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| "text": "महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४)",
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| "tail": " ऋचाम् उपसर्गा ये उपसर्जनभूतास्तान् "
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| "type": "Moola"
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| "text": "उपसृजति",
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| "tail": " संयोजयति । महन्नाम यास्वृक्षु विद्यते ता महानाम्न्यः । परस्य ब्रह्मणो यन्नामेन्द्रादिकं तन्महार्थत्वान्महत् । महद्धि तत्परं ब्रह्म । अशेषगुणपूर्तेः ।"
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| "tail": "\n "
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| "id": "KNR_C01_V01_B002"
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| "text": "तत्रैक आहुरगुणं ब्रह्मेति । न तद्युक्तम्, श्रुतियुक्तिविरोधात् ।",
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| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "text": "तथाहि श्रुतिः -",
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| "tag": "reference",
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| "type": "Taittiriyopanishat_id"
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| "text": "‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२)"
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| |
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| "type": "Bruhadaranyakopanishat_id"
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| "text": "‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५)"
| |
| }
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| |
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| "type": "Mundakopanishat_id"
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| "text": "‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते॥’(मुण्डक.उ.१.१.९)"
| |
| }
| |
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| "tail": " "
| |
| },
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| },
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| "attrs": {
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| "type": "Mundakopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥’(मुण्डक.उ.३.२(२.१.२))"
| |
| }
| |
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
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| "type": "Rigveda_id"
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| },
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| "text": "‘एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पुरुषः।’(ऋ.सं.१०.९०.३)"
| |
| }
| |
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| |
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।’(ऋ.सं.१०.८२.३) "
| |
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| |
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| "type": "Shruti_id"
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| "text": "‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।",
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| "tail": " पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’ "
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| |
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| "text": "‘सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः।’(छां.उ.३.१४.२,४)"
| |
| }
| |
| ],
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| |
| },
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| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि।’(ऋ.सं.१.१५४.१)"
| |
| }
| |
| ],
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| |
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| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति।’(ऋ.सं.७.९९.१)"
| |
| }
| |
| ],
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| |
| },
| |
| {
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| |
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| {
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| "children": [
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| "tag": "reference",
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| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप।’(ऋ.सं.७.९९.२)"
| |
| }
| |
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| "tail": " इत्यादिका ।"
| |
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| |
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| "id": "KNR_C01_V01_B004"
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| "text": "युक्तिश्च । बुद्धिपूर्वं सर्वकर्तृत्वात् सर्वज्ञत्वादयो गुणा युक्ताः ।",
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| "type": "Bhagavata_id"
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| },
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| "text": " ‘कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम्’(भाग.३.३२.१३)"
| |
| }
| |
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| |
| "tail": " इति च भागवते ॥"
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "id": "KNR_C01_V01_B005"
| |
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| "text": "न च-",
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| "type": "Shvetashvataropanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.उ.६.११)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इत्यादिविरोधः । सत्वादिगुणाभावोक्तेस्तत्र । अन्यथा ‘एको देवस्सर्वभूतेषु गूढः’ इत्यादीनामपि गुणत्वात् स्वोक्तिविरोधः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B006"
| |
| },
| |
| "text": "न च निर्विशेषं नाम किञ्चिदस्ति । निर्विशेषत्वोक्तेरेव व्याहतत्वात् । निर्विशेषत्वेन विशिष्टं (तन्न) न वेत्युक्ते, यद्यविशिष्टं तर्हि न विशेषनिराकरणं विशेषवत्त्वमेव भवति । यदि तेन विशिष्टं स एव विशेष इति व्याहतिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B007"
| |
| },
| |
| "text": "न च निर्विशेषत्वे किञ्चिन्मानम् । अशेषविशेषवचनानुभवयुक्तिविरोधश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B008"
| |
| },
| |
| "text": "न च मिथ्याविशेषवत् । व्याहतेः । मिथ्याविशेष इत्युक्ते ह्यसद्विशेष इत्येव भवति । तथा चाविशेष (विशेष)विशिष्टपक्षोक्तदोष एव ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B009"
| |
| },
| |
| "text": "न चानिर्वचनीयविशेष इति भवति । अनिर्वचनीयासिद्धेः । न हि तत्र प्रत्यक्षमस्ति । मिथ्याशब्दस्त्वभाववाच्येव । तदन्यत्र प्रमाणाभावात् । न चान्यत् प्रमाणम् । प्रतिज्ञाव्याहतेः । नहि सदन्तरादसतश्चान्यत् सदसद्विलक्षणं प्रसिद्धम् । असन्न भवतीत्युक्ते ‘द्वौ नञौ प्रकृतमर्थं सातिशयं गमयतः’ इति सदेव भवति । असदन्तरं वा विशेषविवक्षायाम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B010"
| |
| },
| |
| "text": "किञ्चैतद्वैलक्षण्यं भेदोऽभेदो भेदाभेदो वा? न तावद्भेदः, अनङ्गीकारात् । व्यावहारिकभेदश्चानिर्वाच्यसिद्धौ वक्तव्यः । न चाव्यावहारिकं किञ्चित् । न चाशेषव्यवहारनिवृत्तौ किञ्चिन्मानम् । न च मिथ्यातथ्ययोस्सामान्यं व्यावहारिकत्वं धूमबाष्पयोर्धूमत्ववत् । न चाभेदोऽनङ्गीकारदेव । तथैवोभयम् । अभेदे चानिर्वाच्यब्रह्मणोस्तच्छब्दयोः पर्यायत्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B011"
| |
| },
| |
| "text": "न च व्यावर्त्यविशेषेणापर्यायत्वं क्वचित् । व्यावर्त्यविशेषस्तद्व्यावृत्ते ब्रह्मणि विशेेषमापादयति चेद्विशिष्टवाक्यार्थता । न चेन्न ब्रह्मज्ञानार्थिनः(ने) पदान्तरं वाच्यम्, असङ्गतत्वात् । मिथ्याविशेषस्य चासिद्धिरुक्ता । (ततो)अतोऽन्योन्याश्रयताऽनवस्थितिश्चक्रकं वा । भेदाभेदविलक्षणमप्युक्तरीत्यैवापाकृतम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B012"
| |
| },
| |
| "text": "किञ्चासद्विलक्षणमित्यत्राभावान्यविरोधानां मध्ये नञः कोऽर्थः ? यद्यभावः, न, असद्विलक्षणत्वं भावत्वमेव जगतः स्यात् । न च सतोऽन्यस्मादसतो विलक्षणं जगत् । असतोऽन्यत्वादिधर्मानङ्गीकारात्। ब्रह्मणश्च । असतोऽनिर्वचनीयत्वाङ्गीकाराच्च न वैलक्षण्यं ततोऽनिर्वाच्यस्य । तथापि चेद् वैलक्षण्यं नानिर्वाच्यत्वं जगतः(वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वं न जगतः) । न च विरोधि(धः) । विरोधिनोरन्यतरनिषेधेऽन्यतरव्याप्तत्वानुभवात् । अविद्यमानं न भवतीत्युक्ते विद्यमानमित्येव हि सर्वलोकानुभवः । अतोऽनन्तगुणो भगवान्नारायणो इति सिद्धम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B013"
| |
| },
| |
| "text": "न च सिद्धेऽर्थे वाक्यस्य प्रामाण्याभावादीश्वराद्यसिद्धिः । सिद्धातिरिक्तकार्याभावात् । लिङाद्यर्थस्त्विष्टसाधनत्वमेव । न हि कर्तव्यत्वं नामेष्टसाधनत्वादन्यत्किञ्चित् (अस्ति) । तन्मानाभावात् । शब्दस्तु न तद्वक्तीत्युक्तम् । लिङादेरिष्टसाधनार्थत्वेनैव कृतार्थत्वे तदन्यकार्यकल्पने कल्पनागौरवं (च)।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B014"
| |
| },
| |
| "text": "न च तत्कल्पकं किञ्चित् । विप्रतिपत्तौ चान्यन्मानं वक्तव्यं तद्भावे । न चानुमा । अप्रसिद्धविशेषणत्वात्। न चार्थापत्तिः । अनुपपत्त्यभावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B015"
| |
| },
| |
| "text": "कार्याभावादेव कार्यान्वयिनि (कार्यान्वयान्वयिनि वा) व्युत्पत्तिरित्यादि दूरतो निरस्तम् । कार्यान्विते व्युत्पत्तिरिति वदतोऽकार्यान्विते व्युत्पत्तिरित्युक्ते किमुत्तरम् ? अध्याहार इत्युक्ते लोप इत्युत्तरम्। (अशेषसिद्धपदार्थ)अशेषसिद्धपदानामर्थलोपाल्लिङ्गाद्यर्थमात्रलोप(ल्लिङ्गाद्यर्थलोप) एव (व)गरीयान् । ‘हससि, हसामि’ इत्यादिसिद्धार्थ एव बालानां व्युत्पत्तेः । प्रथमप्राप्तत्वान्न(प्राप्तत्वाच्च न) तत्त्यागे कारणम् । तथैव व्युत्पत्तिदर्शनाच्च । अतः सिद्धार्थे प्रामाण्यसिद्धेश्च सिद्धं महागुणवत्वं विष्णोः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V01_B016"
| |
| },
| |
| "text": "ताश्च विदा मघवन् इत्याद्याः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V02",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| |
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| "text": "विदा मघवन् विदा गातुमनुशंसिषो दिशः ।",
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| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": " शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरुवसो ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n\t\t "
| |
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V02"
| |
| },
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| "text": "\n\t\t ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V02_B001"
| |
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| "text": " हे ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मघवन्",
| |
| "tail": " धनवन् यशस्विन् मखपत इति वा ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V02_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तं वा एतं मघ(ख)वन्तं सन्तं मघवानित्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः’ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " , "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्’(ऋ.सं.९.७५.५)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " , "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तन्न आयातु मघाय । यशो वा मघम् । मघमनु प्रापत्सि’, ‘आ मामेतु मघम् । मघमनुप्रापत्सि । धनं वाव मघम्’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादिश्रुतिभ्यः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V02_B003"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गातुं",
| |
| "tail": " त्वां स्तोतुम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विद",
| |
| "tail": " वेदय इति सामान्यतोऽपेक्षिताशेषवेदनमुक्त्वा तात्कालिकापेक्षितार्थं प्रार्थयति- "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "गातुं विदेति ॥",
| |
| "tail": " त्वमेव "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अनुशं(शा)सिषो दिशः",
| |
| "tail": " मार्गान् । आत्मनः स्तुतिप्रकारांस्त्वमेवोपदिशेत्यर्थः(रान् स्वयमेवोपदिशेत्यर्थः) । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पूर्वीणां",
| |
| "tail": " भगवत्सम्प्रदायागतानां परमविद्यानामर्थे "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शिक्ष(क्षा)",
| |
| "tail": "। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शचीनां",
| |
| "tail": " विद्यानां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पते",
| |
| "tail": ", वाचां पते इति वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पुरूवसो",
| |
| "tail": " बहुवित्त बहुज्ञानेति वा। बहुषु वसति बहूनामावास इति वा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V03",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आभिष्ट्वमभिष्टिभिः प्रचेतन प्रचेतय।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इन्द्र द्युम्नाय न इष एवाहि शक्रः ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V03_B001"
| |
| },
| |
| "text": "आभिरभिष्टिभिः एवम्भूतैस्त्वत्पर्येषणैस्त्वत्प्रार्थनैः त्वं किञ्चिन्मदादिकं ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रचेतय",
| |
| "tail": " प्रबोधय । प्रकृष्टचेतन सर्वज्ञ, परमात्मन् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "द्युम्नाय",
| |
| "tail": " ज्ञानाय वित्ताय यशसे वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इषे",
| |
| "tail": " अन्नाय (च) नः प्रबोधय । एतादृशो हि "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शक्रः",
| |
| "tail": " । शक्र एवेति वा । शक्तिरतिरूपत्वाच्छक्रः ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V04",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "राये वाजाय वज्रिवः शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस आ याहि पिब मत्स्व ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V04_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "राये",
| |
| "tail": " वित्ताय "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वाजाय",
| |
| "tail": " अन्नाय, वज्रिणम् इन्द्रं वर्तयतीति वज्रिवाः, नियामकत्वेन गच्छतीति वा। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शविष्ठ",
| |
| "tail": " बलवत्तम सुखवत्तमेति वा। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ऋञ्जसे",
| |
| "tail": " प्रेरयसि सर्वान् । ‘मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस’ इत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मत्स्व",
| |
| "tail": " मदं कुरु ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V05",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विदा रायः सुवीर्यं भुवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥ ४ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V05_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विदा",
| |
| "tail": " वेदय लम्भय "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "रायः सुवीर्यं",
| |
| "tail": " च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वाजानां",
| |
| "tail": " प्रजानां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पतिः",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "भुवः",
| |
| "tail": " अभवः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘प्रजा वै वाजः’ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति श्रुतेः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वशान् अनु",
| |
| "tail": " यथावशम् । ‘वश= इच्छायाम्’ इति धातोः यथावशं यथेच्छम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शूराणां",
| |
| "tail": " सकाशाद्बलवत्तमः ॥ ४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V06",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्वो अभि नो नय।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः ॥ ५ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V06_001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मघोनां",
| |
| "tail": " यशस्विनां महत्तमः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "चिकित्वः",
| |
| "tail": " ज्ञातः कर्तरिति वा। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नः",
| |
| "tail": " अभितः सर्वतो "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नय",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इन्द्रो विदे",
| |
| "tail": " समस्तं व्यजानात् । तमेव "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "स्तुषे",
| |
| "tail": " ॥ ५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V07",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स नः पर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥ ६ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V07_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ऊतये",
| |
| "tail": " रक्षायै, अभिप्रायसिद्धये वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "स नो द्विषः",
| |
| "tail": " शत्रूनतिपारयतु, पापानि तमांसि वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "क्रतुः",
| |
| "tail": " ज्ञानरूपः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "छन्दः",
| |
| "tail": " इच्छारूपः । छन्द्यत्वाच्छादनत्वाद्वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ऋतम्",
| |
| "tail": " अशेषशास्त्रावगतम् ॥ ६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V08",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सनः पर्षदति द्विषः स नः पर्षदति स्रिधः ॥ ७ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V08_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सातये",
| |
| "tail": " लब्धये । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "स्रिधो",
| |
| "tail": " विनाशात्(न्) ॥ ७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V09",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्वस्य यत्ते अद्रिवः सुम्न आधेहि नो वसो।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " पूर्तिः शविष्ठ शस्यत ईशे हि शक्रः ॥ ८ ॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V09_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पूर्वस्य",
| |
| "tail": " अनादेः सतस्ते(अनादेः ते) सकाशात् यत् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सुम्नं",
| |
| "tail": " सुखं तस्मिन् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "न आधेहि",
| |
| "tail": " । तव "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पूर्तिः",
| |
| "tail": " शस्यते ॥ ८ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V10",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V10_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "तन्नव्यं",
| |
| "tail": " स्तुत्यं ब्रह्म । तत्सम्यक् हृदि न्यसे(सन्यसे) "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "जनस्य",
| |
| "tail": " उपदेशेन । त्वत्स्वरूपेषु त्वं चाहं च सम्ब्रवावहै ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": " गोषु ",
| |
| "tail": " ज्ञानेषु "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गच्छति",
| |
| "tail": " ज्ञानविषयो भवति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सुशेवः",
| |
