| id | "Isha-1" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_I01" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "नित्यानित्यजगद्धात्रे नित्याय ज्ञानमूर्तये ।" |
| "पूर्णानन्दाय हरये सर्वयज्ञभुजे नमः ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-2" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_I02" |
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| type | "introduction" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "यस्माद् ब्रह्मेन्द्ररुद्रादिदेवतानां श्रियोऽपि च ।" |
| "ज्ञानस्फूर्तिः सदा तस्मै हरये गुरवे नमः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-3" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_I03" |
|---|
| type | "introduction" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स्वायम्भुवो मनुरेतैर्मन्त्रैर्भगवन्तमाकूतिसूनुं यज्ञनामानं विष्णुं तुष्टाव । स्वायम्भुवः स्वदौहित्रं विष्णुं यज्ञाभिधं मनुः । ईशावास्यादिभिर्मन्त्रैस्तुष्टावावहितात्मना ॥ रक्षोभिरुग्रैः सम्प्राप्तः खादितुं मोचितस्तदा । स्तोत्रं श्रुत्वैव यज्ञेन तान् हत्वाऽवध्यतां गतान् ॥ प्रादादि्ध भगवांस्तेषामवध्यत्वं हरः प्रभुः । तैर्वध्यत्वं तथाऽन्येषामतः कोऽन्यो हरेः प्रभुः ॥ इति ब्रह्माण्डे । भागवते चायमर्थ एव उक्तः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-4" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V01" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।" |
| "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-5" |
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| oldKey | "IS_C01_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ईशस्यावासयोग्यमीशावास्यम् । जगत्यां प्रकृतौ । तेन ईशेन । त्यक्तेन दत्तेन । भुञ्जीथाः ।" |
| "स्वतः प्रवृत्यशक्तत्वादीशावास्यमिदं जगत् ।" |
| "प्रवृत्तये प्रकृतिगं यस्मात् स प्रकृतीश्वरः ॥" |
| "तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् ।" |
| "तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् ॥ इति ब्राह्मे ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-6" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतग्ं समाः ।" |
| "एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-7" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V02_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अकुर्वतः कर्म न लिप्यत इति नास्ति ।" |
| "अज्ञस्य कर्म लिप्येत कृष्णोपास्तिमकुर्वतः ।" |
| "ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥" |
| "अतोऽलेपेऽपि लेपः स्यादतः कार्यैव सा सदा ॥" |
| "इति नारदीये ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-8" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "असुर्या नाम ते लोकाः अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।" |
| "तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-9" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V03_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "सुष्ठु रमणविरुद्धत्वादसुराणां प्राप्यत्वाच्चासुर्याः । न च रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनः इत्युक्तत्वात् ।" |
| "महादुःखैकहेतुत्वात् प्राप्यत्वादसुरैस्तथा ।" |
| "असुर्या नाम ते लोकास्तान् यान्ति विमुखा हरौ ॥ इति वामने ।" |
| "ये के चेत्यनेन नियम उक्तः ।" |
| "नियमेन तमो यान्ति सर्वेऽपि विमुखा हरौ । इति च ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-10" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।" |
| "तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-11" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अनेजन्निभर्यत्वात्तदेकं प्राधान्यतस्तथा ।" |
| "सम्यग्ज्ञातुमशक्यत्वादगम्यं तत्सुरैरपि ॥" |
| "स्वयं तु सर्वानगमत् पूर्वमेव स्वभावतः ।" |
| "अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥" |
| "द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् ।" |
| "मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां हरयेर्पयेत् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| "ऋष ज्ञाने ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-12" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।" |
| "तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-13" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तदेजति तत एव एजत्यन्यत् । तत् स्वयं नेजति ।" |
| "ततो बिभेति सर्वोऽपि न बिभेति हरिः स्वयम् ।" |
| "सर्वगत्वात् स दूरे च बाह्येऽन्तश्च समीपगः ॥" |
| "इति तत्त्वसंहितायाम् ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-14" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।" |
| "सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-15" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V06_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "सर्वगं परमात्मानं सर्वं च परमात्मनि ।" |
| "यः पश्येत् स भयाभावान्नात्मानं गोप्तुमिच्छति ॥" |
| "इति सौकरायणश्रुतिः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-16" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः ।" |
| "तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-17" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "यस्मिन् परमात्मनि सर्वभूतानि स परमात्मैव तत्र सर्वभूतेष्वभूत् । एवं सर्वभूतेष्वेकत्वेन परमात्मानं विजानतः को मोहः ।" |
| "यस्मिन् सर्वाणि भूतानि स आत्मा सर्वभूतगः ।" |
| "एवं सर्वत्र यो विष्णुं पश्येत् तस्य विजानतः ॥" |
| "को मोहः कोऽथवा शोकः स विष्णुं पर्यगाद्यतः ॥" |
| "इति पिप्पलादशाखायाम् ।" |
| "पूर्वोक्तानुवादेन शोकमोहाभावो विजानतश्चात्रोच्यते । अभ्यासश्च सर्वगतत्वस्य तात्पर्यद्योतनार्थः ॥ ७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-18" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।" |
| "कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-19" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "शुक्रं तच्छोकराहित्यादव्रणं नित्यपूर्णतः ।" |
| "पावनत्वात्सदा शुद्धमकायं लिङ्गवर्जनात् ॥" |
| "स्थूलदेहस्य राहित्यादस्नाविरमुदाहृतम् ।" |
| "एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥" |
| "ब्रह्मादिसर्वमनसां प्रकृत्या मनसोऽपि च ।" |
| "ईशितृत्वान्मनीषी स परिभूस्सर्वतो वरः ॥" |
| "सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः ।" |
| "स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥" |
| "अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः ।" |
| "नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥" |
| "सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः ।" |
| "सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥" |
