| id | "Tattvasankhyanam-1" |
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| oldKey | "TSK_C01_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते ।" |
| "स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः भावाभावौ द्विधेतरत् ॥1॥" |
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| searchText | "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते ।
स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः भावाभावौ द्विधेतरत् ॥1॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-2" |
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| oldKey | "TSK_C01_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।" |
| "चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥2॥" |
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| searchText | "प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।
चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥2॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-3" |
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| oldKey | "TSK_C01_V03" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।" |
| "नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥3॥" |
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| searchText | "दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।
नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥3॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-4" |
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| oldKey | "TSK_C01_V04" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।" |
| "दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥4॥" |
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| searchText | "स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।
दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥4॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-5" |
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| oldKey | "TSK_C01_V05" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ।" |
| "एवं विमुक्तियोग्याश्च तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥5॥" |
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| searchText | "देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ।
एवं विमुक्तियोग्याश्च तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥5॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-6" |
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| type | "verse" |
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| parent | "TSK_C01" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "इति द्विधा मुक्त्ययोग्या दैत्यरक्षपिशाचकाः ।" |
| "मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकीर्तिताः ॥6॥" |
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| searchText | "इति द्विधा मुक्त्ययोग्या दैत्यरक्षपिशाचकाः ।
मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकीर्तिताः ॥6॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-7" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "ते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ।" |
| "नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥7॥" |
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| searchText | "ते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ।
नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥7॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-8" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "नित्या वेदाः पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।" |
| "नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तमनित्यं द्विविधं स्मृतम् ॥8॥" |
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| searchText | "नित्या वेदाः पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।
नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तमनित्यं द्विविधं स्मृतम् ॥8॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-9" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "असंसृष्टं च संसृष्टमसंसृष्टं महानहम् ।" |
| "बुद्धिर्मनःखानि दश मात्रा भूतानि पञ्च च ॥9॥" |
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| searchText | "असंसृष्टं च संसृष्टमसंसृष्टं महानहम् ।
बुद्धिर्मनःखानि दश मात्रा भूतानि पञ्च च ॥9॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-10" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| lines | | "संसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।" |
| "सृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने ॥10॥" |
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| searchText | "संसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।
सृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने ॥10॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam-11" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| verseType | "shloka" |
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| lines | | "बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृत्तिर्ज्योतिरेव च ।" |
| "विष्णुनास्य समस्तस्य समासव्यासयोगतः ॥11॥" |
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| searchText | "बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृत्तिर्ज्योतिरेव च ।
विष्णुनास्य समस्तस्य समासव्यासयोगतः ॥11॥" |
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| id | "Tattvasankhyanam#note-1" |
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| type | "note" |
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| chapter | "TSK_C01" |
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| searchText | "तत्त्वसङ्ख्यानम्
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं तत्त्वसङ्ख्यानम् ॥" |
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