| "tail": " सुसुखः समाधिकरहितोऽद्वयः(तः अद्वयः) ॥ ९ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V11",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवाह्येवैवाह्यग्नाँ३ इ । एवाह्येवैवाहीन्द्रँ । एवाह्येवैवाहि विष्णाँ३ उ । एवाह्येवैवाहि पूषन् । एवा ह्येवैवाहि देवाः। एवा हि शक्रो वशी हि शक्रो वशाँ अनु ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V11"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V11_B001"
| |
| },
| |
| "text": "‘एवाह्येवैवाहि’ इत्यग्न्यादिदेवतानां संवादरूपेणोक्तमर्थमतिशयेनावधारयति । अभ्यासो हि तात्पर्यार्थः । एवं हि(एवा हि) एवमेव हीत्यर्थः । ‘विनिश्चिते तु संवादे विभागो रङ्ग एव च’ इति शब्दनिर्णये । अतो ‘अग्नाइ’ इत्यादि । एवमेव ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "हि शक्रः वशाननु",
| |
| "tail": " यथावशं स्वतन्त्रो वर्तत इत्यर्थः ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आयोमन्याय मन्यव उपोमन्याय मन्यवे । उपेहि विश्वध ॥ विदा मघवन्विदो३म् ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V12"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B001"
| |
| },
| |
| "text": "‘अय पय= गतौ’ इति धातोः आयो इत्यायतिः । उपो इतिवदतिशयार्थे ओकारः । ‘ओ=अतिशये’ इति च सूत्रम् । आयो जानातीत्यायोमन्यः, समीपस्थमपि जानातीत्युपोमन्यः । अन्येषामिन्द्रियाणां पराङ्मुखत्वान्न ह्यान्तरं जानन्तीति । अयं त्वान्तरमप्यापरोक्ष्येण पश्यति । अयनेन गमनेन प्राप्यं दूरस्थम् आयो इति वा । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोर्मन्युरिति ज्ञानी। बाह्यज्ञाय ज्ञानिने आन्तरज्ञाय ज्ञानिने इत्यभ्यासो(ऽतितात्पर्यार्थः) हि तात्पर्यार्थः। एवंविधं मद्गतं त्वामुद्दिश्यैव ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उपेहि विश्वध",
| |
| "tail": " विश्वधारक । समीपतो दूरतश्च त्वां मन्यमानाय मह्यं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मन्यवे",
| |
| "tail": " ज्ञानाय मामुपेहीति वा ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padmapurana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘समीपे दूरतोऽभिज्ञं(दूरतो ज्ञं) त्वामुद्दिश्यैव मद्गतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एहि विष्णो न मे शक्तिस्त्वदाह्वाने हि मामुप ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति ब्रह्माऽस्तुवद्विष्णुं तन्नाभ्युत्थितपद्मगः’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B003"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Skandapurana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘समीपे दूरतश्चैव ध्यायन्तं त्वा सदा (प्र)विभो ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मामेहि ज्ञानदानायेत्याह गाधिसुतो हरिम्॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्कान्दे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B004"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Manyasamhita_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ओतमस्मिन् जगद्यस्मादोमित्युक्तो हरिसः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तमेव जगदाधारं यतयः समुपासते॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति मान्यसंहितायाम् ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B005"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘इन्द्रो वा एताभिर्महानात्मानं निरमिमीत’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यस्याप्युक्त एवार्थः । निर्माणं नामाऽत्मनस्तद्व्याख्यानेन ख्या(स्था)पनम् । न ह्यन्यथा तासां करणत्वं भवति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B006"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति (च) श्रुतिः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahanarayanopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘त्रीणि पदा निहिता गुहासु यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्(यस्तद्वेद सवितुः पिता सत् )’(महानारायणोपनिषत्.१.१५)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": ", "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Taittiriyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न विचेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स इमा चिकेत यस्ता विजानात् (सवितुः पिता सत्)स पितुष्पितासत्।’(तैत्तिरीयारण्यकम्.१.११)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्यादिश्रुतिभ्यो विज्ञानमेव तन्निर्माणम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः’(ऋ.सं.४.५८.४)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादेर्विज्ञापनं वा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B007"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘प्रचेतन प्रचेतय’(ऐ.आ.४.१.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘आयाहि पिब मत्स्व’ (ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘सुम्न आ धेहि नो वसो’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्युपसर्गाः । अंशा अप्यंश्यपेक्षयोपसर्गा भवन्ति । उपसृष्टत्वादुपसर्गाः । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B008"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘अन्तर्गतं बहिर्गञ्च(र्गतञ्च) द्विधा स्यादुपसर्जनम् । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हस्तवद्धेतिवच्चैव पदानां चोपसर्गवत्’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B009"
| |
| },
| |
| "text": "‘अधत्तान्यञ्जठरे प्रेम रिच्यत 'प्रचेतन'’ ॥ १ ॥ ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Samaveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘दाता राधस्तुवते काम्यं वसु 'प्रचेतय'’(सामवेद.३.६)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " ॥ २ ॥ "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "‘अस्माकं बोधि चोदिता 'आ याहि पिब मत्स्व'’ ॥ ३ ॥ "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "‘तं त्वा परिष्वजामहे 'क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्'’ ॥ ४ ॥ "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "‘या ते रातिर्ददिर्वसु 'सुम्न आधेहि नो वसो'’ ॥ ५ ॥ इत्युपसृजति ॥ "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "‘अशेषमहानाम्न्यर्थसंस्मरणपरिज्ञानपूर्वकमुपसर्गसंयोजनं कर्तव्यम्’ इत्येदर्थत्वेन महानाम्नीप्रशंसा क्रियते । अन्यथा तावन्मात्रप्रशंसामृते अशेषमहानाम्नीप्रशंसाया व्यर्थत्वात् । (त्र्युच)तृचविभागेन ‘विदा मघवन्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘तमूतये’(ऐ.आ(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘नूनम्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) इति वा तिस्त्रो महानाम्न्यः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B010"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘प्रथमा या महानाम्नी तद्वाच्यः पार्थिवो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्वितीयाया आन्तरिक्ष्यस्तृतीयाया द्युगः प्रभुः’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यृक्संहितायाम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B011"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘(त्र्युचा)तृचास्तिस्त्रो महानाम्न्यः पञ्चर्चा प्रथमा परा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "(त्र्युचा)तृचा द्व्यृचा च निगदैस्तार्तीया सप्तभिर्युता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति द्वेधा(त्रेधा) विभागः स्याज्जपध्यानादिकर्मसु’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B012"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘त्रिलोकगेन हरिणा निर्मितः षोळशीक्रतुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं ज्ञात्वा हरिं तं च कर्म कुर्वन्न जायते’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V12_B013"
| |
| },
| |
| "text": "‘एवैवाहि(एवा ह्येवैवा हि)’(इत्यस्यार्थो)इत्युपसर्गस्यार्थोऽप्युक्तावधारणरूपत्वात् पूर्वोक्तार्थज्ञानं विना न स्मर्तुं शक्यते । एवं निर्मितेन षोळशिनर्द्धो (राध्नो) भवत्येवंवित् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V13",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V13_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रप्र वः",
| |
| "tail": " । हे ऋत्विजः प्रजा वा वः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "त्रिष्टुभमिषं",
| |
| "tail": " त्रिष्टुभाख्यमन्नम् इन्द्रः परमेश्वरः सोमाय आ"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विवासति",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पुरन्ध्या धिया",
| |
| "tail": " अशेषप्राणिदेहाश्रयया स्वबुद्ध्या "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रप्र",
| |
| "tail": " प्रकर्षेण प्रकर्षेणातितरां (शं)शस्यमाना त्रिष्टुप् प्रीतिं करोति सोमपानार्थमित्यर्थः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मन्दद्वीराय",
| |
| "tail": " तस्य वीरस्य परमेश्वरस्य मदं प्रीतिं करोतीति मन्दद्वीरः सोमः । न त्वात्मप्रयोजनाय प्रीतिं करोति, किं तर्हि? "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वो मेधसातये",
| |
| "tail": " यज्ञसिद्ध्यर्थम् । ‘व’ इति गुरुत्वाद्, ईश्वरं प्रत्येव वा बहुवचनम् । तदा वः अन्नं त्रिष्टुभं वो मेधसातये भवद्दैवत्ययज्ञसिद्ध्यर्थं भवान् प्रप्राविवासतीत्यर्थः ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V14",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.२)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V14"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V14_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ओदतीनाम्",
| |
| "tail": " उन्दनकर्त्रीणां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वः",
| |
| "tail": " अपाम्, भवदीयानां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पतिं वः",
| |
| "tail": " पुरुषं प्राणं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नदं",
| |
| "tail": " नदनकर्तारं प्रति "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इषुध्यसि",
| |
| "tail": " पतिर्भवसि । सृष्टौ सृष्टौ यो यः प्राणस्तं तं प्रति पतिर्भवसीति नदमिति पुनर्वचनम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "योयुवतीनां",
| |
| "tail": " गमनशीलानाम् आकाशे पोप्लूयमानानाम् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अघ्न्यानां",
| |
| "tail": " धूमरूपेणादाह्यानां रेतोरूपेणाजराणां वा, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "धेनूनां",
| |
| "tail": " जगत्पोषकाणाम् । ‘धिनु=पुष्टौ’ इति धातोः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘ता नदेन विहरति’(ऐ.आ.१.३.५)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादिश्रुतेः । पयसा सेचकानां देशाद्देशान्तरगमनशीलानाम् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अघ्न्यानां",
| |
| "tail": " हन्तुमयोग्यानां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "धेनूनां",
| |
| "tail": " गवां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पतिं",
| |
| "tail": " वायुं प्रति "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इषुध्यसि",
| |
| "tail": " इति वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘वायुर्वाव गवां पतिः’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति श्रुतेः(तिः) । धेनुशब्दाच्च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ओदतीनां",
| |
| "tail": " भक्त्या सेचकानाम्,"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "योयुवतीनाम्",
| |
| "tail": " अतिशयेनाऽत्मतत्वावगमकानाम्, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अघ्न्यानां",
| |
| "tail": " नित्यानां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "धेनूनां",
| |
| "tail": " धर्मार्थकामपोषकाणां वाचां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पतिं",
| |
| "tail": " वायुं प्रति पतिर्भवसीति वा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bruhadaranyakopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनासः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारसः स्वधाकार(स्तस्यै) इति । तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरः। तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः’(बृ.उ.७.१०)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V15",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.३)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V15"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V15_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ताः पृश्नयः",
| |
| "tail": " आपो गावो वाचो वा, अस्य "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सूददोहसः",
| |
| "tail": " प्राणस्य वायुस्थस्य परमेश्वरस्य "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सोमं श्रीणन्ति",
| |
| "tail": " । अद्भिर्हि संसृष्टो भवति। सोमः पयआदिना च (शृ)श्रितो भवति\\ मन्त्रैर्वा गृह्यते । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Aitareyaaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘अथ सूददोहाः प्राणो वै सूददोहाः’(ऐ.आ.१.४.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति श्रुतिश्च । शोभनमुदं कर्म ज्ञानं वा दोग्धीति सूददोहाः । उदेति उच्चो भवत्यनेन पुरुष इत्युदं ज्ञानादि । ‘मनो वाव सोमः’ तद् वाचः श्रीणन्ति स्वार्थैः । प्रश्नयोग्यत्वात् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पृश्नयो",
| |
| "tail": " वाचः, प्रशंसनरूपत्वात् प्रशंसनीयत्वाद्वा । प्रशंसनीयत्वमेवापां गवां च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": " देवानां",
| |
| "tail": " जन्मनि यज्ञे । तत्र हि तेषामभिव्यक्तिः पूर्वं ज्ञाने वा। विशः प्रजाश्च श्रीणन्ति । मुख्यतस्ता एव श्रीणन्तीति चशब्दवर्जनम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "दिवस्त्रिषु आरोचनेषु",
| |
| "tail": " आदित्यचन्द्रविद्युत्पर्यन्तं स्थितानां देवानां जन्मनि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘यज्ञो वै देवजन्म तत्र हि देवाः प्रादुर्भवन्त्या सूर्याचन्द्रमसावा विद्युतं ते वै लोकानधिश्रिताः’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादिश्रुतेः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव परमुपगच्छति सैषा ब्रह्मलोके विराजते’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादि श्रुतेर्द्यौरेव विद्युत् ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/८)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V16"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16_B001"
| |
| },
| |
| "text": "अर्चनं यज्ञादि, प्रार्चनं ज्ञानध्यानादि । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भगवद्वचनात् । प्रिययज्ञा "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अर्चत",
| |
| "tail": " प्रियज्ञानाः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रार्चत",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पुत्रका",
| |
| "tail": " अल्पज्ञाना अप्यर्चत ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तस्समाचरन् ॥’(भ.गी.२.२६)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16_B003"
| |
| },
| |
| "text": "उतशब्दाज्ज्ञानिनामप्यर्चनं युक्तम् । स्वाश्रमानुसारेणेति । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यस्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता’(ऋ.सं.१.१५६.१)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति श्रुतेः । किं तदर्चनीयम् ? "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "धृष्णु",
| |
| "tail": " धृष्टं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यम् । पुरं देहं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नार्चत",
| |
| "tail": " ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16_B004"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavata_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथस्सुमध्यमे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने ॥’(भाग.४.३.२२)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भागवते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V16_B005"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Vyasasmruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘सदेहमानिहरये प्रणमेत्केवलाय वा । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न देहाय न तन्मानपराय च कथञ्चन ॥’ इति व्यासस्मृतौ "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुनरर्चतेति तात्पर्यार्थः(र्थे) ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V17",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V17"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V17_B001"
| |
| },
| |
| "text": "गर्गरगोधापिङ्गादीनां घोषा अपि नादमात्रव्यञ्जकत्वेन(नादव्यञ्जकत्वेन) भगवद्वाचका एवेत्याह- ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अव स्वराति गर्गर इत्यादिना॥",
| |
| "tail": " एतत्समस्तमिन्द्रायैवेत्यर्थः । ब्रह्म वेदो विशेषत इन्द्रायैवोद्यतः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गर्गर",
| |
| "tail": " इति पादभूषण-महामत्रक-दधिपात्र-हस्तिहस्तानां नाम । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पिङ्गा",
| |
| "tail": " चकोरी । अवपरीत्यल्पाधिक्यादिविशेषोऽपि तद्वाचक एवेति ज्ञापनाय । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "चनिष्कदद्",
| |
| "tail": " इत्यनुकरण(नुकार)शब्दः । सनिष्वणदित्यतिशयार्थे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V17_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव(प्राण ऋच इत्येव विद्यात्)’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति (च) श्रुतिः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdatattve_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘दध्नो मथनशब्दश्चाप्यन्तर्नादस्वरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " भीषकत्वं हरेर्ब्रूयादन्तर्नादो हि भीषणे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " गजबृंहितमप्येवं धिक्कारसहितं वदेत् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वरितेन समायोगाद् धिक्कृतौ स्वरितो यतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " महामत्रं(मन्त्रं) जलाद्यैश्च युक्तमेतादृशं वदेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " पादभूषा च धिक्कारं तत्कृतं स्वरितं(तो) वदेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अद्भुतत्वं हरेर्वक्ति पिङ्गाकण्ठगशब्दवत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तामेवाद्भुततां वक्ति गृहगोधा पराऽपि च’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दतत्वे ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V18",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आयत्पतन्त्येन्यस्सुदुघा अनपस्फुरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१०)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V18"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V18_B001"
| |
| },
| |
| "text": "यच्च एन्यो नद्य आपतन्ति तद्धोषश्चेन्द्रवाचकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘नदीसमुद्रघोषाश्च नादत्वाच्छ्रैष्ठ्यवाचकाः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " नादो हि श्रैष्ठ्यवाची स्यादेवं घोषाः परेपि च’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तदर्थं च नद्य आपतन्ति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Vaihayasasaamhita_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘भूतादिभूतोम्बुनिधानमध्ये भूत्वा हरिः सर्वहरोऽतिधाम्ना । अगाधमम्भो विदधाति भस्म यो वाडवाग्निर्नृहरिर्विचिन्त्यः॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति वैहायससंहितायाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सुदुघाः",
