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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।" |
| "नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "सत्यं ज्ञानमनन्तमानन्दं ब्रह्म सर्वशक्त्येकम् ।" |
| "सर्वैर्देवैरीड्यं विष्ण्वाख्यं सर्वदैमि सुप्रेष्ठम् ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ॐ शिक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ २ ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "वरणीयो वर्णः । स्वरतेस्तु स्वरः । मानात् त्राता मात्रा । बलरूपः । समश्च सर्वरूपेषु । सन्ततश्च ।" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः संहितायाः उपनिषदं व्याख्यास्यामः ।" |
| "पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासंहिता इत्याचक्षते ॥ ३ ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "नारायणादिरूपाणि लोकादिषु च पञ्चसु ।" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "अथाधिलोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः सन्धिः । वायुः सन्धानम् । इत्यधिलोकम् ॥ ४ ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाधिज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः सन्धिः । वैद्युतः सन्धानम् । इत्यधिज्यौतिषम् ॥ ५ ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या सन्धिः । प्रवचनं सन्धानम् । इत्यधिविद्यम् ॥ ६ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा सन्धिः । प्रजननं सन्धानम् । इत्यधिप्रजम् ॥ ७ ॥" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाध्यात्मम् । अधराहनुः पूर्वरूपम् । उत्तराहनुरुत्तररूपम् । वाक्सन्धिः । जिह्वा सन्धानम् । इत्यध्यात्मम् । इतीमा महासंहिताः । य एवमेता महासंहिता याख्याता वेद । सन्धीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्ग्येण लोकेन ॥ ८ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-13" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात् सम्बभूव । समेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधयाऽपिहितः । श्रुतं मे गोपाय ॥ ९ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-14" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "आवहन्ती वितन्वाना । कुर्वाणा चीरमात्मनः । वासांसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा ॥ १० ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-15" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "आ मा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । वि मा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।" |
| "प्र मा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।" |
| "शमा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । यशो जनेऽसानि स्वाहा ।" |
| "श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा ।" |
| "तस्मिन् सहस्रशाखे । नि भगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ॥ ११ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-16" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यथापः प्रवता यन्ति । यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां ब्रह्मचारिणः । धातरा यन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ १२ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-17" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "यो विश्वरूपो भगवांश्च्छन्दसामधिपो हरिः ।" |
| "छन्दोभ्योऽमृतरूपेभ्यस्सुव्यक्तस्तदुपासनात् ॥" |
| "मेधावी तत्त्वविज्ञानी भूत्वा क्षिप्रं विमुच्यते ॥ इति च ।" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-18" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "वेदावासत्वतो विष्णुर्ब्रह्मकोश इति स्मृतः ।" |
| "भगः षड्गुणपूर्णत्वाद् बहुरूपत्वतो विभुः ॥" |
| "सहस्रशाख इत्युक्तस्तमुपास्य जनार्दनम् ।" |
| "मुच्यते नात्र सन्देहस्सर्वभोगैश्च युज्यते ॥ इति प्रक्लृप्ते ।" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-19" |
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| type | "bhashya" |
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "आवहन्ती चिरं सर्वभोगान् या श्रीस्सनातनी ।" |
| "तां मय्यावह गोविन्द सुशिखण्डोपशोभिताम् ॥ इति च॥ १२ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-20" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूर्भुवः स्वरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मै तां चतुर्थीम् । माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद् ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः ॥ १३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-21" |
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| oldKey | "TTB_C01_S01_V13_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "भूरादिव्याहृतीभिस्तु वाच्यं मूर्तिचतुष्टयम् ।" |
| "अनिरुद्धादिकं वासुदेवान्तं देहमध्यगः ॥" |
| "वासुदेवो महोनामा त्वनिरुद्धश्शिरो मतः ।" |
| "भूर्नामाथ भुवोनामा बाहू प्रद्युम्न ईरितः ॥" |
| "सङ्कर्षणस्सुवर्नामा पादौ तस्य महात्मनः ।" |
| "अनन्योऽप्यन्यशब्देन चतुरात्मा प्रकीर्त्यते ॥" |
| "निर्विशेषोऽपि भगवान् सङ्ख्यामात्रविशेषतः ॥ १३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-22" |
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| oldKey | "TTB_C01_S01_V14" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूरिति वा अयं लोकः । भुवः इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वा व सर्वे लोका महीयन्ते ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-23" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्यादित्यः । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतींषि महीयन्ते ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-24" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूरिति वा ऋचः । भुव इति सामानि । सुवरिति यजूंषि । मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-25" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-26" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "लोकज्योतिःप्राणवेदेष्वेकस्स पुरुषोत्तमः ।" |
| "प्रत्येकशश्चातुरात्म्यात् षोडशात्मा प्रकीर्तितः ॥" |
| "महीयते महति च स्वयं स भगवान् हरिः ।" |
| "पूज्यपूजकभेदोऽत्र नैव कश्चिदपीष्यते ॥" |
| "नामप्रवृत्तिहेतुत्वान्नाम लोकादिकं हरेः ।" |
| "अयं समीपस्थतया त्वसौ प्राणे स्थितत्वतः ॥" |
