| id | "Mundaka-1" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।" |
| "स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-2" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "आनन्दमजरं नित्यमजमक्षयमच्युतम् ।" |
| "अनन्तशक्तिं सर्वज्ञं नमस्ये पुरुषोत्तमम् ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-3" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘मनोर्वैवस्वतस्यादावथर्वा ब्रह्मणोऽजनि ।" |
| "मित्रश्च वरुणश्चाथो प्रहेतिर्हेतिरेव च ॥" |
| "ब्रह्मणः प्रथमे कल्पे शिवः प्रथमजः स्मृतः(सुतः) ।" |
| "सनकाद्यास्तु वाराहे ब्रह्मा विष्णोः सुतोऽग्रजः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-4" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।" |
| "स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-5" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।" |
| "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-6" |
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| oldKey | "MUN_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति । परा चैवापरा च ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-7" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तत्रापरा । ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-8" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘ऋगाद्या अपरा विद्या यदा विष्णोर्न वाचकाः ।" |
| "ता एव परमा विद्या यदा विष्णोस्तु वाचकाः ॥’ इति परमसंहितायाम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-9" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘ऋग्भिर्हौत्रेण(ऋग्भिर्होत्रेण) शंसन्ति तथौद्गात्रैः(तथोद्गात्रे) स्तुवन्ति ये ।" |
| "विष्णुमेव (च) तथा तस्मै यजुर्भिरपि जुह्वति ॥" |
| "स्तुवन्त्यथर्वणैश्चैनं सेतिहासपुराणकैः ।" |
| "न विष्णुसदृशं किञ्चित् परमं वाऽपि मन्वते ॥" |
| "सर्वोत्तमं तं जानन्तस्ते हि भागवतोत्तमाः ॥’" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-10" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।" |
| "आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-11" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘एतदन्ते च मध्ये च ब्रह्मैवोक्त्वा विजानताम् ।" |
| "ऋगादि पञ्चधा संस्थं शब्दब्रह्म प्रशाम्यति ॥" |
| "यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च ।" |
| "स्तुवन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येन सामसु ॥’" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-12" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।" |
| "यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥’" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-13" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।’ इति च भारते ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-14" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘चतुर्दश महाविद्यास्थानानि(विद्यास्थानानि) वेदितव्यानि भवन्ति’ । इति च मूलश्रुतिः ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-15" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘पञ्चरात्रमृगाद्याश्च सर्वमेकं पुराऽभवत् ।" |
| "मूलवेद इति ह्याख्या काले कृतयुगे तदा ॥" |
| "नैवर्क्सामादिनामानि तदा वेदस्य चाभवन् ।" |
| "नैव चेन्द्रादिनामानि विष्णोरन्यत्र कुत्रचित् ॥" |
| "ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वैस्तु नामभिः प्रोच्यते हरिः ।" |
| "देवतात्वेन चेज्यस्स ब्रह्माद्या मनुनामकाः ॥" |
| "वक्तृत्वेन पितृत्वेन कारित्वेनैव चादरात् ।" |
| "इज्यन्ते देवताः सर्वा न तु देवतया क्वचित् ॥" |
| "अनन्ययाजिनस्ते(अनन्ययाजिनस्त्वेते) तु तस्मात्कार्तयुगा जनाः ।" |
| "प्राप्नुवन्ति हरिं तं च तस्माद्वेदे न किञ्चन ॥" |
| "पारावर्यं हरेर्यस्मादुत्थितास्तुरगाननात् ।" |
| "ऋगाद्या अनुव्याख्यान्तास्तस्मात् सर्वैर्हरिं यजेत् ॥" |
| "तस्माद्ब्रह्मादयः सर्वे मनवो मानवास्तथा ।" |
| "यजन्ति सर्ववेदैस्तं जानन्ति च विनिश्चयात् ॥" |
| "अशक्तः पञ्चरात्रेण ऋगाद्यैर्वाथ तं यजेत् ।" |
| "ऋगाद्यैरेव (सर्वत्र)स त्रैतैर्भिन्नैरिष्टो जनैर्हरिः ॥" |
| "द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः ।" |
| "कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः ॥" |
| "एको वेदः कृते ह्यासीत् त्रेतायां स त्रिधाऽभवत् ।" |
| "स एव पञ्चधा जातो द्वापरं प्राप्य वै युगम् ॥" |
| "उत्सन्नः स कलिं प्राप्य वेदः प्रायेण सर्वशः ।" |
| "मुख्यो धर्मः कार्तयुगो वर्तितव्यः कलावपि ॥" |
| "त्रेतादौ तदशक्त्या हि धर्मोऽन्यः सम्प्रकीर्तितः(सम्प्रवर्तितः) ।" |
| "कृते भागवताः सर्वे वेदाश्च पुरुषास्तथा ॥" |
| "त्रेतायां भिन्नविषयास्ततस्त्रैविद्यतां गताः ।" |
| "तस्मादेकः सर्ववेदैर्ज्ञेयो विष्णुः सनातनः ॥" |
| "पूज्यो यज्ञैः सोपचारैर्ध्येयो वन्द्यश्च सर्वदा ॥’ इत्यादि नारायणसंहितायाम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-16" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘वेदवादाश्चानुयुगं ह्रसन्तीति हि नः(च) श्रुतिः ॥’ इति (च)भारते ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-17" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘वेदैश्च पञ्चरात्रैश्च भक्त्या यज्ञैस्तथैव च ।" |