| |
| "tail": " सुष्ठु अपां दोहनकर्त्र्यः । स्फुरणापगमनमासां नास्तीति "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अनपस्फुरः",
| |
| "tail": " । नित्यचलनस्वभावाः । अपगतस्फुरणत्वेन "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सोमं ",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गृभायत",
| |
| "tail": " । अचलत्वेन मनो वा ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V19",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V19_B001"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "व्यतीन्",
| |
| "tail": " विशेषेणाधिकान् देवान् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अफाणयत्",
| |
| "tail": " विस्तारयामास । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "दाशुषे",
| |
| "tail": " यजमानाय तत्समीपे । ‘फण= विस्तारे’ इति धातोः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सुयुक्तान्",
| |
| "tail": " सुयोगरतान् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Prakashasamhita_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘विशेषेणाधिकत्वेन व्यतयो देवतास्स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " नित्ययोगरताश्चैव नारायणपरायणाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ता एव चेन्द्रियात्मानस्तान्विस्तारयतीश्वरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मन आदीन्द्रियाणां तु शक्तिविस्तार एव तु(हि) ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " विस्तारो देवतानां स्याद् भक्तेषु हरिणा कृतः’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रकाशसंहितायाम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च श्रुतिः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Taittiriyopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्’(तै.उ.१.९(शिक्षावल्लि.९)) "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "इति च । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Mahabharata_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘न देवा यष्टिमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संयोजयन्ति तम् ॥’(म.भा.५.३५.३३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति भारते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V19_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "तक्वो",
| |
| "tail": " जगत्कर्ता । ‘तक=निर्माणे’ इति धातोः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Rigveda_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः’(ऋ.सं.३.३३.४)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति(इत्यादि) प्रयोगाच्च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": " नेता",
| |
| "tail": " (च सर्वस्य) चाशेषस्य। तदेव वपुस्सः । यत्तज्जगत्कर्तृनेतृरूपम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Padma_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘देहदेहिविभागश्च न क्वचित्परमेश्वरे । गुणतद्वद्विभागो वा नेह नानेति हि श्रुतिः॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पाद्मे । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः’॥"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति(इत्यादि) श्रुतेश्च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V19_B003"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Purushottanasamhita_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘विशुद्धविज्ञानमरीचिमालया (वि)सचित्ररत्नप्रकरप्रकाशया ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " प्रकाशिताशेषजगत्स्वरूपया प्रभुः सदा ह्लादतनुर्विभूषितः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति पुरुषोत्तमसंहितायाम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उपमा",
| |
| "tail": " उपमायाम् उपमाविषये, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अमुच्यत",
| |
| "tail": " त्यक्तोऽभवत् । निरुपम इत्यर्थः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘अल्पाक्षरेण शक्येऽपि वक्तुं बह्वक्षरं यदि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " उक्तस्याऽधिक्यमेवात्र निषेधेऽशेषतो भवेत्॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति (च)शब्दनिर्णये ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V20",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V20"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V20_B001"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "(विश्वा)",
| |
| "tail": " विश्वान् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "द्विषो",
| |
| "tail": " अज्ञानपापादीन् अतीत्य "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शक्रो",
| |
| "tail": " (शक्तो)विष्णुः स्वभक्तान्(क्तम्)अतिवहत्येव हि । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Kathopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(कठ.उ.१.२.२३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": ", "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्’(भगी.१२.७)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " (इत्यादिना)इत्यादिप्रसिद्धमुशब्देनाऽह । द्विषोऽतीत्यातिशयेनाऽत्मानं (प्रत्येवोहतेति)प्रत्योहतेति "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अति",
| |
| "tail": "शब्दद्वयार्थः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ओदनम्",
| |
| "tail": " उन्दतेः कर्म बन्धनम् अभिनत्। भगवान् कानीनो बादरायणः, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "परः",
| |
| "tail": " परमात्मा, गिरैव पच्यमानं परिपाककाले । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Vyasasamhita_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘संश्लेषादोदनं कर्म पच्यमानं गिरैव हि । अभिनद्भगवान् व्यासः स्वभक्तानामशेषतः’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति व्याससंहितायाम् ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V21",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम् ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१५)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V21"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V21_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अर्भक",
| |
| "tail": " इव स्थितः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नवं",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "रथम्",
| |
| "tail": " अध्यतिष्ठत् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "कुमारकः",
| |
| "tail": " कुत्सितमारकः । अर्भक इव सूक्ष्मदेहः। पूर्वं पूर्वं देहं परित्यज्य नवं नवं देहमध्यतिष्ठज्जीवमादाय ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Manyasamhitayam_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘जीवदेहं परित्यज्य सह जीवेन चेश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " जीवस्यान्यच्छरीरं च समुत्पाद्य विशत्यजः’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति मान्यसंहितायाम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " कुमारक इवार्भकः सूक्ष्मदेह इति च(वा) । अर्भकः सूक्ष्मदेहोऽपि न (कुमारक) कुमार इति वा । सपक्षत् परिपक्वज्ञानादिगुणकमकरोत् । महिषं महान्तं ब्रह्माणम् । मृगं मृगयन्तं स्वात्मानम् । पित्रे स्वस्मै, मात्रे लक्ष्म्यै च, विभुक्रतुं पूर्णज्ञानम् । पितृमातृविषये पूर्णज्ञानम् । पुनः पूरयामासेत्यर्थः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘ज्ञानपूर्णं विधातारं मोक्षदानेन केशवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स्वपुत्रं पूरयामास महिषं महतां महान्’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्ते ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V21_B002"
| |
| },
| |
| "text": "यथास्थिताः प्रज्ञाताः । इतस्ततः संयोजनं विना यथास्थितशंसनं पथः(थिः) प्राप्तिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V22"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B001"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "व्याप्तो",
| |
| "tail": " विशेषेणापन्नः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अविहृतम्",
| |
| "tail": " असंसृष्टम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "कृच्छ्राद्",
| |
| "tail": " अयथावस्थितशंसननिमित्ताद् दुःखादवाग्गतिं गतश्रीकतामेव न प्राप्नुयाम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘विलोमः शत्रुज (क्ष)यकृत्संसर्गः पापनाशनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यथास्थितः श्रीकरः स्यात्स्वाध्यायः शंसनेऽपि च’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्ते"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Svadhyayatattva_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘गतश्रियः श्रियो हानिं पापहानिं परस्य च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " संसर्गश्छन्दसां कुर्याच्छ्रियो वृद्धिं यथास्थितः’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्वाध्यायतत्वे ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘किञ्चित्वे चोभयत्वे च संशये सदृशे तथा । इवशब्दः प्रयुज्येत न्यक्कारेऽपि च पण्डितैः॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अतो गतश्रीत्वसंशयेऽपीत्यर्थः ।इतस्ततो विशेषेण संहृतं (संयोजितं) "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विहृतम्",
| |
| "tail": " ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Svadhyayatattve_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘पापानां व्यतिषिक्तत्वाद्व्यतिषक्तं विनाशकम् । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "धनस्याव्यतिषङ्गेण व्यतिषङ्गोविनाशकः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सदृशं सदृशस्यैव यतः स्यात्प्रविनाशकम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तथाप्यप्राप्तनाशस्य धनस्य बलवत्त्वतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " शक्नुयान्न विनाशाय पापस्येच्छासमेधितम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " संसृष्टं स्याद्विनाशाय नहीच्छा धनसङ्क्षये॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति स्वाध्यायतत्वे । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अव्यतिषक्तत्वं च मोक्षे विद्यत इत्यत्रोभयार्थ इवशब्दः । एवम्भूतेन शंसनेन "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पाप्मानम्",
| |
| "tail": " अपहन्ति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "शमलं",
| |
| "tail": " रागादिकं च । पापस्य पृथगुक्तेः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shabdanirnaya_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘शमलं पापमुद्दिष्टं रागद्वेषादिकं तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अपराधश्च शमलं मलं च शमलं विदुः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " य एवमुपास्ते सोऽपि पाप्मानमपहन्ति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ऋक्षु संसृज्यमानासु प्रोच्यमानं जनार्दनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " पुंसंसृष्टस्य पापस्य निहन्तारं विशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तत्प्रसादेन मुक्तस्य पापासंसृष्टतामपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ध्यायन्कर्माणि कृत्वापि मुच्यते सर्वपातकैः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B003"
| |
| },
| |
| "text": "न चैवमादिवाक्यानां स्वार्थे प्रामाण्याभावः । सिद्धार्थे प्रामाण्यस्य साधितत्वात् । अविरोधाच्च । न च बह्नर्थेषु तात्पर्यकल्पने कल्पनागौरवम् । वचनेनैव प्रतीयमानत्वाद् अर्थस्य कल्पनाभावात् । न च वाचनिकार्थस्तात्पर्यार्थ इति विशेषः । तन्मानाभावात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B004"
| |
| },
| |
| "text": "यत्र वाचनिकार्थादन्यस्तात्पर्यार्थः प्रतीयते लौकिकवाक्येषु न तत्र साक्षाद्वचनं प्रबोधकम् । वचनलिङ्गा(लिङ्गका)नुमा हि सा । विरोधादमुख्यवृत्तिर्वा । आप्तत्वनिश्चये । आप्तत्वानिश्चये प्रामाण्यमेव न भवति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B005"
| |
| },
| |
| "text": "वेदवाक्यस्य तु वाचनिकार्थं विना नैवान्यो युज्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B006"
| |
| },
| |
| "text": "वाचनिकानां तु बहूनामप्यविरोधे स्वीकार्यता । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmasutra_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि’(ब्र.सू.४.४.१६)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति सूत्रम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B007"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Soukarayanashruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘वानात्सूतेर्देवनाद्वासुदेवो वासाद्द्युतेश्छादनात्क्रीडया वा । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " बलादसुत्वाद् दातृतो वर्तनाच्च तं वासुदेवं प्रवदन्ति वेदाः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इत्यादि च सौकरायणश्रुतिः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B008"
| |
| },
| |
| "text": "मोक्षेऽपि सुप्तिरस्तीत्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमेवान्यतरपदम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B009"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmatarka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘रूढियोगौ विना कश्चिन्नैवार्थो वेदगो भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तत्रापि यौगिको मुख्यः सर्वत्रास्ति स वैदिके ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अनवस्थानिवृत्त्यर्थं यौगिके रूढकल्पना ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ज्ञाते विशेषविज्ञानं व्यवहारोऽपि रूढितः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ब्रह्मतर्के ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B010"
| |
| },
| |
| "text": "वाचनिकमर्थं परित्यज्य नियोगार्थकल्पने श्रुतहानिरश्रुतकल्पनेति सर्वदोषाधिकौ तस्य व्यर्थमापद्येते । एवं च वदतो विधिशब्दा निरर्थकाः सिद्धार्था वा?, सिद्धशब्दाः वा स्वार्थे प्रमाणभूता इत्युक्ते किमुत्तरम् ? न च कारणं किञ्चिद्वाचनिकानां बहूनामप्यर्थानां त्यागे । प्रतीयमाने तु विरोधे तदन्योऽर्थः स्वीकार्यो वाचनिक एव । सोऽपि वाचनिक एवेत्यपि तत एव सिद्ध्यति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B011"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘मुख्यार्थानां च सर्वेषां तारतम्यं (च) तु विद्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तत्राऽपि परमो मुख्यो वाच्योऽशेषरवैर्हरिः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " (तत्र मुख्यविरोधेन)तत्तन्मुख्याविरोधेन तदन्यार्थस्य सङ्ग्रहः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स्वतो मुख्यविरोधे तु त्याज्योऽन्योऽर्थोऽखिलेष्वपि ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इति सर्वत्र नियमः शब्दार्थज्ञानभूमिषु’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B012"
| |
| },
| |
| "text": "न च क्रियायामेव प्रयोजनं न सिद्ध इति युक्तम् । ज्ञानमात्रेऽपि महाप्रयोजनदर्शनात्(दृष्टेः) पितृजीवनादिवाक्ये । आह च स्वयं भगवान्–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B013"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥’(भ.गी.१५.१६-२०)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Praman_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ध्यानं त्वखिलकर्मभ्यो ध्यानाच्च ज्ञानमुत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " न ज्ञानसदृशं किञ्चित् पुरुषार्थप्रसिद्धये॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति (च) प्रवृत्ते । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय।’(भ.गी.२.४९)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B014"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Karmaviveka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘अशेषकर्मपूगोऽपि न विष्णुध्यानलेशभाक् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तच्च ध्यानं हरेर्ज्ञानकोट्यंशाय न पूर्यते’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति कर्मविवेके । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Taittiriyaranyaka_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति च श्रुतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B015"
| |
| },
| |
| "text": "न च कर्ममात्रे पर्यवसितिर्वेदस्य । सुखज्ञानस्यैव प्रयोजनत्वात् । अतः सिद्धस्यैव प्रयोजनत्वं (वाच्यम् /सिद्धम्)।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B016"
| |
| },
| |
| "text": "प्रशंसादीनां च तात्पर्यं वाचनिकार्थात्यागेनैव कथितं स्वयं भगवता, ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Brahmasutra_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति’(ब्र.सू.३.१.७)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति । तस्माद् विरुद्धवत्प्रतीयमानानि प्रशंसादीनि ज्ञानसहकार्यपेक्षया योजनीयानि । पुराणादीनां तु श्रुत्यादि विरोधे गौणोऽप्यर्थो युज्यते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V22_B017"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Varahapurana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘कुहकञ्चेन्द्रजालं च विरुद्धाचरणानि च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " दर्शयित्वा जनं सर्वं मोहयाशु महेश्वर॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इत्यादि वाराहे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V23",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि । मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.७)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-KNR_C01_V23"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V23_B001"
| |
| },
| |
| "text": " ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ब्रध्नस्य",
| |
| "tail": " सूर्यस्य "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विष्टपं",
| |
| "tail": " स्वर्गम् उद्"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गन्वहि",
| |
| "tail": " इन्द्रोऽहं च। यत्तदिन्द्रगृहं (ब्रध्नं)ब्रध्नविष्टपं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मध्वः",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पीत्वा",
| |
| "tail": " तत्र "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सचेवहि",
| |
| "tail": " सुखमनुभवाव । सख्युरिन्द्रस्य त्रिस्सप्तस्थानेषु ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V23_B002"
| |
| },
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Pramana_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘एकविंशति दिव्यानि स्थानानि दिवि चक्रिणः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " वज्रिणो वाऽपि तद्भक्तैर्भुज्यन्ते तानि याज्ञिकैः॥’"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " इति प्रवृत्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V24",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषं जठर आवृषस्व ॥ २ ॥ (ऋ.मं.१०, सू.९६.१३)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-KNR_C01_V24"
| |
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| |
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V24_B001"
| |
| },
| |
| "text": "पूर्वान् (सुतान्) प्रातस्सवनगान् सोमानपाः । हरीनिन्द्रियाणि वर्तयतीति (हरिवः) हरिभिर्वर्तत इति वा । इदं माध्यन्दिनं ",
| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "Moola"
