् । एवं धूमवत्वज्ञानं अग्निमत्वं ज्ञापयति प्राप्य अप्राप्य वा । द्वितीये अतिप्रसङ्गात् प्राप्य इति वक्तव्यम् । लिङ्गज्ञानस्य साध्यप्राप्तिश्च विषयविषयिभाव एव सम्भवति । तथा च धूमवत्वज्ञाने वह्निमत्वस्यापि स्फुरणात् व्यर्थमनुमानमिति ॥", |
| | "प्राप्तिपक्षनिरासेन अप्राप्तिपक्षं शेषयित्वा तद्दूषणम् अप्राप्तिसमः । यथा, पूर्ववत् प्राप्तिपक्षस्य दुष्टत्वात् अप्राप्य इति वक्तव्यम् । न च तत् युक्तम् । न हि अप्राप्याग्निः काष्ठं दहति । न हि अप्राप्य दीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति । प्राप्तावुक्तानुपपत्तिदर्शनमुत्थानहेतुः । साध्यप्राप्तेर्हेतुविशेषणत्वेन विशेषणासिद्धिरारोप्या । पुर्ववत् दुष्टत्वमूलम् इति ॥।", |
| | "सिद्धस्यापि पक्षाऽदेः उत्पादकज्ञापकानवस्थाप्रसञ्जनं प्रसङ्गसमः। यथा, पर्वतस्यापि किम् उत्पादकम् ? तस्यापि अन्यत् इत्यनवस्था । कस्यचित् कारणाभावे अन्यस्यापि तत्प्रसङ्गात् । तथा प्रमाणेऽपि किं प्रमाणं ? तत्राप्यन्यदित्यनवस्था । कस्यचित् प्रमाणान्तरं विना सिद्धावन्यत्रापि तथात्वापातादिति । कारणाऽदिनियमाभिमानोऽत्र द्वारम् । तर्कपराहतिरारोप्या । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः अवस्थाङ्गमूलक्षतेरभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।", |
| | "हेतुं विना प्रतिदृष्टान्तमात्रेण बाधप्रतिरोधोद्भावनं प्रतिदृष्टान्तसमः । यथा ‘हृदवत् पर्वतो निरग्निरेव’ इति । ‘निरग्निकोऽपि किं न स्यात्’ इति वा । अत्र हेतुरनङ्गं साध्यातिदेशे इत्यभिमान उत्थानबीजम् । बाधादि आरोप्यम् । बाधाद्यङ्गस्य अधिकबलादेरनभ्युपगमात् युक्ताङ्गत्यागः । साधनस्य हेतुसाहित्यात् । अत्र तदनुपन्यासात्। तस्यानङ्गत्वे ‘प्रतिदृष्टान्तो न दूषकः रासभादिवत इति व्याघात् इति ॥।", |
| | "पक्षादीनां प्रागुत्पत्तेः हेतुवृत्त्यभावेन असिद्ध्याद्युद्भावनं अनुत्पत्तिसमः । यथा पर्वतस्योत्पत्तेः प्रागपि पक्षत्वात् अनुत्पन्ने तस्मिन् अवृत्तेः धूमवत्वस्याश्रयभागासिद्धिः इत्यादि । अत्र अनुत्पन्नस्य स्वकार्यसामर्थ्याभिमानमुत्थानकारणम् । असिद्ध्यादि आरोप्यम् । जात्युत्तरेऽप्येवं वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । अनुत्पन्नस्य अङ्गत्वादेरयुक्ताङ्गाधिक्यादीति चेति ॥।", |
| | "सत्यपि निर्णयकारणे संशयकारणमात्रेण संशयापादनं संशयसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् अग्निमत्वनिश्चयः तर्हि हृदमहानससाधर्म्येण द्रव्यत्वेन तत्संशयः स्यात्’ इत्यादि । अत्र समानधर्माऽदिमात्रदर्शनं तद्रहितस्यैव निश्चायकत्वाभिमानश्चोत्थानहेतुः । सत्प्रतिपक्षत्वमारोप्यम् । निर्णयकारणराहित्यस्य संशयाङ्गत्वानङ्गीकारात् संशयकारणराहित्यस्य अयुक्तस्यैव निर्णयाङ्गताङ्गीकारात् युक्ताङ्गहानिः अयुक्ताङ्गाधिक्यञ्च । अन्यथा दूषकादूषकसाधर्म्याऽदिना जातावपि संशय प्रसङ्गसाम्यात् व्याघात इति ॥ १३ ॥", |
| | "अङ्गीकृतानधिकबलत्वेन बाधचोदनं प्रकरणसमः । यथा ‘द्रव्यत्वात् पर्वतो नाग्निमानेव’ इति । अत्र प्रतिप्रमाणोपलम्भ उत्थानहेतुः । बाध आरोप्यः । बाधकत्वेऽधिकबलवत्वस्याङ्गत्वात् युक्ताङ्गहानिः । बाधकस्य अधिकबलत्वानङ्गीकारे स्थापनयैव जातेर्बाधकप्राप्तेर्व्याहतिरिति ॥", |
| | "हेतोः साध्यात् पूर्वापरसहभावनिरासेन ओतुत्वचोदनं ओतुसमः । यथा दूमवत्त्वज्ञानं अग्निमत्वज्ञानात् अग्निमत्वाद्वा किं पूर्वभावि उतानन्तरभावि उत तेन समभावीति । नाद्यः । साध्याभावे तस्य साधनत्वायोगात् । न द्वितीयः । साधनाभावे साध्यस्य तत्वायोगात् । न तृतीयः । अविशेषेण साध्यसाधनभावायोगादिति ।", |
| | "प्रतितर्कप्रतीतिरत्रोत्थानहेतुः । अन्योन्याश्रयत्वमारोप्यम् । प्रतिषेधोऽपि किं प्रतिषेध्यात् पूर्वभावीत्यादेर्वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । कृतौ पूर्वभाविना पश्चाद्भाविजन्मदर्शनात् ज्ञप्तौ च यथायथं पूर्वभाव्यादिना पश्चाद्भाव्यादेः सिद्धिदर्शनात् तर्कस्य व्याप्तिहीनत्वेन युक्ताङ्गहानिश्च । साधनत्वादिव्यवहारस्य बुद्धिस्थसाध्यादिनोपपत्तेः । व्यापारेष्वन्यानपेक्षणात् । सहभावे च सिद्ध्यसिद्धिभ्यां विशेषादिति ॥", |
| | "व्याप्तिं विना वाद्युक्तिमात्रेण ‘अर्थात् इदमाक्षिप्तं’ इत्यभिमानेनोक्तविपरीतारोपणेन दोषाभिधानं अर्थापत्तिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते अर्थात् आपद्यते ‘अन्यत् अनग्निमत्’ इति । तथा च साध्यविकलो दृष्टान्त इत्यादि । अत्र ‘विशेषविधिः शेषनिषेधं गमयति’ इत्यभिमानमुत्थानबीजम् । साध्यविकलत्वादि आरोप्यम् । व्याप्तेरभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनपेक्षणे ‘धूमवत्वं असाधकं’ इत्युक्ते अर्यादापद्यते ‘अन्यत् सर्वं साधकं ‘इति ॥ तथा च दृष्टान्ताभावः इति व्याघातः इति ॥", |
| | "साधनप्रतिबन्द्या तदितरधर्मेण तद्वतां सर्वपदार्थानामविशेषापादनं अविशेषसमः । यथा ‘यदि धूमवत्वात् पर्वतमहानसयोरग्निमत्वाविशेषः तर्हि द्रव्यत्वात् सर्वद्रव्याणां अनित्यत्वं स्यादिति । कस्यचिद्धर्मस्य किञ्चिदसाधकत्व दर्शनमत्रोऽत्थानबीजम् । तर्कपराहतिः आरोप्या । व्याप्तिहीनत्वात् तर्कस्य युक्ताङ्गहानिरिति । अन्यथा ‘अस्य सम्प्रतिपन्नस्य च तर्कपराहतत्वेन असाधकत्वविशेष पदार्थत्वात् सर्वस्यानित्यत्वाविशेषः स्यात्’ इति व्याघात इति । अस्य सम्प्रतिपन्नस्य चेति । ‘धूमवत्त्वं असाधकं तर्कपराहतत्वात् तर्कपराहतहेत्वन्तरवत्’इत्यत्र त्वया पक्षीकृतधूमवत्त्वस्य दृष्टान्तीकृतस्य चेत्यर्थः ॥", |
| | "मत्पक्षेऽपि किञ्चित् प्रमाणं भविष्यतीति तदुपपादनमुपपत्तिसमः । यथा ‘धूमवत्वं यथा अस्ति त्वत्पक्षे प्रमाणं तथा मत्पक्षेऽपि किञ्चित् भविष्यति पक्षत्वात्’ इति । अत्र सामान्यतः प्रमाणसम्भावना उत्थानबीजम् । बाधः प्रतिरोधो वा आरोप्यः । तस्यापि कश्चित् दोषो भविष्यतीति वक्तुं शक्यत्वात् व्याघातः । युक्ताङ्गहानिश्च । उपन्यस्तं प्रत्यनुप न्यस्तस्य प्राबल्यादेर्वाधाद्यङ्गस्य अनिश्चयादिति ॥।", |
| | "वादिवाक्यस्यावधारणे तात्पर्यमारोप्य विकल्प्य तद्दूषणमुपलब्धिसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते किं पर्वत एवाग्निमान् ? उत पर्वतोऽग्निमानेव ? इति । नाद्यः महानसादेरप्यग्निमत्वात् । न द्वितीयः कदाचिदनग्निमत्वात् इत्यादि । वाक्यस्यावधारणे तात्पर्यावश्यम्भावाभिमानोऽत्रोत्थान बीजम् । बाधादि आरोप्यम् । जात्युतरेऽपि अस्य साम्यात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वं च अन्ययोगायोगव्यवच्छेदस्य अयोगादिति ॥", |
| | "उपलब्ध्यादिविषयिधर्माणां स्वात्मनि तदतद्रूपतां विकल्प्य उभयथा व्याघातापादनं अनुपलब्धिसमः । यथा ‘उपलब्धत्वात् इदमस्ति’ इत्युक्ते सा उपलब्धिः स्वस्मिन्न् उपलब्धितया वर्तते न वा । आद्ये नोपलब्धिः प्रमेयवदुपलब्धत्वात् । द्वितीयेऽपि तथा। प्रमेयवत् स्वात्मनि तथा अवृत्तेः । तथा च उपलब्धित्वमसिद्धम् । एवं ‘अनुपलब्धेरिदं नास्ति’ इत्युक्ते अनुपलब्धिः स्वात्मनि अनुपलब्धितया वर्तते चेत् प्रमेयवदसती स्यात् । अवृत्तौ घटवत् नानुषलब्धिः । अनुपलब्ध्यभावात् अनुपलब्धत्वासिद्धिः इत्यादि ।", |
| | "अत्र विषयिधर्मोपलब्धिः उत्थानबीजम् । असिद्ध्याद्यारोप्यम् । ‘असिद्धो हेतुः’ इत्यत्रापि असिद्धिः स्वात्मनि तथा वर्तते न वेति जातावपि सम्भवात् व्याघातः । अयुक्ताङ्गाधिकत्वञ्च स्वात्मनि तथावृत्तेरयुक्तत्वात् । विषये तथावृत्त्या तत्त्वोपपत्तेरिति ॥।", |
| | "विवक्षितस्य कस्यचिद्धर्मस्य तदतद्रूपतां विकल्प्य तद्दूषणेन धर्मिणः तद्विशिष्टत्वभङ्गो नित्यसमः । यथा ‘शब्दोऽनित्यः’ इत्युक्ते अनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा । आद्ये शब्दोऽपि तथा स्यात् । न हि धर्मो नित्यः धर्मी चानित्य इति युज्यते । द्वितीये यदाऽनित्यत्वाभावस्तदा शब्दस्य नित्यत्वमिति सारूप्येण । वैरूप्येण तु अनित्यत्वं शब्दात् भिन्नमभिन्नं वा । आद्ये अनवस्था । द्वितीये अन्यतरमात्रावशेषे आश्रयासिद्ध्यादीत्यादि । अत्र धर्मधर्मिभावदर्शनमुत्थानबीजम् । तर्कपराहतिरारोप्या । धर्मधर्मिभावनिरासे जातेरप्यनुत्थानात् व्याघातः। तर्कस्य व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिश्चेति ॥।", |
| | "वादिसाधनप्रतिबन्द्या धर्मान्तरेण सर्वस्य साध्यधर्मवत्वापादनमनित्यसमः । यथा ‘यदि महानसवत् धूमवत्वात् पर्वतोऽग्निमान् तर्हि सत्त्वात् सर्वमप्यग्निमत् स्यात्’ इति । अविशेषसमायां तु सर्वाविशेषमात्रापादनम् । अन्यत् समानम् । व्याप्त्यभावात् युक्ताङ्गहानिः । तदनभ्युपगमे ‘यदि असाधक प्रतिबन्दीग्रस्तत्वात् इदमसाधकं तर्हि पदार्थत्वात् सर्वमप्यसाधकं स्यात्’ इति व्याघात इति ॥।", |
| | "पक्षादीनामन्यतमस्यासिद्धिमुद्भाव्य तत्साधकत्वेन स्वयमेवोत्प्रेक्षितस्य दूषणेन वादि साधनभङ्गः कार्यसमः । यथा ‘पर्वतोऽग्निमान्’ इत्युक्ते पर्वतस्यैवाभावादाश्रयासिद्धिः । ‘यदिप्रतीयमानत्वात् सोऽस्तीत्युच्यते तन्न । शुक्तिरजतादौ व्यभिचारात्’ इति । व्यवहर्तव्यद्वैतमत्र हेतुरुत्थानस्य । तत्तदङ्गसिद्धिरारोप्या । अस्य जातावपि तुल्यत्वेन व्याघातः । उत्प्रेक्षितदोषेण वाद्युक्तस्यासाधकत्वोक्तेरविषयवृत्तित्वञ्चेति ॥।", |
| | "अथ निरनुयोज्यानुयोगांशस्य छलस्यापि उक्तान्तर्भावमाह", |
| | "छलमसङ्गतम्", |
| | "परोक्तस्यार्थान्तरं परिकल्प्य तद्दूषणेन परोक्तभङ्गः छलम् परोक्तदूषणस्यैव सङ्गतत्वेन अनुक्तारोपितदूषणं छलं असङ्गते अन्तर्भवति ॥", |
| | "न केवलमसङ्गतं छलम् । किं तर्हि ? इत्यत आह", |
| | "अन्यच्च", |
| | "असङ्गतात् अन्योऽर्थदोषो विरोधः । तत्राप्यन्तर्भवति छलम् । छलवाक्यस्याप्यर्थान्तरं परिकल्प्य दूषणसम्भवेन स्ववचनन्यायेन स्वविरोधेऽन्तर्भावात् ॥", |
| | "निरनुयोज्यानुयोगांशान्तरद्वयस्याप्यसङ्गतान्तर्भावमाह", |
| | "अन्यच्च", |
| | "उक्तात् छलात् जातेश्च अन्यत् निरनुयोज्यानुयोगांशद्वयं च असङ्गतमेव । प्राप्तस्यैव हान्यादेरुद्भावनप्राप्तकाल एव ग्रहणस्य च सङ्गतत्वात् ॥", |
| | "निग्रहस्थानान्तरस्यापि असङ्गतान्तर्भावमाह–", |
| | "अन्यच्च", |
| | "उक्तात् अन्यदपि निग्रहस्थानं किञ्चित् असङ्गतमेव । यथा अर्थान्तरम् । प्रकृतोपयोगिन एव सङ्गतत्वात् । परबोधनार्थं प्रवृत्तस्य तदङ्गपदप्रयोग एव सङ्गत इति निरर्थकमपि । अत एव अविज्ञातार्थम् । अपार्थकस्य स्फुटस्तत्रान्तर्भावः । अप्राप्तकाले तु अवयवविपर्यासादि निग्रहस्थानमेव न भवति अर्थाविरोधात् छन्दोभङ्गादिवत् । अर्थविरोधि असङ्गतमेव । विवक्षित क्रमानुल्लङ्घने हि सङ्गतिः स्यात् । अन्यथाृनुभाषणं च, उक्तानुवादस्यैव सङ्गतत्वात् । प्राप्तदूषणोद्भावनस्यैव सङ्गतत्वेन पर्यनुयोज्योपेक्षणमपि असङ्गतिरेवेति ।", |
| | "एवमुक्तादन्यच्च यथासम्भवमुक्तान्तर्भूतं द्रष्टव्यमित्याह–", |
| | "अन्यच्च", |
| | "यथा, प्रतिज्ञाहानिः संवादे, अन्तर्भवति । अर्थतो हानिरसङ्गतावपि । प्रकृतदोषपरिहारे प्राप्ते ‘अन्यथास्तु’ इत्यस्य सङ्गत्यदर्शनात् । एवं प्रतिज्ञान्तरमपि । अविशिष्टदूषणाभ्युपगमात् तद्दूषणपरिहारस्यैव सङ्गतत्वात् । हेत्वन्तरमप्यनेनोक्तम् । न्यूनाधिके न्यूनाधिकयोः । तत्र अवयवन्यूनमदूषणमित्युक्तम् । एवं आभासानुद्धारः अनुकूलतर्कानुक्तिश्च । अबुभुत्सितोक्तेरेव दोषत्वात् । तर्कस्य पृथक्प्रमाणत्वात् । पुनरुक्तमधिकम् । उक्तात् अन्यत् अननुभाषणं न्यूनम्। तृष्णीम्भावः अनुक्तौ । अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपश्च, यत्किञ्चिदुक्तावपि प्रकृतोपयोगाभिमानाद्यभावात् । न ह्यनुक्तिरप्यात्यन्तिकी । किं तु ? प्रकृतोप्योगाभिमानादिना अनुक्तिः । मतानुज्ञायाः प्रयोजनविशेषात् पृथगन्तर्भावं वक्ष्यतीति । नचानेन त्रिविधो विरोधः इत्यादेर्गतार्थता । अनुमानविरोधविवेकाभावे हेत्वाभासादेरुक्तान्तर्र्भावाप्रतीतेरिति ॥", |
