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| text | "प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमिति प्रतिज्ञातं निरूपयितुमाह– " |
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| text | "वादो जल्पो वितण्डेति ॥" |
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| tail | " वादादीनां लक्षणं निरूपयति– " |
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| text | "तत्वनिर्णयमित्यादिना ॥" |
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| tail | " केवलं तत्वनिर्णयं गुरुशिष्ययोरन्येषां वा सतां परस्परं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण समिता मनोहरा कथाऽसौ वाद इत्युच्यते । सत्सिद्धान्तं उत्सादयितुं यत्रासतः स्वपक्षसाधनं कुर्युस्तत्रासत्सु तत्वस्याकथनीयत्वात् स्वपक्षसाधनमकृत्वा सन्तस्तत्पक्षदूषणमेव कुर्युः , सेयं स्वपक्षस्थापनरहिता परपक्षदूषणरूपा कथा वितण्डेत्यर्थः । वादे तु प्रतिवादिना सहैव तत्वं निर्णेतव्यमिति नियमो नास्ति ॥ 1-3॥ " |
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| text | "प्रतिवाद्यसामर्थ्ये प्राश्निकैः सहापि निर्णेतुं शक्यत्वादित्याह– " |
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| text | "स्वयं वेति ॥" |
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| text | "प्राश्निकलक्षणमाह– " |
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| text | "रागद्वेषविहीना इत्यादिना ॥" |
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| tail | " विषमसङ्ख्याका विषमा उच्यन्ते । सद्गुणानां समीचीनगुणवतां सर्वेषां चेतनानां विष्णुभक्तिरेव स्वलक्षणमव्यभिचरितलक्षणम् । विष्णुभक्त्यभावे सज्जना एव न सम्भवन्ति । अतो विष्णुभक्तिपरा एव प्राश्निका भाव्या इत्यर्थः ॥" |
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| text | " चिन्तयेत्तत्वनिर्णयम् इत्युक्तम् । तच्चिन्ताप्रकारमाह– " |
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| text | "पृष्टेनेत्यादिना ॥" |
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| tail | " प्रतिवादिना पृष्टेन वादिनेत्यर्थः । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ इति श्रुतेः परतत्वसिद्ध्यर्थमादावागम एव प्रयोक्तव्यः । गमानुगृहीतानुमानस्य प्रबलत्वेन प्रत्यनुमानासम्भवात् । आगमानन्तरमनुमानमपि प्रयोक्तुं शक्यते । प्रयुक्तस्यान्यार्थ एव प्रतिवादिना वक्तव्यः । न प्रत्यनुमानम् दुर्बलत्वादित्यर्थः । " |
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| text | "आगमशब्दार्थमाह– " |
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| text | "ऋग्यजुः इत्यादिना ॥" |
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| text | "वादिप्रयुक्तागमस्य योऽन्यार्थः उक्तः तस्मिन्नागमोऽन्यो वक्तव्यः प्रतिवादिना । प्रतिवाद्युक्तागमस्यान्यार्थतां वादिनां स्वपक्षसिद्ध्यर्थं साधयित्वा स्वागमस्यान्यार्थता निश्चयेन निराकार्या उपपत्तिबलात् । एवमुपक्रमोपसंहारादिभिः स्वागमं निर्णीय तथैव परप्रयुक्तागमोऽपि यदा निर्णीयते स्वपक्षानुसारेण तदा निश्शेषनिर्णयो भवतीत्याह " |
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| text | "स्वपक्ष इत्यादिना ॥" |
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| text | " एवमागमैकवेद्यत्वचिन्तां निर्वर्त्य प्रत्यक्षादिसिद्धार्थनिर्णयचिन्तां निर्वर्तयति–" |
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| text | " प्रत्यक्षसिद्धेष्विति ॥" |
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| tail | " घटादिसद्भावप्रत्यक्षेण प्रतिपादयेत् । सुखदुः खादिसद्भावमनुभवेन प्रतिपादयेत् । तद्दार्ढ्यायानन्तरमनुमानादिकमपि प्रयुञ्ज्यात् प्रतिवादिनं प्रतिवादीत्यर्थः । " |
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| text | "तत्वविषये यदागमवाक्यं वादी वा प्रतिवादी वा वदेत् तत्सतां तुष्टिकरमेव तावुभौ वदेतामित्याह " |