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
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| "text": "ते "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
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| |
| "text": " केवलम्",
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| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अथो ",
| |
| "tail": "इत्यर्थान्तरम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मधुमन्तं ",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सोमं ",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
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| |
| "text": "जठरे ",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "आवृषस्व",
| |
| "tail": " (आ)सिञ्च, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ममद्धि",
| |
| "tail": " च। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": " सत्रा",
| |
| "tail": " अस्मत्त्राणेन सह । पीतशब्दवत् । अपूर्वपानत्वात्तदेव पानं मुख्यमिति पीतशब्दः । इन्द्रस्य केवलत्वात्केवलं माध्यन्दिनं सवनम् । ‘ममद्धि’ इति तृतीयसवनम् । तत्र हि मदो विशेषतो भवति पूर्तेः । इति सवनत्रयरूपता षोळशिनः । वृषण्वत् वृष्णः इन्द्रस्य विशेषतः प्रियत्वात् । एवं चतूरूपता षोळशिनः । राध्नोति ऋद्धो भवति ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V24_B002"
| |
| },
| |
| "text": "विहृतपक्षे तु–",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Ashvalayanashroutasutra_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘पादान्व्यवधायार्धर्चशः शंसेत् । पूर्वासां पूर्वाणि पदानि । गायत्र्यः पङ्क्तिभिः। पङ्क्तीनां तु द्वे द्वे पदे शिष्येते ताभ्यां प्रणुयात् । उष्णिहो बृहतीभिः । उष्णिहान्तूत्तमान्पादान् द्वौ कुर्यात्। चतुरक्षरमाद्यम् । द्विपदाश्चतुर्धा कृत्वा प्रथमां त्रिष्टुभोत्तरा जगतीभिः । उत्तमायाश्चतुर्थमक्षरमन्त्यं पूर्वस्याऽऽद्यमुत्तरस्य । अनुष्टुभमतिच्छन्दःस्वव(द)दध्यात् । द्वितीयतृतीययोस्तृतीययोः पादयोरवसानत उपदध्यात् प्रचेतनेति पूर्वस्यां प्रचेतयेत्युत्तरस्याम् । उत्तरास्वितरान् पादान् षष्ठान्कृत्वाऽनुष्टुप्कारं शंसेत् ॥’ (आ.श्रौ.सू.६.३.३-१३)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V25",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४))"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| "id": "bhashya-KNR_C01_V25"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V25_B001"
| |
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| |
| "text": "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
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| "children": [
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| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Ashvalayanashroutasutra_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘एवाह्येवा(वैव) अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् (एवै)एवाहीन्द्रम् अथो इदं सवनं केवलं ते । एवा हि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र वशीहि शक्रः सत्रा वृषं जठर आवृषस्वेति’(आ.श्रौ.सू.६.३.१७)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V25_B002"
| |
| },
| |
| "text": "भगवद्भक्तिज्ञानवैराग्यपूर्वकं च कर्म कर्तव्यम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Atharvanopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " नाकस्य पृष्ठे सुकृते तेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनकरं वाऽऽविशन्ति॥’((मुण्डक)आथ.२.१०) "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ]
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavata_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे विनार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥’(भाग.१२.१२.५२)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ]
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": " ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥’(भ.गी.१८.४६) "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥’(भ.गी.१९.२०)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ये मे मतमिदं नित्यमनुतिषष्ठन्ति मानवाः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥’(भ.गी.३.३०-३२)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
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| |
| {
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| |
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| {
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| "children": [
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavata_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः । ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥’(भाग.२.४.१७)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
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| "tail": ", "
| |
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| |
| {
| |
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| |
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| |
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| |
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Shruti_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘एष उ एव दाश्वान् य (एनमेवं)एवं वेद’ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br"
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Chandogyopanishat_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’(छां.उ.१.१.८(१०)) "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "।"
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।’(भ.गी.९.११-१२)"
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
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| |
| {
| |
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "blockquote",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bhagavadgeeta_id"
| |
| },
| |
| "text": "‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "tail": " इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥’(भ.गी.१८.६४-६५) "
| |
| }
| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
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| |
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| |
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| "children": [
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| "tag": "reference",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Bruhadaranyakopanishat_id"
| |
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| |
| "text": "‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तिष्ठमानस्य तद्विदः’(बृ.उ.५.९.७(३.९.२८))"
| |
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| |
| ]
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः ॥"
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
| |
| "id": "KNR_C01_V25_B03"
| |
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| |
| "text": "नमो नारायणायाजभवशक्रोष्णरुङ्मुखैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": " सदा वन्दितपादाय (श्रि)श्रीपाय प्रेयसेऽधिकम् ॥"
| |
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| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः कर्मनिर्णयः समाप्तः ॥",
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| "text": "महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४)" | | "lines": [ |
| | "महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजत्ययं वै लोकः प्रथमा महानाम्न्यन्तरिक्षलोको द्वितीयासौ लोकस्तृतीया सर्वेभ्यो वा एष लोकेभ्यस्सन्निर्मितो यत्षोशी तद्यन्महानाम्नीनामुपसर्गानुपसृजति सर्वेभ्यः एवैनं तल्लोकेभ्यस्सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यो लोकेभ्यस्सन्निर्मितेन षोशिना राध्नोति य एवं वेद । (ऐतरेयब्राह्मणम् २.१६.४)" |
| | ] |
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| "text": "महानाम्नीनाम्\nऋचाम् उपसर्गा ये उपसर्जनभूतास्तान्\nउपसृजति\nसंयोजयति । महन्नाम यास्वृक्षु विद्यते ता महानाम्न्यः । परस्य ब्रह्मणो यन्नामेन्द्रादिकं तन्महार्थत्वान्महत् । महद्धि तत्परं ब्रह्म । अशेषगुणपूर्तेः ।" | | "lines": [ |
| | "महानाम्नीनाम्", |
| | "ऋचाम् उपसर्गा ये उपसर्जनभूतास्तान्", |
| | "उपसृजति", |
| | "संयोजयति । महन्नाम यास्वृक्षु विद्यते ता महानाम्न्यः । परस्य ब्रह्मणो यन्नामेन्द्रादिकं तन्महार्थत्वान्महत् । महद्धि तत्परं ब्रह्म । अशेषगुणपूर्तेः ।" |
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| "text": "तत्रैक आहुरगुणं ब्रह्मेति । न तद्युक्तम्, श्रुतियुक्तिविरोधात् ।" | | "lines": [ |
| | "तत्रैक आहुरगुणं ब्रह्मेति । न तद्युक्तम्, श्रुतियुक्तिविरोधात् ।" |
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| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
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| "text": "तथाहि श्रुतिः -\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id\"\u003E‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२)\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id\"\u003E‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५)\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id\"\u003E‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते॥’(मुण्डक.उ.१.१.९)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id\"\u003E‘दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥’(मुण्डक.उ.३.२(२.१.२))\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पुरुषः।’(ऋ.सं.१०.९०.३)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।’(ऋ.सं.१०.८२.३)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।\u003Cbr/\u003E पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id\"\u003E‘सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः।’(छां.उ.३.१४.२,४)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि।’(ऋ.सं.१.१५४.१)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति।’(ऋ.सं.७.९९.१)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप।’(ऋ.सं.७.९९.२)\u003C/span\u003E\nइत्यादिका ।" | | "lines": [ |
| | "तथाहि श्रुतिः -", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id\"\u003E‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२)\u003C/span\u003E", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id\"\u003E‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते॥’(मुण्डक.उ.१.१.९)\u003C/span\u003E", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mundakopanishat-id\"\u003E‘दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥’(मुण्डक.उ.३.२(२.१.२))\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पुरुषः।’(ऋ.सं.१०.९०.३)\u003C/span\u003E", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।’(ऋ.सं.१०.८२.३)\u003C/span\u003E", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।\u003Cbr/\u003E पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’\u003C/span\u003E", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id\"\u003E‘सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः।’(छां.उ.३.१४.२,४)\u003C/span\u003E", |
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| | "इत्यादिका ।" |
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| "text": "युक्तिश्च । बुद्धिपूर्वं सर्वकर्तृत्वात् सर्वज्ञत्वादयो गुणा युक्ताः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम्’(भाग.३.३२.१३)\u003C/span\u003E\nइति च भागवते ॥" | | "lines": [ |
| | "युक्तिश्च । बुद्धिपूर्वं सर्वकर्तृत्वात् सर्वज्ञत्वादयो गुणा युक्ताः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम्’(भाग.३.३२.१३)\u003C/span\u003E", |
| | "इति च भागवते ॥" |
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| "text": "न च-\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shvetashvataropanishat-id\"\u003E‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.उ.६.११)\u003C/span\u003E\nइत्यादिविरोधः । सत्वादिगुणाभावोक्तेस्तत्र । अन्यथा ‘एको देवस्सर्वभूतेषु गूढः’ इत्यादीनामपि गुणत्वात् स्वोक्तिविरोधः ॥" | | "lines": [ |
| | "न च-", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shvetashvataropanishat-id\"\u003E‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.उ.६.११)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिविरोधः । सत्वादिगुणाभावोक्तेस्तत्र । अन्यथा ‘एको देवस्सर्वभूतेषु गूढः’ इत्यादीनामपि गुणत्वात् स्वोक्तिविरोधः ॥" |
| | ] |
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| "text": "न च निर्विशेषं नाम किञ्चिदस्ति । निर्विशेषत्वोक्तेरेव व्याहतत्वात् । निर्विशेषत्वेन विशिष्टं (तन्न) न वेत्युक्ते, यद्यविशिष्टं तर्हि न विशेषनिराकरणं विशेषवत्त्वमेव भवति । यदि तेन विशिष्टं स एव विशेष इति व्याहतिः ।" | | "lines": [ |
| | "न च निर्विशेषं नाम किञ्चिदस्ति । निर्विशेषत्वोक्तेरेव व्याहतत्वात् । निर्विशेषत्वेन विशिष्टं (तन्न) न वेत्युक्ते, यद्यविशिष्टं तर्हि न विशेषनिराकरणं विशेषवत्त्वमेव भवति । यदि तेन विशिष्टं स एव विशेष इति व्याहतिः ।" |
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| "text": "न च निर्विशेषत्वे किञ्चिन्मानम् । अशेषविशेषवचनानुभवयुक्तिविरोधश्च ।" | | "lines": [ |
| | "न च निर्विशेषत्वे किञ्चिन्मानम् । अशेषविशेषवचनानुभवयुक्तिविरोधश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "न च मिथ्याविशेषवत् । व्याहतेः । मिथ्याविशेष इत्युक्ते ह्यसद्विशेष इत्येव भवति । तथा चाविशेष (विशेष)विशिष्टपक्षोक्तदोष एव ॥" | | "lines": [ |
| | "न च मिथ्याविशेषवत् । व्याहतेः । मिथ्याविशेष इत्युक्ते ह्यसद्विशेष इत्येव भवति । तथा चाविशेष (विशेष)विशिष्टपक्षोक्तदोष एव ॥" |
| | ] |
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| "text": "न चानिर्वचनीयविशेष इति भवति । अनिर्वचनीयासिद्धेः । न हि तत्र प्रत्यक्षमस्ति । मिथ्याशब्दस्त्वभाववाच्येव । तदन्यत्र प्रमाणाभावात् । न चान्यत् प्रमाणम् । प्रतिज्ञाव्याहतेः । नहि सदन्तरादसतश्चान्यत् सदसद्विलक्षणं प्रसिद्धम् । असन्न भवतीत्युक्ते ‘द्वौ नञौ प्रकृतमर्थं सातिशयं गमयतः’ इति सदेव भवति । असदन्तरं वा विशेषविवक्षायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "न चानिर्वचनीयविशेष इति भवति । अनिर्वचनीयासिद्धेः । न हि तत्र प्रत्यक्षमस्ति । मिथ्याशब्दस्त्वभाववाच्येव । तदन्यत्र प्रमाणाभावात् । न चान्यत् प्रमाणम् । प्रतिज्ञाव्याहतेः । नहि सदन्तरादसतश्चान्यत् सदसद्विलक्षणं प्रसिद्धम् । असन्न भवतीत्युक्ते ‘द्वौ नञौ प्रकृतमर्थं सातिशयं गमयतः’ इति सदेव भवति । असदन्तरं वा विशेषविवक्षायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "किञ्चैतद्वैलक्षण्यं भेदोऽभेदो भेदाभेदो वा? न तावद्भेदः, अनङ्गीकारात् । व्यावहारिकभेदश्चानिर्वाच्यसिद्धौ वक्तव्यः । न चाव्यावहारिकं किञ्चित् । न चाशेषव्यवहारनिवृत्तौ किञ्चिन्मानम् । न च मिथ्यातथ्ययोस्सामान्यं व्यावहारिकत्वं धूमबाष्पयोर्धूमत्ववत् । न चाभेदोऽनङ्गीकारदेव । तथैवोभयम् । अभेदे चानिर्वाच्यब्रह्मणोस्तच्छब्दयोः पर्यायत्वम् ।" | | "lines": [ |
| | "किञ्चैतद्वैलक्षण्यं भेदोऽभेदो भेदाभेदो वा? न तावद्भेदः, अनङ्गीकारात् । व्यावहारिकभेदश्चानिर्वाच्यसिद्धौ वक्तव्यः । न चाव्यावहारिकं किञ्चित् । न चाशेषव्यवहारनिवृत्तौ किञ्चिन्मानम् । न च मिथ्यातथ्ययोस्सामान्यं व्यावहारिकत्वं धूमबाष्पयोर्धूमत्ववत् । न चाभेदोऽनङ्गीकारदेव । तथैवोभयम् । अभेदे चानिर्वाच्यब्रह्मणोस्तच्छब्दयोः पर्यायत्वम् ।" |
| | ] |
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| "text": "न च व्यावर्त्यविशेषेणापर्यायत्वं क्वचित् । व्यावर्त्यविशेषस्तद्व्यावृत्ते ब्रह्मणि विशेेषमापादयति चेद्विशिष्टवाक्यार्थता । न चेन्न ब्रह्मज्ञानार्थिनः(ने) पदान्तरं वाच्यम्, असङ्गतत्वात् । मिथ्याविशेषस्य चासिद्धिरुक्ता । (ततो)अतोऽन्योन्याश्रयताऽनवस्थितिश्चक्रकं वा । भेदाभेदविलक्षणमप्युक्तरीत्यैवापाकृतम् ।" | | "lines": [ |
| | "न च व्यावर्त्यविशेषेणापर्यायत्वं क्वचित् । व्यावर्त्यविशेषस्तद्व्यावृत्ते ब्रह्मणि विशेेषमापादयति चेद्विशिष्टवाक्यार्थता । न चेन्न ब्रह्मज्ञानार्थिनः(ने) पदान्तरं वाच्यम्, असङ्गतत्वात् । मिथ्याविशेषस्य चासिद्धिरुक्ता । (ततो)अतोऽन्योन्याश्रयताऽनवस्थितिश्चक्रकं वा । भेदाभेदविलक्षणमप्युक्तरीत्यैवापाकृतम् ।" |
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| "text": "किञ्चासद्विलक्षणमित्यत्राभावान्यविरोधानां मध्ये नञः कोऽर्थः ? यद्यभावः, न, असद्विलक्षणत्वं भावत्वमेव जगतः स्यात् । न च सतोऽन्यस्मादसतो विलक्षणं जगत् । असतोऽन्यत्वादिधर्मानङ्गीकारात्। ब्रह्मणश्च । असतोऽनिर्वचनीयत्वाङ्गीकाराच्च न वैलक्षण्यं ततोऽनिर्वाच्यस्य । तथापि चेद् वैलक्षण्यं नानिर्वाच्यत्वं जगतः(वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वं न जगतः) । न च विरोधि(धः) । विरोधिनोरन्यतरनिषेधेऽन्यतरव्याप्तत्वानुभवात् । अविद्यमानं न भवतीत्युक्ते विद्यमानमित्येव हि सर्वलोकानुभवः । अतोऽनन्तगुणो भगवान्नारायणो इति सिद्धम् ।" | | "lines": [ |
| | "किञ्चासद्विलक्षणमित्यत्राभावान्यविरोधानां मध्ये नञः कोऽर्थः ? यद्यभावः, न, असद्विलक्षणत्वं भावत्वमेव जगतः स्यात् । न च सतोऽन्यस्मादसतो विलक्षणं जगत् । असतोऽन्यत्वादिधर्मानङ्गीकारात्। ब्रह्मणश्च । असतोऽनिर्वचनीयत्वाङ्गीकाराच्च न वैलक्षण्यं ततोऽनिर्वाच्यस्य । तथापि चेद् वैलक्षण्यं नानिर्वाच्यत्वं जगतः(वैलक्षण्यमनिर्वाच्यत्वं न जगतः) । न च विरोधि(धः) । विरोधिनोरन्यतरनिषेधेऽन्यतरव्याप्तत्वानुभवात् । अविद्यमानं न भवतीत्युक्ते विद्यमानमित्येव हि सर्वलोकानुभवः । अतोऽनन्तगुणो भगवान्नारायणो इति सिद्धम् ।" |
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| "text": "न च सिद्धेऽर्थे वाक्यस्य प्रामाण्याभावादीश्वराद्यसिद्धिः । सिद्धातिरिक्तकार्याभावात् । लिङाद्यर्थस्त्विष्टसाधनत्वमेव । न हि कर्तव्यत्वं नामेष्टसाधनत्वादन्यत्किञ्चित् (अस्ति) । तन्मानाभावात् । शब्दस्तु न तद्वक्तीत्युक्तम् । लिङादेरिष्टसाधनार्थत्वेनैव कृतार्थत्वे तदन्यकार्यकल्पने कल्पनागौरवं (च)।" | | "lines": [ |
| | "न च सिद्धेऽर्थे वाक्यस्य प्रामाण्याभावादीश्वराद्यसिद्धिः । सिद्धातिरिक्तकार्याभावात् । लिङाद्यर्थस्त्विष्टसाधनत्वमेव । न हि कर्तव्यत्वं नामेष्टसाधनत्वादन्यत्किञ्चित् (अस्ति) । तन्मानाभावात् । शब्दस्तु न तद्वक्तीत्युक्तम् । लिङादेरिष्टसाधनार्थत्वेनैव कृतार्थत्वे तदन्यकार्यकल्पने कल्पनागौरवं (च)।" |
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| "text": "न च तत्कल्पकं किञ्चित् । विप्रतिपत्तौ चान्यन्मानं वक्तव्यं तद्भावे । न चानुमा । अप्रसिद्धविशेषणत्वात्। न चार्थापत्तिः । अनुपपत्त्यभावात् ।" | | "lines": [ |
| | "न च तत्कल्पकं किञ्चित् । विप्रतिपत्तौ चान्यन्मानं वक्तव्यं तद्भावे । न चानुमा । अप्रसिद्धविशेषणत्वात्। न चार्थापत्तिः । अनुपपत्त्यभावात् ।" |
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| "text": "कार्याभावादेव कार्यान्वयिनि (कार्यान्वयान्वयिनि वा) व्युत्पत्तिरित्यादि दूरतो निरस्तम् । कार्यान्विते व्युत्पत्तिरिति वदतोऽकार्यान्विते व्युत्पत्तिरित्युक्ते किमुत्तरम् ? अध्याहार इत्युक्ते लोप इत्युत्तरम्। (अशेषसिद्धपदार्थ)अशेषसिद्धपदानामर्थलोपाल्लिङ्गाद्यर्थमात्रलोप(ल्लिङ्गाद्यर्थलोप) एव (व)गरीयान् । ‘हससि, हसामि’ इत्यादिसिद्धार्थ एव बालानां व्युत्पत्तेः । प्रथमप्राप्तत्वान्न(प्राप्तत्वाच्च न) तत्त्यागे कारणम् । तथैव व्युत्पत्तिदर्शनाच्च । अतः सिद्धार्थे प्रामाण्यसिद्धेश्च सिद्धं महागुणवत्वं विष्णोः ।" | | "lines": [ |