| "ईक्षणादन्तरिक्षं चाथादित्यस्थोऽदितेस्सुतः ।" |
| "अग्निरग्नौ स्थितत्वाच्च वायुर्वयति यज्जगत् ॥" |
| "चन्द्र आह्लादरूपत्वादृगर्च्यत्वाज्जनार्दनः ।" |
| "यजुर्याज्यस्वरूपत्वात् साम चासौ समत्वतः ॥" |
| "बृहत्वात् ब्रह्म वेदानां समुदायेऽखिले स्थितः ।" |
| "तत्सम्बन्धाद्वेदराशिर्ब्रह्मशब्देन कीर्तितः ॥" |
| "प्रकृष्टनयनात् प्राणोऽपानोऽवाङ्नयनाद्धरिः ।" |
| "विविधं नयनाद् व्यानस्सोऽन्नं सर्वोपजीव्यतः ॥" |
| "एवं षोडशरूपोऽसौ चतुरात्मा व्यवस्थितः ।" |
| "महाचमसनामासौ यस्मादतिचमत्कृतिः ॥" |
| "माहाचमस्यस्तज्ज्ञानी ब्रह्मा सम्परिकीर्तितः ।" |
| "एवं षोडशरूपाणां ज्ञानयोग्यश्चतुर्मुखः ॥" |
| "स एव ब्रह्मवित् तस्मात् पूज्यते मुक्तिगोऽपि सन् ।" |
| "सर्वदेवैरतितरां यस्सम्यक् षोडशात्मवित् ॥ इति व्याहृतितत्त्वे ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-27" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तस्य भूरिति शिरः । एकं शिरः । एकमेतदक्षरम् । भुव इति बाहू । द्वौ बाहू । द्वे एते अक्षरे । सुवरिति प्रतिष्ठा । द्वे प्रतिष्ठे । द्वे एते अक्षरे इत्यादिश्रुतेः । सर्वव्याहृतीनां प्रवेत्ता माहाचमस्यश्चतुर्थीत्वेनेतां प्रवेदयत इति विशेषः ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-28" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "भूर्नामा स्फूर्तिरूपत्वात् भूरिवीर्यत्वतो भुवः ।" |
| "सुवस्सुबलरूपत्वात् महः पूर्णत्वतो विभुः ॥" |
| "तदेतच्चतुराकारं ब्रह्मोक्तं गुणबृंहणात् ।" |
| "स आत्मा सर्वदेवानां चतुरात्मा जनार्दनः ॥" |
| "तस्य ब्रह्मादयो देवा अङ्गमागन्तुकत्वतः ।" |
| "वासुदेवादिरूपोऽसौ षोडशात्मा चतुश्चतुः ॥" |
| "स एव सर्ववेदोक्तस्सर्वविद्यासु चेश्वरः ।" |
| "प्रणवार्था व्याहृतयो व्याहृत्यर्था ऋगादयः ॥" |
| "इतिहासपुराणं च पञ्चरात्रं च सर्वशः ।" |
| "सम्यग्व्याहरणात् विष्णोः श्रुता व्याहृतयस्त्विति ॥" |
| "सर्ववेदोक्तसर्वस्वव्याहृतेर्व्याहृतित्वमु ।" |
| "विशेषेणाहरन्तीमं विष्णुमित्यथवा स्मृताः ॥ इति व्याहृतिसारे ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-29" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य एषस्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो वि वर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-30" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "य एष हृदयाकाशस्त्वनिरुद्धस्तु तद्गतः ।" |
| "प्रद्युम्नस्तालुमध्यस्थो लम्बिन्यामिन्द्रनामकः ॥" |
| "व्याख्यस्सुपर्णरूपत्वात् केशान्ते वर्तते तु यः ।" |
| "सङ्कर्षणस्सुपर्णात्मा वासुदेवो व्यपस्स्मृतः ॥" |
| "यस्माद्व्यपगतस्थाता जगति प्रलये विभुः ।" |
| "अशीर्षककपालोसौ कपालादुपरि स्थितः ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-31" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ । सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत् ततो भवति ॥ १६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-32" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्ति समृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्व ॥ १७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-33" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V20_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S01" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अनिरुद्धस्तु भूर्नामा हुताशे संव्यवस्थितः ।" |
| "प्रद्युम्नो भगवान् वायौ भुव इत्येव कीर्तितः ॥" |
| "सङ्कर्षणस्सुवर्नामा सूर्ये तिष्ठति केशवः ।" |
| "महोनामा वासुदेवो ब्रह्मणिस्थश्चतुर्मुखे ॥" |
| "स वासुदेवस्स्वाराज्यं व्याप्यास्मिन् मनसस्पतौ ।" |
| "अनिरुद्धे च संव्याप्तः ततो वागादिनां पतिः ॥" |
| "वागादिषु स्थितो नित्यं भवत्येष जनार्दनः ।" |
| "स्वव्यापी च जगद्व्यापी नित्यैश्वर्यात् स ईश्वरः ॥" |
| "आकाशवद्व्याप्तदेहस्सत्यात्मा गुणपूर्तितः ।" |
| "वायोर्विशेषरमको बलानन्दस्वरूपवान् ॥" |
| "ज्ञानानन्दस्वरूपोऽसौ शान्तिनामा सुखोन्नतेः ।" |
| "अन्तगत्वात् स्वतः पूर्तेस्समृद्धं तत् प्रकीर्तितम् ॥" |
| "इत्युपास्व प्राथमिको योग्यस्त्वं मदुपासने ।" |
| "प्राधान्यादिति पूर्वं हि प्राह विष्णुश्चतुर्मुखम् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-34" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V21" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः । अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसं स्नावास्थिमज्जा । एतदधि विधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदं सर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तं स्पृणोतीति ॥ १८ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "पृथिव्याद्यं पाङ्क्तषट्कं पाङ्क्तेनैव स्वयं हरिः ।" |
| "नारायणादिरूपेण बलयत्यञ्जसा प्रभुः ॥" |
| "इत्युवाच स्वयं विष्णुर्वेदद्रष्टा गुणाधिकः ॥ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥" |
|
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| lines | | "आत्मा अहङ्कारतत्त्वम् ॥ १८ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ॐ इति ब्रह्म । ॐ इतीदं सर्वम् । ओमित्येतदनुकृति ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्या श्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओग्ंशोमिति शस्त्राणि शग्ंसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १९ ॥" |
|
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| lines | | "ॐनामा भगवान् विष्णुरधिकोच्चगुणत्वतः ।" |
| "यद्यद्रूपं भगवतस्तदिदं सर्वमेव च ॥" |
| "ओमेवाधिकपूर्णत्वात् तस्माद्यज्ञेषु चर्त्विजः ।" |
| "ओमित्येव स्वकर्माणि कुर्वन्त्युद्दिश्य केशवम् ॥" |
| "अधिकोच्च शृणुष्वेति हरिमध्वर्युराह हि ।" |
| "अधिकोच्च महाधाम सूच्च देवेति चादरात् ॥" |
| "प्रति प्रति गृणात्येनं शंरूपात्युच्चशावन ।" |
| "इत्याह होता शस्त्रेषु तथैवान्येऽपि चर्त्विजः ॥" |
| "एवं स्वऽध्यायकृच्चाह ब्रह्मप्राप्त्यर्थमञ्जसा ।" |
| "एवं जानन्त एते तु प्राप्नुवन्त्येव तत्परम् ॥ इति च ॥ १९ ॥" |
|
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च ॥ २० ॥" |
|
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| lines | | "ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च कर्तव्यानि । प्रवचनं व्याख्यानम् । यथार्थज्ञानं ऋतम् । तत्पूर्वकं यथार्थवचनं करणं च सत्यम् ।" |
|
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| lines | | "ऋतं यथार्थविज्ञानं सत्यं तत्पूर्विका कृतिः ।" |