| "दृश्योऽहं नान्यथा दृश्यो वर्षकोटिशतैरपि ॥’ इत्यादि वाराहे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-18" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अत्रापि ‘तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन् ।’ इत्यादिना कर्मविषयामपरविद्यामुक्त्वा ‘येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्’ (इत्याद्यारभ्य)इत्यारभ्याथर्वणानेव मन्त्रान् परविद्यात्वेनाह । चतुर्वेदसंस्कारवतामेव(चातुर्वेदसंस्कारवतामेव) च विद्यायामधिकार उक्तः- ‘तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम्’ इति । शिरोव्रतमित्युपलक्षणत्वेन ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-19" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V03_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘स्ववेदव्रतयुक्तस्य सर्ववेदगतास्वपि ।" |
| "अधिकारोऽस्ति विद्यासु नावेदव्रतिनः क्वचित् ॥’ इति व्यासस्मृतौ ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-20" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।" |
| "नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-21" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।" |
| "यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-22" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।" |
| "अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-23" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यस्सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः ।" |
| "तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-24" |
|---|
| oldKey | "MUN_C01_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C01" |
|---|
| chapter | "MUN_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | |
|---|
|
| id | "Mundaka-25" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदेतत् सत्यम् ।" |
| "मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन् तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ।" |
| "तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-26" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तदेतत्सत्यं भगवान् । तत्कामाः कर्माण्याचरथ । तदा साऽपि परविद्या । अन्यथा ‘प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः’ । भगवद्विषयत्वेन कृते एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः । परब्रह्मलोकः ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-27" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते ।" |
| "निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति व्यासस्मृतिः ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-28" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते’ । इति च श्रुतिः ।" |
| "‘सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा’ इत्युक्त्वा," |
| "‘एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।" |
| "अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥’ इति च ।" |
| "‘यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-29" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।" |
| "न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-30" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘यस्त्वात्मरतिः’ इत्युक्त्वाऽपि ‘कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तः’ इत्येवोक्तत्वाच्च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-31" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।" |
| "सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-32" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनघ’ इत्युक्तत्वाच्च नाश्रमान्तरविरोधः । त्रेतायां बहुधा सन्ततानि, कृते त्वेकप्रकारेणैव सन्ततानि ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-33" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैः सर्वदेवस्थितं हरिम् ।" |
| "यजन्ति तांश्च कारित्वाद्वसुस्तस्मात्तथाऽयजत् ॥" |
| "पृथक् पृथक् च(तु) त्रेतायां यजन्ते देवतागणान्(देवतागणाः) ।" |
| "यथा कृते तथा प्राज्ञास्त्रेतायां बहुधा ततः ॥’ इति पाद्मे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-34" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।" |
| "यो देवानां देवतमो जनित्रो वायोस्तस्मै सोममेभ्यो जुहोमि ॥’" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-35" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘एवं वायोः पितरं विष्णुमेव यजन्ति देवैः सह ये कृते जनाः ।" |
| "एवं त्रेतायां केचिदन्ये पृथक् तानिष्ट्वा विष्णावर्पयन्ते न चान्ये ॥’ इति च ब्रह्माण्डे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-36" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।" |
| "तदाऽऽज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-37" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।" |
| "अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-38" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।" |
| "स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-39" |
|---|
| oldKey | "MUN_C02_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C02" |
|---|
| chapter | "MUN_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।" |
| "तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।" |
| "प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।" |