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| text | "परतुष्टिकरमिति ॥" |
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| text | "एवंविधवादकथायां एक एव वादी एक एव प्रतिवादीत्यपि नियमो नास्ति । बहवो वादिनो बहवः प्रतिवादिनो बहुतराश्च प्राश्निकाः सभ्यादयश्चिरकालं वा तत्वनिर्णयपर्यन्तं प्रयतेरन् । तत्वनिर्णयावसानत्वाद्वादस्य । जल्पस्तु वादिप्रतिवादिपक्षिणोरन्यतरपराजयमाह– " |
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| text | "एवं निर्णयपर्यन्तमिति ॥" |
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| text | "तत्वनिर्णयानुपयुक्ताग्रहेण वादे साक्षात्प्रतिपक्षिपराजयः न तु न्यूनोक्त्यधिकोक्त्यादिदूषणेन । तत्र सभ्यैः प्रतिपक्षी पराजित इत्युक्ते यद्यसौ संवादं करोति तर्हि श्लाघ्यो भवेत् । न दण्ड्यः । संवादाकरणे निन्द्यो वा यथायोग्यं दण्ड्यो वा भवेत् । तदेतदाह " |
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| text | "तत्वनिर्णयवैलोम्यमित्यादिना ॥ " |
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| text | " वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति प्राश्निकैरनुवादः कर्तव्य इति वादजल्पयोः नियमो नास्ति । अननुवादेऽपि दूषणाभावात् । अनुवादाभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्या मेव जल्पकथायाः कर्तुं शक्यत्वादित्याह– " |
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| text | "अनुवादेति ॥" |
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| text | " विरोधासङ्गतिन्यूनोक्त्यादिदूषणमिव विद्याहीनत्वलिङ्गमपि वादिनः प्रतिवादिपराजयनिमित्तं भवति । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिच्छेदः । न हि हीनविद्यस्याधिकविद्येन जल्पो वा वितण्डा वा युज्यते । समानविद्ययोरेव तदर्हत्वादित्याह– " |
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| text | "विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपीति ॥" |
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| tail | " यत्पराजयनिमित्तनिग्रहस्थानं तद्विरोधासङ्गतिन्यूनाधिकसंवादानुक्त्याख्यषट्कमेव । साध्याविशिष्टत्वादिनिग्रहस्थानानां विरोधादिषु अन्तर्भावादनन्तर्भूतनिग्रहस्थानाभावादित्याह–" |
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| text | " तदभावादिति ॥" |
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| text | " यद्विद्याहीनत्वं तद्वादिप्रतिवादिविद्यापरीक्षाकाले प्राश्निकैरेव मन्तव्यम् । न तु वादिना प्रतिवादिना वा उद्भाव्यम् । अतो न तन्निगृहस्थानान्तरमित्याशयवानाह–" |
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| text | " विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोरिति ॥ " |
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| tail | " यद्यप्यत्र जल्पवितण्डयोः न्यूनोक्त्याधिकोक्त्यादिदूषणं पराजयनिमित्तमुक्तं तदौत्सर्गिकं ज्ञातव्यम् । " |
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| text | "क्वचिदपवादोऽस्तीत्याह– " |
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| text | "स्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजय इति ॥ " |
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| tail | " न्यूनोक्त्यनन्तरमेवाधिकोक्तौ न न्यूनोक्त्यादिना पराजयो भवतीत्यर्थः । एवं जल्पवितण्डालक्षणं शोधितमित्युपसंहरति– " |
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| text | "वादजल्पवितण्डानामिति ॥" |
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| text | " वादजल्पवितण्डाभिः भगवत्प्रतिपक्षनिरासाद्भगवत्पक्षस्थापनात् कथालक्षणकथनेन भगवत्प्रीतिः भवतीत्याह " |
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| text | "आनन्दतीर्थमुनिनेति ॥ " |
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| text | "॥ इति श्रीपद्मनाभतीर्थभट्टारकविरचिता श्रीकथालक्षणटीका समाप्ता ॥" |
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