| "ध्यानसत्ये पूज्यपूजा तप इत्यभिधीयते ॥ इति शब्दनिर्णये ॥" |
|
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| lines | | "सर्वकर्मकृतिकालेष्वपि स्वाध्यायप्रवचनयोः कर्तव्यत्वात् तयोः सर्वत्र अनुषङ्गः ।" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "मन्त्रो मन्त्रार्थवचनमन्यस्य स्वात्मनोऽपि वा ।" |
| "सर्वकर्मसु कर्तव्यौ सर्वकर्मात्मकौ ततः ॥ इति कर्मतत्त्वे ।" |
|
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| lines | | "आत्मनश्चेन्मनसैवार्थवचनम् ।" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "मानुषं मानुषो धर्मो देवा अपि हि मानुषे ।" |
| "मनुष्यवत् प्रवर्तन्ते नैवैश्वर्यप्रकाशिनः ॥ इति च ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "प्रजाया रक्षणं चैव पुनः प्रजननं तथा ।" |
| "प्रकृष्टजातिकरणं कर्मभिस्तनये पितुः ॥ इति च ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ २१ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "सत्ये तपसि वा चीर्णे सर्वकर्म कृतं भवेत् ।" |
| "स्वाध्याये च प्रवचने ह्यन्तर्भावो विशेषतः ॥ इति च ॥" |
|
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| lines | | "यं यं क्रतुमधीते तेन तेनास्येष्टं भवति इति च श्रुतिः ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ इति भारते ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "सम्यग्ज्ञात्वा तु यो विष्णुं व्याख्यायीत जपेत च ।" |
| "न तस्य किञ्चिदकृतं कर्तव्यं मुच्यते च सः ॥ इति कर्मतत्त्वे ।" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि । द्रविणग्ं सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ २२ ॥" |
|
|---|
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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|---|
| lines | | "संसारवृक्षच्छेत्ताऽहं मत्कीर्तिः पर्वतोपमा ।" |
| "अत्युत्कृष्टेन हरिणा पावितोऽस्मि यतः स्फुटम् ॥" |
| "वाजिरूपश्च नेता च वाजिनी सूर्य उच्यते ।" |
| "तत्रस्थो भगवान् विष्णुस्सम्प्रोक्तो वाजिनीवसुः ॥" |
| "तेनामृतोऽस्मि द्रविणं नित्यानन्दस्वरूपतः ।" |
| "तेनामृतेन सिक्तोहं तेन व्याप्तो यतस्सदा ॥" |
| "इत्याह मन्त्रदृक् पूर्वं त्रिशङ्कुर्मानवो नृपः ॥ इति यजुर्विवेके ॥" |
|
|---|
|
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|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकग्ं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाग्ंसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयासने न प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ॥ २३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-55" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S01_V27" |
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता अयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ताः अयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ २४ ॥" |
|
|---|
|
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामवीत् । तद्वक्तारमवीत् । अवीन्माम् । अवीद्वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-57" |
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "paada" |
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| lines | |
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "संहितायाः पञ्चाधिकरणाभिमानित्वं प्राणादिरूपस्य वायोरपि भवति । पृथिव्यन्तरिक्षमित्युक्तपाङ्क्तत्वं च । अत उपक्रमोपसंहारयोः त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् इति युज्यते ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-59" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-60" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाऽभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान्त्सह । ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-61" |
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|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स्वयोग्यं ब्रह्मवित् भुङ्क्ते विरिञ्चेन परेण च ।" |
| "ब्रह्मणा सह तद्वश्यः सुखमेव न दुष्कृतम् ॥ इति च ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-62" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नात् पुरुषः ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-63" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-64" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V06" |
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| type | "verse" |
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीग्ग् श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपियन्त्यन्ततः । अन्नग्ं हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नग्ं हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद् भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-65" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स एष भगवान् विष्णुर्भूतस्रष्टा गुणाधिकः ।" |
| "स एवान्नात् पुनर्जातो ह्यजातोऽपि यतो विभुः ॥" |
| "अन्नात्मनि शरीरेऽसौ व्यज्यते सुविवेकिभिः ।" |
| "अन्नस्य सारभूतोऽयं शरीरस्य च केशवः ॥" |
| "अन्ननामा चान्नसंस्थः शरीरेषु च संस्थितः ।" |
| "अत्तृत्वात् सर्वलोकानामन्नमित्युच्यते हरिः ॥" |
| "उपजीव्यश्च भूतानामिति चान्नं जनार्दनः ।" |
| "स ज्यायान् सर्वभूतेभ्यस्तस्मात् सर्वौषधं स्मृतः ॥" |
| "संसारे दह्यमानानामाश्रयत्वात् स औषधम् ।" |
| "प्रचुरं मय इत्युक्तं प्रचुरात्ता यतो हरिः॥" |
| "प्रचुरैस्सेव्यते नित्यमतोऽन्नमय ईरितः ।" |
| "देहस्यैव शिरस्यस्य शिरो विष्णोः प्रतिष्ठितम् ॥" |
| "बाह्वोः पक्षौ तथा मध्ये मध्यं पश्चात्तनौ तथा ॥" |
| "पुच्छमित्येष भगवाननिरुद्धः स्वयं हरिः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-66" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा ॥ ६ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-67" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग् दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा ॥ ८ ॥" |
|
|---|
|
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| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ॥ तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-69" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | ".... तस्मिन् सङ्कर्षणः स्थितः ॥" |
| "शिरस्तस्य यजुर्नाम यज्ञानां हरणात् स्मृतम् ।" |
| "यजुःसंस्थं च बाहू तु ऋक्सामान्तःस्थितौ सदा ॥" |
