| id | "Karmanirnaya-1" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_001" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ॐ॥ य इज्यते विधीशानशक्रपूर्वैस्सदा मखैः ।" |
| "रमाप्रणयिने तस्मै सर्वयज्ञभुजे नमः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-2" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४)" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-3" |
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| oldKey | "KNR_C01_V01_B001" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "महानाम्नीनाम्" |
| "ऋचाम् उपसर्गा ये उपसर्जनभूतास्तान्" |
| "उपसृजति" |
| "संयोजयति । महन्नाम यास्वृक्षु विद्यते ता महानाम्न्यः । परस्य ब्रह्मणो यन्नामेन्द्रादिकं तन्महार्थत्वान्महत् । महद्धि तत्परं ब्रह्म । अशेषगुणपूर्तेः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-4" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B002" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तत्रैक आहुरगुणं ब्रह्मेति । न तद्युक्तम्, श्रुतियुक्तिविरोधात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-5" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B003" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तथाहि श्रुतिः -" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२)</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५)</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते॥’(मुण्डक.उ.१.१.९)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id">‘दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥’(मुण्डक.उ.३.२(२.१.२))</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पुरुषः।’(ऋ.सं.१०.९०.३)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।’(ऋ.सं.१०.८२.३)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।<br/> पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः।’(छां.उ.३.१४.२,४)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि।’(ऋ.सं.१.१५४.१)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति।’(ऋ.सं.७.९९.१)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप।’(ऋ.सं.७.९९.२)</span>" |
| "इत्यादिका ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-6" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B004" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "युक्तिश्च । बुद्धिपूर्वं सर्वकर्तृत्वात् सर्वज्ञत्वादयो गुणा युक्ताः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम्’(भाग.३.३२.१३)</span>" |
| "इति च भागवते ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-7" |
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| oldKey | "KNR_C01_V01_B005" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च-" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shvetashvataropanishat-id">‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.उ.६.११)</span>" |
| "इत्यादिविरोधः । सत्वादिगुणाभावोक्तेस्तत्र । अन्यथा ‘एको देवस्सर्वभूतेषु गूढः’ इत्यादीनामपि गुणत्वात् स्वोक्तिविरोधः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-8" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B006" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च निर्विशेषं नाम किञ्चिदस्ति । निर्विशेषत्वोक्तेरेव व्याहतत्वात् । निर्विशेषत्वेन विशिष्टं (तन्न) न वेत्युक्ते, यद्यविशिष्टं तर्हि न विशेषनिराकरणं विशेषवत्त्वमेव भवति । यदि तेन विशिष्टं स एव विशेष इति व्याहतिः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-9" |
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| oldKey | "KNR_C01_V01_B007" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च निर्विशेषत्वे किञ्चिन्मानम् । अशेषविशेषवचनानुभवयुक्तिविरोधश्च ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-10" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B008" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च मिथ्याविशेषवत् । व्याहतेः । मिथ्याविशेष इत्युक्ते ह्यसद्विशेष इत्येव भवति । तथा चाविशेष (विशेष)विशिष्टपक्षोक्तदोष एव ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-11" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B009" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न चानिर्वचनीयविशेष इति भवति । अनिर्वचनीयासिद्धेः । न हि तत्र प्रत्यक्षमस्ति । मिथ्याशब्दस्त्वभाववाच्येव । तदन्यत्र प्रमाणाभावात् । न चान्यत् प्रमाणम् । प्रतिज्ञाव्याहतेः । नहि सदन्तरादसतश्चान्यत् सदसद्विलक्षणं प्रसिद्धम् । असन्न भवतीत्युक्ते ‘द्वौ नञौ प्रकृतमर्थं सातिशयं गमयतः’ इति सदेव भवति । असदन्तरं वा विशेषविवक्षायाम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-12" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B010" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "किञ्चैतद्वैलक्षण्यं भेदोऽभेदो भेदाभेदो वा? न तावद्भेदः, अनङ्गीकारात् । व्यावहारिकभेदश्चानिर्वाच्यसिद्धौ वक्तव्यः । न चाव्यावहारिकं किञ्चित् । न चाशेषव्यवहारनिवृत्तौ किञ्चिन्मानम् । न च मिथ्यातथ्ययोस्सामान्यं व्यावहारिकत्वं धूमबाष्पयोर्धूमत्ववत् । न चाभेदोऽनङ्गीकारदेव । तथैवोभयम् । अभेदे चानिर्वाच्यब्रह्मणोस्तच्छब्दयोः पर्यायत्वम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-13" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B011" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च व्यावर्त्यविशेषेणापर्यायत्वं क्वचित् । व्यावर्त्यविशेषस्तद्व्यावृत्ते ब्रह्मणि विशेेषमापादयति चेद्विशिष्टवाक्यार्थता । न चेन्न ब्रह्मज्ञानार्थिनः(ने) पदान्तरं वाच्यम्, असङ्गतत्वात् । मिथ्याविशेषस्य चासिद्धिरुक्ता । (ततो)अतोऽन्योन्याश्रयताऽनवस्थितिश्चक्रकं वा । भेदाभेदविलक्षणमप्युक्तरीत्यैवापाकृतम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-14" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B012" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "किञ्चासद्विलक्षणमित्यत्राभावान्यविरोधानां मध्ये नञः कोऽर्थः ? यद्यभावः, न, असद्विलक्षणत्वं भावत्वमेव जगतः स्यात् । न च सतोऽन्यस्मादसतो विलक्षणं जगत् । असतोऽन्यत्वादिधर्मानङ्गीकारात्। ब्रह्मणश्च । असतोऽनिर्वचनीयत्वाङ्गीकाराच्च न वैलक्षण्यं ततोऽनिर्वाच्यस्य । तथापि चेद् वैलक्षण्यं नानिर्वाच्यत्वं जगतः(वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वं न जगतः) । न च विरोधि(धः) । विरोधिनोरन्यतरनिषेधेऽन्यतरव्याप्तत्वानुभवात् । अविद्यमानं न भवतीत्युक्ते विद्यमानमित्येव हि सर्वलोकानुभवः । अतोऽनन्तगुणो भगवान्नारायणो इति सिद्धम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-15" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B013" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च सिद्धेऽर्थे वाक्यस्य प्रामाण्याभावादीश्वराद्यसिद्धिः । सिद्धातिरिक्तकार्याभावात् । लिङाद्यर्थस्त्विष्टसाधनत्वमेव । न हि कर्तव्यत्वं नामेष्टसाधनत्वादन्यत्किञ्चित् (अस्ति) । तन्मानाभावात् । शब्दस्तु न तद्वक्तीत्युक्तम् । लिङादेरिष्टसाधनार्थत्वेनैव कृतार्थत्वे तदन्यकार्यकल्पने कल्पनागौरवं (च)।