| "एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् ।" |
| "अनाद्यनन्तकालीनं ससर्जात्मेच्छया प्रभुः ॥ इति वाराहे ॥८॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-20" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।" |
| "ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ ९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-21" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V10" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया ।" |
| "इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-22" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V11" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।" |
| "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-23" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V11_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अन्यथोपासका ये तु तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ।" |
| "ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥" |
| "तस्माद्यथास्वरूपं तु नारायणमनामयम् ।" |
| "अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः ।" |
| "ते निन्दयाऽयथार्थस्य दुःखाज्ञानादिरूपिणः ॥" |
| "दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः ।" |
| "यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥" |
| "यान्ति ... ॥ ९-११ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-24" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V12" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।" |
| "ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ १२ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-25" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।" |
| "इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-26" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सम्भूतिं च विनाशं यस्तद्वेदोभयं सह ।" |
| "विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-27" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V14_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "... एवं सृष्टिकर्तृत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति ये हरेः ।" |
| "तेऽपि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् ॥" |
| "नाङ्गीकुर्वन्ति तेऽप्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् ।" |
| "सर्वकर्तारमीशेशं सर्वसंहारकारकम् ॥" |
| "यो वेद संहृतिज्ञानाद्देहबन्धाद्विमुच्यते ।" |
| "सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात् तद्व्यक्तिमाव्रजेत् ॥" |
| "सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् ।" |
| "जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥" |
| "न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् ।" |
| "नैव प्रचिन्तयेत् तस्मात् ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ॥" |
| "मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् ।" |
| "ततो विष्णोः परोत्कर्षं सम्यग्ज्ञात्वा विमुच्यते ॥" |
| "इति कौर्मे ॥ १२-१४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-28" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।" |
| "तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-29" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V15_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पात्रं हिरण्मयं सूर्यमण्डलं समुदाहृतम् ।" |
| "विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥ तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् । सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-30" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।" |
| "समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-31" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "... ... प्रधानज्ञानरूपतः ।" |
| "विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥" |
| "सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः ।" |
| "विशेषेणैव गम्यत्वात् ... ॥ १६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-32" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-33" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ १८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-34" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V19" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ १९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-35" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V19_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "...अहं चासावहेयतः ।" |
| "अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥" |
| "स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः ।" |
| "स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।" |
| "सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति ॥ यस्मिन्नयं स्थितः सोऽप्यमृतः किमु परः । अः ब्रह्मैव निलयनं यस्य वायोः सोऽनिलम् ।" |
| "अतिरोहितविज्ञानाद्वायुरप्यमृतः स्मृतः ।" |
| "मुख्यामृतः स्वयं रामः परमात्मा सनातनः ॥" |
| "इति रामसंहितायाम् ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-36" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V19_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "भक्तानां स्मरणं विष्णोर्नित्यज्ञप्तिस्वरूपतः ।" |
| "अनुग्रहोन्मुखत्वं तु नैवान्यत् क्वचिदिष्यते ॥" |
| "इति ब्रह्मतर्के ॥ १७-१९ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Isha-37" |
|---|
| oldKey | "IS_C01_V20" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "IS_C01" |
|---|
| chapter | "IS_C01" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।" |
| "युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ २० ॥" |
|
|---|
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| id | "Isha-38" |
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| oldKey | "IS_C01_V20_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "IS_C01" |
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| chapter | "IS_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "वयुनं ज्ञानम् । त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वम् इति वचनात् । जुहुराणं अस्मानल्पीकुर्वत् । युयोधि वियोजय ।" |
| "यदस्मान् कुरुतेऽत्यल्पांस्तदेनोऽस्मद्वियोजय ।" |
| "नय नो मोक्षवित्तायेत्यस्तौद्यज्ञं मनुः स्वराड् ॥ इति स्कान्दे ।" |
| "युयु वियोगे इति धातुः । भक्तिज्ञानाभ्यां भूयिष्ठां ते नम इत्युक्तिं विधेम ॥" |
| "पूर्णशक्तिचिदानन्दश्रीतेजःस्पष्टमूर्तये ।" |
| "ममाभ्यधिकमित्राय नमो नारायणाय ते ॥" |
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