| "ऋगर्चनायाः स्वीकारात् साम दोषात् समीकृतेः ।" |
| "पञ्चरात्रगतं मध्यमादेशाख्यं सुविस्तृतेः ॥" |
| "अथर्वाख्यं तथा पुच्छमधरं चाङ्गिनां रसः ।" |
| "मनोवाचामगम्यं तं ज्ञात्वाऽऽनन्दस्वरूपिणम् ॥" |
| "कुतश्चिन्न बिभेत्येव .." |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-70" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्माद्वा एतस्मात् मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ॥ १० ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान् कामान् समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ॥ ११ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "....वासुदेवोऽन्तरस्ततः ॥ ९ ॥" |
| "श्रद्धाख्यं श्रुतिधर्तृत्वाच्छ्रद्धायां तच्छिरः स्मृतम् ।" |
| "ऋतं ज्ञानततेर्दाता चर्तस्थो दक्षिणः करः ॥" |
| "वामः सत्यस्थितः सत्यं सतां यस्मान्नियामकः ।" |
| "योगाख्यं सर्वलोकस्य योगादत्रैव योगगम् ॥" |
| "मध्यं पुच्छं महोनाम महनीयत्वतस्सदा ॥ ११ ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्माद्वा एतस्मात् विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽ नन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ॥ १२ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "तस्मिन्नानन्दरूपोऽसौ स्थितो नारायणस्सदा ।" |
| "शिरः प्रिये स्थितं तस्य परेयं प्रियनामकम् ।" |
| "मोदप्रमोदयोर्बाहू मोदनाच्च प्रमोदनात् ॥" |
| "मोदप्रमोदनामानावानन्दस्त्वाततत्वतः ।" |
| "मध्यमानन्दसंस्थं च ब्रह्म सृष्ट्या तु बृंहयेत् ॥" |
| "पुच्छं प्रधानवायौ च ब्रह्माख्ये संस्थितं सदा ।" |
| "अभेदोऽप्यविशेषोऽपि परमैश्वर्ययोगतः ॥" |
| "देहदेहिवदेवासौ पञ्चधाऽवस्थितो हरिः ।" |
| "बहिःस्थो देहवद्विष्णुरन्तस्थो देहिवत् स्मृतः ॥" |
| "अन्तर्व्याप्तिविशेषेण न त्वशक्तत्वतो बहिः ।" |
| "सर्वेऽपि पुरुषाकाराः उत्तरात् पूर्वसम्भवाः ॥" |
| "उत्तरैः पूरिताः पूर्वे निश्छिद्रत्वेन सर्वशः ।" |
| "अत्तृत्वं च प्रणेतृत्वं बोधो विविधवेत्तृता ॥" |
| "आनन्दश्च यतः पूर्णस्ततोऽन्नादिमयास्स्मृताः ।" |
| "अत्त्यादिदास्ते प्रत्येकं सर्वे सर्वगुणा अपि ॥" |
| "नामभेदस्ततस्तूक्तः सर्वनामवतामपि ।" |
| "पञ्चरूपं च तद् ब्रह्म जीवादन्यन्न विद्यते ॥" |
| "इति ये तु विजानन्ति तेऽसन्तस्तमआलयाः ।" |
| "जीवादन्यत् परं ब्रह्म पञ्चरूपं च ये विदुः ॥" |
| "सन्तस्त इति विज्ञेया मोक्षयोग्या हि ते ध्रुवम् ॥ १२ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-76" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य । कश्चन गच्छती३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य । कश्चित् समश्नुता३ उ ॥ १३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-77" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V14_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "इत्युक्ते ब्रह्मणा पूर्वं पप्रच्छवरुणो विभुम् ।" |
| "अविद्वानपि यः कश्चिद् ब्रह्माप्नोति कथञ्चन ॥" |
| "विद्वानेवोत तत्रापि सर्वे वाऽथैव केचन ।" |
| "यदि सर्वेऽथ तत्रापि सर्वे सम्यक् समाप्नुयुः ॥" |
| "केचिदेवोत सम्यक् तदसम्यगपरे जनाः ।" |
| "ज्ञानिनोऽपीति पृष्टः सन् ब्रह्मा प्राह चतुर्मुखः ॥" |
| "अज्ञा न प्राप्नुयुर्ब्रह्म प्राप्नुयुर्ज्ञानिनोऽखिलाः ।" |
| "तत्रापि सम्यक् प्राप्तिस्तु विरिञ्चस्यैव सर्वदा ॥" |
| "अन्येषां तारतम्येन प्राप्तिः सुखविशेषतः ।" |
| "इत्यभिप्रायवान् ब्रह्मा ह्युकारेण समासतः ॥" |
| "उक्त्वा प्रश्नोत्तरं पश्चाद्विस्तरेण जगाद ह ।" |
| "कश्चिदेवोत सम्यक् तदाप्नुयादिति वाक्यतः ॥" |
| "अनन्तरं तथैवेति ब्रह्मोङ्कारमुवाच ह ॥ १३ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-78" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदग्ं सर्वमसृजत । यदिदं किञ्च । तत्सृष्ट्वा । तदेवानु प्राविशत् । तदनु प्रविश्य । सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च । तत् सत्यमित्याचक्षते ॥ १४ ॥" |
|
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अज्ञो नैव तदाप्नोति ज्ञान्येवैतदवाप्नुते ।" |
| "इति ज्ञापयितुं विष्णोः स्वातन्त्र्यज्ञापनाय तु ॥" |
| "आह सृष्टिं प्रवेशं च माहात्म्यज्ञानतो यतः ।" |
| "प्रीतिं यान्ति महान्तस्तु तद्वशा एव चेश्वराः ॥" |
| "अग्न्यादयोऽपि किमुत तदन्ये मुक्तिदस्ततः ।" |
| "स एवैकस्स विज्ञेयः पूर्णैश्वर्यादिरूपवान् ॥" |
| "इति तस्य महैश्वर्यमुच्यते स त्वकामयत् ।" |
| "सृष्ट्वा जगदिदं सर्वं नियामकतयाऽस्य तु ॥" |
| "बहुरूपो भवानीति स्याज्जगच्चेत्यचिन्तयत् ।" |
| "स्यादित्यालोचनान्नान्यत् तपो विष्णोः कदाचन ॥" |
| "अवतारेष्वनुकृतिर्बाह्यवृत्या तपस्विनाम् ।" |
| "सृष्टिर्नाम स्वरूपात्तु बहिर्निष्क्रमणं स्मृतम् ॥" |
| "यद्यपीदं जगत्सर्वं स्वोदरस्थं महात्मनः ।" |
| "तथाऽप्येष द्वितीयेन रूपेण बहिराक्षिपेत् ॥" |
| "रूपान्तरेणाविशच्च जगत्सर्वं जनार्दनः ।" |
| "त्यच्चानिरुक्तं विज्ञानं तथा निलयनं महान् ॥" |
| "सत्यं प्राणस्तथा श्रीश्च सन्निरुक्तं तथाऽनृतम् ।" |
| "अविज्ञानं चानिलयनं प्रकृतिप्राणयोः परम् ॥" |
| "तद्गविष्णोस्तु सम्बन्धात् स्वतस्तन्नामको हरिः ।" |
| "ततो नियामकश्चेति त्यदानन्त्यादवाच्यतः ॥" |
| "अनिरुक्तं निलयनं सर्वाधारत्वतो हरिः ।" |
| "विज्ञानं सर्वविज्ञानात् सत्यं साधुस्वरूपतः ॥" |
| "अवसादसुवाच्यत्वदौर्बल्याज्ञप्त्यसाधुताः ।" |
| "प्रकृतिप्राणतोऽन्यत्र कुर्वंस्तन्नामको हरिः ॥" |
| "अतः साधुस्वरूपः सन् सत्यनामाऽनृतादिकम् ।" |
| "नामानेन गतत्वादेर्यदिदं किञ्च भाषितम् ॥" |
| "सन्निरुक्तादिशब्देन तत् सर्वं साधुतैव हि ।" |
| "अवसादनादिहेतुत्वं साधुतैव हि सर्वशः ॥" |
| "असाधुताऽवसादादिस्तत्कर्तृत्वं हि भाषितम् ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-80" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V16" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानग्ग् स्वयमकुरुत । तस्मात् तत् सुकृतमुच्यत इति ॥ यद्वै तत् सुकृतम् । रसो वै सः । रसग्ग् ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दीभवति । को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-81" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अनासाद्यस्त्वसन्नामा पूर्वं नारायणाभिधः ।" |
| "स आसाद्यश्च सन्नामा वासुदेवोऽभवत् प्रभुः ॥" |
| "स वासुदेवः स्वात्मानं चक्रे सङ्कर्षणादिकम् ।" |
| "तस्मात् तत् सुकृतं नाम स आनन्दो रसस्ततः ॥" |
| "आनन्दमेनं सम्प्राप्य मुक्तो मोदेन्न चान्यथा ।" |
| "आदीप्तस्त्वेष भगवान् यद्यानन्दो भवेन्न च ॥" |
| "सामान्यचेष्टा धर्म्याश्च कस्य स्युस्तमृते प्रभुम् ।" |