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-16" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B014" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च तत्कल्पकं किञ्चित् । विप्रतिपत्तौ चान्यन्मानं वक्तव्यं तद्भावे । न चानुमा । अप्रसिद्धविशेषणत्वात्। न चार्थापत्तिः । अनुपपत्त्यभावात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-17" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B015" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "कार्याभावादेव कार्यान्वयिनि (कार्यान्वयान्वयिनि वा) व्युत्पत्तिरित्यादि दूरतो निरस्तम् । कार्यान्विते व्युत्पत्तिरिति वदतोऽकार्यान्विते व्युत्पत्तिरित्युक्ते किमुत्तरम् ? अध्याहार इत्युक्ते लोप इत्युत्तरम्। (अशेषसिद्धपदार्थ)अशेषसिद्धपदानामर्थलोपाल्लिङ्गाद्यर्थमात्रलोप(ल्लिङ्गाद्यर्थलोप) एव (व)गरीयान् । ‘हससि, हसामि’ इत्यादिसिद्धार्थ एव बालानां व्युत्पत्तेः । प्रथमप्राप्तत्वान्न(प्राप्तत्वाच्च न) तत्त्यागे कारणम् । तथैव व्युत्पत्तिदर्शनाच्च । अतः सिद्धार्थे प्रामाण्यसिद्धेश्च सिद्धं महागुणवत्वं विष्णोः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-18" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V01_B016" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ताश्च विदा मघवन् इत्याद्याः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-19" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V02" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विदा मघवन् विदा गातुमनुशंसिषो दिशः ।" |
| "शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरुवसो ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-20" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V02_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "हे" |
| "मघवन्" |
| "धनवन् यशस्विन् मखपत इति वा ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-21" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V02_B002" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तं वा एतं मघ(ख)वन्तं सन्तं मघवानित्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः’</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्’(ऋ.सं.९.७५.५)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘तन्न आयातु मघाय । यशो वा मघम् । मघमनु प्रापत्सि’, ‘आ मामेतु मघम् । मघमनुप्रापत्सि । धनं वाव मघम्’</span>" |
| "इत्यादिश्रुतिभ्यः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-22" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V02_B003" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "गातुं" |
| "त्वां स्तोतुम् ।" |
| "विद" |
| "वेदय इति सामान्यतोऽपेक्षिताशेषवेदनमुक्त्वा तात्कालिकापेक्षितार्थं प्रार्थयति-" |
| "गातुं विदेति ॥" |
| "त्वमेव" |
| "अनुशं(शा)सिषो दिशः" |
| "मार्गान् । आत्मनः स्तुतिप्रकारांस्त्वमेवोपदिशेत्यर्थः(रान् स्वयमेवोपदिशेत्यर्थः) ।" |
| "पूर्वीणां" |
| "भगवत्सम्प्रदायागतानां परमविद्यानामर्थे" |
| "शिक्ष(क्षा)" |
| "।" |
| "शचीनां" |
| "विद्यानां" |
| "पते" |
| ", वाचां पते इति वा ।" |
| "पुरूवसो" |
| "बहुवित्त बहुज्ञानेति वा। बहुषु वसति बहूनामावास इति वा ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-23" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V03" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "आभिष्ट्वमभिष्टिभिः प्रचेतन प्रचेतय।" |
| "इन्द्र द्युम्नाय न इष एवाहि शक्रः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-24" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V03_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "आभिरभिष्टिभिः एवम्भूतैस्त्वत्पर्येषणैस्त्वत्प्रार्थनैः त्वं किञ्चिन्मदादिकं" |
| "प्रचेतय" |
| "प्रबोधय । प्रकृष्टचेतन सर्वज्ञ, परमात्मन् ।" |
| "द्युम्नाय" |
| "ज्ञानाय वित्ताय यशसे वा ।" |
| "इषे" |
| "अन्नाय (च) नः प्रबोधय । एतादृशो हि" |
| "शक्रः" |
| "। शक्र एवेति वा । शक्तिरतिरूपत्वाच्छक्रः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-25" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "राये वाजाय वज्रिवः शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे।" |
| "मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस आ याहि पिब मत्स्व ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-26" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V04_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "राये" |
| "वित्ताय" |
| "वाजाय" |
| "अन्नाय, वज्रिणम् इन्द्रं वर्तयतीति वज्रिवाः, नियामकत्वेन गच्छतीति वा।" |
| "शविष्ठ" |
| "बलवत्तम सुखवत्तमेति वा।" |
| "ऋञ्जसे" |
| "प्रेरयसि सर्वान् । ‘मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस’ इत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः ।" |
| "मत्स्व" |
| "मदं कुरु ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-27" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विदा रायः सुवीर्यं भुवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु।" |
| "मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-28" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V05_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विदा" |
| "वेदय लम्भय" |
| "रायः सुवीर्यं" |
| "च ।" |
| "वाजानां" |
| "प्रजानां" |
| "पतिः" |
| "भुवः" |
| "अभवः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘प्रजा वै वाजः’</span>" |
| "इति श्रुतेः ।" |
| "वशान् अनु" |
| "यथावशम् । ‘वश= इच्छायाम्’ इति धातोः यथावशं यथेच्छम् ।" |
| "शूराणां" |