| | "छलं त्रिविधम् वाक्छलं सामान्यछलं उपचारछलञ्चेति ॥ तत्र मुख्यार्थविवक्षया प्रत्युक्तस्य मुख्यार्थान्तरकल्पनया तद्दूषणं वाक्छलम् । अभिप्रायान्तरकल्पनया तद्दूषणं सामान्यछलम् । अमुख्यार्थाभिप्रायेण प्रयुक्तस्य मुख्यार्थकल्पनया दूषणमुपचारछलम् । तत्र वाक्छलादेरसङ्गताद्यन्तर्भावस्फुरणायोपलक्षणतया वाक्छलमुदाहरति । गृष्टिविवक्षया ‘गां आनय’ इत्युक्ते पृथिवीविवक्षया ‘गवानयनमशक्यम्’ इतिवत् । एकवारप्रसूता गौः गृष्टिः । द्वितीयं यथा ‘अनूचानोऽयं ब्राह्मणः’ इत्युक्ते ‘युक्त मेव हि ब्राह्मणे अनूचानत्वम्’ इति सम्भावनाभिप्रायेण परेणाभिहिते ब्राह्मणत्वस्य हेतुत्वाभिप्रायकल्पनया ‘नैवं, व्रात्ये व्यभिचारात्’ इति प्रतिषेधः । तृतीयं यथा ‘सिंहो देवदत्तः’ इत्युक्ते ‘नैवं, सटाद्यभावात्’ इति । अत्र ‘गवानयनं न विधेयं अशक्यत्वात्’ इत्यादिछलवाक्ये ‘गवा नयनम्’ इत्येतदयुक्तंअनन्वितत्वात्’ इत्यादेश्छलस्य प्रवृत्तेर्विरोधत्वं ज्ञातव्यम् ॥", |
| | "रूढ्या योगेन वा प्रतिपाद्योऽर्थो मुख्यः । बहुलप्रयोगमात्रसिद्धा रूढिः प्रवृत्तिनिमित्तविवक्षया प्रवृत्तिर्योगः । अखण्डवृत्तिः रूढिः अवयववृत्तिर्योग इति वा । गौण्या लक्षणया वा वृत्त्या शब्दबोध्योऽर्थः अमुख्यः । मुख्यार्थगुणयुक्तार्थान्तरवृत्तिर्गौणी। मुख्यार्थसम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्लक्षणेति ।" |
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| "text": "हेत्वाभासादेः क्वान्तर्भावः ? इत्यतस्तं वक्तुमनुमानविरोधविभागमाह–\nत्रिविधो विरोधः\nअनुमानस्य साधारणोऽसाधारणश्च सम्भावित इति शेषः ।\nकथं त्रैविध्यम् ? इत्यत आह\nप्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तभेदेन\nअत्र प्रतिज्ञापदेन पक्षोऽप्युपलक्ष्यते । हेतुपदेन लिङ्गञ्च । तथा दृष्टान्तपदेनोदाहरणम् । विरोधस्योभयदूषणत्वात् । प्रतिज्ञादिभेदेन साधनांशानां त्रैविध्यात् तद्विरोधस्त्रिविधः । विरोधपदं संयोज्य वा योज्यम् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधः साधारणः। अन्यावसाधारणौ ॥\nप्रतिज्ञाविरोधं लक्षयति ॥\nप्रमाणविरुद्धार्थप्रतिज्ञाविरोधः\nअत्र प्रमाणविरोध एव हेत्वाभासानामन्तर्भावात् तस्य ग्रहणं, न स्ववाक्यविरोधस्य ।\nहेतुविरोधं दर्शयति\nहेतुस्वरूपासिध्दिव्याप्तिश्चेति हेतुविरोधः\nअत्र प्रथमहेतुशब्देन लिङ्गमुच्यते । यत् यत्र वादिना विवक्षितं तत्र तस्याप्रमितिः स्वरूपासिद्धिः ॥\nदृष्टान्तविरोधं दर्शयति\nसाध्यस्य साधनस्य वा अननुगमो दृष्टान्तविरोधः\nउभयोर्वेति ग्राह्यम् । अननुगमो अनुगत्यप्रमितिः । साधर्म्य दृष्टान्तस्यायं विरोधः । साध्यस्य साधनस्य उभयोर्वा व्यावृत्त्यप्रमितिर्वैधर्म्यदृष्टान्तविरोधोऽपि द्रष्टव्यः । अनेन पक्षसाधनदृष्टान्तलक्षणराहित्यं प्रतिज्ञाहेत्वादिविरोधलक्षणं सूचितं भवति । तल्लक्षणविभागादि सङ्ग्रहेणैव ज्ञापयितुमियमुक्तिः ॥\nबाध एव प्रमाणविरोध इति मन्वान आह - सप्रतिसाधनोऽप्यन्योऽनुमानविरोधोऽस्ति । अतः कथमेवं त्रैविध्यं? इति । तत्राह\nप्रतिज्ञायाः समबलविरोध एव सप्रतिसाधनः\nद्विविधो हि प्रतिज्ञायाः प्रमाणविरोधः प्रबलप्रमाणेन समबलेन चेति । आद्योबाधकत्वेन । द्वितीयः प्रतिबन्धकत्वेन । तत्र योऽयं प्रतिज्ञायाः समबलेन प्रमाणेन विरोधः स सप्रतिसाधनसञ्ज्ञो भवति । अतो युक्तमुक्तमिति ॥\nएवकारेणास्य हेतुविरोधत्वं व्यवच्छिनत्ति । प्रतिज्ञामात्र एवास्य स्फुरणात् । व्याप्त्यादिहेत्वङ्गस्यानेनाखण्डितत्वाच्च । एतेन प्रबलप्रमाणविरोधस्यापि हेतुविरोधत्वं प्रत्युक्तम् ॥\nउपाधिविरोधोऽप्यन्योऽस्तीत्याह–\nस एवोपाधिदोषोऽपि\nनोपाधिः स्वयमेव दोषः । किं तु दोषोन्नायक एव । स चोपाधिना उन्नेयो दोषः उपाधिदोषः प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एवान्तर्भवतीति नोक्तविरोधः । प्रकृतसाध्यव्यापकः प्रकृतसाधनाव्यापकः उपाधिः । स हि पक्षात् व्यावर्तमानः साध्यं व्यावर्तयन् प्रतिपक्षोन्नायको भवति ॥ उपाध्यभावस्य साध्याभावे लिङ्गत्वात् । उपाधेर्हि पक्षात् व्यावृत्तिः स्वव्यावृत्त्या साध्यव्यावर्तने शक्तिश्चापेक्षिता । तत्र साध्यव्यापक इत्येवोक्ते साधनव्यापकस्य साधनस्येव पक्षे वर्तमानत्वात् साध्यव्यापकोऽप्युपाधिर्न पक्षात् साध्यं व्यावर्तयेदिति साधनाव्यापकत्वं ग्राह्यम् ।तावत्येवोच्यमाने साध्याव्यापकस्य पक्षात् व्यावृत्तावपि साध्यव्यावर्तनसामर्थ्याभावात् वैयर्थ्यं स्यादिति साध्यव्यापकत्वमपि ग्राह्यम् । तथा च साधनाव्यापकत्वात् पक्षात् व्यावृत्त उपाधिः साध्यव्यापकत्वात् व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यनिवृत्तिरिति साध्यं व्यावर्तयतीति ॥\nउपाधिगतव्याप्यत्वोपजीवनात् सोपाधिको हेतुर्व्याप्यत्वासिद्धो भवतीत्येके । साध्यरहितस्य पक्षस्यैव विपक्षत्वात् तत्र वर्तमानो हेतुः व्यभिचारी स्यादित्यपरे तत् एवकारेण व्यवच्छिद्यते । यदा उपाधिव्यावृत्त्या पक्षे साध्याभावः सिद्धः तदैव परानुमानं दुष्टं स्यादिति पश्चाद्भाविना दोषेण पिष्टं पिष्टं स्यादिति ॥ साध्याभावाविनाभाव्यभावत्वस्य अवश्याभ्युपगमनीयत्वात् प्रथमप्राप्तपरित्यागेन दोषान्तरान्वेषणे गौरवं च स्यात् । विषमव्याप्तौ व्याप्यत्वासिद्ध्यनुपपत्तिश्चेति ।" | | "lines": [ |
| | "हेत्वाभासादेः क्वान्तर्भावः ? इत्यतस्तं वक्तुमनुमानविरोधविभागमाह–", |
| | "त्रिविधो विरोधः", |
| | "अनुमानस्य साधारणोऽसाधारणश्च सम्भावित इति शेषः ।", |
| | "कथं त्रैविध्यम् ? इत्यत आह", |
| | "प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तभेदेन", |
| | "अत्र प्रतिज्ञापदेन पक्षोऽप्युपलक्ष्यते । हेतुपदेन लिङ्गञ्च । तथा दृष्टान्तपदेनोदाहरणम् । विरोधस्योभयदूषणत्वात् । प्रतिज्ञादिभेदेन साधनांशानां त्रैविध्यात् तद्विरोधस्त्रिविधः । विरोधपदं संयोज्य वा योज्यम् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधः साधारणः। अन्यावसाधारणौ ॥", |
| | "प्रतिज्ञाविरोधं लक्षयति ॥", |
| | "प्रमाणविरुद्धार्थप्रतिज्ञाविरोधः", |
| | "अत्र प्रमाणविरोध एव हेत्वाभासानामन्तर्भावात् तस्य ग्रहणं, न स्ववाक्यविरोधस्य ।", |
| | "हेतुविरोधं दर्शयति", |
| | "हेतुस्वरूपासिध्दिव्याप्तिश्चेति हेतुविरोधः", |
| | "अत्र प्रथमहेतुशब्देन लिङ्गमुच्यते । यत् यत्र वादिना विवक्षितं तत्र तस्याप्रमितिः स्वरूपासिद्धिः ॥", |
| | "दृष्टान्तविरोधं दर्शयति", |
| | "साध्यस्य साधनस्य वा अननुगमो दृष्टान्तविरोधः", |
| | "उभयोर्वेति ग्राह्यम् । अननुगमो अनुगत्यप्रमितिः । साधर्म्य दृष्टान्तस्यायं विरोधः । साध्यस्य साधनस्य उभयोर्वा व्यावृत्त्यप्रमितिर्वैधर्म्यदृष्टान्तविरोधोऽपि द्रष्टव्यः । अनेन पक्षसाधनदृष्टान्तलक्षणराहित्यं प्रतिज्ञाहेत्वादिविरोधलक्षणं सूचितं भवति । तल्लक्षणविभागादि सङ्ग्रहेणैव ज्ञापयितुमियमुक्तिः ॥", |
| | "बाध एव प्रमाणविरोध इति मन्वान आह - सप्रतिसाधनोऽप्यन्योऽनुमानविरोधोऽस्ति । अतः कथमेवं त्रैविध्यं? इति । तत्राह", |
| | "प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एव सप्रतिसाधनः", |
| | "द्विविधो हि प्रतिज्ञायाः प्रमाणविरोधः प्रबलप्रमाणेन समबलेन चेति । आद्योबाधकत्वेन । द्वितीयः प्रतिबन्धकत्वेन । तत्र योऽयं प्रतिज्ञायाः समबलेन प्रमाणेन विरोधः स सप्रतिसाधनसञ्ज्ञो भवति । अतो युक्तमुक्तमिति ॥", |
| | "एवकारेणास्य हेतुविरोधत्वं व्यवच्छिनत्ति । प्रतिज्ञामात्र एवास्य स्फुरणात् । व्याप्त्यादिहेत्वङ्गस्यानेनाखण्डितत्वाच्च । एतेन प्रबलप्रमाणविरोधस्यापि हेतुविरोधत्वं प्रत्युक्तम् ॥", |
| | "उपाधिविरोधोऽप्यन्योऽस्तीत्याह–", |
| | "स एवोपाधिदोषोऽपि", |
| | "नोपाधिः स्वयमेव दोषः । किं तु दोषोन्नायक एव । स चोपाधिना उन्नेयो दोषः उपाधिदोषः प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एवान्तर्भवतीति नोक्तविरोधः । प्रकृतसाध्यव्यापकः प्रकृतसाधनाव्यापकः उपाधिः । स हि पक्षात् व्यावर्तमानः साध्यं व्यावर्तयन् प्रतिपक्षोन्नायको भवति ॥ उपाध्यभावस्य साध्याभावे लिङ्गत्वात् । उपाधेर्हि पक्षात् व्यावृत्तिः स्वव्यावृत्त्या साध्यव्यावर्तने शक्तिश्चापेक्षिता । तत्र साध्यव्यापक इत्येवोक्ते साधनव्यापकस्य साधनस्येव पक्षे वर्तमानत्वात् साध्यव्यापकोऽप्युपाधिर्न पक्षात् साध्यं व्यावर्तयेदिति साधनाव्यापकत्वं ग्राह्यम् ।तावत्येवोच्यमाने साध्याव्यापकस्य पक्षात् व्यावृत्तावपि साध्यव्यावर्तनसामर्थ्याभावात् वैयर्थ्यं स्यादिति साध्यव्यापकत्वमपि ग्राह्यम् । तथा च साधनाव्यापकत्वात् पक्षात् व्यावृत्त उपाधिः साध्यव्यापकत्वात् व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यनिवृत्तिरिति साध्यं व्यावर्तयतीति ॥", |
| | "उपाधिगतव्याप्यत्वोपजीवनात् सोपाधिको हेतुर्व्याप्यत्वासिद्धो भवतीत्येके । साध्यरहितस्य पक्षस्यैव विपक्षत्वात् तत्र वर्तमानो हेतुः व्यभिचारी स्यादित्यपरे तत् एवकारेण व्यवच्छिद्यते । यदा उपाधिव्यावृत्त्या पक्षे साध्याभावः सिद्धः तदैव परानुमानं दुष्टं स्यादिति पश्चाद्भाविना दोषेण पिष्टं पिष्टं स्यादिति ॥ साध्याभावाविनाभाव्यभावत्वस्य अवश्याभ्युपगमनीयत्वात् प्रथमप्राप्तपरित्यागेन दोषान्तरान्वेषणे गौरवं च स्यात् । विषमव्याप्तौ व्याप्यत्वासिद्ध्यनुपपत्तिश्चेति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "प्रतिज्ञाविरोधादेरुदाहरणमाह\nसर्व एते दृश्यत्वानुमाने द्रष्टव्याः\n‘विवादपदं मिथ्या दृश्यत्वात् यत् दृश्यं तत् मिथ्या यथा शुक्तिरजतं तथा चेदं दृश्यं तस्मान्मिथ्या’ इत्येतदनुमानं प्रतिज्ञाविरोधादीनामुदाहरणं ज्ञातव्यमिति ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रतिज्ञाविरोधादेरुदाहरणमाह", |
| | "सर्व एते दृश्यत्वानुमाने द्रष्टव्याः", |