| "सुखं लब्ध्वा हि कुरुते लोकचेष्टां जनार्दनः ॥" |
| "अल्पात् सुखादल्पकर्मा पूर्णानन्दाद्धि सर्वकृत् ।" |
| "न ह्यार्ताः कर्म कुर्वन्ति मुग्धाश्चैव विशेषतः ॥" |
| "तस्माद् यादृक् सुखं तादृक् कर्म पूर्णसुखत्वतः ।" |
| "सर्वकृत्त्वात् परो विष्णुराह तस्मात् सनातनी ॥" |
| "सुखं लब्ध्वा करोतीति च्छन्दोगानां श्रुतिः परा ।" |
| "अलब्ध्वा तु सुखं नैव करोतीत्यपि सादरम् ॥" |
| "तत् पूर्णानन्ददेवेन कारितः प्राणिति स्फुटम् ।" |
| "सर्वलोकः स एवैक आनन्दयति चाखिलम् ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-82" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V17" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्ये अनात्म्ये अनिरुक्ते अनिलयने अभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य । तदप्येष श्लोको भवति । भीषास्माद् वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति ॥ १६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-83" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तस्माददृश्ये जैवानां गुणानामप्यसङ्गतेः ।" |
| "अनात्म्येऽथ गुणानन्त्यादनिरुक्ते निराश्रयात् ॥" |
| "अनिलयनेऽभयत्वेन यदा ज्ञानेन तिष्ठति ।" |
| "तदाऽभयं हरिं गच्छेन्नैवाज्ञानी कथञ्चन ॥" |
| "यदैतस्मिन् परे विष्णावुदरं जीवगत्वतः ।" |
| "भेदं करोति तेनैव भयमस्य महद् भवेत् ॥" |
| "अ इत्युक्तः परो विष्णुरेभ्य उच्च स एव तु ।" |
| "त उदा जीवसङ्घाः स्युरुदरं तद्गतान्तरम् ॥" |
| "तदेव ब्रह्म भयकृद् विदुषोऽविदुषस्तथा ।" |
| "विदुषोऽल्पभयं कुर्याद् यावन्मुक्तिं व्रजत्यसौ ॥" |
| "अथाभयं भवेद् ब्रह्म तस्य मुक्तस्य सर्वदा ।" |
| "तस्माद् वाय्वादयो देवा विद्वांसोऽपि विशेषतः ॥" |
| "भीताः स्वकर्म कुर्वन्ति विष्णोः प्रीत्यर्थमञ्जसा ।" |
| "अमन्वानस्य नुर्विष्णुः कुर्यान्नित्यं महद्भयम् ॥" |
| "तमआख्यमनुत्थानम् .... .... ॥ १६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-84" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सैषानन्दस्य मीमाग्ं सा भवति । युवा स्यात् साधु युवाऽध्यायकः । आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ १७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-85" |
|---|
| oldKey | "TTB_C01_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "..... विदुषां नियमेन तु ।" |
| "स्यादेव मोक्षस्तत्रापि ह्यानन्दस्य विचित्रता ॥" |
| "यस्तु साधुगुणैर्युक्तस्तस्यैवाप्यखिला मही ।" |
| "त्रेतायुगे चक्रवर्ती यदा मुक्तस्तु संसृतेः ॥" |
| "अधीतिफलपूर्णत्वादाध्यायक इतीरितः ।" |
| "स एव विष्णुना युक्तो गच्छतीति युवा स्मृतः ॥" |
| "एकानन्दस्वरूपोऽसौ मानुषो मुक्त इष्यते ।" |
| "तस्माच्छतगुणानन्दा गन्धर्वा मानुषात्मकाः ॥" |
| "मुक्ताः श्रुतिफलं प्राप्तास्ततः कामाहतास्तथा ॥ १७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-86" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V19" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ १८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-87" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V20" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
|---|
| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ १९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-88" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V21" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S02" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २० ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-89" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V22" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "TTB_C01_S02" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानामानन्दः ॥" |
| "ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥२१॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-90" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २२ ॥" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-91" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २३ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २४ ॥" |
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| id | "Taittiriya-93" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः ॥ स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २५ ॥" |
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| id | "Taittiriya-94" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ २६ ॥" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-95" |
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V27_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "TTB_C01_S02" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "तेभ्यः शतगुणानन्दा देवप्रेष्यास्तु मुख्यतः ।" |
| "ये ते हि देवगन्धर्वा मुक्तेभ्यस्तेभ्य एव च ॥" |
| "शताधिका हि पितरस्तेभ्य आजानदेवताः ।" |
| "अनाख्याता देवतास्तु जाता देवकुले च याः ॥" |
| "आजानदेवतास्ता हि ताभ्योऽग्र्याः कर्मदेवताः ।" |
| "बल्याद्या अन्तराप्राप्तदेवताः कर्मदेवताः ॥" |
| "ताभ्यश्च तात्त्विका देवाः सृष्ट्यादौ देवतां गताः ।" |
| "तेभ्यो दक्षश्चेन्द्रनामा स हीन्दुं रारयत् पुरा ॥" |
| "तस्मात् बृहस्पतिर्नाम महेन्द्रत्वात् पुरन्दरः ।" |
| "तस्मात् प्रजापतिर्मुक्तो रुद्रः प्रजननेशिता ॥" |
| "तस्माद् ब्रह्मा शतगुणो मुक्त इत्येष निर्णयः ।" |
| "यथाऽऽनन्दे तथा ज्ञाने विष्णुभक्तौ बलाधिके ॥" |
| "सर्वैर्गुणैः शतगुणाः क्रमेणोक्तेन तेऽखिलाः ।" |
| "अथवा सहस्रगुणिता अनन्तगुणितास्तथा ॥" |
| "परिमाणे शतगुणेऽप्यानन्दस्फुटतावशात् ।" |
| "यथा दीपाच्छतगुणाऽप्यग्निज्वाला न दीपवत् ॥" |
| "स्फुटीभवेद् यथैवाग्निर्बहुलोऽपि न सूर्यवत् ।" |
| "यथैव सूर्याद् द्विगुणश्चन्द्रो नैव स्फुटीभवेत् ॥" |
| "उत्तरेषामुत्तरेषां गुणा एवमतिस्फुटाः ।" |
| "प्रतिबिम्बा यतः पूर्वे ब्रह्मान्तानां नरादयः ॥" |
| "अतोऽस्पष्टस्वरूपास्ते स्फुटरूपास्तथोत्तराः ॥ १८-२६ ॥" |
|
|---|
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| oldKey | "TTB_C01_S02_V28" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः । स य एवंवित् । अस्माल्लोकात् प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ॥ २७ ॥" |