| "सकाशाद्बलवत्तमः ॥ ४ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-29" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V06" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्वो अभि नो नय।" |
| "इन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-30" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V06_001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "मघोनां" |
| "यशस्विनां महत्तमः ।" |
| "चिकित्वः" |
| "ज्ञातः कर्तरिति वा।" |
| "नः" |
| "अभितः सर्वतो" |
| "नय" |
| "।" |
| "इन्द्रो विदे" |
| "समस्तं व्यजानात् । तमेव" |
| "स्तुषे" |
| "॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-31" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V07" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् ।" |
| "स नः पर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
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| oldKey | "KNR_C01_V07_B001" |
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|---|
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|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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|---|
| lines | | "ऊतये" |
| "रक्षायै, अभिप्रायसिद्धये वा ।" |
| "स नो द्विषः" |
| "शत्रूनतिपारयतु, पापानि तमांसि वा ।" |
| "क्रतुः" |
| "ज्ञानरूपः ।" |
| "छन्दः" |
| "इच्छारूपः । छन्द्यत्वाच्छादनत्वाद्वा ।" |
| "ऋतम्" |
| "अशेषशास्त्रावगतम् ॥ ६ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् ।" |
| "सनः पर्षदति द्विषः स नः पर्षदति स्रिधः ॥ ७ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "सातये" |
| "लब्धये ।" |
| "स्रिधो" |
| "विनाशात्(न्) ॥ ७ ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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|---|
| lines | | "पूर्वस्य यत्ते अद्रिवः सुम्न आधेहि नो वसो।" |
| "पूर्तिः शविष्ठ शस्यत ईशे हि शक्रः ॥ ८ ॥" |
|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "पूर्वस्य" |
| "अनादेः सतस्ते(अनादेः ते) सकाशात् यत्" |
| "सुम्नं" |
| "सुखं तस्मिन्" |
| "न आधेहि" |
| "। तव" |
| "पूर्तिः" |
| "शस्यते ॥ ८ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "तन्नव्यं" |
| "स्तुत्यं ब्रह्म । तत्सम्यक् हृदि न्यसे(सन्यसे)" |
| "जनस्य" |
| "उपदेशेन । त्वत्स्वरूपेषु त्वं चाहं च सम्ब्रवावहै ।" |
| "गोषु" |
| "ज्ञानेषु" |
| "गच्छति" |
| "ज्ञानविषयो भवति ।" |
| "सुशेवः" |
| "सुसुखः समाधिकरहितोऽद्वयः(तः अद्वयः) ॥ ९ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "एवाह्येवैवाह्यग्नाँ३ इ । एवाह्येवैवाहीन्द्रँ । एवाह्येवैवाहि विष्णाँ३ उ । एवाह्येवैवाहि पूषन् । एवा ह्येवैवाहि देवाः। एवा हि शक्रो वशी हि शक्रो वशाँ अनु ॥ १० ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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|---|
| lines | | "‘एवाह्येवैवाहि’ इत्यग्न्यादिदेवतानां संवादरूपेणोक्तमर्थमतिशयेनावधारयति । अभ्यासो हि तात्पर्यार्थः । एवं हि(एवा हि) एवमेव हीत्यर्थः । ‘विनिश्चिते तु संवादे विभागो रङ्ग एव च’ इति शब्दनिर्णये । अतो ‘अग्नाइ’ इत्यादि । एवमेव" |
| "हि शक्रः वशाननु" |
| "यथावशं स्वतन्त्रो वर्तत इत्यर्थः ॥ १० ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "आयोमन्याय मन्यव उपोमन्याय मन्यवे । उपेहि विश्वध ॥ विदा मघवन्विदो३म् ॥ ११ ॥" |
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "‘अय पय= गतौ’ इति धातोः आयो इत्यायतिः । उपो इतिवदतिशयार्थे ओकारः । ‘ओ=अतिशये’ इति च सूत्रम् । आयो जानातीत्यायोमन्यः, समीपस्थमपि जानातीत्युपोमन्यः । अन्येषामिन्द्रियाणां पराङ्मुखत्वान्न ह्यान्तरं जानन्तीति । अयं त्वान्तरमप्यापरोक्ष्येण पश्यति । अयनेन गमनेन प्राप्यं दूरस्थम् आयो इति वा । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोर्मन्युरिति ज्ञानी। बाह्यज्ञाय ज्ञानिने आन्तरज्ञाय ज्ञानिने इत्यभ्यासो(ऽतितात्पर्यार्थः) हि तात्पर्यार्थः। एवंविधं मद्गतं त्वामुद्दिश्यैव" |
| "उपेहि विश्वध" |
| "विश्वधारक । समीपतो दूरतश्च त्वां मन्यमानाय मह्यं" |
| "मन्यवे" |
| "ज्ञानाय मामुपेहीति वा ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Padmapurana-id">‘समीपे दूरतोऽभिज्ञं(दूरतो ज्ञं) त्वामुद्दिश्यैव मद्गतम् ।<br/>एहि विष्णो न मे शक्तिस्त्वदाह्वाने हि मामुप ॥<br/>इति ब्रह्माऽस्तुवद्विष्णुं तन्नाभ्युत्थितपद्मगः’</span>" |
| "इति पाद्मे ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Skandapurana-id">‘समीपे दूरतश्चैव ध्यायन्तं त्वा सदा (प्र)विभो ।<br/>मामेहि ज्ञानदानायेत्याह गाधिसुतो हरिम्॥’</span>" |
| "इति स्कान्दे ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Manyasamhita-id">‘ओतमस्मिन् जगद्यस्मादोमित्युक्तो हरिसः सदा ।<br/>तमेव जगदाधारं यतयः समुपासते॥’</span>" |
| "इति मान्यसंहितायाम् ॥ ११ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| verseType | null |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘इन्द्रो वा एताभिर्महानात्मानं निरमिमीत’</span>" |
| "इत्यस्याप्युक्त एवार्थः । निर्माणं नामाऽत्मनस्तद्व्याख्यानेन ख्या(स्था)पनम् । न ह्यन्यथा तासां करणत्वं भवति ।" |
|
|---|
|
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्’</span>" |
| "इति (च) श्रुतिः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id">‘त्रीणि पदा निहिता गुहासु यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्(यस्तद्वेद सवितुः पिता सत् )’(महानारायणोपनिषत्.१.१५)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyaaranyaka-id">‘स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न विचेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स इमा चिकेत यस्ता विजानात् (सवितुः पिता सत्)स पितुष्पितासत्।’(तैत्तिरीयारण्यकम्.१.११)</span>" |
| "इत्यादिश्रुतिभ्यो विज्ञानमेव तन्निर्माणम् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः’(ऋ.सं.४.५८.४)</span>" |
| "इत्यादेर्विज्ञापनं वा ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-48" |
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| oldKey | "KNR_C01_V12_B007" |
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|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘प्रचेतन प्रचेतय’(ऐ.आ.४.१.१)</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘आयाहि पिब मत्स्व’ (ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘सुम्न आ धेहि नो वसो’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)</span>" |