| | "कार्याभावादेव कार्यान्वयिनि (कार्यान्वयान्वयिनि वा) व्युत्पत्तिरित्यादि दूरतो निरस्तम् । कार्यान्विते व्युत्पत्तिरिति वदतोऽकार्यान्विते व्युत्पत्तिरित्युक्ते किमुत्तरम् ? अध्याहार इत्युक्ते लोप इत्युत्तरम्। (अशेषसिद्धपदार्थ)अशेषसिद्धपदानामर्थलोपाल्लिङ्गाद्यर्थमात्रलोप(ल्लिङ्गाद्यर्थलोप) एव (व)गरीयान् । ‘हससि, हसामि’ इत्यादिसिद्धार्थ एव बालानां व्युत्पत्तेः । प्रथमप्राप्तत्वान्न(प्राप्तत्वाच्च न) तत्त्यागे कारणम् । तथैव व्युत्पत्तिदर्शनाच्च । अतः सिद्धार्थे प्रामाण्यसिद्धेश्च सिद्धं महागुणवत्वं विष्णोः ।" |
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| "text": "विदा मघवन् विदा गातुमनुशंसिषो दिशः ।\nशिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरुवसो ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "हे\nमघवन्\nधनवन् यशस्विन् मखपत इति वा ।" | | "lines": [ |
| | "हे", |
| | "मघवन्", |
| | "धनवन् यशस्विन् मखपत इति वा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,789: |
Line 270: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘तं वा एतं मघ(ख)वन्तं सन्तं मघवानित्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः’\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्’(ऋ.सं.९.७५.५)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘तन्न आयातु मघाय । यशो वा मघम् । मघमनु प्रापत्सि’, ‘आ मामेतु मघम् । मघमनुप्रापत्सि । धनं वाव मघम्’\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतिभ्यः ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘तं वा एतं मघ(ख)वन्तं सन्तं मघवानित्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः’\u003C/span\u003E", |
| | ",", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्’(ऋ.सं.९.७५.५)\u003C/span\u003E", |
| | ",", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘तन्न आयातु मघाय । यशो वा मघम् । मघमनु प्रापत्सि’, ‘आ मामेतु मघम् । मघमनुप्रापत्सि । धनं वाव मघम्’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिश्रुतिभ्यः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,798: |
Line 286: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "गातुं\nत्वां स्तोतुम् ।\nविद\nवेदय इति सामान्यतोऽपेक्षिताशेषवेदनमुक्त्वा तात्कालिकापेक्षितार्थं प्रार्थयति-\nगातुं विदेति ॥\nत्वमेव\nअनुशं(शा)सिषो दिशः\nमार्गान् । आत्मनः स्तुतिप्रकारांस्त्वमेवोपदिशेत्यर्थः(रान् स्वयमेवोपदिशेत्यर्थः) ।\nपूर्वीणां\nभगवत्सम्प्रदायागतानां परमविद्यानामर्थे\nशिक्ष(क्षा)\n।\nशचीनां\nविद्यानां\nपते\n, वाचां पते इति वा ।\nपुरूवसो\nबहुवित्त बहुज्ञानेति वा। बहुषु वसति बहूनामावास इति वा ॥" | | "lines": [ |
| | "गातुं", |
| | "त्वां स्तोतुम् ।", |
| | "विद", |
| | "वेदय इति सामान्यतोऽपेक्षिताशेषवेदनमुक्त्वा तात्कालिकापेक्षितार्थं प्रार्थयति-", |
| | "गातुं विदेति ॥", |
| | "त्वमेव", |
| | "अनुशं(शा)सिषो दिशः", |
| | "मार्गान् । आत्मनः स्तुतिप्रकारांस्त्वमेवोपदिशेत्यर्थः(रान् स्वयमेवोपदिशेत्यर्थः) ।", |
| | "पूर्वीणां", |
| | "भगवत्सम्प्रदायागतानां परमविद्यानामर्थे", |
| | "शिक्ष(क्षा)", |
| | "।", |
| | "शचीनां", |
| | "विद्यानां", |
| | "पते", |
| | ", वाचां पते इति वा ।", |
| | "पुरूवसो", |
| | "बहुवित्त बहुज्ञानेति वा। बहुषु वसति बहूनामावास इति वा ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,807: |
Line 314: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "आभिष्ट्वमभिष्टिभिः प्रचेतन प्रचेतय।\nइन्द्र द्युम्नाय न इष एवाहि शक्रः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "आभिष्ट्वमभिष्टिभिः प्रचेतन प्रचेतय।", |
| | "इन्द्र द्युम्नाय न इष एवाहि शक्रः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,816: |
Line 326: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "आभिरभिष्टिभिः एवम्भूतैस्त्वत्पर्येषणैस्त्वत्प्रार्थनैः त्वं किञ्चिन्मदादिकं\nप्रचेतय\nप्रबोधय । प्रकृष्टचेतन सर्वज्ञ, परमात्मन् ।\nद्युम्नाय\nज्ञानाय वित्ताय यशसे वा ।\nइषे\nअन्नाय (च) नः प्रबोधय । एतादृशो हि\nशक्रः\n। शक्र एवेति वा । शक्तिरतिरूपत्वाच्छक्रः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "आभिरभिष्टिभिः एवम्भूतैस्त्वत्पर्येषणैस्त्वत्प्रार्थनैः त्वं किञ्चिन्मदादिकं", |
| | "प्रचेतय", |
| | "प्रबोधय । प्रकृष्टचेतन सर्वज्ञ, परमात्मन् ।", |
| | "द्युम्नाय", |
| | "ज्ञानाय वित्ताय यशसे वा ।", |
| | "इषे", |
| | "अन्नाय (च) नः प्रबोधय । एतादृशो हि", |
| | "शक्रः", |
| | "। शक्र एवेति वा । शक्तिरतिरूपत्वाच्छक्रः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,825: |
Line 345: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "राये वाजाय वज्रिवः शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे।\nमंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस आ याहि पिब मत्स्व ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "राये वाजाय वज्रिवः शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे।", |
| | "मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस आ याहि पिब मत्स्व ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,834: |
Line 357: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "राये\nवित्ताय\nवाजाय\nअन्नाय, वज्रिणम् इन्द्रं वर्तयतीति वज्रिवाः, नियामकत्वेन गच्छतीति वा।\nशविष्ठ\nबलवत्तम सुखवत्तमेति वा।\nऋञ्जसे\nप्रेरयसि सर्वान् । ‘मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस’ इत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः ।\nमत्स्व\nमदं कुरु ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "राये", |
| | "वित्ताय", |
| | "वाजाय", |
| | "अन्नाय, वज्रिणम् इन्द्रं वर्तयतीति वज्रिवाः, नियामकत्वेन गच्छतीति वा।", |
| | "शविष्ठ", |
| | "बलवत्तम सुखवत्तमेति वा।", |
| | "ऋञ्जसे", |
| | "प्रेरयसि सर्वान् । ‘मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस’ इत्यभ्यासस्तात्पर्यार्थः ।", |
| | "मत्स्व", |
| | "मदं कुरु ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,843: |
Line 377: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "विदा रायः सुवीर्यं भुवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु।\nमंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "विदा रायः सुवीर्यं भुवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु।", |
| | "मंहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,852: |
Line 389: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "विदा\nवेदय लम्भय\nरायः सुवीर्यं\nच ।\nवाजानां\nप्रजानां\nपतिः\nभुवः\nअभवः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘प्रजा वै वाजः’\u003C/span\u003E\nइति श्रुतेः ।\nवशान् अनु\nयथावशम् । ‘वश= इच्छायाम्’ इति धातोः यथावशं यथेच्छम् ।\nशूराणां\nसकाशाद्बलवत्तमः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "विदा", |
| | "वेदय लम्भय", |
| | "रायः सुवीर्यं", |
| | "च ।", |
| | "वाजानां", |
| | "प्रजानां", |
| | "पतिः", |
| | "भुवः", |
| | "अभवः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘प्रजा वै वाजः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति श्रुतेः ।", |
| | "वशान् अनु", |
| | "यथावशम् । ‘वश= इच्छायाम्’ इति धातोः यथावशं यथेच्छम् ।", |
| | "शूराणां", |
| | "सकाशाद्बलवत्तमः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,861: |
Line 414: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्वो अभि नो नय।\nइन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "यो मंहिष्ठो मघोनां चिकित्वो अभि नो नय।", |
| | "इन्द्रो विदे तमु स्तुषे वशी हि शक्रः ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,870: |
Line 426: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "मघोनां\nयशस्विनां महत्तमः ।\nचिकित्वः\nज्ञातः कर्तरिति वा।\nनः\nअभितः सर्वतो\nनय\n।\nइन्द्रो विदे\nसमस्तं व्यजानात् । तमेव\nस्तुषे\n॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "मघोनां", |
| | "यशस्विनां महत्तमः ।", |
| | "चिकित्वः", |
| | "ज्ञातः कर्तरिति वा।", |
| | "नः", |
| | "अभितः सर्वतो", |
| | "नय", |
| | "।", |
| | "इन्द्रो विदे", |
| | "समस्तं व्यजानात् । तमेव", |
| | "स्तुषे", |
| | "॥ ५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,879: |
Line 448: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् ।\nस नः पर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् ।", |
| | "स नः पर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,888: |
Line 460: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "ऊतये\nरक्षायै, अभिप्रायसिद्धये वा ।\nस नो द्विषः\nशत्रूनतिपारयतु, पापानि तमांसि वा ।\nक्रतुः\nज्ञानरूपः ।\nछन्दः\nइच्छारूपः । छन्द्यत्वाच्छादनत्वाद्वा ।\nऋतम्\nअशेषशास्त्रावगतम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "ऊतये", |
| | "रक्षायै, अभिप्रायसिद्धये वा ।", |
| | "स नो द्विषः", |
| | "शत्रूनतिपारयतु, पापानि तमांसि वा ।", |
| | "क्रतुः", |
| | "ज्ञानरूपः ।", |
| | "छन्दः", |
| | "इच्छारूपः । छन्द्यत्वाच्छादनत्वाद्वा ।", |
| | "ऋतम्", |
| | "अशेषशास्त्रावगतम् ॥ ६ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,897: |
Line 480: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् ।\nसनः पर्षदति द्विषः स नः पर्षदति स्रिधः ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् ।", |
| | "सनः पर्षदति द्विषः स नः पर्षदति स्रिधः ॥ ७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,906: |
Line 492: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "सातये\nलब्धये ।\nस्रिधो\nविनाशात्(न्) ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "सातये", |
| | "लब्धये ।", |
| | "स्रिधो", |
| | "विनाशात्(न्) ॥ ७ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,915: |
Line 506: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "पूर्वस्य यत्ते अद्रिवः सुम्न आधेहि नो वसो।\nपूर्तिः शविष्ठ शस्यत ईशे हि शक्रः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "पूर्वस्य यत्ते अद्रिवः सुम्न आधेहि नो वसो।", |
| | "पूर्तिः शविष्ठ शस्यत ईशे हि शक्रः ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,924: |
Line 518: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "पूर्वस्य\nअनादेः सतस्ते(अनादेः ते) सकाशात् यत्\nसुम्नं\nसुखं तस्मिन्\nन आधेहि\n। तव\nपूर्तिः\nशस्यते ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "पूर्वस्य", |
| | "अनादेः सतस्ते(अनादेः ते) सकाशात् यत्", |
| | "सुम्नं", |
| | "सुखं तस्मिन्", |
| | "न आधेहि", |
| | "। तव", |
| | "पूर्तिः", |
| | "शस्यते ॥ ८ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,933: |
Line 536: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "नूनं तं नव्यं सन्यसे प्रभो जनस्य वृत्रहन् । समन्येषु ब्रवावहै शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयाः ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,942: |
Line 547: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "तन्नव्यं\nस्तुत्यं ब्रह्म । तत्सम्यक् हृदि न्यसे(सन्यसे)\nजनस्य\nउपदेशेन । त्वत्स्वरूपेषु त्वं चाहं च सम्ब्रवावहै ।\nगोषु\nज्ञानेषु\nगच्छति\nज्ञानविषयो भवति ।\nसुशेवः\nसुसुखः समाधिकरहितोऽद्वयः(तः अद्वयः) ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "तन्नव्यं", |
| | "स्तुत्यं ब्रह्म । तत्सम्यक् हृदि न्यसे(सन्यसे)", |
| | "जनस्य", |
| | "उपदेशेन । त्वत्स्वरूपेषु त्वं चाहं च सम्ब्रवावहै ।", |
| | "गोषु", |
| | "ज्ञानेषु", |
| | "गच्छति", |
| | "ज्ञानविषयो भवति ।", |
| | "सुशेवः", |
| | "सुसुखः समाधिकरहितोऽद्वयः(तः अद्वयः) ॥ ९ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,951: |
Line 567: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "एवाह्येवैवाह्यग्नाँ३ इ । एवाह्येवैवाहीन्द्रँ । एवाह्येवैवाहि विष्णाँ३ उ । एवाह्येवैवाहि पूषन् । एवा ह्येवैवाहि देवाः। एवा हि शक्रो वशी हि शक्रो वशाँ अनु ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "एवाह्येवैवाह्यग्नाँ३ इ । एवाह्येवैवाहीन्द्रँ । एवाह्येवैवाहि विष्णाँ३ उ । एवाह्येवैवाहि पूषन् । एवा ह्येवैवाहि देवाः। एवा हि शक्रो वशी हि शक्रो वशाँ अनु ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,960: |
Line 578: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘एवाह्येवैवाहि’ इत्यग्न्यादिदेवतानां संवादरूपेणोक्तमर्थमतिशयेनावधारयति । अभ्यासो हि तात्पर्यार्थः । एवं हि(एवा हि) एवमेव हीत्यर्थः । ‘विनिश्चिते तु संवादे विभागो रङ्ग एव च’ इति शब्दनिर्णये । अतो ‘अग्नाइ’ इत्यादि । एवमेव\nहि शक्रः वशाननु\nयथावशं स्वतन्त्रो वर्तत इत्यर्थः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "‘एवाह्येवैवाहि’ इत्यग्न्यादिदेवतानां संवादरूपेणोक्तमर्थमतिशयेनावधारयति । अभ्यासो हि तात्पर्यार्थः । एवं हि(एवा हि) एवमेव हीत्यर्थः । ‘विनिश्चिते तु संवादे विभागो रङ्ग एव च’ इति शब्दनिर्णये । अतो ‘अग्नाइ’ इत्यादि । एवमेव", |
| | "हि शक्रः वशाननु", |
| | "यथावशं स्वतन्त्रो वर्तत इत्यर्थः ॥ १० ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,969: |
Line 591: |
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| "text": "आयोमन्याय मन्यव उपोमन्याय मन्यवे । उपेहि विश्वध ॥ विदा मघवन्विदो३म् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "आयोमन्याय मन्यव उपोमन्याय मन्यवे । उपेहि विश्वध ॥ विदा मघवन्विदो३म् ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,978: |
Line 602: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘अय पय= गतौ’ इति धातोः आयो इत्यायतिः । उपो इतिवदतिशयार्थे ओकारः । ‘ओ=अतिशये’ इति च सूत्रम् । आयो जानातीत्यायोमन्यः, समीपस्थमपि जानातीत्युपोमन्यः । अन्येषामिन्द्रियाणां पराङ्मुखत्वान्न ह्यान्तरं जानन्तीति । अयं त्वान्तरमप्यापरोक्ष्येण पश्यति । अयनेन गमनेन प्राप्यं दूरस्थम् आयो इति वा । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोर्मन्युरिति ज्ञानी। बाह्यज्ञाय ज्ञानिने आन्तरज्ञाय ज्ञानिने इत्यभ्यासो(ऽतितात्पर्यार्थः) हि तात्पर्यार्थः। एवंविधं मद्गतं त्वामुद्दिश्यैव\nउपेहि विश्वध\nविश्वधारक । समीपतो दूरतश्च त्वां मन्यमानाय मह्यं\nमन्यवे\nज्ञानाय मामुपेहीति वा ।" | | "lines": [ |
| | "‘अय पय= गतौ’ इति धातोः आयो इत्यायतिः । उपो इतिवदतिशयार्थे ओकारः । ‘ओ=अतिशये’ इति च सूत्रम् । आयो जानातीत्यायोमन्यः, समीपस्थमपि जानातीत्युपोमन्यः । अन्येषामिन्द्रियाणां पराङ्मुखत्वान्न ह्यान्तरं जानन्तीति । अयं त्वान्तरमप्यापरोक्ष्येण पश्यति । अयनेन गमनेन प्राप्यं दूरस्थम् आयो इति वा । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोर्मन्युरिति ज्ञानी। बाह्यज्ञाय ज्ञानिने आन्तरज्ञाय ज्ञानिने इत्यभ्यासो(ऽतितात्पर्यार्थः) हि तात्पर्यार्थः। एवंविधं मद्गतं त्वामुद्दिश्यैव", |
| | "उपेहि विश्वध", |
| | "विश्वधारक । समीपतो दूरतश्च त्वां मन्यमानाय मह्यं", |
| | "मन्यवे", |
| | "ज्ञानाय मामुपेहीति वा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,987: |
Line 617: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padmapurana-id\"\u003E‘समीपे दूरतोऽभिज्ञं(दूरतो ज्ञं) त्वामुद्दिश्यैव मद्गतम् ।\u003Cbr/\u003Eएहि विष्णो न मे शक्तिस्त्वदाह्वाने हि मामुप ॥\u003Cbr/\u003Eइति ब्रह्माऽस्तुवद्विष्णुं तन्नाभ्युत्थितपद्मगः’\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padmapurana-id\"\u003E‘समीपे दूरतोऽभिज्ञं(दूरतो ज्ञं) त्वामुद्दिश्यैव मद्गतम् ।\u003Cbr/\u003Eएहि विष्णो न मे शक्तिस्त्वदाह्वाने हि मामुप ॥\u003Cbr/\u003Eइति ब्रह्माऽस्तुवद्विष्णुं तन्नाभ्युत्थितपद्मगः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति पाद्मे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 4,996: |
Line 629: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skandapurana-id\"\u003E‘समीपे दूरतश्चैव ध्यायन्तं त्वा सदा (प्र)विभो ।\u003Cbr/\u003Eमामेहि ज्ञानदानायेत्याह गाधिसुतो हरिम्॥’\u003C/span\u003E\nइति स्कान्दे ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Skandapurana-id\"\u003E‘समीपे दूरतश्चैव ध्यायन्तं त्वा सदा (प्र)विभो ।\u003Cbr/\u003Eमामेहि ज्ञानदानायेत्याह गाधिसुतो हरिम्॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति स्कान्दे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,005: |
Line 641: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Manyasamhita-id\"\u003E‘ओतमस्मिन् जगद्यस्मादोमित्युक्तो हरिसः सदा ।\u003Cbr/\u003Eतमेव जगदाधारं यतयः समुपासते॥’\u003C/span\u003E\nइति मान्यसंहितायाम् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Manyasamhita-id\"\u003E‘ओतमस्मिन् जगद्यस्मादोमित्युक्तो हरिसः सदा ।\u003Cbr/\u003Eतमेव जगदाधारं यतयः समुपासते॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति मान्यसंहितायाम् ॥ ११ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,014: |
Line 653: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘इन्द्रो वा एताभिर्महानात्मानं निरमिमीत’\u003C/span\u003E\nइत्यस्याप्युक्त एवार्थः । निर्माणं नामाऽत्मनस्तद्व्याख्यानेन ख्या(स्था)पनम् । न ह्यन्यथा तासां करणत्वं भवति ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘इन्द्रो वा एताभिर्महानात्मानं निरमिमीत’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यस्याप्युक्त एवार्थः । निर्माणं नामाऽत्मनस्तद्व्याख्यानेन ख्या(स्था)पनम् । न ह्यन्यथा तासां करणत्वं भवति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,023: |
Line 665: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्’\u003C/span\u003E\nइति (च) श्रुतिः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id\"\u003E‘त्रीणि पदा निहिता गुहासु यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्(यस्तद्वेद सवितुः पिता सत् )’(महानारायणोपनिषत्.१.१५)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyaaranyaka-id\"\u003E‘स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न विचेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स इमा चिकेत यस्ता विजानात् (सवितुः पिता सत्)स पितुष्पितासत्।’(तैत्तिरीयारण्यकम्.१.११)\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतिभ्यो विज्ञानमेव तन्निर्माणम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः’(ऋ.सं.४.५८.४)\u003C/span\u003E\nइत्यादेर्विज्ञापनं वा ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्’\u003C/span\u003E", |
| | "इति (च) श्रुतिः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahanarayanopanishat-id\"\u003E‘त्रीणि पदा निहिता गुहासु यस्तद्वेद स पितुष्पितासत्(यस्तद्वेद सवितुः पिता सत् )’(महानारायणोपनिषत्.१.१५)\u003C/span\u003E", |
| | ",", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyaaranyaka-id\"\u003E‘स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न विचेतदन्धः । कविर्यः पुत्रः स इमा चिकेत यस्ता विजानात् (सवितुः पिता सत्)स पितुष्पितासत्।’(तैत्तिरीयारण्यकम्.१.११)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिश्रुतिभ्यो विज्ञानमेव तन्निर्माणम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः’(ऋ.सं.४.५८.४)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादेर्विज्ञापनं वा ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,032: |
Line 683: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘प्रचेतन प्रचेतय’(ऐ.आ.४.१.१)\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘आयाहि पिब मत्स्व’ (ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘सुम्न आ धेहि नो वसो’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E\nइत्युपसर्गाः । अंशा अप्यंश्यपेक्षयोपसर्गा भवन्ति । उपसृष्टत्वादुपसर्गाः ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘प्रचेतन प्रचेतय’(ऐ.आ.४.१.१)\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘आयाहि पिब मत्स्व’ (ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘सुम्न आ धेहि नो वसो’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्युपसर्गाः । अंशा अप्यंश्यपेक्षयोपसर्गा भवन्ति । उपसृष्टत्वादुपसर्गाः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,041: |
