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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "रोहिण्यामर्धरात्रे तु यदा कालाष्टमी भवेत् ।" |
| "जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी॥ १॥" |
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| searchText | "रोहिण्यामर्धरात्रे तु यदा कालाष्टमी भवेत् ।
जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी॥ १॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "यस्यां जातो हरिः साक्षान्निशीथे भगवानजः ।" |
| "तस्मात्तद्दिनमत्यन्तं पुण्यं पापहरं परम्॥ २॥" |
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| searchText | "यस्यां जातो हरिः साक्षान्निशीथे भगवानजः ।
तस्मात्तद्दिनमत्यन्तं पुण्यं पापहरं परम्॥ २॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "तस्मात् सर्वैरुपोष्या सा जयन्ती नाम वै सदा ।" |
| "द्विजातिभिर्विशेषेण तद्भक्तैश्च विशेषतः॥ ३॥" |
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| searchText | "तस्मात् सर्वैरुपोष्या सा जयन्ती नाम वै सदा ।
द्विजातिभिर्विशेषेण तद्भक्तैश्च विशेषतः॥ ३॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "यो भुङ्क्ते तद्दिने मोहात्पूयशोणितमत्ति सः ।" |
| "तस्मादुपवसेत् पुण्यं तद्दिनं श्रद्धयान्वितः॥ ४॥" |
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| searchText | "यो भुङ्क्ते तद्दिने मोहात्पूयशोणितमत्ति सः ।
तस्मादुपवसेत् पुण्यं तद्दिनं श्रद्धयान्वितः॥ ४॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "कृत्वा शौचं यथान्यायं स्नानं कुर्यादतन्द्रितः ।" |
| "प्रभातकाले मेधावी योगायेति यथाविधि॥ ५॥" |
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| searchText | "कृत्वा शौचं यथान्यायं स्नानं कुर्यादतन्द्रितः ।
प्रभातकाले मेधावी योगायेति यथाविधि॥ ५॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "नित्याह्निकं प्रकुर्वीत भगवन्तमनुस्मरन् ।" |
| "योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय श्रीगोविन्दाय नमो नमः॥ ६॥" |
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| searchText | "नित्याह्निकं प्रकुर्वीत भगवन्तमनुस्मरन् ।
योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय श्रीगोविन्दाय नमो नमः॥ ६॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "मध्याह्नकाले च पुमान् सायङ्काले त्वतन्द्रितः ।" |
| "स्नायीत पूर्वमन्त्रेण वासुदेवमनुस्मरन्॥ ७॥" |
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| searchText | "मध्याह्नकाले च पुमान् सायङ्काले त्वतन्द्रितः ।
स्नायीत पूर्वमन्त्रेण वासुदेवमनुस्मरन्॥ ७॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "ततः पूजां प्रकुर्वीत विधिवत्सुसमाहितः ।" |
| "यज्ञायेति च मन्त्रेण श्रद्धाभक्तियुतः पुमान्॥ ८॥" |
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| searchText | "ततः पूजां प्रकुर्वीत विधिवत्सुसमाहितः ।
यज्ञायेति च मन्त्रेण श्रद्धाभक्तियुतः पुमान्॥ ८॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "कृष्णं च बलभद्रं च वसुदेवं च देवकीम् ।" |
| "नन्दगोपं यशोदां च सुभद्रां तत्र पूजयेत् ।" |
| "अर्घ्यं दत्वा समभ्यर्च्याभ्युदिते शशिमण्डले॥ ९॥" |
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| searchText | "कृष्णं च बलभद्रं च वसुदेवं च देवकीम् ।
नन्दगोपं यशोदां च सुभद्रां तत्र पूजयेत् ।
अर्घ्यं दत्वा समभ्यर्च्याभ्युदिते शशिमण्डले॥ ९॥" |
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| lines | | "जातः कंसवधार्थाय भूभारोत्तारणाय च ।" |
| "कौरवाणां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च॥ १०॥" |
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| searchText | "जातः कंसवधार्थाय भूभारोत्तारणाय च ।
कौरवाणां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च॥ १०॥" |
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| id | "Jayantinirnaya-11" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | | "पाण्डवानां हितार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।" |
| "गृहणार्घ्यं मया दत्तं देवक्या सहितो हरे॥ ११॥" |
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| searchText | "पाण्डवानां हितार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।
गृहणार्घ्यं मया दत्तं देवक्या सहितो हरे॥ ११॥" |
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| id | "Jayantinirnaya-12" |
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| lines | | "क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव ।" |
| "गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिन्॥ १२॥" |
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| searchText | "क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिन्॥ १२॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "दत्वार्घ्यं मनुनानेन ह्युपस्थाय विधुं बुधः ।" |
| "शशिने चन्द्रदेवाय सोमदेवाय चेन्दवे॥ १३॥" |
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| searchText | "दत्वार्घ्यं मनुनानेन ह्युपस्थाय विधुं बुधः ।
शशिने चन्द्रदेवाय सोमदेवाय चेन्दवे॥ १३॥" |
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| id | "Jayantinirnaya-14" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "मृगिणे सितबिम्बाय लोकदीपाय दीपिने ।" |
| "शीतदीधितिबिम्बाय तारकापतये नमः॥ १४॥" |
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| searchText | "मृगिणे सितबिम्बाय लोकदीपाय दीपिने ।
शीतदीधितिबिम्बाय तारकापतये नमः॥ १४॥" |
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| id | "Jayantinirnaya-15" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "उपसंहृत्य तत्सर्वं ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।" |
| "विश्वायेति च मन्त्रेण ततः स्वापं समाचरेत्॥ १५॥" |
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| searchText | "उपसंहृत्य तत्सर्वं ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
विश्वायेति च मन्त्रेण ततः स्वापं समाचरेत्॥ १५॥" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "ततो नित्याह्निकं कृत्वा शक्तितो दीयतां धनम् ।" |
| "सर्वायेति च मन्त्रेण ततः पारणमाचरेत् ।" |
| "धर्मायेति ततः स्वस्थो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ १७॥" |
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| searchText | "ततो नित्याह्निकं कृत्वा शक्तितो दीयतां धनम् ।
सर्वायेति च मन्त्रेण ततः पारणमाचरेत् ।
धर्मायेति ततः स्वस्थो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ १७॥" |
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| id | "Jayantinirnaya#note-1" |
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| chapter | "JN_C01" |
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| lines | |
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| searchText | "जयन्तीनिर्णयः
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितो जयन्तीनिर्णयः समाप्तः॥" |
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