| "इत्युपसर्गाः । अंशा अप्यंश्यपेक्षयोपसर्गा भवन्ति । उपसृष्टत्वादुपसर्गाः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-49" |
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|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">‘अन्तर्गतं बहिर्गञ्च(र्गतञ्च) द्विधा स्यादुपसर्जनम् । <br/>हस्तवद्धेतिवच्चैव पदानां चोपसर्गवत्’</span>" |
| "इति शब्दनिर्णये ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-50" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V12_B009" |
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|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘अधत्तान्यञ्जठरे प्रेम रिच्यत 'प्रचेतन'’ ॥ १ ॥" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Samaveda-id">‘दाता राधस्तुवते काम्यं वसु 'प्रचेतय'’(सामवेद.३.६)</span>" |
| "॥ २ ॥" |
| "‘अस्माकं बोधि चोदिता 'आ याहि पिब मत्स्व'’ ॥ ३ ॥" |
| "‘तं त्वा परिष्वजामहे 'क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्'’ ॥ ४ ॥" |
| "‘या ते रातिर्ददिर्वसु 'सुम्न आधेहि नो वसो'’ ॥ ५ ॥ इत्युपसृजति ॥" |
| "‘अशेषमहानाम्न्यर्थसंस्मरणपरिज्ञानपूर्वकमुपसर्गसंयोजनं कर्तव्यम्’ इत्येदर्थत्वेन महानाम्नीप्रशंसा क्रियते । अन्यथा तावन्मात्रप्रशंसामृते अशेषमहानाम्नीप्रशंसाया व्यर्थत्वात् । (त्र्युच)तृचविभागेन ‘विदा मघवन्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘तमूतये’(ऐ.आ(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘नूनम्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) इति वा तिस्त्रो महानाम्न्यः ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-51" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V12_B010" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘प्रथमा या महानाम्नी तद्वाच्यः पार्थिवो हरिः ।<br/>द्वितीयाया आन्तरिक्ष्यस्तृतीयाया द्युगः प्रभुः’</span>" |
| "इत्यृक्संहितायाम् ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-52" |
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| oldKey | "KNR_C01_V12_B011" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘(त्र्युचा)तृचास्तिस्त्रो महानाम्न्यः पञ्चर्चा प्रथमा परा ।<br/>(त्र्युचा)तृचा द्व्यृचा च निगदैस्तार्तीया सप्तभिर्युता ।<br/>इति द्वेधा(त्रेधा) विभागः स्याज्जपध्यानादिकर्मसु’</span>" |
| "इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-53" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V12_B012" |
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| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘त्रिलोकगेन हरिणा निर्मितः षोळशीक्रतुः ।<br/>एवं ज्ञात्वा हरिं तं च कर्म कुर्वन्न जायते’</span>" |
| "इति प्रवृत्ते ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-54" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V12_B013" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘एवैवाहि(एवा ह्येवैवा हि)’(इत्यस्यार्थो)इत्युपसर्गस्यार्थोऽप्युक्तावधारणरूपत्वात् पूर्वोक्तार्थज्ञानं विना न स्मर्तुं शक्यते । एवं निर्मितेन षोळशिनर्द्धो (राध्नो) भवत्येवंवित् ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-55" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V13" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे ।" |
| "धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१)" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-56" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V13_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "प्रप्र वः" |
| "। हे ऋत्विजः प्रजा वा वः" |
| "त्रिष्टुभमिषं" |
| "त्रिष्टुभाख्यमन्नम् इन्द्रः परमेश्वरः सोमाय आ" |
| "विवासति" |
| "।" |
| "पुरन्ध्या धिया" |
| "अशेषप्राणिदेहाश्रयया स्वबुद्ध्या" |
| "प्रप्र" |
| "प्रकर्षेण प्रकर्षेणातितरां (शं)शस्यमाना त्रिष्टुप् प्रीतिं करोति सोमपानार्थमित्यर्थः ।" |
| "मन्दद्वीराय" |
| "तस्य वीरस्य परमेश्वरस्य मदं प्रीतिं करोतीति मन्दद्वीरः सोमः । न त्वात्मप्रयोजनाय प्रीतिं करोति, किं तर्हि?" |
| "वो मेधसातये" |
| "यज्ञसिद्ध्यर्थम् । ‘व’ इति गुरुत्वाद्, ईश्वरं प्रत्येव वा बहुवचनम् । तदा वः अन्नं त्रिष्टुभं वो मेधसातये भवद्दैवत्ययज्ञसिद्ध्यर्थं भवान् प्रप्राविवासतीत्यर्थः ॥ १ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-57" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V14" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् ।" |
| "पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.२)" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-58" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V14_B001" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ओदतीनाम्" |
| "उन्दनकर्त्रीणां" |
| "वः" |
| "अपाम्, भवदीयानां" |
| "पतिं वः" |
| "पुरुषं प्राणं" |
| "नदं" |
| "नदनकर्तारं प्रति" |
| "इषुध्यसि" |
| "पतिर्भवसि । सृष्टौ सृष्टौ यो यः प्राणस्तं तं प्रति पतिर्भवसीति नदमिति पुनर्वचनम् ।" |
| "योयुवतीनां" |
| "गमनशीलानाम् आकाशे पोप्लूयमानानाम्" |
| "अघ्न्यानां" |
| "धूमरूपेणादाह्यानां रेतोरूपेणाजराणां वा," |
| "धेनूनां" |
| "जगत्पोषकाणाम् । ‘धिनु=पुष्टौ’ इति धातोः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘ता नदेन विहरति’(ऐ.आ.१.३.५)</span>" |
| "इत्यादिश्रुतेः । पयसा सेचकानां देशाद्देशान्तरगमनशीलानाम्" |
| "अघ्न्यानां" |
| "हन्तुमयोग्यानां" |
| "धेनूनां" |
| "गवां" |
| "पतिं" |
| "वायुं प्रति" |
| "इषुध्यसि" |
| "इति वा ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘वायुर्वाव गवां पतिः’</span>" |
| "इति श्रुतेः(तिः) । धेनुशब्दाच्च ।" |
| "ओदतीनां" |
| "भक्त्या सेचकानाम्," |
| "योयुवतीनाम्" |
| "अतिशयेनाऽत्मतत्वावगमकानाम्," |
| "अघ्न्यानां" |
| "नित्यानां" |
| "धेनूनां" |
| "धर्मार्थकामपोषकाणां वाचां" |
| "पतिं" |
| "वायुं प्रति पतिर्भवसीति वा ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनासः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारसः स्वधाकार(स्तस्यै) इति । तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरः। तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः’(बृ.उ.७.१०)</span>" |
| "इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-59" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V15" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः ।" |