Line 701: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘अन्तर्गतं बहिर्गञ्च(र्गतञ्च) द्विधा स्यादुपसर्जनम् । \u003Cbr/\u003Eहस्तवद्धेतिवच्चैव पदानां चोपसर्गवत्’\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘अन्तर्गतं बहिर्गञ्च(र्गतञ्च) द्विधा स्यादुपसर्जनम् । \u003Cbr/\u003Eहस्तवद्धेतिवच्चैव पदानां चोपसर्गवत्’\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,050: |
Line 713: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘अधत्तान्यञ्जठरे प्रेम रिच्यत 'प्रचेतन'’ ॥ १ ॥\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Samaveda-id\"\u003E‘दाता राधस्तुवते काम्यं वसु 'प्रचेतय'’(सामवेद.३.६)\u003C/span\u003E\n॥ २ ॥\n‘अस्माकं बोधि चोदिता 'आ याहि पिब मत्स्व'’ ॥ ३ ॥\n‘तं त्वा परिष्वजामहे 'क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्'’ ॥ ४ ॥\n‘या ते रातिर्ददिर्वसु 'सुम्न आधेहि नो वसो'’ ॥ ५ ॥ इत्युपसृजति ॥\n‘अशेषमहानाम्न्यर्थसंस्मरणपरिज्ञानपूर्वकमुपसर्गसंयोजनं कर्तव्यम्’ इत्येदर्थत्वेन महानाम्नीप्रशंसा क्रियते । अन्यथा तावन्मात्रप्रशंसामृते अशेषमहानाम्नीप्रशंसाया व्यर्थत्वात् । (त्र्युच)तृचविभागेन ‘विदा मघवन्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘तमूतये’(ऐ.आ(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘नूनम्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) इति वा तिस्त्रो महानाम्न्यः ।" | | "lines": [ |
| | "‘अधत्तान्यञ्जठरे प्रेम रिच्यत 'प्रचेतन'’ ॥ १ ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Samaveda-id\"\u003E‘दाता राधस्तुवते काम्यं वसु 'प्रचेतय'’(सामवेद.३.६)\u003C/span\u003E", |
| | "॥ २ ॥", |
| | "‘अस्माकं बोधि चोदिता 'आ याहि पिब मत्स्व'’ ॥ ३ ॥", |
| | "‘तं त्वा परिष्वजामहे 'क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्'’ ॥ ४ ॥", |
| | "‘या ते रातिर्ददिर्वसु 'सुम्न आधेहि नो वसो'’ ॥ ५ ॥ इत्युपसृजति ॥", |
| | "‘अशेषमहानाम्न्यर्थसंस्मरणपरिज्ञानपूर्वकमुपसर्गसंयोजनं कर्तव्यम्’ इत्येदर्थत्वेन महानाम्नीप्रशंसा क्रियते । अन्यथा तावन्मात्रप्रशंसामृते अशेषमहानाम्नीप्रशंसाया व्यर्थत्वात् । (त्र्युच)तृचविभागेन ‘विदा मघवन्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘तमूतये’(ऐ.आ(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) ‘नूनम्’(ऐ.आ.(बह्वृचब्राह्मणारण्यककाण्डे)४.१.१) इति वा तिस्त्रो महानाम्न्यः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,059: |
Line 730: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘प्रथमा या महानाम्नी तद्वाच्यः पार्थिवो हरिः ।\u003Cbr/\u003Eद्वितीयाया आन्तरिक्ष्यस्तृतीयाया द्युगः प्रभुः’\u003C/span\u003E\nइत्यृक्संहितायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘प्रथमा या महानाम्नी तद्वाच्यः पार्थिवो हरिः ।\u003Cbr/\u003Eद्वितीयाया आन्तरिक्ष्यस्तृतीयाया द्युगः प्रभुः’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यृक्संहितायाम् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,068: |
Line 742: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘(त्र्युचा)तृचास्तिस्त्रो महानाम्न्यः पञ्चर्चा प्रथमा परा ।\u003Cbr/\u003E(त्र्युचा)तृचा द्व्यृचा च निगदैस्तार्तीया सप्तभिर्युता ।\u003Cbr/\u003Eइति द्वेधा(त्रेधा) विभागः स्याज्जपध्यानादिकर्मसु’\u003C/span\u003E\nइति च ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘(त्र्युचा)तृचास्तिस्त्रो महानाम्न्यः पञ्चर्चा प्रथमा परा ।\u003Cbr/\u003E(त्र्युचा)तृचा द्व्यृचा च निगदैस्तार्तीया सप्तभिर्युता ।\u003Cbr/\u003Eइति द्वेधा(त्रेधा) विभागः स्याज्जपध्यानादिकर्मसु’\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,077: |
Line 754: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘त्रिलोकगेन हरिणा निर्मितः षोळशीक्रतुः ।\u003Cbr/\u003Eएवं ज्ञात्वा हरिं तं च कर्म कुर्वन्न जायते’\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्ते ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘त्रिलोकगेन हरिणा निर्मितः षोळशीक्रतुः ।\u003Cbr/\u003Eएवं ज्ञात्वा हरिं तं च कर्म कुर्वन्न जायते’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्ते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,086: |
Line 766: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘एवैवाहि(एवा ह्येवैवा हि)’(इत्यस्यार्थो)इत्युपसर्गस्यार्थोऽप्युक्तावधारणरूपत्वात् पूर्वोक्तार्थज्ञानं विना न स्मर्तुं शक्यते । एवं निर्मितेन षोळशिनर्द्धो (राध्नो) भवत्येवंवित् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘एवैवाहि(एवा ह्येवैवा हि)’(इत्यस्यार्थो)इत्युपसर्गस्यार्थोऽप्युक्तावधारणरूपत्वात् पूर्वोक्तार्थज्ञानं विना न स्मर्तुं शक्यते । एवं निर्मितेन षोळशिनर्द्धो (राध्नो) भवत्येवंवित् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,095: |
Line 777: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे ।\nधिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१)" | | "lines": [ |
| | "प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे ।", |
| | "धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,104: |
Line 789: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "प्रप्र वः\n। हे ऋत्विजः प्रजा वा वः\nत्रिष्टुभमिषं\nत्रिष्टुभाख्यमन्नम् इन्द्रः परमेश्वरः सोमाय आ\nविवासति\n।\nपुरन्ध्या धिया\nअशेषप्राणिदेहाश्रयया स्वबुद्ध्या\nप्रप्र\nप्रकर्षेण प्रकर्षेणातितरां (शं)शस्यमाना त्रिष्टुप् प्रीतिं करोति सोमपानार्थमित्यर्थः ।\nमन्दद्वीराय\nतस्य वीरस्य परमेश्वरस्य मदं प्रीतिं करोतीति मन्दद्वीरः सोमः । न त्वात्मप्रयोजनाय प्रीतिं करोति, किं तर्हि?\nवो मेधसातये\nयज्ञसिद्ध्यर्थम् । ‘व’ इति गुरुत्वाद्, ईश्वरं प्रत्येव वा बहुवचनम् । तदा वः अन्नं त्रिष्टुभं वो मेधसातये भवद्दैवत्ययज्ञसिद्ध्यर्थं भवान् प्रप्राविवासतीत्यर्थः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रप्र वः", |
| | "। हे ऋत्विजः प्रजा वा वः", |
| | "त्रिष्टुभमिषं", |
| | "त्रिष्टुभाख्यमन्नम् इन्द्रः परमेश्वरः सोमाय आ", |
| | "विवासति", |
| | "।", |
| | "पुरन्ध्या धिया", |
| | "अशेषप्राणिदेहाश्रयया स्वबुद्ध्या", |
| | "प्रप्र", |
| | "प्रकर्षेण प्रकर्षेणातितरां (शं)शस्यमाना त्रिष्टुप् प्रीतिं करोति सोमपानार्थमित्यर्थः ।", |
| | "मन्दद्वीराय", |
| | "तस्य वीरस्य परमेश्वरस्य मदं प्रीतिं करोतीति मन्दद्वीरः सोमः । न त्वात्मप्रयोजनाय प्रीतिं करोति, किं तर्हि?", |
| | "वो मेधसातये", |
| | "यज्ञसिद्ध्यर्थम् । ‘व’ इति गुरुत्वाद्, ईश्वरं प्रत्येव वा बहुवचनम् । तदा वः अन्नं त्रिष्टुभं वो मेधसातये भवद्दैवत्ययज्ञसिद्ध्यर्थं भवान् प्रप्राविवासतीत्यर्थः ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,113: |
Line 813: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् ।\nपतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.२)" | | "lines": [ |
| | "नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् ।", |
| | "पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.२)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,122: |
Line 825: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "ओदतीनाम्\nउन्दनकर्त्रीणां\nवः\nअपाम्, भवदीयानां\nपतिं वः\nपुरुषं प्राणं\nनदं\nनदनकर्तारं प्रति\nइषुध्यसि\nपतिर्भवसि । सृष्टौ सृष्टौ यो यः प्राणस्तं तं प्रति पतिर्भवसीति नदमिति पुनर्वचनम् ।\nयोयुवतीनां\nगमनशीलानाम् आकाशे पोप्लूयमानानाम्\nअघ्न्यानां\nधूमरूपेणादाह्यानां रेतोरूपेणाजराणां वा,\nधेनूनां\nजगत्पोषकाणाम् । ‘धिनु=पुष्टौ’ इति धातोः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘ता नदेन विहरति’(ऐ.आ.१.३.५)\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतेः । पयसा सेचकानां देशाद्देशान्तरगमनशीलानाम्\nअघ्न्यानां\nहन्तुमयोग्यानां\nधेनूनां\nगवां\nपतिं\nवायुं प्रति\nइषुध्यसि\nइति वा ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘वायुर्वाव गवां पतिः’\u003C/span\u003E\nइति श्रुतेः(तिः) । धेनुशब्दाच्च ।\nओदतीनां\nभक्त्या सेचकानाम्,\nयोयुवतीनाम्\nअतिशयेनाऽत्मतत्वावगमकानाम्,\nअघ्न्यानां\nनित्यानां\nधेनूनां\nधर्मार्थकामपोषकाणां वाचां\nपतिं\nवायुं प्रति पतिर्भवसीति वा ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id\"\u003E‘वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनासः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारसः स्वधाकार(स्तस्यै) इति । तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरः। तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः’(बृ.उ.७.१०)\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "ओदतीनाम्", |
| | "उन्दनकर्त्रीणां", |
| | "वः", |
| | "अपाम्, भवदीयानां", |
| | "पतिं वः", |
| | "पुरुषं प्राणं", |
| | "नदं", |
| | "नदनकर्तारं प्रति", |
| | "इषुध्यसि", |
| | "पतिर्भवसि । सृष्टौ सृष्टौ यो यः प्राणस्तं तं प्रति पतिर्भवसीति नदमिति पुनर्वचनम् ।", |
| | "योयुवतीनां", |
| | "गमनशीलानाम् आकाशे पोप्लूयमानानाम्", |
| | "अघ्न्यानां", |
| | "धूमरूपेणादाह्यानां रेतोरूपेणाजराणां वा,", |
| | "धेनूनां", |
| | "जगत्पोषकाणाम् । ‘धिनु=पुष्टौ’ इति धातोः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘ता नदेन विहरति’(ऐ.आ.१.३.५)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिश्रुतेः । पयसा सेचकानां देशाद्देशान्तरगमनशीलानाम्", |
| | "अघ्न्यानां", |
| | "हन्तुमयोग्यानां", |
| | "धेनूनां", |
| | "गवां", |
| | "पतिं", |
| | "वायुं प्रति", |
| | "इषुध्यसि", |
| | "इति वा ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘वायुर्वाव गवां पतिः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति श्रुतेः(तिः) । धेनुशब्दाच्च ।", |
| | "ओदतीनां", |
| | "भक्त्या सेचकानाम्,", |
| | "योयुवतीनाम्", |
| | "अतिशयेनाऽत्मतत्वावगमकानाम्,", |
| | "अघ्न्यानां", |
| | "नित्यानां", |
| | "धेनूनां", |
| | "धर्मार्थकामपोषकाणां वाचां", |
| | "पतिं", |
| | "वायुं प्रति पतिर्भवसीति वा ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id\"\u003E‘वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनासः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारसः स्वधाकार(स्तस्यै) इति । तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरः। तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः’(बृ.उ.७.१०)\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,131: |
Line 875: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः ।\nजन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.३)" | | "lines": [ |
| | "ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः ।", |
| | "जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.३)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,140: |
Line 887: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "ताः पृश्नयः\nआपो गावो वाचो वा, अस्य\nसूददोहसः\nप्राणस्य वायुस्थस्य परमेश्वरस्य\nसोमं श्रीणन्ति\n। अद्भिर्हि संसृष्टो भवति। सोमः पयआदिना च (शृ)श्रितो भवति\\ मन्त्रैर्वा गृह्यते ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘अथ सूददोहाः प्राणो वै सूददोहाः’(ऐ.आ.१.४.१)\u003C/span\u003E\nइति श्रुतिश्च । शोभनमुदं कर्म ज्ञानं वा दोग्धीति सूददोहाः । उदेति उच्चो भवत्यनेन पुरुष इत्युदं ज्ञानादि । ‘मनो वाव सोमः’ तद् वाचः श्रीणन्ति स्वार्थैः । प्रश्नयोग्यत्वात्\nपृश्नयो\nवाचः, प्रशंसनरूपत्वात् प्रशंसनीयत्वाद्वा । प्रशंसनीयत्वमेवापां गवां च ।\nदेवानां\nजन्मनि यज्ञे । तत्र हि तेषामभिव्यक्तिः पूर्वं ज्ञाने वा। विशः प्रजाश्च श्रीणन्ति । मुख्यतस्ता एव श्रीणन्तीति चशब्दवर्जनम् ।\nदिवस्त्रिषु आरोचनेषु\nआदित्यचन्द्रविद्युत्पर्यन्तं स्थितानां देवानां जन्मनि ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘यज्ञो वै देवजन्म तत्र हि देवाः प्रादुर्भवन्त्या सूर्याचन्द्रमसावा विद्युतं ते वै लोकानधिश्रिताः’\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतेः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव परमुपगच्छति सैषा ब्रह्मलोके विराजते’\u003C/span\u003E\nइत्यादि श्रुतेर्द्यौरेव विद्युत् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "ताः पृश्नयः", |
| | "आपो गावो वाचो वा, अस्य", |
| | "सूददोहसः", |
| | "प्राणस्य वायुस्थस्य परमेश्वरस्य", |
| | "सोमं श्रीणन्ति", |
| | "। अद्भिर्हि संसृष्टो भवति। सोमः पयआदिना च (शृ)श्रितो भवति\\ मन्त्रैर्वा गृह्यते ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Aitareyaaranyaka-id\"\u003E‘अथ सूददोहाः प्राणो वै सूददोहाः’(ऐ.आ.१.४.१)\u003C/span\u003E", |
| | "इति श्रुतिश्च । शोभनमुदं कर्म ज्ञानं वा दोग्धीति सूददोहाः । उदेति उच्चो भवत्यनेन पुरुष इत्युदं ज्ञानादि । ‘मनो वाव सोमः’ तद् वाचः श्रीणन्ति स्वार्थैः । प्रश्नयोग्यत्वात्", |
| | "पृश्नयो", |
| | "वाचः, प्रशंसनरूपत्वात् प्रशंसनीयत्वाद्वा । प्रशंसनीयत्वमेवापां गवां च ।", |
| | "देवानां", |
| | "जन्मनि यज्ञे । तत्र हि तेषामभिव्यक्तिः पूर्वं ज्ञाने वा। विशः प्रजाश्च श्रीणन्ति । मुख्यतस्ता एव श्रीणन्तीति चशब्दवर्जनम् ।", |
| | "दिवस्त्रिषु आरोचनेषु", |
| | "आदित्यचन्द्रविद्युत्पर्यन्तं स्थितानां देवानां जन्मनि ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘यज्ञो वै देवजन्म तत्र हि देवाः प्रादुर्भवन्त्या सूर्याचन्द्रमसावा विद्युतं ते वै लोकानधिश्रिताः’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादिश्रुतेः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव परमुपगच्छति सैषा ब्रह्मलोके विराजते’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादि श्रुतेर्द्यौरेव विद्युत् ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,149: |
Line 915: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।\nअर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/८)" | | "lines": [ |
| | "अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।", |
| | "अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/८)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,158: |
Line 927: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अर्चनं यज्ञादि, प्रार्चनं ज्ञानध्यानादि ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)\u003C/span\u003E\nइति भगवद्वचनात् । प्रिययज्ञा\nअर्चत\nप्रियज्ञानाः\nप्रार्चत\n।\nपुत्रका\nअल्पज्ञाना अप्यर्चत ।" | | "lines": [ |
| | "अर्चनं यज्ञादि, प्रार्चनं ज्ञानध्यानादि ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)\u003C/span\u003E", |
| | "इति भगवद्वचनात् । प्रिययज्ञा", |
| | "अर्चत", |
| | "प्रियज्ञानाः", |
| | "प्रार्चत", |
| | "।", |
| | "पुत्रका", |
| | "अल्पज्ञाना अप्यर्चत ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,167: |
Line 946: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eजोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तस्समाचरन् ॥’(भ.गी.२.२६)\u003C/span\u003E\nइति च ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।\u003Cbr/\u003Eजोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तस्समाचरन् ॥’(भ.गी.२.२६)\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,176: |
Line 958: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "उतशब्दाज्ज्ञानिनामप्यर्चनं युक्तम् । स्वाश्रमानुसारेणेति ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यस्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता’(ऋ.सं.१.१५६.१)\u003C/span\u003E\nइति श्रुतेः । किं तदर्चनीयम् ?\nधृष्णु\nधृष्टं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यम् । पुरं देहं\nनार्चत\n।" | | "lines": [ |
| | "उतशब्दाज्ज्ञानिनामप्यर्चनं युक्तम् । स्वाश्रमानुसारेणेति ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यस्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता’(ऋ.सं.१.१५६.१)\u003C/span\u003E", |
| | "इति श्रुतेः । किं तदर्चनीयम् ?", |
| | "धृष्णु", |
| | "धृष्टं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यम् । पुरं देहं", |
| | "नार्चत", |
| | "।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 975: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथस्सुमध्यमे ।\u003Cbr/\u003Eप्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने ॥’(भाग.४.३.२२)\u003C/span\u003E\nइति भागवते ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथस्सुमध्यमे ।\u003Cbr/\u003Eप्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने ॥’(भाग.४.३.२२)\u003C/span\u003E", |
| | "इति भागवते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,194: |
Line 987: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vyasasmruti-id\"\u003E‘सदेहमानिहरये प्रणमेत्केवलाय वा । \u003Cbr/\u003Eन देहाय न तन्मानपराय च कथञ्चन ॥’ इति व्यासस्मृतौ\u003C/span\u003E\n।\nपुनरर्चतेति तात्पर्यार्थः(र्थे) ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vyasasmruti-id\"\u003E‘सदेहमानिहरये प्रणमेत्केवलाय वा । \u003Cbr/\u003Eन देहाय न तन्मानपराय च कथञ्चन ॥’ इति व्यासस्मृतौ\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "पुनरर्चतेति तात्पर्यार्थः(र्थे) ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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Line 1,000: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९)" | | "lines": [ |
| | "अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्वणत् । पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम् ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/९)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,212: |
Line 1,011: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "गर्गरगोधापिङ्गादीनां घोषा अपि नादमात्रव्यञ्जकत्वेन(नादव्यञ्जकत्वेन) भगवद्वाचका एवेत्याह-\nअव स्वराति गर्गर इत्यादिना॥\nएतत्समस्तमिन्द्रायैवेत्यर्थः । ब्रह्म वेदो विशेषत इन्द्रायैवोद्यतः ।\nगर्गर\nइति पादभूषण-महामत्रक-दधिपात्र-हस्तिहस्तानां नाम ।\nपिङ्गा\nचकोरी । अवपरीत्यल्पाधिक्यादिविशेषोऽपि तद्वाचक एवेति ज्ञापनाय ।\nचनिष्कदद्\nइत्यनुकरण(नुकार)शब्दः । सनिष्वणदित्यतिशयार्थे ।" | | "lines": [ |
| | "गर्गरगोधापिङ्गादीनां घोषा अपि नादमात्रव्यञ्जकत्वेन(नादव्यञ्जकत्वेन) भगवद्वाचका एवेत्याह-", |
| | "अव स्वराति गर्गर इत्यादिना॥", |
| | "एतत्समस्तमिन्द्रायैवेत्यर्थः । ब्रह्म वेदो विशेषत इन्द्रायैवोद्यतः ।", |
| | "गर्गर", |
| | "इति पादभूषण-महामत्रक-दधिपात्र-हस्तिहस्तानां नाम ।", |
| | "पिङ्गा", |
| | "चकोरी । अवपरीत्यल्पाधिक्यादिविशेषोऽपि तद्वाचक एवेति ज्ञापनाय ।", |
| | "चनिष्कदद्", |
| | "इत्यनुकरण(नुकार)शब्दः । सनिष्वणदित्यतिशयार्थे ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,221: |
Line 1,030: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव(प्राण ऋच इत्येव विद्यात्)’\u003C/span\u003E\nइति (च) श्रुतिः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdatattve-id\"\u003E‘दध्नो मथनशब्दश्चाप्यन्तर्नादस्वरूपतः ।\u003Cbr/\u003E भीषकत्वं हरेर्ब्रूयादन्तर्नादो हि भीषणे ।\u003Cbr/\u003E गजबृंहितमप्येवं धिक्कारसहितं वदेत् । \u003Cbr/\u003Eस्वरितेन समायोगाद् धिक्कृतौ स्वरितो यतः ।\u003Cbr/\u003E महामत्रं(मन्त्रं) जलाद्यैश्च युक्तमेतादृशं वदेत् ।\u003Cbr/\u003E पादभूषा च धिक्कारं तत्कृतं स्वरितं(तो) वदेत् ।\u003Cbr/\u003E अद्भुतत्वं हरेर्वक्ति पिङ्गाकण्ठगशब्दवत् ।\u003Cbr/\u003E तामेवाद्भुततां वक्ति गृहगोधा पराऽपि च’\u003C/span\u003E\nइति शब्दतत्वे ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव(प्राण ऋच इत्येव विद्यात्)’\u003C/span\u003E", |