| | "‘विवादपदं मिथ्या दृश्यत्वात् यत् दृश्यं तत् मिथ्या यथा शुक्तिरजतं तथा चेदं दृश्यं तस्मान्मिथ्या’ इत्येतदनुमानं प्रतिज्ञाविरोधादीनामुदाहरणं ज्ञातव्यमिति ॥" |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "तत्कथम् ? इत्यतः प्रतिज्ञायाः प्रबलप्रमाणविरोधं तावदुपपादयति\nप्रत्यक्षागमादिभिर्जगतः सत्यत्वात्\nसन् घटः इत्यादिप्रत्यक्षेण, विश्वं सत्यमित्याद्यागमेन, विवादपदं सत्यं अर्थक्रियाकारित्वात् इत्याद्यनुमानेन च जगतः सत्यत्वावधारणात् जगन्मिथ्या इति प्रतिज्ञा प्रबलप्रमाणविरुद्धा भवति ॥\nहेतोः स्वरूपासिद्धिमुपपादयति\nतत्पक्षे दृश्यत्वस्य च मिथ्यात्वात्\n‘यत् दृश्यं तत् मिथ्या’ इति व्याप्तिमङ्गीकुर्वता दृश्यत्वस्यापि मिथ्यात्वमङ्गीकर्तव्यम् । अन्यथा दृश्यत्वस्य व्यभिचारापातात् । अतो दृश्यत्वहेतोर्मिथ्यात्वात् दृश्यत्वहेतुर्वादिनः स्वरूपासिद्ध एव ।न मिथ्येत्यसदुच्यते । येन हेतोः स्वरूपासिद्धिः स्यात् । किं नाम ? अनिर्वचनीयमेव । अतः अनिर्वचनीयदृश्यत्वस्य भावान्न स्वरूपासिद्धिरित्यत आह\nअनिर्वचनीयस्य प्रतिवादिनोऽसिद्धत्वात्\nअनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वस्य हेतुत्वाङ्गीकारेऽपि प्रतिवादिनः स्वरूपासिद्धिर्भवत्येव । प्रतिवादिना जगति अनिर्वाच्यदृश्यत्वस्यानङ्गीकृतत्वादिति । यथा अग्निमत्वे साध्ये मलिनत्वामलिनत्वादिविशेषानपहाय धूममात्रं हेतुः तथा अनवधारितानिर्वचनीयत्वादिविशेषं दृश्यत्वमात्रं जगन्मिथ्यात्वे हेतुः किं न स्यात् ? इत्यत आह\nदृश्यत्वहेतोरव्याप्तिमुपपादयति\nआत्मनोऽपि दृश्यत्वात्\nसत्यत्वेनाङ्गीकृतस्यात्मनो विपक्षत्वात् तत्र च दृश्यत्वहेतोर्वर्तमानत्वात् व्याप्तिहीनोऽप्यसौ भवति । एतेन व्यतिरेकदृष्टान्तात् साधनाव्यावृत्तिश्चोपपादिता भवति ॥\nशुक्तिरजतादिदृष्टान्ते साध्याननुगममुपपादयति\nशुक्तिरजतादेरनिर्वचनीयत्वाभावात्\nमिथ्यापदेन अनिर्वचनीयत्वमभिमतं वादिनः । तच्च दृष्टान्ते शुक्तिरजतादौ न विद्यते । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्’ इति बाधकप्रत्ययेन असत्त्वावधारणात् । अतः शुक्तिरजतादिदृष्टान्तः साध्यविकलो भवति ॥\nतत्र साधनाननुगमं चोपपादयति\nअनिर्वचनीयदृश्यत्वाभावात्\nअनिर्वचनीयं हि दृश्यत्वं साधनमभिमतम् । न तत् शुक्तिरजतादौ वर्तत इति दृष्टान्तः साधनविकलो भवति । अनिर्वचनीयतया अभिमतस्य शुक्तिरजतादेर्दृश्यत्वाभावादिति वा । शुक्त्यादेरेव दृग्विषयत्वेन ‘रजतादिकं दृष्टम्’ इति भ्रममात्रम् । तन्मतेऽपि अनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वाभावादिति वा । तैरपि शुक्तिरजतादेः न ऐन्द्रियकदृग्विषयत्वं अङ्गीकृतम् । प्रतीतिसमय एवोदयाभ्युपगमात् । इन्द्रियस्याधिष्ठानग्रहण एव व्यापारोररीकरणात् । शुक्त्याद्यवच्छिन्नाऽत्माविद्याकल्पितमारोपितयैव अवभासत इति तत्प्रक्रिया ॥\nप्राक् दृष्टान्तविरोधाभिधानानन्तरं प्रतिज्ञायाः समबलप्रमाणविरोधस्य सप्रतिसाधनसञ्ज्ञाविहिता । अतस्तेनैव क्रमेण तमुपपादयति\nमानसिद्धत्वादिति सप्रतिसाधनत्वाच्च\n‘जगत् सत्यं मानसिद्धत्वात् ब्रह्मवत्’ इत्यपि वक्तुं शक्यत्वात् जगन्मिथ्येति प्रतिज्ञासत्प्रतिपक्षा भवति । चशब्देन अमानसिद्धत्वमुपाधिं सूचयति । तद्धि मिथ्यात्वव्यापकं•ुक्ति रजतादौ दृष्टम् । दृश्यत्वाव्यापकं च, जगति दृश्यत्वे विद्यमानेऽप्यभावात् । अतो जगतो व्यावर्तमानं अमानसिद्धत्वं मिथ्यात्वमपि व्यावर्तयतीति ।\nयदुक्तं ‘जगन्मिथ्या’ इति प्रतिज्ञा प्रत्यक्षविरुद्धेति। तदयुक्तम् । अनुमानेन ह्येष्यत्कालीनब•ध्यत्वं साध्यते । न च तदभावं गोचरयितुं प्रत्यक्षमीष्टे येन तद्विरोधोऽनुमानस्य स्यात् । वर्तमानमात्रग्राहित्वात् प्रत्यक्षस्य । न हि भिन्नविषययोर्बाध्यबाधकभावोऽस्ति । न हि भवति आमघटश्यामताप्रत्यक्षेण पाकरक्तताप्रमाणस्य बाध इत्याशङ्क्य परिहरति ॥\nजगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वे अनुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणोऽपि प्रत्यक्षत्वविशेषात् उत्तरक्षणे प्रामाण्यं न सेत्स्यतीति भेदादिवाक्यानामेव प्रामाण्यं स्यात् । यो जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वं अङ्गीकुर्यात् स प्रष्टव्यः जगन्मिथ्यात्वग्राहिणः अनुमानस्य ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्याद्यागमस्य च प्रामाण्यं केन गृह्यते ? इति । न तावत् स्वेन । स्वप्रामाण्यविषयत्वाननुभवात् । नाप्यनुमानाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत् तर्हि तस्यानुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणः प्रत्यक्षस्यापि प्रत्यक्षत्वाविशेषात् वर्तमानमात्रग्राहित्वं स्यात् । तथा च न तेनोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यसिद्धिः । जगन्मिथ्यात्वानुमानादेः उत्तरक्षणे प्रामाण्यासिद्धौ च ‘द्वा सुपर्णा’ इत्यादिभेदवाक्यानां ‘विश्वं सत्यं’ इत्यादिविश्वसत्यत्ववाक्यानां मानसिद्धत्वाद्यनुमानानां चोत्तरक्षणे प्रामाण्यं स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । न चोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यग्राहकं प्रत्यक्षान्तरं भविष्यतीति वाच्यम् । उक्तरीत्या तत्र प्रामाण्याभावस्य वक्तुं शक्यत्वात् ॥\nननु न सर्वप्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहीत्युच्यते । किं तु ? साक्षिव्यतिरिक्तमेव । साक्षी तु एष्यदपि गृह्णाति । अतस्तेन उत्तरक्षणेऽपि अनुमानागमप्रामाण्यं सेत्स्यति इत्याशङ्क्य परिहरति\nतस्य साक्षिसिद्धत्वं चेत् जगत्सत्यत्वमपि साक्षिसिद्धम्\nयदि अनुमानादिप्रामाण्यस्य साक्षिसिद्धत्वमुच्यते हन्त तर्हि जगत्सत्यत्वमपि साक्षिप्रत्यक्षसिद्धमिति ब्रूमः । तथा च साक्षिणो वर्तमानमात्रग्राहित्वाभावात् तेन एष्यत्कालीनजगद्बाधाभाव सिद्धिसम्भवात् प्रत्यक्षविरोधोऽनुमानस्य दुर्वार एवेति ।\nअन्यस्त्वाह, न प्रत्यक्षेणानुमानस्य विरोधः । प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र शुक्तिरजतादौ व्यभिचारो दृश्यते । ततश्च न तत्प्रामाण्ये विश्वासः सम्भवति । अविश्वस्तप्रामाण्येन च कथमनुमानस्य विरोधः स्यात् ? इति । तत्राह–\n.व्यभिचारश्चेदागमार्थानुमानिर्दोषत्वाध्यवसाये च समः\nप्रत्यक्षस्य व्यभिचारदर्शनात् अविश्वसनीयत्वं वदन् वादी प्रष्टव्यः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यागमस्य अशेषभेदाभावोऽर्थः, दृश्यत्वानुमानं निर्दोषं, मानसिद्धत्वाऽद्यनुमानं सदोषं इत्यध्यवसायः केन प्रमाणेन ? इति । न तावत् स्वेनैव । अननुभवात् । नाप्यागमाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत्, तर्हि प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र व्यभिचारदर्शनात् इदमपि प्रत्यक्षमविश्वसनीयं । तथा च न तेनागमार्थाध्यवसायः सिध्यतीति । अनुमाया अनिर्दोषत्वाध्यवसाय इति च योज्यम्। यद्यप्यत्र पूर्वोक्तमेवानिष्टं शक्यते वक्तुम् तथापि तत् शिष्यैरेव शक्यते ज्ञातुमिति दूषणान्तरमेवोक्तम् । अभेदागमस्य अभेदार्थत्वाध्यवसायानुपपत्तिरेवानिष्टा ।\nअधिकं चाह–\n.अत उत्तरदिवसे अभेदवाक्यस्य भेदोऽर्थः स्यात्\n‘नेहनाना इति वाक्यस्याभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायानुपपत्तौ भेदोऽर्थः स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । प्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वाभ्युपगमेऽप्ययं दोषः समान इति सूचयितुं उत्तरदिवस इत्युक्तम् । तथा हि, यदि प्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहि तर्हि ‘नेह नाना’ इति वाक्यस्य अभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायहेतोः प्रत्यक्षस्यापि तथात्वापत्त्या उत्तरदिवसेऽपि तदर्थत्वाध्यवसायो न स्यात् इति सिद्धं कृत्वा आह अत इति ॥\nदृश्यत्वानुमानिर्दोषत्वाध्यवसायायोगे अनिष्टमाह–\n.निर्दोषानुमायाः सदोषत्वम्\nनिर्दोषत्वेनाभ्युपगतानुमायाः प्रत्यक्षेण क्वचित् व्यभिचारदर्शनेन अविश्वसनीयेन निर्दोषत्वाध्यवसायानुपपत्तौ सदोषत्वं स्यात् । अभावाभावे भावनियमात् ।\nमानसिद्धत्वाद्यनुमानं सदोषमित्यध्यवसायानुपपत्तौ दोषमाह–\n.सदोषानुमाया निर्दोषत्वम्\nसदोषानुमायाः सदोषत्वेनाभ्युपगताया अनुमायाः । न केवलं प्रत्यक्षस्या विश्वसनीयत्वाङ्गीकृतौ आगमार्थाव्यवस्था । किं तु सर्वव्यवस्थानां प्रत्यक्षमूलत्वेन न काऽपि व्यावस्था सिध्यतीति सर्वव्यवहारोच्छेदः स्यादित्याह–\nइत्यव्यवस्था\nउक्तप्रकारसूचनार्थ इतिशब्दः ।\nयदुक्तं हेतुस्वरूपासिद्धिरव्याप्तिरिति हेतुविरोध इति तदयुक्तम् । आश्रयासिद्धिसाध्यासिद्धिव्यधिकरणासिद्धीनामपि हेतुविरोधित्वात् इत्यत आह\nआश्रयसाध्यव्यधिकरणासिद्धयो न दूषणम्\nआश्रयासिद्धिव्यधिकरणासिद्धी दर्शिते । ततः प्राक् साध्यधर्मस्याप्रसिद्धिः साध्यासिद्धिः । यथा ‘इयं भूः शशविषणोल्लिखिता भूत्वात्’ इति ।\nकुतो न दूषणमित्याह–\n.अतिप्रसङ्गाभावात्\nआश्रयासिद्ध्यादीनामदूषणत्वाङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गाभावात् न दूषणम् । अतिप्र्रसङ्गाभावेऽपि कथमदूषणम् ? इत्याह–\nअतिप्रसङ्गेन हि दोषत्वादोषत्वे कल्प्ये\nयस्य दोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य दोषत्वम् । यथा स्वरूपासिद्धेः अदोषत्वे हृदादेरग्निमत्वप्रसङ्गेन दोषत्वम्। यस्य च अदोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य अदोषत्वम् । यथा व्याप्तेः अदोषत्वानङ्गीकारे साध्यासिद्धिप्रसङ्गेन अदोषत्वम् एवं दोषत्वादेरतिप्रसङ्गाधीनत्वात् अत्र च तदभावात् न दोषत्वम् । अत्र अदोषत्वोक्तिः दृष्टान्ततया उपयुज्यते । अतिप्रसङ्गशब्देन भावाभावावुपलक्ष्य अन्वयव्यतिरेकोक्तिर्वा ।\nइतोपि नाश्रयासिद्ध्यादेर्दोषत्वमित्याह–\nव्याप्तिरेव हि प्रयोजिका\nसाध्यसिद्धौ हि साधनस्य व्याप्तिरेव प्रयोजिका । न तु सदाश्रयत्वं साध्यप्रसिद्धिः साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वं वा। व्यतिरेकाभावात् । न हि सत्यां व्याप्तौ दोषान्तरासङ्गीर्णाश्रयासिद्ध्यादिना साध्यासिद्धिर्दृष्टेति । उपलक्षणमेतत् । विवक्षितस्थले सिद्धिश्चेति ज्ञातव्यम् । हेतुस्वरूपासिद्धिरिति ह्युक्तम् । एवकारस्तु सदाश्रयत्वादिव्यावर्तकः । व्याप्तिमत्साधनं हि विवक्षितस्थले विद्यमानं विवक्षितस्थले साध्यं प्रयोजयति ।\nकिमतो यदि व्याप्तिरेव प्रयोजिका ? इत्यत आह\n.असत्यपि व्याप्तिरस्त्येव\nप्रयोजिका च व्याप्तिः असत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो नाश्रयासिद्धिर्दूषणमिति ।\nएवं असत्यपि साध्यस्य प्रसिद्धत्वे प्रयोजिका व्याप्तिरस्त्येव ‘जीवच्छरीरजातं सात्मकं प्राणादिमत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो न साध्यासिद्धिर्दूषणमिति ॥\nतथा असत्यपि साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वे प्रयोजिका व्याप्तितरस्त्येव । चन्द्रोदयादिना समुद्रवृद्धि्याद्यनुमानदर्शनात् । अतो न व्यधिकरणासिद्धिरपि दूषणमिति ।\nअसादाश्रयस्य हेतोर्व्याप्त्यनङ्गीकारे बाधकं चाह–\n‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इत्यपि व्याप्तिं विना कथं निवार्यते ?\nअसदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति ब्रुवंस्तत्र किञ्चित् प्रमाणमाचष्टे न वा । न द्वितीयाः । प्रमाणं विना अर्थसिद्धेरभावात् । आद्ये न तावत् प्रत्यक्षमागमो वा तत्रास्ति । अतोऽनुमानमेव वाच्यम् । तत् किमसत् तदाश्रयं हेतुं वा पक्षीकृत्य प्रवर्तते ? उभयमप्यसदाश्रयं स्यात् । सतः असद्धर्मत्वानङ्गीकारात् । तत्र प्रष्टव्यं, तस्य व्याप्तिरस्ति न वा ? इति । नाद्यः सर्वत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये ‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति निवारणं न स्यात् । अव्याप्तस्य साधनबाधनानङ्गत्वादिति ।\nनन्वसतो निर्धर्मकत्वेन साध्यसाधनाश्रयत्वानुपपत्तेः कथमसदाश्रयो हेतुः साधकः स्य•त् ? इत्यत आह असदाश्रयस्येति ॥ अत्र व्याप्तिरिति तद्वतोः साध्यसाधनयोराश्रयत्वमुपलक्ष्यते । प्रागपिर्हेतुसमुच्चये अत्रासद्विषयव्यवहारान्तरानुपपत्तिं समुच्चिनोति । अन्यत्समानम् ।\nइतोऽपि न निर्धर्मकत्वेन असतः साध्यसाधनाश्रयत्वाभावो वाच्य इत्याह–\nअसदाश्रयमित्यादिविशेषणत्वसम्भवे कथमव्याप्तिः\n‘असदाश्रयं साधनं न साधकं’ इति वदता असतः साधनव्यावर्तकतया तद्विशेषणत्वं अङ्गीकृतमेव । अन्यथा तथा वक्तुमेवाशक्यत्वात् । एवञ्च असतो विशेषणत्वलक्षणधर्मसम्भवे कथं साध्यसाधनधर्माश्रयत्वासम्भवः ? विशेष हेत्वभावादिति । एवं असदाश्रयत्वं आश्रयसिद्धिरिति मतं निराकृतम् ।