| "जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.३)" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-60" |
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| oldKey | "KNR_C01_V15_B001" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "ताः पृश्नयः" |
| "आपो गावो वाचो वा, अस्य" |
| "सूददोहसः" |
| "प्राणस्य वायुस्थस्य परमेश्वरस्य" |
| "सोमं श्रीणन्ति" |
| "। अद्भिर्हि संसृष्टो भवति। सोमः पयआदिना च (शृ)श्रितो भवति\ मन्त्रैर्वा गृह्यते ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id">‘अथ सूददोहाः प्राणो वै सूददोहाः’(ऐ.आ.१.४.१)</span>" |
| "इति श्रुतिश्च । शोभनमुदं कर्म ज्ञानं वा दोग्धीति सूददोहाः । उदेति उच्चो भवत्यनेन पुरुष इत्युदं ज्ञानादि । ‘मनो वाव सोमः’ तद् वाचः श्रीणन्ति स्वार्थैः । प्रश्नयोग्यत्वात्" |
| "पृश्नयो" |
| "वाचः, प्रशंसनरूपत्वात् प्रशंसनीयत्वाद्वा । प्रशंसनीयत्वमेवापां गवां च ।" |
| "देवानां" |
| "जन्मनि यज्ञे । तत्र हि तेषामभिव्यक्तिः पूर्वं ज्ञाने वा। विशः प्रजाश्च श्रीणन्ति । मुख्यतस्ता एव श्रीणन्तीति चशब्दवर्जनम् ।" |
| "दिवस्त्रिषु आरोचनेषु" |
| "आदित्यचन्द्रविद्युत्पर्यन्तं स्थितानां देवानां जन्मनि ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘यज्ञो वै देवजन्म तत्र हि देवाः प्रादुर्भवन्त्या सूर्याचन्द्रमसावा विद्युतं ते वै लोकानधिश्रिताः’</span>" |
| "इत्यादिश्रुतेः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव परमुपगच्छति सैषा ब्रह्मलोके विराजते’</span>" |
| "इत्यादि श्रुतेर्द्यौरेव विद्युत् ॥ ३ ॥" |
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| lines | | "अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।" |
| "अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/८)" |
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| lines | | "अर्चनं यज्ञादि, प्रार्चनं ज्ञानध्यानादि ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)</span>" |
| "इति भगवद्वचनात् । प्रिययज्ञा" |
| "अर्चत" |
| "प्रियज्ञानाः" |
| "प्रार्चत" |
| "।" |
| "पुत्रका" |
| "अल्पज्ञाना अप्यर्चत ।" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।<br/>जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तस्समाचरन् ॥’(भ.गी.२.२६)</span>" |
| "इति च ।" |
|
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| lines | | "उतशब्दाज्ज्ञानिनामप्यर्चनं युक्तम् । स्वाश्रमानुसारेणेति ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यस्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता’(ऋ.सं.१.१५६.१)</span>" |
| "इति श्रुतेः । किं तदर्चनीयम् ?" |
| "धृष्णु" |
| "धृष्टं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यम् । पुरं देहं" |
| "नार्चत" |
| "।" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथस्सुमध्यमे ।<br/>प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने ॥’(भाग.४.३.२२)</span>" |
| "इति भागवते ।" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Vyasasmruti-id">‘सदेहमानिहरये प्रणमेत्केवलाय वा । <br/>न देहाय न तन्मानपराय च कथञ्चन ॥’ इति व्यासस्मृतौ</span>" |
| "।" |
| "पुनरर्चतेति तात्पर्यार्थः(र्थे) ॥ १ ॥" |
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| lines | | "अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९)" |
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| lines | | "गर्गरगोधापिङ्गादीनां घोषा अपि नादमात्रव्यञ्जकत्वेन(नादव्यञ्जकत्वेन) भगवद्वाचका एवेत्याह-" |
| "अव स्वराति गर्गर इत्यादिना॥" |
| "एतत्समस्तमिन्द्रायैवेत्यर्थः । ब्रह्म वेदो विशेषत इन्द्रायैवोद्यतः ।" |
| "गर्गर" |
| "इति पादभूषण-महामत्रक-दधिपात्र-हस्तिहस्तानां नाम ।" |
| "पिङ्गा" |
| "चकोरी । अवपरीत्यल्पाधिक्यादिविशेषोऽपि तद्वाचक एवेति ज्ञापनाय ।" |
| "चनिष्कदद्" |
| "इत्यनुकरण(नुकार)शब्दः । सनिष्वणदित्यतिशयार्थे ।" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव(प्राण ऋच इत्येव विद्यात्)’</span>" |
| "इति (च) श्रुतिः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdatattve-id">‘दध्नो मथनशब्दश्चाप्यन्तर्नादस्वरूपतः ।<br/> भीषकत्वं हरेर्ब्रूयादन्तर्नादो हि भीषणे ।<br/> गजबृंहितमप्येवं धिक्कारसहितं वदेत् । <br/>स्वरितेन समायोगाद् धिक्कृतौ स्वरितो यतः ।<br/> महामत्रं(मन्त्रं) जलाद्यैश्च युक्तमेतादृशं वदेत् ।<br/> पादभूषा च धिक्कारं तत्कृतं स्वरितं(तो) वदेत् ।<br/> अद्भुतत्वं हरेर्वक्ति पिङ्गाकण्ठगशब्दवत् ।<br/> तामेवाद्भुततां वक्ति गृहगोधा पराऽपि च’</span>" |
| "इति शब्दतत्वे ॥ ३ ॥" |
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| lines | | "आयत्पतन्त्येन्यस्सुदुघा अनपस्फुरः ।" |
| "अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१०)" |
|
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| lines | | "यच्च एन्यो नद्य आपतन्ति तद्धोषश्चेन्द्रवाचकः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘नदीसमुद्रघोषाश्च नादत्वाच्छ्रैष्ठ्यवाचकाः।<br/> नादो हि श्रैष्ठ्यवाची स्यादेवं घोषाः परेपि च’</span>" |
| "इति च ।" |
| "तदर्थं च नद्य आपतन्ति ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Vaihayasasaamhita-id">‘भूतादिभूतोम्बुनिधानमध्ये भूत्वा हरिः सर्वहरोऽतिधाम्ना । अगाधमम्भो विदधाति भस्म यो वाडवाग्निर्नृहरिर्विचिन्त्यः॥’</span>" |
| "इति वैहायससंहितायाम् ।" |
| "सुदुघाः" |
| "सुष्ठु अपां दोहनकर्त्र्यः । स्फुरणापगमनमासां नास्तीति" |
| "अनपस्फुरः" |
| "। नित्यचलनस्वभावाः । अपगतस्फुरणत्वेन" |
| "सोमं" |
| "गृभायत" |
| "। अचलत्वेन मनो वा ॥ ३ ॥" |
|
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| lines | | "यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३)" |
|
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| lines | | "व्यतीन्" |
| "विशेषेणाधिकान् देवान् ।" |
| "अफाणयत्" |
| "विस्तारयामास ।" |
| "दाशुषे" |
| "यजमानाय तत्समीपे । ‘फण= विस्तारे’ इति धातोः ।" |
| "सुयुक्तान्" |
| "सुयोगरतान् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Prakashasamhita-id">‘विशेषेणाधिकत्वेन व्यतयो देवतास्स्मृताः ।<br/> नित्ययोगरताश्चैव नारायणपरायणाः ।<br/> ता एव चेन्द्रियात्मानस्तान्विस्तारयतीश्वरः ।<br/> मन आदीन्द्रियाणां तु शक्तिविस्तार एव तु(हि) ।<br/> विस्तारो देवतानां स्याद् भक्तेषु हरिणा कृतः’</span>" |