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येष श्लोको भवति । यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चनेति ॥ एतग्ं ह वाव न तपति । किमहग्ं साधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानग्ग् स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानग्ग् स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ २८ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ इति ब्रह्मवल्ली ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "यत्प्रसादात् स्वरूपाप्तिर्ब्रह्मादीनां समन्ततः ।" |
| "स विष्णुः सर्वजीवेषु नृषु देवेषु च स्थितः ।" |
| "एक एव महायोगी निर्विशेषोऽखिलैर्गुणैः ॥" |
| "सर्वोत्तमः स पूर्णश्च तमेवं वेद यः पुमान् ।" |
| "जीवांश्च तारतम्यस्थान् स गच्छेत् पञ्चरूपिणम् ॥" |
| "विष्णुं न पुण्यपापे च तस्यानिष्टे कदाचन ।" |
| "प्रियाप्रियेषु तज्ज्ञानी ह्यास्तृणोति यतो नृषु ॥" |
| "अगोचरं वाङ्मनसोरानन्त्यात् पुरुषोत्तमम् ।" |
| "ज्ञात्वा मुक्तस्य भीर्नैव कुतश्चन भविष्यति ॥" |
| "इत्यादि यजुःसंहितायाम् ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "न च सह ब्रह्मणा इत्यादेरन्योऽर्थः कल्प्यः । अप्रामाणिकत्वात् । अनाश्वासाच्च । न चौषधीभ्योऽन्नमन्नरसमय इत्यत्रोभयार्थत्वेन विरोधः । अन्नस्यान्नम् मध्यमः प्राणः प्राणः स्थूणा इत्यादिवद् विशेषितत्वादुपपत्तेः ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "न चान्नमयदीनामब्रह्मत्वे किञ्चिन्मानम् । येऽन्नं ब्रह्मोपासते ये प्राणं ब्रह्मोपासते आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् विज्ञानं ब्रह्म चेद् वेद अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत् प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचम् इत्यादिना ब्रह्मशब्देनोक्तत्वाच्च । न च लौकिकान्नस्यात्तृत्वमस्ति । येऽन्यथा विदुस्तेऽन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति इति श्रुतेरविद्यमानोपासनाद् दोषावगतेश्च ।" |
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| lines | | "न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनः इति च भागवते ।" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | ".नाविद्यमानं ब्रुवते वेदा ध्यातुं न वैदिकाः ।" |
| "अविद्यमानं ध्यायन्तो यान्ति सर्वेऽधरं तमः ॥" |
| "तस्मात् सत्यार्थतां ब्रूयात् वेदानामपि सर्वशः ।" |
| "य एवं वेद स ज्ञानी ज्ञानवान् नान्यथा भवेत् ॥" |
| "इति वेदार्थविवेके ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | ". स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये इत्यधिकरणत्वेन भेद एव जीवस्य परमादुक्तः । एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता एतमानन्दमयमात्मानमुसङ्क्रम्य । इमान् लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् इत्यादिना मुक्तस्यापि भेद एवाभ्यस्यते । अथ सोऽभयं गतो भवति इति मुक्तिप्रस्तावात् । सैषानन्दस्य मीमांसा इति मुक्तानन्दो मीमांस्यते । श्रोत्रियस्य चाकामाहतस्येति सर्वत्र विशेषणाच्च । न ह्यमुक्तस्याकामहतत्वं मुख्यं भवति । न च मुख्या श्रोत्रियता ।" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "यस्य श्रुतिफलं पूर्णं स श्रोत्रिय उदाहृतः ।" |
| "स हि मुक्तोऽकामहतः स हि कामैर्न हन्यते ॥" |
| "यस्य कामास्तु सत्याः स्युस्सहि कामैर्न हन्यते ।" |
| "न ह्यकामः क्वचित् कश्चित् दृश्यते श्रूयतेऽपि च ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-107" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | ".न च देवपदाकामस्य सकाशादिन्द्रपदाकामस्य शतगुणानन्दो दृश्यते सति च प्राजापत्यादिकामे । न च मानुषाः प्रायस्तदिच्छवः । चक्रवर्तिनस्तु युवशब्देनैव मुक्तत्वमुक्तम् । तस्मान्मुक्तविषयेयं मीमांसा । यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः इत्यत्राप्यन्तःकरणस्थानामेव कामानां विमोक्ष उक्तः । न तु स्वरूपभूतानाम् । यं यमन्तमभिकामो भवति सोऽस्य सङ्कल्पादेव भवति इति मुक्तानामपि स्वरूपभूतः कामः प्रतीयते ।" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "कामाः सङ्कल्प आनन्दो मुक्तानां तारतम्यतः ।" |
| "स्वरूपभूतास्ते सर्वे निर्दोषा गुणरूपकाः ॥ इति पाद्मे ।" |
|
|---|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः इति सूत्रम् । भेदव्यपदेशात् इति जीवेशयोर्भेदश्चोक्तो भगवता ।" |
|
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "न च भेददर्शनमसुकरम् । स्वरूपत्वात् भेदस्य । सर्वव्यावृत्तं हि सर्वस्य स्वरूपं सर्वैरनुभूयते । अन्यथाऽहं वा दृष्टोऽन्यो वा दृष्ट इत्यपि संशयः स्यात् । न च पश्चात् भेदो ज्ञायत इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न हि दृष्टवस्तुनः पुरुषस्य तस्य वस्त्वन्तराद् भेदे संशयः क्वचिद् दृष्टः । न च सर्वतो व्यावृत्यनुभवे सर्वज्ञताऽपेक्षितेति दोषः । सामान्यतः सर्वस्य सर्वैरपि ज्ञातत्वात् । यावत्तु सर्वतो भेदो विशेषतो न ज्ञायते तावत् स्वरूपमेव विशेषतो न ज्ञातम् । न हि ज्ञाताद्वस्तुनोऽव्यावृत्तिः केनचित् शङ्क्यते । यदा तु संशीयते तदापि कुतश्चिद् व्यावृत्तमेव ज्ञायते । न हि सर्वमिदं भवति वा न वेति कस्यचित् संशयः । अतो व्यावृत्तिरेव स्वरूपम् । अस्य भेद इति विशेष्यत्वमस्य स्वरूपमितिवत् । यथाऽस्तीति वर्तमानः कालो वस्तुना सहैवानुभूयते एवमन्यस्मात् व्यावृत्तमित्यत्रान्यदपि सामान्यतः सहैवानुभूयते । न ह्यस्तीति वर्तमानकालापेक्षयानुभूयत इत्येतावता विद्यमानता नाम वस्तुनोऽन्या । सदित्यपि शत्रन्तत्वात् कालसम्बन्ध्येवाऽनुभूयते तिष्ठन्नितिवत् । एवमन्यस्मात् व्यावृत्तमित्यन्येन सह प्रतीयमानमपि न स्वरूपादन्यत् । अस्माद् व्यावृत्तिरन्यस्य स्वरूपमन्यस्माद् व्यावृत्तिरस्य स्वरूपमिति नैकस्वरूपता । ज्ञानानन्दादिवत् स्वरूपत्वेऽपि व्यवहारविशेषो भवति । न च स्वरूपत्वेन भेदस्याभावो भवति । ज्ञानान्दादिवदेव । अन्यप्रतियोगिकत्वाद् भेदस्य न स्वस्मादपि भवति ।" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-111" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "भेदस्तु सर्ववस्तूनां स्वरूपं नैजमव्ययम् ।" |
| "नष्टानामपि वस्तूनां भेदो नैव विनश्यति ॥" |
| "अवस्तुनोऽपि रूपं स्वं भेद एव न चान्यथा ।" |
| "विशेषरूपनाशेन भेदमात्रावसायिता ॥" |
| "नाश इत्युच्यते सद्भिर्भेदो न हि विनश्यति ।" |
| "इत्याहुः केचिदज्ञानात् तत्राहुः सूक्ष्मदर्शिनः ॥" |
| "सत्यं भेदस्तु वस्तूनां स्वरूपं नात्र संशयः ।" |
| "तस्माद् वस्तुविनाशे तु तद्भेदो नास्ति कुत्रचित् ॥" |
| "अविनष्टस्य तस्मात्तु भेदोऽस्त्येव स्वरूपतः ।" |
| "एवम्भावादभावस्य न भेदो भावरूपवान् ॥" |
| "अभावाद् भावरूपस्य स्वरूपं भाव इष्यते ।" |
| "नष्टभेदोऽप्यभावात्मा विद्यते च विनाशतः ॥" |