| "एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ ७ ॥" |
|
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| lines | | "अविद्यायामन्तरे वेष्ट्यमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।" |
| "जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथाऽन्धाः ॥ ८ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अविद्यायां बहुधाः वर्तमाना स्वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।" |
| "यत् कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥" |
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।" |
| "नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥" |
|
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| lines | | "विष्णोः सर्वेभ्यः किञ्चिदुत्तमत्वं जानन्त इमं लोकमाविशन्ति ।" |
| "साम्यं हीनत्वं वा जानन्तो हीनतरं तम एवाविशन्ति(नामाविशन्ति) ॥" |
|
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| lines | | "‘देवेभ्य उत्तमं विष्णुं राजवद्यस्तु मन्यते ।" |
| "याजी स मानुषं याति साम्यहीनत्ववित्तमः ॥’ इति च ।" |
|
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| lines | | "‘त्रैविद्या माम्’ इति तु ‘येऽप्यन्यदेवता भक्ताः तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्’, ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता’ इत्युक्तत्वादज्ञानपूर्वयाजिनस्त्रैविद्याः॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तपःश्रद्धे येऽभ्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।" |
| "सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन ।" |
| "तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C02" |
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| lines | | "तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।" |
| "येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदेतत् सत्यम् ।" |
| "यथा सुदीप्तात् पावकाद् विष्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।" |
| "तथाऽक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।" |
| "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| lines | | "‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका ।" |
| "अक्षरं परमं श्रीस्तु परतः परमक्षरम् ॥" |
| "वासुदेवः परानन्दः इति त्रिविधमक्षरम् ॥’ इति च ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।" |
| "खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥" |
|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः ।" |
| "वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| lines | | "‘विष्ण्वङ्गानां हि नामानि द्युभ्वादीनि तु सर्वशः ।" |
| "क्रीडादिशक्तिरूपत्वात् तज्जत्वादन्यवस्तुषु ॥’ इति च ॥ ४ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्मादग्निः समिधो यश्च सूर्यः सोमात् पर्जन्यौषधयः पृथिव्याम् ।" |
| "पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
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| lines | | "‘वासुदेवः पुमान्नामा पूर्णत्वात् स स्वयोषिति ।" |
| "रमायां गर्भमदधात् प्रजास्तस्मात् प्रजज्ञिरे ॥’ इति च ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।" |
| "संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।" |
| "प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥" |
| "सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।" |
| "इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-61" |
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|---|
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|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
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| lines | | "सप्तार्चिषो वृत्तयः । होमाः सम्बन्धाः । लोकाः गोलकाः । गुहाशयां बुद्धौ । ‘लोपः समाने’ इति सूत्रादेकयकारलोपः । प्रतिपुरुषं सप्त सप्त ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-62" |
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| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।" |
| "अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-63" |
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|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।" |
| "एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरति ह सोम्य ॥ १० ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-64" |
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| type | "bhashya" |
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|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "भगवतः कर्म चेष्टा तपो ज्ञानं च परामृतब्रह्माख्यः पुरुषो भगवानेव ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-65" |
|---|
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| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘यैषा चेष्टा भगवतो यच्च ज्ञानं परात्मनः ।" |
| "तत्सर्वं भगवानेव ये च धर्मा बलादयः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-66" |
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|---|
| parent | "MUN_C03" |
|---|
| chapter | "MUN_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ इति श्रुतिः ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-67" |