\nये पुनरभावस्य निर्धर्मकत्वात् तदाश्रयत्वं आश्रयासिद्धिदूषणं ब्रुवते तन्निरासायाह–\nन चात्यन्ताभावोऽपि सर्वधर्मरहितः\nकिमुत प्रागभावादिः प्रामाणिकप्रतियोगिक इति शेषः । कुतो न ? इत्यत आह\nप्रमेयत्वाद्यनुभवात्\nअनुभूयन्ते हि प्रमेयत्वाभिधेयत्वादयः अत्यन्ताभावेऽपि धर्माः । कथमन्यथा तस्य सर्वधर्मराहित्यादि जानीयात् ? कथं च शिष्यं प्रत्युपदिशेत् ? अनुपदिष्टश्च कथमसौ जानीयात् ? इति ।\nहेत्वन्तरेण अप्रसिद्धसाध्यस्य हेतोः साधकत्वं साधयति\nपरिशेषार्थापत्तिप्रामाण्याभ्युपगमाच्च\nपरिशेषस्य अर्थापत्तेश्च प्रामाण्यं तावत् सर्वैरङ्गीकृतम् । तत्साध्यं अप्रसिद्धमपि दृश्यते । अतो न कुत्रापि साध्याप्रसिद्धेर्दूषणत्वम् ।\nइतोऽपि नाप्रसिद्धसाध्यस्य असाधकत्वमित्याह–\n‘विमतं सकर्तृकं’ इत्यत्र सर्वज्ञत्वस्य पक्षधर्मताबलेन सिद्ध्यङ्गीकारात्\n‘भूभूधरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्’ इत्यनुमानेन परैः ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्धिरङ्गीक्रियते । यद्यपि कार्यत्वं सकर्तृकत्वमात्रेण व्याप्तं भूभूधरादिपक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञमेव कर्तारं गमयति । उपादानाऽदिविषयज्ञानवत एव कर्तृत्वात् । न च सर्वज्ञत्वं प्रसिद्धम् । अतस्तद्वत् न कुत्रापि अप्रसिद्धसाध्यस्य दूषणत्वमिति । अनेनैव व्यधिकरणत्वेऽपि साधकत्वं चोपपादितं भवति। भूभूधराऽदिनिष्ठेन कार्यत्वेन हेतुना ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्ध्यङ्गीकारात् न कुत्रापि साध्यसाधनयोर्व्यधिकरणत्वं दूषणमिति । एतेनैव अवयवनियमश्च परास्तः । न हि पक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञत्वसिद्धाववयवनियमोऽस्ति ।" | | "lines": [ |
| | "तत्कथम् ? इत्यतः प्रतिज्ञायाः प्रबलप्रमाणविरोधं तावदुपपादयति", |
| | "प्रत्यक्षागमादिभिर्जगतः सत्यत्वात्", |
| | "सन् घटः इत्यादिप्रत्यक्षेण, विश्वं सत्यमित्याद्यागमेन, विवादपदं सत्यं अर्थक्रियाकारित्वात् इत्याद्यनुमानेन च जगतः सत्यत्वावधारणात् जगन्मिथ्या इति प्रतिज्ञा प्रबलप्रमाणविरुद्धा भवति ॥", |
| | "हेतोः स्वरूपासिद्धिमुपपादयति", |
| | "तत्पक्षे दृश्यत्वस्य च मिथ्यात्वात्", |
| | "‘यत् दृश्यं तत् मिथ्या’ इति व्याप्तिमङ्गीकुर्वता दृश्यत्वस्यापि मिथ्यात्वमङ्गीकर्तव्यम् । अन्यथा दृश्यत्वस्य व्यभिचारापातात् । अतो दृश्यत्वहेतोर्मिथ्यात्वात् दृश्यत्वहेतुर्वादिनः स्वरूपासिद्ध एव ।न मिथ्येत्यसदुच्यते । येन हेतोः स्वरूपासिद्धिः स्यात् । किं नाम ? अनिर्वचनीयमेव । अतः अनिर्वचनीयदृश्यत्वस्य भावान्न स्वरूपासिद्धिरित्यत आह", |
| | "अनिर्वचनीयस्य प्रतिवादिनोऽसिद्धत्वात्", |
| | "अनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वस्य हेतुत्वाङ्गीकारेऽपि प्रतिवादिनः स्वरूपासिद्धिर्भवत्येव । प्रतिवादिना जगति अनिर्वाच्यदृश्यत्वस्यानङ्गीकृतत्वादिति । यथा अग्निमत्वे साध्ये मलिनत्वामलिनत्वादिविशेषानपहाय धूममात्रं हेतुः तथा अनवधारितानिर्वचनीयत्वादिविशेषं दृश्यत्वमात्रं जगन्मिथ्यात्वे हेतुः किं न स्यात् ? इत्यत आह", |
| | "दृश्यत्वहेतोरव्याप्तिमुपपादयति", |
| | "आत्मनोऽपि दृश्यत्वात्", |
| | "सत्यत्वेनाङ्गीकृतस्यात्मनो विपक्षत्वात् तत्र च दृश्यत्वहेतोर्वर्तमानत्वात् व्याप्तिहीनोऽप्यसौ भवति । एतेन व्यतिरेकदृष्टान्तात् साधनाव्यावृत्तिश्चोपपादिता भवति ॥", |
| | "शुक्तिरजतादिदृष्टान्ते साध्याननुगममुपपादयति", |
| | "शुक्तिरजतादेरनिर्वचनीयत्वाभावात्", |
| | "मिथ्यापदेन अनिर्वचनीयत्वमभिमतं वादिनः । तच्च दृष्टान्ते शुक्तिरजतादौ न विद्यते । ‘असदेव रजतं प्रत्यभात्’ इति बाधकप्रत्ययेन असत्त्वावधारणात् । अतः शुक्तिरजतादिदृष्टान्तः साध्यविकलो भवति ॥", |
| | "तत्र साधनाननुगमं चोपपादयति", |
| | "अनिर्वचनीयदृश्यत्वाभावात्", |
| | "अनिर्वचनीयं हि दृश्यत्वं साधनमभिमतम् । न तत् शुक्तिरजतादौ वर्तत इति दृष्टान्तः साधनविकलो भवति । अनिर्वचनीयतया अभिमतस्य शुक्तिरजतादेर्दृश्यत्वाभावादिति वा । शुक्त्यादेरेव दृग्विषयत्वेन ‘रजतादिकं दृष्टम्’ इति भ्रममात्रम् । तन्मतेऽपि अनिर्वचनीयस्य दृश्यत्वाभावादिति वा । तैरपि शुक्तिरजतादेः न ऐन्द्रियकदृग्विषयत्वं अङ्गीकृतम् । प्रतीतिसमय एवोदयाभ्युपगमात् । इन्द्रियस्याधिष्ठानग्रहण एव व्यापारोररीकरणात् । शुक्त्याद्यवच्छिन्नाऽत्माविद्याकल्पितमारोपितयैव अवभासत इति तत्प्रक्रिया ॥", |
| | "प्राक् दृष्टान्तविरोधाभिधानानन्तरं प्रतिज्ञायाः समबलप्रमाणविरोधस्य सप्रतिसाधनसञ्ज्ञाविहिता । अतस्तेनैव क्रमेण तमुपपादयति", |
| | "मानसिद्धत्वादिति सप्रतिसाधनत्वाच्च", |
| | "‘जगत् सत्यं मानसिद्धत्वात् ब्रह्मवत्’ इत्यपि वक्तुं शक्यत्वात् जगन्मिथ्येति प्रतिज्ञासत्प्रतिपक्षा भवति । चशब्देन अमानसिद्धत्वमुपाधिं सूचयति । तद्धि मिथ्यात्वव्यापकं•ुक्ति रजतादौ दृष्टम् । दृश्यत्वाव्यापकं च, जगति दृश्यत्वे विद्यमानेऽप्यभावात् । अतो जगतो व्यावर्तमानं अमानसिद्धत्वं मिथ्यात्वमपि व्यावर्तयतीति ।", |
| | "यदुक्तं ‘जगन्मिथ्या’ इति प्रतिज्ञा प्रत्यक्षविरुद्धेति। तदयुक्तम् । अनुमानेन ह्येष्यत्कालीनब•ध्यत्वं साध्यते । न च तदभावं गोचरयितुं प्रत्यक्षमीष्टे येन तद्विरोधोऽनुमानस्य स्यात् । वर्तमानमात्रग्राहित्वात् प्रत्यक्षस्य । न हि भिन्नविषययोर्बाध्यबाधकभावोऽस्ति । न हि भवति आमघटश्यामताप्रत्यक्षेण पाकरक्तताप्रमाणस्य बाध इत्याशङ्क्य परिहरति ॥", |
| | "जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वे अनुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणोऽपि प्रत्यक्षत्वविशेषात् उत्तरक्षणे प्रामाण्यं न सेत्स्यतीति भेदादिवाक्यानामेव प्रामाण्यं स्यात् । यो जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वं अङ्गीकुर्यात् स प्रष्टव्यः जगन्मिथ्यात्वग्राहिणः अनुमानस्य ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्याद्यागमस्य च प्रामाण्यं केन गृह्यते ? इति । न तावत् स्वेन । स्वप्रामाण्यविषयत्वाननुभवात् । नाप्यनुमानाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत् तर्हि तस्यानुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणः प्रत्यक्षस्यापि प्रत्यक्षत्वाविशेषात् वर्तमानमात्रग्राहित्वं स्यात् । तथा च न तेनोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यसिद्धिः । जगन्मिथ्यात्वानुमानादेः उत्तरक्षणे प्रामाण्यासिद्धौ च ‘द्वा सुपर्णा’ इत्यादिभेदवाक्यानां ‘विश्वं सत्यं’ इत्यादिविश्वसत्यत्ववाक्यानां मानसिद्धत्वाद्यनुमानानां चोत्तरक्षणे प्रामाण्यं स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । न चोत्तरक्षणे अनुमानादिप्रामाण्यग्राहकं प्रत्यक्षान्तरं भविष्यतीति वाच्यम् । उक्तरीत्या तत्र प्रामाण्याभावस्य वक्तुं शक्यत्वात् ॥", |
| | "ननु न सर्वप्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहीत्युच्यते । किं तु ? साक्षिव्यतिरिक्तमेव । साक्षी तु एष्यदपि गृह्णाति । अतस्तेन उत्तरक्षणेऽपि अनुमानागमप्रामाण्यं सेत्स्यति इत्याशङ्क्य परिहरति", |
| | "तस्य साक्षिसिद्धत्वं चेत् जगत्सत्यत्वमपि साक्षिसिद्धम्", |
| | "यदि अनुमानादिप्रामाण्यस्य साक्षिसिद्धत्वमुच्यते हन्त तर्हि जगत्सत्यत्वमपि साक्षिप्रत्यक्षसिद्धमिति ब्रूमः । तथा च साक्षिणो वर्तमानमात्रग्राहित्वाभावात् तेन एष्यत्कालीनजगद्बाधाभाव सिद्धिसम्भवात् प्रत्यक्षविरोधोऽनुमानस्य दुर्वार एवेति ।", |
| | "अन्यस्त्वाह, न प्रत्यक्षेणानुमानस्य विरोधः । प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र शुक्तिरजतादौ व्यभिचारो दृश्यते । ततश्च न तत्प्रामाण्ये विश्वासः सम्भवति । अविश्वस्तप्रामाण्येन च कथमनुमानस्य विरोधः स्यात् ? इति । तत्राह–", |
| | ".व्यभिचारश्चेदागमार्थानुमानिर्दोषत्वाध्यवसाये च समः", |
| | "प्रत्यक्षस्य व्यभिचारदर्शनात् अविश्वसनीयत्वं वदन् वादी प्रष्टव्यः ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ इत्यागमस्य अशेषभेदाभावोऽर्थः, दृश्यत्वानुमानं निर्दोषं, मानसिद्धत्वाऽद्यनुमानं सदोषं इत्यध्यवसायः केन प्रमाणेन ? इति । न तावत् स्वेनैव । अननुभवात् । नाप्यागमाद्यन्तरेण । अनवस्थापातात् । प्रत्यक्षेण चेत्, तर्हि प्रत्यक्षस्य तत्र तत्र व्यभिचारदर्शनात् इदमपि प्रत्यक्षमविश्वसनीयं । तथा च न तेनागमार्थाध्यवसायः सिध्यतीति । अनुमाया अनिर्दोषत्वाध्यवसाय इति च योज्यम्। यद्यप्यत्र पूर्वोक्तमेवानिष्टं शक्यते वक्तुम् तथापि तत् शिष्यैरेव शक्यते ज्ञातुमिति दूषणान्तरमेवोक्तम् । अभेदागमस्य अभेदार्थत्वाध्यवसायानुपपत्तिरेवानिष्टा ।", |
| | "अधिकं चाह–", |
| | ".अत उत्तरदिवसे अभेदवाक्यस्य भेदोऽर्थः स्यात्", |
| | "‘नेहनाना इति वाक्यस्याभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायानुपपत्तौ भेदोऽर्थः स्यात् । परस्परविरुद्धयोः अन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिनान्तरीयकत्वनियमादिति । प्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वाभ्युपगमेऽप्ययं दोषः समान इति सूचयितुं उत्तरदिवस इत्युक्तम् । तथा हि, यदि प्रत्यक्षं वर्तमानमात्रग्राहि तर्हि ‘नेह नाना’ इति वाक्यस्य अभेदोऽर्थ इत्यध्यवसायहेतोः प्रत्यक्षस्यापि तथात्वापत्त्या उत्तरदिवसेऽपि तदर्थत्वाध्यवसायो न स्यात् इति सिद्धं कृत्वा आह अत इति ॥", |
| | "दृश्यत्वानुमानिर्दोषत्वाध्यवसायायोगे अनिष्टमाह–", |
| | ".निर्दोषानुमायाः सदोषत्वम्", |
| | "निर्दोषत्वेनाभ्युपगतानुमायाः प्रत्यक्षेण क्वचित् व्यभिचारदर्शनेन अविश्वसनीयेन निर्दोषत्वाध्यवसायानुपपत्तौ सदोषत्वं स्यात् । अभावाभावे भावनियमात् ।", |
| | "मानसिद्धत्वाद्यनुमानं सदोषमित्यध्यवसायानुपपत्तौ दोषमाह–", |
| | ".सदोषानुमाया निर्दोषत्वम्", |
| | "सदोषानुमायाः सदोषत्वेनाभ्युपगताया अनुमायाः । न केवलं प्रत्यक्षस्या विश्वसनीयत्वाङ्गीकृतौ आगमार्थाव्यवस्था । किं तु सर्वव्यवस्थानां प्रत्यक्षमूलत्वेन न काऽपि व्यावस्था सिध्यतीति सर्वव्यवहारोच्छेदः स्यादित्याह–", |
| | "इत्यव्यवस्था", |
| | "उक्तप्रकारसूचनार्थ इतिशब्दः ।", |
| | "यदुक्तं हेतुस्वरूपासिद्धिरव्याप्तिरिति हेतुविरोध इति तदयुक्तम् । आश्रयासिद्धिसाध्यासिद्धिव्यधिकरणासिद्धीनामपि हेतुविरोधित्वात् इत्यत आह", |
| | "आश्रयसाध्यव्यधिकरणासिद्धयो न दूषणम्", |
| | "आश्रयासिद्धिव्यधिकरणासिद्धी दर्शिते । ततः प्राक् साध्यधर्मस्याप्रसिद्धिः साध्यासिद्धिः । यथा ‘इयं भूः शशविषणोल्लिखिता भूत्वात्’ इति ।", |
| | "कुतो न दूषणमित्याह–", |
| | ".अतिप्रसङ्गाभावात्", |
| | "आश्रयासिद्ध्यादीनामदूषणत्वाङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गाभावात् न दूषणम् । अतिप्र्रसङ्गाभावेऽपि कथमदूषणम् ? इत्याह–", |
| | "अतिप्रसङ्गेन हि दोषत्वादोषत्वे कल्प्ये", |