| | "इति (च) श्रुतिः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdatattve-id\"\u003E‘दध्नो मथनशब्दश्चाप्यन्तर्नादस्वरूपतः ।\u003Cbr/\u003E भीषकत्वं हरेर्ब्रूयादन्तर्नादो हि भीषणे ।\u003Cbr/\u003E गजबृंहितमप्येवं धिक्कारसहितं वदेत् । \u003Cbr/\u003Eस्वरितेन समायोगाद् धिक्कृतौ स्वरितो यतः ।\u003Cbr/\u003E महामत्रं(मन्त्रं) जलाद्यैश्च युक्तमेतादृशं वदेत् ।\u003Cbr/\u003E पादभूषा च धिक्कारं तत्कृतं स्वरितं(तो) वदेत् ।\u003Cbr/\u003E अद्भुतत्वं हरेर्वक्ति पिङ्गाकण्ठगशब्दवत् ।\u003Cbr/\u003E तामेवाद्भुततां वक्ति गृहगोधा पराऽपि च’\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दतत्वे ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,230: |
Line 1,044: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "आयत्पतन्त्येन्यस्सुदुघा अनपस्फुरः ।\nअपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१०)" | | "lines": [ |
| | "आयत्पतन्त्येन्यस्सुदुघा अनपस्फुरः ।", |
| | "अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१०)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 1,056: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "यच्च एन्यो नद्य आपतन्ति तद्धोषश्चेन्द्रवाचकः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘नदीसमुद्रघोषाश्च नादत्वाच्छ्रैष्ठ्यवाचकाः।\u003Cbr/\u003E नादो हि श्रैष्ठ्यवाची स्यादेवं घोषाः परेपि च’\u003C/span\u003E\nइति च ।\nतदर्थं च नद्य आपतन्ति ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vaihayasasaamhita-id\"\u003E‘भूतादिभूतोम्बुनिधानमध्ये भूत्वा हरिः सर्वहरोऽतिधाम्ना । अगाधमम्भो विदधाति भस्म यो वाडवाग्निर्नृहरिर्विचिन्त्यः॥’\u003C/span\u003E\nइति वैहायससंहितायाम् ।\nसुदुघाः\nसुष्ठु अपां दोहनकर्त्र्यः । स्फुरणापगमनमासां नास्तीति\nअनपस्फुरः\n। नित्यचलनस्वभावाः । अपगतस्फुरणत्वेन\nसोमं\nगृभायत\n। अचलत्वेन मनो वा ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यच्च एन्यो नद्य आपतन्ति तद्धोषश्चेन्द्रवाचकः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘नदीसमुद्रघोषाश्च नादत्वाच्छ्रैष्ठ्यवाचकाः।\u003Cbr/\u003E नादो हि श्रैष्ठ्यवाची स्यादेवं घोषाः परेपि च’\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।", |
| | "तदर्थं च नद्य आपतन्ति ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vaihayasasaamhita-id\"\u003E‘भूतादिभूतोम्बुनिधानमध्ये भूत्वा हरिः सर्वहरोऽतिधाम्ना । अगाधमम्भो विदधाति भस्म यो वाडवाग्निर्नृहरिर्विचिन्त्यः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति वैहायससंहितायाम् ।", |
| | "सुदुघाः", |
| | "सुष्ठु अपां दोहनकर्त्र्यः । स्फुरणापगमनमासां नास्तीति", |
| | "अनपस्फुरः", |
| | "। नित्यचलनस्वभावाः । अपगतस्फुरणत्वेन", |
| | "सोमं", |
| | "गृभायत", |
| | "। अचलत्वेन मनो वा ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,248: |
Line 1,079: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३)" | | "lines": [ |
| | "यो व्यतीँरफाणयत्सुयुक्ताँ उप दाशुषे । तक्वो नेता तदिद्वषुरुपमा यो अमुच्यत ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१३)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,257: |
Line 1,090: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "व्यतीन्\nविशेषेणाधिकान् देवान् ।\nअफाणयत्\nविस्तारयामास ।\nदाशुषे\nयजमानाय तत्समीपे । ‘फण= विस्तारे’ इति धातोः ।\nसुयुक्तान्\nसुयोगरतान् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Prakashasamhita-id\"\u003E‘विशेषेणाधिकत्वेन व्यतयो देवतास्स्मृताः ।\u003Cbr/\u003E नित्ययोगरताश्चैव नारायणपरायणाः ।\u003Cbr/\u003E ता एव चेन्द्रियात्मानस्तान्विस्तारयतीश्वरः ।\u003Cbr/\u003E मन आदीन्द्रियाणां तु शक्तिविस्तार एव तु(हि) ।\u003Cbr/\u003E विस्तारो देवतानां स्याद् भक्तेषु हरिणा कृतः’\u003C/span\u003E\nइति प्रकाशसंहितायाम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६)\u003C/span\u003E\nइति च श्रुतिः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id\"\u003E‘स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्’(तै.उ.१.९(शिक्षावल्लि.९))\u003C/span\u003E\nइति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahabharata-id\"\u003E‘न देवा यष्टिमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संयोजयन्ति तम् ॥’(म.भा.५.३५.३३)\u003C/span\u003E\nइति भारते ।" | | "lines": [ |
| | "व्यतीन्", |
| | "विशेषेणाधिकान् देवान् ।", |
| | "अफाणयत्", |
| | "विस्तारयामास ।", |
| | "दाशुषे", |
| | "यजमानाय तत्समीपे । ‘फण= विस्तारे’ इति धातोः ।", |
| | "सुयुक्तान्", |
| | "सुयोगरतान् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Prakashasamhita-id\"\u003E‘विशेषेणाधिकत्वेन व्यतयो देवतास्स्मृताः ।\u003Cbr/\u003E नित्ययोगरताश्चैव नारायणपरायणाः ।\u003Cbr/\u003E ता एव चेन्द्रियात्मानस्तान्विस्तारयतीश्वरः ।\u003Cbr/\u003E मन आदीन्द्रियाणां तु शक्तिविस्तार एव तु(हि) ।\u003Cbr/\u003E विस्तारो देवतानां स्याद् भक्तेषु हरिणा कृतः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रकाशसंहितायाम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६)\u003C/span\u003E", |
| | "इति च श्रुतिः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyopanishat-id\"\u003E‘स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्’(तै.उ.१.९(शिक्षावल्लि.९))\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Mahabharata-id\"\u003E‘न देवा यष्टिमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संयोजयन्ति तम् ॥’(म.भा.५.३५.३३)\u003C/span\u003E", |
| | "इति भारते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,266: |
Line 1,116: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "तक्वो\nजगत्कर्ता । ‘तक=निर्माणे’ इति धातोः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः’(ऋ.सं.३.३३.४)\u003C/span\u003E\nइति(इत्यादि) प्रयोगाच्च ।\nनेता\n(च सर्वस्य) चाशेषस्य। तदेव वपुस्सः । यत्तज्जगत्कर्तृनेतृरूपम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E‘देहदेहिविभागश्च न क्वचित्परमेश्वरे । गुणतद्वद्विभागो वा नेह नानेति हि श्रुतिः॥’\u003C/span\u003E\nइति पाद्मे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।\u003Cbr/\u003E ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः’॥\u003C/span\u003E\nइति(इत्यादि) श्रुतेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "तक्वो", |
| | "जगत्कर्ता । ‘तक=निर्माणे’ इति धातोः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Rigveda-id\"\u003E‘न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः’(ऋ.सं.३.३३.४)\u003C/span\u003E", |
| | "इति(इत्यादि) प्रयोगाच्च ।", |
| | "नेता", |
| | "(च सर्वस्य) चाशेषस्य। तदेव वपुस्सः । यत्तज्जगत्कर्तृनेतृरूपम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Padma-id\"\u003E‘देहदेहिविभागश्च न क्वचित्परमेश्वरे । गुणतद्वद्विभागो वा नेह नानेति हि श्रुतिः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति पाद्मे ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’\u003C/span\u003E", |
| | "।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।\u003Cbr/\u003E ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः’॥\u003C/span\u003E", |
| | "इति(इत्यादि) श्रुतेश्च ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,275: |
Line 1,138: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Purushottanasamhita-id\"\u003E‘विशुद्धविज्ञानमरीचिमालया (वि)सचित्ररत्नप्रकरप्रकाशया ।\u003Cbr/\u003E प्रकाशिताशेषजगत्स्वरूपया प्रभुः सदा ह्लादतनुर्विभूषितः॥’\u003C/span\u003E\nइति पुरुषोत्तमसंहितायाम् ।\nउपमा\nउपमायाम् उपमाविषये,\nअमुच्यत\nत्यक्तोऽभवत् । निरुपम इत्यर्थः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘अल्पाक्षरेण शक्येऽपि वक्तुं बह्वक्षरं यदि ।\u003Cbr/\u003E उक्तस्याऽधिक्यमेवात्र निषेधेऽशेषतो भवेत्॥’\u003C/span\u003E\nइति (च)शब्दनिर्णये ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Purushottanasamhita-id\"\u003E‘विशुद्धविज्ञानमरीचिमालया (वि)सचित्ररत्नप्रकरप्रकाशया ।\u003Cbr/\u003E प्रकाशिताशेषजगत्स्वरूपया प्रभुः सदा ह्लादतनुर्विभूषितः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति पुरुषोत्तमसंहितायाम् ।", |
| | "उपमा", |
| | "उपमायाम् उपमाविषये,", |
| | "अमुच्यत", |
| | "त्यक्तोऽभवत् । निरुपम इत्यर्थः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘अल्पाक्षरेण शक्येऽपि वक्तुं बह्वक्षरं यदि ।\u003Cbr/\u003E उक्तस्याऽधिक्यमेवात्र निषेधेऽशेषतो भवेत्॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति (च)शब्दनिर्णये ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,284: |
Line 1,156: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४)" | | "lines": [ |
| | "अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः । भिनत्कनीन(निन) ओदनं पच्यमानं परो गिरा ॥ २ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.१४)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,293: |
Line 1,167: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "(विश्वा)\nविश्वान्\nद्विषो\nअज्ञानपापादीन् अतीत्य\nशक्रो\n(शक्तो)विष्णुः स्वभक्तान्(क्तम्)अतिवहत्येव हि ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id\"\u003E‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(कठ.उ.१.२.२३)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।\u003Cbr/\u003E भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्’(भगी.१२.७)\u003C/span\u003E\n(इत्यादिना)इत्यादिप्रसिद्धमुशब्देनाऽह । द्विषोऽतीत्यातिशयेनाऽत्मानं (प्रत्येवोहतेति)प्रत्योहतेति\nअति\nशब्दद्वयार्थः ।\nओदनम्\nउन्दतेः कर्म बन्धनम् अभिनत्। भगवान् कानीनो बादरायणः,\nपरः\nपरमात्मा, गिरैव पच्यमानं परिपाककाले ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vyasasamhita-id\"\u003E‘संश्लेषादोदनं कर्म पच्यमानं गिरैव हि । अभिनद्भगवान् व्यासः स्वभक्तानामशेषतः’\u003C/span\u003E\nइति व्याससंहितायाम् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "(विश्वा)", |
| | "विश्वान्", |
| | "द्विषो", |
| | "अज्ञानपापादीन् अतीत्य", |
| | "शक्रो", |
| | "(शक्तो)विष्णुः स्वभक्तान्(क्तम्)अतिवहत्येव हि ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Kathopanishat-id\"\u003E‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(कठ.उ.१.२.२३)\u003C/span\u003E", |
| | ",", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।\u003Cbr/\u003E भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्’(भगी.१२.७)\u003C/span\u003E", |
| | "(इत्यादिना)इत्यादिप्रसिद्धमुशब्देनाऽह । द्विषोऽतीत्यातिशयेनाऽत्मानं (प्रत्येवोहतेति)प्रत्योहतेति", |
| | "अति", |
| | "शब्दद्वयार्थः ।", |
| | "ओदनम्", |
| | "उन्दतेः कर्म बन्धनम् अभिनत्। भगवान् कानीनो बादरायणः,", |
| | "परः", |
| | "परमात्मा, गिरैव पच्यमानं परिपाककाले ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Vyasasamhita-id\"\u003E‘संश्लेषादोदनं कर्म पच्यमानं गिरैव हि । अभिनद्भगवान् व्यासः स्वभक्तानामशेषतः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति व्याससंहितायाम् ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,302: |
Line 1,195: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम् ।\nस पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम् ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१५)" | | "lines": [ |
| | "अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम् ।", |
| | "स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम् ॥ ३ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९/१५)" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,311: |
Line 1,207: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अर्भक\nइव स्थितः ।\nनवं\nरथम्\nअध्यतिष्ठत् ।\nकुमारकः\nकुत्सितमारकः । अर्भक इव सूक्ष्मदेहः। पूर्वं पूर्वं देहं परित्यज्य नवं नवं देहमध्यतिष्ठज्जीवमादाय ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Manyasamhitayam-id\"\u003E‘जीवदेहं परित्यज्य सह जीवेन चेश्वरः ।\u003Cbr/\u003E जीवस्यान्यच्छरीरं च समुत्पाद्य विशत्यजः’\u003C/span\u003E\nइति मान्यसंहितायाम् ।\nकुमारक इवार्भकः सूक्ष्मदेह इति च(वा) । अर्भकः सूक्ष्मदेहोऽपि न (कुमारक) कुमार इति वा । सपक्षत् परिपक्वज्ञानादिगुणकमकरोत् । महिषं महान्तं ब्रह्माणम् । मृगं मृगयन्तं स्वात्मानम् । पित्रे स्वस्मै, मात्रे लक्ष्म्यै च, विभुक्रतुं पूर्णज्ञानम् । पितृमातृविषये पूर्णज्ञानम् । पुनः पूरयामासेत्यर्थः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘ज्ञानपूर्णं विधातारं मोक्षदानेन केशवः ।\u003Cbr/\u003E स्वपुत्रं पूरयामास महिषं महतां महान्’\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्ते ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अर्भक", |
| | "इव स्थितः ।", |
| | "नवं", |
| | "रथम्", |
| | "अध्यतिष्ठत् ।", |
| | "कुमारकः", |
| | "कुत्सितमारकः । अर्भक इव सूक्ष्मदेहः। पूर्वं पूर्वं देहं परित्यज्य नवं नवं देहमध्यतिष्ठज्जीवमादाय ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Manyasamhitayam-id\"\u003E‘जीवदेहं परित्यज्य सह जीवेन चेश्वरः ।\u003Cbr/\u003E जीवस्यान्यच्छरीरं च समुत्पाद्य विशत्यजः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति मान्यसंहितायाम् ।", |
| | "कुमारक इवार्भकः सूक्ष्मदेह इति च(वा) । अर्भकः सूक्ष्मदेहोऽपि न (कुमारक) कुमार इति वा । सपक्षत् परिपक्वज्ञानादिगुणकमकरोत् । महिषं महान्तं ब्रह्माणम् । मृगं मृगयन्तं स्वात्मानम् । पित्रे स्वस्मै, मात्रे लक्ष्म्यै च, विभुक्रतुं पूर्णज्ञानम् । पितृमातृविषये पूर्णज्ञानम् । पुनः पूरयामासेत्यर्थः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘ज्ञानपूर्णं विधातारं मोक्षदानेन केशवः ।\u003Cbr/\u003E स्वपुत्रं पूरयामास महिषं महतां महान्’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्ते ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,320: |
Line 1,229: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "यथास्थिताः प्रज्ञाताः । इतस्ततः संयोजनं विना यथास्थितशंसनं पथः(थिः) प्राप्तिः ॥" | | "lines": [ |
| | "यथास्थिताः प्रज्ञाताः । इतस्ततः संयोजनं विना यथास्थितशंसनं पथः(थिः) प्राप्तिः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,329: |
Line 1,240: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद ।" | | "lines": [ |
| | "स यो व्याप्तो गतश्रीरिव मन्येताविहृतं षोळशिनं शंसयेन्नेच्छन्दसां कृच्छ्रादवपद्या इत्यथ यः पाप्मानमपजिघांसुः स्याद् विहृतं षोळशिनं शंसयेद् व्यतिषक्त इव वै पुरुषः पाप्मना व्यतिषक्तमेवास्मै तत् पाप्मानं शमलमप हन्त्यप पाप्मानं हते य एवं वेद ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,338: |
Line 1,251: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "व्याप्तो\nविशेषेणापन्नः ।\nअविहृतम्\nअसंसृष्टम् ।\nकृच्छ्राद्\nअयथावस्थितशंसननिमित्ताद् दुःखादवाग्गतिं गतश्रीकतामेव न प्राप्नुयाम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘विलोमः शत्रुज (क्ष)यकृत्संसर्गः पापनाशनः ।\u003Cbr/\u003E यथास्थितः श्रीकरः स्यात्स्वाध्यायः शंसनेऽपि च’\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्ते\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Svadhyayatattva-id\"\u003E‘गतश्रियः श्रियो हानिं पापहानिं परस्य च ।\u003Cbr/\u003E संसर्गश्छन्दसां कुर्याच्छ्रियो वृद्धिं यथास्थितः’\u003C/span\u003E\nइति स्वाध्यायतत्वे ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘किञ्चित्वे चोभयत्वे च संशये सदृशे तथा । इवशब्दः प्रयुज्येत न्यक्कारेऽपि च पण्डितैः॥’\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\nअतो गतश्रीत्वसंशयेऽपीत्यर्थः ।इतस्ततो विशेषेण संहृतं (संयोजितं)\nविहृतम्\n।" | | "lines": [ |
| | "व्याप्तो", |
| | "विशेषेणापन्नः ।", |
| | "अविहृतम्", |
| | "असंसृष्टम् ।", |
| | "कृच्छ्राद्", |
| | "अयथावस्थितशंसननिमित्ताद् दुःखादवाग्गतिं गतश्रीकतामेव न प्राप्नुयाम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘विलोमः शत्रुज (क्ष)यकृत्संसर्गः पापनाशनः ।\u003Cbr/\u003E यथास्थितः श्रीकरः स्यात्स्वाध्यायः शंसनेऽपि च’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्ते", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Svadhyayatattva-id\"\u003E‘गतश्रियः श्रियो हानिं पापहानिं परस्य च ।\u003Cbr/\u003E संसर्गश्छन्दसां कुर्याच्छ्रियो वृद्धिं यथास्थितः’\u003C/span\u003E", |
| | "इति स्वाध्यायतत्वे ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘किञ्चित्वे चोभयत्वे च संशये सदृशे तथा । इवशब्दः प्रयुज्येत न्यक्कारेऽपि च पण्डितैः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "अतो गतश्रीत्वसंशयेऽपीत्यर्थः ।इतस्ततो विशेषेण संहृतं (संयोजितं)", |
| | "विहृतम्", |
| | "।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,347: |
Line 1,276: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Svadhyayatattve-id\"\u003E‘पापानां व्यतिषिक्तत्वाद्व्यतिषक्तं विनाशकम् । \u003Cbr/\u003Eधनस्याव्यतिषङ्गेण व्यतिषङ्गोविनाशकः ।\u003Cbr/\u003E सदृशं सदृशस्यैव यतः स्यात्प्रविनाशकम् ।\u003Cbr/\u003E तथाप्यप्राप्तनाशस्य धनस्य बलवत्त्वतः ।\u003Cbr/\u003E शक्नुयान्न विनाशाय पापस्येच्छासमेधितम् ।\u003Cbr/\u003E संसृष्टं स्याद्विनाशाय नहीच्छा धनसङ्क्षये॥’\u003C/span\u003E\nइति स्वाध्यायतत्वे ।\nअव्यतिषक्तत्वं च मोक्षे विद्यत इत्यत्रोभयार्थ इवशब्दः । एवम्भूतेन शंसनेन\nपाप्मानम्\nअपहन्ति ।\nशमलं\nरागादिकं च । पापस्य पृथगुक्तेः ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘शमलं पापमुद्दिष्टं रागद्वेषादिकं तथा ।\u003Cbr/\u003E अपराधश्च शमलं मलं च शमलं विदुः॥’\u003C/span\u003E\nइति शब्दनिर्णये ।\nय एवमुपास्ते सोऽपि पाप्मानमपहन्ति ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘ऋक्षु संसृज्यमानासु प्रोच्यमानं जनार्दनम् ।\u003Cbr/\u003E पुंसंसृष्टस्य पापस्य निहन्तारं विशेषतः ।\u003Cbr/\u003E तत्प्रसादेन मुक्तस्य पापासंसृष्टतामपि ।\u003Cbr/\u003E ध्यायन्कर्माणि कृत्वापि मुच्यते सर्वपातकैः॥’\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्ते ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Svadhyayatattve-id\"\u003E‘पापानां व्यतिषिक्तत्वाद्व्यतिषक्तं विनाशकम् । \u003Cbr/\u003Eधनस्याव्यतिषङ्गेण व्यतिषङ्गोविनाशकः ।\u003Cbr/\u003E सदृशं सदृशस्यैव यतः स्यात्प्रविनाशकम् ।\u003Cbr/\u003E तथाप्यप्राप्तनाशस्य धनस्य बलवत्त्वतः ।\u003Cbr/\u003E शक्नुयान्न विनाशाय पापस्येच्छासमेधितम् ।\u003Cbr/\u003E संसृष्टं स्याद्विनाशाय नहीच्छा धनसङ्क्षये॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति स्वाध्यायतत्वे ।", |
| | "अव्यतिषक्तत्वं च मोक्षे विद्यत इत्यत्रोभयार्थ इवशब्दः । एवम्भूतेन शंसनेन", |
| | "पाप्मानम्", |
| | "अपहन्ति ।", |
| | "शमलं", |
| | "रागादिकं च । पापस्य पृथगुक्तेः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shabdanirnaya-id\"\u003E‘शमलं पापमुद्दिष्टं रागद्वेषादिकं तथा ।\u003Cbr/\u003E अपराधश्च शमलं मलं च शमलं विदुः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "य एवमुपास्ते सोऽपि पाप्मानमपहन्ति ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘ऋक्षु संसृज्यमानासु प्रोच्यमानं जनार्दनम् ।\u003Cbr/\u003E पुंसंसृष्टस्य पापस्य निहन्तारं विशेषतः ।\u003Cbr/\u003E तत्प्रसादेन मुक्तस्य पापासंसृष्टतामपि ।\u003Cbr/\u003E ध्यायन्कर्माणि कृत्वापि मुच्यते सर्वपातकैः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्ते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 5,356: |