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| parent | "MUN_C04" |
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| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "आविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत् पदम् ।" |
| "अत्रैतत् सर्वमर्पितमेजत् प्राणन्निमिषच्च यत् ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-68" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद् यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ।" |
| "यदर्चिमद् यदणुभ्योऽणु च यस्मिंल्लोका निहिता लोकिनश्च ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-69" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विज्ञानाद् ब्रह्मणः परम् । ‘नाभिहृदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्तेः’ इति (हि)भागवते ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-70" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदेतक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः ।" |
| "तदेतत् सत्यं तदमृतं तद् वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-71" |
|---|
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|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘प्राणः प्रणयनाद्विष्णुर्वक्तृत्वाद्वागुदीरितः ।" |
| "मनो मन्तृत्वतो विष्णुः सर्वजीवनियामकः ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-72" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत ।" |
| "आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-73" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।" |
| "अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-74" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।" |
| "तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-75" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V06_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अमृतस्य मुक्तस्य सेतुः । ‘मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्’ । ‘मुक्तानां परमा गतिः’ इत्यादेः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-76" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः ।" |
| "स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-77" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘हृदयस्थः सदा विष्णुर्बहुधा चैकधाभवेत्(बहुधा चैकधाऽभवत्) ।" |
| "चरति स्वेच्छयैवान्तः सर्वजीवान्नियामयन् ॥’ इति प्रवृत्ते ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-78" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ओमित्येवं ध्यायत आत्मानं स्वस्तिवः पराय तमसः परस्तात् ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-79" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि ।" |
| "दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा सम्प्रतिष्ठितः ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-80" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।" |
| "तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥ १० ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-81" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।" |
| "तक्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ११ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-82" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V11_B11" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘परा अप्यवरा यस्मात् स हि विष्णुः परावरः ॥ ११ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-83" |
|---|
| oldKey | "MUN_C04_V12" |
|---|
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|---|
| parent | "MUN_C04" |
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| chapter | "MUN_C04" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।" |
| "तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ १२ ॥" |
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|---|
|
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C04" |
|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | null |
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| lines | | "ब्रह्माण्डमध्यगो नित्यं तपत्येष रवौ स्थितः ॥’ इति च ॥ १२ ॥" |
|
|---|
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| id | "Mundaka-85" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C04" |
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| chapter | "MUN_C04" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।" |
| "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १३ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "MUN_C04" |
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| lines | | "सूर्यादयस्तं न भासयन्ति ॥ १३ ॥" |
|
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| id | "Mundaka-87" |
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|---|
| chapter | "MUN_C04" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।" |
| "अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-88" |
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| oldKey | "MUN_C04_V14_B14" |