| | "यस्य दोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य दोषत्वम् । यथा स्वरूपासिद्धेः अदोषत्वे हृदादेरग्निमत्वप्रसङ्गेन दोषत्वम्। यस्य च अदोषत्वानङ्गीकारे अनिष्टप्रसङ्गः तस्य अदोषत्वम् । यथा व्याप्तेः अदोषत्वानङ्गीकारे साध्यासिद्धिप्रसङ्गेन अदोषत्वम् एवं दोषत्वादेरतिप्रसङ्गाधीनत्वात् अत्र च तदभावात् न दोषत्वम् । अत्र अदोषत्वोक्तिः दृष्टान्ततया उपयुज्यते । अतिप्रसङ्गशब्देन भावाभावावुपलक्ष्य अन्वयव्यतिरेकोक्तिर्वा ।", |
| | "इतोपि नाश्रयासिद्ध्यादेर्दोषत्वमित्याह–", |
| | "व्याप्तिरेव हि प्रयोजिका", |
| | "साध्यसिद्धौ हि साधनस्य व्याप्तिरेव प्रयोजिका । न तु सदाश्रयत्वं साध्यप्रसिद्धिः साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वं वा। व्यतिरेकाभावात् । न हि सत्यां व्याप्तौ दोषान्तरासङ्गीर्णाश्रयासिद्ध्यादिना साध्यासिद्धिर्दृष्टेति । उपलक्षणमेतत् । विवक्षितस्थले सिद्धिश्चेति ज्ञातव्यम् । हेतुस्वरूपासिद्धिरिति ह्युक्तम् । एवकारस्तु सदाश्रयत्वादिव्यावर्तकः । व्याप्तिमत्साधनं हि विवक्षितस्थले विद्यमानं विवक्षितस्थले साध्यं प्रयोजयति ।", |
| | "किमतो यदि व्याप्तिरेव प्रयोजिका ? इत्यत आह", |
| | ".असत्यपि व्याप्तिरस्त्येव", |
| | "प्रयोजिका च व्याप्तिः असत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो नाश्रयासिद्धिर्दूषणमिति ।", |
| | "एवं असत्यपि साध्यस्य प्रसिद्धत्वे प्रयोजिका व्याप्तिरस्त्येव ‘जीवच्छरीरजातं सात्मकं प्राणादिमत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् । अतो न साध्यासिद्धिर्दूषणमिति ॥", |
| | "तथा असत्यपि साध्यसाधनयोरेकाधिकरणत्वे प्रयोजिका व्याप्तितरस्त्येव । चन्द्रोदयादिना समुद्रवृद्धि्याद्यनुमानदर्शनात् । अतो न व्यधिकरणासिद्धिरपि दूषणमिति ।", |
| | "असादाश्रयस्य हेतोर्व्याप्त्यनङ्गीकारे बाधकं चाह–", |
| | "‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इत्यपि व्याप्तिं विना कथं निवार्यते ?", |
| | "असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति ब्रुवंस्तत्र किञ्चित् प्रमाणमाचष्टे न वा । न द्वितीयाः । प्रमाणं विना अर्थसिद्धेरभावात् । आद्ये न तावत् प्रत्यक्षमागमो वा तत्रास्ति । अतोऽनुमानमेव वाच्यम् । तत् किमसत् तदाश्रयं हेतुं वा पक्षीकृत्य प्रवर्तते ? उभयमप्यसदाश्रयं स्यात् । सतः असद्धर्मत्वानङ्गीकारात् । तत्र प्रष्टव्यं, तस्य व्याप्तिरस्ति न वा ? इति । नाद्यः सर्वत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये ‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इति निवारणं न स्यात् । अव्याप्तस्य साधनबाधनानङ्गत्वादिति ।", |
| | "नन्वसतो निर्धर्मकत्वेन साध्यसाधनाश्रयत्वानुपपत्तेः कथमसदाश्रयो हेतुः साधकः स्य•त् ? इत्यत आह असदाश्रयस्येति ॥ अत्र व्याप्तिरिति तद्वतोः साध्यसाधनयोराश्रयत्वमुपलक्ष्यते । प्रागपिर्हेतुसमुच्चये अत्रासद्विषयव्यवहारान्तरानुपपत्तिं समुच्चिनोति । अन्यत्समानम् ।", |
| | "इतोऽपि न निर्धर्मकत्वेन असतः साध्यसाधनाश्रयत्वाभावो वाच्य इत्याह–", |
| | "असदाश्रयमित्यादिविशेषणत्वसम्भवे कथमव्याप्तिः", |
| | "‘असदाश्रयं साधनं न साधकं’ इति वदता असतः साधनव्यावर्तकतया तद्विशेषणत्वं अङ्गीकृतमेव । अन्यथा तथा वक्तुमेवाशक्यत्वात् । एवञ्च असतो विशेषणत्वलक्षणधर्मसम्भवे कथं साध्यसाधनधर्माश्रयत्वासम्भवः ? विशेष हेत्वभावादिति । एवं असदाश्रयत्वं आश्रयसिद्धिरिति मतं निराकृतम् ।", |
| | "ये पुनरभावस्य निर्धर्मकत्वात् तदाश्रयत्वं आश्रयासिद्धिदूषणं ब्रुवते तन्निरासायाह–", |
| | "न चात्यन्ताभावोऽपि सर्वधर्मरहितः", |
| | "किमुत प्रागभावादिः प्रामाणिकप्रतियोगिक इति शेषः । कुतो न ? इत्यत आह", |
| | "प्रमेयत्वाद्यनुभवात्", |
| | "अनुभूयन्ते हि प्रमेयत्वाभिधेयत्वादयः अत्यन्ताभावेऽपि धर्माः । कथमन्यथा तस्य सर्वधर्मराहित्यादि जानीयात् ? कथं च शिष्यं प्रत्युपदिशेत् ? अनुपदिष्टश्च कथमसौ जानीयात् ? इति ।", |
| | "हेत्वन्तरेण अप्रसिद्धसाध्यस्य हेतोः साधकत्वं साधयति", |
| | "परिशेषार्थापत्तिप्रामाण्याभ्युपगमाच्च", |
| | "परिशेषस्य अर्थापत्तेश्च प्रामाण्यं तावत् सर्वैरङ्गीकृतम् । तत्साध्यं अप्रसिद्धमपि दृश्यते । अतो न कुत्रापि साध्याप्रसिद्धेर्दूषणत्वम् ।", |
| | "इतोऽपि नाप्रसिद्धसाध्यस्य असाधकत्वमित्याह–", |
| | "‘विमतं सकर्तृकं’ इत्यत्र सर्वज्ञत्वस्य पक्षधर्मताबलेन सिद्ध्यङ्गीकारात्", |
| | "‘भूभूधरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्’ इत्यनुमानेन परैः ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्धिरङ्गीक्रियते । यद्यपि कार्यत्वं सकर्तृकत्वमात्रेण व्याप्तं भूभूधरादिपक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञमेव कर्तारं गमयति । उपादानाऽदिविषयज्ञानवत एव कर्तृत्वात् । न च सर्वज्ञत्वं प्रसिद्धम् । अतस्तद्वत् न कुत्रापि अप्रसिद्धसाध्यस्य दूषणत्वमिति । अनेनैव व्यधिकरणत्वेऽपि साधकत्वं चोपपादितं भवति। भूभूधराऽदिनिष्ठेन कार्यत्वेन हेतुना ईश्वरे सर्वज्ञत्वसिद्ध्यङ्गीकारात् न कुत्रापि साध्यसाधनयोर्व्यधिकरणत्वं दूषणमिति । एतेनैव अवयवनियमश्च परास्तः । न हि पक्षधर्मताबलेन सर्वज्ञत्वसिद्धाववयवनियमोऽस्ति ।" |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "नन्वप्रसिद्धसाध्ययोः परिशेषार्थापत्त्योः प्रामाण्याभ्युपगमेऽपि किमायातमप्रसिद्धसाध्यस्यानुमानस्य साधकत्वे ? इत्यत आह\nपरिशेषोऽर्थापत्तिरनुमानमित्यविशेषः ।\nअप्रसिद्धसाध्यस्य परिशेषादेः साधकत्वे अनुमानस्यैव तदुक्तं स्यात् । परिशेषादिरनुमानमित्यनतिभिन्नार्थत्वात् ।\nतत्कुतः ? इत्यत आह\nउपपत्तिमात्रत्वात्\nइहोपपत्तिरन्यथानुपपत्तिर्ज्ञातव्या ।\nपरिशेषार्थापत्त्योः अन्यथानुपपत्तित्वेऽपि कुतोऽनुमानत्वं ? इत्यत आह\nउपपत्तेश्च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्येत्याग्रहमात्रेण भेदः ।\nअन्यथानुपपत्तिर्हि केनचित् विना कस्यचिदसम्भवः । असम्भवश्च न तावदनुत्पत्तिः । बहिर्भावादिनाऽपि गूहाभावादेरजन्यत्वात् । अतोऽनवस्थानमेवासम्भव इति वाच्यम् । तस्य च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्या । केनचिद्विना कस्यचिदनवस्थानं हि तयोर्व्याप्तिं विना नोपपद्यते । व्याप्त्यपेक्षया अर्थावगमकमनुमानमिति चोक्तम् ।\nएवमपि परिशेषादेरनुमानत्वानङ्गीकारे धूमोऽप्यन्यथानुपपत्त्या अग्निं गमयन् नानुमानं स्यात् । अतो दुर्दर्शनाभ्यासविशेषविजृम्भिताऽग्रहमात्रेण अनुमानात् अर्थापत्यादेर्भेदो वादिभिरङ्गीक्रियत इति ।\nप्रसङ्गात् उपमानस्याप्यनुमानत्वं प्रागुक्तं साधयितुमाह–\nउपमानस्यापि\nअपिपदेन ‘आग्रहमात्रेण भेदः’ इत्यनुकृष्यते ॥\nकुतः ? इत्यत आह\nव्याप्तिरूपत्वात्\nव्याप्तिसापेक्षमर्थगमकं ह्यनुमानम् । उपमानस्यापि व्याप्तिसापेक्षत्वात् नानुमानात् भेदः ॥\nकथमुपमाने व्याप्तिः ? इत्यतस्तामुपपादयति\n.न हि स्वसदृशेनासदृशं क्वचित् दृष्टम्\n‘यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तेन सदृशः’ इति हि व्याप्तिरुपमाने विवक्षिता । ‘न हि यत् येन सदृशं तत् तेन असदृशं क्वापि दृष्टम्’ येनेयं व्याप्तिरनुपपन्ना स्यादिति मीमांसकोपमानस्य व्याप्तिरुपपादिता भवति । नैयायिकोपमानेऽपि न हि योऽगोत्वे सति गोसदृशः असौ गवयशब्दवाच्यात् अन्यो दृष्ट’ इत्यादिरूपेण व्याप्तिरुपपादनीया ।\nअभावप्रमाणस्यापि अनुमानेऽन्तर्भावमुपपादयति\nयोग्यानुपलब्धेश्च लिङ्गत्वम्\nभावानुपलब्धिरभावप्रमाणमङ्गीक्रियते । सापि अर्थे लिङ्गमेव । न तु पृथक्प्रमाणम् । कुतः ? न ह्यनुपलब्धिमात्रमभावगमकमङ्गीक्रियते । किं तु ? उपलब्धियोग्यस्यानुपलब्धिः । तथापि कुतोऽनुमानत्वं इत्यत आह\nअविशेषात्\nअनुपलब्धिमभावप्रमाणमङ्गीकुर्वता योग्यस्यानुपलब्धिरिति कस्मादुच्यते ? अनुपलब्धिमात्रस्य अभावव्यभिचारादिति चेत् । तत् किं योग्यानुपलब्धिरभावाव्यभिचारिणी ? बाढमिति चेत् हन्त तर्हि व्याप्तिसापेक्षा अर्थं गमयतीत्यङ्गीकृतं स्यात् । तथा च प्रसिद्धानुमादविशेषादनुमानमेवेति ।\nकिं चानुपलब्धेरभावगमकत्वे अभावत्वाविशेषात् अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षेत्यनवस्था स्यादित्याह–\nअविशेषात्\nअस्मत्पक्षे स्वप्रकाशसाक्षिसिद्धत्वाददोषः ।\nन च वाच्यमनुपलब्धिरज्ञातैवार्थं बोधयतीति । तथासत्यनुपलब्धित्वाविशेषात् सुषुप्त्यादावपि बोधयेदित्याह–\nअविशेषात्\nनच चक्षुरादिवदुपपत्तिः । तस्य सम्प्रयोगादिविशेषापेक्षत्वात् । अनुपलब्धेस्तदभावादित्याह–\nअविशेषात्\nत्रिविधो विरोध इत्यादिनोक्तस्योपयोगमाह–\nउक्तदोषेष्वेवाशेषानुमानदोषाणामन्तर्भावः\nये प्रतिज्ञाविराधादयो दोषा उक्ताः तेष्वेव अशेषानुमानदोषाणां हेत्वाभासादीनामन्तर्भावः । अतो नोक्तदोषातिरेक इति । तत्र प्रबलप्रमाणविरोधः कालातीतः । समबलेन हेत्वन्तरेण विरोधः सन्देहतो व्याप्यत्वासिद्धिः सत्प्रतिपक्षश्चेत्युक्तम् । तेनैव हेतुना चेत् प्रकरणसमः । असिद्धिः स्वरूपासिद्धिः । व्यर्थविशेषणासिद्ध्यादेराधिक्ये अन्तर्भावः ।\nव्याप्यत्वासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितानामव्याप्तौ । आद्यस्य साध्यसम्बन्धाभावात् । उत्तरयोस्तु विपक्षवृत्तित्वेन साध्यव्यभिचारात् । अनध्यवसितस्यापि पक्ष एव वर्तमानत्वेन व्याप्तेरग्रहणात् । व्यतिरेकव्याप्तिस्तत्र गृह्यतामिति चेन्न । सपक्षविपक्षाभावे सपक्षमात्रभावे वा तदयोगात् । सपक्षविपक्षभावे च अन्वयस्यैव प्रथमप्राप्तत्वेन सत्यपि सपक्षे तदनुपलब्धौ व्याप्त्यनिश्चयात् । सपक्षैकदेशवृत्यन्वयव्यतिरेकिवत् अस्य व्याप्तिः किं न गृह्यते ? इति चेन्न । सपक्षैकृदेशेऽपि अवृत्त्या किमत्र व्याप्तिरेव नास्ति ? उत सपक्षैकदेशवृत्तिवत् अस्ति व्याप्तिः ? इति सन्देहावस्कन्दनात् ।\nव्यतिरेकतोऽनैकान्तिक एवानध्यवसित इत्येके । तदसत् । सपक्षविपक्षरहिते तदयोगात् । असिद्धविरुद्धयोरपि तत्त्वप्रसङ्गाच्चेति ।दृष्टान्तविरोध एव उदाहरणाभासानामन्तर्भावः । आश्रयहीनत्वं पूर्ववत् अदूषणम् । अव्याप्त्यभिधानं न्यूने विपरीत व्याप्त्यभिधानं असङ्गतौ । तर्कपराहतेरसिद्ध्यादाविति ।\nतथापि साध्याविशिष्टत्वं हेतोर्दूषणान्तरमस्तीत्यत आह\nसाध्याविशिष्टोऽसिद्धः\nपर्वतोऽग्निमान् अग्निमत्वादिति साध्याविशिष्टो हेतुरसिद्ध एवान्तर्भवति । साध्यमेव ह्यत्र हेतुः । न हि साध्यं सिद्धम् । व्याहतेरेव । न च वाच्यं साध्याविशिष्टो हेतुरव्याप्तौ किं नान्तर्भवति ? व्याप्तेरुभयधर्मत्वेन स्वेनैव स्वस्य व्याप्त्ययोगादिति । विवक्षितस्थले लिङ्गदर्शनानन्तरं हि व्याप्तिस्मृतिः स्यात् । तत्र साध्यभूतलिङ्गस्य अदर्शनेनैव अनुमानदोषसिद्धौ व्याप्तिचिन्ताया एवानुदयात् । आश्रयासिद्धिरदूषणमित्युक्तम् । तत् किं सर्वापि ? न धर्म्यभावादिनिमित्तैव । यदभाषता असत्यपि व्याप्तिरस्तीत्यादि । अत्र भगवत्पादोक्तं ज्ञापकमाह यदभाषतेति ॥ असत्यपीति ॥ प्रयोजिका च व्याप्तिरसत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् इति तदर्थः पूर्वमुक्तो द्रष्टव्यः ।\nतर्हि सिद्धसाधकत्वं दोषान्तरमस्तीत्यत आह\n.सिद्धसाधकोऽसङ्गतः ।\nबुभुत्सितसाधनस्यैव सङ्गतत्वात् सिद्धसाधकोऽसङ्गतो भवति ।\nएवं प्रमाणतदाभासस्वरूपं निरूप्य स्वोक्तलक्षणदृढीकरणाय वाद्यन्तरोक्तलक्षणानि निराकुर्वन् भाट्टानां लक्षणं तावन्निराचष्टे\n.