Line 1,298: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
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| "text": "न चैवमादिवाक्यानां स्वार्थे प्रामाण्याभावः । सिद्धार्थे प्रामाण्यस्य साधितत्वात् । अविरोधाच्च । न च बह्नर्थेषु तात्पर्यकल्पने कल्पनागौरवम् । वचनेनैव प्रतीयमानत्वाद् अर्थस्य कल्पनाभावात् । न च वाचनिकार्थस्तात्पर्यार्थ इति विशेषः । तन्मानाभावात् ॥" | | "lines": [ |
| | "न चैवमादिवाक्यानां स्वार्थे प्रामाण्याभावः । सिद्धार्थे प्रामाण्यस्य साधितत्वात् । अविरोधाच्च । न च बह्नर्थेषु तात्पर्यकल्पने कल्पनागौरवम् । वचनेनैव प्रतीयमानत्वाद् अर्थस्य कल्पनाभावात् । न च वाचनिकार्थस्तात्पर्यार्थ इति विशेषः । तन्मानाभावात् ॥" |
| | ] |
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| "text": "यत्र वाचनिकार्थादन्यस्तात्पर्यार्थः प्रतीयते लौकिकवाक्येषु न तत्र साक्षाद्वचनं प्रबोधकम् । वचनलिङ्गा(लिङ्गका)नुमा हि सा । विरोधादमुख्यवृत्तिर्वा । आप्तत्वनिश्चये । आप्तत्वानिश्चये प्रामाण्यमेव न भवति ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्र वाचनिकार्थादन्यस्तात्पर्यार्थः प्रतीयते लौकिकवाक्येषु न तत्र साक्षाद्वचनं प्रबोधकम् । वचनलिङ्गा(लिङ्गका)नुमा हि सा । विरोधादमुख्यवृत्तिर्वा । आप्तत्वनिश्चये । आप्तत्वानिश्चये प्रामाण्यमेव न भवति ॥" |
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| "text": "वेदवाक्यस्य तु वाचनिकार्थं विना नैवान्यो युज्यते ॥" | | "lines": [ |
| | "वेदवाक्यस्य तु वाचनिकार्थं विना नैवान्यो युज्यते ॥" |
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| "text": "वाचनिकानां तु बहूनामप्यविरोधे स्वीकार्यता ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id\"\u003E‘ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि’(ब्र.सू.४.४.१६)\u003C/span\u003E\nइति सूत्रम् ।" | | "lines": [ |
| | "वाचनिकानां तु बहूनामप्यविरोधे स्वीकार्यता ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id\"\u003E‘ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि’(ब्र.सू.४.४.१६)\u003C/span\u003E", |
| | "इति सूत्रम् ।" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Soukarayanashruti-id\"\u003E‘वानात्सूतेर्देवनाद्वासुदेवो वासाद्द्युतेश्छादनात्क्रीडया वा । \u003Cbr/\u003E बलादसुत्वाद् दातृतो वर्तनाच्च तं वासुदेवं प्रवदन्ति वेदाः॥’\u003C/span\u003E\nइत्यादि च सौकरायणश्रुतिः ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Soukarayanashruti-id\"\u003E‘वानात्सूतेर्देवनाद्वासुदेवो वासाद्द्युतेश्छादनात्क्रीडया वा । \u003Cbr/\u003E बलादसुत्वाद् दातृतो वर्तनाच्च तं वासुदेवं प्रवदन्ति वेदाः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादि च सौकरायणश्रुतिः ।" |
| | ] |
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| "text": "मोक्षेऽपि सुप्तिरस्तीत्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमेवान्यतरपदम् ।" | | "lines": [ |
| | "मोक्षेऽपि सुप्तिरस्तीत्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमेवान्यतरपदम् ।" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id\"\u003E‘रूढियोगौ विना कश्चिन्नैवार्थो वेदगो भवेत् ।\u003Cbr/\u003E तत्रापि यौगिको मुख्यः सर्वत्रास्ति स वैदिके ।\u003Cbr/\u003E अनवस्थानिवृत्त्यर्थं यौगिके रूढकल्पना ।\u003Cbr/\u003E ज्ञाते विशेषविज्ञानं व्यवहारोऽपि रूढितः॥’\u003C/span\u003E\nइति ब्रह्मतर्के ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmatarka-id\"\u003E‘रूढियोगौ विना कश्चिन्नैवार्थो वेदगो भवेत् ।\u003Cbr/\u003E तत्रापि यौगिको मुख्यः सर्वत्रास्ति स वैदिके ।\u003Cbr/\u003E अनवस्थानिवृत्त्यर्थं यौगिके रूढकल्पना ।\u003Cbr/\u003E ज्ञाते विशेषविज्ञानं व्यवहारोऽपि रूढितः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति ब्रह्मतर्के ॥" |
| | ] |
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| "text": "वाचनिकमर्थं परित्यज्य नियोगार्थकल्पने श्रुतहानिरश्रुतकल्पनेति सर्वदोषाधिकौ तस्य व्यर्थमापद्येते । एवं च वदतो विधिशब्दा निरर्थकाः सिद्धार्था वा?, सिद्धशब्दाः वा स्वार्थे प्रमाणभूता इत्युक्ते किमुत्तरम् ? न च कारणं किञ्चिद्वाचनिकानां बहूनामप्यर्थानां त्यागे । प्रतीयमाने तु विरोधे तदन्योऽर्थः स्वीकार्यो वाचनिक एव । सोऽपि वाचनिक एवेत्यपि तत एव सिद्ध्यति ।" | | "lines": [ |
| | "वाचनिकमर्थं परित्यज्य नियोगार्थकल्पने श्रुतहानिरश्रुतकल्पनेति सर्वदोषाधिकौ तस्य व्यर्थमापद्येते । एवं च वदतो विधिशब्दा निरर्थकाः सिद्धार्था वा?, सिद्धशब्दाः वा स्वार्थे प्रमाणभूता इत्युक्ते किमुत्तरम् ? न च कारणं किञ्चिद्वाचनिकानां बहूनामप्यर्थानां त्यागे । प्रतीयमाने तु विरोधे तदन्योऽर्थः स्वीकार्यो वाचनिक एव । सोऽपि वाचनिक एवेत्यपि तत एव सिद्ध्यति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘मुख्यार्थानां च सर्वेषां तारतम्यं (च) तु विद्यते ।\u003Cbr/\u003E तत्राऽपि परमो मुख्यो वाच्योऽशेषरवैर्हरिः ।\u003Cbr/\u003E (तत्र मुख्यविरोधेन)तत्तन्मुख्याविरोधेन तदन्यार्थस्य सङ्ग्रहः ।\u003Cbr/\u003E स्वतो मुख्यविरोधे तु त्याज्योऽन्योऽर्थोऽखिलेष्वपि ।\u003Cbr/\u003E इति सर्वत्र नियमः शब्दार्थज्ञानभूमिषु’\u003C/span\u003E\nइति च ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘मुख्यार्थानां च सर्वेषां तारतम्यं (च) तु विद्यते ।\u003Cbr/\u003E तत्राऽपि परमो मुख्यो वाच्योऽशेषरवैर्हरिः ।\u003Cbr/\u003E (तत्र मुख्यविरोधेन)तत्तन्मुख्याविरोधेन तदन्यार्थस्य सङ्ग्रहः ।\u003Cbr/\u003E स्वतो मुख्यविरोधे तु त्याज्योऽन्योऽर्थोऽखिलेष्वपि ।\u003Cbr/\u003E इति सर्वत्र नियमः शब्दार्थज्ञानभूमिषु’\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
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| "text": "न च क्रियायामेव प्रयोजनं न सिद्ध इति युक्तम् । ज्ञानमात्रेऽपि महाप्रयोजनदर्शनात्(दृष्टेः) पितृजीवनादिवाक्ये । आह च स्वयं भगवान्–" | | "lines": [ |
| | "न च क्रियायामेव प्रयोजनं न सिद्ध इति युक्तम् । ज्ञानमात्रेऽपि महाप्रयोजनदर्शनात्(दृष्टेः) पितृजीवनादिवाक्ये । आह च स्वयं भगवान्–" |
| | ] |
| }, | | }, |
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Line 1,413: |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।\u003Cbr/\u003E क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।\u003Cbr/\u003E उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।\u003Cbr/\u003E यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।\u003Cbr/\u003E यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।\u003Cbr/\u003E अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।\u003Cbr/\u003E यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।\u003Cbr/\u003E स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।\u003Cbr/\u003E इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।\u003Cbr/\u003E एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥’(भ.गी.१५.१६-२०)\u003C/span\u003E\nइति ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)\u003C/span\u003E\nइति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Praman-id\"\u003E‘ध्यानं त्वखिलकर्मभ्यो ध्यानाच्च ज्ञानमुत्तमम् ।\u003Cbr/\u003E न ज्ञानसदृशं किञ्चित् पुरुषार्थप्रसिद्धये॥’\u003C/span\u003E\nइति (च) प्रवृत्ते ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय।’(भ.गी.२.४९)\u003C/span\u003E\nइति च ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।\u003Cbr/\u003E क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।\u003Cbr/\u003E उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।\u003Cbr/\u003E यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।\u003Cbr/\u003E यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।\u003Cbr/\u003E अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।\u003Cbr/\u003E यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।\u003Cbr/\u003E स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।\u003Cbr/\u003E इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।\u003Cbr/\u003E एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥’(भ.गी.१५.१६-२०)\u003C/span\u003E", |
| | "इति ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप’(भ.गी.४.३३)\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Praman-id\"\u003E‘ध्यानं त्वखिलकर्मभ्यो ध्यानाच्च ज्ञानमुत्तमम् ।\u003Cbr/\u003E न ज्ञानसदृशं किञ्चित् पुरुषार्थप्रसिद्धये॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति (च) प्रवृत्ते ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय।’(भ.गी.२.४९)\u003C/span\u003E", |
| | "इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Karmaviveka-id\"\u003E‘अशेषकर्मपूगोऽपि न विष्णुध्यानलेशभाक् ।\u003Cbr/\u003E तच्च ध्यानं हरेर्ज्ञानकोट्यंशाय न पूर्यते’\u003C/span\u003E\nइति कर्मविवेके ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyaranyaka-id\"\u003E‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१३)\u003C/span\u003E\nइति च श्रुतिः ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Karmaviveka-id\"\u003E‘अशेषकर्मपूगोऽपि न विष्णुध्यानलेशभाक् ।\u003Cbr/\u003E तच्च ध्यानं हरेर्ज्ञानकोट्यंशाय न पूर्यते’\u003C/span\u003E", |
| | "इति कर्मविवेके ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Taittiriyaranyaka-id\"\u003E‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१३)\u003C/span\u003E", |
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| | ] |
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| "text": "न च कर्ममात्रे पर्यवसितिर्वेदस्य । सुखज्ञानस्यैव प्रयोजनत्वात् । अतः सिद्धस्यैव प्रयोजनत्वं (वाच्यम् /सिद्धम्)।" | | "lines": [ |
| | "न च कर्ममात्रे पर्यवसितिर्वेदस्य । सुखज्ञानस्यैव प्रयोजनत्वात् । अतः सिद्धस्यैव प्रयोजनत्वं (वाच्यम् /सिद्धम्)।" |
| | ] |
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| "text": "प्रशंसादीनां च तात्पर्यं वाचनिकार्थात्यागेनैव कथितं स्वयं भगवता,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id\"\u003E‘ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति’(ब्र.सू.३.१.७)\u003C/span\u003E\nइति । तस्माद् विरुद्धवत्प्रतीयमानानि प्रशंसादीनि ज्ञानसहकार्यपेक्षया योजनीयानि । पुराणादीनां तु श्रुत्यादि विरोधे गौणोऽप्यर्थो युज्यते ।" | | "lines": [ |
| | "प्रशंसादीनां च तात्पर्यं वाचनिकार्थात्यागेनैव कथितं स्वयं भगवता,", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id\"\u003E‘ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति’(ब्र.सू.३.१.७)\u003C/span\u003E", |
| | "इति । तस्माद् विरुद्धवत्प्रतीयमानानि प्रशंसादीनि ज्ञानसहकार्यपेक्षया योजनीयानि । पुराणादीनां तु श्रुत्यादि विरोधे गौणोऽप्यर्थो युज्यते ।" |
| | ] |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Varahapurana-id\"\u003E‘कुहकञ्चेन्द्रजालं च विरुद्धाचरणानि च ।\u003Cbr/\u003E दर्शयित्वा जनं सर्वं मोहयाशु महेश्वर॥’\u003C/span\u003E\nइत्यादि वाराहे ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Varahapurana-id\"\u003E‘कुहकञ्चेन्द्रजालं च विरुद्धाचरणानि च ।\u003Cbr/\u003E दर्शयित्वा जनं सर्वं मोहयाशु महेश्वर॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इत्यादि वाराहे ।" |
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| "text": "उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि । मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.७)" | | "lines": [ |
| | "उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि । मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे ॥ १ ॥ (ऋ.मं.८, सू.६९.७)" |
| | ] |
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| "text": "ब्रध्नस्य\nसूर्यस्य\nविष्टपं\nस्वर्गम् उद्\nगन्वहि\nइन्द्रोऽहं च। यत्तदिन्द्रगृहं (ब्रध्नं)ब्रध्नविष्टपं\nमध्वः\nपीत्वा\nतत्र\nसचेवहि\nसुखमनुभवाव । सख्युरिन्द्रस्य त्रिस्सप्तस्थानेषु ।" | | "lines": [ |
| | "ब्रध्नस्य", |
| | "सूर्यस्य", |
| | "विष्टपं", |
| | "स्वर्गम् उद्", |
| | "गन्वहि", |
| | "इन्द्रोऽहं च। यत्तदिन्द्रगृहं (ब्रध्नं)ब्रध्नविष्टपं", |
| | "मध्वः", |
| | "पीत्वा", |
| | "तत्र", |
| | "सचेवहि", |
| | "सुखमनुभवाव । सख्युरिन्द्रस्य त्रिस्सप्तस्थानेषु ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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Line 1,513: |
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| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘एकविंशति दिव्यानि स्थानानि दिवि चक्रिणः ।\u003Cbr/\u003E वज्रिणो वाऽपि तद्भक्तैर्भुज्यन्ते तानि याज्ञिकैः॥’\u003C/span\u003E\nइति प्रवृत्ते ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Pramana-id\"\u003E‘एकविंशति दिव्यानि स्थानानि दिवि चक्रिणः ।\u003Cbr/\u003E वज्रिणो वाऽपि तद्भक्तैर्भुज्यन्ते तानि याज्ञिकैः॥’\u003C/span\u003E", |
| | "इति प्रवृत्ते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते ।\nममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषं जठर आवृषस्व ॥ २ ॥ (ऋ.मं.१०, सू.९६.१३)" | | "lines": [ |
| | "अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते ।", |
| | "ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषं जठर आवृषस्व ॥ २ ॥ (ऋ.मं.१०, सू.९६.१३)" |
| | ] |
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Line 1,537: |
| "chapter": "KNR_C01", | | "chapter": "KNR_C01", |
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| "text": "पूर्वान् (सुतान्) प्रातस्सवनगान् सोमानपाः । हरीनिन्द्रियाणि वर्तयतीति (हरिवः) हरिभिर्वर्तत इति वा । इदं माध्यन्दिनं\nसवनं\nते\nकेवलम्\n।\nअथो\nइत्यर्थान्तरम् ।\nमधुमन्तं\nसोमं\nजठरे\nआवृषस्व\n(आ)सिञ्च,\nममद्धि\nच।\nसत्रा\nअस्मत्त्राणेन सह । पीतशब्दवत् । अपूर्वपानत्वात्तदेव पानं मुख्यमिति पीतशब्दः । इन्द्रस्य केवलत्वात्केवलं माध्यन्दिनं सवनम् । ‘ममद्धि’ इति तृतीयसवनम् । तत्र हि मदो विशेषतो भवति पूर्तेः । इति सवनत्रयरूपता षोळशिनः । वृषण्वत् वृष्णः इन्द्रस्य विशेषतः प्रियत्वात् । एवं चतूरूपता षोळशिनः । राध्नोति ऋद्धो भवति ॥" | | "lines": [ |
| | "पूर्वान् (सुतान्) प्रातस्सवनगान् सोमानपाः । हरीनिन्द्रियाणि वर्तयतीति (हरिवः) हरिभिर्वर्तत इति वा । इदं माध्यन्दिनं", |
| | "सवनं", |
| | "ते", |
| | "केवलम्", |
| | "।", |
| | "अथो", |
| | "इत्यर्थान्तरम् ।", |
| | "मधुमन्तं", |
| | "सोमं", |
| | "जठरे", |
| | "आवृषस्व", |
| | "(आ)सिञ्च,", |
| | "ममद्धि", |
| | "च।", |
| | "सत्रा", |
| | "अस्मत्त्राणेन सह । पीतशब्दवत् । अपूर्वपानत्वात्तदेव पानं मुख्यमिति पीतशब्दः । इन्द्रस्य केवलत्वात्केवलं माध्यन्दिनं सवनम् । ‘ममद्धि’ इति तृतीयसवनम् । तत्र हि मदो विशेषतो भवति पूर्तेः । इति सवनत्रयरूपता षोळशिनः । वृषण्वत् वृष्णः इन्द्रस्य विशेषतः प्रियत्वात् । एवं चतूरूपता षोळशिनः । राध्नोति ऋद्धो भवति ॥" |
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| "text": "विहृतपक्षे तु–\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Ashvalayanashroutasutra-id\"\u003E‘पादान्व्यवधायार्धर्चशः शंसेत् । पूर्वासां पूर्वाणि पदानि । गायत्र्यः पङ्क्तिभिः। पङ्क्तीनां तु द्वे द्वे पदे शिष्येते ताभ्यां प्रणुयात् । उष्णिहो बृहतीभिः । उष्णिहान्तूत्तमान्पादान् द्वौ कुर्यात्। चतुरक्षरमाद्यम् । द्विपदाश्चतुर्धा कृत्वा प्रथमां त्रिष्टुभोत्तरा जगतीभिः । उत्तमायाश्चतुर्थमक्षरमन्त्यं पूर्वस्याऽऽद्यमुत्तरस्य । अनुष्टुभमतिच्छन्दःस्वव(द)दध्यात् । द्वितीयतृतीययोस्तृतीययोः पादयोरवसानत उपदध्यात् प्रचेतनेति पूर्वस्यां प्रचेतयेत्युत्तरस्याम् । उत्तरास्वितरान् पादान् षष्ठान्कृत्वाऽनुष्टुप्कारं शंसेत् ॥’ (आ.श्रौ.सू.६.३.३-१३)\u003C/span\u003E" | | "lines": [ |
| | "विहृतपक्षे तु–", |
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| "text": "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४))" | | "lines": [ |
| | "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्यो वा एष च्छन्दोभ्यः सन्निर्मितो यत् षोळशी तद्यन्महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु सर्वेभ्य एवैनं तच्छन्दोभ्यः सन्निर्मिमीते सर्वेभ्यश्छन्दोभ्यः सन्निर्मितेन षोळशिना राध्नोति य एवं वेद॥(ऐ.ब्रा.४.४,(चतुर्थपञ्चिका.४))" |
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| "text": "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Ashvalayanashroutasutra-id\"\u003E‘एवाह्येवा(वैव) अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् (एवै)एवाहीन्द्रम् अथो इदं सवनं केवलं ते । एवा हि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र वशीहि शक्रः सत्रा वृषं जठर आवृषस्वेति’(आ.श्रौ.सू.६.३.१७)\u003C/span\u003E\n॥" | | "lines": [ |
| | "महानाम्नीनां पञ्चाक्षरानुपसर्गानुपसृजत्येकादशाक्षरेषु पादेषु ।", |
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| "text": "भगवद्भक्तिज्ञानवैराग्यपूर्वकं च कर्म कर्तव्यम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Atharvanopanishat-id\"\u003E‘इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । \u003Cbr/\u003E नाकस्य पृष्ठे सुकृते तेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनकरं वाऽऽविशन्ति॥’((मुण्डक)आथ.२.१०)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।\u003Cbr/\u003E कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे विनार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥’(भाग.१२.१२.५२)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।\u003Cbr/\u003E स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥’(भ.गी.१८.४६)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।\u003Cbr/\u003E ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥’(भ.गी.१९.२०)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥\u003Cbr/\u003E ये मे मतमिदं नित्यमनुतिषष्ठन्ति मानवाः ।\u003Cbr/\u003E श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥\u003Cbr/\u003E ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।\u003Cbr/\u003E सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥’(भ.गी.३.३०-३२)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavata-id\"\u003E‘तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः । \u003Cbr/\u003E क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥’(भाग.२.४.१७)\u003C/span\u003E\n,\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Shruti-id\"\u003E‘एष उ एव दाश्वान् य (एनमेवं)एवं वेद’\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Chandogyopanishat-id\"\u003E‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’(छां.उ.१.१.८(१०))\u003C/span\u003E\n।\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥\u003Cbr/\u003E मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।’(भ.गी.९.११-१२)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bhagavadgeeta-id\"\u003E‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।\u003Cbr/\u003E इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ \u003Cbr/\u003Eमन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । \u003Cbr/\u003Eमामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥’(भ.गी.१८.६४-६५)\u003C/span\u003E\n\u003Cspan class=\"gr-reference gr-ref-Bruhadaranyakopanishat-id\"\u003E‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् । \u003Cbr/\u003Eतिष्ठमानस्य तद्विदः’(बृ.उ.५.९.७(३.९.२८))\u003C/span\u003E\nइत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः ॥" | | "lines": [ |
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