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|---|
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|---|
| chapter | "MUN_C04" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "इदं ब्रह्मैव विश्वं पूर्णम् । इदमेव (च) वरिष्ठं सर्वोत्तमम् । इदंशब्दानां बहुत्वाद् ब्रह्मविषय एवेदंशब्दः ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-89" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।" |
| "तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| id | "Mundaka-90" |
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|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स्वादुवत्सर्वदाऽत्ति । न तु स्वाद्वेव(न त्वस्वाद्वेव) । ‘तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद’ इत्यज्ञानां स्वादुनिषेधात् । जीवाद्यमेव नाश्नाति भगवान् । न तु नाश्नात्येव । ‘तस्येदाहुः पिप्पलं स्वादु’ इत्युक्तत्वात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-91" |
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| oldKey | "MUN_C05_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘स्वातन्त्र्येणैव भोक्तृत्वाद् दुःखाभोगाच्च सर्वदा ।" |
| "अभोक्ता चैव भोक्ता च भगवान् विष्णुरव्ययः ॥’ इति तत्त्वसारे ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-92" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।" |
| "जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-93" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘नास्तीशोऽस्या यतोऽन्यो हि ततोऽनीशा हरेर्मतिः ।" |
| "तया मुह्यति जीवस्तमन्यं ज्ञात्वा विमुच्यते ॥" |
| "जीवादन्यः स्वतन्त्रोऽयं(स्वतन्त्रो यो) यतोऽतः पुरुषोत्तमः ॥’ इति ब्रह्मसारे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-94" |
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| oldKey | "MUN_C05_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।" |
| "तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-95" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V03_B03" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पुण्यं चानिष्टं विधूय ॥ ३ ॥" |
|
|---|
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| id | "Mundaka-96" |
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| oldKey | "MUN_C05_V04" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "प्राणो ह्येष सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी ।" |
| "आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-97" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।" |
| "अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-98" |
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| oldKey | "MUN_C05_V06" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन विततो देवयानः ।" |
| "येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-99" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V06_B06" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘सत्यो हि भगवान् विष्णुः सद्गुणत्वात् प्रकीर्तितः ।" |
| "आसुरास्तद्विरुद्धत्वादनृताः परिकीर्तिताः ।" |
| "तस्य विष्णोर्निधानं तु वैकुण्ठो लोक उत्तमः ॥’ इति च ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-100" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।" |
| "दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-101" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V07_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "सर्वगत्वाद्दूरेऽन्तिके च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-102" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।" |
| "ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-103" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V08_B08" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘नान्यैर्देवैर्हरिं पश्येत् ज्ञानरूपेण वायुना ।" |
| "ब्रह्मणा परमज्ञानरूपेण हरिणा तथा ॥" |
| "प्रसन्नेनैव तं पश्येदन्येऽनुज्ञाप्रदायिनः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-104" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V08_B08" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "षोडशकलाशरीरो न भवतीति निष्कलः । ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णम्’, ‘आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इत्युक्तत्वात् ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-105" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ।" |
| "प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-106" |
|---|
| oldKey | "MUN_C05_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C05" |
|---|
| chapter | "MUN_C05" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।" |
| "तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेत् भूतिकामः ॥ १० ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-107" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।" |
| "उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-108" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स आत्मज्ञार्चको ब्रह्मणो धाम प्राणं वेद । यत्र विश्वं पूर्णं ब्रह्म निहितम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-109" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘प्रधानं धाम विष्णोस्तु प्राण एव प्रकीर्तितः ।" |