| "स्वरूपत्वात्तु भेदस्य भेदे शङ्का न कस्यचित् ।" |
| "सर्वं सामान्यतो यस्मात् सर्वैरप्यनुभूयते ॥" |
| "तस्माद् व्यावृत्तता सर्वैः सर्वस्मादनुभूयते ।" |
| "प्रतियोगिता त्वभावस्याप्यस्त्यभावतया स्फुटम् ॥" |
| "न ह्यभावोऽप्यधर्मा स्यान्न तु स्याद् भावधर्मयुक् ।" |
| "अभावस्यास्तिता नाम स्यादेवाभावरूपिणी ॥" |
| "अभावतापि सैव स्यान्न तु स्याद् भावरूपिणी ।" |
| "अतः स सर्वव्यावृत्तस्वरूपो भगवान् परः ॥" |
| "येन ज्ञातः स तु ज्ञानी मुच्यते नात्र संशयः ॥" |
| "इति तत्त्वनिर्णये ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-112" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत् प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तग्ं होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-113" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तग्ं होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-114" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । प्राणं ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तग्ं होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Taittiriya-115" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V05" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तग्ं होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ॥ ४ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-116" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V06" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तग्ं होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-117" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V07" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ॥ ६ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-118" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V08" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सैषा भार्गवी वारुणी विद्या । परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ ७ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-119" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अन्नं न निन्द्यात् । तद् व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ ८ ॥" |
|
|---|
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| id | "Taittiriya-120" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V09_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "चक्षुः स चष्टे यद् विष्णुः श्रोत्रं श्रोतृत्वतो विभुः ।" |
| "वाक् च वक्तृत्वतो नित्यं मनो मन्तृत्वतस्तथा ॥" |
| "तपो ज्ञानस्वरूपत्वाद् विज्ञानं तु विवेचनात् ।" |
| "ज्ञानानुसन्धानरूपतपसा तं जनार्दनम् ॥" |
| "क्रमाद् भृगुर्व्यजानात् तमन्नादिबहुरूपिणम् ।" |
| "एवं विजानंस्तं विष्णुं तस्मिंस्तु प्रतितिष्ठति ॥" |
| "मुक्तो भूत्वाऽन्नवांश्च स्यादन्नादश्च सदैव तु ।" |
| "अन्ननामा तु भगवान् विद्वांस्तमुपजीवति ॥" |
| "तद्वांश्च तेन गुप्तत्वात् .... ॥ १८ ॥" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V10" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अन्नं न परिचक्षीत । तद् व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् । ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ ९ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अन्नं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ १० ॥" |
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| id | "Taittiriya-123" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "न कं चन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद् यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोन्नग्ं राद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नग्ं राध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नग्ं राद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नग्ं राध्यते । एतद्वा अन्ततोन्नग्ं राद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नग्ं राध्यते । य एवं वेद ॥ ११ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "..... विद्यार्थे वसतीच्छया ।" |
| "आगतं नेति न ब्रूयात् तदेतद् विदुषो व्रतम् ॥" |
| "स विष्णुः पृथिवीनामा पृथुत्वात् प्राणनामकः ।" |
| "प्रकृष्टानन्दबलत आकाशः सर्ववेत्तृतः ॥" |
| "शराख्यदेहिनश्चैव शरीरं प्रेरणात् स्मृतः ।" |
| "एतैश्चतुभिर्भगवान् रूपैश्च चतुरात्मभिः ॥" |
| "भोग्यभोक्तृस्वरूपेण तिष्ठति क्रीडया स्वयम् ।" |
| "न च भोग्यत्वमात्रेण हीनत्वं तस्य कुत्रचित् ॥" |
| "न हि भार्योपभोग्यस्तु भर्ता हीनत्वमाप्नुयात् ।" |
| "एवं स भगवान् विष्णुरविशेषोऽखिलेष्वपि ॥" |
| "रूपेषु क्रीडते नित्यं भोक्ता भोग्य इतीच्छया ।" |
| "अन्नाख्यं तं नैव निन्द्यात् बहु मन्येत तं सदा ॥" |
| "इति व्रतद्वयं ह्येतद् भाव्यं यदि सुखे स्पृहा ।" |
| "येन केनापि विधिना बह्वित्येव जनार्दनम् ॥" |
| "मत्वैव प्राप्नुयान्नित्यं मनोवाक्कायवृत्तिभिः ।" |
| "य एवं समुपासीत तस्यान्नाख्यो हरिः स्वयम् ॥" |
| "सिद्ध इत्येव हि प्राहुर्विद्वांसः परिनिष्ठिताः ।" |
| "यस्य तद् ब्रह्म संसिद्धं पूर्वं तेनाप्यतेऽग्रतः ॥" |
| "मध्ये वयसि चेत् सिद्धं मुक्तो मध्यं प्रपश्यति ।" |
| "वार्धके चेद् विजानाति मुक्तः पादौ प्रपश्यति ॥" |
| "तेजोमण्डलमेवान्यत् अङ्गं विष्णोः प्रपश्यति ।" |
| "पूर्वे वयसि बोद्धव्यमामुखात् सर्वदृष्टये ॥ ११ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "क्षेमकृत्वात् क्षेमनामा वाचिस्थः स परो हरिः ।" |
| "योगनामा तथा प्राणे सर्वकामनियोजनात् ॥" |
| "क्षेमनामा क्षेमकृत्त्वादपानेऽपि हरिः स्वयम् ।" |
| "कर्मनामा हस्तगतः कर्मकृत्त्वाज्जनार्दनः ॥" |
| "गतिदत्वात् गतिर्नाम पादस्थः पुरुषोत्तमः ।" |
| "विसर्गकृद् विमुक्त्याख्यः पायुस्थः परमो विभुः ॥" |
| "अध्यात्मस्थ इति प्रोक्तोऽथाधिदैवगतं शृणु ।" |
| "पर्जन्ये तृप्तिनामासौ तृप्तिदत्वाज्जनार्दनः ॥" |
| "वायौ तु बलनामा च बलदत्वात् सदैव हि ।" |
| "यशःप्रदत्वात् दक्षे तु यशः पश्वभिमानिनि ॥" |
| "नक्षत्रेषु ज्योतिराख्यो ज्योतिर्दातृत्वतो हरिः ।" |
| "उपस्थमानिनि शिवे प्रजात्यानन्दसन्ततेः ॥" |
| "दातृत्वात् तत्तदाख्योऽसौ सन्ततिस्त्वमृतं स्मृतम् ।" |
| "सर्वः सर्वप्रदत्वात् तु प्रकृतौ पुरुषोत्तमः ॥ १२ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः ॥ १३ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "स प्रतिष्ठा स्थापकत्वात् मनो मान्यत्वतो हरिः ।" |
| "नमो नम्यत्वतो नित्यं महश्चापि महत्त्वतः ॥" |