| "इति प्रकाशसंहितायाम् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६)</span>" |
| "इति च श्रुतिः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id">‘स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्’(तै.उ.१.९(शिक्षावल्लि.९))</span>" |
| "इति च ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Mahabharata-id">‘न देवा यष्टिमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संयोजयन्ति तम् ॥’(म.भा.५.३५.३३)</span>" |
| "इति भारते ।" |
|
|---|
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| lines | | "तक्वो" |
| "जगत्कर्ता । ‘तक=निर्माणे’ इति धातोः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Rigveda-id">‘न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः’(ऋ.सं.३.३३.४)</span>" |
| "इति(इत्यादि) प्रयोगाच्च ।" |
| "नेता" |
| "(च सर्वस्य) चाशेषस्य। तदेव वपुस्सः । यत्तज्जगत्कर्तृनेतृरूपम् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Padma-id">‘देहदेहिविभागश्च न क्वचित्परमेश्वरे । गुणतद्वद्विभागो वा नेह नानेति हि श्रुतिः॥’</span>" |
| "इति पाद्मे ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।<br/> ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः’॥</span>" |
| "इति(इत्यादि) श्रुतेश्च ।" |
|
|---|
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Purushottanasamhita-id">‘विशुद्धविज्ञानमरीचिमालया (वि)सचित्ररत्नप्रकरप्रकाशया ।<br/> प्रकाशिताशेषजगत्स्वरूपया प्रभुः सदा ह्लादतनुर्विभूषितः॥’</span>" |
| "इति पुरुषोत्तमसंहितायाम् ।" |
| "उपमा" |
| "उपमायाम् उपमाविषये," |
| "अमुच्यत" |
| "त्यक्तोऽभवत् । निरुपम इत्यर्थः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">‘अल्पाक्षरेण शक्येऽपि वक्तुं बह्वक्षरं यदि ।<br/> उक्तस्याऽधिक्यमेवात्र निषेधेऽशेषतो भवेत्॥’</span>" |
| "इति (च)शब्दनिर्णये ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| lines | | "अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४)" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "(विश्वा)" |
| "विश्वान्" |
| "द्विषो" |
| "अज्ञानपापादीन् अतीत्य" |
| "शक्रो" |
| "(शक्तो)विष्णुः स्वभक्तान्(क्तम्)अतिवहत्येव हि ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id">‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(कठ.उ.१.२.२३)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।<br/> भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्’(भगी.१२.७)</span>" |
| "(इत्यादिना)इत्यादिप्रसिद्धमुशब्देनाऽह । द्विषोऽतीत्यातिशयेनाऽत्मानं (प्रत्येवोहतेति)प्रत्योहतेति" |
| "अति" |
| "शब्दद्वयार्थः ।" |
| "ओदनम्" |
| "उन्दतेः कर्म बन्धनम् अभिनत्। भगवान् कानीनो बादरायणः," |
| "परः" |
| "परमात्मा, गिरैव पच्यमानं परिपाककाले ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Vyasasamhita-id">‘संश्लेषादोदनं कर्म पच्यमानं गिरैव हि । अभिनद्भगवान् व्यासः स्वभक्तानामशेषतः’</span>" |
| "इति व्याससंहितायाम् ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| lines | | "अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम् ।" |
| "स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम् ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१५)" |
|
|---|
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| lines | | "अर्भक" |
| "इव स्थितः ।" |
| "नवं" |
| "रथम्" |
| "अध्यतिष्ठत् ।" |
| "कुमारकः" |
| "कुत्सितमारकः । अर्भक इव सूक्ष्मदेहः। पूर्वं पूर्वं देहं परित्यज्य नवं नवं देहमध्यतिष्ठज्जीवमादाय ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Manyasamhitayam-id">‘जीवदेहं परित्यज्य सह जीवेन चेश्वरः ।<br/> जीवस्यान्यच्छरीरं च समुत्पाद्य विशत्यजः’</span>" |
| "इति मान्यसंहितायाम् ।" |
| "कुमारक इवार्भकः सूक्ष्मदेह इति च(वा) । अर्भकः सूक्ष्मदेहोऽपि न (कुमारक) कुमार इति वा । सपक्षत् परिपक्वज्ञानादिगुणकमकरोत् । महिषं महान्तं ब्रह्माणम् । मृगं मृगयन्तं स्वात्मानम् । पित्रे स्वस्मै, मात्रे लक्ष्म्यै च, विभुक्रतुं पूर्णज्ञानम् । पितृमातृविषये पूर्णज्ञानम् । पुनः पूरयामासेत्यर्थः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ज्ञानपूर्णं विधातारं मोक्षदानेन केशवः ।<br/> स्वपुत्रं पूरयामास महिषं महतां महान्’</span>" |
| "इति प्रवृत्ते ॥ ३ ॥" |
|
|---|
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| lines | | "यथास्थिताः प्रज्ञाताः । इतस्ततः संयोजनं विना यथास्थितशंसनं पथः(थिः) प्राप्तिः ॥" |
|
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| lines | | "स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद ।" |
|
|---|
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| lines | | "व्याप्तो" |
| "विशेषेणापन्नः ।" |
| "अविहृतम्" |
| "असंसृष्टम् ।" |
| "कृच्छ्राद्" |
| "अयथावस्थितशंसननिमित्ताद् दुःखादवाग्गतिं गतश्रीकतामेव न प्राप्नुयाम् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘विलोमः शत्रुज (क्ष)यकृत्संसर्गः पापनाशनः ।<br/> यथास्थितः श्रीकरः स्यात्स्वाध्यायः शंसनेऽपि च’</span>" |
| "इति प्रवृत्ते" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Svadhyayatattva-id">‘गतश्रियः श्रियो हानिं पापहानिं परस्य च ।<br/> संसर्गश्छन्दसां कुर्याच्छ्रियो वृद्धिं यथास्थितः’</span>" |
| "इति स्वाध्यायतत्वे ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">‘किञ्चित्वे चोभयत्वे च संशये सदृशे तथा । इवशब्दः प्रयुज्येत न्यक्कारेऽपि च पण्डितैः॥’</span>" |
| "इति शब्दनिर्णये ।" |
| "अतो गतश्रीत्वसंशयेऽपीत्यर्थः ।इतस्ततो विशेषेण संहृतं (संयोजितं)" |
| "विहृतम्" |
| "।" |
|
|---|
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| verseType | null |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Svadhyayatattve-id">‘पापानां व्यतिषिक्तत्वाद्व्यतिषक्तं विनाशकम् । <br/>धनस्याव्यतिषङ्गेण व्यतिषङ्गोविनाशकः ।<br/> सदृशं सदृशस्यैव यतः स्यात्प्रविनाशकम् ।<br/> तथाप्यप्राप्तनाशस्य धनस्य बलवत्त्वतः ।<br/> शक्नुयान्न विनाशाय पापस्येच्छासमेधितम् ।<br/> संसृष्टं स्याद्विनाशाय नहीच्छा धनसङ्क्षये॥’</span>" |
| "इति स्वाध्यायतत्वे ।" |
| "अव्यतिषक्तत्वं च मोक्षे विद्यत इत्यत्रोभयार्थ इवशब्दः । एवम्भूतेन शंसनेन" |
| "पाप्मानम्" |
| "अपहन्ति ।" |
| "शमलं" |
| "रागादिकं च । पापस्य पृथगुक्तेः ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id">‘शमलं पापमुद्दिष्टं रागद्वेषादिकं तथा ।<br/> अपराधश्च शमलं मलं च शमलं विदुः॥’</span>" |