| "उपायैर्यो विजानीयात् प्राणस्थं परमेश्वरम् ।" |
| "तस्य प्राणे हरिर्नित्यमाविष्टो भवति ध्रुवम् ॥" |
| "नित्यं प्राणस्थितस्यैव विष्णोरावेश एव हि ।" |
| "प्राणद्वारेण यज्ज्ञानदीपनं ज्ञानिनः सदा ॥" |
| "सन्निधानं यथा प्राप्ताः पिशाचाः पुरुषेष्वपि ।" |
| "तत्र स्थित्वाऽपि भुञ्जन्त आविशेयुः पुनश्च ते ॥" |
| "मन्त्रादिभिस्तथा विष्णुः सदा प्राणस्थितोऽपि सन् ।" |
| "ज्ञानदीप्त्यादिकं कुर्याज्ज्ञानिनः पुनरेव तु ॥’ इति च ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-110" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V01_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "एतच्छुक्रं प्रत्यन्यदतिवर्तन्ते ॥" |
| "‘सर्वं तीर्त्वा हरिं शुक्रं प्रति(प्रतिवर्ती) वृत्तिर्भवेत् पुनः ।" |
| "ज्ञानिनः सा हि मुक्तिः स्यात्तन्नैवात्येति कश्चन ॥’ इति महावाराहे ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-111" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।" |
| "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-112" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।" |
| "यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-113" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात् तपसो वाऽप्यलिङ्गात् ।" |
| "एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-114" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।" |
| "ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीराः मुक्तात्मानः सर्वमेवापियन्ति ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-115" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V05_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "सर्वतो देहादेर्मुक्ताः सन्तः सर्वगं(सर्वं) भगवन्तं प्राप्य तमेवापियन्ति ।" |
| "‘देहादेः सर्वतो मुक्ताः सर्वगं पुरुषोत्तमम् ।" |
| "प्राप्य तस्मिन् प्रविश्याथ मोदन्तेऽन्तर्बहिस्तथा ॥’ इति च ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-116" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ।" |
| "ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-117" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V06_B06" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ब्रह्मलोकेषु स्थित्वा परान्तकाले परिमुच्यन्ति ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-118" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।" |
| "कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-119" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘अविरोधश्च (सादृश्यादेक.....)सादृश्यमेकदेशस्थितिस्तथा ।" |
| "एकीभावस्त्रिधा प्रोक्तो नैकीभावः स्वरूपयोः ।" |
| "कुतोऽभूतस्य भवनं स्वरूपस्यैक्यमेव हि ॥" |
| "अतो नदीनां जीवानां विरुद्धानां नृणामपि ।" |
| "अब्धिना हरिणा चैव तथैव च नरान्तरैः ॥" |
| "एकीभावस्तु संश्लेषो विरोधस्य च वर्जनम् ।" |
| "स्वरूपैक्यं कुतस्तेषां नित्यभिन्नस्वरूपिणाम् ॥" |
| "हरेरपि स्वरूपाणामेकीभावो यदोच्यते ।" |
| "संश्लेष एव सिद्धत्वात् स्वरूपैक्यस्य नो भवः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-120" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "गताः मुक्ताः । प्राणादिपञ्चदशकलारूपा देवता अन्ये च देवाः सर्वे प्रतिदेवतासु देवताप्रतिबिम्बभूतासु प्रजासु प्रति प्रति स्थिताः कर्माणि विज्ञानमयो जीवश्च परमात्मनि प्रविशन्ति ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-121" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘प्रतिबिम्बो हरेः प्राणस्तस्य चान्याः कलाः क्रमात् ।" |
| "कलानां देवता अन्या देवतानां नरा अपि ॥" |
| "तस्मात् सर्वेषु मुक्तेषु नरेष्वपि नियामकाः ।" |
| "तिष्ठन्ति नात्र सन्देहः परमात्मनि चाखिलाः ॥’ इति मुक्तिविवेके ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-122" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘कलाभ्यश्चान्यदेवेभ्यः कर्म प्रत्यवरं यतः ।" |
| "कलाभ्यः पृथगुक्तं तत् पुष्करः कर्म चोच्यते ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-123" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V07_B07" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अन्यथा गता भविष्यन्तीत्यध्याहारो दोषः । न च मूलरूपाणि प्रतिदेवता इत्युच्यन्ते देवानाम् । प्रतिरूपशब्दवद्धि प्रतिदेवताशब्दः । ‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र‘, ‘इमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति’ इति, ‘यथा सोम्येमाः समुद्रायणाः’ इति नदीदृष्टान्तपूर्वकं पुरुषप्राप्तिकथनाच्च मुक्ता देवता एवोच्यन्ते । ‘स प्राणमसृजत’ इत्यादेश्च पुरुषो भगवान् ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Mundaka-124" |
|---|
| oldKey | "MUN_C06_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "MUN_C06" |
|---|
| chapter | "MUN_C06" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति नामरूपेऽविहाय ।" |
| "तथा विद्वान्नामरूपाद् विमुक्तः परात् परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥" |
|
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| id | "Mundaka-125" |