न प्रमासाधनं प्रमाणम्\nप्रमेयगतं ज्ञाततापरपर्यायं प्राकट्यं प्रमेत्युच्यते । तत्साधनं प्रमाणम् अत्र प्रमाग्रहणं कुठारादिव्यावृत्त्यर्थम् । साधनग्रहणं प्रमायामतिव्याप्तिं प्रत्यक्षादावसम्भवं च व्यवच्छिनत्ति । न चेन्द्रियसन्निकर्षादावव्याप्तिः । ज्ञानस्यैव मुख्यतः प्रामाण्यात् । न च भ्रमादावतिव्याप्तिः । अर्थानुसारिणो ज्ञातता विशेषस्यैव प्रमात्वात् । भ्रमादिना च तदजननात् । इदमित्याद्याकारेण जननेऽपि तत्र प्रामाण्याभ्युपगमात् । ज्ञाते पुनर्ज्ञाततानुदयेन न स्मृतावतिव्याप्तिः । साधनग्रहणेनैव प्रमात्रादिव्युदास इति ।\nतदेतल्लक्षणं नोपपद्यते । कुतः ? इत्यत आह\nज्ञानव्यतिरिक्तप्रमायां प्रमाणाभावात्\nप्रमेयाश्रयायाः प्रमाया एवाभावेन असम्भवित्वादयुक्तमिदं लक्षणम् । न हि प्रमेयनिष्ठप्रमायां प्रमाणमस्ति । ज्ञातो घटः, प्रकटो घटः इति प्रमेयधर्मतया प्रमा प्रत्यक्षत एवानुभूयत इत्यत उक्तम् ॥ ज्ञानव्यतिरिक्तेति ॥ ज्ञातो घटः इत्यादौ हि ज्ञानमेवप्रमेयविशेषणतया दृश्यते । न तु ततोऽन्या प्रमेति । न च आत्मधर्मस्य ज्ञानस्य प्रमेयविशेषणताऽनुपपत्तिः । इष्टो घटः इत्यादावपि तदभावापातात् । विषयविषयिभावात् तत्रोपपत्तिरिति चेत् समं प्रकृतेऽति । न च वाच्यं ज्ञातताऽभावे ज्ञानस्य विषयनियम एव अयुक्तः । यदाकारं यत् विज्ञानं तत् तद्विषयमिति हि बौद्धानामेव शोभत इति । तथा सति इच्छादीनामपि विषयनियमाभावप्रसङ्गादिति ॥ करणविषयतया तत्रोपपत्तिरिति चेत् तुल्यम् । अन्यथा तेनैव ज्ञानेन अत्रैव ज्ञातता जायत इति नियमो न स्यादिति ।\nअन्यस्त्वाह, प्रमासाधनत्वमेव लक्षणम् । प्रमा च नार्थप्राकट्यम् । किं तु ? अज्ञातार्थस्य यथार्थज्ञानम् । अतो नोक्तदूषणमित्यत आह\nन चाज्ञातपरिच्छित्तिरेव प्रमेत्यत्र किञ्चिन्मानम्\nपरिच्छित्तिरिति यथार्थज्ञानमुच्यते । अज्ञातेति स्मृतिसाधनव्युदासार्थम् । यथार्थग्रहणं भ्रमादिसाधनव्युदासार्थम् । अस्तु नाम अज्ञातपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधनं च प्रमाणम् ॥\nतथापि न लक्षणमेतद्युक्तम् ज्ञातपरिच्छित्तेरपि प्रमात्वेन तत्साधनस्य च प्रमाणत्वेन तत्राव्याप्तेः । न हि ज्ञातपरिच्छित्यादेः अमात्वादौ प्रमाणमस्ति । ज्ञातपरिच्छित्त्यादेः प्रमात्वादौ स्मृत्यादेरपि तत् स्यादित्यत आह\nयाथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकारात्\nस्मृत्यादेः प्रमात्वादिप्रसङ्गो नानिष्टः । याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकुर्वद्भिः स्मृत्यादिकस्य प्रमात्वादेरङ्गीकृतत्वादिति ।\nप्राभाकराणां लक्षणं दूषयति ।\nन चानुभूतिरेव प्रमाणम्\nस्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानमनुभूतिः । स्मृतिश्च संस्कारमात्रजं ज्ञानम् । न च अयथार्थानुभवे अतिव्याप्तिः । ‘प्रमाणं स्मृतिश्च नः प्रत्ययः’ इत्यङ्गीकृतत्वेन तत्स्वरूपस्यैवानभ्युपगमात् । व्यवहारस्तु ग्रहणस्मरणयोरेव ग्रहणयोरेव वा स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहमात्रेण भवतीति । एतदपि लक्षणमयुक्तम् । कुतः ? इत्यत आह\n. स्मृत्यादावव्याप्तेः\nआदिपदेन वेदाद्यनुप्रमाणसङ्ग्रहः ।\nस्मृत्यादेः सति प्रामाण्ये भवेदव्याप्तिदोषः । तदेव कुतः? इत्यत आह\nवेदादिप्रामाण्यप्रसिद्धेश्च\nअत्र आदिपदेन स्मृत्यादिग्रहणम् । प्रसिद्धिर्लौकिकी । न हि सा निर्मूला याथार्थ्यहेतुसिद्धा ।" | | "lines": [ |
| | "नन्वप्रसिद्धसाध्ययोः परिशेषार्थापत्त्योः प्रामाण्याभ्युपगमेऽपि किमायातमप्रसिद्धसाध्यस्यानुमानस्य साधकत्वे ? इत्यत आह", |
| | "परिशेषोऽर्थापत्तिरनुमानमित्यविशेषः ।", |
| | "अप्रसिद्धसाध्यस्य परिशेषादेः साधकत्वे अनुमानस्यैव तदुक्तं स्यात् । परिशेषादिरनुमानमित्यनतिभिन्नार्थत्वात् ।", |
| | "तत्कुतः ? इत्यत आह", |
| | "उपपत्तिमात्रत्वात्", |
| | "इहोपपत्तिरन्यथानुपपत्तिर्ज्ञातव्या ।", |
| | "परिशेषार्थापत्त्योः अन्यथानुपपत्तित्वेऽपि कुतोऽनुमानत्वं ? इत्यत आह", |
| | "उपपत्तेश्च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्येत्याग्रहमात्रेण भेदः ।", |
| | "अन्यथानुपपत्तिर्हि केनचित् विना कस्यचिदसम्भवः । असम्भवश्च न तावदनुत्पत्तिः । बहिर्भावादिनाऽपि गूहाभावादेरजन्यत्वात् । अतोऽनवस्थानमेवासम्भव इति वाच्यम् । तस्य च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथा अङ्गीकार्या । केनचिद्विना कस्यचिदनवस्थानं हि तयोर्व्याप्तिं विना नोपपद्यते । व्याप्त्यपेक्षया अर्थावगमकमनुमानमिति चोक्तम् ।", |
| | "एवमपि परिशेषादेरनुमानत्वानङ्गीकारे धूमोऽप्यन्यथानुपपत्त्या अग्निं गमयन् नानुमानं स्यात् । अतो दुर्दर्शनाभ्यासविशेषविजृम्भिताऽग्रहमात्रेण अनुमानात् अर्थापत्यादेर्भेदो वादिभिरङ्गीक्रियत इति ।", |
| | "प्रसङ्गात् उपमानस्याप्यनुमानत्वं प्रागुक्तं साधयितुमाह–", |
| | "उपमानस्यापि", |
| | "अपिपदेन ‘आग्रहमात्रेण भेदः’ इत्यनुकृष्यते ॥", |
| | "कुतः ? इत्यत आह", |
| | "व्याप्तिरूपत्वात्", |
| | "व्याप्तिसापेक्षमर्थगमकं ह्यनुमानम् । उपमानस्यापि व्याप्तिसापेक्षत्वात् नानुमानात् भेदः ॥", |
| | "कथमुपमाने व्याप्तिः ? इत्यतस्तामुपपादयति", |
| | ".न हि स्वसदृशेनासदृशं क्वचित् दृष्टम्", |
| | "‘यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तेन सदृशः’ इति हि व्याप्तिरुपमाने विवक्षिता । ‘न हि यत् येन सदृशं तत् तेन असदृशं क्वापि दृष्टम्’ येनेयं व्याप्तिरनुपपन्ना स्यादिति मीमांसकोपमानस्य व्याप्तिरुपपादिता भवति । नैयायिकोपमानेऽपि न हि योऽगोत्वे सति गोसदृशः असौ गवयशब्दवाच्यात् अन्यो दृष्ट’ इत्यादिरूपेण व्याप्तिरुपपादनीया ।", |
| | "अभावप्रमाणस्यापि अनुमानेऽन्तर्भावमुपपादयति", |
| | "योग्यानुपलब्धेश्च लिङ्गत्वम्", |
| | "भावानुपलब्धिरभावप्रमाणमङ्गीक्रियते । सापि अर्थे लिङ्गमेव । न तु पृथक्प्रमाणम् । कुतः ? न ह्यनुपलब्धिमात्रमभावगमकमङ्गीक्रियते । किं तु ? उपलब्धियोग्यस्यानुपलब्धिः । तथापि कुतोऽनुमानत्वं इत्यत आह", |
| | "अविशेषात्", |
| | "अनुपलब्धिमभावप्रमाणमङ्गीकुर्वता योग्यस्यानुपलब्धिरिति कस्मादुच्यते ? अनुपलब्धिमात्रस्य अभावव्यभिचारादिति चेत् । तत् किं योग्यानुपलब्धिरभावाव्यभिचारिणी ? बाढमिति चेत् हन्त तर्हि व्याप्तिसापेक्षा अर्थं गमयतीत्यङ्गीकृतं स्यात् । तथा च प्रसिद्धानुमादविशेषादनुमानमेवेति ।", |
| | "किं चानुपलब्धेरभावगमकत्वे अभावत्वाविशेषात् अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षेत्यनवस्था स्यादित्याह–", |
| | "अविशेषात्", |
| | "अस्मत्पक्षे स्वप्रकाशसाक्षिसिद्धत्वाददोषः ।", |
| | "न च वाच्यमनुपलब्धिरज्ञातैवार्थं बोधयतीति । तथासत्यनुपलब्धित्वाविशेषात् सुषुप्त्यादावपि बोधयेदित्याह–", |
| | "अविशेषात्", |
| | "नच चक्षुरादिवदुपपत्तिः । तस्य सम्प्रयोगादिविशेषापेक्षत्वात् । अनुपलब्धेस्तदभावादित्याह–", |
| | "अविशेषात्", |
| | "त्रिविधो विरोध इत्यादिनोक्तस्योपयोगमाह–", |
| | "उक्तदोषेष्वेवाशेषानुमानदोषाणामन्तर्भावः", |
| | "ये प्रतिज्ञाविराधादयो दोषा उक्ताः तेष्वेव अशेषानुमानदोषाणां हेत्वाभासादीनामन्तर्भावः । अतो नोक्तदोषातिरेक इति । तत्र प्रबलप्रमाणविरोधः कालातीतः । समबलेन हेत्वन्तरेण विरोधः सन्देहतो व्याप्यत्वासिद्धिः सत्प्रतिपक्षश्चेत्युक्तम् । तेनैव हेतुना चेत् प्रकरणसमः । असिद्धिः स्वरूपासिद्धिः । व्यर्थविशेषणासिद्ध्यादेराधिक्ये अन्तर्भावः ।", |
| | "व्याप्यत्वासिद्धविरुद्धानैकान्तिकानध्यवसितानामव्याप्तौ । आद्यस्य साध्यसम्बन्धाभावात् । उत्तरयोस्तु विपक्षवृत्तित्वेन साध्यव्यभिचारात् । अनध्यवसितस्यापि पक्ष एव वर्तमानत्वेन व्याप्तेरग्रहणात् । व्यतिरेकव्याप्तिस्तत्र गृह्यतामिति चेन्न । सपक्षविपक्षाभावे सपक्षमात्रभावे वा तदयोगात् । सपक्षविपक्षभावे च अन्वयस्यैव प्रथमप्राप्तत्वेन सत्यपि सपक्षे तदनुपलब्धौ व्याप्त्यनिश्चयात् । सपक्षैकदेशवृत्यन्वयव्यतिरेकिवत् अस्य व्याप्तिः किं न गृह्यते ? इति चेन्न । सपक्षैकृदेशेऽपि अवृत्त्या किमत्र व्याप्तिरेव नास्ति ? उत सपक्षैकदेशवृत्तिवत् अस्ति व्याप्तिः ? इति सन्देहावस्कन्दनात् ।", |
| | "व्यतिरेकतोऽनैकान्तिक एवानध्यवसित इत्येके । तदसत् । सपक्षविपक्षरहिते तदयोगात् । असिद्धविरुद्धयोरपि तत्त्वप्रसङ्गाच्चेति ।दृष्टान्तविरोध एव उदाहरणाभासानामन्तर्भावः । आश्रयहीनत्वं पूर्ववत् अदूषणम् । अव्याप्त्यभिधानं न्यूने विपरीत व्याप्त्यभिधानं असङ्गतौ । तर्कपराहतेरसिद्ध्यादाविति ।", |
| | "तथापि साध्याविशिष्टत्वं हेतोर्दूषणान्तरमस्तीत्यत आह", |
| | "साध्याविशिष्टोऽसिद्धः", |
| | "पर्वतोऽग्निमान् अग्निमत्वादिति साध्याविशिष्टो हेतुरसिद्ध एवान्तर्भवति । साध्यमेव ह्यत्र हेतुः । न हि साध्यं सिद्धम् । व्याहतेरेव । न च वाच्यं साध्याविशिष्टो हेतुरव्याप्तौ किं नान्तर्भवति ? व्याप्तेरुभयधर्मत्वेन स्वेनैव स्वस्य व्याप्त्ययोगादिति । विवक्षितस्थले लिङ्गदर्शनानन्तरं हि व्याप्तिस्मृतिः स्यात् । तत्र साध्यभूतलिङ्गस्य अदर्शनेनैव अनुमानदोषसिद्धौ व्याप्तिचिन्ताया एवानुदयात् । आश्रयासिद्धिरदूषणमित्युक्तम् । तत् किं सर्वापि ? न धर्म्यभावादिनिमित्तैव । यदभाषता असत्यपि व्याप्तिरस्तीत्यादि । अत्र भगवत्पादोक्तं ज्ञापकमाह यदभाषतेति ॥ असत्यपीति ॥ प्रयोजिका च व्याप्तिरसत्यप्याश्रये साध्यसाधनयोरस्त्येव । ‘वन्ध्यासुतो न वक्ता अचेतनत्वात्’ इत्यादौ दर्शनात् इति तदर्थः पूर्वमुक्तो द्रष्टव्यः ।", |
| | "तर्हि सिद्धसाधकत्वं दोषान्तरमस्तीत्यत आह", |
| | ".सिद्धसाधकोऽसङ्गतः ।", |
| | "बुभुत्सितसाधनस्यैव सङ्गतत्वात् सिद्धसाधकोऽसङ्गतो भवति ।", |
| | "एवं प्रमाणतदाभासस्वरूपं निरूप्य स्वोक्तलक्षणदृढीकरणाय वाद्यन्तरोक्तलक्षणानि निराकुर्वन् भाट्टानां लक्षणं तावन्निराचष्टे", |
| | ".न प्रमासाधनं प्रमाणम्", |
| | "प्रमेयगतं ज्ञाततापरपर्यायं प्राकट्यं प्रमेत्युच्यते । तत्साधनं प्रमाणम् अत्र प्रमाग्रहणं कुठारादिव्यावृत्त्यर्थम् । साधनग्रहणं प्रमायामतिव्याप्तिं प्रत्यक्षादावसम्भवं च व्यवच्छिनत्ति । न चेन्द्रियसन्निकर्षादावव्याप्तिः । ज्ञानस्यैव मुख्यतः प्रामाण्यात् । न च भ्रमादावतिव्याप्तिः । अर्थानुसारिणो ज्ञातता विशेषस्यैव प्रमात्वात् । भ्रमादिना च तदजननात् । इदमित्याद्याकारेण जननेऽपि तत्र प्रामाण्याभ्युपगमात् । ज्ञाते पुनर्ज्ञाततानुदयेन न स्मृतावतिव्याप्तिः । साधनग्रहणेनैव प्रमात्रादिव्युदास इति ।", |
| | "तदेतल्लक्षणं नोपपद्यते । कुतः ? इत्यत आह", |
| | "ज्ञानव्यतिरिक्तप्रमायां प्रमाणाभावात्", |
| | "प्रमेयाश्रयायाः प्रमाया एवाभावेन असम्भवित्वादयुक्तमिदं लक्षणम् । न हि प्रमेयनिष्ठप्रमायां प्रमाणमस्ति । ज्ञातो घटः, प्रकटो घटः इति प्रमेयधर्मतया प्रमा प्रत्यक्षत एवानुभूयत इत्यत उक्तम् ॥ ज्ञानव्यतिरिक्तेति ॥ ज्ञातो घटः इत्यादौ हि ज्ञानमेवप्रमेयविशेषणतया दृश्यते । न तु ततोऽन्या प्रमेति । न च आत्मधर्मस्य ज्ञानस्य प्रमेयविशेषणताऽनुपपत्तिः । इष्टो घटः इत्यादावपि तदभावापातात् । विषयविषयिभावात् तत्रोपपत्तिरिति चेत् समं प्रकृतेऽति । न च वाच्यं ज्ञातताऽभावे ज्ञानस्य विषयनियम एव अयुक्तः । यदाकारं यत् विज्ञानं तत् तद्विषयमिति हि बौद्धानामेव शोभत इति । तथा सति इच्छादीनामपि विषयनियमाभावप्रसङ्गादिति ॥ करणविषयतया तत्रोपपत्तिरिति चेत् तुल्यम् । अन्यथा तेनैव ज्ञानेन अत्रैव ज्ञातता जायत इति नियमो न स्यादिति ।", |