| "इति शब्दनिर्णये ।" |
| "य एवमुपास्ते सोऽपि पाप्मानमपहन्ति ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘ऋक्षु संसृज्यमानासु प्रोच्यमानं जनार्दनम् ।<br/> पुंसंसृष्टस्य पापस्य निहन्तारं विशेषतः ।<br/> तत्प्रसादेन मुक्तस्य पापासंसृष्टतामपि ।<br/> ध्यायन्कर्माणि कृत्वापि मुच्यते सर्वपातकैः॥’</span>" |
| "इति प्रवृत्ते ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "न चैवमादिवाक्यानां स्वार्थे प्रामाण्याभावः । सिद्धार्थे प्रामाण्यस्य साधितत्वात् । अविरोधाच्च । न च बह्नर्थेषु तात्पर्यकल्पने कल्पनागौरवम् । वचनेनैव प्रतीयमानत्वाद् अर्थस्य कल्पनाभावात् । न च वाचनिकार्थस्तात्पर्यार्थ इति विशेषः । तन्मानाभावात् ॥" |
|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "यत्र वाचनिकार्थादन्यस्तात्पर्यार्थः प्रतीयते लौकिकवाक्येषु न तत्र साक्षाद्वचनं प्रबोधकम् । वचनलिङ्गा(लिङ्गका)नुमा हि सा । विरोधादमुख्यवृत्तिर्वा । आप्तत्वनिश्चये । आप्तत्वानिश्चये प्रामाण्यमेव न भवति ॥" |
|
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| lines | | "वेदवाक्यस्य तु वाचनिकार्थं विना नैवान्यो युज्यते ॥" |
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| lines | | "वाचनिकानां तु बहूनामप्यविरोधे स्वीकार्यता ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि’(ब्र.सू.४.४.१६)</span>" |
| "इति सूत्रम् ।" |
|
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Soukarayanashruti-id">‘वानात्सूतेर्देवनाद्वासुदेवो वासाद्द्युतेश्छादनात्क्रीडया वा । <br/> बलादसुत्वाद् दातृतो वर्तनाच्च तं वासुदेवं प्रवदन्ति वेदाः॥’</span>" |
| "इत्यादि च सौकरायणश्रुतिः ।" |
|
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| lines | | "मोक्षेऽपि सुप्तिरस्तीत्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमेवान्यतरपदम् ।" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id">‘रूढियोगौ विना कश्चिन्नैवार्थो वेदगो भवेत् ।<br/> तत्रापि यौगिको मुख्यः सर्वत्रास्ति स वैदिके ।<br/> अनवस्थानिवृत्त्यर्थं यौगिके रूढकल्पना ।<br/> ज्ञाते विशेषविज्ञानं व्यवहारोऽपि रूढितः॥’</span>" |
| "इति ब्रह्मतर्के ॥" |
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "वाचनिकमर्थं परित्यज्य नियोगार्थकल्पने श्रुतहानिरश्रुतकल्पनेति सर्वदोषाधिकौ तस्य व्यर्थमापद्येते । एवं च वदतो विधिशब्दा निरर्थकाः सिद्धार्था वा?, सिद्धशब्दाः वा स्वार्थे प्रमाणभूता इत्युक्ते किमुत्तरम् ? न च कारणं किञ्चिद्वाचनिकानां बहूनामप्यर्थानां त्यागे । प्रतीयमाने तु विरोधे तदन्योऽर्थः स्वीकार्यो वाचनिक एव । सोऽपि वाचनिक एवेत्यपि तत एव सिद्ध्यति ।" |
|
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘मुख्यार्थानां च सर्वेषां तारतम्यं (च) तु विद्यते ।<br/> तत्राऽपि परमो मुख्यो वाच्योऽशेषरवैर्हरिः ।<br/> (तत्र मुख्यविरोधेन)तत्तन्मुख्याविरोधेन तदन्यार्थस्य सङ्ग्रहः ।<br/> स्वतो मुख्यविरोधे तु त्याज्योऽन्योऽर्थोऽखिलेष्वपि ।<br/> इति सर्वत्र नियमः शब्दार्थज्ञानभूमिषु’</span>" |
| "इति च ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "न च क्रियायामेव प्रयोजनं न सिद्ध इति युक्तम् । ज्ञानमात्रेऽपि महाप्रयोजनदर्शनात्(दृष्टेः) पितृजीवनादिवाक्ये । आह च स्वयं भगवान्–" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।<br/> क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।<br/> उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।<br/> यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।<br/> यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।<br/> अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।<br/> यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।<br/> स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।<br/> इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।<br/> एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥’(भ.गी.१५.१६-२०)</span>" |
| "इति ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)</span>" |
| "इति च ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Praman-id">‘ध्यानं त्वखिलकर्मभ्यो ध्यानाच्च ज्ञानमुत्तमम् ।<br/> न ज्ञानसदृशं किञ्चित् पुरुषार्थप्रसिद्धये॥’</span>" |
| "इति (च) प्रवृत्ते ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय।’(भ.गी.२.४९)</span>" |
| "इति च ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Karmaviveka-id">‘अशेषकर्मपूगोऽपि न विष्णुध्यानलेशभाक् ।<br/> तच्च ध्यानं हरेर्ज्ञानकोट्यंशाय न पूर्यते’</span>" |
| "इति कर्मविवेके ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Taittiriyaranyaka-id">‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१३)</span>" |
| "इति च श्रुतिः ॥" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "न च कर्ममात्रे पर्यवसितिर्वेदस्य । सुखज्ञानस्यैव प्रयोजनत्वात् । अतः सिद्धस्यैव प्रयोजनत्वं (वाच्यम् /सिद्धम्)।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "प्रशंसादीनां च तात्पर्यं वाचनिकार्थात्यागेनैव कथितं स्वयं भगवता," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति’(ब्र.सू.३.१.७)</span>" |
| "इति । तस्माद् विरुद्धवत्प्रतीयमानानि प्रशंसादीनि ज्ञानसहकार्यपेक्षया योजनीयानि । पुराणादीनां तु श्रुत्यादि विरोधे गौणोऽप्यर्थो युज्यते ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Varahapurana-id">‘कुहकञ्चेन्द्रजालं च विरुद्धाचरणानि च ।<br/> दर्शयित्वा जनं सर्वं मोहयाशु महेश्वर॥’</span>" |
| "इत्यादि वाराहे ।" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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|---|
| lines | | "उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि । मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.७)" |
|
|---|
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "ब्रध्नस्य" |
| "सूर्यस्य" |
| "विष्टपं" |
| "स्वर्गम् उद्" |
| "गन्वहि" |
| "इन्द्रोऽहं च। यत्तदिन्द्रगृहं (ब्रध्नं)ब्रध्नविष्टपं" |
| "मध्वः" |
| "पीत्वा" |
| "तत्र" |
| "सचेवहि" |
| "सुखमनुभवाव । सख्युरिन्द्रस्य त्रिस्सप्तस्थानेषु ।" |
|
|---|
|
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Pramana-id">‘एकविंशति दिव्यानि स्थानानि दिवि चक्रिणः ।<br/> वज्रिणो वाऽपि तद्भक्तैर्भुज्यन्ते तानि याज्ञिकैः॥’</span>" |
| "इति प्रवृत्ते ।" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-102" |