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| oldKey | "MUN_C06_V08_B08" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘अगम्यनामरूपत्वादमुक्तैर्मुक्तिगा नराः ।" |
| "विहीननामरूपास्तु न हि तद्रहितत्वतः ॥" |
| "अशरीरो यथा वायुः सामान्यागम्यदेहतः ।" |
| "एवं नद्यः समुद्रस्थाः सामान्यागम्यरूपतः ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-126" |
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| oldKey | "MUN_C06_V08_B08" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘स्वकीयमुदकं नद्यः समुद्रे नैव जानते ।" |
| "वायुस्तु तत्पृथग्ज्ञात्वा मेघे कृत्वा प्रवर्षति ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-127" |
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| oldKey | "MUN_C06_V08_B08" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "विमुक्त इत्यमुक्त इत्यर्थः । विप्रिय इतिवत् । अविहायेति च । ‘अनन्तं वै नाम’ इति (च) श्रुतेः ॥ ८ ॥" |
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| id | "Mundaka-128" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।" |
| "तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥" |
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| id | "Mundaka-129" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| lines | | "‘परं ब्रह्म विदित्वा तु बृंहितः स्यात् स्वयोग्यतः(बृंहिताच्च स्वयोग्यतः) ।" |
| "नायोग्यं किञ्चिदाप्नोति कुत एव हरेर्गुणान् ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-130" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| lines | | "‘ब्रह्मत्वं बृंहितत्वं स्याज्जीवानां न परात्मता ।" |
| "अस्वतन्त्रस्य जीवस्य कुतो नित्यस्वतन्त्रता ॥’ इति स्कान्दे ।" |
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| id | "Mundaka-131" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| lines | | "‘यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा’, ‘यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्’, ‘अमृतस्यैष सेतुः’, ‘शरवत् तन्मयो भवेत्’, ‘ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते’(तल्लक्षमुच्यते) । ‘निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’ इत्यादिना मुक्तस्य सर्वत्र भगवत्सकाशाद्भेदस्यैवोक्तत्वाच्च । ‘मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्’ ‘जगद्व्यापारवर्जम्’, ‘प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च’(प्रकरणादसन्निहितत्वात्) इत्यादिना भगवताऽपि सर्वत्र भेदस्यैव सूचितत्वात् । न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ ।" |
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| id | "Mundaka-132" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।" |
| "तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’ इत्यादेश्च ।" |
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| id | "Mundaka-133" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘मुक्तेभ्योऽपि मनुष्येभ्यो देवा एव गुणाधिकाः ।" |
| "तेभ्यो वायुस्ततो विष्णुः परिपूर्णगुणः सदा ॥" |
| "ये त्वेतदन्यथा विद्युस्ते हि यान्त्यधरं तमः ।" |
| "ये त्वेतदेवं जानन्ति ते यान्ति परमं हरिम् ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-134" |
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| oldKey | "MUN_C06_V09_B09" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘देवानां सन्ततौ जाताः प्रायशो ज्ञानिनः कृते ।" |
| "बलवद्धेतुतश्चान्ये यस्माद् ब्रह्मविदः सुराः ॥" |
| "न सन्ततौ(नासंस्ततो) ब्रह्मविदो नराणां ज्ञानिनामपि ।" |
| "प्रायशः स्युः सुराणां च नियमोऽयं कृते युगे ॥" |
| "तस्मात् स भगवान् विष्णुर्ज्ञेयः सर्वोत्तमोत्तमः ।" |
| "सदा सर्वगुणैः पूर्णो योऽनन्तः पुरुषोत्तमः ॥’ इति च ।" |
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| id | "Mundaka-135" |
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| oldKey | "MUN_C06_V10" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तदेष श्लोकः ।" |
| "क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षीन् श्रद्धयन्तः ।" |
| "तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥" |
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| id | "Mundaka-136" |
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| oldKey | "MUN_C06_V11" |
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| type | "verse" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच । नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ।" |
| "ॐ नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥" |
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| id | "Mundaka-137" |
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| oldKey | "MUN_C06_V11_B1" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "MUN_C06" |
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| chapter | "MUN_C06" |
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| verseType | null |
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| lines | | "प्रीयतां भगवान् मह्यं प्रेष्ठप्रेष्ठतमः सदा ।" |
| "मम नित्यं नमाम्येनं परमोदारसद्गुणम् ॥" |
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