| "विरिञ्चमारकश्चासौ ब्रह्म पूर्णगुणत्वतः ॥ १३ ॥" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः । स य एवंवित् । अस्माल्लोकात् प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमाल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत् साम गायन्नास्ते । हा३वु हा३वु हा३वु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः । अहग्ग् श्लोककृदहग्ग्लोककृदहग्ग्श्लोककृत् ॥ १४ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाइ । यो मा ददाति स इदेव मा३वाः । अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम् । सुवर्णज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ १५ ॥" |
| "ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-131" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "वेदैनं तत्त्वतो ब्रह्मा स एनं पञ्चरूपिणम् ॥" |
| "प्राप्य गायति मुक्तः सन्नन्ननामाऽस्मि भोग्यतः ।" |
| "यथेष्टमन्नभोक्ता च कीर्तिकर्ता हरेस्तथा ॥" |
| "ऋतरूपस्य विष्णोस्तु पुत्रः प्रथमजो ह्यहम् ।" |
| "देवेभ्यः पूर्वजश्चाहं मुक्तानामाश्रयः सदा ॥" |
| "यो ददाति च मां सम्यग् विष्णुतत्त्वप्रकाशकः ।" |
| "स इत्थमेव मां याति विष्णोरन्नमहं सदा ॥" |
| "ममान्नं सर्वजीवास्तु भोग्या मम यतः सदा ।" |
| "सर्वमभ्यभवं चाहं गुणैः सर्वैश्च नित्यकैः ॥" |
| "सुवर्णो भगवान् विष्णुर्ज्योतिः स मम (रे)रोचकः ।" |
| "योऽहमेवंविदभवं तस्य मे माधवः पतिः ॥" |
| "इति ब्रह्मा गायमानो मुक्तश्चरति सर्वदा ॥" |
| "इति यजुःसंहितायाम् ॥" |
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| id | "Taittiriya-132" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "अन्नं भगवन्तं न परिचक्षीत । न निराकुर्यात् । तद्गुणांस्तत्कर्माणि वा कुत्रापि बहु कुर्वीत । बहुगुणत्वेन प्रतिपादयेत् भगवन्तम् । यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अतिप्रयत्नेनापि विहितप्रकारेण बहुतरां भगवद्विद्यां प्राप्नुयात् ।" |
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| id | "Taittiriya-133" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "प्रजापतिः प्रथमजा ऋतस्यात्मनाऽऽत्मानमभिसम्बभूव ।" |
| "प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव इत्यादिना विरिञ्चस्यैवैतद् गानम् । अन्यो न परि बभूवेति निषेधात् ।" |
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| id | "Taittiriya-134" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
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| lines | | "विद्युद्वन्मानुषा विद्युः सूर्यमण्डलवत् सुराः ।" |
| "प्रतिबिम्बवच्च गिरिशो ब्रह्मैनं पश्यति स्फुटम् ॥" |
| "ब्रह्मा हि स्थिरचिद्रूपो बहुलात्मा विशेषतः ।" |
| "अन्ये क्रमादबहुलास्तथा चञ्चलचेतसः ॥" |
| "तस्मात् सम्यङ् न पश्यन्ति हरिं ब्रह्मा तु पश्यति ॥" |
| "इति हरिवंशवचनाच्च ब्रह्मैवैनं सम्यग् वेद ।" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-135" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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|---|
| lines | | "यस्योच्चोथ समो वा कश्चिन्नैवास्त्यनन्तसच्छक्तेः ।" |
| "तं वन्दे परमेशं प्रेयांसं प्रेयसश्च मे विष्णुम् ॥" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-136" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V16_B01" |
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|---|
| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।" |
| "वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥" |
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| id | "Taittiriya-137" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V16_B01" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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| lines | | "हनुशब्दो ज्ञानवाची हनूमान् मतिशब्दितः ।" |
| "रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥" |
| "भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृताः ।" |
| "ऋगाद्याः इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥" |
| "प्रोक्ताः सप्त शिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।" |
| "मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ॥" |
| "मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुती तनुः ।" |
| "इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।" |
| "यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च ।" |
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|---|
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| id | "Taittiriya-138" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
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|---|
| lines | | "साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा ।" |
| "हनूमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥" |
| "पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः ।" |
| "पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः ॥" |
| "दशेति पूर्णमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते ।" |
| "प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः ॥" |
| "आ समन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् ।" |
| "असत्यमप्रतिष्ठं च जगदेतदनीश्वरम् ॥" |
| "वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति ।" |
| "येन विष्णोस्तु वर्पाख्यान् गुणानज्ञासिषुः परान् ॥" |
| "ईशानासः सूरयश्च निगूढान् निर्गुणोक्तिभिः ।" |
| "त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः ॥" |
| "एतेषां परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः ।" |
| "स्वयम्भुब्रह्मसञ्ज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥ इति च ।" |
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| id | "Taittiriya-139" |
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| oldKey | "TTB_C01_S03_V16_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "TTB_C01_S03" |
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| chapter | "TTB_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पूर्णागण्यगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे ।" |
| "अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥" |
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