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| oldKey | "KNR_C01_V24" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते ।" |
| "ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषं जठर आवृषस्व ॥ २ ॥ (ऋ.मं.१०, सू.९६.१३)" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-103" |
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| oldKey | "KNR_C01_V24_B001" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "KNR_C01" |
|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पूर्वान् (सुतान्) प्रातस्सवनगान् सोमानपाः । हरीनिन्द्रियाणि वर्तयतीति (हरिवः) हरिभिर्वर्तत इति वा । इदं माध्यन्दिनं" |
| "सवनं" |
| "ते" |
| "केवलम्" |
| "।" |
| "अथो" |
| "इत्यर्थान्तरम् ।" |
| "मधुमन्तं" |
| "सोमं" |
| "जठरे" |
| "आवृषस्व" |
| "(आ)सिञ्च," |
| "ममद्धि" |
| "च।" |
| "सत्रा" |
| "अस्मत्त्राणेन सह । पीतशब्दवत् । अपूर्वपानत्वात्तदेव पानं मुख्यमिति पीतशब्दः । इन्द्रस्य केवलत्वात्केवलं माध्यन्दिनं सवनम् । ‘ममद्धि’ इति तृतीयसवनम् । तत्र हि मदो विशेषतो भवति पूर्तेः । इति सवनत्रयरूपता षोळशिनः । वृषण्वत् वृष्णः इन्द्रस्य विशेषतः प्रियत्वात् । एवं चतूरूपता षोळशिनः । राध्नोति ऋद्धो भवति ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-104" |
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|---|
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|---|
| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विहृतपक्षे तु–" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Ashvalayanashroutasutra-id">‘पादान्व्यवधायार्धर्चशः शंसेत् । पूर्वासां पूर्वाणि पदानि । गायत्र्यः पङ्क्तिभिः। पङ्क्तीनां तु द्वे द्वे पदे शिष्येते ताभ्यां प्रणुयात् । उष्णिहो बृहतीभिः । उष्णिहान्तूत्तमान्पादान् द्वौ कुर्यात्। चतुरक्षरमाद्यम् । द्विपदाश्चतुर्धा कृत्वा प्रथमां त्रिष्टुभोत्तरा जगतीभिः । उत्तमायाश्चतुर्थमक्षरमन्त्यं पूर्वस्याऽऽद्यमुत्तरस्य । अनुष्टुभमतिच्छन्दःस्वव(द)दध्यात् । द्वितीयतृतीययोस्तृतीययोः पादयोरवसानत उपदध्यात् प्रचेतनेति पूर्वस्यां प्रचेतयेत्युत्तरस्याम् । उत्तरास्वितरान् पादान् षष्ठान्कृत्वाऽनुष्टुप्कारं शंसेत् ॥’ (आ.श्रौ.सू.६.३.३-१३)</span>" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-105" |
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४))" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-106" |
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| oldKey | "KNR_C01_V25_B001" |
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| parent | "KNR_C01" |
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| chapter | "KNR_C01" |
|---|
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| lines | | "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Ashvalayanashroutasutra-id">‘एवाह्येवा(वैव) अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् (एवै)एवाहीन्द्रम् अथो इदं सवनं केवलं ते । एवा हि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र वशीहि शक्रः सत्रा वृषं जठर आवृषस्वेति’(आ.श्रौ.सू.६.३.१७)</span>" |
| "॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-107" |
|---|
| oldKey | "KNR_C01_V25_B002" |
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| chapter | "KNR_C01" |
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|---|
| lines | | "भगवद्भक्तिज्ञानवैराग्यपूर्वकं च कर्म कर्तव्यम् ।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id">‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । <br/> नाकस्य पृष्ठे सुकृते तेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनकरं वाऽऽविशन्ति॥’((मुण्डक)आथ.२.१०)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।<br/> कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे विनार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥’(भाग.१२.१२.५२)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।<br/> स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥’(भ.गी.१८.४६)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।<br/> ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥’(भ.गी.१९.२०)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥<br/> ये मे मतमिदं नित्यमनुतिषष्ठन्ति मानवाः ।<br/> श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥<br/> ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।<br/> सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥’(भ.गी.३.३०-३२)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavata-id">‘तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः । <br/> क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥’(भाग.२.४.१७)</span>" |
| "," |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Shruti-id">‘एष उ एव दाश्वान् य (एनमेवं)एवं वेद’</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id">‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’(छां.उ.१.१.८(१०))</span>" |
| "।" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥<br/> मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।’(भ.गी.९.११-१२)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id">‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।<br/> इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ <br/>मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । <br/>मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥’(भ.गी.१८.६४-६५)</span>" |
| "<span class="gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id">‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् । <br/>तिष्ठमानस्य तद्विदः’(बृ.उ.५.९.७(३.९.२८))</span>" |
| "इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Karmanirnaya-108" |
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| oldKey | "KNR_C01_V25_B03" |
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| parent | "KNR_C01" |
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| chapter | "KNR_C01" |
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| lines | | "नमो नारायणायाजभवशक्रोष्णरुङ्मुखैः ।" |
| "सदा वन्दितपादाय (श्रि)श्रीपाय प्रेयसेऽधिकम् ॥" |
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