| | "अन्यस्त्वाह, प्रमासाधनत्वमेव लक्षणम् । प्रमा च नार्थप्राकट्यम् । किं तु ? अज्ञातार्थस्य यथार्थज्ञानम् । अतो नोक्तदूषणमित्यत आह", |
| | "न चाज्ञातपरिच्छित्तिरेव प्रमेत्यत्र किञ्चिन्मानम्", |
| | "परिच्छित्तिरिति यथार्थज्ञानमुच्यते । अज्ञातेति स्मृतिसाधनव्युदासार्थम् । यथार्थग्रहणं भ्रमादिसाधनव्युदासार्थम् । अस्तु नाम अज्ञातपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधनं च प्रमाणम् ॥", |
| | "तथापि न लक्षणमेतद्युक्तम् ज्ञातपरिच्छित्तेरपि प्रमात्वेन तत्साधनस्य च प्रमाणत्वेन तत्राव्याप्तेः । न हि ज्ञातपरिच्छित्यादेः अमात्वादौ प्रमाणमस्ति । ज्ञातपरिच्छित्त्यादेः प्रमात्वादौ स्मृत्यादेरपि तत् स्यादित्यत आह", |
| | "याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकारात्", |
| | "स्मृत्यादेः प्रमात्वादिप्रसङ्गो नानिष्टः । याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकुर्वद्भिः स्मृत्यादिकस्य प्रमात्वादेरङ्गीकृतत्वादिति ।", |
| | "प्राभाकराणां लक्षणं दूषयति ।", |
| | "न चानुभूतिरेव प्रमाणम्", |
| | "स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानमनुभूतिः । स्मृतिश्च संस्कारमात्रजं ज्ञानम् । न च अयथार्थानुभवे अतिव्याप्तिः । ‘प्रमाणं स्मृतिश्च नः प्रत्ययः’ इत्यङ्गीकृतत्वेन तत्स्वरूपस्यैवानभ्युपगमात् । व्यवहारस्तु ग्रहणस्मरणयोरेव ग्रहणयोरेव वा स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहमात्रेण भवतीति । एतदपि लक्षणमयुक्तम् । कुतः ? इत्यत आह", |
| | ". स्मृत्यादावव्याप्तेः", |
| | "आदिपदेन वेदाद्यनुप्रमाणसङ्ग्रहः ।", |
| | "स्मृत्यादेः सति प्रामाण्ये भवेदव्याप्तिदोषः । तदेव कुतः? इत्यत आह", |
| | "वेदादिप्रामाण्यप्रसिद्धेश्च", |
| | "अत्र आदिपदेन स्मृत्यादिग्रहणम् । प्रसिद्धिर्लौकिकी । न हि सा निर्मूला याथार्थ्यहेतुसिद्धा ।" |
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| "text": "श्रौती चास्तीत्याह–\n‘‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्युमनुमानश्चतुष्टयम् । प्रमाणमिति विज्ञेयं धर्माद्यर्थे बुभूषुभिः’’ इति श्रुतेश्च ।\nनन्विदं शान्तिके कर्मणि वेतालोत्थानमिव । यावता स्मृत्यादिप्रामाण्यसिद्ध्यर्थं उदाहृतश्रुतौ ऐतिह्यं चतुर्थ प्रमाणमापतितमित्यत आह\nऐतिह्यमागमभेदः\nपुरावृत्तोक्तिरैतिह्यम् । तत् यथार्थमागम एवान्तर्भावति । ऐतिह्यमित्यशेषागमोपलक्षणम् । स्मृतिपदञ्च अशेषकेवलप्रमाणस्य । तथा च केवलमेकं अनुप्रमाणं प्रत्यक्षादिभेदेन त्रिविधमिति चतुष्टयमित्युक्तं भवति ।\nनैयायिकलक्षणं निराकरोति\nन च सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्\nसम्यग्ग्रहणं संशयविपर्ययापोहनम् । अनुभव इति कुठारादेर्निरासः । ज्ञानग्रहणे स्मृतौ प्रसङ्गादनुभवग्रहणम् । साधनग्रहणं फलात् भेदज्ञापनार्थं प्रमातृप्रमेयव्यवच्छेदार्थं चेति ॥\nएतदपि लक्षणं नोपपद्यते । कस्मात् ? इत्यत आह\nईश्वरज्ञानादावव्याप्तेः\nनैयायिकैः खल्वीश्वरस्यापि प्रमाण्यमङ्गीकृतम् । अतः तस्मिन्नीश्वरे तज्ज्ञाने अस्मदादिज्ञाने चाव्याप्तत्वादिदमलक्षणम् । न हीश्वरादेः सम्यगनुभवसाधनत्वमस्ति । ईश्वरातिरिक्तप्रमाणलक्षणं तत् इत्यङ्गीकारेऽपि तज्ज्ञानादावव्याप्तिरपरिहार्यैवेति ज्ञापनाय स्वरुपेण तज्ज्ञानग्रहणम् । ज्ञानं प्रमाणमेव न भवति । किं तु ? तत्फलमेव । अतः कथं तत्राव्याप्तिर्दूषणम् इत्यत आह\n.अप्रामाण्ये प्रमाणाभावाच्च\nज्ञानस्येति शेषः । चशब्देन ‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्यं’ इत्यादि प्रमाणविरोधं समुच्चिनोति ।\nसाक्षिज्ञानेऽपि अव्याप्तिं वक्तुं तस्य प्रामाण्यानङ्गीकारे बाधकं तावदाह–\nप्रामाण्यज्ञाने च\nप्रमाणाभावादिति चशब्देन अनुकृष्यते । तादर्थ्ये सप्तमी। साक्षिणोऽप्रामाण्ये सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमप्रामाणिकं स्यात् । प्रामाण्यज्ञानार्थं प्रमाणान्तराभावात् ।\nप्रामाण्यज्ञानार्थमपि सम्यगनुभवसाधनमेव किञ्चित् अङ्गीक्रियते । अतो न तस्याप्रमाणिकत्वापात इत्यत आह\nतत्राप्यङ्गीकारेऽनवस्थितेः\nयदि प्रामाण्यज्ञानार्थं सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणमङ्गीक्रियते तर्हि तत्प्रामाण्यं प्रामाणिकं न वा ? नेति पक्षे न स्यात् । आद्ये किं स्वेनैव सिद्धं ? प्रमाणान्तरेण वा ? नाद्यः अन्यत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये तस्यापि प्रामाण्यं प्रमाणान्तरवेद्यमित्यनवस्थितिः स्यात् । तस्मात् साक्षिज्ञानेनैव सर्वप्रमाणप्रामाण्यं ज्ञायत इत्यङ्गीकार्यम् । तस्य च स्वप्रकाशत्वेन स्वप्रामाण्यविषयत्वात् नानवस्था । ‘मामहं जानामि’ इति आत्मनः स्वप्रकाशत्वदर्शनात् । साक्षिणश्चात्मत्वादिति ।\nएवं स्वप्रकाशात्मरूपसाक्षिज्ञानस्य प्रमाणप्रामाण्यज्ञानार्थमङ्गीकारे किं स्यात् ? इत्यत आह\n.स्वप्रकाशात्माङ्गीकारे तत्राव्याप्तेः\nस्वप्रकाशात्मभूतसाक्षिज्ञाने प्रमाणे अङ्गीकृते तस्य सम्यगनुभवत्वेन तत्साधनत्वाभावात् तत्राव्याप्तेरयुक्तमेतल्लक्षणमिति ।\nयथार्थस्मृतावव्याप्तिश्च प्राक् आदिशब्देन सङ्गृहीता । तत्र स्मृतिर्न प्रमाणमिति न वाच्यम् । साधितत्वात् ।\nतदनङ्गीकारे बाधकं चाह–\nस्मृतेश्च प्रामाण्यानङ्गीकारे अनुभूतं मया इत्यत्र प्रमाणाभावात्\nयदि स्मृतिर्न प्रमाणं तर्ह्यनुभूतमप्रामाणिकं स्यात् । ‘अनुभूतं मयेदं’ इत्यत्र स्मृतिं विना प्रमाणाभावात् । सत्यम्, स्मृतिरेवानुभूते प्रमाणम् । किं नाम ? लिङ्गत्वेनैव । पटुतरो ह्यनुभवः संस्कारं जनयति । स च सदृशदर्शनादिना समुद्वुद्धः स्मृतिमिति ।\nसंस्कारजन्या स्मृतिः संस्कारे लिङ्गम् । स च पूर्वानुभवे भविष्यति । अतो नानुभूतस्याप्रामाणिकत्वं नापि लक्षणस्याव्याप्तिः । स्मृतेरपि सम्यगनुभवसाधनत्वादित्यत आह\nलिङ्गत्वेन प्रामाण्ये कल्पनागौरवम्\nयदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं कल्प्यते तर्हि कल्पनागौरवं स्यात् । साक्षात् अर्थ एव प्रामाण्यसम्भवेऽपि स्मृतेः संस्कारे लिङ्गत्वं, तस्यानुभव इत्यप्रामाणिकस्यानेकस्य कल्प्यमानत्वादिति ।\nदोषान्तरं चाह–\nदृष्टहानिश्च\nयदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं तर्हि पृथक्प्रमाणतया दृष्टस्य अपि प्रत्यक्षादेः लिङ्गत्वमेव स्यात् तत्रापि प्रत्यक्षादिना कर्मकारकस्यार्थस्यानुमानसम्भवात् । अतः प्रत्यक्षादिवत् स्मृतेरपि साक्षात्प्रामाण्यात् तत्राव्याप्तं परोक्तप्रमाणलक्षणमयुक्तमेवेति यथावस्थितार्थविषयत्वमेव लक्षणमुपपन्नमिति ।\nइदमपि लक्षणं न युक्तम् । द्विविध एव हि प्रत्ययः स्मृतिरनुभवश्चेति । तत्रानुभवः सर्वोऽपि प्रमाणमेव । स्मृतिरपि यदि प्रमाणं तदा यथावस्थितविशेषणस्य कृत्याभावादित्यत आह\nस्मृतिप्रमाणद्वैविध्यमात्रकल्पने मिथ्याज्ञानादेर्निरासादनुभवविरोधः\nस्मृतिश्च प्रमाणं चेति प्रत्ययद्वैविध्यमात्रकल्पनं युज्यते । तथा सति विपर्ययसंशययोः अपाकरणप्रसङ्गात् । न च तथास्त्विति वाच्यम् । विपर्ययादेरनुभवसिद्धत्वेन तद्विरोधादिति ।\nविपर्ययादिविषयोऽनुभव एव नास्ति । किन्तु ? व्यवहारमात्रमित्यत आह\nतदनुभवाभाव इत्युक्ते अनुभवः स्मृतिश्च नास्तीत्युक्ते किमुत्तरम्?\nयदि विपर्ययादिविषयोऽनुभवः स्वयं प्रकाशमानोऽपि नास्तीत्युच्यते तर्हि पराभ्युपगतं अनुभवमात्रं स्मृतिमात्रं च न स्यात् । अविशेषात् । तथा च जगदान्ध्यं स्यात् ॥\nअथ वा विपर्ययाद्यनङ्गीकारे दूषणान्तरमेतत् । यदि शुक्तिकायां ‘इदं रजतं’ इत्यादिरूपोविपर्ययाद्यनुभवो नास्ति किं तु ? पुरोवृत्यनुभवे सति रजतस्मृतौ तयोः स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहादेव ‘इदं रजतं’ इत्यादिव्यवहार इत्युच्यते तर्हि पुरोवृत्त्यनुभवो रजतस्मृतिश्च नास्तीति वदामः । ज्ञानपूर्वकत्वात् व्यवहारस्य कथं तदभावेऽसौ स्यात् ? इति चेत् हन्त तर्हि विशिष्टज्ञानपूर्वकत्वात् विशिष्टव्यवहारस्य कथमसावपि तद्विना स्यात् । स्मृत्यनुभवयोरगृहीतविवेकत्वेन विशिष्टज्ञानसादृश्यात् व्यवहार इति चेत् तर्हि अविवेकाग्रहेण अविशिष्टज्ञानसादृश्यात् तदभावस्याप्यापातः स्यात् । तस्मात् विपर्ययादेर्व्यावर्तनीयस्य सद्भावात् याथार्थ्यमेवोपपन्नं लक्षणमिति ।\nननु विपर्ययाद्यनुभवाभावे अनुभवस्मृत्योरभावः स्यादित्ययुक्तम् । अपसिद्धान्तप्रमाणबाधा सिद्धिदोषादिति चेन्न । तर्कस्य दूषणानुमानत्वात् । तथापि कुतो नापसिद्धान्तादि ? इत्यत आह\nस्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषणम्\nसाधनमेव स्वसिद्धान्तसिद्धन्यायैः कर्तव्यम् । न तु दूषणमपि । तत् परसिद्धन्यायैरपि भवति ।\nकिमतो यद्येवम् ? इत्यत आह\nअतो न दूषणे अपसिद्धान्तादि\nअतः परसिद्धन्यायेन परोक्तस्य दूषणीयत्वात् दूषणानुमाने नापसिद्धान्ताद्युद्भावनीयमिति ।\nस्वपक्षदोषमनुद्धृत्य प्रतिबन्दीग्रहणं मतानुज्ञेत्येके । तदनुपपन्नम् । प्रतिबन्दीग्रहणस्य परोक्तव्यभिचारोद्भावनरूपत्वेन बाधकतर्कोद्भावनरूपेण वा परोक्तदूषणत्वात् । स्वपक्षास्थापनेन प्रवृत्तेर्दोषत्वमिति चेत् तर्हि अप्राप्तकालसाङ्कर्यापातात् । स्वपक्षे दोषमनुद्धृत्य परस्येष्टापादनमित्यन्ये । तदप्यसत् । विशेषणासामर्थ्यात् । तस्मात् इष्टापादनमेव मतानुज्ञेति भावेन तत्स्वरूपानुवादेन सिंहावलोकनन्यायेन प्रकृतदूषणानुमानदोषस्य मतानुज्ञाया उक्तान्तर्भावमाह–\nइष्टापत्तिः सिद्धसाधनत्वात् असङ्गतमेव\nइष्टापादनरूपा मतानुज्ञा असङ्गतावन्तर्भूता । परसिद्धार्थसाधनस्वरूपत्वात् । सिद्धसाधनस्य च असङ्गतत्वमुक्तम् । अनिष्टापादनस्यैव सङ्गतत्वादिति न विरोधादिभ्यो दूषणान्तरमस्तीति । व्याप्त्यभावादीनामन्तर्भावस्तु स्फुटत्वान्नोक्तः ।" | | "lines": [ |
| | "श्रौती चास्तीत्याह–", |
| | "‘‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्युमनुमानश्चतुष्टयम् । प्रमाणमिति विज्ञेयं धर्माद्यर्थे बुभूषुभिः’’ इति श्रुतेश्च ।", |
| | "नन्विदं शान्तिके कर्मणि वेतालोत्थानमिव । यावता स्मृत्यादिप्रामाण्यसिद्ध्यर्थं उदाहृतश्रुतौ ऐतिह्यं चतुर्थ प्रमाणमापतितमित्यत आह", |
| | "ऐतिह्यमागमभेदः", |
| | "पुरावृत्तोक्तिरैतिह्यम् । तत् यथार्थमागम एवान्तर्भावति । ऐतिह्यमित्यशेषागमोपलक्षणम् । स्मृतिपदञ्च अशेषकेवलप्रमाणस्य । तथा च केवलमेकं अनुप्रमाणं प्रत्यक्षादिभेदेन त्रिविधमिति चतुष्टयमित्युक्तं भवति ।", |
| | "नैयायिकलक्षणं निराकरोति", |
| | "न च सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम्", |
| | "सम्यग्ग्रहणं संशयविपर्ययापोहनम् । अनुभव इति कुठारादेर्निरासः । ज्ञानग्रहणे स्मृतौ प्रसङ्गादनुभवग्रहणम् । साधनग्रहणं फलात् भेदज्ञापनार्थं प्रमातृप्रमेयव्यवच्छेदार्थं चेति ॥", |
| | "एतदपि लक्षणं नोपपद्यते । कस्मात् ? इत्यत आह", |
| | "ईश्वरज्ञानादावव्याप्तेः", |
| | "नैयायिकैः खल्वीश्वरस्यापि प्रमाण्यमङ्गीकृतम् । अतः तस्मिन्नीश्वरे तज्ज्ञाने अस्मदादिज्ञाने चाव्याप्तत्वादिदमलक्षणम् । न हीश्वरादेः सम्यगनुभवसाधनत्वमस्ति । ईश्वरातिरिक्तप्रमाणलक्षणं तत् इत्यङ्गीकारेऽपि तज्ज्ञानादावव्याप्तिरपरिहार्यैवेति ज्ञापनाय स्वरुपेण तज्ज्ञानग्रहणम् । ज्ञानं प्रमाणमेव न भवति । किं तु ? तत्फलमेव । अतः कथं तत्राव्याप्तिर्दूषणम् इत्यत आह", |
| | ".अप्रामाण्ये प्रमाणाभावाच्च", |
| | "ज्ञानस्येति शेषः । चशब्देन ‘स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्यं’ इत्यादि प्रमाणविरोधं समुच्चिनोति ।", |
| | "साक्षिज्ञानेऽपि अव्याप्तिं वक्तुं तस्य प्रामाण्यानङ्गीकारे बाधकं तावदाह–", |
| | "प्रामाण्यज्ञाने च", |
| | "प्रमाणाभावादिति चशब्देन अनुकृष्यते । तादर्थ्ये सप्तमी। साक्षिणोऽप्रामाण्ये सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमप्रामाणिकं स्यात् । प्रामाण्यज्ञानार्थं प्रमाणान्तराभावात् ।", |
| | "प्रामाण्यज्ञानार्थमपि सम्यगनुभवसाधनमेव किञ्चित् अङ्गीक्रियते । अतो न तस्याप्रमाणिकत्वापात इत्यत आह", |
| | "तत्राप्यङ्गीकारेऽनवस्थितेः", |
| | "यदि प्रामाण्यज्ञानार्थं सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणमङ्गीक्रियते तर्हि तत्प्रामाण्यं प्रामाणिकं न वा ? नेति पक्षे न स्यात् । आद्ये किं स्वेनैव सिद्धं ? प्रमाणान्तरेण वा ? नाद्यः अन्यत्रापि तत्प्रसङ्गात् । द्वितीये तस्यापि प्रामाण्यं प्रमाणान्तरवेद्यमित्यनवस्थितिः स्यात् । तस्मात् साक्षिज्ञानेनैव सर्वप्रमाणप्रामाण्यं ज्ञायत इत्यङ्गीकार्यम् । तस्य च स्वप्रकाशत्वेन स्वप्रामाण्यविषयत्वात् नानवस्था । ‘मामहं जानामि’ इति आत्मनः स्वप्रकाशत्वदर्शनात् । साक्षिणश्चात्मत्वादिति ।", |
| | "एवं स्वप्रकाशात्मरूपसाक्षिज्ञानस्य प्रमाणप्रामाण्यज्ञानार्थमङ्गीकारे किं स्यात् ? इत्यत आह", |
| | ".स्वप्रकाशात्माङ्गीकारे तत्राव्याप्तेः", |
| | "स्वप्रकाशात्मभूतसाक्षिज्ञाने प्रमाणे अङ्गीकृते तस्य सम्यगनुभवत्वेन तत्साधनत्वाभावात् तत्राव्याप्तेरयुक्तमेतल्लक्षणमिति ।", |
| | "यथार्थस्मृतावव्याप्तिश्च प्राक् आदिशब्देन सङ्गृहीता । तत्र स्मृतिर्न प्रमाणमिति न वाच्यम् । साधितत्वात् ।", |
| | "तदनङ्गीकारे बाधकं चाह–", |
| | "स्मृतेश्च प्रामाण्यानङ्गीकारे अनुभूतं मया इत्यत्र प्रमाणाभावात्", |
| | "यदि स्मृतिर्न प्रमाणं तर्ह्यनुभूतमप्रामाणिकं स्यात् । ‘अनुभूतं मयेदं’ इत्यत्र स्मृतिं विना प्रमाणाभावात् । सत्यम्, स्मृतिरेवानुभूते प्रमाणम् । किं नाम ? लिङ्गत्वेनैव । पटुतरो ह्यनुभवः संस्कारं जनयति । स च सदृशदर्शनादिना समुद्वुद्धः स्मृतिमिति ।", |
| | "संस्कारजन्या स्मृतिः संस्कारे लिङ्गम् । स च पूर्वानुभवे भविष्यति । अतो नानुभूतस्याप्रामाणिकत्वं नापि लक्षणस्याव्याप्तिः । स्मृतेरपि सम्यगनुभवसाधनत्वादित्यत आह", |
| | "लिङ्गत्वेन प्रामाण्ये कल्पनागौरवम्", |
| | "यदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं कल्प्यते तर्हि कल्पनागौरवं स्यात् । साक्षात् अर्थ एव प्रामाण्यसम्भवेऽपि स्मृतेः संस्कारे लिङ्गत्वं, तस्यानुभव इत्यप्रामाणिकस्यानेकस्य कल्प्यमानत्वादिति ।", |
| | "दोषान्तरं चाह–", |
| | "दृष्टहानिश्च", |
| | "यदि स्मृतेर्लिङ्गत्वेन प्रामाण्यं तर्हि पृथक्प्रमाणतया दृष्टस्य अपि प्रत्यक्षादेः लिङ्गत्वमेव स्यात् तत्रापि प्रत्यक्षादिना कर्मकारकस्यार्थस्यानुमानसम्भवात् । अतः प्रत्यक्षादिवत् स्मृतेरपि साक्षात्प्रामाण्यात् तत्राव्याप्तं परोक्तप्रमाणलक्षणमयुक्तमेवेति यथावस्थितार्थविषयत्वमेव लक्षणमुपपन्नमिति ।", |
| | "इदमपि लक्षणं न युक्तम् । द्विविध एव हि प्रत्ययः स्मृतिरनुभवश्चेति । तत्रानुभवः सर्वोऽपि प्रमाणमेव । स्मृतिरपि यदि प्रमाणं तदा यथावस्थितविशेषणस्य कृत्याभावादित्यत आह", |
| | "स्मृतिप्रमाणद्वैविध्यमात्रकल्पने मिथ्याज्ञानादेर्निरासादनुभवविरोधः", |
| | "स्मृतिश्च प्रमाणं चेति प्रत्ययद्वैविध्यमात्रकल्पनं युज्यते । तथा सति विपर्ययसंशययोः अपाकरणप्रसङ्गात् । न च तथास्त्विति वाच्यम् । विपर्ययादेरनुभवसिद्धत्वेन तद्विरोधादिति ।", |
| | "विपर्ययादिविषयोऽनुभव एव नास्ति । किन्तु ? व्यवहारमात्रमित्यत आह", |
| | "तदनुभवाभाव इत्युक्ते अनुभवः स्मृतिश्च नास्तीत्युक्ते किमुत्तरम्?", |
| | "यदि विपर्ययादिविषयोऽनुभवः स्वयं प्रकाशमानोऽपि नास्तीत्युच्यते तर्हि पराभ्युपगतं अनुभवमात्रं स्मृतिमात्रं च न स्यात् । अविशेषात् । तथा च जगदान्ध्यं स्यात् ॥", |
| | "अथ वा विपर्ययाद्यनङ्गीकारे दूषणान्तरमेतत् । यदि शुक्तिकायां ‘इदं रजतं’ इत्यादिरूपोविपर्ययाद्यनुभवो नास्ति किं तु ? पुरोवृत्यनुभवे सति रजतस्मृतौ तयोः स्वरूपतो विषयतश्च विवेकाग्रहादेव ‘इदं रजतं’ इत्यादिव्यवहार इत्युच्यते तर्हि पुरोवृत्त्यनुभवो रजतस्मृतिश्च नास्तीति वदामः । ज्ञानपूर्वकत्वात् व्यवहारस्य कथं तदभावेऽसौ स्यात् ? इति चेत् हन्त तर्हि विशिष्टज्ञानपूर्वकत्वात् विशिष्टव्यवहारस्य कथमसावपि तद्विना स्यात् । स्मृत्यनुभवयोरगृहीतविवेकत्वेन विशिष्टज्ञानसादृश्यात् व्यवहार इति चेत् तर्हि अविवेकाग्रहेण अविशिष्टज्ञानसादृश्यात् तदभावस्याप्यापातः स्यात् । तस्मात् विपर्ययादेर्व्यावर्तनीयस्य सद्भावात् याथार्थ्यमेवोपपन्नं लक्षणमिति ।", |
| | "ननु विपर्ययाद्यनुभवाभावे अनुभवस्मृत्योरभावः स्यादित्ययुक्तम् । अपसिद्धान्तप्रमाणबाधा सिद्धिदोषादिति चेन्न । तर्कस्य दूषणानुमानत्वात् । तथापि कुतो नापसिद्धान्तादि ? इत्यत आह", |
| | "स्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषणम्", |
| | "साधनमेव स्वसिद्धान्तसिद्धन्यायैः कर्तव्यम् । न तु दूषणमपि । तत् परसिद्धन्यायैरपि भवति ।", |
| | "किमतो यद्येवम् ? इत्यत आह", |
| | "अतो न दूषणे अपसिद्धान्तादि", |
| | "अतः परसिद्धन्यायेन परोक्तस्य दूषणीयत्वात् दूषणानुमाने नापसिद्धान्ताद्युद्भावनीयमिति ।", |
| | "स्वपक्षदोषमनुद्धृत्य प्रतिबन्दीग्रहणं मतानुज्ञेत्येके । तदनुपपन्नम् । प्रतिबन्दीग्रहणस्य परोक्तव्यभिचारोद्भावनरूपत्वेन बाधकतर्कोद्भावनरूपेण वा परोक्तदूषणत्वात् । स्वपक्षास्थापनेन प्रवृत्तेर्दोषत्वमिति चेत् तर्हि अप्राप्तकालसाङ्कर्यापातात् । स्वपक्षे दोषमनुद्धृत्य परस्येष्टापादनमित्यन्ये । तदप्यसत् । विशेषणासामर्थ्यात् । तस्मात् इष्टापादनमेव मतानुज्ञेति भावेन तत्स्वरूपानुवादेन सिंहावलोकनन्यायेन प्रकृतदूषणानुमानदोषस्य मतानुज्ञाया उक्तान्तर्भावमाह–", |
| | "इष्टापत्तिः सिद्धसाधनत्वात् असङ्गतमेव", |
| | "इष्टापादनरूपा मतानुज्ञा असङ्गतावन्तर्भूता । परसिद्धार्थसाधनस्वरूपत्वात् । सिद्धसाधनस्य च असङ्गतत्वमुक्तम् । अनिष्टापादनस्यैव सङ्गतत्वादिति न विरोधादिभ्यो दूषणान्तरमस्तीति । व्याप्त्यभावादीनामन्तर्भावस्तु स्फुटत्वान्नोक्तः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "एवं प्रमाणदिस्वरूपं निरूप्य तन्निरूपणस्य प्रयोजनादिकं दर्शयति\nआनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्काक्तिमार्गतः । प्रमाणलक्षणमित्युक्तं सङ्क्षेपाद्ब्रह्मसिद्धये ॥\nलक्षणादिनिरूपणेन संशोधितैरेव खलु वेदादिभिर्ब्रह्मज्ञानं भवति । तदिदं न वाद्यन्तरोक्तवदेवेति मन्तव्यम् । परमाप्ततमेन सुरवरावतारेणोक्तत्वादिति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआनन्दतीर्थमुनिनेति ॥\u003C/span\u003E यस्तु स्वप्रभावानभिज्ञः तं प्रत्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eब्रह्मतर्कोक्तिमार्गत इति ॥\u003C/span\u003E यस्तु अनधिगतब्रह्मतर्कोक्तिमार्गोऽपि तदनुजिवृक्षया आह - \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइत्युक्तमिति ॥\u003C/span\u003E युक्त्यादियुक्तता प्राक् प्रदर्शितेति इतिशब्देन स्मर्यते । यद्येवं कथं तर्हि स्वल्पेनैव ग्रन्थेन समाप्तं ? इत्यत उक्तम् ॥ सङ्क्षेपादिति ॥ श्रोतृबुद्धिमनुसृत्य शब्दसङ्क्षेपेणोक्तमिति ।" | | "lines": [ |
| | "एवं प्रमाणदिस्वरूपं निरूप्य तन्निरूपणस्य प्रयोजनादिकं दर्शयति", |
| | "आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्काक्तिमार्गतः । प्रमाणलक्षणमित्युक्तं सङ्क्षेपाद्ब्रह्मसिद्धये ॥", |
| | "लक्षणादिनिरूपणेन संशोधितैरेव खलु वेदादिभिर्ब्रह्मज्ञानं भवति । तदिदं न वाद्यन्तरोक्तवदेवेति मन्तव्यम् । परमाप्ततमेन सुरवरावतारेणोक्तत्वादिति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआनन्दतीर्थमुनिनेति ॥\u003C/span\u003E यस्तु स्वप्रभावानभिज्ञः तं प्रत्याह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eब्रह्मतर्कोक्तिमार्गत इति ॥\u003C/span\u003E यस्तु अनधिगतब्रह्मतर्कोक्तिमार्गोऽपि तदनुजिवृक्षया आह - \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइत्युक्तमिति ॥\u003C/span\u003E युक्त्यादियुक्तता प्राक् प्रदर्शितेति इतिशब्देन स्मर्यते । यद्येवं कथं तर्हि स्वल्पेनैव ग्रन्थेन समाप्तं ? इत्यत उक्तम् ॥ सङ्क्षेपादिति ॥ श्रोतृबुद्धिमनुसृत्य शब्दसङ्क्षेपेणोक्तमिति ।" |
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| "chapter": "PRL_C01", | | "chapter": "PRL_C01", |
| "text": "अथ समापितप्रकरणोऽपि भगवनाचार्यः स्वेष्टदेवतां प्रणमति\nअशेषमानमेयैकसाक्षिणेऽक्षयमूर्तये । अजेशपुरुहूतेड्य नमो नारायणाय ते ॥\n॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं प्रमाणलक्षणं सम्पूर्णम् ॥\nनारायणस्यैव प्रणामे को हेतुः ? इत्यतो यत् उक्तं प्रमाणादि तत् प्रेरकत्वेन नारायणस्यैव ? मुख्यतः तदभिज्ञत्वात् इति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअशेषेति ॥\u003C/span\u003E\nननु नारायणस्य शरीरमस्ति न वा आद्ये मरणादिप्रसङ्गः । द्वितीये कथं तस्येन्द्रियशून्यस्याशेषमानादिसाक्षित्वम् ? इत्यत उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअक्षयमूर्तय इति ॥\u003C/span\u003E अस्त्येवेश्वरस्य शरीरम् । तच्च सच्चिदानन्दादिरूपत्वेन अक्षयमेवेति न कश्चिद्दोष इति । अजादिवन्द्यत्वाच्च नारायण एव नमस्कार्य इति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअजेशेति ॥\u003C/span\u003E\n॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितस्य प्रमाणलक्षणस्य न्यायकल्पलता जयतीर्थभिक्षुविरचिता सम्पूर्णा ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ समापितप्रकरणोऽपि भगवनाचार्यः स्वेष्टदेवतां प्रणमति", |
| | "अशेषमानमेयैकसाक्षिणेऽक्षयमूर्तये । अजेशपुरुहूतेड्य नमो नारायणाय ते ॥", |
| | "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं प्रमाणलक्षणं सम्पूर्णम् ॥", |
| | "नारायणस्यैव प्रणामे को हेतुः ? इत्यतो यत् उक्तं प्रमाणादि तत् प्रेरकत्वेन नारायणस्यैव ? मुख्यतः तदभिज्ञत्वात् इति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअशेषेति ॥\u003C/span\u003E", |
| | "ननु नारायणस्य शरीरमस्ति न वा आद्ये मरणादिप्रसङ्गः । द्वितीये कथं तस्येन्द्रियशून्यस्याशेषमानादिसाक्षित्वम् ? इत्यत उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअक्षयमूर्तय इति ॥\u003C/span\u003E अस्त्येवेश्वरस्य शरीरम् । तच्च सच्चिदानन्दादिरूपत्वेन अक्षयमेवेति न कश्चिद्दोष इति । अजादिवन्द्यत्वाच्च नारायण एव नमस्कार्य इति भावेनोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअजेशेति ॥\u003C/span\u003E", |
| | "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितस्य प्रमाणलक्षणस्य न्यायकल्पलता जयतीर्थभिक्षुविरचिता सम्पूर्णा ॥" |
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